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  • अध्याय - 22 सिक्ख धर्म एवं उसका इतिहास

     02.06.2020
    अध्याय - 22 सिक्ख धर्म एवं उसका इतिहास

    सिक्ख धर्म एवं उसका इतिहास


    दया को तू अपनी मस्जिद मान, भलाई एवं निष्कपटता को अपनी नमाज की दरी मान, जो कुछ भी उचित और न्यायसंगत है, वही तेरी कुरान है। नम्रता को अपनी सुन्नत मान ले, शिष्टाचार को अपना रोजा मान ले, इस प्रकार तू मुसलमान बन जाएगा। -गुरु नानक।


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    गुरु नानक


    सिक्खों के प्रथम गुरु 'नानक देव' सिक्ख धर्म के प्रवर्त्तक थे। उनका जन्म ई.1469 में अविभक्त पंजाब के तलवण्डी गांव में हुआ था। नानक देव ने 'गुरमत' को खोजा और गुरमत की शिक्षाओं को स्वयं देश-देशांतर जाकर फैलाया। गुरु नानक एकेश्वरवादी और निराकारवादी थे तथा जाति-पाँति, अवतारवाद और मूर्ति-पूजा को नहीं मानते थे। उनकी शिक्षाएँ 'आदि ग्रन्थ' में पाई जाती हैं।

    गुरु नानक बगदाद भी गए जहाँ उनका बड़ा स्वागत-सत्कार हुआ। बगदाद में उनका एक मन्दिर भी है जिसमें तुर्की भाषा में एक शिलालेख मौजूद है। गुरु नानक के सैयद-वंशी शिष्यों के उत्तराधिकारी अब भी उस मन्दिर की रक्षा करते हैं। गुरु नानक की वेशभूषा और रहन-सहन सूफियों जैसा था। गुरु नानक और शेख फरीद के बीच गाढ़ी मैत्री थी। कुछ विद्वानों का अनुमान है कि गुरु नानक पर इस्लाम का प्रभाव अधिक था।

    हिन्दू और मुसलमान दोनों ने गुरु नानक का शिष्यत्व स्वीकार किया। गुरु नानक जाति-पांति को नहीं मानते थे इसलिए उनके अनुयाइयों में समस्त जातियों के लोग सम्मिलित थे। उनके शिष्यों में समाज के निर्धन एवं उपेक्षित लोगों की बहुलता थी। उनके अनुयाइयों को 'सिक्ख' कहा जाता था। यह 'शिष्य' शब्द का पंजाबी भाषा में रूपान्तर था।

    सिक्ख धर्म की स्थापना

    गुरु नानक का पन्थ 'सिक्ख धर्म' के नाम से विख्यात हुआ। नानक स्वयं किसी नवीन धर्म की स्थापना करना नहीं चाहते थे। उनके जीवन काल में सिक्ख धर्म का कोई अस्तित्त्व नहीं था। ई.1538 में गुरु नानक के निधन के बाद उनके अनुयाइयों तथा शिष्यों ने 'सिक्ख धर्म' की स्थापना की।

    गुरु नानक का दर्शन

    गुरु नानक का मत भारतीय वेदान्त दर्शन पर आधारित है तथा उसमें 'तसव्वुफ' के भी लक्षण हैं। गुरु नानक की उपासना के चारों अंग- सरन खंड, ज्ञान खंड, करम खंड तथा सच खंड; सूफियों के चार मुकामात- शरीअत, मारफत, उकबा और लाहूत से ही निकले हैं। गुरु नानक का सिद्धान्त वेदान्त के उस रूप पर आश्रित था जिसे तंत्र ने प्रस्तुत किया था और मध्य-काल के प्रायः समस्त सन्त सम्प्रदायों ने स्वीकार किया था। वे 'एक-ओंकार' या 'अकाल पुरुष' को चरम सत्य मानते थे।

    अकाल पुरुष ने 'पुरुष' और 'प्रकृति' की सृष्टि की और अपना हुकुम चलाया। प्रकृति, माया, मोह, गुण, देवता, राक्षस और सारा जगत् उसी से बना है। इसलिए सारी प्रकृति और सारा जगत सत्य है। इसके सब काम अंहकार से चलते हैं किंतु व्यक्तिगत अंहकार को ही सब कुछ मान बैठना पाप की जड़ है। अतः मनुष्य को अपने कर्म द्वारा अपने मन से इस व्यक्तिगत अंहकार को निकालकर समष्टिगत अंहकार अर्थात् सृष्टि की सम्पूर्णता को आत्मसात करना चाहिए जो अकाल पुरुष की अभिव्यक्ति है।

    गुरु नानक कहते हैं- 'मन कागज है और हमारे कर्म स्याही हैं, पुण्य और पाप इस पर लिखा हुआ है। हमें अपने कर्म की स्याही द्वारा मन के कागज पर लिखे हुए पुण्य के लेख को बढ़ाना है और पाप के लेख को मिटाना है। इसके लिए गुरु की सहायता आवश्यक है।' गुरु नानक का मुख्य उपदेश था कि ईश्वर सत्य है तथा एक है, उसी ने सबको बनाया है। हिन्दू-मुसलमान सभी एक ही ईश्वर की संतान हैं और ईश्वर के लिए एक-समान हैं। मनुष्य को अच्छे कार्य करने चाहिए ताकि परमात्मा के दरबार में उसे लज्जित न होना पड़े।

    गुरुनानक के बाद नौ अन्य गुरुओं ने भी गुरमत का प्रचार किया। पंजाब में रहने वाले विभिन्न जातियों के लोगों ने सिक्ख गुरुओं से दीक्षा ग्रहण की। नानक का कहना था कि संसार में रह कर तथा सुन्दर गृहस्थ का जीवन व्यतीत कर मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर सकता है। सिक्ख धर्म के अनुसार मनुष्य को सरल तथा त्यागमय जीवन व्यतीत करना चाहिए। मोहसिन फानी ने लिखा है- 'सिक्खांे में ऐसा कोई नियम नहीं है कि ब्राह्मण खत्री का शिष्य न हो, नानक खुद खत्री थे। यही नहीं उन्होंने खत्रियों को भी जट्टों से निचली श्रेणी दी है, जो वैश्यों में सबसे छोटे माने जाते हैं।'

    गुरु के सिक्ख खेती, नौकरी, व्यापार या दस्तकारी करते हैं और अपनी शक्ति के अनुसार 'मसण्ड' अर्थात् गुरु के प्रतिनिधि को 'नजर' अर्थात् भेंट देते हैं। वे 'नाम जपन अते वण्ड के छकन' (नाम जपने और बाँटकर खाने) को अपना विशेष नियम समझते हैं। हिन्दुओं के सम्बन्ध में गुरु नानक का मत था- 'हिन्दुओं में से केाई भी वेद-शास्त्रादि को नहीं मानता, अपितु अपनी बड़ाई करने में लगा रहता है। उनके कान एवं हृदय सदा तुर्कों की धार्मिक शिक्षाओं से भरते जा रहे हैं। ये लोग मुसलमान कर्मचारियों के निकट एक-दूसरे की निन्दा करके सबको कष्ट पहुँचा रहे हैं। वे समझते हैं कि रसोई के लिए चौका लगा देने मात्र से हम पवित्र हो जाएंगे।'

    मुस्लिम शासन के लिए कर उगाहने वाले हिन्दू कर्मचारियों को लक्ष्य करके गुरु नानक ने कहा है- 'गौ तथा ब्राह्मणों पर कर लगाते हो और धोती, टीका और माला जैसी वस्तुएँ धारण किए रहते हो। तुम अपने घर पर तो पूजा-पाठ करते हो और बाहर कुरान के हवाले दे-देकर तुर्कों के साथ सम्बन्ध बनाए रहते हो। ये पाखण्ड छोड़ क्यों नहीं देते?' उपरोक्त पंक्तियों में हिन्दूओं की आलोचना तो है ही किन्तु हिन्दू-धर्म में सुधार की इच्छा भी है। सिक्ख धर्म का सारा इतिहास हिन्दुत्व के लिए इस तड़प से परिपूर्ण रहा है।

    गुरु नानक ने मुसलमानों को लक्ष्य करके कहा- 'दया को तुम अपनी मस्जिद मानो, भलाई एवं निष्कपटता को अपनी नमाज की दरी मानो, जो कुछ भी उचित और न्यायसंगत है, वही तुम्हारी कुरान है। नम्रता को अपनी सुन्नत मान ले, शिष्टाचार को अपना रोजा मान ले और इस प्रकार तू मुसलमान बन जाएगा।' उन्होंने पाँचों नमाजों की व्याख्या करते हुए कहा- 'पहली नमाज सच्चाई है, दूसरी इन्साफ है, तीसरी दया है, चौथी नेक-नीयत है और पाचँवी अल्लाह की बंदगी है।'

    गुरु नानक मुसलमानों द्वारा की जाने वाली हिंसा से बहुत व्यथित रहते थे। उनके समय में हिंदुओं का बड़ी संख्या में नरसंहार हुआ। बाबर ने अपनी आत्मकथा 'तुजुके बाबरी' में इस नरसंहार का वर्णन किया है। उसने हिन्दुओं के सिरों की मीनारें चिनवाईं। बाबरनामा में ऐसी बहुत सी घटनाएं लिखी गई हैं। सिक्खों के 16वीं सदी के ग्रंथों में सिक्खों और मुसलमानों के बीच हुए हिंसक युद्धों के उल्लेख मिलते हैं।

    बाबर के शासनकाल में हुए हिन्दुओं के नरसंहार के गुरु नानकदेव प्रत्यक्षदर्शी थे। उन्होंने हिंदुओं पर हुए अत्याचारों से व्यथित होकर परमात्मा को सम्बोधित करते हुए लिखा है- 'ऐती मार पई कुरलाणे, तैं कि दर्द न आया?'


    सिक्ख धर्म की दार्शनिक मान्यताएँ

    सिक्ख धर्म का लक्ष्य

    सिक्ख धर्म का परम लक्ष्य मानव मात्र का कल्याण करना है। गुरु नानक का मानना था कि धर्म के बाह्य आडम्बरों के कारण लोगों के बीच भेद उत्पन्न होता है और वे गुमराह होते हैं। उन्होंने मनुष्यों को सब तरह के भेदभाव भुलाकर ईमानदारी और नेक-नीयत से अपना काम करने का उपदेश दिया। यही कारण था कि उन्होंने स्वयं कोई अलग धर्म नहीं चलाया।

    सिक्ख धर्म में ईश्वर तत्त्व का निरूपण

    सिक्खमत की शुरुआत 'एक' से होती है। सिक्खों के धर्म ग्रंथ में 'एक' की ही व्याख्या है। 'एक' को निरंकार, परब्रह्म आदि गुणवाचक नामों से जाना गया है। गुरु ग्रंथ साहिब के शुरुआत में 'निरंकार' का स्वरूप बताया है जिसे 'मूल मन्त्र' भी कहते हैं- 'एक ओंकार, सतिनामु, करतापुरखु, निर्भाओ, निरवैरु, अकालमूर्त, अजूनी, स्वैभंग गुर पर्सादि। जपु। आदि सचु जुगादि सचु है भी सचु नानक होसी भी सचु।' इस प्रकार सिक्ख धर्म एकेश्वरवादी है तथा ईश्वर को एक-ओंकार कहता है।

    गुरु नानक का मानना था कि ईश्वर 'अकाल पुरुष' और 'निरंकार' है। अकाल पुरुष का अर्थ होता है जिस पर समय का प्रभाव नहीं पड़ता। न उसका जन्म होता है और न मृत्यु। निरंकार का अर्थ निर्गुण-निराकार से है, अर्थात् जिसका कोई आकार या रूप नहीं है। इसलिए ईश्वर की मूर्ति या चित्र नहीं बनाया जा सकता। गुरु अर्जुनदेव के अनुसार- 'परमात्मा व्यापक है, जैसे सभी वनस्पतियों में आग समायी हुई है एवं दूध में घी समाया हुआ है। इसी तरह परमात्मा की ज्योति ऊँच-नीच सभी में व्याप्त है परमात्मा घट-घट में व्याप्त है।'

    सिक्ख धर्म में जीव-आत्मा तत्त्व का निरूपण

    सिक्ख धर्म की मूल शिक्षाओं में आत्मा के निराकारी स्वरूप, मन (आत्मा), चित (परात्मा), सुरत, बुधि, मति आदि की जानकारी दी गई है। इनकी गतिविधिओं को समझ कर मनुष्य स्वयं को समझ सकता है। इसे सिक्ख धर्म में 'आतमचिंतन' कहते हैं। जीव-आत्मा जो निराकार है, उस के पास निरंकार के सिर्फ 4 ही गुण व्याप्त हैं- 'ओंकार, सतिनाम, करता पुरख, स्वैभंग।'

    शेष चार गुण प्राप्त करते ही जीव-आत्मा पुनः वापिस निरंकार में समा जाती है किन्तु उसको प्राप्त करने के लिए गुरमत के ज्ञान द्वारा जीव-आत्मा को समझना आवश्यक है। आत्मा क्या है? कहाँ से आई है? इसका अस्त्तिव क्यों है? करना क्या है? आत्मा के विकार क्या हैं? आत्मा विकार मुक्त कैसे होे? आत्मा स्वयम् निरंकार की अंश है। आत्मा का ज्ञान प्राप्त करने पर निरंकार का ज्ञान हो जाता है। इत्यादि विषयों पर सिक्ख धर्म में खूब विचार किया गया है।

    चार पदार्थ की प्राप्ति में विश्वास

    मानव को अपने जीवन में 'चार 'पदार्थ' प्राप्त करने अनिवार्य हैं-

    (1.) ज्ञान पदार्थ: ज्ञान पदार्थ या प्रेम पदार्थ किसी से ज्ञान लेकर प्राप्त होता है। गुरमत का ज्ञान पढ़ कर या समझ कर। भक्त लोग ये पदार्थ देते हैं। इसमें माया में रह कर माया से छूटने का ज्ञान है। सब विकारों को त्यागना और निरंकार को प्राप्ति करना ही इस पदार्थ का ध्येय है।

    (2.) मुक्त पदार्थ: ज्ञान पदार्थ की प्राप्ति के बाद ही मुक्त पदार्थ प्राप्त होता है। माया की प्यास ख़त्म होने पर मन और चित एक हो जाते हैं। जीव सिर्फ़ नाम की आराधना करता है। इसको जीवित मुक्त कहते हैं।

    (3.) नाम पदार्थ: नाम आराधना से प्राप्त किया हुआ निराकारी ज्ञान है। इसको 'धुर की बनी' भी कहते हैं। यह बिना कानों के सुनी जाती है और हृदय में प्रगट होती है। यह नाम ही जीवित करता है। आँखें खोल देता है। ३ लोक का ज्ञान मिल जाता है- 'नानक नाम मिले तां जीवां।'

    (4.) जन्म पदार्थ: यह निराकारी जन्म है। बस शरीर में है किन्तु सुरत शब्द के साथ जुड़ गयी है। शरीर से प्रेम नहीं है। दुःख सुख कुछ भी नहीं मानता, पाप पुण्य कुछ भी नहीं। बस जो 'हुकुम' होता है वो करता है- हुक्मे अंदर सब है बाहर हुक्म न कोए।

    गुरुओं के सम्बन्ध में सिक्ख धर्म की मान्यता

    गुरु, भगवान के सेवक हैं जो मनुष्य के मार्गदर्शन के लिए समय-समय पर आते हैं किंतु वे भगवान बिल्कुल नहीं है। केवल मनुष्य ही 'गुरु' नहीं है, शास्त्र और शब्द भी 'गुरु' है। इसलिए गुरुओं में श्रद्धा रखने और उनके शास्त्र को मानने से मनुष्य की आत्मा का 'अकाल पुरुष' से संयोग हो सकता है, जो जीवन का चरम लक्ष्य है।

    ब्राह्मणों के वचनों में विश्वास नहीं

    गुरु नानक ब्राह्मणों के वचनों पर विश्वास नहीं करते थे। गुरुग्रंथ साहिब में गुरु नानक के एक पद में कहा गया है- 'पण्डित पोथी पढ़ते हैं किन्तु विचार को नहीं बूझते। दूसरों को उपदेश देते हैं, इससे उनका मायिक व्यापार चलता है। उनकी कथनी झूठी है, वे संसार में भटकते रहते हैं। इन्हें सबद के सार का कोई ज्ञान नहीं है। पण्डित तो वाद-विवाद में ही पड़े रहते हैं।'


    पण्डित वाचहि पोथिआ न बूझहि बीचारू।

    आन को मती दे चलहि माइआ का बामारू।

    कहनी झूठी जगु भवै रहणी सबहु सबदु सु सारू।

    -आदिग्रन्थ, पृ. 55

    कर्म-फल सिद्धांत में विश्वास नहीं

    सिक्ख-मत कर्म-फल सिद्धांत में विश्वास नहीं रखता। सिक्ख-धर्म के अनुसार मनुष्य स्वयं कुछ नहीं कर सकता। मनुष्य केवल सोचने तक सीमित है। करता वही है जो 'हुक्म' में है, चाहे वो किसी गरीब को दान दे रहा हो, चाहे वो किसी को जान से मार रहा हो- 'हुक्मे अंदर सब है बाहर हुक्म न कोए।'

    पाप-पुण्य में विशवास नहीं

    इसी लिए गुरमत में पाप पुन्य को नहीं माना जाता- 'पाप पुन्य दोउ एक सामान।' अगर इंसान कोई क्रिया करता है तो वो अंतर-आत्मा के साथ आवाज़ मिला कर करे। यही कारण है की गुरमत कर्मकाण्ड के विरुद्ध है। गुरु नानक देव ने अपने समय के भारतीय समाज में व्याप्त कुप्रथाओं, अंधविश्वासों, रूढ़ियों और पाखण्डों की आलोचना करते हुए जन-साधारण को पण्डों तथा पीरों के चंगुल में न फंसने की सलाह दी।

    चार पुरुषार्थों में विश्वास नहीं

    धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को चार पदार्थों में नहीं लिया गया। गुरु गोबिंद सिंह कहते हैं-


    ज्ञान के विहीन लोभ मोह में परवीन,

    कामना अधीन कैसे पांवे भगवंत को।

    मूर्ति-पूजा में विश्वास नहीं

    सिक्खमत में भक्तों एवम सद्गुरुओं ने अपने 'एक-निरंकार' को 'आकार रहित' कहा है। क्योंकि सांसारिक पदार्थ समाप्त हो जाते हैं किंतु परब्रह्म कभी नहीं मरता। इसी लिए उसे 'अकाल' कहा गया है। 'जीव-आत्मा' भी आकार रहित है और इस शरीर के साथ कुछ समय के लिए बंधी है। इसका अस्त्तिव शरीर के बिना भी है, जो साधारण मनुष्य की बुद्धि से परे है। इस कारण सिक्खमत मूर्ति-पूजा के विरुद्ध है।

    सिक्ख-गुरुओं ने मूर्ति-पूजकों को अंधा एवं जानवर इत्यादि कहा है। निराकार परमात्मा की तस्वीर नहीं बनाई जा सकती। कोई भी संसारी पदार्थ जैसे कि कब्र, भक्तों एवं सद्गुरुओं की ऐतिहासक वस्तुएं, प्रतिमाएं आदि को पूजना सिक्खों के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है। धार्मिक ग्रंथ का ज्ञान जो एक विधि निरंकार के देश की तरफ लेकर जाता है, सिक्ख उसके समक्ष नतमस्तक होते हैं किन्तु धार्मिक ग्रंथों की पूजा भी सिक्खों के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है क्योंकि वे भी सांसारिक पदार्थ ही हैं।

    अवतारवाद और पैगम्बरवाद में विश्वास नहीं

    सिक्ख-मत में हर जीव को अवतार कहा गया है। हर जीव 'एक-निरंकार' का अंश है इसलिए पशु, पक्षी, वृक्ष इत्यादि भी अवतार हैं। मनुष्य योनि में जीव अपना ज्ञान पूरा करने के लिए अवतरित हुआ है। सिक्ख धर्म में व्यक्ति की पूजा नहीं होती- 'मानुख कि टेक बिरथी सब जानत, देने को एके भगवान।' कोई भी अवतार एक निरंकार की शर्त पर पूरा नहीं उतरता क्योंकि सबने जन्म लिया है। सिक्ख किसी अवतार को परमेश्वर नहीं मानते। यदि कोई अवतार गुरमत का उपदेश करता है तो सिक्ख उस उपदेश को स्वीकार कर लेते हैं।

    श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि आत्मा मरती नहीं, इस बात से सिक्ख-मत सहमत है किंतु सिक्ख-मत श्रीकृष्ण द्वारा दिए गए 'कर्म' के उपदेश से सहमत नहीं है। सिक्ख-मत की दृष्टि में पैग़म्बर वह है जो निरंकार का सन्देश अथवा ज्ञान जनसाधारण में बांटे। इस्लाम में कहा गया है कि मुहम्मद आखरी पैगम्बर हैं, सिक्खों में कहा गया है कि 'हर जुग जुग भक्त उपाया।' अर्थात्् भक्त हर युग में पैदा होते हैं और 'एक-निरंकार' का सन्देश लोगों तक पहुँचाते हैं।

    सिक्खमत 'ला इलाहा इल्ल अल्लाह (अल्लाह् के सिवा और कोई परमेश्वर नहीं है) से सहमत है, वे इससे भी सहमत हैं कि मुहम्मद रसूल अल्लाह हैं किन्तु वे इस बात से सहमत नहीं हैं कि सिर्फ़ मुहम्मद ही रसूल अल्लाह है। अर्जुन देव जी कहते हैं- 'धुर की बानी आई, तिन सगली चिंत मिटाई।' अर्थात मुझे धुर से वाणी आई है और मेरी समस्त चिंताएं मिट गई हैं।


    सिक्ख धर्म के प्रमुख ग्रंथ

    आदि ग्रंथ (पोथी साहिब अथवा ज्ञान गुरु ग्रंथ साहिब)

    सिक्खों का धार्मिक ग्रन्थ 'श्री आदि ग्रंथ' या 'ज्ञान गुरु ग्रंथ साहिब' है। इसे 'आदि गुरु दरबार' या 'पोथी साहिब' भी कहा जाता है। मूलतः भाई गुरदास जी ने पुराने पूर्ववर्ती गुरुओं एवं भक्त कवियों की पोथियों से रचनाएं लेकर यह ग्रंथ तैयार किया। गुरु अर्जुनदेव इस ग्रंथ के दिशा निर्धारक बने तथा गुरु अर्जुनदेव ने अपनी वाणी भी ग्रंथ में संकलित करवाई। इस ग्रंथ की कई प्रतिलिपियां भी तैयार हुईं। ई.1604 में गुरु अर्जुन-देव ने 'आदि ग्रन्थ' का संपादन किया।

    इसमें 5 सिक्ख-गुरुओं, 15 संतों एवं 14 कवियों की रचनाओं को सम्मिलित किया। इन पाँच गुरुओं के नाम हैं- गुरु नानक, गुरु अंगद देव, गुरु अमरदास, गुरु रामदास और गुरु अर्जुनदेव। 15 संतों के नाम हैं- शेख़ फरीद, जयदेव, त्रिलोचन, सधना, नामदेव, वेणी, रामानंद, कबीर, रविदास, पीपा, सैठा, धन्ना, भीखन, परमानन्द और सूरदास। 14 कवियों के नाम हैं- हरिबंस, बल्हा, मथुरा, गयन्द, नल्ह, भल्ल, सल्ह, भिक्खा, कीरत, भाई मरदाना, सुन्दरदास, राइ बलवंड एवं सत्ता डूम, कलसहार, जालप।

    बाद में गुरु गोविन्द सिंह ने अपने पिता गुरु तेग बहादुर की वाणी भी गुरुग्रंथ साहब में शामिल करके आदि ग्रन्थ को अन्तिम रूप दिया। एक दोहा गुरु गोविन्दसिंह का भी है। इस प्रकार आदि ग्रंथ में 7 सिक्ख-गुरुओं, 15 संतों एवं 14 कवियों की रचनाएं सम्मिलित हो गईं। आदि-ग्रन्थ में 15 संतों के कुल 778 पद हैं। इनमें 541 कबीर के, 122 शेख फरीद के, 60 नामदेव के और 40 संत रविदास के हैं।

    अन्य संतों के एक से चार पद लिए गए हैं। गुरु गोविन्द सिंह ने अपने बाद गुरु-परम्परा समाप्त कर दी तथा सिक्खों के आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए 'आदि ग्रन्थ' को समूचे खालसा पंथ के 'गुरु पद' पर आसीन कर दिया। उस समय से आदि ग्रन्थ, 'गुरु साहब' के रूप में स्वीकार किया जाने लगा। खालसा द्वारा आदि ग्रंथ के 1430 पृष्ठ मानकित किए गए। इसे 'आदि ग्रंथ' इसलिए कहते हैं क्योंकि इसमें 'आदि' का ज्ञान है। 'जप बानी' के अनुसार 'सत्य' ही 'आदि' है। इसका ज्ञान करवाने वाले ग्रंथ को 'आदि ग्रंथ' कहते हैं।

    कुछ विद्वानों के अनुसार जब इस ग्रंथ में गुरु तेग बहादुर की बानी नहीं थी तब यह आदि ग्रंथ था और जब गुरु गोबिंद सिंह ने 9वें महले की 'बानी' (वाणी) चढ़ाई तब इसे आदि ग्रंथ की जगह 'गुरु ग्रंथ' कहा जाने लगा।

    दसम ग्रंथ

    आदि ग्रंथ का ज्ञान लेना ही सिक्खों के लिए सर्वोपरि है परंतु सिक्ख हर उस ग्रंथ को सम्मान देते हैं, जिसमें 'गुरमत' का उपदेश है। गुरु गोबिंदसिंह ने अनेक रचनाएँ लिखीं जिनकी छोटी-छोटी पोथियाँ बना दीं। उन की मृत्यु के बाद उन की धर्मपत्नी 'सुन्दरी' की आज्ञा से भाई मनीसिंह खालसा और अन्य खालसा शिष्यों ने गुरु गोबिंदसिंह की समस्त रचनाओं को एकत्रित करके एक जिल्द में चढ़ा दिया जिसे 'दसम ग्रन्थ' कहा जाता है।

    दसम ग्रंथ की वाणियाँ, यथा जाप साहिब, तव परसाद सवैये और चोपाई साहिब सिक्खों के दैनिक 'सजदा' एवं 'नितनेम' का हिस्सा हैं। ये वाणियाँ 'खंडे बाटे की पहोल' अर्थात् 'अमृत छकने' के अवसर पर पढ़ी जाती हैं। तखत हजूर साहिब, तखत पटना साहिब और निहंग सिंह आदि गुरुद्वारों में दसम ग्रन्थ का गुरु ग्रन्थ साहिब के साथ प्रकाश होता है और रोज़ हुकम्नामे भी लिया जाता है।

    सरब्लोह

    'सरब्लोह' ग्रन्थ में 'खालसा महिमा' संकलित है जो कि गुरु गोबिंदसिंह की प्रमाणित रचना है। इसके साथ ही सरब्लोह ग्रन्थ में कर्म कांड, व्यक्ति पूजा इत्यादि विषय पर भी कुछ रचनाएं हैं जो गुरमत के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध हैं।

    भाई गुरदास की वारों

    भाई गुरदास (ई.1551-1636) गुरु अमरदास के भतीजे थे। वे चार गुरुओं के साथ रहे। उन्होंने ही सर्वप्रथम ई.1604 में 'आदि ग्रंथ' संक.लित किया। 'भाई गुरदास की वारों' में मूर्ति-पूजा तथा कर्म-सिद्धांत पर आधारित कई रचनाएं हैं जो 'गुरमत' के विरुद्ध हैं। फिर भी गुरु अर्जुनदेव ने उनकी रचना को 'गुरबानी की कुंजी' कहकर सम्मान दिया।

    श्री गुर सोभा

    सिक्ख इतिहास को जानने के लिए जिन ग्रंथों का सहारा लिया जा सकता है, उनमें से अधिकतर ग्रंथ ई.1750 के बाद लिखे गए। सिक्ख धर्म का इतिहास के लिए कोई भी ग्रंथ पूरी तरह विश्वसनीय नहीं माना जाता। 'श्री गुर सोभा' ही ऐसा ग्रन्थ है जो गुरु गोबिंदसिंह के निकटवर्ती शिष्य द्वारा लिखा गया है किन्तु इसमें तिथियां नहीं दी गई हैं। सिक्खों के और भी इतिहास विषयक ग्रन्थ हैं। श्री गुर परताप सूरज ग्रन्थ, गुर-बिलास पातशाही 10, महीमा परकाश, पंथ परकाश, जनम-सखियाँ इत्यादि। श्री गुर परताप सूरज ग्रन्थ की व्याख्या गुरद्वारों में होती है। कभी 'गुर-बिलास पातशाही दस' की व्याख्या भी होती थी। सिक्खों का इतिहास लिखने वाले प्रायः सनातनी विद्वान थे। इस कारण उनकी पुस्तकों में गुरुओं एवं भक्तों के चमत्कार लिखे गए हैं जो गुरमत-दर्शन के अनुकूल नहीं हैं। 'जम्सखिओं' और 'गुर-बिलास' में गुरु नानक का हवा में उड़ना, मगरमच्छ की सवारी करना, माता गंगा को बाबा बुड्ढा द्वारा गर्भवती करना इत्यादि घटनाएं लिखी हैं।

    गुरुद्वारा

    सिक्खों के धार्मिक स्थान को 'गुरुद्वारा' कहते हैं। इसमें किसी गुरु या ईश्वर की प्रतिमा नहीं होती अपितु गुरुग्रंथ साहब की प्रति रखी हुई होती है जिसे गुरु मानकर सेवा, प्रणाम किया जाता है तथा उसके समक्ष मत्था टेका जाता है। ग्रंथियों द्वारा 'शबद-कीर्तन' आयोजित किए जाते हैं। देश में कई प्रसिद्ध गुरुद्वारे हैं जिनमें आनन्दपुर साहब, शीशगंज, तरनतारन, कर्तारपुर साहब, रकाबगंज, बुड्ढा जोहड़ आदि प्रमुख हैं।

    स्वर्णमंदिर

    चौथे गुरु रामदास ने पंजाब में अमृतसर नामक सरोवर की स्थापना की थी। इसके चारों ओर एक नगर बस गया। इस नगर को भी अमृतसर कहा गया। पांचवें गुरु अर्जुनदेव ने अमृतसर में अकाल तख्त की स्थापना की तथा स्वर्ण मंदिर बनवाया। यह सिक्खों का सबसे बड़ा तीर्थ है। इसे श्री हरिमन्दिर साहिब, हरमंदिर साहिब, दरबार साहिब एवं स्वर्ण मन्दिर भी कहते हैं। यह सिक्खों का सबसे प्रमुख गुरुद्वारा है। यह गुरुद्वारा अमृतसर सरोवर के मध्य में स्थित है। गुरुद्वारे तक पहुँचने के लिए पुल से होकर जाना होता है।

    गुरु अर्जुनदेव ने दिसंबर 1588 में हरमंदिर साहिब की नींव लाहौर के सूफी संत साईं मियां मीर से रखवाई थी जो कि गुरु अर्जुनदेव का शिष्य भी था। इस गुरुद्वारे का नक्शा स्वयं गुरु अर्जुन देव ने तैयार किया था। गुरुद्वारे के चारों ओर दरवाजे हैं, जो चारों दिशाओं (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण) में खुलते हैं। ये दरवाजे समाज के चारों वर्णों के लोगों के गुरुद्वारे में आने का संकेत करते हैं। पूरा गुरुद्वारा सफेद संगमरमर से बना हुआ है और इसकी बाहरी दीवारों पर सोने की पर्त चढ़ाई गई है।

    इसलिए इसे स्वर्ण मंदिर कहते हैं। मंदिर परिसर में पत्थर का एक स्मारक है जो शहीद सिक्ख सैनिकों को श्रद्धाजंलि स्वरूप लगाया गया है। श्री हरिमन्दिर साहिब के चार द्वारों में से एक द्वार गुरु रामदास सराय की ओर खुलता है। इसमें चौबीस घंटे लंगर चलता है, जिसमें लगभग 40 हजार लोग प्रतिदिन प्रसाद ग्रहण करते हैं। श्री हरिमन्दिर साहिब परिसर में बेरी का एक वृक्ष है जिसे बेर बाबा बुड्ढा कहते हैं। जब स्वर्ण मंदिर बन रहा था तब बाबा बुड्ढा इसी वृक्ष के नीचे बैठकर मंदिर का निर्माण कार्य देखते थे। स्वर्ण मंदिर से 100 मीटर की दूरी पर स्वर्ण जड़ित, अकाल तख्त है।

    इसमें एक भूमिगत तल है और पांच अन्य तल हैं। इसमें एक संग्रहालय और सभागार भी बनाया गया है। यहाँ पर सरबत खालसा की बैठकें होती हैं। सिक्ख पंथ से जुड़ी हर समस्या का समाधान इसी सभागार में होता है। गुरुद्वारे के बाहर दाईं ओर अकाल तख्त है जिसका निर्माण ई.1606 में किया गया था। अकाल तख्त के दर्शन करने के बाद श्रद्धालु, स्वर्ण मंदिर में प्रवेश करते हैं। यहाँ दरबार साहिब स्थित है। उस समय यहाँ महत्वपूर्ण फैसले लिए जाते थे। इसके पास शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति का कार्यालय है।

    वर्तमान समय में यह समिति सिक्ख पंथ से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय लेती है। मुसलमानों ने स्वर्णमंदिर को कई बार नष्ट करने का प्रयास किया किंतु सिक्खों ने इसे हर बार पुनः बना लिया। 18वीं सदी में अहमदशाह अब्दाली ने इस गुरुद्वारे पर हमला करके इसे बुरी तहर क्षतिग्रस्त कर दिया। सरदार जस्सा सिंह अहलुवालिया ने इसका पुनर्निर्माण करवाया। ई.1757 में मुसलमानों ने पुनः स्वर्ण मंदिर पर अधिकार कर लिया। तब ई.1761 में बाबा दीपसिंह ने मुसलमानों से भयानक संघर्ष करके गुरुद्वारे को मुक्त करवाया। 19वीं शताब्दी में अफगा़न हमलावरों ने स्वर्णमंदिर को पूरी तरह नष्ट कर दिया। तब महाराजा रणजीतसिंह (ई.1801-39) ने इसे फिर से बनवाया और इसकी बाहरी दीवारों पर सोने की परत चढ़वाई।

    सिक्ख गुरुओं का महान जीवन

    सिक्ख धर्म में गुरु नानक से लेकर गुरु गोविन्दसिंह तक दस गुरु हुए जिनके नाम क्रमशः (1.) नानक, (2.) अंगद, (3.) अमरदास, (4.) रामदास, (5.) अर्जुनदेव, (6.) हरगोविन्द, (7.) हरराय, (8.) हरकृष्णराय, (9.) तेग बहादुर और (10.) गोविन्दसिंह है। प्रत्येक गुरु अपने अन्तिम समय में अपने उत्तराधिकारी को अपना पद सौंपकर उसे पंथ का गुरु घोषित कर दिया करते थे। गुरु गोविन्दसिंह जब स्वर्गवासी होने लगे, तब उन्होंने 'ग्रन्थ साहिब' को ही पंथ का गुरु घोषित कर दिया और यह आज्ञा दी कि अब से कोई 'व्यक्ति' गुरु नहीं होगा। इस प्रकार दस गुरुओं के नेतृत्व में सिक्ख धर्म का विकास हुआ।

    इन सभी गुरुओं का जीवन सहज, सरल, सादा और परम्परागत भारतीय जीवन मूल्यों पर आधारित था। उन्होंने तत्कालीन राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक जीवन को गहरई तक प्रभावित किया। उन्होंने भक्ति, ज्ञान, उपासना, अध्यात्म एवं दर्शन को उच्च जातियों के संकीर्ण दायरे से निकालकर समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचाया। सिक्ख गुरुओं ने मनुष्य को उद्यम करते हुए जीवन जीने, कमाते हुए सुख प्राप्त करने और ध्यान करते हुए निरंकार ईश्वर को प्राप्त करने की बात कही।

    उनका मानना था कि परिश्रम करने वाला व्यक्ति सभी चिन्ताओं से मुक्त रहता है। गुरु नानक के अनुसार जो व्यक्ति मेहनत करके कमाता है और उसमें कुछ दान-पुण्य करता है, वही सही मार्ग को पहचानता है। सिक्ख गुरुओं द्वारा प्रारंभ की गई 'लंगर' (निःशुल्क भोजन) प्रथा विश्व-बन्धुत्व, मानव-प्रेम, समानता एवं उदारता की मिसाल है। सिक्ख गुरुओं ने अन्धी नकल के खिलाफ वैकल्पिक चिन्तन पर जोर दिया। शारीरिक-अभ्यास एवं विनोदशीलता को जीवन का आवश्यक अंग माना। पंजाब के लोकगीतों, लोकनृत्यों एवं 'होला-महल्ला' पर शास्त्रधारियों के प्रदर्शित करतबों के मूल में सिक्ख गुरुओं के प्रेरणा-बीज ही हैं।

    गुरु अंगद के समय में सिक्ख धर्म

    गुरु नानक के वचनों को सर्वप्रथम गुरु अंगद ने 'गुरुमुखी' लिपि में लिखा। तभी से गुरुओं के उपदेशों का संकलन आरम्भ हुआ तथा गुरुमुखि लिपि आरम्भ हुई। गुरु अंगद ने सिक्ख धर्म में लंगर को प्रधानता दी।

    गुरु अमरदास के समय में सिक्ख धर्म

    तीसरे गुरु अमरदास ने प्रत्येक आगंतुक के लिए 'गुरु के लंगर' में भोजन करना आवश्यक किया। उन्होंने औरतों में पर्दे और सती-प्रथा की निन्दा की तथा धर्म-प्रचार के लिए 'बाईस मज्झी' ( बाईस गद्दी) कायम की।

    गुरु रामदास के समय में सिक्ख धर्म

    चौथे गुरु रामदास ने अमृतसर की स्थापना की, जो पहले रामदासपुर कहलाता था और कालान्तर में सिक्ख धर्म का प्रमुख तीर्थ स्थान बना।

    गुरु अर्जुन देव के समय में सिक्ख धर्म

    पाचँवे गुरु अर्जुनदेव (ई.1581-1606) ने अमृतसर के तालाब को पूरा करवाया और उसके बीच में प्रसिद्ध सूफी संत मियां मीर के हाथ से हरमन्दर साहब की बुनियाद रखवाई। इस मन्दिर के चारों तरफ दरवाजे थे, जिसका अर्थ था कि यह चारों दिशाओं के मनुष्यों और चारों वर्णों की जातियों के लिए खुला था। इसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र समान रूप से आ सकते थे। उन्होंने जलन्धर दोआब में करतारपुर भी बसाया और तरनतारन में गुरुद्वारा स्थापित किया।

    उनके समय 'आदि ग्रन्थ साहिब' का संकलन एवं सम्पादन किया गया जिसमें गुरुवाणी को इकट्ठा कराकर रागबद्ध रूप से सज्जित किया गया। इससे सिक्खों के शास्त्र को मूर्तरूप मिल गया। एक बार किसी ने अकबर से शिकायत की कि इस ग्रन्थ में इस्लाम और अन्य धर्मों की निन्दा की गई है। इस पर अकबर ने गुरु को बुलाकर इस बारे में पूछा। गुरु ने ग्रन्थ खोलकर कहा कि इस चाहे जहाँ से पढ़वा लो। अकबर ने ग्रंथ में एक जगह अपना हाथ रखा। वह भाग पढ़ा गया। इस पंक्ति में निराकार ईश्वर की स्तुति की गई थी।

    अकबर ने प्रसन्न होकर ग्रन्थ साहिब पर इक्यावन मोहरें भेंट कींे और गुरु को वस्त्र देकर सम्मानित किया। एक बार अकबर ने दिल्ली लौटते हुए गोइन्द्रवाल में गुरु के लंगर में भोजन भी किया। जहाँगीर, अकबर जैसा सहिष्णु नहीं था। वह गुरु की तहरीक पसन्द नहीं करता था तथा इसे कुफ्र समझता था। अकबर की मृत्यु के बाद जहाँगीर का पुत्र खुसरो भाग कर गुरु अर्जुनदेव की शरण में आया। गुरु ने पांच हजार रुपए देकर शहजादे की सहायता की।

    जहाँगीर ने गुरु को दिल्ली बुलवाया और उन पर दो लाख रुपयों का जुर्माना लगाया तथा आज्ञा दी कि ग्रन्थ साहिब में से वे समस्त पंक्तियाँ निकाल दें जिनसे इस्लाम का थोड़ा भी विरोध होता है। गुरु ने दोनों आज्ञाआंे को मानने से इन्कार कर दिया। इस पर जहाँगीर ने गुरु पर आमानुषिक अत्याचार किए। उन पर जलती हुई रेत डाली गई, उन्हें जलती हुई लाल कड़ाही में बैठाया गया और उन्हें उबलते हुए गर्म जल से नहलाया गया। गुरु ने समस्त उत्पीड़न सहन कर लिया। इसके बाद गुरु रावी-स्नान के बहाने कैद से बाहर आए और रावी के तट पर जाकर अपने प्राण-त्याग दिए।

    इस प्रकार ई.1606 में गुरु अर्जुनदेव की हत्या के बाद सिक्खों का इतिहास पूरी रह बदल गया। अब वे भजन-कीर्तन करने वाले शांत लोग नहीं रहे, अपितु अपने सिद्धांतों के लिए लड़-मरने वाले समूहों में संगठित होने लगे। वे अवसर मिलते ही मुगलों को क्षति पहुँचाने का प्रयास करते थे। अतः मुसलमानों की हिंसा का सामना करने के लिए शांतिप्रिय सिक्ख जाति ने स्वयं को लड़का समूहों में संगठित कर लिया।

    गुरु हरगोविंद के समय में सिक्ख धर्म

    गुरु अर्जुनदेव के बाद छठे गुरु हरगोविन्द हुए। गुरु अर्जुनदेव के साथ जो अमानुषिक अत्याचार हुए, उससे सिक्खों में नई जागृति उत्पन्न हुई। वे समझ गए कि केवल जप और माला से धर्म की रक्षा नहीं की जा सकती। इसके लिए तलवार भी धारण करनी चाहिए और उसके पीछे राज्य-बल भी होना चाहिए। इसलिए गुरु हरगोविन्द ने 'सेली' (साधु का चोगा) फाड़कर गुरुद्वारे में डाली और शरीर पर राजा और योद्धा का परिधान धारण किया। यहीं से सिक्ख-पंथ की प्रेम और भक्ति की परम्परा ने सैनिक चोला पहन लिया। गुरु हरगोविन्द ने माला और कण्ठी के बजाए दो तलवारें रखनी शुरू कीं, एक आध्यात्मिक शक्ति के प्रतीक के रूप में और दूसरी लौकिक प्रभुत्व के प्रतीक के रूप में।

    उन्होंने समस्त 'मज्झियों' के 'मसण्डो' (धर्म प्रचारकों) को आदेश दिया कि अब से भक्त, गुरुद्वारे में चढ़ाने के लिए द्रव्य नहीं भेजेंगे अपितु अश्व और अस्त्र-शस्त्र भेजेंगे। उन्होंने पाँच सौ सिक्खों की एक फौज तैयार की और उन्हें सौ-सौ सिपाहियों के दस्तों में संगठित किया। उन्होंने अमृतसर में लोहागढ़ का किला बनवाया तथा लौकिक कार्यों की देख-रेख के लिए हर मन्दिर के सामने अकाल तख्त स्थापित किया। गुरु हरगोविन्द के समय सिक्खों की मुगलों से तीन लडाइयाँ हुईं और हर लडाई में मुगलों को मुँह की खानी पडी।

    इससे सिक्खों की प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई और सारा हिन्दू समाज उन्हें धर्म और संस्कृति के रक्षक के रूप में देखने लगा। सिक्खों की संख्या बढ़ाने को पूरे पंजाब में प्रायः यह परम्परा चल पड़ी कि हर हिन्दू परिवार अपने ज्येष्ठ पुत्र को गुरु की शरण में समर्पित कर दे। अभी भी पंजाब में ऐसे हिन्दू परिवार हैं जिनका एक सदस्य सिक्ख होता है और शेष पुरुष मौना सिक्ख कहलाते हैं। ई.1628 में शाहजहाँ, अमृतसर के निकट आखेट खेल रहा था। उसका एक बाज गुरु के डेरे में चला गया। जब बादशाह के सिपाहियों ने सिक्खों से बाज लौटाने की मांग की तो सिक्खों ने शरण में आए हुए बाज को लौटाने से मना कर दिया।

    इस पर बादशाह की सेना ने सिक्खों पर आक्रमण कर दिया परन्तु गुरु के नेतृत्व में सिक्खों ने मुगल सेना को मार भगाया। इस पर वजीर खाँ तथा गुरु के अन्य शुभचिंतकों ने बादशाह के क्रोध को शान्त किया। कुछ समय बाद गुरु हरगोविंद ने पंजाब में व्यास नदी के किनारे एक नए नगर का निर्माण आरम्भ किया जो आगे चल कर श्री हरगोविन्दपुर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। पंजाब के मध्य में इस नगर का निर्माण मुगल सल्तनत के लिए हितकर नहीं समझा गया।

    इसलिए बादशाह ने गुरु को आदेश दिया कि वे नगर का निर्माण नहीं करें किंतु सिक्खों ने इस आदेश की उपेक्षा करके नगर का निर्माण पूर्ववत् जारी रखा। सिक्खों के विरुद्ध पुनः एक सेना भेजी गई जिसे गुरु हरगोविंद के सिक्खों ने मार भगाया। इस बार पुनः मामला किसी तरह शांत किया गया। गुरु का मुगलों से तीसरा संघर्ष एक चोरी के कारण हुआ। बिधीचन्द्र नामक एक कुख्यात डाकू गुरु का परम भक्त था। उसने शाही अस्तबल से दो घोड़े चुराकर गुरु को भेंट कर दिए। गुरु ने अनजाने में वे घोड़े स्वीकार कर लिए।

    इसलिए ई.1631 में गुरु के विरुद्ध मुगल सेना भेजी गई परन्तु सिक्खों ने उसे खदेड़ दिया तथा सात मस्जिदों पर अधिकार जमाकर उन्हें अपने काम में लेने लगे। शाहजहाँ ने सेना भेजकर उन्हें मस्जिदों से बाहर निकाला। मुगलों से निरन्तर संघर्ष के कारण सिक्ख गुरु द्वारा किए जाने वाले धर्म-प्रचार के कार्य में बाधा उत्पन्न होने लगी तथा सिक्खों को बड़ा कष्ट उठाना पड़ा।

    गुरु हरगोविंद जानते थे कि सिक्खों की शक्ति एवं साधन अत्यंत सीमित हैं जबकि मुगल सल्तनत की शक्ति एवं साधन असीमित हैं, सिक्ख बहुत दिनों तक इस संघर्ष में नहीं टिक सकेंगे। इसलिए गुरु हरगोविंद आध्यात्मिक चिन्तन के लिए काश्मीर की पहाड़ियों में चले गए और कीरतपुर नामक स्थान पर निवास करने लगे। माना जाता है कि गुरु हरगोविन्द ने ही सिक्खों को मांस खाने की अनुमति प्रदान की। ई.1645 मंे गुरु हरगोविंद का निधन हो गया।

    गुरु हरराय के समय में सिक्ख धर्म

    सातवें गुरु हरराय की भी औरंगजेब से नहीं बनी किंतु उनके समय में मुगलों से कोई लड़ाई नहीं हुई और सिक्ख धर्म के संगठन का काम जारी रहा।

    गुरु हरकिशन के समय में सिक्ख धर्म

    आठवें गुरु हरकिशन के समय भी सिक्ख धर्म के संगठन का कार्य निरंतर चलता रहा। उन्होंने बुद्धिमत्ता से काम लेते हुए अपने निकटतम सम्बन्धी की बजाए गुरु अर्जुन के पौत्र तेग बहादुर को अपना उत्तराधिकारी बनाया, जो सिक्ख धर्म के नौवें गुरु बने।

    गुरु तेगबहादुर के समय में सिक्ख धर्म

    जिस समय तेगबहादुर (ई.1664-75) सिक्खों के गुरु बने, औरंगजेब का दमन-चक्र जोरों पर था तथा हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाया जा रहा था। औरंगजेब ने हिन्दू-मन्दिरों की भाँति सिक्ख-गुरुद्वारों को भी तुड़वाना आरम्भ कर दिया। इस पर गुरु तेगबहादुर ने विद्रोह का झण्डा बुलंद किया। जब कश्मीर के कुछ पण्डितों को इस्लाम ग्रहण करने के लिए मजबूर किया गया तो वे आनन्दपुर आकर गुरु तेगबहाुदर से मिले। गुरु ने कहा- 'किसी महापुरुष के बलिदान के बिना धर्म की रक्षा असम्भव है।' उस समय उनके पुत्र गोविन्दसिंह ने कहा- 'पिताजी, आपसे बढ़कर दूसरा महापुरुष कौन होगा?'

    गुरु तेगबहादुर को यह परामर्श उचित लगा। उन्होंने कश्मीरी पंडितों से कहा कि औरंगजेब को समाचार भेज दो कि- 'यदि तेग बहादुर इस्लाम स्वीकार कर ले तो समस्त हिन्दू खुशी-खुशी मुसलमान बन जाएंगे।' औरंगजेब ने गुरु तेगबहादुर को अपने दरबार में बुलावया। गुरु वहाँ हाजिर तो हुए किंतु उन्होंने इस्लाम स्वीकार करने से इन्कार कर दिया। इस पर 11 नवम्बर 1675 को दिल्ली के चाँदनी चौक में उनकी हत्या कर दी गई। इससे सिक्खों की क्रोधाग्नि और भड़क उठी।

    गुरु गोबिंदसिंह के समय में सिक्ख धर्म

    जब गुरु तेगबहादुर पूर्वी भारत में दौरा कर रहे थे और उनका परिवार पटना में ठहरा हुआ था तब ई.1666 में पटना में गोविन्दसिंह का जन्म हुआ। पाँच वर्ष वहाँ रहकर वे आनन्दपुर आए और सातवें वर्ष में पढ़ने बैठे। साहिबचन्द ग्रन्थी ने उन्हें संस्कृत और हिन्दी तथा काजी पीर मुहम्मद ने फारसी सिखाई। उन्होंने शीघ्र ही इन भाषाओं पर अधिकार कर लिया। आरम्भ से ही उन्हें साहित्य का जो व्यसन लगा, वह अन्त तक रहा। नौ वर्ष की आयु में जब उनके पिता दिल्ली में शहीद हुए तब पंथ का भार गोविन्दसिंह के कन्धों पर आ गया। गोविन्दसिंह सिक्खों के दसवें गुरु हुए।

    उन्होंने सिक्खों को सैनिक जाति में परिवर्तित कर दिया। गुरु गोविन्दसिंह ने आनन्दपुर के वैशाखी मेले मे सिक्खों को एकत्रित किया। उन्होंने एक बड़े चबूतरे पर चारों ओर से कनात खड़ी करवाकर उसके भीतर कुछ बकरे बँधवा दिए। त्तपश्चात वे तलवार खींच कर कनात से बाहर आए और कहा कि धर्म की रक्षा के लिए चण्डी बलिदान चाहती है। तुममें से जो प्राण देने को तैयार हो वह कनात में आए। मैं अपने हाथों महाचण्डी के आगे उसका बलिदान करूँगा। गुरु के पुकारने पर एक आदमी कनात मेें जाता, गुरु उसे वहीं बिठा देते और एक बकरे की गरदन काटकर रक्त-भरी तलवार लिए बाहर निकल आते।

    इस प्रकार पाँच वीर कनात के भीतर पहुँचे। गुरु ने फिर पुकार लगाई किंतु जब कोई और व्यक्ति बलिदान के लिए प्रस्तुत नहीं हुआ, तब गुरु ने उन पाँच वीरों को बाहर निकाला और कहा ये 'पाँच प्यारे धर्म के खालिस अर्थात् शुद्ध सेवक हैं और उन्हें लेकर मैं आज से खालसा-धर्म की नींव डालता हूँ।' उसी समय, उन्होंने एक कड़ाह में पवित्र जल भरवाया, उनकी धर्मपत्नी ने उसमें बताशे घोले और गुरु ने तलवार से उस जल को आलोड़ित किया तथा तलवार से ही उसे 'पाँच प्यारों' पर छिड़का। इसी अमृत को पीकर लोग खालसा-धर्म की सेवा में प्रवृत्त हुए।

    इस प्रकार गुरु गोविंदसिंह ने 'खालसा' की स्थापना की। खालसा का अर्थ होता है- 'शुद्ध'। उन्होंने 30 मार्च 1699 के दिन खालसा पंथ की शिक्षाओं को अंतिम रूप दिया। तब से यह पंथ खालसा धर्म कहलाने लगा। इस पंथ के अनुयाई, हिन्दू-धर्म की रक्षा के लिए प्रत्येक समय प्राणोत्सर्ग करने के लिए तैयार रहते थे। गुरु गोबिंदसिंह अपने शिष्यों को उपदेश देते थे कि केवल 'शाप' ही नहीं 'शर' का भी प्रयोग करना चाहिए। उनकी कविताओं में अद्भुत तेज था।

    जिस परमात्मा को गुरु नानक 'निरंकार पुरुख' कहते थे, उस परमात्मा के नाम गुरु गोविन्दसिंह ने असिध्वज, महाकाल और महालौह रखे। सिक्ख-धर्म का वर्तमान संगठन काफी अंशों तक गुरु गोविन्दसिंह द्वारा ही किया गया। उन्होंने सिक्खों में पगड़ी बाँधने की प्रथा प्रारम्भ की तथा 'पंच-ककारों' को धारण करना समस्त सिक्खों के लिए अनिवार्य बनाया। ये पाँच ककार हैं-

    (1.) कंघी (बाल सुलझाने के लिए)

    (2.) कच्छ (फुर्ती के लिए)

    (3.) कड़ा (यम, नियम और संयम का प्रतीक)

    (4.) कृपाण (आत्मरक्षा के लिए) तथा

    (5.) केश (जिसे प्रायः समस्त गुरु धारण करते आए थे)।

    गुरु गोविन्दसिंह ने सिक्ख धर्म में मदिरा और तम्बाकू को वर्जित किया। सिक्खों के लिए जो कर्म निषिद्ध हैं उनका उल्लेख 'रहतनामा' मंे मिलता है। रहतनामा में केश-कर्तन को महान् अपराध माना गया है। गुरु गोविन्दसिंह की तैयारियों से औरंगजेब घबरा गया। उसने गुरु की राजधानी आनन्दपुर पर जबरदस्त घेरा डाला किन्तु गुरु हाथ नहीं आए। आनन्दपुर से भागते हुए उनके दो पुत्र जोरावर सिंह और फतेहसिंह, गायब हो गए। किसी ने उनके दोनों पुत्रों को सरहिन्द के शासक वजीरखाँ के हाथों में सौंप दिया।

    वजीर खाँ ने उन बालकों से इस्लाम स्वीकार करने के लिए कहा परन्तु उन बालकों ने भी अपने दादा की भांति, इस घृणित प्रस्ताव को ठुकरा दिया। इस पर वजीर खाँ ने उन्हें जीवित ही दीवार में चुनवा दिया गया। गुरु गोविन्द सिंह ने औरंगजेब की धर्मान्ध नीति के विरुद्ध उसे फारसी भाषा में एक लम्बा पत्र लिखा जिसे 'ज़फ़रनामा' कहा जाता है। इस पत्र में औरंगजेब के शासन-काल में हो रहे अन्याय तथा अत्याचारों का मार्मिक उल्लेख है।

    इस पत्र में नेक कर्म करने और मासूम प्रजा का खून न बहाने की नसीहतें, धर्म एवं ईश्वर की आड़ में मक्कारी और झूठ के लिए चेतावनी तथा योद्धा की तरह युद्ध के मैदान में आकर युद्ध करने की चुनौती दी गई है। औरंगजेब ने एक विशाल सेना गुरु के विरुद्ध भेजी। गुरु परास्त हो गए। औरंगजेब ने सन्धि करने के लिए गुरु को दक्षिण में आमंत्रित किया। गुरु गोविंदसिंह दक्षिण की तरफ रवाना हुए किंतु गुरु द्वारा औरंगजेब से भेंट किए जाने से पहले ही औरंगजेब का निधन हो गया।

    गुरु गोविन्दसिंह ने उत्तराधिकार के युद्ध में औरंगजेब के पुत्र बहादुरशाह के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित की और उसके साथ दक्षिण की तरफ गए परन्तु गोदावरी के किनारे नानदेड़ नामक स्थान पर दो अफगान पठानों ने छुरे से वार करके गुरु को घायल कर दिया। गुरु ने अपनी मृत्यु से पहले ही घोषणा की कि मेरे बाद सिक्ख धर्म में कोई गुरु नहीं होगा तथा 'ग्रंथ साहब' को ही गुरु माना जाएगा।

    बंदा बैरागी के समय में सिक्ख धर्म

    गुरु गोबिंदसिंह जब घायल होकर मृत्यु शैय्या पर लेटे हुए थे तब माधवदास नामक एक वैरागी उनसे भेंट करने आया। उसने स्वयं को गुरु का बन्दा (दास) कहा। गुरु ने उसे बन्दा बहादुर के नाम से पुकारा। गुरु ने बन्दा बहादुर को सिक्खों की सुरक्षा का दायित्व सौंपा तथा अपने पाँच मुख्य अनुयाई तथा कुछ अन्य सिक्ख अनुयाई उसके साथ करके उसे पंजाब जाने का आदेश दिया। बन्दा जब दिल्ली पहुँचा तभी उसे गुरु की मृत्यु का समाचार मिला। उसने गुरु के आदेश को मानकर सिक्खों को नेतृत्व प्रदान किया।

    वह इतिहास में बंदा बैरागी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसने सिक्खों से मुगलों के अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करने का आह्नान किया तथा सोनीपत से मुगल अधिकारियों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष आरम्भ किया और वहाँ के मुगल फौजदार को युद्ध में परास्त किया। उसने शाहबाद, मुस्तफाबाद आदि स्थानों को जीतते हुए सरहिन्द पर आक्रमण किया जहाँ के फौजदार वजीर खाँ ने गुरु के दो पुत्रों को दीवार में जिन्दा चुनवाया था। वजीर खाँ युद्ध में मारा गया। उसकी अपार सम्पत्ति बन्दा के हाथ लगी।

    बन्दा ने सरहिन्द के 28 परगने अपने अधीन कर लिये। बन्दा की इन सफलताओं ने उसे अत्यन्त लोकप्रिय बना दिया। बन्दा का उद्देश्य पंजाब में एक स्वतंत्र सिक्ख राज्य की स्थापना करना था। इसके लिए उसने लौहगढ़ को राजधानी बनाया, गुरु नानक और गुरु गोविन्दसिंह के नाम के सिक्के चलाए और सिक्ख राज्य की एक सील या मुहर भी बनवायी। बन्दा ने सरहिन्द क्षेत्र में मुगल अधिकारियों को हटाकर सिक्ख अधिकारियों को नियुक्त किया। इस प्रकार उसने सबसे पहले सिक्ख राज्य की स्थापना की किंतु बन्दा बहादुर ने स्वयं न तो कोई पदवी धारण की और न कभी दरबार लगाया।

    उसने सभी कार्य गुरु के नाम से किए। मुगल बादशाह पहले तो राजपूत शासकों के विरोध को दबाने में और फिर दक्षिण भारत के राज्यों के विरोध दबाने में व्यस्त रहा। इसका लाभ उठाते हुए बन्दा बहाुदर ने पंजाब से बाहर निकलकर गंगा-यमुना दोआब में सहारपुर और उसके निकट के क्षेत्रों तक आक्रमण किए। बहादुरशाह ने अपने प्रमुख अमीरों को सिक्खों का दमन करने का उत्तरदायित्त्व सौंपा। उसने स्वयं भी पंजाब की तरफ प्रस्थान किया। दिसम्बर 1710 में मुगलों ने बन्दा के केन्द्र लौहगढ़ पर अधिकार कर लिया परन्तु बन्दा भाग निकला।

    इससे पहले कि सिक्ख विद्रोह पूर्ण रूप से कुचल दिया जाता, फरवरी 1712 में बहादुरशाह की मृत्यु हो गई तथा जहांदारशाह बादशाह हुआ। जहांदारशाह ने गुरु गोविन्दसिंह के दत्तक पुत्र अजीतसिंह को मान्यता देकर सिक्खों में फूट का बीज बोया किंतु बंदा बैरागी का मुगलों के विरुद्ध संघर्ष चलता रहा। जहाँदारशाह केवल 10 माह के शासन के बाद अपने भतीजे फर्रूखसीयर द्वारा मार दिया गया। फर्रूखसीयर ने फीरोज खाँ के नेतृत्व में एक सेना बन्दा के विरुद्ध भेजी। बन्दा भागकर पहाड़ों में छिप गया।

    उसकी राजधानी लौहगढ़ पर मुगलों का अधिकार हो गया। बन्दा बहादुर ने साहस नहीं छोड़ा। वह निरन्तर मुगलों से संघर्ष करता रहा। ई.1716 में गुरुदास-नांगल नामक स्थान पर बन्दा बहादुर को मुगल सेना ने घेर लिया। आठ माह तक मुगल सेना से घिरे रहने के बाद विवश होकर बन्दा बहादुर ने आत्म-समर्पण कर दिया। उसे तथा उसके साथियों को दिल्ली ले जाया गया, जहाँ उसे इस्लाम स्वीकार करने को कहा गया। उसकी अस्वीकृति के बाद उसे तथा उसके साथियों का निर्ममता से हत्या की गई।

    बन्दा की मृत्यु के बाद सिक्ख नेतृत्व-विहीन हो गए। जब सिक्खों के सामने न गुरु रहा, न गुरु का बन्दा, तब सिक्खों ने सरबत खालसा और गुरुमत्ता की प्रथाएँ आरम्भ कीं। वर्ष में दो बार- बैशाखी और दीवाली पर, सिक्खों ने विशाल सभाएँ करनी आरम्भ कीं जिन्हें सरबत खालसा कहा जाता था। सरबत खालसा में लिये गए निर्णयों को 'गुरुमत्ता' कहा जाता था। बन्दा बहादुर के पश्चात् भी सिक्खों और मुगलों के बीच संघर्ष चलते रहे।

    सिक्खों द्वारा दल खालसा का गठन

    ई.1737 में नादिरशाह ने दिल्ली पर आक्रमण किया। उसके बाद मुगल सत्ता का बिखराव चरम पर पहुँच गया था। नादिरशाह के आक्रमण के बाद सिक्खों ने स्वयं को 100-100 व्यक्तियों के छोटे दलों में संगठित कर लिया। प्रत्येक दल का एक नेता होता था। दल के सभी सदस्य अपने नेता के आदेश का पालन करते थे। ई.1748 में सभी दलों ने मिलकर दल खालसा का गठन किया। दल खालसा में सम्मिलित सभी दलों को पुनः 11 जत्थों में विभाजित किया, जो बाद में 'मिसलों' के नाम से विख्यात हुए।

    इन मिसलों के पराक्रमी और योग्य सिक्ख नेताओं ने पंजाब के भिन्न-भिन्न भागों में अपने-अपने राज्य स्थापित कर लिये। धीरे-धीरे सम्पूर्ण पंजाब में 12 छोटे-छोटे राज्य स्थापित हो गए। आगे चलकर महाराजा रणजीतसिंह (ई.1801-39) ने इन मिसलों को जीतकर पंजाब में एक शक्तिशाली राज्य स्थापित किया। इस प्रकार पंजाब मुगल सल्तनत से बाहर हो गया।

    सिक्ख धर्म पर हिन्दू-धर्म का प्रभाव

    सिक्ख धर्म भले ही आध्यात्मिक रूप से एवं बाह्य रूप से स्वयं को हिन्दू-धर्म से अलग दिखाता है किंतु व्यावहारिक रूप में सिक्ख धर्म पर हिन्दू-धर्म का गहरा प्रभाव है। गुरु ग्रंथ साहब में कई ऐसे पद हैं जिनमें हिन्दू देवी-देवताओं के नाम हैं। भाई गुरदास ने 'आदि ग्रंथ साहब' का संकलन किया था जिसे आगे चलकर 'गुरुग्रंथ साहब' कहा गया। उन्हीं भाई गुरदास द्वारा रचित 'भाई गुरदास की वारों' में मूर्ति-पूजा तथा कर्म-सिद्धांत पर आधारित कई रचनाएं हैं जो 'गुरमत' के विरुद्ध हैं।

    फिर भी गुरु अर्जुनदेव ने उनकी रचना को 'गुरबानी की कुंजी' कहकर सम्मान दिया। राष्ट्रकवि रामधारीसिंह दिनकर के अनुसार सिक्ख-धर्म और हिन्दुत्व, ये दो नहीं, एक ही धर्म हैं। हिन्दुत्व का स्वभाव है कि उस पर जैसी विपत्ति आती है तब वह वैसा ही रूप अपने भीतर से प्रकट करता है। इस्लामी हमले से बचने के लिए अथवा उनका उत्तर देने के लिए हिन्दुत्व ने इस्लाम के अखाड़े में अपना जो रूप प्रकट किया, वही सिक्ख या खालसा-धर्म है। सिक्ख गुरुओं ने हिन्दू-धर्म की रक्षा के लिए अपनी गर्दने कटवाईं। उन्होंने अपना जो सैनिक संगठन खड़ा किया, उसका लक्ष्य भी हिन्दू-धर्म को जीवित एवं जागरूक रखना था।

    यद्यपि सिक्ख गुरुओं ने निराकार ईश्वर की भक्ति पर जोर दिया किन्तु सिक्खों ने कभी भी सगुण-साकार उपासना का विरोध नहीं किया। गोविन्दसिंह ने 'किसुन-विसुन' के अस्तित्त्व से इन्कार किया किन्तु 'चण्डी' की स्तुति भी की। रामकथा पर भी उन्होंने सुन्दर खण्डकाव्य लिखा। व्यवाहारिक रूप में सिक्ख गुरु, अवतारों तथा हिन्दू देवी-देवताआंे में श्रद्धा रखते थे। सिक्ख ग्रन्थों में लिखा है-


    रामकथा जुग जुग अटल, जो कोई गावे नेत।

    स्वर्गवास रघुवर कियो, सगली पुरी समेत।

    सैद्धांतिक रूप में भले ही सिक्ख धर्म जांति-पांति में विश्वास नहीं करता किंतु व्यववारिक रूप में सिक्ख समाज ने हिन्दू समाज की बहुत सी कुरीतियाँ स्वीकार कर लीं जिनमें जाति-पांति भी है। सिक्खों में भी जटसिक्ख, माली सिक्ख, कुम्हार सिक्ख, चमार सिक्ख सहित कई जातियाँ है तथा छुआछूत भी मौजूद है। विवाह सम्बन्धों पर वैसे ही नियन्त्रण हैं, जैसे हिन्दू समाज में हैं। जटसिक्ख आदि जातियां बन गई हैं। बहुत से सिक्ख गंगाजी नहाते हैं तथा हिन्दू-मंदिरों में जाते हैं। बहुत से सिक्ख देवी के भक्त हैं। इस प्रकार सिक्ख सम्प्रदाय, हिन्दू-धर्म के काफी निकट बना हुआ है।

    सिक्ख मत की हिन्दू-धर्म, सूफी मत और इस्लाम से तुलना

    एक पाश्चात्य लेखक ने लिखा है- 'सिक्ख धर्म सनातन धर्म की अरबी टीका और आर्य समाज इस्लाम का संस्कृत में अनुवाद है।' यदि इस टिप्पणी पर विचार किया जाए तो स्पष्ट हो जाएगा कि सिक्ख धर्म और कुछ नहीं हिन्दू-धर्म का ही बदला हुआ रूप है। गुरु नानक की शिक्षाओं से स्पष्ट होता है कि वे वेदान्त दर्शन से अत्यंत प्रभावित थे। उन पर सूफियों की धर्म-साधना का भी प्रभाव पड़ा था किन्तु इस्लामी दर्शन का नहीं। हजरत मुहम्म्द तथा गुरु नानक दोनों ही एकेश्वरवादी थे किन्तु इन दोनों के ईश्वर के स्वरूप में बहुत अंतर था।

    मुहम्मद के अनुसार अल्लाह सातवें आसमान पर रहता है एवं मनुष्यों के सुख-दुःख तथा भक्ति-अभक्ति से उसका सम्बन्ध है किन्तु गुरु नानक का 'एक-ओंकार', 'निराकार पुरुष' है। सिक्ख धर्म के दर्शन और इस्लाम के दर्शन में, विशेषतः ईश्वर के स्वरूप को लेकर वही भिन्नता है जो वेदान्त और कुरान के बीच मिलती है। इस प्रकार सिक्ख धर्म और इस्लाम की नींव ही बिल्कुल अलग है। इस्लाम की अपेक्षा वह वेदानत के अधिक निकट है। गुरु नानक का सृष्टि विकास का सिद्धान्त, वेदान्त का सिद्धान्त है। वे कर्म को मानते थे, पुनर्जन्म को मानते थे, निर्वाण और माया को मानते थे तथा ब्रह्मा, विष्णु और महेश के त्रिदेवत्व में विश्वास करते थे।

    उनका गुरु-परम्परा में, जो विश्वास था, वह हिन्दू-धर्म तथा सूफी मत दोनों से प्रेरित है। इस्लाम में वैराग्य का कोई स्थान नहीं है जबकि हिन्दू-धर्म एवं सूफी मत दोनों में वैराग्य की बड़ी महिमा है। इस्लाम में नाम जप, ध्यान, समाधि और योग बिल्कुल अलग तरह का है जबकि सिक्ख धर्म का नाम जप, ध्यान, समाधि और योग बिल्कुल हिन्दुओं जैसा है। गुरु नानक की सबसे बड़ी शिक्षा यह थी कि परमात्मा विश्व के कण-कण में व्याप्त है। इसलिए निखिल सृष्टि को ब्रह्ममय समझकर उसे प्रणाम करो।

    हिन्दू-धर्म भी इस सिद्धांत पर सर्वाधिक विश्वास करता है जबकि इस्लाम में केवल अल्लाह के अलावा और किसी की इबादत स्वीकार्य नहीं है। गुरु नानक स्वयं को न हिन्दू मानते थे, न मुसलमान। वे जिसे 'सिक्ख धर्म' कहते थे, वह उनकी दृष्टि में 'सुधरा हुआ हिन्दू' और 'सुधरा हुआ मुसलमान' दोनों हो सकते थे। आरम्भ में उनके पंथ में बहुत-से मुसलमान भी दीक्षित हुए। कालान्तर में सिक्खों का मुसलमानों से राजनीतिक वैर हो गया जिसके कारण मुसलमानों ने सिक्ख बनना छोड़ दिया। 'रहतनामा' में गुरु की स्पष्ट आज्ञा है कि खालसा-धर्म (अर्थात् शुद्ध धर्म) हिन्दू और मुस्लिम, दोनों धर्मों से अलग हैं।

    सिक्ख धर्म के प्रगतिशील तत्त्व

    सिक्ख धर्म आरम्भ से ही प्रगतिशील रहा। जाति-पांति, मूर्ति-पूजा और तीर्थ के साथ वह सती-प्रथा, शराब और तम्बाकू को भी निषिद्ध मानता है। इस धर्म ने पर्दा-प्रथा का घोर विरोध किया। कहा जाता है कि सिक्खों के तीसरे गुरु अमरदास से एक रानी मिलने आई किन्तु वह पर्दे में थी। अतः गुरु ने उससे मिलने से इन्कार कर दिया। सिक्ख धर्म के गुरु, वैराग्य को उच्च-जीवन के लिए आवश्यक मानते थे किंतु उसे वे गृहस्थों पर जबरदस्ती लादने के विरुद्ध थे। खान-पान में खालसा-धर्म में वैष्णवों जैसी कट्टरता नहीं है।

    एक हिन्दू पंडित प्रतापमल का पुत्र जब मुसलान बनने लगा, तब उससे कहा गया कि यदि तुम खान-पान की स्वतंत्रता के लिए हिन्दू-धर्म को छोड़ना चाहते हो तो अच्छा है कि मुसलमान न होकर सिक्ख हो जाओ। गुरुओं ने सभी धर्मों और जातियों के लोगों को सिक्ख धर्म में दीक्षित किया। उन्होंने आने वाली शताब्दियों के लिए नए मनुष्य का सृजन किया जो जातियों एवं धर्मों में विभक्त न होकर धर्म, मानव एवं देश के संरक्षण के लिए तत्त्पर रहने वाला था। सबको साथ लेकर चलने की सामाजिक संचरना, सिक्ख धर्म की सबसे बड़ी विशेषता है।

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  • अध्याय - 16 महाराणा प्रताप संग्रहालय हल्दीघाटी

     02.06.2020
    अध्याय - 16 महाराणा प्रताप संग्रहालय हल्दीघाटी

    अध्याय - 16 महाराणा प्रताप संग्रहालय हल्दीघाटी


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    राजसमन्द जिले में स्थित हल्दीघाटी में बने चेतक स्मारक से कुछ ही दूरी पर महाराणा प्रताप संग्रहालय स्थित है। इसे महाराणा प्रताप (ई.1572-97) कालीन परिवेश एवं शिल्प में बनाने का प्रयास किया गया है। दर्शकों के समक्ष उस काल की स्मृतियों को पुनजीर्वित करने के उद्देश्य से इतिहास को उसके मूल स्वरूप में प्रदर्शित करने का प्रयास किया गया है। यहाँ प्रतिदिन बड़ी संख्या में दर्शक आते हैं।

    संग्रहालय में आने वाले दर्शकों के लिए थोड़े-थोड़े अंतराल में प्रकाश एवं ध्वनि शो दिखाया जाता है जिसमें महाराणा प्रताप के जीवन वृत्त पर आधारित एक लघु फिल्म भी दिखाई जाती है, साथ ही विभिन्न शस्त्रों, छायाचित्रों, पुस्तकों आदि की प्रदर्शनी भी दिखाई जाती है। तत्पश्चात बड़े से एक मानचित्र पर युद्धस्थल एवं युद्ध की प्रमुख घटनाओं के स्थलों को दिखाया जाता है।

    आगे महाराणा प्रताप की जीवनी से सम्बन्धित घटनाओं का विवरण प्रदर्शित किया गया है। इस विवरण में पन्ना धाय के बलिदान की कहानी, महाराणा प्रताप का साथियों सहित युद्ध की तैयारी हेतु विचार-विमर्श, राणा प्रताप का जंगल में निवास, घास की रोटी खाते हुए महाराणा प्रताप और हल्दीघाटी युद्ध के समय एक पांव से घायल चेतक का बलिदान आदि का प्रदर्शन किया गया है।

    एक प्रतिमा में महाराणा के घोड़े में मानसिंह के हाथी के मस्तक पर पैर रखे हुए हैं तथा महाराणा प्रताप मानसिंह पर वार करने की तैयारी में है। हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप का साथ देने वाले भील राजा, हकिम खां सूरी, राणा पुंजा, दानवीर भामाशाह आदि के चित्र भी प्रदर्शित किए गए हैं। अन्त में हल्दीघाटी में गुलाब की खेती, गुलाबजल कैसे बनता है, आदि दिखाया गया है।

    संग्रहालय के बाहर छाोटा सा बाजार है जहाँ हस्तशिल्प की वस्तुएं, पुस्तकें, चाय नाश्ता, गन्ने का रस, पारंपरिक पोशाकों में फोटोग्राफी, ऊँट तथा घोड़े की सवारी एवं नौकायन आदि की सुविधाएं उपलब्ध हैं।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-52

     02.06.2020
     राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-52

    पर्यावरण के उन्नायक एवं संस्कृति के संवाहक धार्मिक मेले


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    राजस्थान में मेलों की अत्यंत प्राचीन परंपरा है। इसलिये राजस्थान में आयोजित होने वाले मेलों की संख्या सैंकड़ों में है। इनमें से अधिकतर मेले धार्मिक विश्वासों के कारण आरंभ हुए किंतु बाद में वे व्यावसायिक एवं सांस्कृतिक उन्नयन का माध्यम बन गये। राजस्थान के प्रमुख मेलों में अजमेर जिले का पुष्कर मेला, सवाई माधोपुर जिले का श्री महावीरजी मेला, करौली जिला मुख्यालय का कैला मैया मेला, जैसलमेर जिले का रामदेवजी का मेला, सवाईमाधोपुर जिले के रणथंभौर में आयोजित होने वाला गणेशमेला, डूंगरपुर जिले के बेणेश्वर में आयोजित होने वाला आदिवासियों का मेला हैं। राज्य के बड़े पशु मेले नागौर जिले के मेड़ता, परबतसर तथा नागौर में, अजमेर जिले के पुष्कर में, जालोर जिले के रानीवाड़ा में तथा बाड़मेर जिले के तिलवाड़ा में आयोजित होते हैं।

    श्रीमहावीरजी मेला : सवाईमाधोपुर की हिण्डौन तहसील में चैत्र शुक्ला त्रयोदशी से वैशाख कृष्णा प्रतिपदा तक श्रीमहावीरजी मंदिर में प्रतिवर्ष यह मेला भरता है जिसमें गूजर, मीणा, अहीर तथा चर्मकार आदि जातियों के लोग बड़ी संख्या में भाग लेते हैं। यह राजस्थान के प्रमुख मेलों में गिना जाता है। इस मंदिर का चढ़ावा चर्मकार जाति के परिवारों को जाता है। मेले में निकाली जाने वाली रथयात्रा में सबसे पहले चर्मकारों से हाथ लगवाये जाने की परंपरा है।

    कैला देवी मेला : करौली जिले में जिला मुख्यालय के निकट ही हनुमानजी की माता अंजना देवी का मंदिर है जिसे लोक संस्कृति में कैला मैया कहा जाता है। यहाँ हनुमानजी को लांगुरिया कहा जाता है। यहाँ प्रतिवर्ष चैत्रमास में मेला भरता है। इसे लक्खी मेला भी कहते हैं। इस मेले में पशु विक्रय बड़े पैमाने पर होता है।

    गौतमेश्वर मेला : सिरोही जिले में पोसालिया नदी के तट पर गौतमेश्वर में प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ला एकादश से पूर्णिमा तक यह मेला लगता है। यह मीणा समाज का मेला है जिसमें मीणा समाज अपने कुल देवता गौतमगुआ की पूजा करते हैं। माना जाता है कि गंगा मैया ने गौतमगुआ मीणा को दर्शन दिये। मीणा समाज मृतकों की अस्थियां यहाँ विसर्जित करते हैं। राजस्थान, गुजरात तथा मध्यप्रदेश से भी मीणा समाज के लोग इस मेले में भाग लेने के लिये आते हैं। मान्यता है कि इस स्थान पर एक कुण्ड जो सदैव रिक्त रहता है किंतु जब मीणा समाज का पुरोहित यहाँ आकर पूजा करता है तो इस कुण्ड में स्वतः ही जल आ जाता है तथा मेला समाप्त होने पर स्वतः ही समाप्त हो जाता है। यहाँ पर बहुत से लोग रंग-बिरंगी पोषाक पहन कर नाचते गाते हैं। इसी नाम से एक मेला प्रतापगढ़ तहसील के अरणोद गाँव में भरता है। इसे आत्मशुद्धि का तीर्थ माना जाता है।

    घोटिया आंबा मेला : यह बांसवाड़ा जिले का सबसे बड़ा मेला है। यह प्रतिवर्ष चैत्र माह की अमावस्या को भरता है जिसमें राजस्थान, गुजरात तथा मध्यप्रदेश आदि प्रांतों से आदिवासी आते हैं। मान्यता है कि पाण्डव अपने अज्ञात वास के समय कुछ दिन यहाँ भी रहे थे। उन्होंने भगवान कृष्ण की सहायता से 88 हजार ऋषियों को केले के पत्ते पर चावल तथा आमरस का भोजन करवाया। यहाँ आज भी पुष्प विहीन केलों के वृक्ष तथा चावलों के पौधे पाये जाते हैं।

    रानी सती का मेला : झुंझुनूं में रानी सती के प्रसिद्ध मंदिर में प्रतिवर्ष भाद्रपद मास में मेला भरता है। 1988 के बाद से सती निषेध कानून के तहत इस पर रोक लगा दी गयी है।

    रामदेवजी का मेला : जैसलमेर जिले के रामदेवरा (रूणेचा) गाँव में प्रतिर्ष भाद्रपद माह में लोकदेवता रामदेवजी का मेला भरता है। इसमें राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश तथा उत्तर प्रदेश आदि राज्यों से श्रद्धालु बोलना के लिये आते हैं। अब इस मेले में भी पशु विक्रय बड़ी संख्या में होता है।

    रणथंभौर का गणेश मेला : सवाई माधोपुर जिले में रणथंभौर दुर्ग में गणेशजी के सुविख्यात मंदिर में प्रतिवर्ष गणेश चतुर्थी को विशाल मेला भरता है। इस मेले में देश-विदेश से लाखों लोग आते हैं।

    खाटू श्यामजी का मेला : सीकर जिले के खाटू श्यामजी नामक गाँव में प्रतिवर्ष फाल्गुन मास की एकादशी को मेले का आयोजन होता है। इसमें राज्य के बाहर से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं।

    केसरिया नाथ का मेला : उदयपुर जिले के ऋषभदेव में प्रति वर्ष चैत्र वदी अष्टमी को विशाल मेले का आयोजन होता है जिसमें हजारों आदिवासी भाग लेते हैं।

    गोगामेड़ी का मेला : हनुमागढ़ जिले में गोगामेड़ी नामक स्थान पर प्रतिवर्ष भाद्रपद माह में विशाल मेले का आयोजन होता है जिसमें राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश तथा पंजाब राज्यों के श्रद्धालु आते हैं।

    चारभुजा का मेला : राजसमंद जिले के गढ़बोर नामक स्थान पर भगवान कृष्ण का विख्यात मंदिर है जिसे श्री चारभुजा नाथ मंदिर भी कहते हैं। यहाँ प्रतिवर्ष भाद्रपद मास में मेला भरता है।

    जीणमाता मेला : सीकर जिले के रेवासा गाँव में ग्यारहवीं सदी का जीणमाता मंदिर स्थित है जहाँ जीणमाता की अष्ट भुजा मूर्ति स्थापित है। यहाँ प्रतिवर्ष चैत्र एवं आश्विन माह की नवरात्रियों में मेले भरते हैं। इस अवसर पर श्रद्धालु लोग अपने बच्चों का मुण्डन करवाने, जात देने तथा मनौती मानने के लिये आते हैं।

    जंभेश्वरजी का मेला : बीकानेर जिले के नोखा कस्बे में फाल्गुन माह व आसोज माह में विश्नोईयों के धर्मगुरु जंभेश्वरजी (जांभोजी) के मेले लगते हैं। इस मेले में विश्नोई संप्रदाय के लोग भाग लेते हैं।

    करणीमाता मेला : बीकानेर जिले के देशनोक कस्बे में प्रतिवर्ष चैत्र माह के नवरात्रों में करणीमाता का मेला भरता है।

    कपिल मुनि का मेला : बीकानेर जिले के कोलायत तीर्थ में प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा को सांख्य दर्शन के प्रणेता कपिल मुनि का मेला भरता है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु कोलायत झील में स्नान करते हैं।

    बेणेश्वर मेला : डूंगरपुर जिले के बेणेश्वर में प्रतिवर्ष माघ मास में आदिवासियों का सबसे बड़ा मेला लगता है। इसमें लाखों आदिवासी परंपरागत रूप से भाग लेते हैं। इस अवसर पर बड़ी संख्या में वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये जाते हैं।

    सील डूंगरी का मेला : जयपुर के चाकसू के निकट चैत्र माह में सील डूंगरी का मेला शीतला सप्तमी के दिन भरता है। इस दिन शीतला माता का पूजन किया जाता है। इस मंदिर का चढ़ावा कुम्हारों को जाता है।

    भृतहरि का मेला : अलवर में सरिस्का अभयारण्य के निकट योगीराज भृतहरि का स्थान है। यहाँ वर्ष में दो बार लक्खी मेला भरता है। वर्षा ऋतु में भाद्रपद माह में भरने वाले मेले में राजस्थान के साथ-साथ कई पड़ौसी राज्यों के श्रद्धालु भी भाग लेते हैं।

    डिग्गी का मेला : जयपुर से लगभग 75 कि.मी. दूर स्थित डिग्गी नामक स्थान पर कल्याणजी का मेला प्रतिवर्ष श्रावण माह की अमावस्या को भरता है। इस मेले में भी राजस्थान के साथ-साथ कई पड़ौसी राज्यों के श्रद्धालु भाग लेते हैं।

    तेजाजी का मेला : नागौर जिले के परबतसर नामक स्थान पर भाद्रपद कृष्णा दशम् से भाद्रपद शुक्ला एकादशम् तक तेजाजी का मेला भरता है। इस मेले में लोक देवता तेजाजी के गीत गाये जाते हैं तथा विभिन्न नस्लों के पशुओं का विक्रय होता है।

    शिवाड़ का मेला : सवाई माधोपुर में जिले में ईसरदा से तीन कि.मी. दूर स्थित शिवाड़ मंदिर में स्थापित शिवलिंग को बारहवें ज्योर्तिलिंग की मान्यता प्राप्त है। इन्हें घुश्मेश्वर कहा जाता है। यहाँ स्थित सरोवर के जल को गंगाजल के समान पवित्र माना जाता है। यहाँ भी प्रतिवर्ष मेला भरता है।

    माता कुण्डलिनी का मेला : चित्तौड़गढ़ जिले के राशमी में कुण्डलिनी माता के मंदिर में कार्तिक माह में मेला भरता है। जिसमें हजारों लोग भाग लेते हैं।

    पार्श्वनाथ मेला : नागौर जिले के मेड़ता रोड रेलवे स्टेशन के निकट फलौदी गाँव में प्रति वर्ष पार्श्वनाथ का मेला भरता है। यह मेला अत्यंत प्राचीन है तथा पश्चिमी राजस्थान एवं मध्य राजस्थान से बड़ी संख्या में जैन श्रद्धालु एवं हिन्दू मतावम्बी इस मेले में सम्मिलित होते हैं।

    मरु महोत्सव : जैसलमेर जिला मुख्यालय पर राजस्थान पर्यटन विभाग की ओर से प्रतिवर्ष मरुमहोत्सव का आयोजन होता है। इसमें विदेशी पर्यटक भी बड़ी संख्या में भाग लेते हैं।

    बादशाह का मेला : अजमेर जिले के ब्यावर कस्बे में प्रतिवर्ष धुलण्डी के दूसरे दिन बादशाह का मेला भरता है। इस मेले में बादशाह की सवारी निकाली जाती है। (प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालय अध्यापक प्रतियोगी परीक्षा 2004, बादशाह मेला कहाँ भरता है?)

    डोलमेला : भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को बारां के डोल तालाब के किनारे डोलमेला आयोजित होता है। माना जाता है कि डोल तालाब 12 तालाबों को पाटकर बनाया गया।

    ख्वाजा का उर्स : अजमेर स्थित ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर सालाना उर्स का आयोजन होता है जिसमें देश-विदेश के मुस्लिम धर्मावलंबी भाग लेते हैं जिन्हें जायरीन कहा जाता है। इस उर्स का सबसे बड़ा आकर्षण कव्वालों द्वारा अपनी प्रस्तुतियां देना है।

    गलियाकोट का उर्स : डूंगरपुर जिले के गलियाकोट नामक स्थान पर दाऊदी बोहरों द्वारा सय्यद फखरूद्दीन की मजार पर सालाना उर्स आयोजित किया जाता है।

    सूफी तारेकीन का उर्स : नागौर जिला मुख्यालय पर जामादि अव्वल को सालाना उर्स का आयोजन होता है।

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  • अध्याय - 23 प्राचीन भारत में शिक्षा का स्वरूप एवं प्रमुख शिक्षा केन्द्र

     02.06.2020
    अध्याय - 23 प्राचीन भारत में शिक्षा का स्वरूप एवं प्रमुख शिक्षा केन्द्र

    प्राचीन भारत में शिक्षा का स्वरूप एवं प्रमुख शिक्षा केन्द्र


    एक बार विद्या, ब्राह्मण से बोली- मेरी रक्षा करो। मैं तुम्हारी निधि हूँ। दोष खोजने वाले, टेढ़े स्वभाव वाले, असंयमी, ईर्ष्यालु को मुझे मत सौंपो। कुछ ऐसा करो जिससे मैं वीर्यवती बनूँ। मुझे बुद्धिमान मनुष्यों को प्रदान करो, जिससे मैं तेजस्वनी बनूँ। - निरुक्त-2, 2.


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    ऋग्वैदिक आर्यों ने भारत में शिक्षा की नींव डाली। उन्होंने वैदिक ऋचाओं के माध्यम से ज्ञान को आगे बढ़ाया। आर्यों ने वैदिक शिक्षा का काम मौखिक परम्परा से आगे बढ़ाया। जब समाज के कुलीन लोगों ने शिक्षा को मानव जीवन का महत्वपूर्ण अंग समझना आरम्भ किया तो बच्चों के लिए शिक्षा का प्रबंध किया गया। ऋषियों ने राज-परिवारों एवं श्रेष्ठि-परिवारों को समझाया कि वैभव-युक्त प्रासादों में जीवन व्यतीत करने वाले बालकों को जीवन की सच्चाईयों एवं कठोरताओं का वास्तविक ज्ञान नहीं हो सकता, न ही उनमें परिश्रम के प्रति सम्मान उत्पन्न हो सकता है। इसलिए उन्हें राज-प्रासादों एवं श्रेष्ठि-प्रासादों से दूर जंगलों में स्थित ऋषि-आश्रमों में भेजा जाता था जो आगे चलकर गुरुकुल कहलाए।


    वैदिक भारत में शिक्षा व्यवस्था

    शिक्षा का उद्देश्य

    प्राचीन भारत में शिक्षा प्रणाली का आरम्भ बालक के सम्पूर्ण विकास एवं आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हुआ था, न कि रोजगार प्राप्ति के लिए। इस कारण प्राचीन भारत में शिक्षा का स्वरूप व्यावसायिक नहीं था। इस काल में शिक्षा का उद्देश्य परम तत्त्व की प्राप्ति अर्थात् सत्य की खोज करना था। इस कारण भारतीय शिक्षा का मूल आधार आस्था, विश्वास, विनय एवं अभ्यास पर टिका हुआ था। शिक्षा का माध्यम देवभाषा संस्कृत थी जिसमें सम्पूर्ण धार्मिक एवं लौकिक ज्ञान उपलब्ध कराया जाता था।

    ब्राह्मण कन्याएं अपने पिता के आश्रय में ज्ञान प्राप्त करती थीं। उन्हें भी हवन एवं अनुष्ठान आदि करना सिखाया जाता था। राजपुत्रियां राजप्रासादों में शिक्षा प्राप्त करती थीं तथा उन्हें राजकुमारों के समान घुड़सवारी, रथ संचालन, धनुर्विद्या और तलवार चलाना सिखाया जाता था। बड़े श्रेष्ठियों की पुत्रियां घर पर रहकर विभिन्न कलाओं का ज्ञान प्राप्त करती थीं। उन्हें नारी जीवन को सुखमय बनाने का ज्ञान दिया जाता था।

    गुरु-कुल

    एक स्वाभाविक प्रक्रिया के तहत समाज की शिक्षा का दायित्व ऋषि-मुनियों ने अपने ऊपर ले लिया था, इस कारण राज्य की ओर से बालकों की शिक्षा के लिए किसी प्रकार की संस्थाओं का प्रबंध नहीं किया जाता था। शिक्षा पूर्णतः निःशुल्क एवं स्वतंत्र थी। राजा भी गुरुकुल की व्यवस्था में हस्तक्षेप नहीं करता था। कुछ राजाओं, सामंतों, श्रेष्ठियों एवं जनसामान्य द्वारा जंगलों में स्थित गुरुकुलों को गौ, अन्न, वस्त्र आदि संसाधन उपलब्ध कराए जाते थे ताकि गुरुकुलों में अध्ययनरत बालकों के भोजन एवं वस्त्र आदि का प्रबंध ऋषियों अथवा ऋषि-पत्नियों को नहीं करना पड़े।

    गुरु-कुल का जीवन

    ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य बालक उपनयन संस्कार के पश्चात् सामान्यतः 12 से 16 वर्ष तक आचार्य-कुल में निवास करते थे और वहाँ ब्रह्मचर्यपूर्वक रहते हुए शिक्षा प्राप्त करते थे। आचार्य-कुल में रहते हुए वे तप एवं साधना का जीवन बिताते थे और विद्याध्ययन में तत्त्पर रहते थे। लिखने के साधनों का अभाव होने के कारण शिक्षा मौखिक रूप से दी जाती थी जिसे विद्यार्थी कण्ठस्थ कर लेते थे। गुरुकुल प्रायः वनों में स्थित होते थे जहाँ ईंधन, कन्द, मूल, फल, पेड़ों की छाल आदि सुलभ होते थे।

    ब्रह्मचारी इनका भी संग्रहण करते थे। आचार्य-कुलों में गौ आदि पशु बड़ी संख्या में पाले जाते थे, जिनका पालन ब्रह्मचारियों अर्थात् विद्यार्थियों द्वारा किया जाता था। आचार्य-कुल की दुग्ध-घी सम्बन्धी आवश्यकता इन्हीं पशुओं से पूरी होती थी। आचार्य-कुलों में ब्रह्मचारियों को पढ़ाने वाले शिक्षकों की अलग-अलग श्रेणी होती थी। गुरुकुल में सर्वोच्च स्थिति आचार्य की होती थी। उस के अनुशासन में गुरुकुल की समस्त व्यवस्था चलती थी। विद्यार्थी भिक्षाटन हेतु प्रतिदिन नगर में जाते थे।

    सत्यकाम जाबाल शिक्षा प्राप्ति के लिए आचार्य हारिद्रुमत गौतम के कुल में अंतेवासी बनकर रहा। आचार्य ने उसका उपनयन संस्कार किया तथा उसे चार सौ दुर्बल गाएं देकर कहा कि वह इन गौओं का अनुसरण करे तथा तब तक इनकी संख्या एक सहस्र न हो जाए, तब तक आचार्य-कुल में मत लौटना। सत्यकाम जाबाल ने गुरु के आदेश का अक्षरशः पालन किया। जब सत्यकाम जाबाल अपनी शिक्षा पूरी करके स्वयं आचार्य बना तब उसके कुल में उपकोसल कामलायन ने शिक्षार्थी के रूप में 12 वर्ष ब्रह्मचर्यपूर्वक जीवन व्यतीत किया था। इस अवधि में उसने निरंतर अपने आचार्य की अग्नियों की परिचर्या सम्पन्न की थी। आचार्य-कुल की अग्निचर्या धार्मिक कृत्य मानी जाती थी।


    उत्तरवैदिक-काल में शिक्षा

    उत्तरवैदिक-काल में शिक्षा के विषय

    उत्तरवैदिक-काल में गुरुकुलों को आचार्य-कुल कहा जाने लगा। छान्दोग्य उपनिषद् में उन विषयों की जानकारी है जिनका अध्ययन-अध्यापन उत्तरवैदिक आचार्य-कुलों में होता था। उस काल में विद्यार्थी को ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, वेदांग, उपनिषद, कर्मकाण्ड, आयुर्वेद, धनुर्वेद, शिल्पवेद, योग, व्याकरण, पितृविद्या, राशिविद्या (गणित), देवविद्या, निधिशास्त्र, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, ब्रह्मविद्या, भूतविद्या, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविद्या (ज्योतिष), सर्पविद्या, देवजन विद्या और पुराण आदि का अध्ययन करवाया जाता था। वात्स्यायन ने 64 विद्याओं का उल्लेख किया है। सनत्कुमार को अनेक विद्याओं का ज्ञान था।

    बौद्धकाल में भी अनेक विषयों की शिक्षा दी जाती थी। इनमें वेद, वैदिक साहित्य, ब्राह्मण, संहिता, उपनिषद्, अर्थशास्त्र, शिल्प, वार्ता, दर्शन धर्म आदि प्रमुख थे। मौर्यकालीन लेखक कौटिल्य ने आन्वीक्षकी (तर्क और दशर््न), त्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और उनके ब्राह्मणादि), वार्ता (कृषि, पशु-पालन, चारा-भूमि, वाणिज्य-व्यापार) और दंडनीति (राजशास्त्र और शासन) का उल्लेख किया है। गुप्तकालीन कवि कालीदास ने 14 विद्याओं का उल्लेख किया है जिनमें सांगोपांग वेद (चारों वेद एवं छः वेदांग), मीमांसा, न्याय, पुराण और धर्मशास्त्र का उल्लेख किया है।

    वेदांगों में छंद (पिंगलादि), मन्त्र, निरुक्त (शब्दों के अर्थ), ज्योतिष (गणित और फलित), व्याकरण और शिक्षा (उच्चारण) सम्मिलित थे। उनके साथ उपवेदों (धुनर्वेद, आयुर्वेद, गंधर्ववेद) का अध्ययन किया जाता था। पुराण, इतिहास एवं महाकाव्यों का अध्ययन किया जाता था। वेदों के अध्ययन के आधार पर ब्राह्मण द्विवेदी, त्रिवेदी, चतुर्वेदी, सामवेदी आदि कहलाते थे।

    उत्तरवैदिक-काल में शिक्षक

    उत्तवैदिक-काल में शिक्षकों की कई श्रेणियां बन गई थीं। मनुस्मृति के अनुसार जो द्विज, शिष्य का उपनयन संस्कार करके उसे वेद पढ़ाए और कल्प एवं वेदांग की उनके रहस्यों सहित शिक्षा दे, उसे 'आचार्य' कहते हैं। सम्पूर्ण आचार्य-कुल आचार्य के अधीन होता था, और वही वेद तथा कल्प का अध्यापन करता था। आचार्य के अधीन जो शिक्षक अध्यापन कार्य करते थे, वे 'उपाध्याय' कहलाते थे।

    मनु के अनुसार जो द्विज वेद के एक देश (मंत्र तथा ब्राह्मण भाग) तथा वेदांगों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छंदशास्त्र) का अध्यापन करे और उसके लिए वृत्ति (वेतन अथवा पारिश्रमिक) ग्रहण करे, वह 'उपाध्याय' कहलाता है। अर्थात् आचार्य-कुलों में कुछ शिक्षकों को नियमित वेतन पर भी नियुक्त किया जाता था। प्रोक्त (शाखाग्रंथ, ब्राह्मण, और श्रौतसूत्र का विद्वान) साहित्य की शिक्षा देने वाला 'प्रवक्ता' अथवा 'आख्याता' कहलता था।

    वैज्ञानिक और लौकिक विषयों का ज्ञान प्रदान करने वाला 'अध्यापक' कहलाता था। 'श्रोत्रिय' वह अध्यापक था जो वेद की शाखाओं को कण्ठस्थ करके छात्रों को दीक्षा देता था। जो गृहस्थ विद्वान शिक्षा प्रदान करता था, उसे 'गुरु' कहते थे। मनु के अनुसार जो ब्राह्मण शास्त्रानुसार गर्भाधान आदि संस्कारों को करता है, और अन्नादि के द्वारा अपने परिवार का पालन करतुा है, वह 'गुरु' है। आचार्यकुलों में 'ऋत्विक' भी होते थे जिनका कार्य विविध यज्ञों का अनुष्ठान कराना होता था।

    जो ब्राह्मण वृत होकर (वरण-संकल्पपूर्वक पादपूजनादि कराकर) अग्न्याधान (आहवनीय आदि अग्नि को उत्पन्न करने का कर्म), पाकयज्ञ (अष्टकादि) और अग्निष्टोम आदि यज्ञ करता था, वह 'ऋत्विक' था। जो अध्यापक भ्रमण और यायावर का जीवन व्यतीत करते थे अर्थात् देश-देशांतर में घूम-घूमकर शिक्षा देते थे, उन्हें 'चरक' कहा जाता था।

    उत्तरवैदिक-काल में छात्र

    उत्तरवैदिक-काल में दो प्रकार के विद्यार्थियों की व्यवस्था थी। एक तो वे विद्यार्थी थे जो कुछ वर्षों तक गुरु के आश्रम में रहकर शिक्षा ग्रहण करते थे तथा शिक्षा समाप्ति के बाद गुरु को कुछ प्रदान करके अपने घर लौट जाते थे। उन्हें 'उपकुर्वाण' कहा जाता था। दूसरे प्रकार के शिष्य आजीवन आचार्यकुल में रहते थे। उन्हें नैष्ठिक कहा जाता था। ये कभी विवाह नहीं करते थे, न सन्यास ग्रहण करते थे। वे अतन्द्रित होकर शरीर का त्याग करते थे और फिर इस लोक में जन्म नहीं लेते थे। पाणिनी ने दो प्रकार के छात्र बताए हैं- दण्डमाणव तथा अन्तेवासी।

    दण्डमाणव छात्र ज्ञान प्राप्त करने की प्रारम्भिक स्थिति में रहता था और अन्तेवासी उससे उत्कृष्ट कोटि में रहता था। माणवक उनपयन संस्कार के पश्चात् गुरु के समीप आता था जबकि अन्तेवासी मनसा, वाचा, कर्मणा आचार्य के समीप प्रारम्भ से रहता था। बाद में शिष्यों की तीन श्रेणियां बन गईं। (1.) विद्याव्रत स्नातक: ये छात्र वेदाध्ययन के साथ-साथ वेद-वर्णित नियमों एवं व्रतों का पालन करते थे। इनका समाज में बहुत आदर था। (2.) विद्यास्नातक: ये छात्र वेद कठस्थ करने के पश्चात् व्रत करते थे। (3.) व्रत स्नातक: ये छात्र वेदों को कण्ठस्थ किए बिना व्रत करते थे।

    उत्तरवैदिक-काल में विद्यार्थियों से शिक्षा के बदले में निर्धारित शुल्क भी लिया जाने लगा था। तक्षशिला के आचार्यकुलों में शिक्षा प्राप्त करने का शुल्क सामान्यतः एक हजार कर्षापण था। जो विद्यार्थी यह शुल्क दे सकते थे, वे आचार्य के घर में पुत्र की तरह पूरे आराम से रहते थे। उन्हें श्रम करने की आवश्यकता नहीं थी। इस प्रकार शुल्क देकर शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को 'आचारिय भागदायक' कहा जाता था। जो विद्यार्थी निश्चित शुल्क नहीं दे सकते थे, वे दिन में काम किया करते थे और रात में पढ़ते थे।

    ऐसे विद्यार्थियों को 'धम्मृन्तेवासिक' कहा जाता था। तक्षशिला आने वाले निर्धन विद्यार्थियों को आचार्य की ओर से काम दिया जाता था जिसके बदले में प्राप्त वेतन से वे अपना खर्च स्वयं चलाते थे। तीसरे प्रकार के विद्यार्थी न तो शुल्क देते थे और न दिन में काम करके रात की पढ़ाई से सन्तुष्ट होते थे। वे शिक्षा प्राप्ति के पश्चात् गुरु का शुल्क चुकाते थे। 'दूतजातक' में एक निर्धन ब्राह्मण-पुत्र की कथा आती है जिसे शिक्षा प्राप्ति की बड़ी लालसा थी किन्तु वह 'आचार्य भाग' नहीं दे सकता था।

    अतः उसने वचन दिया कि शिक्षा समाप्ति के बाद वह 'आचार्य भाग' चुकाएगा। उसे 'आचारिय भागदायक' विद्यार्थियों की तरह रखा गया। शिक्षा पूर्ण होने के बाद उसने धनार्जन करके आचार्य का शुल्क चुकाया। इत्सिंग ने बौद्ध विद्यार्थियों की दो श्रेणियां बताई हैं- (1.) माणव: वे विद्यार्थी जो भविष्य में संघ में दीक्षा लेते थे और (2.) ब्रह्मचारी: वे विद्यार्थी जो प्रव्रजित नहीं होना चाहते थे।

    गुरु-शिष्य सम्बन्ध

    विद्यार्थी को प्रायः12 से 16 वर्ष तक गुरु के आश्रम में रहना होता था। इस अवधि में गुरु-शिष्य के बीच बनने वाले सम्बन्धों में अपनत्व एवं विश्वास का सृजन होता था। उस युग में शिक्षक सदाचारी, त्यागी, विद्वान् तथा निराभिमानी होते थे। गुरु-शिष्य सम्बन्ध को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता था। शिष्य के लिए आचार्य ही पिता होता था और सावित्री (विद्या) उसकी माता होती थी। कुछ ऋषियों के शिष्यों की संख्या हजारों में होती थी। दुर्वासा ऋषि जब कुरु-नरेश से मिलने के लिए गए तब उनके साथ दस हजार शिष्य थे।

    शिष्य का यह कृतव्य था कि वह अपने आचार्य को पितृतुल्य एवं मातृतुल्य माने तथा किसी भी अवस्था में उसके प्रति द्रोह न करे। चंद्रगुप्त मौर्य ने आचार्य चाणक्य के आचार्य-कुल में रहकर शिक्षा ग्रहण की। बाद में आचार्य चाणक्य ने चंद्रगुप्त का भारत का सम्राट बनने का पथ-प्रशस्त किया तथा चंद्रगुप्त के मंत्री बनकर उसे राज्य चलाने में भी सहायता की। इस प्रकार गुरु-शिष्य सम्बन्ध आजीवन बने रहते थे।

    चीनी यात्री इत्सिंग ने लिखा है- 'शिष्य गुरु के पास रात्रि के पहले और अंतिम पहर में जाता है, उसके शरीर पर मालिश करता है, वस्त्र आदि संभाल कर रखता है।यदा-कदा गुरु के आवास और आंगन में झाड़ू लगाता है। फिर जल छानकर उसे पीने के लिए देता है। अपने से बड़े के प्रति इसी प्रकार आदर प्रदिर्शत किया जाता है। इसी प्रकार गुरु भी शिष्य के रोगग्रस्त हो जाने पर सेवा करता है, उसे औषध देता है और उसके साथ पितृवत् व्यवहार करता है।'

    आचार्य अपने पुत्र और अंतेवासी को एक ही कोटि में रखता था। कालांतर में कभी-कभी गुरु अपनी पुत्रियों के लिए अपने शिष्यों में से पति चुन लेते थे। यदि कोई शिष्य अपने गुरु के निर्देशों का पालन नहीं करता था या शिक्षा प्राप्ति में रुचि नहीं दर्शाता था तो गुरु उन्हें उपदेश तथा मधुर वचन से सुधारने का प्रयास करता था। हठी शिष्य को शारीरिक दण्ड भी दिया जाता था। कभी-कभी रज्जु या छड़ी से भी दण्डित किया जाता था किंतु कठोर दण्ड नहीं दिया जाता था।

    बौद्ध जातकों में उल्लेख है कि कुछ शिष्यों को कठोर दण्ड भी दिया गया था। काशी के एक राजकुमार को चोरी करने की लत लग गई। बार-बार प्रयास करने पर भी जब वह नहीं सुधरा तो उसे कठोर शारीरिक दण्ड दिया गया। मनु ने उद्दण्ड छात्रों के लिए मधुर वचन एवं उपदेश का सहारा लेने की अनुशंसा की है जबकि गौतम ने कठोर दण्ड का भी समर्थन किया है। वर्षा के समय, पर्व के दिन एवं बीमारी होने पर छात्र को शिक्षा से अवकाश दिया जाता था। दैव प्रकोप होने पर श्ृगाल, उलूक, गर्दभ एवं श्वान जैसे जीवों के बोलने का अध्ययन-अध्यापन बंद कर दिया जाता था।

    दीक्षांत एवं गृहस्थ आश्रम में प्रवेश

    जब विद्यार्थी शिक्षा पूर्ण कर लेते थे तब उनका 'दीक्षान्त' (समावर्तन) संस्कार होता था। तैत्तिरीय उपनिषद् में आचार्य द्वारा समावर्तन के अवसर पर शिष्यों को दिए जाने वाले उपदेश का विस्तृत विवेचन दिया गया है। शिक्षा समाप्ति पर विद्यार्थी आचार्य को अपनी सामर्थ्य के अनुसार गुरु-दक्षिणा देते थे, जो आचार्य-कुल की आय का महत्वपूर्ण साधन होती थी। गुरु-दक्षिणा देने के बाद विद्यार्थी अपने घरों को लौटकर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करते थे।

    उत्तर-वैदिक-काल के प्रसिद्ध आचार्य-कुल

    उत्तर-वैदिक-काल में शिक्षा का प्रबंध आचार्य-कुलों में किया गया था। इन आश्रमों में छात्रों से हवन-पूजा के साथ-साथ वेदपाठ करवाया जाता था। उन्हें वेद-वेदांगों का अध्ययन और शस्त्र-शास्त्रों का अभ्यास करवाया जाता था। प्रयाग में संगम के तट पर महर्षि भरद्वाज का आश्रम था जहाँ छात्रों को वेद-वेदांगों और शस्त्र-शास्त्रों का ज्ञान दिया जाता था। मन्दाकिनी नदी के तट पर चित्रकूट में महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था। महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में भी शिक्षा दी जाती थी।

    महर्षि अगस्त्य का आश्रम दंडकारण्य में था जहाँ उनके शिष्य यज्ञ और अध्ययन में लगे रहते थे। महर्षि अगस्त्य कई प्रकार के दिव्यास्त्रों पर अधिकार रखते थे तथा राक्षसों से भी युद्ध करते थे। मालिनी नदी के तट पर महर्षि कण्व का आश्रम शिक्षा का महत्वपूर्ण केन्द्र था। नैमिषारण्य में महर्षि शौनक का आश्रम था, जहाँ विद्यार्थियों के अध्ययन का काल 12 वर्ष था। महेन्द्र पर्वत पर परशुराम का आश्रम था, जहाँ अन्य विद्याओं के साथ-साथ युद्ध-कौशल का ज्ञान कराया जाता था। नागरिकों द्वारा प्रदत्त भोजन, वस्त्र आदि से विद्यार्थियों, आचार्यों तथा अन्य व्यक्तियों का जीवन-निर्वाह होता था।


    प्राचीन भारत में स्त्री-शिक्षा

    वैदिक-काल में स्त्री-शिक्षा

    वैदिक-काल में स्त्री-शिक्षा पर विशेष बल दिया जाता था। ज्ञान और शिक्षा में वे पुरुषों के समकक्ष थीं। गार्गी ने जनक की राजसभा में याज्ञवल्यक्य को अपने गूढ़ प्रश्नों से मूक कर दिया था। याज्ञवल्क्य की पत्नी मैत्रेयी अत्यन्त विदुषी थी। उस युग की स्त्रियां अनेक कार्यों में दक्ष होती थीं। ऋग्वेद कालीन अनेक विदुषी स्त्रियों के उल्लेख मिलते हैं जिनमें से अनेक ने ऋग्वेद की ऋचाओं का भी प्रणयन किया था। इनमें लोपामुद्रा, घोषा, सिकता, विश्ववारा, निवावरी आदि अनेक प्रतिभा-सम्पन्न विदुषियां थीं।

    गृह्यसूत्रों से ज्ञात होता है कि उस काल में स्त्रियों के उपनयन एवं समावर्तन संस्कार भी होते थे। उपनयन संस्कार शिक्षा आरम्भ होने से पूर्व एवं समावर्तन संस्कार शिक्षा-समाप्ति के बाद होता था। अतः अनुमान है कि सूत्र-युग में स्त्रियां भी पुरुषों की तरह शिक्षा प्राप्त करने के लिए ब्रह्मचर्य जीवन व्यतीत करती थीं। ऋषि-तर्पण के समय गार्गी, वाचनवी, सुलभा, मैत्रेयी, बड़वा प्रतिथेयी आदि ऋषि-नारियों के नाम भी लेने का निर्देश किया गया था।

    उस काल में दो प्रकार की स्त्रियां थीं- एक सद्योवधू और दूसरी ब्रह्मवादिनी। 'सद्योवधू' विवाह होने से पहले तक ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करती थीं ओर 'ब्रह्मवादिनी' जीवन पर्यन्त ज्ञानार्जन में लगी रहकर ब्रह्मचर्य का पालन करती थीं। उस काल में स्त्रियां संगोष्ठियों में पुररुषों के बराबर बैठकर उनसे शास्त्रार्थ किया करती थीं।

    महाकाव्य-काल में स्त्री-शिक्षा

    महकाकाव्य काल में भी स्त्री-शिक्षा का महत्व बना हुआ था। कौशल्या और तारा मन्त्रविद् थीं। सीता सन्ध्या पूजन करती थी और अत्रेयी वेदान्त का अध्ययन करती थी। महाभारत में उल्लिखित सुलभा ने जीवन पर्यन्त वेदान्त का अध्ययन किया। आत्रेयी ने वाल्मीकि आश्रम में लव और कुश के साथ शिक्षा ग्रहण की थी। महारानी द्रौपदी पण्डिता थीं। उत्तरा ने अर्जुन से संगीत और नृत्य की शिक्षा प्राप्त की। परवर्ती काल में स्त्री-शिक्षा में अवरोध आने लगा।

    बौद्ध-काल में स्त्री-शिक्षा

    बौद्ध एवं जैन ग्रंथों में सुशिक्षित नारियों का उल्लेख हुआ है। संघमित्रा ने लंका जाकर बौद्ध धर्म का उपदेश एवं प्रचार किया। सुभा, अनोपमा आदि स्त्रियां दर्शन में पारंगत थीं। जैन ग्रंथों में जयन्ती, सहस्रानीक आदि शिक्षित स्त्रियों का उल्लेख है। उपाध्याय की स्त्री को उपाध्यायानीतथा आचार्य की पत्नी को आचार्यनी कहा जाता था। छात्राओं को अध्येत्री कहा जाता था। पतंजलि ने औदमेध्या नामक आचार्या का उल्लेख किया है जिसके छात्र 'औदमेध' कहलाते थे। छात्राओं के लिए छात्री-शालाएं होती थीं।

    मौर्य-काल में स्त्री-शिक्षा

    ई.पू. चौथी शती के आचार्य वात्स्यायन ने स्त्रियों के लिए 64 अंगविद्याओं के अध्ययन करने का उल्लेख किया है। उसने उपाध्याया, उपाध्यायी, आचार्या, आदि का भी उल्लेख किया है जिससे ज्ञात होता है कि उस काल में स्त्रियां आचार्य-कुलों में शिक्षण का कार्य भी करती थीं।

    स्मृति-काल में स्त्री-शिक्षा

    स्मृतियों का युग आते-आते स्त्रियों के उपनयन एवं समावर्तन संस्कार बंद हो गए किंतु समृद्ध एवं उच्च प्रतिष्ठित परिवारों में स्त्री-शिक्षा पूर्ववत् चलती रही।

    गुप्त-काल में स्त्री-शिक्षा

    गुप्त-काल में स्त्री-शिक्षा स्मृतियों के निर्देशानुसार ही थी। इस काल में उच्च वर्ग की कुछ स्त्रियों के विदुषी और कलाकार होने का उल्लेख मिलता है। 'अभिज्ञान शकुन्तलम्' में अनुसूया को इतिहास का ज्ञाता बताया गया है। 'मालती माधव' में मालती को चित्रकला में निपुण बताया गया है। संभवतः स्त्रियां ही स्त्रियों को शिक्षा देती थीं। 'अमरकोष' में आचार्या, उपाध्यया आदि शब्दों का प्रयोग किया गया है।

    प्राचीन भारत में शूद्र-शिक्षा

    ऋग्वैदिक-काल में वर्ण विभाजन नहीं हुआ था। इसलिए समाज के किसी भी सदस्य को शिक्षा से वंचित रखे जाने की संभावना नहीं है। उत्तरवैदिक-काल में वर्ण व्यवस्था ने आकार लिया फिर भी जन्म से किसी को शूद्र नहीं माना जाता था। शुक्रनीति के अनुसार- 'इस संसार में जन्म से कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य शूद्र या म्लेच्छ नहीं होता है, गुण तथा कर्म के भेद से ही होता है।' अतः अनुमान लगाया जा सकता है कि उत्तरवैदिक-काल के आरम्भ में शूद्रों को शिक्षा से वंचित नहीं रखा गया होगा। महाभारत में सूतजी का उल्लेख हुआ है जो शूद्र होने पर भी ऋषि थे।

    ई.पू. चौथी शताब्दी में मनुस्मृति की रचना हुई तथा दूसरी शताब्दी ईस्वी तक इस ग्रंथ में संशोधन एवं परिवर्द्धन होते रहे। मनुस्मृति के रचना काल में तक्षशिला में चल रहे आचार्यकुलों के सम्बन्ध में प्राप्त होने वाले वृत्तांतों से ज्ञात होता है कि तक्षशिला में क्षत्रिय, ब्राह्मण और वैश्य के साथ-साथ दर्जी और मछली मारने वाले परिवारों के लड़के भी शिक्षा प्राप्त करते थे। चाण्डालों का तक्षशिला में पढ़ना निषिद्ध था।

    'चित्तसम्भूत जातक' में लिखा है कि चाण्डाल लोग वेश बदल कर छिपकर, तक्षशिला में शिक्षा प्राप्त किया करते थे। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि चाण्डाल शूद्रों से भी नीचे समझे जाते थे और उन्हें अन्त्यज (अस्पर्श्य) कहा जाता था। इस काल में मैला ढोने की प्रथा आरम्भ नहीं हुई थी। अतः अन्त्यज वर्ग में केवल चाण्डाल ही थे। जब समय के साथ वर्ण व्यवस्था का आधार कर्म न होकर जन्म हो गया तब शूद्रों के लिए शिक्षा अनावश्यक मानकर उन्हें शिक्षा से वंचित किया जाने लगा। इस काल के शास्त्रकार शूद्रों के लिए शिक्षा का निषेध करते हैं। उन्हें वैदिक अध्ययन तथा यजन से पूर्णतः वंचित कर दिया गया।

    'गौतम धर्म सूत्र' के सूत्रकार गौतम ने व्यवस्था दी कि वैदिक मंत्रों का उच्चारण करने वाले शूद्रों की जिह्वा काट लेनी चाहिए। महर्षि जैमिनि के अनुसार कोई भी शूद्र अग्निहोत्र और वैदिक यज्ञ नहीं कर सकता। 'अर्थशास्त्र' के रचियता कौटिल्य ने शूद्रों की शिक्षा के बारे में कुछ नहीं लिखा है। 'मनुस्मृति' के रचयिता मनु के अनुसार शूद्र धार्मिक शिक्षा और व्रतों के अनुपयुक्त था।

    गुप्तोत्तर भारत में शिक्षा

    ई.570 के आसपास गुप्त साम्राज्य ध्वस्त हो गया तथा देश हूणों के आक्रमणों से त्रस्त हो गया। हूण लड़ाके बड़े ही असभ्य तथा बर्बर थे। उन्होंने लाखों बौद्ध-भिक्षुओं का बड़ी क्रूरता से वध किया और उनके मठों तथा विहारों को आग लगाकर नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। इस आग में हजारों पुस्तकालय भी भस्मीभूत हो गए जिनमें प्राचीन भारतीय शिक्षा के अमूल्य ग्रंथ भरे हुए थे। हूणों ने मन्दिरों, मठों, स्तूपों, विहारों आदि का विध्वंस कर भारतीय कलाओं को भी बहुत क्षति पहुँचाई। हूणों के कारण भारतीय समाज में बहुत सी कुप्रथाएँ तथा अन्धविश्वास प्रचलित हो गये। इससे शिक्षा को बहुत बड़ा धक्का लगा।

    फिर भी प्राचीन शिक्षा के लाखों ग्रंथ बच गए और ब्राह्मण शिक्षा पूर्ववत् चलती रही। छठी शताब्दी ईस्वी के संस्कृत कवि दण्डी ने पाठ्य विषयों की सूची में लिपियों, भाषाओं, वेद, वेदांग, काव्य, नाट्यकला, धर्मशास्त्र, व्याकरण, ज्योतिष, तर्कशास्त्र, मीमांसा, राजनीति, संगीत, छन्द रसशास्त्र, युद्धविद्या, द्यूत, चौर्य विद्या को सम्मिलित किया है। सातवीं शताब्दी ईस्वी में भारत आए चीनी बौद्ध-भिक्षु ह्वेनत्सांग ने व्याकरण, शिल्प, आयुर्वेद, तर्क, आत्मविद्या आदि विषयों का उल्लेख किया है। उसी काल के संस्कृत कवि बाणभट्ट ने लिखा है कि उस काल में ब्राह्मण गुरु नियमित रूप से वेद, व्याकरण, मीमांसा आदि की शिक्षा देता था।

    गुरुकुल में वेदों का निरंतर पाठ होता था। अग्निहोत्र की क्रियाएं हुआ करती थीं। विश्वदेव को बलि दी जाती थी। विधिपूर्वक यज्ञ का सम्पादन होता था। ब्राह्मण उपाध्याय ब्रह्मचारियों को पढ़ाने में संलग्न रहते थे। सातवीं शताब्दी में भारत आए विद्वान इत्सिंग ने लिखा है कि काशिकावृत्ति और पतंजलि के महाभाष्य का अध्ययन चार या छः साल में पूर्ण होता था। यद्यपि कुछ विद्वानों ने मनु, याज्ञवलक्य एवं यम आदि स्मृतिकारों पर स्त्री-शिक्षा को प्रतिबंधित कर देने का आरोप लगाया है किंतु उपलब्ध तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि यह आरोप सही नहीं है।

    स्मृति-युग से भी बहुत बाद तक के काल तक स्त्री-शिक्षा की परम्परा बनी रही। चार्वाक् परम्परा के कुछ लोगों ने स्मृतियों में क्षेपक जोड़कर उनके मूल स्वरूप को विकृत कर दिया है। आठवीं शताब्दी ईस्वी में भवभूति ने सहशिक्षा का उल्लेख किया है। 'कामन्दकी' ने भूरिवस और देवराट के साथ विद्या ग्रहण की थी। आठवीं-नौवीं सदी में भी भारत में स्त्री-शिक्षा की स्थिति अच्छी थी। शिक्षित स्त्रियों के पुररुषों के बराबर बैठकर शास्त्रार्थ करने की परम्परा जगद्गुरु शंकराचार्य के काल तक जीवित थी। मण्डन मिश्र के पराजित हो जाने के बाद उनकी पत्नी 'भारती' ने शंकर से शास्त्रार्थ किया था।

    पूर्व-मध्य-काल में शिक्षा

    दसवीं शताब्दी के अंत एवं ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारंभ में भारत भ्रमण पर आए अरबी विद्वान अलबरूनी ने तत्कालीन भारत में ज्ञान-विज्ञान के विविध विषयों और विभिन्न ग्रंथों का उल्लेख किया है। उसने चार वेद, अठारह पुराण, बीस स्मृतियाँ, रामायण, महाभारत, पतंजलि-कृत महाभाष्य, कपिल-कृत न्याय भाषा, जैमिनि-कृत मीमांसा, बृहस्पति-कृत लोकायत, अगस्त्य कृत अगस्त्य मत, शर्ववर्मन-कृत कातंत्र, शशिदेव वृत्त, उग्रभूति कृत शिष्यहितावृत्ति, पुलिष कृत गणित-विषयक सिद्धान्त, वराहमिहिर, आर्यभट्ट विद्याधर गौड़-कृत सरलावृत्ति आदि के ग्रंथों का उल्लेख किया है।

    अलबरूनी लिखता है- 'हिन्दू विज्ञान और साहित्य की अन्य अनेक शाखाओं का विस्तार करते हैं तथा उनका साहित्य सामान्यतः अपरिसीम है। इस प्रकार मैं अपने ज्ञान के अनुसार उनके साहित्य को न समझ सका।' अतः अनुमान लगाया जा सकता है कि इस काल में भारत में शिक्षा का इतना प्रसार था और ग्रंथों की संख्या इतनी बढ़ चुकी थी कि किसी एक व्यक्ति के लिए विभिन्न विषयों के समस्त ग्रंथों को जान पाना और समझ पाना अत्यंत कठिन था।

    इस काल में भारत में शूद्रों की शिक्षा पूर्णतः विनाश को प्राप्त कर गई थी। अलबरूनी ने लिखा है कि शूद्र को वेद पढ़ने का कोई अधिकार नहीं है। अपरार्क सूचित करता है कि शूद्रों को न वेद पढ़ने का अधिकार है और न यज्ञ करने का।

    प्राचीन भारत में वैदिक शिक्षा के प्रमुख केन्द्र

    उत्तरवैदिक-काल के अंत में शिक्षा व्यवस्था के स्वरूप में परिवर्तन आने लगा और देश के विभिन्न क्षेत्रों में छोटे-छोटे अध्ययन केन्द्रों की स्थापना होने लगी। ये शिक्षा केन्द्र जंगलों में स्थित ऋषि-आश्रमों अथवा आचार्य-कुलों में न होकर प्रसिद्ध धार्मिक नगरियों में खुले। महाकाव्य काल आने तक इस व्यवस्था ने व्यवस्थित रूप ले लिया। रामायण और महाभारत में अनेक शिक्षा केन्द्रों का उल्लेख मिलता है। इस काल में काशी, कांची, कन्नौज, काश्मीर आदि नगर विद्या-केन्द्रों के रूप में विख्यात हुए।

    काशी (वाराणसी)

    काशी विश्व के प्राचीनतम बसे शहरों में से एक और भारत का प्राचीनतम बसा नगर है। यहाँ वरुणा और असि नामक नदियां गंगाजी में आकर मिलती थीं इसलिए इसे वाराणसी भी कहते थे। विद्या और शिक्षा के क्षेत्र में काशी का महत्व वैदिक-काल से होने लगा था। उपनिषद् काल में काशी प्रतिष्ठित शिक्षा-केन्द्र के रूप में विकसित होने लगा था। काशी के राजा अजातशत्रु एवं काशी के अन्य अनेक राजा विद्वत्ता के लिए देश-देशांतर मंे विख्यात थे।

    काशीराज अजातशत्रु से शिक्षा ग्रहण करने के लिए दूर देशों से विद्यार्थी काशी पहुँचते थे। तेइसवें जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ काशी के राजा अश्वसेन के पुत्र थे। उनके समय से काशी वैदिक धर्म के साथ-साथ जैन-धर्म और दर्शन का भी प्रधान केन्द्र बन गया। बौद्ध युग में काशी का शिक्षा-केन्द्र के रूप में महत्व पहले से भी अधिक हो गया। वैदिक दर्शन, ज्ञान, तर्क और शिक्षा में काशी अग्रणी था। इसलिए महात्मा बुद्ध ने 'धर्मचक्र-प्रवर्तन' काशी से ही आरम्भ किया तथा अपने ज्ञान का प्रसार यहीं से आरम्भ किया ताकि उनका प्रभाव काशी के विद्वानों पर पड़ सके।

    'संजीव जातक' के अनुसार काशी-निवासी 'बोधिसत्व' विद्याध्ययन के लिए तक्षशिला गया तथा विद्याध्ययन के बाद पुनः काशी लौटकर 'बटुकों' को पढ़ाने लगा। पाँच सौ बटुक उसके शिष्य थे और वह विश्व प्रसिद्ध आचार्य हो गया। 'कोसिय-जातक' में भी इस आचार्य का वर्णन है। जातक साहित्य से ज्ञात होता है कि काशी के विद्यालयों में प्रवेश पाने के लिए छात्र की न्यूनतम आयु 16 वर्ष होनी चाहिए थी। मौर्य-सम्राट अशोक ने काशी में अनेक बौद्ध-विहारों और मठों का निर्माण करवाया। सातवीं सदी ईस्वी में बौद्ध-भिक्षुक ह्वेनत्सांग ने काशी के विहारों, चैत्यों, स्तूपों और भवनों को देखा था।

    ह्वेनत्सांग के अनुसार यहाँ कई मंजिला भवन थे जो अत्यन्त आकर्षक और लुभावने थे। इससे स्पष्ट है कि इस काल में काशी वैदिक, जैन और बौद्ध तीनों प्रमुख चिंतन-धाराओं का मुख्य स्थल था। मध्य-कालीन भारत में भी काशी विद्या का प्रमुख केन्द्र बना रहा। बौद्ध-धर्म का ह्रास होने के साथ-साथ काशी पुनः प्राचीन, सनातन, वैदिक और पौराणिक दर्शन का शिक्षा-केन्द्र बना गया। यहाँ वेद, वेदांग, इतिहास, पुराण, ज्योतिष, कल्प एवं शिल्प आदि की शिक्षा दी जाती थी।

    दसवीं सदी के अंत में जब अरबी विद्वान अलबरूनी भारत आया तो वह हिन्दूशास्त्रों से परिचय प्राप्त करने के लिए वाराणसी गया। उसने लिखा है- 'इस नगरी में भारत के श्रेष्ठ विद्यालय हैं। हिन्दू विद्याएँ हमारे विजित प्रदेशों से भागकर काश्मीर और वाराणसी जैसे सुदूर स्थानों में चली आई हैं।' मध्ययुगीन अभिलेखों से ज्ञात होता है कि वाराणसी में वेदों का अध्ययन किया जाता था। गहड़वाल वंश के अनेक राजाओं ने वाराणसी को अपनी दूसरी राजधानी के रूप में स्थापित किया। उनके संरक्षण में यह नगर शिक्षा का महत्वपूर्ण केन्द्र बना रहा।

    प्रसिद्ध कश्मीरी कवि श्रीहर्ष, गहड़वाल शासक विजयचन्द्र का सभासद था। उसने 'नैषध चरित्' की रचना काशी में रहकर की। कबीर और तुलसी आदि अनेक बड़े संत-कवि काशी में रहे। आज तक भी यह नगर प्राचीन संस्कृत विद्या का प्रमुख केन्द्र समझा जाता है।

    तक्षशिला विश्वविद्यालय

    वेदों में 'गांधार' नामक स्थान का उल्लेख हुआ है किंतु 'तक्षशिला' नामक नगरी का सर्वप्रथम उल्लेख वाल्मीकि रामायण में हुआ है। यह नगरी सिंधु नदी के पूर्वी तट पर स्थित थी। अनेक प्राचीन ग्रंथों के अनुसार दुष्यंत एवं शकुंतला के पुत्र महाराज भरत ने तक्षशिला की स्थापना की तथा इसका शासन 'तक्ष' नामक व्यक्ति को सौंपा। इसी 'तक्ष' के नाम पर यह तक्षशिला कहलाई। महाभारत के पश्चात् महाराज जनमेजय ने तक्षशिला में नागयज्ञ किया था। इसलिए तक्षशिला का सम्बन्ध 'तक्षक' नाग से भी जोड़ा जाता है।

    महाभारत में आए उल्लेख के अनुसार आचार्य धौम्य के शिष्य उपमन्यु, आरुषि और वेद ने तक्षशिला में ही शिक्षा ग्रहण की थी। इससे अनुमान होता है कि उत्तरवैदिक-काल में तक्षशिला शिक्षा के केन्द्र के रूप में विकसित हो चुकी थी। 7वीं शताब्दी इस्वी पूर्व के काल में तक्षशिला ज्ञान और विद्या के प्रमुख केन्द्र के रूप में विख्यात थी। जातकों के अनुसार देश-विदेश से बड़ी संख्या में छात्र तक्षशिला आकर आचार्यों से शिक्षा प्राप्त करते थे। त्रिपिटक की टीकाओं और अठ्ठकथाओं के अनुसार पाटलिपुत्र, बनारस, राजगृह, मिथिला और उज्जयिनी अदि स्थानों से बड़ी संख्या में विद्यार्थी उच्च अध्ययन करने के लिए तक्षशिला आते थे।

    'तिलमुष्टि जातक' के अनुसार तक्षशिला के विद्यालयों का अनुशासन अत्यंत कठोर था और राजाओं के लड़के भी यदि बार-बार दोष करते तो पीटे जा सकते थे। अनेक जातकों में उल्लेख है कि वाराणसी के अनेक राजाओं ने भी अपने पुत्रों को उच्चशिक्षा प्राप्ति के लिए तक्षशिला भोजा क्योंकि तक्षशिला राजनीति, शस्त्र-विद्या, आयुर्वेद और विधि-शास्त्र आदि की शिक्षा प्राप्ति के लिए अन्यतम केंद्र थी। तक्षशिला में एक ऐसा विद्यापीठ भी था, जिसमें एक आचार्य के पास 101 राजकुमार शिक्षा प्राप्त कर रहे थे।

    इस आचार्य के गुरुकुल को 'राजकुमारों का गुरुकुल' कहा जा सकता है। तक्षशिला के अन्य विद्यालय भी भारत भर में प्रसिद्ध थे। 'धोनसाख जातक' में लिखा है कि भारत-भर से ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्णों के लड़के तक्षशिला में पढ़ने जाया करते थे। समस्त द्विज-पुत्र (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) एक साथ शिक्षा प्राप्त करते थे। ब्राह्मण के साथ क्षत्रिय भी वेदाध्ययन करते थे और क्षत्रिय के साथ ब्राह्मण भी धनुर्विद्या सीखता था। जातकों से ज्ञात होता है कि एक ब्राह्मण राजपुरोहित ने अपने पुत्र को धनुर्विद्या की शिक्षा प्राप्त करने के लिए तक्षशिला भेजा। क्षत्रिय, ब्राह्मण और वैश्य के साथ-साथ दर्जी और मछली मारने वाले भी, जो निम्न जाति के समझे जाते थे, यहाँ शिक्षा प्राप्त करते थे।

    चाण्डालों का तक्षशिला में पढ़ना निषिद्ध था। 'चित्तसम्भूत जातक' में लिखा है कि चाण्डाल लोग वेश बदल कर छिपकर, तक्षशिला में शिक्षा प्राप्त किया करते थे। मेघावी छात्रों को राजकीय सहायता पर शिक्षा प्राप्त करने के लिए तक्षशिला भेजा जाता था। वाराणसी और राजगृह के राजपुरोहित-पुत्र और युवराजों के साथ जाने वाले ऐसे छात्रों का उल्लेख जातकों में मिलता है। इस युग में प्रतिभाशाली निर्धन छात्रों को राज्य और समाज की ओर से सहयोग दिया जाता था। तक्षशिला के स्नातकों में भारतीय इतिहास के कुछ अत्यंत प्रसिद्ध व्यक्त्यिों के नाम मिलते हैं। संस्कृत व्याकरण के ज्ञाता 'पाणिनि' गांधार स्थित शालातुर के निवासी थे। संभवतः उन्होंने तक्षशिला में शिक्षा प्राप्त की।

    गौतम बुद्ध के समकालीन कुछ प्रसिद्ध व्यक्ति भी तक्षशिला के विद्यार्थी थे जिनमें कोसलराज 'प्रसेनजित', मल्लराज 'बंधुल', लिच्छवि नरेश 'महालि' तथा प्रसिद्ध शल्य-चिकित्सक 'जीवक' प्रमुख थे। जीवक के अपार ज्ञान और कौशल का विवरण 'विनय-पिटक' से मिलता है। मौर्य राज्य के संस्थापक चंद्रगुप्त ने तक्षशिला में शिक्षा प्राप्त की। उसके गुरु 'आचार्य चाणक्य' तक्षशिला के स्नातक थे और वहीं के विश्वविद्यालय में राजनीति एवं अर्थशास्त्र के अध्यापक थे।

    काशी का राजकुमार 'ब्रह्मदत्त', मगधराज का लड़का 'अरिन्दम', इन्द्रप्रस्थ का राजकुमार 'सुतसोम', मिथिला का राजकुमार 'विदेह', इन्द्रप्रस्थ का राजकुमार 'धनन्जय', मिथिला के राजकुमार सुरुचि तथा कम्पिल्लक देश के राजकुमार ने भी तक्षशिला में शिक्षा प्राप्त की। कुछ विद्वानों का मत है कि तक्षशिला में आधुनिक विश्वविद्यालय जैसी कोई संगठित संस्था नहीं थी। नगर में छोटे-छोटे अनेक गुरुकुल थे जिनमें आचार्यगण व्यक्तिगत रूप से विभिन्न विषयों की शिक्षा देते थे। किसी-किसी गुरुकुल में 500 अथवा उससे भी अधिक विद्यार्थी भी पढ़ते थे।

    इस कारण यदि इन्हें आधुनिक विश्वविद्यालयों के समकक्ष रखा जाए तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। तक्षशिला के उच्च शिक्षाकेन्द्रों में शिक्षा प्रारम्भ करने की आयु सोलह वर्ष थी। विद्यार्थी अपने-अपने नगर में प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करके तक्षशिला आया करते थे। राजाओं के साथ-साथ देश भर के ब्राह्मण तथा श्रेष्ठिजन अपने पुत्रों को शिक्षा प्राप्ति हेतु तक्षशिला भेजते थे। एक जातक-कथा में तक्षशिला की शिक्षा-विधि पर अच्छा प्रकाश डाला गया है।

    तक्षशिला के पाठयक्रम में आयुर्वेद, धनुर्वेद, हस्तिविद्या, त्रयी, व्याकरण, दर्शनशास्त्र, गणित, ज्योतिष, गणना, संख्यानक, वाणिज्य, सर्पविद्या, तंत्रशास्त्र, संगीत, नृत्य और चित्रकला आदि का मुख्य स्थान था। जातकों में आए उल्लेखों के अनुसार तक्षशिला में कम से कम तीन वेद और 18 विद्याएं पढ़ाई जाती थीं। कर्मकांड की शिक्षा के लिये तक्षशिला की जगह वाराणसी अधिक प्रसिद्ध थी। तक्षशिला में पढ़ाये जाने वाले विषयों के सम्बन्ध में जातक साहित्य में उल्लेख आए हैं-

    (1) वेदत्रयी: जातकों में सर्वत्र तीन वेदों का ही उल्लेख है। संभवतः इस काल तक अथर्ववेद को वेदों में सम्मिलित नहीं किया गया था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी 'त्रयी' में अथर्ववेद का समावेश नहीं किया गया है।

    (2) अष्टादश विद्याएँ: बौद्ध जातकों में तक्षशिला का कई बार उल्लेख हुआ है। यहाँ अष्टादश विद्याओं में प्रवीणता प्राप्त कराई जाती थी। युद्धकला, व्याकरण, दर्शन, ज्योतिष, भविष्य-कथन, मुनीमी, व्यापार, कृषि, रथचालन, इन्द्रजाल, गुप्तनिधि अन्वेषण, संगीत, नृत्य और चित्रकला अष्टादश विद्याओं में सम्मिलत थे।

    (3) सिप्प या शिल्प: तक्षशिला में अनेक प्रकार के शिल्प कार्यों की शिक्षा दी जाती थी।

    (4) धनुर्विद्या: 'असदिस जातक' में असदृश (असदिस) कुमार का वर्णन है जिसने तक्षशिला के आचार्य से धनुर्विद्या में अपूर्व प्रवीणता प्राप्त की।

    (5) हस्तविद्या: 'सुसीम जातक' के अनुसार वाराणसी के राजकुमार सुसीम ने तक्षशिला में आचार्य के पास वेदों के साथ-साथ हस्तविद्या भी सीखी।

    (6) मन्त्र-विद्या: 'अनभिरति जातक' के अनुसार काशी में रहने वाले एक ब्राह्मण कुमार ने तक्षशिला में सम्पूर्ण मन्त्र-विद्या का अध्ययन किया। 'चाम्पेयय जातक' में लिखा है कि एक विद्यार्थी ने तक्षशिला में ऐसा मन्त्र सीखा था जिससे वह सब प्राणियों को अपने वश में कर सकता था। उस विद्यार्थी द्वारा सर्प को वश में किये जाने का विवरण भी एक जातक में दिया गया है।

    (7) सब प्राणियों की आवाज समझने की विद्या: 'परन्तप जातक' में एक कुमार का वर्णन है जिसने तक्षशिला में जाकर उस विद्या का अध्ययन किया जिससे कि सब प्राणियों की आवाजों को समझा जा सके।

    (8) चिकित्सा-शास्त्र: तक्षशिला चिकित्सा-शास्त्र की दृष्टि से बहुत प्रसिद्ध था। चिकित्सा-शास्त्र का अध्ययन करने के लिए दूर-दूर से विद्यार्थी तक्षशिला पहुँचते थे। मगध सम्राट बिम्बिसार के प्रसिद्ध राजवैद्य जीवक ने तक्षशिला में ही शिक्षा प्राप्त की थी।

    विद्यार्थीगण अपने आचार्य के निरीक्षण में रहते थे। आचार्य अपने विद्यार्थियों को शारीरिक अथवा अन्य दण्ड भी दे सकते थे। आचार्यों के साथ बार-बार विश्व प्रसिद्ध विशेषण लगाना इस बात का द्योतक है कि उस समय तक्षशिला नगरी शिक्षाध्ययन के लिये दूर तक विख्यात थी। सामान्यतः शिक्षण कार्य उन आचार्यों के पास था जिन्हें निर्वाह के लिए राज्य की ओर से भूमि मिलती थी। ऐसी भूमि से कोई कर नहीं लिया जाता था। इस भूमि की सम्पूर्ण आय शिक्षक वर्ग के ही काम आती थी। कौटिल्य ने ऐसे अध्यापकों का भी उल्लेख किया है, जिन्हें राज्य की ओर से वेतन दिया जाता था जिसे 'पूजा वेतन' कहते थे। इस काल में नैष्ठिक ब्रह्मचारियों की संख्या बहुत अधिक थी जो वेद और कल्प में पारंगत होकर निर्जन स्थान में रहते थे तथा उनके साथ उनके शिष्य भी रहा करते थे। यहाँ पाठ्यक्रम निर्धारित होता था तथा छात्र अपनी इच्छानुसार विषय पढ़ते थे।

    शिक्षा का प्रधान लक्ष्य समाज की कल्याण भावना था न कि भौतिक साधनों अथवा अर्थ की उपलब्धि। तक्षशिला में शिक्षा समाप्त कर चुकने पर विद्यार्थी शिल्प, व्यवसाय आदि का क्रियात्मक ज्ञान प्राप्त करने के लिए तथा देश-देशान्तर के रीति-रिवाजों का अध्ययन करने के लिए देशाटन भी किया करते थे। चौथी सदी ई.पू. से छठी सदी तक तक्षशिला को यवन, बैक्ट्रियन, शक, पह्ल्लव, कुषाण और हूणों के आक्रमण हुए जिनके कारण तक्षशिला के गुरुकुलों को भारी क्षति पहुँची।

    फिर भी तक्षशिला शिक्षा-केन्द्र का महत्व चौथी सदी ईस्वी तक बना रहा। पांचवी सदी इस्वी में भारत आए चीनी यात्री फाह्यान तथा उसके बाद आए यात्रियों ने तक्षशिला का कोई विवरण नहीं दिया है जिससे अनुमान होता है कि फाह्यान के आगमन से पहले ही तक्षशिला नष्ट हो चुका था। अब तक्षशिला पाकिस्तान में हैं।

    काश्मीर

    प्राचीनकाल से काश्मीर धर्म और शिक्षा का प्रधान केन्द्र था। प्रारम्भ में यह शैव धर्म का प्रमुख केन्द्र था किंतु कालांतर में बौद्ध धर्म और शिक्षा का भी प्रधान केन्द्र बन गया। पहली सदी ईस्वी में शक शासक कनिष्क ने चौथी बौद्ध संगीति का आयोजन काश्मीर में ही किया था। काश्मीर में बौद्ध दर्शन, साहित्य, न्याय, ज्योतिष, इतिहास आदि के प्रतिभा सम्पन्न विद्वान् हुए जिन्होंने अनेक ग्रन्थों की रचना की।

    'हरिविजय' का रचनाकार रत्नाकर (नौवीं सदी), 'वृहत्कथामंजरी', 'रामायणमंजरी', 'भारतमंजरी', 'बोधिसत्वावदान' का कर्ता क्षेमेन्द्र, 'कलाविलास', 'चतुर्वर्गसंग्रह', 'नीतिकल्पतरू', 'चारूचर्या' आदि ग्रन्थों का रचयिता सोमेन्द्र (क्षेमेन्द्र का पुत्र), 'श्रीकंठचरित्' का लेखक मंखक (बारहवीं सदी) आदि विद्वान् काश्मीर के निवासी थे। काश्मीरी लेखक कल्हण ने 'राजतरंगिणी' लिखी जो तत्कालीन इतिहास जानने का प्रमुख स्रोत है।

    धारा नगरी

    धारा नगरी आठवी शताब्दी ईस्वी से परमारों की राजधानी थी किंतु मालवा के परमारों की शक्ति का वास्तविक उत्कर्ष वाक्पति मुंज (ई.972-994) के समय आरंभ हुआ। उसके समय में धारा नगरी भी देश भर में हिन्दू-धर्म एवं शिक्षा के महत्वपूर्ण केन्द्र के रूप में प्रसिद्ध हुई। मुंज के अनेक उत्तराधिकारियों ने धारा नगरी को विद्या और ज्ञान के केन्द्र के रूप में संरक्षण दिया। 'दशरूप' का लेखक धनंजय और 'यशोरूपावलोक' का रचियता धनिक परमार राजाओं के आश्रित थे।

    परमार शासक भोज अपने पूर्ववर्ती शासक मंुज की भाँति विद्वान् और प्रतिभाशाली शासक हुआ। वह राजनीति, दर्शन, ज्योतिष, वास्तु, काव्य, साहित्य, व्याकरण, चिकित्सा आदि विभिन्न विषयों का प्रकाण्ड पंडित था। उसने राजमृगांक, विद्वज्जन मण्डल, समरांगण, शृंगारमंजरी तथा कूर्मशतक आदि अनेक ग्रन्थों की रचना की। भोज की राज्यसभा में बल्लल, मेरुतुंग, वररुचि, सुबंधु, अमर, माघ, धनपाल, मानतुंग, विज्ञानेश्वर, उवट आदि अनेक प्रसिद्ध लेखक रहते थे। उसने अनेक विद्यालयों की स्थापना की। उसके द्वारा स्थापित 'सरस्वती कण्ठाभरण मंदिर एवं भोजशाला' विश्वविद्यालय के रूप में विख्यात हुई। भोज की मृत्यु पर किसी कवि ने कहा था-


    अद्य धारा निराधारा निरालम्बा सरस्वती।

    पंडित खंडिता सर्वे भोजराजे दिवंगते।।

    अर्थात राजा भोज की मृत्यु से धरती, आधारविहीन हो गई, सरस्वती अवलम्बन विहीन हो गई और पण्डित खण्डित हो गए।

    कन्नौज

    कन्नौज नगर की स्थापना उत्तरवैदिक-काल में गंगा नदी के बायीं ओर हुई। इसका पुराना नाम कान्यकुब्ज है तथा यह ब्राह्मणों का बहुत बड़ा केन्द्र था। इस नगर का प्रथम उल्लेख रामायण में मिलता है। उस काल में यह पौराणिक धर्म का बड़ा केन्द्र था। महाभारत में इस नगर का उल्लेख कई बार हुआ है। ई.पू. दूसरी शताब्दी में पतंजलि ने भी इस नगर का उल्लेख किया है। दूसरी शताब्दी ईस्वी के विश्वप्रसिद्ध भूगोलवेत्ता टॉलेमी ने भी कन्नौज का उल्लेख किया है।

    ई.405 में जब फाह्यान कन्नौज आया तो उसने यहाँ दो बौद्ध विहार देखे। पाँचवीं शताब्दी में कन्नौज गुप्त-साम्राज्य के प्रमुख नगरों में से एक था। उनके काल में कन्नौज में अनेक मंदिरों का निर्माण हुआ। गुप्तकाल में कन्नौज हिन्दू-शिक्षा का प्रमुख केन्द्र था। परवर्ती-गुप्त काल में कन्नौज में अनेक बौद्ध विहारों की स्थापना हुई। छठी शताब्दी ईस्वी में श्वेत हूणों के आक्रमण से इस नगर को बहुत क्षति पहुँची। सातवीं शताब्दी ईस्वी में चीनी यात्री ह्वेनत्सांग ने कन्नौज का उल्लेख किया है।

    उस समय यहाँ सैंकड़ों हिन्दू एवं बौद्ध मंदिर थे। गंगा के पूर्वी तट पर लगभग चार मील तक विहार ही विहार थे। 'हर्षचरित' के रचयिता बाणभट्ट ने कन्नौज के एक आचार्य-कुल में शिक्षा प्राप्त की थी। हर्ष के शासन काल में कन्नौज में बौद्ध और हिन्दू विद्वानों के बीच दार्शनिक-शास्त्रार्थ होते थे। ह्वेनत्सांग ने लिखा है कि कन्नौज के ब्राह्मण-पण्डित विद्वत्ता में अद्वितीय थे। हर्ष के समकालीन राजशेखर ने अनेक ग्रन्थों की रचना की। प्रतिहारों के समय में भी कन्नौज शिक्षा का महत्वपूर्ण केन्द्र बना रहा।

    गहड़वालों के युग में भी कन्नौज की पुरानी कीर्ति बनी रही। इस प्रकार सातवीं सदी से लेकर बारहवीं सदी तक कन्नौज देश के प्रमुख शिक्षा-केन्द्रों में से एक था। ई.1018 में महमूद गजनी ने कन्नौज पर आक्रमण किया तथा नगर एवं उसकी शिक्षण संस्थाओं को बहुत नुक्सान पहुँचाया। ई.1194 ई. में मुहम्मद गौरी ने कन्नौज पर अधिकर कर लिया। उसके बाद कन्नौज का धार्मिक एवं शैक्षणिक महत्व समाप्त हो गया।

    कांचीपुरम्

    कांची अथवा कांचीपुरम् दक्षिण भारत की एक प्राचीन धार्मिक नगरी है जो मेघावती नदी के किनारे स्थित है। इसे दक्षिण भारत का काशी भी कहा जाता है। कांची भारत के इतिहास की एक ऐसी नगरी है जहाँ हिन्दू-धर्म, बौद्ध धर्म तथा जैन-धर्म ने अपना प्रभाव जमाए रखने के लिए सैंकड़ों साल तक प्रतिस्पर्द्धा की। वैदिक धर्म: महाभारत के समय भी कांची अस्त्तिव में थी। ई.पू. तीसरी शती के आचार्य पतंजलि ने अपने ग्रंथ महाभाष्य में कांची का उल्लेख किया है।

    तीसरी शताब्दी इस्वी में कांची पल्लव राजाओं की राजधानी बनी। पल्लवों के नेतृत्व में कांची संस्कृत भाषा और साहित्य के अध्ययन के महान् शिक्षा-केन्द्र के रूप में विख्यात हुई। चौथी शताब्दी ईस्वी में कालीदास ने भी इस नगरी का उल्लेख किया है। गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त (ई.335-85) ने अपनी दक्षिण भारत विजय के दौरान कांची के राजा को भी परास्त किया था। बौद्ध धर्म: पहली से पांचवीं शताब्दी तक कांची में बौद्ध धर्म खूब फला-फूला। दूसरी-तीसरी शताब्दी के बौद्ध-आचार्य आर्यदेव कांची में शिक्षित थे जो नागार्जुन के बाद नालंदा विश्वविद्यालय के प्रधान बने।

    पालि भाषा के विद्वान बुद्धघोष एवं धम्मपाल भी कांची के शिक्षित थे। पांचवी शताब्दी ईस्वी के प्रसिद्ध बौद्ध शास्त्रार्थी दिग्नाग ने कांची से शिक्षा प्राप्त करने के बाद नालन्दा विश्वविद्यालय के विख्यात ब्राह्मण पंडित सुदुर्गम को शास्त्रार्थ में पराजित किया था। उसके बाद ही नालंदा विश्वविद्यालय वैदिक धर्म की शिक्षा के स्थान पर बौद्ध धर्म की शिक्षा का केन्द्र बना। पांचवी-छठी शताब्दी का बौद्ध-भिक्षु बोधिधर्मन् कांचीपुरम् का पल्लव राजकुमार था जिसने चीन में शाओलिन कुंगफू की स्थापना की।

    कांची की बौद्ध संस्थाओं ने बर्मा तथा थाईलैण्ड में बौद्धों की 'थेरवाद' शाखा का प्रसार किया। बिहार के गया क्षेत्र में स्थित कुर्किहार (अपनाक विहार) से प्राप्त नौवीं से ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी के अभिलेखों से ज्ञात होता है कि इस विहार को सर्वाधिक दान कांची से प्राप्त होता था तथा कांची के बहुत से बौद्ध-श्रद्धालु एवं भिक्षु गया की यात्रा करते थे। जैन-धर्म: पहली शताब्दी ईस्वी में कांची में कुण्ड कुण्डाचार्य द्वारा जैन-धर्म का प्रसार किया गया। तीसरी शताब्दी ईस्वी में अकलंक द्वारा जैन-धर्म का प्रसार किया गया। पल्लवों के पूर्ववर्ती कल्भर राजाओं ने जैन-धर्म स्वीकार किया।

    इस प्रकार कांची में राजकीय संरक्षण मिल जाने के कारण जैन-धर्म का खूब प्रसार हुआ। पल्लव राजा सिंहविष्णु, महेन्द्र वर्मन तथा सिंहवर्मन (ई.550-560) ने भी जैन-धर्म का अनुसरण किया। हिन्दू-धर्म का पुनरुत्थान: जब छठी-सातवीं शताब्दी ईस्वी में नयनार तथा आलवार संतों का उदय हो गया तो पल्लव राजाओं ने हिन्दू-धर्म अंगीकार कर लिया। सर्वप्रथम पल्लव राजा महेन्द्र वर्मन नयनार संतों के प्रभाव से जैन-धर्म त्यागकर हिन्दू बन गया।

    सातवीं-आठवीं शताब्दी के महाकवि दण्डिन् ने कांची के राज्याश्रय में रहकर अनेक ग्रन्थों की रचना की। कदम्बवंशी राजकुमार मयूरवर्मन तथा वात्स्यायन आदि विद्वानों ने कांची में रहकर शिक्षा प्राप्त की। आठवीं शताब्दी में दक्षिण में शंकर के प्रभाव से शैव मत का तथा ग्यारहवीं शताब्दी में रामानुज के प्रभाव से वैष्णव धर्म का प्रभाव बढ़ा। दक्षिण के चोल शासकों तथा विजयनगर के शासकों ने हिन्दू-धर्म को अंगीकार किया किंतु उन्होंने जैन-धर्म को भी सम्मान दिया जो अब भी कांची में विद्यमान था।

    त्रिलोक्यनाथ एवं चंद्रप्रभ के जुड़वां जैन मंदिर में पल्लव एवं चोल शासकों के शिलालेख पाए गए हैं। हिन्दू-धर्म में कांची को भारत की सात बड़ी धार्मिक नगरियों में सम्मिलित किया गया है जिन्हें सप्तपुरी कहा जाता है। हिन्दू-धर्म में मान्यता है कि कांची की पवित्र भूमि में इतनी शक्ति है कि यहाँ मृत्यु होने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है। गरुड़ पुराण के अनुसार कांची सहित सभी सप्तपुरियां मोक्ष देने वाली हैं। कांची शैव एवं वैष्णव दोनों मतों के श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत आदरणीय है।

    कांची में भगवान शिव के 108 तथा भगवान विष्णु के 108 मंदिर हैं। कुछ लोगों का विश्वास है कि कांची का कामाक्षी अम्मा मंदिर आदिशंकराचार्य द्वारा स्थापित किया गया था तथा आदिशंकराचार्य ने कांची में एक मठ की भी स्थापना की किंतु एक अन्य मान्यता के अनुसार इस मठ की स्थापना श्ृंगेरी मठ की शाखा के रूप में 18वीं सदी में कुंभकोनम द्वारा की गई। बाद में इस मठ ने स्वयं को स्वतंत्र कर लिया। कांची में एक मठ 'उपनिषद् ब्रह्मम् मठ' के नाम से जाना जाता है।

    मान्यता है कि इस मठ में 'उपनिषद ब्रह्मयोगिन' नामक संत ने महासमाधि ली थी जिन्होंने भारत के समस्त प्रमुख उपनिषदों की टीका लिखी थी। सदाशिव ब्रह्मेन्द्र ने इसी मठ में सन्यास लिया था। पूर्व-मध्य-कालीन चोल वंश एवं पाण्ड्यवंश के शासन काल में कांची दक्षिण भारत का विख्यात शिक्षा केन्द्र बनी रही जहाँ अनेक आचार्य वैदिक साहित्य का अध्ययन-अध्यापन करते थे। दक्षिण भारत के साथ-साथ उत्तर भारत से भी विद्यार्थी कांची आते थे।

    प्राचीन भारत में जैन शिक्षा के प्रमुख केन्द्र

    अनहिलपाटन (अन्हिलपाटन, अन्हिलवाड़ा)

    गुजरात के चालुक्यवंशी शासकों की राजधानी अन्हिलपाटन पूर्व मध्य काल में शिक्षा-केन्द्र के रूप में विख्यात थी। यहाँ हिन्दू-धर्म-दर्शन के साथ-साथ जैन-धर्म और दर्शन की भी शिक्षा दी जाती थी। अनेक चालुक्यवंशी राजा ज्ञान और विद्या के उत्कर्ष में रुचि लेते थे। सोमप्रभाचार्य, हेमचन्द्र, रामचन्द्र, उदयचन्द्र, जयसिंह, यशपाल, वत्सराज एवं मेरूतुंग जैसे विद्वान् लेखकों ने अन्हिलपाटन के राज्याश्रय में संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश आदि विभिन्न भाषाओं में महत्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की। इनमें हेमचन्द्र सर्वाधिक प्रसिद्ध विद्वान् हुआ, जिसने व्याकरण, छन्द, शब्द-शास्त्र, साहित्य, कोश, इतिहास, दर्शन आदि विभिन्न विषयों पर विभिन्न ग्रन्थों की रचना की। जब मुसलमानों ने गुजरात पर आक्रमण किए तब अन्हिलपाटन का शैक्षणिक एवं धार्मिक महत्व समाप्त हो गया।

    जालोर

    सातवीं-आठवीं शताब्दी ईस्वी में जालोर जैनों का बड़ा केन्द्र था। आठवीं शती में उद्योतन सूरी ने कुवलयमाला नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की। प्रसिद्ध जैन विद्वान हेमचन्द्र की प्रेरणा से कुमारपाल चौलुक्य ने ई.1164 में जालोर में कुवर विहार जिनालय बनवाया। ई.1185 में राजा समरसिंह के मंत्री यशोवीर ने इस जिनालय का जीर्णोद्धार करवाया। इस कारण जालोर जैन-ग्रंथों के अध्ययन का प्रमुख केन्द्र बन गया। आजादी के बाद मुनि जिन विजय जालोर जिनालय के ग्रंथों को अहमदाबाद ले गए।

    प्राचीन भारत में बौद्ध शिक्षा के प्रमुख केन्द्र

    महात्मा बुद्ध के उपदेशांे से प्रभावित होकर बहुत से लोग किशोरावस्था में ही भिक्षुव्रत ग्रहण करके बौद्ध संघ में सम्मिलित हो गए। विभिन्न राज्यों के राजा एवं सम्पन्न गृहस्थ बौद्ध विहारों को उदारतापूर्वक दान देते थे। ये विहार भी शिक्षा के भी महत्वपूर्ण केन्द्र हो गए जिनमें आचार्य और उपाध्याय अध्यापन का कार्य करते थे। इस प्रकार आचार्य-कुलों या गुरुकुलों का स्थान विहारों ने ले लिया और परम्परागत गुरुकुलों को भारी आघात लगा।

    परम्परागत गुरुकुल का स्वरूप एक परिवार की तरह होता था जिसमें गुरु और शिष्यों के बीच पिता-पुत्र जैसा सम्बन्ध हो जाता था किन्तु बौद्ध विहारों में यह सम्भव नहीं था, क्योंकि उनमें शिक्षा प्राप्त करने वाले भिक्षुओं या विद्यार्थियों की संख्या सैकड़ों-हजारों में होती थी। भिक्षुओं को अपने भोजन आदि के लिए भिक्षाटन की आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि बौद्ध विहार प्रायः अत्यन्त समृद्ध होते थे। विद्यार्थी इन विहारों में बड़े समूह मंे शिक्षार्जन करते थे। उनके अध्यापन के लिए अनेक उपाध्याय और शिक्षक नियत होते थे। विद्यार्थियों को विनय-पिटक में दिए गए नियमों का पालन करना होता था।

    नालन्दा और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों तथा श्रावस्ती और वलभी विहार बौद्ध शिक्षा के प्रसिद्ध केन्द्र थे। बौद्ध विहार की सम्पूर्ण व्यवस्था बौद्ध-भिक्षुओं के हाथों में रहती थी, चाहे वह छोटा बौद्ध-विहार हो अथवा बड़ा। इनका प्रबन्धन किसी विख्यात बौद्ध विद्वान् के निर्देशन में होता था, जो संघ के सदस्यों के मतों से भिक्षुओं में से चुना जाता था।

    नालन्दा विश्वविद्यालय, पहले बौद्ध-संघ था किंतु कालान्तर में विश्वविख्यात शिक्षण संस्था के रूप में विख्यात हुआ। प्रधान आचार्य के प्रबन्ध में सहायता प्रदान करने के लिए कई समितियाँ होती थीं जिनमें दो समितियाँ प्रधान थीं- एक शिक्षा समिति और दूसरी प्रबन्ध समिति। शिक्षा समिति के अन्तर्गत विभिन्न पाठ्यक्रमों का निर्धारण होता था तथा प्रबन्ध समिति के अन्तर्गत शिक्षा-संस्थाओं की प्रशासनिक व्यवस्था, कार्यकर्ताओं की नियुक्ति तथा भवनों का निर्माण आदि कार्य होते थे। प्रारम्भ में बौद्ध शिक्षण संस्थाओं के अनुशासन और नियम प्रायः हिन्दू शिक्षण व्यवस्था की तरह थे।

    दोनों शिक्षा प्रणालियों के आदर्श और पद्धति में भी बहुुत साम्य था। जैसे-जैसे बौद्ध-शिक्षा का प्रसार हुआ, इनकी आदर्श, पद्धति एवं नियमों में अंतर आता गया तथा बहुत से वैदिक शिक्षण संस्थान राजकीय संरक्षण खोकर बौद्ध शिक्षण संस्थानों में बदल गए। बौद्ध विहारों में शिक्षा का माध्यम संस्कृत न होकर पालि था। बौद्ध संघ में शिक्षा आरम्भ करने के लिए 'पब्बजा' (प्रव्रज्या) और समाप्ति के लिए 'उपसम्बदा' नामक संस्कार आवश्यक थे।

    प्रायः आठ वर्ष के बाद कभी भी पब्बजा संस्कार करवाया जा सकता था। ऐसे विद्यार्थी को उपासक कहा जाता था। उसे विहार में रहते हुए बुद्ध के उपदेशों में शत-प्रतिशत श्रद्धा रखनी होती थी तथा ब्रह्मचर्य का पालन करना होता था। वह भी हिन्दू विद्यार्थियों की तरह 'भिक्षाटन' के लिए जाता था। उपसम्बदा के समय विद्यार्थी की आयु लगभग 30 वर्ष हो जाती थी। बौद्ध उपासक भी अपने आचार्य की सेवा करता था।

    नालन्दा विश्वविद्यालय

    नालन्दा अपने प्रारम्भिक काल में ब्राह्मण शिक्षा का प्रसिद्ध केन्द्र था। बौद्धों ने नालंदा का इतिहास उलझा दिया है। कुछ बौद्ध विवरणों के अनुसार नालन्दा की ख्याति महात्मा बुद्ध के समय में भी थी तथा यह बुद्ध के प्रमुख शिष्य 'सारिपुत्र' की जन्मभूमि थी। कुछ बौद्ध लेखकों के अनुसार 500 श्रेष्ठियों ने मिलकर 10 करोड़ मुद्राओं से नालन्दा क्षेत्र को क्रय करके महात्मा बुद्ध को अर्पित किया था। तथागत ने यहाँ के आम्र-वन में कई दिन व्यतीत किए तथा अपने शिष्यों को बौद्ध धर्म की शिक्षा दी। बाद में मौर्य सम्राट अशोक ने नालंदा में एक विशाल विहार का निर्माण करवाया।

    इस विवरण में अनेक तथ्य गलत हैं। ई.399 से ई.412 तक चीनी बौद्ध-भिक्षु 'फाहियान' भारत में रहा। वह पाटलिपुत्र तथा राजगृह भी गया। उसने इस क्षेत्र के बौद्धविहारों का वर्णन किया है किंतु उसने एक भी स्थान पर नालंदा के विहार का उल्लेख नहीं किया है जबकि नालंदा राजगृह से केवल 11 किलोमीटर दूर है। यदि यहाँ कोई बड़ा बौद्ध विहार या विश्वविद्यालय रहा होता तो फाहियान ने उसका उल्लेख अवश्य किया होता। अतः स्पष्ट है कि पांचवी शताब्दी ईस्वी के प्रारंभ तक नालंदा में कोई विश्वविद्यालय नहीं था।

    यदि छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व में अर्थात् फाहियान के भारत आगमन से लगभग 1100 वर्ष पहले 500 श्रेष्ठियों ने 10 करोड़ मुद्राओं से कोई भूमि क्रय करके बुद्ध को दी होती अथवा सम्राट अशोक ने नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की होती तो फाहियान के समय तक यहाँ कोई न कोई बौद्ध विहार अथवा विश्वविद्यालय अवश्य रहा होता। पूरे मौर्य शासन काल के दौरान नालंदा में बौद्ध-शिक्षा के किसी केन्द्र की स्थापना नहीं हुई थी। मगध राज्य का उल्लेख महाभारत तथा अनेक पुराणों में हुआ है।

    जिससे स्पष्ट है कि मगध का राज्य बहुत पुराना है। संभवतः पौराणिक काल में ही नालंदा में ब्राह्मण शिक्षा का कोई केन्द्र स्थापित हुआ होगा जिसका अब कोई उल्लेख नहीं मिलता है। यदि भगवान बुद्ध के समय एवं बाद में सम्राट अशोक के समय में 'नालंदा' शिक्षा का बड़ा केन्द्र रहा भी होगा तो वह ब्राह्मण शिक्षा का बड़ा केन्द्र रहा होगा न कि बौद्ध शिक्षा का। पांचवी शताब्दी के मध्य में बौद्ध विद्वान् दिग्नाग ने नालन्दा के विख्यात ब्राह्मण पंडित सुदुर्गम को शास्त्रार्थ में पराजित किया था।

    इसके बाद मगध के गुप्त सम्राट कुमारगुुप्त (ई.414-455) ने नालंदा में बौद्ध महाविहार का निर्माण करवाया तथा उसे विपुल धन प्रदान किया। उसके बाद बुद्धगुप्त, तथागतगुप्त, नरसिंहगुप्त बालादित्य आदि अनेक गुप्त राजाओं ने इस महाविहार को संरक्षण प्रदान किया तथा इसके परिसर में अनेक भवन बनवाए। इस कारण इस संस्था की ख्याति में तेजी से विस्तार हुआ और देश-विदेश के हजारों विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करने के लिए आने लगे। अनेक चीनी विद्वान भी इस विहार में अध्ययन करने आए।

    उन्होंने अपने देश को लौटकर अपने यात्रा-विवरण लिखे, उन्हीं से नालन्दा के भवनों, आचार्यों और शिक्षा-पद्धति आदि की जानकारी प्राप्त होती है। इस विश्वविद्यालय के उल्लेख चीनी यात्रियों 'इत्सिंग' तथा 'ह्वेनत्सांग' के वर्णनों में मिलते हैं। इनमें से इत्सिंग सातवीं शताब्दी ईस्वी में तथा ह्वेनत्सांग आठवीं शताब्दी ईस्वी में भारत आए। इन दोनों यात्रियों ने नालंदा के बौद्ध महाविहार एवं विश्वविद्यालय को अपनी आंखों से देखा था। चीनी यात्री ह्वेनत्सांग ने लिखा है कि नालंदा में अनेक बौद्ध विहारों का निर्माण किया गया जिनमें से कुछ तो काफी बड़े और भव्य थे जिनके गगन-चुम्बी शिखर अत्यन्त आकर्षक थे।

    यहाँ का सबसे बड़ा विहार 203 फुट लम्बा और 164 फुट चौड़ा था। इसके कक्ष साढ़े नौ फुट से 12 फुट लम्बे थे। यशोवर्मा के एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि नालन्दा के विहारों की शिखर श्रेणियाँ गगनस्थ मेघों का चुम्बन करती थीं। इनमें अनेक जलाशय थे, जिनमें कमल तैरते रहते थे। अनेक विशालकाय भवन थे जिनमें छोटे-बड़े अनेक कक्ष थे। खुदाई में मिले अवशेषों से उसकी भव्यता प्रमाणित होती है। विश्वविद्यालय भवन में व्याख्यान के लिए 7 विशाल कक्ष और 300 छोटे-बड़े कक्ष थे।

    विद्यार्थी छात्रावासों में रहते थे तथा प्रत्येक कोने पर कूपों का निर्माण किया गया था। नालन्दा विश्वविद्यालय के संचालन हेतु 200 गाँव दान में प्राप्त थे। इन गाँवों की आय से यहाँ के भिक्षुओं, विद्यार्थियों एवं कर्मचारियों का पोषण होता था। ग्रामवासी भी प्रतिदिन कई मन चावल और दूध भेजा करते थे। विद्यार्थियों से किसी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाता था। उनके भोजन और आवास की व्यवस्था विश्वविद्यालय द्वारा निःशुल्क की जाती थी। ह्वेनत्सांग ने लिखा है कि जब तक वह नालन्दा में रहा, उसे प्रतिदिन महासाली चावलों का एक निश्चित परिमाण, 20 पूग और 120 जम्बीर मिलते रहे। साथ ही प्रतिमास तेल, घी और अन्य खाद्य पदार्थ भी निश्चित मात्रा में दिये जाते थे।

    नालन्दा विश्वविद्यालय में प्रवेश पाने के इच्छुक विद्यार्थियों के लिए कठोर नियम निर्धारित थे। प्रवेशार्थी विद्यार्थियों को प्रवेश परीक्षा में उत्तीर्ण होना होता था। यह परीक्षा 'द्वार पण्डित' द्वारा ली जाती थी। महाविहार के प्रवेश द्वार को लांघने के लिए 'द्वार पण्डित' की कठिन परीक्षा में उत्तीर्ण होना अनिवार्य था। ह्वेनत्सांग के अनुसार प्रवेश द्वार पर 8-10 विद्यार्थी असफल हो जाया करते थे और केवल एक या दो सफल हो पाते थे। द्वार पण्डित को पराजित कर जो विद्यार्थी नालन्दा के महाविहार में प्रविष्ट होते थे, उन्हें वहाँ बहुत ही कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी।

    ह्वेनत्सांग के अनुसार महाविहार में प्रविष्ट होकर भी बहुत से विद्यार्थी वहाँ परास्त हो जाते थे किंतु जो विद्यार्थी वहाँ भी विजयी होकर (परीक्षाओं में उत्तीर्ण होकर) फिर बाहर आते थे, उनके ज्ञान और पाण्डित्य का सर्वत्र आदर होता था। विश्वविद्यालय में प्रत्येक विषय के कई विद्वान नियत थे। सातवीं सदी ईस्वी में 'इत्सिंग' नामक चीनी यात्री भारत आया। उसने ई.671 में चीन से प्रस्थान किया और ई.673 में वह ताम्रलिप्ति के बन्दरगाह पर पहुँचा।

    इत्सिंग का मुख्य उद्देश्य भारत आकर बौद्ध धर्म का उच्च ज्ञान प्राप्त करना और यहाँ से धर्म की प्रामाणिक पुस्तकों को एकत्र करके चीन ले जाना था। उसका अधिकांश समय नालन्दा में व्यतीत हुआ। उसने लगभग चार सौ ग्रन्थों का अध्ययन किया, जिनके श्लोकों की संख्या पांच लाख थी। इन ग्रन्थों को वह अपने साथ चीन ले गया। इत्सिंग के समय यहाँ विद्यार्थियों की संख्या 3,000 थी किन्तुु ह्वेनत्सांग के समय बढ़कर 10,000 हो गई थी।

    महाविहार में प्रवेश पाने के लिए व्याकरण, हेतु विद्या (न्याय) और अभिधर्म कोश का ज्ञान होना आवश्यक था। महाविहार में प्रवेश पा चुकने पर विद्यार्थी बौद्ध धर्म के विशाल साहित्य का अध्ययन करते थे। शब्द-विद्या, चिकित्सा-विद्या, सांख्यशास्त्र, तन्त्र, वेद आदि के अध्ययन की भी व्यवस्था थी। नालंदा महाविहार के शिक्षकों की संख्या 1,510 थी जिनमें से 1,010 'सूत्र निकायों' में दक्ष थे और शेष 500 विद्यार्थी अन्य विषयों में। ह्वेनत्सांग के समय इस विश्वविद्यालय का प्रधान कुलपति 'शीलभद्र' था, जो अनेकों विषयों में पारंगत था। शीलभद्र के पहले 'धर्मपाल' कुलपति था।

    ह्वेनत्सांग भी यहाँ के प्रधान शिक्षकों में था, जिसने अनेक विषयों पर अधिकार प्राप्त कर लिया था। नालन्दा के कई शिक्षकों की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। इस कारण विद्यार्थी भारत के सुदूर प्रदेशों तथा चीन, तिब्बत, कोरिया आदि देशों से नालंदा आकर शिक्षा प्राप्त करते थे। नालन्दा महाविहार में विद्यार्थियों के अध्ययन के लिए धर्मयज्ञ नामक विशाल पुस्तकालय था जिसमें रत्नसागर, रत्नोदधि और रत्नरंजक नामक तीन विशाल भवन थे। रत्नोदधि-भवन नौ मंजिल ऊँचा था और उसमें धर्मग्रन्थों का संग्रह था।

    अन्य दोनों इमारतंे भी इसी प्रकार विशाल एवं विस्तीर्ण थीं जिनमें जिज्ञासु शोधकर्ताओं एवं अध्ययनशीन विद्यार्थियों की भीड़ लगी रहती थी। एक अध्यापक नौ या दस विद्यार्थियों को पढ़ाता था। विश्वविद्यालय में 7 विशाल व्याख्यान भवन थे और 300 छोटे व्याख्यान कक्ष थे। सभी विषयों के मिलाकर नित्य लगभग 100 व्याख्यानों की आयोजना की जाती थी। नालंदा विश्वविद्यालय में मुख्यतः बौद्ध धर्म की महायान शाखा का अध्यापन किया जाता था। महायानी शाखा के भी अनेक विहार स्थित थे।

    पालि भाषा की शिक्षा अनिवार्य रूप से दी जाती थी। नागार्जुन, वसुबंध, असंग, धर्मकीर्ति आदि महायानी विद्वानों ने नालंदा से ही शिक्षा प्राप्त की थी। ह्वेनत्सांग ने ऐसे अनेक विद्वान् आचार्यों का उल्लेख किया है जो अपने विषय के प्रकाण्ड पंडित थे तथा भारत के विभिन्न प्रदेशों से आकर अध्ययन-अध्यापन करते थे। धर्मपाल, चन्द्रपाल, गुणमति, स्थिरमति, प्रभामित्र, जिनमित्र, आर्यदेव, दिड्नाग, ज्ञानचन्द्र आदि ऐसे ही प्रतिभावन शिक्षकों की ख्याति पूरे देश में थी।

    इनमें से आर्यदेव और दिड्नाग दक्षिण भारत के थे, धर्मपाल कांची का रहने वाला था, शीलभद्र समतट (बंगाल) का निवासी था तथा गुणमति एवं स्थिरमति वलभी के रहने वाले थे। ह्वेनत्सांग और इत्सिंग के अतिरिक्त भी अनेक विदेशी विद्वान् नालन्दा में उच्च शिक्षा प्राप्त करने आये। श्रमण हिएनचिन सातवीं सदी में नालन्दा आया और तीन वर्ष तक यहाँ रहा। उसका भारतीय नाम प्रकाशमणि था। कोरिया का एक भिक्षु आर्यवर्मन बहुत दिनों तक नालन्दा में रहा और उसकी मृत्यु भी यहीं हुई।

    चेहांग नामक एक अन्य चीनी भिक्षु सातवीं सदी में नालन्दा आया और आठ वर्ष तक अध्ययन करता रहा। आठवीं सदी के प्रारम्भ में तिब्बत के राजा ने नालन्दा के प्रसिद्ध आचार्य शान्तरक्षित को आमन्त्रित किया ताकि वह तिब्बत में बौद्ध धर्म का प्रसार कर सके। तिब्बत पहुँचने पर शान्तरक्षित का बड़ी धूमधाम से स्वागत किया गया और उसे 'आचार्य बोधिसत्व' की उपाधि से विभूषित किया गया। शान्तरक्षित के कुछ समय बाद कमलशील नामक एक अन्य आचार्य को नालन्दा से बुलाया गया। इन दो भारतीय बौद्ध-आचार्यों ने तिब्बत में बौद्ध धर्म की स्थापना की।

    यद्यपि नौवीं शताब्दी ईस्वी में पालवंशी राजाओं के संरक्षण में मगध में विक्रमशिला विश्वविद्यालय की भी स्थापना हो गयी थी, जिसके कारण नालन्दा की कीर्ति कुछ मन्द पड़ने लगी तथापि नालन्दा महाविहार ग्यारहवीं सदी ईस्वी तक भारत के प्रमुख शिक्षा केन्द्र के रूप में अपना स्थान बनाए रखने में सफल रहा। ई.1203 में मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी ने बिहार पर आक्रमण किया। उसने मगध स्थित दोनों बड़े विश्वविद्यालयों अर्थात् नालन्दा विश्वविद्यालय एवं विक्रमशिला विश्वविद्यालय को पूरी तरह नष्ट कर दिया तथा हजारों बौद्ध-भिक्षुओं एवं विद्यार्थियों की हत्या कर दी। इस प्रकार शिक्षा एवं संस्कृति के ये दोनों केन्द्र नष्ट हो गए।

    विक्रमशिला विश्वविद्यालय

    नालंदा विश्वविद्यालय की ख्याति अत्यधिक बढ़ जाने के कारण देश-देशांतर केे विद्यार्थी बड़ी संख्या में नालंदा पहुँचते थे। संभवतः विद्यार्थियों की बढ़ती हुई संख्या को देखते हुए आठवीं शताब्दी ईस्वी में बंगाल के पालवंशी राजा धर्मपाल (ई.775-800) ने बिहार में स्थित वर्तमान भागलपुर से लगभग 40 किलोमीटर दूर विक्रमशिला विहार की स्थापना की तथा विहार को 100 गांव दान दिए। राजा धर्मपाल बौद्ध-धर्म का अनुयायी था।

    उसने विक्रमशिला में महाविहार बनवाकर उसमें 108 बौद्ध-आचार्यों की नियुक्ति की। राजा धर्मपाल और उसके उत्तराधिकारियों ने विक्रमशिला विहार को विपुल धन एवं संसाधन प्रदान किए जिसके कारण देश-विदेश के बहुत से विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने के लिए विक्रमशिला में आने लगे। इस विश्वविद्यालय में बौद्ध धर्म और दर्शन, न्याय, तत्त्वज्ञान, व्याकरण, वैदिक साहित्य तथा तंत्र आदि विषयों की शिक्षा दी जाती थी। यह विश्वविद्यालय बौद्धों के वज्रयान सम्प्रदाय के अध्ययन का सबसे बड़ा केन्द्र था।

    इस युग में तन्त्र-विद्या का बहुत प्रचार था। बौद्ध धर्म, शैव धर्म, जैन धर्म, शाक्तमत तथा पौराणिक धर्म सहित उस युग के सभी धर्मों में तन्त्र साधना को अत्यंत महत्व दिया जाता था। यह विश्वविद्यालय तन्त्र-शिक्षा का सबसे बड़ा केन्द्र था। विक्रमशिला महाविहार का तिब्बत के साथ विशेष सम्बन्ध रहा। विक्रमशिला विश्वविद्यालय में तिब्बत से आने वाले विद्वानों के लिए अलग से एक अतिथिशाला थी। विक्रमशिला से भी अनेक विद्वान तिब्बत गए जिन्होंने कई ग्रन्थों का तिब्बती भाषा में अनुवाद किया।

    इनमें प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान 'दीपंकर श्रीज्ञान' भी थे जो 'उपाध्याय अतीश' के नाम से विख्यात थे और जिन्होंने लगभग 200 ग्रंथों की रचना की। विश्वविद्यालय की आंतरिक व्यवस्था अत्यधिक सुसंगठित थी। विश्वविद्यालय के कुलपति 6 भिक्षुओं के एक मण्डल की सहायता से प्रबंध तथा व्यवस्था करते थे। कुलपति के अधीन विद्वान द्वार-पण्डितों की एक परिषद प्रवेशार्थी विद्यार्थियों की परीक्षा लेती थी। यहाँ द्वार-पण्डितों की संख्या छः थी।

    अनुमान है कि विक्रमशिला विश्वविद्यालय में छः महाविद्यालय थे तथा प्रत्येक महाविद्यालय का द्वार-पण्डित पृथक था। इन छः द्वार-पण्डितों की समिति द्वारा इस विश्वविद्यालय का संचालन होता था, जिसका प्रधान महास्थविर होता था। तिब्बती लेखक तारानाथ ने लिखा है- 'विक्रमशिला के दक्षिणी द्वार का द्वार-पण्डित प्रज्ञाकरमति, पूर्वी द्वार का रत्नाकरशान्ति, पश्चिमी द्वार का बागीश्वर कीर्ति, उत्तरी द्वार का नारोपन्त, प्रथम केन्द्रीय द्वार का रत्नव्रज और द्वितीय केन्द्रीय द्वार का द्वार-पण्डित ज्ञानश्रीमित्र था।'

    द्वार-पण्डित पद पर उच्च कोटि के विद्वानों को नियुक्त किया जाता था। विश्वविद्यालय के दैनिक प्रबन्धन के लिए अनेक अधिकारी और कर्मचारी नियुक्त थे। इस विश्वविद्यालय का व्यय धनाढ्य दानदाताओं के दान से चलता था। आचार्यों एवं विद्यार्थियों के आवास एवं भोजन का प्रबन्ध विश्वविद्यालय द्वारा किया जाता था। भिक्षुक एवं अध्यापक विश्वविद्यालय के प्रबन्धन में हाथ बँटाते थे। विक्रमशिला महाविहार में अनेक छोटे-बड़े बौद्ध मन्दिर बने हुए थे।

    विहार में स्थित समस्त 6 महाविद्यालयों में 108-108 शिक्षक थे। इस प्रकार विक्रमशिला में शिक्षकों की कुल संख्या 648 थी। यहाँ कितने विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करते थे, इसका उल्लेख किसी भी विदेशी यात्री ने नहीं किया है। विक्रमशिला के मुख्य सभा-भवन में 8,000 व्यक्ति एक साथ बैठ सकते थे। इससे अनुमान होता है कि यहाँ के विद्यार्थियों की संख्या हजारों में थी। विदेशी छात्रों में तिब्बत के छात्र अधिक होते थे, जो बौद्ध धर्म और दर्शन का ज्ञान प्राप्त करने आते थे। प्रायः एक छात्रावास तिब्बत के छात्रों से भरा रहता था।

    इस विश्वविद्यालय के बाहर एक धर्मशाला बनाई गई थी, ताकि विद्यार्थी विश्वविद्यालय में प्रविष्ट होने से पहले उसमें निवास कर सकें। विश्वविद्यालय में स्थित विहारों के व्याख्यान कक्षों में व्याख्यान होते थे तथा धर्म और दर्शन की संगोष्ठियाँ आयोजित की जाती थीं। विश्वविद्यालय के चारों ओर दुर्ग जैसी मजबूत प्राचीर थी। विक्रमशिला का पुस्तकालय बहुत समृद्ध था। विद्यार्थियों को पुस्तकालय से पुस्तकें उपलब्ध कराई जाती थीं तथा विद्वान आचार्यों द्वारा उनकी जिज्ञासाओं का समाधान किया जाता था।

    विद्यार्थियों की शिक्षा की समाप्ति पर बंगाल के राजा उन्हें उपाधि प्रदान करते थे। इस विश्वविद्यालय की उपाधि, विद्यार्थी के विषय की दक्षता का प्रमाण मानी जाती थी। विक्रमशिला विश्वविद्यालय के प्रख्यात विद्वानों की एक लम्बी सूची है। इस विश्वविद्यालय के अनेक विद्वानों ने विभिन्न ग्रंथों की रचना की जिनका बौद्ध साहित्य और इतिहास में अच्छा नाम है।

    इनमें रक्षित, विरोचन, ज्ञानपाद, बुद्ध, जेतारि रत्नाकर शान्ति, ज्ञानश्री मिश्र, रत्नवज्र, अभयंकर, आचार्य रत्नकीर्ति और दीपंकर श्रीज्ञान अर्थात् आचार्य अतीश विशेष उल्लेखनीय हैं। 'दीपंकर श्रीज्ञान' विक्रमशिला का महान् प्रतिभाशली आचार्य था। वह गौड़ प्रदेश (बंगाल) का रहने वाला था। उसका जन्म ई.980 ई. में हुआ था। बचपन मंे वह कृष्णगिरी नामक विहार में रहकर पढ़ा। वहाँ उसे शीलरक्षित, चन्द्रकीर्ति और धर्मरक्षित जैसे बौद्ध आचार्यों ने शिक्षा दी।

    कालान्तर में वह बौद्ध धर्म और दर्शन का प्रकाण्ड पण्डित हुआ। बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु वह तिब्बत भी गया। विक्रमशिला के बहुत से विद्यार्थी, यहीं पर आचार्य बन गए। अतीश को तिब्बत में बौद्ध धर्म की पुनः स्थापना के लिए बुलाया गया। उसके द्वारा स्थापित व्यवस्था लामाओं की अधीनता में अब तक विद्यमान है। आचार्य रत्नकीर्ति, अतीश का गुरु था और ज्ञानश्रीमित्र, अतीश का उत्तराधिकारी था। अतीश के तिब्बत चले जाने के बाद ज्ञानश्रीमित्र ही विक्रमशिला विश्वविद्यालय का प्रधान आचार्य बना।

    तबकात-ए-नासिरी में इस महाविहार का उल्लेख आया है जिसके अनुसार विक्रमशिला में अधिकांशतः ब्राह्मण या बौद्ध-भिक्षु निवास करते थे और वे सभी सिर मुंड़ाए हुए थे। ई.1203 में मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी ने बिहार पर आक्रमण किया, तब उसने नालन्दा विश्वविद्यालय तथा विक्रमशिला विश्वविद्यालय को जलाकर नष्ट कर दिया तथा हजारों बौद्ध-भिक्षुओं एवं विद्यार्थियों की हत्या कर दी। अब इस विश्वविद्यालय के खण्डहर ही बचे हैं।

    वलभी विश्वविद्यालय

    वलभी नगर वर्तमान में गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र में स्थित है तथा विगत सैंकड़ों वर्षों से अरब की तरफ से आने वाले समुद्री जहाजों के लिए बन्दरगाह के रूप में प्रयुक्त होता रहा था। बुंदेलों के परम्परागत इतिहास से ज्ञात होता है कि वल्लभीपुर की स्थापना उनके पूर्वपुरुष कनकसेन ने की थी जो श्री रामचन्द्र के पुत्र लव का वंशज था। इसका समय ई.144 बताया जाता है। यह भी माना जाता है कि वलभी नगर की स्थापना ई.470 में मैत्रक वंश के संस्थापक सेनापति भट्टारक ने की थी किंतु वलभी नगर इससे पहले भी अस्त्तिव में था।

    क्योंकि ईस्वी 453 अथवा 466 में वलभी में दूसरी जैन परिषद् आयोजित की गई थी। अतः ई.470 से पहले वलभी एक सम्पन्न नगर रहा होगा और उस काल में यह जैन-धर्म का बड़ा केन्द्र रहा होगा। सातवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य में हर्ष के समय चीनी बौद्ध-भिक्षु 'ह्वेनत्सांग' और सातवीं शताब्दी ईस्वी के अन्त में चीनी बौद्ध-भिक्षु 'इत्सिंग' वलभी आए थे। इन दोनों ने वलभी के बौद्ध विहारों का उल्लेख किया है तथा उनकी तुलना बिहार के नालन्दा विश्वविद्यालय से की है।

    अतः कहा जा सकता है कि हर्ष के शासनकाल में वलभी बौद्ध-शिक्षा के बड़ा केन्द्र के रूप में विख्यात था। वलभी में बौद्ध विहार का सर्वप्रथम निर्माण राजकुमारी टड्डा ने कराया जो संभवतः मैत्रकों की राजकुमारी रही होगी। वलभी में दूसरा बौद्ध विहार राजा धरसेन अथवा श्रीबप्पपाद ने ई.580 में बनवाया। आचार्य स्थिरमति इस विहार के प्रमुख आचार्य थे।

    ह्वेनत्सांग ने लिखा है कि वलभी में 100 विहार थे जिनमें 6,000 बौद्ध-भिक्षु निवास करते थे। दूर-दूर के स्थानों से विद्यार्थी विद्याध्ययन के लिए वलभी आते थे। इत्सिंग के अनुसार वलभी का महाविहार, नालन्दा महाविहार के समान ही महत्वपूर्ण था। यहाँ अनेक विशाल बौद्ध विहार और मठ स्थित थे। 'कथासरित्सागर' के अनुसार अन्तर्वेदी (गंगा-यमुना का दोआब) के द्विज वसुदत्त का पुत्र विष्णुदत्त जब सोलह वर्ष का हो गया तो वह विद्या प्राप्ति के लिए वलभी पुरी गया।

    वलभी महाविहार के बौद्ध शिक्षकों में स्थिरमति और गुणमति की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई थी। इस विहार में बौद्ध धर्म एवं दर्शन, तर्क, व्याकरण, व्यवहार, साहित्य आदि विभिन्न विषय पढ़ाए जाते थे। विहारों के संचालन, भिक्षुओं के भोजन, ग्रन्थों के लेखन एवं प्रतिलिप्यांकन आदि कार्यों के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से धन प्राप्त होता था। वलभी में रहने वाले लगभग 100 श्रेष्ठि तथा देश के अनेक राजा वलभी के विहारों को विपुल धन दान देते थे।

    ई.725-735 में सौराष्ट्र पर अरब सेनाओं के भयानक आक्रमण हुए किंतु वलभी नगर इन आक्रमणों में बच गया। इसके बाद वलभी का इतिहास बहुत कम प्राप्त होता है। 12वीं सदी में जब मुस्लिम आक्रान्ताओं ने पुनः सौराष्ट्र को आक्रान्त किया तो वलभी के विहारों को भयानक क्षति पहुँची तथा यह यह नगर पूरी तरह नष्ट हो गया। अब इस नगर की पहचान 'वल' नामक गाँव के रूप में की गई है जहाँ से मैत्रक राजाओं के ताम्र-अभिलेख और मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं।

    अन्य बौद्ध-शिक्षा केन्द्र

    उपर्युक्त प्रमुख हिन्दू एवं बौद्ध शिक्षा-केन्द्रों के अतिरिक्त भी देश में अनेक छोटे-बड़े हिन्दू, बौद्ध और जैन आश्रम, विहार एवं मठ; विद्यालयों एवं शिक्षा केन्द्रों के रूप में विकसित हुए। वैशाली, नासिक, उज्जैन तथा पाटलिपुत्र प्राचीन काल में ब्राह्मण शिक्षा के प्रमुख केन्द्र थे जो बाद में बौद्ध शिक्षा के लिए प्रसिद्ध हुए। कपिलवस्तु भी विद्या और शिल्प का केन्द्र था जहाँ गौतम बुद्ध ने शिक्षा प्राप्त की। फाह्यान ने 'कश्यप बुद्ध संघाराम' का उल्लेख किया है जहाँ बाद में ह्वेनत्सांग ने चार माह रहकर 'सर्वास्तिवाद' का अध्ययन किया।

    ह्वेनत्सांग ने काश्मीर स्थित विहार में कोश, न्याय तथा हेतु की शिक्षा ग्रहण की। यहाँ देश के विभिन्न विद्वान बौद्ध-भिक्षुओं के उपदेश सुनने के लिए आते थे। जालन्धर का बौद्ध विहार भी बहुत प्रसिद्ध था जिसका उल्लेख ह्वेनत्सांग ने किया है।

    'श्रुघ्न' के मठ में उसने उसने बौद्ध विद्वान जयगुप्त से विद्यार्जन किया। उसने मतिपुर के विशाल संघाराम में रहकर मित्रसेन से अभिधर्मज्ञान-प्रस्थान शास्त्र का अध्ययन किया। कान्यकुब्ज के 'भद्र' बौद्ध विहार में रहकर उसने वीर्यसेन से त्रिपिटक का ज्ञान प्राप्त किया। उसने वाराणसी के तीस ऐसे विहारों का उल्लेख किया है जो सर्वस्तिवाद के प्रमुख केन्द्र थे। राजगृह तथा श्रावस्ती भी बौद्ध शिक्षा के प्रसिद्ध केन्द्रों में से थे। ई.641 में ह्वेनत्सांग ने भीनमाल के बौद्ध मठ की यात्रा की जिसमें 100 बौद्ध-भिक्षु रहते थे।

    अयोध्या एवं पुष्कर भी प्राचीन काल से प्रसिद्ध हिन्दू केन्द्र थे किंतु बाद में वहाँ बौद्ध विहारों का निर्माण हुआ। पुष्कर में निश्चित अंराल पर विशाल धर्मसभाओं का आयोजन होता था जिनमें देश भर के हिन्दू एवं बौद्ध विद्वान सम्मिलित होते थे। कपिलवस्तु का निग्रोधाराम विहार, राजगृह का जेतवन और पूर्वाराम विहार, वैशाली का आम्रवन विहार और राजगृह का वेणुवन विहार बहुत प्रसिद्ध थे। मठों एवं विहारों के साथ-साथ कुछ संघारामों का भी विकास हुआ जिनमें आध्यात्मिक चिंतन होता था।

    ह्वेनत्सांग ने मुंगेर के हिरण्य संघाराम में रहकर वसुबंधु के मित्र संघभद्र द्वारा लिखित न्यायशास्त्र के ग्रंथों का अध्ययन किया था। जब ग्यारहवी-बारहवीं शताब्दी ईस्वी में मुसलमानों ने भारत में अपने राज्य का प्रसार किया तब शिक्षा के अधिकांश प्राचीन केन्द्र नष्ट हो गए।

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  • मैं नाथद्वारा जाकर सन्यासी हो जाउंगा, स्वामी पर हथियार नहीं उठाऊंगा

     02.06.2020
    मैं नाथद्वारा जाकर सन्यासी हो जाउंगा, स्वामी पर हथियार नहीं उठाऊंगा

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    जब कोटा का महाराव किशोरसिंह अपने आदमियों पृथ्वीसिंह तथा गोरधन दास को साथ लेकर कोटा से रंगबाड़ी चला गया और वहाँ से जालिमसिंह पर हमला करने की तैयारियां करने लगा तो पोलिटिकल एजेण्ट ने जालिमसिंह से पूछा कि अब वह क्या करेगा?

    इस पर जालिमसिंह ने उत्तर दिया कि मैं नाथद्वारा जाकर सन्यासी हो जाउंगा किंतु अपने स्वामी पर हथियार नहीं उठाउंगा। इस उत्तर को सुनकर एजेण्ट रंगबाड़ी गया और महाराव को समझा बुझा कर फिर से कोटा ले आया जहाँ महाराव का नये सिरे से राज्याभिषेक किया गया। गोरधनदास को कोटा से निकाल दिया गया। उसे दिल्ली में रहने के लिये मकान दे दिया गया।

    वस्तुतः सारे विवाद की जड़ महाराव किशोरसिंह तथा दीवान माधोसिंह के मध्य चल रहा शक्ति परीक्षण था। किशोरसिंह की शिकायत थी कि माधोसिंह मेरे साथ आदर से व्यवहार नहीं करता। जबकि माधोसिंह कोटा राज्य पर उसी तरह निर्बाध शासन करना चाहता था जैसा कि उसके पिता जालिमसिंह ने किया था। महाराव किशोरसिंह चाहता था कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी ई.1917 में हुई उस संधि का पालन करे जिसमें कोटा राज्य को आंतरिक विद्रोह तथा सामंतों की अनुशासनहीनता को दबाने में मदद किये जाने का प्रावधान था अतः माधोसिंह को हटाया जाये। जबकि माधोसिंह चाहता था कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी इस संधि में ई.1918 में जोड़ी गयी उन दो गुप्त धाराओं पर दृढ़ रहे जिनमें झाला जालिमसिंह और उसके वंशजों को सदैव के लिये सम्पूर्ण अधिकार युक्त प्रधानमंत्री बने रहने का अधिकार दिया गया था।

    कम्पनी सरकार की स्पष्ट धारणा थी कि कोटा राज्य का वास्तविक शासक जालिमसिंह है न कि महाराव किशोरसिंह। इसलिये वह माधोसिंह के विरुद्ध किसी तरह की कार्यवाही नहीं करना चाहती थी। परिस्थतियों से क्षुब्ध होकर कुछ दिन बाद महाराव किशोरसिंह ने फिर से झाला जालिमसिंह को मारने का षड़यंत्र किया। जालिमसिंह ने अपने चारों ओर पहरा बैठा दिया तथा महाराव से मिलने से मना कर दिया। इस पर भी महाराव नहीं माना तो जालिमसिंह ने नगर के दरवाजे बंद करवा दिये और सूरजपोल के कोट की तोपों के मुँह गढ़ की ओर फेर दिये।

    सायं काल से लेकर मध्यरात्रि तक तोपें गोले बरसाती रहीं। आधी रात के बाद महाराव गुप्त मार्ग से नाव में बैठकर चम्बल के पार निकल गया। उसके साथ उसका छोटा भाई पृथ्वीसिंह, कुंवर रामसिंह, विश्वस्त साथी एवं नौकर थे। जालिमसिंह उस समय नगर से बाहर के डेरे में रहा करता था। जब उसने यह समाचार सुना तो वह गढ़ में आया। उसने गढ़ में उपस्थित लोगों के शस्त्र छीन लिये। भण्डारों तथा अंतःपुर का यथोचित प्रबंध किया तथा कोटा की राजगद्दी पर महाराव किशोरसिंह की खड़ाऊँ मंगवाकर स्थापित कर दीं। जालिमसिंह ने घोषणा की कि कुछ बदमाश मेरे स्वामी को बहकाकर ले गये हैं। अतः उनके लौटने तक यही खड़ाऊँ शासन करेंगी।

    किशोरसिंह कोटा के महलों से निकलकर सीधा बूंदी गया। बूंदी के शासक विष्णुसिंह ने महाराव का स्वागत किया। वस्तुतः कोटा राज्य बूंदी राज्य से ही अलग हुआ था तथा कोटा का राजवंश बूंदी के राजवंश की कनिष्ठ शाखा थी। कु्रछ दिनों बाद झाला जालिमसिंह का दुष्ट पुत्र गोरधनसिंह भी महाराव किशोरसिंह से आ मिला किंतु अंग्रेजों के दबाव के कारण गोरधनसिंह पुनः दिल्ली चला गया।

    अंग्रेजों ने बूंदी नरेश को संदेश भेजा कि वह किशोरसिंह को सेना एकत्र न करने दे तथा किशोरसिंह का अधिक समय तक बूंदी में रहना वांछनीय नहीं है। इस कारण कुछ समय बाद किशोरसिंह बूंदी से वृंदावन चला गया। कुछ दिन वृंदावन में बिताकर किशोरसिंह भी दिल्ली पहुंचा और वहाँ जाकर रेजीडेंट से मिला। रेजीडेंट ने किशोरसिंह से कहा कि वह कोटा लौट जाये किंतु किशोरसिंह यह स्वीकार करने को तैयार नहीं हुआ कि वह नाम मात्र का राजा बनकर रहे तथा जालिमसिंह का पुत्र माधोसिंह वास्तविक राजा रहे। अतः किशोरसिंह पुनः कोटा पर आक्रमण करने के उद्देश्य से चम्बल के तट पर आ ठहरा।

    किशोरसिंह ने समस्त हाड़ा राजपूतों को अपनी ओर से लड़ने के लिये आमंत्रित किया। सारे हाड़ा सरदार किशोरसिंह से आ मिले तथा 3000 हाड़ा राजपूत बाणगंगा के तट पर जालिमसिंह पर हमला करने के लिये डट कर खड़े हो गये। इस पर जालिमसिंह ने पोलिटिकल एजेण्ट से सहायता मांगी। जालिमसिंह का संदेश पाकर कर्नल टॉड नीमच से कम्पनी सरकार की दो पलटनें, नौ रिसाले, एक तोपखाना तथा लेफ्टीनेंट क्लार्क, लेफ्टीनेंट मिलन और लेफ्टीनेंट कर्नल रिज को अपने साथ लेकर कोटा पहुँचा। जालिमसिंह की निजी आठ पलटनें, चौदह रिसाले और तेईस तोपें थीं। जालिमसिंह और कर्नल टॉड की संयुक्त सेनाओं ने किशोरसिंह की सेनाओं पर आक्रमण कर दिया।

    युद्ध बड़ा भयानक सिद्ध हुआ। इसमें महाराव का छोटा भाई पृथ्वीसिंह, लेफ्टीनेंट क्लार्क, लेफ्टीनेंट रीड तथा दोनों ओर के अनेक सैनिक मारे गये। पृथ्वीसिंह ने मरते समय अपना खंजर तथा अपने गले की मोतियों की माला पोलिटिकल एजेण्ट कर्नल टॉड को दे दीं तथा निवेदन किया कि मेरे पुत्र रामसिंह को याद रखना। किशोरसिंह पराजय स्वीकार करके नाथद्वारा चला गया। उसके साथ पृथ्वीसिंह का पुत्र कुंवर रामसिंह भी था। किशोरसिंह ने पाँच विवाह किये थे। केवल एक रानी के गर्भ से एक पुत्र उत्पन्न हुआ था। जो चार वर्ष का होकर मर गया था। अतः किशोरसिंह रामसिंह को ही अपना पुत्र मानता था।

    किशोरसिंह नाथद्वारा में श्रीनाथजी के चरणों में बैठकर भजन करता रहा और उसकी खड़ाऊँ कोटा में शासन करती रहीं। वह लगभग 9 माह तक नाथद्वारा में रहा। अंत में उसे श्रीनाथजी की पाद सेवा का फल प्राप्त हुआ और मेवाड़ महाराणा के प्रयत्नों से किशोरसिंह तथा जालिमसिंह में समझौता हो गया। ई.1822 में किशोरसिंह कोटा लौट आया। झाला जालिमसिंह तथा पोलिटिकल एजेण्ट कर्नल टॉड ने कोटा से 6 किलोमीटर बाहर आकर महाराव का स्वागत किया। कोटा में भारी खुशियां मनायी गयीं। जालिमसिंह ने महाराव को फिर से गद्दी पर बैठाकर उसे 25 स्वर्ण मोहरें भेंट कीं।

    कर्नल टॉड के कहने पर किशोरसिंह तथा जालिमसिंह का पुत्र माधोसिंह गले मिले तथा दोनों ने पिछली बातों के लिये एक दूसरे के प्रति खेद प्रकट किया। सारे गड़बड़ झाले के लिये झाला जालिमसिंह ने अपने आप को तो धिक्कारा ही साथ ही अपने पुत्र माधोसिंह से भरे दरबार में कहा कि यह सब तेरे कुकृत्यों का फल है जो मेरे स्वामी को इतना कष्ट हुआ और मुझे इतनी लज्जा उठानी पड़ी।

    ई.1824 में 85 वर्ष की आयु में जालिमसिंह की मृत्यु हुई। यद्यपि सूर्यमल्ल मिश्रण, कर्नल टॉड तथा मथुरालाल शर्मा ने उसकी स्वामिभक्ति पर अंगुली उठायी है किंतु इतिहास की नंगी सच्चाई यह है कि वह युग जो दुनिया भर की मक्कारियों से भरा हुआ था, उसमें जालिमसिंह जैसा वीर, लड़ाका, बुद्धिमान, नेक और स्वामिभक्त फौजदार मिलना मुश्किल था। वह अपने पिता झाला हिम्मतसिंह का दत्तक पुत्र था। उसने कोटा को जयपुर, मेवाड़, मराठों तथा पिण्डारियों से बचाया था। अन्यथा कोटा राज्य को इनमें से कोई शक्ति निगल चुकी होती और किशोरसिंह जैसे अयोग्य, अदूरदर्शी राजा का कोई निशान भी नहीं मिलता।

    वस्तुतः महाराव किशोरसिंह उस युग की अभिशप्त राजनीति से ग्रस्त राजा था जो चापलूसों की भीड़ में घिरे रहकर केवल अपने अधिकार को भोगने के लिये लालायित रहते थे। यदि उसके स्थान पर कोई अन्य बुद्धिमान राजा होता तो वह जालिमसिंह जैसे सेवक की सेवाओं का उपयोग अपने और अपने राज्य के भाग्य को संवारने में लगाता।

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  • अध्याय - 17 शिल्पग्राम संग्रहालय उदयपुर

     02.06.2020
    अध्याय - 17 शिल्पग्राम संग्रहालय उदयपुर

    अध्याय - 17 शिल्पग्राम संग्रहालय उदयपुर


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    शिल्पग्राम संग्रहालय, उदयपुर नगर के पश्चिम में हवाला गांव के निकट ग्रामीण शिल्प एवं लोककला परिसर ‘शिल्पग्राम’ में स्थित है। यह संग्रहालय अरावली पर्वतमालाओं के ग्रामीण परिवेश के बीच स्थित होने से दर्शकों को अनूठा अनुभव प्रदान करता है। इसकी स्थापना 70 एकड़ भूमि में की गई है।

    यह अरावली उपत्यकाओं के ग्रामीण तथा आदिम संस्कृति एवं जीवन शैली को दर्शाने वाला एक जीवन्त संग्रहालय है। इस परिसर में पश्चिमी भारत के पांच राज्यों की पारंपरिक वास्तु कला को दर्शाने वाली झौंपड़ियाँ निर्मित की गई हैं जिनमें इन राज्यों के भौगोलिक एवं सांस्कृतिक परिवेश तथा आदिवासियों के रहन-सहन को दर्शाया गया है।

    इस संग्रहालय में ग्रामीण अंचल में बनने वाली हस्तशिल्प कलाकृतियां प्रदर्शित की गई हैं जिन्हें दर्शक खरीद भी सकते हैं। यहाँ हथकरघों पर कार्य करते हुए बुनकरों को देखना बहुत रोमांचकारी होता है। मोलेला के कलाकारों द्वारा बनाई गई टैराकोटा कलाकृतियां भी प्रदर्शित की गई हैं। इस परिसर में राजस्थान की सात झौंपड़ियाँ हैं। दो झौंपड़ियाँ बनुकरों का आवास हैं जिनका प्रतिरूप राजस्थान के रेगिस्तान में स्थित गांव ‘रामा’ (जिला जालोर) तथा ‘सम’ (जिला जैसलमेर) से लिया गया है।

    मेवाड़ के पर्वतीय अंचल में रहने वाले कुंभकार की झौंपड़ी उदयपुर जिले के गांव ‘ढोल’ से ली गई है। दो अन्य झौंपड़ियाँ दक्षिणी राजस्थान की भील तथा सहरिया आदिवासियों की हैं जो मूलतः कृषक हैं। शिल्पग्राम में गुजरात राज्य की प्रतीकात्मक बारह झौंपड़ियाँ हैं। इनमें से छः झौंपड़ियाँ गुजरात प्रांत के कच्छ क्षेत्र के ‘बन्नी’ तथा ‘भुजोड़ी’ गांव से ली गई हैं।

    बन्नी झोंपड़ियों में रहने वाली रेबारी, हरिजन एवं मुस्लिम जाति के परिवारों की 2-2 झौंपड़ियाँ है जो कांच की कशीदाकारी, भरथकला तथा रोगनकाम के सिद्धहस्त शिल्पी माने जाते हैं। लांबड़िया उत्तर गुजरात के गांव ‘पोशीना’ के मृण-शिल्पी का आवास है जो विशेष प्रकार के घोड़े बनाते हैं। इसी के समीप पशिचमी गुजरात के छोटा उदयपुर क्षेत्र के ‘वसेड़ी’ गांव के बुनकर का आवास है।

    गुजरात के आदिम-कृषक-समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली राठवा और डांग जनजातियों की झौंपड़ियाँ हैं जो अपने पारंपरिक वास्तु-शिल्प एवं भित्ति-अलंकरणों के कारण सबसे अलग दिखाई देती हैं। लकड़ी की श्रेष्ठ नक्काशी से तराशी गई पेठापुर हवेली गुजरात के गांधीनगर जिले की काष्ठ कला का बेजोड़ नमूना है।

    शिल्पग्राम में शिल्प-बाजार, मृण-कला संग्रहालय, कांच जड़ित कार्य, भित्तिचित्र, बच्चों के लिए झूले, घोड़ा एवं ऊँट की सवारी आदि मुख्य आकर्षण हैं। यह प्रतिदिन प्रातः 11 बजे से सायं 7.00 बजे तक दर्शकों के लिए खुला रहता है।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-53

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-53

    पर्यावरणीय संस्कृति की पहचान : पशुमेले


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    पशुओं के क्रय-विक्रय के लिये पूरे प्रदेश में प्रति वर्ष 250 से अधिक पशु मेले लगते हैं जिनमें दूर-दूर के प्रांतों के पशु पालक एवं पशु व्यापारी आते हैं। राज्य सरकार द्वारा 12 मेलों को राज्य स्तरीय पशु मेलों में सम्मिलित किया गया है। इन मेलों में पशुओं के क्रय-विक्रय से राज्य के पशु पालकों को 50 से 60 करोड़ रुपयों की आय होती है। अधिकतर पशु मेले लोक देवताओं के नाम पर लगते हैं। मेलों में पशुपालकों को राज्य सरकार की ओर से पानी, बिजली, आवास, सुरक्षा, पशु चिकित्सा एवं टीकाकरण, मानव चिकित्सा आदि की सुविधाएं उपलब्ध करवाती है।

    राज्य स्तरीय मेलों में नागौर जिले में तीन मेले (श्री रामदेव पशु मेला नागौर, श्री बलदेव पशु मेला मेड़ता सिटी एवं श्री वीर तेजाजी पशु मेला परबतसर), झालवाड़ जिले में दो (श्री गोमती सागर पशु मेला झालरापाटन तथा श्री चंद्रभागा पशु मेला झालरापाटन), हनुमानगढ़ जिले में एक (श्री गोगामेड़ी पशु मेला गोगामेड़ी), भरतपुर जिले में एक (श्री जसवंत प्रदर्शनी एवं पशु मेला भरतपुर), अजमेर जिले में एक (श्री कार्तिक पशु मेला पुष्कर), करौली जिले में एक (श्री महा शिव रात्रि पशु मेला करौली), बाड़मेर जिले में एक (श्री मल्लीनाथ पशु मेला तिलवाड़ा), अलवर जिले में एक (बहरोड़ पशुमेला) तथा चित्तौड़गढ़ जिले में एक (चित्तौड़गढ़ पशु मेला) सम्मिलित हैं। इनमें से श्रीरामदेव पशु मेला नागौर, श्री बलदेव पशुमेला मेड़तासिटी, गोगामेड़ी पशुमेला गोगामेड़ी, पुष्कर पशु मेला पुष्कर तथा मल्लीनाथ पशु मेला तिलवाड़ा राजस्थान के पाँच प्रमुख पशु मेलों में गिने जाते हैं।

    राजस्थान के नागौर जिले में राज्य सरकार सर्वाधिक पशु मेलों का आयोजन करती है। नागौर जिले में तीन बड़े पशु मेले लगते हैं। ये तीनों ही प्रदेश स्तरीय हैं। इन तीनों ही मेलों में नागौर नस्ल के बैलों की बड़ी भारी संख्या में बिक्री होती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार आदि राज्यों में जहाँ कि कृषि जोत काफी छोटी है तथा उन खेतों में टैªक्टर आदि मशीनें नहीं चलाई जा सकतीं वहाँ नागौरी बैलों से खेती की जाती है। यही कारण है कि उत्तर एवं मध्य भारत के कई राज्यों के कृषक इन मेलों में आते हैं और बड़ी संख्या में बैलों को खरीद कर ले जाते हैं। नागौर जिला मुख्यालय, मेड़तासिटी तथा परबतसर में आयोजित होने वाले पशु मेलों में हजारों की संख्या में नागौरी नस्ल के बैल बिकते हैं।

    श्री रामदेव पशु मेला

    इस मेले का आयोजन जिला मुख्यालय नागौर पर होता है। किसी समय मानासर गाँव के समतल भू-भाग पर रामदेवजी की मूर्ति स्वतः प्रकट हुई। श्रद्धालुओं ने यहाँ पर छोटा सा मंदिर बना दिया। आस-पास के गाँवों के पशु पालक इस मंदिर में अपने पशुओं के स्वास्थ्य के लिये मनौती मांगने आने लगे। धीरे-धीरे इस स्थान पर पशुओं का मेला भरने लगा। आजादी के बाद राजस्थान सरकार ने इसे राज्य स्तरीय पशु मेलों में शामिल कर लिया। फरवरी 1958 से पशु पालन विभाग इस मेले का संचालन करता आ रहा है। यह मेला प्रति वर्ष नागौर कस्बे से लगे हुए मानासर गाँव में माघ माह में भरता है। इस मेले में नागौरी बैलों की बड़ी संख्या में बिक्री होती है।

    श्री बलदेव पशु मेला, मेड़ता सिटी

    राज्य सरकार द्वारा यह पशु मेला बलदेव राम मिर्धा की स्मृति में मेड़ता सिटी में चैत्र सुदी 1 से चैत्र सुदी 15 तक आयोजित किया जाता है। इस मेले में नागौरी बैलों की खरीद फरोख्त अधिक होती है। बैलों के साथ-साथ ऊँट, गधे, बकरी, भैंस आदि पशु भी बिकने आते हैं।

    श्री वीर तेजाजी पशु मेला, परबतसर

    यह पशु मेला लोक देवता वीर तेजाजी की स्मृति में श्रावण मास की पूर्णिमा से भाद्रपद की अमावस्या तक लगता है। पशु पालन विभाग ने इस मेले की बागडोर सन 1957 में संभाली। यह पशु मेला आमदनी के लिहाज से प्रदेश का सबसे बड़ा मेला है। 1734 ई. में जोधपुर के महाराजा अजीत सिंह ने तेजाजी का देवल बनाकर तथा तेजाजी की मूर्ति स्थापित कर इस पशु मेले की शुरूआत की।

    श्री कार्तिक पशु मेला, पुष्कर

    अजमेर जिले में हिंदुओं का प्राचीन तीर्थ पुष्कर राज स्थित है जिसे तीर्थ राज प्रयाग का गुरु कहा जाता है। यहाँ प्रत्येक वर्ष कार्तिक माह की एकादशी से पूर्णिमा तक पशु मेले का आयोजन होता है। इस मेले का आरंभ इन तिथियों में सरोवर स्नान के महात्म्य को लेकर हुआ था। यह कई हजार वर्ष पुराना धार्मिक मेला है जिसने अब पशु मेले का रूप ले लिया है। पुष्कर मेले में बड़ी संख्या में ऊँटों के क्रय-विक्रय तथा लोक कलाओं का प्रदर्शन होता है। यह मेला अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर चुका है। इस कारण प्रति वर्ष सैंकड़ों विदेशी पर्यटक इस मेले को देखने आते हैं। राज्य सरकार इस मेले में कई तरह की सुविधाएं उपलब्ध करवाती है। मेला परिसर में राज्य सरकार के विभिन्न विभागों की ओर से प्रदर्शनी भी लगायी जाती है।

    मल्लीनाथ पशु मेला, तिलवाड़ा

    बाड़मेर जिले के तिलवाड़ा मेले में थारपारकर एवं कांकरेज नस्ल की गायें तथा मालानी नस्ल के घोड़े बड़ी संख्या में बिकने के लिये आते हैं। इस मेले का आयोजन प्रति वर्ष चैत्रमास में किया जाता है। इन मेलों के आयोजन से पर्यावरण को बचाने में बड़ी सहायता मिलती है। इन मेलों के माध्यम से राजस्थान का पशुधन देश के दूरस्थ भागों में पहुंचता है जिससे देश की कृषि के यांत्रिकीकरण की गति रुकती है। पशुमेलों के माध्यम से पशुओं के विक्रय के कारण पशुवध की गति पर विराम लगता है। यदि राज्य में इतनी बड़ी संख्या में पशु मेलों का आयेाजन नहीं होता तो बड़ी संख्या में पशुओं के राजस्थान में ही निवास करने के कारण उनमें भेाजन, पानी एवं स्थान के लिये संघर्ष होता तथा बड़ी संख्या में पशुओं को मरने से नहीं बचाया जा सकता था।

    गधों का मेला, भावगढ़ बंध्या

    जयपुर जिले की सांगानेर पंचायत समिति में स्थित भावगढ़ बंध्या में प्रतिवर्ष गधों, खच्चरों एवं घोड़ों का एक मेला भरता है। किसी समय इस मेले में पच्चीस हजार गधे आते थे किंतु अब इनकी संख्या घटकर पाँच हजार रह गयी है। इस मेले का प्रारंभ बिना किसी उद्घाटन के होता है। क्योंकि कोई भी जन प्रतिनिधि इस मेले के उद्घाटन के लिये उपलब्ध नहीं होता है।

    जालोर जिले के मेले

    जालोर जिले के रानीवाड़ा एवं सांचोर कस्बों में प्रतिवर्ष विशाल पशु मेलों का आयोजन होता है। इन मेलों में अन्य पशुओं के अतिरिक्त सांचोरी किस्म की गायें बड़ी संख्या में बिकने के लिये आती हैं।

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  • अध्याय - 24 आर्यों की वर्ण व्यवस्था

     02.06.2020
    अध्याय - 24 आर्यों की वर्ण व्यवस्था

    आर्यों की वर्ण व्यवस्था


    इस संसार में जन्म से कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र या म्लेच्छ नहीं होता है, गुण तथा कर्म के भेद से ही होता है। - शुक्रनीति, प्रथम अध्याय।


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    भारतीय संस्कृति की मुख्य विशेषताओं को समझने के लिए आर्यों द्वारा स्थापित वर्ण व्यवस्था को समझना अत्यन्त आवश्यक है क्योंकि भारतीय संस्कृति के मूल में आज भी वर्ण व्यवस्था, अपने बदले हुए स्वरूप में विद्यमान है। आर्यों के सामाजिक संगठन का इतिहास पाँच हजार वर्ष से भी अधिक पुराना है। जब विश्व के अधिकांश भू-भागों में सभ्यता अपने उषा-काल में थी, तब ही आर्यों की सामाजिक व्यवस्था सुव्यवस्थित रूप ले चुकी थी।

    आर्यों ने 'जन' अर्थात् कबीलों के रूप में बसने से पहले ही इस बात को भली-भांति समझ लिया था कि मनुष्य जाति के सामाजिक संगठन की सबसे छोटी इकाई 'परिवार' है न कि 'व्यक्ति'। 'व्यक्ति' 'परिवार' में सुरक्षित होता है, 'परिवार' 'कुटुम्ब' के भीतर सुरक्षित रहता है और 'कुटुम्ब' की सुरक्षा 'जन' में होती है। आर्यों के प्राचीनतम ग्रन्थ 'ऋग्वेद' में 'पारिवारिक-व्यवस्था' का विकसित स्वरूप दिखाई देता है। आर्यों ने अनुभव किया कि किसी भी 'जन' में रहने वाले व्यक्तियों, परिवारों एवं कुटुम्बों को एक दूसरे से सहयोग करना पड़ता है तथा अपनी क्षमता एवं रुचि के अनुसार विशिष्ट प्रकार के कार्य करने पड़ते हैं। ये विशिष्ट प्रकार के कार्य ही आगे चलकर 'वर्ण व्यवस्था' का आधार बने।

    प्राचीन भारतीय ऋषि-मुनियों एवं चिन्तकों ने अनुभव किया कि मनुष्य के समस्त क्रिया-कलापों को चार भागों में विभक्त किया जा सकता है-

    (1.) यज्ञ-हवन एवं धािर्मक अनुष्ठान करना तथा करवाना, दान लेना एवं देना, बालकों को शिक्षा देना, मनुष्यों को श्रेष्ठ आचरण हेतु प्रेरित करना आदि।

    (2.) व्यक्ति, परविार, कुटुम्ब, जन, धार्मिक अनुष्ठान, गौ आदि पशु एवं ऋषि-मुनियों के आश्रमों की रक्षा करना।

    (3.) कृषि एवं पशुपालन के माध्यम से मनुष्यों के लिए भोजन सामग्री जुटाना, बाद में व्यापार भी इसमें जुड़ गया।

    (4.) 'जन' में निवास करने वाले व्यक्तियों के लिए ईंट बनाना, भवन बनाना, कुम्भ बनाना, कूप खनन करना, कृषि उपकरण बनाना, लकड़ी काटना आदि।

    इन चारों प्रकार के कार्य करने वालों को क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र नामक चार वर्णों में रखा गया। भारतीय ऋषियों ने 'आश्रम व्यवस्था' की तरह 'वर्ण व्यवस्था' को भी मनुष्य के लिए अनिवार्य बताया। कालांतर में वर्ण एवं आश्रम व्यवस्था को 'वर्णाश्रम धर्म' कहा जाने लगा।

    वर्ण शब्द की उत्पत्ति एवं उसका अर्थ

    वर्ण शब्द संस्कृत भाषा के 'वृ' धातु अथवा 'वर्ण' धातु से उत्पन्न हुआ है। जब यह शब्द, 'संज्ञा' रूप में प्रयुक्त होता है तो रंग, सौन्दर्य, अक्षर, स्वर, प्रशंसा आदि अर्थों को प्रकट करता है। क्रिया रूप में प्रयुक्त होने पर इसका अर्थ रंगना अथवा प्रकट करना होता है। वर्ण शब्द से आर्यों के चार सामाजिक वर्गों- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र का भी बोध होता है किंतु प्रारम्भ में वर्ण-व्यवस्था कतिपय भिन्न रूप में प्रकट हुई थी।

    त्वचा के रंग के आधार पर वर्णों की उत्पत्ति

    कुछ विद्वानों की मान्यता है कि भारत में आने से पूर्व आर्यों में वर्ण-व्यवस्था नहीं थी। एक परिवार, कुटुम्ब एवं जन में रहने वाले समस्त आर्य जीवन-यापन के लिए आवश्यक सभी कार्य करते थे। एक व्यक्ति एक काम छोड़कर दूसरा काम कर सकता था। जब आर्य भारत में आए तो उन्होंने स्वयं को 'गौर वर्ण' का तथा भारत के आदिवासियों को 'कृष्ण वर्ण' का पाया। आर्यों ने इन श्याम-वर्णी लोगों को 'अनार्य' कहा।

    त्वचा के रंग के भेद के कारण आर्यों में अपने रक्त की शुद्धता बनाए रखने की कामना उत्पन्न हुई। इसलिए उन्होंने अनार्यों से दूरी बनाई। इस प्रकार त्वचा के रंग के आधार पर उस काल के भारतीय समाज में दो वर्ण बन गए- (1.) आर्य, तथा (2.) अनार्य। भारत में अनार्यों की अनेक समृद्ध एवं सुसंस्कृत बस्तियाँ विद्यमान थीं। अधिकांश इतिहासकारों की मान्यता है कि आर्यों ने उन 'दासों' अथवा 'दस्युओं' पर विजय प्राप्त कर उन्हें अपने अधीन कर लिया। अनार्य लोग, आर्य-जनपदों में आर्य-राजाओं की अधीनता में रहने लगे।

    आर्यों ने अनार्यों को परिश्रम पर आधारित छोटे-मोटे कार्य करने को दिए। आर्य लोग उन्हें अपने से हीन समझते थे। इस कारण अनार्यों की सामाजिक स्थिति आर्यों की अपेक्षा हीन हो गई तथा उन्हें 'दास' एवं 'दस्यु' कहा गया, जिसका अभिप्राय सेवक, अधीनस्थ एवं गुलाम होने से था। इस प्रकार आर्य जनपदों में रहने वाली प्रजा दो वर्णों में विभक्त हो गयी-

    (1.) आर्य: ये गौर वर्ण के थे, विजेता थे और स्वामि थे। वे याज्ञिक आदि श्रेष्ठ कर्म करते थे। इस कारण सब प्रकार से श्रेष्ठ थे।

    (2.) दास: ये श्याम वर्ण के थे, पराजित थे, सेवक थे और यज्ञ आदि श्रेष्ठ कर्मों से वंचित थे। इस कारण सब प्रकार से हीन थे।

    आर्यों और दासों के कामों में अंतर

    दास लोग 'शिल्प कर्म' में अत्यन्त चतुर थे। ये सुन्दर और विशाल भवनों का निर्माण करते थे और अनेक प्रकार के व्यवसायों में दक्ष थे। आर्यों द्वारा पराजित हो जाने के बाद भी उनकी, शिल्प एवं व्यवसाय सम्बन्धी निपुणता नष्ट नहीं हुई थी, अतः वे विभिन्न प्रकार के शिल्प एवं व्यवसायों में लगे रहे। आर्य श्रेष्ठ सैनिक और विजेता थे। वे याज्ञिक अनुष्ठानों को गौरव की बात समझते थे और भू-स्वामी बनकर खेती, पशु-पालन आदि द्वारा जीवन निर्वाह करते थे जबकि विविध प्रकार के शिल्प और श्रम आधारित कार्य अनार्यों के हाथों में रहे। फलस्वरूप प्राचीनकाल से ही भारत में शिल्पियों को कुछ हीन समझने की प्रवृत्ति रही।

    व्रात्यों की उत्पत्ति

    समाज में आर्यों की अपेक्षा अनार्यों अथवा दासों की संख्या अधिक थी। इसलिए स्वाभाविक था कि आर्य युवक, अनार्य युवतियों से विवाह करें। इस कारण आर्यों एवं अनार्यों में पारस्परिक वैवाहिक सम्बन्ध भी होने लगे। इस कारण आर्य-प्रदेशों में ऐसे लोगों की संख्या निरन्तर बढ़ती गई, जो शुद्ध आर्य या शुद्ध दास न होकर वर्णसंकर थे। ऐसे वर्णसंकर लोगों को ही सम्भवतः 'व्रात्य' कहा जाता था।

    अथर्ववेद में व्रात्य जातियों का उल्लेख अनेक स्थानों पर मिलता है। बाद में 'व्रात्य-सोम-यज्ञ' द्वारा व्रात्यों को आर्य जाति में सम्मिलित करने की व्यवस्था की गई थी। इससे स्पष्ट है कि वैदिक युग में आर्यों और दासों का भेद बहुत स्पष्ट था तथा आर्य-जनपदों में दो वर्ण स्पष्ट रूप से विद्यमान थे किंतु अथर्ववेद का युग आते-आते आर्यों एवं दासों की वर्ण-संकर संततियों को आर्य-वर्ण में सम्मिलित किया जाने लगा।

    कर्म के आधार पर वर्णों की उत्पत्ति

    ऋग्वेद मंे ब्राह्मणों और क्षत्रियों का उल्लेख कई स्थानों पर हुआ है किन्तु वैश्यों और शूद्रों का उल्लेख केवल 'पुरुष सूक्त' में मिलता है। पुरुष सूक्त को प्रायः समस्त विद्वान् बाद में जोड़ा हुआ मानते हैं। अतः कहा जा सकता है कि ऋग्वैदिक-काल में कर्म के आधार पर दो वर्ण अस्त्तिव में आए-

    (1.) ब्राह्मण: जब आर्य लोग स्थायी रूप से भारत में बस गए तब उनके विधि-विधानों एवं अनुष्ठानों में भी वृद्धि हो गयी। प्राचीन काल का सादगी पूर्ण और सरल धर्म अधिकाधिक जटिल होता चला गया। ऐसी परिस्थिति में यह स्वाभाविक था कि कुछ लोग जटिल याज्ञिक कर्मकाण्ड में विशेष निपुणता प्राप्त करें। इन्हें ब्राह्मण कहा गया क्योंकि वे 'ब्रह्म' अर्थात् 'ईश्वर' सम्बन्धी ज्ञान में निपुण थे। उन्हें भी 'आर्य-विशः' अर्थात् जन-सामान्य आदर से देखने लगा।

    (2.) क्षत्रिय: बहुत बड़ी संख्या में अनार्य अब भी आर्य जनों से स्वतंत्र थे। उनसे आर्यों का निरंतर संघर्ष चलता था। अतः आर्यों को ऐसे वीर सैनिकों की आवश्यकता अनुभव हुई जो युद्ध-विद्या में निपुण हों तथा निरंतर युद्धरत रह सकें ताकि शेष 'विषः' (प्रजा) शांति के साथ यज्ञ-हवन आदि कर सके। 'जन' के शत्रुओं से 'प्रजा' की रक्षा करना ही उन सैनिकों का मुख्य कार्य था। क्षति (हानि) से त्राण (रक्षा) करने के कारण उन्हें 'क्षत्रिय' कहा गया। ये क्षत्रिय, आर्य-विशः के ही अंग थे किन्तु उन्हें सर्वसाधारण लोगों से अधिक सम्मानित और ऊँचा समझा गया। क्षत्रिय सैनिकों के विशिष्ट कुल 'राजन्य' कहलाते थे। सम्भवतः ये राजन्य ही अपने में से किसी एक को राजा स्वीकार कर लेते थे।

    (3.) जन-साधारण अर्थात् आर्य-विशः: जन-साधारण अर्थात् 'आर्य-विशः' का कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छा से 'ब्राह्मण कर्म' अथवा 'क्षत्रिय कर्म' कर सकता था अथवा एक कर्म को छोड़कर दूसरा कर्म स्वीकार कर सकता था। किसी व्यक्ति की कर्म-स्वीकार्यता का आधार उसकी कर्म में निपुणता एवं रुचि होती थी। ब्राह्मण का पुत्र ब्राह्मण ही हो, अथवा क्षत्रिय का पुत्र क्षत्रिय हो, यह अनिवार्य नहीं था।

    पंच-जन का उदय तथा विस्तार

    ऋग्वेद में अनेक स्थलों पर 'पंचजनाः' और 'पंचकृष्टयः' शब्दों का उल्लेख हुआ है। ये निश्चय ही उस युग के आर्यों के पाँच प्रमुख कबीले थे जो अपनी अलग-अलग पहचान रखते थे। ये पंच-जन- अनु, द्रुह्यु, यदु, तुर्वशु और पुरू थे। वेदों में इन 'पंच-जन' के अलावा भरत, त्रित्सु, श्ृंजय आदि अन्य जनों का उल्लेख भी मिलता है। इससे अनुमान होता है कि ज्यों-ज्यों आर्यों का भारत में विस्तार होता गया, उनमें विविध जनों का गठन भी होता गया।

    प्रत्येक जन में समस्त व्यक्तियों की स्थिति एक समान थी और एक जन के समस्त व्यक्ति एक ही 'विशः' (जनता) के अंग समझे जाते थे। विभिन्न 'जन' एक-दूसरे से स्वाभाविक प्रतिद्वंद्विता अथवा सौहार्द रखते थे किंतु उनमें किसी तरह का जातीय अथवा वर्ण सम्बन्धी भेद नहीं था।

    ऋग्वैकिद काल में दासों की स्थिति

    यद्यपि आर्य, दासों अथवा दस्युओं को अपने से हीन समझते थे तथापि उन्हें अस्पृश्य नहीं समझा जाता था। ऋग्वैदिक-काल में कुछ दास परिवार, बहुत समृद्ध थे तथा आर्य ब्राह्मण, उनसे दान-दक्षिणा स्वीकार करते थे। ऋग्वेद के एक मन्त्र में बल्बूथ नामक दास द्वारा सौ गायें दान में देने का उल्लेख है। कुछ मन्त्रों में आर्य ब्राह्मणों द्वारा दासों के हित-सुख के लिए प्रार्थना की गई है।

    उत्तर-वैदिक युग में चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था का उदय

    यजुर्वेद तथा अथर्ववेद में अनेक स्थानों पर चार वर्णों का उल्लेख हुआ है। इस काल में याज्ञिक कर्मकाण्ड जटिल हो चुके थे तथा उनकी प्रक्रियाओं को सम्पादित करने के लिए विशेषज्ञता एवं शिक्षा-दीक्षा की आवश्यकता होने लगी। इस कारण ब्राह्मण पुत्र ही इस शिक्षा को भलीभंाति प्राप्त करने लगे। सामान्य आर्य विषयः के लिए इस वर्ग का द्वार धीरे-धीरे बंद होता जा रहा था। इसी प्रकार क्षत्रियों को भी अब अधिक पराक्रम के साथ-साथ श्रेष्ठ रथी होने और युद्ध-व्यूह रचना करने में निपुणता की आवश्यकता होने लगी। अतः क्षत्रिय कर्म में भी वंश परम्परा की शुरुआत होने लगी। इन योद्धाओं एवं राजाओं के बल पर आर्यों ने बहुत से नए प्रदेशों पर अधिकार करने में सफलता प्राप्त की।

    वैश्य वर्ण की उत्पत्ति: उत्तर-वैदिक-काल के आते-आते आर्यों को यज्ञ-कर्म एवं युद्ध-कर्म के साथ-साथ समाज के अन्य कार्यों में भी विशिष्टता एवं निपुणता की आवश्यकता अनुभव होने लगी। इस कारण शिल्पी, वणिक्, कृषक, पशु-पालक आदि भी दो वर्णों में पृथक् होने लगे। उन्हें 'विशः' या 'वैश्य' कहा गया और तीसरा वर्ण सामने आया। 'ताण्ड्य ब्राह्मण' वैश्यों को ब्राह्मणों एवं क्षत्रियों से निम्न श्रेणी का घोषित करता है। शूद्र वर्ण की उत्पत्ति: समाज का अब भी बहुत बड़ा वर्ग ऐसा था जो उपरोक्त तीनों वर्णों से बाहर रहा।

    यह वर्ग आर्य-गृहस्थों की सेवा-टहल करने, हाथों से कार्य करने, मिट्टी के बर्तन बनाने, चमड़े का काम करने, धातुकर्म करने आदि से सम्बन्धित था। इन कार्यों को करने के लिए किसी विशेष प्रतिभा, कौशल एवं दक्षता की आवश्यकता नहीं होती थी इसलिए इन्हें क्षुद्र कार्य अर्थात् छोटा कार्य कहा गया। क्षुद्र कार्य करने वालों को 'क्षुद्र' कहा गया तथा आगे चलकर यही क्षुद्र शब्द 'शूद्र' में बदल गया।

    क्षुद्र कार्य करने वालों के लिए लिए आध्यात्मिक उन्नति करना आवश्यक नहीं समझा गया। इसलिए यह वर्ग शनैः-शनैः यज्ञ करने, यज्ञोपवीत धारण करने, युद्ध करने आदि आदि अभिजात्य कर्मों से वंचित होने लगा।

    उत्तर-वैदिक ग्रंथों में वर्ण-उत्पत्ति के सिद्धांत

    ऋग्वेद के पुरुषसूक्त की एक ऋचा में समाज में चार वर्णों की उत्पत्ति का रूपक खड़ा किया गया है जिसके अनुसार विराट पुरुष (ब्रह्म) के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, जंघाओं से वैश्य तथा चरणों से शूद्रों की उत्पत्ति हुई। वर्ण-उत्पत्ति के इस रूपक से आर्यों के चारों वर्णों की समाज में भूमिका, महत्ता एवं स्थिति का भान होता है। चूंकि ऋग्वेद काल में वैश्य एवं शूद्र वर्णों की उत्पत्ति नहीं हुई थी इसलिए अनुमान लगाया जाता है कि यह रूपक उत्तर-वैदिक-काल में ऋग्वेद में जोड़ा गया होगा। बाद में इस रूपक को महाभारत के शांति पर्व, मनुस्मृति, विष्णु-पुराण तथा वायुपुराण में भी दोहराया गया। ऋग्वेद के बाद के ग्रंथों में शूद्रों को शेष वर्णों की सेवा करने हेतु उत्पन्न माना गया।

    बृहदारण्यकोपनिषद् में कहा गया है कि प्रारम्भ में ब्रह्म अकेला था वह ब्राह्मण रूप था। उसने अकेले प्रगति न कर सकने के कारण एक और रूप बनाया। यह दूसरा रूप क्षत्र था जिसमें इन्द्र, वरुण, सोम, रुद्र, पर्जन्य, यम, मृत्यु तथा ईशान देवता सम्मिलित थे। तब भी संतुष्ट न होने पर उन्होंने वैश्यत्व का निर्माण किया जिसमें वसु, रुद्र, आदित्य, विश्वदेव तथा मरुत् आदि देव समाहित थे। इसके बाद भी न्यूनता अनुभव होने पर उन्होंने शूद्र के रूप में पूषण देवता का निर्माण किया। बृहदारण्यकोपनिषद् द्वारा प्रतिपादित इस सिद्धांत में चारों ही वर्णों को समान स्तर का माना गया है।

    उत्तर-वैदिक-काल में द्विज एवं उपनयन की अवधारणा

    यद्यपि उपनयन संस्कार वैदिक-काल से चला आ रहा था किंतु उत्तरवैदिक-काल में वह वर्ण की उच्चता की पहचान बन गया। उच्च वर्ण के व्यक्ति ही उपनयन संस्कार के बाद यज्ञोपवीत धारण कर सकते थे और केवल यज्ञोपवीत धारण करने वाले व्यक्ति को ही यज्ञ करने का अधिकार था। इस प्रकार उत्तर-वैदिक-काल में आध्यात्मिक उन्नति का अधिकार रखने एवं यज्ञोपवीत धारण करने के कारण ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य वर्ण, समाज के उच्च वर्ण समझे गए।

    यज्ञोपवीत धारण करने को मनुष्य का दूसरा जन्म माना गया तथा उन्हें 'द्विज' कहा गया। तैत्तिरीय ब्राह्मण ग्रन्थ में ब्राह्मण के लिए सूत के, क्षत्रिय के लिए सन के तथा वैश्य के लिए ऊन के यज्ञोपवीत धारण करने का विधान किया गया है। इसी ग्रन्थ में कहा गया है कि ब्राह्मण का वसंत ऋतु में, क्षत्रिय का ग्रीष्म ऋतु में और वैश्य का शीत ऋतु में 'उपनयन' होना चाहिए। इससे ज्ञात होता है कि ब्राह्मण ग्रन्थों की रचना के समय वर्ण-भेद भलीभाँति विकसित हो चुका था। इन भेदों के उत्पन्न हो जाने से शूद्र वर्ण को शेष तीनों वर्णों से निम्नतर समझा गया।

    उत्तर-वैदिक-काल में वर्ण-भेद की वास्तविक स्थिति

    यद्यपि ब्राह्मण ग्रन्थों के प्रणयन-काल तक वर्ण-भेद भलिभाँति विकसित हो चुके थे तथापि वर्ण का निर्धारण अभी तक पूर्णतः जन्म से नहीं होता था। कर्म अभी भी वर्ण-व्यवस्था का आधार बना हुआ था। राजा 'सुदास' ने ब्राह्मण 'वशिष्ठ' के स्थान पर क्षत्रिय कुलोत्पन्न 'विश्वामित्र' को अपना पुरोहित बनाया। जनक आदि अनेक क्षत्रिय राजा अध्यात्म एवं दार्शनिक चिन्तन के लिए देश भर में प्रसिद्ध थे। ब्राह्मण-पुत्र भी उनके पास आकर शिक्षा ग्रहण करते थे।

    ब्राह्मण 'श्वेतकेतु' का पिता 'उद्दालक', पांचाल के क्षत्रिय राजा 'प्रवाहण जाबालि' के पास ज्ञान-प्राप्ति के लिए गया। ब्राह्मण गुरु अज्ञात कुलोत्पन्न बालकों को भी विद्या प्रदान करते थे। 'छान्दोग्य उपनिषद्' में कथा आती है कि 'सत्यकाम जाबाल' जब 'गौतम ऋषि' के पास विद्याध्ययन के लिए गया तो आचार्य ने उसके पिता का नाम एवं गौत्र पूछा। सत्यकाम ने कहा कि मुझे अपने पिता एवं गौत्र का पता नहीं है क्योंकि मेरी माता एक परिचारिका के रूप में अनेक घरों में काम करती थी तभी मेरा जन्म हुआ।

    आचार्य गौतम ने उसे विद्याध्ययन कराना स्वीकार किया और विधिवत् यज्ञोपवीत संस्कार कराके उसे अपना शिष्य बनाया। उपनिषदों के काल में शूद्र भी ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर सकते थे। रैक्व ऋषि ने जानश्रुति पौत्रायन नामक शूद्र राजा को धर्म सम्बन्धी ज्ञान प्रदान किया था। अश्वपति कैकेय नामक क्षत्रिय राजा ने पांच ब्राह्मणों को तथा क्षत्रिय राजा प्रवाहण ने गौतम नामक एक ब्राह्मण को आत्मा एवं ब्रह्म सम्बन्धी उपदेश दिए।

    'ऐतरेय ब्राह्मण' का लेखक 'महिदास' किसी अज्ञात आचार्य की पत्नी 'इतरा' (शूद्रा दासी) का पुत्र था। इसीलिए वह 'ऐतरेय' नाम से विख्यात हुआ। ऐतरेय ब्राह्मण में एक कथा आती है कि एक बार ऋषि-मुनियों ने कहा कि यह तो परम विद्वान् है, देवता भी इसे जानते हैं। ऐतरेय ब्राह्मण में 'शूद्र कवष ऐलूष' का उल्लेख है जिसे विद्वता के कारण ऋषियों में सम्मिलित किया गया और वह ऋग्वेद की कुछ ऋचाओं का ऋषि भी बना। एक अन्य प्राचीन कथा के अनुसार 'राजा शान्तनु' के भाई 'देवापि' ने याज्ञिक अनुष्ठान में दक्षता प्राप्त करके ब्राह्मण पद प्राप्त कर लिया। उस काल में भिन्न वर्णों में वैवाहिक सम्बन्ध भी होते थे।

    'महर्षि च्यवन' (ब्राह्मण) ने 'राजन्य शर्याति' (क्षत्रिय) की कन्या से विवाह किया था। इन उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि इस काल में कोई भी व्यक्ति अपनी प्रतिभा के आधार पर एक वर्ण से दूसरे वर्ण में चला जाता था।

    महाभारत काल में शूद्रों की स्थिति

    महाभारत के मूल स्वरूप का रचनाकाल ई.पू. चौथी शताब्दी (मौर्यकाल) अथवा उससे भी पूर्व का माना जाता है तथा वर्तमान स्वरूप चौथी शताब्दी ईस्वी (गुप्तकाल) माना जाता है। अतः यह कहना कठिन है कि महाभारत की कौनसी बात किस काल में लिखी गई। महाभारत के शांति पर्व के अनुसार वर्ण-व्यवस्था का आधार कर्म है, न कि जन्म। संभवतः महाभारत में आया यह उल्लेख मौर्यकाल से भी बहुत पहले किया गया होगा-


    न विशेषोऽस्ति वर्णानां सर्वं ब्राह्ममिदं जगत्।

    ब्रह्मणा पूर्वसृष्टं हि कर्मभिर्वर्णतां गतम्।।

    अर्थात् वर्णों में कोई भेद नहीं है। ब्रह्मा के द्वारा रचा गया यह सारा संसार पहले सम्पूर्णतः ब्राह्मण ही था। मनुष्यों के कर्मों द्वारा यह वर्णों में विभक्त हुआ।

    सूत्र ग्रन्थों के काल में विभिन्न वर्णों की स्थिति

    ब्राह्मण ग्रन्थों के बाद सूत्र ग्रन्थों की रचना हुई थी। ये सूत्र ग्रन्थ तीन प्रकार के हैं- श्रौत सूत्र, गृह्य सूत्र और धर्म सूत्र। इन ग्रन्थों का रचनाकाल सामान्यतः ई.पू.600 से ई.पू.400 माना जाता है। सूत्र ग्रन्थों में वर्ण-व्यवस्था और वर्ण-भेद के स्पष्ट उल्लेख हैं।

    ब्राह्मण वर्ण: इस काल में ब्राह्मणों को सर्वश्रेष्ठ समझा जाता था। 'गौतम धर्म सूत्र' में कहा गया है कि राजा अन्य समस्त वर्णों से श्रेष्ठ है किन्तु ब्राह्मणों से नहीं। ब्राह्मणों का आदर-सत्कार करना राजा का परम् कर्त्तव्य है। यदि कोई ब्राह्मण आ रहा हो, तो राजा को उसके लिए मार्ग छोड़़ देना चाहिए। धर्म सूत्रों में ब्राह्मणों को अवध्य, अदण्ड्य, अबहिष्कार्य और अबन्ध्य कहा गया है तथा ब्रह्म-हत्या को घोर पाप बताया गया है। यह भी व्यवस्था की गई है कि ब्राह्मणों से किसी प्रकार का कोई कर न लिया जाय, क्योंकि वह वेदपाठ करता है और विपत्तियों का निवारण करता है। इस युग में ब्राह्मण वर्ण का आधार जन्म से माना जाने लगा। विशेष परिस्थितियों में ब्राह्मणों को यह अनुमति दी गई थी कि वे अन्य वर्णों के कार्य भी कर सकें। बोधायन धर्मसूत्र के अनुसार संकटकालीन परिस्थितियों में ब्राह्मण के लिए शस्त्र धारण करना उचित है। आवश्यकता होने पर वैश्य भी शस्त्र धारण कर सकते थे।

    क्षत्रिय वर्ण: समाज में क्षत्रियों का स्थान ब्राह्मणों के नीचे था। क्षत्रियों का कार्य बाह्य शत्रुओं से प्रजा की रक्षा करना तथा राज्य में शन्ति बनाए रखना था। इन कार्यों के लिए ब्राह्मणों के सहयोग की आवश्यकता स्वीेकार की गई थी। वैदिक युग में भी यह विचार विद्यमान था कि ब्रह्म-शक्ति और क्षत्र-शक्ति एक दूसरे की पूरक हैं। सूत्र ग्रन्थों में अनेक स्थानों पर राजा और क्षत्रिय वर्ग के लिए ब्राह्मणों के सहयोग की आवश्यकता बताई गई है।

    वैश्य वर्ण: वैश्य वर्ग के लोगों का कार्य कृषि, पशु-पालन, वाणिज्य और महाजनी करना था किन्तु संकटकालीन परिस्थितियों में उन्हें शस्त्र धारण करने की अनुमति दी गई थी।

    शूद्र वर्ण: सूत्रकाल के आते-आते समाज में शूद्रों की स्थिति पहले से हीन हो गई। समाज में उनकी भूमिका तीनों उच्च वर्णों के लोगों की सेवा करने तक सीमित हो गई थी। 'गौतम धर्मसूत्र' में कहा गया है कि उच्च वर्ण के लोगों के जीर्ण-शीर्ण जूते एवं वस्त्र आदि, शूद्रों के प्रयोग के लिए दिये जाएं तथा उच्च वर्णों के लोगों के भोजन-पात्रों में बची झूठन से शूद्र अपनी भूख शान्त करें। शूद्र हत्या करने पर उसी दण्ड की व्यवस्था की गई जो कौवे, मेंढक, कुत्ते आदि की हत्या के लिए निर्धारित थी।

    शूद्रों को न तो वेद पढ़ने का अधिकार था और न यज्ञ करने का। 'गौतम धर्मसूत्र' में कहा गया है कि यदि कोई शूद्र, वेद-मन्त्र सुन ले तो उसके कानों में सीसा या लाख पिघलाकर डालना चाहिए और यदि कोई शूद्र, वेद मन्त्रों का उच्चारण करे, तो उसकी जीभ काट लेनी चाहिए। शूद्रों के लिए उपनयन संस्कार वर्जित था। अतः उन्हें शिक्षा ग्रहण करने का अवसर प्राप्त नहीं हो सकता था।

    किसी प्रकार की शिक्षा प्राप्त न कर सकने के कारण उनके लिए यही एकमात्र कार्य रह जाता था कि वह तीनों वर्णों की सेवा करके अपना जीवन निर्वाह करें। इस प्रकार समाज में शूद्रों की स्थिति अत्यंत हीन हो गई थी। सूत्रग्रंथों में ब्राह्मणों की जिस स्थिति का वर्णन किया गया है, वह बाद के युग में लिखे जाने वाले बौद्ध-ग्रंथों में वर्णित शूद्रों की स्थिति से मेल नहीं खाता। बौद्ध-ग्रंथों से पता चलता है कि बौद्ध-काल में शूद्रों की स्थिति उतनी गिरी हुई नहीं थी।

    इससे अनुमान होता है कि गौतम धर्मसूत्र में शूद्रों के लिए जो कुछ भी कहा गया है, वह बाद के किसी काल में जोड़ा गया है। क्योंकि सूत्रकाल मौर्यकाल से पहले प्रारम्भ होता है तथा मौर्यकाल में वर्ण-व्यवस्था कर्म-आधारित थी न कि जन्म आधारित। सूत्रकाल में शिल्पी एवं सेवक दोनों ही शूद्र वर्ण में आते थे। इसलिए इनकी सामाजिक स्थिति इतनी खराब नहीं हो सकती थी। अतः सूत्रगं्रथों में शूद्रों की स्थिति के उल्लेख बाद में जोड़े गए प्रतीत होते हैं।

    यस्क मुनि के निरुक्त में वर्णों की स्थिति

    ई.पू.600 से ई.पू.500 के बीच यस्क मुनि हुए। वे वैदिक संज्ञाओं के प्रसिद्ध व्युत्पत्तिकार एवं वैयाकरण थे। उन्हें निरुक्तकार कहा गया है। निरुक्त को तीसरा वेदाङग् माना जाता है। यस्क ने 'निघण्टु' नामक वैदिक शब्दकोश तैयार किया। निरुक्त उसी का विशेषण है। यस्क मुनि ने लिखा है-


    जन्मना जायते शूद्रः संस्कारादद्विज उच्यते।

    वेदपाठी भवेद् विप्रः ब्रह्म जानाति ब्राह्मणः।

    अर्थात्- जन्म से सभी शूद्र हैं। अपने कार्यों से मनुष्य द्विज बनता है। वेेद पढ़ने वाला विप्र हो जाता है और ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करने वाला ब्राह्मण होता है।

    निरवसित तथा अनिरवसित शूद

    पाणिनी (ई.पू. पांचवी शताब्दी) ने शूद्रों के दो वर्गों का उल्लेख किया है- निरवसित और अनिरवसित। कुम्हार, नाई, धोबी, लुहार आदि शिल्पी अनिरवसित वर्ग के शूद्र थे अर्थात् ये लोग अपवित्र कार्य नहीं करते थे, इस कारण नगर में ही रहते थे और उच्च-वर्ण के लोगों के भोजन-पात्रों को छू सकते थे। चाण्डाल आदि जातियाँ अपवित्र कार्य करने के कारण उच्च वर्ण के व्यक्ति के भोजन-पात्रों को नहीं छू सकती थीं।

    उन्हें नगरों एवं गांवों के बाहर रहना पड़ता था इस कारण वे निरवसित शूद्र कहलाते थे। उनके छूने से पात्र अपवित्र हो जाता था। ऐसे पात्र को अग्नि द्वारा शुद्ध करके ही उच्च वर्ण के व्यक्ति प्रयोग में ला सकते थे। संभवतः अनिरवसित शूद्र आर्यों की चतुर्वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत थे। वे शिल्प एवं सेवा का कार्य करने वाले आर्य ही थे जबकि निरवसित शूद्र आर्य नहीं थे, वे शिल्प एवं सेवा कार्यों से जुड़े हुए नहीं थे।

    वे अनार्य थे तथा उन्हें उदरपूर्ति के लिए अपवित्र कार्य करने पड़ते थे जिनमें मृतक पशुओं को गांवों एवं नगरों से उठाकर ले जाना, मृतक पशुओं के चर्म उतारना, उनकी अस्थियों का निस्तारण करना, शासक परिवारों के घरों से मैला उठाना आदि कार्य शामिल थे। उस काल में ऐसे कार्य करने वाले लोगों को ही चाण्डाल कहा जाता होगा। यदि 'गौतम धर्मसूत्र' में शूद्रों के लिए वर्णित दण्ड विधान के वर्णन को वास्तविक मान लिया जाए तो वह दण्ड-विधान इन्हीं निरवसित शूद्रों अर्थात् चाण्डाल, श्वपच एवं निषाद आदि के लिए रहा होगा। ऐसे लोगों को वेदों के अध्ययन एवं यज्ञ आदि से वंचित किया गया होगा।

    वर्ण आधारित दण्ड व्यवस्था

    विभिन्न वर्णों के व्यक्तियों के लिए एक ही अपराध के लिए अलग-अलग दण्ड व्यवस्था की गई थी। 'गौतम धर्मसूत्र' के अनुसार ब्राह्मण का अपमान करने पर क्षत्रिय पर 100 कार्षापण की शास्ति की जा सकती थी। ब्राह्मण द्वारा वैश्य का अपमान करने पर केवल 25 कार्षापण दण्ड देने का विधान था। 'आपस्तम्ब धर्म सूत्र' में कहा गया है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, ये चार वर्ण हैं और इनमें प्रथम तीन वर्ण जन्म के आधार पर अधिकाधिक श्रेष्ठ हैं।

    इस प्रकार सूत्र ग्रन्थों के रचना काल में वर्ण-भेद न केवल पुष्ट हो गया था अपितु वर्ण का आधार जन्म को माना जाने लगा था किंतु इस काल में भी निम्न वर्ण का व्यक्ति धर्माचरण करके, अपने से उच्च वर्ण को प्राप्त कर सकता था। 'आपस्तम्ब धर्मसूत्र' में कहा गया है कि, 'धर्माचरण द्वारा निकृष्ट वर्ण का व्यक्ति भी अपने से उच्च वर्ण को प्राप्त कर सकता है और अधर्म का आचरण करने पर उच्च वर्ण का व्यक्ति अपने से निचले वर्ण में हो जाता है।' अतः वर्ण परिवर्तन सर्वथा असम्भव नहीं था।

    यदि आपस्तम्ब धर्मसूत्र के कथन पर विचार किया जाए तो यह संभव नहीं लगता कि उस युग में शूद्र को वेदमंत्र सुनने या बोलने पर कानों में सीसा भरने या जीभ काट लेने की व्यवस्था की गई होगी। पर्याप्त संभव है कि शूद्रों की जीभ काट लेने जैसी बातें बाद के किसी काल में जोड़ी गई होंगी।

    महात्मा बुद्ध के काल में विभिन्न वर्णों की स्थिति

    छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व में सूत्र-ग्रन्थों के रचना-काल आरम्भ हुआ तथा छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व में ही बौद्ध एवं जैन-धर्म का प्रादुर्भाव हुआ। महात्मा बुद्ध एवं महावीर स्वामी के आविर्भाव के समय तक वर्ण व्यवस्था जन्म-आधारित होने लगी थी। इसीलिए बौद्ध साहित्य में वर्ण-भेद की आलोचना की गई है। बौद्ध साहित्य में जन्म के स्थान पर कर्म को अधिक महत्त्व दिया गया तथा समाज में व्याप्त ऊँच-नीच की भावना के विरुद्ध विचार व्यक्त किए गए।

    क्षत्रिय वर्ण द्वारा ब्राह्मणों की श्रेष्ठता को चुनौती: बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार इस युग में ब्राह्मणों और क्षत्रियों में 'सामाजिक प्रतिष्ठा' के लिए प्रतिद्वन्द्विता प्रारम्भ हो गई थी। बौद्ध धर्म का उद्भव पूर्वी भारत में हुआ था, जहाँ अनार्य लोगों की प्रधानता थी तथा याज्ञिक कर्मकाण्डों का अभाव था। वहाँ का क्षत्रिय वर्ण विशुद्ध आर्य क्षत्रिय न होकर 'व्रात्य' था। 'व्रात्य क्षत्रियों' द्वारा ब्राह्मणों की प्रमुखता के विचार को नकार दिया गया। महात्मा बुद्ध के अनुसार जन्म से न तो कोई ब्राह्मण होता है और न कोई चाण्डाल। किसी व्यक्ति को ब्राह्मण या चाण्डाल केवल उसके कर्म के आधार पर कहा जा सकता है।महात्मा बुद्ध के अनुसार केवल ब्राह्मण ही स्वर्ग का अधिकारी नहीं है, अपितु अपने पुण्य कर्मों द्वारा क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र भी स्वर्ग प्राप्त करने के अधिकारी हो सकते हैं।

    ब्राह्मण वर्ण की स्थिति: जातक कथाओं में ऐसे ब्राह्मणों का उल्लेख मिलता है जिन्होंने कृषि, वाणिज्य, सुथारी तथा पशु-चारण आदि विभिन्न व्यवसाय अपना लिए थे। उस युग में ऐसे ब्राह्मण भी हो गए थे जो धर्म विरोधी कार्यों में रत रहते थे। इस कारण बुद्ध द्वारा जन्म के आधार पर किसी को ब्राह्मण मानने का विचार नकार दिया गया।

    वैश्य वर्ण की स्थिति: बौद्ध साहित्य के अनुसार वैश्य वर्ण में अनेक वर्गों के गृहपति सम्मिलित थे। इस वर्ण में श्रेष्ठि एवं सार्थवाह जैसे धनी वर्ग के वैश्य भी थे और लघु व्यवसाय तथा व्यापार करने वाले वैश्य भी थे।

    शूद्रों की स्थिति: बौद्ध साहित्य में शूद्रों की स्थिति का वर्णन, पूर्ववर्ती सूत्र ग्रंथों के वर्णन से मेल नहीं खाता। सूत्र ग्रंथों में शूद्र को द्विजों की झूठन खाकर अपनी क्षुधाशान्त करने का निर्देशन किया गया है जबकि बौद्धकाल में परिश्रम करके अपना जीवन निर्वाह करने वाले शिल्पी, नट, नर्तक, घसियारे, ग्वाले, सपेरे आदि शूद्र वर्ण के अन्तर्गत माने गए हैं। इससे अनुमान होता है कि सूत्रग्रंथों में शूद्रों के उल्लेख सम्बन्धी वर्णन बाद के किसी काल में जोड़ दिए गए होंगे एवं सूत्रग्रंथ कालीन समाज में शूद्रों की स्थिति, बौद्ध कालीन शूद्रों की स्थिति से हेय नहीं रही होगी।

    चाण्डाल आदि जातियाँ: बौद्ध साहित्य में चाण्डाल और निषाद जैसी कुछ जातियों का उल्लेख मिलता है जिन्हें शूद्रों से हीन माना गया है।

    जैन-धर्म में वर्ण व्यवस्था की अस्वीकार्यता

    जिस प्रकार महात्मा बुद्ध द्वारा जन्म के आधार पर श्रेष्ठता के विचार को नकार कर कर्म के आधार पर श्रेष्ठता का समर्थन किया गया, उसी प्रकार महावीर स्वामी ने भी जन्म के स्थान पर गुण-कर्म को सामाजिक स्थिति के लिए महत्त्वपूर्ण माना। अनेक प्राचीन जैन-ग्रंथों में इस प्रकार के विचार मिलते हैं।

    मौर्य युग में आर्यों की वर्ण-व्यवस्था

    'कौटिल्य' द्वारा रचित ग्रन्थ 'अर्थशास्त्र' और 'मेगस्थिनीज' द्वारा लिखे गए उसके 'यात्रा-विवरण' से मौर्य-युगीन वर्ण-व्यवस्था के स्वरूप की जानकारी मिलती है।

    कौटिल्य का वर्णन

    विष्णु गुप्त चाणक्य को कौटिल्य भी कहा जाता है। वह मौर्य-वंश के संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य का आचार्य तथा मंत्री था। उसने अपने ग्रंथ अर्थशास्त्र में चार वर्णों का उल्लेख किया है- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। इस ग्रंथ के अनुसार विभिन्न वर्णों के कर्म निम्नलिखित प्रकार से हैं-

    ब्राह्मण: ब्राह्मण का स्वधर्म (कर्त्तव्य अथवा कार्य) अध्ययन, अध्यापन, यजन (यज्ञ करना), याजन (यज्ञ कराना), दान देना और दान ग्रहण करना बताया गया है।

    क्षत्रिय: क्षत्रिय का स्वधर्म अध्ययन, यजन, दान, शस्त्राजीव (शस्त्र द्वारा आजीविका प्राप्त करना) और भूत रक्षण (प्राणियों की रक्षा करना) है।

    वैश्य: वैश्य का स्वधर्म अध्ययन, यजन, दान, कृषि, पशु-पालन और वाणिज्य (व्यापार) करना है।

    शूद्र: शूद्र का स्वधर्म द्विजातियों (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) की सेवा करना, वार्ता (कृषि, पशु-पालन और वाणिज्य), कारूकर्म (शिल्पी या कारीगर का कार्य) और कुशीलव कर्म (नट आदि के कार्य) हैं।

    कौटिल्य ने चतुर्वर्णों के कार्य प्रायः वही बताए हैं जो स्मृतियों और धर्मशास्त्रों में बताए गए हैं किन्तु कौटिल्य ने शूद्र के स्वर्ध में कृषि, पशु-पालन और वाणिज्य को सम्मिलित किया है, यह स्मृतियों तथा धर्मशास्त्रों से भिन्न है। सम्भ्वतः वैश्यों के सहायक के रूप में या स्वतंत्र रूप से शूद्र भी इस युग में कृषि, पशु-पालन और व्यापार करते थे और शिल्प को शूद्रों का कार्य मान लिया गया था।

    ब्राह्मणों एवं वैश्यों को युद्ध करने का अधिकार: यद्यपि कौटिल्य ने भारत की प्राचीन परम्परा और सामाजिक मर्यादा के अनुसार ही चारों वर्णों के स्वधर्म प्रतिपादित किए हैं तथापि व्यवहार रूप में विभिन्न वर्णों के लोग केवल इन्हीं स्वधर्मों का पालन करने तक सीमित नहीं थे। यद्यपि क्षत्रियों का कार्य सैनिक सेवा करना था तथापि ब्राह्मणों, वैश्यों और शूद्रों की सेनाएं भी होती थी।

    शूद्रों को यज्ञ करने का अधिकार: कौटिल्य ने एक स्थान पर लिखा है कि यदि किसी पुरोहित को आदेश दिया जाए कि वह अयाज्य (शूद्र आदि ऐसे व्यक्ति जिन्हें यज्ञ करने का अधिकार न हो) को यज्ञ कराये या उसे पढ़ाए, और वह पुरोहित इस आदेश का पालन नहीं करे तो उसे पदच्युत कर दिया जाए। इससे स्पष्ट है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में शूद्र यज्ञ कर सकते थे और उन्हें भी वेद आदि की शिक्षा दी जाती थी।

    शूद्रों को दास बनाने पर प्रतिषेध: मौर्य कालीन समाज में दास-प्रथा प्रचलित थी किंतु शूद्रों को दास नहीं बनाया जा सकता था। कौटिल्य ने लिखा है कि यदि कोई आर्य, किसी शूद्र को दास के रूप में विक्रय के लिए ले जाए तो उस पर बारह पण का दण्ड लगाया जाए। इससे स्पष्ट है कि शूद्र होने पर भी 'आर्य' को 'दास' नहीं बनाया जा सकता था, हालांकि 'म्लेच्छों' की सन्तानों को दास-रूप में बेचने में कोई दोष नहीं था।

    स्वधर्म पालन की व्यावहारिक स्थिति: मौर्य युग में वर्ण-व्यवस्था का स्वरूप ऐसा नहीं था कि विभिन्न वर्णों के व्यक्ति केवल वहीं कार्य करें जो शास्त्रों में बताए गए हैं। फिर भी कौटिल्य ने इस बात पर बहुत अधिक बल दिया है कि समस्त वर्णों को अपने-आपने स्वधर्म का पालन करना चाहिए और राज्य का दायित्व है कि वह प्रजा को अपने-अपने स्वधर्म में स्थिर रखे। स्पष्ट है कि मौर्य काल में समाज में प्रत्येक वर्ण के लिए अपने-अपने स्वधर्म का पालन करना एक आदर्श स्थिति थी किन्तु व्यवहार रूप में विविध वर्णों के लोग अन्य वर्णों के लिए विहित कार्य भी करते थे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, चारों ही वर्ण समाज के अभिन्न अंग माने जाते थे। इस काल में 'अनार्यों' को 'म्लेच्छ' कहा जाता था।

    व्यवसाय के आधार पर जातियों का उदय: मौर्य युग में विशिष्ट कार्य या व्यवसाय के आधार पर जातियाँ बनने लग गई थीं। उन्हें उनके कार्य के आधार पर तन्तुवाय (जुलाहे), रजक (धोबी), तुत्नवाय (दर्जी), सुवर्णकार (सुनार), चर्मकार (चमार), कर्मार (लुहार), लोहकारू, कुट्टाक (बढ़ई), कुंभकार (कुम्हार) आदि कहा जाता था। कौटिल्य ने इनका समावेश शूद्र वर्ण में किया है।

    वर्ण-संकर प्रजा: उपरोक्त चार वर्णों के अतिरिक्त कौटिल्य ने 'वर्ण-संकर' प्रजा का भी उल्लेख किया है। ब्राह्मण पिता और वैश्य माता से उत्पन्न सन्तान को 'अम्बठ' कहा गया है। ब्राह्मण पिता और शूद्र माता की सन्तान को 'निषाद' और 'पारशव' की संज्ञा दी गई थी। क्षत्रिय पिता और शूद्र माता की सन्तान को 'उग्र' कहा जाता था। वैश्य पिता की क्षत्रिय माता से उत्पन्न सन्तान को 'मागध' और ब्राह्मण माता से उत्पन्न सन्तान को 'वैदेहक' कहते थे। शूद्र पिता की वैश्य स्त्री से उत्पन्न सन्तान को 'चाण्डाल' कहा जाता था। शूद्र पिता की क्षत्रिय स्त्री से उत्पन्न सन्तान 'क्षत' कहलाती थी। इस प्रकार कौटिल्य ने अनेक वर्ण संकर लोगों का उल्लेख किया है। मौर्य युग में वर्णसंकर लोगों ने पृथक जातियों का रूप धारण कर लिया था। कौटिल्य ने यह भी व्यवस्था दी कि विभिन्न जातियों के वैवाहिक सम्बन्ध उन्हीं लोगों में हो और अपने कार्यों तथा परम्पराओं में वे अपने पूर्ववर्ती पूर्वजों का अनुसरण करें।

    आर्य वर्णों से बाहर की प्रजा: ऐसा प्रतीत होता है कि मौर्य युग में अनेक ऐसे लोग थे जिन्हें परम्परागत चार वर्णों के अन्तर्गत रखना संम्भव नहीं था। उनकी स्थिति शूद्रों के समकक्ष मानी जाती थी।

    मेगस्थिनीज का वर्णन

    मेगस्थिनीज यूनान के शासक सैल्यूकस का दूत था। वह कुछ समय के लिए मगध सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य की राजधानी पाटलिपुत्र में राजदूत के रूप में रहा। उसने अपने यात्रा विवरण में भारत की जातियों का वर्णन किया है। यद्यपि उसके द्वारा लिखित पुस्तक अब प्राप्त नहीं होती है तथापि उस पुस्तक के विवरण अन्य ग्रंथों से उपलब्ध होते हैं। मेगस्थिनीज ने मौर्यकालीन भारतीय समाज में सात जातियों का उल्लेख किया है-

    (1.) दार्शनिक: दार्शनिकों की संख्या यद्यपि अन्य जातियों से कम थी, तथापि प्रतिष्ठा में सर्वश्रेष्ठ थी। वे गृहस्थों द्वारा बलि प्रदान करने तथा मृतकों का श्राद्ध करने के लिए नियुक्त किए जाते थे और इन अनुष्ठानों के बदले में बहुमूल्य दान प्राप्त करते थे। वे बहुत-सी बातों की भविष्यवाणी करते थे, जिससे सर्वसाधारण को बड़ा लाभ पहुँचता था। जो दार्शनिक अपनी भविष्यवाणी में भूल करता था, उसे निन्दा के अतिरिक्त कोई दण्ड नहीं दिया जाता था। भविष्यवाणी के अशुद्ध होने पर दार्शनिक जीवनभर के लिए मौन ग्रहण कर लेता था।

    (2.) किसान: किसान लोग दूसरों की तुलना में संख्या में बहुत अधिक थे। वे कृषि करते थे तथा राजा को भूमि-कर देते थे। किसान अपनी स्त्रियों तथा बच्चों के साथ गांवों में निवास करते थे। वे नगरों में जाने से बचते थे।

    (3.) ग्वाले: मेगस्थिनीज ने पशुपालकों, चरवाहों एवं बहेलियों को ग्वाला माना है। वह लिखता है कि ग्वाले नगरों एवं गांवों से बाहर 'डेरों' में रहते थे। वे जंगली पशु-पक्षियों का शिकार करते थे तथा हानिकारक जंगली पशुओं और पक्षियों को जाल में फंसाकर उनसे देश की रक्षा करते थे। वे ऐसे जंगली पशु-पक्षियों को पकड़ते थे जो किसानों द्वारा बोयी गई फसल को खा जाते थे।

    (4.) कारीगर: एक वर्ग या जाति कारीगर लोगों की थी। इनमें से कुछ लोग तो कवच बनाते थे और कुछ लोग अन्य उपकरण बनाते थे। इनके द्वारा बनाए गए उपकरण किसानों तथा अन्य व्यवसायियों द्वारा प्रयोग में लाये जाते थे।

    (5.) सैनिक: मेगस्थिनीज के अनुसार समाज में सैनिकों का भी एक वर्ग था जो भलिभांति संगठित था तथा युद्ध के लिए तत्त्पर रहता था। यौद्धा सैनिकों, तथा युद्ध के हाथी,-घोड़ों आदि का पालन राजा द्वारा किया जाता था। शान्ति के समय ये लोग आमोद-प्रमोद में मग्न रहते थे या आलस्य में पड़े रहते थे। ये संख्या में दूसरे स्थान पर थे।

    (6.) निरीक्षक: मेगस्थिनीज ने राजकीय निरीक्षकों एवं गुप्तचरों को एक ही मान लिया है। वह लिखता है कि निरीक्षक लोग, साम्राज्य में होने वाली प्रत्येक गतिविधि की सूचना वहाँ के राजा को तथा यदि वहाँ राजा न हो तो किसी राजकीय अधिकारी को देते थे।

    (7.) अमात्य: मेगस्थिनीज ने राज्य के मन्त्रीगण, कोषाध्यक्ष और न्यायकर्त्ताओं को इस वर्ग में रखा है। सेना का नायक और प्रधान शासक भी इसी वर्ग में आते थे। ये राज्य-कार्य की देखभाल तथा शासन-संचालन का कार्य करते थे और अपने उच्च चरित्र एवं बुद्धिमत्ता के कारण सर्वाधिक प्रतिष्ठित थे। इनकी संख्या सबसे कम थी।

    मेगस्थिनीज के इस विवरण से यह संकेत मिलता है कि भारतीय समाज के इन समस्त वर्गों (सातों वर्गों) ने इस समय तक जातियों का रूप धारण कर लिया था। ग्रीक लेखक 'डायोडोरस' ने लिखा है- 'किसी को यह अनुमति नहीं है कि वह अपनी जाति से बाहर विवाह कर सके, या किसी ऐसे व्यवसाय अथवा शिल्प का अनुसरण कर सके जो उसका अपना न हो। कोई सिपाही, किसानी नहीं कर सकता था और कोई शिल्पी, दार्शनिक नहंीं बन सकता था'

    कौटिल्य एवं मेगस्थिनीज के वर्णन की तुलना

    कौटिल्य एवं मेगस्थिनीज दोनों ने मौर्य कालीन समाज का वर्णन किया है। कौटिल्य चातुर्वर्ण का उल्लेख करता है किंतु मेगस्थिनीज सात वर्गों का उल्लेख करता है। मेगस्थिनीज अपने देश ग्रीस (यूनान) और पड़ौसी देश ईजिप्ट (मिस्र) की सामाजिक रचना से परिचित था, जहाँ समाज अनेक जातियों एवं वर्गों में विभक्त था। उसी सामाजिक संरचना को ध्यान में रखकर मेगस्थिनीज ने भारत की जनता को सात वर्गों में विभाजित करने का प्रयास किया। निःसंदेह ये सातों प्रकार के लोग तत्कालीन भारतीय समाज में विद्यमान थे किंतु मेगस्थिनीज भारतीय वर्ण व्यवस्था को समझ नहीं पाया।

    मेगस्थिनीज ने जिन्हें दार्शनिक कहा है वे वस्तुतः तत्कालीन समाज में ब्राह्मण तथा श्रमण कहलाते थे। मेगस्थिनीज ने जिन्हें किसान लिखा है, उस वर्ग में वे वैश्य एवं शूद्र थे जो खेती द्वारा जीवन-निर्वाह करते थे। मेगस्थिनीज ने जिन ग्वालों अथवा गड़रियों का उल्लेख किया है, कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में उन्हंा वैश्य और शूद्र कहा गया है, जिनका व्यवसाय पशु-पालन था। कारीगरों को भारत में शूद्र वर्ण में माना जाता था तथा सैनिकों को क्षत्रिय वर्ण में रखा जाता था।

    कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मंत्रियों, गुप्तचरों एवं गूढ़-पुरुषों का विस्तृत वर्णन किया गया है जो शासन-संचालन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण थे। मेगस्थिनीज ने शासकों का एक पृथक् वर्ग माना है किंतु ये व्यक्ति प्रायः ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्ण में से होते थे। वस्तुतः मेगस्थिनीज द्वारा वर्णित भारतीय समाज का कौटिल्य के चातुर्वण्य से कोई विरोध नहीं है, अपितु केवल वर्गीकरण की भिन्नता है।

    मौर्य काल में वर्ण आधारित न्याय व्यवस्था

    मौर्य कालीन भारतीय समाज में चारों वर्णों की समाजिक स्थिति एक जैसी नहीं थी। न्यायालयों द्वारा अपराधियों को 'दण्ड' देते समय तथा उनकी 'गवाही' लेते समय उनके वर्ण को ध्यान में रखा जाता था। यदि उच्च वर्ण का व्यक्ति नीचे वर्ण के व्यक्ति को कुवचन कहे तो उसे कम दण्ड दिया जाता था, जबकि निचले वर्ण का व्यक्ति उच्च वर्ण के व्यक्ति को अपशब्द कहे तो उसे अधिक दण्ड दिया जाता था।

    यदि क्षत्रिय, ब्राह्मण को अपशब्द कहे तो उसे तीन पण जुर्माना देना पड़ता था किंतु यदि वही अपराध वैश्य करता तो उसे छः पण जुर्माना देना पड़ता था और शूद्र द्वारा यही अपराध किए जाने पर नौ पण जुर्माना देना पड़ता था। यदि ब्राह्मण किसी शूद्र को अपशब्द कहे तो उसे केवल दो पण जुर्माना देना पड़ता था, ब्राह्मण द्वारा वैश्य को अपशब्द कहने पर चार पण और क्षत्रिय को अपशब्द कहने पर छः पण जुर्माने की व्यवस्था थी। कुछ अपराध ऐसे भी थे जिनके लिए उच्च वर्ण के व्यक्तियों को कठोर दण्ड दिया जाता था।

    यदि कोई शूद्र अपने किसी अवयस्क स्वजन का दास के रूप में विक्रय करे या रहन रखे तो उसके लिए बारह पण दण्ड का विधान था किन्तु यदि यही अपराध वैश्य द्वारा किए जाने पर चौबीच पण तथा क्षत्रिय व ब्राह्मण द्वारा किए जाने पर क्रमशः अड़तालीस और छियानवे पण दण्ड की व्यवस्था की गई थी। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में अनेक ऐसे अपराधों का उल्लेख है जिनमें विविध वर्णों के व्यक्तियों के लिए एक ही अपराध के लिए भिन्न-भिन्न दण्ड की व्यवस्था की गई थी।

    न्यायालय में ब्राह्मण द्वारा साक्षी देने पर उसे केवल साधारण सत्य बोलने की शपथ लेनी पड़ती थी, जबकि अन्य वर्ण के व्यक्तियों के लिए अधिक कठोर शपथ लेने की व्यवस्था की गई थी।

    मौर्य काल में शूद्र वर्ण की स्थिति

    मौर्य काल में कुंभकार (कुम्हार), तन्तुवाय (जुलाहे), रजक (धोबी), तुत्नवाय (दर्जी), सुवर्णकार (सुनार), कर्मार (लुहार), लोहकारू, कुट्टाक (बढ़ई) आदि जातियाँ अस्तित्व में आ चुकी थीं और उनमें अपने सामाजिक नियमों तथा रीति-रिवाजों का प्रचलन था जिन्हें राज्य-संस्था भी स्वीकार करती थी।

    कौटिल्य ने इन जातियों को शूद्र वर्ण में माना है किन्तु मौर्य युग में शूद्रों की सामाजिक स्थिति हीन नहीं थी। वे आर्य जाति एवं समाज के ही अंग थे, वे अस्पर्श्य नहीं थे तथा चाण्डालों, म्लेच्छों आदि से उच्च एवं भिन्न स्थिति रखते थे। मौर्य युग में विविध प्रकार के शिल्पियों के साथ-साथ कृषकों, कुशीलवों और पशुपालकों को भी शूद्र वर्ण के अन्तर्गत माना जाता था किंतु समाज में उनकी स्थिति हेय नहीं थी और वे केवल द्विज-समुदाय की सेवा में ही निरत न रहकर स्वतंत्र रूप से अपने व्यवसाय भी किया करते थे।

    अन्तावसायी: मौर्य युग में कुछ लोगों की स्थिति शूद्रों से भी हीन थी। उन्हें 'अन्तावसायी' कहते थे। आगे चलकर जिन्हें अत्यंज, अस्पर्श्य एवं अछूत कहा गया, वे सम्भवतः इन्हीं अन्तवसायियों के वंशज थे।

    चाण्डाल: मौर्य कालीन समाज में 'चाण्डालों' की स्थिति 'शूद्रों' से हीन थी तथा समाज उन्हें हेय दृष्टि से देखता था। चाण्डालों के लिए व्यवस्था की गई थी कि वे नगरों से बाहर शमशान के समीप निवास करें। 'चित्तसम्भूत जातक' के अनुसार चाण्डाल वेश बदल कर तक्षशिला में शिक्षा प्राप्त किया करते थे।

    निष्कर्ष

    इस प्रकार हम देखते हैं कि मौर्य युग में भारतीय समाज का मुख्य आधार चातुर्वण्य था। चारों वर्णों के 'स्वधर्म' निश्चित थे और प्रत्येक व्यक्ति के लिए अपने 'स्वधर्म' में स्थिर रहना उपयोगी एवं आवश्यक माना जात था। समाज में ब्राह्मणों की स्थिति सर्वोच्च और सम्मानित थी तथा राज्य-शासन पर उनका प्रभाव था। मन्त्री, पुरोहित आदि राजकीय पदाधिकारी प्रायः ब्राह्मण वर्ण के हुआ करते थे और वे राजा को धर्म और मार्यादा मंे रखने का कार्य करते थे किंतु मौर्य युग में वर्ण-व्यवस्था सूत्र-ग्रन्थों में हुए वर्णन जैसी कठोर नहीं थी।

    मौर्योत्तर युग अर्थात् शुंग, कण्व एवं सातवाहन काल में वर्ण-व्यवस्था

    मौर्य शासकों ने बौद्ध एवं जैन-धर्म को राजकीय संरक्षण दिया किंतु इन धर्मों के अहिंसा के सिद्धांत के कारण मौर्य साम्राज्य का स्वयं का ही पतन हो गया और समाज में इन धर्मों के विरुद्ध प्रतिक्रिया उत्पन्न हुइ। जिसके फलस्वरूप ब्राह्मण-शासक वंशों क्रमशः शुंग, कण्व एवं सातवाहन आदि राजवंशों का उदय हुआ। ये राजवंश ब्राह्मण-धर्म के अनुयायी थे। इन वंशों के शासनकाल में प्राचीन वैदिक धर्म का नए रूप में पुनरुत्थान हुआ।

    बौद्ध और जैन-धर्म व्यक्ति के 'कुल की श्रेष्ठता' के स्थान पर व्यक्ति के 'गुण एवं कर्म' को अधिक महत्त्व देते थे किंतु शुंग एवं कण्व काल के साहित्य से ज्ञात होता है कि समाज में ब्राह्मणों की उत्कृष्टता को फिर से स्वीकार कर लिया गया तथा वर्ण-भेद को पुनः महत्त्व प्राप्त हो गया। शुंग एवं कण्व वंशों के शासनकाल में मनुस्मृति, याज्ञवलक्य स्मृति, नारद स्मृति और बृहस्पति स्मृति को उनका वर्तमान स्वरूप प्राप्त हुआ। पाणिनी कृत अष्टाध्यायी की रचना भी शुंग काल में हुई।

    भास के संस्कृत नाटकों का प्रणयन भी इसी काल में हुआ। इसी प्रकार वाल्मीकि कृत रामायण को भी वर्तमान स्वरूप शुंगकाल में तथा महाभारत को वर्तमान स्वरूप गुप्तकाल में प्राप्त हुआ।

    मौर्योत्तर काल में ब्राह्मण वर्ण की स्थिति

    जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था: शुंग, कण्व एवं सातवाहन काल के सम्पूर्ण साहित्य से स्पष्ट होता है कि भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था का महत्त्व एवं ब्राह्मणों का वर्चस्व पुनः स्थापित हो गया था। पतन्जलि के 'महाभाष्य' से के अनुसार ब्राह्मण वर्ण जन्म पर आधारित था। पतन्जलि ने लिखा है कि ब्राह्मणों की जातिगत पहचान उनका गौर वर्ण का होना, कपिल रंग के बालों का होना तथा पिंगल रंग की आंखों वाला होना है। मगध प्रदेश में जहाँ कृष्ण वर्ण के अनार्यों की प्रधानता थी, वहाँ शरीर के बाह्य रूप को देखकर ब्राह्मणों को पहचानना अत्यंन्त सरल था।

    ये ब्राह्मण सदाचारी, विद्वान और तपस्वी भी हो सकते थे, किंतु ऐसे भी जो विद्या एवं सत्कर्मों से रहित हों। ब्राह्मण-कुल में उत्पन्न व्यक्ति के लिए पतन्जलि ने 'जाति-ब्राह्मण' शब्द का प्रयोग किया है। विद्वान और मूर्ख, सदाचारी और कुकर्मी समस्त ब्राह्मण-कुल में उत्पन्न व्यक्ति 'जाति ब्राह्मण' माने जाते थे किन्तु वर्ण में सम्मिलित होने के लिए ब्राह्मणोचित विद्या का ज्ञान एवं ब्राह्मणोचित कर्म का होना अनिवार्य था। इस प्रकार जो व्यक्ति गुण और कर्म दोने से ब्राह्मण हो, वही ब्राह्मण वर्ण में माना जाता था।

    ब्राह्मण वर्ण के मुख्य कार्य: मनु स्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति में ब्राह्मणों को अन्य वर्णों से श्रेष्ठ माना गया है। इस काल में ब्राह्मणों का प्रधान कार्य वेदों का अध्ययन-अध्यापन करना, यज्ञ करना और कराना तथा दान देना और ग्रहण करना था। अन्य वर्णों के लोग न तो वेदों का अध्यापन कर सकते थे, न यज्ञ करा सकते थे और न दान ग्रहण कर सकते थे। मनु के अनुसार यदि ब्राह्मण के अतिरिक्त कोई अन्य व्यक्ति यह कार्य करता तो उसकी सम्पत्ति छीनकर उसे कारावास का दण्ड दिया जाता था।

    इन कार्यों को करने वाले ब्राह्मण के लिए विद्वान, तपस्वी और त्यागी होना आवश्यक था। ब्राह्मण के लिए कठोर आदर्श: मनु ने व्यवस्था दी कि ब्राह्मणों का जीवन आदर्शयुक्त होने पर ही समाज में उनकी उच्च स्थिति स्वीकार की जा सकती थी। मनु ने ब्राह्मणों के लिए कठोर आदर्श प्रस्तुत किया। मनु ने लिखा है कि ब्राह्मण, खेतों में बचे रह गए दानों को बीन कर अपना जीवन निर्वाह करे।

    वह केवल इतना ही अन्न संचित करे जो एक कुम्भी (छोटी मटकी) में भरने के लिए पर्याप्त हो या जिससे उसके परिवार का तीन दिन के भोजन का काम चल सके। ब्राह्मण को दान में अधिक धन ग्रहण नहंी करना चाहिए, क्योंकि अधिक धन से उसकी वह आलौकिक शक्ति समाप्त हो जाती है जिसके कारण उसे समाज में प्रतिष्ठत स्थिति प्राप्त होती है। बौद्ध और जैन धर्मों ने ब्राह्मणों की श्रेष्ठता की स्थिति का इसी आधार पर विरोध किया था कि ब्राह्मण लोग आम लोगों की तरह जीवन व्यतीत करते थे तथा लोभ आदि से रहित नहीं थे।

    अतः ब्राह्मणों की उत्कृष्टता पुनः स्थापित करने के लिए स्मृतिकारों ने इस बात पर बहुत अधिक बल दिया कि ब्राह्मणों का जीवन लोभ रहित हो। वे अकिन्चन-वृत्ति को अपनाने वाले हों और त्यागी-तपस्वी बनें। ऐसे ब्राह्मणों को ही समाज में विशिष्ट स्थिति प्राप्त होनी चाहिए।

    ब्राह्मणों के विशेषाधिकार: स्मृतिकारों ने ब्राह्मणों के लिए अत्यंन्त उच्च आदर्श प्रस्तुत किए तथा उन्हें विशेषाधिकार भी दिए। मनु ने व्यवस्था दी कि जब ब्राह्मण, वेदाध्ययन के बाद स्नातक होकर गुरु के पास से लौट रहा हो, तब राजा को भी उसके लिए मार्ग छोड़़ देना चाहिए। चूँकि ब्राह्मण अकिन्चन-वृत्ति वाला होता है और उसके पास कोई सम्पत्ति संचित नहीं होती, अतः ब्राह्मणों से कर नहीं लिया जाए तथा राजा उनके भरण-पोषण की व्यवस्था करे।

    कर्मच्युत ब्राह्मणों की स्थिति: स्मृति-ग्रन्थों में ब्राह्मणों के जिन विशेषाधिकारों का उल्लेख किया गया है, वे केवल उन ब्राह्मणों के लिए थे जो वास्तव में विद्वान् और तपस्वी हों एवं उच्च आदर्शों से युक्त जीवन व्यतीत करते हों। सामान्य काम-धन्धे करने वाले ब्राह्मण करों से मुक्त नहीं थे और उन्हें 'अदण्ड्य' नहीं माना जाता था। महाभारत में लिखा है कि जो ब्राह्मण 'अश्रोत्रिय' (वेदों के ज्ञान से रहित) और 'अनाहिताग्नि' (यज्ञों से रहित) हों, उनसे कर और बेगार ली जानी चाहिए। स्मृति-ग्रन्थों के अनुसार जो ब्राह्मण ज्ञानी और तपस्वी न हों, उनसे अन्य प्रजाजनों के समान ही कर लिया जाना चाहिए।

    स्मृति-ग्रन्थों से ज्ञात है कि यद्यपि मौर्योत्तर युग में वर्ण का निर्धारण, गुण-कर्म पर आधारित न होकर जन्म पर आधारित था तथापि कर्म-च्युत ब्राह्मण अपनी स्थिति से गिर जाते थे। मनुस्मृति में ऐसे ब्राह्मणों की सूची दी गई है जिन्हें विद्वान् एवं सदाचारी ब्राह्मणों की पंक्ति में बैठने का अधिकार नहीं था। मनु ने चोरी करने वाले, जुआ खेलने वाले, मांस बेचने वाले, व्यापार करने वाले, सूदखोर, नट, गायक व नर्तक, खेती करने वाले, भीख मांगने वाले, पशुओं का क्रय-विक्रय करने वाले, शिल्पकर्म करने वाले, चिकित्सक या पुजारी का काम करने वाले और वृत्ति ग्रहण करके शिक्षण करने वाले ब्राह्मणों को शूद्रों के समकक्ष माना है और लिखा है कि ऐसे ब्राह्मण सीधे नर्क में जाते हैं।

    ब्राह्मणों के लिए कठोर दण्ड विधान: समाज में ब्राह्मणों की उच्च स्थिति के कारण उन्हें कुछ विशेष प्रकार के दण्डों से मुक्त रखा गया था किन्तु व्यभिचार, सुरापान तथा चोरी जैसा अपराध करने वाले ब्राह्मण के लिए कठोर दण्ड का विधान किया गया। बोधायन धर्मसूत्र के अनुसार ऐसे अपराध करने वाले ब्राह्मण के सिर (ललाट) पर जलते हुए लोहे से दाग लगा कर उसे देश से बहिष्कृत कर देना चाहिए।

    मौर्योत्तर काल में क्षत्रिय वर्ण की स्थिति

    मौर्योत्तर काल में क्षत्रियों की स्थिति न्यूनाधिक वही थी, जो उत्तर-वैदिक-काल एवं मौर्य काल में थी। बौद्धकाल में क्षत्रियों ने श्रेष्ठता के लिए ब्राह्मणों से प्र्रतिस्पर्द्धा की किंतु मौर्योत्तर काल में क्षत्रियों ने ब्राह्मणों से प्र्रतिस्पर्द्धा करना बंद कर दिया। इस काल में ब्राह्मण वर्ण को सर्वश्रेष्ठ वर्ण स्वीकार कर लिया गया। इस काल में भी क्षत्रियों के प्रधान कार्य अध्ययन करना, यज्ञ करना, शस्त्र धारण करना, दान देना तथा बाह्य एवं आन्तरिक शत्रुओं से प्रजा की रक्षा करना माना जाता था।

    समाज में उनकी स्थिति सर्वसाधारण से श्रेष्ठ एवं ऊँची समझी जाती थी। ब्राह्मणों की तरह क्षत्रिय वर्ण भी जन्म पर आधारित था। मौर्योत्तर युग में वैश्यकर्म करके जीविकोपार्जन करने वाले क्षत्रिय भी थे। मनु-स्मृति और याज्ञवल्क्य-स्मृति में क्षत्रियों को संकटकालीन परिस्थितियों में वैश्यों के कर्म करने की अनुमति दी गई है।

    मौर्योत्तर काल में वैश्य वर्ण की स्थिति

    इस काल में भी वैश्यों को उत्तरवैदिक-काल की भांति द्विज होने का गौरव प्राप्त था। उनका उपनयन संस्कार होता था। वैश्य वर्ण के प्रधान कार्य पढ़ना, यज्ञ करना, दान देना, खेती, पशु-पालन, व्यापार, व्यवसाय और महाजनी करना था किन्तु संकटकालीन परिस्थितियों मे वैश्यों को शस्त्र धारण करने का अधिकार दिया गया था, ताकि वे समाज की एवं अपनी रक्षा कर सकें। बौद्ध युग की भांति मौर्योत्तर युग में भी बहुत से वैश्य, श्रेष्ठि तथा सार्थवाह के रूप में अपार धन अर्जित करते थे।

    साधारण किसानों, पशुपालकों एवं वणिजों की तुलना में इनकी सामाजिक स्थिति थोड़ी ऊँची होती थी। इस युग के अभिलेखों में ऐसे अनेक धनी श्रेष्ठियों का उल्लेख है जो अपने धन से मन्दिर आदि धर्मस्थानों तथा सार्वजनिक उपयोग के सरोवरों, सरायों, भवनों आदि का निर्माण करवाते थे।

    मौर्योत्तर काल में शूद्र वर्ण की सामाजिक स्थिति

    मौर्योत्तर काल में शूद्रों की सामाजिक स्थिति, पूर्ववर्ती समस्त कालों से हीन हो गई थी। वे वेदाध्ययन, याज्ञिक कर्मकाण्ड एवं अनुष्ठान नहीं कर सकते थे। उन्हें केवल इतिहास-पुराण का श्रवण करके अपनी ज्ञान-पिपासा शान्त करने की अनुमति थी। उनके लिए यही पर्याप्त था कि वे देवताओं का स्मरण करके उनके प्रति नमस्कार निवेदित करें। तीनों उच्च वणों की सेवा करना ही शूद्रों का प्रधान कार्य था। साधारणतः उनकी अपनी कोई सम्पत्ति नहीं होती थी। उनके लिए दण्ड-विधान भी कठोर था। यद्यपि मौर्योत्तर युग में शूद्रों की स्थिति अत्यंन्त हीन थी, फिर भी वे अस्पृश्य नहीं थे।

    मनु के अनुसार ब्राह्मण ऐसे शूद्र के यहाँ भोजन कर सकता था जो उसकी सेवा में पशुपालक का कार्य करता हो। बौद्ध-युग से पूर्व तो शूद्र, उच्च-वर्ण गृहस्थों के घरों में भोजन बनाने का कार्य भी करते थे किन्तु कालान्तर में रसोइये का कर्म शूद्रों से ले लिया गया। पाराशर समृति के अनुसार ब्राह्मण, किसी शूद्र के द्वारा पकाया हुआ ऐसा भोजन कर सकता था जिसे घी, तेल और दूध में बनाया गया हो।

    अर्थात् शूद्रों द्वारा निर्मित पक्का भोजन उच्चवर्ण के लिए ग्राह्य था, किन्तु कच्चा भोजन ग्राह्य नहीं था। शूद्रों में उपनयन संस्कार नहीं होता था, अतः वे ब्राह्मचारी रहकर विद्याध्ययन नहीं कर सकते थे। वे वानप्रस्थ और सन्यास आश्रम में प्रवेश नहीं कर सकते थे।

    मौर्योत्तर काल में शूद्र जातियाँ

    पतन्जलि के महाभाष्य में उन जातियों का उल्लेख है जिन्हें शूद्र वर्ण के अन्तर्गत माना जात था। पतन्जलि ने रथकारों, धीवरों (कहारों), तंतुवायों (जुलाहों), कुम्भकारों (कुम्हारों), अयस्कारों (लुहारों), नापितों (नाइयों), चर्मकारों (चमारों), आमीरों और धोबियों को शूद्र माना है। वैदिक एवं उत्तरवैदिक-काल में ये जातियाँ शिल्पी कहलाती थीं और 'विश' की साधारण प्रजा के अन्तर्गत थी। मौर्य काल एवं मौर्योत्तर काल में इन्हें शूद्र माना जाता था।

    वर्ण आधारित दण्ड विधान

    इस काल में भी दण्ड विधान वर्ण आधारित था। प्रत्येक वर्ण के लिए एक ही अपराध का अलग-अलग दण्ड विधान था। यदि कोई शूद्र ब्राह्मण-स्त्री से संभोग करे तो उसके लिए प्राणदण्ड की व्यवस्था थी किन्तु किसी ब्राह्मण द्वारा क्षत्रिय या वैश्य स्त्री से सम्भोग करने पर केवल अर्थ दण्ड का विधान था। यदि कोई शूद्र ब्राह्मण को गाली दे तो उसकी जीभ काट ली जाती थी किन्तु यदि ब्राह्मण किसी शूद्र को गाली दे तो उसे केवल 12 पण का दण्ड भरना होता था।

    वर्णसंकर जातियाँ

    प्राचीन 'आर्य-जनों' (कबीलों) का जब पूर्वी भारत के मगध, अंग और बंग के अनार्यों तथा दक्षिणी भारत के अनार्यों से सम्पर्क हुआ तो उनमें पारस्परिक वैवाहिक सम्बन्ध होने लगे। इन विवाहों से उत्पन्न सन्तान को चातुर्वण्य में समाहित करने के लिए उन्हें 'व्रात्य' (व्रत द्वारा समाज में सम्मिलित) मान लिया गया। अनार्यों में जो भी सैनिक थे, वे विशुद्ध क्षत्रिय न होकर 'व्रात्य' ही थे। वज्जि, मल्ल, लिच्छवी आदि सब 'व्रात्य-क्षत्रिय' ही थे।

    दक्षिणी और पूर्वी भारत के जनपदों में न केवल क्षत्रिय, अपितु ब्राह्मण भी वर्णसंकर थे। सातवाहन राजा जन्म से ब्राह्मण समझे जाते थे किन्तु उनमें अनार्य रक्त विद्यमान था। मनुस्मृति के अनुसार भूर्जकंटक और आवन्त्य, 'व्रात्य ब्राह्मणों' की सन्तान थे और मल्ल, झल्ल तथा लिच्छवियों की उत्पत्ति 'व्रात्य क्षत्रियों' से हुई थी। कारूष और सात्वत 'व्रात्य वैश्यों' की सन्तान थे। वैश्य और क्षत्रियों के सम्मिश्रण से 'मागध' और वैश्य तथा ब्राह्मणों के सम्मिश्रण से 'वैदेह' लोगों की उत्पत्ति हुई थी। मनुस्मृति का कथन है कि मागध, वैदेह, आवन्त्य, लिच्छवि आदि वंश शुद्ध आर्य नहीं थे।

    चूँकि उन्होंने भारतीय समाज में महत्त्वपूर्ण स्थिति प्राप्त कर ली थी, इसलिए उन्हें व्रात्य-ब्राह्मण, व्रात्य-क्षत्रिय, व्रात्य-वैश्य और वर्णसंकर के रूप में चातुर्वण्य की परिधि में लाया गया। शनैः शनैः वे चातुर्वर्ण्य में पूरी तरह विलोपित हो गए।

    विदेशी आक्रांताओं का क्षत्रिय वर्ण में समायोजन

    ईसा पूर्व की शतादियों में यूनानियों ने एवं ईसा की प्रारिम्भक शताब्दियों में शकों, कुषाणों एवं हूणों आदि विदेशी जातियों ने भारत पर आक्रमण किए एवं विभिन्न भागों पर अधिकार कर लिया। वे भारत के विविध जनपदों में बस गए। विजेता होने के कारण उनकी सामाजिक और राजनैतिक स्थिति ऊँची थी। वर्ण-भेद के विचारों से शून्य होने के कारण, बौद्ध एवं जैन-धर्म के लिए विदेशी म्लेच्छ विजेताओं को अपने धर्म में आत्मसात करने में विशेष कठिनाई नहीं हुई।

    इन शक्तिशाली अनार्यों को सनातन आर्य धर्म के चातुर्वण्य में समाहित करने के लिए जिस विशेष नीति का प्रतिपादन किया गया, वह इतिहास के अध्ययन की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्व की है। आर्य ब्राह्मणों ने व्यवस्था दी कि यवन, शक, पल्हव, द्रविड़़, पौण्ड्रक आदि समस्त जातियाँ मूलतः क्षत्रिय थीं किन्तु ब्राह्मणों से सम्पर्क न रहने के कारण ये वृषलत्व (म्लेच्छत्व) को प्राप्त हो गयीं। अब इन्हें पुनः ब्राह्मणों का सम्पर्क मिल गया और इन्होंने वैदिक सम्प्रदायों को अपना लिया है, इसलिए इन्हें क्षत्रिय समझा जाना चाहिए।

    इस प्रकार समस्त विदेशी आक्रांता मनु द्वारा प्रतिपादित क्षत्रिय वर्ण में सम्मिलित मान लिए गए। ब्राह्मणों के सम्पर्क से वे वासुदेव कृष्ण और शिव की उपासना करते थे और उनमें वृषलत्व शेष नहीं रह गया था। इन विदेशी म्लेच्छों के पुरोहित, 'ब्राह्मण वर्ण' में सम्मिलित कर लिए गए, क्योंकि उन्होंने भी प्राचीन आर्य-धर्म को अंगीकार कर लिया था।

    गुप्त काल तथा हर्षवर्द्धन काल में वर्ण-व्यवस्था

    मौर्याेत्तर काल में चातुर्वण्य का जो रूप प्रचलित था, वह गुप्त काल और मध्य काल में भी उसी तरह विद्यमान रहा। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के चार वर्ण समाज में विद्यमान थे तथा उन्हें उसी वर्ण का माना जाता था, जिस वर्ण में उनका जन्म हुआ था। यही कारण है कि इस युग में अनेक ऐसे राजा हुए जो जन्म से क्षत्रिय नहीं थे। शुंगों और कण्वों के बाद भी ब्राह्मण कुल में उत्पन्न अनेक व्यक्तियों ने राज्य विजित एवं स्थापित किए किंतु क्षत्रिय कर्म करते हुए भी उन्हें ब्राह्मण वर्ण में ही माना गया।

    मयूर शर्मा नामक एक ब्राह्मण ने कांची के पल्लव राजा को पराजित कर पल्लव राज्य के एक प्रदेश पर अधिकार कर लिया तथा बनवासी नगरी को राजधानी बनाकर अपना स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिया। मयूर शर्मा ने अपनी विजयों के उपलक्ष्य में अठारह बार अश्वमेघ यज्ञ किए। मयूर शर्मा का समय चौथी शताब्दी का मध्य माना जाता है। मयूर शर्मा ने एक नया वंश प्रारम्भ किया जो इतिहास में कदम्ब वंश के नाम से विख्यात हुआ। सातवीं शताब्दी ईस्वी में ह्वेनत्सांग की भारत यात्रा के समय उज्जैन, जिहोती और महेश्वरपुर के राजा ब्राह्मण वर्ण के थे।

    कतिपय वैश्य और शूद्र भी राजा बनने में सफल हुए। मगध के गुप्त सम्राट तथा थानेश्वर के वर्धनवंशी राजाओं को भी वैश्य वर्ण का माना जाता है। सातवीं शताब्दी ईस्वी में ह्वेनत्सांग ने सिन्ध के शूद्र राजाओं का उल्लेख किया है। इन तथ्यों से प्रमाणित होता है कि गुप्तकाल और इसके बाद भी वर्ण का आधार जन्म ही था। हर्ष के काल में भी चातुर्वण्य के वे ही कर्म थे, जो प्राचीन स्मृतिकारों ने निरूपति किए थे। ह्वेनत्सांग ने भी चारों वर्णों का उल्लेख करते हुए उनके वे ही कर्म बताए है जो परम्परागत रूप से प्रतिपादित थे।

    हर्षवर्धन के ताम्रलेख में हर्षवर्धन को 'वर्णाश्रम-व्यवस्थापन-प्रवृत्तचक्र' (वर्णाश्रम धर्मों को व्यवस्थापित करने वाला) कहा गया है। इससे ज्ञात होता है कि इस युग में भी समस्त वर्णों को अपने-अपने धर्म व कार्यों में स्थिर रखना राजा का कर्त्तव्य माना था। हर्ष कालीन संस्कृत कवि बाण ने 'हर्षचरितम्' में राजा हर्षवर्धन को वर्णाश्रम धर्म का पालन करने वाला कहा है। उसने लिखा है कि 'असंस्कृत ब्राह्मण' भी अपनी जाति के कारण 'आदरणीय' होता है।

    मध्य काल में वर्ण-व्यवस्था

    मध्य-काल में वर्ण का आधार पूरी तरह 'जन्म' हो गया था। जन्म के आधार पर ही किसी को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र माना जाता था। अब यह कदापि सम्भव नहीं था कि कोई व्यक्ति विद्वता एवं कर्मों के आधार पर ब्राह्मण वर्ण में या वीरता और राजसत्ता के आधार पर क्षत्रिय वर्ण में सम्मिलित हो सके। यदि किसी व्यक्ति का जन्म वैश्य कुल में हुआ था तो विद्वान् एवं याज्ञिक कर्मकाण्डी होने पर भी वह वैश्य ही कहलाता था और सैनिक शक्ति से राज्य प्राप्त करने पर भी वह वैश्य ही समझा जाता था।

    दसवीं शताब्दी के अन्त एवं ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारत आए अरबी विद्वान् अलबरूनी ने लिखा है- 'समाज के विभिन्न वर्गों के अपने-अपने कर्म नियत थे तथा राजा का यह कर्त्तव्य था कि वह किसी भी व्यक्ति को अपने वर्ण के कार्यों का अतिक्रमण न करने दे। जो व्यक्ति अपने वर्ण के कर्म का अतिक्रमण करता था, उसे दण्ड दिया जाता था।'

    ब्राह्मण वर्ण: मध्य-कालीन समाज में ब्राह्मणों की स्थिति सर्वोच्च थी, चाहे वह अयोग्य या भ्रष्ट ही क्यों न हो। अलबरूनी ने भी समाज में ब्राह्मणों की स्थिति सर्वोच्च बताई है। उसे यज्ञ करने, वेदों का अध्ययन-अध्यापन करने, दान लेने का अधिकार था।

    क्षत्रिय वर्ण: क्षत्रिय वर्ण परम्परागत रूप से युद्ध करने एवं राज्य व्यवस्था चलाने तक सीमित था। उसे यज्ञ करने, शिक्षा प्राप्त करने एवं दान देने का अधिकार था। शासक के रूप में उसका कर्त्तव्य था कि वह प्रजा को अपने स्वधर्म पर अडिग रखे।

    वैश्य एवं शूद्र वर्ण: उत्तरवैदिक-काल में कृषि करने के साथ-साथ पढ़ना और यज्ञ करना भी वैश्यों के कार्य थे किन्तु जब वैश्य वेदादि के अध्ययन की उपेक्षा करने लगे और उनकी शिक्षा, व्यावसायिक प्रवीणता प्राप्त करने तक सीमित हो गई तब उनका सामाजिक स्तर शिल्पियों के समान होने लगा। उस काल में शिल्पियों की गणना वैश्यों में होती थी। कौटिल्य (चौथी शताब्दी ईस्वी पूर्व) ने अपने ग्रंथ 'अर्थशास्त्र' में कृषि करने वालों को शूद्रों में सम्मिलित किया है। चूंकि वैश्य और शूद्र दोनों वर्ण, शिल्प तथा कृषि कर्म करते थे इसलिए मौर्य काल में उनकी सामाजिक स्थिति में कोई विशेष अन्तर नहीं रह गया था।

    पतन्जलि (दूसरी शताब्दी ईस्वी पूर्व) के अनुसार शिल्पी शूद्र वर्ण में माने जाते थे। मध्य-काल में वैश्य वर्ण में दो भेद थे। वैश्यों का एक वर्ग समृद्ध श्रष्ठियों एवं सार्थवाहों का था तथा दूसरा वर्ग शिल्पियों एवं कृषकांे का। अलबरूनी ने लिखा है कि वैश्य और शूद्र में विशेष अन्तर नहीं है।

    निष्कर्ष

    उपरोक्त विवेचन से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वर्ण व्यवस्था प्रारम्भ में त्वचा के रंग के आधार पर बनी थी जिसमें आर्यों के गौर वर्ण और अनार्यों के कृष्ण वर्ण में भेद किया गया था। इस व्यवस्था की स्थापना आर्य जाति के रक्त की शुद्धता को बनाए रखने के लिए हुई थी। बाद में इस व्यवस्था में श्रेष्ठता का भाव जुड़ जाने से आर्यों को उच्च वर्ण एवं अनार्यों को निम्न वर्ण का माना गया।

    समाज में धार्मिक, राजनीतिक एवं आर्थिक गतिविधियों के विकास के साथ ही आर्यों के भीतर एक नई तरह की वर्ण व्यवस्था का विकास हुआ और ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र वर्ण अस्तित्व में आए। प्रारम्भ में कोई भी व्यक्ति अपनी योग्यता बढ़ाकर अपना कार्य और अपना वर्ण बदल सकता था किंतु कालांतर में प्रत्येक वर्ण के लिए स्वधर्म निर्धारित किए गए। ब्राह्मणों के लिए वेदों का अध्ययन-अध्यापन, यजन-याजन आदि कार्य प्रमुख थे। क्षत्रियों के लिए युद्ध करना स्वधर्म माना गया।

    वैश्यों के लिए कृषि एवं व्यापार प्रधान कार्य माने गए। शूद्रों के लिए शेष तीनों उच्च वर्णों की सेवा करना एवं शिल्प सम्बन्धी कार्य करना ही उनका स्वधर्म था। समय के साथ प्रत्येक वर्ण के लिए स्वधर्म का निर्वहन अनिवार्य हो गया। राजा का यह कर्त्तव्य माना गया कि वह प्रजा को स्वधर्म पर दृढ़ रहने के लिए बाध्य करे। जैसे-जैसे वर्ण व्यवस्था के बंधन दृढ़ होते चले गए वैसे-वैसे लोगों के लिए अपने स्वधर्म को त्यागकर अन्य वर्ण के कार्य करना वर्जित हो गया। इस प्रकार वर्ण का निर्धारण 'जन्म' से होने लगा।

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  • मेवाड़ से अलग हो गए डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ और शाहपुरा

     02.06.2020
    मेवाड़ से अलग हो गए डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ और शाहपुरा

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    अंग्रेजों के भारत में आगमन के समय मेवाड़ राजवंश धरती भर के राजवशों में सबसे पुराना था। डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ और शाहपुरा राज्य भी पहले मेवाड़ के ही हिस्से थे। महाराणा सामंतसिंह के वंशजों ने बारहवीं शताब्दी में वागड़ राज्य की स्थापना की थी। इसकी राजधानी वटपद्रक थी जो बड़ौदा कहलाती थी। यह बड़ौदा अब भी डूंगरपुर जिले में छोटे से गाँव के रूप में स्थित है। वागड़ के राजा डूंगरसिंह ने ई.1358 में डूंगरपुर नगर की स्थापना की। बाबर के समय में उदयसिंह वागड़ का राजा था जिसने मेवाड़ के महाराणा के संग्रामसिंह के साथ मिलकर खानुआ के मैदान में बाबर का मार्ग रोका था। उदयसिंह के दो पुत्र थे- पृथ्वीराज तथा जगमाल। उदयसिंह ने अपनी जीवन काल में ही अपने राज्य के दो हिस्से कर दिये। माही नदी को सीमा मानकर पश्चिम का भाग छोटे पुत्र जगमाल के लिये स्थिर कर दिया तथा पूर्व का भाग बड़े पुत्र पृथ्वीराज को दिया गया।

    इस प्रकार डूंगरपुर तथा बांसवाड़ा राज्य अस्तित्व में आये। इन राज्यों के शासक अपने आपको पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न शासक मानते थे किंतु मेवाड़ के महाराणा दोनों राज्यों को अपने अधीन मानते थे। इस कारण प्रायः मेवाड़ राज्य इन राज्यों से कर लेने, राज्यारोहण के समय होने वाले टीके की रस्म की राशि वसूलने तथा अन्य विवादों के कारण इन पर आक्रमण करते रहते थे। इन आक्रमणों में प्रायः बड़ी संख्या में सैनिकों का रक्तपात होता था जिससे तीनों ही राज्य कमजोर होते जा रहे थे। चूंकि डूंगरपुर और बांसवाड़ा ने मुगलों का संरक्षण प्राप्त कर लिया था इसलिये महाराणा चाहकर भी इन राज्यों को पूर्ण रूप से मेवाड़ में नहीं मिला पाते थे।

    जब मुगलों का राज अस्ताचल को चला गया और मराठों का परचम लहराने लगा तो इन तीनों ही राज्यों को मराठों ने कुचल कर धर दिया। मराठों ने बांसवाड़ा राज्य का जीना हराम कर रखा था। ई.1737 में उन्होंने बांसवाड़ा नगर में घुसकर लूटमार मचाई। उस समय बांसवाड़ा का शासक उदयसिंह मात्र 4 साल का था तथा राज्यकार्य अर्थूणा का ठाकुर गुलालसिंह चौहान चलाता था जो उदयसिंह का मामा भी था। बांसवाड़ा के सरदार महारावल को लेकर भूतवे की पाल में चले गये। मराठों ने धन प्राप्ति की आशा में पूरा महल खोद डाला किंतु उनके हाथ कुछ नहीं लगा।

    कुछ स्वामिभक्त लोगों ने राज्य की इज्जत बचाने की चेष्टा की तथा परिवार सहित कट मरे। मात्र साढ़े तेरह वर्ष की आयु में महारावल उदयसिंह मर गया तथा उसका छोटा भाई पृथ्वीसिंह बांसवाड़ा का शासक हुआ। उसी समय मराठे फिर बांसवाड़ा में घुस आये और जबर्दस्त लूट मार करने लगे। इस पर सरदार लोग महारावल को लेकर पहाड़ों में चले गये। मराठा आनन्दराव ने निर्दयता पूर्वक लोगों से 25 हजार रुपये वसूल किये तथा शेष राशि की वसूली हेतु राज्य के प्रतिष्ठित लोगों को पकड़ कर धार ले गया। इसी बीच आनन्दराव मर गया और उसका पुत्र जसवंत राव (प्रथम) धार का स्वामी हुआ। उसने अपने सेनानायक मेघश्याम बापूजी को पुनः बांसवाड़ा भेजा। मेघश्याम ने अगला-पिछला कुल 72 हजार रुपया तय किया तथा रुपये प्राप्त होने पर ही राज्य के प्रतिष्ठित लोगों को छोड़ने का निर्णय सुनाया। इस पर महारावल पृथ्वीसिंह सितारा जाकर राजा शाहू से मिला और मराठा सरदारों की दुष्टता की शिकायत की। शाहू ने पृथ्वीसिंह को आदेश दिया कि वह चौथ की सारी रकम नियमित रूप से सितारा भेजे।

    इस प्रकार बांसवाड़ा को मराठों के आतंक से कुछ मुक्ति मिली। मराठों से निरंतर लड़ते रहने के कारण राज्य में राजपूतों की कमी हो गयी इस पर महारावल ने बाहर से मुसलमानों को बुलाकर सेना में भरती किया। ई.1800 में मराठों ने फिर से बांसवाड़ा को घेर लिया। उस समय महारावल विजयसिंह (ई.1786-1816) बांसवाड़ा का शासक था। उसने मराठों का जमकर मुकाबला किया और उन्हें मार भगाया। बांसवाड़ा की सेना ने मराठों की सेना के झण्डे और तोपें छीन लिये। जब ई.1817 में पिण्डारी करीमखां बांसवाड़ा राज्य में लूटमार करने लगा तो ई.1818 में महारावल ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी से दोस्ती कर ली।

    मेवाड़ राज्य में जहांगीर के शासन काल तक देवलिया ठिकाना था। जहांगीर के सेनापति महावतखां के उकसाने पर ई.1626 में देवलिया के ठिकानेदार सींहा ने अपने आप को स्वतंत्र घोषित कर दिया। महाराणा उसे दबाने में असफल रहा। 8 अप्रेल 1627 को सींहा की मृत्यु हो गयी और उसका बड़ा पुत्र जसवंतसिंह देवलिया का रावत बना। 7 नवम्बर 1627 को जहांगीर भी मर गया।

    जसवंतसिंह ने मेवाड़ के मोड़ी गाँव पर आक्रमण करके बहुत से मेवाड़ी सैनिकों को मार डाला। महाराणा जगतसिंह (प्रथम) ने जसवंतसिंह को समझाने के लिये उदयपुर बुलवाया। जब जसवंतसिंह महाराणा की बात मानने को तैयार नहीं हुआ तो मेवाड़ की सेना ने उसे तथा उसके एक हजार आदमियों को चम्पाबाग में घेर कर मार डाला। जसवंतसिंह का छोटा पुत्र हरिसिंह देवलिया का रावत हुआ। शाहजहां ने हरिसिंह को देवलिया का स्वतंत्र शासक स्वीकार कर लिया। इस प्रकार ई.1628 में देवलिया राज्य अस्तित्व में आया जिसक कुल क्षेत्रफल 889 वर्ग मील था।

    ई.1659 में औरंगजेब ने डूंगरपुर, बांसवाड़ा तथा देवलिया महाराणा को लौटा दिये इस पर हरिसिंह दर-दर भटकने लगा। हरिसिंह की माता ने हरिसिंह को एक हाथी, एक हथिनी तथा 50 हजार रुपये देकर महाराणा की सेवा में भेजा। महाराणा ने उसे अपना सामंत स्वीकार कर लिया। ई.1673 में हरिसिंह मर गया तथा उसका पुत्र प्रतापसिंह देवलिया का जागीरदार हुआ। ई.1698 में महाराणा जयसिंह की मृत्यु होने पर अमरसिंह द्वितीय मेवाड़ का महाराणा हुआ किंतु इस अवसर पर डूंगरपुर के रावल खुमानसिंह, बांसवाड़ा के रावल आबसिंह तथा देवलिया के रावत प्रतापसिंह ने उपस्थित होकर टीके का दस्तूर पेश नहीं किया। इस पर महाराणा ने तीनों राज्यों पर आक्रमण कर उनसे टीका वसूल किया।

    ई.1699 में प्रतापसिंह ने डोडेरिया का खेड़ा नामक स्थान पर प्रतापगढ़ नामक नगर बसाया और उसे मुख्यालय बनाया तब देवलिया ठिकाणा प्रतापगढ़ राज्य के नाम से जाना जाने लगा। प्रतापगढ़ का रावत सालिमसिंह (ई.1756 से 1774) प्रतापी राजा हुआ। मल्हार राव होलकर जैसा प्रबल शत्रु भी उससे चौथ वसूल नहीं कर पाया। सालिमसिंह ने मुगल बादशाह शाहआलम से सिक्का ढालने की स्वीकृति प्राप्त की। इसे सालिमसाही सिक्का कहा गया। प्रतापगढ़ राज्य मुगलों को 15 हजार मुगलिया रुपये वार्षिक कर दिया करता था। सालिमसिंह के पुत्र सामंतसिंह (ई.1774-1818) ने मुगलों को कर देना बंद करके 72 हजार 720 सालिमसाही सिक्के जसवंतराव होलकर को चौथ के रूप में देने स्वीकार कर लिये।

    ई.1804 में सामंतसिंह ने कर्नल मरे के माध्यम से ईस्ट इण्डिया कम्पनी से संधि की तथा जो राशि चौथ के रूप में मराठों को दी जाती थी वह खिराज के रूप में अंग्रेजों को देनी स्वीकार की किंतु लॉर्ड कार्नवालिस ने इसे स्वीकार नहीं किया तथा अगले 14 वर्ष तक प्रतापगढ़ राज्य दुख के सागर में गोते खाता रहा। 5 अक्टूबर 1818 को प्रतापगढ़ राज्य तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के बीच दूसरा समझौता हुआ। संधि की अन्य शर्तों के अतिरिक्त यह भी तय हुआ कि प्रतापगढ़ राज्य ने अब तक मराठों को 1 लाख 24 हजार 657 रुपये छः आने नहीं चुकाये हैं, नियमित खिराज (72,700 रुपये वार्षिक) के अतिरिक्तयह राशि भी चुकानी होगी। प्रतापगढ़ राज्य अरबों तथा मकरानियों को नौकर नहीं रखेगा। इस संधि के होने से पूर्व प्रतापगढ़ राज्य की औसत वार्षिक आय दो लाख रुपये थी। संधि के बाद राज्य की आय में पहले साल 42 हजार रुपये तथा दूसरे साल 50 हजार रुपये की वृद्धि हुई।

    शाहपुरा राज्य की स्थापना महाराणा अमरसिंह के द्वितीय पुत्र सूरजमल के वंशजों ने शाहजहां के समय की थी।

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  • अध्याय - 18 वैक्स म्यूजियम उदयपुर

     02.06.2020
    अध्याय - 18 वैक्स म्यूजियम उदयपुर

    अध्याय - 18 वैक्स म्यूजियम, उदयपुर


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    सज्जनगढ़ रोड पर मेवाड़गढ़ होटल के पीछे एक वैक्स म्यूजियम स्थापित किया गया है। इसे लंदन के मैडम तुसाद म्यूजियम की अनुकृति की तरह बनाया गया है। भारत में इस तरह के पांच मोम संग्रहालय हैं जिनमें से दो राजस्थान में हैं।

    उदयपुर वैक्स म्यूजियम प्रदेश का पहला वैक्स म्यूजियम है। इस संग्रहालय में देश-विदेश के प्रसिद्ध व्यक्त्यिों के मोम के पुतले रखे गए हैं। संग्रहालय में प्रदर्शित रानी पद्मावती का मोम से बना पुतला दर्शकों के विशेष आकर्षण का केन्द्र है जिसके साथ दर्शक अपनी सैल्फी लेना पसंद करते हैं। इस पुतले के कारण जनसामान्य में रानी पद्मावती के इतिहास को जानने की जिज्ञासा बढ़ी है।

    भक्त-शिरोमणी मीरांबाई, पूर्व राजघराने के सदस्य लक्ष्यराज सिंह मेवाड़, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, क्रिकेट के खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर आदि के पुतले भी दर्शकों द्वारा सर्वाधिक पसंद किए जाते हैं। सलमान खान, मदर टेरेसा, बराक ओबामा, माइकल जैक्सन, ब्रूस विलिस, ब्रूस ली, जैकी चैन, अमॉल्ड, हैरी पॉटर तथा हॉलीवुड अभिनेताओं के पुतले भी प्रदर्शित किए गए हैं।

    महाराणा प्रताप, कल्पना चावला तथा मोहनदास करमचंद गांधी सहित और भी कई ऐतिहासिक व्यक्तियों के वैक्स से बने पुतले लगाए जाने की योजना है। इस संग्रहालय को देखने लिए 150 रुपए का टिकट है। यह प्रातः 9 बजे से सायं 9 बजे तक खुला रहता है।

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