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  • प्यार ! (हिन्दी कविता)

     22.03.2018
    प्यार ! (हिन्दी कविता)

    प्यार !



    धूप छूकर

    चली जाती है

    जहां झूठे को

    और लौट कर नहीं आती

    फिर हफ्तों!

    पहाड़ियों की उन

    तमिस्र छाया में

    प्यार! तुम मुझे मिले

    झरना बनकर झूमते हुए।



    हिमाच्छादित शुभ्रवर्णा

    चोटियों के तले खड़े

    लम्बे देवदार की फुनगी पर

    प्यार! मैंने तुम्हें देखा

    किरण बनकर बिखरते हुए।



    विशाल, अनगढ़

    बेडौल चट्टानों के बीच

    दूर-दूर तक फैली

    झाड़ियों के किनारे किनारे

    मीलों चली गईं

    सर्पिलाकार पगडण्डियों पर

    प्यार! मैंने तुम्हें देखा

    खरगोश और मेमने बनकर

    डोलते हुए।



    आंखें फाड़-फाड़ कर

    देखा करता है हिमांशु

    रात-रात भर जागकर

    नदी के जिस उन्मुक्त प्रवाह को

    और विदा हो लेता है

    हर सवेरे अतृप्त ही,

    प्यार! मैंने तुम्हें देखा

    उर्मि बनकर फिसलते हुए।



    हजारों हाथ गहरी कन्दराओं में

    मारे तम के भय से

    वनैले हिंस्रक भी

    धरते नहीं पैर

    प्यार! मैंने तुम्हें वहां देखा

    हवा बनकर डोलते हुए।



    बड़ी-बड़ी चट्टानें खिसकती हैं

    प्रकृति के धनुष पर

    प्रत्यंचा बनकर

    और मुक्त कण्ठ से करती हैं

    ताण्डव का उद्घोष

    वहां पर प्यार! मैंने तुम्हें

    नदी बनकर

    उनका स्वागत करते देखा है

    छपाक की ध्वनि के साथ।

    मानों बोल उठी हों घाटियां

    घुंघरू बनकर।

    प्यार ! मैंने वह जलतरंग सुनी है।



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  • क्या दलितों को कांग्रेस ने भड़काया !

     11.04.2018
    क्या दलितों को कांग्रेस ने भड़काया !

    क्या दलितों को कांग्रेस ने भड़काया !

    दो अप्रैल 2018 को दलित आंदोलन के दौरान भारत-बंद, धरना, प्रदर्शन, जुलूस आदि कार्यक्रम हुए। ये कार्यक्रम कई स्थानों पर हिंसक हो गए। आग लगी, लोगों के घर जले, सिर फूटे, कुछ लोग मरे भी।

    कहा जा रहा है कि इसके पीछे कांग्रेस ने राजनीतिक रोटियां सेकीं।

    क्या वाकई में इसके पीछे कांग्रेस थी !

    इस प्रश्न पर विचार-विमर्श करने से पहले कुछ मूलभूत बातों पर विचार किया जाना चाहिए।

    भारत के सामाजिक ढांचे में कुछ दरारें हैं जिनका लाभ कभी देश विरोधी तो कभी सत्ता विरोधी शक्तियों ने उठाया है। पहले इसका लाभ महमूद गजनवी, मुहम्मद गौरी तथा बाबर ने उठाया, बाद में अंग्रेजों ने उठाया और मीडिया में आरोप लग रहा है कि अब कांग्रेस उठाना चाहती है !

    इस समस्या के इतिहास में थोड़ा और पीछे चलते हैं।

    जब कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था, श्रम आधारित जाति व्यवस्था में बदली तो समाज को उसके लाभ और हानि दोनों ही मिले। श्रम आधारित जाति व्यवस्था का लाभ श्रम कौशल से जुड़ा हुआ था जबकि इस व्यवस्था का नुक्सान कुछ अतिवादियों, मूर्खों एवं बुरी प्रवृत्ति के लोगों द्वारा एक-दूसरे के विरुद्ध संगठित होकर षड़यंत्र करने के रूप में हुआ।

    जाति व्यवस्था ने अस्पृश्यता जैसे घृणित विचार को जन्म दिया। इसके कारण कई तरह की समस्याएं उत्पन्न हुईं।

    भारत को आजादी मिलने तक देश में जातिवाद एक सामाजिक समस्या थी किंतु देश की आजादी के बाद यह राजनीतिक समस्या बन गई।

    जातिवादी व्यवस्था ने एससी-एसटी आरक्षण को जन्म दिया। जातिवादी व्यवस्था ने मण्डल कमीशन को जन्म दिया। जातिवादी व्यवस्था ने ओबीसी आरक्षण को जन्म दिया। जातिवादी व्यवस्था ने दलित, पिछड़ा, अति पिछड़ा जैसे शब्दों को जन्म दिया। जातिवादी व्यवस्था ने बुरी प्रवृत्ति के लोगों को समूचे हिन्दू धर्म को बुरा बताने का अवसर दिया। जातिवादी व्यवस्था ने जाट आंदोलन, गुर्जर आंदोलन, पटेल आंदोलन और दलित आंदोलन को जन्म दिया।

    जाति व्यस्था की आड़ में कुछ बुरे लोगों को हिन्दू धर्म के विरुद्ध विष वमन करने तथा उसे असहिष्णु, हिंसक और शोषकों का धर्म कहने का दुस्साहस हुआ। हिन्दू धर्म की अच्छाइयों की चर्चा बंद कर दी गई और समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता तथा समानता जैसे राजनीतिक मुहावरे गढ़ लिए गए।

    नेहरू से लेकर राहुल गांधी तक हिन्दू संगठनों को गांधीजी का हत्यारा बताकर देशवासियों को हिन्दू संगठनों के विरुद्ध भड़काते रहे। राहुल गांधी तो आर एस एस पर गांधीजी की हत्या का आरोप दोहरा कर मुकदमा तक झेल रहे हैं।

    आज भी कांग्रेस के महासचिव अशोक गहलोत यही कहते हैं कि बीजेपी घृणा फैलाने वाली राजनीति करती है। देश का बहुसंख्यक हिन्दू अब इन बातों को पसंद नहीं करता क्योंकि वह जानता है कि इन जुमलों की आड़ में अल्पसंख्यकों के वोट बटोरे जाते हैं। इसलिए देश का बहुसंख्यक हिन्दू, कांग्रेस से विमुख हो गया और केन्द्र में बीजेपी की सरकार बनी।

    जब देश का बहुसंख्यक हिन्दू, कांग्रेस से विमुख होकर बीजेपी की तरफ मुड़ गया तो कांग्रेस का राजनीतिक आधार ही खिसक गया। जिस अल्पसंख्यक वर्ग को कांग्रेस ने वोट बैंक में बदलकर सत्ता के घोड़े पर चढ़े रहने की आदत बना ली थी, वह घोड़ा धड़ाम से नीचे गिर गया। इसलिए कांग्रेस के समक्ष अब कोई चारा नहीं बचा, सिवाय इसके कि हिन्दू धर्म के वोटरों में सेंध लगाई जाए।

    देश की प्रत्येक राजनीतिक पार्टी जानती है कि हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी कमजोरी क्या है ! जाति को जाति से लड़ाओ, और हिन्दू धर्म की एक-जुटता को चटखा दो। हिन्दू धर्म को जाति के नाम पर आसानी से कई टुकड़ों में बांटकर कुछ टुकड़ों को अपनी ओर किया जा सकता है। एससी, एसटी, ओबीसी, जनरल, अल्पसंख्यक जैसे बड़े टुकड़े तो थोड़े से ही परिश्रम से अलग किए जा सकते हैं।

    इस बैकग्राउण्ड के बाद अब हम अपने मूल विषय पर लौटते हैं। दलित आंदोलन के दौरान कुछ अजीबोगरीब घटनाएं हुईं जिनके कारण कांग्रेस पर दलित आंदोलन भड़काने के आरोप लगाए गए। दलितों का यह आंदोलन इस बात को लेकर हुआ था कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि किसी दलित द्वारा किसी सवर्ण के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करवाने मात्र से सवर्ण व्यक्ति की गिरफ्तारी नहीं हो, पहले जांच हो तथा जांच के तथ्यों के आधार पर गिरफ्तारी हो ।

    दलित आंदोलन के नेताओं ने मुद्दे को भटकाया और उसे आरक्षण के मुद्दे में बदल दिया। कांग्रेस ने भी यही किया। दलित आंदोलन के नेताओं द्वारा सड़कों पर चल रहे जुलूसों में बार-बार कहा गया कि बीजेपी, दलितों का आरक्षण समाप्त कर रही है, जबकि बीजेपी बारबार दोहरा रही थी कि आरक्षण समाप्त नहीं होगा। राहुल गांधी लगातार दोहराते रहे कि बीजेपी दलित विरोधी है, बीजेपी आरक्षण समाप्त करना चाहती है। यह भी कहा गया कि गुजरात से शुरू हुआ दलित आंदोलन भगवा राजनीति के लिए कफ़न साबित होगा !

    इस आंदोलन के दौरान कुछ स्थानों पर हनुमानजी आदि देवी देवताओं की मूर्तियों पर सार्वजनिक रूप से जूते मारे गए और उन पर थूका गया। कुछ स्थानों पर सवर्णों के घर जलाए गए। प्रतिक्रिया में कुछ दलितों के घर भी जलाए गए। सोशियल मीडिया में हिन्दू धर्म के विरुद्ध घृणा फैलाने का दौर चला।

    राजस्थान में बीजेपी की एक एससी महिला एमएलए का घर भी जलाया गया। उन्होंने आरोप लगाया है कि कांग्रेस के स्थानीय प्रतिद्वंद्वियों ने उनके घर को आग लगाई। अन्य स्थानों से भी कुछ ऐसी बातें सामने आईं।

    यह तो प्रत्येक घटना की पुलिस जांच होने पर ही पता लग सकेगा कि किसी भी घटना में कांग्रेस का हाथ था या नहीं, तब तक जितने मुंह, उतनी बातें होंगी। इस बीच बीजेपी के कुछ दलित सांसद भी अपनी ही पार्टी के विरुद्ध शिकायतों का पिटारा खोलकर बैठ गए हैं। यह तो वक्त ही बताएगा कि उनकी शिकायतें कितनी सही हैं और कितनी गलत!

    कांग्रेस देश की बहुत जिम्मेदार तथा प्रतिष्ठित पार्टी है, उसके नेतृत्व में देश ने आजादी की लड़ाई लड़ी और आजादी पाई। कांग्रेस ने देश पर 60 से अधिक वर्षों तक शासन किया। कांग्रेसी सरकारों के नेतृत्व में देश ने दुश्मनों को युद्धों में पराजित किया। अतः उससे किसी भी तरह की गैर जिम्मेदार हरकत की अपेक्षा नहीं की जा सकती। इसलिए आवश्यक है कि कांग्रेस भी देश को गंभीर स्वर में स्वयं को निर्दोष बताने का प्रयास करे।

    दलित नेताओं को भी विचार करना चाहिए कि वे अपने समाज की अशिक्षा और निर्धनता का लाभ उठाकर उन्हें सरकार, समाज अथवा धर्म के विरुद्ध न भड़काएं। यह कैसे संभव है कि हम अपने देश से प्रेम करने का दंभ भरें और देशवासियों से घृणा करें!

    इससे पहले कि प्रत्येक जाति स्वयं को एक राष्ट्र समझे और हम पूरी दुनिया के समक्ष दया के लिए गिड़गिड़ाएं, हमें जिम्मेदार नागरिकों की तरह व्यवहार करना होगा। राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी तो और भी ज्यादा है।
    प्रेम से ही प्रेम उत्पन्न होता है, घृणा से किसी को भी अंत में कुछ प्राप्त नहीं होता।


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  • गींदड़ नृत्य

     11.04.2018
    गींदड़ नृत्य

    गींदड़ नृत्य

    राजस्थान के शेखावाटी अंचल में वसंत पंचमी से ही ढफ बजने लगते हैं तथा धमालें गाई जाने लगती हैं। कुछ धमाल भक्ति प्रधान एवं कुछ धमाल शृंगार प्रधान होती हैं। जब होली में 15 दिन रह जाते हैं तो गांव-गांव गींदड़ होने लगते हैं। इसे गींदड़ खेलना कहते हैं।

    होलिका दहन से दो दिन पहले रात भर गींदड़ होते हैं। इन आयोजनों में सैंकड़ों आदमी भाग लेते हैं। यह शेखावाटी अंचल का लोकनृत्य है। सुजानगढ़, चूरू, रामगढ़, लक्ष्मणगढ़, सीकर और उसके आसपास के क्षेत्रों में होली से पन्द्रह दिन पहले से इस नृत्य के सामूहिक कार्यक्रम आयोजित होने लगते हैं।

    इस नृत्य में आयु, वर्ग एवं जाति-पांति का भेद नहीं रखा जाता है। परम्परागत रूप से यह नृत्य चांदनी रात में होता था किंतु अब विद्युत प्रकाश भी किया जाता है।

    नगाड़ा इस नृत्य का मुख्य वाद्य होता है। नर्तक अपने हाथों में छोटे डण्डे लिये हुए होते हैं। नगाड़े की ताल के साथ इन डंडों को परस्पर टकराते हुए घूमते हैं तथा आगे बढ़ते हैं। नृत्य के साथ लोकगीत भी ठेके से मेल खाते हुए गाए जाते हैं। चार मात्रा का ठेका धीमी गति के नगाड़े पर बजता है।

    धीरे-धीरे उसकी गति तेज होती है। जैसे-जैसे नृत्य गति पकड़ता है, नगाड़े की ध्वनि भी तीव्र होती है। इस नृत्य में विभिन्न प्रकार के स्वांग बनाये जाते हैं जिनमें साधु, शिकारी, सेठ-सेठानी, डाकिया, दुल्हा, दुल्हन आदि प्रमुख हैं। प्रत्येक नर्तक अपने पैरों में घुंघरू बांधे हुए होता है।

    यह मारवाड़ के डांडिया तथा गुजरात के गरबा नृत्य से मिलता-जुलता है। गींदड़ में गरबा की तरह ही कई पुरुष अपने दोनो हाथों में लकड़ी की डंडियाँ लेकर अपने आगे व पीछे के साथियों की डंडियों से टकराते हुए तथा गोल घेरे में चलते हुए आगे बढ़ते हैं। घेरे के केन्द्र में एक ऊँचा मचान बनाया जाता है जिस पर ऊँचा झँडा भी लगाया जाता है। मचान पर बैठा हुआ व्यक्ति नगाड़ा बजाता है।

    नगाड़े, चंग, धमाल व डंडियों की सम्मिलित ध्वनियों से आनंद दायक संगीत बजाया जाता है जिसकी ताल पर नृत्य होता है। गरबा और गींदड़ में मुख्य भेद डंडियों का होता है, गींदड़ की डंडियां गरबा के डांडियों से आकार में अधिक लम्बाई लिए होती हैं। गरबा में स्त्री-पुरुषों के जोडे होते हैं जबकि गींदड़ में मुख्य रूप से पुरुष ही स्त्रियों का स्वांग रचकर नाचते हैं।

    शेखावाटी क्षेत्र में कई स्थानों पर गींदड़ महोत्सव का आयोजन किया जाता है। बहुत से स्थानों पर गींदड़ खेलने की प्रतियोगिताएं होती हैं। गींदड़ को कहीं-कहीं गींदड़ी भी कहा जाता है। इस लोकनृत्य के साथ विभिन्न प्रकार के लोकगीत गाए जाते हैं- कठैं सैं आई सूंठ कठैं सैं आयो जीरो, कठैं सैं आयो ए भोळी बाई थारो बीरो।


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  • घुड़ला नृत्य

     14.04.2018
    घुड़ला नृत्य

    घुड़ला नृत्य

    घुड़ला नृत्य मारवाड़ क्षेत्र में किया जाता है। यह सुहागिन स्त्रियों द्वारा किया जाने वाला सामूहिक नृत्य है। कई स्थानों पर कुंवारी कन्याएं भी इसमें भाग लेती हैं। यह नृत्य गणगौर पर्व के आसपास किया जाता है। इस अवसर पर माता गौरी अर्थात् पार्वतीजी एवं उनके ईश्वर शिवजी की पूजा होती है। विधवा स्त्रियां भी गौर को पूजती हैं।

    घुड़ला नृत्य में सुहागिन स्त्रियां एवं कुंवारी लड़कियां छिद्र युक्त घड़े को सिर पर रखकर उसमें दिये जलाती हैं तथा नृत्य के दौरान घूमर और पणिहारी के अंदाज में गोल चक्कर बनाती हैं। इस नृत्य से मारवाड़ रियासत अर्थात जोधपुर राज्य की एक ऐतिहासिक घटना जुड़ी हुई है।

    ई.1490 में मारवाड़ पर राव जोधा के पुत्र सातलदेव का राज्य था। उन दिनों मारवाड़ के राठौड़ राजकुमार मुस्लिम जागीरों को उजाड़कर अपने राज्य में मिला रहे थे। जोधा के पुत्र दूदा ने मेड़ता, बीदा ने लाडनूं तथा बीका ने बीकानेर राज्य की स्थापना की थी।

    इस कारण आसपास के मुस्लिम सूबेदार एवं जागीरदार मारवाड़ पर आक्रमण करते रहते थे। अजमेर का सूबेदार मल्लूखां भी मारवाड़ रियासत पर ताबड़तोड़ हमले कर रहा था। एक बार उसने अपने सहायक सिरिया खां तथा घुड़ले खां के साथ मारवाड़ के मेड़ता गांव पर आक्रमण किया। मार्ग में उसने पीपाड़ गाँव के तालाब पर सुहागिन स्त्रियों को गणगौर की पूजा करते हुए देखा। मल्लूखाँ ने उन सुहागिनों को पकड़ लिया तथा उन्हें लेकर अजमेर के लिए रवाना हो गया।

    जब यह समाचार राव सातल के पास पहुँचा तो राव सातल ने अपनी सेना लेकर मल्लू खाँ का पीछा किया। मेड़ता से दूदा तथा लाडनूं से बीदा की सेनाएं भी मल्लूखां को रोकने के लिए चल पड़ीं। मल्लूखां पीपाड़ से कोसाणा तक ही पहुँचा था कि जोधपुर नरेश सातल ने उसे जा घेरा। मल्लूखां और उसके साथी भाग छूटे किंतु मल्लूखां का सेनापति घुड़ले खां इस युद्ध में मारा गया। हिन्दू कन्याएं एवं सुहागिन स्त्रियां मुक्त करवा ली गयीं।

    सातल के सेनापति खीची सारंगजी ने घुड़ला खां का सिर काटकर राव सातल को प्रस्तुत किया। राव सातल ने घुड़लाखां का कटा हुआ सिर उन स्त्रियों को दे दिया जिन्हें मल्लू खां उठाकर ले जाना चाहता था। स्त्रियां उस कटे हुए सिर को लेकर गांव में घूमीं और उन्होंने राजा के प्रति आभार व्यक्त किया। महाराजा के आदेश से उस सिर को सारंगवास गांव में गाड़ा गया। जिसके कारण वह गांव आज भी घड़ाय कहलाता है।

    घायल राव सातल और उसके कुछ साथी सरदारों का उसी रात अपने डेरे में प्राणांत हो गया। इस घटना की स्मृति में आज भी चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को घुड़ला निकाला जाता है। इस अवसर पर गाँव-गाँव में मेला लगता है।

    इस दिन औरतें कुम्हार के यहाँ से कोरा घड़ा लाकर उस पर सूत बांधती हैं तथा घड़े में बहुत से छेद करके उसमें मिट्टी का दीपक जलाती हैं। मटकी के छेद, घुड़ले के सिर में लगे तीर-बरछी के घाव समझे जाते हैं और उसमें रखा दीपक जीवात्मा का प्रतीक माना जाता है। सुहागिन स्त्रियां एवं लड़कियां इस घड़े को लेकर गली-गली घूमती हैं तथा नृत्य करती हैं। घुड़ला घुमाने वाली महिलाओं को तीजणियां कहा जाता है। इस दौरान वे घुड़ले को चेतावनी देती हुई गाती हैं-

    घुड़ले रे बांध्यो सूत, घुड़लो घूमैला जी घूमैला।

    सवागण बारै आग, घुड़लो घूमैला जी घूमैला।


    इस आयोजन के माध्यम से मारवाड़ की सुहागिन स्त्रियां घुड़ले खां को चेतावनी देती हैं कि सुहागिनें माता पार्वती की पूजा करने जा रही हैं, घुड़ले खां में दम हो तो रोक ले।

    चैत्र सुदी तीज तक यह घुड़ला घुमाया जाता है तथा उसके बाद विसर्जित कर दिया जाता है। जोधपुर राज परिवार एवं सामंती परिवारों की स्त्रियाँ कुम्हार के यहाँ घुड़ला लेने लवाजमे के साथ जाती थीं। दासी घुड़ले को अपने सिर पर रख कर गणगौर की सवारी के साथ अष्टमी से तीज तक घुमाती थी। तीज के दिन महाराजा तलवार या खांडे से इस घड़े को खंडित करते थे। यह आयोजन गांव-गांव होता था तथा जनता घड़े के टुकड़ों को शकुन के तौर पर अपने अन्न के कोठार में रखती थी।

    घुड़ले के मेले के दूसरे दिन मारवाड़ में लोटियों का मेला होता था। संध्या के समय कन्याएँ एवं सुहागन 
    स्त्रियां टोली बनाकर, सिर पर छोटे-बड़े तीन चार कलश रखकर, गीत गाती हुई जलाशय, कुएँ या बावड़ी पर जाती थीं। जलाशय से जल भर कर उसमें दूब, पुष्प आदि रखकर गाजे-बाजे के साथ लौटती थीं। उस जल से गणगौर की पूजा की जाती थी। जोधपुर में गणगौर को पानी पिलाने के लिये लोटियाँ चांदी, तांबे तथा पीतल कीे होती थीं। कलश पर नारियल रखा जाता था एवं पुष्प मालाएँ बांधी जाती थीं। लोटियों वाली स्त्रियां गले में फूलों की माला पहन कर गीत गाती हुई पूजा स्थान को आतीं और गणगौर को पानी पिलाती थीं। यह परम्परा आज भी अनवरत रूप से चल रही है।

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  • राजस्थान का लोकप्रिय नृत्य - घूमर

     15.04.2018
    राजस्थान का लोकप्रिय नृत्य - घूमर

    घूमर नृत्य

    घूमर नृत्य समूचे राजस्थान का लोकप्रिय नृत्य है। इसे राजस्थान के लोकनृत्यों की रानी कहा जा सकता है। यह लोकनृत्य थार के रेगिस्तान से लेकर, डूंगरपुर-बांसवाड़ा के आदिवासी क्षेत्र, अलवर-भरतपुर के मेवात क्षेत्र, कोटा-बूंदी-झालावाड़ के हाड़ौती क्षेत्र एवं धौलपुर-करौली के ब्रज क्षेत्र तक में किया जाता है।

    मारवाड़, मेवाड़ तथा हाड़ौती अंचल के घूमर में थोड़ा अंतर होता है। रेगिस्तानी क्षेत्र की घूमर में शृंगारिकता अधिक होती है जबकि मेवाड़ी अंचल की घूमर गुजरात के गरबा से अधिक मेल खाती है।

    यह नृत्य होली, दीपावली, नवरात्रि, गणगौर जैसे बड़े त्यौहारों एवं विवाह आदि मांगलिक प्रसंगों पर घर, परिवार एवं समाज की महिलाओं द्वारा किया जाता है। यह विशुद्ध रूप से महिलाओं का नृत्य है। परम्परागत रूप से महिलाएं इस नृत्य को पुरुषों के समक्ष नहीं करती थीं किंतु अब इस परम्परा में शिथिलता आ गई है। इस नृत्य में सैंकड़ों महिलाएं एक साथ भाग ले सकती हैं। राजस्थानी महिलाएं जब घुमावदार घेर का घाघरा पहनकर चक्कर लेकर गोल घेरे में नृत्य करती हैं तो उनके लहंगों का घेर और हाथों का लचकदार संचालन देखते ही बनता है।

    इस नृत्य में गोल चक्कर बनाने के बाद थोड़ा झुककर ताल ली जाती है। घूमर के साथ अष्टताल कहरवा लगाया जाता है जिसे सवाई कहते हैं। इसे अनेक घूमर गीतों के साथ मंच तथा सरकारी आयोजनों में भी प्रस्तुत किया जाता है।

    घूमर नृत्य के साथ घूमर गीत गाया जाता है-

    म्हारी घूमर छै नखराली ए माँ।

    घूमर रमवा म्हैं जास्यां।

    सागर पाणीड़ै जाऊं निजर लग जाय।

    कुण जी खुदाया कुवा बावड़ी ए परिणाहरी ए लो।

    सामंती काल में घूमर राजपरिवारों की महिलाओं का सर्वाधिक लोकप्रिय नृत्य था। इसे जनसामान्य द्वारा आज भी चाव से किया जाता है। भील एवं गरासिया आदि जनजातियों की महिलाएं भी घूमर करती हैं। घुड़ला, घूमर एवं पणिहारी नृत्य में महिलाओं द्वारा एक जैसे गोल चक्कर बनाए जाते हैं।

    यह लोकप्रिय लोकनृत्य होने के साथ-साथ आज व्यावसायिक नृत्य का भी रूप ले चुका है। मारवाड़ में राजपरिवारों के मनोरंजन के लिए त्यौहारों एवं शादी-विवाह पर पातरियों और पेशेवर नृत्यांगनाओं की भी घूमर होती थी।

  • घूमर नृत्य
    घूमर नृत्य
    घूमर नृत्य

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  • भारत की एक रहस्यमयी लिपि - शंख लिपि

     16.04.2018
     भारत की एक रहस्यमयी लिपि - शंख लिपि

    राजस्थान के जयपुर जिले में स्थित बिजार अथवा बीजक की पहाड़ियों में बड़ी संख्या में ऐसी कंदराएं हैं जिनमें एक रहस्यमय लिपि उत्कीर्ण है। इस लिपि को अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है।

    शंखलिपि के नाम से जानी जाने वाली इस लिपि के लेख बड़ी संख्या में बीजक की पहाड़ी, भीम की डूंगरी तथा गणेश डूंगरी में बनी गुफाओं में अंकित हैं। इन लेखों के अक्षर शंख की आकृति के हैं। वैज्ञानिकों को इस लिपि के अभिलेख भारतीय उपमहाद्वीप के भारत, इण्डोनेशिया, जावा तथा बोर्नियो आदि देशों से मिले हैं जिनसे यह धारणा बनती है कि- जिस तरह किसी काल खंड में सिंधु लिपि जानने वाली सभ्यता भारतीय उप महाद्वीप में विकसित हुई थी, उसी तरह शंखलिपि जानने वाली कोई सभ्यता किसी काल खण्ड में भारतीय उपमहाद्वीप में फली-फूली।

    ये लोग कौन थे! इनका कालखंड क्या था! आदि प्रश्नों का उत्तर अभी तक नहीं दिया जा सका है। भारत में शंखलिपि के अभिलेख उत्तर में जम्मू कश्मीर के अखनूर से लेकर दक्षिण में सुदूर कर्नाटक तथा पश्चिमी बंगाल के सुसुनिया से लेकर पश्चिम में गुजरात के जूनागढ़ तक उपलब्ध हैं। ये अभिलेख इस लिपि के अब तक ज्ञात विशालतम भण्डार हैं।

    उत्कीर्ण अभिलेखों में लिपि को अत्यंत सुसज्जित विधि से लिखा गया है। कुछ विद्वान इस लिपि को ब्राह्मी लिपि के निकट मानते हैं। विराट नगर से प्राप्त अभिलेखों की तिथि तीसरी शताब्दी ईस्वी मानी गई है। एक लेख में ‘चैल-चैतरा’ पढ़ा गया है जो संस्कृत का ‘शैल-चैत्य’ माना गया है। इसका अर्थ होता है- ‘पहाड़ी पर स्थित चैत्य।’ इससे अनुमान लगाया जाता है कि ईसा की तीसरी शताब्दी में यहां कोई पहाड़ी बौद्ध चैत्य था। विराट नगर तीसरी शताब्दी के आसपास तक बौद्ध धर्म का बड़ा केन्द्र था। मौर्य सम्राट अशोक के भब्रू तथा विराटनगर अभिलेख इसी स्थान से मिले हैं। इन पहाड़ियों में अनेक चैत्य एवं विहारों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।

    प्राचीन बौद्ध ग्रंथ ललित विस्तर में उन 64 लिपियों के नाम गिनाए गए हैं जो बुद्ध को सिखाई गई थीं। उनमें नागरी लिपि का नाम नहीं है, ब्राह्मी लिपि का नाम है। ललित विस्तर का चीनी भाषा में अनुवाद ईस्वी 308 में हुआ था। जैनों के पन्नवणा सूत्र और समवायांग सूत्र में 18 लिपियों के नाम दिए गए हैं जिनमें पहला नाम बंभी (ब्राह्मी) लिपि का है। भगवतीसूत्र का आरंभ नमो बंभी लिबिए (ब्राह्मी लिपि को नमस्कार) से होता है।

    यद्यपि इन लिपियों का काल निर्धारण नहीं किया जा सका है किंतु ये लिपियां महावीर स्वामी एवं गौतम बुद्ध के युग में प्रचलन में थीं। शंखलिपि भी उनमें से एक है। इस लिपि के लेख आज तक पढ़े नहीं जा सके हैं। इस लिपि के अक्षर ‘शंख’ की आकृति से साम्य रखते हैं। इसलिए इसे शंखलिपि कहा जाता है।

    राजगीर की प्रसिद्ध सोनभंडा की गुफाओं में लगे दरवाजों की प्रस्तर चौखटों पर एवं भित्तियों पर शंख लिपि में कुछ संदेश लिखे हैं जिन्हें पढ़ा नहीं जा सका है। बिहार में मुण्डेश्वरी मंदिर तथा अन्य कई स्थानों पर यह लिपि देखने को मिलती है। मध्यप्रदेश में उदयागिरि की गुफाओं में, महाराष्ट्र में मनसर से तथा बंगाल एवं कनार्टक से भी इस लिपि के लेख मिले हैं। इस लिपि के लेख मंदिरों एवं चैत्यों के भीतर, शैलगुफाओं में तथा स्वतंत्र रूप से बने स्तम्भों पर उत्कीर्ण मिलते हैं।

    प्राप्त शिलालेखों के आधार पर अनुमान लगाया गया है कि इस लिपि में 12 अक्षर हैं। इस लिपि के लेखों में बहुत छोटे-छोटे संदेश खुदे हुए हैं। अर्थात् इन लेखों में पवित्र शब्द, ईश्वरीय नाम, ‘शुभास्ते पंथानः संतु’ एवं ‘ऑल दी बैस्ट’ जैसे मंगल कामना करने वाले शब्द उत्कीर्ण हो सकते हैं। सोलोमन नामक एक विद्वान ने सिद्ध किया है कि इस लिपि में उतने अक्षर मौजूद हैं जिनमें संस्कृत भाषा के समस्त शब्दों को व्यक्त किया जा सके।

    उत्तर प्रदेश के देवगढ़ में इस लिपि के अक्षरों का आकार ब्राह्मी लिपि के अक्षरों से कुछ ही बड़ा है जबकि उदयगिरि की गुफाओं में शंखलिपि के अक्षरों को कई मीटर की ऊंचाई वाला बनाया गया है। कुछ विद्वान इस लिपि का काल चौथी से नौंवी शताब्दी ईस्वी निर्धारित करते हैं किंतु यह काल निर्धारण सही नहीं लगता। इस लिपि को ब्राह्मी लिपि की समकालीन माना जा सकता है।

    ब्राह्मी लिपि उत्तर भारत में ईसा से चार सौ साल पहले प्रचलन में आई किंतु दक्षिण भारत तथा लंका में यह लिपि ईसा से 600 साल पहले प्रचलन में थी। शंखलिपि का उद्भव भी उसी काल में माना जाना चाहिए। भरहुत स्तम्भों पर मिले इस लिपि के अभिलेख ईसा से 300 वर्ष पुराने हैं।

    उदयगिरि की गुफाओं में शंखलिपि के लेख गुप्त कालीन हैं जिनके पांचवीं शताब्दी ईस्वी का होना अनुमानित है। देवगढ़ के स्तम्भों की तिथि पांचवीं शताब्दी ईस्वी की है। अतः इस पर लेखों के उत्कीर्णन की तिथि पांचवीं-छठी शताब्दी ईस्वी की होनी चाहिए। सोलोमन ने गुजरात के पठारी नामक स्थान से शंखलिपि का एक ऐसा शिलालेख ढूंढा जिसे प्रतिहार कालीन माना जाता है। इससे अनुमान किया जा सकता है कि शंखलिपि प्रतिहार काल में भी मौजूद थी।

    एक आख्यान के अनुसार महात्मा गौतम अपने जीवन काल के प्रारम्भ में जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर स्वामी के शिष्य थे। जब वे महावीर स्वामी से अलग होकर उदयगिरि आए तो महावीर के लिए शंख लिपी में संदेश छोड़कर आए। यह एक आख्यान है जिसकी विश्वसनीयता अधिक नहीं है। - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • अंधेरे में पलते उजाले (कहानी)

     10.05.2018
    अंधेरे में पलते उजाले (कहानी)

    बबीता स्वप्न बुनती है और स्वप्न के जंजाल में उनींदी सी रहकर स्वेटर बुनती है। स्वप्न और स्वेटर से इतर बबीता और भी बहुत कुछ बुनती है। बबीता जानती है कि जब तक उसमें बुनने की क्षमता है, तब तक ही वह बुन सकती है। बुनना उसके हाथ की बात नहीं है। उसे बुनने की भूमिका मिली है। उसे जीवन भर और सामर्थ्य भर बुनते ही रहना है। ऊन के मुलायम और रंग बिरंगे गोले केवल उसकी गोद में ही नहीं रखे हैं जिनके सिरे उसकी अंगुलियों में पकड़ी हुई सलाईयों से जुड़े हुए हैं, ऊन के गोले उसकी गोद के भीतर भी रखे हैं जिनके सिरे उसके अपने शरीर से जुड़े हुए हैं।

    हाथ की सलाईयां तेज गति से फंदे रचती हैं, नरम मुलायम रंगीन ऊन के गोले गोल-गोल नाचते हैं और स्वेटर का आकार शनैः शनैः बड़ा होता जाता है। उसका शरीर भी सलाइयों की तरह हिलता है, गोद के भीतर हलचल होती है और अदृश्य दीवारों के पीछे कुछ फंदे रचे जा रहे हैं। कुछ उलटे फंदे और उसके बाद कुछ सीधे फंदे। इन उलटे और सीधे फंदों के मेल से शरीर की अदृश्य दीवारों के पीछे जो कुछ भी बुना जा रहा है, वह शनैः शनैः बड़ा होता जाता है। कौन जाने कि बेटा है या बेटी! एक अनजान भय से कंपित रहकर अंधेरी कोठरी में सुबह का उजाला पालते जाना ही बबीता की क्षमता का चरम है।

    तीन साल की मुनिया ऊन के गोलों को उठाकर बाहर भाग जाना चाहती है किंतु हर बार की तरह बबीता उसे प्यार से झिड़क देती है - ‘भइया के लिये स्वेटर बुन रही हूँ। इन्हें लेकर मत भाग।’

    ‘कहाँ है भइया?’

    ‘अभी आयेगा। तू ऊन छोड़।’

    ‘कब आयेगा?’ मुनिया को भइया से मिलने की जल्दी है।

    ‘जब आयेगा तब अपने आप देख लेना। तू खेलेगी भइया के साथ।’

    ‘हाँ मैं भइया के साथ खेलूंगी।’

    ‘तो फिर ऊन छोड़।’

    मुुनिया अनमने हाथों से ऊन का गोला माँ की गोद में फैंक देती है।

    ‘ऐसे नहीं फैंकते, भइया के लग जायेगी।’

    ‘कहाँ है भइया?’ मुनिया फिर सवाल करती है।

    ‘जा तू बाहर खेल। देख तो गली में सब्जी बेचने वाला आया है क्या?’ ‘नहीं, पहले बताओ भइया कहाँ है। मैं उसके साथ खेलूंगी। मुनिया अड़ जाती है।

    इससे पहले कि बबीता कुछ जवाब सोच पाती, बाहर गली में गुब्बारे बेचने वाले की आवाज आई और मुनिया भइया देखने की जिद छोड़कर बाहर लॉन में दौड़ गई। बबीता हाथ की सलाइयों को समेटकर पलंग के कौने पर रख देती है। वह आहिस्ता से ऊन के मुलायम रंगीन गोलों को हाथ में उठाकर तोलती है, उसे आश्चर्य होता है कितने हलके हैं। उनका कोमल स्पर्श उन्हें और भी हलका बना देता है किंतु यही हलके गोले ठण्ड का गुरूर तोड़ देते हैं।

    सर्दियों के छोटे दिनों में आकाश के अतिथि को भी घर जाने की जल्दी रहती है इसलिये पाँच बजने से पहले ही सांझ होने का आभास होने लगा है। सास मंदिर जाने की तैयारी कर रही हैं और ससुर अंधेरा होने से पहले ही सायंकालीन भ्रमण के लिये चले गये हैं। पति के दफ्तर से लौटने से पहले बबीता को रात के खाने की तैयारी करनी है। वह पलंग का सहारा लेकर खड़ी होती है। भीतर भारीपन का अहसास होता है। उसका ध्यान एक बार फिर भीतर की अदृश्य रचना पर चला जाता है। आजकल उसका ध्यान बाहर की ओर कम और अपने भीतर की ओर अधिक रहता है।

    लोग कहते हैं कि आखिरी महीने में बालक माँ के पेट में उलटा लटक कर रहता है। इस दौरान वह माँ के शरीर से जुड़ी नाल के रास्ते भोजन प्राप्त करता है। उलटे लटकने की कल्पना मात्र से ही सिहर उठती है बबीता। वह जगह तो एक दम अंधेरी बंद कोठरी जैसी होगी जिसमें हाथ-पाँव तक हिलाने को जगह नहीं। क्या इतनी तंग अंधेरी बंद कोठरी में आँखें बंद करके उलटे लटके रहने में गर्भस्थ शिशु को कोई कष्ट नहीं होता होगा?

    बबीता को याद है, उसकी नानी कहा करती थीं - ‘हर प्राणी अपनी माँ के पेट में नौ महीने की सबसे कठिन सजा भोगता है। इस सजा से घबरा कर वह भगवान के सामने बारबार गिड़गिड़ाता है कि इस बार मुझे इस कष्ट से छुटकारा दिला दो, अब कभी पाप नहीं करूंगा। तब भगवान प्राणी को उसके अपराधों की जानकारी देता है और कहता है कि यह तेरे पिछले पापों की सजा है। जब तक तू पाप करता रहेगा, तब तक तू जन्म मरण के चक्कर में पड़ा रहेगा और बारम्बार यहाँ आता रहेगा। यह सजा तो तुझे भोगनी ही है।’

    बबीता चक्कर में पड़ जाती है। तो क्या मेरेे अपने भीतर इन दिनों एक न्यायालय चल रहा है जिसमें किसी अज्ञात, अदेखे, अजन्मे प्राणी के पूर्व जन्मों के पाप पुण्य के मुकदमे की सुनवाई हो रही है? क्या जो मासूम अदृश्य रचना मेरे रक्त और मज्जा से शनैः शनैः साकार हो रही है, वह अपने पूर्व जन्मों के कर्मों की सजा भोगने के लिये मेरे भीतर बनी एक अंधी कोठरी में उलटी लटकी हुई है और भगवान उससे उसके पूर्व जन्मों का लेखा-जोखा पूछ रहा है?

    बबीता का पूरा शरीर सिहर उठता है। भगवान पाप-पुण्य का लेखा-जोखा किससे पूछ रहा है? उलटे लटके हुए निर्माणाधीन शिशु के शरीर से या फिर उसके भीतर उलटी लटकी हुई निर्माणाधीन आत्मा से? क्या जिस तरह शिशु के शरीर का शनैः शनैः निर्माण होता है, उसी तरह आत्मा का भी शनैः शनैः अवतरण होता है? या फिर शरीर तो तिल-तिल कर बनता है और आत्मा एक साथ उसमें प्रवेश करती है? बबीता अपने आप से कई सवाल करती है किंतु कोई उत्तर नहीं सूझता।

    बबीता एक बार फिर अपने आप से पूछती है, पूर्व जन्मों के पापों की सजा किसे मिल रही है? तिल-तिल कर बन रहे उलटे लटके हुए शरीर को? या फिर उसके भीतर धीरे-धीरे अवतरित होती हुई आत्मा को? तो क्या जिस तरह मेरे शरीर में एक और शरीर प्रवेश कर गया है, उसी तरह मेरी आत्मा के भीतर भी एक और आत्मा प्रवेश कर गई है? वह खुद ही उलझ जाती है, उसे समझ नहीं आता, आत्मा के भीतर आत्मा कैसे प्रवेश कर सकती है? उसका ध्यान फिर से सजा वाली बात पर चला जाता है। माँ के पेट मंे सजा किसे मिलती है? शरीर को या आत्मा को?

    यदि सजा शरीर को मिलती है तो वह अन्याय है क्योंकि जिस शरीर ने पाप किये थे वह तो पहले ही कहीं मर चुका है। यह तो मेरे रक्त और मेरी मज्जा से बनने वाला शरीर है जो अभी तक पूरा बना ही नहीं है। फिर इसे सजा किस बात की? तो क्या सजा आत्मा को मिलती है? उस आत्मा को जो अजर है, अमर है, अखण्ड है, शाश्वत है? जो आत्मा अग्नि से नहीं जलती, पानी से नहीं भीगती, शस्त्र से नहीं कटती उस आत्मा को सजा कैसे दी जा सकती है? आत्मा तो कुछ भोगती ही नहीं, भोगता तो शरीर है।

    मुनिया गली में देखकर आ गई है। उसके चेहरे पर निराशा का भाव है। गुब्बारे वाला जा चुका है।

    ‘मम्मी गुब्बारे वाला चला गया।’

    बबीता का ध्यान कहीं और है। वह मुनिया की बात का जवाब नहीं देती।

    ‘मम्मी भइया आ गया?’

    ‘इसे भइया की बड़ी जल्दी पड़ी है।’ सास 
    हँस कर मुनिया के सिर पर हाथ फेरती हैं। वे मंदिर जाने के लिये तैयार हो चुकी हैं।

    ‘देख ध्यान से दरवाजा लगा लेना, मैं जा रही हूँ और तू कुछ खा पी लेना। ऐसे में भूखे नहीं रहते। बालक को कष्ट होता है।’ सास जाते-जाते निर्देश देती हैं।

    सास की बात से बबीता का ध्यान नाल से जुड़े गर्भस्थ शिशु की ओर चला जाता है। क्या गर्भस्थ शिशु की स्थिति चिकित्सालय में अचेत पड़े रोगी के समान है? वह स्वयं से सवाल पूछती है किंतु उत्तर में वह स्वयं ही अपने आप से सहमत नहीं हो पाती। वहाँ तो रोगी पलंग पर सीधा सोया रहता है और ग्लूकोज की बोतल उलटी लटकाई जाती है। जिससे रोगी ग्लूकाज प्राप्त करता रहता है। जबकि इस अंधी कोठरी में स्थिति उलटी है। ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ ग्लूकोज की बोतल तो सीधी रहती है किंतु रोगी उलटा लटक कर ग्लूकोज प्राप्त करता है।

    बबीता को ध्यान है कि जब वह स्कूल में पढ़ती थी तब उनके घर में एक सन्यासी आया करते थे। वे बबीता के पिता के पुराने मित्र हुआ करते थे जो गृहस्थी का जंजाल छोड़कर वैरागी हो गये थे। उन्होंने बबीता के पिता से एक दिन कहा था - ‘जब तक प्राणी माता के गर्भ में रहता है तब तक वह ईश्वर से साम्य रखता है तथा निरंतर सोअ्हम-सोअ्हम अर्थात् मैं ही परमात्मा हूँ, मैं ही परमात्मा हूँ, कहता रहता है ताकि भीतर होने वाले सारे कष्टों को भूल जाये किंतु जब वही प्राणी माँ के गर्भ से बाहर आता है तो उसी क्षण सोअह्म-सोअ्हम भूलकर कोअ्हम-कोअ्हम अर्थात् मैं कौन हूँ, मैं कौन हूँ कहने लगता है और फिर से नये कष्ट पाने की भूमिका रचने लगता है।' 

    तो क्या इस समय मेरे भीतर पल-पल बड़ी हो रही रचना स्वयं के परमात्मा होने का दावा कर रही है? बबीता फिर अपने आप से सवाल पूछती है। यदि वह इस समय परमात्मा होने का दावा कर रही है तो फिर संसार में आते ही वह स्वयं को भूल क्यों जाती है? कोअ्हम्-कोअ्हम् क्यों कहने लगती है? वह रोने क्यों लगती है? बबीता को नहीं लगता कि वह अदृश्य मासूम रचना जिस भी अवस्था में उसके गर्भ में है, वह कुछ भी सोच सकने की स्थिति में है। वह तो एक निश्चेष्ट और निष्क्रिय स्थिति है। कोई भी प्राणी अचेत अवस्था में कैसे सोच सकता है? जब वह सोच ही नहीं सकता तो उसे कष्ट कैसे हो सकता है?

    अगले ही क्षण बबीता का ध्यान उचट कर दूसरी ओर चला जाता है। क्या कोई भी विचार शून्य रचना वृद्धि कर सकती है? यदि गर्भस्थ शिशु विचार शून्य होता है तो वह गर्भ से बाहर आते ही रोने क्यों लगता है? वह केवल कष्ट से भरा हुआ विचार ही हो सकता है जो नवजात शिशु को रोने के लिये प्रेरित करता है। विचार शून्य रचना रो नहीं सकती। इसका अर्थ यह हुआ कि गर्भस्थ शिशु कष्ट पूर्ण विचारों से परिपूर्ण है। उसे भूख लगती है, तभी तो वह माँ के गर्भ में रहकर नाल से आहार खींच लेता है और गर्भ से बाहर आकर दूध पीने लगता है। विचार शून्य रचना को भूख की अनुभूति नहीं होती।

    यदि गर्भस्थ रचना विचारों और अनुभूतियों से परिपूर्ण है तो इसका अर्थ यह हुआ कि उसे अंधेरी बंद कोठरी में कष्टों की अनुभूति होती ही होगी। लम्बे समय तक आँखें बंद करके चौबीसों घण्टे तरल आवरण में उसे घुटन का अहसास होता ही होगा। यदि प्राणी के बारबार जन्म लेने की बात सही है तो उसे यह बात भी अच्छी तरह स्मरण रहती होगी कि वह खुले आकाश में साँस लेने वाला प्राणी है। वह माता के गर्भ में बनी पानी की थैली में कैसे बंद रह पाता होगा? उसका दम तो घुटता ही होगा।

    नहीं-नहीं। एक बार फिर वह स्वयं से असहमत हो जाती है। क्या किसी भी आदमी को माँ के गर्भ में रहने के काल की कोई भी स्मृति होती है? इसका अर्थ यह है कि माँ के गर्भ के भीतर शिशु अपने आस-आस पास हो रही घटनाओं से अनजान होता है। उस समय की कोई स्मृति किसी भी आदमी को नहीं होती।

    लोग पूर्व जन्म के समय की स्मृतियों और घटनाओं की बात करते तो देखे गये हैं किंतु माता के गर्भ में निवास करने के समय की किसी घटना या स्मृति का उल्लेख करते हुए नहीं देखे गये हैं। इसलिये पानी के आवरण में रहने के दौरान शिशु को दम घुटने की अनुभूति बिल्कुल नहीं होती होगी।

    मछलियाँ भी तो पानी में रहती हैं। क्या उनका दम पानी में घुट जाता है? वे तो पूरा जीवन ही पानी में निकाल देती हैं। बबीता इस विचार पर भी स्थिर नहीं रह पाती। वह स्वयं से ही प्रश्न करती है और स्वयं से ही उनके उत्तर भी चाहती है। वह जानती है कि मछलियों का दम पानी के भीतर नहीं घुटता, वे तो बनी ही पानी के भीतर रहने के लिये हैं। यदि उन्हें पानी से बाहर निकाला जायेगा तो उन्हें कष्ट होगा। किंतु गर्भस्थ शिशु तो पानी के भीतर रहने के लिये नहीं बना है, उसे अवश्य नौ मास तक पानी की थैली के भीतर रहने में कष्ट होता होगा।

    एक बार फिर बबीता  के विचारों को झटका लगता है। वह अपने आप से नया प्रश्न करती है, मछलियों का ही उदाहरण क्यों? सृष्टि में मेंढक, सर्प और मगरमच्छ भी तो हैं जो पानी के भीतर और बाहर, दोनों ही स्थितियों में आनंद पूर्वक रह सकते हैं। आदमी भी उन्हीं की तरह का प्राणी हो सकता है जो नौ माह तक पानी की थैली में और उसके बाद हवा में बड़े मजे से रह सकता है। अचानक उसके विचारों का क्रम टूटता है। मुनिया उसे झिंझोड़ रही है।

    ‘मम्मी पापा आ गये।’ ‘

    अरे तेरे पापा आ भी गये। मैंने तो अभी खाना बनाना शुरु ही नहीं किया।’ विचारों को एक तरफ झटककर बबीता शीघ्रता से रसोई में घुस जाती है। सूर्य देवता अपनी प्रकाश शलाकाओं को समेट कर अपने घर चले गये हैं और बाहर काफी अंधेरा हो गया है। बिल्कुल बंद अंधेरी कोठरी जैसा जिसमें पूरी दुनिया सोअ्हम-सोअ्हम के स्थान पर कोअ्हम-कोअ्हम कह रही है।


    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • साहित्य का सामर्थ्य एवं राष्ट्रवाद

     07.09.2018
    साहित्य का सामर्थ्य एवं राष्ट्रवाद

    साहित्य का सामर्थ्य एवं राष्ट्रवाद


    साहित्य का सामर्थ्य एवं राष्ट्रवाद दो भिन्न बातें हैं किंतु एक बिंदु है जहाँ दोनों आकर मिलते हैं, इस बिंदु पर इनका सम्मिलन औपचारिकता मात्र नहीं रहता अपितु एक-दूसरे के अन्योन्याश्रित होकर एक-दूसरे का पूरक हो जाता है। यदि साहित्य संस्कृति और समाज को संस्कारित करता है तो साहित्य राष्ट्रवाद के लिए खाद-पानी भी प्रदान करता है।

    ‘‘दिपै वारां देस जारां साहित जगमगै’’ जैसी उक्ति इस बात को पुष्ट करती है कि साहित्य और राष्ट्र में कितना गहरा सम्बन्ध है। आप समाज को खराब साहित्य दीजिए और एक खराब राष्ट्र का निर्माण कर लीजिए। आप समाज को अच्छा साहित्य दीजिए और अच्छे राष्ट्र का निर्माण कर लीजिए।

    इस बात को थोड़ा विस्तार देना आवश्यक है।

    किसी भी राष्ट्र के तीन शरीर होते हैं- भौगोलिक शरीर, राजनीतिक शरीर एवं सांस्कृतिक शरीर। ये तीनों ही शरीर एक दूसरे में समाए हुए होते हैं। इनमें से एक के क्षीण, नष्ट अथवा पुष्ट होने पर दूसरा एवं तीसरा शरीर स्वतः क्षीण, नष्ट अथवा पुष्ट हो जाता है।

    राष्ट्र का निर्माण कौन करता है ?

    आप कहेंगे- प्रकृति। प्रकृति राष्ट्र के केवल भौगोलिक शरीर का निर्माण करती है। नदियां, पहाड़, समुद्र और झीलों ने विश्व के बहुत से देशों की सीमाएं बनाई हैं किंतु ये सीमाएं शाश्वत नहीं हैं। कल हिन्दूकुश पर्वत भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा का निर्माण करता था किंतु आज रैडक्लिफ रेखा भारत और पाकिस्तान की सीमा का निर्माण करती है। 

    तो क्या राष्ट्र का निर्माण राजा या सेना करते हैं ?

    निश्चित रूप से करते हैं किंतु वे केवल राष्ट्र के राजनीतिक शरीर का निर्माण करते हैं। राजा या सेना के हारते ही राष्ट्र की भौगोलिक सीमाएं बदल जाती हैं तथा राजनीतिक व्यवस्थाएं भी ध्वस्त हो जाती हैं।

    तो फिर अखण्ड, अक्षय एवं शाश्वत राष्ट्र का निर्माण कौन करता है?

    निःसंदेह किसी भी राष्ट्र के अखण्ड, अक्षय एवं शाश्वत शरीर का निर्माण, उस देश की संस्कृति करती है। आइए इसे इस बात को समझने की चेष्टा करते हैं- मनुष्य के तीन शरीर होते हैं- स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर। स्थूल शरीर दिखाई देता है, सूक्ष्म शरीर अनुभव होता है किंतु कारण शरीर को तो अनुभव नहीं किया जा सकता केवल उसका चिंतन किया जा सकता है। आंखों से जो कपड़ा दिखाई देता है, वह केवल बाह्य स्वरूप है, कपड़ा तो वास्तव में धागे से बनता है। धागा भी केवल एक बीच की अवस्था या व्यवस्था है, वास्तविक इकाई तो वह रुई है जिससे धागा बाना है और जिससे अंत में कपड़ा बना है।

    ठीक इसी प्रकार राष्ट्र का बाह्य स्वरूप उसकी भौगोलिक देह है जिसे हम राष्ट्र कहते हैं- कश्मीर के कन्याकमारी तक की भौगोलिक देह। इस भौगोलिक देह को एक सूत्र अथवा एक व्यवस्था के अंतर्गत नियंत्रित करने वाली, उसे बांध कर रखने वाली देह हमारी राजनीतिक व्यवस्था है किंतु राजनीतिक व्यवस्था राष्ट्र नहीं है, यह राष्ट्र की स्थूल देह को निर्मित करने का माध्यम भर है। वास्तव में देश की संस्कृति ही उसकी राजनीतिक व्यवस्था का भी निर्माण करती है।

    कहने का अर्थ ये कि राष्ट्र को निर्मित करने वाला बारीक तत्व संस्कृति है। देश की भौगोलिक सीमाएं बदल जाएं, राजनीतिक व्यवस्थाएं बदल जाएं किंतु नागरिक अपनी संस्कृति को पकड़े रहें तो वह राष्ट्र अक्षुण्ण रहता है। यदि भौगोलिक सीमाएं और राजनीतिक व्यवस्थाएं न बदलें और राष्ट्र की संस्कृति को बदल दिया जाए तो राष्ट्र मर जाता है।

    अब हम अपने मूल विषय पर आते हैं।

    संस्कृति का निर्माण कौन करता है ?

    निःसंदेह मनुष्य करता है।

    संस्कृति का परिष्कार कौन करता है ?

    निःसंदेह साहित्य 
    करता है। 

    राष्ट्र का विचार या मंत्र कौन देता है ?

    निःसंदेह साहित्य करता है।

    यजुर्वेद की एक ऋचा में ‘राष्ट्र मे देहि’ और अथर्ववेद की एक ऋचा में ‘त्वा राष्ट्र भृत्याय’ जैसे शब्द प्रयुक्त हुए हैं जो राष्ट्र के मूल आधार अर्थात् ‘समाज’ के अर्थ में प्रयुक्त हुए हैं। समाज ही सभ्यता का विकास करता है, समाज ही संस्कृति को रचता है और समाज ही राष्ट्र का निर्माण करता है। समाज, सभ्यता एवं संस्कृति को सुरक्षित रखने की भावना ही राष्ट्रीय चेतना के रूप में प्रतिफलित होती है।

    यह भावना आती कहां से है ?

    यह भावना आती है साहित्य से। समाज अपनी भूमि से जुड़ा हुआ रहता है। यही कारण है कि राष्ट्र, एक राजा द्वारा शासित एक गांव के संकुचित अर्थ से लेकर भारत, चीन और अमरीका जैसे विराट देशों के लिए प्रयुक्त होता है।

    अथर्ववेद का सूक्तकार ‘माता भूमिः पुत्रो ऽहं पृथिव्याः’ कहकर राष्ट्रवाद का सूत्रपात करता है। यहां देखिए कि अथर्ववेद का सूक्तकार राष्ट्रवाद का बीज वपन कर रहा है। अथर्ववेद के पृथ्वी-सूक्त का प्रत्येक मंत्र राष्ट्र-भक्ति का पाठ पढ़ाता है। आधुनिक युग में भारत माता की कल्पना इसी पृथ्वी-सूक्त से आई है।

    राष्ट्र को कौन जगाता है 
    ?

    यजुर्वेद कहता है- वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः । यजुर्वेद राष्ट्र संरक्षण का दायित्व ब्राह्मणों पर ही डालता है। ये ब्राह्मण कौन हैं! ये ब्राह्मण और कोई नहीं, वेदों के मंत्र देने वाले, रामायण, महाभारत और गीता जैसे लोकोपकारी साहित्य रचने वाले, समाज को मार्ग दिखाने वाले हमारे और आपके जैसे साहित्यकार ही ब्राह्मण हैं। राष्ट्र को जागृत और जीवंत बनाने का भार इन्हीं साहित्यकार रूपी ब्राह्मणों पर है। आप किसी देश के साहित्य को बदल दीजिए, थोड़े ही समय में देश बदल जाएगा।

    साहित्य का सामर्थ्य कहां तक विस्तारित है 


    साहित्य के सामर्थ्य को समझने के लिए हमें मनुष्य जाति के विकास की कहानी पर थोड़ी दृष्टि डालनी चाहिए।

    क्या आप को मालूम है, धरती पर आदमी का पहला संस्करण कब आया ?

    देवताओं ने इस धरती को लगभग 18 लाख साल पहले, मानव का पहला संस्करण प्रदान किया। इसे होमो हैबिलिस कहते थे, वह बंदर से मिलता-जुलता था किंतु यह मानव पत्थर के औजार बनाकर उनसे शिकार करता था। देवताओं को विश्वास था कि यह मनुष्य उन्नति करेगा तथा एक संस्कृति का विकास करेगा किंतु 8 लाख साल तक भी वह अपनी उस अवस्था से एक इंच भी आगे नहीं बढ़ा।

    इसलिए देवताओं ने आज से 10 लाख साल पहले आदमी का दूसरा संस्करण तैयार किया जिसे होमो इरैक्टस कहते थे। यह दो पैरों पर सीधा खड़ा होकर चलता था। उसकी शेष चेष्टाएं पशुओं जैसी थीं। देवताओं को विश्वास था कि यह मनुष्य अवश्य उन्नति करेगा किंतु 5 लाख साल बीत जाने पर भी इस मनुष्य ने अपनी आदतों में कोई परिवर्तन नहीं किया।

    इसलिए देवताओं ने आज से 5 लाख साल पहले आदमी का तीसरा संस्करण तैयार किया जिसे होमो सेपियन कहते थे। इसका मस्तिष्क, धरती पर निवास करने वाले समस्त प्राणियों से बहुत तेज बनाया गया। यह शब्दों का निर्माण करके उन्हें बोल भी सकता था। अर्थात् भाषा का निर्माण कर सकता था। देवताओं को इस मानव से बहुत आशाएं थीं कि शायद तेज दिमाग वाला और बोलकर अपनी बात कह सकने वाला यह मानव, अपनी सभ्यता और संस्कृति का विकास करेगा किंतु चार लाख साल बीतने पर भी यह मनुष्य अपनी अवस्था से आगे नहीं बढ़ सका।

    देवताओं ने आज से सवा लाख साल पहले मनुष्य का चौथा संस्करण तैयार किया जिसे होमो सैपियन-सैपियन कहते थे। जब इस आदमी ने भी सभ्यता और संस्कृति का विकास नहीं किया तो आज से लगभग 40 हजार वर्ष पहले आदमी का अब तक का अंतिम प्रारूप आया। इसे क्रो-मैगनन मैन कहा जाता है। जो कि आप और हम हैं।

    इस संस्करण के मनुष्य अधिक अच्छे हथियार बना सकते थे। वे कपड़ों को सिलकर पहनते थे। उनके आश्रय स्थल अच्छे थे और उनके चूल्हे भोजन पकाने में अधिक उपयोगी थे। मनुष्य का यह संस्करण बहुत उन्नत था। देवताओं को इस संस्करण से बहुत आशाएं थीं किंतु देवताओं को इस मनुष्य ने भी पहले के सभी मनुष्यों की तरह निराश किया और यह मनुष्य भी धरती के दूसरे पशुओं की तरह जीवन जीता रहा।

    देवताओं ने विचार किया कि क्या किया जाना चाहिए! उन्हें एक उपाय सूझा। उन्होंने आज से लगभग साढ़े तीन हजार साल पहले मनुष्य को तीन पुस्तकें प्रदान कीं जिन्हें ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद कहा जाता था। देवताओं ने ये पुस्तकें मनुष्यों को बोलकर सुनाईं तथा मनुष्य से कहा कि वह इन पुस्तकों को याद कर ले। मनुष्य ने वैसा ही किया। इस बार वह चमत्कार हो गया जिसकी प्रतीक्षा देवतागण पिछले 18 लाख साल से कर रहे थे।

    मनुष्य ने अपने मस्तिष्क, विचार और भाषा के साथ-साथ मन और इच्छा का विस्तार करना आरम्भ किया। उसने देवताओं को अथर्ववेद बनाकर सुनाया जिसमें मनुष्य ने देवताओं से प्रार्थना की कि आप हमें अच्छे घोड़े, अच्छे हल, अच्छी गाएं, अच्छे बीज, अच्छे मंत्र, अच्छी औषधियां दीजिए। हमारे शत्रुओं का नाश कीजिए।

    कहने का अर्थ यह कि देवगण 18 लाख सालों तक मनुष्य के संस्करण परिष्कृत करते रहे किंतु वे बुद्धि से परिपूर्ण मनुष्य का निर्माण नहीं कर पाए किंतु जैसे ही उन्होंने मनुष्य को वेदों का ज्ञान दिया अर्थात् साहित्य प्रदान किया तो चमत्कार को घटित होने में समय नहीं लगा। आज आप धरती पर जो भौतिक उन्नति, वैज्ञानिक उन्नति और आध्यात्मिक उन्नति देख रहे हैं, यह मनुष्य ने पिछले लगभग साढ़े तीन हजार वर्षों में अर्जित की है।

    अब साहित्य के सामर्थ्य पर दो उदाहरण आज के उन्नत युग से देखते हैं।

    एक जर्मन लेखक हुआ है कार्लमार्क्स। हम सबने उसका नाम सुना है। ई.1867 में उसकी एक पुस्तक प्रकाशित हुई- ‘दास कैपिटल’। यह पुस्तक यह कहती थी कि दुनिया में तो तरह के लोग हैं। पहले वे जो ताकतवर हैं और दुनिया का शोषण करते हैं, दूसरे वे जो कमजोर हैं और शोषित होते हैं। यदि शोषित लोग संगठित हो जाएं तो वे शोषण से मुक्ति पा सकते हैं। इस पुस्तक ने विश्व भर के राष्ट्रों में बेचैनी उत्पन्न की। बहुत से देशों में मजदूरों, किसानों और वंचतों ने संगठित होकर शासन व्यवस्था के विरुद्ध क्रांतियां कीं तथा लगभग आधी दुनिया से सत्ता के तख्ते पलट गए। 1917 में रूस तथा 1947 में चीन भी कम्युनिस्टों के हत्थे चढ़ गए।

    यहां के लोगों ने अपने पुराने शासकों को मार डाला और कम्यूनिस्ट सरकारें बना लीं। लोगों ने क्रांतियां तो कर दीं किंतु उनका परिणाम यह हुआ कि नए विचारों वाले शासक, पुराने शासकों से भी अधिक शोषण करने वाले सिद्ध हुए। मानवता इस भयानक शोषण से सिसक उठी।

    ई.1903 के आसपास भारत के बिहार प्रांत में एक अंग्रेज अधिकारी काम करता था। उसका एक पुत्र था- जॉर्ज ऑरवेल जो अंग्रेजी भाषा में उपन्यास लिखा करता था। उसने एनिमल फार्म नामक एक उपन्यास लिखा। यह उपन्यास 1945 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में 1917 की रूसी क्रांति पर एक करारा व्यंग्य किया गया।

    इस उपन्यास में रूपक खड़ा किया गया कि नेपोलियन और स्नोबॉल नामक दो सूअर, मेजर नामक एक महान सूअर के विचारों से प्रेरित होकर अपने फार्म के मालिक मिस्टर जोंस के विरुद्ध क्रांति करके उसे फार्म से खदेड़कर भगा देते हैं। इस उपन्यास के क्रांतिकारी सूअर वास्तव में रूसी क्रांति के नाक स्टालिन और ट्रोटस्की के प्रतीक थे। उपन्यासकार लिखता है किस प्रकार नेपोलियन और स्नोबॉल नामक चालाक और धूर्त सूअरों ने खेत की सत्ता हथिया ली और फार्म पर रहने वाले पशु-पक्षियों का जमकर शोषण किया। यह शोषण उनके पुराने मालिक अर्थात् आदमी द्वारा किए जाने वाले शोषण से अधिक भयानक था। वे गायों का दूध पी जाते हैं, मुर्गियों और बत्तखों के अण्डे खा जाते हैं। खेत में काम नहीं करते तथा घोड़ों को पहले की अपेक्षा अधिक घण्टों तक काम करने के लिए मजबूर करते हैं।

    जब यह उपन्यास इंग्लैण्ड से बाहर निकलकर दुनिया के अन्य देशों की जनता के हाथों में पहुंचा तो जनता ने पाया कि कम्युनिस्ट शासकों ने हमारा भी वैसा ही हाल किया है जैसा कि नेपोलियन और स्नोबॉल नामक सूअर, एनीमल फार्म के जानवरों का कर रहे थे।

    इस पुस्तक को पढ़कर दुनिया के बहुत से कम्यूनिस्ट देशों के नागरिकों के सिर से कम्यूनिज्म का भूत उतर गया। इन देशों में फिर से क्रांतियां हुईं और कम्यूनिस्ट सरकारों को उखाड़ फैंका गया। यहां तक कि स्वयं रूस ही बिखर गया। पूरी दुनिया से कम्यूनिज्म की शवयात्रा निकल गई। केवल चीन और इक्का-दुक्का कोई छोटा सा देश बचा है जहां कम्यूनिस्ट सरकारें हैं और वे आज भी अपने नागरिकों को गुलाम जैसी स्थति में रखती हैं।

    हमने राष्ट्र पर बात की, संस्कृति पर बात की, साहित्य की बात की अब थोड़ा विचार राष्ट्रवाद पर करते हैं।

    भारतीय ऋषि प्रार्थना करता है- विश्वानि देव सवितरदुरितानि परा सुवः, यद्भद्रम तन्नासुवः। अर्थात् वह विश्व भर के देवताओं से प्रार्थना कर रहा है कि मेरे भीतर जो भी बुराई है उसे दूर कीजिए और जो कुछ भी अच्छा है, वह मेरे पास लाइए।

    तो क्या यह ऐसी बात हुई कि हम प्रार्थना तो करेंगे विश्व भर में कहीं भी निवास करने वाले देवताओं की और गीत गाएंगे अपने राष्ट्र के। इस वैदिक मंत्र के परिप्रेक्ष्य में राष्ट्र निश्चित रूप से एक संकुचित विचार है।

    एक राष्ट्र, दूसरे राष्ट्र से अलग है, प्रत्येक राष्ट्र के नागरिकों कोे अपने राष्ट्र पर गर्व है। गर्व की यह भावना मनुष्य की सोच को विस्तार नहीं देती, संकुचित करती है। यहां तक कि एक राष्ट्र, दूसरे राष्ट्र पर आक्रमण करके वहां की जनता को आक्रांत करे। राष्ट्रवाद के नाम पर यूरोप में सैंकड़ों वर्षों तक यही हुआ।

    आचार्य चतुरसेन ने राष्ट्रवाद के बारे में लिखा है कि राष्ट्रवाद का दैत्य यूरोप में पैदा हुआ। तो क्या राष्ट्रवाद की भावना एक नकारात्मक एवं विध्वंसात्मक बात है
    ? 

    प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध इस बात के गवाह हैं कि उपनिवेशवादी शक्तियों ने जनता में राष्ट्रवाद की भावनाएं भड़का कर धरती पर निवास करने वाले करोड़ों लोगों को मौत की नींद सुला दिया। प्रथम विश्वयुद्ध में लगभग 2 करोड़ लोग मरे और 2 करोड़ से अधिक लोग घायल हुए। द्वितीय विश्व युद्ध में 5 से 8 करोड़ लोग मरे। 50 लाख मनुष्य तो युद्धबंदियों के रूप में मृत्यु को प्राप्त हुए। घायलों की संख्या अलग है।

    यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यदि राष्ट्रवाद की भावना, मानव जाति के लिए इतनी भयानक चीज है तो फिर राष्ट्रवाद क्यों ?

    वस्तुतः इस प्रश्न का जवाब कहीं से आ सकता है तो केवल साहित्य की दुनिया से। संस्कृत के एक कवि ने लंका को जीतने वाले राजा रामचंद्र के मुख से यह कहलवाया है- ‘स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते, जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ इस श्लोक के माध्यम से साहित्यकार राष्ट्रवाद की भावना को मर्यादा में बांधता है। जैसे ही मनुष्य में इस भावना का उदय होता है, राष्ट्रवाद की भयावहता समाप्त हो जाती है और राष्ट्रवाद की अच्छाई के दर्शन होने लगते हैं।

    जब हम वन्दे मातरम् कहते हैं तो उसका आशय भारत माता से तो होता ही है, वस्तुतः समस्त धरित्री से भी होता है। धरती हम सब की मां है, उसे देशों में हमने बांटा है, परमात्मा ने तो उसे एक इकाई के रूप में बनाया है। धरती के विभिन्न देशों में इसलिए बंटी क्योंकि विभिन्न स्थानों के मनुष्यों द्वारा सर्वे भवंतु सुखिनः जैसे साहित्य को त्यागकर, विकृत साहित्यों का निर्माण किया, जिससे पहले तो लोगों के मन अलग हुए और बाद में देश। बहुत प्राचीन काल में जब धरती पर केवल वैदिक धर्म ही व्याप्त था, दूसरी संस्कृतियां अस्तित्व में नहीं आई थीं, तब पूरी धरती एक देश ही थी।

    साहित्य का काम संस्कृतियों के इस वैमनस्य को दूर करने का है। यही साहित्य का वास्तविक सामर्थ्य है। जब कबीरदास यह कहते हैं कि- साईं इतना दीजियो जामै कुटुम समाय, मैं भी भूखा ना रहूं साधु न भूखा जाय। तो वे वस्तुतः संतोषी, सुखी और शांत राष्ट्र का निर्माण कर रहे होते हैं। यह साहित्य का ही सामृथ्य है कि वह मनुष्य को केवल इस बात के लिए तैयार करे कि वह परमात्मा से अपने परिवार और अतिथि का पेट भर जाने योग्य अन्न मांगने में ही संतोष का अनुभव करता है।

    मानव जब किन्हीं अन्य भूमियों पर विकसित राजनीतिक शक्तियों के अधीन हो जाता है तो वह अपनी जन्मभूमि से अपने सम्बन्ध का स्मरण करता है। इसी बिंदु पर राष्ट्रवाद का साहित्य जन्म लेता है। संसार की प्रत्येक भाषा के काव्य में, हर युग में राष्ट्रीय भावना का समावेश होता है। किसी भी देश के राष्ट्रीय काव्य में समग्र राष्ट्र की चेतना प्रस्फुटित होती है।

    अच्छे साहित्य से रची गई राष्ट्रीय-भावना ही राष्ट्र की प्रगति का मंत्र है। राष्ट्रीय भावना का सृजनात्मक पक्ष मानवता वादी होता है। वह न केवल अपने देश को स्वतंत्र देखना चाहता है अपितु समस्त मानवता को स्वाधीन एवं सुखी देखने की कामना रखता है।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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  • घर चलो माँ! (हिन्दी कहानी)

     20.05.2018
     घर चलो माँ! (हिन्दी कहानी)

     घर चलो माँ!

    बबलू बेचैन है। क्या कहे माँ से! कुछ बोलने की हिम्मत ही नहीं होती। वह कनखियों से माँ की ओर देखता है, माँ का चेहरा पूरी तहर निर्विकार है। बबलू को इस चेहरे को पढ़ने का अभ्यास तब से है जब वह बोल भी नहीं पाता था। तब वह केवल रो कर माँ को बता देता था कि वह क्या चाहता है! थोड़ा सा रोने के बाद बबलू चुप हो जाता था और माँ का चेहरा देखकर आश्वस्त होने का प्रयास करता था कि माँ ने उसकी आवश्यकता को ठीक से समझ लिया है या नहीं। माँ हर बार ठीक से जान जाती थी कि इस बार बबलू दूध के लिये रोया है, या उसने लंगोटी गीली कर ली है, या उसे गर्मी लग रही है। उन दिनों से लेकर इन दिनों तक उसकी हर मांग माँ ही पूरी करती आई है। आज वही माँ बबलू को माँ के अपने बनाये मकान में छोड़कर भावशून्य चेहरा लिये किराये के मकान में रहने चली आई है।

    माँ का भावशून्य चेहरा देखकर बबलू भीतर ही भीतर काँप जाता है। उसे लगता है कि वह एक ऐसी इमारत के सामने खड़ा है जिसमें प्रवेश करने के सारे दरवाजे पूरी मजबूती के साथ भीतर से बंद कर लिये गये हैं। बाहर से कितनी भी आवाज दो, भीतर न तो आवाज पहुँचने वाली है और न अनायास ही दरवाजा खुलने वाला है। कौन जाने दरवाजा खोलने के लिये इमारत के भीतर कोई है भी कि नहीं!

    बबलू फिर से कनखियों से माँ की ओर देखता है। माँ मौन है। पिछले कई सालों से उसकी आँखों में हर पल दिखाई देने वाली कठिनाई, खीझ, गुस्सा और असमंजस का भाव आज नहीं है। माँ की आँखों में पल-पल दिखाई देने वाले भाव बबलू के लिये खिड़की का कार्य करते थे जिनके माध्यम से वह माँ के भीतर पहुँच जाया करता था और नाराज माँ को किसी तरह मना लिया करता था किंतु आज सारी खिड़कियाँ बंद हैं। माँ का चेहरा कपूर की तरह सफेद, बर्फ की तरह ठण्डा और सर्दियों में ठहरे हुए झील के पानी की तरह शांत है। छोटे से घर में पसरा हुआ मौन बबलू को काटता हुआ सा प्रतीत होता है। माँ कभी इतनी तंग गली के इतने छोटे मकान में नहीं रही। कैसे माँ ने इस मकान में रहने का मन बनाया होगा! उसे आश्चर्य होता है।

    माँ का मोबाइल बजने से बबलू को राहत मिलती है। वह आया तो था माँ को मनाकर पुनः घर ले चलने के लिये किंतु माँ का नितांत ठण्डा स्वर और भावशून्य चेहरा देखकर उसकी हिम्मत ही नहीं हुई। माँ को मोबाइल में व्यस्त जानकर बबलू कमरे से बाहर आ गया है। यह कहना गलत है कि वह कमरे से बाहर आ गया है।

    वास्तविकता यह है कि एक कमरे के घर में कमरे से बाहर आने का अर्थ होता है घर से भी बाहर आ जाना। सड़क पर आकर बबलू गाड़ी स्टार्ट करता है। कहाँ जाये! ऑफिस या घर! ऑफिस में मन नहीं लगेगा और घर में विनीता के सवालों की झड़ी लग जायेगी। वे सवाल जिनकी वजह बबलू नहीं है, स्वयं विनीता है, या फिर पापा हैं किंतु विनीता उन सवालों के उत्तर बबलू से लेना चाहेगी। यह कैसी विडम्बना है, प्रायः वह उन सवालों से घिर जाता है जिनके उत्तर उसे स्वयं चाहिये। कल तक वह भी माँ पर खूब चीखता चिल्लाता था। उन्हीं सवालों के जवाब वह माँ से मांगता रहा था जिन सवालों के जवाब आज उसे पूरी दुनिया को देने पड़ेंगे।

    जिन सवालों ने आज माँ को घर से निकाल कर किराये के मकान में पहुंचा दिया है, जिन सवालों ने आज उसके और माँ के बीच में एक ऐसी मोटी दीवार चिन दी है जिसके आर-पार आवाज जाने की संभावना तक दिखाई नहीं देती, उन सवालों के जवाब कहाँ से लाये बबलू! उसे स्वयं अपनी स्थिति पर तरस आ जाता है। अगले ही क्षण उसे माँ का ध्यान आता है। निश्चय ही आज उसने माँ का जो चेहरा देखा है, वह चेहरा उसके हृदय की वास्तविक स्थिति का द्योतक नहीं है। भीतर ही भीतर वह अवश्य ही बहुत दुःखी है।

    जरा सी बात पिछले नौ सालों में बढ़कर यहाँ तक पहुँच गई थी। न तो पापा विनीता को सहन करने को तैयार हुए थे और न विनीता ने पापा की किसी बात को सुनने का प्रयास किया था। इस पूरे प्रकरण में बबलू की क्या गलती थी? और माँ? माँ की भी तो कोई गलती नहीं थी। उन्हें भी तो सजा मिल रही है। जब माँ औरत होकर इतना सहन कर सकती है तो फिर बबलू क्यों नहीं। क्यों वह अपने भीतर की पीड़ा को सहन नहीं कर पा रहा!

    उसे आज भी याद है कि अंतिम वर्ष में उसके पास कॉलेज की फीस भरने लायक रुपये नहीं थे, पापा सदैव की तरह अपने सुनहरे अतीत का गुणगान करते हुए किंकर्त्तव्य विमूढ़ की तरह घर में बैठे थे और बबलू रिश्तेदारों और परिचितों के यहाँ दो सौ रुपये के लिये याचक बना घूम रहा था, पूरे शहर में वह चक्करघिन्नी की तरह घूम गया था किंतु किसी उसे दो सौ रुपये नहीं दिये थे। हार थक कर बबलू घर की सीढ़ियों पर आ बैठा था। उसका दिल रोने को हो रहा था किंतु माँ को हॉस्पीटल गये काफी देर हो गई थी इसलिये मकान की सीढ़ियों पर बैठकर रोने से अधिक जरूरी माँ को ढूंढने के लिये हॉस्पीटल जाना हो गया था।

    आंसुओं को आँखों में ही रोककर वह सीढ़ियों से उतर कर घर से बाहर निकला ही था कि दरवाजे पर थकी हारी माँ दिखाई दी थी। माँ ने स्कूल फीस जमा कराने की पर्ची चुपचाप उसकी हथेली पर रख दी थी और स्वयं सीढ़ियों पर बैठकर हांफने सी लगी थीं। उन्होंने अपनी एक महीने की दवाईयाँ न खरीदकर उन रुपयों से उसकी फीस भरवा दी थी।

    उन दिनों बीमारी के कारण माँ को नौकरी पर जाना बंद किये हुए पूरा एक साल होने आया था और जो कुछ भी घर में पिछले दिनों का बचा हुआ था, वह माँ के इलाज पर शनैः शनैः चुक रहा था। यह तो ठीक था कि सरकारी नौकरी थी इसलिये वह छूटी नहीं, अन्यथा माँ के लिये आगे की नौकरी का रास्ता पूरी तरह बंद हो जाता।

    उपचार से माँ लगातार ठीक होती जा रही थी और यह आशा बंधती जा रही थी कि कुछ महीनों बाद वह फिर से नौकरी पर जाने लगेगी और घर फिर से पुराने ढर्रे पर चल पड़ेगा। माँ का सारा गहना भी उन्हीं दिनों बिका। बबलू और उससे भी चार साल छोटी बबीता ने उन दिनों क्या कुछ नहीं सहा! अच्छे कपड़ों में तो वे समझते ही नहीं थे किंतु साबुत निक्कर कमीज के लिये भी तरस गये थे वे। आखिर कुछ महीने और बीते, माँ नौकरी पर जाने लायक हो गई। जीवन धीरे-धीरे सामान्य होता चला गया था। बबलू ने भी अपनी पढ़ाई पूरी कर ली किंतु पढ़ाई पूरी करते-करते उसके मन में गरीबी और लाचारी ने ऐसी जिद भर दी कि अब वह कोई छोटी-मोटी नौकरी तलाशने के स्थान पर व्यापार में हाथ आजमाना चाहता था। वह कोई ऐसा व्यापार चाहता था जो उसे कुछ ही समय में करोड़पति बना दे ताकि फिर कभी गरीबी और बेचारगी मुड़कर इस घर को न देखें।

    उसने अपने लिये इम्पोर्ट एक्सपोर्ट का बिजनिस चुना। माँ ने सुना तो उनके पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई। इतना पैसा कहाँ से आयेगा! यह ऐसा बिजनिस था जिसे आरंभ करने के लिये कम से कम पाँच-सात लाख रुपये तो जेब में चाहिये ही। माँ ने बबलू को इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट का बिजनिस करने से लाख मना किया और कहा कि वह कोई नौकरी कर ले किंतु बबलू को तो एक ही धुन सवार थी - इम्पोर्ट एक्सपोर्ट का बिजनिस।

    बबलू को आज भी याद है कि उसने माँ से कुछ नहीं मांगा था किंतु जब उसे परेशान होते हुए कई दिन बीत गये थे तब एक दिन स्वयं माँ ने उसके हाथ में तीन लाख रुपये का चैक रख दिया था - 'ये ले! अपना बिजनिस शुरु कर।'

    बुरी तरह चौंका था बबलू - 'इतने रुपये कहाँ से आये?'

    - 'तुझे ज्यादा पूछताछ करने की जरूरत नहीं।' माँ ने हर बार की तरह उसे निरुत्तर कर दिया था।

    कई महीने बाद बबलू को पता चल पाया कि जिस मकान को बनाने में माँ ने अपनी आधी जिंदगी की कमाई झौंक दी थी, उसी को गिरवी रखकर माँ ने बैंक से यह पैसा लिया था। उसके बाद से तो जैसे एक नया सिलसिला चल पड़ा। इस बिजनिस की अपनी परेशानियाँ थीं जिन्हें सुलझा पाना बबलू के अकेले के बूते की बात ही नहीं थी लेकिन जब भी बबलू ने पीछे मुड़कर देखने की कोशिश की तो उसे माँ अपने ठीक पीछे खड़ी हुई मिली।

    कई बार उसका कन्साइनमैण्ट फेल हो जाता था। कई बार उसका माल कस्टम में रोक लिया जाता था। कई बार फॉरेन वाली पार्टी वायदा करके मुकर जाती थी। जब भी ऐसा होता था बबलू को तत्काल दो तीन लाख रुपयों की जरूरत होती थी और हर बार बबलू की जेब खाली होती थी। पता नहीं कैसे बबलू इतना बड़ा बिजनिस संभाल पाता था, उसे पैसों का हिसाब रखने को तो कोई होश ही नहीं था। वह तो केवल इतना जानता था कि जितना पैसा हो सब बिजनिस में लगा दो। पैसा कम पड़े तो माँ को बताओ। यह सही था कि बबलू को इस बिजनिस में अच्छा लाभ हो रहा था किंतु वह पूरी आय को बिजनिस में झौंकता जा रहा था जिससे बिजनिस का आकार और मुनाफा दोनों बढ़ रहे थे किंतु बबलू का हाथ सदैव तंग ही रहता था।

    बबलू को मुँह से बोलकर कुछ भी मांगना नहीं पड़ता था। माँ सब जानती थी, सब सहती थी और सब करती थी। रसोई का खर्च, बबलू के पापा का इलाज, अपनी दवाईयाँ, बबीता के विवाह का खर्च, बबलू के विदेश आने-जाने के टिकट, सारा प्रबंध माँ ही करती रही थी और बबलू बेतहाशा पैसा कमाता रहा था। इस बीच में बबीता अपने ससुराल चली गई थी किंतु घर में विनीता आ गई थी। बबलू को लगा था कि बहू के आ जाने के बाद माँ को कुछ आराम मिलेगा किंतु हुआ ठीक उलटा। पापा के और विनीता के गण पहले दिन से ही नहीं मिले। विनीता के आने से पहले पापा कभी इतने रूखे नहीं थे। यह ठीक है कि पापा ने जीवन भर कभी ढंग से कमाया नहीं किंतु वे स्वभाव के अच्छे ही थे। जाने ऐसी क्या बात थी कि विनीता को देखते ही उनके स्वभाव ने पलटी मार ली थी।

    सरल स्वभाव की विनीता, जाने क्यों पापा की इच्छानुसार काम नहीं कर पाती थी। पापा की एक न एक शिकायत बनी ही रहती - रोटियाँ कच्ची हैं। सब्जी बेस्वाद है। चाय को ढंग से उबाला नहीं। पापड़ ढंग से नहीं सेके। बरतन मांजने में इतनी आवाज करती है। धूप में पड़े-पड़े कपड़ों का रंग खराब हो रहा है। इसे कपड़े भीतर लाने का होश नहीं है। विनीता सिर झुका कर पापा के सब आरोपों और उलाहनों को चुपचाप सब सुनती। पापा के मन को अच्छा लगे, ऐसा कुछ करने का भरसक प्रयास करती किंतु पापा अपने अतीत की गौरव गाथाओं का गायन करते-करते विनीता के हर काम में दोष निकालते ही गये थी। जाने पापा विनीता से क्या चाहते थे?

    जब घर में नई पीढ़ी के बच्चे आ गये तो बबलू को लगा कि पापा अब बच्चों के साथ समय निकाल लिया करेंगे किंतु उनका पूरा ध्यान विनीता की ओर ही लगा रहा। कैसी फूहड़ है? कितना पैसा खर्च करती है? बच्चों के इतने महंगे कपड़े खरीद कर क्यों लाई? कपड़ों पर ढंग से इस्तरी तक नहीं कर सकती। कपड़ों में नील लगाने तक की तमीज नहीं। पूरी बनियान पर धब्बे लगा देती है। झाडू. बुहारने तक का शउर नहीं। बरतनों की आवाज करती है।

    माँ ने पापा को समझाने का लाख प्रयास किया कि वे विनीता से प्यार से बोलें किंतु पापा को माँ की कोई बात समझ में नहीं आई थी। बबलू ने स्वयं को पापा और विनीता के प्रकरण से कभी जोड़ा ही नहीं। माँ जाने और उसका काम जाने। माँ के रहते बबलू को घर के मामलों में बोलने की जरूरत ही नहीं थी लेकिन वह लगातार अनुभव करता रहा था कि पापा और विनीता के मामले में माँ बिल्कुल असफल सिद्ध होती जा रही थी।

    जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता जाता था, पापा की शिकायतों की सूची बढ़ती जाती थी। नित नई शिकायतों की मार से विनीता का धैर्य चुकता चला गया था। पहले तो वह पापा के सामने जाने से बचने लगी। बाद में वह उन्हें जानबूझ कर अनसुना करने लगी। पापा फिर भी नहीं माने तो वह जानबूझ कर चाय खराब बनाने लगी। जानबूझ कर कच्ची रोटियाँ पापा की थाली में परोसने लगी और पापा की बनियान पर जान बूझ कर नील के धब्बे लगाने लगी। पापा में कोई सुधार नहीं हुआ। वे विनीता में आते जा रहे परिवर्तन को भी लक्ष्य नहीं कर पाये।

    धीरे-धीरे विनीता पापा के सामने बोलने भी लगी थी। उन्हें तमक कर जवाब भी देने लगी थी लेकिन ऐसा वह तभी करती थी जब उसे यह पूरा विश्वास हो कि माँ या बबलू में से कोई देख नहीं रहा है। बहू के तीखे जवाबों को सुनकर पापा और भी बौखला जाते। उनका गुस्सा आसमान पर जा चढ़ता। वे जोर-जोर से चीखने चिल्लाने लगते और घर में बवण्डर जैसा ही आ जाता।

    कई बार बबलू ने और कई बार माँ ने भी विनीता को पापा से मुँहजोरी करते हुए सुन लिया था। अब स्थिति उस बिंदु तक जा पहुँची थी कि दोनों में किसी को नहीं समझाया जा सकता था। न तो बबलू को और न माँ को ऐसा आभास हो पाया था कि विनीत आजकल पापा को गुस्सा करने के लिये क्यों उकसाती है। बहुत दिनों बाद उन्हें मालूम हुआ था कि विनीता पापा को गुस्सा करने के लिये उकसा कर अपने मोबाइल को ऑन करके पापा की सारी चीखें और गुस्से में बकी गई गालियां वह अपने पीहर वालों से लेकर ससुराल पक्ष के रिश्तेदारों को सुनाती थी। इस प्रकार पापा गुस्से में आग बबूला होकर जो कुछ भी अनाप-शनाप बकते थे, उसे सब रिश्तेदारों ने अपने-अपने घर में बैठकर ही सुन लिया था और पापा सब रिश्तेदारों की दृष्टि में गिर गये थे।

    आखिर वह दिन भी आ ही गया था जिसके भय से बबलू और माँ दोनों ही भीतर ही भीतर आशंकित थे। पापा और विनीता, दोनों ने घोषणा कर दी थी कि इस घर में वे दोनों साथ नहीं रह सकते। दोनों में से किसी एक को घर छोड़कर जाना ही पड़ेगा। माँ एक ओर पापा से बंधी हुई थी तो दूसरी ओर बबलू से। बबलू भी एक ओर माँ से बंधा हुआ था तो दूसरी ओर विनीता से किंतु पापा और विनीता एक घर में रहने को तैयार नहीं थे। अतः स्वाभाविक ही था कि या तो माँ पापा को लेकर घर से चली जाती या फिर बबलू विनीता और बच्चों को लेकर घर छोड़ देता।

    आखिर इस बार भी बबलू को कुछ नहीं करना पड़ा था। माँ चुपचाप पापा को लेकर इस किराये के मकान में चली आई थीं और बबलू लाख चाह कर भी उनसे यह नहीं कह पाया था - घर चलो माँ।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • सेमल का पेड़ (हिन्दी कहानी)

     20.05.2018
     सेमल का पेड़ (हिन्दी कहानी)

    सेमल का पेड़ (हिन्दी कहानी) 

    कमल बाबू ने लोहे का गेट खोलकर घर में प्रवेश करते हुए देखा, सेमल का पेड़ आज भी कौने में प्रहरी की तरह खड़ा हुआ है, ठीक उसी तरह जिस तरह आज से चौबीस साल पहले कमल बाबू ने आखिरी बार उसे यहाँ खड़े हुए देखा था। प्रहरी शब्द कमल बाबू को दुविधा में डाल देता है। किसका प्रहरी है यह! घर का! या उसमें रहने वालों का! संभवतः दोनों का ही नहीं। वह तो समय का प्रहरी है। बीतने वाले एक-एक पल का प्रहरी। जब भी एक प्रहर बीतता है सेमल का वृक्ष आकाश रूपी चौड़े थाल पर अपनी टहनियों से आघात करता है। हवा का एक झौंका उद्वेलित होता है और उसी के साथ पूरा वृक्ष सम्पूर्ण शक्ति से झूमने लगता है मानो किसी हठी योगी के योगासन की एक मुद्रा पूरी हो गयी हो और अब दूसरी मुद्रा में जाने का समय हो गया हो।

    घर के किसी सदस्य को पता तक नहीं चलता कि समय बीत रहा है और बाहर खड़ा हुआ सेमल का पेड़ बीतते हुए हर पल की घोषणा कर रहा है। जाने क्यों सेमल का पेड़ घर के सदस्यों की अनवरत उदासीनता से अप्रभावित रहकर मौन योगी की तरह साधना में संलग्न है! वह अकेला ही समय की उस उदास गूंज को अनुभव करता है जिसने पिछले पिचहत्तर सालों में इस घर को इतना बदल दिया है कि घर का हर हिस्सा बदला हुआ दिखाई देने लगा है।

    समय की गति है भी तो कितनी मंथर! कभी लगता ही नहीं कि समय चल रहा है किंतु इस मंथर गति की मार कितनी तेज है! जिसके चलते सभी कुछ तेजी से बदल जाता है। लगता है मानो पलक झपकी और दृश्य गायब। प्रायः हर बदलाव की कसक भी सेमल के पेड़ को बरसों तक बनी रहती है किंतु बदलाव से बेपरवाह घर के सदस्य सेमल के पेड़ की इस कसक को अनुभव तक नहीं कर पाते।

    कमल बाबू को आज भी अच्छी तरह याद है कि सर्दियां आने से ठीक पहले कैसे पूरा पेड़ अपने पत्तों को त्याग कर नागा साधु का रूप धारण कर लेता। सुबह उठने पर पूरा लॉन पीले कत्थई पत्तों से भरा हुआ मिलता। नानी जब जिंदा थीं तो उनका दिन इन्हीं पत्तों को बुहारने से आरंभ होता था। कमल बाबू जब नानी को पेड़ के नीचे पत्ते बुहारते देखते तो वे स्वयं भी नानी का हाथ बंटाने लगते।

    जब तक तेज सर्दियां शुरू होतीं तब तक सारे पत्ते झर जाते और पूरा पेड़ लाल अंगारों जैसे दिखने वाले बड़े-बड़े फूलों से भर जाता। मानो किसी हठी नागा साधु ने वस्त्र त्यागकर गांजे की चिलम के अंगारों को पूरे दम से फूंका हो। कुछ दिन और बीतते तो अमिया जैसी छोटी-छोटी फलियां शाखाओं पर दिखने लगतीं। होली के आने तक फूल पूरी तरह बुझ गयी चिलम के अंगारों की तरह अदृश्य हो जाते और अप्रेल की हलकी गर्मी में रुई की फलियां पूरे वैभव के साथ शाखाओं पर बैठकर चहकने लगतीं।

    ठीक ये ही वो दिन होते थे जब छोटी नानी सेमल के पेड़ के आस पास दिखायी देने लगती थीं। तेज गर्मियों के साथ रुई की फलियां फटने को होतीं और उनमें से नागा साधु के चिलम की ठण्डी हो चुकी राख जैसी सफेद रुई बाहर झांकने लगती। अब तो छोटी नानी की उपस्थिति सेमल के पास और अधिक बढ़ जाती। बड़ी जल्दी उठकर लम्बे बांस की सहायता से वे रुई की फलियांे को नीचे गिरातीं और टोकरी में जमा कर लेतीं। इतने भर से उन्हें संतोष न होता। पूरी दुपहरी वे सेमल के पेड़ के नीचे थोड़ी-थोड़ी देर में चक्कर लगाती रहतीं ताकि तेज हवा के चलने से नीचे टपकी रुई की फलियों को टोकरी में डाला जा सके।

    छोटी नानी अर्थात् नानी की विधवा देवरानी का मानना था कि इस घर में उनका आधा हिस्सा था। छोटी नानी की दृष्टि में वैसे तो उनका हिस्सा आधे से अधिक बनता था क्योंकि वे अपनी इस जेठानी से भी पहले इस घर में आयी थीं और इस नाते जेठानी के अधिकार, जेठ की पत्नी के नहीं बल्कि उनके अपने पास होने चाहिये थे।

    सेमल का यह पेड़ गवाह है कि समय भी कितना क्रूर होता है। वह आदमी के साथ कैसी निर्ममता से व्यवहार करता है। कमल बाबू की मां के बाबा अर्थात् सुखानंद ने इस पेड़ को एक नन्हे से पौधे के रूप में यहां लाकर लगाया था। उस दिन से वह इस घर में घटने वाली हर घटना का मूक साक्षी हो गया था। सुखानंद वास्तव में सुखानंद थे। उनके चारों ओर हर समय आनंद बरसा करता था। लगता था दुःख तो जैसे सदासुखी सुखानंद के निकट नहीं फटक सकता था।

    कहते हैं कि समय को आँख बदलते समय नहीं लगता। समय ने सुखानंद के साथ भी क्रूर खेल खेला। उनके दो पुत्रों में से बड़े पुत्र की पत्नी दो बच्चों को जन्म देकर काल के गाल में समा गयी तो छोटा पुत्र भी दो बच्चों के जन्म के बाद परमात्मा को प्राप्त हुआ। सुखानंद ने समय के इस क्रूर दण्ड को बड़े धैर्य से अपने सीने पर झेला था। किसी तरह भाग दौड़ करके बड़े बेटे का तो उन्होंने दूसरा विवाह करवा दिया किंतु आर्य समाजी विचारों का होने के बावजूद अपनी छोटी बहू के लिये वे कुछ प्रबंध नहीं कर सके। उसे पूरा जीवन इसी घर में विधवा औरत के रूप में व्यतीत करना था।

    'छोटी बहू' अर्थात् दुनिया भर की कर्कशा, कुरूपा, निरक्षरा, हठी और दो बच्चों की विधवा मां का संसार में किसी चीज से कोई साम्य नहीं था। पता नहीं पूर्व जन्मों के किन संस्कारों के कारण वह इस घर की बहू बनकर आ गयी थी और भाग्य की किस विडम्बना के कारण वैधव्य ने असमय ही उसका वरण कर लिया था! सुखानंद ने अपने जीवन भर की कमाई झौंककर अपने दोनों लड़कों के लिये दो भव्य मकान बनवाये थे किंतु जब छोटे पुत्र की असमय मृत्यु हो गयी तो उन्होंने छोटी बहू को भी उसी मकान में रहने के लिये बुला लिया था जिसमें वे अपने बड़े पुत्र के साथ रहते थे। समय पाकर सुखानंद तो दुनिया से चले गये किंतु छोटी बहू अपने दोनों बच्चों के साथ जेठ के ही मकान में रहती रही। वही छोटी बहू कमल बाबू की पीढ़ी के बच्चों के लिये छोटी दादी और छोटी नानी के रूप में जानी जाती थी।

    चूंकि सेमल का पेड़ सुखानंद ने लगाया था इस नाते सेमल के पेड़ पर भी नानी की विधवा देवरानी अर्थात् छोटी नानी का आधे का अधिकार था। इसी अधिकार से छोटी नानी पूरी गर्मियों में रूई इकट्ठी करतीं और आधी रुई साधिकार अपने पास रखकर, आधी रुई बड़ी नानी को दे देतीं। सहज संतोषी नानी उस रुई से तकिये भरतीं और गर्मी में आने वाली बहन बेटियों के लिये तकिये भर कर उन्हें भेंट कर देतीं। जब नानी किसी बहन बेटी को सेमल की रुई का नरम मुलायम तकिया भेंट करतीं तो उनकी आंखों में एक विशेष प्रकार की चमक होती। उनका संतोषी मन इस घर की बहन बेटियों को साड़ियां, स्वेटर, लड्डू, मठरियां और अचार के डिब्बे देने में जितने आनंद का अनुभव करता था उससे अधिक आनंद उन्हें सेमल के तकिये देते समय होता था।

    नानी इसे छोटी नानी का बड़प्पन मानती थीं कि उनकी कर्कशा, कुरूपा और मुंहफट देवरानी ने सेमल की रुई पर आधे का ही अधिकार मान रखा था अन्यथा घर के पिछवाड़े में छोटी नानी ने जो करौंदे, अमरूद और केले के पेड़ लगाये थे, उन पर छोटी नानी का ही स्वघोषित एकछत्र अधिकार था। इस नाते करौंदों को तोड़कर उनकी सॉस बनाने का अधिकार भी केवल छोटी नानी को था। यह अलग बात थी कि वे उस सॉस को अपनी जेठानी की बेटियों को उदारता पूर्वक भेंट किया करती थीं क्योंकि गर्मियों में पीहर आने वाली उनकी अपनी कोई बेटी नहीं थी। छोटी नानी के जीवन में केवल एक यही उदारता देखी थी कमल बाबू ने।

    उन दिनों घर कितनी चहल पहल से भरा हुआ रहता था। सारी बहन-बेटियां बच्चों को लेकर अपने पीहर आ जाती थीं। कमल बाबू भी उन्हीं दिनों अपनी मां के साथ ननिहाल आया करते थे। टिक्का मौसी अर्थात बड़ी मौसी, झब्बा मौसी अर्थात् मंझली मौसी और संतरा मौसी अर्थात् छोटी मौसी, उन सबके बच्चे, फिर मामाओं के बच्चे, पूरे घर में धमाल रहती। नानी दोपहरी में जलेबी और समोसे मंगवातीं तो पूरा घर बच्चों के झगड़े से गूंज उठता। शोर घर से बाहर निकल कर सेमल के पेड़ तक जा पहुंचता। नानी बड़ी तसल्ली से उनके झगड़े सुलझातीं। वे हर बच्चे की शिकायत को धैर्य पूर्वक सुनतीं और उसे तब तक मिठाई देती रहतीं जब तक कि वह बच्चा संतुष्ट नहीं हो जाता किंतु छोटी नानी इन झगड़ों में अम्पायर की भूमिका निभातीं। कभी इस बच्चे को लाल कार्ड दिखाकर मैदान से बाहर किया तो कभी उस बच्चे पर पैनल्टी ठोकी। बच्चे भी जलेबी देने वाली नानी के स्थान पर अम्पायर की भूमिका निभाने वाली छोटी नानी का रौब अधिक मानते।

    टिक्का मौसी, झब्बा मौसी और संतरा मौसी भी जलेबी और समोसों के लिये होने वाले इन झगड़ों में बराबर की भागीदारी निभातीं। सबसे छोटे दोनों मामा अर्थात् किन्नू मामा और गब्बू मामा भी इन झगड़ों में पूरा कौशल दिखाते किंतु कमल बाबू की माँ जिन्हें दूसरी मौसियों के बच्चे गुल्ला मौसी कहते थे, घर की सबसे बड़ी सदस्य होने के कारण इस झगड़े से दूर खड़ी रहकर तमाशा देखतीं। संभवतः कमल को भी जलेबियों के लिये झगड़ने की बजाय शांत खड़े रहकर तमाशा देखने की प्रेरणा उन्हीं से मिली थी।

    क्यों रे कमल, तू कभी जलेबी के लिये झगड़ा नहीं करता। तू दूसरे बच्चों से अलग है क्या! छोटी नानी, दूसरे बच्चों से अलग खड़े कमल को उलाहना देतीं। देख तो यह निरमल लड़-झगड़ कर अपनी नानी से कितनी सारी जलेबी ले गया! जवाब में कमल बाबू मुस्कुराते भर। छोटी नानी को इस बात पर बड़ी नाराजगी थी कि छोटे से कमल ने कभी उनसे दूसरे बच्चों की शिकायत नहीं की और न ही अपने लिये अधिक मिठाई की मांग रखी।

    कमल बाबू का ध्यान अपने लिये अधिक मिठाई झपटने में नहीं बल्कि अपनी ही उम्र के दूसरे बच्चों द्वारा अधिक मिठाई पाने के लिये अपनाई गयी तरकीबों को देखने में अधिक रहता था। उन्हें आश्चर्य होता कि सबसे छोटा नीटू कैसे दूसरे बच्चों की बजाय हर बार नानी को चकमा देकर दो बार जलेबी पाने में सफल हो जाता था और कैसे फिर छोटी नानी उसकी चोरी पकड़ कर उससे जलेबियां छीनने के लिये उसके पीछे दौड़ती थी ताकि दूसरे बच्चों की शिकायत दूर की जा सके।

    गर्मियां आतीं और चली जातीं। उनके साथ ही खत्म हो जातीं गर्मियों की छुट्टियां। सारी बहन-बेटियां भी एक-एक करके घर से विदा लेतीं। हर बहन-बेटी के सामान में लड्डू, मठरी और अचार के साथ-साथ सेमल का एक तकिया अवश्य बढ़ जाता था।

    उधर सेमल का पेड़ प्रहर पर प्रहर बदलने की सूचना देता रहा और इधर नानी के बालों की सफेदी और चेहरे की झुर्रियां बढ़ती रहीं। धीरे-धीरे मौसियों के बाल भी पकने लगे थे। कुछ मौसियां तो हर साल आने की बजाय दो साल में आने लगी थीं। उनके साथ आने वाले बच्चों की संख्या भी घटने लगी थी। कुछ बच्चे बड़ी कक्षाओं में आने के कारण और कुछ अपने काम धंधों में लग जाने के कारण ननिहाल कम ही आ पाते थे। बाद के बरसों में स्वयं कमल बाबू भी तो कितना कम आ पाते थे। हां इतना अंतर अवश्य आ गया था कि घर में मामाओं के बच्चों की संख्या बढ़ गयी थी।

    कमल बाबू उन दिनों नौकरी के सिलसिले में शिमला में थे जब उन्हें तार मिला कि नाना नहीं रहे। तार पढ़ते ही कमल बाबू की आंखों के सामने नाना के स्थान पर सेमल का पेड़ तैर गया था। वे बार-बार मन को स्थिर करते कि नाना नहीं रहे किंतु जाने क्यों हर बार उन्हें यही लगता कि सेमल का पेड़ नहीं रहा। कमल बाबू एक दिन के लिये ननिहाल आये थे। सेमल का पेड़ उसी तरह मौन योगी की तरह खड़ा था। पूरी तरह रुई से लदा हुआ। छोटी नानी की टोकरी तब भी पेड़ के नीचे रखी थी।

    नानी के बाल और सफेद हो गये थे। मानो सेमल की रुई ने उन्हें अपना रंग दे दिया हो। घर में सारी मौसियां दिखायी दी थीं कमल बाबू को किंतु उनके बच्चों में से कोई नहीं था। कोई अपने पोते के साथ आयी थी तो कोई बूढ़े हो चले मौसा के साथ। कुल एक दिन रुके थे कमल बाबू। वापसी के समय उन्होंने क्षण भर के लिये ठहर कर सेमल के पेड़ को देखा था। अब उसकी ऊँचाई और अधिक हो चली थी। लगता था जैसे आकाश में कहीं गहरे तक जा धंसा है।

    सात आठ साल तक कमल बाबू का ननिहाल आना नहीं हुआ। एक दिन अचानक उन्हें फोन से सूचना मिली कि नानी नहीं रहीं। कमल बाबू को लगा कि धड़ाम की आवाज हुई और सेमल का पेड़ नीचे गिर पड़ा। उन्होंने चौंक कर अपने आस पास देखा। कहीं कुछ नहीं गिरा था। किसी चीज के गिरने की आवाज नहीं हुई थी। कमल बाबू का जाना नहीं हो सका। नानी को उन्होंने मन ही मन वहीं श्रद्धांजलि दी और फिर से नौकरी में रम गये। कमल बाबू की मां अपने बड़े पोते को लेकर अपने पीहर गयीं। उसके बाद कमल बाबू का ननिहाल जाना हुआ ही नहीं। बरसों बीत गये। जाने सेमल का पेड़ रहा भी होगा कि नहीं, कमल बाबू प्रायः सोचते।

    आज पूरे चौबीस साल बाद जब इस शहर में किसी काम से आना हुआ तो कमल बाबू की इच्छा हुई कि ननिहाल का चक्कर लगाया जाये। नाना तो नहीं रहे। नानी भी नहीं रहीं। मौसियों का आना तो नाना-नानी के समय ही कम हो गया था। फिर भी कोई न कोई मामा, कोई न कोई मामी अवश्य मिल जायेंगे।

    संध्या के झुरमुटे में गेट खोलते ही उनकी दृष्टि सेमल के पेड़ पर गयी। वह आज भी हठी योगी की तरह उसी तरह प्रहरी के रूप में विद्यमान था। नीचे लॉन में पत्तों की रेलमपेल मची हुई थी। निश्चित ही था कि नानी का स्थान घर की किसी औरत ने नहीं लिया था जिसके दिन की शुरूआत इन पत्तों को बुहारने से हो। अंधेरे में कमल बाबू यह तो नहीं देख पाये कि लाल अंगारों वाले फूल शाखाओं पर आ बैठे हैं कि नहीं किंतु उन्होंने अनुमान लगा लिया था कि वे अवश्य ही वहां उपस्थित हैं। उन्हें लगा कि घर के भीतर जाने से कोई लाभ नहीं, जिस काम के लिये आये थे वह तो हो गया है।

    लौट जाने के लिये उन्होंने गेट बंद करना चाहा, ठीक उसी समय किसी ने अंदर से आवाज लगायी- ''कौन है।''

    कमल बाबू की जीभ मानो तालु से चिपक गयी। क्या जवाब दें वे! क्या सवाल करने वाला जान जायेगा कि गेट पर कौन है!

    - ''कौन है गेट पर!'' फिर से आवाज आयी।

    - ''मैं कोई नहीं।'' कमल बाबू के मुंह से बरबस निकला और वे सेमल के पेड़ की तरफ पीठ करके आगे बढ़ गये।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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