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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-54

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-54

    पर्यावरण एवं संस्कृति का मिलन बिंदु : आहार एवं व्यंजन


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राजस्थान के परम्परागत आहार एवं व्यंजन, पर्यावरण एवं संस्कृति के मिलन बिंदु हैं। राजस्थान का परम्परागत आहार, देश के शेष भागों से काफी भिन्न है।

    विभिन्न प्रकार की रोटियाँ

    राजस्थान के प्रत्येक भाग में प्रयुक्त होने वाली बाजरे की मोटी रोटी को सोगरा कहा जाता है। गेंहू की मोटी रोटी को टुक्कड़ अथवा टिक्कड़ कहा जाता है। टुक्कड़ के भीतर घी नहीं भरा होता है जबकि टिक्कड़ के भीतर घी भरा हुआ होता है। पतली चपातियों को सुखा कर खाखरे बनाये जाते हैं। ये कई दिन तक चलते हैं अतः यात्रा, तीर्थाटन एवं विदेश गमन में इनका अधिक महत्व होता है। खाखरे कई प्रकार से बनाये जाते हैं। कुछ खाखरे बिल्कुल सादे होते हैं तो कुछ मसाले एवं दालों से युक्त एवं तले हुए। खाखरों की पैकिंग बाजार में बिकती है। गेहूँ, चावल तथा मक्का के आटे से कई प्रकार के खीचिये बनाये जाते हैं। इन्हें तलकर अथवा आग पर सेक कर खाया जाता है। इनका भी लम्बे समय तक भण्डारण किया जा सकता है तथा नाश्ते के रूप में खाया जाता है। शहरी क्षेत्रों में पूड़ी, कचौड़ी एवं परांठों का भी बड़े स्तर पर प्रचलन है।

    विभिन्न प्रकार के दलिये

    राजस्थान में गेहूँ, बाजरा, चावल एवं मक्का से बनने वाले विभिन्न प्रकार के दलिये प्रयुक्त किये जाते हैं। बाजरी व मोठ की दाल के योग से खीच अथवा खीचड़ा बनता है। गेंहूं के दलिये व गुड़ के योग से बनी लापसी विवाह आदि अवसरों पर परोसी जाती है। राजस्थान में साबत गेहूँ को उबाल कर घूघरी बनाने का भी प्रचलन है। यह मांगलिक अवसरों पर प्रसाद के रूप में वितरित होती है तथा किसी मांगलिक अवसर पर एकत्रित हुई महिलाओं में भी बांटी जाती है। आदिवासियों में मक्का का दलिया छाछ में उबाल कर बनाया जाता है। इसे कई दिनों तक खाया जा सकता है।

    विशिष्ट व्यंजन

    दाल-बाटी-चूरमा राजस्थान का विशिष्ट व्यंजन माना जाता है। छाछ तथा बाजरी के योग से बनी राबड़ी, आटे व दाल के योग से बने दाल-ढोकले शहरों एवं गाँवों में चाव से खाये जाते हैं। राब अथवा राबड़ी छाछ में बाजरी के आटे के योग से बनायी जाती है। इसे स्वास्थ्य के लिये अच्छा माना जाता है। यह ग्रीष्म ऋतु का भोजन है। आटे और नमक का काफी पतला हलुआ पटोलिया कहलाता है। सुपाच्य होने के कारण इसे बीमार मनुष्य को खाने के लिये दिया जाता है।

    विभिन्न प्रकार के पेय

    राजस्थान में दूध-दही की लस्सी तथा छाछ का अधिक प्रचलन है। शहरी क्षेत्रों में गर्मी के दिनों में जलजीरा एवं माखनिया लस्सी का अधिक प्रयोग होता है। चाय-कॉफी, शिकंजी एवं विभिन्न प्रकार के शरबत भी काम में लिये जाते हैं। गाय, भैंस एवं बकरी का दूध बड़े पैमाने पर प्रयुक्त होता है। कुछ चरवाहा जातियाँ सांड (मादा ऊँट) व भेड़ का दूध पीने, चाय बनाने एवं औषधि के रूप में प्रयुक्त करती हैं।

    राजस्थानी मिठाइयां

    राजस्थान में तीज-त्यौहार, अतिथि के आगमन, विवाह, जापा आदि अवसरों पर लापसी, विभिन्न प्रकार के लड्डू, नुकती, सीरा (हलुआ), मावा, पंजीरी, खीर, सत्तू, घेवर आदि बनाने का प्रचलन है। ये मिठाइयां घर में बनी होने के कारण सस्ती एवं मानव स्वास्थ्य के लिये निरापद होती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी मुख्यतः घरों में बनी मिठाइयां व्यवहृत होती हैं। यह राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति का सबसे बड़ा उदाहरण है। जोधपुर में रबड़ी के लड्डू तथा मावे की कचौरी, बीकानेर में रसगुल्ले, ब्यावर में तिलपट्टियां तथा मालपुए, जैसलमेर में गोटमां, किशनगढ़ में पेठे, मेड़ता में दूध पेड़े, सांभर में फीणी, लूनी में केशरबाटी, नावां में गोंद के पापड़, खारची में रबड़ी, खुनखुना में जलेबी, पाली में गूंजा, पुष्कर तथा नागौर में मालपुए बनते हैं जो देश-विदेश में भी जाते हैं।

    राजस्थानी नमकीन व्यंजन

    राजस्थान के कुछ नमकीन व्यंजनों ने देश-विदेश में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। इनमें बीकानेर के भुजिया तथा पापड़, जोधपुर की प्याज की कचौरी तथा मिर्ची बड़े प्रसिद्ध हैं।

    राजस्थान की विशिष्ट सब्जियाँ

    राजस्थान में प्रयुक्त होने वाली विशिष्ट सब्जियों में काचरे, कंकेड़े, कुमटी, कैर, सांगरी, ग्वारफली, ग्वारपाठा, टिंडे, खींपोली, लहसुन की चटनी, गट्टे, कढ़ी, पित्तौड़ आदि सम्मिलित होती हैं। पापड़ों तथा नमकीन भुजिया की सब्जी भी बनती है।

    काचरिया : कार्तिक-मिगसर माह में काचरियां तथा चिमड़ियां मिलती हैं। ये छोटी-छोटी बेलों पर लगने वाले मध्यम आकार के फल हैं जो कच्ची अवस्था में कड़वे तथा पकने पर खट्टे होते हैं। इनकी सब्जी-चटनी बनती हैं तथा सुखा कर भी रखा जाता है। छोटी काचरियों को सिराडिया अथवा चिराडिया कहते हैं। छीलकर सुखाये हुए काचरियों की माला गोटका कहलाती है। जब काचरियों की फांकें काटकर सुखाई जाती हैं तो उन्हें लोथरे कहते हैं। सुखाकर रखी गई काचरिया 2-3 साल तक प्रयुक्त हो सकती है।

    कैर (करील) : कैर अथवा करील के फलों को मारवाड़ में कैर, पंजाब से लगते जिलों में डेले तथा ब्रजक्षेत्र से लगते जिलों में टेंटी कहा जाता है। इसका फूल लाल रंग का तथा फल हरे रंग का होता है। चैत्र-वैशाख में कैर की झाड़ी में कैर लगते हैं। हरे कैरों की सब्जी वे अचार बनता है तथ सुखाकर दो-चार साल तक काम लिये जाते हैं।

    चापटिया : कुमट के पेड़ से प्राप्त फल चापटिया कहलाता है। ये मिगसर(अगहन), पौष, माघ तथा फाल्गुन माह में तोड़े जाते हैं। इन्हें पानी में उबाल कर सुखा लिया जाता है तथा वर्ष भर काम में लिया जा सकता है।

    सांगरी : खेजड़ी से प्राप्त फलियां सांगरी कहलाती हैं। ये वैशाख तथा ज्येष्ठ माह में तोड़ी जाती हैं। इनसे सब्जी बनती है। इन्हें सुखाकर भी रखा जाता है। सूखी हुई सांगरियां 5-6 साल तक काम में आ सकती हैं। जब सांगरियां पेड़ पर ही पक जाती हैं और सूख कर पीली पड़ जाती हैं तो उसे खोखा कहते हैं।

    टिणसी : खेतों में फसलों के बीच उगने वाली बेलों पर लगने वाली टिणसी जब हरी होती है तब तो सब्जी बनाने के काम आती ही है, यह सुखाकर भी रखी जाती है तथा वर्ष भर पचकूटे की सब्जी में डालकर काम में ली जाती है।


    फास्टफूड का विकल्प हैं राजस्थानी आहार एवं व्यंजन

    देश में तेजी से फैलती जा रही महानगरीय संस्कृति में फास्ट फूड कल्चर ने सुरसा की तहर मुँह पसार लिया है। छोटे-छोटे कस्बों में भी ब्रेड, बटर, चिकन, आमलेट, पेस्ट्री, बर्गर, पिज्जा, चूइंगम, जैम, जैली तथा सॉस का प्रचलन होने गया है। सामान्यतः फास्ट फूड की मार्केटिंग पैकिंग के भीतर होती है। इन्हें लम्बे समय तक बैक्टीरिया से बचाने के लिये इनमें तरह-तरह के रसायनों का उपयोग होता है जो कि मानव स्वास्थ्य के लिये अत्यंत हानिकारक होते हैं। इन उत्पादों को बनाने में प्रायः खराब, कम गुणवत्तायुक्त, घटिया एवं खराब सामग्री का उपयोग होता है। इस कारण भी फास्ट फूड, मानव स्वास्थ्य के लिये बड़ा खतरा बन गये हैं। इनमें उच्च कैलौरीयुक्त वसा, चीनी एवं कृत्रिम रंगों का प्रयोग होता है जबकि राजस्थानी व्यंजन यथा लड्डू, मठरी, खाखरे, भुजिये, नुकती, सांगरी की सब्जी, अचार आदि को लम्बे समय तक सुरक्षित बनाने के लिये किसी रसायन का प्रयोग नहीं होता, न ही कृत्रिम रंग मिलाये जाते हैं। इसी प्रकार बाजार में बिकने वाली मिठाइयों में खतरनाक कृत्रिम रंगों, कृत्रिम सुगंधों, मिलावटी दूध, खोए एवं घी का प्रयोग होता है।

    कृत्रिम रंगों एवं सुगंधों के माध्यम से इन मिठाइयों के दोषों को ढंका जाता है जो मानव स्वास्थ्य एवं पर्यावरण दोनों के लिये अत्यंत घातक हैं। इनके उपयोग से पेट के रोगों यथा- एसिडिटी एवं अल्सर से लेकर त्वचा रोग, जोड़ों के रोग तथा कैंसर जैसी बीमारियां बढ़ रही हैं। इसलिये राजस्थानी आहार एवं व्यंजन, फास्ट फूड का अच्छा विकल्प हो सकते हैं। धन की बचत एवं पर्यावरण की दृष्टि से भी देशी व्यंजन अधिक उपयोगी हैं।

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  • अध्याय - 25 हिन्दुओं की जाति-प्रथा

     02.06.2020
    अध्याय - 25 हिन्दुओं की जाति-प्रथा

    हिन्दुओं की जाति-प्रथा


    हिन्दुओं के लिए जाति-संगठन उनका क्लब, उनका व्यावसायिक संघ और उनका हितकारी तथा मानव-प्रेमी समाज है। जाति-प्रथा के कारण भारत में कोई दरिद्रालय अथवा सुधारालय नहीं है, उसकी कोई आवश्यकता भी नहीं है। - सिडनी लो, ए विजन ऑफ इण्डिया।


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    प्राचीन भारतीय आर्य ही, सिन्धु नदी के क्षेत्र में रहने के कारण हिन्दू कहलाए। आगे चलकर वे ही भारतीय समाज का मुख्य हिस्सा बने। आर्य-क्षत्रियों ने देश के विभिन्न भागों में छोटे-बड़े राज्यों का निर्माण किया। इसलिए आर्य संस्कृति का ही पूरे देश में न्यूनाधिक प्रचार हो गया। इसी को हिन्दू संस्कृति कहा गया। भारत की अनार्य संस्कृतियाँ भी इसी संस्कृति में समाती चली गईं। जाति-प्रथा, हिन्दू संस्कृति की प्रमुख सामाजिक व्यवस्था थी जिसका विकास आर्यों की प्राचीन वर्ण-व्यवस्था से हुआ और जो अब तक चली आ रही है।

    जाति से तात्पर्य

    'जाति' शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत की 'जन' धातु से मानी गई है जिसका अर्थ 'जन्म' से लिया जाता है। इसका सम्बन्ध 'प्रजातीय' अथवा 'जन्मगत' व्यवस्था से है। आधुनिक समाज-शास्त्रियों ने भारतीय समाज में प्रचलित जाति-व्यवस्था को अनेक प्रकार से परिभाषित करने का प्रयास किया है।

    समाजशास्त्रियों के अनुसार भारतीय जाति-व्यवस्था सामाजिक संगठन का सामान्य रूप है जो हिन्दू समाज को समूहों में विभक्त करता है, जिसके स्तर और आचरण में सम्यक् अंतर है। इसे विकसित होने में सैंकड़ों वर्ष लगे हैं तथा इसमें काल-परिवर्तन के साथ अनेक परिवर्तन होते रहे हैं। आज भारत के हिन्दू समाज में तीन हजार से भी अधिक जातियाँ और उपजातियाँ अस्तित्व में हैं।

    कुछ समाजशास्त्रियों ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि भारतीय जाति-प्रथा कुटुम्बों अथवा कुटुम्बों के समूहों का समवेत रूप है जो साधारण नाम के साथ एक काल्पनिक पूर्वज, कुलदेवता या एक सामान्य वंश परम्परा से सम्बन्ध रखती है। भारतीय जाति-प्रथा के उद्भव के सम्बन्ध में किसी काल्पनिक पूर्वज या कुलदेवता के होने की बात सही नहीं है क्योंकि किसी पूर्वज या कुलदेवता का सम्बन्ध किसी जाति के गौत्र-विशेष से होता हे न कि सम्पूर्ण जाति से। जाति-प्रथा के उद्गम का आधार व्यवसाय है न कि पूर्वज या देवता।

    इतिहासकार स्मिथ के अनुसार- 'जाति उन परिवारों का एक समूह है जो धार्मिक क्रियाविधि की विशुद्धता, खान-पान और वैवाहिक-सम्बन्ध की पवित्रता के विशिष्ट नियमों का पालन करने के लिए परस्पर संगठित है।'

    हर्बर्ट रिजले के अनुसार- 'जाति परिवारों के संगठन या समूह को कहते हैं। उस समूह के सदस्यों का एक ही नाम होता है जो किसी ईश्वरीय या महान् मानवीय अस्तित्त्व से सम्बन्धित होता है, उनका एक ही व्यवसाय होता है और योग्य व्यक्तियों के विचारानुसार वे एक संयुक्त समुदाय हैं।'

    आर. एन. मुकर्जी के अनुसार- 'जाति जन्म पर आधारित सामाजिक संस्कार और वर्ग-विभाजन की वह गतिशील व्यवस्था है जो आवागमन, खान-पान, विवाह, व्यवसाय और सामाजिक सहवास के सम्बन्ध में अपने सदस्यों पर नियम या प्रतिबन्ध लागू करती है।'

    डॉ. शाम शास्त्री के अनुसार- 'आहार और विवाह सम्बन्धी सामाजिक पृथकत्व को ही जाति कहते हैं।'

    जाति प्रथा का आरम्भ

    ऋग्वैदिक-काल से ही चार प्रधान श्रेणियों के अतिरिक्त अनेक व्यवसायपरक जातियाँ उत्पन्न होने लगी थीं। ऋग्वेद में चर्मग्न, चर्मकार, कापरी, लोहार-तष्टा, बढ़ई-वप्ता, नापित भिषक-वैद्य आदि कार्य करने वाले लोगों का उल्लेख है। ये लोग ही आगे चलकर व्यावसायिक समूहों में संगठित हो गए और उनकी जातियाँ निश्चित होने लगीं। उत्तरवैदिक-काल में अनेक प्रकार के व्यवसाय और शिल्प होने लगे।

    इस काल तक रथकार (रथों का निर्माण करने वलो), सूत (सारथि), वाय (जुलाहा), स्वर्णकार, कर्मार (लोहार), तक्ष, क्षातृ, कुलाल (कुम्हार), ईषुकृत, धवकृत, मृगयु (शिकारी), रज्जुसर्ग, वय, मणिकार, सुराकार, विदलकार, कंटककार, निषद, श्वनि (श्वान-रक्षक), तच्चक (बढ़ई) आदि अनेक व्यवसाय प्रधान वर्गों का उल्लेख हुआ है। इस काल में सूत को उच्च पद प्राप्त था। इस काल में लोहार को इतना आदर प्राप्त था कि उसे मनीषी शिल्पकार कहा जाता था। रथकार को अग्निहोत्र करने का अधिकार था।

    दसवीं-ग्यारहवीं सदी ईस्वी में भारत आए अरबी लेखक अलबरूनी ने हिन्दुओं के चार वर्णों के बारे में लिखा है, जिससे अनुमान होता है कि इस काल तक वर्ण व्यवस्था प्रचलित थी किंतु विभिन्न वर्णों के भीतर जातियाँ, धीरे-धीरे स्थूल रूप लेती जा रही थीं। इस काल तक वैश्य और शूद्र का वर्गीकरण भी उत्तर-वैदिक काल की तरह पुनः स्पष्ट हो गया था। कृषकों एवं पशुपालकों को वैश्य मान लिया गया था तथा विभिन्न शिल्पकर्म में संलग्न वर्ग, शूद्र वर्ण की जातियों में समाहित हो रहे थे।

    बारहवीं शताब्दी के आते-आते भारत में अनेक जातियाँ बन गईं जो व्यवसाय के साथ-साथ आचार-विचार में भी एक दूसरे से अलग थीं। ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य जैसी उच्च जातियां, निम्न-व्यवसाय अपनाने वाली जातियों से प्रायः अलग रहती थीं। यदि इन तीन उच्च जातियों के सदस्य किसी बढ़ई, लोहार, सुनार गन्ने के रस या अन्य द्रव पदार्थ के व्यापारी, तेली बुनकर, रंगरेज, बेत का कार्य करने वाले या धोबी से भोजन ग्रहण करते हैं तो उन्हें प्रायश्चित स्वरूप तप करना पड़ता था। अंगिरा के अनुसार धोबी, चमार, मछुए या बेत का कार्य करने वाले का स्पर्श नहीं करना चाहिए।

    जाति-प्रथा की विशेषताएँ

    भारतीय समाज में प्रचलित जाति-प्रथा की कुछ निश्चित विशेषताएँ हैं-

    (1.) यह जन्म पर आधारित है अर्थात् बालक जिस जाति के सदस्य के घर में जन्म लेगा उसकी जाति भी वही होगी।

    (2.) वैवाहिक सम्बन्ध अपनी जाति में ही किए जाते हैं। इस नियम का उल्लघंन करने पर भारी अर्थ-दण्ड देना पड़ता है और कभी-कभी जाति से भी बहिष्कृत कर दिया जाता है। वर्तमान समय में यह बन्धन शिथिल हो गया है।

    (3.) प्राचीन काल मंे प्रत्येक जाति का प्रायः पैतृक व्यवसाय होता था, किन्तु आधुनिक काल में इस विशेषता का लोप हो गया है।

    (4.) जाति-व्यवस्था में खान-पान पर कठोर नियन्त्रण होता है। प्रत्येक जाति का कुछ दूसरी जातियों के साथ खान-पान का व्यवहार नहीं होता है।

    (5.) सामाजिक रीति-रिवाजों तथा त्यौहारों के अवसर पर जातीय नियमों का पालन करना पड़ता है।

    (6.) इस व्यवस्था में बहुत सी जातियाँ उच्च-स्तर की मानी जाती हैं तथा कुछ निम्न-स्तर की। निम्न-स्तर की जातियों के साथ उच्च-स्तर की जातियों का व्यवहार एक-समान नहीं होता।

    वर्ण व्यवस्था और जाति-प्रथा में अन्तर

    वर्ण व्यवस्था एवं जाति-व्यवस्था आर्यों की सामाजिक व्यवस्था के दो रूप हैं। इन दोनों व्यवस्थाओं में मूलभूत समानता होते हुए भी अनेक अन्तर हैं-

    (1.) वर्ण-व्यवस्था का प्रारम्भ ऋग्वैदिक एवं उत्तरवैदिक-काल में हुआ था जबकि जाति-व्यवस्था उसके बहुत बाद उत्पन्न हुई।

    (2.) वर्ण का प्रारम्भिक सम्बन्ध मनुष्य की त्वचा के रंग से था किंतु बाद में उसका आधार कर्म से हो गया। जाति का सम्बन्ध किसी निश्चित व्यवसाय में संलग्न समुदाय में जन्म लेने से था।

    (3.) वर्ण व्यवस्था सहज स्वाभाविक रूप से उत्पन्न हुई थी किंतु जाति व्यवस्था, वर्ण व्यवस्था का ही जटिल रूप है।

    (4.) वर्ण का सम्बन्ध राजनीतिक और सामाजिक स्थिति से था परन्तु जाति का सम्बन्ध परम्परागत व्यवसाय और विशिष्ट सामाजिक रीति-रिवाजों से था।

    (5.) एक ही वर्ण में एक व्यवसाय और भिन्न-भिन्न व्यवसाय करने वाले लोग सम्मिलित थे परन्तु एक जाति में एक ही व्यवसाय करने वाले लोग होते थे।

    (6.) वर्ण-व्यवस्था मूलतः कर्म पर आधारित थी, जबकि जाति-व्यवस्था जन्म पर आधारित थी।

    (7.) वर्ण-व्यवस्था में विभिन्न वर्णों एवं समुदायों के बीच, खान-पान और सहभोज, विवाह सम्बन्ध आदि आचरण प्रचलित थे परन्तु विभिन्न जातियों में ऐसी प्रथाएं वर्जित थीं।

    (8.) वर्ण-व्यवस्था में अस्पृश्यता का प्राधान्य नहीं था परन्तु जाति-व्यवस्था में छुआछूत का भेदभाव अपने चरम पर था।

    (9.) वर्ण-व्यवस्था में रक्त की शुद्धता पर कम बल दिया जाता था परन्तु जाति-व्यवस्था में रक्त की शुद्धता एवं धार्मिक और सामाजिक रीति-रिवाजों की विशिष्टता पर अधिक जोर दिया जाता था।

    (10.) वर्ण-व्यवस्था परिवर्तनशील थी अर्थात् कोई भी व्यक्ति दूसरे वर्ण की योग्यता को अपनाकर उस वर्ण को अपना सकता था परन्तु जाति-व्यवस्था में जाति-परिवर्तन सम्भव नहीं होता है।

    जाति-प्रथा की उत्पत्ति

    जाति-प्रथा की उत्पत्ति, वर्ण व्यवस्था का ही विकसित और जटिल रूप है। जाति-प्रथा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनेक सिद्धान्त प्रतिपादित किए गए हैं-

    (1.) विराट पुरुष से वर्ण-उत्पत्ति का सिद्धान्त: ऋग्वेद के पुरुषसूक्त के अनुसार ब्राह्मणों की उत्पत्ति विराट पुरुष (ब्रह्म) के मुख से, क्षत्रियों की उत्पत्ति विराट पुरुष की भुजाओं से, वैश्यों की उत्पत्ति विराट पुरुष की जंघाओं से तथा शूद्रों की उत्पत्ति विराट पुरुष के चरणों से हुई। इस प्रकार वर्णों की उत्पत्ति में ईश्वरीय तत्त्व और देव-आज्ञा की अवधारणा बनाई गई ताकि जनसाधारण वर्ण-व्यवस्था के प्रति आस्था बनाए रखे। जिस प्रकार वर्ण-विभाजन को ईश्वरीय माना गया, उसी प्रकार जाति-व्यवस्था को भी देव-निर्मित समझा गया।

    (2.) कुल देवता से उत्पत्ति का सिद्धान्त: होकाट के अनुसार प्राचीन काल में राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि समझा जाता था और उसे अनेक धार्मिक कृत्य करने पड़ते थे। अतः राजा ने विभिन्न कार्यों के लिए विभिन्न लोगों को नियुक्त किया और उन्हें पद तथा प्रतिष्ठा प्रदान की। इन लोगों के बन्धु-बान्धव एक समूह में संगठित होते गए। सेनार्ट की मान्यता है कि लोग अलग-अलग कुलदेवता की पूजा करते थे और उनके वंशज अपने आपको उसी कुलदेवता की सन्तान समझने लगे। एक देवता को मानने वाले ने दूसरे देवता को मानने वालों के साथ खान-पान तथा वैवाहिक सम्बन्धों आदि के मामलों में प्रतिबन्ध लगाने आरम्भ कर दिए। इस प्रकार भिन्न-भिन्न समूहों का निर्माण हुआ जो आगे चलकर जातियों में बदल गए।

    (3.) राजनीतिक नियंत्रण का सिद्धान्त: प्रसिद्ध समाजशास्त्री अबेडुबायस की मान्यता है कि ब्राह्मणों ने अपने लाभ तथा अपनी प्रभुता को बनाए रखने के लिए एक चतुर राजनीतक योजना बनाई। उन्होंने धार्मिक कृत्यों के सम्पादन का एकाधिकार अपने पास रखकर समाज के अन्य लोगों को अपने नियंत्रण में कर लिया, जाति-प्रथा इसी योजना का परिणाम थी।

    (4.) रक्त की शुद्धता का सिद्धान्त: आर्यों की सभ्यता के प्रारम्भ में किसी प्रकार की सामाजिक एवं व्यावसायिक संरचना नहीं थी। समस्त आर्य समान रूप से एक ही समुदाय में रहते थे। भारत में आने पर उन्होंने भारत के मूल निवासियों को परास्त किया। आर्यों ने अपने रक्त की शुद्धता को बनाए रखने के लिए उन्हें अपने से निम्न सामाजिक स्तर प्रदान किया। इस प्रकार रक्त की शुद्धता के आधार पर दो वर्ण बन गए- एक आर्य और दूसरे अनार्य (दस्यु)। रक्त की शुद्धता के विचार ने ही आर्यों को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र वर्णों में विभक्त कर दिया। कालांतर में प्रत्येक वर्ण में आवश्यकतानुसार छोटे-छोटे व्यावसायिक समूह बनने लगे। प्रत्येक समूह के लोगों ने अपने रक्त की शुद्धता बनाए रखने के लिए भिन्न व्यवसाय के लोगों से वैवाहिक और खान-पान के सम्बन्ध अलग कर लिए और जाति-व्यवस्था अस्तित्व में आई।

    (5.) आर्थिक सिद्धान्त: समाज-शास्त्री वैजित इवेटसन की मान्यता है कि जाति-प्रथा की उत्पत्ति आर्थिक हितों की सुरक्षा का परिणाम थी। सभ्यता के विकास के साथ-साथ नये-नए व्यवसाय भी फैलने लगे और धीरे-धीरे ये व्यवसाय आर्थिक संघों में संगठित हो गए। कालान्तर में अपने-अपने व्यवसाय के हितों की रक्षा करने के लिए व्यवसाय को वंश-परम्परा में बदल दिया गया। इसी से जाति-प्रथा की उत्पत्ति हुई। प्रोफेसर नेसफील्ड का मत है कि जातीय भिन्नताएँ उद्योग-धन्धों की भिन्नता के कारण हैं। जे. एस. मिल की मान्यता है कि व्यवसायों की ऊँच-नीच की भावना से जाति-प्रथा में ऊँच-नीच की भावना आ गई। कुछ विद्वानों की मान्यता है कि जाति-प्रथा का निर्माण श्रम-विभाजन के आधार पर हुआ जैसे- पुरोहिताई, लुहारी, सुनारी, बढ़ईगिरी, बुनकरी आदि।

    (6.) भौगोलिक सिद्धान्त: इस सिद्धान्त के प्रतिपादक क्लिब्रेट की मान्यता है कि विभिन्न स्थानों पर बस जाने के कारण एक स्थान पर बसे समूह के खान-पान, रीति-रिवाज तथा अन्य बातों में दूसरे स्थान पर बसे समूह से भिन्नता आ गई। इस भिन्नता ने जाति-प्रथा को जन्म दिया।

    इस प्रकार भारतीय जाति-प्रथा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनेक सिद्धान्त प्रतिपादित किए गए हैं परन्तु इनमें से कोई भी सिद्धांत पूर्ण नहीं है। भारतीय जाति-व्यवस्था का विकास क्रमशः हुआ है और यह भौगोलिक, राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक कारणों का मिश्रित परिणाम है।

    जाति-प्रथा का विकास

    वर्ण-व्यवस्था का स्थान लेने वाली जाति-व्यवस्था धीरे-धीरे अत्यधिक जटिल होती चली गई। विभिन्न वर्णों के अंतर्गत अनेक जातियाँ बन गईं और ये जातियाँ भी उपजातियों में विभाजित हो गईं। प्रत्येक जाति का एक विशेष व्यवसाय था और उस व्यवसाय पर उसी जाति का एकाधिकार हो गया। अब जन्म से ही मनुष्य की जाति निश्चित थी और इसमें परिवर्तन नहीं हो सकता था। जातियों की संख्या में वृद्धि के साथ-साथ जाति-प्रथा में संकीर्णता और अपरिवर्तनशीलता भी बढ़ी। जाति-प्रथा के विकास में कई कारकों ने भूमिका निभाई-

    (1.) पुरोहितों की भूमिका: वर्ण-व्यवस्था को 'कर्म' के स्थान पर 'जन्म' आधारित बनाने में पुरोहितों (ब्राह्मणों) की बड़ी भूमिका थी। उन्होंने वर्णों को ईश्वरीय-रचना घोषित किया। इस व्यवस्था में ब्राह्मणों की श्रेष्ठता और प्रमुखता की मजबूती से स्थापना की गई थी। ब्राह्मण सूत्रकारों ने धर्मशास्त्रों की रचना की तथा व्यवस्था दी कि जो व्यक्ति जन्म से ब्राह्मण नहीं है, वह पुरोहित का कार्य नहीं कर सकेगा। 'गौतम धर्म सूत्र' के रचनाकार गौतम ने व्यवस्था दी कि ब्राह्मण को ब्राह्मण या क्षत्रिय के यहाँ भोजन ग्रहण करना चाहिए। विशेष परिस्थितियों में वह वैश्य के घर भी भोजन ग्रहण कर सकता है किन्तु साधारणतः नहीं। इससे स्पष्ट है कि सहभोज और खान-पान की प्रथा परस्पर वर्गों या समूहों में निषिद्ध की जा रही थी। ब्राह्मणों ने समाज पर अपना प्रभुत्व बनाए रखने के लिए धर्मशास्त्रों में नवीन सिद्धान्त, निषेध, नियम आदि का निर्माण किया। ब्राह्मणों के भोजन की शुद्धता सम्बन्धी नियमों ने विभिन्न जातियों और वर्गों के पारस्परिक सहभोज को पूरी तरह समाप्त कर दिया। फलस्वरूप लोग छोटे-छोटे समुदायों में बँटने लगे और विभिन्न जातियों में परिवर्तित हो गए।

    (2.) नवीन व्यवसायों की भूमिका: आर्यों की आर्थिक-समृद्धि के साथ-साथ, नवीन व्यवसायों का विकास हुआ जिन्हें अपनाने वालों की पृथक्-पृथक् जातियाँ तथा उपजातियाँ बनने लगीं। व्यापारियों तथा शिल्पकारों ने अपने आपको विभिन्न श्रेणियों, संघों तथा समुदायों में विभक्त कर लिया जो कालान्तर में उनकी जातियाँ तथा उपजातियाँ बन गईं। इस प्रकार व्यवसायों की भिन्नता एवं विशेषता ने जाति-प्रथा के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    (3.) विदेशी आक्रांताओं की भूमिका: ईसा के पूर्व तथा बाद की प्रारम्भिक सदियों में यूनानी, शक, कुषाण, हूण, पह्लव तथा पार्थियन आदि विदेशी आक्रांता भारत में अपने छोटे-छोटे राज्य स्थापित करने में सफल हो गए। वे भारत के विभिन्न हिस्सों में बस गए। इन विदेशी लोगों ने स्थानीय रीति-रिवाजों और व्यवसायों को अपना लिया। भारतीय संस्कृति ने उन्हें भी व्यवसाय के आधार पर हिन्दू समाज में सम्मिलित कर लिया। इन लोगों ने भी अपने-अपने व्यवसायों के आधार पर अपनी नवीन जातियाँ बना लीं। 'गुर्जर' जाति का उद्भव खिजरों से माना जाता है जो कि विदेशी आक्रांता के रूप में भारत में आए थे। आज भी कुछ लोग अपनी जाति 'हूण' लिखते हैं।

    (4.) आर्य जाति का विभिन्न क्षेत्रों में जाकर बसना: आर्य प्रजा के प्रसार के साथ-साथ आर्यों के विभिन्न समूह भारत के विभिन्न क्षेत्रों में फैल गए। इन समूहों ने स्थानीय प्रथाओं एवं रीति-रिवाजों को अपना कर अपनी सामाजिक प्रथाओं और आचार-विचार के भिन्न नियम बना लिए। इस कारण उनमें और उनके सजातीय बन्धुओं में अंतर दिखाई देने लगा। ये अंतर समय के साथ अधिक दृढ़ होते चले गए तथा उनमें समस्त प्रकार के सामाजिक सम्पर्क और व्यवहार विलुप्त हो गए। परिणामस्वरूप नवीन जातियों का निर्माण होता चला गया। उदाहरण के लिए ब्राह्मण जाति के विभिन्न क्षेत्रों में बसे ब्राह्मण समूह अपने आपको पृथक् जाति के समझने लगे। इस प्रकार ब्राह्मण वर्ण में ही गोरवाल ब्राह्मण, पालीवाल ब्राह्मण, श्रीमाली ब्राह्मण, पुष्करणा ब्राह्मण, आदिगौड़ ब्राह्मण, गुर्जर-गौड़ ब्राह्मण, गौड़ ब्राह्मण आदि सैंकड़ों जातियां-उपजातियाँ बन गईं।

    (5.) रीति-रिवाजों में परिवर्तन एवं जाति बहिष्कार: अनेक बार स्थानीय प्रभाव के कारण अथवा अन्य परिस्थितियों के कारण किसी-किसी जाति के रीति-रिवाज में परिवर्तन करने लगे परन्तु उस जाति के बहुत से लोगों को रीति-रिवाजों में परिवर्तन पसन्द नहीं आए। अतः वे अपने को उनसे अलग करके अपनी नई जाति बना लेते थे। कभी-कभी जाति के रीति-रिवाजों, प्रथाओं तथा अनुशासन का उल्लंघन करने वाले परिवारों अथवा समूहों को जाति से बहिष्कृत कर दिया जाता था। ऐसे लोग भी आपस में खान-पान एवं वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करके नवीन जाति के रूप में संगठित हो जाते थे।

    (6.) जैन एवं बौद्ध धर्मों की भूमिका: यद्यपि जैन एवं बौद्ध दोनों ही धर्मों में ब्राह्मणों की बनाई वर्ण-आश्रम व्यवस्था को नकारा गया था किंतु इन दोनों धर्मों में धार्मिक रीतियों के आधार पर नई जातियों ने जन्म लिया। पहले अधिकांश जातियों में शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार के लोग थे किंतु अहिंसा के प्रभाव से बहुत-सी जातियों के शाकाहारियों ने मांसाहारियों से अलग होकर अपनी पृथक् जातियाँ बना लीं।

    (6.) नवीन धार्मिक सम्प्रदायों की भूमिका: उत्तरवैदिक-काल से लेकर मध्ययुग में विकसित होने वाले नवीन धार्मिक सम्प्रदायों के अनुयाइयों ने भी पृथक् जातियों का रूप ले लिया, जैसे कि लिंगायत, कबीर-पन्थी, रामदासी, दादूपन्थी, रामस्नेही इत्यादि।

    (7.) दार्शनिक मान्यताओं की भूमिका: भारतीय दर्शन की, भाग्यवाद, कर्मवाद और पुनर्जन्मवाद की विचारधारा ने भी जाति-प्रथा को ठोस बनाने में अपना योगदान दिया। किसी जाति विशेष में जन्म लेने को भाग्य के साथ जोड़ दिया गया। धर्मशास्त्रों के रचयिताओं, व्याख्याकारों और टीकाकारों ने जाति-प्रथा को पुष्ट करने का प्रयत्न किया।

    (8.) अन्य कारकों की भूमिका: आर्य राजाओं ने ब्राह्मणों की बनाई हुई व्यवस्थाओं को स्वीकार करके जाति-व्यवस्था को स्थाई बनाने में योगदान दिया। सैंकड़ों वर्षों से अस्तित्त्व में रहने के कारण जाति-प्रथा की जड़ें इतनी गहरी हो गईं कि इस व्यवस्था को बदलना अथवा त्यागना सम्भव नहीं रहा। भारत में इस्लाम के प्रवेश के बाद मुस्लिम आक्रान्ताओं ने हिन्दुओं को बल-पूर्वक मुसलमान बनाना आरम्भ किया। इस पर हिन्दुओं ने स्वयं को जाति की मजबूत दीवारों में सुरक्षित बनाने का प्रयास किया। इस कारण जाति-व्यवस्था और भी अधिक जटिल व कठोर हो गयी। प्रत्येक जाति ने अपने अस्तित्त्व को बनाए रखने के लिए अपने चारों ओर रीति-रिवाजों और परम्पराओं का मजबूत परकोटा बना लिया जिसे लांघकर न तो कोई बाहर जा सकता था और न भीतर आ सकता था।

    जाति-प्रथा के गुण

    भारतीय जाति-व्यवस्था में अनेक गुण और दोष विद्यमान थे। जाति-व्यवस्था के निम्नलिखित गुणों का उल्लेख किया जा सकता है-

    (1.) सह-अस्तित्त्व की भावना: जाति-व्यवस्था ने भारतीय प्रजा को सह-अस्तित्व की भावना के साथ जीना सिखाया। प्रत्येक जाति केवल एक काम करने में दक्ष थी जबकि उसे अन्य जातियों द्वारा उत्पादित किए जा रहे उत्पादों की भी आवश्यकता थी। इस प्रकार सभी जातियाँ एक दूसरे की पूरक बन गईं और उनमें सह-अस्तित्व की भावना विकसित हुई।

    (2.) व्यावसायिक दक्षता: जाति-व्यवस्था का निर्माण व्यवसाय विशेष के आधार पर हुआ था। इस कारण प्रत्येक जाति का एक वंशानुगत व्यवसाय था। अतः वंशानुगत परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए एक पीढ़ी ने दूसरी पीढ़ी को व्यावसायिक शिक्षा एवं कौशल प्रदान किया। इस प्रकार समाज में पीढ़ी दर पीढ़ी व्यावसायिक दक्षता विकसित हुई और विभिन्न शिल्पकलाओं को न केवल पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखा जा सका अपितु उनका विकास भी सम्भव हो सका।

    (3.) प्रतिस्पर्द्धा का अभाव: जाति-व्यवस्था के अन्तर्गत प्रत्येक जाति का व्यवसाय और उद्योग अलग-अलग थे। व्यावसायिक प्रतिस्पर्द्धा नहीं होने के कारण समाज में उत्पन्न होने वाले संघर्ष, ईर्ष्या, घृणा एवं द्वेष आदि दुर्गुणों का प्रवेश नहीं हुआ। इससे सामाजिक जीवन में शान्ति बनी रही। राज्यशक्ति के क्षीण होने की अवस्था में जाति-व्यवस्था ने राजनैतिक संगठन की इकाई के रूप में कार्य किया तथा समाज को दृढ़ता प्रदान की।

    (4.) रक्त, वंश और वर्ण की शुद्धता: प्रत्येक जाति के खान-पान, आचार-विचार वैवाहिक सम्बन्ध और सम्पर्क के नियम निश्चित थे। अन्तर्जातीय-विवाह और विभिन्न जातियों में ऊँच-नीच की भावनाओं के कारण परस्पर सहभोज निषिद्ध थे। विवाह अपनी ही जाति में होते थे। इन नियमों को उल्लघंन करने वालों को जाति से बहिष्कृत किया जाता था। इस भय से समाज अपनी जातीय-नियमों के अनुशासन में रहता था जिससे रक्त, वंश और वर्ण की शुद्धता बनी रही और शारीरिक एवं मानसिक गुणों को सुरक्षित रखा जा सका तथा आर्यों को अवंाछनीय विदेशी रक्त के अपमश्रण से बचाया जा सका।

    (5.) हिन्दू संस्कृति एवं धर्म की रक्षा: जाति-प्रथा ने लोगों में रूढ़ियाँ, पृथकत्व की भावना और वर्ग-अभिमान को उत्पन्न किया जिससे जातीय नियमों, निषेधों और दण्ड-विधान में कठोरता आ गयी। इस कठोरता ने विदेशी संस्कृतियों के अतिक्रमण एवं हस्तक्षेप के विरुद्ध किलेबन्दी का काम किया। इसने हिन्दू समाज को इस्लाम के राजनीतिक एवं धार्मिक आघातों को सहन करने की शक्ति प्रदान की। जब देश राजनैतिक विप्लव, जातीय संघर्ष एवं अराजकता के युग से गुजर रहा था, तब जाति-प्रथा ने हिन्दू-धर्म और संस्कृति की रक्षा की। जाति-प्रथा से जुड़े हुए रीति-रिवाजों एवं परम्पराओं की सुदृढ़ किलेबन्दी ने इस्लामी रीति-रिवाजों एवं परम्पराओं को हिन्दू समाज के भीतर नहीं घुसने दिया। आक्रांता मुसलमानों से परास्त हो जाने के बावजूद अधिकांश हिन्दुओं ने अपने प्राणों का बलिदान देकर भी अपने धर्म की रक्षा की। इसका श्रेय भारतीय धार्मिक आदर्श एवं जाति-व्यवस्था को सम्मिलित रूप से जाता है।

    (6) अन्य गुण: जाति-प्रथा ने हिन्दू-धर्म को अपनी श्रेणियों के विस्तार के लिए मार्ग सुलभ कराया तथा विदेशी तत्त्वों के हिन्दू समाज में एकीकरण का काम किया। यह विदेशियों की इच्छा और रुचि पर निर्भर था कि वे हिन्दू-धर्म को स्वीकार करके अपनी नवीन जातियों का निर्माण कर लें और अपनी परम्पराओं एवं संस्कृति के मूल तत्त्वों को बनाए रखें। जाति-प्रथा की इस व्यावहारिक दृष्टि के कारण विदेशी आक्रमणकारियों के समूह शनैः-शनैः हिन्दू समाज में घुल-मिल गए। जाति-प्रथा ने बन्धुत्व भावना को बढ़ाया तथा एक जाति के सदस्यों में एकता एवं दृढ़ता स्थापित की। संकट और बेकारी के समय जाति के सदस्य, स्वजातीय बन्धुओं की सहायता करते थे। जाति-प्रथा ने स्वार्थ-त्याग, प्रेम और लोक-सेवा के नागरिक गुणों को भी प्रोत्साहित किया। अनेक सम्पन्न लोग अपनी जाति के लोगों के लिए चिकित्सालय, धर्मशालाएँ, मन्दिर, पाठशालाएँ आदि बनवाते थे। इससे जाति के लोगों को कम व्यय में जीवन-यापन करने की सुविधा उपलब्ध हुई। जाति-व्यवस्था ने सामुदायिक उत्तरदायित्व की भावना का विकास किया। इस प्रकार भारतीय जाति-व्यवस्था कई प्रकार से उपयोगी सामुदायिक संस्था के रूप में सफल रही।

    जाति-प्रथा के दोष

    अनेक गुणों के साथ-साथ जाति-व्यवस्था में अनेक दोष भी थे-

    (1.) संकीर्णता की भावना: जाति-प्रथा ने हिन्दू समाज को सैकड़ों वंश-परम्परागत जातियों और उपजातियों में विभाजित कर दिया जिसने पृथकत्व की भावना प्रज्वलित की और जन-साधारण की सोच को जाति के दायरे में संकुचित कर दिया। इससे समाज की एकता, संगठन-शक्ति और सहकारिता की भावना को हानि पहुँची। लोगों ने अपनी जाति की उन्नति के बारे में तो सोचा किंतु देश और समाज की उन्नति पर विचार करना बंद कर दिया।

    (2.) पारस्परिक फूट: विभिन्न जातियों एवं उपजातियों में एक दूसरे को नीचा समझने की प्रवृत्ति थी। विभिन्न जातियों के ईर्ष्या, द्वेष और संघर्ष ने समाज को प्रतिद्वन्द्वी समुदायों में विभक्त कर दिया और वे विदेशी आक्रमणों के विरुद्ध संगठित होकर नहीं लड़ सके। इससे राष्ट्रीयता का विकास रुक गया और भारतीयों की राजनैतिक एकता खतरे में पड़ गई।

    (3.) युद्ध का दायित्व जाति विशेष पर: जाति-व्यवस्था के कारण देश की रक्षा के लिए युद्ध करने एवं दस्युओं आदि से समाज की रक्षा करने का दायित्व क्षत्रिय जाति पर हो गया। दूसरी जातियों को अस्त्र-शस्त्र संचालन तथा युद्ध-कौशल से वंचित कर दिया गया। इस कारण विदेशी आक्रमणों के समय क्षत्रियों ने अकेले ही उनका सामना किया और वे परास्त हो गए। इसी प्रकार मुसलमानों के आक्रमण के समय राजपूतों ने अकेले ही उनका सामना किया। प्राचीन क्षत्रियों एवं उनके बाद अस्तित्व में आए राजपूतों में भी परस्पर ऊँच-नीच एवं कुल की श्रेष्ठता का अभिमान चरम पर था। इसलिए वे संगठित होकर नहीं लड़ सके और एक-एक करके परास्त हो गए।

    (4.) दक्षता एवं कार्यकुशलता में कमी: आर्थिक क्षेत्र में जाति-प्रथा के बंधन श्रम की दक्षता और व्यवसाय-कौशल को हानि पहुँचाते हैं। क्योंकि व्यक्ति को व्यवसाय विशेष में रुचि एवं योग्यता न होने पर भी अपनी ही जाति का परम्परागत व्यवसाय अपनाना पड़ता है। इस कारण प्रतिभा को अपनी रुचि का क्षेत्र चुनने का अवसर नहीं मिलता। इससे आर्थिक एवं बौद्धिक प्रगति रुक जाती है।

    (5.) बड़े औद्योगिक एवं व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से दूरी: जाति-प्रथा की संकीर्णता के कारण ही देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना से पहले किसी बड़े औद्योगिक एवं व्यावसायिक प्रतिष्ठान की स्थापना नहीं हो सकी क्योंकि लोग छोटे-छोटे समूहों में एवं कुटीर उद्योगों के रूप में कार्य करने के ही अभ्यस्त थे।

    (6.) व्यक्ति-स्वातंत्र्य को क्षति: जाति-व्यवस्था के अन्तर्गत कोई व्यक्ति अपनी जाति का व्यवसाय त्याग कर अन्य व्यवसाय नहीं अपना सकता था और न अपनी जाति छोड़कर दूसरी जाति ग्रहण कर सकता था। इससे व्यक्ति स्वातंत्र्य की हानि होती है और नैसर्गिक प्रतिभा कुंद होती है।

    (7.) अस्पृश्यता एवं असहिष्णुता का विस्तार: जाति-प्रथा ने एक दूसरे को नीचा समझने की प्रवृत्ति को उसके चरम पर पहुँचा दिया। इस कारण जातीय कुएं, जातीय तालाब, जातीय धर्मशालाएं का ही उपयोग करने का अधिकार रह गया। उनमें सामुदायिकता की सहज भावना का विकास नहीं हुआ। लोग एक दूसरे के प्रति असहिष्णु हो गए और शक्तिशाली समुदाय, अपने से कमजोर समुदाय पर अत्याचार करने लगे।

    जाति-प्रथा के सम्बन्ध में विद्वानों के विचार

    भारतीय जाति प्रथा विश्वभर के विद्वानों के लिए कौतूहल एवं अध्ययन का विषय रही है। अनेक पश्चिमी विद्वानों ने भारतीय जाति-प्रथा का समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से अध्ययन किया है एवं इसके सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त किए हैं। सिडनी लो नामक यूरोपीय समाजशास्त्री ने लिखा है- 'इसमें कोई संदेह नहीं है कि शताब्दियों तक राजनैतिक आघातों और प्राकृतिक विभीषिकाओं के विरुद्ध, भारतीय जाति प्रथा ने मूलभूत स्थायित्व और सन्तोष के द्वारा भारतीस समाज को बांधे रखने में मुख्य योगदान दिया है।'

    सर हेनरी कॉटन ने लिखा है- 'हिन्दू समाज में ढूंढी जा सकने वाली कठिनाइयों एवं सममस्याओं का कारण रूप होने की बजाए जाति-प्रथा ने अतीत में महत्वपूर्ण सेवा की है और वर्तमान में भी व्यवस्था तथा एक जुटता बनाए रखी है।'

    भारतीय इतिहास में चाण्डाल जाति

    मनुस्मृति तथा धर्मसूत्रों के अनुसार चाण्डाल जाति की उत्पत्ति शूद्र पुरुष और ब्राह्मण स्त्री से हुई थी। महाभारत में इसे नापित पुरुष और ब्राह्मण स्त्री की संतान माना गया है। इसे अत्यधिक हीन तथा महापातकी जाति के अंतर्गत रखा गया है। गौतम के अनुसार ये कुत्ते और कौए की कोटि के थे। आपस्तम्ब की दृष्टि में चाण्डाल को स्पर्श करना, उसे दखेना और उससे बोलना भी पाप था जिसके लिए प्रायश्चित का विधान किया गया था। छांदोग्य उपनिषद के अनुसार उसकी स्थिति श्वान और शूकर जैसी थी।

    माना जाता था कि पूर्वजन्म में असत् कर्म करने के कारण चाण्डाल योनि मिलती थ्ी। बौद्ध काल मंे भी चाण्डालों को नगर से बाहर रहना पड़ता था। बौद्ध-जातकों से चाण्डालों की हीन एवं दयनीय अवस्था का ज्ञान होता है। मातंग जातक से ज्ञात होता है कि एक चाण्डाल जब नगर में प्रवेश कर रहा था तब एक श्रेष्ठि-दुहिता की दृष्टि उस पर पड़ गई। लड़की ने कहा कि ओह! मैंने तो अशुभ दर्शन कर लिया। इसके बाद अनेक लोगों ने उस चाण्डाल को खूब मारा।

    मनु ने लिखा है- 'चाण्डाल और श्वपच को गांव के बाहर निवास करना चाहिए तथा कुत्ते और गधे उसकी सम्पत्ति होनी चाहिए।' कफन उसका वस्त्र था। वह फूटे बर्तन में भोजन करता था, उसका अलंकार लोहे का होता था और वह सर्वदा घूमा करता था। उसे रात्रि के समय गांव और नगर में प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी। वह दिन में राजाज्ञा का विशेष चिह्न धारण करके गांव में घूम सकता था और बान्धव रहित शव को शमशान ले जा सकता था। प्राणदण्ड पाए हुए व्यक्ति का वध करता और उसका वस्त्र, शैया, और आभाूषण आदि ग्रहण करता था।

    पुराणों में भी उसे कुत्ते और पक्षियों की श्रेणी में रखा गया है। श्राद्ध के अन्न पर उसकी दृष्टि पड़ जाने से देवता और पितृगण अपना भाग त्याग देते थे। वह अधम और पातकी था। जो व्यक्ति जानबूझकर चाण्डाल-स्त्री का संग करता था, उसके साथ भोजन करता था या प्रतिग्रह स्वीकार करता था, वह उसी श्रेणी का हो जाता था। चीनी यात्री फाह्यिान (पांचवीं शताब्दी ईस्वी) ने लिखा है कि जब कभी चाण्डाल बाजार में प्रवेश करता था तब वह लकड़ियां बजाता चलता था जिससे लोग लकड़ियों की आवाज सुनकर हट जाएं और उसके स्पर्श से अशुद्ध न हों।

    वह बहेलिए और मछली मारने का धंधा अपना सकता था। हर्ष के काल में भारत आने वाले चीनी यात्री ह्वेनत्सांग (सातवीं शताब्दी ईस्वी) ने लिखा है कि वह पशुओं को मारकर उनका मांस बेचता था। बधिक का कार्य करता था, विष्ठा आदि उठाता था और नगर के बाहर रहता था। उसके घर पर विशेष चिह्न बने होते थे। बाण (सातवीं शताब्दी ईस्वी) ने अपनी पुस्तक कादम्बरी में उसे स्पर्श-वर्जित कहा है। तथा बांस की छड़ी बजाकर अपने आने की सूचना देने वाला निर्दिष्ट किया है। अल्बरूनी (दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी) ने लिखा है कि उसका मुख्य कार्य गांव की सफाई करना था।

    अनेक अरब लेखकों ने लिखा है कि वह स्थान-स्थान पर खेल-तमाशे करके जीविकोपार्जन करता था। उसका वर्ग खिलाड़ी और कलावन्त का था। जैन आचार्य हेमचंद्र (बारहवीं शताब्दी ईस्वी) ने लिखा है कि चाण्डाल लकड़ी की आवाज करते हुए चलते थे ताकि उच्च वर्ण के लोग उसे छूने से बच जाएं। कल्हण (बारहवीं शताब्दी ईस्वी) ने भी चाण्डाल की हीन स्थिति का वर्णन किया है।

    भारतीय इतिहास में कायस्थ जाति

    कायस्थ जाति का उल्लेख भारतीय आर्य वर्ण-व्यवस्था में नहीं मिलता। उनका विकास अलग वर्ग और जाति के रूप में हुआ। प्राचीन भारत में कायस्थों की स्थिति के बारे में अलग-अलग बातें मिलती हैं। कायस्थों का सर्वप्रथम उल्लेख याज्ञवलक्य ने किया है। महर्षि याज्ञवल्क्य ने कायस्थों को चोर-डाकुओं से अधिक खतरनाक बताया है तथा राजा को आदेश दिया है कि वह कायस्थों से अपनी प्रजा की रक्षा करे। महर्षि उषनस एवं महर्षि व्यास ने अपनी स्मृतियों में कायस्थों का उल्लेख शूद्र जाति के रूप में उल्लिखित किया है।

    औशनस स्मृति के अनुसार 'कायस्थ' शब्द का निर्माण 'काल', 'यम' और 'स्थपति' के प्रारम्भिक अक्षरों को मिलाकर हुआ है। कायस्थ जाति के सम्बन्ध में गुप्तकालीन अभिलेखीय प्रमाण भी मिलता है। गुप्तकालीन अभिलेख में उन्हें 'प्रथम कायस्थ' एवं 'ज्येष्ठ कायस्थ' कहा गया है।

    सहेत-महेत के गाहड़वाल अभिलेख में कायस्थ शब्द का उल्लेख 'लेखक' के रूप में हुआ है जबकि चन्देल, चेदि, चाहमान आदि अभिलेखों में उन्हें कायस्थ जाति एवं कायस्थ वंश कहा है। अतः अनुमान होता है कि कायस्थ, गुप्त काल तक भारतीय समाज में चारों वर्णों से अलग, एक वर्ग के रूप रह रहे थे और नौवीं शताब्दी आते-आते वे एक जाति में बदल गए। उनका प्रधान कर्म लेखन कार्य करना था। वे लेखाकरण, गणना, आय-व्यय और भूमि-कर के भी अधिकारी होते थे।

    हरिषेण (दसवीं शताब्दी ईस्वी) ने उनके लिए लेखक एवं कायस्थ दोनों शब्दों का प्रयोग किया है। श्री हर्ष ने उनकी उत्पत्ति यम के लिपिक चित्रगुप्त से मानी है। ग्वारहवीं सदी के एक अभिलेख में कायस्थ वंश को बहुत पुराना माना गया है तथा उनका उद्भव कुश और उनका पिता काश्यप विवृत है। एक अभिलेख में उनका सम्बन्ध क्षत्रियों से बताया गया है जिसके अनुसार जब परशुराम ने इन निर्भीक क्षत्रियों को समाज से निकाल दिया तब वे 'कायस्थ' कहे गए।

    कायस्थ अपना उपनाम 'पंचोली' भी लिखते हैं जिसका संकेत 'पांचवे वर्ण' की ओर प्रतीत होता है। 'कायस्थ' और 'पंचोली' दोनों ही शब्द इन लोगों के समाज रूपी 'काया में स्थित होने' एवं समाज के 'पंाचवे चोले' में स्थित होने की ओर भी संकेत करते हैं।

    निष्कर्ष

    उपरोक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि जाति-प्रथा का उद्भव प्राचीन वर्ण-व्यवस्था का ही विस्तार था जिसका प्रमुख आधार व्यावसायिक वंश-परम्परा था। कुछ विदेशी आक्रांता, अनार्य वर्ग, वर्णसंकर वर्ग आदि समुदाय, आर्यों के चार-वर्णों से बाहर थे किंतु वे जाति व्यवस्था में अलग-अलग जातियों के रूप में स्थान पा गए। जाति-व्यवस्था के कारण भारतीय समाज को कुछ बड़े लाभ हुए तो कुछ बड़ी हानियाँ भी झेलनी पड़ीं।

    एक ओर तो जाति-प्रथा ने भारतीय समाज को व्यावसायिक कौशल बढ़ाने में सहायता दी, विदेशी जातियों को अलग जाति के रूप में भारतीय समाज में समाहित होने का अवसर दिया तथा इस्लाम के विरुद्ध अपने धर्म की रक्षा के लिए दृढ़ता प्रदान की किंतु दूसरी ओर जाति-व्यवस्था ने भारतीय समाज को एक ही देश के भीतर छोटे-छोटे देशों में विभक्त कर दिया जिनमें सहजीवन की भावना कम और प्रतिद्वंद्विता की भावना अधिक थी। यदि देश पर चढ़कर आए शत्रुओं के विरुद्ध समस्त भारतीय समाज संगठित होकर लड़ता तो देश को दीर्घकाल तक पराधीनता नहीं झेलनी पड़ती।

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  • अध्याय - 19 बी. जी. शर्मा चित्रालय उदयपुर

     02.06.2020
    अध्याय - 19 बी. जी. शर्मा चित्रालय उदयपुर

    अध्याय - 19 बी. जी. शर्मा चित्रालय उदयपुर

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    उदयपुर में सहेलियों की बाड़ी के पास बी. जी. शर्मा चित्रालय स्थित है। इसकी स्थापना 13 अप्रेल 1993 को नाथद्वारा चित्रशैली के सुप्रसिद्ध चित्रकार बी. जी. शर्मा ने की थी। आर्ट गैलेरी के रूप में स्थित यह संग्रहालय दो-मंजिला भवन में बना हुआ है। 5 अगस्त 1924 को नाथद्वारा में जन्मे बी. जी. शर्मा पारम्परिक चित्रकला शैली के सिद्धहस्त कलाकार हैं।

    उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की जीवन लीला से सम्बन्धित चित्र बड़ी संख्या में बनाए। इस चित्रालय की यह विशेषता है कि इसमें प्रदर्शित समस्त चित्र एक ही कलाकार की तूलिका से निकले हैं। इस चित्रालय में उनके द्वारा 1935 से लेकर बनाए गए 500 से अधिक चित्र प्रदर्शित हैं। इनमें सबसे बड़ा चित्र सूती कपड़े पर बना पिछवई का है। पिछवई में श्रीनाथजी के अन्नकूट उत्सव को दर्शाया गया है। यह चित्र 8 गुणा 12 फुट का है। सबसे छोटा चित्र 1 इंच से भी लघु आकार का है।

    इस चित्रालय में कृष्णलीला के चित्रों के अतिरिक्त रामलीला से सम्बन्धित चित्र भी हैं। मुगल कालीन तथा राजपूत कालीन जीवन परिवेश तथा बादशाहों और राजा-महाराजाओं से सम्बन्धित चित्रों के साथ 24वें जैन तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी के जीवन के प्रमुख प्रसंगों के चित्र भी हैं। इन चित्रों के माध्यम से सम्पूर्ण जैनत्व के सिद्धांतों को कोई भी पहचान सकता है। राष्ट्रीय विभूतियों तथा मेवाड़ के शासकों के भी चित्र इस संग्रहालय में उपलब्ध हैं।

    सूती कपड़े के साथ-साथ कुछ चित्र रेशमी कपड़े पर भी बने हुए हैं। हाथीदांत पर बने चित्र भी प्रदर्शित किए गए हैं। चित्रों को बनाने में पारम्परिक रंग (स्टोन कलर) काम में लिए गए हैं। कुछ चित्र ऐसे हैं जिन्हें असली स्वर्ण एवं रजत रंग से रंगा गया है। ऐसे चित्र भी हैं जो रंग-विहीन हैं तथा केवल पैंसिल-रेखाओं से बनाए गए हैं।


    उदयपुर की अन्य निजी दीर्घाएं

    उदयपुर में कमल शर्मा आर्ट गैलेरी, बोगेन विला, रामा आर्ट गैलेरी, गैलेरी प्रीस्टाइन तथा मेवाड़ आर्ट गैलेरी भी स्थित हैं जो विभिन्न कलाकारों द्वारा निजी स्तर पर स्थापित की गई हैं। इन्हें देखने के लिए टिकट खरीदना होता है।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-55

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-55

    पर्यावरण की व्याख्या है परम्परागत वेशभूषा


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    राजस्थान के लोक अंचल में हर जाति एवं समुदाय की अपनी विशिष्ट पहचान युक्त वेशभूषा होती थी। वस्त्रों की बनावट, रंग एवं उनके पहनने के ढंग से अलग उस व्यक्ति को दूर से ही पहचाना जा सकता था कि वह किस व्यवसाय अथवा किसी समाज से सम्बन्ध रखता है। आजादी के बाद वेशभूषा में पहले जैसी परम्पराओं का निर्वहन नहीं होता है फिर भी लोक अंचल में पलने वाली राजस्थानी संस्कृति में आज भी वेशभूषा विशेष महत्व रखती है। राजस्थन के विभिन्न समुदायों की परंपरागत वेशभूषा न केवल उसकी सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति अपितु मानव मन के भीतर छिपी कलात्मकता और सौंदर्यबोध को भी व्यक्त करती है।


    ग्रामीण परिधान (वेषभूषा)

    राजस्थान में परम्परागत रूप से कपास एवं भेड़ों की ऊन से बने हुए कपड़े उपयोग में लाये जाने की परम्परा है। ये वस्त्र मानव स्वास्थ्य एवं पर्यावरण दोनों दृष्टि से सुरक्षित हैं। आजकल नगरीय परिवेश में परिधानों पर अत्यधिक धन व्यय किया जाने लगा है। मोटी जीन्स, चमड़े एवं रैगजीन के बने हुए कोट, सिंथेटिक ऊन, पॉलिस्टर, के कपड़े न केवल मानव शरीर को अपितु पर्यावरण को भी अत्यधिक नुक्सान पहुंचाते हैं।

    ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुष सामान्यतः सफेद धोती बांधते हैं तथा सफेद कुर्ता या अंगरखी धारण करते हैं। पैरों में विभिन्न आकृतियों एवं आकार-प्रकार की जूतियां तथा सिर पर विविध रंगों तथा आकृतियों की पाग-पगड़ियां धारण करते हैं। स्त्रियां लहंगा-ओढ़ना धारण करती हैं। पहले अलग-अलग जाति की स्त्रियां अलग-अलग रंग के लहंगे-ओढ़ने पहनती थीं किंतु अब सभी जातियों की स्त्रियां लगभग सभी रंग धारण करती हैं। ओढ़ने कई प्रकार के होते हैं जिनमें पोमचा, पीलिया, लहरिया व चूनरी अधिक प्रसिद्ध हैं। पुत्रवती स्त्री सौभाग्यवती समझी जाती है तथा उसके वस्त्रों का अलंकरण अधिक सज्जा युक्त होता है।

    पोमचा : कमल पुष्प के अभिप्राय को व्यक्त करने वाली ओढ़नी को पोमचा कहते हैं। यह दो प्रकार का होता है-

    (1) लाल व गुलाबी रंगों से बना हुआ तथा

    (2) लाल व पीले रंगों से बना हुआ।

    दोनों प्रकार के पोमचों में किनारा तथा बीच के पुष्प लाल रंग से बनाये जाते हैं जबकि धरती गुलाबी या पीली हो सकती है। बच्चे के जन्म पर बच्चे की मां के लिये उसके पीहर से पोमचे भेजे जाते हैं। बेटे के जन्म पर पीला तथा बेटी के जन्म पर गुलाबी पोमचा देते हैं।

    लहरिया : लहरिया ओढ़नी व पगड़ी दोनों ही रूप में प्रयोग होता है। श्रावण मास में भाई, बहिन के लिये तथा पति, पत्नी के लिये लहरिया भेंट में लाते हैं। लहरिये एक, दो, तीन, पाँच व सात रंगों में बनाये जाते हैं किंतु पचरंगों वाला पचरंगी लहरिया मांगलिक कार्यों के लिये सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। विभिन्न रंगों की आड़ी धारियों से रंगा हुआ कपड़ा लहरिया कहलाता है, जबकि आड़ी धारियां खंजरीनुमा ढंग से रंगी जायें तो गंडादार कहलाता है। यदि आड़ी धारियां दोनों ओर से एक दूसरे को काटती हुई हों तो वह मोठड़ा कहलाता है। जयपुर में 'समुद्र लहर' नाम का लहरिया रंगा जाता है। उसमें भी दो, तीन, पाँच या सात रंग प्रयुक्त होते हैं।

    चूनरी : यद्यपि चूनरी पूरे राजस्थान में व्यापक रूप से प्रयुक्त होती है तथापि जोधपुर की तरफ इसका विशेष प्रचलन है। चूनरी भी ओढ़नी तथा पगड़ी दोनों रूपों में प्रयुक्त होती है। चूनरी के कपड़े की पक्के व चमकीले रंगों से बारीक बंधेज की रंगाई की जाती है तथा छोटी-छोटी डिब्बियाँ, विभिन्न पशु-पक्षियों तथा फूल पत्तियों की आकृतियां बनाई जाती हैं। जोधपुर व सीकर की तरफ बंधेज की चूनरी अधिक प्रसिद्ध है।

    चौकड़ी, पतंगा एवं धनक : पोमचा, पीलिया, लहरिया, चूनरी के अतिरिक्त चौकड़ी, चौकड़ी का जाल, पतंगा, धनक आदि भी ओढ़नी व पगड़ियों में प्रयुक्त होते हैं। अजमेर-मेरवाड़ा क्षेत्र की गूजर स्त्रियां गाढ़े की लाल ओढ़नी व फड़द के नीले-काले रंगों के घाघरे पहनती हैं। मीणा जाति की स्त्रियों में भी लगभग ऐसा ही प्रचलन है किंतु वे ऊन का घाघरा नहीं पहनतीं। बिश्नोई स्त्रियां ऊन का पट्टीदार घाघरा पहनती हैं और उस पर ऊन का झूमकेदार नाड़ा लपेटती हैं। उनकी ओढ़नी व कांचली कसीदे से युक्त होती है जिसमें कांच भी जड़े होते हैं। मेवाड़ में लाल व हरा रंग अधिक प्रयुक्त होता है। ढूंढाढ़ में भी गहरे रंग पसंद किये जाते हैं जबकि मारवाड़ में हल्के रंग पहने जाते हैं तथा उनमें सलमा-सितारे का काम भी अधिक नहीं होता किंतु गोटा व जरी का काम खूब होता है। शेखावाटी की तरफ वस्त्रों पर पेचवर्क का काम भी बहुतायत से किये जाने का प्रचलन है।

    पगड़ियाँ : राजस्थान में विभिन्न जातियों एवं विभिन्न आर्थिक स्थितियों वाले पुरुष विभिन्न प्रकार की पगड़ियां बांधते हैं। इन्हें पाग, पगड़ी, साफा अथवा लहरिया कहते हैं। मध्यकाल में अमरशाही, उदेशाही, खंजरशाही, शिवशाही, राठौड़ी, मानशाही, जसवंतशाही, शाहजहानी तथा अटपटी पगड़ियां अधिक प्रचलित थीं। विशेष प्रकार की पगड़ियां रियासत विशेष में अधिक प्रचलित थीं। पगड़ियों के पेच, आकार व रंग लोगों की आर्थिक व सामाजिक स्थितियों के प्रतीक थे। अब भी अवसर विशेष पर ये पगड़ियां धारण की जाती हैं। त्यौहारों, उत्सवों एवं ऋतुओं के अनुसार विभिन्न प्रकार की पगड़ियां धारण की जाती हैं।

    तीज पर लहरिया, दशहरे पर मदील अथवा मझल छपाई की सलमा-सितारे के फूलों से कढ़ी हुई, होली पर सफेद या पीली, वर्षा ऋतु में हरी या कसूमल, सर्दियों में कसुम्बी तथा गर्मियों में केसरिया पाग बांधी जाती है। विवाहोत्सव पर मोठड़ा बांधा जाता है। पगड़ियों पर तुर्रे, सरपेच, बालाबंदी, धुगधुगी, गोसपेच, पछेवड़ी, लटकन, फतेपेच तथा अन्य आभूषण लगाये जाते हैं। चीरा और फेंटा भी उच्च एवं धनी वर्ग के लोगों में प्रचलित है। शोक के अवसर पर सफेद साफे अथवा पगड़ियां पहनी जाती हैं। माली तथा रेबारी जाति के लोग गहरे लाल रंग की पगड़ियां पहनते हैं जिन पर विवाहोत्सव के समय चमकीली कलंगी लगाई जाती है। सुनार आंटे वाली तथा बनजारे मोटी पट्टेदार पगड़ी काम में लेते हैं। राजपूत सामान्यतः केसरिया पाग धारण करते हैं। जोधपुर की तरफ चूंदड़ी का साफा बहुतायत से प्रयोग होता है। मेघवाल जाति के संपन्न लोग हलके गुलाबी रंग की पगड़ियां धारण करते हैं। मारवाड़ में सामाजिक, सार्वजनिक व सरकारी समारोहों में शामिल होने वाले विशिष्ट लोगों को साफा बंधवाने तथा तलवार व नारियल भेंट करने का प्रचलन है। सामान्यतः चूंदड़ी (चूनरी) वाला साफा काम लिया जाता है।


    आदिवासी परिधान

    आदिवासी पुरुषों के वस्त्र

    दक्षिण राजस्थान आदिवासी बहुल क्षेत्र है। आदिवासियों की भील जाति के पुरुष सिर पर सफेद अंगोछा बांधते हैं जिस पर लाल रंग के बेल बूटे छपे होते हैं। बदन पर काले रंग का अंगरखा पहनते हैं जिस पर सफेद धागे से कढ़ाई की जाती है। अंगोछे और अंगरखे के साथ धोती पहनने का रिवाज है। अंगरखे को बुगतरी भी कहते हैं।


    आदिवासी स्त्रियों के वस्त्र

    आदिवासी स्त्रियां जामसाई साड़ी पहनती हैं जिस पर लाल जमीन पर फूल पत्तियों युक्त बेल होती है। बेल की दो पंक्तियों के बीच बूटा भी छापा जाता है। लाल जमीन पर भांत काले सफेद में होती है। जामसाई छींट भी बनती है जिसका लहंगा भी बनता है। नांदणा या नानड़ा आदिवासियों द्वारा प्रयुक्त होने वाला सबसे प्राचीन वस्त्र है। नांदणा नीले रंग की छींट से बनता है। इसमें छोटे-छोटे चतुष्कोण और तितलियां भी बनती हैं। इसकी छपाई दाबू पद्धति से होती है। दाबू उड़द के आटे अथवा चिकनी मिट्टी का लगता है। अविवाहित युवतियां और बालिकाएं लाल जमीन की ओढ़नी ओढ़ती हैं जिसके कटकी कहते हैं। बूटी काले और सफेद संयोजन से बनती है। सफेद जमीन के लिये दाबू का प्रयोग होता है।

    आदिवासी स्त्रियां काले रंग की जमीन पर लाल एवं भूरे रंग की बूटियों वाला लहंगा पहनती हैं जिसे रेनसाई कहा जाता है। विवाहिता स्त्रियां लूगड़ा पहनती हैं। ज्वार के दानों जैसी छोटी-छोटी बिंदी वाली जमीन और बेल बूटे वाले पल्लू की ओढ़नी को ज्वार भांत की ओढ़नी कहा जाता है। ज्वार भांत जैसी बिंदियों से लहरिया बनता ह उसवे लहर भांत की ओढ़नी कहते हैं। इसमें किनारा तथा पल्लू ज्वार भांत जैसा ही होता है। जब किनारी व पल्लू में केरी तथा जमीन में ज्वार भांत जैसी बिंदियां होती हैं तो उसे केरी भांत की ओढ़नी कहते हैं। इसमें जमीन लाल रंग की होती है तथा बिंदिया सफेद एवं पीले रंग में।

    तारा भांत की ओढ़नी आदिवासी स्त्रियों में अत्यधिक लोकप्रिय होती है। इसमें जमीन भूरी रंगत लिये लाल होती है और किनारी का छोर काला षटकोणीय आकृति वाले तारों जैसा दिखता है। अलंकरण सफेद रंग में होता है। उदयपुर के निकट ही भीलों की चूनड़ छपती है। इसमें भी बिंदियों के द्वारा ही अनेक प्रकार के संयोजन बनते हैं। बिंदियां सफेद होती हैं और जमीन का रंग कत्थई लाल।

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  • अध्याय - 26 भारत में परिवारिक जीवन

     02.06.2020
    अध्याय - 26 भारत में परिवारिक जीवन

    भारत में परिवारिक जीवन


    हे कुल-वधू तुम यहीं इसी घर में रहो, वियुक्त मत होओ, अपने घर में पुत्रों और पौत्रों के साथ खेलते और आनन्द मनाते हुए समस्त आयु का उपभोग करो। -ऋग्वेद।


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    भारतीय सामाजिक संगठन का इतिहास पाँच हजार वर्ष से भी अधिक पुराना है। जब विश्व के अधिकांश देश सभ्यता के उषाकाल में थे, तभी भारतीय समाज सुव्यवस्थित रूप धारण कर चुका था। आर्य ऋषियों ने भारतीय समाज के संगठन के लिए जिन संस्थाओं का निर्माण किया, 'परिवार' अथवा 'कुटुम्ब' उनमें सबसे प्राचीन था।

    आर्यों के प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद में परिवार का संगठित स्वरूप दिखाई देता है। वैदिक यज्ञ-अनुष्ठान, षोडष संस्कार, राजन्य व्यवस्था, वर्ण व्यवस्था, आश्रम व्यवस्था, विवाह, यौन सम्बन्ध, कुल, गौत्र एवं वंश परम्परा आदि समस्त संस्थाओं एवं परम्पराओं का आधार परिवार ही था। पश्चिमी संस्कृतियों में समाज की सबसे छोटी इकाई 'व्यक्ति' है किंतु भारतीय संस्कृति में 'परिवार' को समाज की सबसे छोटी इकाई माना गया। भारतीय समाज में परिवार-रहित व्यक्ति का सहजता से जीवन-यापन करना कठिन है।

    इसे इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि भारतीय समाज का गठन परिवारों से हुआ है न कि व्यक्तियों से। परिवार की रचना में थोड़ा सा परिवर्तन, सामाजिक संरचना में बड़ा परिवर्तन कर देता है। भारतीय परिवारों की संरचना पश्चिमी सभ्यताओं में प्रचलित परिवारों से भिन्न है। भारत में परविार का आशय 'संयुक्त परिवार' से है। 'परिवार' समस्त सभ्यताओं की सार्वभौम संस्था है किन्तु 'संयुक्त परिवार' की संस्था केवल भारत में ही देखने को मिलती है। पश्चिम के व्यक्तिवादी समाज में संयुक्त परिवार एक दुर्लभ संगठन है।

    परिवार का आधार 'सुनिश्चित यौन-सम्बन्ध' है जो संतान उत्पन्न करने से लेकर उसके पालन-पोषण, रोजगार की व्यवस्था एवं कुटुम्ब के वृद्ध एवं रुग्ण सदस्यों की समुचित देखभारत करने तक विस्तृत है। परिवार के सदस्यों के मध्य भावनात्मक आबद्धता के कारण परस्पर सहयोग, गृहस्थ-धर्म के उत्तरदायित्व एवं कर्त्तव्यबोध जैसे विचारों का निर्माण होता है।

    परिवार की परिभाषा

    अनेक समाजशास्त्रियों ने परिवार की अलग-अलग परिभाषाएँ प्रस्तुत की हैं। प्रसिद्ध विद्वान् मैकाइवर और पेज के अनुसार- 'परिवार पर्याप्त निश्चित यौन-सम्बन्धों द्वारा परिभाषित एक ऐसा समूह है जो बच्चों के जनन एवं पालन-पोषण की व्यवस्था करता है।' इस परिभाषा के अनुसार परिवार यौन-सम्बन्धों पर आश्रित एक जैविक समुदाय भर है जिसका मुख्य कर्त्तव्य सन्तानोत्पति करना एवं उसका लालन-पालन करना है किन्तु परिवार इन लक्षणों के अतिरिक्त और भी बहुत कुछ होता है।

    बर्जेस और लॉक के अनुसार- 'परिवार संस्था के रूप में एक प्रक्रिया है, जो समाज की संरचना में सहयुक्त है। परिवार व्यक्तियों का समूह है जो विवाह, रक्त या गोद लेने के सम्बन्धों से संगठित होता है। इसमें एक छोटी गृहस्थी का निर्माण होता है जिसमें पति-पत्नी, पुत्र-पुत्री और भाई-बहिन एक दूसरे से अन्तःक्रियाएँ करते तथा एक सामान्य संस्कृति का निर्माण और देख-रेख करते हैं।'

    पश्चिमी समाजशास्त्री डेविस के अनुसार- 'परिवार ऐसे व्यक्तियों का समूह है, जिसके एक-दूसरे से सम्बन्ध, सगोत्रता पर आधारित होते हैं ओर इस प्रकार एक-दूसरे से रक्त-सम्बन्ध होते हैं।'

    डॉ. आर. सी. मजूमदार ने लिखा है- 'परिवार उन व्यक्तियों का समूह है जो एक ही छत के नीचे रहते हैं, जो रक्त-सम्बन्धी सूत्रों से सम्बद्ध रहते हैं और स्थान, हित तथा पारस्परिक कृतज्ञता के आधार पर समान होने की भावना रखते हैं।'

    प्रसिद्ध विद्वान् केलर के अनुसार- 'यह मनुष्यों का एक वर्ग है, जो जीवन-यापन तथा मानव जाति को सहकारिता के आधार पर स्थिर रखने का प्रयत्न करता है।'

    उपरोक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि 'परिवार' का मुख्य आधार 'विवाह' है तथा यौन-सम्बन्धों द्वारा सन्तान उत्पन्न करने से लेकर उसके लालन-पालन, भरण-पोषण और सेवा-सुश्रुषा तक विस्तृत है। परिवार में पति-पत्नी, उसकी सन्तानें व भाई-बहिन रहते हैं जिनकी पृथक् वंश-परम्परा होती है। परिवार समाज का लघु रूप है और समाज, परिवार का विराट रूप है। चूँकि परिवार समाज की मूलभूत इकाई है, अतः मानव-समाज का इतिहास परिवार से ही आरम्भ होता है। परिवार के सहारे ही अन्य संस्थाआंे और समितियों का जन्म सम्भव हो पाया है।

    परिवार की उत्पत्ति

    परिवार की उत्पत्ति कब और कैसे हुई, इसके सम्बन्ध में भी अनेक मत एवं विचार प्रकट किए गए हैं। कुछ समाजशास्त्रियों का विचार है कि मानव सभ्यता के प्रारम्भ में 'पितृसत्तात्मक' परिवार की उत्पत्ति हुई होगी जबकि कुछ अन्य विद्वानों की मान्यता है कि पहले 'मातृसत्तात्मक' परिवार विकसित हुए होंगे क्योंकि प्रारम्भिक काल में यौन सम्बन्धों की सुनिश्चतता अर्थात् विवाह जैसी संस्था का विचार नहीं पनप सका होगा।

    भारत में मानव द्वारा कृषि आरम्भ किए जाने के बाद 'मातृसत्तात्मक परिवार' का महत्त्व घट गया और 'पितृसत्तात्मक परिवार' की प्रथा मजबूत होने लगी। ऋग्वैदिक-काल एवं उत्तरवैदिक-काल में भी संयुक्त-परिवार-प्रथा प्रचलित थी। परिवार का वयोवृद्ध व्यक्ति, परिवार का मुखिया होता था तथा परिवार के समस्त सदस्य उसके आदेशों का पालन करते थे। बौद्ध-काल में भी परिवार संयुक्त होते थे। अनेक जातक कथाओं में ऐसे परिवारों का उल्लेख मिलता है जो अपने सदस्यों के सहयोग और सहायता से चलते थे।

    एकल अथवा पृथक् परिवार

    उत्तरवैदिक-काल में संयुक्त-परिवार के विघटन का आभास होने लगता है किंतु आर्यों में मुख्यतः संयुक्त-परिवार परम्परा ही प्रचलित रही। स्मृतिकारों ने भी संयुक्त परिवारों का वर्णन किया है परन्तु इस युग में 'एकल अथवा पृथक् परिवार' का समर्थन भी आरम्भ हो गया था। मनु के अनुसार परिवार का विभाजन धर्मानुकूल है किंतु सम्पत्ति का बँटवारा पिता की मृत्यु के बाद ही किया जाना चाहिए।

    पितृ-सत्तात्मक आर्य-परिवार

    भारतीय आर्यों में पितृमूलक तथा भारत की अनार्य सभ्यताओं में मातृमूलक परिवार व्यवस्था थी। आर्य-परिवार में पति-पत्नी, पुत्र-पौत्र, प्रपौत्र, पुत्र-वधुएँ, पौत्र वधुएं, प्रपौत्र वधुएँ, अविवाहित पुत्रियाँ, अविवाहित बहिनें, अविवाहित पौत्रियाँ, अविवाहित प्रपौत्रियाँ आदि रहते थे। ये सब लोग एक ही स्थान पर और प्रायः एक ही भवन में रहते थे। एक साथ भोजन करते थे और और एक ही धर्म तथा इष्टदेव की उपासना करते थे। परिवार का वयोवृद्ध पुरुष परिवार का मुखिया होता था।

    परिवार का मुखिया, परिवार के समस्त सदस्यों के आचरण को अनुशासित करता था और उनकी विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं को पूरा करता था। परिवार का मुखिया ही समाज में अपने परिवार का प्रतिनिधित्व करता था। परिवार के समस्त सदस्य, मुखिया के अनुशासन में रहते थे तथा उसके मार्ग-र्दशन में कार्य करते थे। वैदिक युग से लेकर आज तक भारतीय परिवार के मुखिया के अधिकारों में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ है।

    मातृ-सत्तात्मक अनार्य-परिवार

    भारत की अनार्य सभ्यताओं में मुख्यतः मातृमूलक परिवार व्यवस्था थी। सिन्धु सभ्यता के अवशेषों के आधार पर विद्वानों का अनुमान है कि सिन्धु-वासियों में मातृसत्तात्मक परिवार-प्रथा रही होगी। आज भी दक्षिण भारत की नैय्यर, कादर, इरूला, पुलयन आदि जातियों में तथा आसाम की गोरो और खासी जातियों में मातृसत्तात्मक परिवार ही पाए जाते हैं। उपर्युक्त अपवादों को छोड़़कर शेष भारत में पितृसत्तात्मक परिवारों का अस्तित्त्व है।

    भारतीय परिवार की प्रमुख विशेषताएँ

    भारतीय परिवार एक गतिशील संस्था है। समय-समय पर इसका स्वरूप बदलता रहा है। फिर भी भारतीय परिवार के संगठन का आधार ठोस है तथा इसकी मूलभूत विशेषताएँ आज भी देखी जा सकती हैं। भारतीय परिवार की मूलभूत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

    (1.) विवाह संस्कार: भारतीय परिवार की सबसे बड़ी विशेषता विवाह-संस्कार है। भारत में विवाह के बिना परिवार की कल्पना नहीं की जा सकती। आदि काल से ही आर्यों ने विवाह के नियम बनाए जिनमें समय के साथ वर्ण-व्यवस्था एवं बाद में जाति-प्रथा का अंकुश कठोर होता चला गया। कुल के साथ-साथ गौत्र सम्बन्धी नियम भी परम्परागत भारतीय परिवारों पर कड़ाई से लागू होते हैं जिनमें दादा के गौत्र के साथ-साथ नाना, नानी एवं दादी के गौत्रों को टालना अनिवार्य था।

    (2.) जन्म-जन्म का बंधन: भारतीय परिवार के मजबूत गठन के पीछे विवाह-सम्बन्धों के जन्म-जन्मांतर अथवा सात जन्मों तक चलने की धारणा थी। एक बार विवाह होने के बाद स्त्री उस परिवार को छोड़ती नहीं थी। भारतीय परिवारों में यह सर्वप्रचलित धारणा रही है कि स्त्री डोली में बैठकर ससुराल आती है, उसके बाद उसकी अर्थी ही उस घर से उठती है क्योंकि इस परिवार से उसका सम्बन्ध केवल इस जन्म तक सीमित नहीं है, अपितु सात जन्मों के लिए है। ऋग्वेद की एक ऋचा में पुरोहित विवाह के अवसर पर वधू को आशीर्वाद देता हुआ कहता है- 'तुम यहीं इसी घर में रहो, वियुक्त मत होओ, अपने घर में पुत्रों और पौत्रों के साथ खेलते और आनन्द मनाते हुए समस्त आयु का उपभोग करो।'

    (3.) संयुक्त परिवार प्रथा: संयुक्त परिवार प्रथा की स्थापना वैदिक-काल में हुई। यह प्रथा भारतीय समाज की सबसे बड़ी विशेषता है। संयुक्त परिवार में माता-पिता और बच्चों के साथ-साथ तीन-चार पीढ़ियों के सदस्य एक ही आवास या आवासीय परिसर में रहते थे। इस प्रथा का उद्देश्य परिवार के समस्त सदस्यों की सर्वतोन्मुखी उन्नति हेतु साधन एवं सुविधाएं उपलब्ध करना और सामाजिक सुरक्षा हेतु सहयोग प्रदान करना था।

    (4.) प्रेम एवं सौहार्द: भारतीय परिवार में प्रेम एवं सौहार्द का तत्व प्रमुखता से पाया जाता है। परिवार में विभिन्न आयु के सदस्य मिल-जुल कर रहते हैं और सुख-दुःख में एक दूसरे का हाथ बँटाते हैं। वैदिक साहित्य में प्रार्थना की गई है- 'हम समस्त परिवार के सदस्य एक दूसरे के प्रति सहृदयता तथा शुद्ध विचार रखें और एक दूसरे से प्रेम करें जैसे गाय अपने बछड़े से प्रेम करती है। पुत्र माता-पिता के प्रति, पत्नी पति के प्रति, भाई भाई के प्रति और बहिन बहिन के प्रति मधुर एवं प्रेमपूर्ण व्यवहार करे। हम एकमति और सत्कर्म युक्त होकर परस्पर मधुर भाषण करें।' इसी भावना के कारण विवाह के उपरान्त पुत्र अपने पिता के परिवार से अलग नहीं होता था अपितु अपने पिता अथवा पितामह के परिवार में रहता था।

    (5.) पुत्रियों से प्रेम: विवाह के बाद पुत्री को अपने ससुराल में जाकर रहना होता है किंतु भारतीय परिवार पुत्रियों के विवाह के बाद उन्हें विस्मृत नहीं करते हैं, अपितु विभिन्न तीज-त्यौहारों एवं पारिवारिक उत्सवों के आयोजनों में उन्हें प्रेम एवं सम्मान के साथ आमन्त्रित करते हैं। पुत्री को पुनः उसके ससुराल लौटते समय वस्त्र, मिठान्न एवं उपहार देते हैं। इसी प्रकार पुत्री के ससुराल में होने वाले पारिवारिक उत्सवों तथा तीज-त्यौहारों पर उपहार आदि भेजते हैं।

    (6.) नारी का सम्मान: नारी को सम्मान देना, भारतीय परिवार की प्रमुख विशेषता है। वैदिक ग्रंथों में गृहस्थ-सुख एवं सन्तान प्राप्ति के लिए पत्नी की आवश्यकता बतायी गई है। ऋग्वेद में कहा गया है कि पत्नी के बिना गृहस्थी संभव नहीं है, पत्नी ही गृहस्थी है। जहाँ स्त्रियों का सम्मान नहीं होता, वहाँ सब काम निष्फल होते हैं। केवल अपने परिवार की ही नहीं अपितु गांव के किसी भी परिवार की बहन-बेटी और बहू पूरे गांव की बहन-बेटी और बहू समझी जाती थी। इस भावना से भी परिवार रूपी संस्था को मजबूती मिलती थी। ऋग्वेद की एक ऋचा में पुरोहित वधू को आशीर्वाद देता हुआ कहता है- 'तू सास, ससुर, ननद और देवर पर शासन करने वाली रानी बने।'

    (7.) धर्माचरण और कर्त्तव्य-परायणता: धर्माचरण और कर्त्तव्य परायणता भारतीय परिवार की प्रमुख विशेषताओं में से एक है। परम्परागत रूप से परिवार के समस्त कार्य शास्त्रविहित विधि से निर्धारित हैं। परिवार के प्रत्येक सदस्य का राज्य, समाज, पड़ौसी तथा परिवार के प्रति कर्त्तव्य; माता-पिता तथा वयोवृद्धों के प्रति कर्त्तव्य; गुरु, ब्राह्मण, सन्यासी एवं कन्याओं के प्रति कर्त्तव्य; मृतक व्यक्तियों अर्थात् पितरों के प्रति कर्त्तव्य; गौ एवं पशु-पक्षियों के प्रति कर्त्तव्य, भिखारियों, कुष्ठ रोगियों एवं क्षुधाग्रस्त व्यक्तियों के प्रति कर्त्तव्य निर्धारित हैं। विभिन्न धर्मग्रन्थों में इन कर्त्तव्यांे का विस्तार से उल्लेख किया गया है। परिवार में अपने से बड़ों की आज्ञा का पालन करना भी धर्माचरण एवं कर्त्तव्य-परायणता माना जाता है। इस प्रकार भारतीय परिवार भौतिक सुख-साधनों की उपलब्ध करवाने वाली व्यवस्था मात्र नहीं है अपितु धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, चारों पुरुषाथों को सिद्ध करने का साधन है।

    (8.) सोलह संस्कार: भारतीय परिवार बालक के जन्म के पहले से लेकर मृत्यु के बाद तक सोलह प्रकार के संस्कार-कर्मों से बंधा हुआ है। गृहस्थों के लिए आत्म-कल्याण के निमित्त व्रत-उपवास और त्यौहारों का विशद विधान है। एक गृहस्थ के लिए आवश्यक संस्कार-कर्मों की विस्तृत रूपरेखा अनेक उत्तर-वैदिक ग्रन्थों में दी गई है। 'मनु स्मृति' और 'याज्ञवल्क्य स्मृति' में संस्कारों एवं विधि-विधानों का विस्तृत वर्णन किया गया है। परिवार के समस्त सदस्यों को इन संस्कारों की परिधि मंे रहकर धर्मानुकूल आचरण करना होता है।

    (9.) अतिथि-सत्कार: भारतीय परिवारों में अतिथि-सत्कार 'शिष्टाचार' मात्र न मानकर 'धर्म' माना जाता है। अतिथि को देवता के समकक्ष आदर दिया जाता है। अतिथि का आदर-सत्कार करना तथा उसे भोजन एवं आवास देना प्रत्येक गृहस्थ का कर्त्तव्य माना जाता है। मनुस्मृति के अनुसार- 'जो गृहस्थ देवता, अतिथि, भृत्य, माता-पिता का संरक्षण नहीं करता, वह श्वांस लेते हुए भी निष्प्राण है।' यदि कभी कोई शत्रु या विरोधी भी अतिथि बनकर घर आता है, परिवार के सभी सदस्य उसे आदर देते हैं। इसी कारण भारतीय समाज में 'घर आया, माँ-जाया बराबर' (अतिथि सहोदर के समान है) जैसी कहावतें प्रचलित हैं।

    (10.) एक विवाह का आदर्श: यद्यपि भारत में बहु-विवाही परिवारों का अस्तित्त्व रहा है तथापि सामान्यतः एक-विवाही परिवार ही आदर्श माना जाता है जिसका आशय एक पुरुष एक ही स्त्री से और एक स्त्री एक ही पुरुष से विवाह करती है। पश्चिमी समाजशास्त्री मेलिनोवस्की ने लिखा है- 'एक-विवाह ही विवाह का सच्चा स्वरूप था, है और रहेगा।' विवाह के सम्बन्ध में प्रचलित यह मान्यता परिवार के सदस्यों में अन्य सभी सम्बन्धों के प्रति सहयोग एवं उत्तरदायित्व की भावना को जन्म देती है।

    इस प्रकार भारतीय परिवार परम्परागत रूप से प्रेम तथा सौहार्द्र पर आधारित होता था जिसमें एक दूसरे के लिए उत्सर्ग करने की भावना प्रमुख थी।

    पारिवारिक सम्पत्ति एवं उत्तराधिकार

    भारतीय आर्य-परिवारों में सम्पत्ति के अधिकार एवं विभाजन के सम्बन्ध में कुछ निश्चित नियम थे जिनका निर्वहन पीढ़ी दर पीढ़ी स्वतः होता था।

    परिवार के मुखिया के अधिकार

    परिवार की सम्पत्ति का स्वामी घर का मुखिया अर्थात् दादा या पिता होता था और सामान्यतः दादा या पिता की मृत्यु के बाद ही उसके पुत्र-पौत्रों में सम्पत्ति का बँटवारा होता था। मनुस्मृति में पुत्र, स्त्री और दास की सम्पत्ति का स्वामी परिवार के मुखिया को माना गया है। विद्वान पिता अपने पुत्रों की शिक्षा स्वयं करता था, इसलिए उस युग मे पिता को पोषक एवं शिक्षक दोनों माना जाता था। पुत्र पर पिता का अधिकार अबाध होता था। पुत्र का वह जैसा चाहता था, उपयोग करता था।

    वह उसे बेच सकता था, दान कर सकता था और दण्डित कर सकता था। ऋग्वेद में आए एक उल्लेख के अनुसार ऋज्राश्व नामक एक पुत्र ने एक भेड़िये को 100 भेड़ें खिला दीं। इस अपराध के लिए ऋज्राश्व के पिता ने ऋज्राश्व की आंखें निकाल लीं। नचिकेता अपने पिता वाजश्रवा द्वारा यमराज को दान कर दिया गया।

    परिवार में माता का स्थान

    परिवार में माता को उच्च एवं प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त था। वेदों में माता का अभिनन्दन किया गया है। भगवान् के पूजन में भगवान को पिता के साथ-साथ माता भी कहा गया है। जब ब्रह्मचारी शिक्षा समाप्त करता था तब आचार्य उसे शिक्षा देता था कि वह देवता की तरह माता का सम्मान करे। रामायण में कौशल्या तथा महाभारत में कुंती एवं गांधारी के रूप में उस काल की माताओं की गरिमा का अनुमान किया जा सकता है। महाभारत में कहा गया है कि आचार्य दस श्रोत्रियों से बढ़कर है, पिता दस उपाध्यायों से बढ़कर है और माता की महत्ता दस पिताओं से भी अधिक है।

    वह अकेली ही अपने गौरव द्वारा सारी पृथ्वी को तिरस्कृत कर देती है। अतः माता के समान दूसरा गुरु नहीं है। वसिष्ठ धर्मसूत्र के अनुसार- 'दस उपाध्यायों से अधिक गौरव आचार्य का है, सौ आचार्यों से अधिक पिता का और एक हजार पिताओं से अधिक माता का।' गौतम-धर्मसूत्र में माता को श्रेष्ठ-गुरु कहा गया है। अतः माता का भरण-पोषण करना पुत्र का परम कर्त्तव्य माना गया। कुछ स्मृतियों में माता को पिता से भी अधिक उच्च स्थान दिया गया है और वह पिता से एक सहस्र गुना श्रद्धेय बताई गयी है किन्तु व्यावहारिक रूप से मुखिया के बाद उसकी पत्नी का स्थान होता था।

    सामूहिक सम्पत्ति

    परिवार की सम्पत्ति, किसी भी सदस्य की व्यक्तिगत सम्पत्ति नहीं मानी जाती थी अपितु परिवार के समस्त सदस्यों की सामूहिक सम्पत्ति मानी जाती थी। उत्तरवैदिक-काल में सम्पत्ति के अन्तर्गत पशु, भूमि एवं आभूषणों को सम्मिलित किया जाता था।

    स्त्री-धन

    स्त्री को विवाह के समय दहेज या उपहार के रूप में प्राप्त धन, उस स्त्री की व्यक्तिगत सम्पत्ति होता था और उसे 'स्त्री-धन' कहा जाता था। सैद्धांतिक रूप से वह स्त्री इस धन का स्वतंत्रता पूर्वक उपयोग कर सकती थी किंतु व्यावहारिक रूप में वह धन भी पूरे परिवार के ही काम आता था।

    परिवार की सम्पत्ति का बँटवारा

    याज्ञवल्क्य स्मृति (ई.100 से ई.300 के बीच रचित) की टीका मिताक्षरा (ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी) की मान्यता है कि पिता के जीवित रहते हुए भी पुत्र सम्पत्ति का बँटवारा करा सकते हैं क्योंकि उनका पारिवारिक सम्पत्ति में अधिकार होता है। यदि पिता के जीवित रहते सम्पत्ति का बँटवारा होता था, तब समस्त पुत्रों को सम्पत्ति में समान हिस्सा मिलता था किन्तु पिता की मृत्यु के बाद बँटवारा होने पर ज्येष्ठ पुत्र को सम्पत्ति का बीसवाँ भाग अतिरिक्त अंश के रूप में मिलता था जिसे 'ज्येष्ठांश' कहते थे। ऐसी स्थिति में ज्येष्ठ पुत्र को छोटे भाइयों के प्रति परिवार के सामूहिक कर्त्तव्यों का पालन करना होता था।

    पैतृक सम्पत्ति पर बारह प्रकार के पुत्रों का अधिकार

    भारतीय-शास्त्र उत्तराधिकारी के सम्बन्ध में बारह प्रकार के पुत्रों तथा सम्पत्ति पर उनके दावों का उल्लेख करते हैं। इन बारह प्रकार के पुत्रों में दत्तक पुत्र भी शामिल है। विवाहित पत्नी से उत्पन्न वयस्क पुत्र स्वाभाविक उत्तराधिकारी होते थे। चौथी पीढ़ी तक के रक्त-सम्बन्धी उत्तराधिकारी माने जाते थे।

    परिवार की सम्पत्ति पर स्त्री एवं पुत्री का अधिकार

    सामान्यतः स्त्री को उत्तराधिकार का अधिकार प्राप्त नहीं था किन्तु याज्ञवल्क्य स्मृति तथा उसके टीकाकार विज्ञानेश्वर ने उत्तराधिकारियों की सूची में पुत्र के बाद स्त्री और कन्या का भी उल्लेख किया है। पिता की मृत्यु के बाद अविवाहित कन्या अपने भाइयों की तरह सम्पत्ति में समान हिस्सा प्राप्त कर सकती थी। पिता के पुत्रहीन होने पर वह अपनी पुत्री को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर सकता था। मनुस्मृति के अनुसार इस प्रकार की पुत्री के पुत्र को अपने नाना की सम्पत्ति में अधिकार प्राप्त है किन्तु यदि अविवाहित कन्या जीवित है तो पुत्री के पुत्र को अपने नाना की सम्पत्ति में अधिकार प्राप्त नहीं होगा।

    भारतीय परिवार के प्रमुख कर्त्तव्य

    विश्व की प्रत्येक संस्कृति में परिवार के प्रमुख कर्त्तव्यों में बच्चों का लालन-पालन, वृद्धों की सेवा, बीमारों की सुश्रुषा तथा प्रत्येक सदस्य को संरक्षण एवं सहारा देना शामिल होता है किंतु भारतीय परिवार कुछ विशिष्ट कार्यों को भी सम्पादित करता है। तीन ऋणों से उऋण होना, पंच महायज्ञ करना तथा सोलह संस्कारों को सम्पादित करना प्रत्येक भारतीय परविार के प्रमुख कर्त्तव्य थे।

    तीन ऋणों से उऋण होना

    भारतीय ऋषियों का मानना था कि प्रत्येक मनुष्य देवताओं, ऋषियों, माता-पिता, अतिथियों और समाज के अन्य व्यक्तियों एवं प्राणियों से कुछ न कुछ सेवा, वस्तु, ज्ञान, आशीर्वाद एवं अनुग्रह प्राप्त करता है। इसलिए प्रत्येक मनुष्य पर तीन ऋण होते हैं- (1.) देव ऋण, (2.) ऋषि ऋण, (3.) पितृ ऋण। प्रत्येक मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह धर्मानुकूल आचरण करके तथा अपने कर्त्तव्यों का पालन करके इन तीनों ऋणांे से उऋण होने का प्रयत्न करे।

    (1.) देव ऋण: मनुष्य को जीवन-यापन करने के लिए जल, भूमि, वायु आदि साधनों की आवश्यकता होती है। ये समस्त साधन दैवीय-शक्तियों द्वारा उपलब्ध कराए जाते हैं। इसलिए हमें ऐसे काम नहीं करने चाहिए जिससे जल, भूमि या वायु को हानि पहुँचे। प्राकृतिक साधनों के संरक्षण के लिए वृक्ष लगाना, जलाशयों को साफ करवाना, उनमें से मिट्टी निकलवाना, पशु-पक्षियों के प्रति हिंसा नहीं करना, उनके दाने-पानी की व्यवस्था करना आदि कार्य देव-ऋण से उऋण करने में सहायक होते हैं।

    (2.) ऋषि ऋण: मनुष्य समाज के विभिन्न व्यक्तियों से ज्ञान प्राप्त करता है। इस ज्ञान के सहारे वह अपना जीवन-यापन करता है, इस कारण मनुष्य पर समाज का ऋण होता है। इसे ऋषि ऋण कहते हैं। इस ऋण से उऋण होने के लिए लिए मनुष्य को समाज के लोगों में ज्ञान बांटना चाहिए तथा विद्यार्थियों के लिए विद्यालय खोलने, निःशुल्क पुस्तकें उपलब्ध कराने तथा स्कॉलरशिप बांटने जैसी व्यवस्थाएं करनी चाहिए।

    (3.) पितृ ऋण: मनुष्य का पालन-पोषण उसके माता-पिता अथवा परिवार के सदस्य करते हैं तथा उसे समुचित शिक्षा दिलवाकर जीविकोपार्जन के योग्य बनाते हैं। इस कारण प्रत्येक मनुष्य पर अपने परिवार की देख-भाल करने तथा अपनी संतान के लालन-पालन की जिम्मेदारी होती है। इसे पितृ ऋण कहते हैं। इस ऋण से उपकृत होने के लिए प्रत्येक व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि वह विवाह करके गृहस्थी बसाए तथा अपने परिवार की समुचित देखभाल करे।

    (4.) गौण ऋण: इन तीन प्रमुख ऋणों के अतिरिक्त दो गौण ऋण और होते हैं- अतिथि ऋण और भूत ऋण। इन दोनों से भी हमें समय-समय पर कुछ न कुछ ज्ञान एवं सहयोग मिलता रहता है। धर्मशास्त्रों मंे इन पाँचों ऋणों से उऋण होने के लिए पंच-महायज्ञों का विधान रख गया है।

    पंच-महायज्ञ

    हिन्दू-धर्मशास्त्रों ने प्रत्येक परिवार के लिए पंच-महायज्ञों का विधान निर्धारित किया है-

    (1.) ब्रह्म यज्ञ: इस यज्ञ के माध्यम से मनुष्य अपने प्राचीन ऋषियों के प्रति सम्मान व्यक्त करता था। इसलिए इसे 'ऋषि यज्ञ' भी कहा जाता है। प्राचीन ऋषियों के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने का सर्वोत्तम ढंग विद्याध्ययन करना माना गया। इस कारण आर्यों ने स्वाध्याय करने का नियम बनाया।

    (2.) देव यज्ञ: इसे देवताओं के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए किया जाता था। प्रत्येक व्यक्ति को प्रातःकाल और सायं काल में अग्नि, इन्द्र, प्रजापति, सोम, पृथ्वी आदि देवी-देवताओं के मंत्रों के साथ 'स्वाहा' कहकर अग्नि में घी, दूध, दही आदि हविष्य की आहुतियाँ देने का विधान किया गया।

    (3.) भूत यज्ञ: इस यज्ञ के अन्तर्गत सृष्टि के समस्त तत्त्वों की संतुष्टि के लिए पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, प्रजापति एवं विश्वदेव आदि को भोजन की बलि दी जाती है और कौआ, गाय, चींटी एवं श्वान आदि पशु-पक्षियों को भोजन डालकर तुष्ट किया जाता है।

    (4.) पितृ यज्ञ: इस यज्ञ में पितरों के लिए तर्पण, बलि-हरण अथवा श्राद्ध का आयोजन होता है। पितरों के लिए दक्षिण दिशा की ओर भोजन एवं जल फेंका जाता है।

    (5.) मनुष्य यज्ञ: मनुष्य मात्र के प्रति उत्तरदायित्व की भावना का प्रदर्शन करने के लिए अतिथि-सत्कार की अनिवार्यता स्थापित की गई। इस यज्ञ के अंतर्गत स्वयं भोजन करने से पहले अतिथि को भोजन कराया जाता है।

    भारत में विवाह-प्रणालियाँ

    स्त्री-पुरुष के यौन सम्बन्धों को अनुशासन में बांधने तथा मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की उपलब्धि कराने के लिए उसे सुव्यवस्थित गृहस्थ जीवन प्रदान करने के उद्देश्य से स्त्री-पुरुष के विवाह की परम्परा आरम्भ हुई। वैदिक-काल से लेकर सूत्रकाल तक भारत में कई प्रकार की विवाह प्रणालियाँ प्रचलन में आईं जिनमें से आठ प्रणालियों को प्रमुख माना गया और इन्हें 'अष्ट-प्रणाली' कहा गया। विवाह की ये आठ प्रणालियाँ इस प्रकार से हैं-

    (1.) ब्रह्म विवाह: इस प्रणाली के अन्तर्गत कन्या के विवाह का उत्तरदायित्व उसके पिता अथवा अभिभावक पर था। वह अपनी कन्या के लिए सुयोग्य वर खोजकर, विधि-विधान पूर्वक अपनी कन्या का विवाह उस सुयोग्य वर से करता था। इस विवाह में वर अथवा वधू पक्ष की ओर से कोई वस्तु नहीं ली जाती थी। इस विवाह को समस्त प्रकार की विवाह प्रणालियों में श्रेष्ठ माना जाता था तथा इसे ब्रह्म विवाह कहा जाता था।

    (2.) प्रजापत्य विवाह: यह विवाह प्रणाली ब्राह्म विवाह के ही अनुरूप है, केवल नाम का अन्तर है। इस विवाह का उद्देश्य प्रजा (सन्तान) की उत्पत्ति करना है। इसमें कन्या का पिता वर की पूजा करके विधिपूर्वक अपनी कन्या का दान करता है और दोनों को गृहस्थ-जीवन बिताने का उपदेश देते हुए कहता है- 'तुम दोनों (पति-पत्नी) साथ रहकर धर्माचरण करो।' इस प्रकार के विवाह मंे भी किसी प्रकार का लेन-देन नहीं होता।

    (3.) दैव विवाह: कभी-कभी यज्ञ कराने वाले पुरोहित के गुणों व योग्यता से प्रभावित होकर यजमान उसके साथ अपनी कन्या का विवाह कर देता था। चूँकि वर दैव कार्य (यज्ञ) करता था अतः विवाह की इस प्रणाली को दैव विवाह कहा जाता था। वैदिक यज्ञों की परम्परा लुप्त हो जाने के साथ ही इस इस प्रकार के विवाह बंद हो गए।

    (4.) आर्ष विवाह: इस विवाह प्रणाली में कन्या का पिता वर पक्ष से एक गाय और एक बैल लेकर अपनी कन्या का विवाह करता था। इस प्रकार प्राप्त गाय-बैल का प्रयोग याज्ञिक कर्मों मंे किया जाता था। इसी से इसका नाम 'आर्ष विवाह' पड़ा।

    (5.) गान्धर्व विवाह: इस प्रकार के विवाह को 'प्रेम विवाह' या 'प्रणय विवाह' कह सकते हैं। इस प्रणाली में लड़के और लड़की मंे विवाह के पूर्व ही प्रेम हो जाता है और वे एक-दूसरे को पति-पत्नी स्वीकार कर लेते हैं। इसमें माता-पिता की सहमति का कोई महत्त्व नहीं होता। दुष्यन्त एवं शकुन्तला का विवाह इसका उदाहरण है। यह विवाह-प्रणाली वर-वधू की वयस्क अवस्था का भी संकेत करती हैे। आपस्तम्ब और वशिष्ठ आदि ऋषियों ने इस प्रणाली को अधर्म्य माना है।

    (6.) आसुर विवाह: इस विवाह-प्रणाली में कन्या का विक्रय होता है। कन्या का पिता विवाह के पूर्व, वर-पक्ष से अपनी कन्या का मूल्य माँगता है और मूल्य मिल जाने के बाद ही अपनी कन्या का विवाह करता है। इस विवाह प्रणाली का घोर विरोध किया गया। बोधायन ने लिखा है- 'कन्या को बेचने वाला पिता घोर नर्क में जाता है और क्रीत-पत्नी धर्म- विवाहिता नहीं हो सकती। वह एक दासी के समान होती है।'

    (7.) राक्षस विवाह: कन्या की इच्छा के विरुद्ध कन्या के पिता तथा सम्बन्धियों को पराजित कर या मारकर कन्या का अपहरण करके उसके साथ विवाह करना राक्षस विवाह कहलाता है। क्षत्रियों में यह विवाह प्रणाली अधिक लोकप्रिय थी परन्तु सूत्रकारों ने इस विवाह-प्रणाली का निषेध किया है।

    (8.) पैशाच विवाह: विवाह की आठ प्रणालियों में सबसे निम्न कोटि की प्रणाली पैशाच विवाह है। जब कोई व्यक्ति किसी सोती हुई, बेहोश, पागल अथवा उन्मत्त कन्या के साथ छलपूर्वक अथवा जागृत अवस्था में कन्या के साथ बलपूर्वक समागम करता था तो उस व्यक्ति को उस कन्या के साथ विवाह करने के लिए विवश किया जाता था। इसी कारण इसे पैशाच विवाह कहा जाता था।

    विवाह-सम्बन्ध में कुल-गौत्र का विचार

    प्राचीन हिन्दू-धर्मग्रन्थों में माता-पिता के गौत्र, प्रवर एवं रक्त-सम्बन्ध के भीतर विवाह करना निषेध माना गया है। गौत्र और प्रवर उस पूर्वज ऋषि के नाम होते हैं जिससे किसी समुदाय विशेष की उत्पत्ति मानी गई है। ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य सहित विभिन्न जातियाँ स्वयं को किसी प्राचीन ऋषि यथा- भरद्वाज, वशिष्ठ, शाण्डिल्य आदि की संतान मानती है। अतः एक ही पूर्वज (गौत्र एवं प्रवर) की सन्तान पारस्परिक विवाह सूत्र मंे नहीं बाँधी जा सकतीं। सपिण्ड के भीतर भी विवाह का निषेध माना गया है। सपिण्ड से अभिप्राय माता और पिता के रक्त-सम्बन्ध से है। वर्तमान समय में सामान्यतः चार कुलों- दादा, दादी, नाना एवं नानी के गौत्र को टालकर विवाह किया जाता है।

    अन्तर्जातीय विवाह

    यद्यपि समाज में अपने वर्ण अथवा अपनी जाति में विवाह करना ही उचित माना जाता है तथापि प्राचीन काल से लेकर वर्तमान समय तक अन्तर्जातीय-विवाह भी प्रचलन में रहे हैं। अन्तर्जातीय-विवाह दो प्रकार के होते थे- अनुलोम और प्रतिलोम। अनुलोम विवाह वे होते थे जिनमें पुरुष अपने से नीचे के वर्ण की कन्या के साथ विवाह करता था, जैसे ब्राह्मण पुरुष का क्षत्रिय अथवा वैश्य कन्या के साथ विवाह और क्षत्रिय पुरुष का वैश्य कन्या के साथ विवाह। प्रतिलोम विवाह वे होते थे जिसमें कोई पुरुष अपने से ऊँचे वर्ण की कन्या से विवाह करता था, जैसे क्षत्रिय पुरुष और ब्राह्मण कन्या अथवा वैश्य पुरुष और क्षत्रिय अथवा ब्राह्मण कन्या। धर्म शास्त्रों ने अनुलोम विवाह को मान्यता दी जबकि प्रतिलोम विवाह को धर्म-विरुद्ध एवं उससे उत्पन्न संतान को अवैध माना।

    नियोग प्रथा

    भारतीय समाज में नियोग-प्रथा अति प्राचीन काल से प्रचलन में रही है। इस प्रथा में कोई भी स्त्री निःसंतान अवस्था में अपने पति की मृत्यु होने पर अथवा पति के नपुसंक या रोगी होने पर अपने देवर या अन्य सगोत्र, सजातीय पुरुष के साथ समागम करके (नियोग स्थापित करके) पुत्र उत्पन्न कर सकती थी। इस प्रकार से उत्पन्न पुत्र को स्मृतियों ने 'क्षेत्रज पुत्र' कहा है। इस प्रकार से प्राप्त पुत्र को तत्कालीन समाज में पूर्ण मान्यता थी।

    विवाह-विच्छेद

    हिन्दू-धर्मग्रन्थों के अनुसार विवाह जन्म-जन्म का सम्बन्ध है इसलिए इसका विच्छेद नहीं हो सकता। मनुस्मृति में कहा गया है कि पति तथा पत्नी को धर्म, अर्थ और काम के विषय में एक-दूसरे के प्रति सच्चा और निष्ठावान रहना चाहिए तथा सदैव यही प्रयत्न करना चाहिए कि वे कभी भी अलग न हो सकें, पति-पत्नी की पारस्परिक निष्ठा जीवन-पर्यन्त चलती रहे, यही पति और पत्नी का परम धर्म है।

    मनु ने वैवाहिक सम्बन्ध को एक पवित्र ओर कभी न भंग होने वाला संस्कार माना है तथा स्त्री के पुनर्विवाह का निषेध किया है। नारद मुनि और पाराशर मुनि विशेष परिस्थितियों में विवाह-विच्छेद की स्वीकृति देते हैं। कौटिल्य के अनुसार- ब्राह्म, प्रजापत्य, आर्ष तथा देव विवाहों का विच्छेद नहीं हो सकता किन्तु गान्धर्व, आसुर, राक्षस तथा पैशाच विवाहों में परस्पर द्वेष उत्पन्न हो जाने पर एक दूसरे की सहमति से विवाह विच्छेद हो सकता है। प्राचीन हिन्दू समाज में पुरुषों का एकाधिकार बढ़ते जाने से स्त्री के लिए विवाह-विच्छेद के नियम भी कठोर हो गए। उच्च समझी जाने वाली जातियों में विवाह-विच्छेद को निकृष्ट कार्य माना जाता था।स्त्री के लिए पति परमेश्वर स्वरूप था जिसकी सेवा करना और आज्ञा पालन करना स्त्री का परम धर्म था।

    संयुक्त परिवार प्रणाली

    संयुक्त परिवार प्रणाली भारतीय जीवन शैली की सबसे बड़ी विशेषता है। गृह्यसूत्रों में बड़े परिवारों का उल्लेख किया गया है। बौद्ध युग में भी परिवार बड़े हुआ करते थे। अनेक जातकों में ऐसे परिवारों का उल्लेख हुआ है जो अपने सदस्यों के सहयोग एवं सहायता से चलते थे। ऐसे कुटुम्बों का भी उल्लेख हुआ है जिनके सदस्य अपनी इच्छा के अनुसार पिता आदि को दुःखी छोड़कर बौद्ध धर्म में दीक्षित हुए और उन्होंने सम्पत्ति में अपना अधिकार स्वयं ही अवरुद्ध कर लिया। स्त्रियाँ भी बौद्ध धर्म में दीक्षित होकर अपने परिवारों से दूर, किसी बौद्ध विहार अथवा संघाराम में जाकर रहने लगती थीं।

    संयुक्त परिवार के आधार-तत्त्व

    संयुक्त परिवार के दो आधार माने गए हैं-

    (1.) सदस्यों के पारस्परिक सम्बन्ध।

    (2) परिवार के प्रति कर्त्तव्यों का पालन।

    अर्थात् परिवार के सदस्यों के परस्पर सम्बन्ध मधुर होने चाहिए एवं प्रत्येक सदस्य को परिवार के प्रति अपने कर्त्तव्यों का पालन करना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति अपने परिवार से दूर रहकर धनोपार्जन करता है और उसकी सम्पत्ति एवं निवास स्थान अलग हैं परन्तु यदि वह अपने परिवार के प्रति उन कर्त्तव्यों का पालन करता है जो एक संयुक्त परिवार के सदस्य के लिए आवश्यक होते हैं, तो दूर रह रहा परिवार एकल नहीं माना जाता।

    संयुक्त परिवार में गृह-स्वामी के अधिकार

    प्राचीन और मध्य काल में व्यक्ति की संतान एवं सम्पत्ति की सुरक्षा करने और आजीविका के साधन एवं कौशल प्राप्त करने के लिए संयुक्त परिवार का होना आवश्यक था। परिवार का सबसे वृद्ध पुरुष संयुक्त परिवार का मुखिया होता था। उसे गृहस्वामी कहते थे। वह परिवार के सदस्यों को अनुशासन में रखता था, उन्हें धर्माचरण पर चलने का मार्ग दिखाता था, परिवार के सदस्यों की सुरक्षा करता था और उनकी उदर-पूर्ति की व्यवस्था करता था।

    वह परिवार में होने वाले मांगलिक कार्यों, याज्ञिक अनुष्ठानों, एवं वैवाहिक सम्बन्ध स्थिर करने सम्बन्धी निर्णय लेता था तथा उचित समय आने पर परिवार एवं सम्पत्ति का विभाजन भी करता था। साधारणतः परिवार के अन्य सदस्यों को गृहस्वामी की आज्ञाओं और निर्णयों में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं होता था। संयुक्त परिवार के स्वरूप को ठीक से समझ न पाने के कारण पाश्चात्य लेखकों ने संयुक्त परिवार के मुखिया को स्वेच्छाचारी बताया है परन्तु यह सत्य नहीं है।

    यद्यपि परिवार के मुखिया के अधिकार बहुत व्यापक होते थे, तथापि वह परिवार के अन्य सदस्यों की भावनाओं एवं उनकी आवश्यकताओं का ध्यान रखता था और महत्त्वपूर्ण निर्यय लेने से पहले उनसे विचार-विमर्श करता था।

    संयुक्त परिवार में सदस्यों के अधिकार

    संयुक्त परिवार के समस्त सदस्य एक ही भवन अथवा भवन-परिसर में एक साथ रहते थे। परिवार के समस्त सदस्यों का भोजन एक ही रसोईघर में बनता था। परिवार की सम्पत्ति में समस्त पुरुष सदस्यों का समान अधिकार होता था। परिवार के कई सदस्य धन अर्जित करते थे परन्तु उन सब की आय अलग-अलग न होकर परिवार की संयुक्त निधि होती थी जिससे पूरे परिवार का व्यय चलता था। इस दृष्टि से संयुक्त परिवार एक आर्थिक इकाई था। संयुक्त परिवार धार्मिक, सामाजिक एवं आर्थिक क्रियाओं का केन्द्र था। देव-पूजन एवं धार्मिक अनुष्ठान में परिवार के समस्त स्त्री एवं पुरुष सदस्य भाग लेते थे।

    संयुक्त परिवार में पुत्र का महत्त्व

    संयुक्त परिवार में पुत्र का महत्त्व अत्यधिक था। समाज में धारणा प्रचलित थी कि आत्मा ही पुत्र के रूप में जन्म लेती है। (आत्मा वै जायते पुत्रः)। इस प्रकार पुत्र के रूप में मनुष्य अमरत्व एवं निरंतरता को प्राप्त करता है। पुत्र उत्पन्न करना ही विवाह का मुख्य उद्देश्य था। पुत्र उत्पन्न होने पर पिता 'पितृ ऋण' से मुक्त हो जाता था। पुत्रों में भी ज्येष्ठ पुत्र का स्थान अन्य पुत्रों की अपेक्षा विशिष्ट था। श्राद्ध में ज्येष्ठ पुत्र ही पिण्ड और तर्पण देने का अधिकारी होता है। पिता की मृत्यु के बाद ज्येष्ठ पुत्र का कर्त्तव्य था कि वह अपने छोटे भाईयों का पुत्र के समान पालन करे।

    संयुक्त परिवार का विभाजन

    हिन्दू-धर्मशास्त्र परिवार के विभाजन को उचित नहीं मानते। मनु ने लिखा है कि परिवार के सदस्यों को परिवार छोड़़ने पर पाप लगता है। पिता की मृत्यु के बाद पुत्र उसकी सम्पत्ति को बराबर बांट सकते हैं किंतु उचित यह है कि छोटे भाई अपने बड़े भाई के साथ वैसे ही रहें जैसे पिता के साथ रहते थे। नारद स्मृति में क्रोधी, विषयी और शास्त्र-विरुद्ध आचरण करने वाले पिता से सम्पत्ति बंटवाने का निर्देश दिया है। पूर्व-मध्य-युग में सम्पत्ति के विभाजन को लेकर दो विचारधाराओं का विकास हुआ।

    इनमें से पहली थी विज्ञानेश्वर द्वारा प्रतिपादित मिताक्षरा और दूसरी थी जीमूतिवाहन द्वारा प्रवर्तित दायभाग। प्रथम विचारधारा के अनुसार पुत्र के उत्पन्न होते ही सम्पत्ति में उसका अधिकार हो जाता था। दूसरे विचार के अनुसार पिता की मृत्यु के बाद पुत्र का सम्पत्ति पर अधिकार सृजित होता था। इस काल में संयुक्त परिवार की साझी सम्पत्ति पर गृहस्वामी का अधिकार होता था और संयुक्त परिवार के किसी सदस्य द्वारा अर्जित सम्पत्ति पर केवल उसी सदस्य का अधिकार होता था।

    संयुक्त परिवार से लाभ

    (1.) सामाजिक सुरक्षा कवच

    संयुक्त परिवार, परिवार के प्रत्येक सदस्य का सुरक्षा कवच है। संकट के समय में वह परिवार के सदस्यों की सहायता प्राप्त करता है तथा किसी भी विपत्ति का सामना कर सकता है जबकि एकल-परिवार के सदस्यों में विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष करने की क्षमता अपेक्षाकृत कम होती है।

    (2.) सामाजिक सम्मान की गारण्टी

    संयुक्त परिवार में प्रत्येक सदस्य की योग्यता और अनुभव अलग-अलग होता है जिसका लाभ परिवार के प्रत्येक सदस्य को मिलता है। इससे परिवार के सदस्यों को समाज में प्रतिष्ठा एवं सम्मान प्राप्त होता है। समाज के बुरे व्यक्ति उस परिवार पर अपवाद आरोपित करने, झगड़ा खड़ा करने अथवा कीचड़ उछालने का दुःसाहस नहीं कर पाते।

    (3.) कम व्यय में जीवन-यापन

    परिवार के समस्त सदस्यों के एक साथ रहने के कारण कम व्यय में अधिक साधन जुटा लिए जाते हैं तथा प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग से संसाधन जुटाने की आवश्यकता नहीं रहती। इस कारण कम व्यय में अधिक लोगों का जीवन-यापन संभव हो जाता है।

    (4.) सहकारी एवं सहयोगी संस्था

    संयुक्त परिवार में बच्चों का लालन-पालन घर की सभी महिलाएं मिलकर करती हैं। इसी प्रकार प्रत्येक सदस्य अपना-अपना कार्य तय कर लेता है। इस कारण परिवार एक सहकारी संस्था बन जाता है। परिवार के समस्त सदस्य एक-दूसरे के साथ सहयोग करना अपना कर्त्तव्य समझते हैं। जवाहरलाल नेहरू के अनुसार संयुक्त पारिवार व्यवस्था परिवार के सदस्यों के लिए बीमा-कवच का काम करती है और इसमें मानसिक तथा शारीरिक दृष्टि से निर्बल लोगों के लिए भी सभी सुरक्षाएं उपलब्ध रहती हैं। रोगी की सेवा-सुश्रुषा भी संयुक्त परिवार में अधिक अच्छी होती है।

    (5.) जीवनयापन के साधन के रूप में

    कृषि, पशुपालन, कुटीर उद्योग एवं व्यापार आदि गतिविधियों में एक से अधिक व्यक्तियों के नियोजन की आवश्यकता होती है। संयुक्त परिवार प्रणाली में यह श्रम-शक्ति परिवार के भीतर ही उपलब्ध हो जाती है। पूरी तरह विश्वसनीय एवं अपने पैतृक व्यवसाय में दक्ष होने के कारण यह मानव-शक्ति अनुचरों की अपेक्षा अधिक अच्छे परिणाम देती है।

    (6.) व्यक्तिगत उन्नति के लिए समान अवसर एवं सुविधाएँ

    संयुक्त परिवार में समस्त सदस्यों को व्यक्तिगत उन्नति के लिए समान सुविधाएं प्राप्त होती हैं। परिवार के प्रत्येक सदस्य के कौशल एवं दक्षता का लाभ कमजोर सदस्य को भी समान रूप से प्राप्त होता है। इससे कमजोर सदस्य को भी व्यक्तिगत उन्नति के अधिक अवसर प्राप्त हो जाते हैं।

    (7.) बच्चों का व्यक्तित्व विकास

    संयुक्त परिवार में सभी भाइयों के बच्चों को घर के वृद्ध सदस्यों से मार्गदर्शन एवं संस्कार सहज रूप से प्राप्त होते हैं। संयुक्त परिवार में रहते हुए बच्चे में तेरा-मेरा जैसे संकीर्ण विचारों का प्रादुर्भाव नहीं होता और उनमें मिल-बांटकर खाने एवं रहने की प्रवृत्ति का विकास होता है।

    (8.) अधिकार और कर्त्तव्य का समन्वय

    संयुक्त परिवार में प्रत्येक सदस्य को अपने से बड़ों का आदर करना तथा उनकी आज्ञा का पालन करना होता है तथा अपने से छोटे एवं कमजोर सदस्य को सहायता एवं संरक्षण देना होता है। इससे उन्हें अधिकार एवं कर्त्तव्य के बीच संतुलन स्थापित करना आ जाता है।

    (9.) आनंद का सृजन

    संयुक्त परिवार में सभी सदस्य मिलजुल कर रहते हैं, तीज-त्यौहार एवं पारिवारिक उत्सव मनाते हैं। परस्पर चलने वाले संवादों एवं हास-परिहास के कारण उन्हें एकाकीपन तथा नीरसता नहीं झेलनी पड़ती अपितु परिवार के सदस्यों में प्रेम बढ़ता है और आनंददायी वातावरण सृजित होता है। परिवार के छोटे-छोटे बच्चों की किलकारियों एवं बाल-सुलभ चेष्टाओं के कारण प्रत्येक सदस्य को आनंद का अनुभव होता है। भाई-बहिन का प्रेम, माँ का वात्सल्य, देवर-भाभी का हास-परिहास, दादा-दादी एवं नाना-नानी के पोते-पोती या दौहित्र आदि के साथ मनोविनोद के प्रसंग केवल संयुक्त परिवार में ही संभव हैं।

    (10.) समाज सेवा की प्रेरणा

    संयुक्त परिवार के सदस्यों में दूसरे मानवों के प्रति सम्मान, मैत्री एवं करुणा के भाव अधिक होते हैं। इसलिए वे देश एवं समाज के लिए जिम्मेदार नागरिक सिद्ध होते हैं। संयुक्त परिवार में रहने से व्यक्ति का नैतिक स्तर ऊँचा रहता है। वे व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज सेवा जैसे कार्य भी करते हैं।

    (11.) कृषि-भूमि का संरक्षण

    संयुक्त परिवार के कारण कृषि-भूमि के विभाजन की गति मंद होती है। जबकि एकल परिवार प्रथा में कृषि-भूमि का विभाजन तेजी से होता है।

    संयुक्त परिवार प्रणाली की दुर्बलताएँ एवं हानियाँ

    संयुक्त परिवार प्रणाली में अनेक गुण होते हुए भी कुछ दोष भी निहित हैं जिनके कारण तथा देश एवं समाज की बदली हुई परिस्थितियों के कारण संयुक्त परिवार प्रणाली लुप्त होने के कगार पर है।

    (1.) जिम्मेदारियों के प्रति उपेक्षा भाव

    संयुक्त परिवार में कुछ लोगों को बहुत अधिक परिश्रम करना पड़ता है तो कुछ लोग बिना कुछ किए ही समस्त सुविधाओं का उपभोग करते हैं। ऐसी स्थिति में काम से बचने की प्रवृत्ति वाले सदस्य मानते हैं कि बाकी लोग काम कर रहे हैं, इसलिए मैं न करूं तो क्या हानि है! जबकि काम करने वाले सदस्य सोचते हैं कि जब दूसरा सदस्य काम नहीं कर रहा तो मैं ही क्यों करूं! इस प्रवृत्ति के कारण परिवार में बिखराव उत्पन्न होने लगता है।

    (2.) परस्पर झगड़ों का कारक

    संयुक्त परिवार में विभिन्न प्रवृत्तियों के सदस्यों को एक साथ रहना होता है, जिनमें बहुधा सामंजस्य का अभाव होता है। परिवार में आने वाली बहुएँ भिन्न पारिवारिक परिवेश से आती हैं और प्रायः ससुराल के नए वातावरण में स्वयं को असुरक्षित अनुभव करती हैं। इस कारण सास-बहू, ननद-भौजाई, देवरानी-जेठानी में व्यक्तित्व का टकराव होता है। ये झगड़े पुरुष सदस्यों में भी आरम्भ हो जाते हैं और प्रायः इतने बढ़ जाते हैं कि परिवार टूटकर बिखर जाते हैं।

    (3.) स्त्रियों की स्वतंत्रता का हनन

    संयुक्त परिवार में स्त्रियों की स्वतंत्रता सीमित हो जाती है। उन्हें पारिवारिक जिम्मेदारियों तथा दूसरे सदस्यों की उपस्थिति के कारण अपने पति एवं बच्चों के साथ वार्तालाप करने, अपनी रुचि का भोजन बनाने, इच्छानुसार वस्त्र पहनने एवं स्वतंत्रता पूर्वक घर से बाहर जाने के अवसर नहीं मिल पाते। उसे घर के बड़े सदस्यों से पर्दा करना पड़ता है और स्वयं को दाब-ढंक कर रखना पड़ता है। बोलते समय भी अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ती है। कई बार उसे अपने पति की कम आय अथवा पीहर वालों की कमजोर आर्थिक स्थिति को लेकर व्यंग्य एवं ताने भी सुनने पड़ते हैं। यदि पति बेरोजगार है तो पत्नी को नौकरानी की तरह काम करना पड़ता है। इससे उस स्त्री तथा उसके बच्चों के मनोविज्ञान पर बुरा असर पड़ता है।

    (4.) व्यक्तित्व विकास में बाधक

    संयुक्त परिवार में रहने के कारण व्यक्ति न तो अपनी इच्छानुसार खा सकता है और न पहन सकता है। वह अपनी इच्छित वस्तु खरीदकर भी नहीं ला सकता। उसे अपनी पत्नी और बच्चों की इच्छाओं को पूरा करने से पहले दूसरे सदस्यों की आवश्यकताओं का ध्यान रखना पड़ता है। इस कारण परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपनी अभिलाषाओं पर अंकुश लगाना पड़ता है।

    संयुक्त परिवार के विघटन के कारण

    (1.) आर्य संस्कृति का मुख्य आधार 'परिवार' था जबकि पाश्चात्य संस्कृति व्यक्ति-स्वातंत्र्य में विश्वास करती है। जब देश में पाश्चात्य विचारों का प्रवेश हुआ तो भारतीयों ने भी 'व्यक्तिवाद' को अपना लिया। कुटीर उद्योगों के विनाश, औद्योगिकीकरण एवं शहरीकरण जैसी प्रवृत्तियों ने लोगों को काम-धंधे की तलाश में बड़ी संख्या में गांव छोड़कर शहरों की ओर जाना पड़ा।

    (2.) संयुक्त परिवार के सदस्यों के सरकारी नौकरियों एवं बड़ी-बड़ी कम्पनियों में दूर पदस्थापन होने से भी संयुक्त परिवार बिखर गए और लोग अपने बीवी-बच्चों एवं शहरी सुख-सुविधाओं के बीच रहने के अभ्यस्त हो गए।

    (3.) पुरानी पीढ़ी के लोग पुरातन परम्पराओं के पक्षधर होते हैं तथा परिवार का संचालन उसी पद्धति पर करना चाहते हैं जबकि नई पीढ़ी के लोगों की मान्यताओं में तेजी से बदलाव आने के कारण वे पुरानी पीढ़ी की बातों से सहमत नहीं होते। इस कारण भी संयुक्त परिवारों का तेजी से विघटन हुआ।

    (4.) परम्परागत परिवार में सास अपनी बहू को अपने अनुशासन में रखना चाहती है किंतु बहू सास को व्यर्थ का बोझ समझकर उससे दूर रहना चाहती है। सास चाहती है कि बहू पर्दा करे, घर की चारदीवारी से बाहर न निकले, सुबह उठकर सास-ससुर के पैर छुए, सास-ससुर की उपस्थिति में अपने पति से बातचीत न करे और जो कुछ सास कहे, उसे चुपचाप स्वीकार कर ले परन्तु पढ़ी-लिखी बहू पुरातनपंथी सास की बातों को दकियानूसी मानती है। इस कारण भी संयुक्त परिवार तेजी से टूटते चले गए।

    (5.) बढ़ती हुई आकांक्षाओं और आवश्यकताओं के कारण अब परिवार का व्यय एक सदस्य की कमाई से नहीं चलता। अतः औरतें भी नौकरी करना चाहती हैं। ऐसे लोगों के लिए संयुक्त परिवार में रहना कठिन हो जाता है। जब घर की कुछ औरतें नौकरी करती हैं और कुछ नहीं करतीं तो उनमें बराबरी के अधिकार को लेकर संघर्ष आरम्भ हो जाता है। कमाने वाली औरतें अपने धन पर अपना अधिकार समझती हैं जबकि न कमाने वाली औरतें और पुरुष सदस्य औरत की कमाई पर पूरे परिवार का अधिकार समझते हैं। इससे घर का वातावरण प्रेम-युक्त नहीं रह पाता।

    संक्षेप में कहा जा सकता है कि व्यक्ति-स्वातंत्र्य के इस युग में न तो नई पीढ़ी ही पुरानी पीढ़ी के नियंत्रण में रहना चाहती है और न पढ़ी-लिखी नारी ही संयुक्त परिवार के दायित्वों का निर्वहन करना चाहती है। इस कारण संयुक्त परिवार की परम्परा लगभग लुप्त हो गई है, विशेषकर नगरीय क्षेत्रों में।

    ऋग्वैदिक-काल के परिवारों में नारी की स्थिति

    आर्य जन-जीवन में पितृसत्तात्मक परिवार प्रणाली होने के उपरान्त भी स्त्रियों को घर, परिवार एवं समाज में सम्मान एवं प्रतिष्ठा प्राप्त थी। वह देवताओं के समान श्रद्धा की पात्र थी। ऋग्वेद में ऐसे अनेक साक्ष्य मिलते हैं जिनसे ज्ञात होता है कि बौद्धिक, आध्यात्मिक तथा सामाजिक जीवन में स्त्रियों को पुरुषों के समान ही प्रतिष्ठा प्राप्त थी। धार्मिक कृत्यों, सामाजिक उत्सवों तथा समारोहों में वे पुरुषों के साथ आसन ग्रहण करती थीं। पत्नी के रूप में वह परिवार की स्वामिनी होती थी। उसके लिए गृहणी, गृहस्वामिनी तथा सहधर्मिणी जैसे आदरसूचक सम्बोधन किए जाते थे।

    ऋग्वैदिक-काल में पुत्री का जन्म चिन्ता का विषय नहीं माना जाता था। कन्याओं की शिक्षा दिलवाई जाती थी। पुत्रों की भांति पुत्रियों का भी उपनयन संस्कार होता था और वे भी ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करती हुई पढ़ती थीं। कन्याओं को गृहस्थ जीवन के लिए आवश्यक कार्यों की शिक्षा दी जाती थी। वैदिक युग में विश्ववारा, घोषा, अपाला, लोपामुद्रा, सिकता, निवावरी, गार्गी, मैत्रेयी आदि स्त्रियों ने ऋषियों का पद प्राप्त किया।

    उन्होंने वेद-मन्त्रों की रचना की और पुरुषों की ही भांति शास्त्रार्थों एवं सभा-गोष्ठियों में भाग लिया। उस युग में पर्दा-प्रथा और सती-प्रथा का प्रचलन नहीं था। कन्याएं अपनी इच्छा से अपने पति के चयन कर सकती थीं। समाज में एक-पत्नी प्रथा प्रचलित थी। उस युग में विधवा-विवाह के भी उदाहरण मिलते हैं, यद्यपि यह सामान्य नियम नहीं था। विधवा स्त्री को नियोग-प्रथा द्वारा पुत्र प्राप्ति का अधिकार था। कुछ विशेष मामलों में पति की जीवितावस्था में भी पति की सहमति से स्त्री को नियोग-प्रथा के द्वारा पुत्र उत्पन्न करने का अधिकार था।

    उत्तरवैदिक-काल के परिवारों में नारी की स्थिति

    उत्तरवैदिक-काल में स्त्रियों की स्थिति में थोड़ी गिरावट आई। कन्या का जन्म कष्ट का कारण माना जाने लगा और स्त्रियों के संस्कारों के समय वेद मन्त्रों का उच्चारण बन्द कर दिया गया। स्त्री-पुरुष की समानता का भाव कम हो गया परन्तु परिवार में स्त्रियों का महत्त्व पहले की तरह बना रहा। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार मनुष्य स्वयं पूर्ण नहीं है, विवाह के बाद पत्नी उसे पूर्ण बनाती है।

    सूत्रग्रंथों के रचयिताओं यथा बोधायन, वशिष्ठ और गौतम आदि ने स्त्री को पुरुष के अधीन माना। फिर भी परिवारों में उसकी मर्यादा बनी रही। महाभारत में नारी को धर्म, अर्थ और काम का सूत्र माना गया है और उसे पुरुष की अर्द्धांगिनी कहा गया है। मनुस्मृति में लिखा है- 'जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता रमण करते हैं। जिस कुल में नारी का अपमान होता है, वह कुल नष्ट हो जाता है।' समय के साथ स्त्रियों की स्वतंत्रता पर और अधिक नियंत्रण लगा दिए गए। उनके लिए शिक्षा को अनावश्यक समझा गया। मनु आदि स्मृतिकारों ने स्त्रियों के उपनयन संस्कार का निषेध कर दिया। इससे स्त्रियों के लिए शिक्षा का द्वार बन्द हो गया।

    मनु-स्मृति में बाल-विवाह का समर्थन किया गया है। याज्ञवल्क्य स्मृति एवं नारद स्मृति के अनुसार कन्या का विवाह रजस्वला होने से पूर्व हो जाना चाहिए। कन्या अपने पिता के घर में राजस्वला नहीं होनी चाहिए। इस काल में नियोग-प्रथा एवं विधवा-विवाह का भी निषेध कर दिया गया। स्त्री को सम्पत्ति रखने या उसका क्रय करने का अधिकार भी नहीं रहा। स्त्रियों पर कठोर नियंत्रण होने के उपरांत भी उत्तरवैदिक युग में नारी भोग की वस्तु नहीं समझी गई। इस काल में भी वह, पहले की ही तरह समाज और परिवार के अस्तित्व एवं उन्नति का आधार मानी जाती थी।

    मध्य-काल में स्त्रियों की स्थिति

    भारत के इतिहास में मध्य-काल विदेशी आक्रांताओं के भीषण आक्रमणों का काल है। इस काल में स्त्रियों की स्थिति में और अधिक गिरावट आई। संयुक्त परिवार में पुत्रियों को शिक्षा एवं सम्पत्ति के समस्त अधिकारों से वंचित कर दिया गया। वे परायी धरोहर समझी जाने लगीं। स्त्रियों का प्रमुख कार्य परिवार के सदस्यों की सेवा करने तक सीमित हो गया।

    मध्य-काल में नारी भोग की वस्तु समझी जाने लगी। विदेशी आक्रांताओं में हाथों में पड़ने से बचने के लिए समाज में सती-प्रथा, जौहर, बाल-विवाह जैसी प्रथाओं को बढ़ावा मिला तथा कन्या-वध जैसी नई कुप्रथाओं ने जन्म लिया। यद्यपि वैदिक-काल में राजाओं तथा धनी लोगों में बहुपत्नी प्रथा प्रचलित थी किन्तु मध्य-काल में इस प्रथा का अत्यधिक विस्तार हो गया। बहुपत्नी प्रथा ने स्त्रियों की सामाजिक स्थिति को और अधिक गिरा दिया। उच्च वर्णों में विधवा-विवाह पूरी तरह निषिद्ध हो गया।

    परिवार में विधवा को अमंगलसूचक माना जाने लगा। स्त्री को विधवा होते ही अपने बाल कटवाने पड़ते थे ताकि उसकी सुन्दरता समाप्त हो जाए। उसे सन्यासी की तरह संयमपूर्वक रहना पड़ता था। उसके लिए मसाले वाला भोजन करना वर्जित हो गया क्योंकि इससे मन में कामेच्छा एवं बुरे विचार उत्पन्न होते हैं। वह रंगीन एवं अच्छे वस्त्र धारण नहीं कर सकती थी तथा किसी विवाहादि उत्सव में भाग नहीं ले सकती थी। परिवार में विधवा के रहने का स्थान भी अलग रखा जाने लगा।

    शिक्षा एवं सम्पत्ति के अधिकारों से पूर्णतः वंचित होने के कारण मध्य-काल में स्त्रियों की दशा इतनी गिर गई कि उसने पुरुष प्रधान समान के समस्त अंकुश चुपचाप स्वीकार कर लिए। परिवार की बड़ी-बूढ़ी अशिक्षित स्त्रियां स्वयं को धर्म की रक्षक समझकर अपनी ही विधवा बहुओं की शत्रु बन गईं। जिस स्त्री के पेट से पुत्र का जन्म नहीं होता था, उसे भी परिवार की अन्य महिलाओं की प्रताड़ना सहन करनी पड़ती थी।

    घर की वृद्धाएं अपने पुत्रों को पुत्र प्राप्ति हेतु दूसरा विवाह करने के लिए उकसाती थीं। पर्दा प्रथा, सती-प्रथा, बाल-विवाह, बहु-विवाह आदि कुरीतियों के पनप जाने के कारण इस युग के परिवारों में स्त्रियों का वह सम्मान नहीं रहा जो उसे वैदिक एवं उत्तरवैदिक-काल में प्राप्त था। अनमेल-विवाह के कारण बहुत सी स्त्रियों का जीवन नर्क बन गया क्योंकि वे प्रायः बहुत कम आयु में विधवा होकर अभिशप्त जीवन जीती थीं।

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  • एक दूसरे को लूटते थे सिरोही और जोधपुर राज्य

     02.06.2020
    एक दूसरे को लूटते थे सिरोही और जोधपुर राज्य

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    राजपूताने और गुर्जरात्रा की सीमाओं पर चौहानों की एक पुरानी और प्रसिद्ध रियासत सिरोही के नाम से जानी जाती थी। सिरोही का अर्थ होता है- शीश काटने वाली अर्थात् तलवार। सिरोही राज्य का क्षेत्रफल 1,994 वर्ग मील था। सिरोही का राजवंश देवड़ा चौहानों के नाम से प्रसिद्ध था।

    ई.1760 में महाराव वैरीशाल द्वितीय सिरोही का राजा हुआ। उस समय राज्य बर्बादी के मुँह में था। भील और मीणे प्रजा को जी भर कर लूटते थे। राज्य के सामंत और सरदार महाराव का कहना नहीं मानते थे तथा राज्य की सीमा पर स्थित पालनपुर एवं जोधपुर राज्यों से सीमा सम्बन्धी झगड़े चलते रहते थे। पालनपुर राज्य ने सिरोही राज्य के लगभग 250 गाँव दबा लिये थे जिससे सिरोही राज्य में उस समय कुल 40-50 गाँव ही रह गये थे जिनसे इतनी आय नहीं होती थी कि सिरोही का राजा एक मजबूत सेना का निर्माण करके पालनपुर से अपने गाँवों को वापस छीन सके।

    महाराव वैरीशाल समझता था कि उसके राजपूत सरदार उसका साथ नहीं देंगे इसलिये उसने बाहर से मकरानी तथा सिंधी मुसलमानों और नागों को फौज में भरती करना आरंभ किया। छः साल में महाराव ने मुसलमानों की बड़ी फौज तैयार करके पालनपुर राज्य पर आक्रमण किया किंतु जो राजपूत सामंत महाराव के साथ सिरोही से सेना लेकर चले वे पालनपुर की सीमा पर पहुँच कर पालनपुर के नवाब की ओर हो गये। इस पर महाराव पालनपुर से लड़ने का विचार त्यागकर राजधानी को लौट आया। बल से काम बनता न देखकर महाराव ने छल से काम लेना आरंभ किया। उसने अपने सरदारों के मुखिया अमरसिंह डूंगरावत को सिंधी मुसलमानों के मुखिया देसर सिंधी को रुपये देकर अमरसिंह डूंगरावत की हत्या करवा दी। अमरसिंह के मरने पर सरदारों के मनोबल में काफी गिरावट आयी।

    जब जोधपुर के राज्य पर महाराजा भीमसिंह ने अधिकार कर लिया और राज्य के दावेदारों को मारना आरंभ किया तब महाराज मानसिंह ने सिरोही राज्य में शरण लेने के लिये अपने पुत्र छत्रसिंह को महाराजा वैरिशाल के पास भेजा। इससे पहले औरंगजेब के समय में सिरोही राज्य ने महाराजा अजीतसिंह को शरण दी थी किंतु महाराज वैरीशाल ने भीमसिंह से मित्रता होने के कारण मानसिंह तथा उसके पुत्र को शरण देने से मना कर दिया।

    जब ई.1803 में मानसिंह जोधपुर का राजा बन गया तब मानसिंह ने जोधपुर राज्य की सेना को सिरोही पर आक्रमण करने भेजा। इस सेना ने सिरोही राज्य को जमकर लूटा किंतु इस पर भी मानसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ। वह आजीवन सिरोही राज्य को लूटता रहा। वह सिरोही राज्य को मारवाड़ में सम्मिलित करना चाहता था किंतु इस उद्योग में सफल नहीं हो सका। ई.1812 में मानसिंह ने फिर से सिरोही पर आक्रमण किया तथा उसे जी भर कर लूटा और बर्बाद किया।

    ई.1813 में सिरोही का महाराव उदयभाण अपने छोटे भाई शिवसिंह के साथ सोरों की यात्रा को गया। मार्ग में वह पाली नगर में ठहरा तथा वहाँ वेश्याओं के नाच गान में रम गया। पाली के हाकिम ने मानसिंह को गुप्त सूचना पहुंचाई कि महाराव उदयभाण पाली में ठहरा हुआ है। इस पर मानसिंह ने तत्काल सेना भेजकर महाराव उदयभाण, उसके भाई शिवसिंह तथा सिरोही राज्य के अधिकारियों को पकड़ लिया तथा जोधपुर ले आया। तीन माह तक सिरोही का महाराव जोधपुर में कैद रहा। इस दौरान मानसिंह ने उदयभाण से कई प्रकार की शर्तें अपने पक्ष में लिखवा लीं। इसके बाद सवा लाख रुपये देने का वचन देकर महाराव जोधपुर की कैद से छूटा। इसके बाद मानसिंह, उदयभाण से ऐसे मिला जैसे एक राजा, दूसरे राजा से मिला करता है।

    उदयभाण अपने वचन का पक्का नहीं था। वह तो केवल कैद से छूटने के लिये ही मानसिंह की शर्तें स्वीकार करता चला गया था। जब कई महीनों तक उसने मानसिंह को सवा लाख रुपये नहीं भिजवाये तो जोधपुर राज्य की सेना ने सिरोही राज्य में घुसकर लूट मचायी।

    महाराव उदयभाण को उसके आदमियों ने सलाह दी कि जब जोधपुर की सेना हमारे राज्य में लूट करती है तो हमें भी जोधपुर राज्य में घुसकर लूटमार करनी चाहिये। इस पर महाराव ने अपनी सेना को जोधपुर राज्य में लूट करने के लिये भेज दिया। जब महाराजा मानसिंह ने सिरोही राज्य की इस ढिठाई के बारे में सुना तो उसने अपनी सेना को आदेश दिया कि वह सिराही राज्य को नष्ट कर दे। जोधपुर राज्य की सेना के भय से उदयभाण सिरोही छोड़कर पहाड़ों में भाग गया। जोधपुर राज्य की सेना पूरे दस दिन तक सिरोही नगर और आस पास के गाँवों को लूटती रही तथा ढाई लाख रुपये इकटठे करके जोधपुर लौटी।

    जोधपुर की सेना ने सिरोही से लौटते समय सिरोही के राजकीय कार्यालयों को आग की भेंट कर दिया। सिरोही राज्य को जलता हुआ देखकर महाराव उदयभाण ने महाराजा मानसिंह को सवा लाख रुपये लौटाने का मन बनाया ताकि दोनों पक्षों में शांति स्थापित हो सके किंतु राजकीय खजाना तो खाली था। इस पर महाराव ने महाजनों से रुपये वसूलने के लिये उन पर सख्ती की जिससे महाजन सिरोही राज्य को छोड़कर हमेशा के लिये गुजरात और मालवा की ओर भाग गये तथा वहीं पर बस गये।

    इसी बीच भीलों और मीणों ने गाँव-गाँव में घुसकर लूट मचानी शुरू कर दी। वे जानवरों के झुण्डों को पकड़ कर ले जाते तथा उन्हें मारकर पकाते खाते थे। महाजनों आदि को बंधक बनाकर पहाड़ों में ले जाते तथा वहाँ उन्हें तरह-तरह की यातनाएं देते थे। उन्होंने कई गाँवों से अपनी चौथ भी बांध ली।

    राज्य की यह दुर्दशा देखकर सिरोही राज्य के सरदार नांदिया गाँव के ठाकुर शिवसिंह के पास गये जिसे राजा साहब की पदवी प्राप्त थी। ठाकुर शिवसिंह महाराव उदयभाण का छोटा भाई था। उसने ई.1817 में महाराव उदयभाण को नजरबंद कर लिया तथा स्वयं राज्यकार्य चलाने लगा।

    महाराजा मानसिंह ने जोधपुर से सेना भेजकर महाराव उदयभाण को नजरबंदी से मुक्त करवाने का उपक्रम किया किंतु सफलता नहीं मिली। महाराव तीस वर्ष तक नजरबंद रहा तथा नजरबंदी की अवस्था में ही ई.1847 में उसकी मृत्यु हो गयी। उसके बाद उसका छोटा भाई शिवसिंह सिरोही राज्य का स्वामी हुआ।

    शिवसिंह ने 1817 से ही सिरोही राज्य का शासन कार्य अपने हाथ में ले लिया था किंतु बड़े भाई के जीवित रहते तक उसने अपने आप को महाराव नहीं कहाँ ई.1818 में उसने ईस्ट इण्डिया कम्पनी से समझौता करने का प्रयास किया किंतु जोधपुर नरेश मानसिंह ने अंग्रेजों को लिखा कि सिरोही राज्य पहले से ही जोधपुर राज्य के अधीन है इसलिये सिरोही राज्य से अंग्रेज अलग से समझौता नहीं कर सकते किंतु कर्नल टॉड ने मानसिंह के इस दावे को ठुकरा दिया और ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने सिरोही राज्य के साथ अलग से समझौता किया।

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  • अध्याय - 20 राजकीय संग्रहालय चित्तौड़गढ़

     02.06.2020
    अध्याय - 20 राजकीय संग्रहालय चित्तौड़गढ़

    अध्याय - 20 राजकीय संग्रहालय चित्तौड़गढ़


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    चित्तौड़गढ़ संग्रहालय की स्थापना राजस्थान सरकार के पुरातत्व विभाग द्वारा ई.1968 में चित्तौड़ दुर्ग में स्थित फतह प्रकाश महल में की गई। इस भवन का निर्माण महाराणा फतहसिंह (ई.1884-1930) द्वारा दुर्ग के मध्य भाग में करवाया गया। इस भवन के प्रांगण में बने कुण्ड में संगमरमर के कमलपुष्प पर महाराणा की प्रतिमा प्रदर्शित है।

    यह आयताकार भवन दो-मंजिला है तथा इसके चारों कोनों पर गुम्बज बनी हुई हैं जो 6-7 किलोमीटर दूर से भी दिखाई देती हैं। गुम्बज पर सुवर्ण कलश अलंकृत हैं। महल के ऊपर की मंजिल में एक बड़ा हॉल बना हुआ है जिसमें रंगीन कांच की नक्काशी करके विभिन्न प्रकार के बेल-बूटे एवं पशु-पक्षियों की आकृतियां बनाई गई हैं। ऊपर की मंजिल में लकड़ी युक्त खिड़कियां, इस प्रकार बनाई गई हैं कि अन्दर की तरफ से व्यक्ति बाहर का दृश्य देख सके परन्तु बाहर खड़े व्यक्ति को अन्दर का दृश्य दिखाई न दे।

    महल का प्रवेश-द्वार उत्तर दिशा की ओर खुलता है जिसमें प्रवेश करते ही गणपति की भव्य प्रतिमा के दर्शन होते हैं। इस संग्रहालय में 640 पाषाण प्रतिमाएं, 18 धातु प्रतिमाएं, 256 धातु कलाकृतियाँ एवं आभूषण, 85 मृण्मय सामग्री, 35 काष्ठ-कलाकृतियां, 100 लघुचित्र, 20 तैलचित्र, 2,060 सिक्के और 307 अन्य वस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं।

    पुरातत्व कक्ष

    इस कक्ष में पूर्व-पाषाण-कालीन उपकरण एवं नगरी से प्राप्त कुषाण-कालीन मृण्मय सामग्री प्रदर्शित की गई है, जिन पर विभिन्न प्रकार के पशु पक्षी एवं पुष्पाकृतियां बनी हुई हैं। मोलेला (उदयपुर) के कुंभकारों द्वारा निर्मित देवी-देवताओं की आधुनिक मृण्मूर्तियां भी प्रदर्शित की गई हैं। इनमें भैरव, काली, दुर्गा, चामुण्डा, नागदेव आदि प्रमुख हैं।

    प्रतिमा कक्ष

    प्रतिमा कक्ष में संजोए गए संग्रह में गुप्तकाल से लेकर आधुनिक काल तक की प्रतिमाओं को स्थान दिया गया है। अधिकांश प्रतिमाएं चित्तौड़ दुर्ग से प्राप्त हुई हैं। प्रतापगढ़, पानगढ, राश्मी (चित्तौड़गढ़) जहाजपुर, मेजाबांध (भीलवाड़ा) आदि स्थानों से प्राप्त प्रतिमाएं भी प्रदर्शित की गई हैं। यहाँ के संग्रह में केन्द्रीय पुरातत्व से प्राप्त अश्ववाहिनी देवी मध्योत्तर काल एवं जहाजपुर से प्राप्त गोधासन गौरी की श्वेत एवं कृष्ण की प्रतिमाएं विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। धातु प्रतिमाओं में विष्णु, वेणु-गोपाल एवं नन्दी की प्रतिमाएं महत्वपूर्ण हैं जो जिलाधीश कार्यालय चित्तौड़ से प्राप्त हुई हैं। एक प्रतिमा में भगवान विष्णु को चौकी पर विराजमान मुद्रा में दर्शाया गया है।

    अस्त्र-शस्त्र कक्ष

    अस्त्र-शस्त्र कक्ष में मध्यकालीन हथियारों का संग्रह है जिनमें जिरहबख्तर, शिरस्त्राण, ढालें, तलवारें, बन्दूकें और कटारें मुख्य हैं। इस कक्ष की अधिकांश सामग्री उदयपुर संग्रहालय से तथा कुछ सामग्री जयपुर संग्रहालय से प्राप्त हुई है। जहांगीर कालीन चमड़े का कवच तथा बस्सी (चित्तौड़) से प्राप्त दस्ताने उल्लेखनीय हैं। यहाँ प्रदर्शित बन्दूकों की अधिकतम लम्बाई सात से आठ फुट तक है। ये बन्दूकें ऊँट पर बैठकर बारूद दागने के काम आती थीं।

    पेन्टिंग कक्ष

    पेन्टिंग कक्ष में मेवाड़ के महाराणाओं के मनुष्याकार तैलचित्र प्रदर्शित किए गए हैं जिनमें बप्पा रावल, कुम्भा, सांगा, उदयसिंह, प्रतापसिंह, फतहसिंह एवं भूपालसिंह के चित्र महत्वपूर्ण हैं। पन्नाधाय का तैलचित्र भी प्रदर्शित किया गया है। अधिकांश चित्र विभागीय कलाकार मोहन लाल शर्मा द्वारा तैयार किए गए हैं। लघु चित्रों में उदयपुर संग्रहालय से प्राप्त 18वीं सदी के योगवशिष्ट, नैषध, मेवाड़ शैली के गोकुलचन्द के चित्र एवं भदेसर (चित्तौड़गढ़) से प्राप्त आधुनिक शैली के चित्र प्रदर्शित किए गए हैं।

    आदिवासी दीर्घा

    चित्तौड़ संग्रहालय में आदिवासी युगल भील óी-पुरुष तथा गाड़िया लोहार के प्लास्टर निर्मित मॉडल प्रदर्शित हैं। मेवाड़ से इन जातियों का विशेष सम्बन्ध था। राणा प्रताप की सेना में आदिवासी वीरों ने महत्वपूर्ण योगदान किया।

    दरबार हॉल

    स्वतंत्रता प्राप्ति की स्वर्ण जयन्ती के अवसर पर सितम्बर 1997 में संग्रहालय भवन के ऊपर की मंजिल दरबार-हॉल में ‘मेवाड़ की सांस्कृतिक धरोहर’ प्रदर्शनी का आयोजन किया गया जिसे बाद में स्थाई कर दिया गया।

    मीरांबाई के चित्र

    संग्रहालय के एक कक्ष में भक्त शिरोमणि महारानी मीरां से सम्बन्धित चित्र भी प्रदर्शित किए गए हैं जो मीरां समिति चित्तौड़गढ़ की ओर से वर्ष 1981 में संग्रहालय को भेंट स्वरूप प्राप्त हुए थे।

    काष्ठ कलाकृतियाँ

    संग्रहालय के एक कक्ष में बस्सी (चित्तौड़गढ़) में निर्मित काष्ठ कलाकृतियों के नमूने प्रदर्शित किए गए हैं जिनमें ईसर, गणगौर, रासलीला दृश्य आदि महत्वपूर्ण हैं।

    सिक्के

    यहाँ के संग्रह में चित्तौड़गढ़ एवं भीलवाड़ा जिले से प्राप्त ताम्बे एवं चांदी के कुछ सिक्के भी प्रदर्शित किए गए हैं जो मुगलकाल से लेकर आधुनिक काल तक के हैं। सोने का एक मुगलकालीन सिक्का ग्राम शंभूगढ़ (भीलवाड़ा) से प्राप्त हुआ है जिसके एक तरफ बादशाह शब्द स्पष्ट पढ़ने में आता है। इस संग्रहालय को देखने के लिए प्रतिवर्ष 1 से 2 लाख पर्यटक एवं शोधार्थी आते हैं।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-56

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-56

    पर्यावरण की परिभाषा : सौंदर्य प्रसाधन एवं आभूषण


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    आजकल महिलाओं में ब्यूटी पार्लर जाने, घरों में लिपिस्टिक, नेल पॉलिश, शैम्पू, डिओडोरेण्ट, अण्डे की जर्दी, विभिन्न प्रकार की सिंथेटिक चीजों से बनी हुई क्रीम एवं कृत्रिम खुशबूदार पाउडर आदि का प्रयोग करने का प्रचलन है। इनकी निर्माण प्रक्रिया में तो पर्यावरण को क्षति पहुंचती ही है साथ ही साथ ये मानव स्वास्थ्य के लिये अत्यंत हानिकारक होती हैं। वैज्ञानिक गण समय-समय पर चेतावनी देते रहते हैं कि इस प्रसाधन सामग्री के प्रयोग से त्वचा खराब हो सकती है यहाँ तक कि कुछ सौंदर्य सामग्री में ऐसी वस्तुओं का प्रयोग होता है जिनके प्रयोग से कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियां हो सकती हैं। खुशबूदार महंगे साबुनों एवं लिपिस्टकों में पशु चर्बी का उपयोग होता है जिनके लिये पशुओं की हत्या की जाती है।

    राजस्थान में परम्परागत रूप से सौंदर्य प्रसाधन सामग्री के रूप में मेहंदी, आल्ता, मुल्तानी मिट्टी, बेसन, दूध की मलाई, खीरा, नीबू का रस, संतरे के सूखे हुए छिलकों का पाउडर, घी क्वार (एल्युविरा), घर में बना हुआ काजल आदि का प्रयोग किया जाता है। इससे त्वचा के खराब होने का कोई भय नहीं होता। ऋतु एवं मौसम के अनुसार सौंदर्य प्रसाधन सामग्री का प्रयोग किया जाता है।


    राजस्थान में प्रयुक्त होने वाले आभूषण

    राजस्थान में स्त्री एवं पुरुष दोनों ही आभूषण धारण करते हैं। ये आभूषण मनुष्य की जाति, वैवाहिक स्थिति, आर्थिक स्थिति एवं उसकी रुचि को प्रतिबिम्बित करते हैं। बहुत से आभूषण ऐसे हैं जो तीज-त्यौहार एवं अवसर के अनुसार धारण किये जाते हैं। राजस्थान की पारम्परिक सौंदर्य प्रसाधन सामग्री की भांति आभूषण निर्माण में भी ऐसा कोई तत्व नहीं है जो पर्यावरण को क्षति पहुंचाये। ये आभूषण स्थानीय सुनारों द्वारा सामान्यतः हस्तचालित औजारें से बनाये जाते हैं। इन आभूषणों की बनावट प्रायः इतनी साधारण होती है कि उसमें प्राकृतिक संसाधनों एवं महंगी धातुओं की किंचिंत् भी बर्बादी नहीं होती। राजस्थान में प्रयुक्त होने वाले कुछ प्रमुख आभूषण इस प्रकार से हैं-

    आंवला सेवटा : इसे कड़े के साथ धारण करते हैं। आंवला ठोस चांदी का बनता है। इस पर छिलाई का काम होता है।

    कंकण : कलाई पर धारण किया जाता है।

    कड़ा : भुजा में पहना जाने वाल यह आभूषण टड्डा भी कहलाता है। इसे स्प्रिंगदार तथा बिना स्प्रिंगदार भी बनाते हैं।

    करधनी : इसे कमर के चारों ओर पहनते हैं। इसमें छोटे घुंघरू लगे रहते हैं। इसे कन्दोरा तथा मेखला भी कहते हैं।

    कर्णफूल : कान के निचले हिस्से में पहना जाने वाला पुष्प आकृति का आभूषण जिसमें नगीने की जड़ाई भी होती है।

    कांटा : इसमें आगे की ओर नगीना तथा पीछे की ओर मुड़ा हुआ तार होता है। इसे नाक में पहनते हैं।

    गजरा : छोटे मोतियों से बने गजरे को कलाई पर पहनते हैं। यह चूड़ी की तरह ढीला न होकर कलाई से चिपका रहता है। यह छोटे बच्चों को अधिक पहनाया जाता है।

    गोरबंध : ऊँट के गले का आभूषण जो कांच, कौड़ियों मोतियों आदि को गूंथकर बनाया जाता है।

    चूड़ी : इसे कलाई पर पहनते हैं। सोने, चांदी, लाख, प्लास्टिक एवं कांच से बनती है।

    चौथ : पुरुषों का आभूषण। इसकी बनावट चौकोर जालियों की जंजीर की तरह होती है। इदसे सीने कमर अैर पेन्ट पर लपेट का पहनते हैं। चौथ की जंजीर चार लड़ों की होती है।

    झांझर : स्त्रियों द्वारा पैरों में पहना जाने वाला आभूषण। इसमें घुंघरू लगे होते हैं जो चलने पर रुनझुन की मधुर ध्वनि करते हैं जिसे रमझौळ कहते हैं।

    झुमका : कान का आभूषण।

    टनका : स्त्रियों के पांवों का आभूषण। यह प्रायः चांदी से बनता है।

    टिड्डी : स्त्रियों के ललाट का आभूषण। इसे भळकौ भी कहते हैं।

    टीका : स्वर्ण के गोल पतरे से बनने वाला यह आभूषण औरतें माथे पर धारण करती हैं। इसे चेन के माध्यम से मांग से अटका दिया जाता है।

    टीकी : इसे बिंदी भी कहते हैं। औरतें ललाट के मध्य में लगाती हैं।

    ठुसी : औरतों के गले का आभूषण। यह नेकलेस से भारी एवं बड़ा होता है। सामान्यतः सेठानियां इसे पहनती हैं।

    तांती : इसे किसी देवी-देवता के नाम पर कलाई पर बांधा जाता है। यह चांदी से बनता है तथा इसे खोलने व बंद करने के लिये इसमें हुक लगता है।

    ताबीज : गले में पहनने का बेलनाकार, आयताकार, अथवा वर्गाकार आकृति का होता है। प्रायः बुरी नजर से बचाने के लिये पहनते हैं। यह चांदी या ताम्बे का बनता है।

    तिमणिया : गले का आभूषण, यह तीन लड़ों का बनता है। धनी स्त्रियों में अधिक प्रचलित है।

    तुलसी : यह छोटे-छोटे मोतियों से बनी माला होती है जिसे तिमणिये एवं ठुसी के साथ पहना जाता है।

    नकेसर : नाक का आभूषण। नथ की भांति छोटी बाली जिसमें मोती पिरोया रहता है। इसे नाक की बाली भी कहते हैं।

    नथ : विवाह आदि विशेष अवसरांे पर नाक में पहना जाने वाला वलयाकार आभूषण। नाक पर नथ का भार कम करने के लिये इसे कान के पीछे की तरफ बालों से धागे या चेन से बांध देते हैं।

    नेवर : स्त्रियों को पांवों का आभूषण। इसे पायल भी कह सकते हैं। नोगरी : यह मोतियों की लड़ों के समूह से बनता है तथा चूड़ियों के बीच कलाई पर पहनते हैं।

    पगपान : यह हथफूल की तरह होता है। अंगूठे एवं अंगुलियों के छल्लों को चेन से जोड़कर पायल की तरह पैर के ऊपर हुक से जोड़ते हैं।

    पायल : पैरों में पहना जाने वाला आभूषण। इसमें घुंघरू लगे होते हैं जो चलने पर रुनझुन की मधुर ध्वनि करते हैं जिसे रमझौळ कहते हैं।

    पाटला : इसे कलाई में पहनते हैं। यह चूड़ी से चौड़ा होता है।

    पीपल पत्र : यह कान के ऊपरी भाग में छेद करके पहना जाता है। यह रिंग के आकार में होता है।

    फून्दा : यह चांदी, मोती अथवा रेशमी कपड़े से बनता है। इसे चूड़ी या कड़े पर बांधते हैं।

    बंगड़ी : यह एक प्रकार की चूड़ी ही है जिस पर सोने या चांदी का पतरा चढ़ा रहता है। इसे सेठाणियों द्वारा अधिक प्रयुक्त किया जाता है। बंगड़ियां पहनकर हाथों की मुद्रा गणगौर के हाथों जैसी हो जाती है। इसलिये बंगड़ियां सौंदर्य, सुहाग तथा ऐश्वर्य की प्रतीक मानी जाती हैं।

    बजट्टी : एक प्रकार का कर्णाभूषण। इसे झुमके के साथ लटकाते हैं।

    बाजूबंद : इसे पट्टे की तरह भुजा पर बांधा जाता है।

    बिछिया : पैर की छोटी अंगुली में पहना जाने वाला चांदी का आभूषण।

    बोर : इसके अगले भाग में छोटे-छोटे दाने उभरे हुए होते हैं तथा पीछे की ओर एक हुक होता है जिसमें धागा बांधकर स्त्रियां माथे पर गूंथती हैं।

    मंगलसूत्र : गले का आभूषण जिसे सुहाग का प्रतीक मानते हैं।

    माणिक्यमाला : यह माला लाल, गुलाबी जवाहरातों की बनी होती है। माणिक के टुकड़े सोने के पतले तारों से जोड़े जाते हैं।

    मादलिया : गले में पहना जाने वाला ताबीज जैसा आभूषण। ग्रामीणों एवं जनजातियों में इसे देवी देवता एवं इष्ट देवता को प्रसन्न करने के लिये पहना जाता है।

    मुक्तामाला : मोतियों की माला। इसे सुमर्णी भी कहते हैं।

    मुद्रिका : अंगूठी। मुरकी : पुरुषों द्वारा कान में पहना जाने वाला आभूषण।

    मैमद : सिर का आभूषण। मौड़ : विवाह के अवसर पर दूल्हे-दुल्हन के कान एवं सिर पर बांधने का मुकुट।

    रखड़ी : यह आभूषण सुहाग चिह्न माना जाता है। गोलाकार रखड़ी के आगे के हिस्से में जवाहरात जड़े होते हैं। पीछे की आरे हुक लगता है जिससे इसे ललाट पर स्थिर रखते हैं।

    लंगर : कड़ों के नीचे लंगर पहनते हैं। यह चांदी के मोटे तारों को जोड़कर बनता है।

    लौंग : इसके ऊपरी भाग में चार छोटी-छोटी पत्तियां होती हैं, मध्य में लाल नग होता है। पीछे का हिस्सा तार से जुड़ा होता है। इसे कील भी कहते हैं। चुन्नी एवं चांप भी नाक में पहने जाते हैं।

    वेणी : यह सेठाणियों में अधिक प्रचलित है। इसे चोटी पर चांदी की जंजीर की तरह लपेटते हैं।

    शीशफूल : यह सोने का बना होता है तथा सिर के पिछले बालों में पहना जाता है। इसे सिरफूल तथा सेरज भी कहते हैं।

    सिरपेच : साफे सा पगड़ी पर बांधा जाने वाला आभूषण। यह सोने या चांदी की जंजीर जैसा होता है। सेठों एवं राजपूतांे में अधिक प्रचलित है।

    सिरमांग : यह चेन के आकार का होता है। इसे औरतें अपनी मांग के ऊपर धारण करती हैं। इस पर नगीने भी जड़े होते हैं।

    सोवनपान : हथेली के ऊपरी भाग में पहना जाने वाला आभूषण। इसे हथफूल भी कहते हैं। यह पान के आकार का होता है। कलाई की चूड़ियों से जुड़ा हथफूल दूसरी ओर अंगुलियों से भी जुड़ा होता है।

    हंसली : यह धातु के मोटे तार को मोड़कर गोलाई में बनता है। इसे गले में पहनते हैं।

    हार : सोने के पतरों पर जवाहरात जड़कर हार बनाये जाते हैं। इन्हें डिजाइन के आधार पर चम्पाकलीहार, कण्ठीहार, चन्दनहार, उर्वशी हार, हैसहार तथा पोतहार कहते हैं।

    हीरानामी : इसे पैरों में कड़े की तरह पहना जाता है। यह आदिवासी एवं ग्रामीणों में अधिक प्रचलित है।

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  • अध्याय - 27 संस्कार

     02.06.2020
    अध्याय - 27 संस्कार

    संस्कार


    व्यक्ति में गुणों का आरोपण करने के लिए जो कर्म किया जाता है, उसे संस्कार कहते हैं। -ब्रह्मसूत्र भाष्य


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    भारतीय समाज में 'संस्कार' शब्द की अत्यधिक महत्ता है किंतु वेदों में इस शब्द का एक बार भी उल्लेख नहीं हुआ है। यह व्यवस्था संभवतः उपनिषद-काल में अस्तित्व में आई। 'संस्कार' शब्द की उत्पत्ति 'कृ' धातु में 'सम्' उपसर्ग लगाने से हुई है। इसका शाब्दिक अर्थ 'भली प्रकार किया गया' होता है। उपनिषदों में 'संस्कारोति' शब्द का प्रयोग हुआ है, वहाँ इस शब्द का आशय 'चमकाना' से है। जैमिनी के सूत्रों में इस शब्द का अनेक बार प्रयोग हुआ है। जैमिनी सूत्र की शबर टीका में कहा गया है कि संस्कार वह है जिसके हो जाने पर पदार्थ या व्यक्ति किसी कार्य के योग्य हो जाता है।

    कालांतर में शबर टीका का अर्थ ही 'संस्कार' शब्द का रूढ़ अर्थ हो गया। संस्कार कर दिए जाने से दो प्रकार की योग्यता उत्पन्न होती थी-

    (1.) संस्कार किए जाने से व्यक्ति वेदाध्ययन या गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के योग्य हो जाता था।

    (2.) संस्कार करने से पुरुष में वीर्य तथा स्त्री में गर्भ आदि दोषों का परिहरण हो जाता था।

    स्मृतिकाल में संस्कारों की अनिवार्यता इतनी बढ़ी कि उपनयन संस्कार होने से ही द्विजत्व सिद्ध होने लगा- 'संस्कारात् द्विज उच्चयते।' वेदों में यद्यपि संस्कार शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है किंतु ऋग्वेद में गर्भाधान, विवाह तथा अन्त्येष्टि के मन्त्र प्राप्त होते हैं। अथर्ववेद में इन सूक्तों का विस्तार प्राप्त होता है। ऋग्वेद एवं अथर्ववेद के इन मन्त्रों ने ही आगे चलकर 'संस्कार' रूपी व्यवस्था को जन्म दिया होगा।

    वेदों की व्याख्या ब्राह्मण ग्रंथों में की गई है। इन ग्रंथों में संस्कार शब्द का विवेचन नहीं किया गया है किंतु 'उपनयन' से जुड़ी हुई विभिन्न विधियों का वर्णन किया गया है। सूत्र साहित्य में न केवल संस्कार शब्द का अनेक बार उल्लेख हुआ है अपितु विभिन्न प्रकार के संस्कारों का विवेचन भी किया गया है। गृह्य सूत्रों में गर्भाधान से लेकर अंत्येष्टि तक किए जाने वाले विविध संस्कारों का विस्तृत वर्णन है।

    इन सूत्रों में संस्कारों का वर्णन प्रायः विवाह संस्कार से आरम्भ हुआ है। कुछ गृह्यसूत्रों में अन्त्येष्टि संस्कार का वर्णन संस्कारों के साथ न करके, परिशिष्ट में दिया गया है। समस्त गृह्यसूत्रों में संस्कारों का स्वरूप मूलतः एक जैसा है किंतु इन सूत्रों का सम्बन्ध अलग-अलग वेदों से होने के कारण उनके स्वरूप में कुछ भेद किया गया है। धर्मसूत्रों में संस्कारों की विधि का अत्यल्प वर्णन किया गया है किंतु संस्कारों की सामाजिक उपयोगिता को विस्तार से लिखा गया है।

    स्मृतिग्रंथों में संस्कारों का वर्णन आचार के रूप में किया गया है। स्मृतिकारों ने उपनयन एवं विवाह नामक संस्कारों का विस्तार से वर्णन किया है। क्योंकि इन्हीं दो संस्कारों के उपरांत व्यक्ति ब्रह्मचर्य आश्रम में एवं गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता था। विभिन्न पुराणों में भी संस्कारों का महत्व भलीभांति प्रतिपादित किया गया है। रामायण एवं महाभारत में विभिन्न संस्कारों के बारे में यथा-स्थान लिखा गया है किंतु महाभारत में इनका विवेचन अधिक विस्तार से किया गया है।

    संस्कारों का सम्बन्ध ऊपरी रूप से भले ही व्यक्ति के साथ संयुक्त दिखाई देता है किंतु वास्तव में इसका सम्बन्ध पूरे मानव समाज के हित से होता है। इन संस्कारों के माध्यम से मनुष्य को परिवार में, परिवार को समाज में तथा समाज को राष्ट्र रूपी व्यवस्था में बांधने का प्रयास किया गया था। इसलिए कहा गया कि 'जो माता-पिता अपनी संतानों का संस्कार नहीं करते वे जनक तो हैं किंतु पशु के समान हैं।' मनु के अनुसार संस्कार शरीर को शुद्ध करके उसे आत्मा के रहने का उपयुक्त स्थान बनाते हैं। विविध ग्रंथों में संस्कारों के साथ उनका प्रयोजन भी स्पष्ट किया गया है।

    मानव के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास ही इन संस्कारों का प्रमुख प्रयोजन है। मनु के अनुसार गर्भाधान तथा अन्य संस्कारों से शरीर शुद्ध होता है तथा इहलोक एवं परलोक में भी मनुष्य को पाप से मुक्ति मिलती है। विशिष्ट संस्कारों के करने से मनुष्य के जन्मगत दोष नष्ट हो जाते हैं। शंकर ने भी वेदान्तसूत्र के भाष्य में यह मत प्रकट किया है। जीवन के प्रगति मार्ग में ये संस्कार सुंदर सोपान हैं जो मनुष्य के विचारों तथा प्रवृत्तियों का शोधन करते हुए उसे निरंतर ऊंचा उठाते जाते हैं।

    बाल्यावस्था के संस्कारों का विशेष महत्व है। सूत्रग्रंथों के अनुसार विभिन्न संस्कार-क्रियाओं से शुद्ध हुआ व्यक्ति ही ब्रह्म-प्राप्ति के योग्य हो पाता है। मेधातिथि के अनुसार शुद्ध शरीर में ही शुद्ध आत्मा निवास करती है। वीरमित्रोदय संस्कार प्रकाश ने हारीत के वचनों को उद्धृत करते हुए लिखा है कि ब्राह्म संस्कार सम्पन्न व्यक्ति ऋषि-पद को प्राप्त कर लेता है तथा दैव- संस्कार सम्पन्न व्यक्ति देवत्व प्राप्त कर लेता है।

    स्त्रियों के लिए भी संस्कारों का प्रतिपादन किया गया किंतु सूत्रकाल में यह भी व्यवस्था दी गई कि स्त्री के संस्कारों के समय वेदमंत्रों का उच्चारण नहीं करना चाहिए। केवल विवाह के समय पुरुष के साथ स्त्री का भी वैदिक मंत्रों से संस्कार किया जाता है।

    संस्कारों की संख्या

    गौतम धर्मसूत्र में चालीस संस्कारों का उल्लेख है जिनमें पाकयज्ञ, हविर्यज्ञ, सोमयज्ञ तथा देवव्रत आदि अनुष्ठान भी सम्मिलित हैं। मनुस्मृति तथा याज्ञवलक्य स्मृति में संस्कारों की संख्या का उल्लेख नहीं किया गया है किंतु गर्भाधान से लेकर अन्त्येष्टि तक के संस्कारों का पूर्ण विधान लिखा गया है। परवर्ती काल में संस्कारों की संख्या घटकर 16 रह गई थी।

    आधुनिक काल में ऋषि दयानंद ने भी 16 संस्कारों का समर्थन किया है किंतु वर्णन 17 संस्कारों का किया है- गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, कर्णवेध, उपनयन, वेदारम्भ, समवर्तन, विवाह, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थ, सन्यास तथा अन्त्येष्टि। डॉ. राजबली पाण्डेय ने समस्त संस्कारों को पांच भागों में बांटा है- (1.) जन्म से पूर्व के संस्कार, (2.) शिशु के संस्कार, (3.) शिक्षा सम्बन्धी संस्कार, (4.) विवाह संस्कार तथा (5.) अन्त्येष्टि। इनके कर्त्ता भी अलग-अलग हैं।

    जन्म-पूर्व एवं शिशु अवस्था के संस्कार माता-पिता करते हैं, शिक्षा सम्बन्धी संस्कार आचार्य करते हैं, विवाह संस्कार परिवार एवं समाज करता है, वानप्रस्थ-ग्रहण तथा सन्यास-ग्रहण संस्कार मनुष्य स्वयं करता है जबकि अन्त्येष्टि संस्कार पुत्र-पौत्र आदि करते हैं।

    सोलह संस्कार

    सोलह संस्कारों का पालन करना प्रत्येक भारतीय परिवार का कर्त्तव्य माना गया है। मनुष्य का जीवन माँ के गर्भ में आने से आरम्भ होता है और यदि मोक्ष नहीं हो तो मृत्यु के उपरांत भी प्रेत रूप में विद्यमान रहता है। अतः मनुष्य शरीर को स्वस्थ तथा दीर्घायु बनाने और मन को शुद्ध एवं ज्ञानवान बनाने के लिए गर्भाधान से लेकर अन्त्येष्टि तक तक सोलह संस्कारों की व्यवस्था की गयी है। संस्कारों का विधान स्त्री और पुरुष दोनों के लिए किया गया है। स्त्रियों के संस्कार (विवाह को छोड़कर) मन्त्रहीन होते हैं। संस्कार प्रमुखतः द्विज जातियों के लिए थे किंतु शूद्रों के लिए भी कुछ संस्कार निर्धारित किए गए। इनकी क्रियाएँ भी मंत्रहीन होती थीं। हिन्दू समाज में निम्नलिखित सोलह संस्कार अनिवार्य माने गए हैं-

    (1.) गर्भाधान संस्कार: यह प्रथम संस्कार है। गौतम और बोधायन आदि व्यवस्थाकारों ने संतानोत्पत्ति के इच्छुक दम्पति के लिए गर्भाधान के पूर्व उचित काल में आवश्यक धार्मिक कर्मों को सम्पन्न करने का निर्देश किया है। इसे निषेक (गर्भाधान) तथा चतुर्थीकर्म भी कहा गया है किंतु वैशानख ने निषेक तथा गर्भाधान को भिन्न-भिन्न माना है। इस संस्कार में माता के गर्भ में बीजरूप से शिशु स्थापित किया जाता है। विवाह के पश्चात् स्त्री के प्रथम ऋतुदर्शन के बाद चौथे दिन गर्भाधान संस्कार का समय कहा गया है। मनु के अनुसार संतान के इच्छुक दम्पत्ति को ऋतुदर्शन के चार दिन, अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या एवं पूर्णमासी को छोड़कर यह संस्कार सम्पन्न कराना चाहिए।

    (2.) पुसंवन संस्कार: पुुसंवन संस्कार का उल्लेख समस्त गृह्यसूत्रों में है। गर्भ में स्थित शिशु को पुत्र का रूप देने के लिए यह संस्कार किया जाता है अर्थात् इस संस्कार का उद्देश्य पुत्र-प्राप्ति है। कुछ व्यवस्थाकारों के अनुसार यह संस्कार, गर्भाधान के दूसरे या तीसरे मास में करना चाहिए, जबकि कुछ व्यवस्थाकारों के अनुसार यह संस्कार, गर्भाधान के क्रमशः तीसरे, पाँचवे और छठवें मास में किया जाना चाहिए। इस संस्कार में देवी की स्तुति की जाती थी एवं उनसे पुत्र-प्राप्ति की याचना की जाती थी। स्त्री की गोद में जल से भरा हुआ पात्र रखा जाता था तथा स्त्री उसे अपने उदर से स्पर्श कराती थी। पुत्रोत्पत्ति तथा गर्भ-रक्षा के लिए आयुर्वेदिक औषधियों का भी प्रयोग किया जाता था।

    (3.) सीमन्तोन्नयन संस्कार: इस संस्कार का उद्देश्य गर्भवती स्त्री को अमंगलकारी शक्तियों से बचाना था। यह संस्कार गर्भाधान के तीसरे और आठवें मास के बीच किया जाता था। इस संस्कार-कर्म में पति पीछे से पत्नी के गले में उदुम्बर की टहनी बाँधता था और पहले दर्भ के अंकुर से और बाद में वीरतर की लकड़ी के टुकड़े से पत्नी के केश सँवारकर मांग (सीमान्त) निकालता था। इसका उद्देश्य यह था कि पत्नी उर्वरा हो और उसके गर्भ से उत्पन्न होने वाला बालक वीर हो। सीमन्तोन्नयन के अवसर पर परिवार में उत्सव मनाया जाता था तथा नृत्य एवं गायन आदि का आयोजन होता था।

    (4.) जातकर्म संस्कार: बृहदारण्यक उपनिषद् एवं गृह्यसूत्रों में इस संस्कार का विस्तृत वर्णन है। यह संस्कार पुत्र उत्पन्न होने के तुरन्त बाद एवं नाभिच्छेदन से पूर्व अथवा पुत्र-जन्म के दस दिन के भीतर किया जाता था। पुत्र जन्म पर देवताओं के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन के लिए बारह अलग-अलग पात्रों में पकी हुई रोटी (पुरोडाश) अर्पित की जाती थी। जमे हुए दूध (दही) और घी की हवि से हवन किया जाता था। इस अवसर पर पिता नान्दीपाठ एवं श्राद्ध आदि का विधान करते हुए अपने बालक पर तीन बार साँस छोड़ता था और सोने के बर्तन या चम्मच से मक्खन, शहद और दही उसकी जीभ पर लगाता था। इसके बाद बालक का नाभिच्छेदन किया जाता था और उसे नहला कर स्वच्छ किया जाता था। तदनन्तर पिता सरस्वती की प्रार्थना करते हुए, शिशु को उसकी माता के स्तनों के पास रखता था।

    (5.) नामकरण संस्कार: जन्म के दसवें अथवा बारहवें दिन नामकरण संस्कार किया जाता है। इस अवसर पर गृह-शुद्धि के लिए हवन एवं भोज आदि का आयोजन होता है। मनु ने व्यवस्था दी कि ब्राह्मण का नाम मांगल्य पूर्ण, क्षत्रिय का बलयुक्त, वैष्य का नाम धन वाचक तथा शूद्र का नाम जुगुप्सित होना चाहिए। कन्या का नाम सरलता पूर्वक उच्चारण करने योग्य, मंगलसूचक, दीर्घ स्वर से अंत होने वाला तथा आशीर्वादात्मक होना चाहिए।

    (6.) निष्क्रमण संस्कार: जन्म के चौथे मास में बालक को पहली बार घर से बाहर निकालने की क्रिया को निष्क्रमण संस्कार कहते हैं। इसमें बालक को घर से बाहर लाकर दिन में सूर्य और रात्रि में चन्द्र के दर्शन कराए जाते हैं। सूर्य तथा चन्द्र के दर्शन से बालक के विकास पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।

    (7.) अन्नप्राशन संस्कार: यह संस्कार बालक के जन्म के छठे मास में किया जाता है। इस संस्कार में बालक को पहली बार दही, भात, मधु, घी आदि चखाया जाता है।

    (8.) चूड़ाकर्म संस्कार: यह संस्कार शिशु के जन्म के पहले या तीसरे वर्ष में सम्पादित किया जाता है। इसे चौल अथवा केशोच्छेदन संस्कार भी कहते हैं। इस संस्कार में शिशु के सिर के बाल पहली बार मुण्डवाये जाते हैं और सिर पर केवल चूड़ा (चोटी) छोड़ी जाती है। शिखा (चोटी) रखने का प्रारम्भ इसी संस्कार से होता है।

    (9.) कर्ण-छेदन संस्कार: यह संस्कार शिशु-जन्म के तीसरे या पाँचवें वर्ष में किया जाता है। इस संस्कार में शिशु का कर्ण-छेदन किया जाता है। शिशु को स्नान कराकर वस्त्र पहनाये जाते है और फिर वैद्य या कुशल व्यक्ति द्वारा पहले दाहिने कान का और फिर बाएं कान का छेदन होता है। शिशु को रोगों से बचाने तथा कानों में आभूषण पहनाने के लिए यह संस्कार किया जाता है।

    (10.) विद्यारम्भ संस्कार: इस संस्कार द्वारा शिशु को अक्षर-ज्ञान कराया जाता है। बालक स्नानादि से निवृत होकर देवताओं की स्तुति के साथ गुरु के सामने बैठकर अक्षरों को पढ़ता है।

    (11.) उपनयन संस्कार: 'उप' का अर्थ है 'समीप' तथा 'नयन' का अर्थ है 'ले जाना'। अर्थात् उपनयन वह संस्कार है जिसके द्वारा बालक को शिक्षा के लिए गुरु के समीप ले जाया जाता है। आचार्य द्वारा शिष्य को ब्रह्म-विद्या देने के लिए स्वीकार किया जाता था। ब्रह्मचर्याश्रम इसी संस्कार से आरम्भ होता था। इसे 'यज्ञोपवीत' संस्कार भी कहते थे क्योंकि इसी संस्कार से ब्रह्मचारी यज्ञोपवीत धारण करता था। शूद्रों को छोड़कर शेष तीनों वर्णों को उपनयन का अधिकार था। बालक को जाति के आनुसार आठवें, ग्यारहवें या बारहवें वर्ष में गुरु के पास भेजा जाता था। बालक धोती और उत्तरीय पहनकर, सिर का मुण्डन करवा कर, मेखला और दण्ड धारण करके आश्रम-जीवन का व्रत लेता था।

    सूत्र साहित्य के अनुसार स्त्रियों को भी उपनयन एवं वेदाध्ययन का अधिकार था किन्तु बाद में जब कन्याओं के विवाह कम उम्र में होने लगे, तब उनकी शिक्षा बन्द हो गई और उपनयन केवल विवाह के समय धार्मिक विधान के रूप में होने लगे। मनु के अनुसार कन्याओं का उपनयन बिना पढे़ ही किया जाना चाहिए। तीनों वर्णों के लिए उपनयन की आयु अलग-अलग है। मनु ब्राह्मण का पाँचवे वर्ष में, क्षत्रिय का छठे वर्ष में तथा वैश्य का आठवें वर्ष में उपनयन करने का निर्देश देते हैं।

    कुछ व्यवस्थाकारों के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य पुत्रों का क्रमशः सोलह, बाईस व चौबीस वर्ष की आयु तक यज्ञोपवीत संस्कार अवश्य हो जाना चाहिए, अन्यथा वे घोर पाप के भागी होते हैं। उपनयन संस्कार में विद्यार्थी जब गुरु के समीप जाकर बैठता था तब गुरु हवन करता था और फिर विद्यार्थी के वस्त्र एवं हाथों को अपने हाथ में लेकर उसे गायत्री मन्त्र की दीक्षा देता था। इसके बाद आचार्य उसे ब्रह्मचर्याश्रम की अन्य बातें बतलाता था। वह कहता था- 'तुम ब्रह्मचारी हो, जल का पान करो, काम करो, दिन में शयन मत करो, आचार्य के नियंत्रण में वेदों का अध्ययन करो।'

    इस संस्कार के सम्पन्न होने पर विद्यार्थी ब्रह्मचर्य व्रत धारण करके गुरु से वेद तथा अन्य शास्त्रों का अध्ययन आरम्भ करता था। इस संस्कार के किए बिना किसी भी विद्यार्थी को वेद पढ़ने अथवा गायत्री मन्त्र के उच्चारण का अधिकार प्राप्त नहीं हो सकता था। उपनयन संस्कार के बाद आचार्य अपने शिष्य का आध्यात्मिक पिता और गायत्री उसकी माता बन जाती थी।

    इस संस्कार को दूसरा जन्म भी कहा जाता था, क्योंकि इस संस्कार के बाद उसका सम्पर्क विद्वानों तथा गुणीजन से होता था और वह 'द्विज' कहलाता था।

    (12.) वेदारम्भ संस्कार: वैदिक युग के प्रारम्भिक काल में उपनयन संस्कार के साथ ही वेदों का अध्ययन आरम्भ होता था। अतः वेदारम्भ संस्कार की आवश्यकता नहीं थी किन्तु जब संस्कृत बोलचाल की भाषा न रही, तब उपनयन संस्कार के बाद लगभग एक वर्ष तक संस्कृत का अध्ययन कराया जाता था और उसके बाद वेदाध्ययन आरम्भ होता था। वेदों के पठन-पाठन का अधिकार मिलने के पूर्व विद्यार्थी को वेदारम्भ संस्कार सम्पन्न करना पड़ता था।

    (13.) केशान्त अथवा गोदान संस्कार: इस संस्कार के अन्तर्गत ब्रह्मचारी को अपने बाल कटवाने पड़ते थे। इस अवसर पर ब्रह्मचारी का परिवार आचार्य को गौ-दान देता था। इसलिए इस संस्कार को गोदान संस्कार भी कहते थे। सामान्यतः यह संस्कार सोलह वर्ष की आयु में सम्पन्न किया जाता था।

    (14.) समावर्तन संस्कार: ब्रह्मचर्याश्रम का प्रारम्भ उपनयन संस्कार से और अंत समावर्तन संस्कार से होता था। सूत्रकारों के अनुसार अध्ययन समाप्ति के पश्चात् ब्रह्मचारी को अपने आचार्य को गुरु-दक्षिणा देकर उसका आशीर्वाद ग्रहण करना चाहिए तथा स्नान करना चाहिए। इस स्नान के कारण ही ब्रह्मचारी को 'स्नातक' कहा जाता था। इसके बाद विद्यार्थी अपने घर लौट आता था।

    (15.) विवाह संस्कार: विवाह संस्कार के बाद ब्रह्मचारी, गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता है। इस संस्कार में कन्या का पिता वस्त्र एवं आभूषणों से अलंकृत अपनी कन्या का, उसके योग्य गुणवान वर को, यज्ञ-की अग्नि के समक्ष दान करता है। इस संस्कार में 'पाणिग्रहण' (वर द्वारा वधू का हाथ थामना), 'लाजाहोम' (अग्नि में धान की खीलों की आहुति देना), 'सप्तपदी' (वर-वधू का अग्नि के चारों ओर सात परिक्रमा करना), 'ध्रुव दर्शन' (ध्रुव तारे को देखना) आदि विधान सम्पन्न किए जाते हैं। वर और वधू आजीवन एक दूसरे के साथ रहने की प्रतिज्ञा करते हैं। भारतीय परिवार में विवाह एक धार्मिक बन्धन माना जाता है। अविवाहित पुरुष को 'यज्ञ' करने का अधिकार नहीं होता।

    (16) अंत्येष्टि संस्कार: यह मनुष्य जीवन का अन्तिम संस्कार है। इसमें मृतक के शरीर को स्नान आदि कराकर अर्थी पर लिटाकर श्मशान ने जाया जाता है और वहाँ चिता पर रखकर मन्त्रोच्चारण के साथ अग्नि को अर्पित कर दिया जाता है। तीसरे या दसवें दिन मृतक की अस्थियाँ चुनी जाती हैं जिन्हें फूल कहा जाता है। इन अस्थियों को कलश में भरकर ऋग्वेद के मन्त्रों का उच्चारण किया जाता है तथा किसी पवित्र नदी, सरोवर या जलाशय में मृतक की अस्थियां एवं भस्मी विसर्जित की जाती हैं। सपिण्डीकरण श्राद्ध द्वारा मृतक को पितरों में शामिल किया जाता है। मृत व्यक्ति के लिए समाधि या चबूतरा बनाया जाता था।

    वर्तमान समय में बहुत से संस्कार विलुप्त हो गए हैं। केवल नामकरण संस्कार, विवाह संस्कार एवं अंतिम संस्कार ही प्रचलन में रह गए हैं।

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  • अंग्रेजों ने भारत मुगलों से नहीं, हिंदुओं से प्राप्त किया

     02.06.2020
    अंग्रेजों ने भारत मुगलों से नहीं, हिंदुओं से प्राप्त किया

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    लॉर्ड वेलेजली के समय में अलवर, भरतपुर तथा धौलपुर राज्यों के साथ की गयी संधियां अब तक चली आ रही थीं। लॉर्ड हेस्टिंग्स (ई.1813 से 1823) द्वारा पद संभालने के समय अलवर, भरतपुर और धौलपुर को छोड़कर प्रायः समस्त राजपूताना अंग्रेजी नियन्त्रिण से बाहर था।

    लॉर्ड हेस्टिंग्स के समय में ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा राजपूताना के 14 राज्यों के साथ सहायक संधियां की गयीं तथा उनको अंग्रेजों के अधीन कर लिया गया। इनमें से करौली, टोंक तथा कोटा राज्यों के साथ वर्ष 1817 में, जोधपुर, उदयपुर, बूंदी, बीकानेर, किशनगढ़, बांसवाड़ा, जयपुर, प्रतापगढ़, डूंगरपुर तथा जैसलमेर के साथ वर्ष 1818 में तथा सिरोही राज्य के साथ वर्ष 1823 में संधि की गयी। इस प्रकार लॉर्ड हेस्टिंग्स ने राजपूताना में ब्रिटिश प्रभुसत्ता स्थापित की। बाद में जब झालावाड़ राज्य अस्तित्व में आया तब 1838 में झालावाड़ राज्य के साथ संधि की गयी।

    अंग्रेजों से संधि करने वाले राज्यों के शासकों को अपने आंतरिक मामलों में पूरी तरह स्वतंत्र आचरण करने का अधिकार था किंतु उन्हें अपने खर्चे पर ब्रिटिश फौजों को अपने राज्य में रखना पड़ता था। इन संधियों के तहत एक राज्य को दूसरे राज्य से संधि करने के लिये पूरी तरह ब्रिटिश राज्य पर निर्भर रहना पड़ता था। इस सब के बदले में अंग्रेजों ने राज्य की बाह्य शत्रुओं से सुरक्षा करने तथा आंतरिक विद्रोह के समय राज्य में शांति स्थापित करने का जिम्मा लिया।

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा राजपूताने के प्रत्येक राज्य के साथ अलग-अलग संधि की गयी। अंग्रेजों द्वारा भारतीय रियासतों के राजाओं के साथ किये गये मित्रता के समझौतों को अलग-अलग करके और राज्यानुसार नहीं लिया जा सकता क्योंकि बहुत से मामलो में परिस्थितियाँ समान थीं। राजाओं को अपनी आंतरिक समस्याओं को सुलझाने के लिये एक अधिक शक्तिशाली सत्ता की सहायता और संरक्षण आवश्यक था।

    ली वारनर ने लिखा है- सन् 1818 से भारतीय रियासतों के प्रति अंग्रेजों का दृष्टिकोण अधीन समझौते का बन गया।

    राजपूताना के कई राज्यों पर कई दशकों से सिंधिया और होलकर का आधिपत्य चला आ रहा था। मराठों के पतन के बाद राजपूत राज्यों में इतनी ताकत नहीं रह गयी थी कि वे अपनी स्वतंत्रता को फिर से स्थापित करें। उन्होंने तुरंत ही ब्रिटिश आधिपत्य मान लिया।

    इस प्रकार भारत की राजनैतिक दुर्बलता का लाभ उठा कर ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारत में शासन का अधिकार प्राप्त किया। देश में केवल 40 रियासतें ऐसी थीं जिनकी ब्रिटिश सरकार के साथ वास्तविक संधियां हुईं थीं। शेष पाँच सौ से अधिक रियासतें अंग्रेजी शासन काल में ब्रिटिश परमोच्च सत्ता की सनदों और जागीरों के फलस्वरूप उत्पन्न हुई थीं।

    राजपूत शासकों ने इससे पूर्व इतने प्रभावकारी और निश्चित रूप से अपनी स्वाधीनता किसी अन्य शक्ति (मुगलों अथवा मराठा सत्ता) को इस सीमा तक समर्पित नहीं की थी जैसी कि उन्होंने 1818 ई.में अंग्रेजों के समक्ष की। अंग्रेजों ने देशी रियासतों के साथ संधियां सोच समझ कर सम्पन्न की थीं। उन के उद्देश्य भी निश्चित थे। वे 'झण्डे के पीछे व्यापार है' के सिद्धांत में विश्वास रखते थे।

    इस प्रकार ब्रिटिश भारत का राजनैतिक ढांचा बनाने का जो काम ई.1799 में टीपू सुल्तान की मृत्यु के साथ आरंभ हुआ था वह ई.1819 (पेशवा को हटाये जाने) के बीच की 20 वर्षों की अवधि में तैयार हुआ। इस अवधि के आरंभ में मैसूर के मुस्लिम राज्य का विनाश हो गया और इस अवधि के अंत में मराठों का संघ राज्य अनेक सरदारों में बिखर गया। इन दोनों विजयों ने अंग्रेजों को भारत का स्वामी बना दिया।

    डब्लू. डब्लू हंटर ने स्वीकार किया है कि अंग्रेजों ने भारत मुगलों से नहीं बल्कि हिंदुओं, मराठों और सिक्खों से प्राप्त किया। वह लिखता है- मुस्लिम राजकुमार हम से बंगाल, कर्नाटक तथा मैसूर में लड़े परंतु सर्वाधिक विरोध हिंदुओं की ओर से हुआ।

    कुछ इतिहासकारों के अनुसार राजपूताना के राज्यों ने मराठों और पिण्डारियों से सुरक्षा पाने के लिये अंग्रेजों से संधि नहीं की थी अपितु कम्पनी सरकार ने पिण्डारियों को नष्ट करने तथा मराठा शक्ति के विस्तार को रोकने के लिए राजपूत राज्यों से संधि की। सच्चाई यह है कि न केवल देशी रियासतें अपितु अंग्रेज भी मराठों तथा पिण्डारियों से त्रस्त थे तथा उनसे मुक्ति चाहते थे। मराठे तथा पिण्डारी देशी राज्यों तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी दोनों के साथ शत्रुवत् व्यवहार कर रहे थे। इस प्रकार ''शत्रु का शत्रु मित्र" के सिद्धांत को आधार बनाकर दोनों पक्षें में मित्रता हो गयी। अंग्रेजों और देशी राज्यों की यह मित्रता आगे चलकर भारत के लिये बहुत ही खतरनाक सिद्ध हुई।

    राजपूताना के देशी राज्यों के साथ हुई संधि के पश्चात् ई.1819 में पेशवा को हटा दिया गया। इसी तरह पिण्डारी अमीरखां को भी टोंक में स्थापित करके उसकी गतिविधियों को समाप्त कर दिया गया किंतु पिण्डारियों के अन्य गिरोह विशेषकर करीमखां, वसील मुहम्मद और चीतू का सफाया किया जाना अभी शेष था। इन गिरोहों के राजपूताना में शरण लेने की पूरी आशंका थी।

    राजपूताने के राज्यों ने भले ही अपने कुछ अन्य कारणों से भी संधि की हो किंतु अंग्रेजों के लिये इन संधियों को करने का उद्देश्य राजपूताना को मराठों और पिण्डारियों के लिये शरणस्थली बनने देने से रोकना ही था। यही कारण था कि संधि के समय अंग्रेजों ने देशी राज्यों के आंतरिक प्रशासन में हस्तक्षेप से स्वयं को दूर ही रखा था। देशी राज्यों को केवल बाह्य आक्रमणों से सुरक्षा का ही वचन दिया गया था।

    इन संधियों के आरंभ होने से देशी राज्यों के सामंतों को पूरी तरह दबा दिया गया तथा राजाओं की स्थिति अपने सामंतों के ऊपर दृढ़ हो गयी। इससे राजाओं को सामंतों के आतंक से छुटकारा मिला किंतु अब वे अंग्रेजी सत्ता के अधीन हो गये। अंग्रेज अधिकारी निरंकुश बर्ताव करने लगे तथा शासन के आंतरिक मामलों में भी उनका हस्तक्षेप हो गया। इन संधियों के तहत जहाँ देशी राज्यों को बिना कोई अधिकार दिये केवल दायित्व सौंप दिये गये वहीं अंग्रेजों को बिना कोई दायित्व निभाये असीमित अधिकार प्राप्त हो गये। राजाओं को सुरक्षा तो मिली किंतु उनकी स्वतंत्रता नष्ट हो गयी। यहाँ तक कि अंग्रेज अधिकारी देशी राज्य के उत्तराधिकारी के मनोनयन में भी हस्तक्षेप करने लगे।

    इन संधियों के हो जाने से राजपूताना में मराठों, अंग्रेजों, फ्रांसिसियों तथा पिण्डारियों के आक्रमण बंद हो गये। राज्यों के सैनिक अभियानों तथा आक्रामक प्रवृत्ति का प्रायः अंत हो गया। राज्यों को भीतर तथा बाहर दोनों ही मोर्चों पर पूर्ण सुरक्षा प्राप्त हो गयी।

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