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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-49

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-49

    पर्यावरण को साधती हस्तकलाएं (2)


    खेस, कम्बल, पट्टू एवं नमदे

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राज्य में सूती खेस एवं ऊनी कम्बल तथा पट्टू बनाने का काम गांव-गांव होता है। जालोर जिले के लेटा गाँव के खेसले, बीकानेर एवं जैसलमेर के कम्बल एवं पट्टू तथा बीकानेर व टोंक के नमदे दूर-दूर तक प्रसिद्ध हैं। राज्य के बाड़मेर जिले में शॉल बुनाई एवं बरडी का काम किया जाता है।

    पट्टू बुनाई : पट्टू बुनाई का कार्य पिटलूम पर किया जाता है। बाड़मेर जिले के चौहटन, ईसरोल, धनाऊ, भूणिया, सीलगण, सेड़वा, बावड़ी, बूठ, मांगता, बाछड़ाऊ, भीमथल, देदूसर, बींजराड़, भीमड़ा, गडरारोड, हरसाणी, बालेवा, अदरीम का तला, नवातला, नोखड़ा, कबूली, गिराब, विशाला, भू का पार, शास्त्री गांव, राणी गांव, महाबार, चौहटन गांव में प्रमुखता से होता है। जैसलमेर, बीकानेर, जोधपुर, बाड़मेर एवं जालोर जिलों में भी कलात्मक पट्टू बनाये जाते हैं।

    जाटा पट्टू : जाटा पट्टू के कार्य के लिये बाड़मेर जिले के नोखड़ा, भीमड़ा तथा मिठड़ाऊ गांव अधिक प्रसिद्ध हैं।

    कोट पट्टी : कोट पट्टी बुनाई का काम बाड़मेर जिले के भीमड़ा, नवातला, नोखड़ा तथा भूणियां गांव में प्रमुखता से होता है।

    शॉल बुनाई : शॉल बुनाई का कार्य फ्रेम लूम पर किया जाता है। यह कार्य बाड़मेर जिले में लगभग बीस हजार परिवारों द्वारा किया जाता है।

    बरडी : बरडी का कार्य बायतु, भीमड़ा, नोखड़ा, कबूली, सीलगण में अधिक होता है।

    जट पट्टी उद्योग

    पशुओं के बालों को जट्ट अथवा जटा कहा जाता है। ऊँटों के बालों को ओठी जट्ट तथा बकरी के बालों को बाकरी जट्ट कहते हैं। बकरी और ऊँट के बालों से जट पट्टी की बुनाई की जाती है जिसे जिरोही, भाकला तथा गंदहा भी कहते हैं। बाड़मेर जिले के जसोल गाँव में यह कार्य लगभग 300 वर्षों से होता है। इस कार्य में कुम्हारों के मारू नामक गोत्र के लोग लगे हुए हैं। जाटा मेघवाल भी इस कार्य को करते हैं। बाड़मेर जिले के बेरी, बांटा, पनावली, गांधव, धनवा, दाखा, हेमे की ढाणी, खारा, लोहिड़ा, रोहिली, बामड़ी, करणा भूंका, नीम्बली नाडी, सेवनियाला, सिणधरी, साडो की ढाणी अरणियाली, पायला कला, जैसार, सांवलासी, जसोल पट्टी तथा चोहटन गांव आदि प्रमुख हैं। जालोर जिले के गांवों में भी यह कार्य होता है।

    इस उद्योग में बकरियों तथा ऊँटों के बालों अर्थात् जटाओं से पांवदान, रस्सियां, बोरे, पट्टियां आदि प्रमुखता से बनाये जाते हैं। बकरी के बालों की पिंजाई करके पूनियों से चरखे पर धागा तैयार किया जाता है। उसके बाद दो धागों को मिलाकर चरखे पर ताना तैयार किया जाता है। ताने को दो भारी लट्ठों पर लपेटा जाता है तथा दो व्यक्ति मिलकर उसकी बुनाई करते हैं। इस प्रकार एक मीटर चौड़ी तथा बीस से पच्चीस मीटर लम्बी जट पट्टियां तैयार की जाती हैं जिन्हें विदेशों में निर्यात किया जाता है। देश की आजादी से पहले ये पट्टियां कराची बंदरगाह से ईरान, इराक, कुवैत, सीरिया, सऊदी अरब, जोर्डन, लेबनान आदि अरब देशों को निर्यात की जाती थीं जहाँ इनका निर्यात घुमक्कड़ जातियों द्वारा तम्बू बनाने में किया जाता था। अब इनका निर्यात यूरोपीय देशों में अधिक होता है जहाँ इनका प्रयोग जहाजों के कालीन के रूप में किया जाता है। बर्फीले क्षेत्रों में जिरोही की मांग अधिक रहती है।

    मिट्टी के खिलौने व मूर्तियां

    लोक देवताओं की पूजा के साथ-साथ मिट्टी के खिलौने व मूर्तियां बनाने का काम पूरे प्रदेश में विकसित हुआ। गोगाजी, भैंरूजी, काली देवी तथा मामाजी की पूजा एवं गणगौर पूजन में गौर (पार्वती) की पूजा के लिये बड़े पैमाने पर गाँव-गाँव में मिट्टी की मूर्तियां बनायी जाती हैं। देवी देवताओं की मिट्टी की मूर्तियाँ हिंगाण कहलाती हैं। पशु-पक्षियों की आकृतियां, ढोला मारू, सेठ-सेठानी, देवी, देवता, शिव, गणेश, कृष्ण, घुड़सवार, ईसर-गौर आदि बहुतायत से बनाये जाते हैं। नाथद्वारा के पास मोलेला के कुम्हारों ने टैराकोटा कार्य में देश-विदेश में अपना नाम कमाया है। जालोर जिले में हरजी गाँव के कुम्हार मामाजी की घोड़े बनाते हैं जिन्हें खरीदने के लिये दूर-दूर से लोग पहुँचते हैं।

    मोलेला तथा हरजी दोनों ही स्थानों में कुम्हार मिट्टी में गधे की लीद मिलाकर मूर्तियां बनाते हैं और उन्हें उच्च ताप पर पकाते हैं। बाड़मेर जिले के निम्बला गांव में उपलब्ध सेलड़ी (सफेद मेट) का उपयोग किया जाता है। पानी में घुलनशील इन दोनों रंगों में पीला रंग आग में पकने पर लाल रंग में तब्दील हो जाता है। पीले और सफेद रंग के सूखने के बाद खेत या नाडी में उपलब्ध काले पत्थर के काले रंग और गेरू रंग की मिट्टी से बर्तनों पर विभिन्न आकृतियां उकेर दी जाती हैं।

    मिट्टी एवं खनिज सम्पदा के रंगों से गुली, हिटड़ी, आंगड़ी, ताड़की, बेलड़ी, बिच्छु, नाग, आम्भ, चौकरड़ी, मची, ढेला, रेसा, मकोड़ा, हमरी, हरणी, फूलड़ी डिजाइनों का चित्रांकन करते हैं। बाड़मेर जिले में मोकलसर गांव की मटकियां बड़ी प्रसिद्ध हैं। इन पर काला दाना दिखाई देता है। पचपदार के बर्तन नमक की मात्रा और राख के उपयोग के कारण अलग पहचान रखते हैं। गुडामालानी की लाल रंग की मटकियां प्रसिद्ध हैं। यहाँ मटका, मटकी, घड़ा, बेड़िया, धाकला (ढक्कन), बगती (पीने के पानी का बर्तन), गुडका, सिकोरा, पुगलिया (बेड़की), बिलोणो, परोटी, हाण्डी, कुलड़ी, तावणियो, तवा, भूड़की, भूड़कियो, बीडमो, कुण्डाली, कुण्डियो, परात, तसियो, ढकणी, प्यालियो, बारोलियो, बढबेड़ा, बुजारियो, दीवटिया, धूपिया आदि प्रमुख रूप से बनाये जाते हैं।

    मोलेला का मृण्मूर्ति शिल्प : मोलेला टेराकोटा पद्धति से लोक देवता और जनजातीय देवी देवताओं की प्रतिमाओं के निर्माण के लिये विश्व भर में प्रसिद्ध है। इस कला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें आकृतियाँ बनाते समय सांचों या औजारों का प्रयोग नहीं किया जाता है। इस मूर्ति कला के लिये मोलेला के शिल्पी सोलानाड़ा तालाब की काली चिकनी मिट्टी काम में लेते हैं। गाँवों में स्थापित होने वाली अम्बा माताजी, भूनाजी, महेन्द्रजी, भैंरूजी और देवनारायणजी आदि की प्रतिमाओं यथा को लेने के लिये दूर दूर से भोपे और पुजारी मोलेला आते हैं। इस परम्परा को सिंगान कहते हैं।

    बू के खिलौने : नागौर जिले में मूण्डवा के निकट स्थित बू गांव में बने मिट्टी के खिलौने मारवाड़ में दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे। इनमें गौर, हाथी, घोड़ा, ऊँट, कुत्ता गाड़ी, सेठ-सेठानी, नाहर, खरगोश, शेर, भैंस, मोर चक्की आदि कई प्रकार के खिलौने बनते हैं किंतु गाय नहीं बनती क्योंकि मिट्टी के खिलौनों को आग में पकाया जाता है और गाय को आग में नहीं रखा जाता। इन खिलौनों का एक हिस्सा चाक पर, एक हिस्सा सांचे में तथा एक हिस्सा हाथों से बनता है। कालीबंगा से मिले मिट्टी के खिलौनों की भी यही विशेषता है। गणगौर के मुंह को सांचे में, नीचे का हिस्सा चाक पर तथा हाथ-पैर हाथों से बनते हैं। देवी-देवताओं की मूर्तियों को भी आग में नहीं पकाते।

    लकड़ी का काम

    राजस्थान में अत्यंत प्राचीन काल से लकड़ी का काम होता है। दरवाजों, चौखटों, खिड़कियों, पालनों, झूलों, पलंगों, मेजों तथा कुर्सियों आदि पर लकड़ी की बारीक खुदाई कर उत्कृष्ट कोटि की नक्काशी की जाती है। बाड़मेर, बीकानेर, जोधपुर, जयपुर तथा उदयपुर जिलों में लकड़ी की नक्काशीदार खुदाई, लकड़ी के खिलौने तथा लकड़ी की मूर्तियां बड़े पैमाने पर बनाई जाती हैं। बाड़मेर व शेखावाटी का कलात्मक फर्नीचर विदेशों को निर्यात होता है। बाड़मेर क्षेत्र में पायी जाने वाले रोहिड़ा वृक्ष की लकड़ी इस कार्य के लिये सर्वाधिक उपयुक्त है। बाड़मेर जिले के धनाऊ, आलमसर, गरल, बालोतरा, शिव तथा भुणिया आदि गांवों में आसू, कुलरिया, बरड़वा, ब्रह्मखत्री, आसदेव, ओढाणा, भदरेचा एवं झूंझा गोत्र के सुथार लकड़ी पर नक्काशी का कार्य करते हैं।

    ग्रामीण सुथार गधों के जांतरे, ऊँटों के पलाण, घोड़ों की काठी, लकड़ी के कैंचिये, औरों की सिहाल, झोंपों के घोड़े, बैलों की भाण, घरेलू उपयोग की वस्तुएं यथा- खाट (माचा), कमाड़, उकले, घरटी तले के भाण्ड, कुड़ियों के ढक, अरटी, कुण्डे, घुड़ला, खुदाई की वाली, खिड़किये होंगू (छोटी कुर्सी), पीढ़े, चकरिया, कांईया, पागे (पाये), खेत के औजार, हल, चौकनिये, दांतरे, बई, पावड़ी, कसी, कई, सिरपी, बीजवण, पालणा, पींगा (झूला), घोड़िया, घाणी, निहणी (सीढ़ी) काष्ठ प्रतिमायें, तोरण, बाजोट (पटला), खोरना, मोगरी, लकड़ी के हथौड़े आदि बनाते हैं। बाड़मेर में बने ऊँटों के पलाण तथा घोड़े की काठियों की मांग ईरान-ईराक तक होती है।

    चंदरस तथा पीतल नक्काशी

    बीकानेर व शेखावाटी के मकानों में सम्पूर्ण छत और नीचे की लकड़ी की मठोठ में उत्कृष्ठ चित्रकारी में चंदरस का काम होता है। दरवाजों, खिड़कियों व चौखटों आदि में खुदाई कर पीतल की कटाई भरने का काम शेखावाटी एवं जयपुर में बढ़िया होता है। लकड़ी की शृंगार पेटियां, तम्बाकू के गट्ठे, डेस्क, ट्रे, चिट्ठीदान, शृंगार मेज, ईसर-गौर, पलंग के पाये व पाटियां, पीढ़े, चौकी आदि पर खुदाई व चित्रकारी का काम बीकानेर, चूरू, रामगढ़, मंडावा, फतहपुर आदि में बढ़िया होता है।

    हाथी दांत तथा चंदन का काम

    हाथी दांत व चंदन की कलाकृतियां बनाने का काम जयपुर, मेड़ता, जोधपुर तथा उदयपुर में अच्छा होता है। हाथीदांत पर खुदाई करने वाले कारीगर ही सामान्यतः चंदन का काम करते हैं। चंदन के हाथी, अम्बाबाड़ी, राधाकृष्ण, जालीदार लैम्प शेड, बुक शैल्फ तथा अन्य कई प्रकार की उम्दा वस्तएं बनायी जाती हैं।

    हैण्डीक्राफ्ट एक्सपोर्ट

    गत कई दशकों से विदेशियों द्वारा राजस्थान के प्राचीन बंगलों, हवेलियों तथा महलों आदि से प्राप्त खिड़कियां, दरवाजे, चौखटें, मूर्तियां, खिलौने, संदूक, बाजोट, पीढ़े, छकड़ों के पहिये आदि बड़े पैमाने पर खरीद कर ले जाये गये हैं जिससे इनके निर्यात का काम भी व्यवसाय के रूप में होता है। आजकल कारीगर पुरानी डिजाईनों की ऐसी ही सामग्री बनाकर उसे धुंए व कीचड़ आदि से पोत कर पुराना बताकर बेचते हैं जिससे उनका मूल्य अधिक मिलता है। जोधपुर, जयपुर आदि नगरों व उनके आस पास के कस्बों में इस तरह का कार्य बड़े पैमाने पर होता है। इस धंधे की आड़ में कई गिरोह प्राचीन महलों, हवेलियों, मंदिरों व बंगलों के दरवाजे, खिड़की, पत्थरों के जालीदार झरोखे, मूर्तियां तथा कलात्मक स्तंभ चुराकर विदेशों को तस्करी करते हैं।

    मीनाकारी एवं कांच कला

    बीकानेर, जयपुर, नाथद्वारा तथा प्रतापगढ़ में मीना एवं थेवा का काम होता है। आभूषणों पर तरज की टिपाई चितेरा करता है। यह काम मीनाकार या सुनार भी करते हैं। टिपाई की रेखाओं के बीच-बीच में धातु पर औजारों द्वारा गहराई ली जाती है। गहराई के धरातल को छीलकर समान भी कर लेते हैं जिससे उस स्थान पर लकीरें अथवा सुम्बी पड़ जाती है। गहराई में रंग भरा जाता है। पारदर्शक रंग में लकीरों के कारण छाया-प्रकाश का प्रभाव झलकने लगता है। रंगों को उनकी ताप सहने की क्षमता के क्रम में लगाया जाता है। अर्थात् अधिक ताप सहने वाले रंग को सबसे पहले लगाकर पकाया जाता है फिर कम ताप सहने वाले रंग को लगाकर पकाया जाता है।

    रंग कांच व चपड़ी दो प्रकार के होते हैं। पत्थर के टुकड़ों की तरह का कांच का रंग खरल में पीस कर पानी के साथ मिलाया जाता है तथा कलम द्वारा वांछित स्थान पर लगाया जाता है। रंग तापने से तरल हो जाते हैं। समानता में आने पर उसकी कुरणु से पालिश की जाती है जिससे वे पारदर्शक व उज्जवल हो जाते हैं। जयपुर के मीनाकार लाल रंग बनाने में तथा बीकानेर के मीनाकार कागज जैसे पतले पतरे पर भी मीना करने में कुशल होते हैं। ताम्बे पर केवल सफेद, काले और गुलाबी रंग ही काम में लाये जा सकते हैं। तलवार व छुरियों के मूठ तथा आभूषणों में बाजू बंगड़ी, हार, सिगरेट केस, ताबीज तथा कनागती आदि पर मीना किया जाता है।

    कोटा के रेतवाली क्षेत्र में कांच पर विभिन्न रंगों से मीना का काम किया जाता है। जिसमें गंदा बिरोजा, तरल पेस्ट, चपड़ी में डालने वाले हरे, पीले, लाल और नीले रंग काम में लाये जाते हैं। वायुरोधी बंद कक्ष में कांच को आग में तपाया जाता है और लकड़ी की नुकीली कलम से वांछित रंग से आकृति बनाकर उसमें रंग भरा जाता है। उसके बाद कांच को पुनः गर्म करते हैं जिससे गंदा बिरोजा रसायनों से क्रिया करके कांच पर अपना प्रभाव छोड़ते हैं। कांच को तपाते समय जरा भी हवा लग जाने पर कांच तड़क जाता है। अतः इस कार्य में बड़ी सावधानी बरती जाती है। कटाई के खत और जिलह में रंगीन कांच (रोल्ड ग्लास) काम में लिया जाता है। कांच को वांछित आकार में काटकर, घिसकर तथा पॉलिश करके आधारभूत सामग्री जुटाई जाती है। इस काम में सान (ग्राइण्डर) का बड़ा उपयोग होता है।

    कांच पर गोंद मिले पीले रंग से वांछित आकृति चित्रित की जाती है। अब ग्रेफाइट मार्कर अथवा ग्लास कटर भी काम में लिया जाता है। इसके बाद जम्बूरे से अनावश्यक कांच काट दिया जाता है जिससे वांछित आकृति प्राप्त हो जाती है। इसके बाद एमरी की सान से आकृति के किनारे रफ किये जाते हैं तथा बारीक एमरी से अनावश्यक कांच हटा दिया जाता है। इसके बाद अकीक पत्थर की सान से घिसाई करके किनारों को चिकना किया जाता है। अंत में एड़ की लकड़ी की सान से किनारों पर पॉलिश की जाती है। इसके बाद सिल्वर नाइट्रेट क्रिस्टल, सोडियम टारट्रेटा, लिकर अमोनिया, फोर्ट और डिस्टल वाटर की मदद से कांच पर कलई की जाती है तथा गज मिट्टी अथवा प्लास्टर ऑफ पेरिस से इन कांचों को चिपकाकर कलाकृतियां तैयार की जाती हैं। डाक पन्नी की कलाकारी में कांच की कलई के वक्त कामीं से लिखाई की जाती है। ये कामीं ताम्बे की पतली पत्तर के रूप में होती है। इसे गोल काट कर अकीक की ओपनी से ओपते हैं तो यह एक कटोरी की तरह का आकार ले लेती है। इसके बाद हाइड्रोलिक अम्ल से कांच पर खुदाई और लिखाई का काम किया जाता है।

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  • अध्याय - 19 संगम युग का साहित्य, समाज एवं संस्कृति

     02.06.2020
    अध्याय - 19 संगम युग का साहित्य, समाज एवं संस्कृति

    संगम युग का साहित्य, समाज एवं संस्कृति


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    प्रथम संगम, तमिल भाषा के प्रणेता अगस्त्य ऋषि की अध्यक्षता में मदुरै में आयोजित हुआ। अगस्त्य को दक्षिण भारत में आर्य संस्कृति के प्रसार का श्रेय है। माना जाता है कि इस संगम में देवताओं और ऋषियों ने भाग लिया था किन्तु इस संगम की सभी रचनाएँ नष्ट हो गईं।

    संगम साहित्य से तात्पर्य पांड्य-शासकों द्वारा संरक्षित विद्वत्-परिषद् के साहित्यकारों द्वारा तीन अलग-अलग सम्मेलनों में तमिल भाषा में रचे गए साहित्य से है। इतिहासविद् संगम साहित्य की तुलना ग्रीस और रोम के गौरव-ग्रंथों तथा यूरोपीय पुनर्जागरण काल के साहित्य से करते हैं। कुछ विद्वान संगम युग को तमिलों का स्वर्ण-युग मानते हैं। निश्चय ही तमिलों के इतिहास में संगम युग अनूठा है। दक्षिण भारत के अनेक स्थलों से प्राप्त पुरातात्त्विक स्रोत संगम युग के लोगों के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पक्षों पर प्रकाश डालते हैं किंतु इस सम्बन्ध में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण जानकारी उस युग के बहुमूल्य संगम-साहित्य से प्राप्त होती है।

    संगम साहित्य का रचनाकाल

    संगम साहित्य के रचना-काल के बारे में विद्वानों में मतभेद हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार संगम साहित्य ईसा पूर्व पांचवीं शताब्दी से लेकर दूसरी शताब्दी ईस्वी के मध्य तक लिखा गया। एम. अरोकिया स्वामी के अनुसार संगम साहित्य में सम्मिलित ग्रंथ 'तोलक्कापियम' के लेखक 'तोल्कापिप्यर' ईसा पूर्व चौथी अथवा ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में हुए। अतः संगम साहित्य की रचना इसी काल में आरम्भ हुई होगी।

    संगम साहित्य की रचना

    के आधार पर के. ए. एन. शास्त्री संगम युग की अवधि ई.100 से ई.250 तक मानते हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार इस साहित्य का संकलन ई.300 से ई.600 के काल में हुआ किंतु यह निर्विवाद है कि इस साहित्य का अंतिम संकलन ई.600 अथवा उसके आसपास हुआ। इस साहित्य का सृजन एवं संग्रहण पांड्य शासकों द्वारा मदुरै में आयोजित तीन 'सम्मेलनों' के दौरान हुआ जिन्हें 'संगम' कहा जाता है। संगम साहित्य की रचना अलग-अलग पांड्य शासकों द्वारा अलग-अलग काल में बुलाए गए तीन साहित्य-सम्मेलनों में भाग लेने के लिए दक्षिण भारत के अनेक ख्यातिनाम लेखक, कवि एवं चारण दूर-दूर से मदुरै आए।

    इन सम्मेलनों को 'संगम' और इन सम्मेलनों में रचित साहित्य को 'संगम साहित्य' कहा गया। संगम साहित्य अनेक वीरों और वीरांगनाओं की प्रशंसा में रचित उच्चकोटि की अनेक छोटी-बड़ी कविताओं का संग्रह है। ये कविताएँ धर्मसम्बन्धी नहीं हैं।

    साहित्य का विशाल भण्डार

    संगम साहित्य अपने मूल रूप में साहित्य का विशाल भण्डार रहा होगा। जो संगम-साहित्य आज उपलब्ध है वह उसका एक हिस्सा भर ही है। संगम साहित्य निम्नलिखित संकलनों में उपलब्ध है- नरिनई, कुरुन्दोहई, ऐन्गुरुनुरु, पत्तुप्पत्त, पदिटुप्पतु, परिपाड़ल, कलित्तोहई, अहनानुरु और पुरनानुरू। संपूर्ण संगम साहित्य में 473 कवियों की 2,289 रचनाएं हैं। इन कवियों में से 102 अनाम कवि हैं तथा शेष तमिल के विख्यात साहित्यकार हैं। संगम साहित्य में 30,000 पंक्तियों की कविताएं हैं।

    इन्हें आठ संग्रहों में संकलित किया गया, जिन्हें 'एट्टूतोकोई' कहा गया। इनके दो मुख्य समूह हैं- पाटिनेनकिल कनाकू (18 निचले संग्रह) और पत्त ूपत्तू (10 गीत)। पहले समूह को दूसरे से अधिक पुराना और अधिक ऐतिहासिक माना जाता है। संगम साहित्य का सबसे प्राचीनतम ग्रंथ 'तोलक्कापियम' है। यह तमिल-व्याकरण और काव्य का ग्रंथ है।

    तीन संगमों की परंपरा

    पांड्य शासकों द्वारा कुल तीन संगम आयोजित किए गए थे किंतु पहले दो संगमों के बारे में कोई इतिहास उपलब्ध नहीं है और उनमें जिस साहित्य का सृजन हुआ उसका भी कुछ पता नहीं। तीसरे संगम के बारे में कुछ जानकारी उपलब्ध है। यह संगम पांड्यों की राजधानी मदुरा में हुआ। इस सम्मलेन में तमिल कवियों ने पर्याप्त संख्या में हिस्सा लिया होगा। इरैयानार अहप्पोरुल के अनुसार ये संगम 9,990 वर्ष तक चलते रहे तथा इनमें 8,598 विद्वान सम्मिलित थे। अधिकांश विद्वान् संगमों की इस अवधि को सही नहीं मानते। उनके विचारानुसार इतनी लम्बी अवधि संभवतः संगम साहित्य को प्राचीनता की गरिमा और महत्ता प्रदान करने के लिए ही बताई गई होगी।

    संत अगस्व्यार संगम परम्परा के प्रवर्तक थे। अहप्पोरुल की टीका से तीनों संगमों की अनुक्रमिक व्यवस्था और उनके अंतरालों के बीच के जल-प्लावनों की भी जानकारी मिलती है। ये संगम अथवा विद्वत्परिषदें 197 पांडय राजाओं द्वारा संरक्षित थीं। परंपरागत मतानुसार तीन अनुक्रमिक संगमों में प्रथम दो प्रागैतिहासिक काल के हैं। सभी तीनों संगम पांडयों की राजधानी में आयोजित किए गए। चूंकि राजधानी समय-समय पर बदलती रहती थी अतः प्रथम संगम का मुख्यालय पुराना मदुरै था और दूसरा संगम कपाटपुरम् में आयोजित किया गया।

    अनुक्रमिक जल-प्लावनों में ये दोनों केन्द्र समुद्र द्वारा नष्ट कर दिए गए। तीसरा संगम आधुनिक मदुरै में आयोजित हुआ था। तृतीय संगम की तिथि अन्य संगमों की तिथियों की अपेक्षा अधिक प्रामाणिक प्रतीत होती है। यह तिथि ईसा की प्रथम दो शताब्दी और संभवतः ईस्वी सन् के प्रारंभ के तत्काल पूर्व की सदी मानी जाती है। तोल्कापिप्यर का काल द्वितीय संगम युग में माना जाता है। तीसरा संगम युग भारत-रोम के तत्कालीन शाही रोम के साथ व्यापार के काल से मेल खाता है।

    यह काल-निधार्रण उस समय के ग्रीक लेखकों के विवरण में उपलब्ध साक्ष्यों पर आधारित है। भूमध्य सागरीय प्रदेशों और तमिल क्षेत्र के बीच समुद्रपारीय व्यापारिक गतिविधियों के अनेक उल्लेख मिलते हैं। यह संगम साहित्य से भी प्रमाणित होता है। संगमों की तुलना आधुनिक युग के यूरोप में फ्रेंच अकादमी से की जा सकती है जिसका लक्ष्य भाषा की शुद्धता और साहित्यिक स्तर को बनाए रखना था। आरंभ में संगम में नामांकन सहयोजन से होता था, किंतु आगे चलकर यह भगवान शिव, जो इस महान संस्था के स्थायी अध्यक्ष थे, की चमत्कारी युक्ति से होने लगा।

    संगम साहित्य की भाषा

    दक्षिण भारत की सर्वाधिक प्राचीन भाषा संभवतः तमिल थी। बाद में स्थानीय बोलियों के मिश्रण से तेलुगु, मलयालम और कन्नड़ भाषाएँ भी अस्तित्व में आईं। वैदिक संस्कृति से सम्पर्क के बाद दक्षिण की भाषाओं में संस्कृत भाषा के अनेक शब्द अपनाए गए और ई.पू. तीसरी शताब्दी में 44 वर्णों पर आधारित एक लिपि का विकास किया गया। संगमकालीन साहित्य इसी लिपि में लिखा गया। पुरातत्वविदों को 75 से भी अधिक ब्राह्मी लिपि (जो बायीं ओर से दायीं ओर लिखी जाती है) में लिखे अभिलेख मदुरा और उसके आस-पास की गुफाओं में प्राप्त हुए हैं। इनमें तमिल के साथ-साथ प्राकृत भाषा के भी कुछ शब्दों का प्रयोग किया गया है। सुदूर दक्षिण के जन जीवन पर पहले-पहल संगम साहित्य से ही स्पष्ट प्रकाश पड़ता है।

    संगम साहित्य के प्रमुख महाकाव्य

    संगम साहित्य में तिरूवल्लूवर जैसे तमिल संतों की कृति 'कुराल' उल्लेखनीय है जिसका बाद में अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ। 'कुराल' को तीन भागों में बांटा गया है। पहला भाग महाकाव्य, दूसरा भाग राजनीति और शासन तथा तीसरा भाग प्रेम विषयक है। 'शिलाप्पदीकारम' तथा 'मणिमेकलई' नामक दो महाकाव्य भी हैं। जिनकी रचना लगभग छठी शताब्दी ईस्वी में की गई। पहला महाकाव्य तमिल साहित्य का सर्वाेत्तम रत्न माना जाता है। यह एक प्रेमगाथा पर आधारित है।

    दूसरा महाकाव्य मदुरै के अनाज व्यापारी ने लिखा। दोनों महाकाव्यों में दूसरी से छठी शताबदी ईस्वी तक के तमिल समाज का सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक वर्णन हुआ है। ईसा की प्रारंभिक सदियों में तमिलनाडु के लोगो के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन के अध्ययन के लिए संगम साहित्य ही एकमात्र प्रमुख स्रोत है। इस साहित्य में व्यापार और वाणिज्य के बारे में प्राप्त तथ्यों की पुष्टि उसकी विदेशी विवरणों तथा पुरातात्विक प्रमाणों से भी होती है।

    संगम साहित्य-निकाय

    आधुनिक विद्वान 'संगम साहित्य पद का प्रयोग केवल उन्हीं रचनाओं के लिए करते हैं जो छंदबद्ध हैं, गद्य का जन्म बहुत बाद में हुआ। 'एत्तुतोगाई' (अष्टसंग्रह), 'पत्तुपात्रु' (दस गीत) और 'पतिने किल्कनक्कु' (अष्टादश लघु कृतियाँ), आदि काव्य इसी क्रम में ई.150-250 की अवधि में रचे गए हैं। पंचमहाकाव्य- जीवकचिंतामणि, सिलप्पादिकरम, मनिमे कलाई, वलयपाथी और कुंडल केशी बहुत बाद में रचे गए। इनमें से अंतिम दो महाकाव्य अब उपलब्ध नहीं हैं।

    शेष तीन महाकाव्यों में सिलप्पादि करम तथा मनिमे कलाई जुड़वाँ महाकाव्य कहे जाते हैं, क्योंकि वे एकल परिवार- कोवलान (पुहार का धनी सौदागर), कन्नगी (कोवलान की साध्वी पत्नी), माधवी (नर्तकी) जिसके साथ कोवलान विवाहित बनकर रहता था, और इस विवाह से उत्पन्न संतान, मनिमेकलाई की कहानी को ही आगे बढ़ाते हैं। सिलप्पदिकरम का लेखक ईलांगो आदिगल था जिसे महाकाव्य में तत्कालीन चेर राजा सेंगुत्तुवन का भाई कहा गया है।

    मनिमेकलाई की रचना सथनार ने मुख्य रूप से तमिलों के बीच बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए की थी। ये काव्य-रचनाएँ तमिलों की सामाजिक, आर्थिक और आर्थिक परिस्थितियों का वर्णन करती हैं और इनके प्रतिपाद्य विषय के केंद्र मदुरै, पुहार (पूंपुहारकावेरी), पटिटनम, वंजि (करुर) और कांची आदि नगर हैं। उपर्युक्त तीन समूहों के काव्य ईसा की प्रथम तीन शताब्दियों के भीतर लिखे माने जा सकते हैं किन्तु वर्तमान समय में वे जिस क्रम में संगृहीत और व्यवस्थित हैं वह बहुत बाद का प्रतीत होता है।

    काव्य की लंबाई उसे बड़े वर्गों में विभाजित करने का मुख्य आधार थी। 'अष्टसंग्रह' की कविताएँ तीन से तैंतीस पंक्तियों की हैं, जबकि 'दशगीत' की सबसे छोटी कविता 103 पंक्तियों तथा सबसे लंबी कविता 782 पंक्तियों की है। अधिकांश कविताओं के अंत में टिप्पणी भी दी गई है जिनमें कवियों के नाम और उस कविता-रचना की परिस्थितियों का भी उल्लेख है। 'अष्टादश लघुकृतियों' में नैतिक और उपदेशात्मक साहित्य है।

    संगम साहित्य के उपदेशात्मक साहित्य में विश्व-प्रसिद्ध 'तिरुक्कुरल' का छंदबद्ध साहित्य भी सम्मिलित है जिसके प्रत्येक छंद में दो से तीन पंक्तियाँ हैं। वर्तमान में संगम साहित्य में 3 पंक्तियों से लेकर 800 पंक्तियों तक की विभिन्न लंबाई वाले काव्य हैं। इनमें से कुछ रचनाएँ एक ही कवि की मानी गई हैं, जबकि नालादियार जैसी कुछ अन्य रचनाएँ अनेक कवियों द्वारा लिखित मानी जाती हैं। वर्तमान में उपलब्ध संगम काव्य 30,000 से अधिक पंक्तियों में है।

    ये कुल 473 कवियों द्वारा लिखी गई हैं जिनमें लगभग 50 महिला कवि भी हैं। 102 कविताएँ अज्ञात कवियों की हैं। इन रचनाओं से प्रकट होता है कि उस समय की संस्कृति बहुत उन्नत थी तथा संगम युग आते-आते तमिल भाषा अत्यंत प्रौढ़ हो चुकी थी। संगम साहित्य की भाषा अवश्य ही अत्यंत प्राचीन है किंतु आधुनिक तमिल भाषियों को उसे समझने में अधिक कठिनाई नहीं होती।

    विद्वानों ने संगम काव्य को विषय-वस्तु के आधार पर अनेक श्रेणियों में बांटा है किंतु आकार के आधार पर उन्हें दो श्रेणियों में विभक्त किया जाता है- (1.) लघु संबोध-गीति और (2.) लंबी कविताएँ। इतिहासकारों के लिए छोटी कविताएँ, लंबे गीतिकाव्य से अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। संबोध-गीति वचनिकाओं में संगृहीत हैं। ये वचनिकाएँ हैं- अहनानुरु, पुरानानुरु, कुरुंतोगाई, नार्रिनाई, कालितोगाई, परिपादाल, ऐंगुरुनुरु और पतिरुर्पत्तु। इनका संकलन 'एत्तुतोगाई' कहलाता है। दस लंबे गीति-काव्य अथवा विवरणात्मक काव्य, जिसे 'पत्तु पत्तु' कहते हैं, नौवां समूह माना जाता है।

    इस संकलन में निम्नलिखित काव्य शामिल हैं- तिरुमुरुगारुर्प्पादाई, सिरुपानारुर्प्पादाई, पोरुनारुर्पादाई, पेरुंबनारुर्पादाई, नेदुनालवादाई, कुरिंजिप्पात्रु, मदुराईक्कांजी, पत्तिनाप्पालाई, मुमुल्लाइप्पत्तु और मलाईपादुकादम। इनमें तिरुमुरुगारुर्पादाई भगवान मुरुगन पर भक्ति-काव्य है। सिरु पनारुर्प्पादाई नलिलयाक्कोडन की उदार प्रकृति का वर्णन करता है जिसने चोल राज्य के एक हिस्से पर शासन किया। पेरुं बाना रुज्पदाई तोंदा ईमान इलांतिरैयान और उसकी राजधानी कांचीपुरम का वर्णन करता है। पोरुनारुर्प्पादाई और पत्तिनाप्पालाई महान चोल राजा कारिकाल का स्तुतिगान करता है।

    नेदुनालवादाई और मदुराई कांजी के महान पांड्य राजा लालैया लांग नत्रु नेडुन जेलियान का वर्णन करता है। कुरिजिप्पत्रु पहाड़ी और पर्वतीय जीवन का चित्रण करता है, और मलाई पादुकादम नायक नान्नान के साथ-साथ युद्ध में राजा की विजय का उत्सव मनाने और सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए गीत-संगीत की रचना करता है। ये सारी कृतियाँ संगम युग में कवियों की महत्ता को भी दर्शाती हैं।

    संगम कालीन साहित्य में वर्णित समाज

    तोल्कापिपयम के वर्णन से पता चलता है कि संगम समाज का आरंभिक दौर भूमि के पंचविध वर्गीकरण- पहाड़ी, पशुचारी, कृषीय, मरुस्थल और तटीय पर आधारित था। इन वर्गीकृत भूमियों पर विभिन्न किस्म के लोग रहते थे और सबने अपने अलग-अलग परिवेश में विशेष प्रकार के तौर-तरीके और जीवन-शैलियाँ विकसित कीं। पारिस्थितिकीय विविधताओं ने उनके विभिन्न व्यवसायों- आखेट, कृषि, पशुचारण, लूट-पाट, माही गिरी, गोताखोरी, नौचालन, इत्यादि का स्वरूप निर्धारित किया।

    आद्य मानव समूह

    मानवशास्त्री अध्ययनों से पता चलता है कि संगम कालीन आद्य सामाजिक घटक नेग्रोआयड और आस्ट्रेलायड समूहों का था जिनका मिश्रण आद्य भूमध्यसागरीय क्षेत्रों से आए एक अन्य प्रजातीय कुल से हुआ था। आरंभिक दौर में इन समाजों की जनसंख्या कम थी और सामाजिक वर्गों का निर्माण नहीं हुआ था। इस कारण प्रत्येक क्षेत्र के लोगों में एकता थी। वे अपने शासकों के पास स्वतंत्रता पूर्वक आ-जा सकते थे। उस समय का तमिल समाज व्यावसायिक वर्गीकरण से परिचित था जिसमें सैनिकों, आखेटकों, गड़ेरियों, हलवाहों, मछुआरों, इत्यादि व्यवसायों का अस्तित्व प्रमुखता से था।

    सामाजिक वर्गीकरण

    संगम युग के उत्तरार्द्ध में अनेक कबीलों और सरदारों का अस्तित्व मिलता है। चार वैदिक वर्ण स्पष्टतः बाद की अवधि के थे। अप्रवासी ब्राह्मणों द्वारा ईसा की पहली सदी के लगभग वर्ण-व्यवस्था लाई गई, किन्तु इसमें उत्तर भारत की तरह क्षत्रिय शामिल नहीं थे। सिर्पफ ब्राह्मण ही द्विज थे जो यज्ञोपवीत धारण कर सकते थे। संगम साहित्य में दासों का उल्लेख भी मिलता है और उन्हें 'आदिमाई' कहा जाता था जिसका अर्थ होता है- वह व्यक्ति जो दूसरों के चरणों पर आश्रित होता है।

    संगम कालीन समाज में स्त्री की दशा

    कालित्तोगाई आदि संगम-काव्यों से ज्ञात होता है कि संगम कालीन तमिल समाज में नारियों को पुरुषों की भांति स्वतंत्रता प्राप्त थी। वे स्वतंत्रता पूर्वक घरों से बाहर जाती थीं। समुद्रतट और नदी-किनारे खेल सकती थीं और मंदिरों के उत्सव में शामिल होती थीं। फिर भी नारी को पुरुषों के संरक्षण में रहना होता था। 'कुरुंतोगाई' से पता चलता है कि पत्नी को पति के गुणों के मूल्यांकन के आधार पर नहीं, अपितु इसलिए प्यार करना चाहिए क्योंकि वह उसका पति है।

    दूसरे शब्दों में, पत्नी के लिए पति का आकलन करना संभव नहीं था। यद्यपि ऐसे प्रसंग भी मिलते हैं जहाँ नारियाँ शिक्षित थीं और काव्य-रचना भी करती थीं किन्तु साधारणतः नारियों की स्थिति ऐसी नहीं थी। उन्हें संपत्ति का अधिकार नहीं था, किन्तु उनके साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार किया जाता था। वे विधवा का जीवन बिताती थीं अथवा सती हो जाती थीं और इसे दैवी-विधान माना जाता था। विवाह एक संस्कार था, संविदा नहीं।

    'तोलकापिपयम' में आठ प्रकार के विवाहों की चर्चा की गई है जिनमें ब्रह्म विवाह का आम प्रचलन था। प्रणय-निवेदन और बिना विवाह के साथ में रहने का भी उल्लेख है जो बाद में पारंपरिक विवाह के रूप ले लेता था। वेश्यावृत्ति एक स्वीकृत संस्था थी। किन्तु गणिकाएँ शांत पारिवारिक जीवन में बाधक मानी जाती थीं। इसके बावजूद, काव्यों में जिस रूप में इनका चित्रण हुआ है और वे जैसी सामाजिक हैसियत रखती थीं उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि संगम युग की गणिकाएं हेय-दृष्टि से नहीं देखी जाती थीं।

    यद्यपि कुरुतोगाई आदि ग्रंथों में ऐसी गणिकाओं की चर्चा हुई है जो पत्नियों और उनके रिश्तेदारों को चुनौती देती हैं, पुरुषों को लुभाती हैं तथापि गणिकाएँ अपने साथियों को मुख्यतः नृत्य-गायन आदि से ही प्रसन्न करती थीं।

    वस्त्राभूषण एवं अलंकार

    धनी लोग बारीक मलमल और रेशम से बने वस्त्र पहनते थे। कुलीनों और राजाओं को छोड़कर शेष लोग कपड़े के दो टुकड़ों- एक कमर के नीचे और दूसरा पगड़ी के रूप में शिरोवस्त्र से ही संतुष्ट रहते थे। स्त्रियाँ कपड़ों का उपयोग कमर से नीचे के भाग को ढंकने के लिए ही करती थीं। कबीले तो उतना भी नहीं कर सकते थे। कबीलाई स्त्रियाँ शरीर को ढंकने के लिए पत्तों और छालों का उपयोग करती थीं। संगम युग के स्त्री-पुरुष तेल, सुगंधित द्रव्य, रंगीन पाउडर और प्रलेप के शौकीन थे तथा अपनी छातियों पर चंदन का गहरा लेप लगाते थे।

    सिलप्पादिकरम के अनुसार सित्रयां अपने शरीर पर तस्वीरें बनवाती थीं और पलकों पर श्याम-रंजक लगाती थीं। स्त्री और पुरुष दोनों गर्दन के घेरे में, बाहों और पैरों में आभूषण धारण करते थे। कुलीन स्त्रियां भारी बाजूबंद और पाजेब पहनती थीं, जबकि सामान्य गृहस्थ-स्त्रियाँ सामान्य प्रकार के जेवर धारण करती थीं। धनी वर्ग के स्त्री-पुरुष स्वर्ण और कीमती रत्नों से शृंगार करते थे, निर्धन स्त्रियां शंख एवं कौड़ी से बने कंगनों और रंगीन मनकों से बने कंठहार पहनती थीं। 'शिलप्पादिकरम' एक ऐसे आनुष्ठानिक गर्मस्नान का उल्लेख करता है जिसका जल पाँच प्रकार के बीजों, दस प्रकार के स्ंतभों और बत्तीस प्रकार के सुगंधित पौधों से गरम किया जाता था, बालों को 'अखिल के धुएं' से सुखाया जाता था और सजने-संवरने के लिए बालों को पाँच हिस्सों में बांटा जाता था।

    पुरुष भी लंबे बाल रखते थे और उनके गुच्छे को गांठ बनाकर बांधते थे। इन गांठों को कभी-कभार मनकों की माला से घेरा जाता था। कुरुंतोगाई के अनुसार तमिल लोग फूलों के शौकीन थे। स्त्रियां जूड़े में कुमुदिनी के फूल लगाती थीं।

    आवास

    संगम काल के लोग कई प्रकार के घर बनाते थे। सामान्य लोगों के घर कच्ची मिट्टी की ईटों एवं गारे से बनाये जाते थे। धनी लोगों के घर 'सुडुमान' अर्थात् पकाई गई मिट्टी की ईंटों से बने होते थे। निर्धन लोेग ऐसी छाजन वाले घरों में रहते थे जो घास अथवा नारियल या पंखिया खजूर अथवा ताड़ से छाई जाती थी। साहित्यिक रचनाएँ धनी लोगों के कई मंजिलों वाले घरों का उल्लेख करती हैं जिनके प्रवेश-द्वार पर लोहे के फाटक होते थे और उन फाटकों को जंग से बचाने के लिए उन पर रंग किया जाता था।

    'सिलप्पादिकरम' के अनुसार ये घर सुंदर कलात्मक दीपकों से प्रकाशित किए जाते थे। ऐसे दीपक ग्रीस और रोम से आते थे। इनमें मछली से निकाला गया तेल डाला जाता था।

    भोजन और पेय

    संगम काल के तमिल लोग प्रायः सामिष भोजन करते थे किंतु ब्राह्मण एवं संन्यासी निरामिष आहार ही ग्रहण करते थे। भोजन में चावल, दूध, मक्खन, घी और शहद प्रधान थे। मांस और मद्य का खुलकर उपयोग होता था। दही लोकप्रिय भोज्य था। कुरुंतोगाई दही, गुड़, मुरमुरा, दूध और घी से बने अनेक प्रकार के मिष्ठानों की चर्चा करता है। संगम ग्रंथों में कढ़ी और चावल का भी उल्लेख हुआ है। उच्च वर्ग के लोग उत्तम कोटि के चावल, मन पसंद मांस, आयातित मद्य इत्यादि ग्रहण करते थे।

    ब्राह्मण मद्य और मांस से परहेज करते थे। नगरीय क्षेत्रों में विभिन्न संस्थाओं द्वारा निर्धनों को निःशुल्क भोजन का वितरण किया जाता था। धनी गृहस्थों द्वारा दावतों का आयोजन भी किया जाता था। अतिथियों को भोजन करवाना सामान्य प्रथा थी और बिना अतिथि को खिलाए भोजन अधूरा माना जाता था। कवि और विद्वान सम्मानित अतिथि माने जाते थे और घी में पकाया गया चावल उन्हें प्रेम और आदर से खिलाया जाता था।

    मनोरंजन

    लोग अनेक प्रकार के खेलों और उत्सवों में भाग लेते थे। इनमें नृत्य, संगीत के आयोजन, धार्मिक उत्सव, बैलों की लड़ाई, मुर्गेबाजी, आखेट, पासा, कुश्ती, मुक्केबाजी, कलाबाजी, इत्यादि शामिल थे। औरतें धार्मिक उत्सवों, पासे और वारिप्पांथु या कपड़े की गेंद से खेलती थीं। लड़कियां प्रायः ताड़ या खजूर की पंखियों के रेशे से बने हिंडोले में झूलती थीं। नरिन्नाई अलंकृत गुड़ियों से खेले जाने वाले खेल की चर्चा करता है।

    कुरुंतोगाई के अनुसार बच्चे खिलौना-गाड़ी से खेलकर और समुद्र-तट पर बालू के घर बनाकर अपना मनोरंजन करते थे। नृत्य और संगीत मनोविनोद के लोकप्रिय साधन थे। संगम काव्य अनेक प्रकार के नृत्यों की चर्चा करता है। सिलप्पादिकरम सात समूहों में बंटे ग्यारह प्रकार के नृत्यों का उल्लेख करता है। यह संगीत की बारीकियों का भी विवरण देता है। मृदंग, बांसुरी और याल जैसे अनेक प्रकार के वाद्ययंत्र पुहार और मदुराई की दुकानों में बेचे जाने का भी उल्लेख है।

    प्रदर्शन की कलाओं में नाटक भी शामिल था। नाटकों का स्वरूप अधिकांशतः धार्मिक होता था, प्रायः महान व्यक्तियों अथवा महत्त्वपूर्ण घटनाओं के स्मरणोत्सव के रूप में भी नाटक खेले जाते थे। मागध और बंदी अपने वाद्य-यंत्रों के साथ जगह-जगह घूमकर किसी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति अथवा घटना की महिमा गाया करते थे और संगम युग में यह कार्य काफी लोकप्रिय था। आरंभ में चारण (पोरुनार) युद्ध में संलग्न सैनिकों में वीरत्व जगाने और युद्ध में विजय मिलने पर उनकी विजय-गाथा गाते थे। वे युद्धरत योद्धाओं के संदेश उनके घरों तक पहुंचाते थे। समाज में उनका बहुत आदर था और राजा भी उन्हें सम्मानित करते थे। पोरुनार के साथ-साथ पनार भी जनसामान्य का मनोरंजन करते थे।

    संगम कालीन समाज के धार्मिक विश्वास

    साहित्यिक स्रोत संगम युग में धार्मिक कृत्यों का विशद उल्लेख करते हैं। संगम कालीन तमिल समाज में ब्राह्मण धर्म, जैन धर्म एवं बौद्ध धर्म प्रचलित थे। बौद्ध धर्म और जैन धर्म ईसा की प्रथम शताब्दी में तमिल प्रदेश में आए। इस अवधि में शैव और वैष्णव जैसे ब्राह्मण-पंथ भी प्रचलित थे। संगम कृतियों में वैदिक लोगों के आगमन और तमिलों के धर्म के साथ उनके धर्म के पारस्परिक प्रभाव की चर्चा अनेक स्थलों पर हुई है। सिलप्पादिकरम त्रिगुण पवित्र-अगिन, द्विज प्रकृति, छः कर्त्तव्य तथा अन्य ब्राह्मणवादी विचारों और अवधारणाओं की चर्चा करता है। तोल्कापिपयम में भी ब्राह्मण-विहित छः कर्त्तव्यों का उल्लेख है।

    ब्राह्मणवादी अनुष्ठान एवं संस्कार पूरी तरह प्रचलन में थे। अनेक संगम काव्यों में यज्ञीय भवनों वाले पांड्य नृपों की चर्चा हुई है। तोल्कापिपयम में चार देवताओं की चर्चा हुई है- मुरुगन, तिरुमल, वेंदन (इंद्र) और वरुण। इन्द्र की पूजा वर्षा के देवता के रूप में होती थी और उसके सम्मान में वार्षिकोत्सव मनाया जाता था। पत्तिनप्पालाई में शिव के पुत्र मुरुगन की पूजा का उल्लेख है। लक्ष्मी (समृद्धि की देवी), वनों के संरक्षक के रूप में मायन (पश्चवर्ती विष्णु), बलदेव, कामन (प्रणय-देव), चन्द्रदेव, समुद्रदेव तथा अन्य देवताओं की भी पूजा होती थी। संगम युग के लोग भूत-प्रेत में भी विश्वास करते थे।

    सिल्पादिकरन में भूत की चर्चा मिलती है। अनेक लोग पेड़ों, युद्ध क्षेत्रों और श्मशानों में निवास करने वाले ऐसी दुष्टात्माओं में विश्वास करते थे जो रक्तपान करते हैं और रक्त सने हाथों से बाल संवारते हैं। उसी ग्रंथ में छोटे देवताओं, जैसे- मदुरा और पुहार आदि अभिभावक देवताओं का उल्लेख हुआ है। वे ग्राम-देवताओं को तुष्ट करने के लिए यज्ञ करते थे। वृक्षों, झरनों और पर्वत-शिखरों पर निवास करने वाले देवताओं में विश्वास और उनकी पूजा-अर्चना की परंपरा से स्पष्टतः जीववाद के प्रचलन का पता चलता है।

    मृतवीरों, सतियों और अन्य शहीदों को भी देवत्व प्रदान किया जाता था। संगम युग में ईसा की प्रथम शताब्दी में बौद्ध और जैन धर्मांे के प्रवेश से तमिलों के दार्शनिक विचार बहुत हद तक प्रभावित हुए। इन विचारधाराओं ने ज्ञान को पदार्थ पर प्राथमिकता दी। बौद्धों और जैनों ने लोगों का आह्वान किया कि वे पदार्थ से परे जगत के बारे में सोचें। अनेक विद्वानों का मत है कि उस काल के दो प्रसिद्ध महाकाव्यों, सिलप्पादिकरम और मनिमेकलाई में से प्रथम जैन ग्रंथ था और दूसरा बौद्ध ग्रंथ।

    शैववाद और वैष्णववाद भी महत्त्वपूर्ण धार्मिक मत थे। मनिमेकलाई में शैववाद का उल्लेख हुआ है। अन्य ग्रंथों में शिव को उनके सहज गुणों के साथ उल्लिखित किया गया है, जैसे- प्राचीन प्रथम ईश्वर, सुंदर नीले कंठ वाले भगवान और वटवृक्ष के नीचे स्थित भगवान। इससे प्रतीत होता है कि आरंभिक काल में शैववाद और वैष्णववाद दोनों तमिल प्रदेश में र्सिफ सिद्धांत में प्रचलित थे, नाम से नहीं। यद्यपि तोल्कापिपयम मुरुगदेव (शिव का पुत्र) और मायन (विष्णु का आरंभिक नाम) की चर्चा तो करता है, किन्तु शैववाद और वैष्णववाद का स्पष्ट उल्लेख नहीं करता।

    संभवतः इन दो पंथों का दो भिन्न संप्रदायों में संक्रमण संगम युग में हो रहा था। संगम युग के लोग स्वप्नों और मानव-जीवन पर ग्रहों के प्रभाव में भी विश्वास करते थे। कुछ लक्षण तो आमतौर पर अनिष्टकर माने जाते थे। कौओं का कांव-कांव किसी अतिथि के आगमन का सूचक था। कुरुंतोगाई के अनुसार कौआ एक शुभ अग्रदूत था और उसे चावल एवं घी खिलाया जाता था। मंदिरों में देवी-देवताओं की पूजा संगम कालीन सभ्यता का परिष्कृत पक्ष था। अनेक संगम ग्रंथों में शिव, मुरुगन, बलदेव, विष्णु, कामन और चन्द्रदेव के मंदिरों की चर्चा हुई है।

    मनिमेकलाई एक विशाल ईंट चक्रवाह कोट्टम का उल्लेख करता है। अनेक वृक्षों के नीचे देवताओं के चबूतरे बनाए जाते थे। पूजन-विधि में नृत्य, पुष्पार्पण, तंडुल आदि सम्मिलित थे। सिल्प्पादिकरम में देवताओं की प्रस्तर-प्रतिमाओं का उल्लेख है। यह ईसा पूर्व तीसरी सदी के लिंगम के रूप में टी. ए. गोपीनाथ राव द्वारा की गई पुरातात्तिवक खोज से भी प्रमाणित होता है। संगम युग के तमिल जन्म और मृत्यु के अवसरों पर आनुष्ठानिक अस्वच्छता में भी विश्वास करते थे।

    मृतकों को दफनाया अथवा जलाया जाता था अथवा खुले में गृद्धों या शृगालों के भोजन के लिए छोड़ दिया जाता था। मनिमेकलाई में शमशानों का उल्लेख हुआ है जहाँ अनेक प्रकार के भूत-प्रेत रहते थे।


    संगम साहित्य में वर्णित राज्य-व्यवस्था

    राज्य व्यवस्था

    संगम काव्य दक्षिण भारत में पहली बार राज्य प्रणाली के विकास की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं। ये रचनाएँ ऐतिहासिक विकास की ऐसी प्रक्रिया के संकेत देती हैं जिसमें हम कबीलों की संख्या में ह्रास तो पाते हैं, किन्तु राजा के साथ सुगठित इकाइयों के रूप में उनका अस्तित्व भी बना रहता है। राज्य एक संगठित राजनीतिक संरचना के रूप में तो गया था किन्तु यह अभी भी स्थिर नहीं था। यद्यपि प्रजातांत्रिक अवधारणा अभी सुदृढ़ नहीं हो पाई थी, परंतु प्रशासन राजतंत्रीय होते हुए भी प्रजातांत्रिक सिद्धांतों पर चलता था।

    राजत्व

    संगम काल के तीन राजवंशों में से 'चोल' सिंचित और उर्वर कावेरी घाटी पर शासन करते थे। उनकी राजधानी 'युरैयुर' में थी। 'पांडय' पशुचारी और तटवर्ती भागों पर शासन करते थे और उनकी राजधानी 'मदुरै' में थी। 'चेर' का आध्ािपत्य पश्चिम में पहाड़ी क्षेत्र में था उनकी राजधानी 'वंजि' (कुरुर) में थी। संगम कृतियाँ इतने राजाओं के नाम की चर्चा करता है कि उनका वंशक्रम और कालक्रम निर्धारित करना कठिन हो जाता है।

    फिर भी विद्वानों ने चोल राजाओं- उरुवाप्रेफर इलांजेत्चेन्नी, उसके पुत्र कारिकल और कारिकल के दो पुत्रों, नालन-किल्ली और नेदुं किल्ली की वंशावली की पुष्टि कर ली है। पांड्य राजवंश में मुथुकुदुमी पेरुवालुदी, अरयिपादाई कादंथ नेडुनजेलियन, वेर्रीवेर्चेलियन और तलयालंकानाथु चेरुवेनरा नेडुल जेलियन नामक राजाओं की पुष्टि हो गई है। इसी प्रकार चेर राजवंश के राजाओं में ईमायारारांबन नेडुमकेरालतन, चेरन सेंगुत्तुवन और मांतारम चेरल ईरुंपोराई की पुष्टि की जा चुकी है।

    संगम काल में शासन राजतंत्रात्मक था। राजा को वेंतन कहा जाता था। वह समाज और शासन दोनों का प्रधान होता था। समाज के प्रधान के रूप में वह इन्द्रोत्सव तथा नृत्य-समारोहों के उद्घाटन करता था। राज्याभिषेक के समय वह महत्त्वपूर्ण उपाध्ाियाँ ग्रहण करता था। उसे देवताओं के समकक्ष माना जाता था। प्राचीन तमिलवासी तीन वस्तुओं- मृदंग, राजदण्ड, और श्वेत छत्र को राजा के प्रधान चिह्न मानते थे। संगम साहित्य के अनुसार राजपद वंशानुगत रूप में पिता से पुत्र को प्राप्त होता था।

    राजा का दायित्व राज्य में राज्य में शांति और व्यवस्था बनाए रखने का था। वह प्रजा के कल्याण की देख-रेख करता था तथा उसकी भलाई के लिए कार्य करता था। राजा अपने राज्य का दौरा करता था एवं शासन के मामलों में मंत्रियों से परामर्श लेता था जिन्हें संगम साहित्य में 'सुर्रम' कहा गया है। सुर्रम का तात्पर्य ऐसे लोगों से है जो राजा को आवश्यकता पड़ने पर सलाह देने के लिए उसके निकट रहते थे।

    सामन्त

    संगम कालीन शासन व्यवस्था में राजा के अधीन दो प्रकार के 'सामंत' होते थे- (1.) वेलिर और (2.) अ-वेलिर। उनमें से कुछ सामंत साहित्य के महान संरक्षक सिद्ध हुए। इन सरदारों में कुछ प्रमुख थे- मोहुर का पालयन मारन (आधुनिक मदुरै के निकट), नानन वेनमान और विल्लवान कोथाई (दोनों प्रायद्वीप के पशिचमी तट के निकट), ओइमानाडु (आधुनिक दक्षिणी आकेटि) के नलिलया कोडन, टिथियन (तिन्ने वैल्ली क्षेत्र) तथा वेलिर सरदारों का समूह, जैसे- पारमबुनाद कापारी, पाल्नी क्षेत्र का वेलपेगन, पुडुकोटटाई क्षेत्र का वेलइव्वी, कोदुंबालुर के वेल आवी और ईरुक्कुवेल, तथा अन्य।

    उत्तर-संगम-काल में राजतंत्रीय सत्ता अधिक सुदृढ़ हो गई और परंपरागत सरदारों की स्थिति घटकर राजकीय अधिकारियों के समान हो गई। संगमोत्तर काल में इन सामंतों ने एवं राजकीय अधिकारियों ने अपनी स्थिति मजबूत कर ली और राजा कमजोर हो गया।

    शासन

    राजा की नीतियाँ को नियंत्रित करने के लिए विभिनन परिषदें बनी हुई थीं। सिलप्पादिकरम दो प्रकार की परिषदों की चर्चा करता है- (1.) पेरुंकुलु और (2.) एंपेरायम। पेरुंकुलुम पांच सदस्यों की मंत्रि-परिषद थी, जबकि एंपेरायम अथवा महासभा में 8 सदस्य होते थे। दोनों परिषदें प्रशासकीय निकाय थीं, यद्यपि उनका कार्य सामान्यतः परामर्शी स्वरूप का था तथापि राजा उनके परामर्श को अस्वीकार नहीं करता था। इन परिषदों का मुख्य कार्य न्यायिक था,।

    मदुरैक्कांजी के अनुसार इन संस्थाओं के प्रमुख को ऐंपेकुल कहते थे। प्राचीन राजा चाहे जितना प्रतापी रहे हों, शासन का स्वरूप 'स्वभावतः-सीमित' अथवा 'लोकप्रिय-राजतंत्र' का रहा है। उत्तर भारत की अपेक्षा दक्षिण भारत में यह व्यवस्था अधिक सुदृढ़ रही है। प्रत्येक स्थानीय इकाई, चाहे वह कितनी भी छोटी और किसी भी कोने में क्यों न स्थित हो, स्थानीय सभा द्वारा शासित होती थी। संगम साहित्य में अवाई और मरनाम नामक संस्थाओं के भी उल्लेख आए हैं। ऐसी सभाओं को आमतौर पर 'आरांकुरावैयम' कहा जाता है जो अपने सही निर्णाय के लिए विख्यात थीं। इन्हें हमारी आधुनिक पंचायत प्रणाली का पूर्वज कहा जा सकता है।

    प्रतिरक्षा

    बड़े राजा और सामंत विशाल एवं स्थायी सेनाएं रखते थे। दो राज्यों के बीच प्रायः युद्ध होते रहते थे। इनका उद्देश्य न केवल अपने राज्य की रक्षा करना एवं पड़ौसी राज्य के क्षेत्र पर अधिकार करके अपने क्षेत्राधिकार को बढ़ाना होता था अपितु पड़ोसी राज्यों की अत्याचार या कुशासन झेल रही जनता को त्राण दिलाने का भी होता था। कभी-कभी वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करने हेतु भी युद्ध होते थे।

    राज्य का प्रत्येक पुरुष स्वयं को युद्ध के लिए प्रशिक्षित करता था। राजाओं द्वारा संपोषित स्थायी सेना के अतिरिक्त पूरे राज्य में ऐसे प्रशिक्षित सैनिक होते थे जो आवश्यकता पड़ने पर वेतनभोगी सैनिक के रूप में राजा की सेना में सम्मिलित हो सकते थे। संगम साहित्य के अनुसार राजा के पास चतुरंगिणी सेना अर्थात् रथ सेना, गज सेना, अश्व सेना और पैदल सेना होती थी। चेर राजाओं के पास नौ-सेना भी थी जो सामुद्रकि पत्तन की रखवाली करती थी। दूसरे राजाओं के जहाज चेर राज्य की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकते थे। संगम ग्रंथों में युद्ध क्षेत्रों में सैनिक छावनी का भी उल्लेख मिलता है।

    राजा की छावनी भव्य होती थी और छावनी में भी वह अपने श्वेत छत्र के नीचे सोता था। राजा को हर समय उसके सैनिक घेरे रहते थे। राजा को घेर कर सोने वाले सैनिक बिना तलवार के होते थे। सामान्य सैनिकों की छावनियाँ अलग-बगल में ईख की पत्तियों से बनी होती थीं और उनके शिखर पर धान की पत्तियाँ लगाई जाती थीं जिनसे धान लटकता रहता था। सेनापतियों और ऊंची श्रेणी के पदाध्ािकारियों के साथ उनकी पत्नियाँ भी युद्ध-अभियान पर जाती थीं और वे उनके पतियों के लिए विशेष रूप से बनी छावनियों में ठहरती थीं।

    राजा सैनिकों और पदाधिकारियों की छावनियों में जाकर उनकी कुशल-क्षेम पूछता था। वह रात्रि के समय और यहाँ तक कि बरसात में भी ऐसा करता था। तमिल प्रजा में योद्धा के प्रति तथा युद्ध में वीरगति प्राप्त करने वाले सैनिक के प्रति भारी सम्मान का भाव था किन्तु पीठ पर लगे घाव के प्रति गहरे तिरस्कार का भाव होता था। जिस राजा या सेनापति की पीठ पर घाव लग जाता था, वह राजा या सेनापति उपवास करके प्राण छोड़ता था। जो योद्धा युद्ध में शहीद हो जाते थे उनकी याद में स्मारक खड़े किए जाते थे। राजकीय कारावासों में बंदियों को पीड़ा दी जाती थी।

    संगम शासन व्यवस्था अनेक मामलों में उत्तर-भारत के राजनीतिक विचारों और संस्थाओं से प्रभावित थी। संगम काल के अनेक राजा अपने कुल को शिव एवं विष्णु आदि देवताओं और प्राचीन ऋषियों से उत्पन्न मानते थे। अनेक राजाओं के पूर्वजों ने महाभारत के युद्ध में भाग लिया था। संगम युग के शासक कला, साहित्य एवं संस्कृति के रक्षक थे और विशाल यज्ञों का आयोजन किया करते थे।


    संगमकालीन साहित्य में वर्णित अर्थव्यवस्था

    कृषि

    संगम युग की जनता की समृद्धि भूमि की उर्वरता और व्यापार के विस्तार में निहित थी। मदुरैक्कांजी कृषि और व्यापार को आर्थिक विकास की मुख्य शक्ति मानता है। सिलप्पादिकरम भी प्रजा की सुख-समृद्धि को कृषि से जोड़ता है। कृषि राज्य के राजस्व का मुख्य स्रोत थी। प्रजा कृषि एवं पशुपालन में विशेष रुचि लेती थी। संगम काव्यों में प्रायः दूध और दूध के उत्पादों- दही, मक्खन, घी, छाछ आदि का उल्लेख हुआ है। संगम साहित्य की अनेक रचनाओं में पशुधन के महत्त्व का उल्लेख हुआ है।

    पड़ौसी राज्य प्रायः पशुधन लूटने के लिए आक्रमण कर दिया करते थे। राजा के प्रधान कर्त्तव्यों में अपने राज्य के पशुधन की रक्षा करना भी था। संगम काल में बड़ै पैमाने पर उपजाई जाने वाली फसलों में धान और ईख का प्रमुख स्थान था। अन्य फसलों में विभिन्न प्रकार के फल, चना, सेम, वलिल (शकरकंद), कटहल, आम, केला, नारियल, सुपारी, केसर, गोल-मिर्च, हल्दी, इत्यादि सम्मिलित थे। संगम युग के राजाओं ने कृषि के विकास के लिए अनेक उपाय किए।

    कारिकाल चोल ने सिंचाई के लिए तालाब खुदवाया। उसका कावेरी तटबंध कृषि के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ। तालाब से सिंचाई के कारण कृषि में लाभ की चर्चा अनेक कविताओं में मिलती है। मदुरैक्कांजी उन नदियों की चर्चा करता है जो पूर्वी-सागर की ओर के तालाबों को भर देती है।

    उद्योग

    संगम युग में विभिन्न प्रकार की उद्योग सम्बन्धी गतिविधियाँ बड़े स्तर पर होती थीं। काव्यों में अनेक प्रकार के कारीगरों- लौहकार, ताम्रकार, स्वर्णकार, कुंभकार, मूर्त्तिकार, चित्रकार और बुनकर आदि का उल्लेख हुआ है। मनिमेकलाई महाराष्ट्र से वास्तुकारों, मालवा से लौहकारों, ग्रीस और रोम से काष्ठकारों तथा मगध से जौहरियों के अपने तमिल प्रतिरूपों के साथ सहयोग की चर्चा करता है। व्यवसाय आमतौर पर आनुवंशिक था अर्थात पिता का काम ही पुत्र अपना लेता था।

    सिलप्पादिकरम के अनुसार अलग-अलग व्यवसाय के लोग अलग-अलग गलियों में रहते थे। इससे विभिन्न व्यापारों और उद्योगों में उन्नति तो हुई ही, साथ ही व्यवसाय से जुड़े लोगों ने भी अपने-अपने क्षेत्र में महारत हासिल की। इस युग में निर्माण-कला ने भी ऊँचाइयां प्राप्त कीं। सिलप्पादिकरम में ऐसी नौकाओं का उल्लेख हुआ है जिनके आग्रभाग अश्व, गज और सिंह की आकृति वाले थे। भूमध्यसागरीय जगत और अन्य दूर-देशों के साथ बढ़ते व्यापारिक सम्बन्ध तभी संभव हो सकते थे जब मजबूत और दूरस्थ यात्रा योग्य पोत बनाए गए हों।

    अन्य निर्माण कार्यों में पुल, नालियाँ, प्रकाशगृह, नगर परिघाएं इत्यादि सम्मिलित थे संगम युग में चित्रकला भी काफी लोक प्रिय थी। पारिपादाल 'मदुरा' (मदुरै) में चित्रांकनों के एक संग्रहालय की चर्चा करता है और सिलप्पादिकरम में चित्रों की बिक्री का उल्लेख हुआ है। घरों की दीवारें छतें, वस्त्र, पलंगपोश, पर्दे और नित्य उपयोग की जाने वाली अन्य चीज़ें भी चित्रांकित की जाती थीं। उस काल में तमिलों में बुनाई कला अत्यंत लोकप्रिय थी। संगम साहित्य में, बुने हुए पुष्प के 'अभिकल्प' की बार-बार चर्चा हुई है। कपास, रेशम, ऊन और चूहे के बाल से भी कपड़े बुने जाते थे।

    सूत को रंगने का भी रिवाज था। भारतीय रेशम अपनी बारीकी के कारण रोमन सौदागरों द्वारा भारी मांग में था। 'बुनाई' एक घरेलू उद्योग था जिसमें परिवार के सारे सदस्य, विशेषकर महिलाएँ भाग लेती थीं। चर्मकारों, कुंभकारों और अन्य कारीगरों ने भी औधोगिक विकास में योगदान किया। इस युग में ग्रीक मूर्ति-कला और अन्य विदेशी शिल्पों का भी दक्षिण भारत में प्रवेश हुआ। 'नेदुनालवादाई' और 'पादिरुप्पत्तु' आदि साहित्यिक कृतियाँ विदेशियों द्वारा बनाए गए सुंदर चिरागों, रोमन पात्रों और मद्य-चषकों का उल्लेख करती हैं। उस अवधि में अमरावती (आंध्र प्रदेश) और श्रीलंका की मूर्तिकलाओं में ग्रीक-रोमन प्रभाव देखे जा सकते हैं।

    व्यापार

    संगम युग में तमिल व्यापारियों के भूमध्यसागरीय देशों, ग्रीस, रोम, मिस्र, चीन, दक्षिण-पूर्वी एशिया और श्रीलंका के साथ व्यापारिक सम्बन्ध थे। सिलप्पादिकरम, मनिमेकलाई और पटिटनप्पालाई आदि साहित्यिक कृतियाँ ग्रीक और रोमन व्यापारियों के साथ सम्बन्धों की बार-बार चर्चा करती हैं। इस अवधि में भारत-रोम व्यापार अपने उत्कर्ष पर था। प्लिनी, टॉलेमी, स्ट्राबो और पेट्रोनियस आदि विदेशियों के पेरिप्लस आफ ऐरिथ्रिअन और अन्य वृत्तांत उस अवधि के अनेक पत्तनों और व्यापारिक सामग्रियों का उल्लेख करते हैं।

    अनेक स्थलों पर हुई पुरातात्त्विक खुदाइयों से भी तमिल व्यापारियों एवं अन्य देशों के बीच व्यापारिक सम्बन्धों की पुष्टि होती है। तमिलनाडु में अनेक स्थानों से उन देशों के सिक्के बड़ी संख्या में मिले हैं। संगम ग्रंथ मुसिरी, पुहार यकावेरी पट्टिनम और कोड़काई के पत्तनों की चर्चा करते हैं। ये पत्तन उस काल के तीन महान शासकों के हैं। इनके अतिरिक्त पेरिप्लस तोंडी, मुुसिरी और कोमारी (कन्याकुमारी), कोल्ची (कोड़की), पोडुके (अरिकामेडु) और सोपात्मा के पत्तनों का उल्लेख करता है।

    पेरिप्लस के अनुसार दक्षिण भारत में तीन प्रकार के जलयानों का उपयोग होता था- लघु तटीय जलयान, वृहद तटीय जलयान और समुद्र-यात्रीय जलयान। कोलांडिया नामक वृहद जलयानों की चर्चा मिलती है जो तमिलनाडु के समुद्रतट से चलकर गंगा नदी तक पहुंचते थे। रोम को निर्यात किए गए पण्यों से अच्छा लाभ होता था। बाघ, तेंदुए, बंदर और मोर आदि जीवित पशु-पक्षी रोम भेजे जाते थे। निर्यात के मुख्य पशु-उत्पादों में हाथीदाँत और मोती शामिल थे।

    वानस्पतिक उत्पादों में सुगंध्ाित पदार्थ और मसाले गोलकी, अदरख, इलायची, लौंग, काष्ठपफल, इत्यादि, नारियल केला, गुड़, सागौन, चंदन, आर्गरु उरैयार के नाम से ज्ञात विशेष प्रकार के सूती वस्त्र, इत्यादि मुख्य निर्यात-सामग्रियाँ थीं। हीरा, वैदूर्य, इस्पात, अल्पमूल्य रत्न, इत्यादि खनिज भी निर्यात किए जाते थे। रोम से आयात की जाने वाली वस्तुओं में सिक्के, मूंगा, मध, शीशा, टिन और जेवर शामिल थे। उस अवधि में दक्षिण भारत के अनेक स्थलों पर बनी मालाएँ दक्षिण-पूर्वी एशिया के अनेक स्थलों पर पाई गई हैं।

    इससे इन प्रदेशों के बीच समुद्रवर्ती सम्बन्धों की पुष्टि होती है। संगम काल में तमिल प्रदेश के अनेक शहरों में विदेशी व्यापारियों की बस्तियां थीं। तमिलों की समृद्धि में र्सिफ विदेशी-व्यापार का ही योगदान नहीं था अपितु विभिन्न नगरीय केंद्रों के जुड़ने से स्थानीय व्यापारिक नेटवर्क ने आंतरिक व्यापार को फूलने-फलने के पर्याप्त अवसर प्रदान किए। 'सिलप्पादिकरम' में पुहार के बाजार की गालियों का उल्लेख हुआ है। मदुराइकांजी पांडयों की राजधानी मदुराई के बाजार का उल्लेख करता है।

    तटीय पत्तनों और शहरों के अतिरिक्त तमिल प्रदेश के भीतरी इलाकों में भी नगर-केंद्रों का विकास हुआ। इनमें मदुरै, करुर, पेरुर, कोडुमानाल, उरैयुर, कांचीपुुरम, इत्यादि प्रसिद्ध हैं। एक और पूर्वीतट पर कोरकोई 'मोती' निकालने के लिए प्रसिद्ध था तो दूसरी ओर भीतरी इलाके में कोडुमानाल 'वैदूर्य' के लिए। दूर-दराज के गाँव भी व्यापारिक नेटवर्क से जुड़े थे। भीतरी प्रदेश के व्यापारिक परिवहन के लिए पशुओं द्वारा खींचे जाने वाले छकड़े प्रमुख साधन थे।

    व्यापार अधिकांशतः अदला-बदली के आधार पर चलता था। तमिल प्रदेश की भौगोलिक विविधता के कारण विभिन्न क्षेत्रों के बीच उत्पादों का विनिमय आवश्यक था। साथ ही मुद्रा का उपयोग भी होता था। व्यापार राजकीय राजस्व का महत्त्वपूर्ण स्रोत था। व्यापारियों से 'पारगमन-कर' लिया जाता था। युद्ध में लूटा गया माल भी राजकीय कोष में वृद्धि करता था किंतु कृषि से होने वाली आय ही युद्ध और राजनीतिक संगठन का मुख्य आधार थी। संगम साहित्य में किसानों से लिए जाने वाले करों की जानकारी नहीं मिलती।

    संगम साहित्य का महत्त्व

    संगम साहित्य प्राचीन तमिल समाज की सांस्कृतिक, साहित्यिक, धार्मिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक जानकारियों के लिए अत्यंत उपयोगी है। संगम साहित्य ने अपनी पश्चवर्ती साहित्यिक परम्पराओं को अत्यंत प्रभावित किया। दक्षिण भारत के प्राचीन इतिहास के लेखन के लिये संगम साहित्य की उपयोगिता अंदिग्ध है। इस साहित्य में उस समय के चोल, चेर और पाण्ड्य नामक तीन राजवंशों का उल्लेख हुआ है।

    संगम साहित्य ही एकमात्र ऐसा साहित्यिक स्रोत है जो सुदूर दक्षिण के जनजीवन पर सर्वप्रथम विस्तृत और स्पष्ट प्रकाश डालता है। संगम साहित्य से दक्षिण भारत के राजनीतिक इतिहास की तिथियां नहीं मिलतीं किंतु संगम साहित्य वहाँ के सामजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक जीवन के सम्बन्ध में प्रचुर सामग्री प्रस्तुत करता है। इसी साहित्य से पता चलता है कि दक्षिण के तीन प्रमुख राज्य- पांड्य, चोल और चेर परस्पर संघर्षरत रहे। संगम साहित्य से दक्षिण और उत्तर भारत की संस्कृतियों के सफल समन्वय का स्पष्ट चित्र प्राप्त होता है। यह साहित्य बताता है कि दक्षिण के तीनों राज्यों ने प्राकृतिक संसाधनों का लाभ उठाते हुए किस प्रकार विदेशी व्यापार का प्रसार किया।

    उनके व्यापारिक सम्बन्ध कैसे थे, इस बारे में भी हमें यथेष्ट जानकारी देता है। संगम कविताएँ तमिल भाषा की पहली सशक्त रचनाएँ मानी जाती हैं। इन कविताओं में संस्कृत भाषा के अनेक शब्दों के तमिल भाषा में आत्मसात करने के प्रमाण भी प्राप्त होते हैं। यह साहित्य इस बात का ज्वलंत प्रमाण देता है कि दक्षिण की द्रविड़ और उत्तर की आर्य संस्कृति ने परस्पर बहुत कुछ आदान-प्रदान किया और देश की एक समन्वित संस्कृति प्रदान की जिसे सामान्यतः हिन्दू संस्कृति भी कहा जाता है।

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  • अध्याय - 13 लोककला संग्रहालय उदयपुर

     02.06.2020
    अध्याय - 13 लोककला संग्रहालय उदयपुर

    अध्याय - 13 लोककला संग्रहालय, उदयपुर


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    उदयपुर में स्थित भारतीय लोककला मण्डल, लोकधर्मी प्रदर्शनकारी कलाओं के संवर्द्धन एवं प्रशिक्षण का विश्व-प्रसिद्ध संस्थान है। इसकी स्थापना 22 फरवरी 1942 को प्रख्यात लोककलाविद् पद्मश्री देवीलाल सामर ने की थी। इसका कलात्मक भवन चेतक सर्कल से पंचवटी जाने वाली मुख्य सड़क पर स्थित है। इस संस्थान में संग्रहालय के साथ-साथ खोज विभाग, प्रदर्शन विभाग तथा काष्ठकला प्रशिक्षण केन्द्र की स्थापना की गई है।

    संस्थान के खोज विभाग द्वारा लोककला विषयक पुस्तकों के प्रकाशन किए जाते हैं तथा प्रदर्शन विभाग द्वारा देश भर में लोकनृत्यों के प्रदर्शन करवाए जाते हैं। काष्ठकला प्रशिक्षण केन्द्र में कलाकारों को काष्ठकला का प्रशिक्षण दिया जाता है। ई.1965 में बुखारेस्ट में आयोजित अंतरराष्ट्रीय कठपुतली समारोह में संस्थान के दल ने कठपुतली प्रदर्शन करके विश्व भर में प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया। इससे राजस्थान की धागा-पुतली कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली।

    लोककला संग्रहालय, बड़ी इमारत में विस्तृत है। इसमें प्रदर्शनकारी लोककलाओं की विशिष्ट कलाकृतियों का संग्रह किया गया है। इसे प्रतिवर्ष एक लाख से अधिक देशी-विदेशी पर्यटक देखने आते हैं। जन-शिक्षण तथा कला-प्रशिक्षण की दृष्टि से यह संग्रहालय देश के महत्वपूर्ण संग्रहालयों में गिना जाता है। संस्थान में आने वाले पर्यटकों को कठपुतलियों का नृत्य दिखाया जाता है।

    संग्रहालय में एक दीवार पर पाबूजी की पड़ लगी हुई है। इसके सामने पड़ वाचक भोपा-भोपिन की, वाचन मुद्रा में मनुष्याकार आकृतियां बनी हुई हैं। इसके निकट गोलाई में राजस्थानी लोक रंगमंच की मुख्य विधाओं- तुर्रा कलंगी, गवरी, रामलीला, भवाई तथा रासलीला की झांकियां सजाई गई हैं। इन झांकियों में मंचसज्जा, कलाकारों की चेष्टाएं तथा लोकजीवन की सहभागिता देखते ही बनती है।

    इसी के निकटवर्ती कक्ष में काष्ठकला की ईसर-गणगौर, होली के खाण्डे, तोरण, नृतकियां, वाद्यवादक, ठाकुरजी की राम-रेबाड़ी, मुखौटे, मणकथंभ आदि से राजस्थान की लोकसंस्कृति का परिचय मिलता है। लम्बी गैलेरी से जुड़े एक अन्य कक्ष में मोलेला की मृण्मूर्तियों में ताखाजी, धर्मराज, गुनामेनू, अम्बा माता, हंसमाता, मुर्गामाता, मच्छी माता, साण्ड माता, रेबारी देव, पाबूजी आदि की टैराकोटा मूर्तियां प्रदर्शित की गई हैं।

    इनके ऊपर दीवार में रामलला तथा कृष्णलला की पड़ें, गले में धारण किए जाने वाले विविध लोक देवी-देवताओं के नावें, कावड़, भैंरूजी का देवरा, मामादेव का काष्ठ तोरण तथा ताखादेव की प्रस्तर प्रतिमा प्रदर्शित हैं। गवरी विसर्जन के समय मिट्टी के बने विशालाकाय हाथी पर देवी गौरज्या का जुलूस भी प्रदर्शित है।

    इसके निकटवर्ती कक्ष में ई.1960 तथा इससे पूर्व के मणिपुर, त्रिपुरा तथा मध्यप्रदेश की आदिमधर्मी जातियों के आकर्षक आयुध, पहनावे तथा दैनिक जीवन से सम्बन्धित आवश्यक वस्तुओं का संग्रह और चित्र प्रदर्शित किए गए हैं। बाहर गैलेरी में मेंहदी के विविध मांडणे, खिलौने, भूमि अलंकरण, दीवार पर बनने वाले आनुष्ठानिक थापे और सांझी कला के चित्र बने हैं।

    इसी गैलेरी से लगा लोकवाद्यों का कक्ष है जिसमें पारम्परिक लोकवाद्यों की प्रदर्शनी तथा वादक कलाकारों के चित्र दिखाए गए हैं। इसके आगे की गैलेरी में आदिवासी भीलों के गवरी के मुख्य पात्र रायबूड़िया, राई, खेतूड़ी, बणजारा तथा हठिया आदि की प्रस्तुतियां प्रदर्शित की गई हैं। आदिवासियों में प्रचलित मृतकों के प्रस्तरांकन चीरा, मातलोक तथा भील-गरासिया-बहरिया आदि आदिवासियों की चित्रमय झांकियां बनी हुई हैं।

    गैलेरी के आगे का कक्ष पुतली कक्ष है जिसमें भारत के विभिन्न प्रांतों- बंगाल, बिहार, उड़ीसा, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, गोवा आदि की विभिन्न शैली की पुतलियों के साथ-साथ विश्व के कई देशों यथा- जर्मनी, पौलेण्ड, इंग्लैण्ड, चेकोस्लोवाकिया, रूस, इण्डोनेशिया, हॉलैण्ड आदि की पुतलियां प्रदर्शित की गई हैं।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-50

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-50

    पर्यावरण को साधती हस्तकलाएं (3)


    ब्लू पॉटरी

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    महाराजा स्कूल ऑफ आर्ट्स, पिंकसिटी संस्थान तथा नाइटा आदि में ब्लू पॉटरी की कलाकृतियां बनायी जाती हैं। नीम का थाना, अजमेर तथा ब्यावर से प्राप्त क्वार्ट्ज पत्थर को पीसकर उसमें मुल्तानी मिट्टी, कथीरा, गोंद, जेलसरी कच्चा तथा कांच का पाऊडर मिलाकर लुगदी बनाते हैं। पानी का छींटा देकर लुगदी को रात भर रखा जाता है। इच्छित वस्तु के प्लास्टर के सांचे को अलग कर देते हैं। सूखने पर राख झाड़कर बर्तन की घिसाई कर ली जाती है। बर्तन का मुँह तथा पैंदा अलग से चाक पर बना कर जोड़ते हैं। पॉलिश के लिये पिसा हुआ कांच तथा क्वाटर्ज बारीक चलनी में छानकर मैदे की लेही में डालकर मथा जाता है और बर्तन पर उसका अस्तर डाल दिया जाता है। डिजाइन, पेंट तथा खत के लिये कोबाल्ट ऑक्साइड को पीस कर रंग बनाते हैं। कॉपर ऑक्साइड से जमीन तथा क्रोमियम से पत्तियां बनाते हैं। मैंगनीज ऑक्साइड से पत्तियों की शेडिंग करते हैं। इसके बाद कांच, सिंदूर तथा सुहागा मिलाकर भुस में गलाकर पानी की तरह पतला कर लिया जाता है और पानी में बुझा लिया जाता है। उसे पानी में से निकालकर सुखा लेते हैं तथा चक्की में पीसकर लेही में मिलाकर बर्तन पर अस्तर डाला जाता है। भट्टी में 800 डिग्री तापमान पर छः घण्टे तक पकाया जाता है। दो दिन बाद भट्टी के ठण्डा होने पर बर्तनों को बाहर निकाल लिया जाता है। चूड़ियों के रंगों के शेड अथवा कांच के रंग फिरोजा आदि में लगाये जाते हैं।

    लाख का काम

    लगभग पूरे राजस्थान में लाख का काम होता है। जयपुर में लाख की चूड़ियां बड़े पैमाने पर बनाई जाती हैं। सवाई माधोपुर, खेड़ला, लक्ष्मणगढ़, इंद्रगढ़ (कोटा), कसैली आदि में लकड़ी के खिलौने व अन्य वस्तुओं पर खराद से लाख का काम किया जाता है जो बहुत पक्का होता है। लाख के काम के पशु-पक्षी, पेंसिल, कलमदान, शृंगारदान व अन्य वस्तुएं भी बनायी जाती हैं जिन पर नगीनों की जड़ाई होती है। लाख की चपड़ी को गर्म करके तरल बनाते हैं तथा उसमें रंग मिलाकर कड़ाही में गर्म करके उसके बेलन तैयार कर लेते हैं। लकड़ी के टुकड़े में चूड़ी की आकृति का खांचा बना होता है जिसमें से बेलन की चपड़ी को भरा जाता है। लकड़ी के शंक्वाकार बेलन पर इस चूड़ी को निकाल लिया जाता है तथा गोल बनाया जाता है। नगीने लगाने के लिये नगीनों को आग पर गर्म किया जाता है तथा चिमटी की सहायता से चूड़ियों पर लगा दिया जाता है।

    चांदी का काम

    चांदी का काम भी पूरे राजस्थान में होता है। चांदी में चिताई, ढलाई तथा थलाई का काम किया जाता है। आभूषणों के अतिरिक्त हस्तावे, लोटे, गंगाजली, गिलास, चिरागदान, फूलदान, गमले, चुस्कियां, सुराहियां तथा विभिन्न पशु-पक्षी बनाये जाते हैं। चिनाई का काम डिजाइन बनाकर कलम से उकेरा जाता है। थलाई डप्पे में रखकर ठोक-ठोक कर उभारी जाती है। बुलंदी में उभरा हुआ काम होता है। महंगे होटलों में उपयोग के लिये तथा विदेशों में निर्यात के लिये कुर्सी, मेज, सोफे, किवाड़ जोड़ियां भी तैयार की जाती हैं। बीकानेर में चांदी के डिब्बे, डिब्बियां, अफीमदानी, सिगरेट केस, कटोरदान तथा किवाड़ जोड़ियां बहुत सुंदर बनायी जाती हैं। चांदी को लगभग एक हजार डिग्री संेटीग्रेड के ताप पर गलाकर उसका पतरा बनाया जाता है और इच्छित आकृति व आकार की वस्तुएं बनायी जाती हैं।

    धातु का काम

    राजस्थान में पीतल, तांबा, कांसा तथा लोहा आदि धातुओं के विभिन्न अस्त्र, शस्त्र, बर्तन तथा अन्य उपयोगी वस्तुएं बनाने का काम बड़े पैमाने पर होता है। लोहे का काम लुहारों द्वारा तथा अन्य धातुओं का काम कसेरों अथवा ठठेरों द्वारा किया जाता है। गाड़िया लुहार, चिमटे, खुरपे, दरांती आदि छोटी-छोटी चीजें बनाते हैं। अलवर तथा सिरोही में तलवारें बनाने का काम उत्कृष्ट कोटि का होता है। उदयपुर में भी तलवारें तथा ढालें बनाने का काम होता है। विभिन्न धातुओं में ढलाई, चिताई, कोफत तथा मीने का काम किया जाता है। पीतल के बर्तनों पर मुरादाबादी काम जयपुर में भी किया जाता है। डिजायन में चिनाई कर जमीन में काली लाख की भराई की जाती है। रेगमाल (सैण्डपेपर) से घिसाई करके फालतू लाख को हटाया जाता है।

    काली जमीन पर चमकता हुआ काम बाहर निकल आता है। दूसरी विधि में डिजाइन में रंग भरा जाता है और जमीन खाली छोड़ दी जाती है। लाख के रंगों के अतिरिक्त मीने के लिये मैंगनीज, कॉबाल्ट ऑक्साइड, कॉपर ऑक्साइड तथा आयरन ऑक्साइड पीले, नीले, हरे, लाल और कत्थई रंगों के लिये काम में लिये जाते हैं। देवी-देवताओं की मूर्तियां, झूले की जंजीरें, हाथी, घोड़े, मोर, डिब्बे, कटोरदान, पंखे, अफीमदानी, सुर्मेदानी, सरौते, पानदान, बंदूकों व तोपों की नाल, हुक्के, थाली आदि ताम्बा, पीतल तथा कांसा आदि धातुओं से बनाये जाते हैं। उदयपुर में व्हाइट मैटल के बड़े आकार के पशु-पक्षी, फर्नीचर आदि बड़े पैमाने पर बनते हैं। जोधपुर में जिंक तथा एल्यूमिनियम की देवी देवताओं की मूर्तियां, विभिन्न सजावटी वस्तुएं, पशु-पक्षी, विजयस्तंभ, फूलदान, तोप-तमंचे आदि बनाये जाते हैं जो भारत से बाहर के देशों में भी निर्यात होते हैं। कोफूतगिरि का काम फौलाद की बनी वस्तुओं पर सोने के पतले तारों की जड़ाई द्वारा होता है। वस्तु पर डिजायन बनाकर उसमें औजार से आड़ी एवं खड़ी रेखाओं में चिराई करते हैं। सोने के बारीक तार चिराई में फंसाकर छोटी हथौड़ी से ठोकते हैं और घूटी से जिलह दी जाती है। फौलाद के काले रंग पर सुनहरी काम बहुत सुंदर दिखता है। तहनिशा के काम में डिजाइन को गहरा किया जाता है और उस खुदाई में पतला तार भर दिया जाता है। यह काम कीमती और टिकाऊ होता है। उदयपुर और अलवर में तहनिशां का काम अधिक होता है।

    पत्थर का काम

    राजस्थान में कई रंग व किस्म का पत्थर मिलता है जिससे बड़े पैमाने पर कलाकृतियां बनती हैं। मकराना से संगमरमर, कोटा से स्लेटी, जालोर से ग्रेनाइट, डूंगरपुर से हरा-काला, तलवाड़ा, छिंछ आवलापुरा तथा धमोतर से कड़ा सफेद, धौलपुर से लाल, भरतपुर से गुलाबी, जोधपुर से बादामी तथा छीतर, राजनगर से छींट व धब्बेदार सफेद, भैंसलाना से काला संगमरमर, खाटू से पीला, निम्बी जोधा (नागौर जिला) से गुलाबी, जैसलमेर से पीला छींटदार (हाबूर) पत्थर बड़ी मात्रा में प्राप्त होता है जिनसे देवी-देवताओं की मूर्तियां, शिवलिंग, नंदी, पशु-पक्षी, जालियां, झरोखे, स्तंभ आदि विभिन्न सजावटी सामग्री यहाँ तक कि सोफे, कुर्सियां, पीढ़े आदि भी बनते हैं।

    मकराना एवं जयपुर में संगमरमर पर कार्विंग का का अच्छा कार्य किया जाता है। भारत भर की विशाल, प्रसिद्ध एवं प्राचीन इमारतें राजस्थान के विभिन्न स्थानों से प्राप्त विभिन्न प्रकार के पत्थरों से निर्मित की गयी हैं। भारत के राष्ट्रपति का निवास स्थल 'राष्ट्रपति भवन' धौलपुर के लाल पत्थर से, आगरा का ताजमहल, दयालबाग मंदिर तथा कलकत्ता का विक्टोरिया मेमोरियल मकराना के संगमरमर से, डीग के महल तथा भरतपुर का किला बांसी और पहाड़पुर के गुलाबी पत्थर से, झालरापाटन का सूर्य मंदिर, जोधपुर का उम्मेदभवन तथा मेहरानगढ़ दुर्ग जोधपुर के गुलाबी रंग के छीतर पत्थर से बने हैं। पत्थरों का काम करने वालों को सिलावट कहते हैं।

    कुट्टी का काम

    कुट्टी का काम जयपुर में अधिक होता है। कागज, चाक, मिट्टी, फेवीकोल तथा गोंद को गलाकर लुगदी बना लेते हैं जिसे सांचे अथवा डाई में दबाकर जमा दिया जाता है। सूखने पर हाथ-पांव, कान, सींग आदि जोड़े जाते हैं। हाथ से फिनिशिंग देते हुए खड़िया या चाइना क्ले का अस्तर किया जाता है। अंत में उसे विभिन्न रंगों से रंगा जाता है। अब से कुछ दशक पूर्व तक कुट्टी का काम गाँव-गाँव में होता था जहाँ औरतें कागज तथा भूसे को गलाकर विभिन्न प्रकार के ठाठिये बनाती थीं। बादला उद्योग जोधपुर में लगभग दो सौ साल से जस्ते के बादले बनाये जाते हैं। जस्ते की चद्दर को काटकर उसे लकड़ी के हथौड़े से पीट-पीटकर बादले का आकार दिया जाता है। जस्ते की चद्दर को इच्छानुसार आकृति में बदलकर उसकी झलाई होती है जिसमें नक्काशी किये हुए एल्यूमिनियम, पीतल आदि के सुंदर टुकड़ों में जोड़ा जाता है। इसके बाद इनकी टेस्टिंग की जाती है। तैयार बादले पर लाल, हरे, नीले, गुलाबी आदि रंगों के सूती व ऊनी नमदे लगाये जाते हैं। किसी समय जोधपुर में 64 प्रकार की डिजाइनों के बादले बनाये जाते थे जिनमें सुराही, केतली, नालदार, मोरदार तथा अण्डाकार आकृतियां प्रमुख थे। पुराने जमाने में धनी लोग चांदी के बादले भी बनवाते थे। अब बादला उद्योग पूरी तरह समाप्त हो गया है।

    थेवा कला

    इस कला का आष्किार आज से लगभग 500 वर्ष पूर्व प्रतागढ़ रियासत के राजा सावंतसिंह के समय में हुआ। प्रतापगढ़ के तत्कालीन राज सोनी ने इस कला के प्रयोग से बनी अपनी पहली कलाकृति राजा सावंतसिंह को भेंट की। राजा ने प्रसन्न होकर उसे जागीर प्रदान की। इस कला के लिये यह परिवार आठ बार राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत हो चुका है। इस कला में कांच पर स्वर्ण का अति सूक्ष्म कार्य किया जाता है। यह कांच साधारण न होकर लाल, नीला अथवा हरे रंग का होता है। इसका कलाकार चित्रकला में पारंगत होता है। सतत साधना के बिना इस कला को नहीं सीखा जा सकता। प्रतापगढ़ के राज सोनी इस कला को अत्यंत गुप्त रखते हैं। यहाँ तक कि बहन बेटी को भी इसका ज्ञान नहीं देते। यही कारण है कि प्रारंभ से लेकर आज तक यह कला एक ही परविार के पास रही है।

    कठपुतली कला

    कोटा शहर में दास्ताना कठपुतली बनाने वाले कलाकार रहते हैं जो 265 तरह की कठपुतलियां बनाते हैं। कठपुतली बनाने के लिये मुलतानी मिट्टी को 24 घण्टे पानी में भिगोकर गलाते हैं। कागज भी अलग से पानी में गलाते हैं। दोनों को अलग-अलग कूटकर लुगदी बनाजी जाती है। मेथी दाने को बारीक मैदे के समान कूटकर इसे कागज एवं मुल्तानी मिट्टी के साथ गंूथ लिया जाता है। लकड़ी के एक चौकोर फ्रेम में गोल छेद करके उसमें 14 इंच का गोल डण्डा लगाया जाता है। डण्डे के ऊपर कठपुतली के मुंह के बराबर कागज की गोल गेंद बनाकर लगाई जाती है। इसके ऊपर तैयार लुगदी चारों ओर चढ़ा दी जाती है। उसमें नाक, कान, मुंह तथा बाल आदि उकेर देते हैं। दो दिन सूखने के बाद सांचे से निकालकर सफेद रंग चढ़ाया जाता है। इसके सूखने पर अन्य रंग लगाय जाते हैं। आकृति के अनुसार कपड़े के हाथ एवं गर्दन से लटकाकर वस्त्र बनाये जाते हैं। एक कठपुतली बनाने में लगभग 10 दिन लगते हैं।

    कावड़ कला

    कावड़ एक चित्रकथा होती है जो लकड़ी के आठ-दस पाटों पर चित्रित की जाती है। लकड़ी के पाटों पर विशिष्ट क्रम में लगभग 300 चित्र बनाये जाते हैं। देहात में रामकथा और कृष्ण कथा को जीवित रखने का श्रेय कावड़ कला को ही जाता है। भाट लोग परम्परागत रूप से पाटों पर चित्रित कथा सुनाते हैं। आज कावड़ बनाने की कला केवल उदयपुर जिले के बस्सी में सीमित होकर रह गई है। एक परिवार के छः-सात घर इस काम को करते हैं। कावड़ बनाने के लिये लकड़ी का काम करने वाले सुथार लकड़ी से डिजाइन तैयार करके गढ़ते हैं। बाद में रंग भरा जाता है।

    पहले पत्थर के रंग काम में आते थे। फिर कथीर का मीना उपयोग में लिया जाने लगा। इसमें कथीर को घोटकर स्प्रिट के साथ मीना तैयार करके बाद में ओपणी से रगड़कर पॉलिश की जाती है। ओपणी से रगड़ने पर मीना चांदी की तरह चमकने लगता है। इस पर चपड़ी, स्प्रिट और रंग मिलाकर रंग भरे जाते हैं। रंग भरने के लिये पहले पाटिये को कच्चा लाल कर देते हैं। फिर पले रंग से टीपाण आकृति माण्डते हैं। गोरे रंग के लिये गुलाबी रंग भरते हैं। आसमानी रंग वस्त्रों और मूर्तियों के चेहरों पर भरा जाता है। रंग भरने से पहले लकड़ी के बूटे की पेंटिंग करते हैं। खुले के इंटालों की खोर लगाते हैं। फिर खड़ी की सफेद पुताई करके सुखा देते हैं। उसके बाद रंग पोतते हैं। रंगों के सूख जाने पर उनपर वार्निश लगाते हैं।

    पातरे तिरपणी

    श्वेताम्बर जैन साधुओं द्वारा काम में लाये जाने वाले लकड़ी के पात्र अर्थात् पातरे और तिरपणी राजस्थान के पीपाड़, जैतारण तथा बगड़ कस्बों में बनते हैं। वैष्णव संतों के काम में आने वाले कमण्डल, कठारी और प्लेटें भी यहीं बनती हैं। इनके निर्माण में रोहिड़े की लकड़ी का प्रयोग होता है। उदयपुर में खिरणी की लकड़ी भी काम में ली जाती है। राजस्थान के शिल्पियांे द्वारा कच्चा माल काम में लिया जा रहा है जो कि स्थानीय संसाधनों से सहज रूप में उपलब्ध है। इस प्रवृत्ति से पर्यावरण को कम क्षति पहुंचती है। यदि कच्चा माल बाहर से मंगवाया जाये तो उसके परिवहन में व्यय होने वाली ऊर्जा पर्यावरण को हानि पहुंचाती है।


    शिल्प एवं माटी कला बोर्ड

    राज्य में परम्परागत विधि से टेराकोटा, ब्ल्यू पॉटरी, मिट्टी के बर्तन, मूर्तियां, आकृतियां एवं अन्य सामग्री बनाने वाले शिल्पकारों के उत्थान एवं सुदृढ़ीकरण के लिये 16 नवम्बर 2009 को शिल्प एवं माटी कला बोर्ड का गठन किया गया है।

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  • अध्याय - 20 इस्लाम का जन्म एवं प्रसार

     02.06.2020
    अध्याय - 20 इस्लाम का जन्म एवं प्रसार

    इस्लाम का जन्म एवं प्रसार


    जब कयामत आएगी, चांद में रोशनी नहीं रहेगी, सूरज और चांद सटकर एक हो जाएंगे और मनुष्य यह नहीं समझ सकेगा कि वह किधर जाए और अल्लाह को छोड़़कर अन्यत्र उसकी कोई भी शरण नहीं होगी ....... । - कुरान में कयामत के वर्णन का अंश।


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    जिस समय भारत भूमि पर वैष्णव धर्म के भीतर विभिन्न दार्शनिक विचारों का विकास नवीन उत्कर्ष को प्राप्त कर रहा था, भारत भूमि से दूर अरब की भूमि पर एक नवीन वैचारिक आंदोलन जन्म ले रहा था जिसे इस्लाम के नाम से जाना जाता है। पश्चिम एशिया में स्थित अरब प्रायद्वीप को भूमध्यसागर, लालसागर, अरबसागर और फारस की खाड़ी तीन ओर से घेरे हुए है। कुछ तटवर्ती क्षेत्रों को छोड़़कर यह सम्पूर्ण प्रायद्वीप रेगिस्तान है।

    इस्लाम का अर्थ

    इस्लाम अरबी भाषा के 'सलम' शब्द से निकला है जिसका अर्थ होता है आज्ञा का पालन करना। 'इस्लाम' का अर्थ है 'आज्ञा का पालन करने वाला।' इस्लाम का वास्तविक अर्थ है 'खुदा के हुक्म पर गर्दन रखने वाला।' व्यापक अर्थ में इस्लाम एक धार्मिक मत का नाम है, जिसका उदय सातवीं शताब्दी में अरब में हुआ था। इस मत के मानने वाले 'मुसलमान' कहलाते हैं। मुसलमान शब्द 'मुसल्लम-ईमान' का बिगड़ा हुआ स्वरूप है।

    'मुसल्लम' का अर्थ है 'पूरा' और 'ईमान' का अर्थ है 'दीन या धर्म।' इसलिए मुसलमान उन लोगों को कहते हैं जिनका दीन इस्लाम में पूरा विश्वास है। वे जो भी कार्य करते हैं, अल्लाह के नाम पर करते हैं और कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व कहते हैं- 'परम करुणामय एवं दयालु अल्लाह के नाम (बिस्मिल्ला-हिर्रहमा-निर्रहीम) पर यह काम करता हूँ।'

    अरब का प्राचीन धर्म

    इस्लाम का उदय होने से पहले, अरब वालों के धार्मिक विचार प्राचीन काल के हिन्दुओं के समान थे। वे भी हिन्दुओं की भाँति मूर्ति-पूजक थे और उनका अनेक देवी-देवताओं में विश्वास था। जिस प्रकार हिन्दू लोग कुल-देवता, ग्राम-देवता आदि में विश्वास करते थे उसी प्रकार इन लोगों के भी प्रत्येक कबीले का एक देवता होता था, जो उनकी रक्षा करता था। अरब वालों में अन्धविश्वास भी कूट-कूट कर भरा था। उनकी धारणा थी कि भूत-प्रेत वृक्षों तथा पत्थरों में निवास करते हैं और मनुष्य को विभिन्न प्रकार के कष्ट देने की शक्ति रखते हैं। मक्का में काबा नामक प्रसिद्ध स्थान है जहाँ किसी समय 360 मूर्तियों की पूजा होती थी।

    यहाँ अत्यंत प्राचीन काल से एक काला पत्थर मौजूद है। अरब वालों का विश्वास था कि इस पत्थर को ईश्वर ने आसमान से गिरा दिया था। इसलिए वे इसे बड़ा पवित्र मानते थे और इसके दर्शन तथा पूजन के लिए काबा जाया करते थे। यह पत्थर आज भी इस्लाम के अनुयाइयों में आदर की दृष्टि से देखा जाता है। काबा की रक्षा का भार कुरेश नामक कबीले के ऊपर था, कुरेश कबीले में मुहम्मद नामक बालक का जन्म हुआ जिसने आगे चलकर अरब की प्राचीन धार्मिक व्यवस्था के विरुद्ध बहुत बड़ी क्रान्ति की और एक नए मत को जन्म दिया, जो इस्लाम के नाम से जाना गया।

    इस्लाम के उदय से पहले, अरब में विदेशी यहूदियों और इसाइयों की बस्तियां भी थीं। विभिन्न भाषाओं और धर्मों के लोग एक दूसरे के सम्पर्क में आते थे और उनके विश्वास एक दूसरे को प्रभावित करते थे।

    हजरत मुहम्मद का परिचय

    हजरत मुहम्मद का जन्म ई.570 में मक्का के एक साधारण परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम अब्दुल्ला तथा माता का नाम अमीना था। मुहम्मद के जन्म से पहले ही उनके पिता की मृत्यु हो गई थी। जब वे छः साल के हुए तो उनकी माता की, तथा आठ साल के हुए तो उनके दादा की भी मृत्यु हो गई। वे भेड़ें चराने लगे इस कारण उनकी शिक्षा का समुचित प्रबंध नहीं हुआ। फिर भी वे चिंतनशील बालक थे। इतिहासकार नैथेनियन प्लैट ने लिखा है- 'अरब के तारों भरे आकाश के तले एक अनाथ गडरिया बालक अपना एकान्त समय ईश्वर के बारे में चिन्तन करता हुआ बिताया करता था।'

    वयस्क होने पर मुहम्मद अपने चाचा के साथ ऊँटों के काफिले लेकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने लगे। इन यात्राओं से उनको मक्का की भौगोलिक, राजनीतिक एवं सामाजिक स्थितियों का ज्ञान हो गया तथा साथ ही उन्हें व्यापार का भी व्यावहारिक ज्ञान हो गया। यात्राओं और व्यापार के कारण मोहम्मद का सम्पर्क एक धनी विधवा 'बीबी खदीजा' से हुआ। बीबी खदीजा ने उनकी ईमानदारी एवं गुणों से प्रभावित होकर उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। उस समय मुहम्मद की आयु लगभग 25 वर्ष और बीबी खदीजा की आयु लगभग 40 वर्ष थी।

    हजरत मुहम्मद सरल जीवन व्यतीत करते थे। चालीस वर्ष की अवस्था तक उनके जीवन में कोई विशेष घटना नहीं घटी। एक दिन उन्हें फरिश्ता जिबराइल के दर्शन हुए जो उनके पास अल्लाह का पैगाम अर्थात् संदेश लेकर आया। यह संदेश इस प्रकार से था- 'अल्लाह का नाम लो, जिसने सब वस्तुओं की रचना की है।' इसके बाद मुहम्मद को प्रत्यक्ष रूप में अल्लाह के दर्शन हुए और यह संदेश मिला- 'अल्लाह के अतिरिक्त कोई दूसरा ईश्वर नहीं है और मुहम्मद उसका पैगम्बर है।' अब मुहम्मद ने अपने मत का प्रचार करना आरम्भ किया। उन्हांेने अपने ज्ञान का पहला उपदेश अपनी पत्नी खदीजा को दिया।

    उन्होंने मूर्ति-पूजा तथा बाह्याडम्बरों का विरोध किया। उनकी शिक्षा में यहूदी, ईसाई और हनीफी शिक्षाओं से भिन्न अथवा नया कुछ भी नहीं था किंतु हजरत मुहम्मद का कहना था कि केवल अल्लाह में आस्था रखो। उसकी इच्छा को चुपचाप शिरोधार्य कर लेना चाहिए। कुरान की सूरत तीन में कहा गया है- 'अल्लाह इस बात की गवाही देता है कि उस (एक अल्लाह) के सिवाय कोई भी पूज्य नहीं और फरिश्ते तथा इल्म वाले भी गवाही देते हैं कि वही इन्साफ के साथ सब कुछ सम्भालने वाला है। उसके सिवाय और कोई इलाह (पूज्य) नहीं, वह सर्वशक्तिमान और ज्ञानमय है। बेशक दीन तो अल्लाह के नजदीक यही इस्लाम (आत्म समर्पण) है।'

    अरबवासियों ने मुहम्मद के विचारों का स्वागत नहीं किया। उनके अपने कुरैशी कबीले के लोगों ने हजरत मुहम्मद का जबर्दस्त विरोध किया। कुछ लोगों ने हजरत मोहम्मद की हत्या करने का षड्यन्त्र रचा जिससे विवश होकर 28 जून 622 को हजरत मुहम्मद को अपनी जन्मभूमि मक्का को छोड़ कर मदीना चले गए। यहीं से मुसलमानों का 'हिजरी संवत्' आरम्भ होता है। हिजरी अरबी के 'हज्र' शब्द से निकला है, जिसका अर्थ है- 'जुदा या अलग हो जाना।' चूंकि हजरत मुहम्मद मक्का से अलग होकर मदीना चले गए इसलिए इस घटना को 'हिजरत' कहते है।

    मदीना (यस्रिब) के खेतिहर नखलिस्तान में हजरत मुहम्मद को अपने विचारों के प्रचार के लिए अनुकूल वातावरण मिला। मदीना वालों की, मक्का के अभिजात्य लोगों से शत्रुता थी, अतः उन्होंने हजरत मुहम्मद को सहर्ष समर्थन दिया और बहुत से लोग उनके अनुयाई बन गए जो 'अन्सार' कहलाए। मुहम्मद मदीना में नौ वर्ष तक रहे। हजरत मुहम्मद ने अपने अनुयाइयों के साथ ई.630 में मक्का पर आक्रमण कर उसे जीत लिया। पराजित मक्कावासियों ने आत्समर्पण कर मुहम्मद के धार्मिक विश्वासों को स्वीकार कर लिया। इससे कुरैशी व्यापारियों तथा सरदारों को नुकसान नहीं हुआ अपितु फायदा हुआ।

    मक्का का एक जातीय व धार्मिक केन्द्र के रूप में महत्त्व पहले से भी अधिक बढ़ गया। जो कुरैशी पहले हजरत मुहम्मद के इस्लाम के आन्दोलन को शत्रुतापूर्ण दृष्टि से देखते थे, वे ही अब इस आन्दोलन से जुड़ने लगे और अग्रणी भमिका भी निभाने लगे। फलस्वरूप, थोड़े ही समय में सम्पूर्ण अरब के लोग इस्लाम को मानने लगे। मक्का इस्लाम का तीर्थ स्थान एवं प्रमुख धार्मिक केन्द्र बन गया। ई.632 में मुहम्मद का निधन हो गया। उनके उत्तराधिकारी खलीफा कहलाए।

    हजरत मुहम्मद के उपदेश

    हजरत मुहम्मद का एक अल्लाह में विश्वास था, जिसका न आदि है न अन्त, अर्थात् न वह जन्म लेता है और न मरता है। वह सर्वशक्तिमान्, सर्वदृष्टा तथा अत्यन्त दयावान है। मुहम्मद का कहना था कि चूंकि समस्त इंसानों को अल्लाह ने बनाया है इसलिए समस्त इंसान एक समान हैं। मुहम्मद ने अपने अनुयाइयों से कहा- 'सच्चे धर्म का यह तात्पर्य है कि तुम अल्लाह, कयामत, फरिश्तों, कुरान तथा पैगम्बर में विश्वास करते रहो और अपनी सम्पत्ति को दीन-दुखियों को खैरात में देते रहो।'

    हजरत मुहम्मद के सम्बन्ध में मुसलमानों की मान्यता

    मुसलमानों में 'ला इलाह इल्लिलाह मुहम्मदुर्रसूलिल्लाह' के सिद्धांत में अटल विश्वास है अर्थात् 'अल्लाह के सिवाय कोई पूजनीय नहीं है तथा मुहम्मद उसके रसूल हैं।' अल्लाह में विश्वास रखने के साथ-साथ यह मानना भी जरूरी है कि मुहम्मद अल्लाह के नबी, रसूल और पैगम्बर हैं। पैगाम ले जाने वाले को 'पैगम्बर' कहते हैं। हजरत मुहम्मद, अल्लाह का संदेश पृथ्वी पर लाए, इसलिए वे पैगम्बर कहलाए।

    'नबी' कहते हैं किसी उपयोगी परम ज्ञान की घोषणा को। हजरत मुहम्मद ने चूँकि ऐसी घोषणा की, इसलिए वे नबी हुए। 'रसूल' का अर्थ दूत होता है। हजरत मुहम्मद रसूल हैं, क्योंकि उन्होंने अल्लाह और इंसान के बीच दूत का काम किया।

    कुरान

    पैगम्बर मुहम्मद को अल्लाह की ओर से बहुत से 'इल्हाम' (दिव्य ज्ञान) हुए थे। मुहम्मद ने जनसामान्य को इस ज्ञान का उपदेश दिया जो 'कुरान' में संकलित है। कुरान को 'कलामे-पाक' भी कहा जाता है। यह स्वयं 'अल्लाह ताला' का कलाम है। यह आसमान से हजरत मुहम्मद पर 'नाजिल' किया गया (उतारा गया) है। मान्यता है कि हजरत मुहम्मद द्वारा 'इल्हाम' के सम्बन्ध में कही गई बातों से उनके अनुयाई टीपें तैयार कर लेते थे।

    हजरत मुहम्मद की मृत्यु के बाद इन टीपों को ई.650 में खलीफा उस्मान के काल में संकलित कर लिया गया और यह संकलन ही कुरान के नाम से जाना गया। इसे पैगम्बरों के पास ईश्वरीय आदेश पहुँचाने वाले फरिश्ते जिब्राइल द्वारा कुरान अरबी भाषा केे 'किरन' शब्द से निकला है, जिसका अर्थ है- 'निकट या समीप।' इस प्रकार कुरान वह ग्रन्थ है, जो लोगों को अल्लाह के निकट ले जाता है।

    सुन्ना

    मुसलमानों के धार्मिक साहित्य का दूसरा भाग सुन्ना कहलाता है। उसमें हजरत मुहम्मद के जीवन, चमत्कारों और उपदेशों से सम्बन्धित हदीसें अर्थात् अनुश्रुतियां शामिल हैं। हदीसों का संकलन नौंवी शताब्दी में बुखारी, मुस्लिम इब्न अल इज्जाज आदि उलेमाओं ने किया था। कई उलेमाओं ने कुरान और हदीस के आधार पर हजरत मुहम्मद का जीवन चरित्र लिखा। हजरत मुहम्मद के उपलब्ध जीवन चरित्रों में से सबसे प्राचीन मदीना के निवासी इब्न इसहाक द्वारा आठवीं शताब्दी ईस्वी में लिखा गया। शिया मतावलम्बी 'सुन्ना' को नहीं मानते जिसकी रचना पहले तीन खलीफाओं के शासनकाल में पैगम्बर विषयक अनुश्रुतियों से हुई थी।

    इस्लाम के सिद्धांत

    कुरान के अनुसार प्रत्येक मुसलमान के पांच कर्त्तव्य हैं- कलमा, नमाज, जकात, रमजान तथा हज।

    (1.) कलमा: कलमा अरबी भाषा के 'कलम' शब्द से बना है, जिसका अर्थ है- शब्द। कलमा का अर्थ होता है- 'अल्लाह का वाक्य' अर्थात् जो कुछ अल्लाह की ओर से लिखकर आया है, कलमा है- 'ला इलाह इल्लिलाह मुहम्मदुर्रसूलिल्लाह।'

    (2.) नमाज: नमाज का अर्थ खिदमत या बंदगी करना है। यह दो शब्दों से मिलकर बना है- नम तथा आज। 'नम' का अर्थ होता है ठण्डा करने वाली या मिटाने वाली और 'आज' का अर्थ होता है वासनाएँ अथवा बुरी इच्छाएँ। इस प्रकार नमाज उस प्रार्थना को कहते हैं जिससे मनुष्य की बुरी इच्छाएँ नष्ट हो जाती हैं। नमाज दिन में पाँच बार पढ़ी जाती है- प्रातःकाल, दोपहर, तीसरे पहर, संध्या समय तथा रात्रि में। शादी, गमी, यात्रा, लड़ाई, बेकारी आदि समस्त परिस्थितियों में नमाज पढ़ी जा सकती है। नमाज किसी भी परिस्थिति में मुआफ नहीं हो सकती किंतु नाबालिक बच्चों और पागलों पर नमाज फर्ज नहीं है। शुक्रवार को समस्त मुसलमान मस्जिद में इकट्ठे होकर नमाज पढ़ते हैं। नमाज से पहले 'वुजू' करना (हाथ, पांव, मुंह आदि धोना) अनिवार्य है।

    (3.) जकात: जकात का शाब्दिक अर्थ होता है- ज्यादा होना या बढ़ना परन्तु इसका व्यावहारिक अर्थ होता है भीख या दान देना। चूंकि भीख या दान देने से धन बढ़ता है इसलिए जो धन दान दिया जाता है उसे जकात कहते हैं। प्रत्येक मुसलमान को अपनी आय का चालीसवाँ हिस्सा खुदा की राह में, अर्थात् दान में दे देना चाहिए।

    (4.) रोजा: चाँद का नौवाँ महीना 'रमजान' होता है जो अरबी भाषा के रमज शब्द से बना है। इसका अर्थ है शरीर के किसी अंग को जलाना। चूंकि इस महीने में रोजा या व्रत रखकर शरीर को जलाया जाता है इसलिए इसका नाम रमजान रखा गया है। रोजा में सूर्य निकलने के बाद और सूर्यास्त के पहले खाया-पिया नहीं जाता। रोजा रखने से बरकत (वृद्धि) होती है और कमाई बढ़ती है। रोजा के लिए रमजान का महीना इसलिए चुना गया क्योंकि इसी महीने में कुरान उतरा था। रोगी एवं यात्री के लिए रमजान के महीने में रोजा रखना अनिवार्य नहीं है। वे बाद में उतने ही दिन रोजा रख सकते हैं।

    (5.) हज: हज का शाब्दिक अर्थ है इरादा परन्तु इसका व्यावहारिक अर्थ है- मक्का में जाकर बन्दगी करना। प्रत्येक मुसलमान का यह धार्मिक कर्त्तव्य है कि वह अपने जीवन में कम से कम एक बार मक्का जाकर बन्दगी करे। जिल्हज (बकरीद माह) की नौवीं तारीख को 'अरफात' (एक स्थान का नाम) के मैदान में उपस्थित होना भी अनिवार्य है।

    अल्लाह

    अल्लाह शब्द अरबी के 'अलह' शब्द से बना है, जिसका अर्थ है- पाक या पवित्र, जिसकी पूजा करनी चाहिए। अल्लाह के सिवाय किसी और की पूजा नहीं की जानी चाहिए। इस्लाम बहुदेववाद के साथ-साथ मूर्ति-पूजा और प्रकृति पूजा का भी विरोध है। वह ईसाइयों द्वारा प्रतिपादित ईश्वर-त्रय (पिता, पुत्र एवं पवित्र आत्मा) के सिद्धांत का भी विरोधी है। वह ईसा को पैगम्बर तो मानता है किंतु ईश्वर का पुत्र नहीं, क्योंकि ईश्वर में पुत्र उत्पन्न करने वाले गुणों को जोड़ना उसे मनुष्य की श्रेणी में ले जाना है।

    कुरान में बार-बार कहा गया है- 'यदि ईश्वर को सन्तानोत्पादक कहोगे तो आकाश फट जाएगा और धरती उलट जाएगी।' कुरान की मान्यता है कि अल्लाह अर्श (आकाश) पर रहता है और वहाँ उसका सिंहासन भी है। वह निराकार, असीम शक्ति का स्वामी तथा प्रेम और दया का सागर है। वह लोगों को क्षमा करता है।

    फरिश्ता

    इस्लाम में देवों को 'मलक' तथा देवदूतों को 'फरिश्ता' कहते हैं। फरिश्ते वे पवित्र आत्माएँ हैं, जो अल्लाह तथा मनुष्य में सामीप्य स्थापित करती हैं। अल्लाह के पास से पैगाम लेकर जो फरिश्ता हजरत मुहम्मद के पास उतरा था, उसका नाम जिबराइल था। हजरत मुहम्मद जिबराइल को चर्म-चक्षु से नहीं, अपनी आध्यात्मिक दृष्टि से देखते थे।

    शैतान एवं जिन्न

    शैतान भी देवताओं की तरह मलक-योनी का है किन्तु कुरान शैतान में विश्वास रखने की मनाही करता है। कुरान के अनुसार नीच वासनाएं मनुष्य के पतन का मार्ग प्रशस्त करती हैं। 'जिन्न' नीच वासनाओं को उभारने का काम करते हैं। कुरान में 'इबलीस' नामक जिन्न का उल्लेख है जो मनुष्यों को गुमराह करने की कोशिश करता है। अतः उससे बचना चाहिए।

    कमायत

    अरबी के कयम शब्द से 'कयामत' बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है- खड़ा होना तथा व्यावहारिक अर्थ है- दुनिया का मिट जाना। कुरान के अनुसार पृथ्वी पर मनुष्य का जन्म पहला और आखिरी जन्म है। इस जीवन के समाप्त हो जाने पर, मनुष्य की देह कब्र में दफनाई जाती है। तब भी उसकी आत्मा एक भिन्न प्रकार के कब्र में जीवित पड़ी रहती है और इसी आत्मा को कयामत के दिन उठकर अल्लाह के समक्ष जाना पड़ता है।

    कुरान में कयामत का वर्णन इस प्रकार से किया गया है- 'जब कयामत आएगी, चांद में रोशनी नहीं रहेगी, सूरज और चांद सटकर एक हो जाएंगे और मनुष्य यह नहीं समझ सकेगा कि वह किधर जाए और ईश्वर को छोड़़कर अन्यत्र उसकी कोई भी शरण नहीं होगी ....... जब तारे गुम हो जाएंगे, आकाश टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा, पहाड़ों की धूल उड़ जाएगी और नबी अपने निर्धारित क्षण पर पहुँचेंगे ....... न्याय का दिन जरूर आएगा, जब सुर (तुरही) की आवाज उठेगी, जब तुम सब उठकर झुण्ड के झुण्ड आगे बढ़ोगे और स्वर्ग के दरवाजे खुल जाएंगे ....... कयामत के दिन समस्त आत्माएं अल्लाह के समक्ष खड़ी होंगी और मुहम्मद उनके प्रवक्ता होंगे। तब, प्रत्येक रूह के पुण्य और पाप का लेखा-जोखा लिया जाएगा। पुण्य और पाप को तौलने का काम जिबराइल करेंगे। जिसका पुण्य परिणाम में अधिक होगा, वह जन्नत (स्वर्ग) में जाएगा। जिनके पाप अधिक होंगे, वे दोज़ख (नर्क) में पड़ेंगे।'

    जन्नत और दोज़ख

    कुरान के अनुसार जन्नत (स्वर्ग) सातवें अर्श (आकाश) पर स्थित है। उसमें एक रमणीय उद्यान है जहाँ झरने और फव्वारे हैं। दूध और शहद की नदियां बहती हैं। वृक्षों के तने स्वर्ण के हैं और उनमें स्वादिष्ट फल लगते हैं। स्वर्ग में 'हूर-यूल-आयून' जाति की सत्तर युवतियां हैं जिनकी आंखें काली और बड़ी हैं। पुण्यात्माओं की सेवा करने के लिए 'गिलमा' जाति के सुन्दर लड़के रहते हैं। इसके विपरीत दोज़ख की कल्पना अत्यंत भयानक तथा विकराल रूप में की गई है। कुरान के अनुसार जन्नत के सुख केवल पुरुषों के लिए हैं, स्त्रियों के लिए नहीं।

    कर्मफलवाद में विश्वास

    इस्लाम भी कर्मफल के सिद्धांत में विश्वास करता है। कुरान के अनुसार अच्छे और बुरे कर्मों का परिणाम अवश्य मिलेगा। जिसने भी कण-मात्र सुकर्म किया है, वह भी अपनी आंखों से देखेगा। कयामत के बाद स्वर्ग और नर्क का निर्णय इसी जन्म में किए गए कर्मों के फलानुसार ही होता है। कुरान कहता है- 'अगर तुम ज्ञान से देखते तो तुम यहीं नर्क को भी देख सकते थे।' कुरान के अनुसार मनुष्य जीवन का लक्ष्य 'लिका-अल्लाह' (ईश्वर मिलन) है। यह मिलन सम्भवतः सुकर्मों से ही सम्भव हो सकता है।

    नैतिक सिद्धान्त

    इस्लाम के नैतिक सिद्धान्त उसका मानवीय स्वरूप प्रस्तुत करते हैं। प्रत्येक मुसलमान से न्यायप्रिय होने, भलाई का बदला भलाई से और बुराई का बदला बुराई से चुकाने, उदारता दिखाने, गरीबों की मदद करने की अपेक्षा की जाती है। इस्लाम में वैवाहिक सम्बन्धों पर पितृसत्तात्मक जीवन पद्धति की छाप है। अल्लाह ने स्त्री को पुरुष के लिए बनाया है। उसे पुरुष से दबकर रहना चाहिए। साथ ही कुरान में स्त्रियों के मानवीय अधिकारों को भी मान्यता दी गई है।

    पति द्वारा पत्नी से अनावश्यक क्रूर व्यवहार किए जाने की भी निन्दा की गई है। स्त्रियों को स्त्री-धन रखने का अधिकार और दयाधिकार प्राप्त हैं। कुरान के अनुसार अल्लाह के सामने समस्त मुसलमान बराबर हैं। अमीरी और गरीबी प्राकृतिक चीजें हैं जिन्हें स्वयं अल्लाह ने बनाया है। गरीबों के निर्वाह के लिए इस्लाम में जकात दिए जाने की व्यवस्था है।

    कुरान मनुष्य की निजी सम्पत्ति का समर्थन करता है। व्यापारिक मुनाफे को उचित मानता है जबकि सूदखोरी की निन्दा की गई है- 'बेचने (व्यापारी) को तो अल्लाह ने हलाल (जाइज) किया है और सूद (ब्याज) को हराम (नाजाइज)।' कर्जदार को बन्धुआ बनाने का निषेध है।

    मुसलमानों पर यहूदी परम्पराओं का प्रभाव

    यहूदी धर्म, इस्लाम से पुराना है। यहूदियों की कुछ परम्पराएं मुसलमानों ने भी अपना लीं। यहूदियों की तरह मुसलमानों में भी लड़कों का अनिवार्यतः खतना किया जाता है। अन्तर यह है कि मुसलमान, लड़के का खतना सामान्यतः सात से दस वर्ष की आयु में करते हैं जबकि यहूदी, जन्म के कुछ समय बाद। सूअर का मांस न खाना भी मुसलमानों ने यहूदियों से अपनाया है। दोनों ही धर्मों में ईश्वर, मनुष्यों एवं पशुओं की मूर्ति या चित्र बनाना एवं मूर्ति-पूजा करना वर्जित है। दोनों धर्मों में शराब पीना वर्जित है।

    शिया सम्प्रदाय

    इस्लाम के अनुयाई दो सम्प्रदायों में विभक्त हैं- शिया और सुन्नी। 'शिया' का शाब्दिक अर्थ होता है 'गिरोह' परन्तु व्यापक अर्थ में शिया उस सम्प्रदाय को कहते हैं जो हजरत मुहम्मद के दामाद 'हजरत अली' को हजरत मुहम्मद का वास्तविक उत्तराधिकारी मानता है, पहले तीन खलीफाओं को नहीं। शिया सम्प्रदाय का झण्डा काला होता है। शिया अनुश्रुतियों के अनुसार हज़रत अली और उनके दो पुत्र-हसन और इमाम हुसैन, दीन की खातिर शहीद हुए थे। उनकी शहादत की याद में शिया हर वर्ष मुहर्रम की दसवीं तारीख को ताजिये निकालते हैं।

    सुन्नी सम्प्रदाय

    'सुन्ना' को मानने वाले तथा अबूबक्र से खलीफाओं की गणना करने वाले 'सुन्नी' कहलाए। 'सुन्नी' शब्द अरबी के 'सुनत' शब्द से निकला है, जिसका अर्थ होता है- मुहम्मद के कामों की नकल करना। व्यावहारिक रूप में सुन्नी उस सम्प्रदाय को कहते है, जो प्रथम तीन खलीफाओं को ही हजरत मुहम्मद का वास्तविक उत्तराधिकारी मानता है, हजरत मुहम्मद के दामाद अली को नहीं। सुन्नी सम्प्रदाय का झण्डा सफेद होता है।

    खलीफाओं का उत्कर्ष

    'खलीफा' अरबी के 'खलफ' शब्द से निकला है, जिसका अर्थ है- 'लायक बेटा' अर्थात् योग्य पुत्र परन्तु खलीफा का अर्थ है जाँ-नशीन या उत्तराधिकारी। हजरत मुहम्मद की मृत्यु के उपरान्त जो उनके उत्तराधिकारी हुए, वे खलीफा कहलाए। प्रारम्भ में खलीफा का चुनाव, हजरत मुहम्मद के अनुयाइयों की सहमति से होता था परन्तु बाद में यह पद आनुवंशिक हो गया। हजरत मुहम्मद की मृत्यु के बाद हजरत मुहम्मद के ससुर अबूबकर प्रथम खलीफा चुने गए जो कुटम्ब में सर्वाधिक बूढ़े थे।

    अबूबकर के प्रयासों से मेसोपोटमिया तथा सीरिया में इस्लाम का प्रचार हुआ। अबूबकर के मर जाने पर 634 ई.में उमर को निर्विरोध खलीफा चुना गया। उमर ने इस्लाम के प्रचार में जितनी सफलता प्राप्त की उतनी सम्भवतः अन्य किसी खलीफा ने नहीं की। उसने इस्लाम के अनुयाइयों की एक विशाल तथा योग्य सेना संगठित की और साम्राज्य विस्तार तथा इस्लाम प्रचार का कार्य साथ-साथ आरम्भ किया। जिन देशों पर उसकी सेना विजय प्राप्त करती थी वहाँ के लोगों को मुसलमान बना लेती थी और इस्लाम का प्रचार आरम्भ हो जाता था।

    इस प्रकार थोड़े ही समय में फारस, मिस्र आदि देशों में इस्लाम का प्रचार हो गया। उमर के बाद उसमान खलीफा हुआ परन्तु थोड़े ही दिन बाद उसकी विलास-प्रियता के कारण उसकी हत्या कर दी गई और उसके स्थान पर हजरत मुहम्मद के दामाद अली को खलीफा चुना गया। कुछ लोगों ने उसका विरोध किया। इस प्रकार गृह-युद्ध आरम्भ हो गया और इस्लाम के प्रचार में भी शिथिलता आ गई। अन्त में अली का वध कर दिया गया। अली के बाद उसका पुत्र हसन खलीफा चुना गया परन्तु उसमें इस पद को ग्रहण करने की योग्यता नहीं थी। इसलिए उसने इस पद को त्याग दिया।

    अब सीरिया का गवर्नर मुआविया, जो खलीफा उमर के वंश से था, खलीफा चुन लिया गया। हसन ने मुआविया के पक्ष में खलीफा का पद इस शर्त पर त्यागा था कि खलीफा का पद निर्वाचित होगा, आनुवांशिक नहीं, परन्तु खलीफा हो जाने पर मुआविया के मन में कुभाव उत्पन्न हो गया और वह अपने वंश की जड़ जमाने में लग गया। उसने मदीना से हटकर दमिश्क को खलीफा की राजधानी बना दिया। चूंकि वह उमर के वंश का था, इसलिए दश्मिक के खलीफा उमैयद कहलाए।

    मुआविया लगभग बीस वर्ष तक खलीफा के पद पर रहा। इस बीच में उसने अपने वंश की स्थिति अत्यन्त सुद्धढ़ बना ली। अली के पुत्र हसन के साथ उसने जो वादा किया था, उसे तोड़ दिया और अपने पुत्र यजीद को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। इससे बड़ा अंसतोष फैला। इस अंसतोष का नेतृत्व अली के पुत्र तथा हसन के भाई इमाम हुसैन ने ग्रहण किया।

    उसने अपने थोड़े से साथियों के साथ फरात नदी के पश्चिमी किनारे के मैदान में उमैयद खलीफा की विशाल सेना का बड़ी वीरता तथा साहस के साथ सामना किया। इमाम हुसैन अपने साथियों के साथ मुहर्रम महीने की दसवीं तारीख को तलवार के घाट उतार दिया गया। जिस मैदान में इमाम हुसैन ने प्राण त्यागे, वह कर्बला कहलाता है।

    कर्बला दो शब्दों से मिलकर बना है- कर्ब तथा बला। कर्ब का अर्थ होता है मुसीबत और बला का अर्थ होता है दुःख। चूंकि इस मैदान में हजरत मुहम्मद की कन्या के पुत्र का वध किया गया था, इसलिए इस मुसीबत और दुःख की घटना के कारण इस स्थान का नाम कर्बला पड़ गया। मुहर्रम मुसलमानों के वर्ष का पहला महीना है। चूंकि इस महीने की दसवीं तारीख को इमाम हुसैन की हत्या की गई थी, इसलिए यह शोक और रंज का महीना माना जाता है।

    मुसलमान लोग मुहर्रम के दिन शोक का त्यौहार मनाते हैं। इमाम हुसैन के बाद अब्दुल अब्बास नामक व्यक्ति ने इस लड़ाई को जारी रखा। अन्त में वह सफल हुआ और उसने उमैयद वंश के एक-एक व्यक्ति का वध कर दिया। अब्बास के वंशज अब्बासी कहलाए। इन लोगों ने बगदाद को अपनी राजधानी बनाया। बगदाद के खलीफाओं में हारूँ रशीद का नाम बहुत विख्यात है, जो अपनी न्याय-प्रियता के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध था।

    अन्त में तुर्कों ने बगदाद के खलीफाओं का अन्त कर दिया। खलीफाओं ने मिस्र में जाकर शरण ली। खलीफा अब इतिहास के नेपथ्य में चले गए थे किंतु खलीफाओं ने ही इस्लाम का दूर-दूर तक प्रचार किया था और इन्हीं लोगों ने भारत में भी इसका प्रचार किया था।

    इस्लाम का राजनीतिक स्वरूप

    इस्लाम आरम्भ से ही राजनीति तथा सैनिक संगठन से सम्बद्ध रहा। हजरत मुहम्मद के जीवन काल में ही इस्लाम को सैनिक तथा राजनीतिक स्वरूप प्राप्त हो गया था। जब ई.622 में पैगम्बर मुहम्मद मक्का से मदीना गए तब वहाँ पर उन्होंने अपने अनुयाइयों की एक सेना संगठित की और मक्का पर आक्रमण कर दिया। इस प्रकार उन्होंने अपने सैन्य-बल से मक्का तथा अन्य क्षेत्रों में सफलता प्राप्त की।

    मुहम्मद न केवल इस्लाम के प्रधान स्वीकार कर लिए गए वरन् वे राजनीति के भी प्रधान बन गए और उनके निर्णय सर्वमान्य हो गए। इस प्रकार मुहम्मद के जीवन काल में इस्लाम तथा राज्य के अध्यक्ष का पद एक ही व्यक्ति में संयुक्त हो गया। पैगम्बर मुहम्मद की मृत्यु के उपरान्त जब खलीफाओं का उत्कर्ष हुआ, तब भी इस्लाम तथा राजनीति में अटूट सम्बन्ध बना रहा क्योंकि खलीफा भी न केवल इस्लाम के अपितु राज्य के भी प्रधान होते थे।

    इसका परिणाम यह हुआ कि राज्य का शासन कुरान के अनुसार होने लगा। इससे राज्य में मुल्ला-मौलवियों का प्रभाव बढ़ा। राज्य ने धार्मिक असहिष्णुता की नीति का अनुसरण किया जिसके फलस्वरूप अन्य धर्म वालों के साथ अन्याय तथा अत्याचार किया जाने लगा। खलीफा उमर ने अपने शासन काल में इस्लाम के अनुयाइयों को सैनिक संगठन में परिवर्तित कर दिया।

    इसका परिणम यह हुआ कि जहाँ कहीं खलीफा की सेनाएं विजय के लिए गईं, वहाँ पर इस्लाम का बल-पूर्वक प्रचार किया गया। यह प्रचार शान्ति पूर्वक सन्तों द्वारा नहीं वरन् राजनीतिज्ञों और सैनिकों द्वारा बलात् तलवार के बल पर किया गया। परिणाम यह हुआ कि जहाँ कहीं इस्लाम का प्रचार हुआ वहाँ की धरा रक्त-रंजित हो गई।

    जेहाद

    इस्लामी सेनापति अपने शत्रु पर युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए 'जेहाद' अर्थात् धर्म-युद्ध का नारा लगाते थे। इस्लाम का एक निर्देश इस्लाम की खातिर पवित्र युद्ध (जिहाद) से सम्बन्ध रखता है। कुरान में इस निर्देश को सूत्रबद्ध किया गया है- 'वर्ष में आठ माह बहुदेववादियों और विधर्मियों से लड़ना, उनका संहार करना और उनकी जमीन-जायदाद को छीन लेना चाहिए।'

    बाद में मुस्लिम उलेमाओं ने जिहाद से सम्बन्धित निर्देशों की अलग-अलग ढंग से व्याख्या की। बहुदेवपूजकों के बारे में कुरान का रवैया बहुत सख्त है। उसमें कहा गया है- 'हे ईमानवालों! अपने आस-पास के काफिरों से लड़े जाओ और चाहिए कि वह तुमसे अपनी बाबत सख्ती महसूस करें, और जानें कि अल्लाह उन लोगों का साथी है जो अल्लाह से डरते हैं।' यद्यपि कुरान 'किताबवालों' अर्थात् यहूदियों और ईसाईयों के प्रति थोड़ी उदार है।

    फिर भी कुरान में उन 'किताबवालों' के साथ लड़ने का आदेश है कि यदि वे अल्लाह को नहीं मानते और इस्लाम के आगे नहीं झुकते। क्लेन नामक विद्वान ने जिहाद का अर्थ 'संघर्ष' किया है और इस संघर्ष के उसने तीन क्षेत्र माने हैं- (1) दृश्य शत्रु के विरुद्ध संघर्ष (2) अदृश्य शत्रु के विरुद्ध संघर्ष और (3) इन्द्रियों के विरुद्ध संघर्ष।

    'रिलीजन ऑफ इस्लाम' के लेखक मुहम्मद अली का मत है कि- 'इस शब्द का अर्थ इस्लाम के प्रचार के लिए युद्ध करना नहीं है, इसका अर्थ परिश्रम, उद्योग या सामान्य संघर्ष ही है। हदीस में हज करना भी जिहाद माना गया है। नबी ने कहा है- सबसे अच्छा जिहाद हज में माना है किंतु व्यवहार में, आगे चलकर काजियों ने जिहाद का अर्थ युद्ध कर दिया उन्होंने समस्त विश्व को दो भागों में बांट दिया- (1.) दारूल-इस्लाम (जिस भाग पर मुसलमानों की हुकूमत थी, उसे शान्ति का देश कहा गया, और (2.) दारूल-हरब (युद्ध स्थल) जिस भाग पर गैर-मुसलमानों की हुकूमत थी। उन्होंने मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को उत्तेजित किया कि ऐसे देशों को जीत कर इस्लाम का झण्डा गाड़ना जाहिदों का परम कर्त्तव्य है।'

    इन भावनाओं के कारण जेहाद प्रायः भयंकर रूप धारण कर लेता था जिससे दानवता ताण्डव करने लगती थी और मजहब के नाम पर घनघोर अमानवीय कार्य किए जाते थे। शताब्दियाँ व्यतीत हो जाने पर भी इस्लाम की कट्टरता का स्वरूप अभी तक समाप्त नहीं हुआ है। इस कारण इस्लाम जिस भी देश में गया, उस देश के समक्ष साम्प्रदायिकता की समस्या की नई चुनौतियां खड़ी हो गईं।

    इस्लामी साम्राज्य का प्रसार

    हज़रत मुहम्मद के जीवन काल में अरब के अधिकांश भू-भाग पर इस्लाम का वर्चस्व हो गया। उनकी मृत्यु के बाद खलीफाओं के नेतृत्व में इस्लामी राज्य का तेजी से प्रसार हुआ। अरबवासियों ने संगठित होकर इस्लाम के प्रसार के साथ-साथ राजनीतिक विजय का अभियान शुरू किया। शीघ्र ही उन्होंने भूमध्यसागरीय देशों- सीरिया, फिलीस्तीन, दमिश्क, साइप्रस, क्रीट, मिस्र आदि देशों पर अधिकार कर लिया। इसके बाद फारस को इस्लाम की अधीनता में लाया गया।

    फिर उत्तरी अफ्रीका के नव-मुस्लिमों और अरबों ने स्पेन में प्रवेश किया। स्पेन तथा पुर्तगाल जीतने के बाद इस्लामी सेनाओं ने फ्रांस में प्रवेश किया परन्तु ई.732 में फ्रांसिसियों ने चार्ल्स मार्टेल के नेतृत्व में 'तुर्स के युद्ध' में इस्लामी सेना को परास्त कर उसे पुनः स्पेन में धकेल दिया जहाँ ई.1492 तक उनका शासन रहा। इसके बाद उन्हें स्पेन से भी हटाना पड़ा। अरबों ने पूर्वी रोमन साम्राज्य की राजधानी कुस्तुन्तुनिया पर भीषण आक्रमण किए।

    15वीं सदी में ओटोमन तुर्कों ने कुस्तुन्तुनिया को जीतकर इस कार्य को पूरा किया। उधर फारस को जीतने के बाद अरबों ने बुखारा और समरकन्द पर अधिकार किया। मध्य एशिया पर उन्होंने पूर्ण प्रभुत्व स्थापित किया। इसके बाद ई.712 में उन्होंने भारत के सिन्ध प्रदेश पर अधिकार किया। ई.750 में उन्होंने बगदाद को अपनी राजधानी बनाया। इस समय तक अरबवासियों का इस्लामी राज्य स्पेन से उत्तरी अफ्रीका होते हुए भारत में सिन्ध और चीन की सीमा तक स्थापित हो चुका था।

    इस्लाम के शीघ्र प्रसार

    के कारण अरब के एक छोटे नगर में उत्पन्न इस्लाम विश्व की सबसे बड़ी शक्तियों में से एक बन गया। इस्लाम के तीव्र प्रसार के कई कारण थे-

    (1.) इस्लाम की कट्टरता ने इस्लाम के तीव्र प्रसार में सहायता की। हजरत मुहम्मद ने मदीना पहुँचकर अपने अनुयाइयों को सैनिकों के रूप में संगठित किया तथा उन्हें आदेश दिया कि कुरान में अविश्वास रखने वाले को बलात् मुसलमान बना लिया जाए और यदि वे इस्लाम को स्वीकार न करें तो उन्हें मौत के घाट उतार दिया जाए। पैगम्बर के आदेश का पालन किया गया तथा सबसे पहला आक्रमण मक्का पर किया गया। मक्का विजय के बाद हर जगह यही उदाहरण दोहराया गया। रामधारीसिंह 'दिनकर' ने लिखा है- 'जहाँ-जहाँ इस्लाम के उपासक गए, उन्होंने विरोधी सम्प्रदाय के सामने तीन रास्ते रखे- या तो कुरान हाथ में लो और इस्लाम कबूल करो या जजिया दो और अधीनता स्वीकार करो। यदि दोनों में से कोई बात पसन्द न हो तो तुम्हारे गले पर गिरने के लिए हमारी तलवार प्रस्तुत है। ये बड़े ही कारगर उपाय रहे होंगे किन्तु यह समझ में नहीं आता कि सिर्फ इन्हीं उपायों से इस्लाम इतनी जल्दी कैसे फैल गया।' इस्लाम के लिए युद्ध करने वाले मुसलमानों को कुरान का आश्वासन था कि उनके पाप क्षमा कर दिए जाएंगे और उन्हें स्वर्ग में खूब आनन्द मिलेगा।

    (2.) अरब की तात्कालीन सामाजिक एवं धार्मिक स्थिति इस्लाम की सफलता का बड़ा कारण था। उस समय सारा अरब अन्धविश्वास, सामाजिक कुरीतियों और दुराचार का केन्द्र बना हुआ था। अरबों में निर्धनता व्याप्त थी जिसके कारण उनमें लालच भी बहुत अधिक था और धन प्राप्त करने का हर उपाय अच्छा समझा जाता था। जुआ, शराबखोरी, और वेश्यागमन भंयकर रूप से प्रचलित थे। विवाह जैसी पवित्र संस्था का महत्त्व भी जाता रहा और समाज में यौन-सम्बन्धों की कोई नैतिक व्यवस्था नहीं रह गयी थी। समस्त अरब लोग बहुदेववादी और घोर मूर्तिपूजक थे। ऐसी स्थिति में हजरत मुहम्मद द्वारा चलाया गया- अन्धविश्वासों से रहित, आडम्बरहीन, सरल, बोधगम्य तथा एक निराकार ईश्वर की उपासना वाला इस्लाम शीघ्र ही लोकप्रिय हो गया।

    (3.) इस्लाम में सामाजिक एवं धार्मिक समानता की विचारधारा भी इस्लाम की सफलता का बड़ा कारण था। इस्लाम में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं है तथा प्रत्येक व्यक्ति के सामाजिक एवं धार्मिक अधिकार एक समान हैं। समस्त मुसलमानों को एक अल्लाह का बन्दा समझा गया है। इसलिए इस्लाम के अनुयाई परस्पर बन्धु हैं तथा उनमें ऊँच-नीच की भावना नहीं है। इस समानता के सिद्धान्त के कारण इस्लाम की लोकप्रियता बहुत तेजी से बढ़ी। जिस भी समाज मेें निम्न स्तर के लोग उच्च स्तर के लोगों के धार्मिक या सामाजिक अत्याचार से पीड़ित थे, उन्होंने समाज में सम्मान एवं प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए इस्लाम स्वीकार कर लिया। इस कारण इस्लाम का प्रसार तेजी से हुआ।

    (4.) जिस समय इस्लाम के अनुयाई इस्लाम के प्रसार में लगे हुए थे, उस समय रोमन साम्राज्य खोखला हो चुका था और वहाँ विलासिता चरम पर थी। ईरानी साम्राज्य भी विलासिता के दलदल में डूबा हुआ था। राज्य के अधिकारी और धर्माधिकारी जनता का भयानक शोषण करते थे। इन शोषित राज्यों की जनता ने इस्लामी सेनाओं को अपनी मुक्तिदाता समझा। इतिहासकार मानवेन्द्र राय ने लिखा है- 'अरब आक्रमणकारी वीर जहाँ भी गए, जनता ने उन्हें अपना रक्षक और मुक्तिदाता मानकर उनका स्वागत किया क्योंकि कहीं तो जनता लोभी शासकों के भ्रष्टाचार के नीचे पिस रही थी तो कहीं ईरानी तानाशाहों के जुल्मों से त्रस्त थी और कहीं ईसाइयत का अन्धविश्वास उन्हें जकड़े हुए था।'

    (5.) अरबों की तात्कालिक आर्थिक स्थिति ने भी इस्लाम की सफलता में योगदान दिया। छठी शताब्दी मेें अरब में कारवाँ व्यापार का ह्रास हो रहा था जिससे आर्थिक सन्तुलन भंग हो गया। कारवाँओं से होने वाली आमदनी बन्द हो जाने पर खानाबदोश अरब, खेती करने लगे। इससे जमीन की माँग बढ़ रही थी और पड़ौसी राज्यों की उपजाऊ भूमि को हस्तगत करना सबसे आसान तरीका था। जिस क्षेत्र को भी वे हस्तगत करते थे, वहाँ के लोगों से कर वसूल करते थे। लाखों गैर-मुसलमानों ने इस्लाम को इसलिए स्वीकार कर लिया ताकि उन्हें कर नहीं चुकाना पड़े। इस्लाम स्वीकार करके वे इस्लामी राज्य में नौकरियाँ प्राप्त करने के पात्र बन जाते थे। यदि वे दास अथवा अर्द्धदास होते तो धर्म-परिवर्तन से दासता से मुक्त कर दिए जाते थे। इस प्रकार विजित क्षेत्रों की निर्धन जनता ने इस्लाम सहर्ष स्वीकार कर लिया।

    (6.) इस्लाम के प्रारम्भिक नेताओं के महान् व्यक्तित्त्व तथा आदर्श पूर्ण जीवन ने इस्लाम की लोकप्रियता में बड़ा योगदान दिया। अबूबक्र, उमर उस्मान और अली, तीनों ही नबी के चुने हुए साथी थे और उन्होंने भी मुहम्मद की ही तरह अभाव और दरिद्रता में जीवन व्यतीत किया था। उनके न तो महल या अंगरक्षक थे और न समसामयिक बादशाहों जैसे ठाट-बाट थे। प्रत्येक मुसलमान सीधे ही उन तक पहुँच सकता था। उन्होंने सादगी, सच्चरित्रता, वीरता और वैराग्य का ऐसा सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किया कि इस्लाम का आचार पक्ष बहुत ऊँचा उठ गया। सैनिक अभियान हो अथवा तीर्थ यात्रा, ये खलीफा लोग सर्वत्र न्याय प्रदान करते चलते थे। उन्होंने अरबों में प्रचलित कुरीतियों को दूर किया और राज्य के कर्मचारियों को निर्दयी और जुल्मी होने से रोका। कुछ खलीफा दक्ष सेनापति तथा कुशल सैन्य संचालक भी थे। इन्हीं कारणों से इस्लाम का शीघ्र प्रसार सम्भव हो सका।

    (7.) प्रत्येक मुसलमान वैधानिक रूप से चार पत्नियाँ रख सकता है। इस बहु-विवाह का परिणाम यह निकला कि मुसलमान जहाँ भी गए, उन्होंने गैर-स्त्रियों से विवाह कर लिए। भारत में आकर भी मुसलमानों ने हिन्दू स्त्रियों से विवाह किए। हिन्दू स्त्रियों से मुस्लिम बच्चे पैदा हुए जिनके कारण देश में इस्लाम का तेजी से प्रसार हुआ। हिन्दू स्त्रियों से उत्पन्न मुसलमान, भारत में इस्लाम के प्रसार के लिए अधिक कट्टर सिद्ध हुए।

    (8.) भारत में तुर्कों के आने के समय यहाँ की राजनीतिक दशा अत्यन्त ही शोचनीय थी। देश में केन्द्रीय सत्ता एवं राजनीतिक एकता का अभाव था। छोटे-बड़े राज्यों के राजा आपसी संघर्ष में अपनी शक्ति क्षीण कर रहे थे। इस समय हिन्दू समाज भी पतनोन्मुख था और उसे उत्साह से भरी हुई सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष करना पड़ा। सामान्य जनता में राजवंशों के उत्थान एवं पतन के प्रति कोई विशेष रुचि नहीं थी। हिन्दू समाज की जाति-व्यवस्था ने जनसामान्य को विभक्त कर रखा था। निम्न कही जाने वाली जातियों का जीवन बहुत ही दयनीय था। निम्न जाति के अधिकांश लोगों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया। इसके विपरीत इस्लाम ने मुसलमानों को एकता के सूत्र में बाँधा तथा काफिरों के विरुद्ध लड़े जाने वाले युद्धों को जिहाद का जामा पहना दिया। मुस्लिम सुल्तानों ने कुरान के आधार पर शासन किया और इस्लाम का प्रसार किया। के. एस. लाल ने लिखा है- 'भारत में सुल्तानों ने अपनी धार्मिक नीति से हिन्दुओं की संख्या एक-तिहाई कर दी।'

    ईस्लाम का भारत में प्रवेश और प्रसार

    मुस्लिम अरब व्यापारियों ने सातवीं शताब्दी से ही भारत के दक्षिण-पश्चिमी समुद्र तटीय राज्यों से व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित कर लिए थे। कुछ अरब व्यापारी दक्षिण भारत के मलाबार तथा अन्य स्थानांे पर स्थायी रूप से बस गए थे। दक्षिण भारत में अरब व्यापारियों ने व्यापार करने के साथ-साथ इस्लाम का प्रचार भी किया। इस कारण दक्षिण भारत के कुछ लोगों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया।

    आठवीं सदी के आरम्भ में अरबों ने सिन्ध को जीत लिया किंतु इस जीत से इस्लाम सिन्ध में अपना वर्चस्व स्थापित नहीं कर सका। इस्लाम का नेतृत्व पहले, ईरानियों और उसके बाद तुर्कों के पास चला गया। इस्लाम के प्रचार के लिए तुर्क कई शाखाओं में बँट गए। समानी वंश के तुर्कों ने पूर्व की ओर बढ़कर ई.874 से 999 के बीच खुरासान, आक्सस नदी पार के देश तथा अफगानिस्तान के विशाल भू-भाग पर अधिकार कर लिया।

    दसवीं शताब्दी ईस्वी में समानी वंश के शासक 'अहमद' का गुलाम 'अलप्तगीन' गजनी का स्वतंत्र शासक बना। उसका वंश 'गजनवी वंश' कहलाया। ई.977 में अलप्तगीन के गुलाम एवं दामाद सुबुक्तगीन ने गजनी राज्य की सीमाओं को हिन्दूशाही राज्य 'लमगान' तक पहुँचा दिया। ई.986 में उसने पंजाब के हिन्दूशाही राज्य लमगान पर आक्रमण किया। लमगान के शासक जयपाल ने उससे सन्धि कर ली किन्तु कुछ समय बाद जयपाल ने सन्धि की अवहेलना शुरू कर दी।

    अतः ई.991 में सुबुक्तगीन ने पुनः हिन्दूशाही राज्य पर आक्रमण करके लमगान तक का प्रदेश जीत लिया। ई.997 में सुबुक्तगीन की मृत्यु होने पर उसका पुत्र महमूद गजनी का शासक बना। गजनी का शासक होने के कारण वह महमूद गजनवी कहलाया। महमूद गजनवी ने ई.1000 से 1026 के मध्य, भारत पर 17 आक्रमण किए। महमूद के आक्रमणों का उद्देश्य भारत में स्थायी शासन स्थापित करना नहीं था, अपितु धन-सम्पदा की लूट, मन्दिरों और मूर्तियों को भूमिसात् करना तथा भारत में इस्लाम के प्रसार का मार्ग प्रशस्त करना था।

    उसके मुस्लिम प्रांतपति अफगानिस्तान से लेकर पंजाब के बीच कुछ क्षेत्रों पर शासन करने लगे। 12वीं शताब्दी ईस्वी में मुहम्मद गौरी ने अजमेर एवं दिल्ली के चौहान शासकों को परास्त कर भारत में मुस्लिम साम्राज्य की नींव रखी। उसका गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली का पहला स्वतंत्र मुस्लिम सुल्तान बना।

    हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता की समस्या

    यद्यपि कुरान तथा हदीस में इस्लामिक एवं गैर-इस्लामिक भूमियों की संकल्पना मौजूद नहीं है तथापि इस्लामी चिंतकों ने पूरे विश्व को दो हिस्सों- 'दारुल इस्लाम' (इस्लाम का घर) तथा 'दारुल हरब' (युद्ध का घर) में बांटा है। दारुल इस्लाम वह भूमि है जहाँ शरीयत का कानून चलता है जबकि दारुल हरब वह भूमि है जहाँ शरीयत के अनुसार शासन नहीं चलता। इसे 'दारुल कुफ्र' भी कहते हैं। दारुल हरब को पुनः तीन भागों में विभक्त किया गया है-

    (1.) दारुल अहद- अर्थात् वह गैर इस्लामिक देश जहाँ अल्लाह को नहीं मानने वालों का बहुमत है।

    (2.) दारुल सुलह- अर्थात् वह गैर इस्लामिक देश जहाँ अल्लाह को नहीं मानने वालों ने मुसलमानों से शांति का समझौता कर रखा है।

    (3.) दारुल दावा- ;च्तवेमसलजप्रपदह वत चतमंबीपदह व िप्ेसंउद्ध अर्थात् वह गैर इस्लामिक देश जिसके लोगों को इस्लाम की शिक्षा देकर उनका धर्मांतरण किया जाना है।

    इस्लाम के प्रसार के इस चिंतन से प्रभावित मुसलमान पूरे विश्व को दारुल इस्लाम में बदलना चाहते थे। इसलिए जहाँ भी मुस्लिम सेनाएं गईं, उन्होंने बुतपरस्तों (मूर्ति-पूजकों) को काफिर (नास्तिक) कहकर उनकी हत्याएं कीं अथवा उन्हें गुलाम बनाया। उन्होंने लोगों के सामने दो ही विकल्प छोड़े या तो मुसलमान बन जाओ या मर जाओ। एक तीसरा और संकरा रास्ता और भी था जिसके अंतर्गत काफिरों को जिम्मी अर्थात् 'रक्षित-विधर्मी' घोषित किया जाता था जो जजिया देकर मुसलमानों के राज्य में जिंदा रहे।

    भारत में हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक समस्या का प्रवेश

    इस्लाम ने तलवार के जोर पर बड़ी संख्या में हिन्दुओं को मुसलमान बनाना आरम्भ कर दिया। जिन हिन्दुओं ने मुसलमान बनने से मना किया, उनका सर्वस्व हरण करके उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया। मुस्लिम मुल्लाओं और मौलवियों ने मुसलमानों को समझाया कि भारत 'दारुल हरब' है तथा 'जेहाद' के माध्यम से काफिरों का सफाया करके इसे 'दारुल इस्लाम' बनाना है।

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  • अध्याय - 14 राजकीय संग्रहालय आहाड़

     19.05.2020
    अध्याय - 14 राजकीय संग्रहालय आहाड़

     अध्याय - 14 राजकीय संग्रहालय, आहाड़

    उदयपुर नगर के प्रताप नगर रेलवे स्टेशन को जाने वाली सड़क के समीप आहाड़ नदी के उत्तर पूर्वी किनारे पर एक प्राचीन टीला है जिसे धूलकोट के नाम से जाना जाता है। किसी समय यह टीला आयड़ नदी के बाएं किनारे पर बसा हुआ था। यही नदी आगे चलकर बेड़च कहलाती है। राजस्थान में बेड़च, बनास एवं चम्बल के कांठे में ऐसे कई टीले प्रकाश में आए हैं जहाँ से सिन्धु सभ्यता के बाद की ‘ग्रे वेयर’ वाली सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं। चूंकि इस सभ्यता के लोग ताम्बे एवं पत्थरों के उपकरणों एवं औजारों का प्रयोग करते थे इसलिए इस सभ्यता को पुरातत्व जगत में ‘ताम्र पाषाण’ संस्कृति के नाम से जाना जाता है।

    राजस्थान में इसका प्रमुख केन्द्र ‘आहाड़’ माना गया है। यह सभ्यता ईसा से चार हजार साल पहले से लेकर ईसा से दो हजार साल पहले तक अस्तित्व में रही। उदयपुर, डूंगरपुर, चित्तौड़गढ़ भीलवाड़ा, अजमेर, कोटा एवं बूंदी जिलों में इस संस्कृति के एक सौ से अधिक गांव खोजे जा चुके हैं।

    इस नगर को प्राचीन शिलालेखों में ताम्बावती नगर, मध्यकालीन शिलालेखों में आघाटपुर और वर्तमान में आहाड़ या आयड़ कहा जाता है। वर्तमान आयड़ ग्राम भी एक प्राचीन टीले पर बसा हुआ है। इस टीले की सर्वप्रथम खुदाई मेवाड़ रियासत के पुरातत्व विभाग के तत्कालीन अध्यक्ष श्री अक्षय कीर्ति व्यास ने बहुत सीमित क्षेत्र में की थी। इसके पश्चात् ई.1954-55 में श्री रत्नचन्द्र अग्रवाल ने राजस्थान सरकार की ओर से उत्खनन कार्य किया। ई.1960-61 में राजस्थान सरकार के पुरातत्व विभाग, डेक्क्न कॉलेज पुणे एवं मेलबॉर्न विश्वविद्यालय ऑस्ट्रेलिया के संयुक्त दल ने इस टीले का उत्खनन किया। इस खुदाई का नेतृत्व डा. एच. डी. सांकलिया ने किया। इस टीले की खुदाई से जो सामग्री प्राप्त हुई उसके प्रदर्शन के लिए इसी टीले के निकट आहाड़ संग्रहालय की स्थापना की गई है।

    आहाड़ टीले से प्राप्त चार हजार वर्ष पुरानी सभ्यता को आहाड़ सभ्यता कहा जाता है। इसमें चित्रित लाल, काले मृद-पात्रों का उपयोग करने वाली सभ्यता के अवशेष मिले हैं। यह ताम्र-पाषाण युगीन सभ्यता है। यहाँ से चौकोर एवं आयताकार मकानों के अवशेष मिले हैं। उस काल में हड़प्पा सभ्यता के अतिरिक्त केवल आहाड़ सभ्यता के लोग ही पक्की दीवारें एवं पक्के घरों का उपयोग कर रहे थे। आहाड़, बालाथल एवं गिलूण्ड में इसके प्रमाण देखे जा सकते हैं। आहाड़ संस्कृति की पहचान मुख्य रूप से विशिष्ट प्रकार के मिट्टी के बर्तनों से होती है।

    इस टीले से सफेद रंग के चित्रित काले एवं लाल बर्तन, चमकीले लाल, राखिया, दूधिया रंग वाले, टैन पॉलिश युक्त, रिजर्व स्लिप्ड वाले बर्तन मिले हैं। इनमें से टैन पॉलिश तथा थिन रैड स्लिप वाले बर्तन आहाड़ सभ्यता के प्रारम्भिक चरण में नहीं मिले हैं, वे आहाड़ संस्कृति के समृद्ध चरण में प्रयुक्त होते थे। आहाड़ टीले के सबसे नीचे के स्तर से हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो के विशिष्ट आकृति वाले डिशऑन स्टेण्ड (मृदपात्र) मिले हैं जो इसी संग्रहालय की दीर्घा में प्रदर्शित हैं। इन मृदपात्रों के यहाँ मिलने से यह स्पष्ट हो जाता है कि आज से चार हजार वर्ष पूर्व अर्थात सिन्धु सभ्यता के अंतिम चरण में सिन्धु सभ्यता का मेवाड़ में प्रवेश हो चुका था। यद्यपि उस समय आहाड़ में काले-लाल रंग के मृद-भाण्डों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग हो रहा था।

    सिन्धु मृद-भाण्ड कला के सम्पर्क का प्रभाव यहाँ तक पहुँचा कि काली-लाल मृद्भाण्ड कला में भी ‘डिश-ऑन स्टैण्ड’ का अनुकरण किया जाने लगा। इस प्रकार की महत्वपूर्ण सामग्री ‘माहेश्वर-नवदाटोली’ के टीलों की खुदाई से भी मिली है। आहाड़ एवं माहेश्वर ‘काली एवं लाल मृदभाण्ड संस्कृति’ के प्रमुख केन्द्र थे। आहाड़ के काले-लाल धरातल वाले चमकीले बर्तनों पर सफेद मांडने बने हुए हैं जो हजारों वर्षों के बाद भी नष्ट नहीं हुए हैं। ये बर्तन सबसे नीचे के स्तर से ऊपर की ओर 20 फुट के जमाव तक मिले हैं। रतलाम से कोटा जाने वाले मार्ग पर स्थित नागदा नामक स्थान की खुदाई में भी काले-लाल मृद्भाण्ड पर्याप्त मात्रा में मिले हैं। आहाड़ के समीपवर्ती क्षेत्र में ‘गिलूण्ड’ नामक स्थान से प्लास्टर युक्त कच्ची दीवारों के बनाने की जानकारी भी मिली है।

    सौराष्ट्र में ‘रोजड़ी’ नामक स्थल से भी इस प्रकार के प्रमाण मिले हैं। इस काल की सभ्यता का प्रमुख केन्द्र आहाड़ ही था। आहाड़ की खुदाई से चार हजार वर्ष पुरानी संस्कृति पर पर्याप्त प्रकाश पड़ा है। इस काल में कच्ची ईटों के मकान का निर्माण करते थे। कुछ घरों के अवशेष खाइयों (ट्रेंचेज) में विद्यमान हैं जिनका आकार 23 गुणा 15 फुट तथा 9 गुणा 9 फुट है। उनमें कच्ची छतों के नीचे बांस के प्रयोग का भी पता चला है। इन छतों को लकड़ी की बल्लियों द्वारा उठा कर रखा जाता था जो नीचे कच्चे फर्श में गाड़ दी जाती थीं।

    आहाड़ के प्राचीन निवासी अपने घरों का गन्दा पानी निकालने की वैज्ञानिक पद्धति से भी परिचित थे। इसके लिए 15 गुणा 20 फुट के गड्ढे़ खोद कर उसमें पकाई हुई मिट्टी के घेरे एक दूसरे के ऊपर रखकर (रिंग वैल) बना लिए जाते थे और उनमें गन्दा पानी गिरता था। इसका एक नमूना पुरा स्थल पर संरक्षित है। आहाड़ में ऐतिहासिक युग की बसावट का जमाव ताम्रपाषाण काल की तुलना में छोटा है। इस काल में भी लोगों ने मिट्टी, पत्थर तथा ईंटों से चौकोर भवन बनाए।

    इस काल के मिट्टी के बर्तन लाल तथा राखिया प्रकार के हैं। उत्खनन में अनेक छोटी वस्तुओं यथा मिट्टी के मणके, झांवे, चूड़ियां, गोफण, घोड़े, हाथी तथा लोहे के औजार यथा कुल्हाड़ी, छैनी, भाले, तीन हल का फाल, कीलें, कांच की चूड़ियां आदि खोजे गए।

    आहाड़ संग्रहालय में तीन दीर्घाएँ हैं। प्रथम दीर्घा में काले चित्रित धूसर मृदपात्र, काले और लाल मृदपात्र, चमकीले लाल रंग के मृदपात्र एवं कुषाण-कालीन मृदपात्र रखे हैं जिनमें लाल टोंटीदार लोटे तथा घड़े इत्यादि सम्मिलित हैं।

    द्वितीय दीर्घा में मणके, मृण-मूर्तियां, धूप-दान, जानवरों के सींग, दीपक, ठप्पे, मोहरें इत्यादि प्रदर्शित हैं।

    तृतीय दीर्घा में आहाड़ क्षेत्र से प्राप्त धातु एवं पाषाण की प्रतिमाएं है। ये प्रतिमाएं सातवीं से पन्द्रहवीं शताब्दी की हैं। इनमें सूर्य, शिव-पार्वती, कच्छपावतार, मत्स्य अवतार और त्रिमुख विष्णु प्रतिमाएं प्रमुख हैं। कच्छप एवं मत्स्यावतार की प्रस्तर प्रतिमाएँ विशेष स्थान रखती हैं। मत्स्य तथा तथा कूर्मावतार को पद्म के ऊपर विग्रह रूप में दर्शाया गया है तथा नीचे विष्णु के आयुध दर्शाए गए हैं। संग्रहालय में प्रदर्शित 8वीं शती ईस्वी की जैन तीर्थंकर की कांस्य प्रतिमा विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-51

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-51

    पर्यावरण के पोषक : तीज-त्यौहार


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    समस्त तीज-त्यौहार ऋतु परिवर्तन एवं प्रकृति में निरंतर आने वाले मौसमी परिवर्तनों से जुड़े हुए हैं। प्रत्येक तीज-त्यौहार के मूल में धार्मिक एवं सामाजिक मान्यताएं हैं, प्रकृति में घट रही घटनाएं हैं, फसलों की बुवाई तथा कटाई जैसी आर्थिक गतिविधियां हैं तो पर्यावरण की सुरक्षा के गहन-गंभीर भाव भी निहित हैं।

    अक्षय तृतीया : यह त्यौहार वैसाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। इस दिन बाजरा, गेंहूं, चना, जौ, तिल आदि सात अन्नों की पूजा की जाती है तथा शीघ्र वर्षा होने की कामना की जाती है। घर के द्वार पर अनाज की बालों के चित्र बनाये जाते हैं।

    निर्जला एकादशी : ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी सर्वाधिक फलदायिनी मानी जाती है। इस दिन व्रत रखने से शेष सभी एकादशियों के व्रत का पुण्य प्राप्त होता है। इस व्रत में जल नहीं पिया जाता है।

    तीज : श्रावण शुक्ला तुतीया को छोटी तीज मनायी जाती है। भाद्रपद की तृतीया को बड़ी तीज कहते हैं। छोटी तीज का महत्व अधिक है। यह त्यौहार ग्रीष्म काल के व्यतीत हो जाने के बाद आने वाला प्रथम त्यौहार है। तीज और गणगौर के बारे में कहा जाता है कि 'तीज त्यौहारां बावड़ी, ले डूबी गणगौर।' अर्थात् तीज अपने साथ त्यौहारों को लेकर आती है और गणगौर अपने साथ त्यौहारों को वापिस ले जाती है। तीज बालिकाओं और सधवा स्त्रियों का त्यौहार है। एक दिन पूर्व बालिकाओं का सिंझारा (शृंगार) किया जाता है। इस सम्बन्ध में एक उक्ति कही जाती है- 'आज सिंझारा तड़के तीज, छोरियां ने लेगी पीर।' विवाहिता स्त्रियाँ एवं कन्याएं हाथ पैरों पर मेंहदी लगाती हैं। विवाहित स्त्रियों के माता-पिता अपनी पुत्री के ससुराल में सिंझारा, वस्त्र आदि भेजते हैं। विवाहिता स्त्रियां इस त्यौहार पर अपने पिता के घर जाती हैं। वे व्रत रखती हैं तथा व्रत में जल भी ग्रहण नहीं करतीं। सायंकाल भगवान शिव एवं पार्वती की पूजा करती हैं तथा रात्रि में चंद्र दर्शन करके भोजन करती हैं। इस त्यौहार पर झूला झलने का विशेष महत्व है। इस दिन किसी सरोवर के पास मेला भरता है। कहीं-कही गणगौर की सवारी भी निकाली जाती है। लोकगीत गाये जाते हैं।

    नाग पंचमी : श्रावण शुक्ला पंचमी को नाग पूजा की जाती है। इस दिन घर के दरवाजों के दोनों ओर गोबर से नाग के चित्र बनाये जाते हैं। सपेरों को दान दिया जाता है।

    रक्षा बंधन : श्रावण मास की पूर्णिमा को रक्षाबंधन का त्यौहार मनाया जाता है। यह मुख्यतः ब्राह्मणों का त्यौहार है। रक्षाबंधन को नया यज्ञोपवीत धारण किया जाता है। इस दिन बहिनें अपने भाईयों को तथा ब्राह्मण अपने यजमानों को राखी बांधते हैं। इसके बदले में समाज अपना कर्तव्य पालन करने तथा अपने आश्रितों की सुरक्षा करने का आश्वासन देता है। इस दिन औरतें अपने घर के दरवाजों के दोनों ओर खड़िया तथा गेरू से राखियां तथा लघु चित्रों का अंकन करती हैं जिन्हें गेरू कहा जाता है। राखी वाले दिन इन चित्रांकनों की पूजा की जाती है।

    ऊभ छट : श्रावण मास में कुंआरी कन्याएं ऊभ छट का त्यौहार मनाती हैं। इस दिन वे व्रत करती हैं तथा सारे दिन खड़ी रहती हैं। रात्रि में वे किसी मंदिर में सम्मिलित प्रार्थना करती हैं तथा रात्रि में चंद्रमा के दर्शन करने के बाद ही भोजन करती हैं।

    हरियाली अमावस्या : श्रावण मास में अमावस्या के दिन हरियाली अमावस्या मनायी जाती है। इस दिन राजस्थान के कुछ हिस्सों में माल पुाए बनाये जाते हैं।

    बच्छबारस : श्रावण मास में द्वादशी के दिन बच्छ बारस मनायी जाती है। इस दिन गायों एवं बछड़ों की पूजा की जाती है तथा उन्हें बाजरी, मोठ व चनों का दलिया खिलाया जाता है।

    जल झूलनी एकादशी : भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जल झूलनी एकादशी मनायी जाती है। इस दिन देव मूर्तियों को पालकियों और विमानों में बैठाकर गाजे बाजे के साथ जलाशय पर ले जाया जाता है तथा स्नान करवाया जाता है।

    गवरी पूजन : भाद्रपद कृष्ण 10 को मेवाड़ क्षेत्र में गवरी पूजन उत्सव आरंभ होता है जो शरद आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की नवमी को समाप्त होता है। इन दिनों में भील जाति के लोग गवरी नृत्य करते हैं।

    गोगानवमी : भाद्रपद माह में नवमी को गोगानवमी मनायी जाती है।

    जन्माष्टमी : भगवान श्रीकृष्ण के जन्म दिवस पर भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को यह त्यौहार मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। हिंदू धर्मावलम्बी इस दिन निराहार रहकर व्रत करते हैं तथा रात्रि में चंद्रोदय तक जागरण करते हैं। लगभग 12 बजे चंद्रमा निकलने पर अर्घ्य देते हैं तथा धनिये का प्रसाद चढ़ाते हैं।

    श्राद्ध पक्ष : भाद्रपद शुक्ला 15 से आश्विन कृष्णा अमावस्या तक श्राद्ध पक्ष मनाया जाता है। हिन्दू धर्म के अनुसार पूर्वजों की मृत्यु के बाद उनकी तिथि के दिन श्राद्ध, तर्पण एवं ब्राह्मण को भोजन करवाया जाता है। इन दिनों में मांस मदिरा का सेवन वर्जित है। कुछ लोग इन दिनों में दाढ़ी एवं बाल भी नहीं कटवाते हैं।

    नवरात्रा : चैत्र माह के शुक्ल पक्ष में प्रतिपदा से नवमी तक तथा आश्विन माह के शुक्ल पक्ष में प्रतिपदा से नवमी तक नवरात्रियों का आयोजन होता है। इन दिनों में देवी दुर्गा की पूजा होती है तथा सप्तशती का पाठ किया जाता है। अनेक देवी मंदिरों में इन दिनों में मेला भरता है। कार्तिक माह की नवरात्रियों में नवमी को रामनवमी के रूप में मनाया जाता है। आश्विन माह की दशमी को दशहरा का आयोजन किया जाता है।

    दशहरा : आश्विन माह की दशमी को दशहरा का आयोजन किया जाता है। इस दिन भगवान राम ने रावण पर विजय प्राप्त की थी, इसलिये इस त्यौहार को बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में मनाया जाता है। यह क्षत्रियों का त्यौहार माना जाता है। इस दिन शस्त्र पूजन होता है तथा शाम के समय रावण, कुंभकर्ण एवं मेघनाद के पुतले जलाये जाते हैं।

    करवा चौथ : सुहागिन स्त्रियों द्वारा कार्तिक कृष्णा चतुर्थी को करवा चौथ का व्रत किया जाता है। चंद्रमा के दर्शन करके उसे अर्घ्य देने के बाद ही स्त्रियां व्रत खोलती हैं। इस व्रत के पालन से घर में सुख-सौभाग्य में वृद्धि तथा पुत्र एवं पति को दीघार्यु प्राप्त होती है।

    दीपावली : कार्तिक माह की अमावस्या को दीपावली मनायी जाती है। इससे दो दिन पहले धनवंतरी त्रयोदशी मनायी जाती है जिसे धनतेरस भी कहते हैं। इस दिन एक दिया जमदीप के नाम से जलाया जाता है। धनतेरस के अगले दिन नरकासुर का वध किया गया था। इसे नर्क चौदस भी कहते हैं। हिन्दुओं में इसे रूप चौदस के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन प्रातः शीघ्र स्नान करने का महत्व है। अमावस्या के दिन दीपावली होती है। रबी फसल पकने की प्रसन्नता में इस पर्व का आयोजन किया जाता है। इस दिन व्यापारी लोग नयी बहियां लगाते हैं। लक्ष्मीजी का पूजन किया जाता है। लक्ष्मीजी के साथ गणेशजी, कौड़ी, शंख तथा बहियों का भी पूजन किया जाता है। घर, दुकान, व्यापारिक कार्यालय, गली, मौहल्ले एवं बाजार में दीप मालाओं एवं बिजली की झालरों से प्रकाश किया जाता है। हिन्दू लोग इसे भगवान श्रीराम के वनवास के बाद पुनः अयोध्या आगमन की प्रसन्नता में मनाते हैं। जैन धर्म के लोग इस दिन महावीर स्वामी का निर्वाण दिवस मनाते हैं। आर्य समाजी दयानंद सरस्वती के निर्वाण दिवस के रूप में मनाते हैं। दीपावली के अगले दिन लोग अपने परिवारों सहित एक दूसरे की कुशल क्षेम पूछने जाते हैं।

    गोवर्धन पूजा एवं अन्नकूट : दीपावली के अगले दिन गोवर्धन का त्यौहार मनाया जाता है। इस दिन बछड़े का पूजन कर उसके कंधे पर हल रखा जाता है। बैलों के सींग रंगे जाते हैं और उनके शरीर पर रंग के छापे लगाये जाते हैं। मंदिरों में अन्नकूट का आयोजन किया जाता है। छप्पन तरह के व्यंजन बनाकर भगवान को अर्पित किये जाते हैं। अन्नकूट के पश्चात् नाथद्वारा तथा कांकरोली में भीलों को भोजन, मिठाई तथा चावलों की लूट करवायी जाती है।

    भाई दूज : गोवर्धन के अगले दिन भाई दूज का पर्व मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन यम ने अपनी बहिन यमी का निमंत्रण स्वीकार करके उनके यहाँ भोजन किया था। इस दिन बहिनें भाई को तिलक निकाल कर उसकी दीर्घायु की कामना करती हैं।

    देवोत्थान एकादशी : कार्तिक शुक्ला एकादशी को देवोत्थान एकादशी मनायी जाती है। मान्यता है कि इसी दिन क्षीर सागर में सोये हुए भगवान विष्णु जागे थे। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है तथा नयी ईख की पूजा करके उसे चूसा जाता है। इसी दिन भगवान विष्णु से तुलसी का विवाह करवाया जाता है। इस दिन से अगले आठ माह तक (हरियाली एकादशी तक) विवाह कार्य संपन्न करने का मुहूर्त रहता है।

    कार्तिक पूर्णिमा : कार्तिक पूर्णिमा को गंगा स्नान और दीपदान का विशेष महत्व है। राजस्थान के लोग इस दिन नदियों एवं तालाबों पर जाकर स्नान करते हैं। इस दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य के रूप में अवतार लिया था। सिक्ख धर्म के गुरु नानक देव का जन्म भी इसी दिन हुआ था। इस दिन गुरुद्वारों में गुरु ग्रंथ साहब का पाठ होता है तथा प्रसाद बांटा जाता है।

    मकर संक्रांति : प्रति वर्ष सूर्य देव के उत्तरायण होने के दिन को मकर संक्रांतिके रूप में मनाया जाता है। यह सामान्यतः 14 जनवरी को ही होता है। इस दिन सूर्य भगवान की पूजा की जाती है। लोग नदियों एवं तालाबों पर जाकर स्नान करते हैं तथा खिचड़ी एवं तिलों का दान करते हैं। इस दिन अनेक स्थानों पर पतंग उड़ाई जाती है। इस दिन मल मास समाप्त हो जाता है तथा लोग फिर से शुभ कार्य आरंभ कर देते हैं।

    बसंत पंचमी : माघ शुक्ल पंचमी को बसंत पंचमी का त्यौहार मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु तथा माता सरस्वती की पूजा की जाती है। काम देव तथा रति की भी पूजा की जाती है। लोग बसंती रंग के वस्त्र पहनते हैं। प्राचीन काल में इस दिन नृत्य तथा संगीत के बड़े आयोजन होते थे।

    शिवरात्रि : माघ कृष्णा त्रयोदशी को शिवरात्रि का आयोजन किया जाता है तथा भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिये व्रत किया जाता है। इस व्रत में अन्न ग्रहण नहीं किया जाता। उसके स्थान पर फलाहार किया जाता है।

    होली : फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होलिका दहन किया जाता है तथा अगले दिन फाग खेला जाता है। यह त्यौहार रबी की फसल के पकने की प्रसन्नता में मनाया जाता है। मान्यता है कि इसी दिन हिरण्यकश्यपु की बहिन होलिका ने भक्त प्रहलाद को अपनी गोदी में बैठकार अग्निस्नान किया था। इस प्रयास में होलिका तो जल कर मर गयी किंतु भक्त प्रहलाद चमत्कारिक रूप से बच गये। पश्चिमी राजस्थान में ईलोजी की सवारी निकालने की परंपरा है। मेवाड़ तथा मारवाड़ में गैर नृतकों की टोलियां इस त्यौहार पर गैर नृत्यों का अयोजन करती हैं। आदिवासी लोगों में होली पर भागोरिया खेला जाता है। ब्रज से लगते हुए क्षेत्र में लट्ठ मार होली खेली जाती है। जालोर जिले में होली के अगले दिन भाटा गैर खेली जाती है।

    शीतला सप्तमी : राजस्थान में चैत्र शुक्ला सप्तम को शीतला सप्तमी मनायी जाती है। इस दिन शीतला देवी की पूजा होती है तथा एक दिन पहले बना हुआ शीतल भोजन किया जाता है। मान्यता है कि शीतला माता की पूजा करने से बच्चों में ओरी, चेचक तथा बोदरी जैसी बीमारियां नहीं होती हैं। जोधपुर राज्य में शीतला सप्तमी की जगह शीतला अष्टमी मनायी जाती है क्योंकि जोधपुर राज्य के राजा विजयसिंह के पुत्र सरदारसिंह की शीतला सप्तमी के दिन ओरी से मृत्यु हो गयी थी। शोक विह्वल राजा ने शीतला माता की मूर्ति को हाथी के पैरों से कुचलवाकर उसे पहाड़ियों से नीचे फैंक दिया। शोक से उबरने पर राजा को अपने कृत्य पर पश्चाताप हुआ और वह सपरिवार माता की पूजा के लिये उपस्थित हुआ।

    गणगौर : गणगौर का त्यौहार होली से लगभग 15 दिन बाद मनाया जाता है। चैत्र कृष्णा प्रतिपदा से गणगौर पूजा प्रारंभ होकर चैत्र शुक्ला तृतीया को समाप्त होती है। गण से तात्पर्य भगवान शिव से तथा गौर से तात्पर्य गौरी अर्थात् माता पार्वती से है। यह त्यौहार पार्वतीजी के गौने का सूचक है। प्रतिदिन संध्याकाल में सौभाग्यवती स्त्रियाँ तथा कुमारियाँ सिर पर कलश रखकर इस अवसर पर गीत गाती हुई तालाबों पर जाती हैं। ईसर और गणगौर की काष्ठ मूर्तियों का जुलूस निकाला जाता है। यह सवारी जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, बीकानेर, कोटा व जैसलमेर में विशेष ठाट बाट के साथ निकाली जाती है। नृत्य एवं संगीत इस अवसर के विशेष आकर्षण होते हैं। इस दौरान ऊँटों एवं घोड़ों की दौड़ भी आयोजित की जाती है। इस सम्बन्ध में एक कहावत कही जाती है- गणगौरियाँ ने ही घोड़ नहीं दौड़ैला तो दौड़ैला कद। उदयपुर में तालाब के बीच नावों पर नृत्य किये जाते हैं। कुंआरी कन्याएं अच्छे दूल्हे की कामना से इस त्यौहार को मनाती हैं। बहिनें माता पार्वती से अपने भाई के लिये अच्छी दुलहन मांगती हैं। इस त्यौहार पर घूमर नृत्य किया जाता है। विवाहित स्त्रियां अपने अखण्ड सौभाग्य की कामना से 15 या 18 दिन तक व्रत करती हैं तथा प्रतिदिन माँ पार्वती की पूजा करती हैं।

    घुड़ला : चैत्र शुक्ला तृतीया को घुड़ले का त्यौहार मनाया जाता है। स्त्रियाँ एकत्रित होकर कुम्हार के घर जाती हैं तथा एक छिद्र युक्त घड़ा लेकर उसमें दिया रखती हैं। इस घड़े को घर घर घुमाया जाता है। बाद में इस घड़े को तालाब में बहा दिया जाता है। इस त्यौहार के पीछे एक ऐतिहासिक घटना है। मारवाड़ के राजा सातलदेव के समय में अजमेर के सूबेदार मल्लूखां का सेनापति घुड़ला खां एक बार मारवाड़ की कन्याओं को उठाकर ले गया। उस दिन चैत्र शुक्ला तृतीया थी तथा कन्याएं गौरी पूजन के लिये गाँव से बाहर तालाब पर आयी हुई थीं। जब सातल देव को यह समाचार मिला तो उसने अपने भाई बीकानेर नरेश बीका तथा मेड़ता नरेश दूदा को भी संदेश भिजवाया। सातल देव के दूसरे भाई भी आ जुटे। इन राठौड़ राजाओं ने घुड़ले खां का पीछा किया और उसे अजमेर पहुंचने से पहले ही धर दबोचा। इस युद्ध में घुड़ले खां मारा गया तथा कन्याएं छुड़ा ली गयीं। घुड़ले खां का सिर काटकर कन्याओं को दे दिया गया। छुड़ा लाया। कन्याओं ने घुड़ले खां का सिर पूरे गाँव में घुमाया। आज भी उसकी स्मृति में घुड़ला घुमाया जाता है। मटकी को घुड़ले खां का सिर माना जाता है तथा उसके छेद घुड़ला खां के सिर के घाव माने जाते हैं। इस अवसर पर कन्याओं द्वारा गाये जाने वाले गीत में कहा जाता है कि मारवाड़ की कन्याएं बेधड़क घूम रही हैं। घुड़लेखां में हिम्मत हो तो उन्हें आकर रोक ले।

    पर्यूषण : यह जैन मतावलंबियों का त्यौहार है जो भाद्रपद माह में मनाया जाता है। इस उत्सव का अंतिम दिन संवत्सरी कहलाता है। इसके दूसरे दिन आश्विन कृष्णा प्रतिपदा को क्षमापणी पर्व मनाया जाता है। इस दिन श्रावक लोग एक दूसरे से क्षमा याचना करते हैं।

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  • अध्याय - 21 भारत में सूफी मत

     02.06.2020
    अध्याय - 21 भारत में सूफी मत

    भारत में सूफी मत


    आराइन (नीची जाति वाले) और सैय्यद (ऊँची जाति वाले) इधर-उधर पैदा होते रहते हैं, परमात्मा को ज़ात की परवाह नहीं। वह ख़ूबसूरतों को परे धकेलता है और बदसूरतों को गले लगता है। अगर तू बाग़-बहार (स्वर्ग) चाहता है तो आराइनों का नौकर बन जा। बुल्ले की ज़ात क्या पूछता है? ऊपर वाले की बनाई दुनिया के लिए शुक्र मना।' - बुल्लेशाह।


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    भारत में इस्लाम के साथ-साथ सूफी मत का भी प्रवेश हुआ। सूफी मत, इस्लाम का एक वर्ग अथवा समुदाय है और उतना ही प्राचीन है जितना कि इस्लाम। सूफी प्रचारक कई वर्गों तथा संघांे में विभक्त थे। उनके अलग-अलग केन्द्र थे। इस्लाम की ही तरह सूफी मत का भी भारत में तीव्र गति से प्रचार हुआ। हिन्दू तथा मुसलमान दोनों ही सूफी सन्तों की ओर आकृष्ट हुए और उनकी शिक्षाओं से प्रभावित हुए।

    सूफी मत का आदि स्रोत

    सूफी मत का आदि स्रोत शामी जातियों की आदिम प्रवृत्तियों में मिलता है। सूफी मत की आधारशिला रति भाव था जिसका पहले-पहल शामी जातियों ने विरोध किया। मूसा और मुहम्मद साहब ने संयत भोग का विधान किया। मूसा ने प्रवृत्ति मार्ग पर जोर देकर लौकिक प्रेम का समर्थन किया। सूफी 'इश्क मजाजी' को 'इश्क हकीकी' की पहली सीढ़ी मानते हैं। सूफी मत पर इस्लाम की गुह्य विद्या, आर्यों के अद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद, नव-अफलातूनी मत एवं विचार स्वातंत्र्य की छाप स्पष्ट है। सूफी मत जीवन का क्रियात्मक धर्म तथा नियम है।

    सूफी मत का अर्थ

    वैराग्ययुक्त साधना द्वारा अल्लाह की उपासना को श्रेयस्कर मानने वाले सूफी कहलाते थे। सूफी मत अथवा ससव्वुफ इन्हीं संतों की देन है। यह एक सम्पूर्ण सांस्कृतिक परम्परा है तथा इसका इतिहास इस्लाम की तरह पुराना है। सूफी शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में विभिन्न मत कहे जाते हैं-

    (1.) सूफी शब्द अरबी भाषा के सफा शब्द से बना है जिसका अर्थ पवित्र तथा शुद्ध होता है। इस प्रकार सूफी ऐसे व्यक्ति को कहते हैं जो मन, वचन एवं कर्म से पवित्र हो।

    (2.) कुछ विद्वानों के अनुसार सूफी शब्द की व्युत्पत्ति सोफिया शब्द से हुई है। सोफिया का अर्थ ज्ञान होता है। अतः सूफी उसे कहते हैं जो ज्ञानी हो।

    (3.) इसकी व्युत्पत्ति सफ शब्द से मानने वालों का मत है कि सफ का अर्थ पंक्ति अथवा प्रथम श्रेणी होता है, अतः सूफी उन पवित्र व्यक्तियों को कहा जाता है जो अल्लाह के प्रिय होने के कारण कयामत के दिन प्रथम पंक्ति में खड़े होंगे।

    (4.) अरबी भाषा में सूफ ऊन को कहते हैं। अतः सूफी शब्द का अर्थ सूफ अर्थात् एक प्रकार के पश्मीने से है। यह लबादा मोटे ऊन का बनता था और अत्यधिक सस्ता होता था। यह सादगी तथा निर्धनता का प्रतीक माना जाता था। पश्चिम एशिया में ऐश्वर्य तथा भौतिक वैभव से परे सादा एवं सरल जीवन-यापन करने वाले संत (इसमें ईसाई भी शामिल थे) इस प्रकार का वस्त्र धारण करते थे। अल्लाह की उपासना में तल्लीन इस्लामी संतों ने भी इसे अपना लिया। वे इसी वस्त्र को धारण करने के कारण पवित्रता, सादगी तथा त्याग के प्रतीक बन गये और सूफी कहलाने लगे।

    (5.) कुछ विद्वानों के अनुसार सूफी मत पैगम्बर मुहम्मद के रहस्यमय विचारों का प्रतिनिधित्व करता है। कुरान शरीफ तथा हदीस में कुछ उल्लेख इसके सम्बन्ध में मिलते हैं। इस प्रकार सूफी मत, इस्लाम के समान ही प्राचीन माना जाता है।

    चिश्तिया सम्प्रदाय एवं उसके प्रमुख सूफी संत

    सूफियों में चिश्तिया सम्प्रदाय सबसे उदार और लोकप्रिय सम्प्रदाय माना जाता है। चिश्ती संप्रदाय के संस्थापक ख्वाजा अबू-इसहाक-शामी चिश्ती, हजरत अली के वंशज थे। खुरासान के चिश्त नगर में रहने के कारण वे चिश्ती कहलाये। चिश्त तथा फीरोजकुह इनके केन्द्र थे जो अधिक समय तक स्थाई न रहे। सूफी दरवेशों के रूप में वहीं से चलकर वे भारत आये। ईराक की राजधानी बगदाद में गौस उल-आजम महबूब सुभानी शेख अब्दुल जिलानी की दरगाह है। वह सूफी सम्प्रदाय का फकीर था।

    इस संप्रदाय के फकीर पैरों में जूते-चप्पल नहीं पहनते थे तथा कपड़ों के स्थान पर मोटा ऊनी लबादा धारण करते थे। इनकी संख्या बहुत कम थी और ये स्थान-स्थान पर घूम कर अल्लाह की आराधना का उपदेश दिया करते थे। मुसलमानों के धर्म गुरु पैगम्बर मुहम्मद सूती लबादा ओढ़ते थे। अतः सूफी फकीरों को ऊनी लबादा ओढ़ने के कारण इस्लाम विरोधी माना जाता था।

    ऊनी लबादा धारण करने की परम्परा ईसाइयों में थी। अनेक सूफियों ने अपने आप को पैगम्बर मुहम्मद द्वारा प्रतिपादित इस्लाम धर्म से अलग माना। ईसाइयों ने भी कोशिश की कि वे सूफी मत को अपनी ओर खींच लंे। इसलिये उन्होंने सूफी फकीरों को मूहन्ना अथवा मसीहा का शिष्य कहना प्रारंभ कर दिया किन्तु इन दोनों मतों में मौलिक अन्तर है।

    मसीहा का मूल मंत्र विराग है जबकि सूफी मत के मूल में प्रेम का निवास है। ईसाई तो सूफी मत को भले ही अपने धर्म में घोषित नहीं कर पाये किन्तु सूफी फकीरों ने ईसाई धर्म में बहुत बड़ा एवं क्रान्तिकारी परिवर्तन कर दिया। वर्तमान के मसीह मत में प्रेम का प्रसार सूफीमत के संसर्ग का परिणाम है।

    मोइनुद्दीन चिश्ती

    गौस उल आजम के शिष्य मोइनुद्दीन का जन्म 1142 ई. में सीस्तान में हुआ था। 1186 ई. में मोइनुद्दीन को अपने गुरु का उत्तराधिकारी चुना गया। उन दिनों अफगानिस्तान में इस्लाम का प्रचार नहीं था। अतः गौस उल आजम ने अपने शिष्यों को आदेश दिया कि वे अफगानिस्तान में जाकर इस्लाम का प्रचार करें। सूफी दरवेश जहाँ भी जाते वहाँ की संस्कृति, भाषा, खान-पान, रीति-रिवाज और सामाजिक परम्पराओं को अपना लेते थे। वे शीघ्र ही पूरे अफगानिस्तान में फैल गये और वहाँ से भारत में आ गये।

    इनमें से मोइनुद्दीन भी एक थे। ई.1191 में मोइनुद्दीन, गौर साम्राज्य की अंतिम सीमा पर स्थित अजमेर आये। उन्होंने फारसी या अरबी में धर्मोपदेश करने के स्थान पर ब्रजभाषा को अपनाया तथा ईश्वर की आराधना में हिन्दू तौर-तरीकों को भी जोड़ लिया। उन्होंने ब्रजभाषा में कव्वाली गाने की प्रथा आरम्भ की।

    शेख निजामुद्दीन औलिया के अनुसार अजमेर नरेश तथा उनके कर्मचारियों ने ख्वाजा के अजमेर प्रवास को स्वयं के लिये तथा राज्य के लिये अनिष्टकारी मानते हुए उन्हें कष्ट देने का प्रयास किया ंिकंतु ख्वाजा की चमत्कारी और अलौकिक शक्ति के फलस्वरूप अंततः पृथ्वीराज चौहान (राय पिथौरा) को मुईजुद्दीन मुहम्मद के हाथों पराजित एवं अपमानित होना पड़ा।

    मोइनुद्दीन चिश्ती की शिक्षाएँ

    मोइनुद्दीन चिश्ती के अनुसार चार वस्तुएं उत्तम होती हैं- प्रथम, वह दरवेश जो अपने आप को दौलतमंद जाहिर करे। द्वितीय वह भूखा, जो अपने आप को तृप्त प्रकट करे। तृतीय वह दुःखी जो अपने आप को प्रसन्न दिखाये और चतुर्थ, वह व्यक्ति जिसे शत्रु भी मित्र परिलक्षित हो। एक अनुश्रुति के अनुसार एक बार एक दरवेश ने ख्वाजा से एक अच्छे फकीर के गुणों पर प्रकाश डालने के लिये विनय की।

    ख्वाजा का मत था कि शरिया के अनुसार पूर्ण विरक्त व्यक्ति अल्लाह के निर्देशों का पालन करता है और उसके द्वारा निषिद्ध कार्य नहीं करता। तरीका एक सच्चे दरवेश के लिये नौ करणीय कार्यों का विवरण देता है। जब ख्वाजा से इन नौ शर्तों की व्याख्या करने की प्रार्थना की तो उन्होंने अपने शिष्य हमीदुद्दीन नागौरी को इनकी व्याख्या करने और समस्त के ज्ञान के लिये लिपिबद्ध करने की आज्ञा दी। शेख हमीदुद्दीन ने फकीर के जीवन के लिये आवश्यक नौ शर्तों का वर्णन इस प्रकार किया है-

    (1.) किसी को धन नहीं कमाना चाहिये।

    (2.) किसी को किसी से धन उधार नहीं लेना चाहिये।

    (3.) सात दिन बीतने पर भी यदि किसी ने कुछ नहीं खाया है तो भी इसे न तो किसी को बताना चाहिये और न किसी से कोई सहायता लेनी चाहिये।

    (4.) यदि किसी के पास प्रभूत मात्रा में भोजन, वस्त्र, रुपये या खाद्यान्न हो तो उसे दूसरे दिन तक भी नहीं रखना चाहिये।

    (5.) किसी को बुरी बात नहीं कहनी चाहिये। यदि किसी ने कष्ट दिया हो तो उसे (कष्ट पाने वाले को) अल्लाह से प्रार्थना करनी चाहिये कि उसके शत्रु को सन्मार्ग दिखाये।

    (6.) यदि कोई अच्छा कार्य करता है तो यह समझना चाहिये कि यह उसके पीर की कृपा है अथवा यह काई दैवी कृपा है।

    (7.) यदि कोई बुरे काम करता है तो उसे उसके लिये स्वयं को दोषी मानना चाहिये और उसे अल्लाह का खौफ होना चाहिये। भविष्य में बुराई से बचना चाहिये। अल्लाह से खौफ करते हुए उसे बुरे कामों की पुनरावृत्ति नहीं करनी चाहिये।

    (8.) इन शर्तों को पूरा करने के बाद दिन में नियमित उपवास रखना चाहिये और रात में अल्लाह की इबादत करनी चाहिये।

    (9.) व्यक्ति को मौन रहना चाहिये ओर जब तक आवश्यक न हो, नहीं बोलना चाहिये। शरिया निरन्तर बोलना और पूर्णतः मौन रहना, अनुचित बताता है। केवल अल्लाह को खुश करने वाले वचन बोलने चाहिये।

    ख्वाजा की रहस्यवादी विचारधारा के अनुसार व्यक्ति की सबसे बड़ी इबादत अनाथों की मदद है। जो लोग अल्लाह की उपासना करना चाहते हैं, उनमें सागर की गम्भीरता, धूप जैसी दयालुता और पृथ्वी जैसी विनम्रता होनी चाहिये। हिन्दू-धर्म और दर्शन का मूल बिन्दु प्रेम है। जब हिंदुओं को उसी प्रेम के दर्शन सूफियों के कलाम में हुए तो उन्होंने अपने हदय की ग्रन्थि को खोल फैंका और वे मोइनुद्दीन में आस्था रखने लगे। मोइनुद्दीन सरल हदय के स्वामी थे।

    वे प्राणी मात्र से प्रेम करने वाले और लोगों का उपकार चाहने वाले थे। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के निधन की कोई निश्चित तिथि नहीं मिलती। कुछ स्रोतों के अनुसार 1227 ई. में 97 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ तथा कुछ अन्य स्रोत उनके निधन की तिथि 1235-36 ई. के आसपास मानते हैं। कुछ विद्वान उनके निधन की तिथि 16 मार्च 1236 बताते हैं।

    बाबा फरीदुद्दीन

    बाबा फरीदुद्दीन दूसरे प्रसिद्ध सूफी संत थे। फरीद का जन्म काबुल के राजवंश में हुआ था। फरीद ने धन-वैभव त्याग कर वैराग्य ले लिया। सतलज नदी के तट पर स्थित एक सड़क जो मुल्तान से दिल्ली आती है बाबा फरीद अपनी कुटिया बनाकर रहने लगे। उनके विचार बड़े ऊँचे थे। उनके उपदेशों से हिन्दू तथा मुसलमान दोनों प्रभावित हुए थे। 1265 ई. में 92 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।

    गेसू दराज

    सूफी संत गेसू दराज भी विख्यात सूफी थे। वे अपने लम्बे बालों के लिये प्रसिद्ध थे। उनका जन्म दिल्ली में हुआ था परन्तु वे दक्षिण भारत चले गये और बहमनी राज्य में स्थायी रूप से निवास करने लगे। गेसू दराज का ज्ञान अत्यन्त व्यापक था। कहा जाता है कि उन्होंने 175 पुस्तकों की रचना की। 1422 ई. में 101 वर्ष की अवस्था में उनका निधन हुआ।

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  • अध्याय - 15 बागोर की हवेली संग्रहालय उदयपुर

     02.06.2020
    अध्याय - 15 बागोर की हवेली संग्रहालय उदयपुर

    अध्याय - 15 बागोर की हवेली संग्रहालय, उदयपुर


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    उदयपुर नगर में पिछोला के किनारे गणगौर घाट पर बागोर की हवेली स्थित है। यह मेवाड़ के बागोर ठिकाने के सामंत की हवेली है। दिसम्बर 1997 में इस हवेली के 18 कमरों में एक संग्रहालय स्थापित किया गया है जिसमें राजपूत जीवन शैली, वेशभूषा, आभूषण, अस्त्र-शस्त्र, उनके मनोरंजन के साधन, तीज-त्यौहार एवं उत्सव आदि की झांकियां प्रस्तुत की गई हैं। साथ ही इस संग्रहालय में मेवाड़ के शूरवीर महाराणाओं की सामाजिक, सांस्कृतिक जीवन शैली को संजोया गया है।

    हवेली के कक्षों की दीवारों पर भित्तिचित्र बने हुए हैं। हवेली के शयन कक्षों में रीति कला (इरोटिक आर्ट) के चित्र बने हैं। अन्य कक्षों में गणगौर की सवारी, पशु-पक्षी एवं युद्ध के दृश्यों का चित्रांकन हुआ है। कलाकृतियों में गजानन की 700 वर्ष पुरानी प्रतिमा दर्शनीय है। संग्रहालय में हस्तशिल्प, कारीगरी, बुनाई, छपाई, रंगाई और पड़कला को प्रदर्शित किया गया है। मेवाड़ के राजपरिवार में प्रयुक्त कुछ आभूषण भी यहाँ प्रदर्शित किए गए हैं।

    शयन कक्ष में कलाकारी युक्त पलंग एवं अन्य प्रसाधन सामग्रियां, बड़े कांच, मदिरा की सुराहियां, प्याले आदि संगृहीत हैं। दरबार हॉल, जनाना कक्ष एवं मर्दाना कक्षों को प्राचीन हस्तकलाओं के नमूनों से सजाया गया है। एक कक्ष में राजस्थान में धारण किए जाने वाले लगभग 50 प्रकार की साफे और पाग-पगड़ियां प्रदर्शित की गई हैं। इस संग्रहालय में महिलाओं के 40 मॉडल रखे गए हैं जिनके माध्यम से राजस्थान की विभिन्न प्रकार की बंधेज, चूनड़ी एवं लहरिया की साड़ियां प्रदर्शित की गई हैं।

    कुंकुम के तिलक के लिए कलात्मक चौपड़े, बाजोट, तोरण, रोड़ी धाम एवं पाटियां आदि कलाकृतियां भी रखी हुई हैं। मांगलिक प्रसंगों, उत्सवों, गुरु आगमनों तथा मंदिर प्रतिष्ठा के अवसरों पर नाटक, ख्याल, तमाशे, नृत्य एवं भवाई किए जाते थे। हवेली में उन अवसरों के दृश्य चित्रित किए गए हैं। लोक चित्रकारी भी प्रदर्शित की गई है। चित्रमय सांप-सीढ़ी में 72 खंड प्रदर्शित किए गए हैं जिनमें चंद्र लोक, सूरजलोक, तपलोक, दिक्पाल लोक आदि प्रमुख हैं।

    बहुरंगी माण्डणों, पलंग के पायों पर राग-रागिनियों के चित्र, दरियों में विभिन्न प्रकार की नृत्य मुद्राएं तथा पशु-पक्षियों की आकृतियां बुनी हुई हैं। गणगौर का मेला, पाड़ीनाथ का मेला, होली, दीपावली, कालाबावजी का मेला, हरियाली अमावस्या का मेला और निर्जला ग्यारस का मेला, फूलडोल का मेला, शीतलामाता का मेला, आदि भी चित्रित किए गए हैं। एक कक्ष बड़ी महारानी का कहलाता है जिसमें धार्मिक वातावरण प्रस्तुत किया गया है।

    भजन-कीर्तन हेतु विविध वाद्ययंत्र, एकलिंगजी, श्रीकृष्ण एवं श्रीराम के चित्र व्यवस्थित रूप से रखे हुए हैं। बागोर की हवेली में पश्चिमी क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र का कार्यालय भी चलता है। इस सांस्कृतिक केन्द्र द्वारा महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात और गोआ दमन एवं दीव में सांस्कृतिक गतिविधियां चलाई जाती हैं।

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  • युग निर्माता महाराजा सूरजमल- 1

     02.06.2020
    युग निर्माता महाराजा सूरजमल- 1

    प्राक्कथन


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    महाराजा सूरजमल अठारहवीं सदी के भारत का निर्माण करने के लिये उत्तरदायी प्रमुख व्यक्तियों में से एक थे। उनका जन्म ऐसे समय में हुआ जब उत्तर भारत की राजनीति जबर्दस्त हिचकोले खा रही थी तथा देश विनाशकारी शक्तियों द्वारा जकड़ लिया गया था। नादिरशाह तथा अहमदशाह अब्दाली ने उत्तर भारत में बहुत बड़ी संख्या में मनुष्यों तथा गायों को मार डाला और तीर्थों तथा मंदिरों को नष्ट कर दिया। देश पर चढ़कर आने वाले आक्रांताओं को रोकने वाला कोई नहीं था। श्रीविहीन हो चुके मुगल, न तो दिल्ली का तख्त छोड़ते थे और न अफगानिस्तान से आने वाले आक्रांताओं को रोक पाते थे।

    उस काल में उत्तर भारत के शक्तिशाली राजपूत राज्य, मराठों की दाढ़ में पिसकर छटपटा रहे थे। मराठे स्वयं भी नेतृत्व की लड़ाई में उलझे हुए थे। होलकर, सिंधिया, गायकवाड़ और भौंसले, उत्तर भारत के गांवों को नौंच-नौंच कर खा रहे थे। जब एक मराठा सरदार चौथ और सरदेशमुखी लेकर जा चुका होता था तब दूसरा आ धमकता था। बड़े-बड़े महाराजाओं से लेकर छोटे जमींदारों की बुरी स्थिति थी। जाट और मराठे निर्भय होकर भारत की राजधानी दिल्ली के महलों को लूटते थे। जब शासकों की यह दुर्दशा थी तब जन-साधारण की रक्षा भला कौन करता! भारत की आत्मा करुण क्रंदन कर रही थी।

    चोरों ओर मची लूट-खसोट के कारण जन-जीवन की प्रत्येक गतिविधि- कृषि, पशुपालन, कुटीर धंधे, व्यापार, शिक्षण, यजन एवं दान ठप्प हो चुके थे। शिल्पकारों, संगीतकारों, चित्रकारों, नृतकों और विविध कलाओं की आराधना करने वाले कलाकार भिखारी होकर गलियों में भीख मांगते फिरते थे। निर्धनों, असहायों, बीमारों, वृद्धों, स्त्रियों और बच्चों की सुधि लेने वाला कोई नहीं था। ऐसे घनघोर तिमिर में महाराजा सूरजमल का जन्म उत्तर भारत के इतिहास की एक अद्भुत घटना थी।

    उन्होंने राजनीति में विश्वास और वचनबद्धता को पुनर्जीवित किया। हजारों शिल्पियों एवं श्रमिकों को काम उपलब्ध कराया। ब्रजभूमि को उसका क्षीण हो चुका गौरव लौटाया। गंगा-यमुना के हरे-भरे क्षेत्रों से रूहेलों, बलूचों तथा अफगानियों का खदेड़कर किसानों को उनकी धरती वापस दिलवाई तथा हर तरह से उजड़ चुकी बृज भूमि को धान के कटोरे में बदल लिया। उन्होंने मुगलों और दुर्दान्त विदेशी आक्रान्ताओं को भारतीय शक्ति से परिचय कराया तथा अपने पिता की छोटी सी जागीर को न केवल भरतपुर, मथुरा, बल्लभगढ़ और आगरा तक विस्तृत किया अपितु चम्बल से लेकर यमुना तक के विशाल क्षेत्रों का स्वामी बन कर प्रजा को अभयदान दिया।

    इस लघु पुस्तिका में महाराजा सूरजमल के उसी अवदान को भारत की युवा पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है। आशा है यह पुस्तक आज की युवा पीढ़ी को महाराजा सूरजमल की विमल कीर्ति का ज्ञान कराने और विषम से विषम परिस्थितियों में धैर्य न खोकर अपना मार्ग ढूंढ लेने के लिये प्रेरित करेगी। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में लिखा है- 'नहीं असत सम पातक पुंजा।’राजा सूरजमल ने कभी सत्य का साथ नहीं छोड़ा। उनके जीवन चरित्र से प्रत्येक व्यक्ति को प्रेरणा लेने की आवश्यकता है।

    आज जिन लोगों के कंधों पर देश को चलाने की जिम्मेदारी है, उनके लिये भी महाराजा सूरजमल प्रेरणा के स्रोत सिद्ध हो सकते हैं जिन्होंने विपत्ति में पड़े अपने शत्रुओं को शरण देने और सार्वजनिक जीवन में शुचिता को कभी न त्यागने का काम जीवन भर पूरी दृढ़ता से किया। आज यदि भारत को अपना पुनरुत्थान करना है तो देश के कर्णधारों को महाराजा सूरजमल की तरह निजी जीवन एवं सार्वजनिक जीवन में शुचिता एवं ईमानदारी का समावेश करना आवश्यक है।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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