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  • अजमेर का इतिहास - 69

     01.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 69

    ब्रिटिश काल में अजमेर का प्रशासन (1)



    अजमेर नगर का स्थानीय प्रशासन

    अजमेर का स्थानीय प्रशासन ई.1818 से ई.1853 तक सुपरिण्टेण्डेण्ट ऑफ अजमेर के अधीन, ई.1853 से 1857 तक कमिश्नर ऑफ अजमेर-मेरवाड़ा के अधीन, ई.1857 से ई.1870 तक डिप्टी कमिश्नर ऑफ अजमेर के अधीन तथा ई.1871 से 1943 तक कमिश्नर ऑफ अजमेर-मेरवाड़ा के अधीन रहा। ई.1943 से 1947 तक अजमेर का स्थानीय प्रशासन फिर से डिप्टी कमिश्नर ऑफ अजमेर के अधीन रहा।

    अजमेर का प्रांतीय स्तर पर नियंत्रण

    ई.1818 से ई.1832 तक अजमेर नगर का प्रांतीय स्तर पर नियंत्रण कुछ समय के लिये दिल्ली स्थित रेजीडेण्ट के अधीन रहा। उसके बाद कुछ समय के लिये एजेण्ट टू दी गवर्नर जनरल फॉर मालवा के अधीन रहा। ई.1832 में एजेण्ट टू दी गवर्नर जनरल फॉर राजपूताना का पद सृजित किया गया। ई.1832 से ई.1853 तक एजीजी को ही कमिश्नर (अजमेर-मेरवाड़ा) भी बनाया जाता रहा। ई.1853 में कमिश्नर (अजमेर-मेरवाड़ा) का पद अलग अधिकारी को दे दिया गया। ई.1857 से पुनः पुरानी व्यवस्था आरंभ कर दी गई। इस कारण ई.1857 से ई.1871 तक अजमेर का प्रांतीय शासन एजीजी एवं कमिश्नर (अजमेर-मेरवाड़ा) के अधीन रहा। ई.1871 से ई.1947 तक अजमेर का प्रांतीय नियंत्रण एजीजी के अधीन ही रहा किंतु इस अवधि में उसे चीफ कमिश्नर (अजमेर-मेरवाड़ा) कहा जाता था।

    अजमेर का राष्ट्रीय स्तर पर नियंत्रण

    अजमेर का राष्ट्रीय स्तर पर नियंत्रण ई.1818 से ई.1871 तक भारत सरकार के नॉर्थ वेस्ट प्रोविंस के अधिकार में रहा। ई.1871 से 1937 तक अजमेर का राष्ट्रीय स्तर पर नियंत्रण भारत सरकार के विदेश एवं राजनीतिक विभाग के अधीन रहा। इसी अवधि में कुछ समय के लिये यह भारत सरकार के राजनीतिक विभाग के अधीन चला गया। ई.1937 में यह नियंत्रण भारत सरकार के गृह विभाग के अधीन चला गया। ई.1947 तक यही स्थिति रही।

    एजेण्ट टू दी गर्वनर जनरल फॉर राजपूताना (एजीजी)

    ई.1832 से एजेण्ट टू दी गवर्नर जनरल फॉर राजपूताना का पद सृजित किया गया। तब से वही अजमेर-मेरवाड़ा का पदेन कमिश्नर होता था। प्रांत का नागरिक प्रशासन चलाने के लिये पर्याप्त समय एवं ध्यान देने की आवश्यकता थी जो कि एजीजी द्वारा नहीं दिया जा सकता था। उसे राजपूत रियासतों के साथ सम्बन्धों के निर्वहन में राजनैतिक एवं कूटनीतिक दायित्वों को प्राथमिकता देनी पड़ती थी। इन दो अलग-अलग तरह के दायित्वों ने कम्पनी को बीमार बना दिया। राजनैतिक एवं कूटनैतिक दायित्वों को निभाने के लिये नियमित रूप से यात्रायें करनी पड़ती थीं तथा शासकों से व्यक्तिशः सम्पर्क रखना पड़ता था जबकि दक्षता पूर्ण नागरिक शासन के लिये लम्बे टेबल वर्क तथा मौके पर पहुँचने एवं मौजूद रहने की आवश्यकता थी।

    अजमेर में न्यायिक प्रशासन

    अजमेर में सबसे अधिक खराब दशा न्यायिक प्रशासन की थी जिसके लिये राजस्थान के राज्यों पर दबाव डाला जाता था। ई.1832 से ई.1853 तक पोलिटिकल विभाग का अधिकारी होते हुए भी अजमेर के कमिश्नर और एजीजी को अंतिम न्यायिक अधिकारी भी बनाया हुआ था किंतु ई.1853 में कमिश्नर और एजीजी के पद अलग-अलग व्यक्तियों को दिये गये। फलस्वरूप अजमेर के कमिश्नर के न्यायिक निर्णयों की अपीलें पहले नॉर्थ वेस्ट प्रोविंस के न्यायिक कमिश्नर और बाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष जाती थीं। ई.1858 में पुनः ये दोनों पद एक ही व्यक्ति को दे दिये किंतु न्यायिक अपीलों की व्यवस्था यथावत् रही।

    एजीजी की प्रतिष्ठा को धक्का

    एजीजी को सेशन जज के भी अधिकार प्राप्त थे। उसके निर्णयों को इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा उलट दिये जाने के कारण एजीजी की प्रतिष्ठा एवं महत्व को काफी धक्का लगा था। इससे राजपूताना की रियासतों के साथ सम्बन्धों में भी कठिनाइयां उत्पन्न होने लगी थीं। उसकी प्रतिष्ठा इतनी घट गई थी कि जब उसे राजपूताना की रियासतों में दौरा करना होता था तो उसे वे सब प्रबंध करने होते थे जो शत्रु के क्षेत्र में जाने पर करने आवश्यक होते हैं। एजेण्ट टू दी गवर्नर जनरल को छः माह तक अपनी राजधानी माउण्ट आबू में रखनी होती थी। उसे प्रशासनिक आवश्यकताओं के कारण मेज-कुर्सी पर बैठकर भी काफी काम करना होता था। इस कारण वह रियासतों का दौरा नहीं कर पाता था।

    एजीजी को हाईकोर्ट के अधिकार

    ई.1861 के पश्चात् अधिकांश मामलों में एजीजी के निर्णयों को बदल दिया गया क्योंकि एजीजी का विधि ज्ञान सदा ही न्यूनतम होता था। कुछ मुकदमों में एजीजी के विरुद्ध इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने टिप्पणियां भी कर दीं। इसलिये एजीजी की राजनीतिक छवि बचाने के लिये अजमेर को पिछड़ा हुआ प्रांत कहकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के क्षेत्र से बाहर निकाला गया ओर एजीजी को अजमेर का उच्च न्यायालय भी बना दिया गया। इस प्रकार एजीजी की राजनीतिक और प्रशासनिक सत्ता को बचाये रखने के लिये लोगों को न्यायिक सुविधा से वंचित कर दिया गया।

    नई व्यवस्था में, प्रांत का न्यायिक प्रशासन प्रथम महत्वपूर्ण आकस्मिकता थी। एजीजी को अजमेर-मेरवाड़ा का न्यायिक आयुक्त घोषित किया गया तथा प्रांत में अपील की सर्वोच्च कोर्ट घोषित किया गया। इसके पीछे औचित्य यह बताया गया कि उच्चतम न्यायिक प्राधिकार केवल मुख्य आयुक्त (चीफ कमिश्नर) में ही निहित हो सकते थे जो कि नॉन रेग्यूलेशन प्रोविंस का मुखिया होता है। यह शक्ति उसके बराबर अथवा उससे उच्च स्तर के अधिकारी को नहीं दी जा सकती क्योंकि इससे एजीजी की प्रतिष्ठा एवं उच्चता को राजपूताना रियासतों में कम करके आंका जाता जबकि उनसे यह अपेक्षा की जाती थी कि वे एजीजी को पूरा सम्मान दें।

    इस व्यवस्था ने न्यायिक शक्तियां कार्यकारी अधिकारियों में निहित कर दीं। इस प्रकार प्रांत में न्याय का काम उन ब्रिटिश पॉलिटिकल अफसरों को दे दिया गया जिन्हें न तो न्यायिक प्रशिक्षण था और न कानूनों की जानकारी थी। इस प्रकार प्रांत के नागरिकों को दक्ष न्यायिक सलाह एवं अनुभवी न्यायिक अधिकारी उपलब्ध नहीं करवाये गये। ब्रिटिश सरकार ने इसका औचित्य यह बताया कि वे प्रांत के नागरिकों को सस्ती एवं सुलभ न्यायिक प्रशासन उपलब्ध करवाना चाहते हैं जो कि न्यायिक तकनीकों से मुक्त हो एवं देशी राज्यों को भी वे सब न्यायिक तकनीकियों सम्बन्धी परेशानियां नहीं हों जो नियमित न्यायिक प्रशासन के भीतर व्यवहार करते समय होती हैं।

    न्याय व्यवस्था चरमराई

    जब अजमेर के चीफ कमिश्नर को हाईकोर्ट के अधिकार दिये गये तो अजमेर के कमिश्नर को सेशन्स न्यायालय के अधिकार दे दिये गये। ये दोनों अधिकारी चीफ कमिश्नर और कमिश्नर, पोलिटिकल विभाग से आते थे जो न्यायिक कार्य करने से बचते थे। इस कारण न्याय पिछड़ता चला गया मुकदमे वर्षों तक अनिर्णीत पड़े रहे। ब्रिटिश सरकार ने न्यायिक प्रशासन को पोलिटिकल प्रशासन के अधीन देकर एक अस्वस्थ परम्परा विकसित की। पोलिटिकल अफसरों ने न्यायिक कार्य को अपने ऊपर भार समझा और उन्होंने प्रकरणों में निर्णय देने को टालने की कोशिश की।

    अदालतों में भ्रष्टाचार

    ई.1896 में अजमेर का विवरण लिखते समय मुराद अली ने लिखा है- अदालतों में रिश्वतबाजी, दगाबाजी, झूठे मुकदमे, झूठे गवाहों की भरमार हो गई। चंडू, मदक और अफीम के ठेके हो गये। हजारों आदमी इन चीजों को पीकर तबाह हो गये। व्यभिचार का बाजार पहले से ही गर्म था, अब भी गर्म है।

    पृथक न्यायिक कमिश्नर

    ई.1907 में अजमेर में एक पृथक न्यायिक कमिश्नर नियुक्त किया गया। ई.1920 में राष्ट्रीय आंदोलन तेजी से बढ़ने के कारण एजीजी एवं चीफ कमिश्नर को भी न्यायिक उत्तरदायित्व से मुक्त कर दिया गया। ई.1921 में अजमेर के लिये एक पृथक् ज्युडीशियल कमिश्नर नियुक्त किया गया ताकि लम्बे समय से अनिर्णित पड़े मुकदमे हल किये जा सकें किंतु ई.1924 में फिर से काठियावाड़ के ज्युडीशियल आयुक्त को अजमेर का काम सौंप दिया गया। वह भी पोलिटिकल विभाग का अधिकारी था। इसका परिणाम यह हुआ कि 1880-81 में जो नागरिक प्रकरण औसतन 19 दिनों में निर्णित होते थे, वे ई.1935-36 में 490 दिनों में निर्णित होने लगे। फौजदारी प्रकरणों के निर्णयों में ई.1880-81 में औसतन 6.4 दिनों का समय लगता था, वे ई.1929-30 में 94 दिनों में निर्णित होने लगे।

    अजमेर के शासन को राजपूताने के लिये प्रतिमान बनाने के प्रयास

    ई.1870 में लार्ड मेयो की अजमेर यात्रा के पश्चात् अजमेर के प्रशासन को राजस्थान के राज्यों के लिये एक प्रतिमान के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया गया। इसलिये ब्रिटिश शासन का पुनर्गठन किया गया किंतु अजमेर को नॉन रेग्यूलेशन प्रान्त के रूप में ही रखा गया। यह श्रेणी पिछड़े हुए क्षेत्रों के लिये थी। ई.1870 के बाद एजीजी न केवल अजमेर प्रांत का मुख्य प्रशासनिक अधिकारी था, अपितु समस्त प्रांत का मुख्य न्यायिक अधिकारी तथा अंतिम अपील कोर्ट भी बन गया।

    वर्ष भर में पांच माह- नवम्बर से मार्च तक वह निरंतर दौरे पर रहता था। 18 राज्यों के साथ राजनीतिक सम्बन्धों का संचालन करता था और माउण्ट आबू में रहता था। ई.1870 के पश्चात् अजमेर प्रशासन का प्रयोग राज्यों पर राजनीतिक एवं कूटनीतिक नियंत्रण स्थापित करने के लिये किया गया। विभिन्न नए विभागों के गठन के लिये राज्यों को अजमेर से अधिकारी प्रतिनियुक्ति पर भेजे जाने लगे। इन अंग्रेज अधिकारियों को उन विभागों के संचालन के लिये अति उत्तम और योग्य बताया जाता।

    कुछ क्षेत्रों में यदि कोई पृथक विभाग प्रत्येक राज्य में न खोला जा सकता तो अजमेर के अधिकारी को समस्त राजस्थान के लिये उस विभाग का अध्यक्ष बना दिया जाता, जैसे मुख्य चिकित्सा अधिकारी, शिक्षा अधिकारी, पशु चिकित्सा अधिकारी, जेल तथा पुलिस अधिकारी आदि। जहाँ तक संभव हो सका, अजमेर प्रशासन में वे समस्त विभाग खोले गये जो एक सामान्य प्रांत में होते थे किंतु उनके पृथक्-पृथक् अध्यक्ष नहीं रख गये। प्रतिमान प्रशासन का अभिप्राय कुशल प्रशासन नहीं था।

    अधिकांश प्रशासनिक अधिकारी, पोलिटिकल विभाग के होते थे जो कार्यालय के काम से बचते थे। अजमेर प्रांत के नागरिकों के सामान्य जीवन से सम्बन्धित चार विभाग खोले गये- न्याय, शांति व्यवस्था, जन स्वास्थ्य और चिकित्सा तथा शिक्षा, इनमें से प्रत्येक में बहुत कमियां थीं। शांति व्यवस्था के लिये आय स्रोतों के अनुसार पुलिस चार भागों में विभक्त थी- कण्टोनमेंट, इम्पीरियल, लोकल और रूरल। पुलिस दल में सेवा की शर्तें अत्यधिक खराब थीं और रिक्त स्थान अधिक रहते थे जिसके कारण वार्षिक भर्ती होने वालों की संख्या अधिक रहती थी।

    बीसवीं सदी के प्रारंभ में लगभग 30-40 प्रतिशत पुलिस कर्मचारी बीमार रहते थे। घोर अपराधों की संख्या बढ़ती रहती थी। अजमेर में 1895 तक सरकारी अस्पताल नहीं था और जब खोला भी गया तो उस पर अधिक खर्च के कारण ध्यान कम दिया गया। मृत्यु दर अजमेर प्रांत में बहुत अधिक थी।

    विदेश एवं राजनीतिक विभाग के अधीन

    ई.1871 में अजमेर मेरवाड़ा क्षेत्र से एन. डब्लू. पी. सरकार का नियन्त्रण हटा लिया गया तथा उसे भारत सरकार के विदेश एवं राजनीतिक विभाग के अधीन कर दिया गया। इस कारण एजीजी राजपूताना को चीफ कमिश्नर (अजमेर-मेरवाड़) बनाया गया। एजीजी के अधीन कमिश्नर अजमेर, असिस्टेण्ट कमिश्नर अजमेर तथा असिस्टेण्ट कमिश्नर मेरवाड़ा की नियुक्ति की गई। ये तीनों अधिकारी राजनीतिक विभाग से आते थे। इसी वर्ष मेरवाड़ा बटालियन को ब्यावर से अजमेर स्थानांतरित कर दिया गया तथा रामसर तहसील समाप्त कर दी गयी।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-6

     01.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-6

    ऐतिहासिक काल में राजस्थान की सभ्यता एवं संस्कृति(2)



    राजपूत काल

    हर्षवर्द्धन की मृत्यु के पश्चात् राजस्थान के राजनीतिक मंच पर राजपूतों का उदय हुआ। माना जाता है कि देश में अव्यवस्था फैल जाने के बाद आबू में एक यज्ञ का आयोजन किया गया तथा इसके बाद प्रतिहार, चौलुक्य, चाहमान तथा परमार नामक चार वीरों को राष्ट्र की रक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई। इन वीरों के नाम पर राजपूतों के चार कुल चले। भारतीय इतिहासकारों के अनुसार चौहान, प्रतिहार, परमार, गुहिल आदि राजपूत वंश ब्राह्मणों में से निकले थे। यूरोपीय इतिहासकारों की मान्यता है कि प्राचीन भारतीय क्षत्रियों में विदेशी क्षत्रियों के रक्त के मिश्रण से राजपूतों की उत्पत्ति हुई। समय के साथ राजपूत कुलों की संख्या का विस्तार होता चला गया। गुहिल, कच्छवाहा, राठौड़, भाटी, चावड़ा आदि राजपूत कुल भी राजपूताना के विभिन्न भागों पर शासन करने लगे। कान्हड़ दे प्रबंध में राजपूतों के छत्तीस कुलों का उल्लेख किया गया है। इन राजपूत कुलों में जहाँ परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध थे वहीं अपने-अपने राज्यों का विस्तार करने के लिये खूनी संघर्ष की एक अनवरत श्रृंखला विद्यमान थी। सैंकड़ों वर्ष तक चले इन खूनी संघर्षों के कारण राजपूतों की शक्ति लगातार क्षीण होती चली गई तथा उनमें बाह्य आक्रांताओं का सामना करने की क्षमता नहीं रही।

    ऋग्वैदिक काल के समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र नामक चार वर्ण विद्यमान थे। उत्तर ऋग्वैदिक काल में अंत्यज वर्ग भी अस्तित्व में आ चुका था किंतु राजपूत काल में समाज में अंत्यजों से भी नीची जातियों का एक वर्ग उत्पन्न हो गया जिन्हें म्लेच्छ कहा जाता था। इन लोगों का पेशा मनुष्यों की हत्या करना, चोरी एवं डकैती करना आदि था। इनमें कबर, भील, मीणा, मेड़ आदि जातियाँ थीं। बाद के काल में मुसलमानों एवं ईसाइयों के लिये म्लेच्छ शब्द का प्रयोग होने लगा जिसका अर्थ था वे लोग जो हिन्दू धर्म से इतर अर्थात् विधर्मी हैं। इन जातियों के अतिरिक्त कुछ जातियाँ ऐसी थीं जिन्हें किसी भी वर्ण में नहीं गिना जाता था। इनमें कायस्थ, जाट एवं गूजर प्रमुख थे। मध्य काल में जातियों की संख्या तेजी से बढ़ी। जातियों में गोत्र निकले, गोत्र में खांपें बनीं और इन्हीं खांपों ने आगे चलकर नई जातियों का निर्माण किया।

    वैदिक काल में यद्यपि पुत्री की अपेक्षा पुत्र जन्म को श्रेष्ठ माना जाता था तथापि समाज में स्त्रियों की स्थिति अत्यंत सम्मानजनक थी। वे सभा-समितियों, सामाजिक समारोहों, धार्मिक उत्सवों, वैवाहिक कार्यक्रमों, यज्ञ आदि महत्त्वपूर्ण कार्यों में पुरुषों के समान ही भाग लेती थीं। इस युग में जातियों का निर्माण नहीं हुआ था तथा अलग अलग कर्म करने वाले परिवारों की संतानों के मध्य विवाह होते थे। एक प्रकार से ये विवाह अंतरजातीय विवाह की श्रेणी में आते थे। इस काल में बाल विवाह प्रचलित थे किंतु विधवा विवाह को अच्छा नहीं माना जाता था।

    ऋग्वैदिक काल में एक पत्नी प्रथा प्रचलित थी किंतु प्रभावशाली लोगों की बहुपत्नियां भी होती थीं। राजपूत काल में बहुपत्नी प्रथा अपने चरम पर थी। ऋग्वैदिक काल में पति की मृत्यु हो जाने पर उसकी पत्नी को शव के साथ कुछ क्षणों के लिये लेटना हेाता था उसके बाद पुरोहित मंत्र पढ़कर स्त्री को आज्ञा देता था कि नारी उठो और जीवलोक में पुनः लौट आओ किंतु बाद में यह प्रथा सती प्रथा में बदल गयी। राजपूत काल में विधवा स्त्री के लिये सती होना ही श्रेयस्कर समझा जाता था। ऋग्वैदिक काल में नियोग प्रथा भी प्रचलित थी जिसमें विधवा स्त्री पुत्र की प्राप्ति के लिये अपने देवर अथवा पति के कुटुम्ब के अन्य सदस्य के साथ पत्नी रूप में रह सकती थी। राजपूत काल में इस तरह की प्रथा समाप्त हो चुकी थी। उच्च कुलों में विधवा विवाह पूरी तरह प्रतिबंधित था किंतु निम्न समझी जानी वाली जातियों में नाता प्रथा का प्रचलन था जिसमें कोई विधवा अपने पति के भाई के साथ पत्नी के रूप में रह सकती थी। ऋग्वैदिक काल में ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं जिनमें एक स्त्री एक साथ कई पुरुषों की पत्नी हो सकती थी इसे सहपतिक विवाह प्रणाली कहते थे। महाभारत काल में द्रौपदी का उदाहरण इसी तरह का है। राजपूत काल में यह प्रथा पूरी तरह समाप्त हो गयी थी। एक स्त्री का विवाह एक पुरुष के साथ ही हो सकता था।

    राजपूत काल में स्त्री का वह सामाजिक सम्मान नहीं रह गया था जो वैदिक काल में था। अब स्त्री पूर्णतः पुरुष की अनुगामिनी हो कर रह गयी थी। उसे विधवा विवाह, नियोग अथवा सहपतिक विवाह के अधिकार नहीं रह गये थे। पर्दा प्रथा प्रारंभ हो गयी थी। एक से अधिक पत्नियों का होना गौरव की बात समझी जाती थी। इस समय तक भी स्वयंवर की प्रथा प्रचलित थी। सगोत्र विवाह का प्रचलन नहीं था और अनुलोम विवाह ठीक नहीं समझे जाते थे किंतु उनका प्रचलन भी समाज में था। इस काल में उच्च कुल की स्त्रियों के लिये सती होना आवश्यक सा हो गया था। विधवाओं को परिवार की सम्पत्ति पर पूरा अधिकार नहीं था। वे केवल अपने आभूषण और स्त्रीधन की ही अधिकारिणी समझी जाती थीं।

    राजपूत काल में वैश्य वर्ण काफी सम्पन्न एवं प्रभावशाली हो गया। अनेक राजा एवं राजपुत्र श्रेष्ठि कन्याओं से विवाह करते थे। इस कारण वैश्य समुदाय का राज्यकार्यों में भी हस्तक्षेप रहता था। राजकीय कोठारों, भण्डारों एवं कोषागारों को संभालने का कार्य भी वैश्य समुदाय ही करता था। राजपूत काल में अग्रवाल, माहेश्वरी, जैसवाल, खण्डेलवाल और ओसवाल प्रभावशाली वैश्य थे। इन सभी वैश्य समुदायों का उद्भव क्षत्रियों से ही माना जाता है।

    इस काल में राजस्थान के सामाजिक जीवन में नर बलि प्रथा, समाधि प्रथा, सती प्रथा, कन्या वध, बहु विवाह प्रथा, त्याग प्रथा, दहेज प्रथा, पर्दा प्रथा, चेला प्रथा, दास प्रथा, मानव व्यापार प्रथा आदि कुप्रथाएं व्याप्त हो गईं। इन कुप्रथाओं के चलते, आम आदमी का जीवन दूभर हो गया।

    मुस्लिम शासन

    राजस्थान के राजपूत कुलों ने मुहम्मद गौरी के आगमन तक राजस्थान के विभिन्न भागों में स्वतंत्र रहकर राज्य किया। मुहम्मद गौरी के प्रतिनिधि कुतुबुद्दीन एबक ने 1206 ई. में दिल्ली सल्तनत की स्थापना की। इसके बाद राजस्थान का बहुत सा भू-भाग दिल्ली सल्तन के अधीन चला गया। फिर भी राजस्थान के राजपूत राज्य कभी पूरी तरह स्वतंत्र रहकर तथा कभी अर्द्ध-स्वतंत्र रहकर अपना अस्तित्त्व बनाये रहे। इस काल में मुस्लिम संस्कृति के प्रभाव से राजस्थानी की संस्कृति में अनेक उल्लेखनीय परिवर्तन आये। लोगों में धार्मिक कट्टरता बढ़ी, सामाजिक भेदभाव अपने चरम पर पहुंच गया। लोगों ने जातिवाद को कसकर पकड़ लिया। लाखों लोग निर्धन एवं परिवारहीन हो जाने के कारण साधु, सन्यासी एवं जोगी हो गये। नये-नये सम्प्रदाय अस्त्वि में आने लगे तथा अनेक मत-मतांतर खड़े हो गये। धर्म भीरू जनता इन मत-मतांतरों के मकड़-जाल में फंस गई।

    16वीं शताब्दी में बाबर ने दिल्ली सल्तनत का ध्वंस करके मुगल सल्तनत की स्थापना की। मेवाड़ को छोड़कर राजस्थान के समस्त राजपूत राज्य मुगलों के अधीन हो गये। इस काल में अकबर द्वारा अपनाई गई साम्प्रदायिक सौहार्द की नीति ने राजपूत राज्यों में कला एवं संस्कृति के विकास को गति दी। इस काल में शिल्पकला, चित्रकला, एवं संगीत कला का अच्छा विकास हुआ। 18वीं शताब्दी में मुगलों का शासन पराभव को पहुँच गया तथा मराठों ने लगभग पूरे उत्तरी भारत को रौंद डाला। इन आक्रमणों से न केवल राज्य की आर्थिक स्थिति को गहरा नुक्सान पहुंचाया अपितु सांस्कृतिक स्तर पर राजस्थान को उससे भी अधिक नुक्सान हुआ।

    ब्रिटिश शासन

    उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम में, मराठों के अत्याचारों से बचने के लिये देशी राज्यों ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी से अधीनस्थ समझौते करके अपने अस्तित्त्व को बचाया। 1857 ई. में हुई सैनिक क्रांति की विफलता के बाद राजस्थान के समस्त देशी राज्य ब्रिटिश क्राउन के अधीन चले गये। इस दौरान राजस्थान की संस्कृति पर पाश्चात्य विचारों का तेजी से प्रभाव पड़ा। लोग शिक्षित होने लगे और अपनी उन्नति के बारे में सोचने लगे। इस कारण प्रजा का चिंतन सामूहिक हित के लिये न होकर व्यक्तिवादी होने लगा। अंग्रेज अधिकारियों ने सामाजिक जीवन में व्याप्त नर बलि प्रथा, समाधि प्रथा, सती प्रथा, कन्या वध, बहु विवाह प्रथा, त्याग प्रथा, दहेज प्रथा, पर्दा प्रथा, चेला प्रथा, मानव व्यापार प्रथा आदि को रोकने के लिये कानून बनाये। इन कानूनों का राजस्थान के सांस्कृतिक परिवेश पर गहरा प्रभाव हुआ। 1947 ई. में स्वतंत्रता मिलने तक राजस्थान की राजनीतिक स्थिति इसी प्रकार बनी रही। आजादी के बाद देशी रजवाड़े, राजस्थान में विलीन हो गये और वर्तमान राजस्थान अपने स्वरूप में आया।

    वर्तमान राजस्थान

    आज जिस प्रदेश को हम राजस्थान कहते हैं उसमें देश का 10.41 प्रतिशत भू-भाग आता है जिसमें देश की 5.56 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है। विगत एक सौ वर्षों में राजस्थान की जनसंख्या में बहुत तेजी से वृद्धि हुई है। 1901 ई. में राजस्थान की जनंसख्या 1,02,94,090 थी जो 100 वर्ष की अवधि में अर्थात् 2001 की जनगणना में 5,64,73,122 हो गई। वर्ष 2011 की जनगणना में राजस्थान की जनसंख्या 6,85,48,437 पाई गई। राजस्थान में एक लाख से अधिक जनसंख्या वाले 20 नगर हैं जिनमें जयपुर, जोधपुर, कोटा, बीकानेर, अजमेर, उदयपुर, भीलवाड़ा, अलवर, गंगानगर, भरतपुर, पाली, सीकर, टोंक, हनुमानगढ़, ब्यावर, किशनगढ़, गंगापुर सिटी, सवाईमाधोपुर, चूरू तथा झुंझुनूं सम्मिलित हैं।

    विशाल मरुस्थल एवं विशाल अरावली पर्वतमाला के प्रसार के कारण राजस्थान विरल जनसंख्या वाला प्रदेश है। भारत का जनसंख्या घनत्व 382 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. है किंतु राजस्थान का जनसंख्या घनत्व केवल 200 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. है। जयपुर जिला 595 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. घनत्व के साथ राज्य का सर्वाधिक घनत्व वाला जिला है जबकि जैसलमेर जिले का जनसंख्या घनत्व सबसे कम, 17 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. है। 2011 की जनगणना के अनुसार राजस्थान में 1000 पुरुषों के पीछे स्त्रियों की संख्या केवल 928 है। प्रदेश की जनसंख्या में साक्षरों की संख्या प्रतिशत है। पुरुष साक्षरता 79.2 प्रतिशत तथा स्त्री साक्षरता 52.1 प्रतिशत है। राज्य में औसत आयु 64 वर्ष है। राज्य की जन्म दर 31.4 तथा मृत्यु दर 8.5 है।

    आज के राजस्थान की संस्कृति, विगत डेढ़ लाख वर्षों में सभ्यता के विभिन्न सोपानों में विकसित ज्ञान-विज्ञान, आचार-विचार, रहन-सहन, रीति-रिवाज एवं धर्म-दर्शन का अद्भुत समुच्चय है। इसमें बहुत कुछ अपना है तो बहुत कुछ बाहर से आगत भी है। भले ही राजस्थान की संस्कृति में बाहरी तत्व कितनी ही प्रबलता से मौजूद क्यों न हों किंतु यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि इस संस्कृति पर पर्यावरणीय चेतना का बहुत गहरा प्रभाव है।

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  • अजमेर का इतिहास - 70

     01.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 70

    ब्रिटिश काल में अजमेर का प्रशासन (1)



    सामान्य प्रशासन के लिये समय नहीं

    ब्रिटिश दस्तावेज इन तथ्यों से भरे पड़े हैं कि ब्रिटिश अधिकारी अजमेर को प्रशासनिक दक्षता का आदर्श घोषित करना चाहते थे जबकि अजमेर में वे सामान्य सुविधायें भी उपलब्ध नहीं करवाई जा सकी थीं जिनका लाभ दूसरे प्रांतों की जनता लम्बे समय से उठा रही थी। इसका मुख्य कारण यह था कि प्रांत के उच्चस्थ पॉलिटिकल अधिकारी हर समय देशी राज्यों की समस्याओं को सुलझाने में व्यस्त रहते थे इस कारण उनके पास अजमेर के सामान्य प्रशासन के लिये पर्याप्त समय नहीं था। यहां तक कि अजमेर की नगर पालिका भी ढंग से कार्य नहीं कर पा रही थी।

    प्रशासन में भ्रष्टाचार

    उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में अजमेर का प्रशासन भ्रष्टाचार में आकण्ठ डूबा हुआ था। शहर में व्यभिचार का बोलबाला था। अजमेर के चारों तरफ स्थित देशी रियासतों की आवारा औरतों को अजमेर में शांति मिलती थी। इस कारण उस समय अजमेर में वेश्याओं के चार बड़े अड्डे विकसित हो गये थे। हर अड्डे में रात को तीस चालीस बदमाश और आवारा औरतें जमा रहते थे। कुटनियों की पांचों अंगुलियां घी में थीं और सिर कढ़ाई में। उस पर उच्च श्रेणी के नये आने वाले अधिकारियों के लिये नई और ताजा औरतें प्रस्तुत की जाती थीं। शहर के हर गली कूंचे में बंदोबस्त के पंजाबी कर्मचारी ही दिखाई देते थे। शहर के चारों ओर के रास्तों तथा पुष्करजी, किशनगढ़ एवं ब्यावर जाने वाली सड़कों पर जुआरियों के झुण्ड फिरा करते थे।

    चण्डू और नशीले पदार्थ को कोई जानता तक न था। किसी बंगले पर कोई साहब का खानसामा या बावरची चोरी छिपे मदक के छर्रे पीता था। अफीम का भी ठेका न था। हर बनिये की दुकान पर रुपये की पंद्रह, बीस तोला अफीम मिलती थी। अजमेर में प्रतिदिन हजारों रुपये की अफीम का सौदा होता था। अजमेर में केवल एक पारसी था। गुजराती, मराठी और मद्रासी नहीं थे। केवल दो बंगाली थे जो डिप्टी कमिश्नर की अदालत में कर्मचारी थे। शहर के सारे रास्ते खतरों से भरे हुए थे। अक्सर सरकारी डाक लुट जाया करती थी। मुंशी अब्दुल्लाह खां सब इंसपेक्टर और मुंशी रामतीर्थ आदि अधिकारी डाकुओं के पीछे दौड़ते-फिरते थे।

    अधिकारियों की नीतियाँ भ्रष्टाचार के लिये जिम्मेदार

    अजमेर की बुरी प्रशासनिक दशा के पीछे एक कारण यह भी था कि इस जिले में कोई भी हाकिम जम कर दो-चार वर्ष नहीं रह पाता था। यूरोपियन अधिकारी और मिलिट्री ऑफिसर विदेश कार्यालय के अधीन होने से जल्दी-जल्दी स्थानांतरित होते थे। अजमेर के निवासियों की ओर से यह मांग उठने लगी थी कि इस जिले को किसी हाईकोर्ट के अधीन कर दिया जाये ताकि यहाँ सिविलियन हाकिम लग सकें किंतु राजपूताना के तत्कालीन एजीजी वॉल्टेयर का यह मानना था कि यदि यह जिला अजमेर हाईकोर्ट के अधीन हो गया तो राजपूताना की समस्त देशी रियासतों पर भी ब्रिटिश सरकार के प्रशासनिक एवं राजनैतिक नियंत्रण की हैसियत कुछ भी नहीं रह जायेगी।

    आदर्श प्रशासनिक प्रतिरूप बनाने का काम छोड़ा

    अजमेर प्रांत में भी वे सब विभाग स्थापित किये गये जो एक नियमित प्रांत में होते थे किंतु 1877 ई. में लॉर्ड लिटन ने अनुभव कर लिया कि यदि अजमेर को आदर्श प्रशासनिक प्रांत के रूप में विकसित किया जायेगा तो यह एक ऐसा प्रदर्शनीय खेत बन जायेगा जिसमें सारी चीजें बहुत खर्चा करके जुटाई गई हों। प्रांत की आय इतनी न थी कि उससे प्रशासनिक व्यय को चलाया जा सके। यही कारण है कि अजमेर में अधिकांश विभागों को एक ही व्यक्ति के अधीन कर दिया तथा बहुत से विभागों में लम्बे समय तक पद रिक्त रखे गये। इस कारण इन विभागों का काम गति नहीं पकड़ सका।

    पोलिटिकल अधिकारियों को नागरिक प्रशासकों के रूप में काफी शक्तियां दी गई थीं किंतु उन्हें काम का अनुभव न होने तथा प्रशिक्षण का अभाव होने के कारण उनके कार्य में दक्षता का अभाव था। नया प्रांत बन जाने एवं नई व्यवस्थायें आरंभ हो जाने पर भी पॉलिटिकल अधिकारियों का मुख्य उद्देश्य राजपूताना की देशी रियासतों पर अपना प्रभावी नियंत्रण बनाये रखना ही रहा।

    ब्रिटिश क्षेत्रों से अलग होने, राजपूताना रियासतों के मध्य स्थित होने तथा कार्य की प्रकृति भिन्न होने से अजमेर-मेरवाड़ा का नागरिक प्रशासन काफी जटिल हो गया। एक तरफ ब्रिटिश सरकार अपने उस वचन से अलग नहीं होना चाहती थी जिसमें कहा गया था कि भारत के नागरिकों को उन्नत नागरिक प्रशासन दिया जायेगा तथा दूसरी तरफ ब्रिटिश सरकार, अजमेर-मेरवाड़ा को अपने पॉलिटिकल अधिकारियों एवं प्रशासकों को प्रशिक्षण स्थल के रूप में विकसित करना चाहती थी। इन दोनों उद्देश्यों ने अजमेर-मेरवाड़ा के प्रशासन को आत्म निर्भर बनाने के लिये विवश किया। शीघ्र ही यह अनुभव कर लिया गया कि प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने में काफी रुपया खर्च करना होगा जिसके बदले में कोई अर्थलाभ नहीं होगा।

    शैक्षिक प्रशासन

    शैक्षिक क्षेत्र में अजमेर प्रशासन ने कई प्रयोग किये ताकि शैक्षिक पिछड़ेपन को दूर किया जा सके। 1872 ई. तक नॉर्थ-वेस्ट प्रोविंसेज के डायरेक्टर पब्लिक इन्सट्रक्शन्स ही नियंत्रक अधिकारी थे। इसके बाद अजमेर-मेरवाड़ा कमिश्नर पब्लिक इंस्ट्रक्शन्स के पदेन डायरेक्टर बन गये। उनके साथ ऐसा कोई अधिकारी नहीं था जो अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत में शिक्षा के लिये पूरा समय और ध्यान दे सके। गवर्नमेंट कॉलेज अजमेर, पदेन इंसपेक्टर ऑफ स्कूल्स हुआ करते थे। उनके जिम्मे ही पूरे जिले का काम देखने का भार था। चालीस वर्ष तक यही व्यवस्था चलती रही। इसके बाद ई.1912 में सुपरिण्टेंडेंट ऑफ एज्यूकेशन फॉर अजमेर एण्ड देहली का पद सृजित किया गया किंतु ई.1922 तक इस पद पर किसी की नियुक्ति नहीं की गई।

    ई.1923 में भारत सरकार के एज्यूकेशनल कमिश्नर को अजमेर मेरवाड़ा में शिक्षा के कार्य को देखने का दायित्व दिया गया। ई.1930 में सुपरिण्टेंडेंट ऑफ एज्यूकेशन फॉर अजमेर-मेरवाड़ा, देहली एण्ड सेण्ट्रल इण्डिया की नियुक्ति की गई। इस पर जितने भी अधिकारियों की नियुक्ति की गई उन सबका मुख्यालय अजमेर से बाहर रहा। इसलिये वे अजमेर में शिक्षा के कार्य पर अधिक ध्यान नहीं दे सके। इस कारण अजमेर की जनता शिक्षा के क्षेत्र में अन्य प्रांतों की तुलना में काफी पिछड़ी हुई थी किंतु आर्यसमाज की स्कूलों तथा मेयो कॉलेज की उपस्थिति के कारण अजमेर का शैक्षिक दृश्य देशी रियासतों की तुलना में काफी समृद्ध दिखाई पड़ता था।

    भू-राजस्व प्रशासन

    अजमेर मेरवाड़ा में ब्रिटिश भू-राजस्व प्रशासन के दो पक्ष थे- पहला, भूस्वामियों (इस्तिमरदारों) के प्रति ब्रिटिश अधिकारियों की प्रवृत्ति तथा दूसरा, प्रत्यक्ष ब्रिटिश नियंत्रण वाले क्षेत्रों में भू बंदोबस्त की नीति। ब्रिटिश अधिकारियों ने पहले पहल इस्तिमरारी जागीरों में काश्तकारों के अधिकारों की रक्षा के दायित्व को पूरा करने का काम किया किंतु बाद में इस्तिमरदारों का विश्वास जीतने के दृष्टिकोण से उन्होंने प्रत्यक्षतः इस्तिमरदारों का पक्ष लेने की नीति अपना ली किंतु इस नीति के कारण इस्तिमरारी जागीरों के किसानों में असंतोष पनप गया।

    जब काश्तकारों ने भूस्वामियों के विरुद्ध शिकायतें कीं तो ब्रिटिश अधिकारियों ने उन शिकायतों को सुनने से मना कर दिया। इससे भूस्वामियों ने यह मान लिया कि काश्तकार अब भूस्वामियों की मर्जी पर छोड़ दिये गये हैं। इससे इस्तिमरदार जागीरों में काश्तकारों पर अत्याचार बढ़ गये और उनकी दुर्दशा होने लगी। अंग्रेज सरकार को काश्तकारों की इस दुर्दशा का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि अब किसान मानने लगे कि इस्तिमरदार जागीरों की बजाय अंग्रेजी नियंत्रण वाली जागीरों में प्रशासन अधिक अच्छा है। आम जनता में भूस्वामियों की प्रतिष्ठा गिर गई। इससे ब्र्रिटिश अधिकारियों को भूस्वामियों के आंतरिक मामलों में प्रत्यक्ष रूप से हस्तक्षेप करने का अवसर मिल गया।

    इस्तिमरदार जागीरों में काश्तकारों की दुर्दशा का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत में इस्तिमरदार जागीरों के अधीन 61 प्रतिशत कृषि भूमि थी तथा ब्रिटिश अधिकारियों के प्रत्यक्ष नियंत्रण में 39 प्रतिशत कृषि भूमि ही थी फिर भी इस्तिमरदारी काश्तकारों की अपेक्षा ब्रिटिश नियंत्रण वाले काश्तकारों से 28 हजार रुपये का वार्षिक राजस्व अधिक प्राप्त होता था। अजमेर प्रांत में 1874, 1887 एवं 1910 में तीन भू बंदोबस्त हुए। तीनों ही बार राजस्व करों में वृद्धि की गई किंतु काश्तकारों के लिये सिंचाई आदि की सुविधाओं का विकास नहीं किया गया।

    पुलिस प्रशासन

    अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत में पुलिस प्रशासन की भी हालत खराब थी। पुलिस कर्मियों के वेतन, भत्ते एवं सुविधायें बहुत कम थे जबकि काम की परिस्थितियां अत्यंत खराब थीं। 1871 ई. के बाद से अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत में पुलिस विभाग में स्वीकृत पदों में से केवल 15 प्रतिशत पदों पर ही पुलिस कर्मियों की भर्ती की जाती थी। पुलिस में भर्ती के लिये योग्य युवक नहीं मिलते थे। लोगों की निर्धनता एवं रहन-सहन के निम्न स्तर के कारण अच्छे युवक उपलब्ध नहीं हो पाते थे।

    इसके साथ ही पुलिस सेवा की परिस्थितियां अच्छी नहीं थीं तथा पुलिस में काम करने की बजाय अन्य जगह पर काम करने से अच्छा वेतन मिलता था। निम्न वेतन के चलते पुलिस कार्मिकों में भ्रष्टाचरण बढ़ गया था। कई बार जांच में यह भी पाया गया कि अजमेर शहर में हुई चोरी की वारदातों में स्वयं पुलिस भी शामिल थी। पुलिस कर्मियों द्वारा नौकरी छोड़ देना अथवा उनकी मौत हो जाना आम बात थी। अजमेर पुलिस अपने दक्ष कर्मियों को नौकरी के प्रति आकर्षित करने में पूरी तरह विफल थी।

    पुलिस सुपरिंटेण्डेंट पर काम का अत्यधिक दबाव था। उसे निश्चित समयावधि में पुलिस थानों का निरीक्षण करना होता था तथा साथ ही अजमेर प्रांत के विशाल एवं असुरक्षित बॉर्डर की भी सुरक्षा करनी पड़ती थी। इस कारण वह सदैव व्यस्त रहत था जिससे उसके काम की गुणवत्ता काफी नीची थी और पुलिस कर्मियों को भ्रष्टाचार करने का पूरा अवसर प्राप्त हो जाता था। अजमेर में पुलिस कर्मियों की स्वीकृत संख्या से सदैव आधी संख्या ही उपलब्ध रहती थी।

    लगभग 36 प्रतिशत अपराधों की जांच ही नहीं हो पाती थी। जांच विभाग में स्टाफ की कमी थी इसकारण बड़ी संख्या में अपराध, चोरी एवं सेंधमारी के प्रकरणों की जांच करने से मना कर दिया जाता था। जहाँ ब्रिटिश सरकार एक ओर अजमेर प्रांत को एक सभ्य और प्रगतिशील जिला कहने के लिये उत्सुक थी वहीं दूसरी ओर वास्तविकता यह थी कि बहुत से अंग्रेज अधिकारी अजमेर को अनुसूचित जिला अधिनियम (शिड्यूल्ड डिस्ट्रिक्ट एक्ट) के अंतर्गत शासित करने की बात करते थे।

    यही कारण था कि ब्रिटिश सरकार ने अजमेर प्रांत में किसी तरह की लोकतांत्रिक संस्था की स्थापना नहीं की। बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में जब अजमेर में विधान सभा की स्थापना करने की मांग उठी तो सरकार ने यह कहकर इस मांग को अस्वीकार कर दिया कि अजमेर प्रांत में पर्याप्त संख्या में पढ़े-लिखे लोग नहीं हैं जो विधानसभा को चला सकें। जबकि कुर्ग जैसे छोटे प्रांत में भी तब विधान सभा का गठन हो चुका था।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-7

     01.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-7

    पर्यावरण एवं संस्कृति का सम्बन्ध(1)



    पुरानी कहावत है कि मनुष्य अपने पर्यावरण की उपज है। इसी कारण पर्यावरण एवं संस्कृति का सम्बन्ध अटूट होना एक सहज स्वाभाविक बात है। पर्यावरण और संस्कृति एक दूसरे से असंपृक्त, विरक्त अथवा शत्रुवत् होकर नहीं रह सकतीं। इनमें मित्रता का भाव होना आवश्यक है। पर्यावरण एवं संस्कृति के अटूट सम्बन्ध को समझने के लिये, इनका निर्माण करने वाले मूल तत्त्वों को समझना आवश्यक है।


    पर्यावरण का निर्माण करने वाले मूल तत्व

    प्राकृतिक शक्तियाँ

    पृथ्वी के धरातल पर तथा धरातल के चारों ओर जो भी दृश्य एवं अदृश्य शक्ति अथवा वस्तु उपस्थित है, उस सबसे मिलकर धरती के पर्यावरण का निर्माण होता है। प्राकृतिक शक्तियाँ- आकाश, वायु, अग्नि, जल और भूमि हमारे पर्यावरण की प्राथमिक निर्माता हैं, यहाँ तक कि गुरुत्वाकर्षण शक्ति भी और दूसरे ग्रहों एवं उपग्रहों द्वारा धरती के प्रति लगाये जाने वाले आकर्षण एवं विकर्षण बल भी। ये प्राकृतिक शक्तियाँ एक दूसरे को गति, स्वरूप एवं संतुलन प्रदान करती हैं जिनके कारण वायु मण्डल, भू-मण्डल तथा जल मण्डल बनते हैं।

    इन्हीं प्राकृतिक शक्तियों के समन्वय से सर्दी, गर्मी, वर्षा, वायु संचरण, वायु में आर्द्रता एवं ताप का संचरण, आंधी, चक्रवात, मानसून तथा बिजली चमकने जैसी प्राकृतिक घटनाएं जन्म लेती हैं। ये प्राकृतिक शक्तियाँ ही परस्पर सहयोग एवं समन्वय स्थापित करके वनस्पति जगत एवं जीव जगत का निर्माण करती हैं।

    वनस्पति जगत

    धरती पर पाया जाने वाला वनस्पति जगत- यथा पेड़-पौधे, घासें, वल्लरियां, फंगस, कवक; नदियों, तालाबों एवं समुद्रों में मिलने वाली काई, घासें एवं विविध प्रकार की जलीय वनस्पतियां; पहाड़ों एवं मरुस्थलों में मिलने वाली वनस्पतियां, हमारे पर्यावरण की द्वितीयक निर्माता हैं जो सम्पूर्ण जीव जगत का पोषण करती हैं। उसे ऑक्सीजन, भोजन, लकड़ी, ईंधन आदि प्रदान करती हैं यहाँ तक कि जलीय चक्र का निर्माण करके जीव जगत के लिये जल की उपलब्धता सुनिश्चित करती हैं। भूमि को ऊर्वरा शक्ति प्रदान करती हैं तथा धरातल पर बहने वाले जल को अनुशासन में बांधती हैं। जीव जगत जीव जगत यथा- मत्स्य, उभयचर, कीट, सरीसृप, पक्षी, पशु एवं मनुष्य जो कि इस पर्यावरण का निर्माण करने वाले आवश्यक तत्व तो हैं ही, साथ ही ये पर्यावरण के उपभोक्ता भी हैं। जो कुछ भी प्राकृतिक शक्तियों द्वारा निर्मित किया जाता है तथा वनस्पति जगत द्वारा उपलब्ध कराया जाता है, उस सबका उपभोक्ता जीव जगत ही है।

    जीव जगत

    में भी मनुष्य ऐसा प्राणी है जो जीव जगत द्वारा उत्पन्न किये जाने वाले एवं उपलब्ध कराये जाने वाले संसाधनों को अंतिम उपभोक्ता की तरह प्रयुक्त करता है। यही कारण है कि मनुष्य इस प्रकृति का पुत्र होते हुए भी, प्रकृति में उपलब्ध हर वस्तु का स्वामी है।


    संस्कृति का निर्माण करने वाले मूल तत्व

    संस्कृति शब्द का निर्माण मूलतः 'कृ' धातु से हुआ है जिसका अर्थ है करना। इसके पूर्व सम् उपसर्ग तथा घात (ति) प्रत्यय लगने से लगने से संस्कार शब्द बनता है जिसका अर्थ- पूरा करना, सुधारना, सज्जित करना, मांज कर चमकाना, शृंगार, सजावट आदि हैं। इसी विशेषण की संज्ञा 'संस्कृति' है। वाजनसनेयी संहिता में 'तैयार करना' या 'पूर्णता' के अर्थ में यह शब्द आया है तथा ऐतरेय ब्राह्मण में 'बनावट' या 'संरचना' के अर्थ में इसका प्रयोग हुआ है। महाभारत में कृष्ण के एक नाम के रूप में इस शब्द का प्रयोग हुआ है। हिन्दी साहित्य कोश के अनुसार संस्कृति शब्द का अर्थ साफ या परिष्कृत करना है। वर्तमान में संस्कृति शब्द अंग्रेजी के कल्चर (CULTURE) शब्द का पर्याय माना जाता है। संस्कृति शब्द का व्यापक अर्थ समस्त सीखे हुए व्यवहारों अथवा उस व्यवहार का नाम है जो सामाजिक परम्परा से प्राप्त होता है। इस अर्थ में संस्कृति को सामाजिक प्रथा का पर्याय भी कहा जाता है। संकीर्ण अर्थ में संस्कृति का आशय 'सभ्य' और 'सुसंस्कृत' होने से है। रामधारीसिंह दिनकर ने अपनी पुस्तक संस्कृति के चार अध्याय में लिखा है- 'संस्कृति जिंदगी का एक तरीका है और यह तरीका सदियों से जमा होकर उस समाज में छाया रहता है, जिसमें हम जन्म लेते हैं।'

    निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि किसी भी क्षेत्र में निवास करने वाले मनुष्यों की जीवन शैली, उस क्षेत्र की संस्कृति का निर्माण करती है। उस क्षेत्र में निवास करने वाले मनुष्यों की आदतें, विचार, स्वभाव, कार्य-कलाप, रीति रिवाज, परम्पराएं, खान-पान, वस्त्र-विन्यास, तीज-त्यौहार, खेल-कूद, नृत्य-संगीत, चाक्षुष कलाएं, जन्म-मरण के संस्कार एवं विधान आदि विभिन्न तत्व उस क्षेत्र की संस्कृति को आकार देते हैं।

    संस्कृति का मनुष्य जाति पर प्रभाव

    संस्कृति की शास्त्रीय व्याख्या के अनुसार मनुष्य आज जो कुछ भी है, वह संस्कृति की देन है। यदि मनुष्य से उसकी संस्कृति छीन ली जाये तो मनुष्य श्री-हीन हो जायेगा। विद्वानों का मानना है कि आज मनुष्य इसलिये मनुष्य है क्योंकि उसके पास संस्कृति है। भारतीय दर्शन के अनुसार संस्कृति मनुष्य की आत्मोन्नति का मापदण्ड भी है और आत्माभिव्यक्ति का साधन भी। संस्कृति चेतन धर्म है। संस्कृति को केवल बाह्य रूप या क्रिया ही नहीं मान लेना चाहिये। उसका आधार जीवन के मूल्यों में है और पदार्थों के साथ स्व को जोड़ने की सूक्ष्म कला में है। श्यामचरण दुबे ने लिखा है, संस्कृति के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन की पूर्ण पृष्ठभूमि में अपना स्थान पाता है और संस्कृति के द्वारा उसे जीवन में रचनात्मक संतोष के साधन उपलब्ध होते हैं।


    पर्यावरण एवं संस्कृति का सम्बन्ध

    पर्यावरण एवं संस्कृति का सम्बन्ध अन्योन्याश्रित है। अर्थात् दोनों एक दूसरे पर निर्भर हैं। एक के बदलने से दूसरा स्वतः बदल जाता है। इसे इस तरह समझा जा सकता है कि सृष्टि के आरम्भ में पर्यावरण सभ्यता को जन्म देता है। दूसरे चरण में सभ्यता, संस्कृति को जन्म देती है तथा तीसरे चरण में संस्कृति पर्यावरण को संवारती या विनष्ट करती है।

    पर्यावरण का संस्कृति पर प्रभाव

    किसी क्षेत्र के पर्यावरण का उस क्षेत्र की संस्कृति पर गहरा प्रभाव होता है। उदाहरण के लिये अत्यधिक ठण्डे एवं अत्यधिक गर्म प्रदेशों के लोग अपने घरों को इस प्रकार बनायेंगे कि उनके घरों में वायु का सीधा प्रवेश न हो जबकि समशीतोष्ण जलवायु युक्त क्षेत्रों में रहने वाले लोग अपने घरों को इस प्रकार बनायेंगे कि उनके घरों में वायु का सीधा और निर्बाध प्रवेश हो। ठण्डे प्रदेशों में निवास करने वाले लोग अपने खान-पान में मांस एवं मदिरा को अधिक मात्रा में सम्मिलित करना पसंद करेंगे जबकि गर्म प्रदेश के निवासी अपने खान-पान में वनस्पति, दूध-दही एवं छाछ को अधिक सम्मिलित करेंगे। ठण्डे प्रदेश के लोग ऊनी, मोटे और चुस्त कपड़े पहना पसंद करेंगे जबकि गर्म प्रदेश के लोग सूती, पतले तथा ढीले कपड़े पहनेंगे। गर्म प्रदेश के लोग चर्च में जूते पहनकर जाना पसंद करेंगे जबकि गर्म प्रदेश के लोग अपने जूते मंदिरों एवं मस्जिदों से बाहर उतारना पसंद करेंगे। बाह्य पर्यावरण के कारण अपनाई गई खान-पान एवं रहन-सहन की आदतों का मनुष्य की कार्य क्षमता एवं उसकी बौद्धिक क्षमता पर गहरा असर होता है। जिन लोगों के भोजन में मदिरा का समावेश होगा तथा जो चुस्त कपड़े पहनेंगे, वे अधिक समय तक काम करेंगे किंतु वे स्वभाव से उग्र होंगे तथा भौतिक प्रगति पर अधिक ध्यान देंगे। जबकि जिन लोगों के भोजन में दही एवं छाछ का समावेश होगा तथा कपड़े ढीले होंगे, उनका शरीर तुलनात्मक दृष्टि से कम समय तक काम कर सकेगा किंतु उनकी प्रवृत्ति शांत होगी तथा वे आध्यात्मिक प्रगति पर अधिक ध्यान देंगे।

    निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि मानव और प्रकृति के बीच के सम्बन्धों की प्रतिक्रिया केवल भौतिक ही नहीं होती, अपितु बौद्धिक भी होती है।

    संस्कृति का पर्यावरण पर प्रभाव

    जिस प्रकार पर्यावरण का संस्कृति पर प्रभाव होता है, उसी प्रकार संस्कृति का पर्यावरण पर गहरा प्रभाव होता है। किसी भी भू-भाग में रहने वाले मानव समुदाय की आदतें, स्वभाव, प्रवृत्तियाँ, रीति-रिवाज, परम्पराएं, धार्मिक विश्वास, तीज-त्यौहार, पर्व, अनुष्ठान आदि विभिन्न तत्व, संस्कृति के ऐसे अंग हैं जो धरती के पर्यावरण को गहराई तक प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिये राजस्थान के सामंती परिवेश में शेरों, शूकरों एवं हरिणों का शिकार एक परम्परा के रूप में प्रचलित रहा। इसका परिणाम यह हुआ कि जंगल असुरक्षित हो गये और भारी मात्रा में मनुष्यों द्वारा सहज रूप से काट कर नष्ट कर दिये गये। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पनपी उपभोक्तावादी संस्कृति, तेजी से बढ़ती जनसंख्या, बेरोजगारी का प्रसार तथा वनों के प्रति आदर के अभाव ने जंगलों को तेजी से गायब किया। आज जहाँ भारत में जहाँ 23.28 प्रतिशत जंगल हैं, वहीं राजस्थान में केवल 9.54 प्रतिशत भू-भाग पर जंगल बचे हैं।

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  • अजमेर का इतिहास - 71

     01.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 71

    अजमेर में संवैधानिक विकास



    नॉर्थ-वेस्ट प्रोविंस के हिस्से के रूप में अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत में विभिन्न राजनैतिक एवं प्रशासकीय कठिनाइयों को अनुभव किया गया। इसलिये ई.1871 में अजमेर-मेरवाड़ा को नया एवं नॉन रेग्यूलेशन प्रोविंस घोषित किया गया। अंग्रेज अधिकारियों द्वारा कहा गया कि अजमेर प्रांत को प्रशासनिक दक्षता के मॉडल के रूप में विकसित किया जायेगा। साथ ही यह भी विचार किया गया कि इस प्रांत का प्रशासनिक व्यय, प्रांत से ही प्राप्त राजस्व में से किया जायेगा। यद्यपि अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत की स्थापना के समय ब्रिटिश सरकार द्वारा कहा गया कि नया प्रोविंस प्रशासनिक दक्षता को बढ़ाने के लिये बनाया जा रहा है तथापि वास्तविकता यह थी कि ब्रिटिश सरकार एजीजी की खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित करना चाहती थी।

    मार्ले मिण्टो सुधार

    ई.1911 में देश में मार्ले मिण्टो सुधार लागू किये गये जिनके कारण ब्रिटिश भारत के प्रांतों के प्रशासन में बड़ा परिवर्तन आया किंतु अजमेर-मेरवाड़ा के प्रशासन में कोई परिवर्तन नहीं किया गया।

    मॉण्टेग्यू चैम्सफोर्ड सुधार योजना

    ई.1924 में मॉण्टेग्यू चैम्सफोर्ड सुधार योजना के अंतर्गत भी अजमेर-मेरवाड़ा के प्रशासनिक ढांचे में कोई परिवर्तन नहीं किया गया। एक मात्र सुधार यह हुआ कि अजमेर-मेरवाड़ा का एक प्रतिनिधि केन्द्रीय विधान सभा (सेन्ट्रल-लेजिस्लेटिव एसेम्बली) में भेजे जाने की स्वीकृति दी गई।

    अजमेर में ज्युडीशियल मेम्बर नियुक्त

    ई.1925 में अजमेर-मेरवाड़ा के लिये नवीन म्युन्सिपेलिटीज रेग्यूलेशन लागू किया गया। ई.1925 में हरिभाऊ उपाध्याय ने अजमेर में सस्ता साहित्य मण्डल की स्थापना की। ई.1926 में उपाध्याय ने अजमेर की राजनीति में प्रवेश किया। ई.1926 में अजमेर-मेरवाड़ा के लिये एक ज्युडीशियल मेम्बर की नियुक्ति की गई तथा मुख्य आयुक्त की न्यायिक शक्तियां समाप्त कर दी गयीं।

    साइमन कमीशन

    ई.1927 में भारत में साइमन कमीशन आया। इस कमीशन द्वारा दी गई रिपोर्ट में कहा गया कि अजमेर-मेरवाड़ा में किसी प्रकार के संवैधानिक परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है। इसके साथ ही आयोग ने भारत सरकार को सिफारिश की कि अजमेर-मेरवाड़ा से जो पहले निर्वाचित प्रतिनिधि केन्द्रीय विधानसभा में भेजा जाता था, अब वह चीफ कमिश्नर द्वारा मनोनीत किया जाये। इस रिपोर्ट की अजमेर में तीव्र प्रतिक्रिया हुई।

    भारत सरकार अधिनियम 1935

    ई.1935 में नया भारत सरकार अधिनियम पारित हुआ। इसका तृतीय भाग 1 अप्रेल 1937 से लागू किया गया। इसके बाद अजमेर के प्रशासनिक ढांचे में एक बार फिर परिवर्तन आया। अजमेर-मेरवाड़ा को भारत सरकार के पोलिटिकल विभाग से हटाकर, गृह विभाग के अधीन कर दिया गया क्योंकि नये संविधान के अनुसार भारत सरकार के पोलिटिकल विभाग का प्रशासनिक नियंत्रण क्राउन प्रतिनिधि वायसराय के अधीन दे दिया गया था।

    नये अधिनियम के अनुसार क्राउन प्रतिनिधि (वायसरॉय) को ब्रिटिश भारत के मामलों में बोलने का अधिकार नहीं रह गया था। यह व्यवस्था भी की गई कि भविष्य में अजमेर के कमिश्नर एवं असिस्टेण्ट कमिश्नर यूनाइटेड प्रोविंस सिविल सेवा के अधिकारी होंगे। इनकी नियुक्ति तीन साल के लिये होगी तथा ये एजेण्ट टू दी गवर्नर जनरल फॉर राजपूताना के नीचे काम करेंगे। एजेण्ट टू दी गवर्नर जनरल का पदनाम बदलकर रेजीडेण्ट इन राजपूताना तथा चीफ कमिश्नर अजमेर मेरवाड़ा कर दिया गया।

    भारत सरकार अधिनियम 1935 में यह प्रावधान किया गया था कि जब संघीय संविधान का निर्माण होगा, तब अजमेर-मेरवाड़ा तथा पांठ-पीपलोदा के लिये संयुक्त रूप से, संघीय विधान सभा में एक सदस्य तथा संघीय विधान परिषद में एक सदस्य का प्रतिनिधित्व होगा। यह भी प्रावधान किया गया कि भविष्य में अजमेर प्रांत के लिये कानून का निर्माण गवर्नर जनरल की परिषद के स्थान पर संघीय विधान द्वारा किया जायेगा। इस समय अजमेर-मेरवाड़ा में जो भी कानून चल रहे थे उन्हें किसी संवैधानिक संस्था द्वारा लागू नहीं किया गया था।

    1 अप्रेल 1937 से अनुसूचित जिला अधिनियम (शिड्यूल्ड डिस्ट्रिक्ट्स एक्ट) अप्रभावी बना दिया गया। 1 अप्रेल 1937 से पहले अजमेर मेरवाड़ा क्षेत्र का पुलिस बल, राजपूताना की रेलवे भूमि तथा आबू में पट्टे की जमीनें एजेण्ट टू दी गवर्नर जनरल ऑफ राजपूताना के अधीन हुआ करती थीं। 1 अप्रेल 1937 से ये सारे विषय चीफ कमिश्नर ऑफ अजमेर-मेरवाड़ा के प्रशासनिक नियंत्रण में दे दिये गये। ई.1947 तक अजमेर में लगभग यही संवैधानिक व्यवस्था चलती रही।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-8

     01.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-8

    पर्यावरण एवं संस्कृति का सम्बन्ध(2)



    पर्यावरण को सुरक्षित बनाने वाली संस्कृति

    जिन समुदायों में प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का चिंतन किया जाता है, उस क्षेत्र की संस्कृति इस प्रकार विकसित होती है कि उससे पर्यावरण को कोई हानि नहीं पहुंचती। अपितु पर्यावरण की सुरक्षा होती है। भारत में वृक्षों, नदियों, समुद्रों तथा पर्वतों की पूजा करने से लेकर गायों को रोटी देने, कबूतरों एवं चिड़ियों को दाना डालने, गर्मियों में पक्षियों के लिये पानी के परिण्डे बांधने, बच्छ बारस को बछड़ों की पूजा करने, श्राद्ध पक्ष में कौओं को ग्रास देने, नाग पंचमी पर नागों की पूजा करने जैसे धार्मिक विधान बनाये गये जिनसे मानव में प्रकृति के प्रति संवेदना, आदर और कृतज्ञता का भाव उत्पन्न होता है। भारतीय संस्कृति में सादगी पर सर्वाधिक जोर दिया गया है। सादा जीवन व्यतीत करने वाला व्यक्ति कभी भी अपनी आवश्यकताओं को इतना नहीं बढ़ायेगा कि पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े। संत पीपा का यह दोहा इस मानसिकता को बहुत अच्छी तरह व्याख्यायित करता है-


    स्वामी होना सहज है, दुरलभ होणो दास।

    पीपा हरि के नाम बिन, कटे न जम की फांस।।

    पर्यावरण को क्षति पहुँचाने वाली संस्कृति

    जिस संस्कृति में ऊर्जा की अधिकतम खपत हो, वह संस्कृति धरती के पर्यावरण में गंभीर असंतुलन उत्पन्न करती है। पश्चिमी देशों में विकसित उपभोक्तावादी संस्कृति, ऊर्जा के अधिकतम खपत के सिद्धांत पर खड़ी हुई है। इस संस्कृति ने धरती के पर्यावरण को अत्यधिक क्षति पहुँचाई है। इस संस्कृति का आधार एक ऐसी मानसिकता है जो मनुष्य को व्यक्तिवादी होने तथा अधिकतम वस्तुओं के उपभोग के माध्यम से स्वयं को सुखी एवं भव्यतर बनाने के लिये प्रेरित करती है। ऐसी संस्कृति में इस बात पर विचार ही नहीं किया जाता कि व्यक्तिवादी होने एवं अधिकतम सुख अथवा भव्यता प्राप्त करने की दौड़ में प्रकृति एवं पर्यावरण का किस बेरहमी से शोषण किया जा रहा है तथा उसके संतुलन को किस तरह से सदैव के लिये नष्ट किया जा रहा है। पश्चिमी देशों एवं अमरीका में विकसित फास्ट फूड कल्चर, यूज एण्ड थ्रो कल्चर तथा डिस्पोजेबल कल्चर, पर्यावरण को स्थाई रूप से क्षति पहुंचाते हैं।

    भारत में प्रति व्यक्ति विद्युत उपभोग 778.71 किलोवाट तथा राजस्थान में प्रति व्यक्ति विद्युत उपभोग 736.20 किलोवाट है। इसके विपरीत, कनाडा में प्रति व्यक्ति विद्युत उपभोग 17,053 किलोवाट तथा अमरीका में 13,647 किलोवाट है जो कि राजस्थान की तुलना में क्रमशः 23.16 तथा 18.54 गुना अधिक है। अमरीका में प्रति व्यक्ति विद्युत उपभोग इतना अधिक है कि यदि पूरी दुनिया के लोग उसी औसत के अनुसार बिजली खर्च करें तो पूरी दुनिया के विद्युत संसाधन (कोयला, डीजल, नेफ्था, नेचुरल गैस आदि) मात्र 50 साल में चुक जायें। जिस लिविंग स्टैण्डर्ड के लिये अमरीका के लोगों को इतना गर्व है, यदि धरती के समस्त मनुष्य उस लिविंग स्टैण्डर्ड का उपयोग करें तो पूरी धरती के संसाधन मात्र 37 साल में चुक जायेंगे। यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि पूरे विश्व में प्रति व्यक्ति विद्युत उपभोग का औसत 2,782 किलोवाट है। इसकी तुलना में राजस्थान में प्रति व्यक्ति विद्युत उपभोग लगभग एक चौथाई है।

    निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि उपभोक्तावादी संस्कृति, धरती के पर्यावरण में भयानक असंतुलन उत्पन्न करती है। इस उपभोक्तावादी संस्कृति के विरोध में ईसा मसीह द्वारा आज से दो हजार साल पहले कही गई यह बात आज भी सुसंगत है 'सुईं के छेद में से ऊँट भले ही निकल जाये किंतु एक अमीर आदमी स्वर्ग में प्रवेश नहीं पा सकता।'

    पर्यावरणीय संस्कृति एवं विनाशकारी संस्कृति के उदाहरण

    प्रकृति के संसाधनों को क्षति पहुंचाये बिना उनका उपयोग करना, पर्यावरणीय संस्कृति का नियम है जबकि यूज एण्ड थ्रो कल्चर, डिस्पोजेबल कल्चर, उपभोक्तावादी मानसिकता एवं बाजारीकरण की प्रवृत्तियां पर्यावरण को क्षति पहुंचाने वाली एवं विनाशकारी संस्कृति की प्रवृत्ति है। कागज की थैलियों, मिट्टी के सकोरों तथा पत्तों के दोनों का उपयोग पर्यावरणीय संस्कृति का उदाहरण हैं। क्योंकि ये तीनों ही, नष्ट होने के बाद फिर से उसी रूप में धरती को प्राप्त हो जाते हैं। जबकि पॉलिथीन कैरी बैग्ज, प्लास्टिक की तश्तरियां तथा थर्मोकोल के गिलास, यूज एण्ड थ्रो कल्चर का उदाहरण हैं क्योंकि इन वस्तुओं की सामग्री फिर कभी भी अपने मूल रूप में प्राप्त नहीं की जा सकती। फाउण्टेन इंक पैन का उपयोग पर्यावरणीय संस्कृति का उदाहरण है तो बॉल पॉइण्ट पैन डिस्पोजेबल कल्चर का उदाहरण है। नीम और बबूल की दांतुन पर्यावरणीय संस्कृति का उदाहरण है तो टूथपेस्ट और माउथवॉश का उपयोग उपभोक्तावादी एवं बाजारीकरण की संस्कृति का उदाहरण हैं। मल त्याग के बाद पानी से प्रक्षालन पर्यावरणीय संस्कृति है तो कागज का प्रयोग यूज एण्ड थ्रो कल्चर है। शेविंग के बाद केवल ब्लेड बदलना, पर्यावरण के लिये कम क्षतिकारक है जबकि पूरा रेजर ही फैंक देना, पर्यावरण के लिये अधिक विनाशकारी है।

    भारत में किसी इंजन या मशीन के खराब हो जाने पर उसे ठीक करवाया जाता है और ऐसा लगातार तब तक किया जाता है जब तक कि उसे ठीक करवाना असंभव अथवा अधिक खर्चीला न हो जाये किंतु अमरीका का आम आदमी, कम्पयूटर खराब होते ही कूड़े के ढेर में, कार खराब होते ही डम्पिंग यार्ड में, घड़ी, कैलकुलेटर, सिलाई मशीन आदि खराब होते ही घर से बाहर फैंक देता है जिन्हें नगरपालिका जैसी संस्थाओं द्वारा गाड़ियों में ढोकर समुद्र तक पहुुंचाया जाता है। इससे समुद्र में प्रदूषण होता है तथा बड़ी संख्या में समुद्री जीव मर जाते हैं। एक आम भारतीय अपनी कार को तब तक ठीक करवाता रहता है जब तक कि उसे बेच देने का कोई बड़ा कारण उत्पन्न नहीं हो जाता किंतु उसे कभी भी कूड़े के ढेर या समुद्र में नहीं फैंका जाता। उसका पुर्जा-पुर्जा अलग करके किसी न किसी रूप में प्रयोग में लाने लायक बना लिया जाता है या फिर उसके मैटरीयल को रीसाइकिलिंग में डाल दिया जाता है। भारत में कबाड़ियों द्वारा घर-घर जाकर खरीदी जाने वाली अखबारी रद्दी और खाली बोतलें श्रम आधारित भारतीय संस्कृति के पूंजीवादी अमरीकी कल्चर से अलग होने का सबसे बड़ा प्रमाण हैं।

    भारत भर के सरकारी एवं ग्रामीण क्षेत्र के विद्यालयों में छात्रों द्वारा किताबों को बार-बार प्रयोग में लाये जाने के लिये पुस्तकालयों के साथ-साथ बुक बैंक स्थापित किये जाते हैं। ये बुक बैंक छात्रों को अपनी पढ़ाई का व्यय नियंत्रण में रखने में सहायक होते हैं। इन बुक बैंक का सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि देश को उन पुस्तकों के कागज एवं मुद्रण के लिये बार-बार पूंजी व्यय नहीं करनी पड़ती। इन बुक बैंक के साथ-साथ भारत में पुरानी पुस्तकें (सैकेण्ड हैण्ड बुक्स) खरीदने-बेचने का काम भी बड़े स्तर पर होता है। बड़े से बड़े धनी व्यक्ति को यह जानकारी होती है कि उनके शहर में पुरानी किताबें कहाँ खरीदी और बेची जाती हैं।

    पुरानी किताबों से पढ़ना असुविधाजनक हो सकता है किंतु उन पर कम पूंजी व्यय करनी पड़ती है तथा कागज की बचत होती है। इसके विपरीत पूंजीवादी व्यवस्था में हर छात्र को स्कूल से ही पूरा बैग तैयार मिलता है जिसमें प्रत्येक किताब नयी होती है। इस प्रकार हर अभिभावक को अपने बच्चों की पुस्तकें खरीदने के लिये हर साल अधिक पूंजी व्यय करनी पड़ती है तथा देश को पुस्तकें छापने के लिये बड़े स्तर पर कागज की आवश्यकता होती है। दुर्भाग्यवश भारत के नगरीय क्षेत्रों में इसी पूंजीवादी व्यवस्था का प्रसार हो गया है। भारतीय रोटी को प्याज, लहसुन, चटनी, मिर्च, अचार, उबले हुए आलू तथा छाछ जैसी सस्ती चीजों के साथ खाया जा सकता है जबकि ब्रेड के लिये बटर और जैम की आवश्यकता होती है जो पर्यावरणीय संस्कृति की बजाय पूंजीवादी संस्कृति के उपकरण हैं।


    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति

    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति के मर्म को जानने से पहले हमें राजस्थान के पर्यावरणीय तत्त्वों अर्थात् राजस्थान के भूगोल, जलवायु, जल संसाधन, मिट्टियाँ, खनिज, वन, कृषि, पशुधन तथा मानव अधिवास के बारे में जानना आवश्यक होगा जिनकी चर्चा हम अगले अध्यायों में करेंगे।

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  • अजमेर का इतिहास - 72

     01.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 72

    उन्नीसवीं शताब्दी में अजमेर से प्रकाशित उर्दू समाचार पत्र



    खैरख्वाह खालिक (ई.1860)

    ई.1860 में अयोध्या प्रसाद ने अजमेर से उर्दू भाषा का साप्ताहिक समाचार पत्र खैरख्वाह खालिक आरम्भ किया। यह आठ पृष्ठों का समाचार पत्र था। यह देश विदेश के विभिन्न समाचारों के साथ राजनैतिक लेख भी प्रकाशित करता था। इसकी गणना 19वीं शताब्दी में राजपूताने के महत्त्वपूर्ण समाचार पत्रों में की जा सकती है। यह ब्रिटिश नीतियों एवं ब्रिटिश जातिभेद की जमकर आलोचना करता था। ईसाई मिशनरियों द्वारा भारतीयों को बलपूर्वक ईसाई बनाने की नीति की भी इस समाचार पत्र ने जमकर भर्त्सना की। इस कारण कुछ समय पश्चात् ही इस समाचार पत्र पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

    इमदाद साबरी ने लिखा था कि सरकार ने इस अखबार की स्वतंत्र नीति को बुरी दृष्टि से देखा। विद्रोह के बाद से समाचार पत्रों को स्वतंत्रता प्राप्त नहीं थी। इसलिये सरकार ने इसके प्रकाशन को बंद कर दिया। 19वीं शताब्दी में राजपूताना का यह प्रथम ब्रिटिश विरोधी समाचार पत्र था। इस कारण सरकार ने इसे बंद कर दिया। दूसरे पत्रों के बंद होने का कारण आर्थिक था न कि राजनैतिक। इसके सम्पादक अयोध्या प्रसाद अजमेर कॉलेज के विद्यार्थी थे तथा उन्हें अंग्रेजी भाषा का अच्छा ज्ञान था। उनकी भाषा सरल थी जिस पर हिन्दुस्तानी एवं अंग्रेजी का असर था। उन्होंने कुछ पुस्तकें भी लिखी थीं।

    राजपूताना अखबार (ई.1869)

    जनवरी 1869 में बूटासिंह ने अजमेर से साप्ताहिक समाचार पत्र 'राजपूताना अखबार' आरंभ किया। इसके सम्पादक वजीर अली और संचालक बाबा हीरासिंह थे। यह 12 पृष्ठों में छपता था। इसका वार्षिक चंदा अमीरों से 12 रुपया तथा जन साधारण से 3 रुपये 10 आना लिया जाता था। यह मेयो प्रेस अजमेर में छपता था। इसमें राजपूताना के समाचारों के साथ-साथ विदेशी समाचार पत्रों से भी समाचार लेकर प्रकाशित किये जाते थे।

    ऑफिशियल गजट (ई.1869)

    जनवरी 1869 में बूटासिंह ने इस साप्ताहिक समाचार पत्र को आरम्भ किया। इसके सम्पादक भी वजीर अली थे। यह केवल चार पृष्ठों का समाचार पत्र था। इसका वार्षिक चंदा 3 रुपये था। इस पत्र में मुख्यतः ऑफिस से सम्बन्धित सूचनाएं प्रकाशित की जाती थीं। राजपूताना अखबार की तरह यह पत्र भी साधारण था किंतु इन दानों पत्रों के प्रकाशन बंद होने के सम्बन्ध में कोई सूचना नहीं मिलती।

    रिखाला अन्जुमन रिफाऐ-आम राजपूताना (ई.1873)

    रिखाला अन्जुमन रिफाऐ-आम नामक सोसाइटी ने ई.1873 में अजमेर से उर्दू भाषा में 'रिखाला अन्जुमन रिफाऐ-आम राजपूताना' नाम से 80 पृष्ठ का त्रैमासिक समाचार पत्र आरंभ किया। सोसाइटी के सचिव पण्डित भगतराम इसके सम्पादक थे। इसका मुद्रण और लेखन बहुत सुंदर था। कोहेनूर प्रेस लाहौर में इसका मुद्रण होता था। इसका मुख्य उद्देश्य रिखाला अन्जुमन रिफाऐ-आम राजपूताना की कार्यवाहियों पर प्रकाश डालना था। इसमें सामाजिक, धार्मिक एवं उर्दू साहित्य से सम्बन्धित आलेख प्रकाशित होते थे।

    चिराग राजस्थान (ई.1875)

    मौलवी मुराद अली बीमार ने 29 नवम्बर 1873 को अजमेर से उर्दू भाषा में चिराग राजस्थान आरंभ किया। इसमें 8 पृष्ठ होते थे और इसका वार्षिक चंदा 8 रुपये था। इसमें देश विदेश के समाचार दूसरे पत्रों से लेकर छापे जाते थे।

    राजपूताना गजट (ई.1881)

    यह साप्ताहिक समाचार पत्र था जिसे मौलवी मुराद अली ने 1881 में अजमेर से उर्दू भाषा में आरम्भ किया। इसमें हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाओं में लेख तथा समाचार प्रकाशित किये जाते थे।

    मिफ्ता हुल कवानीन (ई.1883)

    प्रो. मुंशी नंदकिशोर ने 13 जनवरी 1883 को अजमेर से उर्दू भाषा में यह 16 पृष्ठों की मासिक पत्रिका आरम्भ की। इसके सम्पादक एवं मालिक नंद किशोर थे। इसका वार्षिक चंदा तीन रुपये आठ आना था। यह एक कानूनी पत्रिका थी। इसमें अदालती कार्यवाहियों के फैसले इत्यादि प्रकाशित होते थे।

    नालाऐ उश्शाक (ई.1884)

    1 नवम्बर 1884 को सैयद नजर सखा और अब्दुल गफूर सखा ने अजमेर से 24 पृष्ठ की यह उर्दू मासिक पत्रिका नालाऐ उश्शाक आरंभ की जिसमें उर्दू साहित्य से सम्बन्धित लेख छपा करते थे। इसका वार्षिक चंदा एक रुपया था। यह सेठ मजीर अली प्रेस अजमेर में छपा करती थी।

    दाग (ई.1888)

    जनवरी 1888 में माधो प्रसाद भार्गव ने अजमेर से उर्दू भाषा की मासिक पत्रिका दाग का प्रकाशन किया। इसका वार्षिक चंदा एक रुपया था। यह अपनी ही प्रेस में छपती थी। इस पत्रिका में केवल शायरों के कलाम छपते थे।

    मोइनुल हिन्द (ई.1893)

    ई.1893 में सिकन्दरखां ने अजमेर से 8 पृष्ठों का उर्दू साप्ताहिक समाचार पत्र मोहनुल हिन्द प्रारंभ किया। इसका वार्षिक चंदा 12 रुपये था। इसमें दूसरे समाचार पत्रों से समाचार लेकर प्रकाशित किये जाते थे। इसकी अपनी स्वयं की प्रेस थी।

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  • अंतिम उपदेश/ कहानी/डॉ. मोहनलाल गुप्ता

     02.06.2020
    अंतिम उपदेश/ कहानी/डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    अंतिम उपदेश/ कहानी/डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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    हात्माजी बड़े प्रसन्न हैं। जंगल के जानवरों पर उनके प्रवचनों का अच्छा प्रभाव पड़ रहा है। जंगल का सम्पूर्ण वातारण ही जैसे बदल गया है। अब बहुत से भेड़िये नदी पर पानी पीने आते तो हरिणों तथा खरगोशों की ओर आंख उठाकर भी नहीं देखते। बहुत से गीदड़, जरख, लक्कड़बग्घे और लोमड़े गले में तुलसी मालाएं डालकर रामधुन गाते हुए जंगल की पगडण्डियों पर विचरण करते हुए दिखाई देते हैं तो महात्माजी का रोम-रोम पुलकित हो उठता है। नदियों के घाट पूरी तरह सुरक्षित हो गये हैं, अब वहाँ हिंसा पूरी तरह बंद हो गई है।

    बाघ और तेंदुए तो अब जंगल में दूर-दूर तक दिखाई नहीं देते। महात्माजी ने भेड़ियों से पूछा कि जब वे इस जंगल में आये थे तो बहुत से बाघ-बघेरे, तेंदुए और चीते दिखाई देते थे किंतु अब उनमें से एक भी दिखाई नहीं देता तो भेड़ियों ने अत्यंत आदर से शीश झुकाकर महात्माजी से निवेदन किया कि वे पातकी और हिंसक प्राणी, महात्माजी के व्यक्तित्व से प्रभावित हो, यह जंगल छोड़कर दूसरे जंगलों में चले गये हैं। महात्माजी ने उस दिन ईश्वर को कोटि-कोटि धन्यवाद दिया कि जंगल में अब खरगोश और हरिण जैसे निरीह प्राणी पूरी तरह सुरक्षित हो गये हैं।

    यहाँ तक तो सब कुछ अद्भुत और प्रभावकारी था किंतु महात्माजी ने एक विचित्र बात भी अनुभव की कि जहाँ एक ओर जंगल के हिंसक पशु इतने सात्विक हो गये हैं, वहीं निरीह प्राणियों में हिंसक पशुओं के प्रति अविश्वास का भाव तनिक भी नहीं घटा। महात्माजी इन निरीह प्राणियों को समझाने का बहुत प्रयास करते किंतु निरीह प्राणियों के चेहरों से अविश्वास के भाव जाते ही नहीं। महात्माजी का मन तब बहुत विचलित हो जाता है, जब वे देखते हैं कि लाख उपदेशों के उपरांत भी खरगोशों, भेड़ों, बकरियों और हरिणों के चेहरों पर प्रसन्नता के वे भाव नहीं आते, जिनकी अपेक्षा महात्माजी को है। फिर भी महात्माजी को विश्वास है कि जिस प्रकार हिंसक पशुओं के मन में सत्य के प्रति निष्ठा जागृत हुई है, उसी प्रकार निरीह पशुओं के मन में भी सत्य की शक्ति के प्रति भरोसा उत्पन्न हो ही जायेगा। इसलिये वे जंगल में घूम-घूम कर पशु-पक्षियों को उपदेश देते रहे।

    जंगल में दिन छोटे और ठण्डे ही होते हैं किंतु जब सर्दियां बीत गईं और गर्मियां आ गईं तो जंगल में भी दिन लम्बे और गर्म हो गये। विशेष रूप से दुपहरी बहुत लम्बी होने लगी किंतु दिन का यही हिस्सा ऐसा होता है जिसमें जंगल सर्वाधिक शांत होता है। एक दिन दुपहरी में सूरज आकाश के मध्य तप रहा था और जंगल के समस्त पशु-पक्षी अपने आश्रय स्थलों में विश्राम कर रहे थे। यह महात्माजी के स्वाध्याय का समय होता है और उनके स्वाध्याय में कोई पशु-पक्षी विघ्न उत्पन्न नहीं करता। अचानक कुटिया के द्वार पर हलचल हुई। महात्माजी ने ग्रंथ पर से आंख हटाकर द्वार की ओर देखा तो देखते ही रह गये। कुटिया के द्वार पर दो सुंदर हरिण शावक खड़े हुए थे और उत्सुक नेत्रों से महात्माजी की ओर ताक रहे थे। इतने सुंदर, इतने निरीह, इतने भोले हरिण शावक महात्माजी ने अब से पहले कभी नहीं देखे थे। महात्माजी का मन आनंद से नाच उठा। वे अपने स्थान से उठे और उन्होंने हरिण शावकों को गोद में भर लिया।

    -‘आओ मेरे बच्चो! तुम्हारा इस कुटिया में स्वागत है।' महात्माजी ने उन्हें पीने के लिये जल दिया और कहा, दोपहर में इधर-उधर मत भटको। तुम्हारी माँ तुम्हारे लिये परेशान हो रही होगी।

    हरिण शावकों ने महात्माजी की बात पर ध्यान नहीं दिया। उन्हें तो कुटिया में आ रही चंदन की सुगंध आकर्षित कर रही थी। वे उसी सुगंध का आनंद लेने लगे। कुटिया में रखे ग्रंथ भी उन्हें किसी अचरज से कम नहीं लग रहे थे। कुछ देर हरिण शावकों की निश्छल चेष्टाओं का आनंद लेने के बाद महात्माजी ने उन्हें अपने निकट बैठा लिया और फिर से स्वाध्याय में मन लगाने का प्रयास किया। महात्माजी का मन स्वाध्याय में नहीं लगा। उन्होंने ग्रंथ पर से दृष्टि हटा ली और हरिण शावकों की ओर देखा। हरिण शावक टकटकी लगाकर महात्माजी की ओर ही देख रहे थे। महात्माजी ने फिर से ग्रंथ उठा लिया और उच्च स्वर से उसका पाठ करने लगे। महात्माजी ने अनुभव किया कि हरिण शावक ध्यान लगाकर ग्रंथ का पाठ सुन रहे हैं। उस दिन महात्माजी को बहुत आनंद आया। उनके मन को असीम शांति मिली। उन्होंने निश्चय किया कि अब से वे स्वाध्याय करने के स्थान पर उच्च स्वर से ग्रंथ का वाचन करेंगे।

    संध्या होने को आई तो महात्माजी ने हरिण शावकों को अपनी माता के पास जाने के लिये कहा। दोनों हरिण शावकों ने महात्माजी को अभिवादन किया तथा उछलते कूदते महात्माजी की आंखों से ओझल हो गये। अगली प्रातः को जब महात्माजी ने कुटिया के बाहर आकर सूर्यदेव को प्रणाम किया तो उनके आश्चर्य का पार न रहा, दोनों हरिण शावक कुटिया के बाहर ही खेल रहे थे। महात्माजी को देखकर वे उनके निकट आकर उनकी टांगों से लिपट गये। महात्माजी का मन एक अनोखे आनंद से भर गया। ये कैसा आनंद है, महात्माजी ने विचार किया। इन निरीह प्राणियों की मित्रता ने महात्माजी के अंतः स्थल को किसी दिव्य अनुभूति से भिगो दिया था।

    महात्माजी ने आज भी दुपहरी मेें स्वाध्याय करने के स्थान पर ग्रंथों का उच्च स्वर से पाठ किया और दोनों हरिण शावक पूरे समय उनके निकट बैठकर उस पाठ को सुनते रहे। तीसरे दिन भी यही हुआ और चौथे दिन भी। फिर तो यह महात्माजी की दिनचर्या का नियमित भाग बन गया। तीनों प्राणी, अपनी इस अद्भुत पाठशाला में निमग्न रहते। कुछ दिन इसी प्रकार बीत गये। इधर ये तीनों प्राणी, शास्त्रों में निमग्न थे और उधर जंगल में कुछ अनपेक्षित और कुटिल चालें चली जाने लगीं। महात्माजी को पता ही नहीं चला कि जंगल में क्या कुछ चल रहा है।

    एक दिन महात्माजी प्रातःकाल में कुटिया से बाहर निकले तो हरिण शावक वहाँ नहीं थे। जब से हरिण शावकों ने कुटिया में आना प्रारम्भ किया था, तब से यह पहली बार था कि वे महात्माजी के बाहर आने से पहले कुटिया के द्वार पर उपस्थित नहीं थे। महात्माजी, हरिण शावकों को देखने के लिये व्यग्र हो उठे। एक प्रहर बीत गया किंतु हरिण शावक नहीं आये। महात्माजी ने शास्त्र खोले किंतु उनका मन ग्रंथ पढ़ने में नहीं लगा। हार कर, महात्माजी ने हरिण शावकों को ढूंढने के लिये जंगल में जाने का निश्चय किया। अभी वे लकुटी उठाकर कुटिया से बाहर आये ही थे कि उन्हें कुटिया की ओर आने वाली पगडण्डी पर धूल उड़ती हुई दिखाई दी। महात्माजी को लगा कि हरिण शावक ही दौड़ते हुए उनकी ओर आ रहे हैं।

    महात्माजी कुटिया के द्वार पर ही ठहर गये। उनका अनुमान सही था, दोनों हरिण शावक दौड़ते हुए उनकी ओर ही चले आ रहे थे। कुछ ही क्षणों में दोनों हरिण शावक महात्माजी के निकट पहुंच गये। महात्माजी ने उन दोनों को निकट आया देखकर संतोष की सांस ली किंतु यह देखकर उनके आश्चर्य का पार न रहा कि दोनों हरिण शावक आज महात्माजी के पैरों से न लिपटकर सीधे कुटिया के भीतर चले गये थे और एक कौने में छिपने का प्रयास करने लगे।

    महात्माजी ने देखा कि हरिण शावकों की त्वचा पर भेड़ियों के पंजों के चिह्न अंकित थे और दोनों की त्वचा से रक्त बह रहा था। महात्माजी को विश्वास नहीं हुआ, जो भेड़िये गले में तुलसी की माला डालकर जंगल की पगडण्डियों पर रामधुन गाते फिरते थे, उनमें हिंसा की प्रवृत्ति फिर से लौट आई थी।

    -‘किसने की तुम्हारी ये दशा ?’ महात्माजी ने हरिण शावकों से पूछा। नित्य की ही भांति हरिण शावकों ने प्रत्युत्तर नहीं दिया। उनकी कातर आंखों से आंसू बह रहे थे और वे भय के कारण थर-थर कांप रहे थे। शावकों की यह दशा देखकर महात्माजी के मन में करुणा का सागर उमड़ पड़ा। उन्होंने हरिण शावकों को गोद में उठा लिया।

    -‘चलो मेरे साथ चलो, मैं उन भेड़ियों की भर्त्सना करता हूँ। तुम्हारे साथ वे इस तरह का व्यवहार कैसे कर सकते हैं ?’ महात्माजी अभी अपनी बात कह ही रहे थे कि उन्हें पगडण्डी के उस ओर से रामधुन सुनाई दी। अवश्य ही वहाँ कुछ भेड़िये हैं, महात्माजी ने अनुमान लगाया और वे तेज कदमों से चलते हुए उसी दिशा में चल दिये।

    वास्तव में ही वहाँ कुछ भेड़िये थे जो एक पेड़ के नीचे बैठकर रामधुन गा रहे थे। महात्माजी को आया देखकर भेड़िये उठ खड़े हुए और उन्होंने महात्माजी के चरणों में प्रणाम किया। महात्माजी ने भेड़ियों को बताया कि आज हरिण शावकों के साथ क्या हुआ है! भेड़ियों ने शावकों के साथ हुए बुरे व्यवहार पर आश्चर्य जताते हुए, महात्माजी के समक्ष खेद व्यक्त किया और महात्माजी को आश्वस्त किया कि वे उन भेड़ियों को, इस बुरे काम के लिये लताड़ पिलायेंगे ताकि भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति न हो।

    भेड़ियों की क्षमा याचना से महात्माजी के चित्त की उद्विग्नता शांत हो गई। वे फिर से अपनी कुटिया में लौट आये। हरिण शावक अब भी कौने में दुबके हुए थे। महात्माजी ने शावकों की त्वचा पर औषधि का लेपन किया तथा शांत चित्त होकर ग्रंथ पढ़ने बैठ गये। शावक भी अपने घावों की पीड़ा भुलाकर महात्माजी के पास आकर बैठ गये। नित्य की ही भांति आज भी शास्त्रों के सेवन में तीनों प्राणियों को बहुत आनंद आया।

    संध्या होने को आई तो महात्माजी ने शावकों को अपने घर जाने के लिये कहा किंतु हरिण शावकों ने जाने से मना कर दिया। इस पर महात्माजी ने उन्हें कुटिया में ही रोक लिया। इसके बाद, हरिण शावक महात्माजी की कुटिया में ही रहने लगे। भेड़ियों के भय से वे भूलकर भी कुटिया के बाहर नहीं निकलते। महात्माजी ने शावकों को समझाया कि तुम जंगल के प्राणी हो, तुम्हें जंगल में विचरण करने के लिये अवश्य जाना चाहिये तथा भेड़ियों के साथ भी कुछ समय व्यतीत करना चाहिये ताकि वे तुम्हारे प्रति मित्रता का भाव रख सकें। भेड़िये अब तुम्हें कुछ नहीं कहेंगे क्योंकि उनकी प्रतााड़ना कर दी गई है।

    हरिण शावकों ने महात्माजी को बताना चाहा कि भेड़ियों की वास्तविक वृत्ति क्या है किंतु महात्माजी ने उनकी बात अनसुनी कर दी और उन्हें स्नेह से झिड़कते हुए कहा कि वे भेड़ियों के प्रति दुराग्रह न रखें, यदि हमारी दृष्टि बुराई पर ही रहेगी तो हमारे जीवन से बुरी चीजें कभी दूर नहीं जा सकेंगी। सदैव अच्छाई पर अपनी दृष्टि केन्द्रित करो। यही जीवन का चरम उत्कर्ष है। हरिण शावकों ने सिर झुका कर महात्माजी की बात सुन ली किंतु महात्माजी के आदेश के उपरांत भी कुटिया से बाहर निकलने से स्पष्ट मना कर दिया और महात्माजी के लाख प्रयास करने पर भी वे कुटिया से बाहर नहीं निकले।

    कुछ दिन और बीते। महात्माजी ने अनुभव किया कि अब पगडण्डियों के निकट रामधुन की आवाजें तेज हो गई हैं तथा गले में तुलसी माला पहने हुए भेड़ियों के झुण्ड जब-तब कुटिया के निकट से निकलते हुए दिखाई दे जाते हैं। जंगल से आती हुई रामधुनों को सुनकर तथा पगडण्डियों पर विचरण करते हुए रामनामी भेड़ियों को देखकर महात्माजी को असीम आनंद का अनुभव होता कि भेड़ियों में रामनाम के प्रति अनुराग बढ़ रहा है किंतु हरिण शावक भेड़ियों को देखते ही सहम कर कुटिया के कोने में छिप जाते।

    कुछ दिन और बीते। कुटिया के बाहर भेड़िये रामधुन गाते रहे और कुटिया के भीतर महात्माजी शावकों को धर्मग्रंथ सुनाते रहे। महात्माजी कुटिया से बाहर निकलते तो हरिण शावक उछलकर उनकी गोद में चढ़ने की चेष्टा करते। महात्माजी हँसकर उन्हें गोद में उठा लेते। जैसे ही भेड़िये महात्माजी को देखते तो वे श्रद्धा और विनय के वशीभूत होकर महात्माजी के चरणों की धूल लेते। महात्माजी उनकी इस सात्विक वृत्ति की प्रशंसा करते और उन्हें जी भरकर आशीर्वाद देते। इस प्रकार महात्माजी, भेड़ियों की ओर से पूरी तरह निश्चिंत थे किंतु शावकों का भय दिन पर दिन बढ़ता ही जाता था।

    एक दिन महात्माजी ने शावकों से कहा कि वे भेड़ियों में हर क्षण बुराई न देखें। उनमें भी बहुत अच्छाईयां हैं। कुछ भेड़िये बुरे हो सकते हैं किंतु समस्त भेड़िये बुरे नहीं हैं। हरिण शाावक सिर झुकाकर महात्माजी का प्रवचन सुनते किंतु कुछ प्रत्युत्तर नहीं देते। कुछ दिन और बीत गये। एक दिन महात्माजी कुटिया से बाहर निकले तो एक भेड़िये ने कहा कि महात्माजी आपके उपदेशों से हम तो अहिंसक और सात्विक हो गये हैं किंतु आप हमारी सदाशयता पर विश्वास ही नहीं करते। जब देखो इन शावकों को छाती से चिपकाये रहते हैं !

    महात्माजी ने हँसकर कहा कि बच्चे हैं, इसलिये डर गये हैं। कुछ दिनों में स्वतः ही समझ जायेंगे। मैं आप लोगों की सात्विक वृत्ति को देखकर प्रसन्न हूँ। कुछ दिन और बीत गये। भेड़ियों की सात्विकता और बढ़ गई किंतु शावकों की प्रवृत्ति में अंतर नहीं आया। महात्माजी यह देखकर हैरान थे कि भेड़ियों पर तो उपदेशों का प्रभाव होता है किंतु हरिण शावकों की वृत्ति में किंचित् अंतर नहीं आता।

    कुछ दिन और बीत गये। एक रात जंगल में तेज बरसात हुई। ठण्डी हवाओं में मिट्टी की सौंधी सुगंध घुल गई। वर्षा के जल में धुलकर वृक्षों के पत्ते और भी हरे तथा चमकदार हो गये। कुटिया के निकट लगे तुलसी के पौधों से तेज सुगंध निकलकर कुटिया के भीतर तथा आसपास के वातातरण में फैल गई। महात्माजी ने प्रकृति की इस उदारता के लिये ईश्वर का धन्यवाद दिया तथा पूजा के लिये पुष्प लेने कुटिया से बाहर निकले। दोनों हरिण शावक एक कौने में सोये पड़े थे।

    जैसे ही महात्माजी ने कुटिया से बाहर पैर धरा, भेड़ियों का एक झुण्ड उन पर टूट पड़ा। महात्माजी असावधान थे इसलिये धरती पर गिर गये। महात्माजी यह देखकर हैरान थे कि ये वही भेड़िये थे जो पगडण्डी के दूसरी तरफ बैठकर कई महीनों से रामधुन गा रहे थे। महात्माजी के मुंह से चीख निकल गई। ऐसा कैसे हुआ!

    एक भेड़िये ने महात्माजी की एक टांग में अपने तीखे दांत गढ़ा दिये। महात्माजी पीड़ा से चीख उठे। दूसरे भेड़िये ने उछलकर महात्माजी की गर्दन पकड़ ली। महात्माजी का दम घुटने लगा किंतु उन्होंने हिम्मत करके कुटिया का द्वार बंद करने की चेष्टा की। एक भेड़िये ने महात्माजी के हाथ में अपना जबड़ा धंसा दिया। फिर भी महात्माजी ने कुटिया का द्वार बाहर से बंद कर दिया।

    -‘ढोंगी साधु! कब तक तू इन हरिण शावकों के प्राण बचायेगा।’ एक भेड़िये ने महात्माजी की टांग चबाते हुए कहा।

    -‘मरते-मरते भी कुटिया के द्वार बंद करके हमें परेशान कर रहा है।’ दूसरे भेड़िये ने महात्माजी की बांह को जड़ से ही उखाड़ते हुए कहा।

    -‘कुटिया का द्वार आज नहीं तो कल हम खोल ही लेंगे किंतु इस पाखण्डी को तो रास्ते से हटाओ।’ एक भेड़िये ने कुटिया का चक्कर लगाकर शावकों तक पहुंचने का दूसरा मार्ग खोजने की चेष्टा की।

    महात्माजी के गले की नली कट चुकी थी और अब वे अंतिम सांसें ले रहे थे, उनकी आंखें बंद होने लगी थीं। किसी तरह महात्माजी ने आंखें खोलकर अपने चारों ओर देखा। कुछ भेड़िये महात्माजी के हाथों और टांगों को चबा रहे थे और कुछ भेड़ियों ने उनका पेट फाड़ डाला था। उन्हें समझ में आ गया था कि अब वे इस जंगल में कुछ ही क्षणों के अतिथि हैं।

    जब आंखें फिर से मुंदने लगीं तो महात्माजी के कानों में शावकों की कांपती हुई आवाजें सुनाई दीं, वे कुटिया के भीतर से महात्माजी को सावधान कर रहे थे- ‘आप इनसे बचकर भाग जाओ महात्माजी वरना ये भेड़िये आपको भी मार डालेंगे।’ महात्माजी की आंखों से आंसू बह निकले। वे समझ गये कि कुटिया के भीतर बंद शावकों को ज्ञात नहीं है कि भेड़ियों ने महात्माजी की क्या गत कर दी है।

    आज महात्माजी की समझ में वह बात आ गयी थी जो बात हरिण-शावक महात्माजी से कहने का प्रयास कर रहे थे किंतु अब इस बात को समझ लेने से कोई लाभ नहीं होने वाला था। महात्माजी ने अंतिम सांस लेने से पहले एक बार और आंखें खोलकर कुटिया के द्वार की ओर देखा, अब भेड़ियों ने कुटिया का द्वार पीटना आरम्भ कर दिया था। महात्माजी के पास इतना समय भी नहीं था कि वे हरिण शावकों को अंतिम उपदेश दे सकते।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • अजमेर का इतिहास - 73

     02.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 73

    उन्नीसवीं सदी में अजमेर में शैक्षणिक विकास


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    मिशनरी स्कूल


    नया बाजार (ब्यावर) में दी यूनाइटेड प्रेस्बाईटेरियन मिशन की ओर से डॉ. शूलब्रेड द्वारा ई.1860 में, एक धर्मान्तरित ईसाई (बाबू चिंताराम राजाराम ब्राह्मण) की सहायता से अजमेर-मेरवाड़ा क्षेत्र का पहला मिशनरी स्कूल खोला गया जो थोड़े दिनों में ही प्रसिद्ध हो गया। इसमें हिन्दी तथा उर्दू के साथ अंग्रेजी की भी शिक्षा दी जाती थी। शीघ्र ही इस स्कूल में छात्रों की संख्या 100 हो गई।

    मिशनरी स्कूल को सफल बनाने के लिये ब्यावर में पहले से ही चल रहे सरकारी स्कूल को बंद कर दिया गया तथा यह सोच कर कि इस क्षेत्र में लोग बहुत ही पिछड़े हुए हैं इसलिये इस स्कूल में बाइबिल की शिक्षा देनी आरंभ की गई। इससे ब्यावर के व्यापारी वर्ग में असंतोष उठ खड़ा हुआ तथा उन्होंने ब्राह्मणों एवं गुसाईंयों की सहायता से अपने बच्चों के लिये एक नया स्कूल खोल लिया।

    इस स्कूल में कुछ मेहतर बच्चों ने प्रवेश ले लिया जिससे नाराज होकर दो तिहाई छात्रों ने मिशनरी स्कूल में जाना बंद कर दिया। इस पर रेवर्ड (सम्मानित) मकालिस्टर ने रात्रि कालीन स्कूल खोलकर मिशनरी स्कूल को जीवित रखने का प्रयास किया। ई.1876 में एक ब्राह्मण ने अपना स्कूल मिशनरी स्कूल के साथ मिला दिया। इससे मिशनरी स्कूल को जीवन दान मिल गया।

    मार्च 1862 में इस स्कूल की एक शाखा अजमेर में खोली गई। तब अजमेर के पण्डितों ने अंग्रेज मिशनरियों के समक्ष एक शर्त रखी कि अजमेर की समस्त स्कूलों में से मेहतरों के बालकों को बाहर निकाला जाये। ग्लार्डन को यह शर्त स्वीकृत नहीं थी। इसलिये अंग्रेजी स्कूलों में से 103 लड़कों में से 92 बच्चों ने अपने नाम कटवा लिये। केवल चार हिन्दू तथा सात मुस्लिम लड़के ही अंग्रेजी स्कूलों में बचे।

    इस स्कूल की विशेषता यह थी कि यह अपनी कक्षायें सवेरे जल्दी लगाता था ताकि कार्यालयों एवं संस्थाओं में काम करने वाले क्लर्क एवं अन्य कर्मचारी भी इनमें आकर पढ़ सकें। इन सारे विरोधों के बावजूद अजमेर-मेरवाड़ा क्षेत्र में अंग्रेजी स्कूलों की संख्या बढ़ने लगी। समर्पित ईसाई पादरियों- डब्ल्यू शूलब्रेड, विलियम मार्टिन, जॉन रॉबसन, विलियम रॉब तथा डॉ. सी. एस. वेलेण्टाइन के लगातार प्रयासों से ई.1862 में नसीराबाद में, ई.1864 में टॉडगढ़ में, ई.1871 में देवली में, ई.1872 में जयपुर में अंग्रेजी स्कूल खुले।

    लड़कियों के लिये शिक्षण संस्थायें

    प्रथम मिशन गर्ल्स स्कूल ई.1862 में नसीराबाद में स्थानीय ईसाई महिला एमिला के प्रयासों से खुला। उसने एक घर में तीन बहिनों के सहयोग से यह स्कूल खोला। प्रेसबाइटेरियन मिशन की रिपोर्ट में इस स्कूल की सफलता की सराहना की गई। इस स्कूल में लिखना, पढ़ना, कसीदा करना, कपड़े सीना तथा क्रोशिया कार्य सिखाया जाता था। 1863 ई. में अजमेर में मिसेज लूसी फिलिप एवं एक ब्राह्मण स्त्री सरदारी द्वारा वर्नाक्यूलर गर्ल्स स्कूल खोला गया। इस स्कूल पर भी यह संदेह किया गया कि यह बच्चों को ईसाई बनाने के उद्देश्य से खोला गया था। इस स्कूल में लड़कियों की संख्या शीघ्र ही 25 हो गई। ईसाई मिशनरी द्वारा ओसवाल जाति की स्त्रियों में शिक्षा का प्रसार करने के लिये जनाना विजिटेशन नामक कार्यक्रम चलाया गया।

    लिथोग्राफिक मुद्रणालय

    मिशन द्वारा ई.1864 में पाठ्य पुस्तकें मुद्रित करने के लिये लिथोग्राफिक मुद्रणालय स्थापित किया गया। इसमें मिशन से सम्बन्धित अन्य पुस्तकें भी मुद्रित की जाती थीं। इस प्रेस में हजारों की संख्या में मारवाड़ी भाषा की मुक्ति रो मार्ग, समजोतरी माला, उकेश माला आदि पुस्तकें छापीं और निःशुल्क वितरित की गईं। हिन्दी और उर्दू में प्राथमिक अध्यायों की पट्टियां, पहाड़ों की सारणियां, जिन्हें पट्टी पहाड़ी कहा जाता था, छापी गईं। सोलोमन की कहावतों के हिन्दी दोहों में अनुवाद विशेष रूप से छापकर बेचे गये। मि. रॉबसन ने हिन्दी पंचांग तैयार किया जो कि बहुत प्रसिद्ध हुआ। ई.1871 में एक पंजाबी व्यक्ति ने अजमेर में मॉडर्न प्रेस लगाई। इस प्रेस में हिन्दी अंग्रेजी तथा उर्दू में राजस्थान ऑफीशियल गजट भी प्रकाशित किया जाता था। इस प्रेस को नौ साल बाद जब्त कर लिया गया।

    प्रेसबाईटेरियन मिशन की स्कूलें

    प्रेसबाईटेरियन मिशन द्वारा ई.1872 में अजमेर नगर में कुल 11 स्कूलें चल रही थीं। जिनमें से 1 एंग्लो वर्नाकुलर, 7 वर्नाकुलर बॉयज तथा 3 वर्नाकुलर गर्ल्स स्कलें चल रही थीं। इन स्कूलों में विद्यार्थियों की कुल संख्या 389 थी जिनमें से लड़कियों की संख्या 82 थी। जबकि इस वर्ष ब्यावर में मिशन की 18 स्कूलों में 873 विद्यार्थी, नसीराबाद में 13 स्कूलों में 558, टॉडगढ़ में 11 स्कूलों में 331 तथा देवली में 9 स्कूलों में 281 विद्यार्थी पढ़ रहे थे। ई.1863 में अजमेर में राज्य की ओर से लड़कों के लिये अंग्रेजी माध्यम की 1 स्कूल चलती थी जिसमें 340 बच्चे पढ़ते थे जबकि निजी क्षेत्र में 113 स्कूलें चलती थीं जिनमें 1,706 बच्चे पढ़ते थे।

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  • पक्की छत/ कहानी/डॉ. मोहनलाल गुप्ता

     02.06.2020
    पक्की छत/ कहानी/डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    पक्की छत/ कहानी/डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    शारदा बेचैन है। बार-बार करवटें बदल रही है। थोड़ी-थोड़ी देर में बाहर जाकर देख आती है, कितनी रात बाकी रही है। झौंपड़े में सन्नाटा है। पास 
    में ही उसका पति मदन बेसुध होकर सोया पड़ा है। दिन भर की हाड़तोड़ मेहनत के बाद, शाम को खाना कम और दारू ज्यादा। इसके बाद पूरा झौंपड़ा कच्ची शराब की गंध से भर जाता है। शारदा को कच्ची दारू की गंध तनिक भी नहीं भाती किंतु पिछले पच्चीस सालों से इस तेज गंध को झेलते रहने के कारण अब उसे इस गंध से उतनी परेशानी नहीं होती जितनी उन दिनों में होती थी, जब वह ब्याह के बाद इस झौंपड़े में आई थी।

    एक कौने में चारों बच्चे बेखबर सोये पड़े हैं, अपने बाप की ही तरह पूरा शरीर बिखेरकर। गहरी नींद में किसी को खबर नहीं कि हाथ कहां है और पैर किधर। तीसरे कोने में श्वसुर का भी वही हाल है। उसका शरीर भी दारू के कारण जर्जर हो रहा है। हाथ पैर कांपते हैं, जबान लड़खड़ाती है, टीबी का मरीज है किंतु दारू पिये बिना गुजर नहीं।

    शारदा उठकर झौंपड़े से बाहर आती है। सचमुच आज की रात उसके लिये काफी लम्बी है। चंद्रमा जरूर अपने स्थान से थोड़ा हिला है किंतु तारे तो वहीं की वहीं, अड़े हुए हैं। शारदा झौंपड़े के बाहर पत्थर पर बैठ जाती है। कौन जाने कल का दिन उसके मन की मुराद पूरी करने वाला ही हो! उसके दिल में उम्मीद बंधती है....... किंतु आज तक तो जीवन में ऐसा कुछ नहीं हुआ जिसे देखकर यह लग सके कि उसके मन की मुराद पूरी भी हो सकती है......... किंतु ग्रामसेवक स्वयं आकर शारदा के दस्तखत लेकर गया है और कहकर गया है कि कल पंचायत समिति में आ जाना तुम्हें पक्का मकान बनाने के लिये पचास हजार रुपये मिलेंगे। मकान में पक्का शौचालय बनाने के लिये बत्तीस सौ रुपये अलग से मिलेंगे। खुद मंत्रीजी जयपुर से चलाकर आयेंगे, गरीबों को चैक देने।

    शारदा फिर आश्वस्त होती है। यदि मंत्रीजी आये तो अवश्य ही पचास हजार रुपये का चैक मिल जायेगा। कब से शारदा के मन में यह आस है कि उसके बच्चों के सिर पर उनकी अपनी पक्की छत हो। शारदा का श्वसुर भीखाराम गांव की गलियों में झाड़ू लगाते-लगाते बूढ़े हो गया किंतु परिवार को पक्की छत तो दूर, कभी झौंपड़े के लिये नया तिरपाल भी नसीब नहीं हुआ जो बरसात में झौंपड़े को टपकने से रोक सके।

    शारदा का पति मदन भी जिंदगी भर हाड़ तोड़ मेहनत के बाद कभी पक्की छत का सपना नहीं देख सका। सपना देखता भी कैसे, वह तो जो कुछ भी कमाता था, हर शाम दारू की भेंट चढ़ जाता था। आज से तीन साल पहले इंदिरा आवास योजना में जब शारदा का नाम आया था तब शारदा को कुछ आस बंधी थी कि देर सबेर ही सही किंतु उसे पक्का मकान बनाने के लिये रुपये मिल जायेंगे किंतु जिस गति से पिछले तीन सालों में सूची में नाम आगे सरक रहे थे, उससे उसकी आस बार-बार कमजोर पड़ जाती थी। जब वह गांव के लोगों के मुँह से सुनती कि इस सूची में लिखे नामों को मकान मिलने में बीस-बाईस साल लग जायेंगे तो उसका रहा-सहा धैर्य जवाब दे जाता।

    कभी-कभी निराश होकर वह अपने घास-फूस के झौंपड़े में गूदड़ी में मुँह छिपाकर रो पड़ती....... किंतु इन आंसुओं की इस बेरहम संसार में कोई कीमत नहीं थी........... कीमत होना तो दूर, इन आंसुओं को कोई देखने वाला तक न था........करे तो क्या करे ? जाये तो कहां जाये ? फूस की छत बरसात को रोक नहीं पाती। सर्दी की रातों में दांत किटकिटा जाते और गमियों की दुपहरी में झौंपड़े में लू बरबस घुस आती।

    अब तो खैर बच्चे काफी बड़े हो गये किंतु जब बच्चे छोटे थे, तब वह काम के लिये मदन के साथ झौंपड़े से निकलती तो उसका कलेजा किसी अनहोनी की आशंका से कांपता रहता। आये दिन वह सुनती कि झौंपड़ी में बच्चे और बकरियां जल मरे तो उसका कलेजा मुँह को आ जाता। फिर भी उसे अपने छोटे बच्चों को झौंपड़ी में बिना किसी सहारे के छोड़कर, मजदूरी करने पति के साथ जाना ही पड़ता।

    कुछ दिन पहले उसने सुना कि सरकार गांवों के गरीब लोगों को मकान बनाने के लिये रुपया देगी तो मन के किसी कोने में आशा का अंकुर एक बार फिर फूट पड़ा था। उसने इधर-उधर पूछताछ की। सरपंच साहब ने बताया कि हाँ उन्होंने भी अखबार में पढ़ा है कि सरकार राज्य के गरीब लोगों को मकान बनाने के लिये चौंतीस सौ करोड़ रुपये का कर्ज लेगी। इस कर्ज से राज्य में रह रहे गरीबों के लिये दस लाख मकान बनाये जायेंगे। कर्ज का नाम सुनकर शारदा एक बार फिर मुरझा गई। कर्ज लेंगे तो चुकायेंगे कैसे ? किंतु जब सरपंच साहब ने बताया कि यह कर्जा सरकार स्वयं चुकायेगी, गरीबों को नहीं चुकाना पड़ेगा तो शारदा की जान में जान आई। यह एक ऐसी सूचना थी जिसे सुनकर शारदा का दिल बल्लियों उछल गया।

    कुछ दिन और बीते। गांव के लोगों में यह चर्चा आम हो गई कि सरकार गरीबों को मकान बनाने के लिये पचास हजार रुपया देगी। शारदा भी इस चर्चा को सुनती और आकाश की ओर देखकर मन ही मन परमात्मा से प्रार्थना करती कि हे भगवान, यह खबर सच्ची निकले। इसमें किसी तरह की दूसरी बात पैदा नहीं हो। पहले भी कितनी ही बार उसने इस तरह की बातें सुनी थीं किंतु वे केवल बातें ही बनकर रह गई थीं। कहीं इस बार फिर किस्मत उसी तरह धोखा न दे जाये। उसके मन में डर घर कर गया था।

    आखिर वो दिन भी आया जब ग्रामसेवक उसका फार्म भरवाने और बैंक में खाता खुलवाने के लिये आया। श्वसुर भीखाराम ने हाथ जोड़कर उसका अभिवादन किया था।

    -‘शारदा कहां है ?’ ग्रामसेवक ने भीखाराम से पूछा था। ग्रामसेवक के मुँह से अपना नाम सुनकर शारदा के कान खड़े हो गये थे।

    -‘झौंपड़े में ही है, क्यों ? भीखाराम ने उलटकर सवाल किया था।

    -‘कागज घर की औरत के नाम बनेंगे। ग्रामसेवक ने कहा।

    -‘औरत के नाम क्यों ?’ शारदा के श्वसुर भीखाराम ने गुस्से से पूछा था।

    -‘औरत के नाम इसलिये ताकि मरद उस मकान को बेचकर दारू न पी जायें।’ ग्राम सेवक ने हँसकर जवाब दिया था।

    -‘दारू! मैं दारू कहां पीता हूँ!’ भीखाराम ने आदत के अुनसार जवाब दिया था। श्वसुर का जवाब सुनकर शारदा को हँसी आ गई थी।

    -‘हाँ, मुझे पता है, तू दारू नहीं पीता। इस गांव में कोई दारू नहीं पीता।’ ग्रामसेवक ने भी हँसकर जवाब दिया था जिसे सुनकर भीखाराम भी झैंप गया था।

    -‘लेकिन घर का मालिक तो मरद ही होता है, क्या सरकार अब औरतों को घर का मालिक बनायेगी ?

    -‘ यदि मरद यू हीं दारू पीते रहे तो एक दिन सारे घरों की मालिक औरतें हो जायेंगी। चल शारदा, अंगूठा लगा।’ ग्रामसेवक ने मुँह बिगाड़कर जवाब दिया।

    शारदा को मानो अब भी अपनी किस्मत पर विश्वास नहीं आया था। जाने क्यों उसकी आंखों से रुलाई फूट पड़ी। इस संसार में जब आदमी फूटी हुई किस्मत लेकर आता है तो उसे चारों ओर से धक्के ही खाने पड़ते हैं। इसलिये उसे किसी अच्छी बात पर जल्दी से विश्वास भी नहीं होता। शारदा का अब तक का अनुभव तो ऐसा ही रहा था। अब तो फार्म भी भरा जा चुका था। खाता भी खुल गया था। फिर भी शारदा के मन में आशंका बनी रही।

    वह रोज ही पंचायत के दफ्तर जा पहुंचती- ‘कब आयेंगे, हमारे मकान बनाने के पैसे।’

    -‘सबर कर। जल्दी आयेंगे।’ ग्राम सेवक हँसकर जवाब देता।

    -‘आ तो जायेंगे ?’ शारदा का अगला सवाल होता।

    -‘हाँ जरूर आ जायेंगे। सरकार ने हडको से साढ़े तीन सौ करोड़ रुपये उधार लिये हैं। तीन सालों के भीतर-भीतर दस लाख मकान बनेंगे।’

    -‘तीन सालों में !’ शारदा अधीर हो उठती।

    -‘हाँ, तीन सालों में।’ इतना कह कर ग्राम सेवक अपने काम में लग जाता।

    शारदा फिर डर जाती। कौन जाने तीन साल में सरकार का सारा रुपया खतम हो जाये और मेरा नम्बर ही नहीं आये। वह मन ही मन चिंता करती। आखिर शारदा की किस्मत जागी। सारी प्रार्थनायें काम आ गईं और आज शाम को उसके श्वसुर खुशखबरी लेकर आये- ‘बीडीओ साहब की खबर आई है। मकान के कागज और चैक लेने पंचायत समिति चलना है।’

    शारदा को एकाएक विश्वास नहीं हुआ। उसे तीन साल क्या, तीन महीने भी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी थी। एक दिन की मजदूरी तो मारी जायेगी किंतु यदि वास्तव में मकान बनाने के लिये मंत्रीजी ने पचास हजार रुपये का चैक दे दिया तो उसके मन की साध पूरी हो जायेगी। यही सोच-सोच कर आज शारदा को नींद नहीं आ रही।

    काफी देर तक वह यूं ही पत्थर पर बैठी रही। चंद्रमा अपने स्थान से थोड़ा और हिल गया। झौंपड़े में सन्नाटा था। गांव की सुनसान गलियों में कुत्तों के भौंकने की आवाज जरूर उस सन्नाटे को भेद जाती थी। जाने कब उसी पत्थर पर बैठे-बैठे उसे झपकी आ गई। उसने देखा कि वह अपने पति और श्वसुर के साथ पंचायत समिति में खड़ी है। मंत्रीजी उसे पचास हजार रुपये का चैक थमा रहे हैं। अचानक श्वसुर ने शारदा के हाथ से वह चैक छीन लिया है। शारदा हक्की-बक्की खड़ी है। श्वसुर कह रहे हैं, ला मुझे दे! तू क्या करेगी इस चैक का ?

    शारदा से कुछ जवाब न बन पड़ा। बीडीओ साहब ने श्वसुर के हाथों से चैक लेकर फिर से शारदा को दे दिया है। बीडीओ साहब भीखाराम पर बिगड़ रहे हैं। यह चैक तेरे काम का नहीं है। इसका पैसा केवल शारदा को मिल सकता है। श्वसुर के चेहरे पर बेबसी के भाव हैं। शारदा ने चैक मोड़कर ब्लाउज में रख लिया है।

    देख शारदा, इस चैक को बैंक में जमा करवा देना। थोड़ा-थोड़ा करके रुपया निकालना और अपना मकान बनाना। इन दोनों को मत देना, न अपने पति को, न अपने श्वसुर को। ये तो इस रुपये को दारू में उड़ा देंगे। शारदा चुप है।

    -‘नहीं मालिक। हम दारू नहीं पियेंगे। इन पैसों से हमारे बच्चों के सिर पर पक्की छत ही बनेगी। मदन और भीखाराम हाथ जोड़कर बीडीओ साहब से कह रहे हैं।

    -‘और हमारा क्या ?’ शारदा के हाथ से किसी ने चैक फिर से छीन लिया है। चैक तो उसने ब्लाउज में रखा था, फिर से हाथ में कैसे आ गया ? शारदा सोचती है, और चैक छीनने वाले की तरफ देखती है।

    -‘अरे ग्राम सेवकजी! ये क्या कर रहे हैं, लाइये चैक मुझे दीजिये। ये मेरा चैक है, इससे मेरे बच्चों का घर बनेगा।’ शारदा बिफर पड़ती है।

    -‘ध्यान से देख बावळी! मैं ग्राम सेवक नहीं हूँ।’ चैक छीनने वाला हँसता है।

    -‘अरे हाँ, आप तो सरपंचजी हैं। माफ करो मालिक। ये चैक मुझे दे दो।’ शारदा हाथ जोड़ती है।

    -‘बावळी हो गई है। मैं तुझे सरपंच दिखाई देता हूँ ?’ चैक छीनने वाला चैक हवा में लहराता है। बीडीओ साहब उसके हाथ से चैक लेकर फिर से शारदा को देते हैं।

    -‘जा घर चली जा। यहाँ कोई छीन लेगा।’ बीडीओ साहब स्नेह से शारदा के सिर पर हाथ रखते हैं। शारदा खुशी से रो पड़ती है। चैक फिर से उसके हाथ में आ गया है।

    अचानक दृश्य बदल गया है। शारदा अपने झौंपड़े के सामाने खड़ी है। नहीं-नहीं झौंपड़ा नहीं, मकान के सामने खड़ी है। यह तो शारदा का ही मकान है जिस पर पक्की छत दूर से ही चमक रही है।

    -‘ऐ........यहां कहां बैठकर सो रही है ?’ किसी ने झिंझोड़कर उठाया।

    शारदा ने
    आंखें खोलीं तो देखा कि दिन निकल आया है। उसका पति मदन उसे झिंझोड़कर उठा रहा है। वहां न कोई सरपंच है, न बीडीओ साहब हैं। वह तो अपने झौंपड़े के बाहर बैठी है। पूरी रात वह इस पत्थर पर बैठी सोती रही है।

    -‘अरे! इतना दिन निकल आया ? पंचायत समिति भी तो जाना है।’ शारदा ने हड़बड़ाकर कहा और पत्थर से उठ खड़ी हुई।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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