Blogs Home / Blogs / /
  • अध्याय-30 समाज में नारी की युग-युगीन स्थिति

     02.06.2020
    अध्याय-30 समाज में नारी की युग-युगीन स्थिति

    समाज में नारी की युग-युगीन स्थिति


    किसी राष्ट्र की सही स्थिति का अनुमान उस राष्ट्र में नारी की परिस्थिति से लगाया जा सकता है। - फ्रांसीसी विद्वान चार्ल्स फोरियर।


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    प्राचीन आर्यों ने पितृसत्तात्मक परिवार प्रणाली की स्थापना की थी जिसमें स्त्रियों के लिए समुचित सम्मान एवं प्रतिष्ठा की व्यवस्था की गई थी। परिवार एवं समाज दोनों में ही स्त्री की विशेष भूमिका थी। वह कन्या, पत्नी तथा माँ के रूप में आर्य संस्कृति का आधार थी। आर्य धर्मशास्त्रों ने नारी को विद्या, शील, ममता, यश और सम्पत्ति की स्वामिनी समझा। उसे यह स्थिति सहज एवं स्वाभाविक रूप से मिली थी किंतु समय के साथ सामाजिक परिस्थितियों में बदलाव आता गया और नारी पर बंधन एवं वर्जनाएं लागू होने लगीं। एक समय ऐसा भी आया जब नारी ने पुरुषों के साथ बराबरी का अधिकार पूर्णतः खो दिया एवं वह पुरुष की अनुगामिनी बनकर रह गई।


    ऋग्वैदिक-काल में नारी की स्थिति

    सामाजिक स्थिति

    ऋग्वैदिक-काल (ई.पू.4000 से ईपू.3000) में परिवार का कोई भी आर्थिक, सामाजिक एवं धार्मिक कार्य नारी के बिना सम्पन्न नहीं हो सकता था। नारी के बिना पुरुष को अपूर्ण समझा गया। जब तक पुरुष विवाहोपरान्त भार्या की प्राप्ति नहीं कर लेता था तब तक वह याज्ञिक अनुष्ठानों को सम्पन्न नहीं कर सकता था। समाज का संचालन संतान से होता है और संतान की प्राप्ति स्त्री तथा पुरुष दोनों के होेने पर ही संभव थी। इसीलिए स्त्री को पुरुष की 'अर्द्धागिनी' कहा गया। वैदिक यज्ञों से लेकर वर्ण व्यवस्था और आश्रम व्यवस्था का आधार नारी ही थी। पंच-महायज्ञों का आधार भी नारी ही थी।

    श्राद्ध, बलि, हविष्य आदि का आधार भी नारी ही थी। उसे 'श्री' और 'लक्ष्मी' कहा गया जो घर में सुख एवं समृद्धि की सृष्टि करती थी। ऋग्वेद में एक भी उल्लेख नहीं मिलता है जिसमें नारी की स्थिति पुरुष की अपेक्षा हेय या कम महत्वपूर्ण प्रतीत होती हो या वह पुरुष के अधीनस्थ स्थिति में हो। ऋग्वैदिक-काल में पर्दा प्रथा का कोई उल्लेख नहीं है। वे स्वतंत्रतापूर्वक घर से बाहर जा सकती थीं। आर्यों के प्रारम्भिक समाज में नारी जितनी स्वतन्त्र और मुक्त थी, उतनी बाद के किसी काल में नहीं रही।

    ऋग्वैदिक-काल में नारी हर तरह से पुरुषों के समकक्ष थी। वह सामाजिक और धार्मिक उत्सवों में बिना किसी प्रतिबन्ध के हिस्सा लेती थी। उस काल की नारी पुरुषों के साथ यज्ञ, सभा, समिति एवं गोष्ठी में सम्मिलित होती थी। अकेला पुरुष यज्ञ के अयोग्य था।

    नारी की शिक्षा

    ऋग्वैदिक-काल में नारी स्वतन्त्रतापूर्वक शिक्षा ग्रहण करती थी। इस काल में स्त्रियाँ सभा एवं गोष्ठियों में ऋग्वेद की ऋचाओं का गायन किया करती थीं। ऋग्वेद में उल्लिखित है कि कतिपय विदुषी स्त्रियों ने ऋग्वेद ऋचाओं का प्रणयन किया। उस युग में बौद्धिक योगदान करने वाली बीस स्त्रियों के नाम मिलते हैं- रोमशा, अपाला, उर्वशी, विश्वधारा, सिकता, निबाबरी, घोषा, लोपामुदा आदि।

    उपनयन संस्कार

    ऋग्वैदिक-काल में पुत्र की तरह पुत्री का भी विद्यारम्भ से पूर्व उपनयन संस्कार किया जाता था तथा वह भी ब्रह्मचर्य का पालन करती हुई वेदों का अध्ययन करती थी। यह व्यवस्था कुछ शिथिलता के साथ स्मृतिकाल तक चलती रही। वैदिक युग में छात्राओं के दो वर्ग थे- (1.) सद्योवधू और (2.) ब्रह्मवादिनी। सद्योवधू वे छात्राएँ थीं जो विवाह के पूर्व तक वेद मंत्रों और याज्ञिक प्रार्थनाओं का ज्ञान प्राप्त करती थीं। ब्रह्मवादिनी वे थीं जो अपना सम्पूर्ण जीवन वेदों की शिक्षा प्राप्त करने में लगाती थीं। ऋषि कुशध्वज की कन्या वेदवती ऐसी ही ब्रह्मवादिनी स्त्री थी। उस युग मे सह-शिक्षा का भी प्रचलन था।

    वाल्मीकि आश्रम में आत्रेयी और लव-कुश ने साथ-साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सह-शिक्षा का उदाहरण महाभारत में भी मिलता है जब अम्बा और शैखवत्य एक साथ शिक्षा ग्रहण करते थे। अनेक स्त्रियाँ शिक्षिका बनकर अध्यापिकाओं का जीवन व्यतीत करती थीं। ऐसी स्त्रियाँ उपाध्याया कहलाती थीं।

    विवाह संस्कार

    आर्य संस्कृति में विवाह को अनिवार्य धार्मिक संस्कार माना गया। इसका मुख्य उद्देश्य उन विभिन्न पुरुषार्थों को पूरा करना था जिनकी प्राप्ति में पुरुष को पत्नी के सहयोग की आवश्यकता होती थी। पुरुष और स्त्री के गृहस्थ जीवन का प्रारम्भ विवाह से ही माना गया। चूँकि कोई भी धार्मिक संकल्प पत्नी के बिना सम्भव नहीं था, इसीलिए उसे 'धर्मपत्नी' अथवा 'सहधर्मिणी' कहा गया है। वैदिक-काल में स्त्री का विवाह यौवन प्राप्ति के बाद किया जाता था किंतु समय के साथ स्त्री की आयु में परिवर्तन आता गया।

    नारी की आर्थिक स्थिति

    वैदिक-काल में कुछ ऐसे उल्लेख हैं जो सम्पत्ति में स्त्री के अधिकार को स्वीकार नहीं करते किंतु ये अपवाद स्वरूप हैं। सम्पत्ति में उसका भाग होता था। वह पुत्र से किसी प्रकार भी कम नहीं समझी जाती थी। दत्तक पुत्र से पुत्री श्रेष्ठ थी। पुत्र के न रहने पर वह उत्तराधिकारी मानी जाती थी। चौथी शताब्दी ईस्वी पूर्व तक समाज में यह व्यवस्था चलती रही।

    नारी की राजनीतिक स्थिति

    ऋग्वेद साहित चारों वेदों में किसी महिला साम्राज्ञी का उल्लेख नहीं हुआ है। वैदिक-काल में किसी भी युद्ध में नारी के भाग लेने की चर्चा एक भी स्थान पर नहीं की गई है।

    उत्तरवैदिक-काल में नारी की स्थिति

    अथर्ववेद (ई.पू.1500-ई.पू.1000) मंे पुत्री केेे जन्म पर खिन्नता का उल्लेख मिलता है। इसी प्रकार एतरेय ब्राह्मण में एक स्थान पर पुत्री के लिए 'कृपण' शब्द का प्रयोग हुआ है। इस काल में यद्यपि पुत्री का जन्म प्रसन्नता का द्योतक नहीं था तथापि उसके पालन-पोषण एवं शिक्षा की उपेक्षा नहीं की जाती थी। वे समाजिक व्यवस्था का आदरणीय अंग थीं।

    महाकाव्य काल में नारी की स्थिति

    महाकाव्य काल (ई.पू.800-600) में स्त्रियाँ आदर की पात्र थीं तथा उन पर अधिक प्रतिबन्ध नहीं थे। स्त्रियाँ सामाजिक उत्सवों और धार्मिक पर्वों में सम्मिलित हुआ करती थीं। रामायण में सीता का वनों में विचरण तथा महाभारत में द्रौपदी का पतियों के साथ वनों में भ्रमण उनकी सामाजिक स्थिति को व्यक्त करता है। सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान था। उनके प्रति समाज में आदर की भावना थी। रामायण में भी सीता के लिए आदर और सम्मान की बातें कही गई हैं।

    अकेला पुरुष यज्ञ सम्पादित नहीं कर सकता था। नारी का यह स्थान रामायण के रचनाकाल तक बना रहा जिसमें सीता के न होने पर राम को अश्वमेध यज्ञ में अपनी पत्नी सीता की स्वर्ण-प्रतिमा रखनी पड़ी थी। महाभारत में भीष्म पितामह का कथन है कि स्त्री को सर्वदा पूज्य मानकर उससे स्नेह का व्यवहार करना चाहिए। जहाँ स्त्रियों का आदर होता है वहाँ देवताओं का निवास होता है। नारी की अनुपस्थिति में समस्त कार्य अपवित्र हो जाते हैं। एक अन्य स्थान पर भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं कि स्त्रियाँ स्वभावतः अपनी लिप्सा को दबा नहीं पातीं, इसलिए उन्हें किसी पुरुष के संरक्षण में रहना चाहिए।

    विवाह संस्कार

    महाकाव्यों के काल में स्वयंवर प्रथा प्रचलित थी जो उस युग में होने वाले युवा-विवाहों की द्योतक है। इस काल में मान्यता थी कि युवा होने पर कन्या का विवाह नहीं किया जाता है तो कन्या का पिता नर्कगामी होता है और वह कन्या स्वयं अपना वर चुन लेने के लिए स्वतन्त्र होती है। युवती कन्या को अपने घर में रखना निन्दनीय माना जाता था।

    विवाह के प्रकार

    वैदिक-काल से लेकर सूत्रकाल तक भारत में आठ प्रकार की विवाह प्रणालियाँ प्रचलन में आईं। धर्मशास्त्रकारों ने ब्रह्मविवाह, देवविवाह, आर्षविवाह, प्रजापत्य विवाह, गान्धर्व विवाह, आसुर विवाह, राक्षस विवाह और पैशाच विवाह नामक आठ प्राकर के विवाह बताए हैं। इनमें से प्रारम्भिक चार प्रकार के विवाह सम्मानित एवं स्वीकृत थे और अन्तिम चार निन्दनीय माने जाते थे। इन समस्त प्रकार के विवाहों का स्वरूप समय और परिस्थिातियों के अनुसार बदलता गया। यद्यपि अपने वर्ण में विवाह करना ही श्रेष्ठ माना जाता था तथापि वर्ण से बाहर भी विवाह प्रचलित थे।

    बहु-विवाह की प्रथा

    महाकाव्य काल में बहुविवाह प्रथा प्रचलित थी। राजा दशरथ की तीन रानियां थीं जबकि द्रौपदी ने पांच पुरुषों से विवाह किया था। एक पुरुष के साथ अनेक स्त्रियों के विवाह सामान्य प्रचलन था किंतु एक स्त्री का कई पुरुषों के साथ विवाह अपवाद रूप में ही मिलता है।

    पर्दा प्रथा

    वाल्मीकि ने रामायण में लिखा है कि जो सीता आकाशचारी भूतों के द्वारा भी नहीं देखी गई थीं, आज उसे राजपथ पर खड़े लोग वन जाते हुए देख रहे हैं। अनुमान लगाया जा सकता है कि भले ही सीता पर्दा नहीं करती हों किंतु रामायण के रचनाकाल में स्त्रियां पर्दे में रहने लगी थीं। महाभारत में दुर्योधन की पत्नियों के लिए 'असूर्यंपश्या' शब्द आया है जिसका अर्थ है कि वे पर्दे में रहती थीं तथा उन्होंने कभी पर्दे से बाहर निकलकर सूर्य भी नहीं देखा था।

    सती-प्रथा

    रामायण में सती शब्द का प्रयोग हुआ है किंतु पति के निधन पर सती होना अनिवार्य नहीं था। राजा दशरथ की मृत्यु होने पर एक भी रानी सती नहीं हुई थी। बाली की मृत्यु पर तारा ने सुग्रीव से विवाह कर लिया था। रावण के मरने पर मंदोदरी ने विभीषण से विवाह किया था किंतु मेघनाद के मरने पर सुलोचना सती हुई थी। महाभारत में उल्लेख है कि महारानी माद्री महाराज पाण्डु के साथ सती हुई थी किंतु बड़ी रानी कुंती सती नहीं हुई थी।

    श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव की चिता पर वसुदेव की चार रानियाँ- देवकी, भद्रा, रोहिणी एवं मंदिरा सती होने के लिए आरोहण करती हैं। इसी प्रकार कृष्ण के परलोकगमन का समाचार हस्तिनापुर पहुँचने पर उनकी आठ पटरानियों में से पांच- रुक्मणि, गांधारी, सह्या, हैमावती तथा जाम्बवती पति की देह के बिना ही चितारोहण करती हैं।

    विधवा-विवाह पर प्रतिबन्ध

    वैदिक-काल में विधवा-विवाह पर कोई प्रतिबन्ध नहीं था। धर्मशास्त्रों ने नियोग-प्रथा को भी मान्यता दी थी किंतु बौद्ध युग के बाद के व्यवस्थाकारों ने विधवा-विवाह एवं नियोग-प्रथा का निषेध कर दिया। विधवा-स्त्री के लिए कठोर संयम का जीवन आदर्श माना गया।

    विवाह विच्छेद का निषेघ

    वैदिक युग में स्त्री अपने पति को छोड़ सकती थी। यह स्थिति धर्मसूत्र ग्रंथों के रचनाकाल तक बनी रही। धर्मसूत्रों ने जाति-भ्रष्ट और नपुंसक पति को त्याग देने के लिए कहा है। बौद्ध साहित्य में विवाह-विच्छेद के अनेक उदाहरण मिलते हैं किंतु नारद आदि हिन्दू शास्त्रकारों ने पति या पत्नी को विवाह-विच्छेद का अधिकार नहीं दिया है। कुछ विशेष परिस्थितियों में ही स्त्री अपने पति को त्याग सकती थी। यदि एक स्त्री के होते हुए पति किसी दूसरी स्त्री से विवाह कर लेता तो स्त्री अपने पति को छोड़ सकती थी। ऐसी स्थिति में पति को पहली पत्नी के भरण-पोषण की समुचित व्यवस्था करनी पड़ती थी।

    मध्य-युग में भी स्त्रियों को अपना पति त्यागने के अधिकार थे किंतु एकाकी स्त्रियों के लिए जीवन निर्वाह करना अत्यन्त दुष्कर और कष्टसाध्य था। स्त्रियों को समानता का अधिकार नहीं था। जो स्त्रियाँ विवाह-विच्छेद का अनुसरण करती थीं, समाज उन्हें हेय समझता था। मनु ने व्यवस्था दी कि यदि स्त्री का पति दुश्चरित्र, परस्त्री-गामी एवं अवगुणी ही क्यों न हो, पत्नी को उसकी सेवा करनी चाहिए। पति-पत्नी का सम्बन्ध जन्म-जन्मान्तर के लिए माना गया।

    सम्पत्ति का अधिकार

    भारतीय संस्कृति में महिला के सम्पत्ति विषयक अधिकारों पर आरम्भ से ही चिंतन किया गया किंतु उसे सामान्यतः सम्पत्ति की अधिकारिणी नहीं माना गया। महाभारत में लिखा है कि पुत्री को पूरी नहीं तो आधी सम्पत्ति अवश्य मिलनी चाहिए।

    सूत्र एवं स्मृति काल में नारी की स्थिति

    गृह्यसूत्रों (ई.पू.600-ई.पू.400) और स्मृतियों (ई.पू.200-ई.300) के रचना-काल में नारी को किसी न किसी पुरुष के आश्रय में रहना अनिवार्य माना गया। पुत्री को पिता के, पत्नी को पति के और विधवा माता को पुत्र के संरक्षण में रहने की व्यवस्था अनिवार्य की गई। इसीलिए उत्तरवैदिक तथा उसके परवर्ती काल में पुत्र की तुलना में पुत्री का स्थान निम्न माना जाने लगा तथा स्त्री की दशा पतनोन्मुख हो गई। स्त्री के साथ भोजन करने वाले पुरुष को गर्हित आचरण करने वाला कहा गया तथा उस स्त्री की प्रशंसा की गई जो अप्रतिवादिनी (प्रतिवाद न करने वाली) थी।

    उसका स्वतन्त्र अस्तित्त्व समाप्त हो गया तथा उसके शरीर पर पति का अधिकार मान लिया गया। मनु ने उसे पुरुष के संरक्षण में रहने के लिए निर्देशित किया। जब तक कन्या रहे वह पिता के संरक्षण में रहे, विवाह हो जाने पर भर्ता (पति) का संरक्षण रहे और जब वह स्थविर (वृद्धावस्था) हो तब उस पर पुत्र का संरक्षण रहे।

    यज्ञों में नारी की स्थिति

    ऋग्वैदिक-काल की तरह उत्तरवैदिक-काल एवं सूत्रकाल में भी स्त्रियाँ यज्ञ करती थीं। इस काल मंन सुलभा, गार्गी, मैत्रेयी आदि विदुषी स्त्रियां भी थीं जिनकी प्रतिष्ठा वैदिक ऋषियों के समान थी। विदेह के राजा जनक द्वारा यज्ञ के अवसर पर आयोजित शास्त्रार्थ में गार्गी ने अद्भुत प्रतिभा और तर्कशक्ति के आधार पर याज्ञवल्क्य ऋषि से शास्त्रार्थ किया। इन साक्ष्यों से विदित होता है कि ऋग्वैदिक-काल से सूत्रकाल तक स्त्रियोें की शिक्षा का समुचित प्रबन्ध था। उस काल की नारी विविध ललित कलाओं में पारंगत थी। उस युग की स्त्रियाँ ब्रह्मचर्य का पालन करती थीं तथा उनका उपनयन संस्कार भी होता था।

    नारी की स्थिति में गिरावट

    जैसे-जैसे समाज की संरचना क्लिष्ट होती गई, वैसे-वैसे नारी की स्थिति में परिवर्तन आता गया और उसके अधिकार सीमित होते गए। जब आर्यों का सम्पर्क पूर्व के अनार्य लोगों से हुआ तो आर्यों एवं अनार्यों के बीच विवाह सम्बन्ध होने लगे। अतः समाज में अनार्य स्त्रियाँ भी प्रवेश पा गईं। इन स्त्रियों का वैदिक वाड्मय और आचार-विचार से कोई परिचय नहीं होता था, वे वैदिक मंत्रों का भ्रष्ट उच्चारण करती थी जिसके कारण यज्ञ के भंग हो जाने का भय उत्पन्न हो गया। अतः वैदिक साहित्य को शुद्ध बनाए रखने एवं यज्ञों को निर्विघ्न सम्पन्न करने के लिए स्त्रियों को यज्ञों से अलग रखने के नियम बने।

    स्त्री का उपनयन संस्कार

    स्मृतिकाल में (ई.पू.200-ई.300) में स्त्री का उपनयन संस्कार स्वतंत्र रूप से समाप्त हो गया किंतु द्विज होने के प्रतीक के रूप में विवाह के अवसर पर स्त्री का भी उपनयन संस्कार अवश्य किया जाता था। यद्यपि स्मृतिकार मनु (ई.पू. दूसरी सदी) ने कन्या के लिए उपनयन संस्कार का विधान किया है तथापि मनु का कथन है कि पति ही कन्या का आचार्य, विवाह ही उसका उपनयन संस्कार, पति की सेवा ही उसका आश्रम और गृहस्थी के कार्य ही दैनिक धार्मिक अनुष्ठान थे।

    स्मृतिकारों ने व्यवस्था दी कि बालिकाओं के उपनयन में वैदिक मंत्र नहीं पढ़ने चाहिए। कालान्तर में उन्हें वेदों के पठन-पाठन और यज्ञ करने के अधिकार से वंचित कर दिया गया। शिक्षण-संस्थाओं और गुरुकुलों में जाकर ज्ञान प्राप्त करना कन्या के लिए अतीत की बात हो गई। वह केवल माता-पिता, भाई, बन्धु आदि से अपने घर पर ही शिक्षा प्राप्त करती थी।

    विवाह हेतु कन्या की योग्यता

    स्मृति काल में विवाह के लिए कन्या की शारीरिक, बौद्धिक एवं आचरण सम्बन्धी योग्यताओं पर भी विचार किया जाता था। शुंगकाल में रची गई मनुस्मृति (ई.पू.200) में कुछ कन्याओं का उल्लेख किया गया है जिनसे विवाह नहीं किया जाना चाहिए। अति सांवली, भूरे वर्ण वाली, पांडुवर्णी, नित्य रोगिणी, वाचाल, भूरी आँखों वाली, अपवित्र, दुष्ट स्वभाव वाली, कटुभाषिणी, मूँछयुक्त, पुरुष के समान आकार वाली, गोल नेत्र वाली, जिसकी जांघों पर बाल हों, जिसके गालों में हँसते-हँसते गड्ढे पड़ते हों और जिसके दाँत निकले हुए हों, ऐसी कन्याएं विवाह के लिए वर्जित की गई हैं।

    याज्ञवलक्य स्मृति (ई.100 से ई.300 के बीच रचित) पर ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी में लिखी गई विज्ञानेश्वर की टीका 'मिताक्षरा' के नाम से जानी जाती है। मिताक्षरा में कन्या में तीन गुणों का होना आवश्यक माना गया है- (1.) कन्या यवीयसी हो अर्थात् आयु में वर से कम हो, (2.) कन्या अनन्यपूर्विका हो अर्थात् जिसने पहले से किसी अन्य पुरुष के साथ यौन सम्बन्ध स्थापित न किया हो और (3.) कन्या स्त्री अर्थात् माँ बनने के योग्य हो।

    बाल-विवाह का प्रचलन

    गृह्यसूत्रों ने विवाह विधि में त्रिरात्र-यज्ञ का विधान किया था। विवाह सम्पन्न हो जाने के बाद पतिगृह में वधू के आ जाने पर भी वर-वधू को यह त्रिरात्र व्रत पालन करना होता था। इसमें वर-वधू लवण एवं क्षार युक्त भोजन नहीं करते थे, भूमि पर शयन करते थे। वे केवल दुग्धपान करते थे और सहवास से दूर रहकर पूर्ण ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते थे। त्रिरात्र व्रत के विधान से संकेत मिलता है कि इस काल में विवाह युवावस्था में होते थे। इस काल में कन्याओं के विवाह की आयु कम होने लगी थी।

    सूत्रग्रंथों एवं बाद के धर्मशास्त्रों के अनुसार कन्या का विवाह 'रजस्वला' की अवस्था से पूर्व कर दिया जाना चाहिए था। धर्मसूत्रकारों और स्मृतिकारों ने कन्या का विवाह 8 से 12 वर्ष की आयु में करने का विधान किया। गौतम और पाराशर ने बारह वर्ष की आयु में रजोदर्शन होने पर तुरन्त कन्यादान का विधान किया। कतिपय गृह्यसूत्रों ने विवाह-योग्य कन्या का एक लक्षण 'नग्निका' बताया है। टीकाकारों ने इस शब्द की व्याख्या करते हुए विवाह योग्य कन्या की आयु 8 से 10 वर्ष बताई है।

    विवाह में धन का महत्त्व

    विवाह में धन का महत्त्व बढ़ने लगा था। आसुर-विवाह में कन्या के माता-पिता वर-पक्ष से धन लेते थे। ब्राह्म एवं दैव विवाह में कन्या का पिता अपनी पुत्री को भलीभांति अलंकृत करके उसका विवाह करता था।

    नारी के सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकार

    सूत्रकाल में भाई के न रहने पर भी स्त्री के उत्तराधिकार को स्वीकार नहीं किया गया। आपस्तम्ब ने व्यवस्था दी कि पुत्र के न होने पर पुत्री को उत्तराधिकारी के रूप में स्वीकार नहीं किया जाए अपतिु अपनी सम्पत्ति को धर्म के कार्य में व्यय किया जाए। उसने यह भी लिखा है कि यदि उत्तराधिकारी चुनना ही है तो पुत्र के अभाव में सपिंड बालक या शिष्य को उत्तराधिकारी बनाया जाए। जब वह भी न हो तब पुत्री उत्तराधिकारी हो सकती है।

    वशिष्ठ, गौतम एवं मनु ने भी उत्तराधिकारी के रूप में पुत्री की नाम कहीं नहीं लिखा है। कौटिल्य ने पुत्र के न होने पर पुत्री को उत्तराधिकारिणी घोषित किया है, चाहे उसे कम ही हिस्सा क्यों न मिले। स्मृतिकाल तक आते-आते कुछ व्यवस्थाकारों ने यह व्यवस्था स्वीकार कर ली कि यदि विधवा-स्त्री पुनर्विवाह नहीं करती है अथवा नियोग द्वारा पुत्र उत्पन्न नहीं करती है तो उस विधवा को मृत-पति की सम्पत्ति में हिस्सा पाने का अधिकार होगा। मनु ने स्त्री-धन का विस्तृत वर्णन किया है।

    मनु के अनुसार स्त्री के छः प्रकार के धन हैं- (1.) माता द्वारा प्रदत्त धन, (2.) पिता द्वारा प्रदत्त धन, (3.) भाई द्वारा प्रदत्त धन, (4.) पति द्वारा प्रदत्त उपहार, (5.) विवाह के समय प्राप्त उपहार, (6.) विवाहोपरान्त पतिगृह से प्राप्त उपहार। इन उपहारों के साथ-साथ वधू शुल्क तथा पति द्वारा द्वितीय विवाह के अवसर पर प्रथम स्त्री को दिया गया धन भी स्त्री-धन में गिना जाता था जिसे पुरुष को नहीं लेना चाहिए। किन्तु स्त्री सम्पत्ति की स्वामिनी होने पर भी उसे पति की आज्ञा के बिना व्यय नहीं कर सकती थी।

    याज्ञवलक्य ने पुत्री के हित में विचार व्यक्त करते हुए कहा है कि पुत्र और विधवा के अभाव में पुत्री ही उत्तराधिकारी है। कन्या के पुत्र को हिस्से का चौथाई पाने की संस्तुति अनेक शास्त्रकारों ने की है। कात्यायन तथा भोज आदि धर्मशास्त्रकारों ने पुत्री के सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकारों को मान्यता नहीं दी है। विष्णु और नारद ने कन्या के हिस्से का तो समर्थन किया है किंतु अपने हिस्से को ले जाने का अनुमोदन नहीं किया है। नारद का अभिमत है कि कन्या उतना ही हिस्सा प्राप्त करे जितना उसके अविवाहित रहने तक व्यय होता है।

    पौराणिक काल (गुप्तकाल) में नारी की शिक्षा

    पौराणिक काल (ई.300-ई.600) ही भारतीय इतिहास के गुप्तकाल (ई.275-ई.550) को समेटे हुए है। विभिन्न पुराणों से ज्ञात होता है कि इस काल में नारी-शिक्षा के दो रूप थे- (1.) आध्यात्मिक और (2.) व्यावहारिक। आध्यात्मिक शिक्षा ग्रहण करने वाली कन्याएँ ब्रह्मवादिनी होती थीं। इस काल के साहित्य में वृहस्पति-भगिनी, अपर्णा, एकपर्णा, एकपाटला, मेना, धारिणी, संनति एवं शतरूपा आदि ब्रह्मवादिनी कन्याओं का उल्लेख हुआ है।

    ऐसी कन्याओं का उल्लेख भी मिलता है जिन्होंने अपनी तपश्चर्या से अभीष्ट की प्राप्ति की थी। उमा, पीवरी, धर्मव्रता आदि कन्याओं ने तपस्या के बल पर अपनी इच्छानुसार वर प्राप्त किया था। व्यावहारिक शिक्षा ग्रहण करने वाली ऐसी कन्याओं का सन्दर्भ मिलता है जिन्होंने अपनी तपस्या के बल पर मनोनुकूल वर प्राप्त किया था। घर-गृहस्थी में रहने वाली कन्याएँ गृहस्थी के कार्यों में निपुण होती थीं।

    पूर्व-वैदिक-युगीन अपाला अपने पिता के कृषि कार्य में सहयोग प्रदान करती थी। उस युग की अधिकांश कन्याएँ गाय दुहना जानती थीं, इसलिए कन्याओं को 'दुहिता' कहा जाता था। वे सूत कातना, बुनना और वस्त्र सिलना जानती थीं एवं ललित कलाओं में निपुण होती थीं।

    विवाह की आयु

    गुप्तकाल तक आते-आते भी कन्या के विवाह की स्थिति पूर्ववत् रही किंतु इस काल में गान्धर्व-विवाह (समाज से छिपकर किये गए प्रेम विवाह) के उल्लेख मिलते हैं जो युवती होने पर स्त्री के विवाह के द्योतक हैं।

    हर्ष के काल में नारी की स्थिति

    थानेश्वर के राजा हर्ष वर्द्धन का शासनकाल ई.606 से ई.647 तक रहा। हर्ष-काल तक आते-आते सामान्य परिवारों में नारी शिक्षा का प्रसार लगभग पूरी तरह अवरुद्ध हो गया था किंतु समाज के अभिजात्य वर्ग की कन्याओं के लिए शिक्षा के द्वार इस काल में भी पूरी तरह खुले हुए थे। वे प्राकृत और संस्कृत काव्य, संगीत, नृत्य, वाद्य एवं चित्रकला में प्रवीण होती थीं। हर्षकालीन कवि बाण ने 'हर्षचरित्' में लिखा है- 'राज्यश्री नृत्य-गीत आदि में विदग्ध सखियों के बीच सकल कलाओं का प्रतिदिन अधिकाधिक परिचय प्राप्त करती हुई शनैःशनैः बढ़ रही थी।'

    पूर्व-मध्य-काल में नारी की स्थिति

    हर्ष की मृत्यु के साथ ही भारतीय इतिहास में प्राचीन काल की समाप्ति होती है एवं मध्य-काल का आरम्भ होता है तथा भारतीय राजनीति के पटल से प्राचीन क्षत्रिय लुप्त हो जाते हैं एवं राजपूत-युग आरम्भ होता है। इस कारण सातवीं शताब्दी ईस्वी से बारहवीं शताब्दी ईस्वी तक के काल को भारतीय इतिहास में पूर्व-मध्य-काल एवं राजपूत-काल कहा जाता है। इस काल तक आते-आते स्त्री के बहुत से अधिकार सीमित कर दिए गए और स्त्री को अनेक बन्धनों से बाँध दिया गया।

    विज्ञानेश्वर ने शंख का उद्धरण देकर टिप्पणी की कि वह बिना किसी से कहे और बिना चादर ओढ़े घर से बाहर न जाए, शीघ्रतापूर्वक न चले, बनिये, सन्यासी, वृद्ध वैद्य के अतिरिक्त किसी पर पुरुष से बात न करे, अपनी नाभि खुली न रखे, एड़ी तक वस्त्र पहने, अपने स्तनों पर से कपड़ा न हटाए, मुँह ढके बिना न हँसे, पति या सम्बन्धियों से घृणा न करे। वह धूर्त, वेश्या, अभिसारिणी, सन्यासिनी, भाग्य बताने वाली, जादू-टोना या गुप्त विधियाँ करने वाली दुःशील स्त्रियों के साथ न रहे।

    इनकी संगति से कुलीन स्त्रियों का चरित्र भ्रष्ट हो जाता है। इस प्रकार स्त्री पर अनेक नियन्त्रण लग गए तथा वह सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक रूप से पुरुष के अधीन हो गई।

    पूर्व-मध्य-काल में नारी की शिक्षा

    इस युग में अनेक प्रज्ञा-सम्पन्न स्त्रियाँ र्हुईं जिन्होंने काव्य, साहित्य एवं ललित कलाओं में विपुल योगदान किया। नौवीं शताब्दी ईस्वी के प्रारम्भ में मंडन मिश्र और शंकर के बीच हुए शास्त्रार्थ की निर्णायिका मंडन मिश्र की पत्नी 'भारती' थी, वह तर्क, मीमांसा, वेदान्त, साहित्य एवं शास्त्रार्थ विद्या में पारंगत थी। नौवीं शताब्दी ईस्वी के अंत में कवि राजशेखर की पत्नी 'अवन्ति सुन्दरी' उत्कृष्ट कवयित्री और टीकाकार थी। इस युग में ऐसी स्त्रियाँ भी हुईं जो शासन-व्यवस्था और राज्य-प्रबन्ध में दक्ष होती थीं तथा शासक अथवा अभिभावक के अभाव में स्वयं शासन करती थीं।

    पूर्व-मध्य-काल में विवाह

    पूर्व-मध्य कालीन समाज में अल्प-वय-विवाह का प्रचलन जोर पकड़ चुका था। इसका प्रमुख कारण भारत पर होने वाले विदेशी आक्रमण थे, विशेषकर इस्लाम के आक्रमण। विदेशियों ने भारतीय स्त्रियों से विवाह करने आरम्भ किए। धर्मशास्त्रकारों ने आर्य-रक्त की शुद्धता बनाए रखने तथा स्त्रियों के कौमार्य की रक्षा के उद्देश्य से बाल-विवाह का प्रावधान किया।

    मध्य-काल में नारी की स्थिति

    भारत पर इस्लाम के आक्रमण ई.712 से आरम्भ हो गए थे किंतु ई.1192 तक इस्लामी आक्रांता सिन्ध एवं पंजाब के कुछ हिस्सों पर ही अपना शासन स्थापित कर पाए थे। ई.1192 में पृथ्वीराज चौहान (तृतीय) की पराजय के बाद उत्तरी भारत के बहुत बड़े हिस्से पर इस्लामी शासन की स्थापना हो गई जो समय के साथ विस्तृत होती चली गई। इस्लामी आक्रांता अपने साथ बलपूर्वक इस्लाम के विस्तार का उद्देश्य लेकर आए थे।

    भारतीय समाज को इस आंधी का सामना करने के लिए जो तैयारी करनी चाहिए थी, भारतीय समाज वह तैयारी नहीं कर सका। इस कारण हिन्दू समाज को सामाजिक वर्जनाओं की दीवारों में बंद किया गया ताकि हिन्दू जाति अपने धर्म एवं रक्त की शुद्धता को बचाए रख सके और वह आक्रांताओं के हाथों में न पड़ सके। इन वर्जनाओं का नारी की स्वतंत्रता, शिक्षा और सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकारों पर बुरा प्रभाव पड़ा।

    पर्दा-प्रथा

    मुस्लिम महिलाओं को अरब और तुर्किस्तान में हिजाब एवं बुर्के में रहना अनिवार्य था। भारत में भी मुस्लिम आक्रांताओं ने महिलाओं के लिए पर्दा अनिवार्य किया। एक ओर तो वे महिलाएं जो इस्लाम स्वीकार कर लेती थीं, हिजाब और बुर्के में बंद हो जाती थीं और दूसरी ओर हिन्दू महिलाएं भी यदि घर से बाहर निकलतीं तो अपने मुंह पर पर्दा डालती थीं और अपना शरीर चद्दर से अच्छी तरह ढंकती थीं ताकि किसी पुरुष की दृष्टि उसके मुंह एवं शरीर पर न पड़े।

    अकबर बादशाह ने भी स्त्री के सम्बन्ध में कठोर आदेश जारी किए- 'यदि कोई नौजवान युवती गलियों एवं बाजारों में बगैर घूँघट के दिखाई दे या जान-बूझकर उसने पर्दे को तोड़ा है तो उसे वेश्यालय में ले जाया जाए और उसी पेशे को अपनाने दिया जाय।' 16वीं सदी के यात्री बरबोसा ने बंगाल की औरतों में पर्दा-प्रथा के प्रचलन का उल्लेख करते हुए लिखा है- 'अमीर और शाही परिवारों में पुरुषों और औरतों के बीच संदेशवाहक का काम करने के लिए हिंजड़े रखे जाते थे। पर्दा-प्रथा के कारण, बीमार औरतों के इलाज के लिए भी मर्द चिकित्सक को शाही हरम एवं अमीरों के जनाने में प्रवेश नहीं दिया जाता था। औरतें अपने घरों से बहुत कम बाहर निकलती थीं। घर से बाहर निकलना अनिवार्य होने पर वे बांदियों तथा हिंजड़ों से घिरी हुई रहती थीं और पूरी तरह ढंकी हुई पालकी में बन्द होकर जाती थीं।'

    यदि कोई मुसलमान महिला किसी कारण-वश थोड़े से समय के लिए भी पर्दा हटा लेती थी तो उसे भंयकर परिणाम भोगना पड़ता था। काबुल के गवर्नर अमीर खाँ ने अपनी औरत को केवल इसलिए छोड़ दिया था क्योंकि वह हाथी के पागल हो जाने पर जान बचाने के लिए नीचे कूदते समय वह बेपर्दा हो गई थी। किसी भी मुसलमान महिला को अपने पति की उपस्थिति में ही अपने अन्य पुरुष सम्बन्धी से बात करने की अनुमति थी।

    हिन्दू स्त्रियाँ अपने सम्बन्धियों से स्वतंत्रता पूर्वक बात करती थीं। इस काल में राजपूत औरतेें युद्ध कला की शिक्षा ग्रहण करती थीं और प्रायः शिकार तथा अन्य अभियानों में भाग लेने के लिए महलों से बाहर निकला करती थीं। फिर भी समय के साथ राजपूत महिलाओं में भी पर्दा-प्रथा का बंधन कठोर होता चला गया।

    बेटी का जन्म

    मध्य-कालीन भारतीय परिवारों में बेटी का पैदा होना अशुभ समझा जाता था। टॉड ने लिखा है कि राजपूत कहते थे- 'बेटी जन्म का दिन मेरे लिए अभिशाप स्वरूप है।' परिवार में लड़की का लड़कों के समान आदर नहीं होता था। यह अन्तर शाही घरानों में भी व्याप्त था। यदि किसी स्त्री के लगातार बेटियाँ होती थीं तो प्रायः ऐसी स्त्री को पति द्वारा छोड़ दिया जाता था।

    शाही परिवार में लड़की के जन्म पर केवल हरम में ही बेगम खुशी मनाती थी, जबकि पुत्र का जन्म पर होने वाले सामारोह में समस्त दरबारियों को शामिल किया जाता था। जब मुस्लिम बादशाह एवं अमीर बलपूर्वक क्षत्रिय कन्याओं से विवाह करने लगे और 'बेटी का बाप' होना नीची दृष्टि से देखा जाने लगा तो राजपूत अपनी कन्याओं का वध करने लगे। कन्या-वध की प्रथा राजपूतों सहित कुछ अन्य योद्धा जातियों तक ही सीमित थी।

    सामान्य परिवारों में लड़की पैदा होने की सूचना दाई इन शब्दों में देती थी- 'थारे भाटो जलमियो है।' अर्थात् तेरे घर में पत्थर ने जन्म लिया है। पुत्री के जन्म पर लोहे का तवा बजाया जाता था जबकि पुत्र के जन्म पर कांसे की थाली बजाकर पड़ौसियों को सूचित किया जाता था कि इस घर में पुत्र का जन्म हुआ है। लोहे का तवा घर की जिम्मेदारियों का सूचक था और इससे अशुभ ध्वनि उत्पन्न होती थी जबकि कांसे की थाली का शब्द घर के भोजन पर अधिकार का सूचक था और कांसे की थाली से मंगल-ध्वनि निकलती थी।

    बाल-विवाह भारत में बाल-विवाह का प्रचलन स्मृतिकाल से आरम्भ हो गया था किंतु मध्य-काल की राजनीतिक परिस्थितियों ने बाल-विवाह को अनिवार्य कर दिया। पुत्री को जन्म के बाद छः से आठ वर्षों से अधिक आयु तक अपने माता-पिता के घर रहना वर्जित माना जाता था। 16वीं सदी के बंगाली कवि मुकंुदराय के अनुसार जो पिता अपनी पुत्री का नौ वर्ष की आयु में विवाह कर देता था, वह भाग्यवान तथा ईश्वर का कृपापात्र समझा जाता था।

    कम आयु होने के कारण दूल्हा-दुल्हन अपना मन पसन्द जीवन साथी नहीं चुन पाते थे। वर पक्ष द्वारा वधू पक्ष से दहेज की माँग की जाती थी। प्रायः माता-पिता वर-वधू की श्रेष्ठता पर विचार किए बिना ही, अच्छे दहेज के लालच में विवाह कर देते थे। कई बार वधू पक्ष अधिक धन देकर अपनी बड़ी आयु की कन्या का विवाह कम आयु के दूल्हे से कर देता था। यह बुराई इतनी बढ़ गई थी कि अकबर को यह आदेश देना पड़ा कि स्त्री की आयु पति से बारह वर्ष अधिक हो तो उस विवाह को अमान्य कर दिया जोयगा।

    कुछ विशेष जातियों तथा क्षेत्रों में वर पक्ष, वधू पक्ष को धन देता था। कई बार वर पक्ष अधिक धन देकर कम आयु की रूपवती कन्या का विवाह प्रौढ़ एवं वृद्ध वर से करवा लेते थे। मध्य-काल में ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं जिनमें राजपूत लड़कियों ने अपने विवाह की शर्तें स्वयं निर्धारित कीं। राव सुरताण की पुत्री ताराबाई ने शर्त रखी कि वह उसी नवयुवक से विवाह करेगी जो उसके पिता के राज्य को पठानों से मुक्त करा देगा।

    पृथ्वीराज के भाई जयमल ने यह शर्त स्वीकार करके ताराबाई से विवाह कियाा। मोहिल सरदार की सुन्दर कन्या कर्मदेवी ने मंडोर के राव के उत्तराधिकारी से अपनी सगाई अस्वीकार करके पूगल के राजकुमार साधु की वधू बनना स्वीकार किया। जब औरंगजेब ने रूपनगढ़ की राजकुमारी चारुमति के लिए डोला भिजवाया तो चारुमति ने मेवाड़ के महाराणा राजसिंह को निमंत्रण भेजा कि वह चारुमति से विवाह करके चारुमति के धर्म की रक्षा करे। अतः स्पष्ट है कि क्षत्रिय राजपरिवारों में कन्याएं वयस्क होने पर विवाह करती थीं।

    एक-पत्नी-प्रथा

    मध्य-काल में हिन्दू तथा मुसिलम समाज के निम्न वर्गों में एक पत्नी का प्रचलन था। अकबर के इबादतखाना में उलेमाओं ने व्यवस्था दी कि मुसलमान 'निकाह' के द्वारा चार तथा 'मूता' के द्वारा कितने भी विवाह कर सकता था। अकबर ने आदेश जारी किया कि कोई भी साधारण व्यक्ति एक स्त्री से अधिक नहीं रख सकता तथा पहली स्त्री के बांझ साबित होने पर ही दूसरी पत्नी रखने की अनुमति दी जा सकती थी। बहु-विवाह की सुविधा केवल धनी मुसलमानों को प्राप्त थी जो प्रायः तीन-चार पत्नियां रखते थे। हिन्दुओं में राजा एवं धनी वर्ग को छोड़कर एक-पत्नी प्रथा प्रचलित थी। कुछ विशेष मामलों में और पहली स्त्री बांझ होने पर ब्राह्मणों की स्वीकृति लेकर दूसरा विवाह कर सकते थे।

    ससुराल में स्त्री की स्थिति

    पुत्री के विवाह का निर्णय माता-पिता द्वारा या परिवार के किसी वरिष्ठ सदस्य द्वारा लिया जाता था। विवाह का निर्णय करने में लड़की की इच्छा महत्त्व नहीं रखती थी। विवाह के बाद लड़की अपनी सास के नियंत्रण में रहती थी। यदि कोई कन्या अपनी सास की उम्मीदों के अनुरूप नहीं बन पाती थी तो मुसलमान परिवार उसे तलाक दे देता था। हिन्दू परिवार में भी अवज्ञाकारी वधू को अच्छा नहीं समझा जाता था। यदि घर की बड़ी बहू अपनी सास से अलग रहती थी तो भी पारिवारिक मामलों में उसकी बात का महत्त्व होता था।

    श्वसुरगृह में नववधू का जीवन 'मर्यादित आश्रित' की भांति होता था। जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा 'तुजुके जहाँगीरी' में लिखा है- 'हिन्दुओं में मान्यता है कि कोई शुभकार्य स्त्री की उपस्थिति या सहयोग के बिना पूर्ण नहीं हो सकता, क्योंकि वह पुरुष की अर्धागिनीं समझी जाती है।' पति-पत्नी एक-दूसरे का कहना मानते थे।

    यद्यपि पति का मत ही सर्वोपरि होता था तथापि उच्च-परिवारों की स्त्रियाँ विशेषतः राजपूतनियाँ अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं करती थीं। यदि पति उपहास में भी किसी दूसरी स्त्री के सौन्दर्य की प्रशंसा करता था तो पत्नी रुष्ट हो जाती थी और दाम्पत्य जीवन कटु हो जाता था।

    विधवा की स्थिति

    विवाह-विच्छेद एवं पुनर्विवाह मुसलमानों में साधारण बात थी किंतु हिन्दुओं में यह वर्जित था। मध्य-कालीन हिन्दू समाज में विधवा-विवाह पूर्णतः निषिद्ध था किंतु कुछ निम्न जातियां इसका अपवाद थीं। उच्च वर्ग में सती-प्रथा प्रचलित थी किंतु राजपूतों में यह प्रथा अधिक अनिवार्यता से लागू थी। जिस राजपूत लड़की की केवल सगाई होती थी वह भी अपने भावी पति की मृत्यु होने पर सती हो जाती थी। जो विधवाएँ सती नहीं होती थीं, समाज द्वारा तिरस्कृत दृष्टि से देखी जाती थीं।

    उनके बाल कटवा दिए जाते थे और उन्हंे रंगीन वस्त्र, शृंगार, आभूषण, अच्छे भोजन, नरम बिस्तर, सार्वजनिक स्थलों पर उपस्थिति, मांगलिक कर्म आदि से वंचित करके रूखा-सूखा एवं मसाले रहित भोजन दिया जाता था। वे धरती पर सोती थीं तथा प्रायः अपना जीवन दासी के समान व्यतीत करती थीं। उनका दर्शन अलमंगलकारी माना जाता था।

    सती-प्रथा

    मुहम्मद बिन तुगलक प्रथम मध्य-कालीन मुस्लिम शासक था जिसने बल-पूर्वक की जाने वाली सती-प्रथा पर प्रतिबन्ध लगाया। उसके शासन में किसी विधवा को सती होने के पूर्व शाही आज्ञा प्राप्त करनी होती थी। सीदी अली रईस हुमायूँ के शासन काल में भारत आया था, वह ई.1553-1556 तक भारत में रहा। उसने लिखा है कि सुल्तान के अफसर यह देखने के लिए तत्परता से उपस्थित रहते थे कि किसी विधवा को उसकी इच्छा के विरुद्ध नहीं जलाया जाए।

    अकबर ने भी बलपर्वूक सती किए जाने पर रोक लगा रखी थी। स्वयं अकबर ने कई बार हस्तक्षेप करके विधवाओं को जबरन जलाये जाने से बचाया। उसने आम्बेर नरेश भगवानदास की भांजी (जयमल की विधवा) की रक्षा की तथा उसके पुत्र को, जो उसे सती होने पर विवश कर रहा था, जेल में डाल दिया।

    सोलहवीं एवं सत्रहवीं सदी के यूरोपियन यात्रियांें डेलावेल, प्लेसार्ट तथा टवर्नियर ने भी उल्लेख किए हैं कि किसी विधवा को जलाये जाने के लिए गवर्नर से अनुमति लेनी अनिवार्य थी। जहाँगीर और शाहजहाँ ने भी अकबरकालीन व्यवस्था को बनाए रखा। औरंगजेब ने आदेश जारी करके सती-प्रथा को निषिद्ध कर दिया किन्तु इन आदेशों का प्रजा पर कोई असर नहीं हुआ और सती-प्रथा पहले की ही भाँति चलती रही।

    माता के रूप में नारी की स्थिति

    मध्य-काल में माता के रूप में नारी की स्थिति सम्मान-जनक थी। राजपूतों में माता के प्रति सम्मान की भावना बहुत प्रबल थी। मेवाड़ का महाराणा संग्रामसिंह (द्वितीय) भोजन करने से पहले माता के दर्शन करता था। जब अकबर ने चितौड़ पर चढ़ाई की, तब फत्ता सिसोदिया ने अपनी माता से आज्ञा लेकर केसरिया बाना पहना और शत्रु से लड़ता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ। कई मुगल बादशाह माता की अगवानी करने थोड़ी दूर तक पैदल जाते थे। बादशाह अपने जन्मदिन पर शहजादों और दरबारियों के साथ माता से आशीर्वाद लेने जाता था।

    नारी की आर्थिक स्थिति

    मध्य-काल में हिन्दू महिला को अपने पीहर एवं ससुराल दोनों ही स्थानों से सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकार प्राप्त नहीं थे। महिला को विवाह के अवसर पर दहेज में प्राप्त आभूषणों, बर्तनों एवं कपड़ों को स्त्री-धन माना जाता था। विधवा होने पर या परित्यक्ता होने पर स्त्री-धन के अतिरिक्त उसे कोई सम्पत्ति नहीं दी जाती थी। ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैष्य परिवारों में स्त्री, धनार्जन की किसी भी गतिविधि में सम्मलित नहीं थी किंतु किसान और मजदूर वर्ग की स्त्रियाँ इस परमपरा की अपवाद थीं जो कृषि, पशु-पालन, मजदूरी, बुनाई, कढ़ाई, सिलाई आदि कामों में घर से बाहर जाकर भी पुरुषों के साथ काम करती थीं। मुस्लिम-स्त्री को उत्तराधिकार के रूप में अपने पिता की सम्पत्ति में हिस्सा प्राप्त होता था। उसका यह अधिकार विवाह के बाद भी बना रहता था। विवाह के अवसर पर मुस्लिम-स्त्री के लिए मेहर की व्यवस्था थी। मध्य-काल में बंगाल में निराश्रित मुस्लिम महिलाओं ने नृत्य और गायन को अपना व्यवसाय बना लिया था।

    मध्य-काल में विदुषी महिलाएँ

    'रघुनाथ अभ्युदय' में 'मधुरवाणी' की लेखिका तथा 'आन्ध्र रामायण' की अनुवादक रामभदबा, 'काव्य वरदंबिका परिणयम्' की लेखिका तिरूमलंबा और 'मारिची परिणयम्' नामक प्रेम काव्य की लेखिका मोइनांगी मध्य-काल की प्रसिद्ध संस्कृत कवयित्रियाँ हैं। मीरांबाई, देवलरानी, रूपमती, चारुमती आदि भी उस काल की विदुषी महिलाएं थीं। इनकी साहित्यिक रचनाएं बड़ी संख्या में प्राप्त होती हैं। महाराष्ट्र की अकाबाई, केनाबाई और मुक्तिबाई तथा बंगाल की माधवबाई का नाम भी मध्य-कालीन भक्ति साहित्य में सर्वोपरि है।

    मुस्लिम महिलाओं में 'हुमायूँनामा' की लेखिका गुलबदन बेगम और 'शिबिया तथा मुनिसाल अरवा की जीवनी' की लेखिका जहाँनारा प्रमुख हैं। सलीमा सुल्ताना, नूरजहाँ, सितिउन्निसा (जहाँनारा की अध्यापिका) और जेबुन्निसा (औरंगजेब की बेटी) भी मध्य-कालीन मुस्लिम समुदाय की प्रबुद्ध महिलाएं थीं तथा उस काल की प्रसिद्ध कवयित्रियाँ थी।

    मध्य-कालीन राजनीति में महिलाएँ

    मध्य-कालीन राजनीति में महिलाओं के लिए विशेष स्थान नहीं था। किसी राजा का निधन हो जाने पर उसका पुत्र अथवा उसके कुल का निकटतम रक्त-सम्बन्धी पुरुष ही राज्य का उत्तराधिकारी होता था। स्वर्गीय राजा के उत्तराधिकारी के अल्पवय होने की अवस्था में उस अल्पवय राजा की माता या दादी, नए राजा की ओर से राज्यकार्य चलाती थी।

    मेवाड़ के महाराणा विक्रमादित्य के अयोग्य शासक होने के कारण राजमाता कर्मवती ने हुमायूँ को राखी भेजकर सहायता प्राप्त करने की चेष्टा की किंतु जब हुमायूं ने मेवाड़ की सहायता नहीं की तो कर्मवती ने पूर्व में मेवाड़ द्वारा मालवा के शासक महमूद खिलजी से छीने गए मालवा के समस्त जिले तथा सोना-चांदी देकर बहादुरशाह से संधि की। गोडवाना की चंदेल रानी दुर्गावती इस काल की प्रसिद्ध रानी हुई है जिसने अपने पति की मृत्यु के बाद अकबर से युद्ध जारी रखा और युद्धक्षेत्र में वीरगति को प्राप्त हुई।

    मराठा शासक राजाराम की मृत्यु के बाद उसकी रानी ताराबाई (ई.1700-1707) ने मराठा राज्य का शासन संचालित किया। उसने औरंगजेब की सेनाओं से सफलतापूर्वक मोर्चा लिया। मराठा सूबेदार मल्हारराव होलकर की पुत्रवधू महारानी अहिल्याबाई (ई.1925-95) धर्म-पूर्वक शासन करने के लिए प्रसिद्ध हुईं। उन्होंने प्रजा की भलाई के लिए बहुत से कार्य किए। मध्य-काल की मुस्लिम महिला शासकों में दिल्ली की शासक रजिया सुल्ताना और अहमदनगर के अल्पवय शासक की संरक्षक चाँदबीबी का नाम उल्लेखनीय है।

    मकदुम-ओ-जहान ने बहमनी परिवार के निजामशाह की ओर से दक्कन का शासन सँभाला। अली मरदान की बेटी साहिबजी ने अपने पति की मृत्यु के बाद काबुल पर शासन किया। जहाँगीर के शासनकाल में उसकी बेगम नूरजहाँ ही समस्त शासकीय निर्णय लेती थी तथा बादशाह की मुहर भी नूरजहाँ के पास रहती थी।

    आधुनिक काल में नारी की स्थिति

    भारतीय इतिहास में आधुनिक काल का आशय मुगल शासन की समाप्ति होकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासनारम्भ से लेकर वर्तमान समय से है। अंग्रेजों ने देशी शासकों को परास्त करके देश में दो प्रकार की शासन व्यवस्थाएं स्थापित कीं। पहली व्यवस्था में अंग्रेजों ने अपने द्वारा विजित क्षेत्रों को ब्रिटिश भारत कहा। देश के इस हिस्से पर अंग्रेजों के बनाए कानून लागू होते थे। दूसरे हिस्से को रियासती भारत कहा जाता था। इस हिस्से में छोटे-छोटे राज्य थे जिनमें राजाओं एवं नवाबों का शासन था।

    इन राज्यों को अधीनस्थ संधियों के माध्यम से ब्रिटिश सत्ता के अधीन लाया गया जिनमें पॉलिटिकल एजेंटों के माध्यम से अंग्रेजी कानून लागू करवाए जाते थे। अंग्रेजों के शासनकाल में भारतीय समाज में नारी का जीवन अत्यंत कठिन था। समाज में दहेज-प्रथा का प्रचलन था। विधवाओं का जीवन अंधकारमय था। पुरुषों में बहु-विवाह प्रचलित था तथा एक पत्नी की मृत्यु होने पर उसे दूसरा विवाह करने की छूट थी किंतु स्त्रियाँ पुनर्विवाह नहीं कर सकती थीं।

    अंग्रेजों ने भारत में परम्परागत रूप से चली आ रही कुप्रथाओं यथा, सती-प्रथा, बाल-विवाह प्रथा, पर्दा-प्रथा, कन्या-वध, अनमेल-विवाह प्रथा, दहेज प्रथा, देवदासी प्रथा, चेला बनाने की प्रथा, दास-प्रथा, बच्चों के बेचने की प्रथा आदि अनेक सामाजिक कुरीतियों को रोकने के लिए कानून बनाए।

    सती-प्रथा

    भारत में सती-प्रथा के उल्लेख महाभारत काल से मिलने लगते हैं। अधिकांश स्मृतियों में पतिव्रता स्त्री के लिए सती होना ही स्वर्गीय मार्ग बताया गया। संभवतः सती-प्रथा के आरम्भ में स्त्रियाँ धार्मिक भावना से प्रेरित होकर स्वेच्छा से सती हो जाया करती थीं। सती हो चुकी स्त्री को समाज में देवी माना जाता था। फिर भी प्राचीनकाल में सती होना अनिवार्य नहीं था। राजा दशरथ की मृत्यु पर कोई भी रानी सती नहीं हुई थी। राजा पाण्डु के निधन के बाद केवल छोटी रानी माद्री सती हुई थी किंतु बड़ी रानी कुंती सती नहीं हुई।

    मध्य-काल आते-आते समाज में यह धारणा प्रचलित हो गई कि विधवा होने पर स्त्रियाँ सच्चरित्र नहीं रह पाएंगी। इसलिए कुल की मर्यादा बचाने के उद्देश्य से उसे सती होने पर विवश किया जाता था। सती होने की इच्छुक न होने पर भी उसे चिता के साथ बाँध दिया जाता था और जब वह जलती हुई चिता से भागने का प्रयत्न करती तो परिवार के लोग उसे बाँस से पीटते हुए चिता की ओर धकेल देते थे।

    स्त्री का क्रन्दन किसी को सुनाई न पड़े, इसके लिए जोर-जोर से ढोल बजाए जाते थे। कुछ मध्ययुगीन शासकों ने इस कुप्रथा को समाप्त करने के प्रयत्न किए किन्तु यह कुप्रथा चलती रही। 18वीं सदी के उत्तरार्द्ध तथा 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में बंगाल, राजस्थान, पजंाब आदि राज्यों में बड़ी संख्या में स्त्रियाँ सती होती थीं।

    कन्या-वध

    भारत में प्राचीन काल से कन्या का जन्म अच्छा नहीं माना जाता था। पातंजलि ने भाष्य में लिखा है- 'पुत्र प्रकाश के समान है और पुत्री संकट का स्रोत है।' राजपूत परिवारों में कन्या का पैदा होना अच्छा नहीं मानते थे। कन्या के विवाह पर वर-पक्ष को दहेज देना पड़ता था। कन्या के विवाह के अवसर पर चारण, ढोली एवं भाट कन्या के पिता से 'त्याग' एवं 'नेग' के रूप में बड़ी राशि की मांग करते थे।

    त्याग एवं नेग नहीं देने पर कन्या के पिता को समाज में नीचा देखना पड़ता था। इन अप्रिय परिस्थितियों से बचने के लिए अधिकांश कन्याओं को जन्मते ही मार दिया जाता था। आधुनिक युग के प्रारम्भ में यह कुप्रथा जोरों पर थी। कन्या के जन्म लेते ही उसे अफीम देकर या गला दबाकर या माता के स्तन पर विष लगाकर मार देते थे। 18वीं सदी के अन्त तक इस प्रथा पर स्वैच्छिक रोक लगनी आरम्भ हो गई।

    डाकन-प्रथा

    मध्ययुग में विश्व के अनेक देशों में यह विश्वास था कि कुछ स्त्रियाँ चुड़ैल अथवा डाकन होती हैं जो बच्चों और रूपवती नव-विवाहिताओं को खा जाती हैं। वे शमशान में गाढ़े गए बच्चों का कलेजा निकाल कर खाती हैं। मृत बच्चा न मिलने पर डाकन रात के समय किसी जीवित बच्चे का कलेजा खा जाती है जिससे बच्चा मर जाता है। इस अन्धविश्वास को झाड़-फंूक करने वाले ओझाओं और तात्रिकों ने अधिक दृढ़ बनाया। झाड़-फूँक करने वाला ओझा, तांत्रिक या भोपा जब किसी स्त्री के डाकन होने की पुष्टि कर देता था तब उस स्त्री को जलाकर या सिर काटकर या पीट-पीट कर मार डाला जाता था।

    ताकि डाकन किसी को कष्ट नहीं पहुँचा सके। 17वीं, 18वीं और 19वीं शताब्दी में तो लोगों में यह विश्वास अत्यधिक दृढ़ था। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली अनेक जातियों, विशेषकर भील, मीणा तथा कुछ अन्य आदिवासी जातियों में यह अन्धविश्वास अधिक व्याप्त था। कई बार तो डाकन घोषित स्त्री के परिवार और उसके पति की सहमति से उस स्त्री को जीवित जला दिया जाता था। गांव वाले या उस स्त्री के परिवार वाले इस कुकृत्य का विरोध नहीं करते थे।

    बाल-विवाह

    वैदिक-काल में कन्या का विवाह, उसके विवाह योग्य होने पर ही किया जाता था किंतु सूत्रकाल तक आते-आते कन्याओं के विवाह की आयु में कमी होने लगी तथा पूर्वमध्य-काल तक समाज में बाल-विवाह ने कुरीति का रूप ले लिया। मुसलमानों के बार-बार आक्रमणों के कारण, लड़कियों के सतीत्व की रक्षा के लिए बाल-विवाह को अच्छा समझा गया किंतु इससे लड़कियों के शारीरिक, मानसिक, शैक्षिक और व्यक्तित्त्व विकास का मार्ग अवरुद्ध हो गया।

    बाल-विवाह के कारण बाल-विधवाओं की समस्या उत्पन्न हो गयी। बहुत सी लड़कियां खेलने-कूदने की उम्र में ही विधवा हो जाती थीं। अक्षय तृतीया को घर की कई कन्याओं का एक साथ विवाह कर दिया जाता था। कुछ कन्याओं को तो थाली में बिठाकर ब्याहा जाता था। बाल-विवाह के कारण छोटी आयु में लड़की माँ बनती थी। आधुनिक समय में कानून के बल पर इस कुप्रथा को समाप्त किया गया है किंतु समाज में यह कुप्रथा अब भी चोरी-छिपे विद्यमान है।

    पर्दा-प्रथा

    वैदिक संस्कृति में पर्दा-प्रथा का प्रचलन नहीं था। भारत पर मुस्लिम आक्रमण आरम्भ होने से पूर्व स्त्रियां बिना परदे के स्वतन्त्रता पूर्वक आ-जा सकती थीं किंतु आक्रान्ता सैनिक सुन्दर कन्याओं का अपहरण करके उनसे बलात् निकाह करने लगे। इस कारण हिन्दू समाज ने बाल-विवाह एवं पर्दा-प्रथा का सहारा लिया। धीरे-धीरे इस कुप्रथा ने हिन्दू समाज में अनिवार्य नैतिक-प्रथा का रूप ले लिया।

    स्त्री को घर के भीतर भी घर के पुरुषों एवं से यहाँ तक कि अपनी सास आदि महिलाओं से भी पर्दा करना पड़ता था। उसका घर से निकलना और शिक्षा ग्रहण करना भी बंद हो गया। मुसलमानों में स्त्रियों के लिए बुर्का एवं हिजाब पहनना अनिवार्य था। 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में समाज-सुधारकों ने पर्दा-प्रथा के विरुद्ध आवाज उठानी आरम्भ की किंतु ग्रामीण क्षेत्रों में यह कुप्रथा आज भी अनिवार्य नैतिक-परम्परा बनी हुई है।

    दास-प्रथा

    प्राचीन एवं मध्य-कालीन भारतीय समाज में दासी-प्रथा का प्रचलन जोरों पर था। इसके लिए लड़कियों की खरीद-फरोख्त होती थी। राजपूत लोग अपनी पुत्री के विवाह में दहेज के साथ दासियां देने के लिए लड़कियों को खरीदते थे। कुछ सामन्त या सम्पन्न लोग लड़कियों को अपनी रखैल बनाने के लिए खरीदते थे। किसी लड़की के साथ दहेज में जाने वाली दासी को सामान्यतः उस घर के पुरुषों की भोग्या बनकर रहना पड़ता था।

    इस प्रकार 19वीं सदी के मध्य तक भारतीय नारी की स्थिति अत्यंत खराब थी परन्तु 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में अनेक भारतीय एवं अंग्रेज समाज सुधारकों के प्रयासों से सरकार ने इन कुप्रथाओं के विरुद्ध कानून बनाकर इन पर रोक लगाने का प्रयास किया।

    नारी की स्थिति सुधारने में समाज-सुधारकों का योगदान

    पश्चिम का समाज व्यक्तिवादी समाज है जिसमें स्त्री और पुरुष को बराबरी के अधिकार है। वहाँ स्त्री अपने विवाह, संतानोत्पत्ति एवं विवाह-विच्छेद जैसे निर्णय स्वयं लेती आई है। अंग्रेजों के शासनकाल में जब भारतीय लोग भ्रमण, पर्यटन, व्यवसाय एवं शिक्षा आदि उद्देश्यों से इंग्लैण्ड आदि देशों में जाने लगे तो उन्हें अपने देश की नारी की खराब स्थिति पर सोचने का अवसर मिला। बहुत से अंग्रेज अधिकारियों ने भी भारतीय समाज में स्त्री की दुर्दशा को करुणा की दृष्टि से देखा और उसकी दुर्दशा को दूर करने का प्रयास किया।

    ईसाई मिशनरियों का योगदान

    भारत में आई अनेक ईसाई मिशनरियों ने भारतीयों में प्रचारित किया कि पर्दा करना अनिवार्य नहीं है, स्त्रियों को पर्दा त्यागकर शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए। अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार ने भारतीयों में भी आधुनिक सोच एवं व्यक्तिवादी जीवन शैली का विकास किया। अनेक ईसाई समाज सुधारकों ने भारतीय पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं लिखकर भारतीयों का ध्यान सामाजिक कुरीतियों की ओर खींचा। ईसाई पादरियों ने सती-प्रथा एवं बाल-विवाह की कड़ी भर्त्सना की।

    बंगाल में समाज सुधार कार्यक्रम

    राज राममोहनराय ने ब्रह्मसमाज के माध्यम से नारी सुधार का कार्यक्रम चलाया। बम्बई के प्रार्थना समाज और लाहौर के देव समाज ने भी भारतीय नारियों की स्थिति सुधारने के लिए आन्दोलन चलाए। जिनके परिणाम स्वरूप गवर्नर-जनरल विलियम बैटिक ने ई.1829 में सती-प्रथा को असंवैधानिक घोषित किया। राजा राममोहनराय ने बहु-विवाह का भी विरोध किया। उन्होंने स्त्रियों के सामाजिक, कानूनी और सम्पत्ति के अधिकारों पर जोर दिया। वे स्त्री-शिक्षा के प्रबल समर्थक थे।

    बंगाल के समाज सुधारक ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने कहा कि सती-प्रथा के बन्द होने से स्त्रियों की यातना का अन्त नहीं हुआ है। इसलिए उन्होंने विधवा-विवाह का प्रबल समर्थन किया। विद्यासागर के अथक प्रयत्न से ही ई.1856 में विधवा-पुनर्विवाह अधिनियम स्वीकृत हुआ। विद्यासागर ने ई.1849 में कलकत्ता में एक कन्या विद्यालय की स्थापना की जो आगे चलकर बैथ्यून गर्ल्स कॉलेज के नाम से प्रसिद्ध हुआ। विद्यासागर ने अपनी सारी सम्पत्ति इस कॉलेज को दान कर दी।

    आर्य समाज का योगदान

    आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती ने वैदिक धर्म और संस्कृति की पुनर्स्थापना के उद्देश्य से स्त्री-शिक्षा पर विशेष जोर दिया तथा कन्याओं की शिक्षा के लिए गुरु-कुलों की स्थापना की। स्वामीजी ने बाल-विवाह का विरोध किया और कहा कि कन्याओं के लिए 16 से 24 वर्ष की आयु विवाह के लिए उपयुक्त है। वैदिक-काल के सामाजिक ढांचे के आधार पर उन्होंने स्त्रियों को समाज में उच्च एवं प्रतिष्ठित स्थान दिलाने का प्रयास किया।

    महाराष्ट्र में समाज सुधार

    महाराष्ट्र में स्त्री-शिक्षा का प्रथम बिगुल महात्मा ज्योतिराव फूले ने बजाया। उन्होंने 'महिला शिक्षा समिति' की स्थापना की तथा ई.1848 में अतिशूद्र लड़कियों के लिए एक स्कूल खोला। ब्राह्मणों के तीव्र विरोध के कारण उन्हें इस स्कूल के लिए अध्यापक नहीं मिला। अतः ज्योतिबा ने अपनी पत्नी सावित्री बाई को, जिसे ज्योतिबा ने घर पर पढ़ाया था, स्कूल में पढ़ाने भेजा।

    रूढ़िवादियों ने सावित्री बाई पर कीचड़ और पत्थर फेंके किंतु वे सावित्री बाई को अपने मार्ग से नहीं हटा सके। ज्योतिबा विधवा-विवाह के प्रबल समर्थक थे। उनके प्रोत्साहन पर पूना में एक शैणवी जाति की विधवा स्त्री का विवाह हुआ। ज्योतिबा ने एक ऐसा अनाथालय स्थापित किया जहाँ गर्भवती हिन्दू विधवाएं गुप्त रूप से अपना अपना प्रसव करा सकती थीं और अपने बच्चे को अनाथालय में रख सकती थीं। ज्योतिबा के मित्र विष्णु शास्त्री ने भी विधवा-विवाह को प्रोत्साहित करने के लिए एक संस्था स्थापित की।

    इस संस्था ने विधवा-विवाह का प्रचार किया तथा अनेक विधवाओं के विवाह कराए। ई.1873 में ज्योतिबा ने अपने कुछ प्रशंसकों के सहयोग से 'सत्य शोधक समाज' की स्थापना की। ज्योतिबा प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने दलित जाति की स्त्रियों के उत्थान का प्रयत्न किया। महादेव रानाडे ने भी महाराष्ट्र में नारी-सुधार कार्यक्रम चलाया। उन्होंने कन्या विवाह की न्यूनतम आयु 12 वर्ष बताई किंतु वे यौन-सम्बन्धों के लिए स्त्री की न्यूनतम आयु 16 वर्ष उपयुक्त मानते थे।

    रानाडे ने विधवा-विवाह का समर्थन किया तथा ई.1861 में स्थापित विधवा-पुनर्विवाह संस्था के सक्रिय कार्यकर्त्ता बने। उन्होंने नारी शिक्षा का समर्थन किया तथा ई.1884 मंे एक कन्या विद्यालय की स्थापना की। रानाडे ने ई.1887 में इण्डियन नेशनल सोशल कान्फ्रेंस की स्थापना की, जिसके कार्यकर्ता मदिरा-त्याग, दहेज का विरोध, विधवा-विवाह का समर्थन, स्त्री-शिक्षा का प्रचार, बाल-विवाह पर प्रतिबन्ध आदि की शपथ लेते थे।

    गुजरात में समाज सुधार कार्यक्रम

    गुजराती समाज सुधारक बहरामजी मलबारी ने बाल-विवाह का विरोध किया तथा विधवा-पुनर्विवाह का समर्थन किया। उन्होंने ई.1885 में बम्बई में 'सेवा-सदन' नामक संस्था की स्थापना की जो स्त्री-समस्याओं को हल करने का प्रयास करती थी। गुजरात के ही एक अन्य समाज सुधारक दुर्गादास मेहता ने अपना ध्यान विधवा-समस्या पर केन्द्रित किया। उन्होंने ई.1844 में 'मानव धर्म सभा' की स्थापना की। इस सभा में जातिभेद का खण्डन, विधवाओं के पुनर्विवाह की आवश्यकता, मूर्ति-पूजा का विरोध एवं अन्धविश्वासों के खण्डन आदि विषयों पर भाषण आयोजित कराए जाते थे।

    गुजरात की समाज-सुधार गतिविधियों में नर्मदा शंकर का विशिष्ट स्थान है। वे स्त्री-शिक्षा और विधवा-पुनर्विवाह के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने 'विधवा-विवाह' नामक संस्था में सक्रिय सहयोग दिया। गुजरात के दलपतराम ने भी बाल-विवाह एवं अनिवार्य वैधव्य जीवन का विरोध किया। वे अहमदाबाद की 'गुजरात वार्नाक्यूलर सोसायटी' नामक सुधारवादी संस्था के प्रमुख कार्यकर्ता थे।

    उन्होंने अपने साहित्य द्वारा समाज में नवीन विचारों का प्रसार किया। करसनदास मूलजी गुजरात के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने प्रथम विधवा-विवाह सम्पन्न कराया। लालशंकर उमियाशंकर ने भी बाल-विवाह का विरोध किया। बड़ौदा के शासक सयाजीराव गायकवाड़ ने नारी-सुधार की दिशा मंे सख्त कदम उठाए। उसने बड़ौदा राज्य में, विवाह के लिए न्यूनतम आयु का निर्धारण, तलाक की पूर्व-स्वीकृति तथा एक-पत्नीत्व को अनिवार्य घाषित करने वाले कानून ब्रिटिश शासन के कानूनों से भी बहुत पहले लागू कर दिए थे।

    अंग्रेजी शिक्षा का योगदान

    अंग्रेजी शिक्षा के कारण तथा अंग्रेजी औरतों के रहन-सहन के कारण भारतीय लोगों के मन में नए विचारों का उदय हुआ। शिक्षित भारतीयों ने पर्दा-प्रथा को निरर्थक समझकर उसका विरोध किया। अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त लोगों के प्रयत्नों का ही परिणाम था कि हजारों स्त्रियों ने पर्दा त्यागकर राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लिया। थियोसोफिकल सोसायटी और दकन एजुकेशन सोसाइटी ने इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया।

    समाज के शिक्षित वर्ग ने स्त्री-शिक्षा के कार्यक्रम को पूर्ण सहयोग दिया तथा अपनी बालिकाओं को स्कूल भेजने में उत्सुकता दिखाई। अनेक स्थानों पर प्रातःकालीन निःशुल्क शिक्षण-संस्थाओं का प्रबन्ध किया गया। ई.1854 में चार्ल्स वुड के शिक्षा सम्बन्धी सुझावों में स्त्री-शिक्षा के सम्बन्ध में भी परामर्श दिया गया था। यद्यपि ब्रिटिश सरकार स्त्री-शिक्षा के प्रति उदासीन रही, फिर भी 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में लड़कियांें की शिक्षण-संस्थाओं में वृद्धि होने लगी। ई.1882 में हण्टर आयोग ने बालिकाओं की शिक्षा के लिए स्थानीय संस्थाओं को अनुदान दिया।

    ब्रिटिश सरकार द्वारा सुधार

    18वीं और 19वीं शताब्दी के बीच अंग्रेज अधिकारियों ने सती-प्रथा, बाल-विवाह, कन्या वध, दास-प्रथा आदि सामाजिक कुरीतियों को रोकने के लिए अनेक कानून बनाए। उन्होंने विधवा-पुनर्विवाह को वैध घोषित किया। विलियम बैंटिक के समय समाज सुधार पर विशेष जोर दिया गया। जनवरी 1832 में विलियम बैंटिक ने अजमेर दरबार के दौरान राजपूताने के राजाओं एवं ब्रिटिश अधिकारियों को नयी सामाजिक नीति अपनाने के लिये प्रेरित किया। इस तरह के आयोजन उस समय देश के विभिन्न भागों में बड़ी संख्या में आयोजित किए गए। ई.1857 की क्रांति के बाद समाज सुधार कानूनों को लागू करने में ढील दी गई क्योंकि ई.1858 में महारानी विक्टोरिया ने घोषणा की थी कि सरकार भारतीय जनता के धार्मिक एवं सामाजिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगी।

    सती-प्रथा का निषेध

    ब्रिटिश सरकार ने ई.1813 और ई.1817 में सती-प्रथा रोकने के लिए आदेश प्रसारित किए तथा अंग्रेज अधिकारियों को अधिकार दिए कि अवयस्क या गर्भवती स्त्री को सती होने से रोका जा सकता है और सती होने के लिए जोर-जबर्दस्ती किए जाने पर भी स्त्री को सती होने से रोका जा सकता है। ये आज्ञा-पत्र केवल शासकीय आदेश थे, कानून नहीं थे। इस कारण सती-प्रथा को रोकने में प्रभावशाली सिद्ध नहीं हुए।

    बंगाल में राजा राममोहनराय के नेतृत्व में भारतीयों का एक प्रगतिशील समूह सती-प्रथा को समाप्त करने हेतु आन्दोलन कर रहा था। इसलिए गवर्नर जनरल विलियम बैंटिक ने 4 दिसम्बर 1829 को एक सरकारी आज्ञा द्वारा सती-प्रथा को गैर कानूनी घोषित कर दिया। ई.1830 में बम्बई एवं मद्रास में भी यह कानून लागू कर दिया गया जिसके अनुसार सती होना निषिद्ध कर दिया गया एवं सती होने में किसी प्रकार की सहायता देना दण्डनीय अपराध घोषित कर दिया गया।

    रूढ़िवादी तत्वों ने इस कानून का जबरदस्त विरोध किया किंतु राजाराममोहन राय के प्रयत्नों से यह कानून समाप्त नहीं हुआ। कुछ वर्षों में यह कानून देशी राज्यों में भी लागू हो गया। 26 अप्रेल 1846 को जयपुर संरक्षक परिषद ने जयपुर राज्य में सती-प्रथा को दण्डनीय अपराध घोषित किया। ई.1856 के अंत तक मेवाड़ को छोड़कर राजस्थान के सभी राज्यों में इस बुराई को पूर्णतः समाप्त कर दिया गया। ई.1861 तक लगभग सारे भारत में सती-प्रथा पर रोक लगा दी गई जिससे सती होने की घटनाएं कम होती चली गईं। वर्तमान समय में यह प्रथा पूरी तरह से समाप्त हो चुकी है।

    बाल-विवाह पर प्रतिबन्ध

    बाल-विवाह पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए ई.1860 में भारतीय दण्ड विधान में लड़की के लिए दाम्पत्य सहवास की न्यूनतम आयु 10 वर्ष निश्चित की गई परन्तु इस आयु की लड़कियों से सहवास के भीषण परिणामों को देखते हुए इस आयु को बढ़ाने की मांग की जाने लगी। सरकार का विचार था कि शिक्षा के द्वारा समाज में स्वतः जाग्रति आएगी और बाल-विवाह स्वयं समाप्त हो जाएगा। इस पर बहरामजी मलबारी इंग्लैण्ड गए और वहाँ के समाचार पत्रों में अपने लेखों एवं भाषणों से सरकार का ध्यान आकर्षित किया।

    समाज सुधारक के. टी. तैलंग ने कहा कि कन्या के सहवास की आयु निर्धारित करने में सुधार की आवश्यकता अधिक है न कि विवाह की आयु निश्चित करने की। मलबारी के एक मित्र दयाराम गिदूमल ने सुझााव दिया कि दाम्पत्य सहवास की आयु 10 वर्ष से बढ़ाकर 12 वर्ष कर दी जाय। जब सरकार सहवास के लिए न्यूनतम आयु पर विचार कर रही थी, तब सरकार के विरोधी सक्रिय हो उठे। उन्होंने सरकार द्वारा हिन्दू विवाह प्रथाओं को सुधारना राष्ट्रीय गौरव के लिए अपमानजनक कहा।

    लोकमान्य तिलक ने बम्बई प्रेसीडेन्सी में कहा कि विवाह की आयु पर नियंत्रण हो किंतु इसके लिए कानून की नहीं अपितु शिक्षा की आवश्यकता है। रानाडे कानून द्वारा विवाह की आयु निर्धारित करने के पक्ष में थे। महादेव रानाडे दाम्पत्य सहवास की आयु 14 वर्ष करने के पक्ष में थे। उन्हीं दिनों एक ग्यारह वर्षीय बालिका फूलमणी दासी के साथ उसके पति ने ऐसा पाशविक सहवास किया कि उसकी मृत्यु हो गई। फूलमणी के पति पर हत्या का मुकदमा सलाया गया किन्तु वह ई.1860 के कानून का सहारा लेकर छूट गया जिसमें दाम्पत्य सहवास की आयु 10 वर्ष निश्चित की गई थी।

    इस घटना ने सरकार को सहवास की न्यूनतम आयु का पुनर्निर्धारण करने के लिए विवश कर दिया। 19 मार्च 1821 को सरकार ने सहवास-वय विधेयक (।हम व िब्वदेमदज ठपसस) पारित कर दिया जिसके अनुसार लड़कियों के लिए सहवास-वय न्यूनतम 12 वर्ष निर्धारित की गई। लोकमान्य तिलक ने इस कानून का विरोध किया, क्योंकि सहवास-वय का निर्धारण सरकार द्वारा किया गया था।

    तिलक का कहना था कि इस प्रकार के प्रतिबन्ध स्वयं समाज द्वारा लगाए जाएं तथा विदेशी सरकार भारतीयों के सामाजिक जीवन में हस्तक्षेप न करे। बिल पर वाद-विवाद के बाद जन-सामान्य इसे भूल गया तथा बाल-विवाह पहले की तरह होने लगे।

    कन्या-वध पर रोक

    मध्य-कालीन समाज में राजपूतों और जाटों सहित कुछ जातियों में कन्या-वध की प्रथा प्रचलित थी। यह कुप्रथा विशेषतः राजपूतों के साथ जुड़ी हुई थी किंतु जहाजपुर के मीणों, मेरों और भरतपुर के मेवों तथा जाटों में भी इस प्रथा का प्रचलन था। जिन जातियों में यह प्रथा प्रचलित थी, उन जातियों के शासक परिवारों एवं सामंत परिवारों में यह प्रथा प्रचलित नहीं थी। इस अमानवीय कुप्रथा का पता अंग्रेज अधिकारियों को सर्वप्रथम ई.1789 में लगा।

    ई.1795 तथा ई.1804 के कानूनों में ब्रिटिश प्रदेशों में कन्या-वध, हत्या का अपराध घोषित किया गया किंतु यह कुरीति निर्बाध रूप से चलती रही। ब्रिटिश अधिकारियों ने लोगों पर दबाव डालकर इस क्रूर कार्य को रोकने का प्रयास किया। जॉन लुडलो, जॉन सदरलैंण्ड, विलकिंसन आदि अंग्रेज अधिकारियों के प्रयत्नों के फलस्वरूप राजपूताना के राज्यों में भी ई.1831 के आसपास कन्या-वध को गैर कानूनी घोषित किया गया। ई.1834 में कोटा एवं मेवाड़ राज्य ने कन्या-वध को प्रतिबंधित किया।

    ई.1837 में बीकानेर राज्य में एवं ई.1839 में जोधपुर राज्य में इस प्रथा को रोकने के लिए कुछ नियम बने। ई.1844 में राजपूताना के ए.जी.जी. सदरलैण्ड, जयपुर में पॉलिटिकल एजेण्ट लुडलो तथा नीमच के पॉलिटिकल एजेण्ट रॉबिन्सन के संयुक्त प्रयासों के परिणाम स्वरूप राजस्थान के सभी राज्यों में कन्यावध को गैर-कानूनी घोषित किया गया। इस काल में कन्यावध का कारण दहेज प्रथा नहीं अपितु त्याग-प्रथा थी। कन्या के पिता को अपनी कन्या का विवाह करवाने के लिए चारण तथा भाटों को बड़ी रकम समर्पित करनी होती थी जिसे त्याग कहते थे। इस त्याग की राशि से बचने के लिए राजपूत अपनी कन्याओं को मार डालते थे।

    ई.1843 में अंग्रेजों ने राजपूताने के राज्यों में यह आज्ञा प्रचारित करवाई कि जिस जागीरदार राजपूत की वार्षिक आय 1000 रुपये या उससे अधिक होगी वह अपनी कन्या के विवाह पर त्याग के रूप में चारण को 25 रुपये तथा भाट को 9 रुपये देगा। भोमिये राजपूत, चारण को 10 रुपये तथा भाट को 5 रुपये देंगे। सामान्य राजपूत चारण को 5 रुपये तथा भाट को 4 रुपये देंगे। इस आदेश को पत्थरों पर खुदवाकर राज्यों की परगना कचहरियों के समक्ष प्रदर्शित किया गया।

    ई.1877 में हितैषिणी सभा उदयपुर ने तय किया कि केवल वही राजपूत त्याग की रकम देंगे जिनकी वार्षिक आय 500 रुपये से अधिक हो। यह रकम उस राजपूत की वार्षिक आय की 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी। पुत्र तथा पुत्री के विवाह के उपलक्ष्य में कोई भी राजपूत अपनी वार्षिक आय का 25 प्रतिशत तक व्यय कर सकता है। मेवाड़ राज्य में बाहर से आए चारणों को त्याग नहीं दिया जाएगा।

    ब्राह्मणों एवं महाजनों को भी सूचित किया गया कि वे भी अपनी पुत्री के विवाह में अपनी वार्षिक आय का अधिकतम 25 प्रतिशत ही व्यय करें। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ब्रिटिश प्रदेशों में कन्या-वध की कुप्रथा कम हुई किंतु राजपूताना की रियासतों में निर्बाध रूप से चलती रही। ई.1870 में एक कानून पारित करके प्रत्येक बच्चे के जन्म का पंजीेकरण करवाना अनिवार्य किया गया।

    उन क्षेत्रों में जहाँ कन्या-वध अधिक प्रचलित था, समय-समय पर कन्याओं की गणना करके पता लगाया जाता था कि वहाँ अब भी कन्या-वध तो नहीं किया जा रहा है फिर भी 19वीं सदी में अकेले जोधपुर राज्य में कन्या-वध की प्रतिवर्ष 300-400 घटनाएं होती थीं।

    विधवा-पुनर्विवाह

    विधवा-पुनर्विवाह की मांग 16वीं सदी से हो रही थी जब बंगाल के रघुनन्दन भट्टाचार्य ने अपनी विधवा-पुत्री का पुनर्विवाह करने का असफल प्रयास किया था। 18वीं शताब्दी में विक्रमपुर निवासी राजा राजवल्ल्भ ने अपने नवयुवती विधवा कन्या का पुनर्विवाह करने का प्रयास किया किन्तु वे सफल नहीं हुए। 19वीं शताब्दी में विधवा-पुनर्विवाह आन्दोलन ने जोर पकड़ा। 14 मार्च 1835 के 'समाचार दर्पण' में कुलीन ब्राह्मण परिवारों की कुछ अविवाहित कन्याओं ने अपने लेखों द्वारा समाज में विधवा स्त्रियों की दुःखद स्थिति का वर्णन करते हुए विधवा-पुनर्विवाह का समर्थन किया और आशा प्रकट की कि ब्रिटिश सरकार इस दिशा में सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाएगी।

    बम्बई के कुछ समाचार पत्र भी विधवा-पुनर्विवाह का प्रचार कर रहे थे। बंगाल के महान् समाज सुधारक ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने, रूढ़िवादियों के कट्टर विरोध के बावजूद इस आन्दोलन को आगे बढ़ाया। जनवरी 1854 में उन्होंने एक पुस्तक प्रकाशित की जिसमें उन्होंने प्रमाणों के द्वारा सिद्ध किया कि विधवा-पुनर्विवाह शास्त्र सम्मत है। उनके विरोध में रूढ़िवादी पंडितों ने पुस्तकें लिखीं किंतु वे विद्यासागर को विचलित नहीं कर सके। विद्यासागर ने 984 व्यक्तियों के हस्ताक्षरों से एक प्रार्थना पत्र सरकार के पास भेजा जिसमें विधवा-पुनर्विवाह को वैध घोषित करने की मांग की गई।

    बंगाल के अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने भी ऐसे ही प्रार्थना पत्र सरकार के पास भेजे। दूसरी ओर रूढ़िवादी पंडितों ने भी हजारों व्यक्तियों के हस्ताक्षरयुक्त प्रार्थना पत्र भिजवाए कि विधवा-पुनर्विवाह शास्त्रसम्मत नहीं है किंतु विद्यासागर व अन्य सुधारकों के प्रयत्नों से सरकार ने 26 जुलाई 1856 को विधवा-पुनर्विवाह कानून पारित कर दिया। इस कानून के द्वारा विधवा-पुनर्विवाह को वैध घोषित कर दिया। विद्यासागर ने इस कानून के पारित होने के तीन माह के अन्दर विधवा-विवाह सम्पन्न कराया।

    इसके बाद कई विधवा-विवाह सम्पन्न हुए। विष्णुशास्त्री ने बम्बई में 'विधवा सहायक सभा' के माध्यम से विधवा-पुनर्विवाह को प्रोत्साहित किया। इस पर भी हिन्दू समाज में विधवा-पुनर्विवाह बहुत कम हुए क्योंकि विधवा स्त्री, पुनर्विवाह करने पर अपने पूर्व-पति की सम्पत्ति में अपना अधिकार खो देती थी।

    डाकन-प्रथा पर रोक

    भारत की अनेक जातियों में, विशेषकर आदिवासी एवं जनजातियों में यह अमानवीय प्रथा प्रचलित थी। भारत सरकार ने अंग्रेज अधिकारियों को निर्देश दिए कि वे स्थानीय शासकों पर दबाव डालकर इस प्रथा को गैरकानूनी घोषित करवायें। चूँकि राजपूताना के आदिवासी क्षेत्रों में इस प्रथा का अधिक प्रचलन था, अतः राजपूताना के राज्यों, विशेषकर मेवाड़ और कोटा के शासकों पर दबाव डाला गया। 19वीं सदी के मध्य में सर्वप्रथम कोटा राज्य ने इस प्रथा को गैर-कानूनी एवं दण्डनीय अपराध घोषित किया।

    अक्टूबर 1853 तक ए.जी.जी. के निर्देश पर महाराणा मेवाड़ को छोड़कर सभी शासकों ने डाकन-प्रथा को गैरकानूनी करार देकर असहाय की सहायता के लिये प्रेरित किया। मेवाड़ का महाराणा स्वयं डाकन-प्रथा में विश्वास करता था फिर भी अंग्रेजों के दबाव से मेवाड़ में डाकन-प्रथा को गैरकानूनी घोषित किया तथा कानून का उल्लंघन करने वालों को छः मास के कारावास का प्रावधान किया। फिर भी मेवाड़ में यह कुप्रथा समाप्त नहीं हुई।

    निर्दोष विधवाओं एवं वृद्धाओं को अपने रास्ते से हटाने के लिए उन्हें धड़ल्ले से डाकन घोषित किया जाता रहा और उनकी हत्याएं होती रहीं, सरकार उन हत्यारों को दण्डित भी करती रही। 19वीं शताब्दी के अन्त में मेवाड़ के रेजीडेन्ट कर्नल वाल्टर ने इस कुप्रथा से प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया और आदिवासियों के मुखियाओं को सौगन्ध दिलवाई कि वे किसी स्त्री के डाकन होने का संदेह होने पर उसकी हत्या नहीं करेंगे अपितु वे इसकी शिकायत सरकार से करेंगे और सरकार ही उस डाकन को दण्डित करेगी।

    इस सौगन्ध को भंग करने वालों को सरकार दण्डित करेगी। मगरापाल के आदिवासी प्रतिनिधियों ने रिखबदेव में वाल्टर को डाकन-प्रथा पर रोक लगाने की सहमति प्रदान की तथा भविष्य में इस अपराध में संलिप्त अपराधियों को स्वयं पकड़कर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने का भी वचन दिया। इस प्रकार की कार्यवाही अन्य स्थानों पर भी की गई। समय के साथ यह कुप्रथा कमजोर पड़ गई। वर्तमान समय में यह पूरी तरह समाप्त हो गई है।

    दासी-प्रथा पर रोक

    देशी राजा, सामन्त तथा अन्य धनी लोग निर्धन लड़कियों को खरीद कर अपनी बेटियों की शादी में दासियों के रूप में दहेज के साथ भेजते थे। घरेलू दास-दासी अमीर लोगों के घरों में वंशानुगत सेवक के रूप में कार्य करते थे। इन्हें गोला, गोली, दावड़ी, वड़ारन, दरोगा, चाकर हजूरिया, दास, खानजादा, चेला आदि नामांे से सम्बोधित किया जाता था। इनका जीवन बड़ा कठिन होता था। उन्हें पीढ़ी दर पीढ़ी स्वामी तथा उसके परिवार की सेवा करनी पड़ती थी तथा स्वामी की लड़कियों के दहेज में जाना होता था। इस सब के बदले में उन्हें साधारण भोजन एवं वस्त्र प्राप्त होते थे।

    राजमहलों, सामन्तों की हवेलियों तथा सम्पन्न लोगों के यहाँ दासियों का दैहिक शोषण किया जाता था। ई.1833 के चार्टर एक्ट द्वारा ब्रिटिश भारत में दास-दासी प्रथा को गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया किंतु देशी राज्यों में यह प्रथा चलती रही। ब्रिटिश अधिकारियों के दबाव देने पर ई.1839 में जयपुर राज्य की संरक्षक परिषद के अध्यक्ष जो कि ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट भी था, ने जयपुर राज्य में दास-व्यापार को प्रतिबंधित किया तथा दासों के गोला-गोली जैसे अपमानजनक सम्बोधनों पर रोक लगाई।

    1 दिसम्बर 1840 को जोधपुर राज्य में भी दास व्यापार को प्रतिबंधित किया गया। राजपूताने के समस्त शासक ई.1848 में इस बुराई को समाप्त करने के लिए सहमत हो गए किंतु अधिकांश देशी राज्यों ने इस कुप्रथा पर ई.1862-63 तक रोक नहीं लगाई। उन्नीसवीं सदी के अंत में पुष्कर में गौरीशंकर ओझा के सभापतित्व में एक सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें गोला कहे जाने वाले समुदाय के लगभग 200 व्यक्ति उपस्थित हुए।

    सम्मेलन में उपस्थित लोगों में अपने स्वामियों का इतना अधिक भय था कि उन्होंने इस सम्मेलन में केवल एक ही प्रस्ताव पारित किया कि उन्हें गोला न कहकर रावणा-राजपूत कहा जाए। अंग्रेज अधिकारी दास-प्रथा को समाप्त करने में विशेष सफलता अर्जित नहीं कर पाए क्योंकि राजपूताना के शासक एवं सामंत हर हाल में इस प्रथा को बनाए रखना चाहते थे। ई.1916 में जोधपुर राज्य की ओर से एक अधिसूचना जारी की गई कि घरेलू दासों के स्वामी उन्हें खाना, कपड़ा और विवाह, जन्म तथा मृत्यु का व्यय प्रदान करते हैं, इसलिए स्वामियों को दासों से काम लेने तथा अपनी पुत्रियों की शादी में दासोें की पुत्रियों को दहेज में देने का पूरा अधिकार है।

    ई.1921 की जनगणना के अनुसार राजपूताने में घरेलू दास-दासियों की संख्या 1,60,755 थी। इनमें से आधे दास ऐसे थे जिनका जन्म अपने मालिक के घर में हुआ था। अंत में राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय दबाव के चलते ई.1926 में जोधपुर राज्य ने दास-प्रथा पर रोक लगाई किंतु यह प्रथा देश के आजाद होने तक अघोषित रूप से चलती रही।

    लड़के-लड़कियों के क्रय-विक्रय पर रोक

    राजपूत रियासतों सहित देश के विभिन्न हिस्सों में बच्चों के क्रय-विक्रय की कुप्रथा प्रचलित थी। राजपूताने में बंजारा जाति अनाज तथा नमक के साथ-साथ बच्चों को खरीदने एवं बेचने का काम करती थी। राजपूताने में बच्चों को खरीदने वाले लोगों की संख्या काफी थी। कुछ लोग इन बच्चों को दास-दासी के रूप में अपनी कन्या के दहेज में दिया करते थे। कुछ जोगी-जोगड़े अपने चेलों की संख्या बढ़ाने के लिए बच्चे खरीदते थे। कुछ लोग वेश्यावृत्ति करवाने के लिए लड़कियों को खरीदते थे।

    कुछ सम्पन्न सामंत इन्हें अपनी रखैल के रूप में रखते थे। एक बार मेवाड़ राज्य के भैरजी नामक आदमी ने ब्रिटिश प्रशासित क्षेत्र से 54 रुपये में 11 वर्ष की लड़की खरीदी। जब अंग्रेजों को उसका पता लगा तो उन्होंने महाराणा को लिखा कि वह भैरजी से लड़की छुड़वा कर वापिस उसके घर वालों को सौंपे। इस पर महाराणा ने जवाब दिया कि भैरजी ने कोई गलत काम नहीं किया है। राज्य में यह प्रथा प्रचलित है।

    ई.1838 में कोटा के रामचंद्र ने अपना पुत्र 15 रुपये में बेचा। बच्चों के बेचने से जो रकम प्राप्त होती थी उसका 40 प्रतिशत हिस्सा राज्य कोष में कर के रूप में जमा करवाया जाता था। रामचंद्र ने 6 रुपये राजकोष में जमा करवाए। अंग्रेजों को इस घृणित कार्य का पता चल गया। उन्होंने इस प्रथा को समाप्त करने का निर्णय लिया। राजपूताना की अधिकांश रियासतों ने ई.1847 में लड़के-लड़कियों के क्रय-विक्रय को असंवैधानिक घोषित किया।

    जयपुर संरक्षण परिषद ने 5 फरवरी 1847 को जयपुर राज्य में नागाओं, दादूपंथियों, सादों इत्यादि द्वारा चेला बनाने के लिये की जाने वाली बच्चों की खरीद को असंवैधानिक घोषित किया। कोटा राज्य में ई.1862 तक बच्चों को खरीदना-बेचना जारी रहा। धीरे-धीरे इस प्रथा पर पूर्णतः रोक लग गई।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • राजस्थान के ऐतिहासिक दुर्ग

     02.06.2020
    राजस्थान के ऐतिहासिक दुर्ग

    राजस्थान के ऐतिहासिक दुर्ग

    लेखक - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    प्रकाशक - राजस्थानी ग्रंथागार जोधपुर


    प्रथम संस्करण-  जुलाई 2017

    भूमिका

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    ‘दुः’ का तात्पर्य दुष्कर (कठिन) से है तथा ‘ग’ का तात्पर्य गमन करने से है। अर्थात् दुर्ग का तात्पर्य उस रचना से है जिस तक गमन करना कठिन होता है। दुर्ग से ही दुर्गम बना है। अतः सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि ‘दुर्ग’ स्थापत्य की वह रचना है जो शत्रु से सुरक्षा तथा युद्ध के लिये विशेष रूप से तैयार की गई हो। सामान्य शब्दों में कहें तो जिस भवन अथवा भवन समूह के चारों ओर प्राकार (प्राचीर अथवा परकोटा) हो, जिसमें सैनिक सन्नद्ध हों, जिसकी प्राचीर पर युद्ध उपकरण लगे हों, जिसमें शत्रु आसानी से प्रवेश न कर सके, जिसका मार्ग दुर्गम हो, शत्रु जिसमें प्रवेश करके भी राजा तक न पहुंच पाये, आदि गुणों से युक्त भवन को दुर्ग कहा जा सकता है। यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक दुर्ग में ये सभी गुण हों। सामान्यतः वह भवन जिसके चारों ओर सुदृढ़ परकोटा हो, दुर्ग कहा जा सकता है। मानव जाति ने दुर्ग अथवा दुर्ग की तरह का परिघा (प्राकार अथवा परकोटा) तथा परिखा (खाई) से युक्त आवासीय बस्तियों की रचना करने की कला मध्य-पाषाण काल में ही सीख ली थी ताकि वह वन्य पशुओं तथा शत्रुओं से अपनी रक्षा कर सके। जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता गया, प्राकार निर्माण मानव सभ्यता की आवश्यकता बन गया। जब राज्य नामक व्यवस्था आरम्भ हुई तो राजा के लिये दुर्ग का निर्माण करना आवश्यक हो गया।

    शुक्र नीति में राज्य के सात अंग- राजा, मंत्री, सुहृत, कोष, राष्ट्र, दुर्ग तथा सेना बताये हैं। अर्थात् इन सात चीजों के होने पर ही राज्य स्थापित हो सकता था। शुक्र नीति में दुर्ग को राज्य का हाथ और पैर कहा गया-

    दृग मांत्यं सुहच्छोत्रं मुखं कोशो बलं मनः

    हस्तौ पादौ दुर्गे राष्ट्रे राज्यांगानि स्मृतानि हि।।


    मनुस्मृति में कहा गया है कि दुर्ग में स्थित एक धनुर्धारी, दुर्ग से बाहर खड़े सौ योद्धाओं का सामना कर सकता है तथा दुर्ग में स्थित सौ धनुर्धारी, दस हजार सैनिकों से युद्ध कर सकते हैं-

    एकः शतं योधयति प्राकारस्थो धनुर्धरः।

    शतं दशसहस्राणि तस्माद्दुर्ग विधीयते।।


    आगे चलकर जब जनपदों, महाजनपदों एवं चक्रवर्ती साम्राज्यों की स्थापना हुई तो एक-एक सम्राट के अधीन कई-कई दुर्ग होने लगे। सम्राट अपने साम्राज्य की सुरक्षा के लिये दुर्गों की विशाल श्ृंखला खड़ी करने लगे। ये दुर्ग-श्ृंखलाएं बड़े-बड़े साम्राज्यों का आधार बन गईं। यही कारण है कि राजा, महाराजा, सामंत, ठिकाणेदार तथा सेनापतियों ने अपनी तथा अपने राज्य अथवा क्षेत्र की सुरक्षा के लिये विभिन्न प्रकार के दुर्गों का निर्माण करवाया। ऋग्वेद में दुर्ग अथवा पुर के कई उदाहरण मिलते हैं। उस काल में दुर्ग चौड़े तथा विशाल होते थे और उनके अंदर विस्तृत क्षेत्र होता था। इसकी तुलना मध्यकालीन नगर परकोटे से की जा सकती है।

    समय के साथ, दुर्ग के स्थापत्य एवं शिल्प में विकास होता गया और दुर्गों की रचना जटिल होती चली गई। दुर्ग का प्राकार दोहरा और कहीं-कहीं तो तिहारा भी हो गया। भरतपुर के दुर्ग में दुर्ग-प्राचीर के बाहर मिट्टी की प्राचीर बनवाई गई थी ताकि तोप के गोले मिट्टी की दीवार में धंस जायें और दुर्ग का वास्तविक प्राकार सुरक्षित रह सके। दुर्ग के चारों ओर खाई खोदकर उसमें पानी भरने की व्यवस्था की गई ताकि शत्रु आसानी से दुर्ग की प्राचीर तक नहीं पहुंच सके।

    संस्कृत साहित्य में गढ़ की रचना के संदर्भ में कपिशीश नामक एक संरचना का उल्लेख मिलता है। इसे राजस्थान में कवसीस कहा जाता था। बाद में इन्हें जीवरखा कहा जाना लगा। जीवरखा, टेढ़-मेढ़े ढलान युक्त मार्गों पर बनाया गया एक छोटा गढ़ होता था जिसमें सैनिक रखे जाते थे। इसे अंगरखा भी कहते थे। दुर्ग के ऊपर चार-पांच अश्वों के एक साथ चल सकने योग्य चौड़ी प्राचीर बनाई जाती थी इन्हीं पर घुमटियों के रूप में जीवरखे अथवा अंगरखे बनाये जाते थे। यहाँ से दुर्ग रक्षक सैनिक आक्रांता सैनिकों पर तीर, गर्म तेल, पत्थर आदि फैंकते थे। जब तोपों का प्रचलन हो गया तो प्राचीर के ऊपरी हिस्से में मोखे बनाये जाने लगे जिनमें तोपों के मुंह खुलते थे। दुर्ग की प्राचीर को मजबूत बनाने के लिये उसके बीच-बीच में गोलाकार बुर्ज बनाई जाने लगी जो भीतर से पोली होती थी। यह एक प्रकार से कपिशीश का ही परिष्कृत रूप थी। इसके भीतर सैनिक एवं युद्ध सामग्री संगृहीत की जाती थी।

    दुर्ग में स्थित राजा अथवा सम्राट के आवास तक पहुंचने के लिये एक से अधिक संख्या में दरवाजों का निर्माण होता था जिन्हें पोल कहते थे। इन पोलों पर सैनिकों का कड़ा पहरा रहता था। राजस्थान के अधिकांश बड़े दुर्गों में कई-कई पोल हैं। इनमें पूर्व की तरफ का दरवाजा सामान्यतः सूरजपोल, पश्चिम की ओर का चांद पोल तथा उत्तर की ओर का धु्रव पोल कहलाता था। दुर्ग की प्राचीरों पर पत्थर फैंकने के यंत्र लगाये जाते थे। यह चड़स जैसा यंत्र होता था जिसके माध्यम से पत्थर के गोले दूर तक फैंके जा सकते थे। इन यंत्रों का आविष्कार मनुष्य द्वारा उत्तर वैदिक काल में कर लिया गया था। इन्हें, ढेंकुली, नालि, भैंरोयंत्र तथा मरकटी यंत्र आदि नामों से पुकारा जाता था। इन यंत्रों का उपयोग सोलहवीं शताब्दी ईस्वी अर्थात् तब तक होता रहा जब तक कि भारतीय शासकों को तोपें और बंदूकें प्राप्त नहीं हो गईं। रणथंभौर दुर्ग में शत्रु पर दुर्ग की प्राचीर से जल प्रवाहित करने की व्यवस्था थी। ऐसी व्यवस्था अन्य दुर्गों में देखने को नहीं मिली है।

    हिन्दू किलों को तोड़ने के लिये मुगलों ने तीन प्रकार की रचनाएं काम में लीं- पाशीब, साबात तथा बारूद। किले की प्राचीर की ऊंचाई तक मिट्टी तथा पत्थरों की सहायता से चबूतरा बनाया जाता था जिसे पाशीब कहते थे। पाशीब का निर्माण सरल नहीं था क्योंकि पाशीब बनाने वाले शिल्पियों एवं सैनिकों पर दुर्ग की प्राचीर से पत्थर के गोले बरसाये जाते थे। उन्हें सुरक्षा देने के लिये साबात बनाये जाते थे। साबात गाय, बैल, भैंस या भैंसे आदि पशुओं के मोटे चमड़े की छावन को कहते थे। किले से बरसने वाले पत्थरों की मार से बचने के लिये मोटे चमड़े की लम्बी छत बनाई जाती थी जिसके नीचे रहकर सैनिक दुर्ग की दीवार तक पहुंच जाते थे तथा दुर्ग की नींव एवं दीवारों में बारूद भरकर उसमें विस्फोट करते थे। अकबर ने चित्तौड़ के किले को तोड़ने के लिये ये तीनों तरीके काम में लिये थे।

    दुर्ग के भीतर सम्पूर्ण नगर बसाने, खेती करने एवं पशु पालन करने की भी परम्परा थी ताकि यदि दुर्ग को शत्रु द्वारा घेर लिया जाये तो लम्बे समय तक दुर्ग के भीतर खाद्य सामग्री एवं अन्य जीवनोपयोगी सामग्री की उपलब्धता बनी रह सके। जालोर दुर्ग, दणथंभौर दुर्ग, चित्तौड़ दुर्ग आदि पर मुसलमान शासकों ने कई-कई वर्ष लम्बे घेरे डाले किंतु दुर्ग के भीतर की स्वावलम्बी व्यवस्था के कारण वे दुर्ग पर तभी विजय प्राप्त कर सके जब या तो दुर्ग के भीतर रसद सामग्री बिल्कुल ही समाप्त हो गई या फिर किसी अपने ने दुर्ग के भेद, आक्रमणकारी को दे दिये। जालोर, सिवाना, रणथंभौर आदि दुर्गों का पतन ऐसे ही धोखों से हुआ था।

    राजस्थान के दुर्गों को एक भवन या भवनों का समूह न मानकर एक परम्परा माना जाना चाहिये। इसे इस तरह समझा जा सकता है कि किसी दुर्ग की स्थापना किसी समय में, किसी वंश के किसी राजा ने की। समय के साथ वह राजा और उसका वंश दोनों इतिहास के नेपथ्य में चले गये किंतु दुर्ग वहीं पर बना रहा। उसका हस्तांतरण, जीर्णोद्धार, पुननिर्निर्माण एवं विस्तार भी हुआ किंतु उसका मूल निर्माता, दुर्ग की जो संरचना करके चला गया, उसमें आमूल-चूल परिवर्तन नहीं किया जा सका। इस पुस्तक में दुर्गों का वर्गीकरण उसके मूल निर्माताओं के काल अथवा वंश के आधार पर किया गया है। उदाहरण के लिये महाभारतकालीन दुर्ग, यादवों के दुर्ग, गुहिलों के दुर्ग इत्यादि।

    दुर्ग बनाने में निष्णात कुछ शिल्पियों ने दुर्ग रचना, शिल्प एवं स्थापत्य पर ग्रंथों की रचना भी की। इनमें महाराणा कुंभा के आश्रित शिल्पी मंडन का नाम प्रमुख है। राजस्थान के दुर्ग निर्माताओं में महाराणा कुंभा का नाम अत्यंत आदर से लिया जाता है। माना जाता है कि कुंभा ने 32 दुर्गों का निर्माण करवाया। उसके समय मेवाड़ राज्य के अधीन दुर्गों की संख्या 84 तक जा पहुंची थी।

    यद्यपि राजस्थान के समस्त राजपूत शासकों के लिये, शत्रु से अपनी सुरक्षा के लिये दुर्ग का होना अनिवार्य था किंतु इनमें भी हाड़ा चौहान गढ़ में अपनी मजबूती के लिये प्रसिद्ध हुए। इस सम्बन्ध में एक दोहा देखा जा सकता है-

    बलहठ बंका देवड़ा, करतब बंका गौड़।

    हाड़ा बांका गाढ़ में, रण बंका राठौड़।।


    प्रस्तुत पुस्तक में राजस्थान के छोटे-बड़े सभी प्रकार के दुर्गों को लेने का प्रयास किया गया है किंतु सभी दुर्गों को समाहित किया जाना सम्भव नहीं हो सका। दुर्ग वर्णन में, महत्वपूर्ण दुर्गों के निर्माण काल, दुर्ग के शासक, इतिहास, दुर्ग में घटित विशिष्ट घटनाएं तथा प्रमुख स्थापत्य विशिष्टताओं का समावेश किया गया है। कुछ भूले-बिसरे दुर्ग जो काल के गाल में समा गये, उन्हें भी इस पुस्तक में स्थान देने का प्रयास किया गया है। आशा है यह पुस्तक पाठकों के लिये उपयोगी सिद्ध होगी।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • अध्याय - 24 राजकीय संग्रहालय झालावाड़

     02.06.2020
    अध्याय - 24 राजकीय संग्रहालय झालावाड़

    अध्याय - 24 राजकीय संग्रहालय झालावाड़

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    हाड़ौती क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने के लिए ई.1915 में झालावाड़ राज्य में हाड़ौती क्षेत्र का पहला संग्रहालय स्थापित किया गया। उस समय इसका नाम आर्कियोलॉजिकल म्यूजियम रखा गया। झालावाड़ के तत्कालीन महाराजा सर भवानीसिंह (ई.1874-1929) की इस संग्रहालय की स्थापना एवं वृद्धि में गहन रुचि रही। उनके संरक्षण में संग्रहालय में हाड़ौती क्षेत्र के विभिन्न स्थानों से पुरासामग्री, शिलालेख, प्रतिमाएँ, सिक्के, हस्तलिखित ग्रंथ, अस्त्र-शस्त्र, दुर्लभ चित्र तथा हस्तशिल्प का संकलन कर संग्रहालय की श्रीवृद्धि की गई।

    वर्तमान में यह संग्रहालय राजस्थान सरकार के पुरातत्त्व एवं संग्रहालय विभाग के अधीन कार्य कर रहा है। वर्ष 2011 में इस संग्रहालय को गढ़-पैलेस में स्थानांतरित कर दिया गया, जहाँ यह आज भी काम कर रहा है।

    हाड़ौती क्षेत्र में कोटा के आलनिया, गेपरनाथ, दरा, जवाहर सागर बांध, बारां के कन्यादह (कृष्ण विलास), कपिलधारा, बूंदी के गरड़दा, रामेश्वर, भीमलत, देवझर, नलदेह, केवड़िया, धारवा, पलका, सुई का नाका एवं झालावाड़ जिले के कालीसिंध एवं आहू के संगम पर गागरोन दुर्ग, आहू नदी के निकट भीलवाड़ी, आमझीरी नाला आदि क्षेत्रों से प्रस्तर युगीन मानव सभ्यता के अवशेष मिले हैं। इस सामग्री में से बहुत सी सामग्री राजकीय संग्रहालय कोटा में रखी गई है तथा शेष प्रतिमाएँ, पुरा सामग्री एवं कलाकृतियां झालावाड़ संग्रहालय में छः दीर्घाओं में प्रदर्शित की गई हैं।

    प्रतिमा दीर्घा

    झालावाड़ संग्रहालय में प्रमुख रूप से हाड़ौती क्षेत्र के ध्वस्त मंदिरों से प्रतिमाएँ लाकर संगृहीत की गई हैं। प्रत्येक कालखण्ड के मूर्तिकारों ने अपने काल को अलग दिखाने के लिए अपनी प्रतिमाओं में कुछ विशिष्ट चिह्न बनाए हैं, जिनके आधार पर प्रतिमाओं के निर्माण काल का अनुमान लगाया जा सकता है। इन प्रतिमाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि चौथी शताब्दी ईस्वी से लेकर बारहवीं शताब्दी ईस्वी तक इस क्षेत्र में मूर्तिकला का निरंतर विकास होता रहा।

    इन प्रतिमाओं में गुप्तकालीन प्रतिमाओं को देवी-देवताओं के शरीर के गठीलेपन के आधार पर पहचाना जाना संभव है। गुप्त काल के बाद की प्रतिमाओं में यह लक्षण शनैःशनैः कम होता चला गया है तथा उनके आभूषणों एवं वस्त्रों का अंकन बढ़ता चला गया है। जहाँ से ये प्रतिमाएँ लाई गई हैं, उन मंदिरों के अवशेष आज भी जंगलों में बिखरे पड़े हैं।

    झलावाड़ संग्रहालय की प्रतिमाएँ भले ही गुप्तकाल के लगभग पांच सौ साल बाद की हैं किंतु इनका वैभव किसी भी प्रकार कम नहीं है। शिल्पकारों ने नृत्यांगनाओं के अंगों की मांसलता, मुखमण्डल की कमनीयता एवं ऐन्द्रिक तृप्ति का भाव दर्शाने में किंचित भी कंजूसी नहीं बरती है। उन्नत उरोज, विशाल आंखें, लम्बी बाहें, पुष्ट जंघाएं एवं रमणभाव से खड़े होने की मुद्रा, दर्शक को बरबस अपनी ओर आकर्षित करती हैं। दलहनपुर के देवालयों में निर्मित सभामण्डप एवं रंगमण्डप के गोलाकार स्तम्भों पर मूर्तिकला का अद्भुत अंकन किया गया है।

    दलहनपुर एवं सूर्यमंदिर झालरापाटन इस क्षेत्र की प्राचीन स्थापत्यकला शैली का प्रतिनिधित्व करते हैं। संग्रहालय में रखी गई अधिकांश प्रतिमाएँ अपेक्षाकृत अच्छी अवस्था में हैं। संग्रहालय के मुख्य हॉल एवं बरामदे में काकूनी, अटरू, विलास, रामगढ़, बारां आदि स्थालों से लाई गई प्रतिमाएँ प्रमुखता से प्रदर्शित हैं जो 6ठी से 18वीं सदी की हैं। इनमें अर्द्धनारीश्वर, नरवाराह, चामुण्डा, चक्रपुरुष, लकुलीश, सूर्य, बटुक भैरव, सुर-सुंदरी आदि महत्वपूर्ण हैं। हाड़ौती क्षेत्र से वैष्णव, शैव, शाक्त, सौर, बौद्ध और जैन आदि विभिन्न सम्प्रदायों की प्रतिमाएँ उपलब्ध हुई हैं जिन्हें इस संग्रहालय में एक साथ देखा जा सकता है।

    वैष्णव प्रतिमाओं में चन्द्रभागा से प्राप्त 9वीं शताब्दी के वैकुष्ठ विष्णु (त्रिमुखी विष्णु), 10वीं शताब्दी की नरवराह प्रतिमा, बड़ी कलमण्डी (तहसील-पाटन) से प्राप्त 10वीं शताब्दी की महावराह प्रतिमा, शंखोधरा पाटन से प्राप्त 10वीं शताब्दी की वामनावतार प्रतिमा, देवगढ़ (डग) से प्राप्त 10वीं शताब्दी की शेषशायी विष्णु प्रतिमा, बिन्जोरी (तहसील-पाटन) से प्राप्त बालमुकुन्द आदि प्रस्तर प्रतिमाएँ प्रदर्शित की गई हैं।

    सूर्यमंदिर झलारापाटन से प्राप्त एक नृत्यांगना की प्रतिमा भी 10वीं शताब्दी ईस्वी की है, जिसे इस संग्रहालय में स्थान दिया गया है। कृष्ण बाललीला फलक रंगपाटन झालावाड़ से प्राप्त हुआ था। यह भी 10वीं शर्ती ईस्वी का है। इसमें नदी के दोनों ओर भारतीय जनजीवन की झांकी का चित्रण है। नदी में मछली एवं अन्य जलचर दिखाए गए हैं।

    फलक के ऊपरी भाग में एक परिवार में स्त्री-पुरुष एवं तीन बच्चे दिखाए गए हैं। एक बच्चा स्त्री की गोद में बैठा है। फलक के बाएं हिस्से में ऊपर की ओर श्रीकृष्ण, शकटासुर का वध कर रहे हैं। पूतनावध एवं दधिमंथन के दृष्य भी अंकित हैं। महिलाओं के सिर पर आकर्षक जूड़ा बंधा हुआ है। नीचे की ओर माता यशोदा एवं बालकृष्ण का अंकन है। इनके नीचे शंख, कच्छप एवं निधियां अंकित हैं।

    10वीं शताब्दी ईस्वी की चतुर्मुखी ब्रह्मा की प्रतिमा लाल पत्थर से निर्मित है। इस प्रतिमा के चारों हाथ खण्डित हैं। मुख पर दाढ़ी का अंकन है, उदर भाग उभरा हुआ तथा कटि मेखला के ऊपर लटका हुआ है। ब्रह्मा के कानों में कुण्डल, गले में माला तथा भुजाओं में बाजूबंद हैं। दोनों ओर परिचारक एवं परिचारिकाएं अंकित हैं। एक प्रस्तर फलक में केशी वध का अंकन किया गया है। भवानीमण्डी के निकट खोड़ से प्राप्त यह प्रतिमा 10वीं शताब्दी ईस्वी की है। इस प्रतिमा में भगवान श्रीकृष्ण केशी नामक राक्षस का वध करते हुए दिखाए गए हैं।

    चतुर्भुज कृष्ण का दक्षिण ऊर्ध्वहस्त प्रहार करने की मुद्रा में है एवं दक्षिण निम्नहस्त में खड्ग का अंकन है। वाम ऊर्ध्वहस्त में चक्र का अंकन किया गया है जबकि वाम निम्नहस्त से भगवान, केशी के बल का प्रतिरोध कर रहे हैं। एक प्रस्तर फलक में संगीत एवं नृत्य की सभा का अंकन किया गया है। मध्यकालीन मंदिरों में रंगमण्डपों का निर्माण आवश्यक रूप से होता था जिनमें इस प्रकार की संगीत एवं नृत्यसभाओं का अंकन किया जाता था। झालावाड़ संग्रहालय में प्रदर्शित फलक 10वीं शताब्दी ईस्वी का है तथा इसे बारां जिले के काकूनी क्षेत्र से प्राप्त किया गया है। इसमें एक पुरुष वादक के हाथ में ढोलक, दूसरे के हाथ में मंझीरा बजाते हुए दर्शाया गया है। बीच में एक नर्तकी कत्थक नृत्य की मुद्रा में है। वादकों एवं नृतकी के पैर नृत्य की मुद्रा में हैं। उनकी शारीरिक रचना सुडौल है तथा सभी कलाकार युवावस्था में हैं।

    कमलासन पर विराजमान सूर्य की 10-11वीं शताब्दी ईस्वी की एक प्रतिमा रंगपाटन से प्राप्त हुई है। सूर्य के दोनों हाथों में कमल दल हैं। सूर्य के पैरों में बूट हैं तथा शरीर पर कवच धारण कर रखा है जिनसे यह सिद्ध होता है कि इस प्रतिमा पर पारसियों की मूर्ति कला का प्रभाव है। सूर्यदेव ने अपने गले में वनमाला धारण कर रखी है। कुबेर की प्रतिमा 10-11वीं शती ईस्वी की है। यह काकूनी से प्राप्त हुई थी जो अब बारां जिले में है तथा झालावाड़ जिले की सीमा पर बहने वाली नदी के तट पर स्थित है। कुबेर ललितासन मुद्रा में हैं तथा उसके दाएं हाथ में धन की थैली है। दाईं ओर चंवरधारिणी का अंजलिबद्ध मुद्रा में सुंदर अंकन है। शैव प्रतिमाओं में चन्द्रभागा (पाटन) से प्राप्त 8वीं शताब्दी की अर्द्धनारीश्वर प्रतिमा, 9वीं शताब्दी की नटराज प्रतिमा, 10वीं शतब्दी का त्रिमुखी शिव, उमामहेश्वर प्रतिमा, रंगपाटन से प्राप्त 11वीं शताब्दी की अन्धकासुरवध प्रतिमा, डग से प्राप्त लकुलीश प्रतिमा, शंखोधरा से प्राप्त 10-11वीं शताब्दी की भैरव एवं गणेश प्रतिमाएँ आदि प्रदर्शित हैं।

    चंद्रावती से प्राप्त 8वीं शताब्दी की अर्द्धनारीश्वर प्रतिमा चतुर्भुजी है जिसमें दायीं तरफ शिव विराजमान हैं। उनका दायां मुख्य हाथ नंदी के ऊपर रखा हुआ है, इस हाथ में कड़ा धारण किया हुआ है तथा ऊपरी दायें हाथ में त्रिशूल धारण किया हुआ है। त्रिशूल के पीछे सर्प का सुंदर अंकन है। बायीं ओर के हिस्से में पार्वती उत्कीर्ण हैं। उनका बायां ऊपरी हाथ खण्डित है तथा नीचे के हाथ में चूड़ियां धारण की हुई हैं। पुरुष भाग में ऊर्ध्व रेतस एवं स्त्री भाग में योनी का अंकन किया गया है।

    चंद्रभागा एवं कालीसिंध के संगम पर गोविंदपुरा नामक स्थान से 8वीं शती ईस्वी की लकुलीश की एक प्रतिमा मिली है। यह प्रतिमा मुकुटाकृति (शुकनास) गवाक्ष में पद्मासन में विराजमान है। प्रतिमा के दो हाथ हैं जिनमें से दायां हाथ अभय मुद्रा में है तथा बायें हाथ में लकुटी है। लकुलीश को ऊर्ध्व-रेत्स अवस्था में उत्कीर्ण किया गया है। लकुलीश के दोनों ओर लंगोटधारी परिचारकों का अंकन है। दायें हाथ की तरफ वाले साधु के सिर पर बालों का अंकन कोटा संग्रहालय के झल्लरीवादकों के सिर के बालों जैसा है। लकुलीश की यह प्रतिमा ठीक वैसी ही है जैसी कि इस श्लोक में वर्णित है-

    लकुलीश ऊर्ध्वमेढ पद्मासन सुंस्थितम्।

    दक्षिणे मातुलिंग च वामे च दण्डप्रकीर्तितम्।।


    नृत्यरत अष्टभुजी शिव का भी एक फलक दर्शनीय है। यह भी 10वीं शताब्दी ईस्वी का है तथा शिव के हाथ एवं पैर नृत्य की मुद्रा में हैं। दोनों ऊर्ध्व भुजाओं में सर्प लिपटा हुआ है। दाएं मध्य हस्त में बाण, दाएं अधोहस्त में त्रिशूल है, बाएं मध्य हस्त में धनुष, बाएं अधोहस्त में खट्वांग धारण कर रखा है। प्रतिमा के दोनों ओर आयताकार पुष्प एवं व्यालों का अंकन है। 10वीं शती की कल्याण सुंदर प्रतिमा भी लाल बलुआ प्रस्तर से निर्मित है।

    इस प्रतिमा में भगवान शिव एवं पार्वती के विवाह का दृश्य अंकित है। भगवान शिव, अपने वाम भाग में खड़ी पार्वती का वरण कर रहे हैं। चतुर्बाहु शिव विभिन्न आभूषणों से सुसज्जित हैं। पार्वती के नेत्र धरती की तरफ झुके हुए हैं। उनके मुख पर नववधू का संकोच दिखाई दे रहा है। शिव दाएं ऊर्ध्व हस्त में त्रिशूल धारण किए हुए हैं तथा दूसरे हाथ से पार्वती की हथेली पकड़े हुए हैं। उनके बाएं ऊर्ध्व हस्त में नाग है तथा बाईं तरफ का दूसरा हाथ पार्वती के कंधे पर है। गोलाकार स्तम्भों के बीच शिव एवं पार्वती को प्रभामण्डल से सम्पन्न दर्शाया गया है। आसपास परिचारिकाएं एवं शार्दूल का अंकन है।

    10वीं शताब्दी ईस्वी की अंधकासुर वध की प्रतिमा रंगपाटन झालावाड़ से प्राप्त की गई थी। यह भी लाल बलुआ पत्थर की है। इस प्रतिमा में छः भुजाओं वाले शिव द्वारा अंधकासुर के वध करने का दृश्य अंकित किया गया है। दोनों तरफ के ऊर्ध्वहस्तों में भगवान ने सर्प धारण कर रखे हैं। दाएं मध्यहस्त में डमरू तथा दाएं अधोहस्त में खड्ग है। बाएं ऊर्ध्वहस्त में ढाल है। शिव ने अंधकासुर को त्रिशूल से बेधकर ऊपर उठा रखा है। शिव का बायां पैर एक अन्य राक्षस की पीठ पर रखा है।

    एक योगिनी, अंधक का रक्तपान कर रही है। प्रतिमा में दोनों ओर त्रिभंग मुद्रा में सेवक-सेविकाओं एवं शार्दूल का अंकन किया गया है। शाक्त प्रतिमाओं में 8वीं शताब्दी की चन्द्रभागा (पाटन) से प्राप्त चामुण्डा प्रतिमा, पाटन से प्राप्त 10वीं शताब्दी की वाराही प्रतिमा, झूमकी (पाटन) से प्राप्त 11वीं शताब्दी की महिषासरमर्दिनी आदि महत्त्वपूर्ण प्रतिमाएँ प्रदर्शित हैं।

    स्थानक सुंदरी की प्रतिमा 9वीं शताब्दी ईस्वी की है। इसे झालरापाटन में बहने वाली चन्द्रभागा नदी के किनारे से प्राप्त किया गया था। संयुक्त देव प्रतिमाओं में रंगपाटन से प्राप्त 10वीं शताब्दी की मार्तण्ड-भैरव, चन्द्रभागा से प्राप्त पूर्व मध्यकालीन सूर्य-नारायण प्रतिमा, चन्द्रभागा से ही प्राप्त 10वीं शताब्दी की हरिहर प्रतिमा, पितामहमार्तण्ड प्रतिमा, काकूनी, रंगपाटन आदि स्थलों से प्राप्त संयुक्त देव प्रतिमाएँ प्रदर्शित हैं। हरिहर की प्रतिमा 10वीं शताब्दी ईस्वी की है तथा बारां जिले के काकूनी से प्राप्त की गई है।

    इस चतुर्भुजी प्रतिमा के आधे दक्षिण भाग में शिव एवं वाम भाग में विष्णु का अंकन है। दक्षिण ऊर्ध्वहस्त में त्रिशूल एवं अधोहस्त में पुष्प है। वाम ऊर्ध्वहस्त में चक्र एवं अधोहस्त में शंख है। देव प्रतिमा विभिन्न आभूषणों से अलंकृत है। शिव की तरफ वाले भाग में नीचे की तरफ नंदी का अंकन है। दोनों ओर तीन-तीन परिचारक खड़े हुए हैं।

    जैन प्रतिमाओं में तीर्थंकर अजितनाथ की 9वीं शती इस्वी की प्रतिमा बलुआ लाल पत्थर की है। अजितनाथ को कायोत्सर्ग मुद्रा में प्रदर्शित किया गया है। सुसज्जित परिकर के ऊपरी भाग में घटाभिषेक का दृश्य अंकित है। दोनों ओर रथिका में एक-एक तीर्थंकर को पद्मासन में बैठे हुए दर्शाया गया है। पाद पीठ पर अजितनाथ के चिह्न के रूप में हाथी का अंकन है।

    झालरापाटन से प्राप्त 10वीं शताब्दी की सर्वतोभद्र प्रतिमा, रतनपुरा से प्राप्त 10वीं शताब्दी की अजितनाथ प्रतिमा, गागरोन से प्राप्त 10वीं शताब्दी की वृषभनाथ प्रतिमा, काकूनी से प्राप्त चक्रेश्वर प्रतिमा, पंचपहाड़ से प्राप्त 16वीं शताब्दी की वासुपूज्य प्रतिमा, पार्श्व नाथ आदि प्रतिमाएँ प्रदर्शित हैं। कोटा-झालावाड़ क्षेत्र में बौद्धों की हीनयान शाखा का प्रभाव रहा है। यहाँ बौद्धों के कुछ आश्रम एवं उपाश्रय स्थित थे। इसलिए इस क्षेत्र से कतिपय बौद्ध मूर्तियां भी प्राप्त हुई हैं। 10वीं शती ईस्वी के एक प्रस्तर फलक में शिल्पकार द्वारा गुरुकुल आश्रम में दो बौद्ध गुरुओं एवं दो शिष्यों का अंकन किया गया है। दोनों साधुओं के बीच में खड़े बालक के सिर पर बालों का अंकन राजकुमार सिद्धार्थ के सिर के बालों जैसा है। राजकुमार सिद्धार्थ को गुरुओं के उपदेशों को ध्यानमग्न होकर सुनते हुए प्रदर्शितत किया गया है। इन प्रतिमाओं पर गांधार, यूनानी एवं ईरानी मूर्तिकला का मिश्रण का प्रभाव परिलक्षित होता है।

    शिलालेख दीर्घा

    झालावाड़ संग्रहालय में पहली शताब्दी ईस्वी पूर्व से लेकर 19वीं शताब्दी इस्वी तक की अवधि के कई प्राचीन शिलालेख प्रदर्शित किए गए हैं। कालाजी (जिला बारां) से प्राप्त कुई का अभिलेख प्रथम शताब्दी ईस्वी पूर्व का है। बारां से प्राप्त तीसरी शताब्दी ईस्वी का लेख ब्राह्मी लिपि में है। गंगधार नरेश नरवर्मन के पुत्र विश्ववर्मन का ई.423 का शिलालेख उल्लेखनीय है, इसमें विष्णु के आयुध तथा भेदभाव का उल्लेख किया गया है। इस शिलालेख से ज्ञात होता है कि परम वैष्णवसचिव मयूराक्ष ने तांत्रिक दर्शन के अन्तर्गत मातृकाओं के पवित्र स्थान का भी निर्माण करवाया था। वैष्णव मतावलम्बी द्वारा तांत्रिक शैली के देवस्थान का निर्माण किया जाना उस युग के इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटना है।

    चन्द्रावती (झालरापाटन) के चंद्रमौलेश्वर मंदिर का ई.689 का शिलालेख तथा यहीं से प्राप्त वि.स. 746 का राजा दुर्गमण का शिलालेख भी प्रदर्शित किए गए हैं। कंसुआ (जिला कोटा) के शिवमंदिर से प्राप्त 8वीं शताब्दी का शिलालेख, शेरगढ़ (जिला बारां) का 9वीं शताब्दी का बौद्ध परम्परा का शिलालेख भी उल्लेखनीय हैं। मगननाथ की डूंगरी (झालरापाटन) से प्राप्त उदयादित्य का ई.1086 का शिलालेख भी प्रदर्शित किया गया है। तुलसीराम के कुण्ड (झालरापाटन) से प्राप्त वि.स. 1193 का लेख भी महत्वपूर्ण है।

    रामगढ़, किशनगढ़, बारां से ई.1162-75 के शिलालेख, बड़वा, अंता तथा मध्यकालीन इतिहास के अनेक शिलालेख प्रदर्शित हैं। ग्राम बेड़ला (गंगधार) से प्राप्त वि.स. 1687 का झाला दयालदास का शिलालेख तथा झालरापाटन से प्राप्त वि.सं. 1853 का झाला जालिम सिंह का अभिलेख भी प्रदर्शित किए गए हैं।

    ई.1796 में कोटा राज्य के सेनापति झाला जालिमसिंह ने चंद्रावती नगर के ध्वंसावशेषों से लगभग पौन किलोमीटर उत्तर में झालरापाटन नगर की स्थापना की। इस नवीन नगर में प्राचीन चंद्रावती नगर के ध्वस्त अवशेषों की सामग्री काम में ली गई। जालिमसिंह ने झालरापाटन नगर के मध्य में एक पत्थर लगावाया जिस पर राजकीय घोषणा अंकित करवाई कि जो व्यक्ति इस नगर में आकर रहेगा उससे चुंगी नहीं ली जाएगी तथा यदि उसे राज्य की तरफ से अर्थ-दण्ड दिया गया है तो उसे क्षमा कर दिया जाएगा। इस घोषणा ने मारवाड़ तथा हाड़ौती क्षेत्र के व्यापारियों को तेजी से आकर्षित किया जिससे झालरापाटन एक समृद्ध नगर बन गया। ई.1850 में राजा पृथ्वीसिंह के कामदार ने यह पत्थर झील में फैंक दिया तथा ई.1796 की घोषणा को वापस ले लिया। ई.1876 में यह पत्थर पुनः झील से बाहर निकाला गया। अब यह पत्थर झालावाड़ संग्रहालय में रखा हुआ है। यह 9 फुट लम्बा और डेढ़ फुट चौड़ा है।

    मुद्रा दीर्घा

    प्राचीन चिह्नित (आहत) मुद्राएं, कुषाण सिक्के, सातवाहन सिक्के, गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्राएं, इण्डोससेनियन (गधैया सिक्के), कोटा-बूंदी-झालावाड़ रियासतों की मुद्राएं, इण्डोग्रीक एवं इण्डोनेशिया की रजत एवं ताम्र मुद्राएं इस संग्रहालय की अनुपम धरोहर हैं। मुद्राओं के साथ उनका संक्षिप्त विवरण भी लिखा गया है। पंचमार्क अथवा आहत मुद्राएं ई.पू.600 से ई.पू.200 तक की हैं। इनके अग्रभाग पर सूर्य, षडचक्र, तीन शिवलिंग, बच्चे के साथ खरगोश, कुत्ता, सात पत्तियों के झाड़ वाला गमला आदि बने हुए हैं।

    समुद्रगुप्त का चौथी शताब्दी ईस्वी का सिक्का ध्वज प्रकार का है जिसके अग्रभाग पर सम्राट की प्रतिमा उत्कीर्ण है। सम्राट सीधा खड़ा हुआ है तथा उसने बाएं हाथ को ऊपर उठाकर उसमें ध्वज धारण किया हुआ है। सम्राट का दायां हाथ हवन वेदिका में आहुति देते हुए दिखाया गया है। सम्राट के सामने की ओर विजय-ध्वज अंकित है जिस पर शक्ति एवं गति का प्रतीक गरुड़ विराजमान है। सिक्के के उसी भाग में ब्राह्मी लिपि में ‘समरशतवितत विजयो जित रिपुरजितो दिवं जयति’ अर्थात् सर्वत्र विजयी सम्राट जिसने सैंकड़ों युद्धों में विजय प्रात कर शत्रु को पराजित किया है, स्वर्गश्री की प्राप्ति करता है, अंकित है। सिक्के के पृष्ठभाग पर देवी लक्ष्मी की प्रतिमा उत्कीर्ण है। लक्ष्मी सिंहासन पर आरूढ़ हैं तथा उनके सिर के पीछे प्रभामण्डल का अंकन किया गया है। सिक्के के इसी भाग पर ब्राह्मी लिपि में पराक्रमः अंकित किया गया है। देवी के बाएं हाथ में कॉर्नुफोनिया एवं दाएं हाथ में पाश है।

    झालावाड़ रियासत का सिक्का चांदी से निर्मित है। इस पर दोनों ओर अरबी लिपि में लेख अंकित है। अग्रभाग पर ‘मल्लिकाह मुआज्जमा विक्टोरिया सल्तनत इंग्लिस्तान’ अंकित है। पृष्ठभाग पर ‘मानूस मैमनत सनह् 39 जुलूस जरब झालावाड़’ लिखा गया है। इस सिक्के का वजन 11.29 ग्राम है।

    लघुचित्र एवं चित्रित ग्रंथ दीर्घा

    इस संग्रहालय में 18-19वीं शती के हस्तलिखित ताड़पत्र एवं दुर्लभ ग्रंथ प्रदर्शित किए गए हैं। इनमें भागवत, औतारचरित, भाषा चरित्र, नहरदान, भारट द्वारा लिखित चित्रग्रंथ प्रमुख हैं। पुरुषोत्तम महाकाव्य, ताड़ के पत्ते पर लिखित वर्णन आदि प्रमुख हैं। शालीहोत्र चित्रित ग्रंथ अश्वचिकित्सा से सम्बन्धित है। चित्रित अरब शाहनामा तथा कुरान भी प्रदर्शित हैं। हस्तलिखित चित्रित ग्रंथों में श्लोकों का चित्रानुवाद दिया गया है। चित्रों में हाथों से रंग भरे गए हैं। अधिकांश चित्रों के रंग आज भी अच्छी अवस्था में हैं। लघुचित्र कला दीर्घा में वेद एवं देवचित्रों को प्रदर्शित किया गया है।

    चित्रवीथी में नायक-नायिका, बाहरमासा, विष्णु के दशावतार, विष्णु के चौबीस स्वरूप, कृष्ण लीला, लोकजीवन के प्रसंग भी प्रदर्शित हैं। कुछ चित्र जयपुर, बूंदी एवं किशनगढ़ शैली के हैं। एक चित्र में दो वृक्षों के मध्य छाया में चतुर्बाहु श्रीकृष्ण को शंख, चक्र, गदा एवं पद्म धारण किए हुए दिखाया गया है। भगवान के सम्मुख गौएं अपने बछड़ों के साथ खड़ी हैं। गौधन के पीछे ग्वालवृंद भी भगवान को प्रणाम करने की मुद्रा में अंकित हैं। भगवान के पीछे की ओर सेविकाएं मोरपंखी, चंवर आदि लिए खड़ी हैं। नदी में मछली, कमल, बत्तख, नाव तथा पक्षियों का अंकन किया गया है। इसे भगवान के संकर्षण स्वरूप का चित्र कहा जाता है। झालवाड़ संग्रहालय में कांच एवं कपड़े पर बने चित्र भी संकलित हैं।

    हस्त-शिल्प दीर्घा

    झालावाड़ संग्रहालय में 19वीं-20वीं शती की हस्तशिल्प सामग्री भी प्रदर्शित की गई है। संगमरमर के पत्थर पर कलात्मक कामसूत्र विषयक कलाकृतियां, हाथी, घोड़ा, देवी दुर्गा की प्रतिमा, हाथी दांत से बना पंखा, दूरबीन, चाकू, सलाइयां आदि प्रदर्शित हैं। एक कलात्मक ग्लोब में दीपक और भारत का नक्शा अंकित हैं। एक रैक में विभिन्न आकृतियों के सीप प्रदर्शित किए गए हैं। 19वीं शताब्दी में निर्मित रेशम का एक रूमाल भी संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है।

    संग्रहालय में 10वीं-12वीं शताब्दी ईस्वी की लकड़ी की एक मुड़ी हुई छड़ी रखी है जो गोल्फ अथवा हॉकी जैसा कोई खेल खेलने के काम आती रही होगी। यह 101 सेंटीमीटर लम्बी तथा 10 सेंटीमीटर मोटी है। रेशम एवं मखमल के कपड़े से 18-19वीं शताब्दी में बनी एक पगड़ी भी प्रदर्शित है। अस्त्र-शस्त्र दीर्घा अस्त्र-शस्त्र दीर्घा में मध्ययुगीन हथियारों से लेकर 19वीं शती तक के अस्त्र-शस्त्र प्रदर्शित हैं। इनमें प्रथम महायुद्ध के दौरान काम में ली गई रिवॉल्वर उल्लेखनीय है।

    इसके अतिरिक्त तलवारें, ढालें एवं तीर-कमान आदि भी विषयवार प्रदर्शित हैं। विभिन्न आकृति की छुरियां एवं विभिन्न धातुओं से बने तलवारों के दस्ते भी दर्शनीय हैं। कुछ तलवारों पर मध्यकालीन अरबी लिपि में लिखावट की गई है तथा सोने एवं चांदी की कारीगरी की गई है। कलात्मक ढालों पर तहनिशां एवं जरनिशा का काम किया गया है।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • युग निर्माता महाराजा सूरजमल- 3

     02.06.2020
    युग निर्माता महाराजा सूरजमल- 3

    महाराजा सूरजमल के जन्म की पृष्ठभूमि (1)


    जाटों का अधिवास एवं प्रवृत्तियां


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    जाट एक अत्यंत प्राचीन भारतीय समुदाय है। यह प्रायः कृषि एवं पशुपालन से जुड़ा हुआ, सम्पन्न, परिश्रमी एवं जनजातीय विशेषताओं से युक्त समुदाय है जो उत्तर भारत के उपाजाऊ मैदानों एवं मध्य भारत के उपाजाऊ पठार में बड़ी संख्या में निवास करता आया है। महाभारत में सर्वप्रथम जाटतृक अथवा जर्तिका नामक जाति का उल्लेख होता है जो पंजाब में निवास करती थी, ऐसा प्रतीत होता है कि महाभारत युद्ध के पश्चात् हुई उथल-पुथल के बाद के किसी काल में जाट जाति ने पंजाब के उपजाऊ मैदानों से बाहर निकलकर दूर-दूर तक अपना विस्तार किया। उपजाऊ प्रदेशों में मुक्त रूप से कृषि एवं पशुपालन जैसे कठिन कार्य को करने के कारण तथा प्राचीन वैदिक सभ्यता का अनुसरण करने के कारण ही जाट जाति में सम्पन्नता एवं स्वातंत्र्य प्रियता सहज रूप से दिखाई पड़ती है।

    ऐसा भी माना जाता है कि जनमेजय के नागयज्ञ के बाद बचे हुए नाग इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) से निकलकर नागपुर (महाराष्ट्र) तथा उसके नीचे तक फैल गये। यही कारण है कि दिल्ली, भरतपुर, धौलपुर, आगरा, मथुरा, मेरठ हिसार, सीकर, चूरू, झुंझुनूं, बीकानेर, नागौर, जोधपुर तथा बाड़मेर आदि जिलों में बड़ी संख्या में जाट निवास करते हैं।


    ब्रज क्षेत्र के जाटों का संघर्ष

    गंगा-यमुना का दो-आब, दिल्ली के मुस्लिम शासकों के अत्याचारों से सर्वाधिक उत्पीड़ित रहा। दिल्ली के सुल्तानों द्वारा अपनाई गई भू-राजस्व की अधिकाधिक वसूली की प्रवृत्ति ने दो-आब के किसानों पर भयानक अत्याचार किये। अनेक सुल्तानों ने मुसलमान किसानों से लगान नहीं लेने तथा हिन्दू किसानों से अत्यधिक भूराजस्व लेने की नीति अपनाई इस कारण हिन्दू किसानों में विद्रोही प्रवृत्ति का जन्म लेना स्वाभाविक ही था। दो-आब के सम्पन्न प्रदेश के निवासी होने के कारण इस क्षेत्र के किसान अत्यधिक स्वातंत्र्य-प्रिय भी थे, इस कारण इस क्षेत्र के किसानों ने दिल्ली सल्तनत की सेनाओं और राजस्व वसूलने वाले अधिकारियों का प्रतिरोध किया, परिणामतः इस क्षेत्र के किसानों पर अत्याचार भी अधिक परिमाण में हुए। बहुत से किसानों को प्रायः शाही सेनाओं के भय से, अपने खेत छोड़कर जंगलों में भाग जाना पड़ता था। शांति स्थापित होने पर ये किसान फिर से अपनी जमीनों पर लौट आते थे। बहुत से किसानों को सिपाहियों के हाथों मिली दर्दनाक एवं भयानक मृत्यु का सामना करना पड़ता था। फिर भी ब्रज क्षेत्र के जाट अपनी जमीनों पर अपना नियंत्रण बनाये रहे। इस कारण उनमें लड़ाकू प्रवृत्ति बनी रही। वे छोटे-छोटे समूहों में संगठित होकर आतताइयों का सामना करने लगे। मुस्लिम सेनाओं के विरुद्ध अपनाई गई यही लड़ाका प्रवृत्ति, जाटों के उत्थान के लिये वरदायिनी शक्ति सिद्ध हुई।

    अकबर के समय में बयाना, बाड़ी, टोडाभीम, खानुआ तथा धौलपुर महाल, आगरा सूबे में स्थित आगरा सरकार के अधीन थे जबकि गोपालगढ़, नगर, पहाड़ी तथा कामां जयपुर रियासत के अधीन थे। रूपबास के आसपास उन दिनों विशाल जंगल खड़ा था जहाँ अकबर प्रायः शिकार खेलने आया करता था। इस क्षेत्र की शासन व्यवस्था औरंगजेब के समय तक वैसी ही चलती रही।

    सत्रहवीं शताब्दी के आते-आते आगरा, मथुरा, कोयल (अलीगढ़), मेवात की पहाड़ियां तथा आमेर राज्य की सीमाओं से लेकर उत्तर में दिल्ली से 20 मील दूर मेरठ, होडल, पलवल तथा फरीदाबाद से लेकर दक्षिण में चम्बल नदी के तट के पार गोहद तक जाट जाति का खूब प्रसार हो गया। इस कारण यह विशाल क्षेत्र जटवाड़ा के नाम से प्रसिद्ध होने लगा। इस क्षेत्र पर नियंत्रण रख पाना शाहजहां के लिये भारी चुनौती का काम हो गया। शाहजहां के काल में जाटों को घोड़े की सवारी करने, बन्दूक रखने तथा दुर्ग बनाने पर प्रतिबंध था।

    मुर्शीद कुली खां का वध

    ई.1636 में शाहजहां ने ब्रजमण्डल के जाटों को कुचलने के लिये मुर्शीद कुली खां तुर्कमान को कामा, पहाड़ी, मथुरा और महाबन परगनों का फौजदार नियुक्त किया। उसने जाटों के साथ बड़ी नीचता का व्यवहार किया जिससे जाट मुर्शीद कुली खां के प्राणों के पीछे हाथ धोकर पड़ गये। हुआ यूं कि कृष्ण जन्माष्टमी को मथुरा के पास यमुना के पार गोवर्धन में हिन्दुओं का बड़ा भारी मेला लगता था। मुर्शीद कुली खां भी हिन्दुओं का छद्म वेश धारण करके सिर पर तिलक लगाकर और धोती बांधकर उस मेले में आ पहुंचा। उसके पीछे-पीछे उसके सिपाही चलने लगे। उस मेले में जितनी सुंदर स्त्रियां थीं, उन्हें छांट-छांटकर उसने अपने सिपाहियों के हवाले कर दिया। उसके सिपाही उन स्त्रियों को पकड़कर नाव में बैठा ले गये। उन स्त्रियों का क्या हुआ, किसी को पता नहीं लगा। उस समय तो मुर्शीद कुली खां से कोई कुछ नहीं कह सका किंतु कुछ दिन बाद ई.1638 में जाटवाड़ नामक स्थान पर (सम्भल के निकट) जाटों ने उसकी हत्या कर दी।

    आम्बेर नरेश जयसिंह की नियुक्ति

    इस पर शाहजहां ने जाटों को कुचलने के लिये आम्बेर नरेश जयसिंह को नियुक्त किया। जयसिंह ने सफलता पूर्वक जाटों का दमन किया और उनसे राजस्व वसूल किया। जयसिंह ने जाटों, मेवों तथा गूजरों का बड़ी संख्या में सफाया किया तथा अपने विश्वस्त राजपूत परिवार इस क्षेत्र में बसाये।

    गोकुला का नेतृत्व

    ई.1699 के आसपास जाट गोकुला के नेतृत्व में संगठित हुए। गोकुला तिलपत गांव का जमींदार था। औरंगजेब के अत्याचारों से तंग होकर वह महावन आ गया। उसने जाटों, मेवों, मीणों, अहीरों, गूजरों, नरूकों तथा पवारों को अपनी ओर मिला लिया तथा उन्हें इस बात के लिये उकसाया कि वे मुगलों को कर न दें। मुगल सेनापति अब्दुल नबी खां ने गोकुला पर आक्रमण किया। उस समय गोकुला' सहोर गांव में था। जाटों ने अब्दुल नबी खां को मार डाला तथा मुगल सेना को लूट लिया। इसके बाद गोकुला ने सादाबाद गांव को जला दिया और उस क्षेत्र में भारी लूट-पाट की। अंत में औरंगजेब स्वयं मोर्चे पर आया और उसने जाटों को घेर लिया। जाटों की स्त्रियों ने जौहर किया तथा जाट वीर मुगलों पर टूट पड़े। हजारों हिन्दू मारे गये। गोकुला को हथकड़ियों में जकड़कर औरंगजेब के समक्ष ले जाया गया। औरंगजेब ने उससे कहा कि वह इस्लाम स्वीकार कर ले। गोकुला ने इस्लाम मानने से मना कर दिया। इस पर औरंगजेब ने आगरा की कोतवाली के समक्ष गोकुला का एक-एक अंग कटवाकर फिंकवा दिया। पराजय, पीड़ा और अपमान का विष पीकर तिल-तिल मरता हुआ गोकुला अपनी स्वतंत्रता को बनाये रखने के लिये विमल कीर्ति के अमल-धवल अमृत पथ पर चला गया।

    राजाराम का नेतृत्व

    इस्लाम स्वीकार करने से इन्कार कर देने के कारण गोकुला को औरंगजेब के हाथों जिस प्रकार की दर्दनाक और अपमान जनक मृत्यु प्राप्त हुई थी, वैसी ही दर्दनाक और अपमान जनक मृत्यु औरंगजेब ने कई और लोगों को भी दी थी। इस कारण देश में चारों ओर मुगलों के विरुद्ध वातावरण बन गया। गोकुला के अंत से जाट बुरी तरह झल्ला गये। इस बार वे ब्रजराज, ब्रजराज के भाई भज्जासिंह तथा भज्जासिंह के पुत्र राजाराम के नेतृत्व में एकत्रित हुए। ब्रजराज मुगलों से युद्ध करता हुआ मारा गया। उसकी मृत्यु के कुछ समय बाद उसकी पत्नी के गर्भ से एक पुत्र ने जन्म लिया जिसका नाम बदनसिंह रखा गया। आगे चलकर बदनसिंह भी जाटों का नेता बना। ब्रजराज का छोटा भाई भज्जासिंह एक साधारण किसान था। यह परिवार सिनसिनी गांव का रहने वाला था। भज्जासिंह का पुत्र राजाराम भी अपने बाप-दादों की तरह विद्रोही प्रवृत्ति का था। कहते हैं एक बार लालबेग नामक एक व्यक्ति मऊ का थानेदार था। उसने एक अहीर की स्त्री का बलात् शील भंग किया। जब यह बात राजाराम को ज्ञात हुई तो उसने लालबेग की हत्या कर दी। उसकी इस वीरता से प्रसन्न होकर जाट उसके पीछे हो लिये और राजाराम निर्विवाद रूप से उनका नेता बन गया। शीघ्र ही राजाराम ने मिट्टी के परकोटों से घिरी पक्की गढ़ैयां (छोटे दुर्ग) बनाने आरम्भ कर दिये। जब राजाराम की स्थिति काफी मजबूत हो गई तो उसने आगरा सूबे पर आक्रमण करने शुरू कर दिये। इस पर औरंगजेब ने राजाराज को दिल्ली बुलवाया तथा मथुरा की सरदारी और 575 गांवों की जागीर प्रदान कर दी।

    राजाराम ने अपनी जागीर अपने भाई-बंधुओं में बन्दूकची सवार की नियमित शर्त पर वितरित कर दी तथा इस प्रकार अपनी नियमित सेना खड़ी कर ली। औरंगजेब ने सोचा था कि जागीर प्राप्त करके राजाराम मुगलों के साथ हो जायेगा तथा जाटों को नियंत्रण में रखेगा किंतु राजाराम ने मुगलों की बिल्कुल भी परवाह नहीं की। इस कारण पूरे जाट क्षेत्र में जाटों ने सरकारी खजानों, व्यापारियों तथा सैनिक चौकियों को लूटना आरम्भ कर दिया। चारों ओर लुटेरे ही लुटेरे दिखाई देने लगे। आगरा और दिल्ली के बीच सरकारी माल तथा व्यापारियों का निकलना दुष्कर हो गया। इस लूटपाट से जाटों की गढ़ियां माल से भरने लगीं। इस पर औरंगजेब ने शफी खां को आगरा का सूबेदार बनाकर जाटों का दमन करने के लिये भेजा। राजाराम ने आगरा के दुर्ग पर चढ़ाई कर दी। शफी खां डरकर किले में बंद हो गया। राजाराम और उसके साथियों ने जी भरकर आगरा परगने को लूटा। इस पर औरंगजेब ने कोकलतास जफरजंग को आगरा भेजा किंतु वह भी राजाराम को दबाने में असफल रहा। ई.1687 में औरंगजेब ने अपने पोते शहजादा बेदार बख्त को विशाल सेना देकर जाटों के विरुद्ध भेजा। बेदार बख्त के आगरा पहुंचने से पहले ही मार्च 1688 के अंतिम सप्ताह में राजाराम ने रात्रि के समय सिकन्दरा स्थित अकबर की कब्र को घेर लिया। उसने अकबर की कब्र खुदवाकर उसकी हड्डियां आग में झौंक दीं तथा मकबरे की छत पर लगे सोने-चांदी के पतरों को उतार लिया। मकबरे के मुख्य द्वार पर लगे कांसे के किवाड़ों को तोड़ डाला। वहाँ से चलकर उसने मुगलों के गांवों को लूटा। खुर्जा परगना भी उसके द्वारा बुरी तरह से लूटा गया। पलवल का थानेदार गिरफ्तार कर लिया गया।

    जब बेदार बख्त जाटों के विरुद्ध अप्रभावी सिद्ध हुआ तो औरंगजेब ने आम्बेर नरेश बिशनसिंह को जाटों के विरुद्ध भेजा। उसने राजाराम को युद्ध क्षेत्र में मार गिराया तथा उसका सिर काटकर औरंगजेब को भेज दिया। राजाराम का प्रबल सहायक रामचेहर भी इस युद्ध में पकड़ा गया। उसका सिर काटकर आगरा के किले के सामने लटका दिया गया। राजाराम के कटे हुए सिर को देखकर औरंगजेब ने बड़ा उत्सव मनाया। राजाराम की मृत्यु से भी औरंगजेब संतुष्ट नहीं हो सका। उसने राजा बिशनसिंह से कहा कि वह जाट जाति को ही समाप्त कर दे। बिशनसिंह जाटों का जन्मजात शत्रु था क्योंकि जाट उसके राज्य में लूटपाट किया करते थे। उसने जाटों के विरुद्ध भयानक अभियान चलाया जिसमें बहुत बड़ी संख्या में जाट मारे गये।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • अध्याय-31 जगद्गुरु शंकराचार्य एवं उनका दर्शन

     02.06.2020
    अध्याय-31 जगद्गुरु शंकराचार्य एवं उनका दर्शन

    जगद्गुरु शंकराचार्य एवं उनका दर्शन


    रास्ते में पड़े चिथड़ों से बनी झोली या गुदड़ी से काम चला लिया, पुण्य-अपुण्य से परे विशेष जीवन-मार्ग अपना लिया, न मैं हूं, न तुम हो, न ही यह संसार है यह जान लिया, तब फिर किस बात शोक किया जाये। -आदि जगत्गुरु शंकराचार्य।


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    वेदों की रचना लगभग ई.पू. 1000 तक पूर्ण हो चुकी थी। उनके बाद ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यकों, उपनिषदों एवं सूत्रों की रचना हुई। इन्हें वेदों का ही भाग माना जाता है। ब्राह्मणों के परिशिष्ट 'आरण्यक' कहलाते हैं और उनके अन्तिम भाग 'उपनिषद' हैं। उपनिषदों को वेदांत कहा जाता है क्योंकि ये वेदों का अंतिम भाग हैं। उपनिषद् बहुत सारे थे तथा इनमें भिन्न-भिन्न मत प्रस्तुत किए गए थे। इन्हें स्वतंत्र रूप से समझ पाना कठिन था।

    ई.पू. 500 से ई.पू. 200 के बीच महर्षि बादरायण ने उपनिषदों के तत्त्व ज्ञान को व्यवस्था करने के उद्देश्य से 'वेदान्तसूत्र' की रचना की जिसे 'ब्रह्मसूत्र' भी कहते हैं। श्रीमद्भगवत् गीता को बादरायण के ब्रह्मसूत्र का ही विकास मानना चाहिए। ई.700 के लगभग महर्षि गोडपाद ने माण्डूक्य उपनिषद पर कारिकाएं लिखकर बादरायण के मत को आगे बढ़ाया। गोडपाद की कारिकाओं पर बौद्ध विचारों का प्रभाव दिखाई देता है। गौडपाद के शिष्य गोविन्द; और गोविन्द के शिष्य शंकराचार्य हुए। शंकराचार्य ने वेदान्त का परिष्कृत एवं परिपक्व रूप प्रस्तुत किया।


    शंकराचार्य का जीवन परिचय

    शंकराचार्य का जन्म

    शंकराचार्य के शिष्यों ने शंकर के जन्म के विषय में अनेक बातें प्रसारित कर रखी हैं जिनके कारण उनके जन्म की सही तिथि प्राप्त करना कठिन है। कतिपय हिन्दू शास्त्र आदिशंकर का जन्म ई.पू.507 में तथा निधन ई.पू.475 में होना बताते हैं किंतु यह तिथि इतिहास सम्मत नहीं है। विभिन्न स्रोतों से प्राप्त समसामयिक तथ्यों के आधार पर यह स्थिर किया गया है कि शंकर का जन्म ई.788 में केरल के मलाबार में अलवाए नदी के किनारे स्थित कालाड़ी (इसे कालटी अथवा काषल भी कहते हैं) गांव के नम्बूदिरी ब्राह्मण परिवार में हुआ।

    उनके पिता का नाम शिवगुरु और माता का नाम आर्याम्बा था। कुछ स्रोत इनकी माता का नाम सुभद्रा बताते हैं। जब शंकर तीन वर्ष के हुए तब उनके पिता का देहांत हो गया। उनका पालन-पोषण उनकी माता ने किया। प्रतिवर्ष वैशाख शुक्ल पंचमी को शंकराचार्य जयंती मनाई जाती है।

    शंकराचार्य की शिक्षा

    माता आर्यम्बा ने पुत्र शंकर को गोविन्द स्वामी से शिक्षा दिलवाई। शंकर अत्यंत मेधावी तथा अद्भुत प्रतिभाशाली बालक थे। मान्यता है कि केवल छः वर्ष की आयु में ही उन्होंने वेद, पुराण, उपनिषद्, रामायण, महाभारत आदि ग्रंथ कंठस्थ कर लिए। आठ वर्ष की आयु में वे शिक्षा पूरी करके घर लौट आए।

    संन्यास

    माता उनका विवाह करना चाहती थीं किंतु किसी ज्योतिषि ने बताया कि शंकर अल्पायु होंगे। इसलिए शंकर ने विवाह के स्थान पर संन्यास लेने का निर्णय लिया किंतु माता उन्हें एकमात्र पुत्र होने के कारण संन्यासी बनने की आज्ञा नहीं देती थीं। एक दिन नदी किनारे स्नान करते समय एक मगरमच्छ ने शंकर का पैर पकड़ लिया। तब शंकर ने माँ से कहा कि मुझे संन्यास लेने की आज्ञा दो अन्यथा मगरमच्छ मुझे खा जाएगा। भयभीत माता ने उन्हें संन्यासी होने की आज्ञा दे दी और मगरमच्छ ने शंकर का पैर छोड़ दिया। माता ने उनसे वचन लिया कि वे माता की मृत्यु के समय अवश्य आएंगे। शंकर ने गोविन्द स्वामी से संन्यास ग्रहण किया। जब कुछ वर्ष पश्चात् माता की मृत्यु का समय हुआ तो शंकर स्वतः ही माता के समक्ष उपस्थित हुए तथा उन्हें मुखाग्नि दी।

    शंकर के शास्त्रार्थ

    शंकर कुछ समय के लिए काशी में रहे तथा वहाँ अनेक विद्वानों को शास्त्रार्थ में परास्त किया। इसके बाद शंकर ने वेदान्त दर्शन के प्रचार के लिए देश के विभिन्न भागों में घूमना आरम्भ किया। शंकर ने मीमांसकों, चार्वाकों, जैनियों एवं बौद्धों से शास्त्रार्थ किया और उन्हें स्थान-स्थान पर परास्त किया। उनमें से बहुत से विधर्मियों ने शंकर का शिष्य बनना स्वीकार कर लिया। बिहार के माहिष्मती क्षेत्र के प्रसिद्ध मीमांसक मण्डन मिश्र से हुआ उनका शास्त्रार्थ अत्यधिक प्रसिद्ध है।

    जब शंकराचार्य ने मण्डन मिश्र को परास्त कर दिया तब मंडन मिश्र की पत्नी भारती ने शंकराचार्य को शास्त्रार्थ हेतु चुनौती दी। मान्यता है कि भारती ने शंकर से 'काम' पर शास्त्रार्थ करना चाहा। इस पर शंकर ने परकाया प्रवेश करके इस विषय का ज्ञान प्राप्त किया तथा भारती से शास्त्रार्थ कर उसे परास्त किया। मंडन मिश्र एवं भारती ने शंकराचार्य को अपना गुरु मान लिया तथा वे भी शंकराचार्य की आज्ञा से अद्वैत दर्शन के प्रचार में जुट गए।

    शंकराचार्य ने चिदम्बरम से काश्मीर, केदार और बद्रिकाश्रम तक और द्वारिका से काशी और जगन्नाथपुरी तक अनेक पण्डितों और दार्शनिकों को परास्त करके अपने मत में सम्मिलित किया। बौद्ध उन्हें अपना शत्रु समझते हैं, क्योंकि उन्होंने बौद्धों को कई बार शास्त्रार्थ में पराजित करके वैदिक धर्म की पताका फहराई। आनन्दगिरि रचित 'शंकर विजय' और माधव द्वारा रचित 'शंकर दिग्विजय' में शंकराचार्य की यात्राओं और शास्त्रार्थों का विस्तृत वर्णन हुआ है।

    शंकरचार्य के ग्रंथ

    शंकराचार्य देश-व्यापी यात्रा और शास्त्रार्थ करते हुए निरन्तर लेखन भी करते रहे। उन्होंने अनेक भाष्य, प्रकरण तथा स्तोत्र ग्रन्थों की रचना की तथा सौन्दर्य लहरी एवं विवेक चूड़ामणि जैसे श्रेष्ठ ग्रंथ लिखे। उन्होंने ब्रह्मसूत्र, भगवद्गीता और ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, मांडूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, बृहदारण्यक, प्रस्थान त्रयी एवं छान्दोग्य उपनिषदों पर भाष्य लिखे। उन्होंने ब्रह्मसूत्र की विशद और रोचक व्याख्या की। उन्होंने उपदेश सहस्री, आत्मबोध, आनन्द लहरी, दक्षिणामूर्ति, शिवापराधक्षमापण, हस्तामलक आदि स्तोत्रों और काव्यों की रचना की।

    शंकराचार्य ने शिव, पार्वती, गणेश, विष्णु आदि देवी-देवताओं के भक्ति-रस से परिपूर्ण स्तोत्र रचे। शंकर के लिखे 'भजगोविन्दम्' भजन ने अत्यधिक प्रसिद्धि प्राप्त की। उनकी तार्किक प्रतिभा, दार्शनिक प्रगल्भता और कवित्व-शक्ति ने देश में नई चेतना एवं स्फूर्ति का संचार किया। उस युग में उनके जैसा लेखन-चातुर्य और प्रचार-कौशल किसी अन्य विद्वान ने प्रदर्शित नहीं किया। मान्यता है कि उन्होंने केवल सोलह वर्ष की आयु में ब्रह्मसूत्र पर शांकरभाष्य की रचना करके विद्वत् समाज को चकित कर दिया।

    शंकराचार्य के सांगठनिक कार्य

    शंकराचार्य उच्च-कोटि के संगठनकर्ता थे। उन्होंने भारतवर्ष में चार दिशाओं में चार वेदांत मठों की स्थापना की- (1.) उत्तर में बद्रिकाश्रम (ज्योतिमठ), (2.) दक्षिण में शृंगेरी पीठ, (3.) पश्चिम में द्वारिका शारदा पीठ और (4.) पूर्व में पुरी गोवर्धन पीठ। ये मठ आज भी बहुत पवित्र माने जाते हैं और इनके अध्यक्ष शंकराचार्य कहलाते हैं। ये मठ अपने-अपने क्षेत्र के मठों की व्यवस्था करते हैं। प्रत्येक प्रधान मठ के अध्यक्ष अर्थात् शंकराचार्य के नीचे सन्यासियों की दस श्रेणियां हैं- सरस्वती, भारती, पुरी, गिरि, तीर्थ, आश्रम, वन, अरण्य, पर्वत और सागर।

    इन्हें सम्मिलित रूप से 'दशनामी' कहते हैं। ज्ञान प्राप्ति की दृष्टि से इनके चार वर्ग- ब्रह्मचारी, दण्डी, परिव्राजक और परमहंस हैं। इनमें जाति-पांति का भेद नहीं है। एक बार बनारस में एक चाण्डाल के प्रश्न करने पर शंकराचार्य ने कहा- 'मैं प्रत्येक व्यक्ति को जो संसार को अद्वैत दृष्टि से देखता है अपना गुरु मानता हूँ, चाहे वह चाण्डाल हो या द्विज।' इससे स्पष्ट है कि शंकराचार्य ने अपने संगठन में वर्ण, आश्रम और लिंग के भेद को कोई स्थान नहीं दिया। देश की चार दिशाओं में चार आश्रमों की स्थापना के करके शंकर ने देश को एक जैसी धार्मिक संस्कृति देने का प्रयास किया।

    वामाचार का निषेध

    शंकराचार्य ने वेदांत दर्शन का प्रचार किया तथा गर्हित धर्माचार का निषेध किया। उन्होंने अनेक मंदिरों एवं मठों में होने वाली शाक्तों, तात्रिकों, भैरवों, कापालिकों तथा पाशुपतों की मलिन क्रियाएं बन्द करवा दीं। शंकर ने कांची के देवी मन्दिर में नर-बलि का प्रबल विरोध किया और उसे बन्द करवाया।

    अद्भुत समन्वय क्षमता

    शंकर में दूसरों को प्रभावित करने की अद्भुत प्रतिभा थी। वे दार्शनिक विचारों के समन्वय के पक्षधर थे। उन्होंने मीमांसा का खण्डन किया किंतु वैदिक रीतियों में अगाध श्रद्धा प्रकट की। बौद्धों का विरोध किया किंतु बुद्ध को योगियों का चक्रवर्ती बताया। शंकर ने बौद्ध धर्म के बहुत से विचारों को मान्यता दी जिनके कारण रूढ़िवादी लोग उन्हें 'प्रच्छन्न बौद्ध' कहने लगे। शंकर ने ब्रह्मज्ञान का प्रचार किया किंतु सूर्य, शक्ति, विष्णु, शिव और गणेश की पूजा को भी स्वीकार किया।

    इस प्रकार शंकराचार्य ने ज्ञान और भक्ति दोनों को मान्यता देकर भारतीय जन-मानस को व्यापक रूप से अपनी ओर आकर्षित किया। वर्तमान समय में भी हिन्दू-धर्म के प्रत्येक पक्ष पर शंकराचार्य की गहरी छाप है। शंकराचार्य के निधन के बाद उनके शिष्य शिवसोम ने काम्बुज देश (वर्तमान कम्बोडिया) में शंकर के अद्वैत मत का प्रचार किया।

    शंकर का निधन

    शंकरचार्य का निधन केवल 32 वर्ष की आयु में हुआ। उन्होंने केदारनाथ धाम में अपनी देह का त्याग किया। स्मार्त संप्रदाय में उन्हें शिव का अवतार माना जाता है। उन्हें आदिशंकराचार्य एवं जगत्गुरु भी कहा जाता है।


    शंकराचार्य का दर्शन

    शंकराचार्य का अद्वैतवाद

    शंकराचार्य भारत के महान दार्शनिक एवं धर्म-प्रवर्तक थे। शंकराचार्य का दर्शन आत्मा और परमात्मा की एकरूपता पर आधारित है। इस दर्शन के अनुसार परमात्मा एक ही समय में सगुण और निर्गुण दोनों स्वरूपों में विद्यमान रहता है। उन्होंने अद्वैत वेदान्त को ठोस दार्शनिक आधार प्रदान किया तथा सनातन धर्म की विविध दार्शनिक धाराओं का एकीकरण किया।

    उन्होंने अनुभव किया कि ज्ञान की अद्वैत भूमि पर जो परमात्मा निर्गुण निराकार ब्रह्म है, वही द्वैत की भूमि पर सगुण साकार है। उन्होंने निर्गुण और सगुण दोनों का समर्थन करके निर्गुण तक पहुँचने के लिए सगुण की उपासना को अपरिहार्य सीढ़ी माना। ज्ञान और भक्ति की मिलन भूमि पर यह भी अनुभव किया कि अद्वैत ज्ञान ही सभी साधनाओं की परम उपलब्धि है।

    ब्रह्म का स्वरूप

    शंकराचार्य का मानना था कि सृष्टि की 'विविधता' के मूल में 'एकता' विद्यमान है। अलग-अलग दिखाई देने वाली वस्तुएं एक ही सत्ता के विभिन्न रूप हैं। यह सत्ता अनन्त, सत्य और ज्ञान है। इसमें चैतन्य और आनन्द निहित है। यह देश, काल और अवस्था से परे है। इसे नाम, गुण और विशेषणों की सीमा में नहीं बांधा जा सकता। इसे 'ब्रह्म' कहते हैं। 'ब्रह्म' में निहित शक्ति के कारण इसके अनेक रूप दिखाई देते हैं। इस शक्ति का नाम 'प्रकृति' या 'माया' है।

    यह ब्रह्म में इस तरह है जैसे आग में जलाने की क्षमता किंतु इसे ब्रह्म का अंग नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ऐसा करने से ब्रह्म भी सीमित या परिवर्तनशील या नाशवान् मानना पड़ेगा जो कि उसके स्वरूप के विपरीत है। वह तो केवल ब्रह्म की एक शक्ति है जिससे वह एक होते हुए भी अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है। ये ब्रह्म के वास्तविक रूप नहीं है किंतु वास्तविक जैसे आभासित होते हैं। इन्हें 'विवर्त' कहा जाता है।

    माया का अर्थ

    शंकराचार्य 'माया' को 'कारण' या 'शक्ति' मानते हैं जिससे ब्रह्म के बहुत से अलग-अलग रूप दिखाई देते हैं। अर्थात् इससे बहुगुणी विश्व के बनने, बढ़ने और बिगड़ने की क्रिया चलती है। इसे 'अव्यक्त प्रकृति' भी कहा जा सकता है जिससे व्यक्त संसार चलता है। दूसरे शब्दों में यह 'माया' प्रकृति का पर्याय है जो समस्त वस्तुओं को प्रकट करती है। माया के कारण यह सृष्टि परिवर्तनशील है। सारांश यह है कि 'ब्रह्म' एक होता हुआ भी 'माया' के कारण बहुत से रूपों में दिखाई देता है।

    जगत् का स्वरूप

    शंकराचार्य ने जगत् का स्वरूप बताते हुए लिखा है- 'नामरूपाभ्यां व्यक्तस्य अनेककर्तृभोक्तृसंयुक्तस्य प्रतिनियत देशकालनिमित्तक्रियाफलाश्रयस्य मनसापि अचिन्त्यरचनारूपस्य जन्मस्थितिभंगंयतः।'

    अर्थात्- नाम एवं रूप से व्यक्त, अनेक कर्ता, अनेक भोक्ता से संयुक्त, जिसमें देश, काल, निमित्त और क्रियाफल भी नियत हैं, जिस जगत् की सृष्टि की मन से भी कल्पना नहीं कर सकते, उस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति तथा लय ब्रह्म से होती है।

    ब्रह्म और जगत की अभिन्नता

    माया के द्वारा हमें ब्रह्म के अनेक रूप दिखाई देते हैं तथा ये विभिन्न रूप ब्रह्म की एकता को ढक लेते हैं। इसे 'आवरण' कहते हैं और इसका नाम 'विक्षेप' है। इससे ऐसा लगने लगता है कि वे ही सत्य हैं। ब्रह्म अपने आप में एक, और समस्त रूपों से परे है किंतु 'माया' का आश्रय होने से उसे 'ईश्वर' कहा जाता है। माया के कारण ब्रह्म सूक्ष्म रूपों में दिखाई देता है। सूक्ष्म रूपों का आधार होने से ब्रह्म 'हिरण्यगर्भ' कहलाता है। माया के कारण ब्रह्म स्थूल रूपों में भी दिखाई देता है।

    स्थूल रूपों का आधार होने से ब्रह्म 'वैश्वानर' कहलाता है। सूक्ष्म रूपों का आर्विभाव इस क्रम में होता है- आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी। फिर इन पांचों का पांच तरह से मेल होता है, जिससे स्थूल रूप बनते हैं। जब आधे में आकाश और आधे में बाकी चारों रूप होते हैं तो स्थूल आकाश बनता है। जब आधे में वायु और आधे में बाकी चारों रूप होते हैं तो स्थूल वायु बनता है। इसी प्रकार स्थूल अग्नि, स्थूल जल और स्थूल पृथ्वी बनते हैं। इस क्रिया को 'पंचीकरण' कहते हैं।

    जीव का स्वरूप

    शंकराचार्य के अनुसार जीव 'अज्ञान व्यष्टि की उपाधि' से युक्त है। शंकराचार्य की दृष्टि में सम्पूर्ण जगत् के जीवों को ब्रह्म के रूप में स्वीकार करना चाहिए।

    ब्रह्म परमार्थ सत्य व जगत व्यावहारिक सत्य

    बहुत से दार्शनिक जगत को मिथ्या मानते हैं जिसका कोई अस्तित्त्व नहीं है। शंकराचार्य ऐसा नहीं मानते। वे कहते हैं कि ब्रह्म और जगत अभिन्न हैं, ब्रह्म परमार्थ रूप में सत्य है और जगत व्यावहारिक रूप में सत्य है। यह अवश्य है कि जगत् बिना ब्रह्म के सत्य नहीं है किंतु यह भी सत्य बात है कि जगत ब्रह्म का ही रूप है, और वह सत्य है। इसलिए ब्रह्मसूत्र स्पष्ट कहता है कि जगत् असत् नहीं है। शंकराचार्य स्वयं लिखते हैं कि तरह-तरह के नामों और रूपों वाली चीजों की सत्ता है, यद्यपि वे अपने आप में पूरी न होने के कारण सत्य नहीं कही जा सकतीं क्योंकि सत्य से उस चीज का बोध होता है जो अपने आप में पूरी हो।

    जिस प्रकार भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों कालों में ब्रह्म की सत्ता बनी रहती है, वैसे ही तीनों कालों में जगत भी बना रहता है। अतः स्पष्ट है कि शंकर जगत को व्यावहारिक सत्य मानते हैं, केवल कल्पना नहीं समझते। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि परमार्थ की दृष्टि से विचार किया जाए तो ब्रह्म ही सत्य है, इसके अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं किन्तु यदि व्यावहारिक दृष्टि से विचार किया जाए तो जगत भी सत्य है। शंकर का मत है कि प्रत्येक कार्य, कारण का ही रूप है या उसकी अवस्था है। इसलिए जीव और जगत दोनों में ब्रह्म दिखाई देता है, जबकि दोनों उसके रूप हैं। दोनों में चैतन्य रहता है- जीव में व्यक्त रूप से एवं जगत में अव्यक्त रूप से।

    अनन्त और सीमित ब्रह्म

    ब्रह्म के विभिन्न रूप देश, काल, गुण और आकार की सीमाओं में बंधे हुए हैं। सामान्य तौर पर इन्हें परछाई की उपमा से समझाया जा सकता है। अर्थात् जल में जैसे चन्द्र की परछाई दिखाई देती है, उसी तरह संसार में जीव भी ब्रह्म की छायाएं हैं किंतु ऐसा मानने में कठिनाई यह है कि जैसे जल के हटने से उनमें दिखाई देने वाला चन्द्र समाप्त हो जाता है, इसी तरह अविद्या के हटने से संसार में दिखाई देने वाले जीव बिल्कुल नष्ट हो जाएंगे। इससे बचने के लिए अद्वैतवादी एक दूसरी उपमा का सहारा लेते हैं।

    वे कहते हैं कि सर्वव्यापी आकाश घड़े की सीमाओं में बंधकर अलग-अलग जीवों और विषयों के रूप में प्रतीत होता है किंतु जब घड़ा फूट जाता है तो उसके अन्दर का आकाश बाहर का व्यापक आकाश बन जाता है। इसी तरह सीमाओं के समाप्त होने पर उनमें दिखाई देने वाला ब्रह्म अपने असली रूप में पहँुच जाता है। मुक्ति का यही अर्थ है कि मनुष्य सीमाओं का विचार छोड़़कर ब्रह्म को पहचाने। इस मत को 'अवच्छेदनवाद' कहते हैं।

    मुक्ति

    मुक्ति का अर्थ जगत् के परिवर्तनशील रूपों के पीछे ब्रह्म की एकता को पहचानना है। इसलिए 'मुक्ति' ज्ञान की अवस्था है और इसी जीवन में प्राप्त हो सकती है। मुक्ति पाकर भी मनुष्य जीवित रहता हुआ अपने दैनिक कर्म करता रह सकता है। शंकर लिखते हैं कि व्यास, वसिष्ठ, भृगु, नारद आदि ऋषि मुक्ति के बाद भी अपने-अपने काम करते रहे। इसलिए मुक्ति का अर्थ यह नहीं समझना चाहिए कि जीवन समाप्त हो जाए अपितु इसका आशय यह है कि हम सही ज्ञान से जगत में इनके पीछे जो ब्रह्म मौजूद है उसे पहचानें। ऐसा करने से आसाक्ति, तृष्णा, और दुःख अपने आप नष्ट हो जाते हैं। वेदान्ती इसे 'जीवन मुक्ति' कहते हैं।

    नैतिक आचरण पर बल

    यह ज्ञान प्राप्त करने के लिए अच्छे आचरण की आवश्यकता है। जिन कर्मों से इसकी प्राप्ति में मदद मिलती है, वे पुण्य हैं और जिनसे इसमें बाधा पहुँचती है, वे पाप हैं। सत्य, अहिंसा, दया एवं परोपकार आदि पुण्यकर्म हैं और झूठ, हिंसा, अत्याचार आदि पाप हैं। पाप वही व्यक्ति करता है जो शरीर या इन्द्रिय को नित्य मानकर उसकी संतुष्टि की चेष्टा करता है। जो ऐसा नहीं मानता और इनके पीछे के ब्रह्म को जानता है, वह समस्त संसार को एक-समान समझता है। उसके अन्दर सर्वात्मभाव होता है और मन में अपने-पराये का भेद नहीं रहता। वह स्वयं को औरों में एवं औरों को स्वयं में अनुभव करता है। इसलिए उसके हर कार्य में सच्चाई, अहिंसा और परोपकार का भाव होता है, उससे पाप हो ही नहीं सकता। इस प्रकार वेदान्त मनुष्य को उच्च नैतिक आचार की ओर ले जाता है, जिसका आधार विद्या और ज्ञान है।

    क्या शंकराचार्य इस्लाम से प्रभावित थे?

    डॉ. ताराचन्द की पुस्तक 'इन्फ्लुएन्स ऑफ इस्लाम ऑन इण्डियन कल्चर' के अनुसार शंकराचार्य इस्लामी प्रभाव से आविर्भूत हुए। प्रोफेसर हुमायँ कबीर ने हिन्दु-मुस्लिम एकता के उद्देश्य से 'अवर हेरिटेज' नामक पुस्तक लिखी। उनके अनुसार भी शंकर इस्लाम से प्रभावित थे। उसके बाद के बहुत से लेखकों ने डॉ. ताराचन्द तथा हुमायँ कबीर को उद्धृत करते हुए इस सिद्धांत को बार-बार दोहराया। इन लोगों द्वारा ऐसा कहने का आधार यह है कि इस्लाम और शंकर दोनों ही एकेश्वरवाद में विश्वास करते हैं।

    जबकि वे इस तथ्य को भूल जाते हैं कि इस्लाम के जन्म से हजारों साल पहले लिखे गए वेदों में अनेक देवताओं की पूजा किए जाने पर भी एक ही परम-सत्ता अथवा एक ही ब्रह्म अथवा एक ही विराट पुरुष का अस्तित्व स्वीकार किया गया है। वस्तुतः शंकर का ऐकेश्वरवाद भारतीय अद्वैतवाद का ही विकसित रूप है और उसका इस्लामी एकेश्वरवाद से कोई साम्य नहीं है। हिन्दू-मुस्लिम एकता के पक्षधर विद्वानों का कहना है कि इस्लाम ईश्वर को एक मानता है और विश्वास करता है कि सृष्टि की रचना ईश्वर ने की है, वह सातवें आकाश पर रहता है एवं उसके हृदय में भक्तों के लिए प्रेम और दुष्टों के लिए घृणा है।

    संसार असत्य है अर्थात् जो कुछ हम देखते हैं वह 'कुछ नहीं में कुछ होने का आभास है'। वास्तविकता यह है कि ये बातें इस्लाम में न तो पहले थीं और न अब हैं। यह सिद्धांत ईसा की नौवीं-दसवीं सदी के बाद सूफियों द्वारा प्रतिपादित किया गया। सूफियों को यह ज्ञान कुछ तो प्रत्यक्षतः ब्राह्मणों से और कुछ नव-अफलातूनी मत से मिला था। नव-अफलातूनी मत के प्रवर्त्तक प्लॉटिनस ने एकेश्वरवाद का सिद्धांत ब्राह्मणों और बौद्धों से प्राप्त किया था।

    सूफियों के एकेश्वरवाद के सिद्धांत से अलग, शंकर का ब्रह्म, शुद्ध, बुद्ध, चैतन्य, निराकार और निर्विकार है। उसे भक्तों की चिन्ता नहीं है और न ही दुष्टों को दण्ड देने की चिंता है। शंकर के अनुसार, ईश्वर और जगत् दोनों ही सत् हैं किंतु जगत् का कारण भी ईश्वर ही है। इस प्रकार शंकर का मत शुद्ध अद्वैत मत है किन्तु इस्लाम शुद्ध या विशिष्ट, किसी भी प्रकार के अद्वैतवाद में विश्वास नहीं करता। उसका विश्वास सिर्फ एक अल्लाह में है। सृष्टि के स्वभाव के विषय में भी कुरान का सिद्धांत शंकर के ठीक विपरीत है।

    अतः निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि इस्लाम का एक अल्लाह का सिद्धांत, शंकर के अद्वैतवाद से बिल्कुल भिन्न है तथा शंकर पर इस्लाम का रंच मात्र भी प्रभाव नहीं है।

    क्या शंकराचार्य प्रच्छन्न बौद्ध थे?

    शंकराचार्य की दार्शनिक परम्परा की जड़ें उपनिषदों एवं ऋग्वेद के नासदीय-सूक्त तक पहुँचती हैं जिनमें जीवन और सृष्टि के विषय में मौलिक प्रश्न उठाये गए थे। उन्हीं प्रश्नों का समाधान खोजते-खोजते पहले उपनिषद, फिर बौद्ध दर्शन और अन्त में शंकर का सिद्धान्त प्रकट हुआ। शंकर के निकटतम वैचारिक-पूर्वज बौद्ध दार्शनिक थे जिन्होंने शून्यवाद की स्थापना की थी। जो बौद्धों का शून्यवाद था, वहीं शंकर का मायावाद हुआ। शंकर ने बौद्धों से आगे बढ़कर एक तटस्थ ब्रह्म को स्थान दिया जो कि उपनिषदों के युग से चला आ रहा था।

    शून्यवाद को मायावाद के नाम से अपनाने के कारण ही रूढ़िवादी हिन्दू, शंकर को 'प्रच्छन्न बौद्ध' कहते थे। शंकर ने ब्रह्म की कल्पना जिस रूप में की थी, वह भक्तों के लिए निराशाजनक थी, क्योंकि भक्तों की प्रार्थना सुनने के लिए इस ब्रह्म के कान की खिड़कियां खुली हुई नहीं थीं। इसीलिए शांकर-मत के विरूद्ध, तीव्र प्रतिक्रिया उत्पन्न हुई और बाद के लगभग समस्त आचार्य ईश्वर के सगुण-साकार स्वरूप की ओर मुड़े।

    शंकराचार्य के गुरु गोविन्दाचार्य अथवा गोविंद स्वामी थे और गोविन्दाचार्य के गुरु गौडपादाचार्य थे जिन्होंने माण्डूक्योपनिषद पर कारिका लिखी थी। इस कारिका के चतुर्थ प्रकरण के आरम्भ में उन्होंने बुद्ध की वन्दना की। संभवतः इस कारण भी कुछ रूढ़िवादी हिन्दू शंकर पर प्रच्छन्न बौद्ध होने का आरोप लगाने में तनिक भी नहीं हिचकिचाते। शून्यवाद और मायावाद भारतीय दर्शन में उपनिषदों के युग से उपस्थित हैं।

    उनका ज्ञान यूनान तक भी पहुँच चुका था। बौद्ध दर्शन पर उपनिषदों के इन विचारों का प्रभाव था जिसके कारण ही बौद्धौं ने शून्यवाद का प्रतिपादन किया। शंकर ने इससे सहमति व्यक्त की और इस कारण कहा जाने लगा कि शंकर के विचारों पर पांचवीं शताब्दी ईस्वी के बौद्ध-दार्शनिक वसुबन्धु का प्रभाव है और वे 'प्रच्छन्न बौद्ध' हैं। यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि शंकर ने अनेक बौद्ध शास्त्रार्थियों को परास्त किया तथा प्रत्येक शास्त्रार्थ में बौद्ध दर्शन का खण्डन किया किंतु साथ ही बौद्धों के दर्शन की अच्छी बातें अपने दर्शन में सम्मिलित कीं जिससे बौद्ध धर्म की आवश्यकता ही समाप्त हो गई।

    प्रसिद्ध दार्शनिक सुरेन्द्रनाथ दास ने भारतीय दर्शन परिषद के स्मारक ग्रन्थ में लिखा है कि नागार्जुन शून्यवादी थे। नागार्जुन का मानना था कि संसार में किसी भी वस्तु की सत्ता नहीं है। 'कुछ नहीं में कुछ होने का भ्रम' होता है। न तो कोई वस्तु उत्पन्न होती है, न नष्ट होती है। लंकावतार-सूत्र का दर्शन यद्यपि विज्ञानवादी है तब भी वह नागार्जुन का ही दर्शन है। यह दर्शन भी मानता है कि हम जो कुछ देख रहे हैं, वह अपनी मानस-तरंग के कारण है।

    वस्तुतः बाह्य जगत से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। क्योंकि जगत सत्य है ही नहीं। इसी विचार को मैत्रैय और असंग ने आगे बढ़ाया तथा वसुबन्धु ने उसका विस्तार किया। शंकर ने उपनिषदों का जो वेदान्ती भाष्य किया, उसकी नींव वसुबन्धु के दर्शन में डाली जा चुकी थी। शंकर ने ब्रह्म को ही एकमात्र सत्य मानते हुए भी जगत् की भी सत्ता स्वीकार की है तथा उसे व्यावहारिक सत्य माना है जो उन्हें बौद्धों के शून्यवाद से अलग करता है।

    निष्कर्ष

    उपरोक्त तथ्यों के आलोक में कहा जा सकता है कि शंकर का मत अपने आप में पूर्ण स्वतंत्र है, उस दर्शन का आधार वेदांत अर्थात् उपनिषद हैं, न कि इस्लाम या बौद्ध धर्म। शंकर ने भारतीय संस्कृति, धर्म-दर्शन एवं अध्यात्म को जितना प्रभावित किया, उतना बहुत कम दार्शनिक कर पाए हैं। उन्होंने आने वाली सदियों के लिए हिन्दू-धर्म को पूरी तरह से बदल दिया। आने वाले युगों के दार्शनिक शंकर का खण्डन या मण्डन करके ही नए दार्शनिक सिद्धांतों का प्रतिपादन कर सकते थे।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • कैप्टन स्टेवार्ड जबर्दस्ती जयपुर राज्य का पोलिटिकल एजेण्ट बन गया

     02.06.2020
    कैप्टन स्टेवार्ड जबर्दस्ती  जयपुर राज्य का पोलिटिकल एजेण्ट बन गया

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राजमाता भटियानी तथा प्रधानमंत्री ठाकुर बैरीसाल सिंह के झगड़ों पर अंकुश लगाने के लिये ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने कैप्टन स्टेवार्ड को जयपुर में पोलिटिकल एजेण्ट नियुक्त किया। जयपुर में इस नियुक्ति का सर्वत्र विरोध हुआ किंतु राजमाता भटियानी की एक न चली। स्टेवार्ड ने 17 अप्रेल 1821 को जयपुर में आकर जबर्दस्ती अपना कार्यालय जमा लिया। तभी से जयपुर में पोलिटिकल एजेंसी की स्थापना हो गयी। गवर्नर जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स ने राजमाता और बैरीसाल को निर्देश भेजे कि राजस्व सम्बन्धी मामलों में स्टेवार्ड की राय से ही कार्य करें। धीरे-धीरे जयपुर राज्य में पोलिटिकल एजेण्ट ने वास्तविक शासक के अधिकार हथिया लिये।


    यह कहना अधिक उचित नहीं होगा कि सारी ज्यादती अंग्रेज अधिकारियों की तरफ से थी। शासक का नाबालिग होना, राजपरिवार के सदस्यों में सत्ता प्राप्ति के लिये खींचतान होना तथा सत्ता से चिपके हुए लोगों का एक दूसरे को जान से मार डालने के लिये आतुर रहना, आदि कई ऐसे कारण थे जिनके कारण अंग्रेज अधिकारियों की स्थिति दृढ़ होती चली गयी। ई.1823 में राजदरबार में दरोगा की नियुक्ति को लेकर राजमाता तथा प्रधानमंत्री बैरीसाल के बीच झगड़ा हो गया। रीजेण्ट ऑक्टरलोनी ने खुलकर बैरीसाल का पक्ष लिया तथा राजमाता के कृपापात्र झूथाराम को जयपुर राज्य से बाहर निकाल दिया। रेजीडेण्ट ऑक्टरलोनी तथा पोलिटिकल एजेण्ट कैप्टन स्टेवार्ड ने राजमाता की प्रतिष्ठा और गरिमा गिराने का कोई भी अवसर हाथ से नहीं जाने दिया। बैरीसाल का पक्ष लेने के कारण ऑक्टरलोनी पूरे जयपुर राज्य में बदनाम हो गया।

    बैरीसाल निकम्मा प्रशासक सिद्ध हुआ। उसके काल में जयपुर राज्य में भ्रष्टाचार, राजकीय आय का दुरुपयोग, प्रशासकीय अव्यवस्था तथा गबन चरम पर
    पहुंच गये। ईशरदा और शेखावाटी की सेनाओं को वेतन नहीं दिया जा सका जिससे उनमें विद्रोह हो गया। ई.1824 में तोरावाटी की चार बटालियनों ने वेतन न मिलने पर विद्रोह कर दिया। शेखावाटी के सैनिक विद्रोह के लिये ऑक्टरलोनी बैरीसाल को जिम्मेदार मानता था तो पोलिटिकल ऐजेण्ट रपर (स्टेवार्ट का उत्तराधिकारी) इसे राजमाता की साजिश मानता था।

    ई.1824 में ऑक्टरलोनी स्वयं जयपुर आया। उसने डिग्गी के ठाकुर मेघसिंह को मुख्तार के पद पर नियुक्त कर दिया। राजमाता को नीचा दिखाने के लिये बैरीसाल को अधिकार दिया गया कि वह पोलिटिकल एजेंसी में अपना वकील नियुक्त कर सकता है। जब तक रपर जयपुर में पोलिटिकल एजेण्ट रहा राजमाता तथा उसके बीच छत्तीस का आंकड़ा बना रहा। ई.1825 में चार्ल्स मेटकाफ दिल्ली में रेजीडेण्ट बना। उसने रपर के स्थान पर कैप्टेन लो को जयपुर राज्य का पोलिटिकल ऐजेण्ट नियुक्त किया तथा उसे निर्देश दिये कि वह राज्य के आंतरिक प्रशासन में हस्तक्षेप न करे तथा राजमाता को शासन संचालन में पूर्ण स्वतंत्रता दे। मेटकाफ ने झूथाराम को फिर से जयपुर राज्य में आने की अनुमति दिलवाई।

    कैप्टेन लो भी अपने पूर्ववर्ती पोलिटिकल एजेण्टों की तरह अत्यंत महात्वाकांक्षी एवं दुराग्रही था। उसने राजमाता को चैन से नहीं बैठने दिया तथा उन सामंतों को संरक्षण दिया जो रानी के विरुद्ध थे तथा राज्य को नुक्सान पहुंचा रहे थे जिससे जयपुर राज्य की आय और अधिक गिर गयी। राज्य ने खिराज समय पर चुकाने के लिये प्रजा पर नये कर लगाये व पुराने करों में वृद्धि की जिससे जनता रुष्ट हो गयी। प्रजा का यह क्रोध अंग्रेजों के प्रति था न कि राजा के प्रति। कर वृद्धि के कारण प्रजा त्राहि-त्राहि करने लगी थी।

    कैप्टेन लो ने राजमाता पर जोर डाला कि वह शिशु महाराजा को प्रकट करे। राजमाता की प्रभुसत्ता को समाप्त करने के लिये लो ने यह चाल चली थी। उसकी धारणा थी कि महाराजा के प्रकट होने से रीजेंसी की अवधि समाप्त हो जायेगी तथा प्रशासन का कार्य राज्य के सामंतों की परिषद के द्वारा किया जाने लगेगा तथा राजमाता के स्थान पर बैरीसाल को शासन के अधिकार मिल जायेंगे। पोलिटिकल एजेण्ट कैप्टेन लो की महत्वाकांक्षा के मार्ग में रेजीडेण्ट चार्ल्स मेटकाफ बहुत बड़ा रोड़ा सिद्ध हुआ। उसने निर्णय दिया कि भले ही महाराजा प्रकट हो जाये किंतु शासन के अधिकार राजमाता के पास ही रहेंगे।

    मेटकाफ का बल पाकर रानी नये जोश से भर गयी उसने प्रशासन में महत्वपूर्ण परिवर्तन किये तथा मेघसिंह को मुख्तार के पद से हटाकर चान्दसिंह को मुख्तार बनाया। चूंकि परम्परा को तोड़ते हुए रानी के अधिकारों को चुनौती देने के लिये सामंतों की बैठक बुलायी गयी थी इसलिये सामंतों को रानी से मुँहजोरी करने का दुःसाहस होने लगा जिससे राज्य की आय और गिर गयी तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी को खिराज नहीं दिया जा सका। राजमाता ने प्रार्थना की कि खिराज की रकम 8 लाख प्रतिवर्ष से घटाकर कम कर दी जाये किंतु कैप्टन लो ने राजमाता का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। इस समय तक दिल्ली में रेजीडेण्ट बदल चुका था तथा मेटकाफ का स्थान कोल ब्रक ने ले लिया था। उसने राजमाता को अनुमति दी कि वह झूंथाराम को राज्य का मुख्तार बना सकती है।

    झूथाराम सामंतों पर अंकुश नहीं लगा सका, लगा भी नहीं सकता था क्योंकि सामंतों को पोलिटिकल एजेण्ट का संरक्षण प्राप्त था। राज्य की आय बढ़ाने के लिये झूथाराम को अपने बलबूते पर ही कुछ करना था। चूंकि राज्य अंग्रेजों के संरक्षण में था इसलिये झूथाराम ने किलों में रखी जाने वाली सेना कम कर दी ताकि राज्य के व्यय में कमी आये। सैनिकों के निर्वहन के लिये जागीर में दी गयी भूमि फिर से खालसा में मिला ली गयी। इससे रुष्ट होकर रणथंभौर के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। इन विद्रोहियों को जागीरदारों ने ही उकसाया था। झूथाराम ने जो सेना इस विद्रोह को दबाने के लिये भेजी वह विद्रोहियों को नहीं दबा सकी। इस पर रानी ने पोलिटिकल एजेण्ट से सहायता मांगी किंतु एजेण्ट ने इसे राज्य का आंतरिक मामला बताकर सहायता करने से इन्कार कर दिया।

    इसी समय नवम्बर 1830 में ब्रिटिश ऐजेंसी को जयपुर से अजमेर स्थानांतरित कर दिया गया। इस पर पोलिटिकल एजेण्ट की तरफ के सामंतों ने समझा कि यह राजमाता तथा कैप्टेन लो के बीच शक्ति परीक्षण चल रहा है और उन्होंने लो के हाथ मजबूत करने के लिये स्थान-स्थान पर विद्रोह कर दिया। इसे दबाने के लिये रीजेण्ट (राजमाता भटियानी) तथा मुख्तार (झूथाराम) को बड़े पापड़ बेलने पड़े जिससे राज्य की आर्थिक स्थिति और भी दयनीय हो गयी। इसी काल में जयपुर राज्य को जोधपुर, बीकानेर, करौली तथा टौंक राज्यों से भी सरहदों पर उलझना पड़ा।

    ई.1833 में राजमाता भटियानी का देहांत हो गया। महाराजा जगतसिंह की मृत्यु (1818) से लेकर पूरे 15 साल तक वह जयपुर राज्य को बचाने के लिये जूझती रही और अंत में राजनीति की गंदी गलियों में हाथ-पांव मारते हुए अपने अवयस्क पुत्र जयसिंह को झूथाराम के हवाले करके इस संसार से कूच कर गयी। राज्य का सारा बोझ झूथाराम पर आ पड़ा। झूथाराम न तो जयपुर राज्य के सामंतों पर अंकुश लगा सका, न राज्य की अर्थव्यवस्था को सुधार सका और न अंग्रेज अधिकारियों का विश्वास पात्र बना रह सका।केवल राजमाता भटियानी ही उसे राज्य का शुभचिंतक मानकर किसी तरह प्रधानमंत्री बनाये रखने में सफल रही थी।

    कहा नहीं जा सकता था कि झूथाराम सही था या गलत किंतु उस युग की प्रवृत्ति ही ऐसी थी कि झूठ इतनी सफाई से, इतनी बार और इतने लोगों द्वारा बोला जाता था कि झूठ तो सच बन जाता था और सच- झूठ। इस प्रोपेगण्डा के चलते झूथाराम जयपुर राज्य में अलोकप्रिय हो गया। अब उसका पतन निकट दिखायी देने लगा था।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • अध्याय - 25 केन्द्रीय संग्रहालय जयपुर (अल्बर्ट हॉल)

     02.06.2020
    अध्याय - 25 केन्द्रीय संग्रहालय जयपुर (अल्बर्ट हॉल)

    अध्याय - 25 केन्द्रीय संग्रहालय जयपुर (अल्बर्ट हॉल)


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    केन्द्रीय संग्रहालय जयपुर को अल्बर्ट म्यूजियम भी कहा जाता है। संग्रहालय भवन का शिलान्यास ब्रिटिश राजकुमार प्रिन्स ऑफ वेल्स प्रिंस अल्बर्ट द्वारा जयपुर नरेश रामसिंह (द्वितीय) के शासनकाल में 6 फरवरी 1876 को किया गया। उसी के नाम से इस संग्रहालय का नाम एल्बर्ट म्यूजियम रखा गया।

    इस संग्रहालय का कला संग्रह ई.1881 में अस्थायी रूप से किशनपोल बाजार में स्थित वर्तमान स्कूल ऑफ आटर््स के भवन में रखा गया। संग्रहालय हेतु पुरा एवं कला सामग्री का संकलन जयपुर राज्य के अंग्रेज चिकित्सा अधिकारी कर्नल हैण्डले की देख-रेख में आरम्भ हुआ जो कला विशेषज्ञ भी था। अल्बर्ट हॉल भवन का निर्माण अंग्रेज इन्जीनियर सर सैम्युअल स्विंटन जैकब की देखरेख में जयपुर के राजमिóियों चन्दर और तारा ने किया। स्थापत्य की दृष्टि से यह भवन महत्वपूर्ण है। इसमें हिन्दू, इस्लामी और ईसाई स्थापत्य शैलियों का मिश्रण देखने को मिलता है। भवन निर्माण में पांच लाख एक हजार छत्तीस रुपये व्यय हुए।

    महाराजा माधोसिंह (द्वितीय) (ई.1880-1922) के शासनकाल में ई.1886 में संग्रहालय, अल्बर्ट हॉल में स्थानान्तरित कर दिया गया। ई.1887 में सर एडवर्ड ब्रेडफोर्ड ने इसका विधिवत उद्घाटन किया। अल्बर्ट म्यूजियम को शैक्षणिक संस्था का रूप दिया गया। इसमें इतिहास, भू-गर्भ 
    शास्त्र, अर्थ शास्त्र, विज्ञान और कला आदि विषयों पर आधारित सामग्री भारत, ब्रिटेन, ईरान, मिश्र, बर्मा, लंका, जापान, तिब्बत, नेपाल आदि देशों से एकत्रित की गई।

    कर्नल हैण्डले के पश्चात् कर्नल पैक, रॉबिन्सन पिशर आदि चिकित्सा अधिकारी इस संग्रहालय के अधिष्ठाता रहे किंतु वे संग्रहालय विज्ञान का कोई ज्ञान नहीं रख्ते थे। कर्नल हैण्डले ने इस संग्रहालय में जिस सामग्री का संयोजन किया, वही संयोजन देश की आजादी तक चलता रहा। डॉक्टर दलजन सिंह प्रथम भारतीय अधिकारी थे जो 1920 के लगभग इस पद पर रहे। राजस्थान के एकीकरण के पश्चात् ई.1950 में डॉ. सत्यप्रकाश श्रीवास्तव के नेतृत्व में राजस्थान राज्य के सभी संग्रहालयों को रखा गया। उसी समय अल्बर्ट म्यूजियम को राज्य स्तरीय केन्द्रीय संग्रहालय का रूप दिया गया।

    देशी राज्यों में संग्रहालयों की छवि अजायबघर वाली थी। स्वतंत्र भारत में उस छवि को मिटाकर इन्हें शैक्षणिक संस्थाओं का स्वरूप प्रदान किया गया तथा राज्य के संग्रहालयों को शिक्षा विभाग के अधीन किया गया। संग्रहालयों के पुनर्गठन, परिवर्तन और साज सज्जा सम्बन्धी महत्वपूर्ण कार्य किए गए तथा संगृहीत सामग्री का विधिवित वर्गीकरण किया गया।

    ई.1959 में राज्य के संग्रहालय विभाग के अधिकारी डा. सत्य प्रकाश जनसामान्य को संग्रहालयों की ओर आकृष्ट करने हेतु अमेरिका से नवीन दृष्टिकोण लेकर आए। उनके निर्देशन में संग्रहालय में राजस्थान की विभिन्न जातियों एवं जनजातियों के मॉडल प्रदर्शित किए गए। इनमें राजपूत, मीणा, वणिक, भील, गाड़िया लुहार आदि जातियों के व्यक्तियों की रूपाकृति, वेशभूषा, आभूषण, उनके परिवेश आदि का प्रदर्शन किया गया तथा उन्हें आधुनिक प्रकार के ‘शोकेस’ में रखा गया। देश में पहली बार जयपुर संग्रहालय में सांस्कृतिक कक्ष का निर्माण किया गया जिसमें विभिन्न प्रकार के शासकीय और लोक वाद्यों का प्रदर्शन किया गया। साथ ही होली, गणगौर तथा विवाह आदि के अवसर पर किए जाने वाले नृत्य तथा कत्थक आदि शास्त्रीय नृत्य एवं घूमर तथा डांडिया आदि लोक नृत्यों के दृश्य एवं ‘मॉडल’ प्रदर्शित किए गए। दर्शकों को नृत्यों से सम्बन्धित गीत एवं संगीत सुनाने के लिए स्वचालित ध्वनियंत्र लगाए गए। यह प्रयोग अपने आप में अनूठा था तथा उस समय तक किसी अन्य संग्रहालय में उपलब्ध नहीं था।

    ‘मॉडलों’ के माध्यम से देशी-विदेशी पर्यटक राजस्थान की जनजातियों तथा उनके सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन की जानकारी प्राप्त करने लगे। संग्रहालय में राजस्थान की हस्तकलाओं, पत्थर की कुराई, सोने एवं मीना का काम, हाथी दांत की कुराई, सुनहरी बर्तन, ऊँट के चमड़े के बर्तनों पर सुनहरी काम, पीतल की चिताई, थलाई एवं कुराई का काम, प्राचीन प्रतिमाओं, आयुधों एवं प्राचीन चित्रों के क्रमिक विकास को भी प्रदर्शित किया गया। प्रकाश व्यवस्था और शो केसों के नवीनीकरण एवं लेबलिंग की नवीन पद्धतियां प्रयोग में लाई गईं।

    संग्रहालय में अस्थाई प्रदर्शनियाँ आयोजित की जाने लगीं जिनसे देशी-विदेशी पर्यटकों को राजस्थान के कला-कौशल के बारे में जानने को मिला। तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू, उप राष्ट्रपति डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, इन्दिरा गांधी, अरब के राष्ट्रपति कर्नल नासिर, नेपाल नरेश, ईरान के शाह, बंगलादेश के सांस्कृतिक मंत्री तथा अनेक देशी-विदेशी अतिविशिष्ट व्यक्तियों ने अल्बर्ट संग्रहालय का भ्रमण किया और संग्रहालय के नवीन रूप की प्रशंसा की।

    संग्रहालय की नीचे की मंजिल में राजस्थान की सांस्कृतिक झांकी प्रस्तुत की गई तथा ऊपर की दीर्घा में दाईं तरफ देश के विभिन्न प्रान्तों का कला-कौशल प्रदर्शित किया गया। बीच के तीन बड़े हॉल में प्राचीन लघु चित्रों को प्रदर्शित किया गया जिनमें विभिन्न प्रकार की चित्र-शैलियों के चित्र उपलब्ध हैं। ऊपर की मंजिल में बाईं ओर की दीर्घा में भू-गर्भशाó, प्राणीशाó विज्ञान एवं शरीर विज्ञान सम्बन्धी मॉडल प्रदर्शित किए गए।

    वर्तमान में इस संग्रहालय में 24,930 कला एवं पुरा वस्तुएं प्रदर्शित हैं जिनमें से मिस्र की ममी अत्यंत महत्वपूर्ण वस्तुओं में से है। अल्बर्ट हॉल में देश-विदेश के महंगे एवं कलात्मक गलीचों का प्रदर्शन किया गया है। इस विशाल हॉल में सोलहवीं शताब्दी ईस्वी का ईरान का एक बहुमूल्य गलीचा भी प्रदर्शित है जिसमें ईरान के शाह अब्बास के उद्यान का दृश्य बुना गया है। यह गलीचा 28 फुट गुणा 12 फुट आकार का है तथा इसमें एक इंच में 250 गाठें हैं। दुनिया में ऐसे कुल छः गलीचे हैं। यह गलीचा मिर्जा राजा जयसिंह को ईरान के शाह द्वारा ई.1640 में भेंट किया गया था जो विश्व की अप्रतिम बहुमूल्य कला वस्तुओं में से एक है।

    संग्रहालय में तिब्बत एवं नेपाल से प्राप्त ताम्र सामग्री भी प्रदर्शित की गई है। राजस्थान के अनेक स्थलों से प्राप्त प्रतिमाएँ, इंग्लैण्ड के राजा-रानी के चित्र, जयपुर महाराजाओं के चित्र, मुगल पेंटिंग्स, कलात्मक हुक्का, ब्लू पॉटरी, सुराहियां, ढालें, विभिन्न प्रकार की हस्तकला सामग्री, अस्त्र-शस्त्र, तीर-कमान-भाले, बग्घियां, कठपुतलियां, लोकवाद्य, धातु पात्र, मृदभाण्ड, रियासत कालीन पोषाकें, मॉडल्स एवं सिक्के आदि प्रदर्शित किए गए हैं।

    संग्रहालय में प्रदर्शित ममी मिस्र के राजपरिवार के पुजारी परिवार की महिला तुतु की है। इसे 19वीं सदी के अंतिम दशक में मिस्र की राजधानी काहिरा से जयपुर लाया गया था। यह ममी मिस्र के प्राचीन नगर पैनोपोलिस में अखमीन से प्राप्त हुई थी। यह ई.पू.322 से ई.पू.200 के बीच की अवधि की है तथा टौलोमाइक युग की बताई जाती है। यह महिला ‘खेम’ नामक देव के उपासक पुरोहितों के परिवार की सदस्य थी। देह के ऊपरी आवरण पर प्राचीन मिस्र का पंखयुक्त पवित्र भृंग (गुबरैला) का प्रतीक अंकित है जो मृत्यु के बाद जीवन और पुनर्जन्म का प्रतीक माना जाता है। पवित्र भृंग के दोनों ओर प्रमुख देव का शीर्ष तथा सूर्य के गोले को पकड़े श्येन पक्षी (बाज) अंकित है। यह बाज होरस देवता का प्रतीक है। तुतु ने गर्दन से कमर तक चौड़े मोतियों से सज्जित परिधान कॉलर के रूप में पहन रखा है। तुतु की मृत देह की सुरक्षा के लिए पंखदार देवी का अंकन किया गया है।

    ममी के नीचे के तीन हिस्सों में से पहले में मृतदेह के दोनों ओर महिलाएं बनाई गई हैं। दूसरे हिस्से में पाताल लोक के निर्णायकों की तीन बैठी हुई छवियां हैं और तीसरे हिस्से में होरस देव के चार बेटे अंकित हैं जो चारों दिशाओं के रक्षक अर्थात् दिक्पाल हैं। इनके मुंह क्रमशः मानव, सियार, बंदर और बाज पक्षी के रूप में दर्शाए गए हैं। रक्षित मृतदेह के पार्श्व भाग में एक अभिलेख लिखा है जिसके अनुसार अनुबिस नेक्रोपोलिस के अधिष्ठाता देव हैं और ओसिरिस तुतु को पुनर्जन्म हेतु संरक्षण प्रदान करते हैं। अंतिम फलक में मृत आत्माओं के देवता ओसिरिस का शीर्ष अंकित है जिसके दोनों और दो विषधर नाग हैं। ओसिरिस स्थिरता और सुदृढ़ता का प्रतीक है और दोनों सांप आईसिस और नेफ्टीज नामक देवियों के प्रतीक हैं। यह फलक मृतदेह के संरक्षण एवं मृत्यु के बाद आत्माओं के पुनर्जीवन के लिए न्याय विधान का चित्रण करता है। ओसिरिस वाले फलक के नीचे का फलक पांवों के ऊपरी आवरण पर बना है। इस फलक में अनुबिस देवता मृतदेह को पकड़े हुए हैं तथा मृतदेह को औषधि के माध्यम से सुरक्षित रखने में सहायता करते हुए दिखाया गया है अनुबिस देवता की पहचान उसके सियार वाले मुंह से की जाती है यह श्मशान भूमि के देवता है जो मृतदेह का संरक्षण करता है और मृत आत्माओं को अपने पिता ओसिरिस के पास ले जाता है जो पाताल लोक का देवता है। इस लोक में मृत्यु के बाद जीवन के बारे में निर्णय होता है। मृत्यु शैय्या के नीचे पांच कुंडीय पात्र आंतों को एकत्रित करने के लिए अंकित है। यहीं चार प्रेतात्माओं की आकृतियां भी दिखाई गई हैं।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • युग निर्माता महाराजा सूरजमल- 4

     02.06.2020
    युग निर्माता महाराजा सूरजमल- 4

    महाराजा सूरजमल के जन्म की पृष्ठभूमि (2)


    सिनसिनी के जाट


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    उन दिनों सिनसिनी दुर्ग जाटों की शक्ति का मुख्य केन्द्र था। सिनसिनी के अधीन केवल तीस गांव थे किंतु यह दुर्ग घने जंगल और दलदल से घिरा हुआ था। चारों ओर पैंघोर, कार्साट, सोगर, अबार, सौंख, रायसीस और सोंखरे-सोंखरी के छोटे दुर्ग बने हुए थे। इन्हें जीते बिना सिनसिनी तक पहुंचना सम्भव नहीं था।

    ई.1688 में महाराजा बिशनसिंह ने सौंख गढ़ी पर घेरा डाला। उसे जीतने में चार महीने लग गये किंतु इसके बाद सिनसिनी तक पहुंचने का मार्ग खुल गया। बिशनसिंह के पास कच्छवाहों के अलावा मुगल सेना भी थी। उसने सिसिनी के चारों तरफ का जंगल कटवा डाला तथा 15 फरवरी 1690 को सिनसिनी पर अधिकार कर लिया। राजाराम का बेटा फतहसिंह और चूड़ामन किसी तरह जान बचाकर भाग गये। इस युद्ध में 900 मुगल सैनिक तथा 1500 जाट सैनिक मारे गये। इसके बाद 21 मई 1691 को बिशनसिंह ने सोघोर गढ़ैया को जा घेरा। उस दिन दुर्ग में धान पहुंचाया जा रहा था। इस कारण दुर्ग के द्वार खुले हुए थे। ठीक उसी समय बिशनसिंह ने वहाँ पहुंचकर दुर्ग को अपने अधिकार में ले लिया। जिसने भी हथियार उठाया, उसे वहीं मार डाला गया। दुर्ग में जीवित बचे 500 जाटों को बंदी बना लिया गया। सिनसिनी की पराजय के बाद जाटों में झगड़ा हुआ और राजाराम के पुत्र फतहसिंह को पराजय का जिम्मेदार ठहराया गया। जाटों ने फतहसिंह के स्थान पर राजाराम के छोटे भाई चूड़ामन को अपना नेता चुन लिया। ई.1704 में चूड़ामन ने सिनसिनी का दुर्ग पुनः जीत लिया किंतु ई.1705 में यह दुर्ग पुनः मुगलों के अधिकार में चला गया।

    सिनसिनी के जाट शासक, अपना सम्बन्ध यदुवंशी राजा मदनपाल से बताते हैं। मदनपाल तजनपाल का तीसरा पुत्र था जो ग्यारहवीं शताब्दी में बयाना का शासक था और बाद में करौली राज्य का संस्थापक था। मदनपाल के वंशज बालचंद की एक स्त्री जाट जाति की थी। इस स्त्री से दो पुत्र हुए जिनमें से एक का नाम विजय तथा दूसरे का नाम सिजय रखा गया। इन दोनों लड़कों को क्षत्रिय न मानकर जाट माना गया। इन दोनों लड़के अपनी जाति सिनसिनवार लिखते थे क्योंकि उनके पैतृक गांव का नाम सिनसिनी था। सिनसिनी डीग से 13 किलोमीटर दूर दक्षिण में है। भरतपुर के जाट शासक अपना सम्बन्ध इन्हीं सिनसिनवारों से मानते हैं।

    चूड़ामन का नेतृत्व

    राजाराम की मृत्यु के बाद चूड़ामन जाटों का नेता बना। ई.1707 में औरंगजेब की मृत्यु हो जाने के बाद चूड़ामन ने अपनी शक्ति बहुत बढ़ा ली और बादशाह जहांदारशाह के हाथियों और खजाने को लूट लिया। उसने थूण दुर्ग में अपनी शक्ति एकत्रित की और शाही खजानों, व्यापारिक कारवों तथा अन्य लोगों को लूटने लगा।

    औरंगजेब की मृत्यु होने पर उसके पुत्रों बहादुर शाह तथा आजमशाह में मुगलिया तख्त पर अधिकार को लेकर झगड़ा हुआ। दोनों पक्ष जाजऊ के मैदान में आमने-सामने लड़कर फैसला करने के लिये आ डटे। चूड़ामन ने भी अपनी सेनाएं, इन दोनों सेनाओं के पास ला टिकाईं। जब दोनों ओर से तोपें आग बरसा रही थीं तब लड़ाई के मैदान में अचानक अराजकता फैल गई और आजमशाह के सेनापति आत्म समर्पण करके बहादुरशाह की ओर जाने लगे। अतः चूड़ामन आजमशाह के शिविर पर टूट पड़ा और उसमें लूटमार करने लगा। थोड़ी देर में बहादुरशाह के तम्बू में आग लग गई और वहाँ भी अफरा-तफरी मच गई। इस पर चूड़ामन आजमशाह के शिविर को छोड़कर बहादुरशाह के शिविर पर टूट पड़ा और पराजित छावनी को बुरी तरह लूटा। इस प्रकार चूड़ामन ने दोनों पक्षों की हार-जीत से कोई मतलब न रखकर, उन्हें निष्पक्ष होकर लूटा। इस युद्ध में बहादुरशाह की जीत हुई। अतः चूड़ामन ने बहादुरशाह से मित्रता कर ली। बादशाह ने चूड़ामन को 1500 जात और 500 सवारों का मनसबदार बनाया। इस प्रकार चूड़ामन लुटेरा न रहकर मुगलों का मनसबदार बन गया।

    ई.1712 में जहांदारशाह मुगलों के तख्त पर बैठा। उसने चूड़ामन की मनसब समाप्त कर दी किंतु जब फर्रूखसीयर सिर उठाने लगा तो जहांदारशाह ने चूड़ामन को बुलाकर फिर से पुराना मनसब सौंप दिया। जब जहांदारशाह और फर्रूखसीयर की सेनाएं लड़ रही थीं तब चूड़ामन, जहांदारशाह की ओर से लड़ने के लिये युद्ध के मैदान में पहुंचा। जैसे ही जहांदारशाह की सेना भारी पड़ने लगी, चूड़ामन और उसके सैनिक लड़ाई करना छोड़कर फर्रूखसीयर का शिविर लूटने में लग गये। इससे फर्रूखसीयर को मौका मिल गया और उसने जहांदारशाह को परास्त कर दिया। जब फर्रूखसीयर दिल्ली के तख्त पर बैठा तब चूड़ामन उसके दरबार में उपस्थित हुआ ओर बादशाह को इक्कीस मोहरें तथा दो घोड़े प्रदान किये। बादशाह फर्रूखसीयर ने उसे राव बहादुर की उपाधि दी, एक हाथी दिया तथा मनसब का दर्जा बढ़ा दिया। साथ ही दिल्ली से चम्बल तक की राहदारी भी उसे सौंपी गई। चूड़ामन के राहदार के पद पर टिप्पणी करते हुए कानूनगो ने लिखा है- 'एक भेड़िये को भेड़ों के झुण्ड का रक्षक बना दिया गया।'

    चूड़ामन ने इतनी कठोरता से राहदारी वसूलनी आरम्भ की कि चारों ओर हा-हाकार मच गया। उसने थूण परगने के प्रत्येक मनसबदार तथा जागीरदार से दो रुपया प्रति मनसबदार तथा जमींदार से नजराना वसूलना आरम्भ कर दिया। अब वह जागीरदारों के मामलों में बेखटके हस्तक्षेप करने लगा। उसकी टोलियों ने मथुरा और सीकरी के परगनों के गांवों को लूटना आरम्भ कर दिया। चूड़ामन ने गुप्त रूप से अस्त्र-शस्त्र बनवाये और गढ़ियों को मजबूत कर लिया।

    सवाई जयसिंह की नियुक्ति

    जब चूड़ामन का आतंक बढ़ गया तब बादशाह फर्रूखसीयर ने जयपुर नरेश सवाई जयसिंह को विपुल धन एवं विशाल सेना देकर चूड़ामन के विरुद्ध भेजा। चूड़ामन बीस वर्ष की खाद्य सामग्री एकत्र करके थूण के दुर्ग में बंद हो गया। जब सवाई जयसिंह, कोटा के महाराव भीमसिंह तथा बूंदी के महाराव बुधसिंह को लेकर थूण के निकट पहुंचा तो चूड़ामन में दुर्ग में स्थित व्यापारियों से कहा कि वे अपना धन एवं सामग्री किले में छोड़कर किले से बाहर चले जायें। यदि युद्ध के बाद वह जीता तो उनके सामान की भरपाई कर देगा। व्यापारी बुरी तरह लुट-पिटकर किले से बाहर निकल गये।

    कच्छवाहा राजा सवाई जयसिंह, हाड़ा राजा महाराव भीमसिंह तथा हाड़ा राजा महाराव बुधसिंह की सेनाएं सात माह तक थूण का दुर्ग घेरे रहीं किंतु चूड़ामन को किले से बाहर नहीं निकाल सकीं। इस पर मुगल साम्राज्य की पूरी ताकत थूण के विरुद्ध झौंक दी गई तथा थूण के चारों ओर का जंगल काटकर साफ कर दिया गया। इस प्रकार दो वर्ष बीत गये और इस अभियान पर मुगल बादशाह के दो करोड़ रुपये खर्च हो गये। अंत में ई.1718 में दोनों पक्षों (जाटों और मुगलों) में समझौता हुआ। इस समझौते से महारा जयसिंह को दूर रखा गया। इस समझौते के अनुसार चूड़ामन को क्षमा कर दिया गया और उसे अनी पत्नी, पुत्र तथा भतीजों सहित मुगल दरबार में उपस्थित होने के लिये कहा गया। डीग तथा थूण के किलों को नष्ट करने की आज्ञा दी गई और चूड़ामन को मुगलों की नौकरी में रख लिया गया।

    जब कुछ समय बाद फर्रूखसीयर को गद्दी से उतारा गया तो चूड़ामन ने सैयद बंधुओं का साथ दिया। जब सैयद बंधुओं ने बादशाह का महल घेर लिया तब किले तथा महल की सारी चाबियां चूड़ामन ने ले लीं ओर बादशाह को अंधा करके कैद में डाल दिया गया। फर्रूखसीयर के बाद रफीउद्दरजात को तख्त पर बैठाया गया। इस पर शहजादे नेकूसीयर ने विद्रोह कर दिया। इस पर चूड़ामन नेकूसीयर के पास गया और उसने गंगाजल हाथ में उठाकर कसम खाई कि नेकूसीयर को सुरक्षित रूप से जयपुर नरेश के राज्य में पहुंचा देगा। नेकूसीयर पचास लाख रुपये तथा अपने भतीजे मिर्जा असगरी को साथ लेकर चूड़ामन के साथ चल पड़ा। चूड़ामन ने नेकूसीयर को तो रफीउद्दरजात को सौंप दिया तथा रुपये अपने पास रख लिये।

    इस प्रकार चूड़ामन ने अन्य कई अवसरों पर भी बहुत से व्यक्तियों के साथ विश्वासघात किया तथा उन्हें लूट-खसोट कर दुर्भाग्य के हवाले कर दिया। उसने जाटों के विख्यात नेता एवं अपने भतीजे बदनसिंह को बंदी बना लिया। चूड़ामन के इस कुकृत्य से समस्त जाट, चूड़ामन से नाराज हो गये और वे चूड़ामन का साथ छोड़कर बदनसिंह के साथ हो लिये। चूड़ामन के लड़के चूड़ामन से भी अधिक धूर्त्त निकले। उसके पुत्र मोहकमसिंह ने अपने किसी सम्बन्धी की काफी बड़ी सम्पत्ति पर अधिकार कर लिया। इस सम्पत्ति में चूड़ामन के दूसरे पुत्र जुलकरण ने भी हिस्सा मांगा। इस बात पर दोनों भाइयों में झगड़ा हो गया तथा दोनों एक दूसरे को मारने के लिये तैयार हो गये। इस पर चूड़ामन ने मोहकमसिंह से कहा कि वह जुलकरण को कुछ सम्पत्ति दे दे। इस पर मोहकमसिंह चूड़ामन को भी मारने के लिये तैयार हो गया। इस पर चूड़ामन ने दुःखी होकर जहर खा लिया।

    मोहकमसिंह का नेतृत्व

    चूड़ामन के मरते ही मोहकमसिंह ने स्वयं को जाटों का नेता घोषित कर दिया और स्वर्गीय ब्रजराज के पुत्र बदनसिंह को बंदी बनाकर खोह नामक स्थान पर कारागार में डाल दिया। बाद में जाटों ने मोहकमसिंह के गुरु माखनदास बैरागी से कहकर बदनसिंह को छुड़वाया। बदनसिंह जयपुर नरेश सवाई जयसिंह के पास चला गया। मोहकमसिंह ने मुगल बादशाह को भी अपने विरुद्ध कर लिया। इससे जयसिंह ने मोहकमसिंह को थूण के किले में जा घेरा। मोहकमसिंह प्रबल शत्रु को सम्मुख आया देखकर स्वयं ही गढ़ी में बारूदी सुरंगें बिछाकर और उनमें पलीता दिखाकर गढ़ से भाग गया। बदनसिंह के माध्यम से जयसिंह को इस बात का पता लग गया। अतः महाराजा सवाई जयसिंह, थूण गढ़ से दूर चला गया और उसके प्राण बच गये।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • अध्याय-32 भारत का मध्य-कालीन भक्ति आंदोलन

     02.06.2020
    अध्याय-32 भारत का मध्य-कालीन भक्ति आंदोलन

    भारत का मध्य-कालीन भक्ति आंदोलन


    यह बात अत्यन्त उपहासास्पद है कि जब मुसलमान उत्तर भारत के मन्दिर तोड़ रहे थे तब उसी समय अपेक्षाकृत निरापद दक्षिण में भक्तों ने भगवान की शरणागति की प्रार्थना की। मुसलमानों के अत्याचार से यदि भक्ति की धारा को उमड़ना था तो पहले उसे सिन्ध में, फिर उत्तरभारत में, प्रकट होना चाहिए था, पर हुई वह दक्षिण में। - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी।


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    भगवद्-भक्ति की अवधारणा आर्यों के प्रथम ग्रंथ ऋग्वेद में ईश्वर की स्तुतियां लिखी गई थीं। इस प्रकार भक्ति की अवधारणा का बीज वेदों में उपलब्ध था जो उपनिषद काल में हरे-भरे पौधे में बदलने लगा। बादरायण के ब्रह्मसूत्र ने इस कार्य को भलीभंाति आगे बढ़ाया। श्रीमद्भगवतगीता ने भक्ति रूपी पौधे को वैचारिक एवं दार्शनिक खाद-पानी देकर विशाल वटवृक्ष बन जाने का अवसर प्रदान किया। भगवद्गीता में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश देते हुए कहा है- 'सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकम् शरणम् व्रज।' अर्थात् सब धर्मों को छोड़कर मेेरी शरण में आ। अर्थात् मेरी भक्ति कर। गीता के बारहवें अध्याय में भक्ति का अत्यन्त सौम्य निरूपण किया गया है।

    छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व में बौद्धों तथा जैनियों के धार्मिक आंदोलनों के उठ खड़े होने से भक्ति रूपी वृक्ष कूछ सूखने लगा किंतु शुंग, कण्व, सातवाहन तथा गुप्त शासकों के काल में भक्ति रूपी इस वृक्ष का फिर से उद्धार हुआ। यही कारण था कि शुंग काल (ई.पू.184-ई.पू.72) से लेकर गुप्त काल (ई.320-495) तक विविध धार्मिक साहित्य की रचना हुई और भक्ति रूपी विशाल वटवृक्ष फिर से पूरे उत्साह के साथ लहराने लगा। शुंगकाल में सूत्र-ग्रंथों एवं स्मृतियों की रचना हुई जबकि गुप्तकाल में विविध पुराणों को लिखा गया जो मूल रूप से भक्ति-ग्रंथ हैं और विष्णु एवं उसके विविध रूपों अर्थात् भगवान एवं उसके अवतारों की भक्ति का उपदेश देते हैं।

    भागवत पुराण के अनुसार भगवान को पूर्ण आत्मसमर्पण करके हम ब्रह्म को आनन्दमय अवस्था में प्राप्त कर सकते हैं। विभिन्न पुराणों के माध्यम से भगवत्-भक्ति के विशाल वटवृक्ष पर वैष्णव धर्म की विविध शाखाओं ने आकार लिया। पौराणिक धर्म अथवा वैष्णव धर्म के जन्म एवं विकास की चर्चा हम 'पौराणिक धर्म अथवा वैष्णव धर्म का उदय एवं विकास' नामक अध्याय में विस्तार से कर चुके हैं।

    पुरुगुप्त से लेकर विष्णुगुप्त तक (ई.467-550) के परवर्ती-गुप्त शासकों ने पुनः बौद्ध धर्म को आश्रय दिया जिससे भक्ति-धर्म का पौधा एक बार फिर मुरझाने लगा। आठवीं शताब्दी ईस्वी में शंकराचार्य ने बौद्धों के मत का खण्डन करके ब्रह्म को जगत् का आधार बताया तथा 'भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्, गोविन्दम् भज मूढ़मते' का उद्घोष करके उन्होंने भक्ति के अवरुद्ध प्रवाह को पुनः खोल दिया।

    चूंकि शंकराचार्य का 'ब्रह्म' भक्तों की करुण-पुकार सुनने के लिए उपलब्ध नहीं था इसलिए शंकराचार्य के बाद के लगभग सभी आचार्यों ने शंकराचार्य के अद्वैतमत का खण्डन एवं मण्डन करके भक्ति को ज्ञान की काराओं से मुक्त कर दिया। शंकराचार्य के बाद दक्षिण भारत में 'सगुण वैष्णव-भक्ति' की धारा प्रकट हुई। वेदों से लेकर, उपनिषदों, सूत्र ग्रंथों, स्मृतियों, पुराणों आदि में भक्ति के जितने भी सिद्धांत एवं स्वरूप प्रस्तुत किए गए थे, आलवार एवं नयनार संतों ने उन सिद्धांतों को लोकभाषा में गीत लिखकर भगवत्-भक्ति को सहज रूप से जन-सामान्य के लिए उपलब्ध करा दिया। उन्होंने भक्ति का अत्यंत सरस स्वरूप तैयार किया जिसकी दार्शनिक भावभूमि अत्यंत उच्च कोटि की थी।

    यद्यपि आलवार एवं नयनार संतों का यह काल लगभग आठ सौ से नौ सौ वर्ष लम्बा है। ये संत कम शिक्षित थे और साधारण जीवन व्यतीत करते थे। इनकी संख्या तय करना कठिन है। आलवार सन्तों ने भगवान विष्णु को अराध्य देव मानकर गीतों और भजनों के माध्यम से भक्ति की धारा प्रवाहित की तो नयनार संतों ने शिव की उपासना का मार्ग प्रस्तुत किया। नयनार संत भगवान शिव को प्रेमपात्री के रूप में तथा स्वयं को प्रेमी के रूप में प्रदर्शित करते हुए गम्भीर भक्तिमय उद्गार प्रकट करते थे।

    इस प्रकार दक्षिण से आई भक्ति की फुहारों का सहारा पाकर ग्यारहवीं शताब्दी के आसपास हिन्दू-धर्मरूपी वटवृक्ष फिर से लहलहा उठा। भक्ति रूपी यह विशाल वटवृक्ष आज भी पूरी ऊर्जा के साथ खड़ा है और मनुष्य मात्र को शीतल छाया प्रदान कर रहा है।

    भक्ति आन्दोलन के पुनरुद्धार के कारण

    दिल्ली सल्तनत काल (ई.1206-1526) में, हिन्दू-धर्म को इस्लाम से बचाने के लिए भारत भूमि पर भक्ति आंदोलन का पुनरुद्धार हुआ। भक्ति आंदोलन तब तक वेगवती नदी के समान प्रवाहरत रहा जब तक कि पंद्रहवीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत कमजोर न पड़ गई। इस भक्ति आंदोलन के प्रभाव से हिन्दुओं को नवीन मनोबल प्राप्त हुआ तथा भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्रांतीय राज्यों का उदय हुआ। इनमें से अनेक राज्य हिन्दू राजपूतों द्वारा शासित थे। उनके सरंक्षण में हिन्दू-धर्म के भीतर भक्ति आंदोलन अपने चरम को पहुँच गया। भक्ति आन्दोलन के पुनरुद्धार के निम्नलिखित कारण प्रतीत होते हैं-

    (1.) राष्ट्रीय आवश्यकता: भारत में जिस समय दिल्ली सल्तनत की स्थापना हुई, उस समय देश में प्रचलित वैष्णव धर्म, शैव धर्म, शाक्त धर्म, बौद्ध धर्म तथा जैन-धर्म तो उपस्थित थे ही, साथ ही इन धर्मों के भीतर भी बड़ी संख्या में मत-मतांतर एवं सम्प्रदाय बने हुए थे। राजाओं-महाराजाओं एवं साधु-संतों से लेकर साधारण प्रजा तक दिग्भ्रमित होकर इन सम्प्रदायों में टूटी और बिखरी हुई थी। प्रत्येक सम्प्रदाय स्वयं को ही सर्वश्रेष्ठ एवं एकमात्र सत्य घोषित करता था तथा दूसरे सम्प्रदाय को पूरी तरह नकारता था।

    ऐसी स्थिति में भारत भूमि पर जब इस्लाम का आक्रमण हुआ तो इन सम्प्रदायों को एक ही दार्शनिक भावभूमि में पिरोकर एक सर्व-स्वीकार्य धर्म की छतरी के नीचे लाने की आवश्यकता हुई। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो खण्ड-खण्ड हुआ हिन्दू-धर्म इस्लाम की चपेट खाकर पूरी तरह से नष्ट हो जाता। इस काल में बौद्ध धर्म नष्ट-प्रायः था तथा जैन-धर्म का प्रभाव अत्यंत सीमित था किंतु हिन्दू-धर्म के विभिन्न सम्प्रदायों को समेट कर एक करने की आवश्यकता थी।

    शंकर के अद्वैतवाद और मायावाद, हिन्दुओं को इस्लाम के समक्ष टिकाए रखने में समर्थ नहीं थे। इसलिए हिन्दू-धर्म को ऐसे दार्शनिक आधार की आवश्यकता थी जो भगवान के सर्व-सामर्थ्यवान एवं भक्त-वत्सल होने का भरोसा दे सके ताकि लोग अपने धर्म की श्रेष्ठता में विश्वास करें और विदेशी धर्म को स्वीकार नहीं करें।

    (2.) हारे को हरि नाम: मुस्लिम शासन काल में हिन्दू किसानों पर समस्त कर लाद दिए गए तथा मुसलमान बनने वाले किसानों के कर माफ कर दिए गए। इसी प्रकार हिन्दुओं के लिए राजकीय सेवा के द्वार बंद कर दिए गए थे किंतु मुसलमान बनने वालों को राजकीय सेवा में रखा जाता था और उन्हें सम्मानित किया जाता था। जब हिन्दुओं का पेट भरना कठिन हो गया तो वे स्वतः ही मुसलमान बनने लगे। बहुत से लोग ऐसे भी थे जो मरना पंसद करते थे किंतु मुसलमान नहीं बनते थे।

    ऐसे लोगों ने हारे को हरिनाम कहावत को सार्थक करते हुए ईश्-भक्ति का सहारा लिया। बर्नीयर ने तारीखे फीरोजशाही में लिखा है- 'हिन्दुओं के पास धन अर्जित करने के साधन नहीं रह गये थे। उनमें से अधिकांश को निर्धनता एवं अभावों का जीवन-यापन करते हुए अजीविका के लिये निरंतर संघर्ष करना पड़ता था। हिन्दू प्रजा के रहन-सहन का स्तर अत्यंत निम्न कोटि का था। करों का समस्त भार उन्हीं पर था। राज्य पद उनको अप्राप्य थे। अल्लाउद्दीन खिलजी ने दोआब के हिन्दुओं से उपज का 50 प्रतिशत भाग बड़ी कठोरता से उगाहा था।'

    इन विकट परिस्थतियों में हिन्दुओं में हारे को हरिनाम अर्थात् परास्त एवं कमजोर व्यक्ति का आसरा स्वयं परमेश्वर है, की भावना ने जन्म लिया तथा हिन्दुओं ने अपने कष्टों को कम करने के लिये ईश्वर की शरण में जाने का मार्ग पकड़ा। फलतः सल्तनत काल में हिन्दू-धर्म में भक्ति आंदोलन का पुनरुद्धार हुआ।

    (3.) क्रियात्मक शक्ति के नियोजन की आवश्यकता: जब हिन्दुओं को बड़ी संख्या में राजकीय सेवाओं से निकाल दिया गया, उनकी खेती बाड़ी चौपट हो गई, खेत एवं घर मुसलमानों द्वारा छीन लिये गये, उन्हें सम्पत्ति कमाने तथा रखने के अधिकारों से वंचित कर दिया गया तब हिन्दुओं के पास अपनी क्रियात्मक शक्ति को नियोजित करने का कोई माध्यम नहीं रहा। ऐसी स्थिति में संकटापन्न एवं विपन्न हिन्दुओं ने स्वयं को भगवद्-भक्ति में नियोजित किया। इस प्रकार भक्ति भावना की अपार धारा प्रवाहित हो चली।

    (4.) सबके लिये सुलभ मार्ग की आवश्यकता: मुस्लिम शासन काल में हिन्दू-धर्म के बाह्याडम्बरों एवं जाति प्रथा से तंग आकर बहुत से हिन्दू स्वेच्छा से मुसलमान बनने लगे। तब हिन्दू-धर्म-सुधारकों ने इस बात को अनुभव किया कि हिन्दू-धर्म को सब लोगों के लिये सुगम बनाना होगा ताकि लोग इसे छोड़कर अन्य धर्म न अपनायें। इसलिये ईश्वर की सरल भक्ति का मार्ग विस्तारित किया गया जो सबके लिये सुलभ थी और सबको बराबर स्थान देती थी।

    (5.) पराधीनता के कष्टों को भूलने का साधन: दिल्ली सल्तनत के शासकों द्वारा हिन्दुओं को आभूषण पहनने, घोड़े पर चढ़ने, राजकीय सेवा करने, सम्पत्ति रखने आदि अधिकारों से वंचित कर दिया गया था। यह पराधीनता उन्हें सालती थी। भक्ति-मार्ग उनकी पराधीनता के विस्मरण का अच्छा साधन सिद्ध हुआ। ईश्वर की प्राप्ति तथा मोक्ष को सर्वप्रधान मानकर यह प्रचारित किया जाने लगा कि ईश्वर की प्राप्ति केवल ईश्वर की दया एवं भक्ति से हो सकती है।

    (6.) परस्पर सहयोग की आवश्यकता: मनुष्य सामाजिक प्राणी है, साथ-साथ रहने से उसे एक-दूसरे के सहयोग की आवश्यकता पड़ती है। यह तभी संभव है जब समाज में कटुता नहीं हो। भगवद्-भक्ति का आधार भी समस्त प्राणियों को ईश्वर की संतान मानकर उनसे प्रेम करने की प्रेरणा ही है। इस भावना को निरंतर विस्तारित करने की आवश्यकता थी, इसलिये भक्ति आंदोलन निरंतर आगे बढ़ता रहा।

    मध्य-युगीन भक्ति सम्प्रदायों की विशेषताएँ

    मध्य-युगीन भक्ति आन्दोलन के प्रवर्तकों ने जिस भक्ति पर जोर दिया, उसका स्वरूप सरल एवं पवित्र था। उसका कोई पुरोहित तथा कर्मकाण्ड नहीं था। भक्ति आन्दोलन के प्रवर्तकों ने हिन्दू-धर्म के आडम्बरों तथा जटिलताओं को दूर करके उसे सरल तथा स्पष्ट बनाने के प्रयास किए। इन लोगों ने एकेश्वरवाद एवं अवतारवाद का सहारा लिया तथा ईश्वर की भक्ति विष्णु तथा उनके अवतारों अर्थात् राम एवं कृष्ण के रूप में की गई। हिन्दू-धर्म सुधारकों का विश्वास था कि मोक्ष केवल ईश्वर की कृपा से प्राप्त हो सकता है।

    भक्ति-मार्गी सुधारकों ने 'नाम' तथा 'गुरु' की महत्ता पर बल दिया। उनके उपदेशों में 'समर्पण' की प्रधानता है तथा 'अहंकार' का अभाव है। इन सन्तों में से कुछ मूर्तिपूजक थे जबकि कुछ मूर्ति-पूजा को निरर्थक मानते थे परन्तु समस्त संतों ने एक स्वर से जाति-पाँति का विरोध किया तथा प्रत्येक व्यक्ति के लिए भक्ति के माध्यम से मोक्ष प्राप्ति का मार्ग सुझाया।

    कुछ संतों ने भक्ति के साथ-साथ प्रपत्ति एवं शरणागति का मार्ग भी सुझाया। समस्त संतों की मान्यता थी कि ईश्वर किसी स्थान विशेष में नहीं रहकर कण-कण में समाया हुआ है तथा प्रत्येक प्राणी के भीतर निवास करता है। ईश्वर को भक्ति से प्रसन्न एवं अपने वश में किया जा सकता है। प्रायः प्रत्येक संत ने साधक के लिए सच्चे गुरु का होना आवश्यक माना। भक्तिमार्गी सन्तों ने अपने दार्शनिक ग्रंथों की भाषा संस्कृत रखी किंतु उपदेशों एवं भजनों के लिए हिन्दी एवं लोकभाषा को स्वीकार किया।

    भक्ति आन्दोलन की प्रमुख धाराएँ

    श्रीमद्भगवत्गीता में मोक्ष प्राप्ति के तीन मार्ग बताये गये हैं- ज्ञान, कर्म एवं भक्ति। इनमें से ज्ञान-मार्ग सर्वाधिक कठिन और भक्ति-मार्ग सर्वाधिक सरल है। भक्ति अपने उपास्यदेव के प्रति भक्त की अपार श्रद्धा तथा असीम प्रेम है। भक्ति करने से भक्त को ईश्वर का प्रसाद अर्थात् विशेष कृपा प्राप्त होती है जिससे मोक्ष मिलता है। ईश्वर भक्ति के तीन प्रधान मार्गों- ज्ञान, प्रेम तथा उपासना को आधार बनाकर भक्ति की तीन धाराएं प्रवाहित हुईं- ज्ञान-मार्गी धारा, प्रेम-मार्गी धारा तथा भक्ति-मार्गी धारा।

    ज्ञान-मार्गी धारा

    ज्ञान-मार्गी धारा के संतों ने हिन्दुओं तथा मुसलमानों के बाह्याडम्बरों तथा मिथ्याचारों की आलोचना करके दोनों को एक दूसरे के निकट लाने का प्रयत्न किया। इस धाारा के प्रधान प्रवर्तक कबीर थे। वे एकेश्वरवादी तथा निर्गुण-निराकार ब्रह्म के उपासक थे। उन्होंने नाम तथा गुरु दोनों की महत्ता को स्वीकार किया।

    प्रेम-मार्गी धारा

    प्रेम-मार्गी धारा के सन्तों ने ईश्वर के विभिन्न रूपों से प्रेम करने का मार्ग अपनाया। इन सन्तों ने ईश्वर को स्वामी, पिता, पति एवं सखा आदि सम्बन्धों से स्वीकार किया तथा उसी भाव से उन्हें भजने का मार्ग पुष्ट किया। तुलसी के लिए वे स्वामी थे, सूर के लिए सखा थे, मीरां के लिए पति थे और नामदेव के लिए वे पिता थे। प्रेम-मार्गी भक्तों की हरिदासी आदि धाराओं के संतों ने स्वयं को अपने उपास्य देव की प्रेयसी घोषित किया।

    भक्ति-मार्गी धारा

    भक्ति-मार्गी धारा के सन्त अपने इष्टदेव की पूजा तथा उपासना में लीन रहते थे। वे ईश्-भजन को जीवात्मा के कल्याण का सर्वोत्तम उपाय मानते थे। भक्ति-मार्गी सन्तों को राज-दरबार के ऐश्वर्य के प्रति कोई आकर्षण नहीं था। इन सन्तों ने विष्णु एवं उनके अवतारों राम तथा कृष्ण के सगुण-साकार स्वरूप की भक्ति की। वे दुर्गा, लक्ष्मी एवं सरस्वती आदि ईश्वरीय शक्तियों की भी उपासना करते थे। इन सन्तों ने अपने कर्मों तथा गुणों की अपेक्षा भगवत् कृपा को अधिक महत्व दिया।

    इस युग के संतों ने जिस धार्मिक धारा का आह्वान किया वह पूर्णतः आस्तिक थी, वेदों की सर्वोच्चता में विश्वास रखती थी एवं श्रीराम और श्रीकृष्ण को वैदिक देवता 'विष्णु' का अवतार मानती थी। भक्ति-मार्गी सन्तों की दो धाराएं हैं- राम-भक्ति धारा एवं कृष्ण-भक्ति धारा-

    (1.) राम-भक्ति धारा: राम-भक्ति धारा के सन्तों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी अतिशय विनयशीलता तथा मर्यादाशीलता है। रामानुजाचार्य, रामानंदाचार्य तथा तुलसीदास, राम-भक्ति मार्गी सन्त थे। इन सन्तों ने विभिन्न मत-मतान्तरों, उपासना-पद्धतियों तथा विचार-धाराओं में समन्वय स्थापित किया तथा हिन्दू जाति को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया।

    (2.) कृष्ण-भक्ति धारा: कृष्ण-भक्ति धारा के सन्तों ने श्रीकृष्ण की विविध लीलाओं का गुणगान किया और श्रीकृष्ण की उपासना पर बल दिया। निम्बार्काचार्य, चैतन्यमहाप्रभु तथा सूरदास, मीराबाई आदि कृष्ण-भक्ति मार्गी सन्त थे।

    मध्य-युगीन भक्ति सम्प्रदाय

    मध्य-युगीन भक्ति सम्प्रदायों में रामानुजाचार्य का श्री सम्प्रदाय, विष्णु गोस्वामी का रुद्र सम्प्रदाय, निम्बार्काचार्य का निम्बार्क सम्प्रदाय, माधवाचार्य का द्वैतवादी माध्व सम्प्रदाय, रामानंद का विशिष्टाद्वैतवादी रामानन्द सम्प्रदाय, वल्लभाचार्य का शुद्धाद्वैतवादी पुष्टि सम्प्रदाय, चैतन्य महाप्रभु का गौड़ीय सम्प्रदाय अथवा चैतन्य सम्प्रदाय, हितहरिवंश का राधावल्लभी सम्प्रदाय तथा हरिदासी सम्प्रदाय महत्वपूर्ण हैं।


    भक्ति मार्गी सन्त

    रामानुजाचार्य

    ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी से भारत में वैष्णव आचार्यों की एक नवीन परम्परा आरम्भ हुई। इस परम्परा में आलवार संत यमुनाचार्य के प्रधान शिष्य रामानुजाचार्य (ई.1016-1137) को विशेष सफलता प्राप्त हुई। रामानुजाचार्य को मध्ययुगीन भक्ति आन्दोलन का जन्मदाता कहा जाता है। उनका जन्म ई.1016 में श्रीरंगम् के आचार्य परिवार में हुआ था। प्रारम्भिक शिक्षा के बाद उन्हें कांजीवरम् के यादव प्रकाश के पास वेदान्त की शिक्षा के लिए भेजा गया। वेद की ऋचाओं के अर्थ निकालने में उनका अपने गुरु से मतभेद हो गया और उन्होंने स्वतन्त्र रूप से अपने विचारों का प्रचार आरम्भ किया।

    कुछ दिनों तक गृहस्थ जीवन बिताने के बाद उन्होंने सन्यास ले लिया। उन्होंने दक्षिण तथा उत्तर भारत के धार्मिक स्थानों का भ्रमण किया तथा विभिन्न धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन किया। उन्होंने अपने विचारों की पुष्टि के लिए पाँच ग्रन्थों की रचना की-(1.) वेदान्त सारम् (2.) वेदान्त संग्रहम्, (3.) वेदान्त दीपक, (4.) भगवद्गीता की टीका और (5.) ब्रह्मसूत्र की टीका जो 'श्रीभाष्य' के नाम से प्रसिद्ध है। रामानुजाचार्य ने 120 वर्ष के दीर्घ आयुकाल में 'श्री सम्प्रदाय' की स्थापना की तथा शंकर के 'अद्वैतवाद' एवं 'मायावाद' का खण्डन करके 'विशिष्टाद्वैत दर्शन' का प्रतिपादन किया।

    शंकर का ब्रह्म शुद्ध, बुद्ध और निराकार था। उसका मनुष्य से कोई सीधा सम्पर्क नहीं है। साधारण मनुष्य उसकी कल्पना भी नहीं कर पाता था। इसी ब्रह्म में ईश्वरत्व का आरोपण कर रामानुज ने उसे साधारण मनुष्य की बुद्धि की पकड़ में लाने का प्रयास किया। रामानुज ने ईश्वर, जगत् और जीव, तीनों को सत्य, नित्य और अनादि माना तथा जीव और जगत् को अनिवार्य रूप से ईश्वर पर आश्रित माना। रामानुज का ईश्वर सगुण, सर्वगुण सम्पन्न, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और सर्वत्र है। वह इस सृष्टि का निर्माता है और उसकी रचना सीमित अर्थ में सृष्टि से अलग है। ईश एवं सृष्टि का यही द्वैध, भक्ति के सिद्धान्त का आधार है।

    भक्ति के माध्यम से जीव ईश्वर से प्रत्यक्ष सम्बन्ध स्थापित कर सकता है। रामानुजाचार्य को 'शेष' अर्थात् लक्ष्मण का अवतार माना जाता है। उनके शिष्यों की मान्यता है कि शेष ही राम के साथ लक्ष्मण के रूप में तथा श्रीकृष्ण के साथ बलराम के रूप में अवतरित हुए तथा कलियुग में उन्होंने रामानुज के रूप में अवतार लेकर विष्णु-धर्म की रक्षा की। रामानुज ने विष्णु एवं लक्ष्मी को एक ही घोषित किया तथा उनकी सगुण भक्ति के माध्यम से मोक्ष प्राप्ति का मार्ग सुझाया। वे ईश्वर को प्रेम तथा सौन्दर्य के रूप में मानते थे।

    उनका मानना था कि विष्णु सर्वेश्वर हैं। वे मनुष्य पर दया करके इस पृथ्वी पर मनुष्य रूप में अवतार लेते हैं। रामानुज 'राम' को विष्णु का अवतार मानते थे और राम की पूजा पर जोर देते थे। उनका कहना था कि पूजा तथा भक्ति से मोक्ष प्राप्त हो सकता है। रामानुज के प्रयासों से, सगुणोपासना करने वाले वैष्णव धर्म को सम्पूर्ण दक्षिण भारत में लोकप्रियता प्राप्त हुई एवं जनसाधारण तेजी से इस ओर आकर्षित होने लगा। उन्हें न केवल अपने धर्म की श्रेष्ठता में विश्वास हुआ अपितु भगवान के भक्त-वत्सल होने तथा भगवान द्वारा भक्तों की रक्षा करने के लिए दौड़कर चले आने में भी विश्वास हुआ।

    रामानुज ने भक्ति के साथ-साथ 'प्रपत्ति' का मार्ग भी सुझाया। मोक्ष प्राप्ति के लिए यह मार्ग सबसे सरल है, क्योंकि इसमें ज्ञान, विद्याभ्यास तथा योग साधना की आवश्यकता नहीं है। ईश्वर में पूर्ण विश्वास करके स्वयं को उसके प्रति पूर्ण रूप से समर्पित कर देना ही 'प्रपत्ति' है। ईश्वर प्राप्ति का यह मार्ग समस्त मनुष्यों के लिए खुला था। इससे लाखों शूद्रों और अन्त्यजों के लिए भी हिन्दू-धर्म में बने रहने के लिए नवीन आशा का संचार हुआ। अब उन्हें धार्मिक तथा आध्यात्मिक सन्तोष के लिए दूसरा मार्ग ढूँढने की आवश्यकता न रही।

    माधवाचार्य (मध्वाचार्य)

    दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य में माधवाचार्य (ई.1197-1278) वैष्णव परम्परा के बड़े आचार्य हुए। उनका जन्म ई.1197 मंे कन्नड़ जिले के उडिपी नगर के ब्राह्मण परिवार में हुआ था। अपनी शारीरिक शक्ति के कारण वे भीम समझे जाते थे। उन्होंने युवावस्था में ही सन्यास ले लिया। वे भी रामानुज की भांति विष्णु के उपासक थे। उन्हें आनंदतीर्थ भी कहा जाता है तथा वायुदेव का अवतार माना जाता है।

    उन्होंने शंकर के अद्वैतवाद का खण्डन करके वैष्णव-भक्ति परम्परा में 'द्वैतवाद' के सिद्धांत का प्रतिपादन किया जिसके अनुसार ब्रह्म, जीव एवं माया तीनों के पृथक् अस्तित्व हैं और तीनों ही अक्षर हैं अर्थात् इनका कभी क्षरण नहीं होता। उन्होंने वेदान्त के निर्गुण ब्रह्म के स्थान पर 'विष्णु' की प्रतिष्ठा की। मध्वाचार्य में वाद-विवाद करने की अद्भुत योग्यता थी। अपने विचारों की पुष्टि के लिए उन्होंने देश के विभिन्न भागों का भ्रमण किया और अनेक विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित किया। मध्वाचार्य का 'द्वैतवाद' का सिद्धान्त रामानुज के 'विशिष्टाद्वैत' के सिद्धान्त से काफी मिलता-जुलता है।

    दोनों ईश्वर की भक्ति में विश्वास रखते हैं और विष्णु को ही ईश्वर मानते हैं। अन्तर केवल इतना ही है कि रामानुज ने ईश्वर, जगत् और जीव, तीनों को सत्य, नित्य और अनादि माना तथा जीव और जगत् को अनिवार्य रूप से ईश्वर पर आश्रित माना। अर्थात् इनमें विशिष्ट प्रकार का द्वैत है। जबकि मध्वाचार्य जीव और जगत् को ईश्वर से सर्वथा भिन्न मानते हैं। मध्वाचार्य के विचार से अन्य समस्त तत्त्व ईश्वर से भिन्न होते हुए भी उस पर आधारित हैं। केवल ईश्वर की ही अपनी स्वतन्त्र सत्ता है।

    मध्वाचार्य का ईश्वर सर्वगुणसम्पन्न है और उसका सम्पूर्ण ज्ञान मानव की शक्ति एवं समझ से परे है। ज्ञान द्वारा ईश्वर की प्राप्ति सम्भव नहीं हो सकती। ईश्वर की प्राप्ति केवल भक्ति से हो सकती है। इसके लिए निष्काम कर्म, योग्य गुरु का मार्गदर्शन और ईश्वर की उपासना आवश्यक है। उनके विचार में मनुष्य का अन्तिम लक्ष्य 'हरि-दर्शन' प्राप्त करना है। हरि-दर्शन से मोक्ष प्राप्त हो जाता है।

    निम्बार्काचार्य

    रामानुज तथा माधवाचार्य के बाद निम्बार्क स्वामी ने बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी में वैष्णव धर्म को नवीन गति दी। उनका जन्म मद्रास प्रान्त के वेलारी जिले में हुआ था। वे रामानुज के समकालीन थे। रामानुज की भांति निम्बार्क ने भी शंकाराचार्य के अद्वैतवाद का खण्डन किया किंतु निम्बाकाचार्य मध्यम मार्गी थे। वे द्वैतवाद तथा अद्वैतवाद दोनों में विश्वास करते थे। इस कारण उनका मत 'द्वैताद्वैतवाद' तथा 'भेदाभेदवाद' कहा जाता है।

    निम्बार्क के अनुसार जीव तथा ईश्वर व्यवहार में भिन्न हैं किन्तु सिद्धान्त्तः अभिन्न (एक) हैं। ब्रह्म इस विश्व का रचयिता है। निम्बार्काचार्य 'कृष्ण-मार्गी' थे और कृष्ण को ईश्वर का अवतार मानते थे। उनके विचार से राधा-कृष्ण के प्रति प्रेमपूर्ण भक्ति एवं आत्मसमर्पण से मोक्ष मिल सकता है। निम्बार्क के मत को 'सनक सम्प्रदाय' भी कहा जाता है। सनक सम्प्रदाय में शरणागति का भाव तो स्वीकार्य था परन्तु ध्यान एवं योग आदि को अधिक महत्त्व नहीं दिया गया।

    निम्बार्क का कृष्ण समस्त अच्छे गुणों से युक्त तथा समस्त विकारों से परे है। उनका अवतारवाद में भी विश्वास था। उन्होंने नैतिकता के नियमोें के पालन पर जोर दिया। निम्बार्क सम्प्रदाय ने जन साधारण को चमत्कार दिखाकर भक्ति में शक्ति होने का विश्वास दिलाया।

    संत नामदेव

    महाराष्ट्र के सन्तों में नामदेव का नाम अग्रणी है। उनका जन्म ई.1270 में एक दर्जी परिवार में हुआ। उनका विवाह बाल्यावस्था में ही कर दिया गया तथा पिता की मृत्यु के बाद परिवार का बोझ भी उनके कन्धों पर आ पड़ा। माता और पत्नी ने उन पर पैतृक व्यवसाय करने के लिए जोर डाला परन्तु नामदेव केवल हरि-कीर्तन करते रहे। कुछ समय बाद वे पण्ढरपुर में जाकर बस गए। यहाँ से वे भारत भ्रमण के लिए निकले। पंजाब आदि प्रान्तों में भक्ति का प्रचार करके वे पुनः पुण्ढरपुर आ गए।

    नामदेव ने जनसाधारण को प्रेममयी-भक्ति का उपदेश दिया और परम्परागत रीति-रिवाज तथा जाति-पाँति के बन्धनों को हटाने का प्रयास किया। उनके शिष्यों में समस्त जातियों और वर्गों के लोग थे। नामदेव भी अन्य सन्तों की भाँति एकेश्वरवादी थे और मूर्ति-पूजा तथा पुरोहितों के नियन्त्रण के विरुद्ध थे। उनकी मान्यता थी कि भक्ति के माध्यम से ही मोक्ष प्राप्त हो सकता है। दक्षिण भारत की जनता पर नामदेव के उपदेशों का बड़ा प्रभाव पड़ा। उन्होंने हिन्दू और मुसलमान दोनों से अपनी बुराइयां त्यागने को कहा-


    हिन्दू अन्धा, तुरको काना।

    दूवौ तो ज्ञानी सयाना।

    हिन्दू पूजै देहरा, मुसलमान मसीद,

    नामा सोई सेविया जहं देहरा न मसीद।।

    रामानन्दाचार्य

    रामानुजाचार्य की शिष्य परम्परा में 14वीं शताब्दी ईस्वी में रामानंद हुए जिन्हें वैष्णव परम्परा की धार्मिक क्रांति को दक्षिण से उत्तर भारत में ले आने का श्रेय प्राप्त है- 'भक्ति द्राविड़ ऊपजी, लाए रामानन्द।' कुछ विद्वानों के अनुसार रामानंद का जन्म ई.1299 में प्रयाग के एक कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में हुआ। उन्होंने बनारस में शिक्षा प्राप्त की तथा वहाँ स्वामी राघवानन्द से श्री सम्प्रदाय की दीक्षा ली। रामानन्द ने बैकुण्ठवासी विष्णु के स्थान पर मानव शरीरधारी और राक्षसों का संहार करने वाले भगवान् राम को अपना आराध्य बनाया।

    उस समय हिन्दू समाज को एक ऐसे धर्म की आवश्यकात थी जो वीरत्व, त्याग एवं बलिदान के लिए प्रेरित कर सके। यद्यपि विष्णु के अवतार के रूप में भगवान राम को पहले से ही प्रतिष्ठा प्राप्त थी परन्तु राम की भक्ति और उपासना का व्यापक प्रचार रामानन्द ने ही किया। रामानन्द ने 'ब्रह्मसूत्र' पर 'आनन्द भाष्य' लिखा जिसमें ब्रह्म के रूप में श्रीराम को प्रतिष्ठित किया। उन्होंने ईश्वर के सगुण और निर्गुण, दोनों रूपों का समर्थन किया। उनके द्वारा स्थापित सम्प्रदाय 'रामावत सम्प्रदाय' कहलाता है। रामानन्दी लोग राम तथा सीता की पूजा करते हैं।

    रामानंद रामानुज के 'विशिष्ठ दर्शन' में आस्था रखते थे और उन्होंने रामानुज के विचारों का समस्त उत्तर भारत में प्रचार किया। रामानुज, निम्बार्क और मध्वाचार्य के उपदेशों की भाषा संस्कृत थी किंतु रामानंद ने अपने उपदेश हिन्दी में दिए। रामानन्द के विचार रामानुज के विचारों से भी अधिक क्रान्तिकारी थे। रामानुज चारों वर्णों और अनेक जातियों की एकता में विश्वास नहीं करते थे परन्तु रामानन्द जाति-प्रथा को नहीं मानते थे।

    रामानन्द ने जाति-पाँति और ऊँच-नीच का भेद नहीं माना और शूद्रों, मुसलमानों तथा स्त्रियों को भी अपना शिष्य बनाया। उनके पूर्व स्त्रियों को सार्वजनिक रूप से धार्मिक विचार-विमर्षों में भाग नहीं लेने दिया जाता था। रामानन्द ने इस प्रतिबन्ध को नहीं माना। उनकी मान्यता थी कि राम के भक्त बिना भेदभाव के एक साथ खा-पी सकते हैं। भगवान के भक्तों के लिए वर्णाश्रम का बन्धन व्यर्थ है। परमेश्वर का एक ही गोत्र है और एक ही परिवार है। अतः समस्त विष्णु-भक्त भाई-भाई हैं और सबकी जाति एक है।

    रामानंद के 12 शिष्यों में सभी जातियों के स्त्री-पुरुष सम्मिलित थे- अनन्तानन्द, सुखानन्द, योगानन्द, सुरसुरानन्द, गालवानन्द, नरहरि आनन्द, भावानन्द (सभी ब्राह्मण), कबीरदास (जुलाहा), पीपा (क्षत्रिय), रैदास (चमार), धन्ना (जाट) तथा सेन (नाई)। कुछ सूचियों में योगानंद तथा गालवानंद के स्थान पर पद्मावती तथा सुरसुरी नामक महिला शिष्याओं के नाम मिलते हैं। कहा जाता है कि गंगा नामक एक वेश्या ने भी रामानंद से दीक्षा प्राप्त की। रामानंद के शिष्यों में से कुछ सगुणोपासक हुए तथा कुछ निर्गुणोपासक।

    ये सभी शिष्य मुस्लिम शासन काल में हिन्दू-धर्म को दृढ़ता देने वाले सिद्ध हुए। इनकी प्रेरणा से समाज के विभिन्न वर्गों एवं जातियों के करोड़ों लोग, अनेक विपत्तियां सहकर भी वैष्णव धर्म में बने रहे। चूंकि रामानंद ने स्वर्ग में रहने वाले विष्णु के स्थान पर धरती पर विचरने वाले राम एवं सीता को अपना आराध्य बनाया, संस्कृत के स्थान पर हिन्दी को उपदेशों का माध्यम बनाया तथा ब्राह्मण की जगह हर जाति के व्यक्ति को अपना शिष्य बनाया इसलिए उन्हें अपने पूर्ववर्ती वैष्णव आचार्यों अर्थात् रामानुज, माधवाचार्य तथा निम्बार्क से अधिक सफलता मिली। इस सफलता के आधार पर कई बार यह भी कह दिया जाता है कि मध्य-कालीन भक्ति आंदोलन का सूत्रपात रामानन्द ने किया।

    वल्लभाचार्य

    महाप्रभु वल्लभाचार्य का जन्म ई.1479 में दक्षिण भारत के एक तैलंग ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता एक उच्चकोटि के विद्वान् थे और उन्होंने बनारस को अपना कार्यक्षेत्र बना रखा था। 13 वर्ष की आयु में ही वल्लभाचार्य समस्त धर्मग्रन्थों में पारंगत हो गए। उनके विचारों पर विष्णु स्वामी के भक्ति-सिद्धान्तों का विशेष प्रभाव पड़ा।

    वल्लभाचार्य ने उनके विचारों को अधिक सुस्पष्ट करके उनका प्रचार किया। उन्हें अग्निदेव का अवतार माना जाता है। उन्होंने सनातन धर्म के समक्ष 'शुद्धाद्वैत' सिद्धांत की संकल्पना प्रस्तुत की तथा पुष्टि सम्प्रदाय की स्थापना की। उन्होंने अणुभाष्य, सिद्धान्त रहस्य और भागवत टीका सुबोधिनी आदि अनेक ग्रंथों की रचना करके अपने मत के समर्थन में दार्शनिक भावभूमि तैयार की तथा ब्रह्मसूत्र, श्रीमद्भागवत् और श्रीमद्भगवद्गीता को पुष्टि मार्ग का प्रमुख साहित्य घोषित किया।

    वल्लभाचार्य की मान्यता थी कि सृष्टि में तीन तत्व विद्यमान हैं- ब्रह्म, जगत् एवं जीव। आत्मा और जड़-जगत् ब्रह्म के ही स्वरूप हैं। ब्रह्म बिना किसी वस्तु अथवा शक्ति की सहायता से विश्व का निर्माण करता है, वह सगुण और सच्चिदानन्द है किंतु हमारी अविद्या के कारण वह हमें जगत् से अलग जान पड़ता है। इस अविद्या से मुक्ति पाने का मार्ग भक्ति है। वल्लभाचार्य ने शंकराचार्य के मायावाद का विरोध करके यह सिद्ध किया कि जीव उतना ही सत्य है जितना कि ब्रह्म। फिर भी, वह ब्रह्म का अंश और सेवक ही है।

    उन्होंने कहा कि जीव भगवान् की भक्ति के बिना शान्ति नहीं पा सकता। भगवान का अनुग्रह होने पर जीव का पोषण होता है। वल्लभाचार्य के अनुसार ब्रह्म के तीन स्वरूप हैं- आधिदैविक, आध्यात्मिक एवं अंतर्यामी। अनंत दिव्य गुणों से युक्त पुरुषोत्तम श्री कृष्ण ही परमब्रह्म हैं। उनका मधुर रूप एवं लीलाएं, जीव में आनंद का आविर्भाव करने वाला अक्षय स्रोत है। सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म का विलास है तथा सम्पूर्ण जगत लीला के निमित्त ब्रह्म की आत्मकृति है।

    उन्होंने प्रेम-लक्षणा-भक्ति पर विशेष बल दिया और वात्सल्य-रस से ओत-प्रोत भक्ति की शिक्षा दी। वल्लभाचार्य का भगवत्-कृपा में अटूट विश्वास था। उनके अनुसार भगवान् श्रीकृष्ण ही परब्रह्म हैं। उनकी सेवा एवं भक्ति ही जीव का परम कर्त्तव्य है। मनुष्य संसारिक मोह और ममता का त्याग करके एवं श्रीकृष्ण के चरणोें में सर्वस्व समर्पण करके भक्ति के द्वारा ही उनका अनुग्रह प्राप्त कर सकता है।

    उन्होंने भारत में कृष्ण-भक्ति का व्यापक प्रचार किया तथा भगवान श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं को भक्ति का आधार बनाया ताकि जन साधारण, बाल-लीलाओं के गुणगान में रस का अनुभव कर सके और बालक के रूप में विहार करने वाले सहज-सरल ईश्वर के साथ अधिक तादात्म्य स्थापित कर सके। वल्लभाचार्य का लक्ष्य मुक्ति नहीं है। वह तो अपने आराध्य देव श्रीकृष्ण के निकट पहुँचकर सदैव के लिए उनकी सेवा में रत रहना चाहते हैं।

    वल्लभाचार्य के जीवन का अधिकांश समय ब्रज में व्यतीत हुआ। उन्होंने मथुरा के निकट गोवर्द्धन पर्वत से भगवान श्रीकष्ण का विग्रह प्राप्त कर उसकी स्थापना की। भगवान के इस प्राकट्य को उस काल की विलक्षण घटना माना गया तथा देश भर से विष्णु-भक्त, भगवान के इस विग्रह के दर्शनों के लिए गोवर्द्धन पर्वत पहुँचने लगे। वल्लभाचार्य की प्रेरणा से देश भर में श्रीमद्भागवत् का पारायण होने लगा। वल्लभाचार्य के सैंकड़ों शिष्य थे जिनमें सूरदास भी सम्मिलित थे।

    वल्लभाचार्य के शिष्य पूरे देश में फैल गए और उन्होंने भजन-कीर्तन एवं अपनी रचनाओं के माध्यम से देश भर में कृष्ण-भक्ति का प्रचार किया। यद्यपि वल्लभाचार्य ने संसार के भोग-विलास त्याग कर विरक्ति के माध्यम से मोक्ष प्राप्त करने का उपदेश दिया था परन्तु उनके अनुयायी इसका अनुसरण नहीं कर सके। ई.1531 में महाप्रभु वल्लभाचार्य का निधन हुआ।

    सूरदास

    सूरदास का जन्म सोलहवीं सदी में हुआ। वे वल्लभाचार्य के प्रमुख शिष्य थे तथा भक्ति आंदोलन के महान संत थे किंतु वे उपदेशक अथवा सुधारक नहीं थे। उन्होंने अपने गुरु वल्लभाचार्य के निर्देश पर भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन किया तथा भागवत् पुराण में वर्णित लीलाओं को आधार बनाते हुए कई हजार सरस पदों की रचना की। इन पदों में भगवान कृष्ण के यशोदा माता के आंगन में विहार करने से लेकर उनके दुष्ट-हंता स्वरूप का बहुत सुंदर एवं रसमय वर्णन किया गया।

    सूरदास ने भ्रमर गीतों के माध्यम से निर्गुण भक्ति को नीरस एवं अनुपयोगी घोषित किया तथा न केवल सगुण भक्ति करने अपितु भक्त-वत्सल भगवान की रूप माधुरी का रसपान करने वाली भक्ति करने का मार्ग प्रशस्त किया। उनकी रचनाएँ- सूरसागर, सूरसारावली एवं साहित्य लहरी में संकलित हैं। उनकी रचनाएं ब्रज भाषा में हैं। ब्रजभाषा में इतनी प्रौढ़ रचनाएं सूरदास के अतिरिक्त अन्य कोई कवि नहीं कर सका। सूरदास की रचनाओं में भक्ति, वात्सल्य और शृंगार रसों की प्रधानता है।

    पुष्टि मार्ग में दीक्षित होने से सूरदास की भक्ति में दास्य भाव एवं सखा भाव को प्रमुखता दी गई है। उन्होंने सूरसागर का आरम्भ 'चरण कमल बन्दौं हरि राई' से किया है। इन पदों को देश-व्यापी लोकप्रियता अर्जित हुई तथा जन-सामान्य को अनुभव हुआ कि भक्ति के बल पर भगवान को अपने आंगन में बुलाया जा सकता है। उन्हें संकट के समय पुकारा जा सकता है और अपने शत्रु से त्राण पाने में सहायता ली जा सकती है। परमात्मा की शक्ति से ऐसे नैकट्य भाव का अनुभव इससे पूर्व किसी अन्य सम्प्रदाय द्वारा नहीं कराया गया था।

    चैतन्य महाप्रभु

    चैतन्य महाप्रभु, महाप्रभु वल्लभाचार्य के समकालीन थे। चैतन्य का जन्म ई.1486 में कलकत्ता से 75 मील उत्तर में स्थित नवद्वीप अथवा नादिया ग्राम में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उस समय मुसलमानों के आतंक से भयभीत वैष्णव-भक्त बंगाल से भागकर नवद्वीप में शरण ले रहे थे। इस कारण नवद्वीप में वैष्णव-भक्ति की धारा अबाध गति से बह रही थी। चैतन्य ने संस्कृत, व्याकरण और काव्य का अध्ययन करने के बाद भागवत पुराण तथा अन पुराणों का अध्ययन किया।

    उनके बड़े बड़े भाई विष्णुरूप ने बहुत कम आयु में ही सन्यास ले लिया था, इसलिए उनकी माता ने बाल्यकाल में ही चैतन्य का विवाह कर दिया। जब चैतन्य 11 वर्ष के हुए तो उनके पिता का देहान्त हो गया। पिता के पिण्डदान और श्राद्ध के लिए ई.1505 में चैतन्य को गया जाना पड़ा। वहाँ उनकी भेंट ईश्वरपुरी नामक सन्यासी से हुई। चैतन्य उनके शिष्य हो गए। इसके बाद चैतन्य गृहस्थ जीवन से विरक्त होकर कृष्ण-भक्ति में लीन रहने लगे।

    चैतन्य ने वेदों और उपनिषदों का गहन अध्ययन किया किंतु उनसे चैतन्य की जिज्ञासा शान्त हुई तो उन्होंने भक्ति तथा प्रेम के माध्यम से ईश्वर को प्राप्त करने का मार्ग अपनाया। 24 वर्ष की आयु में वे केश्व भारती से दीक्षा लेकर सन्यासी हो गए। सन्यास लेने के बाद आठ वर्ष तक चैतन्य ने देश का भ्रमण किया। वे सर्वप्रथम नीलांचल गए और इसके बाद दक्षिण भारत के श्रीरंग क्षेत्र एवं सेतुबंध आदि स्थानों पर रहे। उन्होंने देश के कोने-कोने में जाकर हरिनाम की महत्ता का प्रचार किया।

    ई.1515 में विजयादशमी के दिन चैतन्य ने अपनी विशाल शिष्य मण्डली के साथ वृंदावन के लिए प्रस्थान किया। ये वन के रास्ते ही वृंदावन को चले। कहा जाता है कि चैतन्य के हरिनाम उच्चारण से वशीभूत होकर वन्यपशु भी नाचने लगते थे। शेर, बाघ और हाथी आदि भी इनके आगे प्रेमभाव से नृत्य करते चलते थे। कार्तिक पूर्णिमा को चैतन्य अपने शिष्यों सहित वृंदावन पहुँचे। वृंदावन में आज भी कार्तिक पूर्णिमा के दिन गौरांग-आगमनोत्सव मनाया जाता है।

    वृंदावन में महाप्रभु ने इमली-तला और अक्रूर-घाट पर निवास किया तथा जन साधारण के समक्ष प्राचीन श्रीधाम वृंदावन की महत्ता प्रतिपादित कर लोगों की सुप्त भक्ति-भावनाओं को जागृत किया। वृंदावन से महाप्रभु प्रयाग गए। वहाँ कुछ काल तक निवास करने के पश्चात् महाप्रभु ने काशी, हरिद्वार, शृंगेरी (कर्नाटक), कामकोटि पीठ (तमिलनाडु), द्वारिका, मथुरा आदि तीर्थों में भगवद्नाम संकीर्तन किया।

    उनका मानना था कि ईश्वर कई रूप धारण करता है परन्तु उनमंे सबसे मोहक और आकर्षक रूप श्रीकृष्ण का है। वे कृष्ण को ईश्वर का अवतार न मान कर ईश्वर मानते थे। उनके विचार से सबसे ऊँची भक्ति और प्रेम का घनिष्ठ स्वरूप पति-पत्नी के सम्बन्ध में होता है जिसमें किसी प्रकार का व्यापार नहीं होता और न उस प्रेम की कोई सीमा नहीं होती। इसलिए राधा और कृष्ण की कल्पना की गई है।

    कृष्ण परम-ब्रह्म हैं और उनके भक्त राधा स्वरूप हैं। इसलिए भक्त का कृष्ण के प्रेम में विह्वल होना स्वाभाविक है। चैतन्य आत्मविभोर होकर अपना अस्तित्त्व भूल जाते थे और कृष्ण में लीन हो जाते थे। चैतन्य ने भगवान की भक्ति के लिए संगीत और नृत्य का सहारा लिया जो संकीर्तन कहलाता था। उन्होंने अपने शिष्यों के साथ ढोलक, मृदंग, झाँझ, मंजीरे आदि वाद्य बजाकर, नृत्य करते हुए उच्च स्वर में हरि नाम संकीर्तन करना प्रारंभ किया- 'हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे-हरे। हरे-राम, हरे-राम, राम-राम, हरे-हरे।'

    उनकी संकीर्तन पद्धति मथुरा-वृन्दावन से लेकर पूर्वी-बंगाल तक व्यापक रूप से लोकप्रिय हो गई। इसमें भक्तजन समूह में संकीर्तन करते थे। चैतन्य और उनके अनुयाई सार्वजनिक मार्गों पर भजन-कीर्तन करते हुए नाचते-गाते थे और अर्द्ध-मूर्च्छित स्थिति में पहुँच जाते थे। स्वयं चैतन्य भी भक्ति के आवेश में मूर्च्छित और समाधिस्थ हो जाते थे। चैतन्य ने लोगों को कृष्ण-भक्ति का मन्त्र दिया। कृष्ण-भक्ति एवं कीर्तन का प्रचार उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य था। उनके निर्मल चरित्र एवं प्रेमपूर्ण व्यवहार से असंख्य लोग उनके अनुयाई बन गए।

    चैतन्य का धर्म रस्मों और आडम्बरों से मुक्त था। उन्होंने परमात्मा में पूर्ण आस्था रखने का उपदेश दिया। उनकी उपासना का स्वरूप प्रेम, भक्ति, कीर्तन और नृत्य था। प्रेमावेश में ही भक्त परमात्मा से साक्षात्कार का अनुभव करता है। चैतन्य का कहना था कि यदि कोई जीव कृष्ण पर श्रद्धा रखता है, अपने गुरु की सेवा करता है तो वह मायाजाल से मुक्त होकर कृष्ण के चरणों को प्राप्त करता है। चैतन्य ने ज्ञान के स्थान पर प्रेम और भक्ति को प्रधानता दी। उन्होंने स्त्रियों को पुरुषों से पृथक् रहने का उपदेश दिया।

    वे मूर्ति-पूजा और धर्मग्रन्थों के विरोधी नहीं थे परन्तु उन्हें कर्मकाण्ड तथा आडम्बरों से घृणा थी। चैतन्य के अनुसार समस्त लोग समान रूप से ईश्वर की भक्ति कर सकते हैं। भक्ति मार्ग में ऊँच-नीच का भेदभाव नहीं होता, समस्त भक्त भगवान श्रीकृष्ण के चरणाश्रित होने के अधिकारी हैं। चैतन्य और उनके अनुयाइयों ने मुसलमानों एवं निम्न जातियों के लोगों को भी कृष्ण-भक्ति का उपदेश दिया। चैतन्य के प्रभाव से शूद्रों को भी भक्ति का अधिकार मिल गया।

    चैतन्य ने अपने 'शिक्षाष्टक' में कृष्ण-भक्ति के विषय में अपने विचार व्यक्त किए हैं। उनके अनुसार भक्ति का प्रथम और प्रमुख साधन 'हरिनाम संकीर्तन' है। चैतन्य महाप्रभु बंगाल के सबसे बड़े धर्म-सुधारक थे। उनके विचार में केवल कर्म से कुछ नहीं होता। मोक्ष प्राप्ति के लिए हरि-भक्ति तथा उनका गुण-गान करना आवश्यक है। प्रेम तथा लीला इस सम्प्रदाय की विशेषताएँ हैं। चैतन्य सम्प्रदाय, निम्बार्काचार्य की भांति भेदाभेद के सिद्धान्त को मानते थे अर्थात् जीवात्मा एक दूसरे से भिन्न तथा अभिन्न दोनों है।

    केवल भक्ति के बल से ही मानव की आत्मा श्रीकृष्ण तक पहुँच सकती है। मनुष्य की आत्मा ही राधा है। उसे श्रीकृष्ण के प्रेम में लीन रहना चाहिए। दास, मित्र, पत्नी तथा पुत्र के रूप में श्रीकृष्ण से प्रेम करना मानव जीवन का प्रधान लक्ष्य है। चैतन्य महाप्रभु ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष जगन्नाथ पुरी में व्यतीत किए। वे जीवन के अन्तिम बारह वर्ष में कृष्ण-विरह में व्याकुल रहा करते थे और हर समय उनके नेत्रों से आँसू बहा करते थे।

    उनके भक्त उन्हें कृष्ण की प्रेम-लीलाएँ सुना-सुना कर सान्त्वना दिया करते थे। ई.1533 में 47 वर्ष की अल्पायु में रथयात्रा के दिन चैतन्य भक्ति के उन्माद में समुद्र में घुस गए तथा उनका शरीर पूरा हो गया। बंगाल, बिहार, उड़ीसा एवं उत्तर प्रदेश की प्रजा पर चैतन्य महाप्रभु की संकीर्तन भक्ति का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। उनकी मृत्यु के पश्चात् वृन्दावन के गोस्वामियों ने चैतन्य के सिद्धान्तों और संकीर्तन-पद्धति को व्यवस्थित रूप प्रदान किया तथा चैतन्य-सम्पद्राय की स्थापना की।

    इस सम्प्रदाय को गौड़ीय सम्प्रदाय भी कहा जाता है। वृन्दावन के गोस्वामी, चैतन्य को अपना प्रभु मानते थे परन्तु नादिया ग्राम के अनुयाई उन्हें कृष्ण का अवतार मानने लगे और गौरांग महाप्रभु के रूप में स्वयं चैतन्य की पूजा होने लगी।

    कबीर

    रामानन्द के शिष्यों में कबीर का नाम अग्रण्य है। उनका जन्म ई.1398 में काशी में एक विधवा ब्राह्मणी की कोख से हुआ। माता द्वारा लोकलाज के कारण त्याग दिये जाने से कबीर नीरू नामक मुसलमान जुलाहे के घर में पलकर बड़े हुए। उनकी पत्नी का नाम लोई था। उससे उन्हें एक पुत्र कमाल और पुत्री कमाली हुई। कबीर ने विधिवत् शिक्षा प्राप्त नहीं की थी। बड़े होने पर वे रामानन्द के शिष्य बन गए। कबीर ने घर-गृहस्थी में रहते हुए भी मोक्ष का मार्ग सुझाया। उन्हें हिन्दू-मुस्लिम दोनों के धर्मग्रन्थों का ज्ञान था।

    कबीर बहुत बड़े धर्म-सुधारक थे। वे अद्वैतवादी थे तथा निर्गुण-निराकार ब्रह्म के उपासक थे। वे जाति-पाँति, छुआछूत, ऊँच-नीच आदि भेदभाव नहीं मानते थे। वे मूर्ति-पूजा और बाह्याडम्बर के आलोचक थे। उनके शिष्यों में हिन्दू तथा मुसमलान दोनों ही बड़ी संख्या में थे। इसलिए उन्होंने हिन्दुओं तथा मुसलमानों दोनों को पाखण्ड तथा आडम्बर छोड़कर ईश्वर की सच्ची भक्ति करने का उपदेश दिया तथा उनकी बुराइयों की खुलकर आलोचना की-


    जो तू तुरक-तुरकणी जाया, भीतर खतना क्यों न कराया!

    जो तू बामन-बमनी जाया, आन बाट व्है क्यों नहीं आया।

    कबीर ने कुसंग, झूठ एवं कपट का विरोध किया। उनके अनुसार जिस प्रकार लोहा पानी में डूब जाता है उसी प्रकार कुसंग के कारण मनुष्य भी भवसागर में डूब जाएगा। कबीर का मानना था कि मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु 'काम' है और 'स्त्री' काम को बढ़ाती है। इसलिए उन्होंने स्त्री को 'कामणि काली नागणी' अर्थात् जादू करने वाली काली सर्पिणी कहा। कबीर ने हिन्दू और मुस्लिम दोनों के अर्थहीन आडम्बरों और रस्मों का खण्डन किया।

    वे हिन्दुओं के छाप-तिलक एवं मूर्ति-पूजा के विरोधी थे तथा उन्होंने मुसलमानों की नमाज, रमजान के उपवास, मकबरों और कब्रों की पूजा आदि की भी आलोचना की उन्होंने मुसलमानों से कहा कि यदि तुम्हारे हृदय में भक्ति-भावना का उदय नहीं होता तो हजयात्रा से कोई लाभ नहीं है। कबीर ने एकेश्वरवाद एवं प्रेममयी भक्ति पर जोर दिया। कबीर की वाणी का संग्रह 'बीजक' नाम से प्रसिद्ध है।

    बीजक के तीन भाग है- (1.) रमैनी, (2.) सबद, और (3.) साखी। कबीर की भाषा सधुक्कड़ी अथवा खिचड़ी कहलाती है जिसमें खड़ी बोली, अवधी, ब्रज, पंजाबी, राजस्थानी, इत्यादि अनेक भाषाओं का मिश्रण है। उनकी भाषा साहित्यिक न होने पर भी प्रभावशाली है। कबीर ने ईश्वर के निर्गुण-निराकार रूप की पूजा की। उनका राम दशरथ-पुत्र राम न होकर अजन्मा, सर्वव्यापी एवं घट-घट वासी राम था। उनका राम समस्त गुणों से परे था। वे कहते हैं-


    कोई ध्यावे निराकार को, काई ध्यावेे आकारा।

    वह तो इन छोड़न तै न्यारा, जाने जानन हारा।

    ई.1518 में कबीर का निधन हुआ। इस प्रकार उनकी आयु 120 वर्ष मानी जाती है। समाज की निम्न समझी जाने वाली जातियों पर कबीर के उपदेशों का बड़ा प्रभाव पड़ा। उनके अनुयाई कबीर-पंथी कहलाए। आगे चलकर उनके शिष्यों ने उन्हें भगवान का अवतार मान लिया।

    भक्त रैदास

    भक्त रैदास का जन्म काशी के एक चमार परिवार में हुआ। वे रामानन्द के बारह प्रमुख शिष्यों में से थे। वे विवाहित थे तथा जूते बनाकर अपनी जीविका चलाते थे। रैदास तीर्थयात्रा, जाति-भेद, उपवास आदि के विरोधी थे। हिन्दू तथा मुसलमानों में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं मानते थे। वे निर्गुण भक्ति में विश्वास रखते थे। उनमें ईश्वर के प्रति समर्पण की भावना स्पष्ट झलकती है। श्री हरि चरणों का अनन्य आश्रय ही उनकी साधना का प्राण है। उनके प्रभाव के कारण निम्न जातियों के लोगों में भगवद्-भक्ति में आस्था उत्पन्न हुई। रैदास के शिष्यों ने 'रैदासी सम्प्रदाय' प्रारम्भ किया। मेवाड़ राजपरिवार की रानी मीरांबाई उन्हें अपना गुरु मानती थी।

    गुरु नानक

    पंजाब के सन्तों में गुरु नानक का नाम अग्रणी है। उनका जन्म ई.1469 में लाहैर से 50 किलोमीटर दूर तलवण्डी गांव के खत्री परिवार में हुआ। उनके पिता कालू ग्राम के पटवारी थे। नानक विवाहित थे तथा उनके दो पुत्र भी हुए किंतु बाद में साधु-संतों की संगत में रहने लगे। वे निर्गुण-निराकार ईश्वर की पूजा करते थे। नानक एकेश्वरवादी थे और ऊँच-नीच, हिन्दू-मुस्लिम तथा जाति-पाँति के भेद को नहीं मानते थे।

    वे मूर्ति-पूजा तथा तीर्थ-यात्रा के भी घोर विरोधी थे। सिक्ख धर्म के अनुसार मनुष्य को सरल तथा त्यागमय जीवन व्यतीत करना चाहिए। नानक का कहना था कि संसार में रहकर तथा सुन्दर गृहस्थ का जीवन व्यतीत करके भी मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर सकता है। नानक पर सूफी मत का अधिक प्रभाव था तथा वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के पक्षधर थे और उनके झगड़ों को बेइमानों का काम बताते थे-


    बन्दे इक्क खुदाय के, हिन्दू मुसलमान।

    दावा राम रसूल का, लड़दे बेईमान।।

    नानक ने अपने हिन्दू शिष्यों से कहा कि- 'मैंने चारों वेद पढ़े, अड़सठ तीर्थों पर स्नान किया, वनों और जंगलों में निवास किया और सातों ऊपरी एवं निचली दुनियाओं का ध्यान किया और इस नतीजे पर पहुँचा कि मनुष्य चार कर्मों द्वारा मुक्ति प्राप्त कर सकता है- भगवान से भय, उचित कर्म, ईश्वर तथा उसकी दया में विश्वास और एक गुरु में विश्वास जो उचित मार्गदर्शन कर सके।'

    नानक ने अपने मुसलमान शिष्यों से कहा- 'दया को अपनी मस्जिद मानो, भलाई एवं निष्कपटता को नमाज की दरी मानो, जो कुछ भी उचित एवं न्याय-संगत है, वही तुम्हारी कुरान है। नम्रता को अपनी सुन्नत मानो, शिष्टाचार को रोजा मानो। इससे तुम मुसलमान बन जाओगे।'

    उन्होंने पाँचों नमाजों की व्याख्या करते हुए कहा- 'पहली नमाज सच्चाई, दूसरी इन्साफ, तीसरी दया, चौथी नेक-नियति और पाँचवीं नमाज अल्लाह की बंदगी है।' नानक ने विभिन्न स्थानों का भ्रमण करके अपनी शिक्षाओं का प्रसार किया। नानक के शिष्यों ने सिक्ख धर्म की स्थापना की। वे सिक्ख धर्म के पहले गुरु माने जाते हैं। उनकी शिक्षाएँ आदि ग्रन्थ में पाई जाती हैं जो आगे चलकर गुरु ग्रंथ साहब कहलाया।

    मीराबाई

    मध्य-कालीन भक्तों में मीराबाई का नाम अग्रणी है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने मीरा का जन्म वि.सं. 1573 (ई.1516) में माना है जबकि गौरीशंकर हीराचंद ओझा, हरविलास शारदा तथा गोपीनाथ शर्मा आदि इतिहासकारों ने मीराबाई का जन्म वि.सं. 1555 (ई.1498) में माना है। मीरा मेड़ता के राठौड़ शासक राव दूदा के पुत्र रतनसिंह की पुत्री थी। जब मीरा दो साल की थीं, उनकी माता का निधन हो गया। मीरा का विवाह मेवाड़ के महाराणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज से हुआ।

    विवाह के सात वर्ष बाद ही भोजराज एक युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। कुछ दिन बाद मीरा के श्वसुर महाराणा सांगा और पिता रतनसिंह भी खानवा के युद्ध में मृत्यु को प्राप्त हुए। कुछ समय बाद जोधपुर के राजा मालदेव ने मीरां के चाचा वीरमदेव से उनका मेड़ता राज्य छीन लिया। बचपन से ही धार्मिक प्रवृत्ति की थीं और श्रीकृष्ण को अपना पति मानती थीं। अब वह सांसारिक सुखों से विरक्त होकर साधु-संतों के साथ भगवान का भजन करने लगीं। महाराणा सांगा के बाद उनके पुत्र रतनसिंह और विक्रमादित्य क्रमशः मेवाड़ के महाराणा हुए किंतु उन दोनों को मीरा का साधुओं के साथ भजन गाना एवं नृत्य करना अच्छा नहीं लगा।

    उन्होंने मीरा को रोकने का प्रयास किया किंतु मीरा चितौड़ छोड़़कर वृन्दावन चली गई। वहाँ से कुछ दिन वह द्वारिका चली गई और वहीं उसका शरीर पूरा हुआ। मीराबाई ने चित्तौड़ के राजसी वैभव त्यागकर वैराग्य धारण किया तथा चमार जाति में जन्मे संत रैदास को अपना गुरु बनाया। वे जाति-पांति तथा ऊँच नीच में विश्वास नहीं करती थीं। उन्होंने ईश्वर के सगुण-साकार स्वरूप की भक्ति की। वे उच्चकोटि की कवयित्री थीं। जन-साधारण में उनके भजन आज भी बड़े प्रेम एवं चाव से गाए जाते हैं।

    मीराबाई से प्रेरणा पाकर देश की करोड़ों नारियों ने श्रीकृष्ण भक्ति का मार्ग अपनाया जिससे हिन्दू परिवारों का वातावरण श्रीकृष्ण मय हो गया। राजपूताने के अनेक राजाओं ने भी श्रीकृष्ण भक्ति एवं ब्रज भाषा की कविता का प्रचार किया। मीरा की आध्यात्मिक यात्रा के तीन सोपान हैं। पहले सोपान में मीरा कृष्ण के लिए लालायित हैं और अत्यंत व्यग्र होकर गाती हैं- 'मैं विरहणी बैठी जागूँ, जग सोवे री आली।' कृष्ण-विरह सी पीड़ित होकर वे गाती हैं- 'दरस बिन दूखण लागे नैण।'

    कृष्ण भक्ति के दूसरे सोपान में मीरा श्रीकृष्ण को प्राप्त कर लेती हैं और वह कहती हैं- 'पायोजी मैंने राम रतन धन पायो।' भक्ति के तीसरे और अन्तिम सोपान में मीरा को आत्मबोध हो जाता है और वे परमात्मा से एकाकार हो जाती हैं। यही सायुज्य भक्ति का चरम बिंदु है। इस सोपान में पहुँचकर मीरा कहती हैं- 'म्हारे तो गिरधर गोपाल दूजो न कोई।' मीरा के काव्य में सांसारिक बन्धनों को त्यागकर ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव मिलता है।

    मीरा कृष्ण को ही परमात्मा और अविनाशी मानती थी। उनकी भक्ति आडम्बर रहित है। मीरा किसी सम्प्रदाय विशेष से बँधी हुई नहीं थीं और उनके मन्दिर के द्वार सबके लिए खुले हुए थे। मीरा ने बहुत से पदों की रचना की जो फुटकर रूप में प्राप्त होते हैं। महादेवी वर्मा के अनुसार मीरा के पद विश्व के भक्ति साहित्य के अनमोल रत्न हैं। मीरा ने 'राग गोविन्द' नामक ग्रन्थ भी लिखा था किंतु यह ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होता है।

    दादू दयाल

    भक्ति आन्दोलन के संतों में दादू दयाल का नाम अत्यंत आदर से लिया जाता है। उनका जन्म अहमदाबाद में हुआ तथा उनका अधिकांश जीवन राजस्थान में व्यतीत हुआ। कबीर एवं नानक की भाँति दादू ने भी अन्धविश्वास, मूर्ति-पूजा, जाति-पाँति, तीर्थयात्रा, व्रत-उपवास आदि का विरोध किया और जनता को सीधा और सच्चा जीवन व्यतीत करने का उपदेश दिया। दादू एक अच्छे कवि थे। उन्होंने भजनों के माध्यम से विभिन्न सम्प्रदायों के मध्य प्रेम एवं भाईचारे की भावना बढ़ाने पर जोर दिया। उनका पन्थ दादू-पन्थ के नाम से विख्यात हुआ। उनकी मृत्यु के बाद उनके शिष्यों- गरीबदास और माधोदास ने उनके उपदेशों को फैलाने का अथक प्रयास किया।

    गोस्वामी तुलसीदास

    रामानंद की शिष्य मण्डली के प्रमुख सदस्य नरहरि आनंद के शिष्य तुलसीदास, अकबर के समकालीन संत हुए। उनका जन्म ई.1532 के लगभग हुआ। उन्होंने रामचरित मानस, गीतावली, कवितावली, विनय पत्रिका, एवं हनुमान बाहुक आदि ग्रंथों की रचना की। उन्होंने भारत की जनता को धनुर्धारी दशरथ-नदंन श्रीराम की भक्ति करने की प्रेरणा दी जो धरती, ब्राह्मण, गाय तथा देवताओं की रक्षा के लिए मनुष्य का शरीर धारण करते हैं- 'गो द्विज धेनु देव हितकारी, कृपासिंधु मानुष तनुधारी।' तथा जो जनता को सुखी करने वाले, वैदिक धर्म की रक्षा करने वाले एवं दुष्टों का विनाश करने वाले हैं- 'जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता।'

    तुलसी ने जनसामान्य को भगवान में विश्वास रखने की प्रेरणा देते हुए कहा- हे परमात्मा, आप ही मेरे स्वामी, गुरु, पिता और माता हैं, आपके चरण-कमलों को छोड़कर मैं कहाँ जाऊँ- 'मोरे तुम प्रभु गुर पितु माता, जाऊँ कहाँ तजि पद जल जाता।' तुलसीदास ने जनसामान्य को सद्ग्रंथों का पठन करने का आह्वान किया तथा विभिन्न गुरुओं द्वारा फैलाए जाने वाले पंथों और मार्गों को निंदनीय बताया ताकि हिन्दू-धर्म को एकता के सूत्र में पिरोए रखा जा सके तथा धर्म-भीरु प्रजा को दुष्ट व्यक्तियों द्वारा धर्म के नाम पर उत्पन्न की जा रही भूल-भुलैयाओं में भटकने से रोका जा सके।

    तुलसी ने पाखण्डी गुरुओं को चेतावनी देते हुए कहा- 'हरइ सिष्य धन सोक न हरई। सो गुर घोर नरक महुँ परई।' अर्थात् जो गुरु, शिष्य के शोक को नहीं हरता अपितु उसका धन हड़पता है, वह घनघोर नर्क में पड़ता है। उन्होंने राजाओं को भी अपनी अच्छी प्रजा अर्थात् सज्जनों के पालन का निर्देशन करते हुए कहा- 'जासु राज प्रिय प्रजा दुःखारी, सो नृपु अवसि नरक अधिकारी।' उन्होंने 'कोउ नृप होहु हमें का हानि' की मानसिकता को दास-दासियों की मानसिकता बताया। तुलसी की रामचरित मानस घर-घर पहुँच गई।

    करोड़ों लोगों को इसकी चौपाइयां कण्ठस्थ हो गईं तथा घर-घर पाठ होने लगे। रामचरित मानस के श्रीराम पर विश्वास हो जाने से सैंकड़ों वर्षों से दबे-कुचले कोटि-कोटि जनसमुदाय के मन में नवीन साहस का संचार हुआ। लोग ईश्वरीय सत्ता में विश्वास रखनकर अपने धर्म पर अडिग बने रहे। तुलसीदास द्वारा विभिन्न सम्प्रदायों में समन्वय के प्रयास: दिल्ली सल्तनत (13वीं-16वीं शताब्दी ईस्वी) एवं मुगलों के शासन काल (16वीं-18वीं शताब्दी ईस्वी) में हिन्दू-धर्म के शैव, शाक्त एवं वैष्णव सम्प्रदायों के बीच कटुता का वातावरण था।

    यहाँ तक कि सगुणोपासकों एवं निर्गुणोपासकों के बीच भी कटुता व्याप्त थी। सभी सम्प्रदायों के मतावलम्बी अपने-अपने मत को श्रेष्ठ बताकर दूसरे के मत को बिल्कुल ही नकारते थे। गोस्वामी तुलसीदास ने राम चरित मानस के माध्यम से इस कटुता को समाप्त करने का सफल प्रयास किया। इस ग्रंथ में तुलसी ने शैवों के आराध्य देव शिव तथा विष्णु के अवतार राम को एक दूसरे का स्वामी, सखा और सेवक घोषित किया।

    राम भक्त तुलसी ने 'सेवक स्वामि सखा सिय-पिय के, हित निरुपधि सब बिधि तुलसी के' कहकर शंकर की स्तुति की। इतना ही नहीं तुलसी ने अपने स्वामी राम के मुख से- 'औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउं कर जोरि, संकर भजन बिना नर भगति न पावई मोर' कहलवाकर राम-भक्तों को शिव की पूजा करने का मार्ग दिखाया एवं राम-पत्नी सीता के मुख से शिव-पत्नी गौरी की स्तुति करवाकर शाक्तों एवं वैष्णवों को निकट लाने में सफलता प्राप्त की- 'जय जय गिरिबर राज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी।'

    तुलसी ने 'सगुनहि अगुनहि नहीं कछु भेदा, गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा' कहकर सगुणोपासकों एवं निर्गुणोपासकों के बीच की खाई को पाटने का प्रयास किया। तुलसी ने भक्तिमार्गियों एवं ज्ञानमार्गियों के बीच की दूरी समाप्त करते हुए कहा- 'भगतहि ज्ञानही नहीं कछु भेदा, उभय हरहिं भव संभव खेदा।' तुलसीदास ब्राह्मणों की श्रेष्ठता में विश्वास रखते थे किंतु उनके राम जन-जन के राम थे जिन्होंने शबर जाति की स्त्री के घर बेर खाए, गृध्र जाति के जटायु का उद्धार किया, निषादराज को अपना मित्र बनाया तथा केवट एवं अहिल्या का उद्धार किया।

    तुलसी के राम ने ताड़का-वध, शूर्पनखा की नासिका कर्तन तथा सिंहका का वध करके यह स्पष्ट संदेश दिया कि स्त्री यदि अच्छे गुणों से युक्त हो तभी वह पूज्य है, दुष्ट स्त्री उसी प्रकार वध के योग्य है जिस प्रकार बुरा पुरुष। तुलसी के प्रयासों को बाद में आने वाले अन्य संतों ने भी बल दिया जिसके परिणाम स्वरूप शैव, शाक्त एवं वैष्णव सम्प्रदायों तथा इन सम्प्रदायों के भीतर उपस्थित विभिन्न विचारधाराओं के अनुयाइयों के बीच की दूरियां कम हुई और हिन्दू-धर्म, विदेशी धरती से आने वाले धर्मों के समक्ष साहस पूर्वक खड़ा हो गया। ई.1623 (वि.सं.1680) में तुलसी का देहान्त हो गया।

    संत तुकाराम

    संत तुकाराम का जन्म ई.1608 में महाराष्ट्र के देहू गांव में हुआ। वे अपने समय के महान् संत और कवि थे तथा तत्कालीन भारत में चले रहे भक्ति आंदोलन के प्रमुख स्तंभ थे। उन्हें 'तुकोबा' भी कहा जाता है। उनके जन्म आदि के विषय में विद्वानों में मतभेद हैं। तुकाराम को चैतन्य नामक साधु ने 'राम कृष्ण हरि' मंत्र का स्वप्न में उपदेश दिया। संत तुकाराम ने 17 वर्ष तक जन-साधारण को उपदेश दिए। अपने जीवन के उत्तरार्ध में उनके द्वारा गाए गए तथा उनके शिष्यों द्वारा लिपिबद्ध किए गए लगभग 4000 'अभंग' आज भी उपलब्ध हैं।

    तुकाराम ने अपनी साधक अवस्था में संत ज्ञानेश्वर और नामदेव के ग्रंथों का गहराई से अध्ययन किया। इन तीनों संत कवियों के साहित्य में एक ही आध्यात्म सूत्र पिरोया हुआ है। स्वभाव से स्पष्टवादी होने के कारण इनकी वाणी में कठोरता दिखलाई पड़ती है, उसके पीछे उनका प्रमुख उद्देश्य समाज से दुष्टों का निर्दलन कर धर्म का संरक्षण करना था। उन्होंने सदैव सत्य का ही अवलंबन किया और किसी की प्रसन्नता एवं अप्रसन्नता की ओर ध्यान न देते हुए धर्म-संरक्षण के साथ-साथ पाखंड-खंडन का कार्य किया।

    उन्होंने अनुभव-शून्य पोथी-पंडित, दुराचारी-धर्मगुरु इत्यादि समाज-कंटकों की अत्यंत तीव्र आलोचना की है। उनके उपदेशों का यही सार है कि संसार के क्षणिक सुख की अपेक्षा परमार्थ के शाश्वत सुख की प्राप्ति हेतु मानव का प्रयत्न होना चाहिए।

    अन्य भक्ति सम्प्रदाय

    भक्ति सम्प्रदायों की इस परम्परा में विष्णु गोस्वामी का रुद्र सम्प्रदाय, हितहरिवंश का राधावल्लभी सम्प्रदाय तथा हरिदासी सम्प्रदाय महत्वपूर्ण हैं।

    भक्ति आन्दोलन का प्रभाव

    भक्ति-आन्दोलन का भारतीयों के धार्मिक, सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। यह प्रभाव इतना गहरा था कि जहाँ साधारण जनता मुस्लिम आक्रांताओं के विरुद्ध धर्म को अपनी ढाल बनाकर खड़ी हो गई, वहीं भारत के हिन्दू राजाओं ने भी शत्रुओं के हाथों से अपनी प्रजा की रक्षा करने के काम को ईश्वरीय आदेश की तरह शिरोधार्य किया-

    (1.) हिन्दू जाति में साहस का संसार

    हिन्दू जनता मुस्लिम शासन द्वारा किये जा रहे दमन के कारण नैराश्य की नदी में डूब रही थी। भगवद्गीता से प्रसूत ईश्-भक्ति का अवलम्बन प्राप्त हो जाने से उसमें मुसलमानों के अत्याचारों को सहन करने की शक्ति उत्पन्न हो गई।

    (2.) मुसलमानों के अत्याचारों में कमी

    भक्ति-मार्गी सन्तों के उपदेशों का मुसलमानों पर भी प्रभाव पड़ा। इन सन्तों ने ईश्वर के एक होने का उपदेश दिया और बताया कि एक ईश्वर तक पहुँचने के लिये विभिन्न धर्म विभिन्न मार्ग की तरह हैं। इससे मुसलमानों द्वारा हिन्दुओं पर किये जा रहे अत्याचारों में कमी हुई।

    (3.) बाह्याडम्बरों में कमी

    भक्तिमार्गी सन्तों ने धर्म में बाह्याडम्बरों की घोर निन्दा की और जीवन को सरल तथा आचरण को शुद्ध बनाने का उपदेश दिया।

    (4.) मूर्ति-पूजा का खंडन

    कबीर, नामदेव तथा नानक आदि संत निर्गुण-निराकार ईश्वर की पूजा में विश्वास रखते थे। उन्होंने मूर्ति-पूजा का खंडन किया।

    (5.) उदार भावों का संचार

    भक्ति-मार्गी सन्तों के उपदेशों के फलस्वरूप हिन्दुओं तथा मुसलमानों में उदारता का संचार हुआ और वे एक दूसरे के प्रति सहिष्णुता प्रदर्शित करने लगे।

    (6.) धर्मों की मौलिक एकता का प्रदर्शन

    भक्तिमार्गी सन्तों तथा सूफी प्रचारकों ने एकेश्वरवाद, ईश्वर प्रेम एवं भक्ति पर जोर देकर दोनांे धर्मो की मौलिक एकता प्रदर्शित की। इसका हिन्दू तथा मुसलमान, दोनों पर प्रभाव पड़ा और वे एक दूसरे को समझने का प्रयत्न करने लगे।

    (7.) जातीय एवं व्यक्तिगत गौरव की उत्पति

    भक्ति मार्गी सन्तों द्वारा विष्णु एवं उसके अवतारों के भक्त-वत्सल होने तथा अत्याचारी का दमन करने के लिये अवतार लेने का संदेश बड़ी मजबूती से जनमसामान्य तक पहुँचाया गया। इससे हिन्दुओं में जातीय एवं व्यक्तिगत गौरव उत्पन्न हुआ। वे निर्बल की रक्षा करना ईश्वरीय गुण मानने लगे और स्वयं को भी इस कार्य के लिये प्रस्तुत करने लगे। उन्होंने गौ, स्त्री तथा शरणागत की रक्षा को ईश कृपा प्राप्त करने का माध्यम माना।

    (8.) प्रान्तीय भाषाओं का विकास

    भक्ति मार्गी सन्तों ने अपने उपदेश जन-सामान्य तक पहुँचाने के लिये लोक भाषाओं को अपनाया। फलतः प्रान्तीय भाषाओं तथा हिन्दी भाषा की प्रगति को बड़ा बल मिला और विविध प्रकार के साहित्य की उन्नति हुई।

    (9.) दलित समझी जाने वाली जातियों को नवजीवन

    सन्तों के उपदेशों से भारत की दलित समझी जाने वाली जातियों में नवीन उत्साह तथा नवीन आशा जागृत हुई। भक्ति, प्रपत्ति और शरणागति के मार्ग का अवलम्बन करके हर वर्ग एवं हर जाति का मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर सकता था। इस आन्दोलन ने भारतीय समाज में उच्च एवं निम्न जातियों के बीच बढ़ती हुई खाई को कम किया तथा हिन्दू समाज में नवीन आशा का संचार किया।

    (10.) राष्ट्रीय भावना की जागृति

    भक्ति आन्दोलन का राजनीतिक प्रभाव भी बहुत बड़ा पड़ा। इसी आन्दोलन के परिणामस्वरूप पंजाब तथा महाराष्ट्र में मुगल काल में राष्ट्रीय आन्दोलन आरम्भ हुए। इस आन्दोलन को पंजाब में गुरु गोविन्दसिंह ने और महाराष्ट्र में शिवाजी ने चलाया था। यह प्रभाव ब्रिटिश शासन काल में भी चलता रहा।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • अध्याय - 26 वैक्स म्यूजियम जयपुर

     02.06.2020
    अध्याय - 26 वैक्स म्यूजियम जयपुर

    अध्याय - 26 वैक्स म्यूजियम जयपुर


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राजस्थान सरकार के पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग द्वारा जयपुर के नाहरगढ़ में जयपुर वैक्स म्यूजियम की स्थापना की गई है। इस दुर्ग का निर्माण अठारहवीं शताब्दी ईस्वी में जयपुर के कच्छवाहा राजाओं द्वारा किया गया था। इस संग्रहालय में इतिहास, कला, संस्कृति, सिनेमा, खेल, विज्ञान आदि क्षेत्रों के प्रसिद्ध व्यक्तियों के मोम एवं सिलिकॉन के पुतले रखे गए हैं।

    इस संग्रह के पुतलों का निर्माण प्रसिद्ध मोमशिल्पी सुशांत रे द्वारा किया गया है। संग्रहालय के रॉयल खण्ड में जयपुर एवं राजस्थान के अन्य रजवाड़ों के प्रसिद्ध राजाओं एवं रानियों के मोम के पुलते रखे गए हैं। ये पुतले इतने सजीव जान पड़ते हैं मानो अभी बोल पड़ेंगे। प्रत्येक पुतले के साथ उस व्यक्ति के युग का परिवेश जीवित करने का प्रयास किया गया है।

    इस संग्रहालय की सजावट अंतर्राष्ट्रीय मानदण्डों के अनुसार की गई है। इस संग्रहालय की संकल्पना वर्ष 2006 में पिंकसिटी फिल्म फैस्टीवल के दौरान अनूप श्रीवास्तव द्वारा की गई। उस समय फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन के पुतले का अनावरण किया गया। इस प्रकार के पुतलों का संग्रह बनाने के लिए सुशांत रॉय आदि अन्य कलाकारोें को इस परियोजना से जोड़ा गया। शीघ्र ही इस संग्रह के लिए 32 पुतले बना लिए गए। संग्रहालय में एक रॉयल दरबार का निर्माण किया गया है।

    इसमें प्रसिद्ध महाराजाओं एवं महारानियों के मोम के पुतले प्रदर्शित किए गए हैं। महाराजाओं एवं महारानियों के पुतलों की स्थापना के लिए कक्ष बनाने हेतु नाहरगढ़ में स्थित शीश महल की दीवारों एवं स्तम्भों का जीर्णोद्धार किया गया तथा उनमें पुनः अच्छी गुणवत्ता के शीशे जड़े गए ताकि मध्यकालीन रियासती ठाठ का पुननिर्माण किया जा सके ताकि इसे देखकर दर्शक को उसी युग का आभास हो सके। इस कक्ष में एक ऐसा दर्पण रखा गया है जिसमें देखने पर ऐसा आभास होता है मानो राजसी वस्त्र धारण कर लिए हैं। इस दर्पण को इसी वैक्स म्यूजियम के कलाकारों ने तैयार किया है।

    एक अन्य कक्ष जिसमें पहले योद्धा विश्राम किया करते थे, उसे भी शीशमहल में परिवर्तित किया गया है। उसमें श्वेत, नीले, लाल, पीले, हरे कांच के 25 लाख टुकड़े लगाए गए हैं। इसे लगाने में 80 दक्ष कलाकारों ने 180 दिन तक काम किया। इस कक्ष में प्रवेश करते ही 23 कैरेट स्वर्ण मिश्रित जवाहरातों से बनी पट्टियों की रंगोली बनाई गई है। इस कक्ष में पेंटिंग्स, पालकी, झूमर, तथा अन्य कलाकृतियां रखी गई हैं।

    टीकड़ी कांच के टुकड़ों का प्रयोग करके सुंदर पुष्पाकृतियों का निर्माण किया गया है। संग्रहालय में सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक आइंस्टीन, अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला, जयपुर की महारानी गायत्री देवी, फिल्म अभिनेता गोविंदा, तिब्बती बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा, भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, भारत के राष्ट्रपति अब्दुल कलाम, नर्तक माइकल जैक्सन आदि विश्व प्रसिद्ध व्यक्तियों एवं स्पाईडरमैन जैसे फैंटेसी पात्रों के मोम के पुतले रखे गए हैं।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×