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  • युग निर्माता महाराजा सूरजमल- 5

     02.06.2020
    युग निर्माता महाराजा सूरजमल- 5

    जाट राज्य की स्थापना


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    थूण दुर्ग पर विजय प्राप्त करके सवाई जयसिंह ने 2 दिसम्बर 1722 के दिन बदनसिंह के सिर पर सरदारी की पाग बंधी, राजाओं की भांति उसका तिलक किया और पांच परिधानों के साथ पचरंगी निसान देकर ठाकुर के पद से सम्मानित किया। इस प्रकार बदनसिंह कच्छवाहों का खिदमती जागीरदार बन गया। बदनसिंह को डीग का राजा घोषित किया गया तथा ब्रजराज की उपाधि दी गई। उसकी तरफ से दिल्ली के बादशाह को दिया जाने वाला वार्षिक कर निर्धारित कर दिया गया। इस प्रकार 1722 ई. में भरतपुर नामक नवीन रियासत का गठन हुआ। बदनसिंह अपने पूर्ववर्ती जाट नेताओं से चरित्र एवं स्वभाव में बिल्कुल भिन्न था। वह विनम्र तथा विश्वसनीय था इस कारण वह एक बड़े राज्य की स्थापना कर सका तथा राजा का पद पा सका। उसने अपनी राजधानी डीग में अनेक भवन, पक्का दुर्ग तथा परकोटे का निर्माण करवाया। उसने डीग, कुम्हेर, भरतपुर तथा वैर में किले बनवाये। उसने अपने राज्य को अस्सी लाख रुपये वार्षिक जमा के क्षेत्र तक पहुंचा दिया। उसने जाट, डूंग एवं पालों के सरदारों की कौमी एकता परिषद् का गठन किया तथा उनकी सहायता से शासन करने लगा। उसने अपने दरबार तथा अपनी सेना का गठन मुगल पद्धति के अनुसार किया।

    राजकुमार सूरजमल का जन्म

    कुछ इतिहासकार सूरजमल को बदनसिंह तथा उसकी रानी देवकी का पुत्र मानते हैं जो कामा की रहने वाली थी। जबकि कुछ अन्य इतिहासकार सूरजमल को, सूरजमल के भाई रूपसिंह की विधवा का पुत्र मानते हैं जो रूपसिंह की मृत्यु के बाद, बदनसिंह के महल में आ गई थी तथा बदनसिंह ने उससे धरेजना कर लिया था। सूरजमल का जन्म कब हुआ इसकी निश्चित तिथि नहीं मिलती है। फिर भी माना जाता है कि महाराजा सूरजमल का जन्म फरवरी 1707 में हुआ।

    डीग, कुम्हेर तथा भरतपुर में नये दुर्गों का निर्माण

    डीग कस्बा, आगरा तथा मथुरा के मुख्य मार्ग पर स्थित था। इस कारण डीग पर शत्रुओं के आक्रमण होते ही रहते थे। इन आक्रमणों का प्रतिरोध करने में जाटों को बहुत शक्ति लगानी पड़ती थी। इस कारण बदनसिंह ने ई.1730 में डीग कस्बे के दक्षिण में 20 फुट चौड़ी दीवारों से युक्त एक सुदृढ़ दुर्ग बनवाया। इसी वर्ष कुम्हेर में भी एक दुर्ग बनाया गया। ई.1732 में सूरजमल ने भरतपुर नगर के दक्षिणी हिस्से में लोहागढ़ नामक दुर्ग बनवाना आरम्भ किया। इस दुर्ग का निर्माण आठ साल में पूरा हुआ। राजा बदनसिंह ने ई.1738 में वैर में एक दुर्ग बनवाया। उसने सूरजमल को कुम्हेर तथा प्रतापसिंह को वैर का दुर्ग प्रदान किया ताकि दोनों भाइयों में उत्तराधिकार को लेकर संघर्ष न हो।

    पेशवा बाजीराव को जाटों का जवाब

    राजा बनने के बाद बदनसिंह प्रति वर्ष राजा जयसिंह से मिलने उसकी राजधानी जाता था जहाँ उसका, राजाओं की तरह स्वागत होता था। वह जिस स्थान पर ठहरता था, उस स्थान को बदनपुरा नाम दे दिया गया। ई.1736 में पेशवा बाजीराव जयपुर आया। पेशवा के सम्मान में महाराजा जयसिंह ने जयपुर में एक भव्य दरबार का आयोजन किया। इस दरबार में भरतपुर रियासत के राजकुमार सूरजमल को भेजा गया। इस दौरान सूरजमल का परिचय पेशवा बाजीराव से करवाया गया किंतु बाजीराव ने सूरजमल के कुल को लेकर कुछ अपमान जनक शब्द कहे। सूरजमल उस समय अपने राज्य की नजाकत को समझता था इसलिये वह तो कुछ नहीं बोला किंतु उनके साथ उपस्थित हलेना के ठाकुर शार्दूलसिंह ने पेशवा को स्मरण कराया कि क्षत्रपति शिवाजी तो इससे भी निम्न कुल के थे।

    नादिरशाह का आक्रमण

    1739 ई. में दिल्ली पर फारस के शाह नादिरशाह ने आक्रमण किया जिससे मुगल साम्राज्य की ताकत बहुत कमजोर हो गई और जाटों को अपना राज्य जमाने में अधिक कठिनाई नहीं आई।

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  • अध्याय - 33 मध्य-कालीन भारतीय समाज (सामाजिक संस्थाएं एवं रीति-रिवाज)

     02.06.2020
    अध्याय - 33 मध्य-कालीन भारतीय समाज (सामाजिक संस्थाएं एवं रीति-रिवाज)

    मध्य-कालीन भारतीय समाज


    (सामाजिक संस्थाएं एवं रीति-रिवाज)


    हिन्दू अलग-अलग बैठकर भोजन खाते हैं और उनके भोजन का स्थान गोबर से लिपा चौका होता है। वे उच्छिष्ट का उपयोग नहीं करते हैं और जिन बर्तनों में खाते हैं, यदि वे मिट्टी के होते हैं तो भोजना खाकर बर्तन फैंक देते हैं। - अलबिरूनी, 10-11वीं सदी ईस्वी।


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    मध्य-कालीन भारतीय समाज, प्राचीन काल में विसित हुई सामाजिक संस्थाओं का ही विकसित रूप था। इस काल के जन-जीवन में जाति, कुटुम्ब, विवाह, सोलह संस्कार, दान-पुण्य, हरि-कीर्तन, तीर्थ सेवन आदि परम्पराओं का महत्त्वपूर्ण स्थान था किन्तु इस काल में भारतीय समाज हिन्दू और मुसलमान के रूप में पूरी तरह दो हिस्सों में विभक्त था। दोनों के सामाजिक नियमों तथा व्यवहार में बहुत अन्तर था। मुसलमानों में बराबरी और भाईचारे का सिद्धान्त था जबकि हिन्दुओं में जाति-प्रथा और छुआछूत के कारण समाज के भीतर भारी विषमता थी।

    हिन्दुओं एवं मुसलमानों में विवाह से लेकर उत्तराधिकार के नियमों, मृतकों के संस्कार, वेशभूषा, भोजन और स्वागत के ढंग पूरी तरह अलग-अलग थे। दोनों के तीज-त्यौहार एवं पर्व भी अलग-अलग थे। हिन्दुओं एवं मुसलमानों दोनों में विवाह का निर्णय यद्यपि पारिवारिक होता था किंतु मुसलमानों में उसका आधार जातीय न होकर सामाजिक हैसियत होता था जबकि हिन्दुओं में विवाह का आधार जाति एवं सामाजिक हैसियत दोनों होता था। हिन्दुओं में सहभोज केवल अपनी जाति के लोगों के बीच होता था जबकि मुसलमानों में सहभोज का कोई आधार नहीं था।

    हिन्दुओं में विधवा-विवाह अब भी अच्छा नहीं माना जाता था तथा विधवा-विवाह न के बराबर होते थे किंतु मुसलमानों में विधवा-विवाह पर कोई प्रतिबंध नहीं था। हिन्दुओं में विवाह के बाद विच्छेद का कोई तरीका नहीं था किंतु मुसलमानों में पुरुषों द्वारा बड़ी आसानी से तलाक दिया जा सकता था। हिन्दू एक विवाह करते थे किंतु मुसलमान चार विवाह तक कर सकते थे।

    शहजादे एवं बादशाह कितने भी विवाह कर सकते थे। हिन्दुओं एवं मुसलमानों की संगीत कला, नृत्यकला, चित्रकला एवं स्थापत्यकला में भी भारी अंतर था। सामाजिक रीति-रिवाजों एवं सांस्कृतिक परम्पराओं के अंतर को लेकर हिन्दू और मुसलमान एक-दूसरे को हीन समझते थे और एक-दूसरे से घृणा करते थे। सम्पूर्ण मध्य-काल में यह समस्या बनी रही कि अपने-अपने सुदृढ़ आधारों वाली इन दो सामाजिक एवं सांस्कृतिक व्यवस्थाआंे में सामंजस्य कैसे विकसित हो!

    सम्पूर्ण दिल्ली सल्तनत काल में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच की खाई गहरी तथा चौड़ी होती चली गई। मध्य-कालीन सन्तों ने हिन्दुओं एवं मुसलमानों की बुराइयों को लेकर उनकी आलोचना की तथा लड़ने की बजाए प्रेम की साधना करने का मार्ग सुझाया। मुगल काल में अकबर ने भी हिन्दू और मुसलमानों के धर्म एवं संस्कृति में निकटता लाने के प्रयास किए।

    कला और साहित्य के क्षेत्र में भी हिन्दू और मुस्लिम कला-परम्पराओं के समन्वय के प्रयास हुए किंतु इन दो संस्कृतियों में इतने अधिक अंतर थे कि इन्हें निकट लाना संभव नहीं हो सका। हिन्दुओं के संस्कारों में तिलक लगाना, जनेऊ धारण करना, मूर्ति-पूजा, गौ-पूजा, विष्णु-पूजा, गंगा-स्नान, रामायण एवं गीता का पाठ आदि इतने गहरे पैठ चुके थे कि वे इन बातों को छोड़ नहीं सकते थे जबकि मुसलमानों ने गौ-मांस खाना, हिन्दुओं को बलपूर्वमक मुसलमान बनाना, मंदिरों को तोड़ना आदि बातें इतनी मजबूती से पकड़ रखी थीं कि वे इन्हें छोड़कर हिन्दुओं को गले लगाने को तैयार नहीं थे।

    हिन्दुओं के रीति-रिवाज

    मध्य-काल में हिन्दू-धर्म में सोलह संस्कारों में से केवल जातकर्म, नामकरण, चूड़ाकरण, उपनयन और विवाह संस्कार आदि पांच-छः संस्कार ही प्रचलन में रह गए थे। अबुल फजल ने लिखा है कि जातकर्म संस्कार में बच्चे का जन्म होने पर घी और शहद मिलाकर सोने के छल्ले से शिशु के मुँह में डाला जाता था। बंगाल में महिलाएँ नवजात शिशु की दीर्घायु की कामना करती हुई उस पर हरी घास तथा चावल न्यौछावर करती थीं।

    तुलसीदास और सूरदास ने अपनी रचनाओं में शिशु जन्म के बाद होने वाले 'नंदी मुख श्राद्ध' का उल्लेख किया गया है। इस अवसर पर ब्राह्मणों को स्वर्ण, गाय, कपड़े, भोजन आदि पदार्थ दान स्वरूप दिए जाते थे। परिवार में होने वाले मांगलिक कार्यों एवं त्यौहारों पर घर के दरवाजों पर आम या अशोक के पत्तों की बंदनवार बनाकर लटकाई जाती थे। शिशु जन्म के बाद जन्मकुंडली बनाकर उसके भविष्य के बारे में घोषणा की जाती थी। शिशु-जन्म के चालीस दिन बाद नामकरण संस्कार होता था।

    बंगाल में दूध, दही और हल्दी मिलाकर शिशु के ललाट पर तिलक लगया जाता था। बच्चे की रुचि जानने के लिए बच्चे के सामने धान, भात, मिट्टी, सोना, चाँदी आदि कई वस्तुएँ रख दी जाती थीं और यह देखा जाता था कि वह किसे हाथ लगाता है! शिशु के छः माह का हो जाने पर अन्न-प्राशन्न संस्कार किया जाता था। सूरदास के पदों में आए प्रसंग के अनुसार बालक को खीर, मधु और घी चखाया जाता था जिसे उसका पिता धार्मिक अनुष्ठान के उपरान्त खिलाता था।

    शिशु के तीन वर्ष का होने पर मुंडन संस्कार (चूड़ाकर्म) किया जाता था तथा सिर पर एक चोटी छोड़़कर शेष बाल काट दिए जाते थे। तभी बच्चे का कर्णच्छेदन संस्कार भी किया जाता था अर्थात् उसके दोनों कान छेदे जाते थे। आठ वर्ष की आयु में बच्चे का जनेऊ संस्कार किया जाता था जिसे उपनयन संस्कार भी कहते थे। जनेऊ में तीन सूत होते थे जिसमें प्रत्येक सूत तीन धागों को बुनकर बनाया जाता था। जनेऊ बालक के बाएं कन्धे पर लटकाया जाता था तथा जिसके छोर दाएं हाथ में लपेट दिए जाते थे।

    जनेऊ के तीन सूत- ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक होते हैं तथा उसका सफेद रंग पवित्रता का सूचक है। जनेऊ धारण करने के बाद बालक अपना अध्ययन प्रारम्भ करता था। विद्याध्ययन आरम्भ करने से पहले बालक को गुरु द्वारा गायत्री मंत्र सुनाया जाता था। इस अवसर पर ब्राह्मणों को दक्षिणा एवं निर्धनों को दान दिया जाता था। बालक के विद्याध्ययन की समाप्ति पर समावर्तन संस्कार किया जाता था।

    मुसलमानों के रीति-रिवाज

    मुसलमान परिवारों में पुत्र के पैदा होने को अच्छा समझा जाता था। इस अवसर पर घर में जलसा किया जाता था। सत्रहवीं शताब्दी ईस्वी में इटली से भारत आए मानसी ने अमीर मुस्लिम परिवार में पुत्र जन्म पर मनाये जाने वाले समारोह का वर्णन किया है। पुत्र-जन्म होने पर शिशु के मुँह मंे शहद टपकाया जाता था और माँ का स्तन दबाकर उसमें से दूध की बूँद शिशु के मुख में डाली जाती थी। शिशु को अजान सुनाई जाती थी। अकबर ने शहजादों के जन्म पर हिन्दुओं की तरह जन्मकुडली भी बनवाई थी।

    जन्म के दिन ही शिशु का नाम रखा जाता था। यह कार्य प्रायः दादा के द्वारा किया जाता था। शिशु जन्म के छठे दिन छठी का समारोेेह मनाया जाता था। बालक के स्नान के बाद उसे किसी फकीर के द्वारा पहने गए पुराने कपड़े की कमीज पहनाई जाती थी। अकबर का पहला कपड़ा सूफी सन्त सैयद अली शिराजी की पोशक से तैयार किया गया था। शिशु जन्म के सातवें दिन अकिकाह किया जाता था। इस अवसर पर लड़के के लिए दो तथा लड़की के लिए एक बकरा काटा जाता था।

    उसी दिन लड़के की पहली हजामत होती थी। अबुल फजल ने मुगलों द्वारा अपनाये गए तुर्की रिवाजों का उल्लेख किया है। जब बच्चा चलने लगता था तो शिशु का दादा शिशु को अपनी पगड़ी से धक्का देता था जिससे वह गिर जाए। बालक के चार वर्ष चार महीने तथा चार दिन का होने पर बिस्मिल्लाह या मकतब किया जाता था। खतना या सुन्नत का आयोजन भी बहुत धूमधाम से किया जाता था। अकबर ने 12 वर्ष से पहले खतना करने की मनाही कर दी थी, इसके बाद भी यह काम उस बालक की इच्छा पर छोड़़ दिया जाता था।

    हिन्दुओं में विवाह की पम्पराएं एवं नियम

    मध्य-कालीन भारत में हिन्दू एवं मुसलमान दोनों में विवाह समारोह आज की ही तरह बड़ी धूम-धाम से होते थे। हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों में बाल-विवाह की प्रथा प्रचलित थी। असम में केवल ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों में बाल-विवाह का प्रचलन था। शेष जातियों में वयस्क होने पर ही विवाह होते थे। असम के अतिरिक्त शेष भारत में हिन्दुओं में बेटी का विवाह छः से आठ वर्ष की आयु तक कर दिया जाता था। अधिक उम्र की लड़कियों का पिता के घर में रहना वर्जित माना जाता था।

    बाल-विवाह की स्थिति में सहवास युवा होने पर ही होता था। अकबर ने विवाह की न्यूनतम आयु लड़कों के लिए 16 वर्ष तथा लड़कियों के लिए 14 वर्ष निर्धारित की। विवाह के लिए दुल्हा और दुल्हन के साथ-साथ माता-पिता की सहमति भी अनिवार्य थी। अकबर के पश्चात् किसी बादशाह ने इस आदेश का समुचित पालन नहीं करवाया। हिन्दुओं में रक्त सम्बन्धियों एवं सगोत्रियों के साथ और अन्तर्जातीय विवाहों का निषेध था। अकबर निकट रिश्तेदारों में विवाह का समर्थक नहीं था। उसने किसी नवयुवक द्वारा धन के लोभ में अधेड़ आयु की महिला से विवाह करने की प्रथा को भी गलत माना।

    अकबर ने आदेश दिया कि यदि स्त्री अपने पति से 12 वर्ष से अधिक बड़ी है तो ऐसा विवाह गैर-कानूनी और रद्द माना जाएगा। समाज में दहेज प्रथा प्रचलित थी। अमीर लोग अपनी पुत्री के विवाह में बहुत सा धन दहेज के रूप में दिया करते थे। निर्धन लोग भी इस प्रथा से बचे हुए नहीं थे। महाराष्ट्र के महान् सन्त तुकाराम को भी अपनी बेटी के विवाह के लिए गाँव के लोगों से धन मांगना पड़ा था। अकबर दहेज प्रथा का विरोधी था किन्तु उसने इस बुराई को समाप्त करने का कोई प्रयत्न नहीं किया।

    पिता द्वारा पुत्री को दहेज दिए जाने के साथ-साथ, मामा द्वारा भांजी के विवाह में मायरा (भात) भरने की प्रथा प्रचलित थी। नरसी मेहता को अपनी दोहिती के विवाह में मायरा भरने के लिए ईश्वर से करुण पुकार लगानी पड़ी थी। मध्य-काल में प्रारम्भ में कुछ निम्न जातियों को छोड़कर शेष हिन्दू समाज में विधवा-विवाह पर प्रतिबंध था। किसी भी मध्य-कालीन शासक ने इसे पुनः प्रचलित करने का प्रयास नहीं किया। फलस्वरूप मध्य-काल में बाल-विधवाओं की समस्या विकट थी, जिन्हें घर की चार-दीवारी में रहते हुए नारकीय जीवन व्यतीत करना पड़ता था।

    अकबर ने विधवा-विवाह को कानूनी घोषित किया। उसका मानना था कि जो नवयुवती अपने पति के साथ सुखभोग नहीं कर सकी है, उसे सती नहीं किया जाना चाहिए, उसका विवाह किसी विधुर से कर दिया जाना चाहिए।

    हिन्दुओं में विवाह समरोह

    हिन्दुओं में वर-वधू का चुनाव माता-पिता या घर के बड़े सदस्यों द्वारा किया जाता था। विवाह सम्बन्ध के मामले में लड़के की बात सुनी जाती थी किन्तु लड़कियों को अपने विवाह के बारे में कुछ भी बोलने का अधिकार नहीं था। धनी घरों की लड़कियां इसका अपवाद थीं। कुछ पुरोहित या पुरोहितिनियां या चतुर महिलाएं विवाह-योग्य लड़के-लड़कियों की जानकारी रखती थीं तथा विवाह के लिए परामर्श और सहयोग करती थीं।

    जब दोनों पक्ष विवाह सम्बन्ध के लिए सहमत हो जाते थे तब ज्योतिषियों द्वारा बताए गए शुभ-मुहूर्त के दिन सगाई का दस्तूर किया जाता था। इसमें वर के माथे पर तिलक लगाकर कुछ भेंट दी जाती थीं। यद्यपि हिन्दुओं में विवाह के धार्मिक कृत्य में जाति और प्रान्त के अनुसार काफी अन्तर था तथापि धार्मिक संस्कार एक जैसे थे।

    समकालीन साहित्यिक ग्रन्थों में इन विवाहों के धार्मिक कृत्यों का विवरण मिलता है। दूल्हा सुन्दर वस्त्र धारण करके अश्व पर सवार होता था, जिसके पीछे उसकी सहायता के लिए एक वयस्क पुरुष बैठता था। दूल्हे के साथ सजी हुई बारात दुल्हन के घर जाती थी। बारात के आगे रंग-बिरंगे कपड़ों में सजे बाजे वाले चलते थे, जिनके हाथों में अस्त्र-शस्त्र भी होते थे। बारात में मित्र और सम्बन्धी सम्मिलित होते थे।

    बारात के वधू-पक्ष के घर पहुँचने पर स्वागत किया जाता था और व्यंजन परोसे जाते थे जिसे ज्यौनार कहा जाता था। वर और वधू एक-दूसरे को माला पहनाते थे। पुरोहितों द्वारा वैदिक मन्त्र उच्चारित किए जाते थे और अग्निकुण्ड में आहुतियां देकर देवताओं का आह्वान किया जाता था। वर-वधू उस अग्निकुण्ड के चारों ओर सात फेरे लेते थे। वधू के पिता द्वारा कन्यादान किया जाता था। वधू को लाल चूड़ियां पहनाई जाती थीं और उसकी मांग में सिंदूर भरा जाता था।

    वधू का पिता वर तथा उसके सम्बन्धियों को नकद, स्वर्ण तथा वस्त्र के रूप में उपहार देता था। इसके बाद वर अपनी वधू को लेकर अपने पिता के घर आता था। अकबर ने आदेश जारी किए कि अमीर-उमराव शादी में मुबारकबाद के रूप में केवल दो नारियल भेंट करें। एक तो उस अधिकारी की ओर से तथा दूसरा बादशाह सलामत की ओर से माना जाएगा।

    मुसलमानों में विवाह समारोह

    मुस्लिम नियमों के अनुसार माँ का दूध टालकर अर्थात् सगी बहिन को छोड़कर किसी भी स्त्री से विवाह किया जा सकता था और कोई भी व्यक्ति चार स्त्रियों तक से विवाह कर सकता था। बहुविवाह के कारण बहुत से परिवारों में कलह और अनैकतिकता आ जाती थी। अकबर से पूर्व किसी भी शासक ने बहुविवाह प्रथा पर अंकुश लगाने का प्रयास नहीं किया था। यद्यपि अकबर के इबादतखाने के उलेमा 'निकाह' के द्वारा चार औरतों से तथा 'मूता' के अन्तर्गत कितनी भी औरतों से विवाह के समर्थक थे, किंतु अकबर ने आदेश दिया कि साधारण आय वाले व्यक्ति को केवल एक विवाह करना चाहिए, यदि पहली पत्नी निःसंतान हो तो दूसरे विवाह के बारे में सोचना चाहिए।

    अकबर का मानना था कि एक से अधिक पत्नी रखना व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिए घातक है तथा इससे परिवार में व्यवस्था भी नहीं रहती। मुसलमानों में वैवाहिक सम्बन्ध 'कव्वाल' निर्धारित करते थे। इस कार्य के लिए परिवार से 1 दाम से 10 मुहर तक शुल्क वसूल किया जाता था। उच्च राजकीय अधिकारियों एवं दरबारियों के लड़के-लड़कियों के विवाह से पहले शाही अनुमति ली जाती थी। मुगल बादशाहों ने अपनी लड़कियों की शादी नहीं करने का रिवाज बना रखा था किंतु औरंगजेब ने कुछ मुसलमान फकीरों के कहने पर अपनी दो पुत्रियों मेहरून्निसा और जुबेदामुन्निसा का विवाह किया था।

    मुसलमानों में विवाह समारोह दुल्हन के घर से 'सचाक' (चार मूल्यवान उपहार) और मेहन्दी भेजने से आरम्भ होता था। सुन्दर तश्तरियों में फल, मिठाईयां और रुपए सजाकर भेजे जाते थे। परिवार की महिलाएं दूल्हे के हाथों पर मेहंदी लगाती थीं। विवाह के मजहबी काम काजी पूरे करता था। इसमें दुल्हन की औपचारिक स्वीकारोक्ति प्राप्त की जाती थी तथा दूल्हे के द्वारा इबादत तथा मेहर की घोषण से शादी की रस्म पूरी होती थी। शाही के अंत में कुरान पढ़ी जाती थी।

    हिन्दुओं में विवाह विच्छेद

    हिन्दू किसी भी परिस्थिति में अपनी पत्नी को तलाक नहीं दे सकता था कई बार विभिन्न कारणों से पति-पत्नी अलग रहते थे किंतु उनमें विवाह विच्छेद की कोई कानूनी, सामाजिक या धार्मिक रीति नहीं थी।

    मुसलमानों में विवाह विच्छेद

    मुसलमानों में तलाक को अच्छा नहीं समझा जाता था फिर भी उनमें तीन तलाक की प्रथा प्रचलित थी जिसमें पति अपनी पत्नी से असंतुष्ट होने पर तीन बार- 'तलाक' शब्द का उच्चारण करके उसे छोड़ देता था। इस अवसर पर उसे अपनी छोड़ी गई पत्नी को मेहर की रकम चुकानी होती थी। यदि पति पुनः उसी स्त्री से विवाह करता चाहता था तो उस स्त्री को किसी दूसरे व्यक्ति से विवाह करके उसके साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने के बाद दूसरे पति को तलाक देकर पुनः पहले पति से विवाह किया जा सकता था। इसे हलाला करना कहते थे।

    हिन्दुओं के मृतक संस्कार

    हिन्दुओं मंे अंतिम संस्कार का बड़ा महत्त्व था, क्योंकि वे इहलोक से परलोक को अधिक मान्यता देते थे। इनके मुख्य अनुष्ठान दाह-संस्कार, उदकर्म, असौच, अस्थि-संचयन, शान्ति-कर्म और सपिंडी कर्म थे। अबुल फजल ने कुछ ऐसे वर्गों का उल्लेख किया है जिनके लिए दाह-संस्कार वर्जित था। धर्मशास्त्र के अनुसार छोटे बच्चों और तपस्वियों के लिए भू-समाधि एवं जल-समाधि का प्रावधान था। जब व्यक्ति मरणासन्न हो जाता था तब उसे चारपाई से उठाकर जमीन पर लिटा देते थे।

    उसका सिर उत्तर की तरफ रहता था तथा उस पर हरी दूब बिखेर कर गाय का गोबर लगाते थे। उसके मस्तक पर पवित्र गंगाजल डालकर मुँह में तथा वक्षस्थल पर तुलसीदल रखते थे। मरणासन्न व्यक्ति को भवसागर पार कराने के उद्देश्य से गोदान किया जाता था। अन्न, वस्त्र एवं, भोजन एवं सिक्के दान किए जाते थे। अबुल फजल ने बंगाल की एक प्रथा का उल्लेख किया है, इसमें मृत्युशैय्या पर पड़े व्यक्ति को उठाकर निकट की नदी में ले जाया जाता था और मृत्यु के समय उसके शरीर को कमर तक जलधार में डुबाये रखते थे।

    सिक्ख-पंथ के संस्थापक गुरुनानक ने उल्लेख किया है कि किसी सम्बन्धी की मृत्यु की सूचना देने वाले पत्र के ऊपरी कौने को फाड़ दिया जाता था। यह प्रथा आज भी प्रचलित है। मृत्यु के पश्चात् तीन दिन तक परिवार के सदस्य भूमि पर सोते थे, दिन में मांगकर या खरीद कर लाए गए भोजन ग्रहण करते थे। घर में भोजन नहीं बनाया जाता था। मृतक के परिवार वाले दस दिन से लेकर एक माह का शोक रखते थे। इस दौरान वे हजामत बनाने, वेद-पाठ करने, देव-प्रतिमाओं की पूजा करने आदि का निषेध रखते थे।

    गहरे रंग के कपड़े नहीं पहने जाते थे। औरतें सिर पर सफेद दुपट्टा रखती थीं। चार से दस दिन में 'अस्थि-संचयन' किया जाता था जिसमें चिता से राख एवं अस्थियों को एकत्रित करके दूध तथा गंगाजल से धोया जाता था और पवित्र नदियों में विसर्जित कर दिया जाता था। मृत्यु के तेरहवें दिन रिश्तेदारों द्वारा मृतक के उत्तराधिकारी को पगड़ी बांधते थे। अबुल फजल के अनुसार मृत्यु के एक साल बाद मृतक का श्राद्ध किया जाता था जिसमें ब्राह्मणों को दान दिया जाता था।

    मुसलमानों के मृतक संस्कार

    मुसलमानों के मृत्यु संस्कार के नियम अलग थे। मरणासन्न व्यक्ति का मुख मक्का की तरफ फेर दिया जाता था और उसके निकट कुरान के यासीन अध्याय का पाठ किया जाता था। उसे मक्का के जमजम कुएं का पानी या शर्बत पिलाया जाता था, जिससे शरीर से प्राण निकलने में सुविधा हो। व्यक्ति की मृत्यु हो जाने पर मृत्यु की घोषणा की जाती थी। शाही परिवार के किसी सदस्य या बादशाह के प्रिय व्यक्ति के मरने पर वकील अपनी बांह पर नीला रूमाल बांधकर बादशाह के सामने उपस्थित होता था।

    मृतक के सम्बन्धी अपने कपड़ों को फाड़ते और अपने सिर पर धूल डालते थे। मृतक के शव को फूल मालाओं तथा सुगन्धित द्रव्यों से सुसज्जित कर कब्रिस्तान ले जाया जाता था। किसी शाही अधिकारी की मृत्यु होने पर उसके प्रतीक चिह्न, ध्वज तथा हाथी-घोड़े आदि भी शव-यात्रा में शामिल होते थे। कुछ मुसलमान भी अपने प्रियजन की मृत्यु पर सिर मुंडवा लेते थे। चालीस दिनों तक शोक रखा जाता था। शोक में स्वादिष्ट भोजन और सुन्दर पोशाक से परहेज रखा जाता था। शोक की समाप्ति चालीसवें दिन होती थी।

    इस दिन मृतक के सम्बन्धी एवं मित्र, मृतक की कब्र पर जाते थे और मृतक के नाम पर गरीबों में खाना, कपड़ा और पैसे बांटते थे। मृत्यु की वार्षिकी भी इसी तरह मनाई जाती थी। जहाँगीर के अनुसार वार्षिकी मनाने का रिवाज मुसलमानों ने हिन्दुओं से ग्रहण किया था। फातिहा पढ़े जाने के बाद गरीबों में भोजन बांटा जाता था। इब्नबतूता ने उल्लेख किया है कि मृतक को उसके जीवन काल के समान ही आवश्यक वस्तुएं भेंट दी जाती थी। अमीर लोग अपने पूर्वजों की कब्र पर रोशनी एवं सजावट करते थे और साधारण लोग मृतक की कब्र पर दीपक जलाते थे। अमीरों की कब्रों के प्रवेश द्वार पर हाथी-घोड़े बांधे जाते थे।

    कुरान पढ़ने के लिए खतमी (वाचक) नियुक्त किए जाते थे। सन्तों की कब्र पर अमीरों द्वारा दरगाह बनवाई जाती थी, जहाँ उसके अनुयाइयों की भीड़ लगती थी। फीरोज तुगलक की तरह औरंगजेब भी कब्रिस्तान में औरतों के प्रवेश का विरोधी था। वह कब्रों पर छत डालने तथा उसकी दीवारों पर सफेदी पोतने को भी पसन्द नहीं करता था।

    सामाजिक व्यवहार एवं शिष्टाचार

    मध्य-कालीन भारतीय समाज में जाति-प्रथा बुरी तरह से हावी थी। इस कारण सामाजिक शिष्टाचार भी अपनी जाति तक सीमित होकर रह गया था। दूसरी जातियों के साथ सामाजिक व्यवहार प्रायः नहीं के बराबर था। समाज पूरी तरह पुरुष-प्रधान था। घरों की स्त्रियां, घर में आए पुरुष अतिथियों से प्रायः बातचीत नहीं करती थीं। गांव की चौपाल पर पुरुष तो परस्पर मिलते रहते थे, किंतु स्त्रियों को मित्र और सम्बन्धियों से मिलने की अनुमति नहीं थी।

    शहरों में भी पुरुष अपने कार्य के सिलसिले में एक-दूसरे से मिलते थे किंतु स्त्रियों को ऐसे अवसर बहुत कम उपलब्ध थे। स्त्रियों में पर्दा-प्रथा प्रचलित थी। जन्म, विवाह, शव-यात्रा आदि के समय या किसी की बीमारी पर स्त्रियों को घर में आए सगे-सम्बन्धियों से मिलने के अवसर प्राप्त होते थे। मध्ययुग में अतिथियों के स्वागत के लिए अनेक औपचारिकताएं की जाती थीं। अतिथि के आगमन पर घर का मुखिया द्वार पर जाकर उसका स्वागत करता था। प्रवेश द्वार पर ही अतिथि अपने जूते उतार देता था।

    पुरुष-अतिथि एवं संत आदि के आगमन पर हिन्दुओं में चन्दन, पुष्प, चावल आदि युक्त जल से उसके पैर धोये जाते थे, फिर उसे बैठक में ले जाया जाता था। अमीरों के घर में बैठक का कमरा सजाकर रखा जाता था जिसमें मूल्यवान दरियां और मखमल के गद्दे बिछे रहते थे। साधारण घरों में चटाई और चारपाई होती थी। शाही पुरुष अपने अतिथियों से दीवानखाने में मिलते थे, जहाँ प्रतिदिन दरबार लगता था।

    इस कक्ष को सुन्दर कालीन और बहुमूल्य पर्दों से सजाया जाता था। अतिथि अपनी सामाजिक स्थिति के अनुसार गृहस्थ के दाईं या बाईं ओर बैठता था। अपरिचितों को भी बैठक में आकर मिलने की अनुमति होती थी। शाही लोगों से मिलने पर भेंट देने की परम्परा थी। किसी बड़े ओहदेदार व्यक्ति के पास छोटे आदमी का खाली हाथ जाना अशिष्टता मानी जाती थी। बादशाह एवं शहजादे के जन्मदिन, विजय अभियान एवं शिकार से सकुशल वापसी, नौरोज आदि अवसरों पर नजराना दिया जाता था, जिनमें से कुछ हिस्सा रखकर शेष लौटा दिया जाता था। भारतीयों के आचार-व्यवहार की अनेक विदेशी यात्रियों ने प्रशंसा की है।

    परस्पर वार्तालाप में लोग मर्यादा का ध्यान रखते थे। अपने से बड़े या श्रेष्ठ व्यक्ति से बातचीत में सावधानी बरती जाती थी और उसके प्रति सम्मान के लिए अपना सिर ढका जाता था। बड़ों की उपस्थिति में लोग प्रायः खड़े ही रहते थे। शाही दरबार में उपस्थित होने के विस्तृत नियम थे। अमीर, उमराव एवं दरबारियों को प्रतिदिन सुल्तान के समक्ष उपस्थित होना पड़ता था। विशिष्ट दरबारियों तथा शहजादों के अतिरिक्त अन्य कोई व्यक्ति दरबार में नहीं बैठ सकता था। राज्य के उच्च अधिकारियों, विदेशों से आए राजदूतों तथा वित्तीय एवं सैन्य सहायता के लिए आए पदच्युत रजवाड़ों के शासकों को भी इस नियम से छूट नहीं दी गई थी।

    बादशाह के जाने से पूर्व किसी को दरबार छोड़़ने की अनुमति नहीं थी। बादशाह का नाम जो भी सुने, जहाँ भी सुने उससे अपेक्षा की जाती थी कि वह सम्मान के साथ अपना सिर झुकाए। पत्रवाहक से शाही फरमान प्राप्त करने के लिए अमीरों, सेनापतियों और दरबारियों को थोड़ी दूर चलकर आना पड़ता था और फरमान लेते समय झुकना और उसे अपने सिर से लगाना पड़ता था। दरबार में भी उत्तम ढंग से शिष्टाचार का निर्वाह किया जाता था।

    अभिावादन की परम्पराएं

    मध्य-काल में अभिवादन की परम्पराएं बहुत कुछ आज की ही तरह थीं। हिन्दुओं में बराबरी वालों को राम-राम कहकर अभिवादन किया जाता था। उच्च पदस्थ व्यक्ति, सूबेदार, मंत्री या सेनापति का अभिवादन सिर से ऊपर हाथों को जोड़कर किया जाता था। छोटों के द्वारा बड़ों का अभिवादन उसके पैरों को छूकर किया जाता था। गुरु के अभिवादन में लेटकर दण्डवत् किया जाता था। राजा का अभिवादन, ब्राह्मणों को छोड़़कर, शेष लोगों के द्वारा पैर छूकर या धरती को स्पर्श करके किया जाता था।

    ब्राह्मण राजा के अभिवादन में सिर से ऊपर अपने दोनों हाथ जोड़ लेते थे। विजयनगर दरबार में प्रत्येक व्यक्ति को नंगे पैर जाना होता था। दरबार में जाने वाला व्यक्ति राजा के पांव चूमने के बाद हाथ बांधकर एक ओर खड़ा हो जाता था तथा तब तक धरती पर दृष्टि रखता था जब तक राजा उसे सम्बोधित नहीं करता था। गुरु नानक ने अपने अनुयाइयों को नमस्कार के उत्तर में 'सत-कर्तार' कहने की सलाह दी थी। मुसलमान अभिवादन के लिए 'सलाम' अथवा 'अस्सलाम वालेकुम' कहते थे और प्रत्युत्तर में 'वालेकुम अस्सलाम' कहते थे।

    बराबरी के लोगों एवं मित्रों का अभिवादन करते समय दांये हाथ को मस्तक के सामने तक उठाते थे। एवं तीन बार गले लगाकर एक-दूसरे का हाथ पकड़ते थे। वरिष्ठ एवं श्रेष्ठ जन के अभिवादन में आगे झुककर दायें हाथ को मस्तक के पास ले जाते हैं। सुल्तान के अभिवादन के लिए भी नियम बनाए गए थे। इसके लिए सामान्य तरीका 'जमींबोसी' (धरती चूमना) या 'पांवबोसी' (पैर चूमना) है। बलबन पांवबोसी का तरीका अधिक पसन्द करता था।

    अबुल फजल ने बादशाह के प्रति सामूहिक अभिवादन के रूप में 'कोर्निस' और 'तसलीम' का उल्लेख किया है। कोर्निस में दायें हाथ की हथेली को ललाट पर रखकर आगे की ओर सिर झुकाया जाता था। तसलीम पेश करते समय दायें हाथ को जमीन पर रखना होता था, जिसमें हथेली ऊपर की ओर रहती थी। फिर हथेली को छाती एवं माथे से लगाया जाता था। अकबर ने आदेश जारी किया कि तसलीम की यह क्रिया एक साथ तीन बार की जानी चाहिए।

    उसने अभिवादन का दूसरा तरीका सिजदा अर्थात् बादशाह के सामने दण्डवत लेटना भी शुरू कराया था किन्तु कट्टरपंथी मुसलमानों ने इसे व्यक्ति-पूजा मानकर इस तरीके पर आपत्ति की। अतः दीवान-ए-आम में इसकी मनाही हो गई फिर भी निजी कक्ष में इसकी अनुमति थी। शाहजहाँ के शासन काल में इस तरीके को समाप्त कर दिया गया और इसकी जगह जमींबोसी का तरीका अपनाया गया। बाद में इसे भी स्थगित कर तसलीम के पुराने ढंग को संशोधित करके अपनाया गया।

    नए तरीके में कम से कम चार बार तसलीम करनी होती थी। औरंगजेब ने इस प्रकार के समस्त अभिवादनों को मूर्ति-पूजा का परिचायक मानते हुए इन्हें समाप्त कर दिया और अभिवादन के लिए केवल 'अस्सलाम वालेकुम' को मान्यता दी।

    वस्त्र, प्रसाधन और आभूषण

    मध्य-कालीन भारत में लोगों के वस्त्र, प्रसाधन एवं आभूषण उनकी आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक हैसियत के अनुसार होते थे। विभिन्न समुदायों के लोग प्रायः सूती वस्त्र पहनते थे।

    जन-सामान्य की पोषाक: हिन्दू पुरुषों में धोती, कुर्ता तथा पगड़ी अधिक प्रचलित थे और हिन्दू औरतों में कांचली, घाघरा ओढ़नी अधिक लोकप्रिय थी किंतु साड़ी-ब्लाउज और पेटीकोट भी समान रूप से प्रचलित थीं। औरतें घर से निकलते समय शरीर को चादर से लपेट लेती थीं। मजदूर और किसान वर्ग के लोग घुटनों से ऊपर तक छोटी सी धोती लपेटते थे। सर्दियों में साधारण लोग सूती कोट पहना करते थे, जिसमें रुई भरी होती थी। उत्तर भारत में पगड़ी अथवा साफा प्रचलित था किंतु कश्मीर और पंजाब में रुई भरी हुई टोपी का चलन था। अत्यंत निर्धन लोग केवल लंगोट लगाकर जीवन बिताते थे। मुसलमानों के राज्य में ऐसे लोगों की संख्या निरंतर बढ़ती चली गई थी।

    सरकारी कारिंदों की पोषाक: मुसलमान सैनिकों की कोई विशेष पोशाक नहीं थी फिर भी वे चुस्त कपड़े पहनते थे जिन पर तलवार, ढाल, गुप्ती आदि हथियार कसे हुए होते थे। शाही कारिंदे एवं गुलाम कमरबंद, लाल जूते और 'कुला' पहनते थे।

    तुर्की सुल्तानों के काल की पोषाक: दिल्ली सुल्तानों के काल में लम्बी तातारी टोपी पहनने का प्रचलन था किंतु बाद में तातारी टोपी का स्थान पगड़ी ने ले लिया। पगड़ी दोनों समुदायों के लोग सामान्य रूप से धारण करते थे। मुस्लिम सफेद और गोल पगड़ी बांधते थे जबकि हिन्दुओं में रंगीन, ऊँची और नोकदार पगड़ी प्रचलित थी। गर्मी के कारण जुर्राबें बहुत कम पहनी जाती थी। अधिकांश हिन्दू नंगे पैर रहते थे। बलबन ने अपने गुलामों को जुर्राब पहनने का आदेश दिया था। कट्टर धार्मिक प्रवृत्ति के मुसलमान नमाज आदि में सफाई बनाए रखने के लिए जुर्राबों का इस्तेमाल आवश्यक मानते थे। उस समय तुर्की जूते अधिक प्रचलित थे, जो सामने से नोकदार तथा ऊपर से खुले हुए होते थे। इनको पहनने और उतारने में अधिक सुविधा रहती थी। अमीर अपने जूते रंगीन मखमल या जरी के बनवाते थे जिन पर रेशम और चमड़े के फीते लगाए जाते थे। कुछ जूतों पर हीरे-जवाहरात भी जड़वाये जाते थे। कालीकट के ब्राह्मण जाड़ों में भूरे चप्पल तथा गर्मियों में काठ की खड़ाऊ पहनते थे। मध्यम-वर्गीय परिवार लाल चमड़े के जूते पहनते थे, जिन पर फूलों की आकृतियां बनी रहती थीं। साधु-सन्तों, फकीरों एवं दरवेशों को उनकी पोषाक से पहचाना जाता था। मुस्लिम फकीर लम्बी 'दरवेश-टोपी' तथा पैरों में 'काठ की चट्टी' पहनते थे और शरीर पर एक लम्बा चोगा डालते थे। मुस्लिम दार्शनिक पगड़ी, चोगा तथा पाजामा पहनते थे। हिन्दू संन्यासी एवं योगी केवल लंगोटी से काम चलाते थे। हिन्दू पंडित कमर में रेशमी चादर लपेट लेते थे, जिसका एक छोर पांव तक लटकता रहता था और लाल रंग की रेशमी चादर कन्धों पर डाल लेते थे।

    मुगलकाल में शाही अमीरों की पोषाक: उच्च वर्ग के लोगों के वस्त्र महंगे होते थे। अमीर मुसलमान सलवार, सुतन्नी और पाजामा पहनते थे। शरीर के ऊपरी भाग पर कुर्ता, जैकेटनुमा कोट, काबा या लम्बा कोट पहना जाता था जो घुटनों तक लटकता था। यह मलमल या बारीक ऊन का बना होता था। मुगल बादशाह रोएंदार फर के कोट पहनते थे। धनी लोग कन्धे पर रंगीन ऊनी चादर रखते थे। मध्य-युगीन सुल्तान, अमीर, खान आदि शाही पुरुष जरी वाले रेशमी और मखमली कपड़े पहनते थे। उनकी पोषाकों में दिबा-ए-हफ्तरंग (सप्तरंगी किमखाब), बीसात-ए-जमुरादी (मोतिया रंग की पोशाक), जामा-ए-जारबफ्त (जरी या सोने के तारों से बुना कपड़ा), कतान-ए-रूसी (रूस में बना कपड़ा), कतान-ए-बिरारी, बरकरमान (कई रंगों का ऊनी कपड़ा) आदि का भी प्रयोग होता था।

    अकबर की पोषाक: अकबर ने अपनी पोशाकों के लिए कुशल दर्जी नियुक्त किए। आइन-ए-अकबरी में ग्यारह प्रकार के कोट का विवरण मिलता है। उनमें 'टकन चिया पेशवाज' सर्वाधिक महत्त्व का था। यह गोल-घेरदार कोट था, जो सामने से खुला रहता था और दांयी ओर से बंद होता था। इसके साथ ही रोएंदार कोट 'शाह आजीदाह' का भी महत्त्व था। अकबर मुलायम रेशम की धोती भी पहनता था। मॉन्सेरट ने अकबर की पोशाक के बारे में लिखा है- 'बादशाह सलामत की पोशाक रेशम की थी, जिस पर सोने का सुन्दर काम किया रहता था। उनकी पोशाक घुटनों तक झूलती थी तथा उसके नीचे पूरे गांव का जूता होता था। वे मोती और सोने के जेवर भी पहनते थे।'

    महिलाओं की पोषाक: महिलाओं की पोशाक साधारण थी। गरीब स्त्रियां साड़ी पहनती थीं जिसके एक छोर से उनका सिर ढका रहता था। गरीब और अमीर दोनों वर्ग की स्त्रियां वक्ष पर अंगिया पहनती थीं। दक्षिण भारत में निम्न-वर्ग की स्त्रियां सिर नहीं ढकती थीं। गरीब उड़िया स्त्रियां कपड़ा प्राप्त न होने के कारण पत्तियों से शरीर को ढकती थीं। मुसलमान स्त्रियां सलवार-कमीज पहनती थीं, ऊपर से बुर्का डालती थीं।

    मध्य-कालीन चित्रों में स्त्रियों को ओढ़नी के साथ पीठ पर बंधने वाली चोली पहने हुए चित्रित किया गया है। स्त्रियां घाघरा भी पहनती थीं, जिनमें किनारी एवं कसीदाकारी का काम होता था। बंगाली स्त्रियां कांचुली या चोली पहनती थीं। यह दो प्रकार की होती थी, एक छोटी होती थी, जिससे केवल स्तन ढकते थे, दूसरी लम्बी होती थी और कमर तक जाती थी। धनी औरतें कश्मीरी ऊन का बना बारीक 'कावा' पहनती थीं। कुछ स्त्रियां उत्तम प्रकार के कश्मीरी शॉल ओढ़ती थीं।

    हिन्दू और मुसलमान महिलाएं सूती, रेशमी या ऊनी दुपट्टे से सिर ढकती थी। उस काल में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियां जूतों का प्रयोग अधिक करती थीं। सौन्दर्य प्रसाधन मनुष्य में सुंदर एवं आकर्षक दिखने की ललक आदिकाल से है। इसलिए शरीर पर सुगंधित पदार्थों का लेप करने, अंगराग लगाने, उबटन मलने, बाल संवारने, काजल लगाने, वस्त्रों को रंगने, आभूषण पहनने आदि की परम्पराएं भी अत्यंत प्राचीन काल से चली आ रही हैं। मध्य-कालीन भारतीय समाज में भी ये परम्पराएं प्रचलन में थीं।

    स्नान करने और कपड़ा धोने के लिए साबुन का उपयोग किया जाता था। शरीर एवं कपड़ों पर लगाने के लिए कई प्रकार की कीमती सुगंधियों का प्रयोग किया जाता था। केशों को काला करने के लिए 'वस्मा' और 'खिजाब' का प्रयोग होता था। कपड़ों को सफेद बनाए रखने के लिए नील का प्रयोग होता था। साबुन, पाउडर और क्रीम जैसी प्रसाधन सामग्रियों के रूप में 'घासूल', त्रिफला, उबटन और चन्दन का प्रयोग होता था।

    अबुल फजल ने मुगल काल में स्त्रियों के सोलह श्ृंगारों का उल्लेख किया है जिनमें स्नान करना, केशों में तेल, लगाना, चोटी गूँथना, रत्नों से वेणी शृंगार करना, मोतियों से सजाकर बिन्दी लगाना, काजल लगाना, हाथ रंगना, पान खाना तथा स्वयं को फूलमालाओं तथा कर्णफूल, हार, करधनी आदि आभूषणों से सजाना आदि सम्मिलित हैं। हिन्दू महिलाएं अपने केश पीछे की ओर बांधती थीं। धनी परिवारों की महिलाएं अपनी केशों को सिर के ऊपर शंक्वाकार गूँथकर उनमें सोने-चांदी के कांटे लगाती थीं।

    नकली केश लगाने का उल्लेख भी मिलता है। हिन्दू स्त्रियां सिन्दूर का टीका लगाने तथा उससे मांग भरने को शुभ मानती थीं। आंखों में काजल लगाती थीं तथा पलकों को रंगने के लिए सुरमे का प्रयोग करती थीं। भारतीय स्त्रियां अपने हाथों और पांवों में मेहन्दी लगाती थीं। मुंह पर लगाने के लिए 'गलगुना' और 'गाजा' (लाल रंग) का प्रयोग किया जाता था। केश संवारने में लकड़ी, पीतल एवं हाथी दांत की कंघियों का प्रयोग होता था।

    अकबर ने शाही परिवार की सुगन्धित पदार्थों की आवश्यकताएं पूरी करने के लिए शेख मन्सूर की अध्यक्षता में 'खुशबूखाना' स्थापित किया था। जहाँगीर की बेगम नूरजहाँ की माँ ने गुलाब से एक नवीन इत्र का निर्माण किया था जिसका नाम 'इत्र-ए-जहाँगीरी' रखा गया। नूरजहाँ स्वयं भी फूलों से इत्र तैयार करती थी और वह विभिन्न डिजाइनों के सुंदर कपड़े डिजाइन करती थी। उन पर चित्र भी बनाती थी।

    आभूषण

    सभ्यता के विकास के साथ ही स्त्रियों में आभूषणों के प्रति बोध उत्पन्न हुआ। वे अपने शरीर के विभिन्न अंगों को फूल, कौड़ी, छोटे शंख, मिट्टी, ताम्बे एवं सोने के बने मनकों तथा सिक्कों आदि से सजाती थीं। अत्यंत प्राचीन काल से ही हार, ताबीज एवं मनके मिलने लगते हैं। मुगलकालीन लेखक अबुल फजल ने सैंतीस आभूषणों का उल्लेख किया है। चौक, मांग, कतबिलादर (संभवतः आधुनिक चंद्रमान), सेकर और बिंदुली आदि आभूषण सिर और ललाट पर धारण किए जाते थे। कर्णफूल, पीपल पत्ती, मोर भांवर और बाली कानों में पहने जाते थे। नाक में पहनने के आभूषणों की शुरुआत संभवतः मुसलमानों ने की थी।

    इनमें 'नथ' और 'बेसर' अधिक प्रचलित थे। हिन्दू स्त्रियां सिर के आगे के भाग में सोने-चांदी का टीका या बोर धारण करती थीं। टीका माथे पर झूलता रहता था जबकि बोर माथे के अगले भाग पर स्थिर रहता था। नाक के बाएं भाग में सोने-चांदी की लौंग पहनी जाती थी जिसके आगे के भाग में मोती, हीरा या अन्य कीमती पत्थर जड़ा जाता था। गले में सोने-चांदी के हार पहने जाते थे जिनमें हीरे, जवाहरात एवं मोती आदि से बने नग जड़े जाते थे। हार एक लड़ी से लेकर कई लड़ी के भी होते थे।

    धनी स्त्रियों के हार में पांच-सात लड़ियां होती थीं। हाथ के ऊपरी भाग में बाजूबन्द या तोड़े पहने जाते थे और कलाई में कंगन, चूड़ी एवं गजरा पहने जाते थे। कमर में तगड़ी, क्षुद्र खंटिका, कटि मेखला एवं सोने की पेटी धारण की जाती थी। अंगुलियों में अंगूठियां पहनी जाती थीं। पैरों में जेहर, घुंघरू, पायल आदि पहनते थे। पैरों की अंगुलियों में झांक, बिछुआ तथा आंवट पहने जाते थे। हिन्दू पुरुष कानों में कर्णफूल, गले में साने की चेन तथा अंगुलियों में अंगूठियाँ पहनतेे थे।

    राजपूत पुरुषों में 'कर्णफूल' धारण करना अनिवार्य था। मुसलमान पुरुष आभूषणों के विरोधी थे, फिर भी कुछ मुसलमान 'ताबीज' और 'गण्डा' आदि पहनते थे। सुल्तान और मुगल बादशाह सोने, चांदी, हीरे, माणिक आदि के आभूषण पहनते थे। सर टॉमस रो ने उल्लेख किया है कि- 'जहाँगीर अपने जन्मदिन पर कीमती वस्त्रों तथा हीरे-जवाहर के आभूषणों से सजकर प्रजा के समक्ष आता था। उसकी पगड़ी सुंदर पक्षी के पंखों से सजी रहती थी, जिसमें एक ओर काफी बड़े आकार का माणिक, दूसरी ओर बड़े आकार का हीरा तथा बीच में हृदय की आकृति का पन्ना सुशोभित होता था। कन्धों पर मोतियों और हीरों की लड़ियां झूलती थीं तथा गले में मोतियों के तीन जोड़े हार होते थे। बाजुओं में हीरे के बाजूबन्द तथा कलाई में हीरे के तीन कंगन होते थे। हाथ की प्रायः प्रत्येक अंगुली में अंगूठी होती थी।' बहूमूल्य हीरों की बनी 'मांग टीका' की कीमत पांच लाख टका तक हो सकती थी। सोने और चांदी के काम में गुजराती हिन्दू स्वर्णकार अधिक विख्यात थे। एक चतुर कारीगर की फीस 64 दाम प्रति तोला थी।

    भोजन

    मध्य-कालीन भारतीय समाज में हिन्दुओं एवं मुसलमानों के भोजन में मांस के अतिरिक्त कोई विशेष अंतर नहीं था। हिन्दुओं के भोजन में विभिन्न प्रकार के अनाज एवं दाल, दूध, दही, मक्खन तथा तेल आदि से बने कई तरह के व्यंजन होते थे। धनी लोग अपने भोजन में गेहूँ एवं मक्का का आटा एवं दलिया, चावल, बेसन तथा उबली हुई सब्जियों का प्रयोग करते थे। उत्तर प्रदेश, बिहार और उड़ीसा के धनी लोग पूड़ी और लूची का अधिक प्रयोग करते थे। वे चावल के साथ बादाम, किशमिश आदि मिलाकर पुलाव तथा अन्य व्यंजन तैयार करते थे। सामान्यतः दाल-भात खाया जाता था। अल्पाहार में दही-चिउड़ा का प्रयोग अधिक होता था।

    मिष्ठान्न में हलवा, लापसी, खीर, मीठे चावल एवं मीठे दलिया का अधिक प्रचलन था। ब्राह्मण, वैश्य, जैन, बौद्ध-भिक्षु एवं अन्य उच्च वर्ग के लोग मांस, मछली, अण्डा, प्याज, लहसुन जैसे तामसिक भोजन को घृणास्पद मानते थे किंतु राजपूत इनका प्रयोग करते थे। समाज में निम्न समझी जाने वाली जातियाँ भी मांस-मछली एवं अण्डे का प्रयोग करती थीं। दक्षिणी भारत के हिन्दुओं में सामिश भोजन का प्रचलन बहुत कम था। विदेशी यात्रियों का कथन है कि- 'हिन्दू मांसाहार की कम जानकारी रखते थे तथा वैसा भोजन नहीं करते थे जिसमें रक्त हो।'

    उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य भारत में ऐसी बहुत सी जातियां थीं जो मांसाहार से दूर रहती थीं जबकि पंजाब, बंगाल और कश्मीर में कुछ ब्राह्मण भी मांस-मछली खाते थे। मुसलमान सामिष भोजन अधिक करते थे। मुसलमानों को मांस तथा उसके बने हुए विविध व्यंजन अधिक प्रिय थे। वे मांस-मछली से 'दूजा ब्रियानी' और 'कीमा पुलाव' बनाया करते थे। अकबर एवं उसके बाद के कुछ मुगल बादशाहों ने पवित्र दिनों में पशुवध का निषेध कर रखा था।

    अकबर ने पहले, शुक्रवार को फिर रविवार को मांसाहार करना छोड़़ दिया था। जहाँगीर ने अपने पिता के जन्मदिन पर पशुवध की मनाही कर दी थी तथा वह स्वयं सप्ताह में एक दिन व्रत रखता था और उस दिन केवल गुजराती खिचड़ी खाता था। तुर्की सुल्तान और मुगल बादशाह काबुल से सूखी मेवा, बदख्शां से तरबूज, समरकंद से अंगूर और सेव, याज्द से अनार, यूरोप से अनानास और काबुल से बेर एवं जामुन आदि मंगवाते थे। सूखे मेवे में नारियल, खजूर, मखाना, कमलगट्टा, अखरोट, पिस्ता आदि होते थे।

    पीने के लिए नदी एवं कुएं आदि का ताजा जल काम में लाया जाता था। साधारण लोग तालाबों एवं ताल-तलैयों का जल भी पीते थे। हिन्दू राजा, मुगल बादशाह तथा कुछ रईस लोग गंगाजल को स्वास्थ्यवर्धक और पवित्र मानते थे। अन्य नदियों का जल भी मंगवाया जाता था। मुगल बादशाह बर्फ के शौकीन थे। अमीर एवं उच्च वर्ग के मुसलमान विभिन्न प्रकार के पशु-पक्षियों के मांस एवं अण्डों से विभिन्न प्रकार के व्यंजन तैयार करवाते थे। साधारण वर्ग के लोगों के भोजन में दलिया, खिचड़ी, भात एवं पुलाव आदि का अधिक प्रयोग होता था।

    दक्षिण में लोगों का मुख्य भोजन चावल था। गुजराती लोग चावल और दही पसन्द करते थे। कश्मीरियों के भोजन में उबले चावल तथा नमकीन उबली सब्जियों की प्रमुखता थी। उत्तर के लोगों में गेहूँ, ज्वार या बाजरा की चपातियां खाई जाती थीं। बेझर एवं मिस्सी रोटियों का भी प्रचलन था। धनी एवं मध्यमवर्गीय लोग दिन में तीन बार तथा निर्धन लोग दिन में दो बार भोजन करते थे एवं दोपहर में चने तथा भुने हुए अनाज खाते थे।

    माद्रक द्रव्य

    मध्य-काल में प्रयोग किए जाने वाले मादक द्रव्यों में मुख्यतः शराब, अफीम, भांग और तम्बाकू थे। कुछ लोग गांजा एवं सुल्फा भी पीते थे। पान, चाय और कॉफी को भी माद्रक द्रव्य माना जाता था। जन-सामान्य मादक द्रव्यों के सेवन को दुर्गुण मानता था। अल्लाउद्दीन खलजी आदि तुर्की सुल्तानों और जहाँगीर एवं औरंगजेब आदि कुछ मुगल बादशाहों ने अपने शासन में मद्य-सेवन पर प्रतिबंध लगाए। बाबर मद्यपान करता था किंतु उसने अपनी सेना पर अपने नैतिक प्रभाव में वृद्धि करने के उद्देश्य से मद्यपान त्याग दिया था।

    अकबर, जहाँगीर एवं शाहजहाँ भी मदिरापान करते थे किंतु औरंगजेब मद्यपान नहीं करता था। अधिकांश मुगल अमीर भी मद्यपान करते थे। मुगल काल में देशी शराब की विख्यात किस्मों में ताड़ी, नीरा, महुआ, खेरा, बधचार और जागरे प्रमुख थीं। पुर्तगाल और फारस से उत्तम किस्म की शराब मंगायी जाती थी। राजपूतों में अफीम का सेवन अधिक प्रचलित था। वे युद्धकाल में अफीम का सेवन अधिक करते थे। कुछ मुगल बादशाह भी अफीम का सेवन करते थे। आरम्भ में भारत में तम्बाखू पैदा नहीं होता था किंतु पुर्तगाली अपने साथ पहली बार तम्बाखू लेकर आए।

    जन-साधारण में कुछ ही वर्षों में तम्बाखू पीने की लत इतनी अधिक बढ़ गई कि ई.1617 में जहाँगीर ने तम्बाखू के सेवन पर रोक लगाई किंतु जनता पर इस रोक का कोई असर नहीं हुआ। इटावली यात्री मानुसी ने लिखा है कि अकेले दिल्ली में तम्बाकू पर लगाई गई चुंगी से प्रतिदिन 5,000 रुपये की आय होती थी। जहाँगीर ने 'भांग' को अस्वास्थ्यकर मानकर उसके सेवन पर रोक लगाई। सुसंस्कृत परिवारों में चाय और कॉफी को भी नशा माना जाता था। इनका प्रचलन कोरोमंडल के तटवर्ती क्षेत्रों में अधिक था।

    मध्य-कालीन आवास

    मध्य-कालीन समाज में आज की ही तरह अमीरों के घर बड़े, पक्के एवं महंगे होते थे जबकि गरीबों के घर छोटे, कच्चे एवं सस्ते होते थे। घरों का निर्माण जलवायुवीय आवश्यकताओं के आधार पर होता था। देश के गर्म हिस्सों में जालीदार खिड़कियां और झरोखे अधिक बनाए जाते थे ताकि प्रकाश और वायु का आगमन निर्बाध रूप से हो। जबकि ठण्डे क्षेत्रों में खिड़कियां छोटी रखी जाती थीं। जिन क्षेत्रों में वर्षा अधिक होती थी या बर्फ गिरती थी, उन क्षेत्रों में घरों की छतें ढलवां बनाई जाती थीं।

    शाही आवास: शाही आवास प्रायः किसी दुर्ग के भीतर बनाए जाते थे। ये दुर्ग किसी बड़ी नदी या पहाड़ी झरने के निकट होते थे। राजमहलों एवं शाही महलों में मुख्य प्रवेश द्वार के निकट मर्दाना महल एवं भीतर की ओर 'जनाना' महल एवं ड्यौढ़ी बनाए जाते थे। शाही महलों में दीवाने आम, दीवाने-ए-खास, शस्त्रागार, भण्डार, खजाना, घुड़साल, नक्कारखाना आदि भी बनाए जाते थे। जनाना महलों में छोटे झरोखे होते थे जिनमें से हरम अथवा अन्तःपुर की औरतें संगीत समारोह, पशुओं की लड़ाई एवं दरबार की कार्यवाही आदि देखती थीं। महलों के चारों ओर बाग, बारादरी, फव्वारे और जलाशय बनाए जाते थे। मुगलों द्वारा बनाए गए भवनों में लाल बलुआ पत्थर एवं संगमरमर का प्रयोग अधिक होता था।

    धनी लोगों के आवास: धनी लोगों के घर भी 'मर्दाना' और 'जनाना' दो हिस्सों में बनाए जाते थे। अतिथियों के लिए दीवान या बैठक, सोने के लिए शयनकक्ष, भोजन पकाने के लिए रसोई एवं नहाने के लिए स्नानागार बनाए जाते थे। अमीरों के घरों में शौचालय भी होते थे। प्रायः घर के मध्य में एक बड़ा सा आंगन होता था। औरतों की अधिकतर गतिविधियां प्रायः इसी आंगन में होती थीं। घरों के ऊपर प्रायः समतल छत होती थी, जहां गर्मियों में रात के समय परिवार के लोग खुले में सोते थे। छत पर प्रायः एक कक्ष या छतदार बरामदा होता था जिसे बरसाती कहते थे जहाँ वर्षा के समय सोया जा सकता था।

    धनी लोगों के घरों के चारों ओर उद्यान लगाया जाता था। प्रायः साग-सब्जियों एवं पूजा के लिए फूलों की वाटिकाएं भी होती थीं। व्यापारियों के घर ईंट और चूने से बहुमंजिले भवन के रूप में बनते थे। मलाबार में धनिकों के घर टीक की लकड़ी से बनाए जाते थे, जो प्रायः दो मंजिले होते थे। सोने के लिए खाट और पलंग का प्रयोग होता था। धनी लोगों के घरों में लकड़ी की आराम-कुर्सियां होती थीं। रईस लोगों के पलंगों एवं खाटों पर कीमती बिछावन और तकिए होते थे। वे लोग जाड़ों में कम्बल एवं गर्मियों में मच्छरदानी का प्रयोग करते थे। रईसों की बैठकें कालीनों से सजाई जाती थीं। बैठकों में गोलाकार गाव-तकिये या मसनद होते थे। हाथ से झलने वाले पंखों का भी चलन था। ये पंखे ताड़पत्र, हाथीदांत, जरी, रेशम, मोटे कागज आदि से बनते थे। अमीरों की हवेलियों में दास-दासियां पंखे झलते थे।

    छत की कड़ियों से बड़े-बड़े पंखों को लटकाया जाता था जिन्हें कक्ष के बाहर बैठे सेवक डोरी से खींचते थे। बादशाह या अमीरों के यहाँ पंखे के हत्थे सोने या चांदी के होते थे, जिनमें हीरे-जवाहरात जड़े होते थे।

    जन-साधारण के आवास: साधारण आय वाले लोगों के घर रईसों के घरों की तुलना मंें छोटे और साधारण होते थे। यदि घर मुख्य सड़क पर होता था तो नीचे की मंजिल में दुकानों के लिए कुछ स्थान आगे की ओर निकाल दिया जाता था। घरों की छत के साथ छज्जे भी होते थे जिनसे मकानों की दीवारों पर छाया रहती थी तथा धूप एवं वर्षा से बचाव होता था। दीवारों पर सफेदी पोती जाती थी। मध्यम वर्गीय लोगों के घर प्रायः पक्के एवं एक-दो मंजिल के होते थे जबकि निम्न मध्यमवर्गीय लोगों के घर कच्चे एवं एक-मंजिले होते थे।

    निर्धन लोगों के आवास: निर्धन घास-फूस की झोंपड़ियों में रहते थे जिनमें कोई खिड़की या अलग कोठरी नहीं होती थी। एक झोंपड़ी में ही पूरा परिवार रहता था। दो झोंपड़ियों को मिलाकर बड़ा घर तैयार करना विशेष बात समझी जाती थी। झोंपड़ी का एक दरवाजा प्रवेश द्वार के रूप में होता था। कच्चे घरों एवं झौंपड़ियों के आंगन तथा दीवारें मिट्टी और गोबर से लीपे जाते थे। कश्मीर में अधिकांश घर लकड़ी से बनते थे। बहुत-से लोग नावों पर भी रहते थे। झौंपड़ियों एवं कच्चे घरों में सोने के लिए प्रायः चटाई का प्रयोग होता था। गरीब लोेग बिछावन के लिए केवल दरी या चादर का प्रयोग करते थे। गरीब लोग ताड़ और नारियल के पत्तों से बने पंखे प्रयोग करते थे।

    मनोरंजन के साधन

    मध्य-कालीन भारत में मनोरंजन के अनेक साधन उपलब्ध थे। अमीरों एवं गरीबों के खेल एवं मनोरंजन के साधन अलग-अलग थे। इसी प्रकार नगरों एवं गांवों के मनोरंजन के साधन अलग-अलग थे। गरीब लोग प्रायः कबड्डी, कुश्ती, गिल्ली डण्डा, गेंद आदि खेल खेलते थे। जबकि शाही परिवारों के सदस्य, धनी लोग एवं मध्यमवर्गीय लोग चौपड़, गंजीफा एवं ताश और शतरंज खेलना अधिक पंसद करते थे। भारत में मुसलमानों द्वारा नाई का खेल आरम्भ किया गया था। पच्चीसी का खेल एक प्राचीन भारतीय खेल था जिसे अकबर ने बढ़ावा दिया।

    चौपड़: चौपड़ एक प्राचीन भारतीय खेल था जो अब भी पच्चीसी, चौसर और चौपड़ आदि नामों से जाना जाता है। आज की तरह मध्य-काल में भी यह 16 गोटियों द्वारा खेला जाता था जो विभिन्न रंगों के 4 हिस्सों में होती थीं। साधारणतः यह खेल चार खिलाड़ियों द्वारा खेला जाता था, जो दो-दो सदस्यों के दो दलों में विभक्त होते थे। प्रत्येक खिलाड़ी के हिस्से में चार गोटियां आती थीं। प्रत्येक खिलाड़ी पासे चलता था और पासे पर आए अंकों के अनुसार अपनी गोटियां चौपड़ के खानों पर आगे बढ़ाता था। चौपड़ का खेल महाभारत से लेकर मुगल बादशाहों के काल तक राजपरिवारों में अत्यधिक लोकप्रिय रहा। अकबर ने चौपड़ के नियमों में कुछ परिवर्तन करके 'चन्दर-मण्डल' का खेल बनाया। इसमें खिलाड़ियों की संख्या 16 होती थी तथा उनमें बराबर बांटने के लिए गोटियों की संख्या 64 कर दी गई थी। औरंगजेब की पुत्री जेबुन्निसा अपना अधिकांश समय अपनी सहेलियों के साथ चौपड़ खेलने में व्यतीत करती थी।

    ताश: ताश प्राचीन भारतीय खेल था। मध्य-कालीन ताश के खेल में ताश के 144 पत्ते होते थे। 12-12 पत्तों के 12 समूह हुआ करते थे, जिनमें बादशाह और उसके वजीर आदि सहयोगी होते थे। अकबर के समय तक इन समूहों के नाम संस्कृत भाषा में थे। अकबर ने इनमें से अन्तिम सात के नए नाम बदल दिए और पांचवें को 'धनपति' समूह नाम दिया। मुगलों में यह खेल बहुत लोकप्रिय था। ताश के समस्त पत्तों पर एक ही चित्र होता था। एक ताश पर शकटासुर का वध करते हुए कृष्ण का चित्र अंकित था। राजस्थान में गोलाकार ताश के पत्तों का प्रचलन था। ताश के खेल की तरह गंजीफे का खेल भी खेला जाता था।

    शतरंज: शतरंज भी भारत का पुराना खेल है, जो उस समय राजपरिवारों से लेकर जन-साधारण में समान रूप से लोकप्रिय था। इसमें एक चौकोर चौकी पर एक वर्गाकार आकृति बनाई जाती थी जिसमें आठ पंक्तियों में 8-8 वर्ग अर्थात् कुल 64 वर्ग बने हाते थे, ये वर्ग काले-सफेद रंगों से पुते होते थे। इस वर्ग की दो तरफ एक-एक खिलाड़ी बैठता था जिनमें से एक के पास सफेद रंग के तथा दूसरे खिलाड़ी के पास काले रंग के 16-16 मोहरे होते थे। ये मोहरे एक सेना का प्रनिनिधित्व करते थे जिसमें हाथी, घोड़े, ऊंट एवं पैदल अर्थात् चतुरंगिणी सेना होती थी। प्रत्येक सेना के केन्द्र में बादशाह एवं वजीर होता था। अकबर इस खेल को बहुत पसन्द करता था। शतरंज के अन्तर्राष्ट्रीय मुकाबले भी होते थे। जहाँगीर के एक दरबारी 'खानखाना' का पर्सिया के शाह सफी से मुकाबला हुआ, जिसमें तीन दिन के खेल के बाद 'खानखाना' पराजित हुआ था।

    पच्चीसी का खेल: पच्चीसी एक प्राचीन हिन्दू खेल था जिसे अकबर विशेष रूप से पसन्द करता था। इसे बड़े आकार की चौपड़ कहा जा सकता है। आगरा तथा फतेहपुर सीकरी के शाही-महलों में संगमरमर के पत्थरों पर इस खेल के चतुर्भुजाकार खाने आज भी बने हुए हैं। गोटियों का खेल दो गोटी, तीन गोटी और बारह गोटी शहरी और देहाती दोनों क्षेत्रों में प्रचलित था। दो गोटी के खेल में चौखाने में आमने-सामने दो गोटियां रखी जाती थीं और एक-दूसरे की गोटियां मारने के लिए चालें चली जाती थीं। इसी प्रकार तीन गोटी का खेल तीन गोटी से तथा नौ गोटी का नौ गोटियों से खेला जाता था।

    गोटियों के अन्य खेल: गोटियों के अन्य खेलों में मुगल-पठान, लाम-तुर्क, भाग-चल, भाग-चक्कर, छब्बीस गोटी तथा भेड़-बकरी के खेल अधिक प्रचलित थे।

    घर के बाहर के खेल: घर के बाहर मैदानों में खेले जाने वाले खेलों में अमीर लोग चौगान, पशुओं का शिकार, जानवरों की लड़ाई आदि खेल खेलते थे। शाही परिवारों का प्रिय खेल चौगान था जिसे वर्तमान में पोलो कहते हैं। भारत में सम्भवतः मुसलमानों ने ही इस खेल को प्रचलित किया था। राजपूत भी इस खेल को बड़े चाव से खेलते थे। इस खेल में पांच-पांच सदस्यों के दो दल होते थे। अकबर के काल में दो चौगान-खिलाड़ी मीर शरीफ और मीर गियासुद्दीय अधिक प्रसिद्ध थे। मुगल अभिलेखों में 'घोफरी' खेल का भी उल्लेख मिलता है जो हॉकी के खेल से मिलता-जुलता था। यह ग्रामीण क्षेत्रों में गेंद और छड़ी से खेला जाता था। मुगलकाल में कुश्ती तथा मुक्केबाजी भी मनोरंजन के प्रमुख साधन थे।

    अकबर अपने दरबार में फारसी और तूरानी मुक्केबाज रखता था। उच्चवर्गीय रईसों में घुड़सवारी भी मनोरंजन का साधन था। इसके लिए विशेष प्रकार के अरबी घोडे़ यमन, ओमन आदि से मंगाये जाते थे। घुड़सवारी में राजपूत और गुजराती मुख्य प्रतियोगी हुआ करते थे। तीरंदाजी, तलवारबाजी, गोला फेंकना, भाला फंेकना आदि में भी जन-सामान्य की रुचि थी और इसके लिए प्रतियोगिताएं हुआ करती थीं। जन-साधारण के लोग कुश्ती और मुक्केबाजी, पशु-दौड़ आदि खेल खेलते थे।

    शिकार खेलना: बादशाहों, राजाओं एवं अमीरों में शिकार खेलना मनोरंजन का उत्तम साधन समझा जाता था जिसमें राजा और अमीरों के साथ-साथ साधारण लोग भी भाग लेते थे। शेर का शिकार केवल बादशाह, शहजादे एवं राजा किया करते थे। हाथियों का शिकार बादशाह या राजा की अनुमति के बिना नहीं किया जा सकता था। राजपूत योद्धा प्रायः शेर, बाघ एवं जंगली सूअर का शिकार करते थे। अकबर ने भारत में शिकार खेलने का तुर्की तरीका प्रचलित किया जिसे 'कमारघा शिकार' कहते थे। इसमें ढोल-नगाड़े एवं मनुष्यों की चिल्लाहट का हाका लगाकर जंगली जानवरों को एक घेरे में ले लिया जाता था और फिर बादशाह एवं बेगम उन पशुओं का शिकार करते थे।

    पक्षियों का शिकार अमीर और गरीब दोनों का मनपसन्द खेल था। मध्य-काल में मछली पकड़ना भी मनोरंजन का प्रमुख साधन था। मछली पकड़ने के लिए विशेष प्रकार के जाल का प्रयोग किया जाता था जिसे सफरा या भँवर जाल कहते थे।

    मेढ़ों, सांडों एवं भैंसों आदि की लड़ाई भी उस काल के खेलों में प्रमुख स्थान रखती थीं। निर्धन लोग छोटे जानवरों की लड़ाई से मनोरंजन करते थे। बुलबुल, बटेर एवं मुर्गे भी लड़ाए जाते थे। कबूतर उड़ाना भी व्यापक स्तर पर प्रचलित मनोरंजन था। मध्य-कालीन समाज में बाजीगरी, जादूगरी, नटविद्या, कठपुतली के खेल, मुशायरा, नृत्य-संगीत के आयोजन, कलाबाजी और नाटक-तमाशे भी मनोरंजन के लोकप्रिय साधन थे। हिन्दू जनता रामायण के विभिन्न प्रसंगों का मंचन करती थी। राजस्थान में 'पार्श्वनाथ चरित्र' तथा 'राजा हरिश्चन्द्र चरित्र' के मंचन के भी प्रमाण मिलते हैं। गुजरात के कलाकार देश के विभिन्न भागों में नाटक तथा खेल-तमाशे किया करते थे।

    मध्य-कालीन समाज में त्यौहार, उत्सव और मेले

    हिन्दू और मुसलमान अलग-अलग त्यौहार मनाते थे। ये त्यौहार पूरे देश में एक समय पर मनाये जाते थे किन्तु इन्हें मनाने के ढंग में स्थानीय भिन्नताएं रहती थीं। दीपावली पर दीयों की सजावट, अतिशबाजी तथा सोने-चांदी और जवाहरात के प्रदर्शन होते थे। अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ होली, दीपावली एवं राखी आदि कुछ हिन्दू त्यौहारों को मनाते थे किन्तु औरंगजेब ने अपने दरबार में कई हिन्दू तथा फारसी त्यौहारों का मनाया जाना बन्द कर दिया। हिन्दुओं के त्यौहार पूरे वर्ष में फैले हुए थे तथा लगभग प्रत्येक माह में आते थे, इन्हें विक्रम कलैण्डर की तिथियों के अनुसार मनाया जाता था।

    हिन्दुओं के त्यौहार

    चैत्र माह के शुक्ल पक्ष से वर्ष का पहला महीना आरम्भ होता था। इसके शुक्ल पक्ष में प्रतिपदा से नवमी तक चैत्रीय नवरात्रियों का आयोजन किया जाता था। चैत्र शुक्ला प्रतिपदा को गुड़ी पड़वा, चैत्रीचन्द्र (चेटीचण्ड) मनाया जाता था। शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन दुर्गा अष्टमी तथा नवमी को भगवान राम का जन्मदिन अर्थात् रामनवमी का त्यौहार मनाया जाता था। चैत्र-पूर्णिमा को हनुमान जयंती अर्थात् हनुमानजी का जन्म दिवस मनाया जाता था।

    ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को वट सावित्री का पर्व होता था जिसमें पत्नी अपने पति की दीर्घ आयु की कामना के साथ व्रत करती थी। इसका महाराष्ट्र में अधिक महत्व था। आषाढ़ माह की पूर्णिमा को गुरु-पूर्णिमा के रूप में मनाते थे। इस दिन भगवान वेदव्यास का जन्मदिन होता है। इस दिन लोग अपने गुरु की पूजा करके उन्हें दक्षिणा आदि देते थे। श्रावण माह की पूर्णिमा को रक्षा-बन्धन मनाया जाता था इस दिन बहिनें अपने भाइयों के घर जाकर उनकी कलाई पर राखी बांधती थीं और उनकी रक्षा की कामना करती थीं।

    भाद्रपद माह की अष्टमी को भगवान श्रीकृष्ण का जन्मदिन जन्माष्टमी मनाया जाता था। दिन में निराहार अथवा फलाहार के साथ उपवास करते थे एवं अर्द्ध-रात्रि के समय चंद्रमा को अर्घ्य देकर गुड़-धनिये का प्रसाद बांटते थे। भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी मनाते थे। आश्विन (कार्तिक) माह के शुक्ल पक्ष के पहले नौ दिन में शारदीय नवरात्रि का आयोजन किया जाता था। दसवें दिन दशहरा अर्थात् विजयादशमी का आयोजन होता था। इस दिन को भगवान राम द्वारा रावण के वध के दिवस के रूप में मनाया जाता था। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को धनतेरस, चतुर्दशी को रूप चौदस एवं अमावस्या को दीपावली मनाई जाती थी।

    इस दिन को भगवान राम के अयोध्या में लौटने का दिन माना जाता था और उनके स्वागत में प्रत्येक, गांव, नगर मौहल्ले, गलियों एवं घरों में दिए जलाए जाते थे। रात्रि में माँ लक्ष्मी की पूजा होती थी एवं कुछ लोग द्यूतक्रीड़ा करना अच्छा समझते थे। दीपावली के अगले दिन यम द्वितीया होती थी जिसे भाई दूज के रूप में मनाया जाता था। इस दिन भाई अपनी बहिन के घर जाकर उससे टीका करवाता था। इसी दिन गोवर्द्धन का आयोजन किया जाता था। गोवर्द्धन पूजा में अकबर भी भाग लेता था। बहुत सी गायों को नहला-धुलाकर एवं आभूषणों से सजाकर बादशाह के सामने लाया जाता था।

    बादशाह उनकी पूजा करता था। जहाँगीर ने भी इस त्यौहार का उल्लेख किया है। कार्तिक मास की पूर्णिमा को भी दिए जलाए जाते थे। इस दिन त्रिपुरी पूर्णिमा का आयोजन किया जाता था। माघ माह में जब सूर्य का मकर राशि में प्रवेश होता था तब पूरे देश में मकर संक्रान्ति मनाई जाती थी। इस दिन नदियों में स्नान करके निर्धनों एवं ब्राह्मणों को दान दिया जाता था एवं अपने से बड़ों को भेंट दी जाती थी। इस दिन तमिनाडु में पोंगल का आयोजन किया जाता था।

    माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी को वसन्त पंचमी के रूप में सरस्वतीजी का जन्म-दिवस मनाया जाता था। इस दिन पीले कपड़े पहनते थे एवं पीले व्यंजन बनाए जाते थे। माघ माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को महाशिवरात्रि का आयोजन होता था। इस दिन पूरे दिन एवं पूरी रात निराहार रहकर भगवान शिव की पूजा की जाती थी। फाल्गुन माह वर्ष का अंतिम माह होता था। इसमें सबसे बड़ा त्यौहार होली मनाया जाता था। फाल्गुन माह की पूर्णिमा को होलिका दहन किया जाता था।

    इस दिन हिरणाकश्यप की बहिन होलिका का दहन किया जाता था तथा प्रहलाद की रक्षा की जाती थी। होली की अग्नि में नया धान सेककर खाया जाता था। अगले दिन रंग खेला जाता था जिसे धुलण्डी कहते थे। इनके अतिरिक्त करवा चौथ, सकट चौथ, शीतला सप्तमी, बड़ अमावस, हरियाली अमावस आदि अनेक छोटे-छोटे त्यौहार मनाए जाते थे। प्रत्येक एकादशी को निराहार रहकर व्रत किया जाता था तथा अगले दिन प्रदोष का व्रत किया जाता था। कुछ प्रांतों में कुछ विशिष्ट त्यौहार भी मनाए जाते थे।

    केरल में ओणम, ओडिसा में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा, विषु, बिहार में छठ पूजा, पंजाब में लोहड़ी एवं वैशाखी, बंगाल में काली पूजा इसी प्रकार के विशिष्ट त्यौहार थे। हिन्दुओं के ये समस्त त्यौहार अत्यंत प्राचीन काल से मनाए जाते रहे थे एवं वर्तमान समय में भी ये त्यौहार सामाजिक जन-जीवन में विशिष्ट स्थान रखते हैं। वर्ष भर में आने वाले सूर्यग्रहण एवं चंद्रग्रहण भी दान-पुण्य एवं स्नान के कारण पर्व की तरह दिखाई देते थे। अबुल फजल ने राम-नवमी और कृष्ण-जन्माष्टमी का उल्लेख महत्त्वपूर्ण हिन्दू त्यौहारों के रूप में किया है।

    मुसलमानों के प्रमुख त्यौहार

    मुसलमानों के प्रमुख त्यौहारों में मुहर्रम, मीलाद उन-नबी, सबे-उल-फितर और ईद-उल-जुहा मुख्य थे। मध्य-कालीन मुस्लिम समाज इन त्यौहारों को बड़ी श्रद्धा से मनाता था। मुहर्रम के पहले दस दिनों में शिया मुसलमान शोक मनाते थे। शिया अनुश्रुतियों के अनुसार हज़रत अली और उनके दो पुत्र-हसन और इमाम हुसैन, दीन की खातिर शहीद हुए थे। उनकी शहादत की याद में शिया हर वर्ष मुहर्रम के महीने की दसवीं तारीख को ताजिये निकाल कर शोक मानते हैं।

    इस दिन शिया मुसलमान पुरुष अपने शरीर को यातनाएं देते थे और अपने सिर पर धूल डालते थे। वे शोक की काली पोशाक पहनते थे। इब्नबतूता के अनुसार लोग उस दिन गरीबों को आटा, चावल और मांस बांटा करते थे। मुगल बादशाह यद्यपि सुन्नी थे तथापि उन्होंने मुहर्रम मनाये जाने पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया था किन्तु औरंगजेब ने अपने राज्य में मुहर्रम का जुलूस निकालने की मनाही कर दी थी। फिर भी मुहर्रम का जमाव तथा ताजिये का जुलूस कभी बन्द नहीं हुआ। इस कारण मुहर्रम के दिन शिया और सुन्नियों में खूनी-संघर्ष हो जाते थे जिनमें कई लोग मारे जाते थे।

    हिजरी महीने 'रबी-उल-अव्वल' के बाहरवें दिन हजरत मुहम्मद के जन्मदिन को मीलाद उन-नबी के रूप में मनाया जाता था। इस दिन शाही-महल में सैयदों, विद्वानों और सन्तों की सभा होती थी और कुरान पढ़ी जाती थी। गुलाब-जल का छिड़काव करने के साथ गरीबांे में मिठाई और हलुआ बांटा जाता था। शाहजहाँ इस अवसर पर एक बड़ी रकम खैरात के रूप में बांटता था। इसी दिन हजरत मुहम्मद का निधन भी हुआ था। हिजरी माह 'शाबान' के चौदहवें दिन 'सबे-बरात' मनाया जाता था। इस दिन पैगम्बर मुहम्मद स्वर्ग में दाखिल हुए थे। इसलिए मुसलमान उस दिन खुशियां मनाते थे।

    शाबान के तेरहवें दिन लोग अपने परिवार के मृतक व्यक्तियों के नाम पर दही और मिठाइयों की थालियां सजाकर उन पर 'फातिहा' पढ़ते थे। आपस में मिठाई और उपहार का आदान-प्रदान होता था। इस पर्व की दूसरी विशेषता घरों तथा मस्जिदों में दीपक जलाना तथा आतिशबाजी का खेल था। फीरोज तुगलक इस पर्व पर तीन दिनों तक आतिशबाजी करता था। शाही परिवार के साथ ही दिल्ली की जनता भी रोशनी तथा सजावट देखने के लिए सड़कों पर निकलती थी।

    राजमहलों, सरकारी इमारतों, बाग-बगीचों तथा बावलियों पर रोशनी की जाती थी और बादशाह एवं अमीर लोग गरीबों में पैसे बांटते थे। रमजान महीने में मुसलमान दिन में निराहार रहकर 'रोजे' रखते थे। इस दौरान वे पानी की एक बूंद भी नहीं पीते थे। रमज़ान महीने का आखरी जुमा (शुक्रवार) जुमातुल विदा के रूप में मानाया जाता था। ईद-उल-फितर तथा ईद-उल-जुहा मुसलमानों के महत्त्वपूर्ण त्यौहार थे। ईद-उल-फितर रमजान के महीने के अंत में आता था। ईद की घोषणा तोप दाग कर तथा बिगुल बजाकर की जाती थी। ईद के दिन तथा उसके अगले दिन मुसलमान अपने मित्रों तथा सम्बन्धियों के गले लगकर उन्हें मुबारक देते थे।

    इस अवसर पर घरों में मिठाइयां बनाकर गरीबों में बांटी जाती थी एवं घर पर ईद की बधाई देने के लिए आने वालों को परोसी जाती थीं। अपने रिश्तेदारों एवं मित्रों के घर भी मिठाइयाँ भेजी जाती थीं। परिवार के बड़े सदस्य अपने से छोटों को 'ईदी' (कुछ रुपये एवं उपहार) दिया करते थे। फिरोज तुगलक इस अवसर पर अपने दरबारियों, कर्मचारियों तथा गुलामों को कपड़े एवं मिठाई देता था। सुल्तन हाथी-घोड़ों के जुलूस के साथ मस्जिद में नमाज पढ़ने जाता था।

    सिकन्दर लोदी ने इस अवसर पर कुुछ कैदियों को जेल से रिहा करने की प्रथा शुरू की थी। जहाँगीर और शाहजंहा ने ईद के दिन जरूरतमंदों और गरीबों में बांटने के लिए खैरात की बड़ी राशि निश्चित की थी। औरंगजेब भी इस पर्व को धूमधाम से मनाता था। हिजरी कलैण्डर के शव्वाल मास की पह्ली तारीख को ईद उल-फ़ित्र मनाई जाती थी। हिजरी कलैण्डर के बारहवें महीने 'जई-उल-हज्जा' के दसवें दिन ईद-उल-अज़हा या बकरा ईद मनाई जाती थी। इसकी तैयारियां कई दिन पहले से होती थीं।

    बादशाह जुलूस एवं लाव-लश्कर के साथ ईदगाह जाकर ईद की नमाज पढ़ता था। इसके बाद बादशाह की उपस्थिति में ऊँट की बलि दी जाती थी। तुर्की सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक और मुगल बादशाह जाहंगीर अपनी तलवार से बकरे की बलि किया करते थे। सम्पन्न लोग भी अपने घरों में बकरे या भेड़ की बलि देते थे। घरों में मिठाइयां, पूडियां आदि तैयार करते थे तथा अपने पूर्वजों के नाम का फातिहा पढ़ते थे। समकालीन ग्रंथों से पता चलता है कि मध्य-कालीन मुस्लिम समाज में बड़ा-वफात', आखिर-चहर और शंबा नामक पर्व भी प्रचलित थे। इन के अलावा योम अल जुमा अर्थात् प्रत्येक साधारण शुक्रवार भी ईद उल मोमिनीन अर्थात् इस्लाम के विश्वासियों का पर्व कह्लाता है।

    मुगल बादशाह अकबर के शासनकाल में नौरोज, मीना बाजार और आबे-पशम भी मनाए जाने लगे थे। 'नौरोज' फारसी वर्ष के पहले महीने 'फरवारदीस' के प्रथम दिवस को (20 या 21 मार्च) को मनाया जाता था। इस समारोह को मुख्यतः उच्च वर्गीय मुसलमान और अमीर मनाते थे। इसका समारोह उन्नीस दिनों तक चलता था। यही समय भारत में बंसत के जाने का और गर्मी के आने का होता था। इस पर्व की तैयारियां महीने पहले शुरू हो जाती थीं।

    शाही राजधानी में बाजार, दीवान-ए-खास और दीवान-ए-आम जैसे स्थानों को किनखाब, मखमल, जरी के सुनहले कपड़ों से सजाया जाता था। मुख्य समारोह का आयोजन दीवान-ए-आम में होता था जहाँ बड़ी वैभवपूर्ण सजावट की जाती थी। अमीर लोग भी अपने महलों को सजाते थे। साधारण-जन अपने मकानों की सफाई करके बंदनवार आदि लटकाते थे। बहुत से स्थानों पर नौरोज का मेला लगता था। इस त्यौहार पर जुआ खेलने पर से प्रतिबंध हट जाता था।

    सप्ताह में एक दिन समस्त प्रजा के लिए बादशाह का दरबार खोल दिया जाता था। मुगल बादशाहों ने ऐसे अवसर पर 'निसार' के नाम से नए सिक्के चलाने की प्रथा प्रारम्भ की जो उस अवसर पर गरीबों को बांटने तथा लोगों को नजराने के लिए काम आते थे। राज्याभिषेक के अवसर पर भी ऐसे सिक्के चलाये जाते थे। इन उन्नीस दिनों में शराब भी खूब पी जाती थी और चारों ओर आनन्द एवं उत्साह रहता था। फारस के कई गायक, वादक और नर्तक बादशाह के दरबार में पहुँचते थे।

    बादशाह का चंदोबा बीच में लगाया जाता था जो हीरे-मोती और कीमती जवाहरात से सुसज्जित होता था। इसके चारों ओर अमीरों के चंदोबे होते थे। बादशाह तथा उसके अमीर एक दूसरे को मूल्यवान भेंट देते थे। बादशाह का जन्मदिन भी बड़े उत्साह और आनन्द से मनाया जाता था। अकबर ने यह प्रथा प्रारम्भ की कि उसका जन्मदिन सूर्य-वर्ष और चन्द्र-वर्ष दोनों के अनुसार मनाया जाए। इस दिन नौरोज की तरह ही शाही महल और दरबार को सजाया जाता था।

    हाथी-घोड़ों को सजाकर बादशाह के समक्ष पेश किया जाता था। बादशाह अपने दरबारियों को साथ लेकर अपनी माता से आशीर्वाद लेने जाता था। हुमायूँ ने इस अवसर पर बादशाह को मूल्यवान धातुओं तथा उपयोगी वस्तुओं से तौलने की प्रथा आरम्भ की। अकबर यह रस्म वर्ष में दो बार- सूर्य वर्ष तथा चन्द्र वर्ष के अनुसार करता था। यह प्रथा जहाँगीर तक तथा कुछ परिवर्तनों के साथ शाहजहाँ के समय तक चलती रही किन्तु औरंगजेब ने वर्ष में एक बार तौले जाने की पुरानी पद्धति अपनाई तथा 51 वर्ष की उम्र में इस प्रथा को समाप्त कर दिया।

    औरंगजेब ने यह प्रथा अपने पुत्रों के लिए बीमारी के उपरान्त स्वस्थ होने पर, इस शर्त पर कायम रखी कि इसमें प्राप्त धन और वस्तुएं गरीबों में बांट दी जाएं। तौलने की रस्म शहजादे के दो वर्ष के होने पर शुरू होती थी, जबकि उसे केवल एक वस्तु से तौला जाता था। फिर वस्तुओं की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ाई जाती थी, जो धीरे-धीरे सात-आठ तक पहुँच जाती थी किन्तु किसी भी स्थिति में यह बारह से अधिक नहीं होती थी।

    ये वस्तुएं बाद में फकीरों तथा जरूरतमंद लोगों को बांट दी जाती थीं। इस समारोह के बाद बादशाह तख्त पर बैठकर लोगों से उपहार ग्रहण करता था। बादशाह इस अवसर पर कुछ लोगों के लिए मनसबदारी घोषित करता था तथा कुछ लोगों को महंगे उपहार तथा जागीरें देता था। मीना बाजार की शुरूआत सर्वप्रथम हुमांयू ने की थी। अकबर इन दिनों को 'खुशरोज' कहता था। शाहजहाँ प्रत्येक समारोह के बाद इस प्रकार का बाजार लगवाया करता था, नौरोज के बाद इस बाजार का लगना अनिवार्य हो गया था।

    अकबर के समय इस बाजार की सबसे अधिक उन्नति हुई। पहले माह बाजार बादशाह के महल के अन्दर नावों पर लगाया जाता था किंतु बाद में हरम की बारादरी में लगने लगा। इसमें अमीरों की स्त्रियां और पुत्रियां दुकानें लगाकर बैठती थीं। राजपूत स्त्रियां भी इसमें भाग लेती थीं। अधिकांश दुकानें बहुमूल्य कपड़ों और जेवरातों की होती थीं। बादशाह शहजादियों तथा हरम की बेगमों के साथ बाजार में आता था और दुकानों से दुगने-तिगुने दाम देकर सौदा खरीद लेता था। बादशाह जिस स्त्री से प्रसन्न हो जाता, उससे अधिक वस्तुएं खरीदकर आवश्यकता से अधिक धन प्रदान कर देता था।

    शाहजहाँ ने मुमताज महल को पहली बार मीना बाजार में ही देखा और पसंद किया था। औरतों के इस बाजार के बाद मर्दों का बाजार लगता था, जहाँ संसार के कई देशों के व्यापारी सामान बेचने आते थे। वर्षा के आरम्भ में मुगल दरबार में होली की तरह एक पर्व मनाया जाता था। जहाँगीर इस पर्व को 'आब-ए-पशम' कहता था किन्तु इतिहासकार लाहोरी ने 'पडशनामा' में इसे 'ईद-ए-गुलाबी' कहा है। इस अवसर पर शाहजादे, प्रमुख अमीर एवं दरबारी एक-दूसरे पर गुलाब-जल छिड़कते थे।

    बादशाह को भेंट तथा उपहार प्रदान किए जाते थे। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मध्ययुगीन भारतीय समाज में हिन्दू और मुसलमान अपने-अपने त्यौहार मनाते थे। मुस्लिम बादशाहों ने कुछ हिन्दू त्यौहारों को अपना लिया था तथा हिन्दू भी मुसलमानों के कुछ त्यौहारों में भाग लेते थे।

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  • संधि की शर्तों से बचने के लिए जोधपुर के राजा मानसिंह ने पागल होने का नाटक किया

     02.06.2020
    संधि की शर्तों से बचने के लिए जोधपुर के राजा मानसिंह ने पागल होने का नाटक किया

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    क्षेत्रफल की दृष्टि से मारवाड़ रियासत राजपूताने की सबसे बड़ी रियासत थी तथा भारत वर्ष की देशी रियासतों में इसका तीसरा स्थान था। भारत भर में केवल हैदराबाद एवं जम्मू-कश्मीर ही इससे बड़ी रियासतें थीं। जब मारवाड़ में राठौड़ों की तीसवीं पीढ़ी के राजा विजयसिंह (1752-1793) की पासवान गुलाबराय का पुत्र तेजसिंह मर गया तो गुलाबराय ने राजकुमार मानसिंह जो कि विजयसिंह के पुत्र गुमानसिंह का पुत्र था, को अपने पास रख लिया। ई.1793 में विजयसिंह की मृत्यु हो गयी तथा उसके पौत्र भीमसिंह, जो कि स्वर्गीय राजकुमार फतैसिंह का दत्तक पुत्र था, ने जोधपुर के दुर्ग पर अधिकार कर लिया।

    राज्यासीन होते ही उसने अपने भाई-भतीजों को मरवाना आरंभ कर दिया। राजकुमार मानसिंह ने अपने प्राणों की रक्षा के लिये जालोर के दुर्ग में शरण ली। और स्वयं को मारवाड़ का शासक घोषित कर दिया। भीमसिंह की सेना ने 10 वर्ष तक जालोर दुर्ग को घेरे रखा किंतु मानसिंह पकड़ा नहीं जा सका। जब मानसिंह को जोधपुर की सेना से बचने का कोई उपाय न दिखा तो उसने 15 अक्टूबर 1803 को जालोर दुर्ग छोड़ने का विचार किया। जलन्धरनाथ पीठ के योगी आयस देवनाथ ने यह सुना तो उसने मानसिंह से केवल 4-5 दिन और जालोर का किला न छोड़ने का आग्रह किया और कहा कि यदि 21 अक्टूबर तक किला नहीं छोड़ोगे तो मारवाड़ का राज्य तुम्हें मिल जायेगा।

    आयसदेव नाथ की बात सही निकली, 20 अक्टूबर 1803 को जोधपुर नरेश भीमसिंह की मृत्यु हो गई। राजधानी जोधपुर से शिवचंद भण्डारी, ज्ञानमल मुहणोत तथा शंभुदान आदि ने इन्द्रसिंह को संदेश भिजवाया कि घेरा जारी रखा जाये तथा पोकरण ठाकुर सवाईसिंह के आदेश की प्रतीक्षा की जाये किंतु चतुर इन्द्रराज समझ चुका था कि भाग्य को संवारने का यही सबसे अधिक उचित समय है। यदि जोधपुर में प्रवास कर रहे राज्याधिकारी मारवाड़ के राजा का मनोनयन करेंगे तो राजा उनके प्रति समर्पित रहेगा। अतः बेहतर यही है कि मानसिंह को जोधपुर का राजा बना दिया जाये। उसने उसी समय मानसिंह को सब समाचार कह भिजवाये तथा तथा मानसिंह को आदर सहित जोधपुर लाकर मारवाड़ की गद्दी पर बैठा दिया। इसके बाद इन्द्रराज सिंघवी मारवाड़ राज्य का प्रमुख कर्ता धर्ता बन गया। आयस देवनाथ के प्रति श्रद्धानत होकर राजा मानसिंह ने उसे अपना गुरु बनाया और जोधपुर नगर से बहर मेड़ती दरवाजे से कुछ दूरी पर ईशान कोण में एक विशाल भव्य मन्दिर का निर्माण करवाया जो अपने आकार और महत्ता के कारण महामन्दिर कहलाया।

    मन्दिर परिसर में दो सुन्दर महल भी बनाये गये जिनकी छत पर एक छतरी का निर्माण करवाया गया जहाँ खड़े होकर आयस देवनाथ राजा मानसिंह को प्रातः काल में दर्शन देते थे। राजा दुर्ग में स्थित महलों से ही गुरु के दर्शन करता और उसी के बाद अन्न-जल ग्रहण करता तथा प्रत्येक सोमवार को महामन्दिर में उपस्थित होकर गुरु को प्रणाम करता। महामन्दिर के पास ही मानसागर तालाब बनाया गया जिसमें राजा मानसिंह और आयस देवनाथ नौका विहार किया करते थे।

    राज्य को स्थायित्व देने के लिये महाराजा मानसिंह ने दिसम्बर 1803 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी से समझौता किया किंतु वह अमल में नहीं लाया जा सका। जोधपुर राज्य में सामंतों का षड़यंत्र चलता रहता था। राजा मानसिंह के समय में भी कई सामंतों की हत्या हो गयी थी। 10 अक्टूबर 1815 को पिण्डारी अमीरखां ने जोधपुर के दुर्ग में घुसकर दिन दहाड़े महाराजा के गुरु आयस देवनाथ तथा राज्य के प्रधानमंत्री इंद्रराज सिंघवी को मार डाला।

    इस हत्याकाण्ड के समय महाराजा मोतीमहल में था, वह तुरंत ही तलवार लेकर दुष्टों का सिर काटने के लिये चल पड़ा किंतु सरदारों ने राजा को वहीं रोक लिया ताकि कोई अनहोनी नहीं हो जाये। इन्द्रराज सिंघवी की सेवाओं को देखते हुए राजा ने उसकी शवयात्रा दुर्ग के मुख्य मार्ग से ले जाने की आज्ञा दी। यह अधिकार केवल राजा, रानी एवं राजकुमारों को ही मिलता था।

    इन्द्रराज की मृत्यु के बाद मानसिंह राज्यकार्य से उदासीन हो गया। उसने इन्द्रराज के भाई गुलराज को दीवान बनाया किंतु 4 अप्रेल 1817 को उसकी भी हत्या हो गयी। इस पर 19 अप्रेल 1817 को भीमनाथ के कहने पर महाराजा मानसिंह ने राज्यकार्य अपने 17 वर्ष के राजकुमार छत्रसालसिंह को सौंप दिया किंतु राजकुमार से राज्य की रक्षा होना संभव न जानकर ई.1818 में महाराजा मानसिंह ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी से दूसरा समझौता किया जिसके अनुसार जोधपुर रियासत अंग्रेजी शासन के संरक्षण में चली गयी। इस संधि की शर्तें इस प्रकार से थीं-

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी और महाराजा मानसिंह तथा उसके वंशजों के बीच मैत्री, सहकारिता तथा स्वार्थ की एकता सदा पुश्त दर पुश्त कायम रहेगी और एक के मित्र तथा शत्रु दोनों के मित्र एवं शत्रु होंगे। अंग्रेज सरकार जोधपुर राज्य और मुल्क की रक्षा करने का जिम्मा लेती है। महाराजा मानसिंह तथा उसके उत्तराधिकारी अंग्रेज सरकार का बड़प्पन स्वीकार करते हुए उसके अधीन रहकर उसका साथ देंगे और दूसरे राजाओं अथवा रियासतों के साथ किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रखेंगे।

    अंग्रेजी सरकार को बताये बिना और उसकी स्वीकृति प्राप्त किये बिना महाराजा तथा उसके उत्तराधिकारी किसी अन्य राजा अथवा रियासत से कोई अहदनामा नहीं करेंगे परंतु अपने मित्रों एवं सम्बंधियों के साथ उनका मित्रतापूर्ण पत्रव्यवहार पूर्ववत् जारी रहेगा।

    महाराजा तथा उसके उत्तराधिकारी किसी पर ज्यादती नहीं करेंगे। यदि दैवयोग से किसी से कोई झगड़ा खड़ा हो जायेगा तो वह मध्यस्थता तथा निर्णय के लिये अंग्रेज सरकार के सम्मुख पेश किया जायेगा। जोधपुर राज्य की तरफ से सिंधिया को प्रतिवर्ष दिया जाने वाला 1 लाख 8 हजार रुपये खिराज अब सदा अंग्रेज सरकार को दिया जायेगा। अंग्रेजी सरकार इकरार करती है कि सिंधिया अथवा अन्य कोई खिराज का दावा करेगा तो अंग्रेज सरकार उसके दावे का जवाब देगी।

    जोधपुर राज्य को अंग्रेजी सरकार की सहायता के लिये 1500 सवार देने होंगे। जब भी आवश्यकता पड़ेगी राज्य के भीतरी प्रबंध के लिये सेना के कुछ भाग के अतिरिक्त शेष सब सेना महाराजा को अंग्रेजी सेना का साथ देने के लिये भेजनी होगी। महाराजा तथा उसके उत्तराधिकारी अपने राज्य के खुदमुख्तार रईस रहेंगे और उनके राज्य में अंग्रेजी हुकूमत का दखल न होगा।

    ये शर्तें व संधि दिल्ली में लिखी गयी और इस पर चार्ल्स मेटकाफ, व्यास बिशनराम और व्यास अभयराम ने हस्ताक्षर किये। संधि में प्रावधान किया गया कि जोधपुर के युवराज महाराजकुमार छत्रसिंह व महाराजा मानसिंह तथा गवर्नर जनरल की स्वीकृति के पश्चात् 6 माह के भीतर संधि लागू हो जायेगी। हालांकि महाराजा मानसिंह लगातार ईस्ट इण्डिया कम्पनी के पास विगत 13 वर्षों से संधि के लिये निवेदन करता रहा था किंतु वास्तविकता यह थी कि महाराजा को संधि से कुछ लेना देना नहीं था। वह तो उन दुष्ट ठाकुरों और पिण्डारियों से छुटकारा पाने के लिये कम्पनी की सहायता प्राप्त करना चाहता था जो उसे दुःख देते थे। बाद में सन्धि की शर्तों की पालना करने से बचने के लिये महाराजा ने पागल होने का नाटक कर लिया।

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  • चीन की दीवार की याद दिलाता है कुम्भलगढ़ का दुर्ग

     02.06.2020
    चीन की दीवार की याद दिलाता है कुम्भलगढ़ का दुर्ग

    मौर्य सम्राटों ने बनाया और गुहिलों ने संवारा कुम्भलगढ़ दुर्ग


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    कुम्भलगढ़ दुर्ग उदयपुर से लगभग 90 किलोमीटर तथा नाथद्वारा से लगभग 40 किलोमीटर उत्तर में, समुद्र सतह से लगभग 1082 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है और नीचे की नाल से लगभग 250 मीटर ऊँचा है।

    दुर्ग के निर्माता

    मौर्य सम्राट अशोक के दूसरे पुत्र ‘सम्प्रति’ ने ईसा से लगभग 200 वर्ष पहले ठीक उसी स्थान पर एक दुर्ग बनवाया था, जहाँ आज कुम्भलगढ़ का दुर्ग स्थित है। ‘सम्प्रति’ जैन धर्म का अनुयायी था उसके समय में बने कुछ प्राचीन जैन मंदिरों के अवशेष आज भी कुम्भलगढ़ में मौजूद हैं। महाराणा कुंभा (ई. 14-1468) के समय यह दुर्ग खण्डहर के रूप में मौजूद था। कुंभा ने अपने प्रसिद्ध शिल्पी मंडन के निर्देशन में उन्हीं खण्डहरों पर एक नये दुर्ग का निर्माण करवाया जिसके कुंभलगढ़ कहा जाता है।

    दुर्ग की श्रेणी

    यह पार्वत्य दुर्ग तथा ऐरण दुर्ग की श्रेणी में आता है। इसे कुंभलमेर या कुंभलमेरु भी कहते हैं। यह छोटी-छोटी कई पहाड़ियों को मिलाकर बनाया गया है। कुंभलगढ़ प्रशस्ति में इन पहाड़ियों के नाम नील, श्वेत, हेमकूट, निषाद, हिमवत्, गन्दमदन आदि दिये गये हैं। इस दुर्ग के चारों ओर स्थित पहाड़ियों के कारण यह दुर्ग दूर से दिखाई नहीं देता है।

    नवीन दुर्ग की प्रतिष्ठा

    महाराणा कुंभा ने वि.सं.1515 चैत्र वदि 13 (ई.1458) को कुंभलगढ़ दुर्ग की प्रतिष्ठा की। दुर्ग बनने की स्मृति में कुंभा ने विशेष सिक्के ढलवाये जिन पर कुंभलगढ़ का नाम अंकित है। उसने दुर्ग में चार दरवाजे बनवाये तथा मण्डोर से लाकर हनुमानजी की मूर्ति स्थापित करवाई। साथ ही अपने किसी अन्य शत्रु के यहाँ से लायी हुई गणपति की मूर्ति भी स्थापित करवायी। वहीं उसने कुंभस्वामी का मंदिर, जलाशय तथा एक बाग का निर्माण भी करवाया।

    दुर्ग की सुरक्षा व्यवस्था

    कुंभलगढ़ अनियमित आकार की कई पहाड़ियों से घिरा हुआ है और इन्हें लगभग 35 किलोमीटर लम्बी तथा सात मीटर चौड़ी दीवार से जोड़ दिया गया है। दुर्ग की प्राचीर पर तीन-चार घुड़सवार एक साथ चल सकते हैं। दुर्ग की प्राचीर में स्थान-स्थान पर बुर्ज बनी हुई हैं जिनकी बाहरी आकृति बड़े आकार के आधे-कुंभों (मटकों) के समान है। इस कारण कोई शत्रु इस प्राचीर पर सीढ़ी टिकाकर नहीं चढ़ सकता। कुंभलगढ़ की लम्बी-चौड़ी दीवार चीन की दीवार का स्मरण कराती है।

    कुंभलगढ़ दुर्ग का मार्ग

    दुर्ग से पहले केलवाड़ा नामक एक प्राचीन कस्बा बसा हुआ है जहाँ स्थित एक गढ़ी में बाणमाता का प्रसिद्ध मंदिर है। दुर्ग में स्थित महलों तक पहुंचने के लिये गोल घुमावदार रास्ता पार करना पड़ता है तथा एक-एक करके ओरठ पोल, हल्ला पोल, हनुमान पोल, विजय पोल, भैरव पोल, नींबू पोल, चौगान पोल, पागड़ा पोल और गणेश पोल नामक कुल नौ द्वार पार करने पड़ते हैं। केलवाड़ा से चलने के बाद ओरठ पोल और हल्ला पोल पार करने के बाद दुर्ग का मुख्य द्वार आता है जिसे हनुमान पोल कहते हैं। यहाँ हनुमानजी की मूर्ति स्थापित है। यह माण्डव्यपुर (मण्डोर) से लाई गई थी। इसका उल्लेख कीर्ति स्तंभ की प्रशस्ति में भी है। यह मूर्ति महाराणा कुंभा द्वारा माण्डव्यपुर (मण्डोर) पर प्राप्त की गई विजय की प्रतीक है। इसकी चरण चौकी पर वि.सं. 1515 फाल्गुन मास का लेख खुदा हुआ है। हनुमानपोल के बाद विजयपोल आता है जिसमें प्रवेश करने पर मध्यकालीन मंदिर, मण्डप, स्मारक दिखाई देते हैं।

    कटारगढ़

    कुंभलगढ़ के भीतर एक पहाड़ी के शिखर पर एक और दुर्ग स्थित है जिसे कटारगढ़ कहते हैं। यह गढ़ भी द्वारों एवं प्राचीरों से सुरक्षित है। भीतरी दुर्ग में प्रवेश करने से पहले देवी का मंदिर आता है। महाराणा, युद्ध अभियान पर जाते समय देवी की आज्ञा लेकर जाते थे और लौटकर सबसे पहले देवी को प्रणाम करते थे। कटारगढ़ में झाली महल, बादल महल (कुंभा महल), तालाब, तोपखाना, बंदीगृह, अन्नागार, अस्तबल और कुछ मंदिर स्थित हैं। बादल महल की छत पर भित्तिचित्र बने हुए हैं। महल के द्वार तथा झरोखे आनुपातिक रूप से छोटे हैं। यहाँ के महलों की छत से पूरे दुर्ग का विहंगम दृृश्य दिखाई देता है। साथ ही मेवाड़ राज्य की सीमा पर स्थित मारवाड़ राज्य दिखाई देता है।

    गोदाम एवं अस्तबल

    महाराणा कुंभा ने दुर्ग के भीतर युद्धोपयोगी सामग्री एवं खाद्यान्न एकत्रित करने के लिये बड़े-बड़े गोदाम बना रखे थे। उनके घोड़ों के अस्तबल तथा हाथियों के बाड़े भी राजप्रासाद की सीमा में स्थित थे।

    झाली रानी की कहानी

    मान्यता है कि महाराणा कुंभा, झालों की एक राजकुमारी को बलपूर्वक ब्याह लाया जो कि मण्डोर के राठौड़ राजकुमार की मंगेतर थी। राठौड़ राजकुमार ने झाली को प्राप्त करने के बहुत प्रयास किए किंतु उसे सफलता नहीं मिली। कुंभा ने झाली के लिये एक मालिया (महल) बनवाया जहाँ से वर्षा काल में आकाश साफ होने पर मण्डोर का दुर्ग भी दिखाई पड़ता था। दुर्ग में झाली बाव नामक एक बावड़ी भी स्थित है। झाली रानी के सम्बन्ध में एक दोहा कहा जाता है-

    झाल कटायां झाली मिले न रंक कटायां राव।

    कुंभलगढ़ रै कांगरे, माछर हो तो आव।।


    दुर्ग में स्थित मंदिर

    मान्यता है कि किसी समय दुर्ग में 365 मंदिर थे जिनमें से अब बहुत से नष्ट हो गए हैं। दुर्ग परिसर में स्थित मंदिरों में मामादेव (कुंभा स्वामी) का मंदिर, विष्णु मंदिर और नीलकण्ठ का मंदिर प्रमुख हैं। नीलकण्ठ मंदिर के निकट कुंभा द्वारा निर्मित विशाल यज्ञदेवी का दो-मंजिला भवन है। इसका निर्माण शास्त्रोक्त विधि से किया गया था। कुंभलगढ़ दुर्ग की प्रतिष्ठा का यज्ञ भी इसी वेदी में हुआ था। यज्ञ से निकलने वाले धूम्र की निकासी के लिये छत में सुंदर जालियां बनी हुई हैं। इनके ऊपर सुंदर शिखर बना हुआ है। राजस्थान में इस प्रकार की प्राचीन यज्ञ वेदी कुंभलगढ़ में ही बची है। अब यज्ञ-स्थान के खम्भों को दीवार से बंद कर दिया गया है। कटारगढ़ के उत्तर में नीची भूमि पर मामादेव (कुंभा स्वामी) का मंदिर है। इस मंदिर के खण्डहर के बाहरी भाग से कई प्रतिमाएं उपलब्ध हुई हैं जिनमें से अधिकांश मूर्तियां उदयपुर के संग्रहालय में सुरक्षित रखी गई हैं। 
    मंदिर में 30 गुणा 30 फुट का खुला बारामदा है। इसमें 16 खम्भे लगे थे। इसके भीतरी भाग के चबूतरे पर प्रतिमा रखी है तथा मध्यवर्ती भाग पर लघु वेदी बनी हुई है।

    इससे थोड़ी दूरी पर एक कुण्ड है जहाँ कुंभा के पुत्र उदयसिंह (ऊदा) ने कुंभा की हत्या की थी। कुण्ड की सीढ़ियों पर बने झरोखों में देवी-देवताओं की कई मूर्तियां बनी हुई हैं। कुंभलगढ़ प्रशस्ति कुंभा स्वामी मंदिर के प्रांगण के बाहर महाराणा कुंभा ने ई.1460 में पत्थर की शिलाओं पर संस्कृत भाषा और देवनागरी लिपि में एक प्रशस्ति उत्कीर्ण करवाई थी। अब यह शिलालेख एवं कुंभलगढ़ के कई पुरावशेष उदयपुर के संग्रहालय में सुरक्षित हैं। इस शिलालेख में मेवाड़ नरेशों की वंशावली, महाराणा 
    कुंभा की उपलब्धियाँ, कुंभा के समय के बाजार, मंदिर, राजमहल तथा युद्धों आदि की जानकारी दी गई है।

    कुंभलगढ़ पर शत्रुओं के आक्रमण

    इस दुर्ग पर पहला आक्रमण महाराणा कुंभा के समय में माण्डू के सुल्तान महमूद खिलजी ने किया। उस समय महाराणा दुर्ग में नहीं था। सामंत दीपसिंह, दुर्ग की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ। महमूद कुंभलगढ़ पर अधिकार करने में सफल नहीं हुआ। अंत में निराश होकर, केलवाड़ा गांव की गढ़ी में तोड़-फोड़ करके वापस लौट गया। ई.1457 में गुजरात के सुल्तान कुतुबुद्दीन ने कुंभलगढ़ पर घेरा डाला। वह भी असफल होकर लौट गया।

    महारणा कुंभा की हत्या

    ई.1468 में महाराणा कुंभा के बड़े पुत्र उदयसिंह (ऊदा) ने कुंभा की छल से हत्या कर दी तथा स्वयं महाराणा बन गया किंतु मेवाड़ के सामंतों ने ऊदा को अपना महाराणा स्वीकार नहीं किया। उन्होंने पांच वर्ष तक चले संघर्ष के बाद ऊदा को गद्दी से उतारकर उसकी जगह कुंभा के दूसरे पुत्र रायमल को महाराणा बनाया। रायमल के कुंवरों- पृथ्वीराज तथा महाराणा सांगा का बचपन कुंभलगढ़ दुर्ग में बीता था।

    उडणा पृथ्वीराज

    रायमल का ज्येष्ठ पुत्र पृथ्वीराज अपनी धावक गति के कारण उडणा पृथ्वीराज के नाम से विख्यात था। उसकी हत्या उसके बहनोई सिरोही नरेश जगमाल ने विष देकर की। विष का सेवन करने के बाद पृथ्वीराज कुंभलगढ़ की ओर आया तथा यहीं पहाड़ियों में उसका दम निकला।

    उसकी एक छतरी दुर्ग की तलहटी में है, जहाँ उसका निधन हुआ था तथा दूसरी छतरी किले में मामादेव कुण्ड के पास स्थित है, जहाँ उसका दाह संस्कार हुआ था। यह छतरी भारतीय पद्धति से बने 12 खंभों पर आधारित है। छतरी के बाहरी भाग में सीधी रेखा के पत्थर लगे हुए हैं। भीतर अष्टकोण बनाते हुए किनारे पर पत्थर लगे हैं। चारों ओर लगभग तीन फुट की ऊंचाई पर खुले बरामदे बने हैं जिनमें आराम से बैठा जा सकता है। इनके चारों ओर पंखुड़ी के घुमाव के ढंग के पत्थर लगे हैं। भीतर वृत्ताकार शिखर, बड़े आकार से छोटा होता चला गया है। छतरी के बीच में लगभग तीन फुट ऊँचा, डेढ़ फुट चौड़ा और ऊपर से नुकीला एक स्मारक स्तम्भ लगा है, जिसमें चारों ओर 17 स्त्रियों की मूर्तियां तथा उनके बीच में पृथ्वीराज की मूर्ति स्तंभ के बीच वाले भाग में खोदी गई है।

    यह स्मारक स्तम्भ 15वीं शताब्दी ईस्वी की वेशभूषा एवं सामाजिक व्यवस्था पर अच्छा प्रकाश डालता है। प्रवेश द्वार के सामने वाले स्मारक स्तम्भ की पहलू पर चार स्त्रियों की मूर्तियां एवं बीच में पृथ्वीराज की घोड़े पर सशस्त्र मूर्ति बनी है। पृथ्वीराज के लम्बी दाढ़ी एवं मूंछें हैं जो तिकाने आकार में नीचे तक चली गई हैं। पृथ्वीराज के आभूषणों में सादी कण्ठी, भुजबंद और कड़े प्रमुख हैं। हाथ में लम्बी तलवार दिखाई गई है। सिर पर गोल आकार की पगड़ी है जैसी बीकानेर तथा मारवाड़ में बांधा करते हैं। अधोवस्त्र में धोती और उसके साथ अंगोछा कमर में बंधा है, जिसके पल्ले नीचे तक लटकते हैं। ऊपरी शरीर पर वस्त्रों का अभाव है। स्त्री वेश में कण्ठी, कड़े, लंगर एवं चूड़ा प्रमुख हैं। तीन लड़ी का कन्दोरा बड़ा ही भव्य दिखाई देता है। अधोवस्त्र जंघा तक बनाया गया है परन्तु साड़ी का पूरा अभाव है। स्त्रियों के वस्त्र सादे ढंग से बनाये गये हैं।

    स्तंभ के दूसरे पहलू में चार रानियां और बीच में पृथ्वीराज बताया गया है। पृथ्वीराज को जटाजूटधारी शिवलिंग की पूजा करते हुए दिखा गया है जिससे स्पष्ट है कि प्राचीन गुहिलवंशी राजाओं की तरह वह भी शैव मतावलम्बी था। ये मूर्तियां आकार-प्रकार में वैसी ही हैं जैसी कुंभलगढ़ में विद्यमान नीलकण्ठ की मूर्ति है। तीसरे पहलू में पांच रानियां और पलंग पर लेटे हुए पृथ्वीराज को दिखाया गया है। यहाँ कुंवर के मस्तक पर नुकीला टोप एवं अधोवस्त्र बताये गये हैं जो एक योद्धा के द्योतक हैं।

    पलंग के पाये तिरछे हैं और इन पायों से पलंग के ऊपरी भाग आगे बढ़े हुए दिखाई देते हैं। आहड़ की छतरियों एवं मंदिरों के पलंगों से इसकी आकृति अलग है। दो स्त्रियों के हाथों में चौरस आकार के पंखे दिखाये गये हैं। इन स्त्रियों के चेहरे से भक्ति-भाव टपकता है। पलंग के नीचे जलपात्र रखा हुआ है जिसे देखने से उस समय के पात्रों के आकार का अनुमान लगाया जा सकता है। चित्तौड़ के विजय स्तंभ के पलंगों के नीचे भी इसी प्रकार के जलपात्र दिखाये गये हैं।

    स्मारक स्तंभ के चौथे पहलू में पृथ्वीराज फिर चार स्त्रियों के साथ छोटी तलवार एवं ढाल लिये बताया गया है। कुंवर के सिर पर गोल आकार की लहरदार पगड़ी बनायी गई है। कुंवर कच्छ पहने हुए है। रानियां हाथ जोड़े हुए शांतभाव से दिखाई देती हैं जो सतीत्व एवं भक्ति-भाव की प्रतिमाएं हैं। इसी छतरी में दाहिनी बाजू वाले खंभे पर अस्पष्ट लेख खुदा हुआ है परन्तु लिपि से स्पष्ट है कि यह लेख नकली है। बायीं ओर के दूसरे खंभे पर तत्कालीन लिपि में ‘श्री घणष पना’ खुदा हुआ है। यह किसी शिल्पी या सूत्रधार का नाम हो सकता है।

    छतरी पर एक गोलाकार गुम्बज है जो प्रारंभ में लगभग दो फुट ऊँचे गोल आधार पर बनाया गया है। यह गुम्बज 15वीं शताब्दी ईस्वी के राजपूत शैली के गुम्बजों की शैली का है। गुम्बज अर्द्ध-भाग समाप्त करने पर नुकीला होता हुआ दिखाई देता है। इसके शिखर पर गोलाकार एवं बिना अलंकरण वाला एक पत्थर लगा हुआ है। आकार-प्रकार से गुम्बज की बनावट कुंभा कालीन गुम्बजों जैसी है। ये गुम्बज कुंभा के राजप्रासादों के गवाक्षों और मंदिरों के शिखरों पर अब भी चित्तौड़ तथा कुंभलगढ़ में देखे जा सकते हैं। इस गुम्बज को बनाने में ईंट तथा पत्थर के टुकड़े काम में लिये गये हैं जिस पर चूने का प्लास्टर कर दिया गया है। यह प्लास्टर काई जमने से काला हो गया है। भीतरी भाग में लाल रंग स्पष्ट झलकता है।

    महाराणा उदयसिंह का राजतिलक

    जब दासी पुत्र बनवीर ने महाराणा सांगा के पौत्र महाराणा विक्रमादित्य की हत्या कर दी और उसके छोटे भाई उदयसिंह को भी मारना चाहा, तब पन्ना धाय ने अपने पुत्र का बलिदान देकर उदयसिंह को बचा लिया। राजकुमार उदयसिंह को किसी तरह कुंभलगढ़ दुर्ग लाया गया और वहीं पर उसका पालन-पोषण किया गया। जब उदयसिंह वयस्क हो गया तब कुंभलगढ़ दुर्ग में ही उसका राज्यतिलक हुआ। महाराणा प्रताप का जन्म महाराणा उदयसिंह के बड़े पुत्र प्रतापसिंह का जन्म भी कुंभलगढ़ में ही हुआ। कुंभलगढ़ से ही उदयसिंह ने चित्तौड़ पर चढ़ाई की और अपने पूर्वजों का दुर्ग पुनः हस्तगत किया। बाद में जब अकबर ने उदयसिंह से चित्तौड़ छीन लिया तब उदयसिंह उदयपुर चला गया।

    महाराणा प्रताप की अस्थाई राजधानी

    जब ई.1572 में महाराणा उदयसिंह का निधन हो गया, तब महाराणा प्रतापसिंह गोगून्दा में अपना राज्यतिलक करवाकर कुंभलगढ़ चला आया और यहीं से मेवाड़ का शासन चलाने लगा। ई.1576 में हल्दीघाटी युद्ध के बाद महाराणा प्रताप सीधा इसी दुर्ग में आया था।

    कुंभलगढ़ पर शाहबाज खां का अधिकार

    अकबर ने शाहबाज खां को कुंभलगढ़ पर चढ़ाई करने के लिये भेजा ताकि महाराणा प्रताप को पकड़ा या मारा जा सके। शाहबाज खां कुंभलगढ़ दुर्ग पर घेरा डालकर बैठ गया। कुछ समय बाद, दुर्ग में रसद की कमी हो गई। दो साल बाद, ई.1578 में महाराणा प्रताप दुर्ग से निकल कर दुर्गम पहाड़ों में चला गया। उसने सोनगरा भाण को दुर्ग की रक्षा का भार सौंपा। सोनगरा भाण, सींधल सूजा तथा अन्य योद्धा दुर्ग की रक्षा करते हुए काम आये। कुंभलगढ़ पर मुगलों का अधिकार हो गया। इस सम्बन्ध में एक दोहा इस प्रकार से कहा जाता है-

    कुंभलगढ़ रा कांगरां, रहि कुण कुण राण।

    इक सिंहावत सूजड़ो इक सोनगरो भाण।


    कुछ दिनों बाद प्रताप पुनः पहाड़ियों से निकला तथा उसने फिर से मुगलों को कुंभलगढ़ दुर्ग से मार भगाया। इसके बाद यह दुर्ग राणाओं के अधिकार में ही रहा।

    इतिहासकारों की दृष्टि में कुंभलगढ़

    कुंभलगढ़ मेवाड़ राज्य का नैसर्गिक सुरक्षा कवच था तथा इसे राजस्थान के सर्वाधिक सुरक्षित किलों में से माना जाता था। अबुल फजल ने लिखा है कि यह दुर्ग इतनी ऊंचाई पर बना हुआ है कि नीचे से ऊपर देखने पर सिर से पगड़ी गिर जाती है। कर्नल टॉड ने इसे चित्तौड़ के बाद दूसरे नम्बर का दुर्ग बताया है तथा दुर्ग की सुदृढ़ प्राचीर, बुर्जों एवं कंगूरों के कारण कुंभलगढ़ की तुलना एट्रस्कन से की है।

    वर्तमान स्थिति

    दुर्ग परिसर में आज भी कुछ परिवार निवास करते हैं। दुर्ग परिसर में खेती भी होती है। अब यह दुर्ग भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की देख-रेख में है। जिस महल में महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था, अब वहाँ चमगादड़ों का बसेरा है।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • युग निर्माता महाराजा सूरजमल- 6

     02.06.2020
    युग निर्माता महाराजा सूरजमल- 6

    राजकुमार के रूप में सूरजमल के कार्य


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    बीस वर्ष तक राज्य का संचालन करने के बाद अर्थात् 1742 ई. के लगभग, राजा बदनसिंह की आंखों की ज्योति घटने लगी। अतः उसने राज्य विस्तार, सैन्य संगठन तथा राजनैतिक वार्त्ताओं के अधिकार अपने ज्येष्ठ पुत्र सूरजमल को सौंप दिये तथा स्वयं कौमी परिषद के साथ बैठकर राज्य का आन्तरिक प्रबंध करने लगा। ई.1745 में राजकुमार प्रतापसिंह की अचानक मृत्यु हो गई तथा राजा बदनसिंह राज्य कार्य से पूरी तरह विरक्त हो गया। इस प्रकार ई.1745 में सूरजमल राज्य का एकमात्र वास्तविक शासक बन गया किंतु पिता के जीवित रहते उसने स्वयं को राजा घोषित नहीं किया।

    चन्दौस युद्ध में फतहअली खां की सहायता

    ई.1745 में राजकुमार सूरजमल दिल्ली के बादशाह मुहम्मदशाह की तरफ से, अली मुहम्मद रुहेले के विरुद्ध जाटों की एक सेना लेकर गया। इस लड़ाई में सूरजमल ने अपनी बहादुरी की धाक जमा ली। अगले वर्ष ई.1746 में सूरजमल ने असद खाननजाद के विरुद्ध सूबेदार फतहअली खां की मदद की और फतहअली खां अपनी जागीर वापस लेने में सफल रहा। सूरजमल ने चन्दौस में असद की सेना को हरा दिया। असद युद्ध में मारा गया। चन्दौस की लड़ाई से सूरजमल बहुत सा धन लेकर लौटा। वर्तमान में चन्दौस, अलीगढ़ जिले में स्थित है।

    जयपुर नरेश ईश्वरीसिंह की सहायता

    ई.1743 में जयपुर नरेश जयसिंह की मृत्यु हो गई तथा उसके पुत्रों ईश्वरीसिंह तथा माधोसिंह में राज्याधिकार को लेकर युद्ध हुआ। उदयपुर के महाराणा ने छोटे पुत्र माधोसिंह का पक्ष लिया क्योंकि माधोसिंह, उदयपुर की राजकुमारी के गर्भ से उत्पन्न हुआ था, जो राजा जयसिंह को ब्याही गई थी। राजा बदनसिंह ने राजकुमार सूरजमल को आदेश दिया कि वह जयपुर के बड़े राजकुमार ईश्वरीसिंह की सहायता के लिये सेना लेकर जयपुर जाये। सूरजमल 10 हजार घुड़सवार, 2 हजार पैदल और 2 हजार बर्छेबाज लेकर कुम्हेर से जयपुर गया। ईश्वरीसिंह ने राजा सूरजमल को अपने बराबर का सम्मान दिया। 21 अगस्त 1748 को ईश्वरीसिंह तथा माधोसिंह की सेनाओं में युद्ध आरम्भ हुआ। तीन दिन चले इस युद्ध में सूरजमल ने अद्भुत पराक्रम का परिचय दिया तथा उसने अपनी तलवार से पचास शत्रु सैनिकों को अकेले ही मार डाला तथा 160 शत्रु सैनिकों को घायल किया। इस कारण सूरजमल की ख्याति मराठों और राजपूतों में लड़ाका वीर के रूप में हो गई। इस युद्ध को बगरू का युद्ध कहा जाता है। इस युद्ध में ईश्वरीसिंह विजयी रहा।

    सफदरजंग से मित्रता

    ई.1748 में दिल्ली के बादशाह मुहम्मदशाह की मृत्यु हो गई। उस समय उसका पुत्र अहमदशाह पानीपत में था। उन दिनों नवाब सफदरजंग उसके साथ था। सफदरजंग ने अहमदशाह को नया बादशाह घोषित कर दिया। अहमदशाह ने सफदरजंग को अपना वजीर घोषित कर दिया। उस समय मुहम्मदशाह का वजीर निजामुलमुल्क जीवित था। इसलिये नये वजीर सफदरजंग ने सूरजमल से सहयोग मांगा। सूरजमल ने आरम्भ में तो उसका सहयोग किया किंतु जब फरीदाबाद के चौधरी चरणदास और उसका पुत्र बलरामसिंह फरीदाबाद के मुगल अधिकारी मुर्तजा को धता बताकर सूरजमल की शरण में आ गये तो सूरजमल ने उन दोनों को अभय प्रदान किया तथा मुर्तजा खां को मार कर फरीदाबाद परगने पर अधिकार जमा लिया। नवाब सफरदरजंग ने सूरजमल को पत्र लिखा कि वह फरीदाबाद से अपना कब्जा हटा ले किंतु सूरजमल ने ऐसा करने से मना कर दिया। इस पर सफदरजंग सेना लेकर सूरजमल पर चढ़ आया। सूरजमल भी अपनी सेना लेकर तैयार हो गया। इसी समय सफदरजंग को सूचना मिली कि रूहेलों ने उसके सूबे अवध पर हमला बोल दिया है। इसलिये सफदरजंग अवध की तरफ चला गया और उसने सूरजमल से संधि की बात चलाई। इस संधि के बाद सफदरजंग एवं सूरजमल में फिर से मित्रता हो गई। राजा सूरजमल तथा उसके बख्शी को बादशाह अहमदशाह की ओर से खिलअतें प्रदान की गईं।

    रूहेलों के विरुद्ध पहला अभियान

    इस संधि के कुछ समय बाद रूहलों के नेता अहमदशाह बंगश ने सफदरजंग के प्रतिनिधि नवलराय को मार डाला और उसकी सेना को खुदागंज से बाहर धकेल दिया। रूहलों के हाथ बहुत सारा धन लगा। इस पर सफदरजंग ने रूहेलों के विरुद्ध अभियान किया। इस अभियान में सूरजमल ने सफदरजंग का साथ दिया। उसने अहमद बंगश की राजधानी फर्रूखाबाद पर अधिकार कर लिया। रूहेलों ने सूरजमल से मित्रता करने का प्रस्ताव भिजवाया किंतु सूरजमल ने उनके दूत को यह कहकर लौटा दिया कि मैं सफदरजंग को वचन दे चुका हूँ। सफदरजंग और रूहेलों के बीच हुए युद्ध में जाटों ने सफदरजंग के प्राणों की रक्षा की किंतु इस युद्ध का अंतिम परिणाम नहीं निकला। इस प्रकार सूरजमल ने जाट राजनीति को विश्वसनीय और पक्की बनाया। इस मामले में वह अपने पूर्ववर्ती जाट नेता चूड़ामन से बिल्कुल उलट था।

    मीर बख्शी पर विजय

    20 जून 1749 को जोधपुर नरेश महाराजा अभयसिंह की मृत्यु हो गई। जोधपुर राज्य पर अधिकार को लेकर अभयसिंह के पुत्र रामसिंह तथा अभयसिंह के भाई बख्तसिंह में में युद्ध ठन गया। मुगल बादशाह अहमदशाह ने बख्तसिंह का पक्ष लिया तथा मीर बख्शी सलाबतजंग को 18 हजार सैनिक देकर बख्तसिंह की सहायता के लिये भेजा। मीर बख्शी ने निश्चय किया कि लगे हाथों जाटों पर धावा बोलकर उनसे आगरा और मथुरा के उन सूबों को फिर से छीन ले जो जाटों ने हाल ही के दिनों में हथिया लिये थे। उसने नीमराना के दुर्ग पर अधिकार कर लिया जो जाटों के अधिकार में था। इस पर सूरजमल ने अपना दूत मीर बख्शी से वार्त्ता करने के लिये भेजा किंतु मीर बख्शी ने सूरजमल के दूत से बात नहीं की। जब मीर बख्शी सराय सोमाचंद नामक स्थान पर पहुंचा तब सूरजमल ने 6000 दु्रतगामी सेना लेकर मुगल सेना को घेर लिया। इस पर मीर बख्शी ने दिल्ली से कुमुक मंगवाई। जब यह कुमुक आई तो जाट उसका मार्ग रोककर उस पर बंदूकों से गोलियां बरसाने लगे। इस लड़ाई में जाटों ने बड़ी संख्या में मुगल सैनिक मार दिये। विवश होकर मुगल सेनापति अली रुस्तम खां तथा हाकिम खां भी मारे गये। सलाबत खां ने सूरजमल के पास संधि का प्रस्ताव भिजवाया। सूरजमल ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। इस संधि की शर्तें इस प्रकार थीं-

    (1.) बादशाह की सरकार पीपल के वृक्षों को न कटवाने का वचन देती है।

    (2.) बादशाह की सरकार पीपल वृक्ष की पूजा में कोई बाधा नहीं डालेगी।

    (3.) बादशाह की सरकार बृज के हिन्दू मंदिरों का अपमान या नुकसान नहीं करेगी।

    (4.) राजकुमार सूरजमल अजमेर प्रांत की मालगुजारी के रूप में राजपूतों से पन्द्रह लाख रुपये लेकर शाही खजाने में दे देगा

    (5.) मीर बख्शी नारनौल से आगे नहीं बढ़ेगा।

    इस सफलता से सूरजमल तथा उसके आदमियों में नया आत्म-विश्वास उत्पन्न हुआ। जाटों की सैनिक सामर्थ्य प्रमाणित हो गई। इस संधि की शर्तों में स्पष्ट रूप से ब्रज मण्डल में भरतपुर के शासकों की उत्कृष्ट स्थिति को मान्यता दे दी गई।

    रूहेलों के विरुद्ध दूसरा अभियान

    ई.1751 में सफदरजंग ने फिर से रूहेलों के विरुद्ध अभियान किया। इस बार उसने मराठों से प्रतिदिन 25 हजार के व्यय पर तथा जाटों से प्रतिदिन 15 हजार रुपये के व्यय पर सेनाएं प्राप्त कीं। जाटों और मराठों की सम्मिलित सेनाओं ने रूहलों के प्रदेश को तहस-नहस कर दिया।

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  • अध्याय -34 भारतीय कलाएँ

     02.06.2020
    अध्याय -34 भारतीय कलाएँ

    भारतीय कलाएँ


    किसी भी राष्ट्रीय कला का वास्तविक मूल्यांकन करते समय हमें यह विचार नहीं करना चाहिए कि उस कला ने क्या उधार लिया है अपितु यह देखना चाहिए कि उसने क्या दिया है। इस प्रकाश में देखने पर भारतीय कला को यूरोप या एशिया में महान स्कूलों में भी महानतम स्थान पर रखना चाहिए। - ई. बी. हावेल।


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    आर्यों के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद (ई.पू.4000 से ई.पू.1000) में कला शब्द का प्रयोग हुआ है- 'यथा कला, यथा शफ, मध, शृण स नियामति।' भरतमुनि (ई.पू.400 से ई.100 के बीच किसी समय) ने अपने ग्रंथ नाट्यशास्त्र में भी कला शब्द का प्रयोग किया है- 'न तज्जानं न तच्छिल्पं न वाधि न सा कला।' अर्थात् ऐसा कोई ज्ञान नहीं, जिसमें कोई शिल्प नहीं, कोई विधा नहीं या जो कला न हो। भरतमुनि द्वारा प्रयुक्त 'कला' का आशय 'ललित कला' से लगाया जाता है और 'शिल्प' का आशय सम्भवतः किसी उपयोगी कला से। सामान्यतः कला उन क्रियाओं को कहते हैं जिन्हें करने के लिए थोड़ी चतुराई अथवा कौशल की आवश्यकता होती है। भारतीय कला-चिंतन में मन की सात्विक प्रवृत्तियों को उजागर करने पर बल दिया गया है।

    कला के उद्देश्य

    'कला' सृजन के अनेक उद्देश्य होते हैं। कला में आत्म-चैतन्य की प्रधानता होती है। कला का विचार भौतिक स्वरूप में प्रकट होता है किन्तु उसका उद्देश्य वस्तु के भौतिक स्वरूप को दर्शाना मात्र नहीं होता अपितु उसके आन्तरिक लक्षणों को भी दर्शाना होता है जिसमें कलाकार के अन्तर्मन की प्रतिच्छाया देखी जा सकती है। 'कला' मनुष्य को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाती है। भारतीय कलाकारों का मुख्य उद्देश्य स्थूल में सूक्ष्म की चेतना को जागृत करना रहा है।

    कला-सृजन के द्वारा मन और आत्मा का सौन्दर्य से साक्षात्कार होता है तथा आत्मा को शांति का अनुभव होता है। कला के माध्यम से रूप और सौन्दर्य का सृजन होता है। कला 'अव्यक्त' को 'व्यक्त' और 'अमूर्त' को मूर्त रूप प्रदान करती है। भारतीय दृष्टिकोण से कला 'रसानुभूति' के लिए किया गया 'सृजन' है। कला मानव जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है। दार्शनिकों के अनुसार 'कला ही जीवन है।' वास्तव में कला जीवन जीने का ढंग है। कला के द्वारा मनुष्य जीवन को पूर्णता प्राप्त होती है। कला मनुष्य की चेतना को स्पर्श करती है।

    कला की परिभाषाएँ

    'कला' वह मानवीय क्रिया है, जिसमें मानव की प्रकृति, रूप और भाव सम्मिलित रहते हैं। पाश्चात्य चिंतन में 'कला' शब्द का प्रयोग शारीरिक या मानसिक कौशल के लिए होता है। कौशलविहीन या बेढंग से किये गये कार्यों को कला नहीं माना जाता। आधुनिक काल में 'कला' की अनेक परिभाषाएं दी गई हैं जिनमें से कुछ के अनुसार 'कला' मानवीय भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति है। 'कला' कल्याण की जननी है। कल्पना की सौन्दर्यात्मक अभिव्यक्ति का नाम ही 'कला' है।

    कल्पना की अभिव्यक्ति भिन्न-भिन्न प्रकार से एवम् भिन्न-भिन्न माध्यमों से हो सकती है। कला का उद्गम सौन्दर्य की प्रेरणा से हुआ है। अतः ललित का आकलन ही कला है। प्रत्येक प्रकार की कलात्मक प्रक्रिया का लक्ष्य सौन्दर्य की अभिव्यक्ति है। महाकवि कालीदास (गुप्तकालीन) ने 'रघुवंश' में 'ललिते कला विधौ' का उल्लेख इसी प्रसंग में किया है। भगवतशरण उपाध्याय के अनुसार, 'अभिराम अंकन चाहे वह वाग्विलास के क्षेत्र में हों, चाहे राग-रेखाओं में, चाहे वास्तु-शिल्प में, वह कला ही है।' जयशंकर प्रसाद के अनुसार- 'ईश्वर की कर्त्तव्य-शक्ति का मानव द्वारा शारीरिक तथा मानसिक कौशलपूर्ण निर्माण कला है।'

    कला और विज्ञान में अंतर

    कला और विज्ञान में बहुत अंतर है। विज्ञान में ज्ञान का प्राधान्य है, कला में कौशल और कल्पना का। विज्ञान में प्रामाणिकता का निर्णय सूंघकर, चखकर, देखकर, नापकर, तौलकर तथा प्रयोगशाला में परख कर किया जाता है जबकि कला को प्रामाणिकता की आवश्यकता नहीं होती, उसका निर्णय मनुष्य की रसानुभूति करती है। विज्ञान की कृति हर काल, देश एवं परिस्थिति में एक जैसा परिणाम एवं प्रभाव उत्पन्न करती है जबकि 'कला' की रसानुभूति देश, काल एवं पात्र के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

    कला और प्रकृति में अंतर

    'कला' का कार्य 'प्रकृति' के कार्य से भिन्न है। कला का अर्थ है- रचना करना अर्थात् उसमें कृत्रिमता है जबकि प्रकृति में कृत्रिमता नहीं होती। कला उस प्रत्येक कार्य में है जो मनुष्य करता है जबकि प्रकृति स्वतः-स्फूर्त रचना है। कला को प्रकृति से प्रेरणा प्राप्त होती है। कला को कौशल की आवश्यकता होती है जबकि प्रकृति को किसी कौशल की आवश्यकता नहीं होती। कला में कल्पना होती है जबकि प्रकृति कल्पना से भी विचित्र होती है।

    कला के प्रकार

    वात्स्यायन केे ग्रंथ कामसूत्र, उशनस् के ग्रंथ शुक्रनीति, जैन ग्रंथ प्रबंधकोश, कलाविलास तथा ललितविस्तर आदि ग्रंथों में कला एवं उसके प्रकारों की चर्चा हुई है। अधिकतर ग्रंथों में कलाओं की संख्या 64 दी गई है। प्रबंधकोश आदि कुछ ग्रंथों में 72 कलाओं की सूची मिलती है। ललितविस्तर में 86 कलाओं के नाम गिनाये गये हैं। प्रसिद्ध कश्मीरी पंडित क्षेमेंद्र ने अपने ग्रंथ कलाविलास में सर्वाधिक संख्या में कलाओं का वर्णन किया है। उसमें 64 जनोपयोगी, 32 धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष सम्बन्धी, 32 मात्सर्य-शील-प्रभावमान सम्बन्धी, 64 स्वच्छकारिता सम्बन्धी, 64 वेश्याओं सम्बन्धी, 10 भेषज सम्बन्धी, 16 कायस्थ सम्बन्धी कलाओं तथा 100 सार-कलाओं की चर्चा की गई है। सबसे अधिक प्रामाणिक सूची कामसूत्र की है।

    कलाओं का वर्गीकरण

    भरतमुनि के 'नाट्यशास्त्र' में कलाओं का वर्गीकरण 'गौण' एवं 'मुख्य' कलाओं के रूप में किया गया है। यही कलाएं आगे चलकर 'कारू' और 'चारू' कलाएँ कहलाईं जिन्हें 'आश्रित' और 'स्वतंत्र' कलाएं भी कहा जा सकता है। विद्वानों ने काव्य, संगीत, चित्र-शिल्प, नृत्य-नाट्य और वास्तु आदि में तादात्म्य स्थापित करते हुए, इन्हें कला में सम्मिलित किया है। ये सभी ललित कलाएँ स्वतंत्र रूप में पहचानी जाती हैं। आधुनिक काल में कला को मानविकी विषय के अन्तर्गत रखा जाता है जिसमें इतिहास, साहित्य, दर्शन और भाषा-विज्ञान आदि भी आते हैं। पाश्चात्य संस्कृति में कला के दो भेद किये गए हैं-

    (1.) उपयोगी कलाएँ (च्तंबजपबम ।तजे) तथा

    (2.) ललित कलाएँ (थ्पदम ।तजे)।

    परम्परागत रूप से लोकप्रिय कलाओं के मुख्य प्रकार इस प्रकार हैं-

    (1.) स्थापत्य कला (।तबीपजमबजनतम),

    (2.) मूर्त्तिकला (ैबनसचजनतम),

    (3.) चित्रकला (च्ंपदजपदह),

    (4.) संगीत (डनेपब),

    (5.) काव्य (च्वमजतल),

    (6.) नृत्य (क्ंदबम),

    (7.) रंगमंच (ज्ीमंजमत ंदक ब्पदमउं)।

    आधुनिक काल में फोटोग्राफी, चलचित्रण, विज्ञापन और कॉमिक्स के साथ-साथ अन्य विषय भी कला के प्रकारों में जुड़ गये हैं। आधुनिक काल की कलाओं को निम्नलिखित प्रकार से श्रेणीकृत कर सकते हैं-

    (1.) साहित्य- काव्य, उपन्यास, लघुकथा, महाकाव्य आदि;

    (2.) निष्पादन कलाएँ (च्मतवितउपदह ंतजे)- संगीत, नृत्य, रंगमंच;

    (3.) पाक कला (ब्नसपदंतल ंतजे)- बेकिंग, चॉकलेटरिंग, मदिरा बना;

    (4.) मीडिया कला- फोटोग्राफी, सिनेमेटोग्राफी, विज्ञापन;

    (5.) दृष्य कलाएँ- ड्राइंग, चित्रकला, मूर्त्तिकला आदि।

    कुछ कलाओं में दृश्य और निष्पादन दोनों के तत्त्व मिश्रित होते हैं, जैसे फिल्म।

    भारतीय कला के प्राचीनतम साक्ष्य

    भारतीय कला के प्राचीनतम साक्ष्य सैन्धव सभ्यता (ई.पू.3500 से ई.पू.1500 के बीच) की खुदाई में उपलब्ध सामग्री से प्राप्त हुए हैं। सैंधव सभ्यता में नगर-निर्माण कला, भवन निर्माण कला, कूप निर्माण कला, मूर्तिकला, नृत्य कला, संगीत कला, धातुकला, वस्त्र निर्माण कला, मिट्टी के बर्तन निर्माण कला, मुद्रा निर्माण कला आदि विविध कलाओं के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। इस सभ्यता से मंदिर निर्माण कला के साक्ष्य प्राप्त नहीं हुए हैं। सैंधव सभ्यता के बाद विविध कलाओं के साक्ष्य मौर्य काल (ई.पू.322 से ई.पू.184) में मिलते हैं तथा इसके बाद भारतीय कलाओं के साक्ष्य निरंतर मिलते हैं।

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  • कबूतर पर गोली चलाने वाले हमारे राज्य में नहीं रह सकते

     02.06.2020
    कबूतर पर गोली चलाने वाले  हमारे राज्य में नहीं रह सकते

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    जोधपुर नरेश मानसिंह ने अंग्रेजों से संधि तो कर ली थी किंतु वह संधि की शर्तों का पालन नहीं करता था। वह मारवाड़ में उत्पात मचा रहे नाथों के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं करना चाहता था। नाथों के कहने पर वह नित्य ही राज्य के दीवान को बदल देता था जिससे राज्यकार्य शिथिल हो गया तथा मेरवाड़ा की ओर से मेर और मीणे मारवाड़ में घुस कर लूटमार मचाने लगे। मेर और मीणों पर लगाम कसने के लिये ई.1824 में ब्रिटिश सरकार ने जोधपुर महाराजा से चांग और कोट किराना परगनों के 21 गाँव ले लिये।

    ई.1827 में नागपुर का राजा मधुराजदेव भोंसले, अंग्रेजों से हारकर जोधपुर राज्य में भाग आया। महाराजा ने उसे महामंदिर में ठहरा दिया। महाराजा मानसिंह ने महामंदिर में एक शिलालेख लगवा रखा था कि इस मंदिर में शरण लेने वालों की प्राण रक्षा करने का दायित्व मंदिर का है। इसलिये महाराजा जिस किसी को अंग्रेजों से बचाना चाहता था उसे यहाँ भेज देता था। जब ब्रिटिश सरकार ने मानसिंह से मांग की कि मधुराजदेव भोंसले ब्रिटिश सरकार को सौंपा जाये तो महाराजा ने जवाब भिजवाया कि यदि आप हमें मित्र मानते हैं तो भौंसले आपकी निगरानी में रहे या हमारी में, क्या अंतर पड़ता है? इस पर अंग्रेज चुप होकर बैठ गये। भौंसले आजीवन जेधपुर में ही रहा और कई वर्ष बाद यहीं उसकी मृत्यु हुई।

    महाराजा मानसिंह स्वतंत्र विचारों का शासक था। ई.1831 में राजपूताने के ए.जी.जी. (एजेण्ट टू द गवर्नर जनरल) ने अजमेर में दरबार का आयोजन किया तथा उसमें राजपूताने की समस्त रियासतों के शासकों को बुलवाया। जोधपुर नेरश मानसिंह ने इस दरबार में भाग लेने से मना कर दिया। ब्रिटिश सरकार को बुरा तो लगा किंतु वह महाराजा के विरुद्ध कुछ कर नहीं सकी क्योंकि संधि की शर्तों में कहीं नहीं लिखा था कि महाराजा को इस तरह के दरबारों में सम्मिलित होना पड़ेगा।

    महाराजा मानसिंह ईस्ट इण्डिया कम्पनी को समय पर खिराज नहीं चुका पाता था इसलिये ए.जी.जी. बारबार जोधपुर पर आक्रमण करने की धमकी दिया करता था। इस पर ई.1833 में सांभर तथा नांवा में नमक से होने वाली आमदनी कम्पनी सरकार को सौंप दी गयी।

    संधि के बाद की 15 वर्ष की अवधि में अंग्रेज समझ गये कि महाराजा किसी तरह संधि को भंग करना चाहता है इसलिये उन्होंने मानसिंह को शक्तिहीन बनाने तथा उसे बदनाम करने की नीति अपना ली। इस समय तक अफगानिस्तान में अंग्रेजों के स्वार्थ रूसियों से टकराने लगे थे इसलिये वे पश्चिमी राजस्थान को मुक्त नहीं छोड़ सकते थे। उन्होंने मारवाड़ में अपना सैनिक अड्डा स्थापित करने का निर्णय लिया जिससे कम्पनी सरकार के लिये सिंध एवं उससे आगे उत्तरी पश्चिमी सीमाक्षत्र पर तत्काल सेना भेजी जा सके। इसलिये अंग्रेजों ने अब जोधपुर, बीकानेर और जैसलमेर पर प्रत्यक्ष नियंत्रण रखने के लिये एक पृथक् ऐजेंसी की स्थापना करने की योजना बनायी।

    जोधपुर राज्य में मालानी और बाड़मेर की तरफ के जागीरदार और भोमिये सिंध, गुजरात, कच्छ और भुज आदि क्षेत्रों में घुसकर चोरी और डकैती किया करते थे। ब्रिटिश सरकार ने महाराजा को लिखा कि वह जागीरदारों पर अंकुश लगाये किंतु महाराजा ने कोई कार्यवाही नहीं की। इस पर ई.1834 में ब्रिटिश सरकार ने बाड़मेर में फौज भेजकर इन जागीरदारों को बुलवाया। जब ये जागीरदार अंग्रेज अधिकारियों से मिलने के लिये आये तो पोलिटिकल एजेण्ट ने उनमें से 29 जागीरदारों को पकड़ कर कच्छ भुज की ओर भेज दिया तथा मालानी परगने का प्रबंध अपने हाथ में ले लिया।

    सिरोही राज्य की सीमा पर से भी मीणे मारवाड़ राज्य पर आक्रमण करने लगे। इस पर ब्रिटिश सरकार ने महाराजा को लिखा कि मीणों से राज्य की रक्षा करने के लिये मारवाड़ तथा सिरोही राज्य की सीमा पर 600 घुड़सवार नियुक्त करे किंतु मारवाड़ राज्य की आय का अधिकांश पैसा भीमनाथ ने दबा लिया था इसलिये महाराजा इस आदेश की पालना नहीं कर सका।

    ई.1818 में दोनों पक्षों के बीच जो संधि हुई थी उसके अनुसार जोधपुर राज्य 1500 घुड़सवार ब्रिटिश सरकार की सहायता के लिये रखे जाते थे किंतु ये घुड़सवार निकम्मे थे और ब्रिटिश सरकार की मंशा के अनुसार काम करने में सक्षम नहीं थे इसलिये ई.1935 में व्यवस्था की गयी कि इन घुड़सवारों के स्थान पर जोधपुर राज्य ब्रिटिश सरकार को 1 लाख 15 हजार रुपये सालाना देगा। इस रुपये से ब्रिटिश सरकार ने ऐरनपुरा में जोधपुर लीजियन नामक सेना तैयार की।

    संधि की शर्तों के अनुरूप जोधपुर नरेश द्वारा ईस्ट इण्डिया कम्पनी को प्रतिवर्ष एक लाख आठ हजार रुपया खिराज दिया जाना था किंतु महाराजा मानसिंह ने इसे भिजवाने में कई बार कोताही बरती जिससे कम्पनी सरकार उससे रुष्ट रहा करती थी। मानसिंह ने कुछ सामंतों की जागीरें भी जब्त कर लीं जो महाराजा के विरुद्ध चला करते थे। इन सामंतों ने ए.जी.जी. कर्नल सदरलैण्ड से महाराजा के विरुद्ध शिकायत की। सदरलैण्ड ने 28 जुलाई 1839 को अजमेर में दरबार आयोजित करके मारवाड़ के सरदारों से पूछा कि यदि हम मारवाड़ पर चढ़ाई करेंगे तो आप हमारा साथ देंगे या महाराजा का? इस पर साथीन के ठाकुर शक्तिदान भाटी ने जवाब दिया कि यद्यपि हम जानते हैं कि महाराजा आपसे युद्ध नहीं करेगा तथापि यदि आप दोनों के बीच युद्ध ठना तो हम महाराजा का ही साथ देंगे।

    कर्नल सदरलैण्ड ने महाराजा को पत्र लिखकर सूचित किया कि वह कम्पनी सरकार को विगत पाँच साल का खिराज तुरंत चुकाये तथा राज्य में कुप्रबंधन के कारण जो राजस्व वसूली नहीं हो पा रही है उसे वसूलने का प्रबंध करे। महाराजा के पास रुपये नहीं थे इसलिये महाराजा ने रुपयों के बदल में कुछ गहने सदरलैण्ड को भिजवा दिये किंतु मारवाड़ के सरदारों के कहने पर सदरलैण्ड ने वे गहने नहीं लिये।

    महाराजा के अत्याचारों से तंग आकर कुछ सरदार अंग्रेजों के पोलिटिकल एजेण्ट एफ. विल्डर से मिले। महाराजा ने अंग्रेजों की बात मान ली और जिन जागीरदारों की जागीरें जब्त की थीं, वापस लौटा दीं। कुछ समय बाद फिर महाराजा और अंग्रेजो में फिर लड़ाई हो गई और अंग्रज सेना ने कर्नल सदरलैण्ड के नेतृत्व में जोधपुर राज्य पर चढ़ाई कर दी। मानसिंह को अपनी जनता और राज्य की सुरक्षा का कोई उपाय नहीं दिखा तो वह जोधपुर से 8 मील पूर्व में बनाड़ तक गया और किले की चाबियां कर्नल सदरलैण्ड को सौंप दी। लगभग 5 माह तक अंग्रेजी सेना जोधपुर दुर्ग में रही।

    राजा ने अंग्रेजी सेना की कोई विशेष आवभगत तो नहीं की किन्तु उसकी उद्दण्डता को तो सहन करना ही पड़ता था। इतना होने पर भी राजा की आत्मा मरी नहीं थी। उसने हिन्दुत्व के जो प्रबल शाश्वत भाव बचपन से पाये थे, वे उसके मन में अब भी दृढ़ता पूर्वक जड़ें जमाये बैठे थे। एक दिन एक अंग्रेज सिपाही ने एक कबूतर पर गोली चलाई। राजा मानसिंह ने इसका बड़ा विरोध किया और कहा कि हमने आपको दुर्ग इसलिये नहीं सौंपा है कि हम हार गये हैं अपितु आपके मित्र हैं, केवल यही विश्वास दिलाने के लिये किले की चाबियां सौंपी हैं। राजा के तेवर देखकर अंग्रेजो को राजा से माफी मांगनी पड़ी। कबूतर चलाने वाले अंग्रेज सैनिक ने अपने हथियार राजा के सामने रख दिये।

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  • भगवद्गीता किसने लिखी ?

     02.06.2020
    भगवद्गीता किसने लिखी ?

    भगवद्गीता किसने लिखी ?


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    महाभारत के भीष्मपर्व में 23 से 40वें अध्याय तक गीता के अट्ठारह अध्याय वर्णित हैं। भारतीय जनमानस इस बात को मानता है कि भगवद्गीता मूलतः भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सखा अर्जुन को कुरुक्षेत्र के युद्ध से पहले, उपदेश के रूप में कही।

    संजय ने अपनी दिव्यदृष्टि से कुरुक्षेत्र के युद्ध का आंखों-देखा विवरण राजा धृतराष्ट्र को सुनाया। इस प्रकार भगवद्गीता भी संजय तथा धृतराष्ट्र तक पहुंची। जब भगवान वेदव्यास ने महाभारत को संहिताबद्ध किया तब उन्होंने पूरी कथा भगवान श्री गणेशजी को बोलकर सुनाई और भगवान गणेशजी ने इसे लिपिबद्ध किया।

    स्वयं भगवान श्रीकृष्ण गीता का उपदेश देने से पहले, अर्जुन से कहते हैं कि तुझसे पहले मैं गीता का पावन ज्ञान सूर्यदेव को सुना चुका हूँ।

    इस प्रकार गीता के मूल रचयिता श्रीकृष्ण ही माने जाते हैं किंतु साहित्यिक, पुरातात्विक, भाषा वैज्ञानिक एवं अन्य साक्ष्य इन प्रश्नों के जवाब कुछ अलग तरह से देते हैं कि भगवद्गीता की रचना किसने एवं कब की ?

    अधिकांश हिन्दू इन तर्कों को स्वाीकार नहीं करते। आधुनिक विद्वानों के अनुसार, श्रीमद्भगवद् गीता को किसने लिखा, यह बात प्रमाणिक रूप से स्पष्ट नहीं हुई है।

    बहुत से पाश्चात्य एवं भारतीय विद्वानों ने इस बात पर विचार किया है कि भगवद्गीता का वास्तविक लेखक कौन था।

    भगवद्गीता के सबसे बड़े टीकाकारों में से एक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्ण ने लिखा है कि जिस प्रकार हमें भारत के प्रारम्भिक साहित्य की लगभग सभी पुस्तकों के लखकों के नाम ज्ञात नहीं हैं, उसी प्रकार हमें गीता के रचयिता का नाम भी ज्ञात नहीं है। सर्वपल्ली राधाकृष्ण के अनुसार, गीता की रचना का श्रेय, भगवान वेदव्यास को दिया जाता है जो महाभारत के पौराणिक संकलनकर्ता हैं।

    आधुनिक काल के विद्वानों का मानना है कि युद्ध क्षेत्र में श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को 700 श्लोक बोलकर सुनाना संभव नहीं हुआ होगा। उन्होंने कुछ महत्वूपर्ण बातें कही होंगी जिन्हें बाद में किसी लेखक ने एक विशाल रचना के रूप में विस्तार से लिख दिया होगा।

    पाश्चात्य विद्वान गर्बे के अनुसार भगवद्गीता पहले, सांख्य-योग सम्बन्धी एक ग्रंथ था जिसमें बाद में कृष्ण-वासुदेव की पूजा पद्धति आ मिली और ईस्वी पूर्व तीसरी शताब्दी में कृष्ण को विष्णु का रूप मानकर, इसका मेल, वैदिक परम्परा के साथ बिठा दिया गया। भारत में गर्बे का सिद्धांत सामान्यतः अस्वीकार किया जाता है।

    डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्ण के अनुसार गीता की मूल रचना ई.पू. 200 में हुई थी और इसका वर्तमान स्वरूप ईसा की दूसरी शताब्दी में किसी वेदांती द्वारा तैयार किया गया था।

    होपकिन्स का विचार है कि गीता का अब जो कृष्ण-प्रधान स्वरूप मिलता है, वह पहले कोई पुरानी विष्णु-प्रधान कविता थी और उससे भी पहले वह कोई निस्सम्प्रदाय रचना थी। संभवतः विलम्ब से लिखा गया कोई उपनिषद्।

    हाल्ट्ज्मन गीता को एक सर्वेश्वरवादी कविता का बाद में विष्णु-प्रधान बनाया गया स्वरूप मानते हैं। कीथ का विश्वास है कि मूलतः गीता, श्वेताश्वतर के ढंग की एक उपनिषद् थी परंतु बाद में उसे कृष्णपूजा के अनुकूल ढाल दिया गया। बार्नेट का विचार है कि गीता के लेखक के मन में परम्परा की विभिन्न धाराएं गड्डमड्ड हो गईं। फर्कुहार लिखता है कि यह एक पुरानी पद्य-उपनिषद् है जो संभवतः श्वेताश्वतर के बाद लिखी गई है और जिसे किसी कवि ने कृष्णवाद का समर्थन करने के लिए ईसा के बाद के किसी सन् में भगवद्गीता के वर्तमान स्वरूप में ढाल दिया है। रूडोल्फ ओटो का कथन है कि मूल गीता, किसी महाकाव्य का एक शानदार खण्ड थी और उसमें किसी प्रकार का कोई सैद्धांतिक साहित्य नहीं था।

    कृष्ण का उद्देश्य, मुक्ति का कोई लोकोत्तर उपाय प्रस्तुत करने का नहीं था, अपितु अर्जुन को उस भगवान की सर्वशक्तिशाली इच्छा को पूरा करने की विशेष सेवा के लिए तैयार करना था जो युद्धों के भाग्य का निर्णय करता है।

    ओटो का विश्वास है कि सैद्धांतिक अंश प्रक्षिप्त है। इस विषय में उसका जैकोबी से मतैक्य है, जिसका विचार है कि विद्वानों ने मूल छोटे से केन्द्र-बिन्दु को विस्तृत करके वर्तमान रूप दे दिया है।

    इन विभिन्न मतों का कारण यह तथ्य प्रतीत होता है कि गीता में दार्शनिक और धार्मिक विचारों की अनेक धाराएं अनेक ढंगों से घुमा-फिरा कर एक जगह मिलाई गई हैं।

    पुराने आचार्यों ने भगवद्गीता को, भक्त को सुनाई गई देववाणी की बजाय एक दार्शनिक विमर्श के धरातल पर ही देखा है।

    चौथी शताब्दी ईस्वी के गुप्तकालीन कवि कालिदास के ग्रंथों रघुवंश एवं कुमारसंभव में गीता का उल्लेख हुआ है। सातवीं शताब्दी के हर्षकालीन कवि बाणभट्ट के ग्रंथ ‘कादंबरी’ में भी गीता का उल्लेख मिलता है।

    पांचवी शताब्दी ईस्वी में गुप्तों के शासन काल में चीनी यात्री फाह्यान भारत आया। उसने लिखा है कि भाइयों के बीच झगड़े को लेकर लिखे गए एक बड़े ग्रंथ में उपदेशात्मक वचनों को जोड़ने को लेकर उन दिनों भारतवासी चर्चा किया करते थे। अर्थात् फाह्यान यह कहता है कि उसके भारत में आने से कुछ समय पहले महाभारत में गीता का समावेश किया गया था। इससे पहले ‘गीता’ एक स्वतंत्र ग्रंथ था। यह बात फाह्यान को किसी भारतीय ने बताई होगी।

    प्रोफेसर दामोदर धर्मानंद कोसंबी ने माना है कि गीता, गुप्तकाल के आसपास ही महाभारत में सन्निवेशित हुई। सातवीं शताब्दी में भारत की यात्रा पर आए चीनी यात्री यात्री ह्वेनसांग ने अपने यात्रा वृत्तांत में एक ऐसी कथा का उल्लेख किया है जो गीता के प्रसंग से मिलती-जुलती है।

    कहा जा सकता है कि गीता के विधिवत् और नियमित अध्ययन एवं टीका लिखने का काम आदि जगद्गुरु शंकराचार्य से प्रारंभ होता है। शंकराचार्य इस ग्रंथ के पहले टीकाकार माने जाते हैं।

    प्रोफेसर मेघनाद देसाई मानते हैं कि आदि शंकराचार्य के पूर्व, भारतीय ग्रंथों में गीता का उल्लेख बहुत कम हुआ है। आदि शंकराचार्य का जन्म 788 ईस्वी में माना जाता है। अर्थात् आठवीं शताब्दी के बाद ही भारत के साहित्य में गीता का उल्लेख होने लगा।

    प्रो. देसाई विभिन्न स्रोतों का हवाला देते हुए कहते हैं कि गीता के लिखने वाले कम से कम तीन लेखक थे, जो तीन अलग-अलग समयों में हुए। वे यह भी मानते हैं कि गीता अलग-अलग कालखंडों में अलग-अलग श्रोताओं को संबोधित थी।

    प्रो. देसाई के अनुसार प्रथम लेखक के श्रोता- पंडित, मुनि, योगी, तत्वदर्शी इत्यादि थे। दूसरे लेखक के श्रोता- चुने हुए यति, योगी आदि थे, जबकि तीसरे लेखक के श्रोता आमजन थे। इस विवेचना में वे डॉ. गजानन खेर से काफी सहायता लेते हैं जिन्होंने मराठी में ‘मूल गीता’ की खोज नामक शोध ग्रंथ लिखा था। प्रो. देसाई का मानना है कि गीता के तीसरे लेखक बादरायण थे जिन्होंने ब्रह्मसूत्र की रचना की थी। वे इन दोनों ग्रंथों में बहुत सी समानताएं पाते हैं।

    डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने गीता पर काफी विस्तार से लिखा है। उनकी मान्यता है कि बौद्ध धर्म के प्रतिकार के लिए ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने भगवद्गीता को एक अस्त्र के रूप में प्रयोग किया।

    स्वामी स्वामी विवेकानंद ने लिखा है कि गीता एक ऐसा सुंदर गुलदस्ता है, जिसमें उपनिषदों से चुन-चुनकर दार्शनिक सूक्तियों के खूबसूरत फूल सजाए गए हैं।

    गीता के लेखक ने अद्वैत, योग, ज्ञान, भक्ति आदि को सम्मिश्रित करने का काम किया है। उसने सभी सम्प्रदायों से सर्वश्रेष्ठ चुनाव किया और गीता की माला में पिरो दिया।

    इस प्रकार कहा जा सकता है कि गीता किसी एक लेखक की लिखी हुई नहीं है, उसे बहुत लम्बे कालखण्ड में बार-बार परिवर्द्धित करके वर्तमान स्वरूप तक लाया गया।

    गीता का विचार निश्चित रूप से भगवान श्रीकृष्ण से पहले भी मौजूद था। इसलिए कहा भी जाता है-

    सर्वोपनिषदो गावो, दोग्धा गोपाल नंदनः

    पार्थो वत्स सुधीर्भोक्ता, दुग्धम् गीतामृतम् महत्।


    अर्थात् भगवान श्रीकृष्ण ने समस्त उपनिषदों रूपी गायों को दुह कर गीतामृत रूपी दुग्ध प्राप्त किया तथा पृथा के पुत्र अर्जुन ने श्रद्धापूर्वक उसका सेवन किया।

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  • युग निर्माता महाराजा सूरजमल- 7

     02.06.2020
    युग निर्माता महाराजा सूरजमल- 7

    चरम उत्कर्ष की ओर


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    सूरजमल के सहयोग से प्रसन्न होकर वजीर सफदरजंग ने मुगल बादशाह से अनुशंसा की कि सूरजमल को 3000 जात और 2000 घुड़सवार का मनसब दिया जाये तथा उसके पुत्र रतनसिंह को राव की उपाधि दी जाये। सूरजमल के पुत्र जवाहरसिंह के मनसब में भी वृद्धि की जाये। इसके कुछ दिन बाद सफदरजंग ने बादशाह से अनुशंसा की कि बदनसिंह को महेन्द्र की उपाधि देकर राजा और सूरजमल को राजेन्द्र की उपाधि देकर कुमार बहादुर बनाया जाये। बादशाह ने इस अनुशंसा को स्वीकार कर लिया। भव्य समारोहों में बदनसिंह तथा सूरजमल ने इन उपाधियों को धारण किया। इसके बाद सूरजमल ने अपना नाम जसवंतसिंह रख लिया किंतु वह इस नाम का उपयोग बहुत कम ही किया करता था। कवि सूदन ने सूरजमल के लिये सुजानसिंह नाम का भी प्रयोग किया है। इसके कुछ दिन बाद बादशाह ने सूरजमल को मथुरा का फौजदार बना दिया। इससे उसे आगरा प्रान्त में यमुना के दोनों ओर के अधिकांश प्रदेशों पर तथा आगरा नगर के आस पास के क्षेत्रों पर अधिकार प्राप्त हो गया। यह सचमुच जाटों का चरम उत्कर्ष था कि वे मथुरा और आगरा के निकटवर्ती क्षेत्रों के शासक बन जायें।

    दिल्ली की लूट

    मार्च 1753 में बादशाह अहमदशाह ने सफदरजंग को वजीर के पद से हटा दिया। इस पर सफदरजंग ने नाराज होकर विद्रोह कर दिया। उसने अपनी लेकर दिल्ली का लाल किला घेर लिया तथा सूरजमल को अपनी सहायता के लिये बुलाया। सूरजमल तत्काल एक सेना लेकर अपने मित्र सफदरजंग की सहायता करने के लिये चल पड़ा। मार्ग में उसने अलीगढ़ के निकट चकला कोइल के जागीरदार बहादुरसिंह बड़गूजर पर आक्रमण किया। उस समय बहादुरसिंह, घसीरा के दुर्ग में था। उसने अन्य कोई उपाय न देखकर अपनी स्त्रियों को मार डाला तथा दुर्ग के द्वार खोल दिये। 23 अप्रेल 1753 को सूरजमल ने समस्त बड़गूजरों को मारकर घसीरा के दुर्ग पर अधिकार किया। इस युद्ध में सूरजमल के 1500 सैनिक मारे गये।

    मई 1753 में सूरजमल 15 हजार घुड़सवारों की सेना लेकर दिल्ली पहुंचा। 9 मई से 4 जून के बीच जाटों ने दिल्ली में जमकर लूट मचाई। जाट सैनिकों ने दिल्ली के दरवाजे तक लूट लिये। बहुत बड़ी संख्या में दिल्ली के मकान ढहा दिये। उस काल के इतिहासकारों ने लिखा है कि जाटों की लूटपाट के बाद दिल्ली के निकट बसे हुए उपनगरों, चुरनिया तथा वकीलपुरा आदि में तो कोई दिया ही नहीं दिखता था। तभी से दिल्ली में जाट-गर्दी मुहावरा कहा जाने लगा। बाद में जब सदाशिव भाऊ ने दिल्ली में लूट मचाई तो भाऊगर्दी का तथा अहमशाह अब्दाली ने लूट मचाई तो शाह-गर्दी का मुहावरा प्रचलित हुआ।

    दिल्ली की बादशाहत पर आये इस संकट में सफदरजंग तथा सूरजमल के अतिरिक्त अन्य समस्त शक्तियां बादशाह की ओर हो गईं। सूरजमल को बड़े प्रलोभन एवं धमकियां दी गईं ताकि वह सफदरजंग का साथ छोड़कर बादशाह के साथ आ जाये किंतु सूरजमल अपने मित्र के प्रति वचनबद्ध था और गद्दारी करने को तैयार नहीं था। सूरजमल पर नियंत्रण करने के लिये बादशाह ने मल्हारराव होलकर को दक्कन से बुलवाया किंतु सूरजमल पर उसका भी कोई प्रभाव नहीं पड़ा। इससे पहले कि मराठे दिल्ली पहुंचते, सूरजमल ने दिल्ली के नये वजीर इन्तिजामुद्दौला तथा उसके भतीजे गाजीउद्दीन के बीच फूट डलवा दी। इस कारण बादशाह को सफदरजंग के समक्ष शांति एवं संधि का प्रस्ताव भेजना पड़ा। ई.1753 के अंतिम महीनों में जयपुर नरेश माधोसिंह दिल्ली पहुंचा। उसने सूरजमल को युद्ध बंद करने के लिये कहा किंतु सूरजमल ने कहा कि जब तक सफदरजंग को दुबारा वजीर नहीं बनाया जायेगा तथा सफदरजंग को अवध एवं इलाहाबाद के सूबे वापस नहीं दिये जायेंगे, युद्ध बंद नहीं होगा। बादशाह ने सूरजमल की मांग मान ली तथा युद्ध समाप्त हो गया। इसके बाद सफदरजंग तो अपने सूबों में चला गया किंतु राजा सूरजमल तथा दिल्ली के बादशाह के बीच जो शत्रुता उत्पन्न हुई, उसका दुष्परिणाम आगे चलकर सूरजमल को भोगना पड़ा।

    मराठों से सामना

    जब सफदरजंग अवध को चला गया तब मराठों की सेना ने मल्हारराव होलकर के पुत्र खांडेराव के नेतृत्व में राजपूताने में पैर रखा। वे सीधे जयपुर रियासत में जा घुसे और वहाँ के राजा माधोसिंह से कर मांगा। माधोसिंह से कर लेकर मराठे भरतपुर रियासत की ओर बढ़े। राजा सूरजमल भरतपुर की रक्षा का भार जवाहरसिंह को सौंपकर स्वयं कुम्हेर के दुर्ग में मोर्चाबंदी करके बैठ गया। यह एक आश्चर्य की ही बात थी कि कुछ दिन पहले रूहलों के विरुद्ध सफदरजंग द्वारा किये गये अभियान में सूरजमल तथा मराठे एक होकर लड़े थे किंतु आज वही मराठे, सूरजमल द्वारा सफदरजंग को दी गई सहायता के लिये सूरजमल को दण्डित करने आ पहुंचे थे। वस्तुतः इसके पीछे मराठों की धन-लिप्सा काम कर रही थी। मराठों को ज्ञात था कि सूरजमल दिल्ली से अथाह खजाना लूट कर लाया है, मराठों को वह खजाना चाहिये था।

    सूरजमल ने खांडेराव के समक्ष मित्रता का प्रस्ताव भिजवाया किंतु होलकर के सेनापति रघुनाथराव ने सूरजमल के समक्ष दो करोड़ रुपयों की मांग रखी। सूरजमल के मंत्री रूपराम ने चालीस लाख रुपये देने स्वीकार किये किंतु मल्हारराव होलकर जो उस समय जयपुर में था, ने कहलवाया कि जाटों को चाहिये कि वे दो करोड़ रुपयों से अधिक राशि दें। इस पर नाराज होकर सूरजमल ने मराठों के सेनापति रघुनाथराव को तोप के पांच गोले और थोड़ा सा बारूद भिजवाया और कहलवाया कि या तो चालीस लाख रुपये ले ले या फिर परिणाम भुगतने को तैयार रहे।

    इस पर जनवरी 1754 में मराठों ने कुम्हेर को घेर लिया। मुगल सेना भी उनके साथ हो गई। सूरजमल के शत्रुओं की सेना में इस समय 80 हजार सैनिक थे। मराठों ने कुम्हेर के चारों ओर पंद्रह मील के घेरे में समस्त फसलें जलाकर राख कर दीं। कुम्हेर को जाने वाले समस्त रास्तों को बंद कर दिया तथा होडल पर अधिकार कर लिया। इमादुलमुल्क, खाण्डेराव, रघुनाथराव तथा मल्हारराव की सेनाओं ने सूरजमल को बुरी तरह घेर लिया। मुगलों और मराठों के दुश्मन हो जाने तथा जयपुर के तटस्थ हो जाने के कारण, राजा सूरजमल पूरे उत्तर भारत में अकेला पड़ गया किंतु उसने हिम्मत नहीं हारी। जयपुर नरेश माधोसिंह नहीं चाहता था कि जिस राज्य को उसके पुरखों ने अपने हाथों से स्थापित किया था, उस राज्य को नष्ट करने में वह योगदान करे। दूसरी तरफ वह मराठों को भी नाराज नहीं करना चाहता था। इसलिये उसने एक छोटी सी कच्छवाहा सेना मराठों के साथ भेज दी थी। राजा सूरजमल ने चार माह तक इस सम्मिलित सेना से लोहा लिया।

    एक दिन जब खांडेराव दुर्ग के बाहर खुदवाई गई खंदकों का निरीक्षण कर रहा था, दुर्ग के भीतर स्थित तोप से चले एक गोले से खांडेराव मारा गया। उसकी नौ रानियां उसके शव के साथ सती हो गईं। उसकी रानी अहिल्याबाई गर्भवती होने के कारण सती नहीं हो सकी। पुत्र शोक में पागल होकर मल्हारराव ने प्रतिज्ञा की कि वह जाटों का समूल नाश करेगा। अब मराठों ने कुम्हेर पर हो रहे आक्रमणों को भयानक बना दिया। ऐसी स्थिति में सूरजमल की रानी हँसिया ने रूपराम के पुत्र तेजराम कटारिया को सूरजमल की पगड़ी और एक पत्र देकर ग्वालियर के सिंधिया राजा को भेजा। उस समय सिंधिया, होलकर के साथ था। जब सिंधिया को रानी हँसिया का प्रस्ताव मिला तो उसने बदले में अपनी पगड़ी, एक उत्साहवर्द्धक पत्र तथा अपनी कुलदेवी के प्रसाद का एक बिल्वपत्र रानी को भिजवाया। जब हँसिया के पत्रवाहक और सिंधिया के बीच हुए पत्र व्यवहार की जानकारी मल्हारराव को हुई तो उसके हौंसले टूट गये।

    जब मराठे, जाटों पर पर्याप्त दबाव नहीं बना पाये तो वजीर इमादुलमुल्क ने दिल्ली से सहायता मंगवाई। बादशाह को लगा कि यदि मराठे, कुम्हेर को तोड़ लेंगे तो जाटों की अपार सम्पत्ति मराठों के हाथ लग जायेगी। इसलिये उसने अतिरिक्त सेना नहीं भिजवाई। इन सब कारणों से मराठों को बाजी अपने हाथ से जाती हुई लगी। उन्होंने सूरजमल से संधि कर ली। सूरजमल ने रूपराम कटारिया के माध्यम से मराठों को आश्वासन दिया कि वह मराठों को तीन साल में तीस लाख रुपये देगा किंतु उसने केवल दो लाख रुपये ही दिये। मराठे अपना घेरा उठाकर दक्कन को चले गये। इस सफलता से सूरजमल की धाक जम गई। मुगल वजीर इमादुलमुल्क अपना सिर धुनता हुआ दिल्ली चला गया जहाँ उसने बादशाह अहमदशाह की आंखें फोड़कर उसे कैद में डाल दिया और उसकी हत्या करवा दी।

    नजीब खां से संधि

    मराठों के जाते ही सूरजमल और जवाहरसिंह ने पलवल और बल्लभगढ़ पर अधिकार कर लिया। ये क्षेत्र उस समय मराठों के अधिकार में चल रहे थे। जून 1755 के मुगल सेनापति नजीब खां ने गंगा-यमुना दो-आब के उन क्षेत्रों को वापस लेने के लिये अभियान किया जिन पर सूरजमल ने अधिकार कर लिया था। इस पर सूरजमल ने नजीब खां के पास संधि का प्रस्ताव भिजवाया तथा दोनों पक्षों के बीच संधि हो गई। इस संधि की शर्तें इस प्रकार थीं-

    1. अलीगढ़ जिले में जिन क्षेत्रों पर राजा सूरजमल का अधिकार था, वे सूरजमल के पास ही रहेंगे।

    2. इन जमीनों पर स्थायी राजस्व छब्बीस लाख रुपये तय हुआ जिनमें से अठारह लाख रुपये उन जागीरों के नगद मुआवजे के कम किये जाने थे, जो अहमदशाह के शासनकाल में खोजा जाविद खां ने सूरजमल के नाम कर दी थीं परंतु उन दिनों की निरंतर अशांति के कारण जिन्हें बाकायदा हस्तान्तरित नहीं किया जा सका था।

    3. सूरजमल सिकन्दराबाद के किले और जिले को खाली कर देगा जो मराठों ने उसे दिया था।

    4. बाकी आठ लाख रुपयों में से जो कि शाही राजकोष को मिलने थे, सूरजमल दो लाख रुपये डासना-सन्धि पर हस्ताक्षर करते समय और बाकी छः लाख एक साल में चुका देगा।

    राजा बदनसिंह का निधन

    आंखों की ज्योति खराब हो जाने के कारण बदनसिंह ने राजकार्य सूरजमल पर छोड़ रखा था। जीवन के अन्तिम दिनों में राजा बदनसिंह सहार चला गया जहाँ 7 जून 1756 को उसकी मृत्यु हो गई।

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  • अध्याय -35 भारतीय मूर्ति-कला

     02.06.2020
    अध्याय -35 भारतीय मूर्ति-कला

    भारतीय मूर्ति-कला


    सर्वोत्तम भारतीय मूर्ति सर्वोत्तम यूनानी मूर्ति की अपेक्षा अनुभूति के गहनतर स्वर और उत्कृष्ट मनोभावों को स्पर्श करती है। - ई. बी. हावेल।


    सैन्धव-मूर्तियाँ

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    सैन्धव सभ्यता के काल से ही आग में पकी हुई मिट्टी की मूर्तियाँ, चूड़ियाँ, बर्तन, खिलौने एवं मुहरें बड़ी संख्या में मिलने लगती हैं। पूजा में प्रयुक्त होने वाले लिंग, योनियाँ, बड़े कूबड़ एवं विशाल सींगों वाले बैलों के अंकन वाली मुहरें, योगी एवं योगिनी के अंकनों से युक्त मुहरें प्राप्त हुई हैं जिनसे उस काल के केशविन्यास, मुद्राएं, बाट, खिलौने, नृत्य, संगीत आदि विभिन्न कलाओं की जानकारी मिलती है। ये मृण्मूर्तियाँ सैंधव संस्कृति को अन्य पूर्ववर्ती अथवा समकालीन सभ्यताओं से पूरी तरह अलग करती हैं। इन मूर्तियों से ज्ञात होता है कि सिंधु सभ्यता के निवासियों ने लेखन कला, मूर्तिकला, चित्रकला, नृत्यकला एवं संगीतकला आदि विविध कलाओं का विकास कर लिया था।

    सिंधु सभ्यता की लिपि को अभी तक ठीक से नहीं पढ़ा जा सका है किंतु उस काल की मूर्तियों, मुद्राओं, लिंगों, योनियों, आभूषणों, बर्तनों एवं भवनावशेषों से उस काल की सभ्यता पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। इन मुद्राओं पर परमपुरुष, परमनारी एवं प्रजनन देवी की आकृतियां अंकित हैं। बहुत सी मूर्तियों के दोनों ओर दो प्याले अथवा दीपक प्रदर्शित हैं और इन मूर्तियों के अग्रभाग पर धूम्र के निशान भी मिले हैं।

    मौर्य कालीन मूर्तिकला

    पाटलिपुत्र, मथुरा, विदिशा तथा अन्य कई क्षेत्रों से मौर्यकालीन पत्थर की मूर्तियाँ मिली हैं। इन पर मौर्य काल की विशिष्ट चमकदार पॉलिश मिलती है। इन मूर्तियों में यक्ष-यक्षिणियों की मूर्तियाँ सर्वाधिक सजीव एवं सुंदर हैं। इन्हें मौर्यकालीन लोककला का प्रतीक माना जाता है। इनमें सबसे प्रसिद्ध दीदारगंज (पटना) से प्राप्त चामरग्राहिणी यक्षी की मूर्ति है जो पौने सात फुट ऊँची है। यक्षी का मुखमण्डल अत्यंत सुंदर है। अंग-प्रत्यंग में समुचित भराव कला की सूक्ष्म छटा है।

    मथुरा के परखम गांव से प्राप्त यक्ष-मूर्ति भी 8 फुट 8 इंच की है। इसके कटाव में सादगी है तथा अलंकरण कम है। बेसनगर की स्त्री मूर्ति भी इस काल की मूर्तियों में विशिष्ट स्थान रखती है। अशोक के स्तम्भ शीर्षों पर बनी हुई विभिन्न पशुओं की मूर्तियाँ उस काल की सर्वश्रेष्ठ मूर्तियाँ हैं। पटना, अहिच्छत्र, मथुरा, कौशाम्बी आदि में मिले भग्नावशेषों से बड़ी संख्या में मौर्यकालीन मृण्मूर्तियाँ प्राप्त की गई हैं। ये कला की दृष्टि से सुंदर हैं तथा मौर्य काल के परिधान, वेशभूषा एवं आभूषणों की जानकारी देती हैं। बुलंदीबाग (पटना) से प्राप्त मौर्य कालीन नर्तकी की मृण्मूर्ति विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

    मूर्तिकला पर विदेशी प्रभाव

    मौर्य साम्राज्य के बिखर जाने के बाद भारत में यूनानी, शक, कुषाण, हूण पह्लव एवं सीथियन आदि जातियाँ प्रवेश कर गईं। इन्होंने भारत के विभिन्न भागों में छोटे-छोटे राज्य स्थापित कर लिए थे। इस कारण भारतीय कला पर विदेशी कला, विशेषकर गान्धार-शैली का बहुत प्रभाव हो गया।

    कनिष्क कालीन मूर्तिकला

    रॉलिसन ने लिखा है- 'भारतीय संस्कृति के इतिहास में कुषाण काल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण युग है।' कनिष्क के काल में मूर्तिकला की खूब उन्नति हुई। मथुरा में इस काल की कई मूर्तियाँ मिली हैं। कनिष्क काल की मथुरा शैली की मूर्तियाँ सरलता से पहचानी जाती हैं क्योंकि इनके निर्माण में लाल पत्थर का प्रयोग हुआ है जो मथुरा के निकट 'सीकरी' से प्राप्त होता था। मथुरा शैली की मूर्तियाँ आकार मंे विशालाकाय हैं। इन मूर्तियों पर मूंछें नहीं हैं।

    बालों और मूछों से रहित मूर्तियों के निर्माण की परम्परा विशुद्ध रूप से भारतीय है। मथुरा की कुषाणकालीन मूर्तियों के दाहिने कंधे पर वस्त्र नहीं रहता। दाहिना हाथ अभय की मुद्रा में उठा हुआ होता है। मथुरा शैली की कुषाण कालीन मूर्तियांे में बुद्ध सिंहासन पर बैठे हुए दिखाये गये हैं। कनिष्क काल में मूर्तिकला की गान्धार-शैली की भी बड़ी उन्नति हुई। कनिष्क तथा उसके उत्तराधिकारियों ने जो बौद्ध-मूर्तियाँ बनवाईं, उनमें से अधिकंाश मूर्तियां, पाकिस्तान के गान्धार जिले में मिली हैं। इसी से इस कला का नाम गान्धार-कला रखा गया है।

    गान्धार-कला की बहुत सी प्रतिमाएँ मुद्राओं पर भी उत्कीर्ण मिलती हैं। गान्धार-कला को इण्डो-हेलेनिक कला अथवा इण्डो-ग्रीक कला भी कहा जाता है, क्योंकि इस पर यूनानी कला की छाप है। बुद्ध की मूर्तियों में यवन देवताओं की आकृतियों का अनुसरण किया गया है। इस कला को ग्रीक बुद्धिष्ट शैली भी कहा जाता है। इस शैली की मूर्तियों में बुद्ध कमलासन मुद्रा में मिलते हैं किंतु मुखमण्डल और वस्त्रों से बुद्ध, यूनानी राजाओं की तरह लगते हैं। बुद्ध की ये मूर्तियाँ यूनानी-देवता अपोलो की मूर्तियों से काफी साम्य रखती हैं। इनमें बुद्ध को यूरोपियन वेश-भूषा तथा रत्नाभूषणों से युक्त दिखाया गया है।

    गुप्तकालीन मूर्ति-कला

    गुप्त-काल में शिल्प-कला की बड़ी उन्नति हुई। गुप्तकाल की मूर्तिकला शैली को कनिष्ककालीन मथुरा शैली का ही विकसित रूप माना जाता है। गुप्त कालीन शिल्प-कला के सम्बन्ध में डॉ. रमाशंकर त्रिपाठी ने लिखा है- 'गुप्त काल के शिल्पकारों की कृतियों की यह विशेषता है कि उनमें ओज, अंसयम का अभाव तथा शैली का सौष्ठव पाया जाता है।' गुप्त काल की शिल्पकला तथा चित्रकला के सम्बन्ध में डॉ. नीलकान्त शास्त्री ने लिखा है- 'शिल्प कला तथा चित्रकला के क्षेत्र में गुप्त कालीन कला भारतीय प्रतिभा में चूड़ान्त विकास की प्रतीक है और इसका प्रभाव सम्पूर्ण एशिया पर दीप्तिमान है।'

    डॉ. रमेशचन्द्र मजूमदार ने गुप्त कालीन शिल्प की विशेषता पर प्रकाश डालते हुए लिखा है- 'सामान्यतः उच्चकोटि का आदर्श और माधुर्य तथा सौन्दर्य की उच्चकोटि की विकसित भावना गुप्त काल की शिल्प कला की विशेषता है।' अपने पूर्ववर्ती युगों की अपेक्षा गुप्त काल में मूर्ति-पूजा का प्रचलन बहुत बढ़ गया था। इसलिये इस काल में देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बड़ी संख्या में बनाई गईं। इस काल की मूर्तिकला की कई विशेषताएँ हैं-

    (1.) इस काल की मूर्तियाँ बहुत सुन्दर हैं।

    (2.) वे विदेशी प्रभाव से मुक्त हैं और विशुद्ध भारतीय हैं।

    (3.) इनमें नैतिकता पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया है।

    (4.) इस काल में नग्न मूर्तियों का निर्माण बन्द हो गया और उन्हें झीने वस्त्र पहनाए गए।

    (5.) ये बड़ी ही सरल हैं। इन्हें अत्यधिक अलंकृत करने का प्रयत्न नहीं किया गया।

    (6.) गुप्तकाल की स्त्री प्रतिमाएं अधिक मांसल हैं तथा उनमें स्थूल स्तनों का अंकन प्रमुखता से किया गया है।

    इस काल की सारनाथ की बौद्ध प्रतिमा बड़ी सुन्दर तथा सजीव है। मथुरा से प्राप्त भगवान विष्णु की मूर्ति गुप्तकाल की कला का श्रेष्ठ उदाहरण है। गुप्तकाल में बनारस, पाटलिपुत्र एवं मथुरा मूर्तिकला के प्रसिद्ध केन्द्र थे।

    हर्षकालीन मूर्ति-कला

    हर्ष के शासनकाल में प्रशासनिक कौशल के साथ-साथ कला और साहित्य की भी बड़ी उन्नति हुई। हर्ष स्वयं कला और साहित्य का अनुरागी था। इस काल में भारत में बड़ी संख्या में हिन्दू, बौद्ध तथा जैन धर्मों के मंदिर, चैत्य तथा संघाराम बने। मंदिरों के निर्माण के कारण मूर्तिकला का भी पर्याप्त विकास हुआ। बौद्धों ने बुद्ध की तथा हिन्दुओं ने शिव तथा विष्णु आदि देवताओं की सुंदर मूर्तियों का निर्माण किया। इस काल की मूर्तिकला में भारशिव शैली तथा मथुरा शैली का सम्मिलन हो गया तथा गोल मुख के स्थान पर लम्बे चेहरे बनाये जाने लगे। अजन्ता की गुफा संख्या 1 एवं 2 की मूर्तियाँ इसी काल की हैं।

    सल्तनत कालीन मूर्तिकला

    मुसलमानों के भारत आने से पहले भारत में मूर्तिकला अत्यन्त ही उन्नत अवस्था में थी किन्तु मुस्लिम आक्रान्ता मूर्तियों को तोड़ना इस्लाम धर्म की सेवा तथा धार्मिक कर्त्तव्य मानते थे। अतः उन्होंने भारतीय मूर्तिकला पर घातक प्रहार किया। मुहम्मद गौरी एवं कुतुबुद्दीन ऐबक के आक्रमण में दिल्ली, आगरा, अजमेर आदि में स्थित लगभग समस्त प्राचीन धार्मिक स्थलों की मूर्तियों को नष्ट कर दिया गया। बहुत से मंदिरों ने अपने मंदिर के बाहर इस्लामिक चिह्न अंकित किये ताकि मुस्लिम आक्रांता उन्हें पूरी तरह नष्ट न कर सकें। फिर भी इन मंदिरों की मूर्तियों को पूर्णतः अथवा अंशतः विक्षत कर दिया गया। सल्तनत काल में मंदिर एवं मूर्तियों के निर्माण पर पूरी तरह रोक लगा दी गई इसलिये उत्तर भारत में मूर्तिकला का विकास ठप्प हो गया। दक्षिण भारत के विजयनगर साम्राज्य सहित उन अन्य राज्यों में मंदिरों एवं मूर्तियों का निर्माण होता रहा जहाँ हिन्दू शासक राज्य कर रहे थे।

    मुगल कालीन मूर्तिकला

    मुगलों के काल में भी भारत की मूर्तिकला का निरंतर ह्रास होता रहा। बाबर और हुमायॅूँ भी कट्टर मुसलमान शासक थे और मूर्ति बनाना पाप समझते थे। उन्होंने अनेक मंदिरों एवं उनकी मूर्तियों को ध्वस्त कर दिया। अकबर ने अपने उदार दृष्टिकोण के कारण मूर्तिकला को प्रोत्साहन दिया। जहाँगीर ने भी कुछ मूर्तियाँ बनवाईं किन्तु शाहजहाँ और औरंगजेब ने इसे कोई प्रोत्साहन नहीं दिया, जिससे मूर्तिकला पतनोन्मुख हो गई। औरंगजेब के शासन काल में मूर्तिकला को सर्वाधिक हानि हुई।

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