Blogs Home / Blogs / /
  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-40

     19.05.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-40

    पर्यावरण की रक्षक कला-साधक जातियाँ


    राजस्थान में निवास करने वाली सैंकड़ों जातियाँ विगत हजारों वर्षों से विभिन्न प्रकार की कलाओं के प्रदर्शन को आजीविका का साधन बनाकर, अपना पेट भरती आ रही हैं। कृषि एवं प्राकृतिक संसाधनों पर बंटवारे का दबाव कम करने के लिये ये लोग गायन, वादन एवं नृत्य जैसी प्रदर्शनकारी कलाओं की साधना करने लगे। बहुतों ने पाबूजी और देवनारायणजी की पड़ सुनाने, कठपुतलियों के खेल दिखाने तथा ख्याल एवं रम्मत जैसी चाक्षुष कलाओं को आजीविका का अधार बना लिया। बहुत से लोग बहरूपिये बनकर लोगों का मनोरंजन करते और अपना पेट भरते रहे ताकि प्राकृतिक संसाधनों का बंटवारा न हो। कालबेलियों ने बीन बजाकर सर्प का प्रदर्शन करने और उनकी औरतों ने नृत्य करने के व्यवसाय को अपनाया। लंगा, मांगणियार, कालबेलिया, बंजारा, भाट, बहरूपिया, भाण्ड, जोगी, कंजर, दमामी, ढोली आदि जातियां, खेती नहीं करतीं। इन कला साधकों द्वारा वस्तु एवं सेवा के रूप में कुछ भी उत्पादित नहीं किया जाता किंतु वे लोगों का मनोरंजन करके अपना पेट भरते हैं। प्रकृति के संसाधनों पर अपना अधिकार नहीं जताते। यह उनकी तरफ से राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति को बहुत बड़ी देन है। कुछ प्रमुख गायक जातियों का विवरण इस प्रकार से है-

    कलावंत : अपने हुनर में निष्णात को कलावंत कहा गया है जिसका तात्पर्य निपुण गायक और वादक से है। संगीत सम्राट तानसेन से रिश्ता जोड़ने वाले कलावंतों में गौड़ ब्राह्मण और चौहान राजपूत मुख्य हैं जो मुसलमान बनाये जाने से पूर्व, मंदिरों में कीर्तन किया करते थे। कलावंतों में आज भी कुछ कलाकार अपने नाम के आगे 'सेन' तथा कुछ 'खां' लगाते हैं।

    ढाढी : राजस्थान में ढाढी जाति के लोग भी गा-बजाकर अपना जीवन यापन करते आये हैं। गायन में ये सारंगी का सहारा लेते हैं। इन कलाकारों में हिंदू व मुसलमान दोनों हैं। इनकी उत्त्पत्ति राजपूतों से मानी गयी है। मुसलमान कलाकार भी हिंदू रीति-रिवाजों को मानते हैं। मध्यकाल में ये लोग युद्ध भूमि में जाकर वहाँ जोशीले गीत गाया करते थे और शूरवीरों की प्रशंसा किया करते थे। ढाढी अपने यजमानों की वंशावलियों को याद करके उनकी प्रशंसा में गीत गाया करते हैं। राज्य के जैसलमेर-बाड़मेर जिलों में इनकी संख्या अधिक है। इनकी स्त्रियां भी गाती हैं मगर नाचती नहीं हैं। रेतीले इलाकों में रहने वाले इन कलाकारों के स्वर हर किसी को अपनी ओर खींचते हैं। पश्चिमी राजस्थान के ये कलाकार नमाज पढ़ते हैं तथा हिंदू देवी-देवताओं को भी मानते हैं। ये कलाकार कमायचा, खड़ताल, सुरणई आदि लोकवाद्य बजाते हैं।

    मिरासी : पेशेवर गायकों में मिरासियों का अलग स्थान है। इनके बारे में दो मत मिलते हैं। पहले मत के अनुसार इनके पूर्वज गौड़ ब्राह्मण थे किंतु अब ज्यादातर सुन्नी मुसलमान हैं। दूसरे मत के अनुसार इनका सम्बन्ध अरब के मिरास नामक नगर से है। इन्हें मांगणहार भी कहते हैं। ये लोग, लोक गायन और कविता से जुड़े हुए हैं। सारंगी इनका मुख्य वाद्य है। ये कलाकार, पीढ़ी दर पीढ़ी गाना-बजाना ही करते आये हैं। मारवाड़ क्षेत्र में इन कलाकारों की बहुलता है। भाटों की तरह ये भी वंशावली का बखान करते हैं। मिरासियों में नक्कारची, ताशे वाले और शहनाई वादक भी हैं। बनिये, ब्राह्मण, मेवाती, राजपूत, डांगी, पठान, सैयद, मुगल, खान आदि इनके यजमान हैं। सामंती दौर में कुछ ठिकाणों में मिरासियों को जागीरें भी बख्शी गयीं। सारंगी के साथ-साथ ये कमायचा, खड़ताल, भपंग, घड़ा तथा सुरमण्डल भी बजाते हैं। मिरासी पुरुष दस फुट लम्बे कपड़े का साफा बांधते हैं। स्त्रियां घाघरा, कुरती, कांचली पहनती हैं और ओढ़नी ओढ़ती हैं।

    ढोली : ढोल बजाने के कारण ये कलाकार ढोली कहलाते हैं। इन्हें दमामी और जावड़ भी कहते हैं। ये अपनी उत्त्पत्ति गंधर्वों से मानते हैं और राजपूतों के रीति रिवाज मानते हैं। रजवाड़ों में ढोलणों के गाने-बजाने के अनेक किस्से आज भी मशहूर हैं। मध्यकाल में कुछ ढोली मुसलमान बन गये। पेशेवर कलाकारों में ढोलियों का विशेष स्थान है। इनकी स्त्रियां नाचने-गाने में विशेष स्थान रखती हैं। ढोली मृदुभाषी और चातुर्य पूर्ण बात कहने में दक्ष होते हैं। ये लोग विभिन्न राजपूत कुलों से अपना सम्बन्ध जोड़ते हैं जिनमें चौहान, परिहार, देवड़ा और राठौड़ प्रमुख हैं। मारवाड़ के डांगी राठौड़ वंश से निकले हैं। मुसलमान ढोली इन्हीं डांगी लोगों की संतान हैं जो सुन्नी हैं।

    रावल : यह जाति चारणों को अपना यजमान मानती है। ये लोग गा-बजाकर अपनी आजीविका चलाते हैं तथा खेल-तमाशे करके भी जन सामान्य का मनोरंजन करते हैं। लोक नाट्य परम्परा में रावल कलाकारों का विशिष्ट स्थान है।

    डोम (डूम) : मारवाड़ के डोम मिरासियों के समान ही हैं। इनके रीति रिवाज भी मिरासियों की तरह ही हैं।

    राणा : रण में नगाड़ा बजाने वाले ही कालांतर में 'राणा' कहलाने लगे। ये कलाकार नगाड़ा बजाने में तो सिद्धहस्त हैं ही, गायन के क्षेत्र में भी इन्होंने अपना सिक्का जमाया है। 'राणा' भी राजपूतों के रीति-रिवाज अपनाते हैं। राणा जाति के कलाकार शहनाई भी बजाते हैं।

    लंगा : राज्य के मरुस्थलीय जिलों- जैसलमेर, बाड़मेर तथा जोधपुर में निवास करने वाले लंगा कलाकार, सम्पूर्ण विश्व में अपनी गायकी की छाप छोड़ चुके हैं। इनकी भाषा सिन्धी एवं उर्दू मिश्रित राजस्थानी है। ये चौहान राजपूतों के वाचक हैं। इन कलाकारों को संगीत विरासत में मिला है। इनकी गायकी में शास्त्रीय संगीत का ताना-बाना है। यही कारण है कि लंगों की गायकी देश विदेश में पसंद की जाती है। सारंगी इनका प्रमुख वाद्य है। ये खड़ताल, अलगोजा, सुरंदा, ढोलक, सुरनई, मोरचंग, नड़, पावा, मुरली और पुंगी भी बजाते हैं। स्वरों का सहज उतार-चढ़ाव और ताल की गूढ़ शिक्षा इन कलाकारों की धरोहर है। लंगा फकीरों में राणका फकीर सुषिर वाद्य बजाने के लिये विख्यात हैं। लंगा पुरुष अजरख, पोतिया कमीज तथा तेमल की तरह का सफेट टहटा पहनते हैं। स्त्रियां बूंद (घाघरा), रेहटा (चूंदड़ी) तथा कांचली पहनती हैं।

    भोपा : राजस्थान में भोपों की कई श्रेणियां हैं। भोपे देवी-देवताओं की स्तुति गा-बजाकर ही करते हैं। माताजी, भैंरूजी, गोगाजी, पाबूजी, देबूजी, हड़बूजी आदि के भोपे पड़ गायन ही करते हैं। रावण हत्था इनका प्रमुख लोकवाद्य है। भोपी का सधा हुआ ऊँचा स्वर भोपे की शान है। रामदेवजी के भोपे तंदूरे बजाते हैं। भैंरूजी के भोपे कमर में घुंघरू बांधकर तथा हंटर से अपने ऊपर वार करते हैं। कोई-कोई मशक बजाकर गाते हैं।

    सांसी-कंजर : इन जातियों का व्यवस्थित जीवन नहीं होता किंतु गाना-बजाना इनके दैनिक जीवन का अंग है। इनकी स्त्रियां नाचती हैं। यह जाति अजमेर जिले में बड़ी संख्या में निवास करती है। हाड़ौती क्षेत्र की कंजर बालायें चकरी नृत्य करती हैं जो आज एक लोकप्रिय नृत्य बन गया है।

    जोगी : बीकानेर, जोधपुर, अलवर तथा शेखावाटी क्षेत्र में जोगी जाति के कलाकार प्रमुख रूप से पाये जाते हैं। ये नाथ संप्रदाय को मानते हैं। मुसलमान संप्रदाय के जोगी कलाकार भी नाथ पंथ को मानते हैं। अलवर क्षेत्र के जोगी और मिरासी भृर्तहरि, शिवजी का ब्यावला और पंडून का कड़ा गायन में अपना सानी नहीं रखते।

    भवई : भाव करे सो भवईं भवई जाति के कलाकार घूम-घूम कर अपने यजमानों का मनोरंजन करते हैं। भवई स्वांग भी करते हैं। भवई कलाकार अनेक करतब करके दर्शकों का मनोरंजन करते हैं। आज जो भवई नृत्य देखते हैं वह इस कला का अंश भर है। भवई कलाकार अने करतब दिखाने में सक्षम हैं। वे बांधजी और बीकाजी की नाटिकायें भक करते हैं।

    आदिवासी : उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, सिरोही तथा आबू आदि पहाड़ी क्षेत्रों में भील, मीणा, गरासिया, सहारिया आदि जन जातियाँ निवास करती हैं। इनके संगीत ने आदिम अवस्था से निकलकर अभी दो चार डग ही धरे हैं। गीतों के साथ मादल बजती है तथा स्त्री पुरुष सम्मिलित होकर नृत्य करते हैं। पटेल्या, बीछियो, लालर आदि इनके प्रमुख लोकगीत हैं।

    मारवाड़ा भील : रेगिस्तान के मारवाड़ा भीलों के लोकदेवता पाबूजी हैं। ये रावण हत्थे पर पाबूजी की पड़ गाते हैं तथा तन्मय होकर नृत्य करते हैं। इनके नृत्यों एवं गीतों के प्रमुख विषय वीरता, प्रेम और भक्ति है। ये ढोल बजाने में भी कुशल होते हैं।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थानी साहित्य

     23.12.2021
    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थानी साहित्य

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी - 212

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थानी साहित्य

    राजस्थानी भाषा में ई.788 में जालोर में उद्योतन सूरि द्वारा रचित ‘कुवलयमाला’ (प्राकृत ग्रंथ) से लेकर, 12वीं शताब्दी ईस्वी में सिरोही में सिंह कवि द्वारा रचित ‘पज्जुन्न कहा’ (अपभ्रंश ग्रंथ), 15वीं शताब्दी में श्रीधर व्यास द्वारा रचित ‘रणमल्ल छंद’ (प्राचीन राजस्थानी ग्रंथ) आदि समस्त महत्वपूर्ण रचनाएं पद्य विद्या में हैं। राजस्थानी साहित्य में 13वीं शताब्दी में गद्य का विकास हुआ। अपभ्रंश में गद्य का प्रायः अभाव है। ई.1273 में राजस्थानी गद्य की एक छोटी सी टिप्पणी मूलक रचना ‘आराधना’ शीर्षक से मिलती है तथा इसके बाद संग्रामसिंह रचित बालशिक्षा, जैन लेखकों की नवकार व्याख्यान, सर्वतीर्थ नमस्कार स्तवन, अतिचार आदि छोटी-छोटी गद्य रचनाएं मिलती हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि आचार्य तरुणप्रभ सूरि रचित ‘षड़ावकबाळावबोध’ राजस्थानी भाषा की पहली प्रौढ़ गद्य रचना है। किसी चारण कवि की पहली स्वतंत्र राजस्थानी गद्य-पद्य रचना ‘अचलदास खीची री वचनिका’ के रूप में प्रकट हुई। इसे चारण कवि शिवदास गाडण ने ई.1415 के लगभग लिखा था और यह गद्य-पद्य मिश्रित रचना थी। राजस्थानी साहित्य का परिचय

    1. प्रश्न -विधा की दृष्टि से राजस्थानी साहित्य को कितने वर्गों में बांटा जा सकता है?

    उतर- दो भागों में- (1) पद्य साहित्य एवं (2) गद्य साहित्य।

    2. प्रश्न -रचनाकारों की दृष्टि से राजस्थानी साहित्य को कितने वर्गों में बांटा जा सकता है?

    उतर- पांच भागों में- (1) चारण साहित्य,

    (2) जैन साहित्य,

    (3) संत साहित्य,

    (4) ब्राह्मण साहित्य तथा

    (5) लोक साहित्य।

    3. प्रश्न - चारण साहित्य को चारण साहित्य किसेलिये कहते हैं?

    उतर- सामान्यतः चारण कवियों द्वारा लिखित होने से इसे चारण साहित्य कहते हैं किंतु भाट, ढाढ़ी आदि अन्य विरुद जातियों के लेखकों द्वारा लिखा गया साहित्य भी शैली की समानता के कारण इस श्रेणी में आता है।

    4. प्रश्न - चारण साहित्य में किस रस की प्रधानता है?

    उतर- चारण साहित्य मुख्यतः वीर रसात्मक है।शंगाररस वीर रस का सहचर होने के कारण चारण साहित्य में स्वतः ही महत्त्वपूर्ण स्थान पा गया है। भक्ति रस और शांत रस भी चारण साहित्य में प्रचुरता से मिलता है।

    5. प्रश्न - चारण साहित्य किन विधाओं में लिखा गया है?

    उतर- यह साहित्य प्रबंध काव्यों, गीतों, दोहों, सोरठों, दोहों, कुण्डलियों, छप्पयों, सवैयों आदि छन्दों में उपलब्ध है।

    6. प्रश्न - चारण साहित्य के मुख्य ग्रंथ कौनसे हैं?

    उतर- जइतसी रऊ छंद, अचलदास खींची री वचनिका, पृथ्वीराज रासो, सूरज प्रकाश, वंश भास्कर, बांकीदास ग्रंथावली आदि

    7. प्रश्न - किस ग्रंथ को हिंदी एवं प्राचीन राजस्थानी दोनों ही भाषाओं का पहला महाकाव्य कहा जाता है?

    उतर- पृथ्वीराज रासो को।

    8. प्रश्न - जैन साहित्य किसे कहते हैं?

    उतर- जैन मुनियों द्वारा लिखित साहित्य जैन साहित्य के अंतर्गत आता है।

    9. प्रश्न - राजस्थानी का प्राचनीतम ग्रंथ कौनसा है?

    उतर- वज्रसेन सूरि रचित ‘भरतेश्वर बाहुबलि घोर’। यह वीर रस एवं शांत रस का 46 पदों का लघु ग्रंथ है।

    10. प्रश्न - किस ग्रंथ को जैन परम्परा का सबसे प्राचीन ग्रंथ होने का गौरव प्राप्त है?

    उतर- आयारो को सबसे प्राचीन जैन ग्रंथ माना जाता है।

    11. प्रश्न - बारहवीं शताब्दी में रचित प्राचीन राजस्थानी की प्रमुख जैन रचना कौनसी है?

    उतर- संवत् 1241 (ई.1184) में शालिचंद्र सूरि कृत ‘भरतेश्वर बाहुबलिरास’ प्राचीन राजस्थानी का महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है।

    12. प्रश्न - तेरहवीं शती में लिखित प्रमुख जैन ग्रंथ कौनसे हैं?

    उतर- बुद्धिरास, जंबूस्वामी चरित, स्थूलिभद्र रास, रेवंतगिरि रासो, आब रास, जीवदया रासु तथा चंदनबाला रास आदि।

    13. प्रश्न - राजस्थान का संत साहित्य प्रमुखतः किन संतों द्वारा रचा गया?

    उतर- वैष्णव भक्तों, दादू पंथियों तथा राम स्नेही साधुओं द्वारा।

    14. प्रश्न - संत साहित्य का प्रमुख आधार क्या है?

    उतर- भक्ति, अध्यात्म, नीति एवं तत्व विवेचन।

    15. प्रश्न - मीरांबाई किस की पुत्री थीं?

    उतर- मेड़ता के राव दूदा के बेटे रतनसिंह की पुत्री थीं।

    16. प्रश्न - मीरांबाई का विवाह किससे हुआ था?

    उतर- मेवाड़ के राणा सांगा के बेटे भोजराज से।

    17. प्रश्न - मीरांबाई ने कौनसी रचनाएं लिखीं?

    उतर- मीरां बाई ने कृष्ण भक्ति को समर्पित हजारों पद लिखे।

    18. प्रश्न - मीरांबाई की रचनाओं में किन भाषाओं का प्रयोग हुआ है?

    उतर- हिंदी, डिंगल, पिंगल, ब्रज, संस्कृत, सधुक्कड़ी मिश्रित भाषाओं का।

    19. प्रश्न - महाकवि वृद का जन्म कब एवं कहाँ हुआ?

    उतर- संवत 1700 (ई.1643) में मेड़ता में हुआ।

    20. प्रश्न - कविवृद की प्रमुख रचनाएं कौनसी हैं?

    उतर- वृंद सतसई, यमक सतसई, भाव पंचाशिका, शृगार शिक्षा, वचनिका, सत्य स्वरूप, पवन पचीसी, समेत सिखर छंद, हितोपदेशाष्टक, भारतकथा, हितोपदेश आदि। वृंद के दोहे बहुत प्रसिद्ध हैं।

    21. प्रश्न - कविवृद की रचनाओं में किन भाषाओं का प्रयोग हुआ है?

    उतर- डिंगल एवं पिंगल भाषाओं का।

    22. प्रश्न - नाभादास किसके शिष्य थे?

    उतर- अग्रदास के।

    23. प्रश्न - नाभादास की प्रमुख रचनाएं कौनसी हैं?

    उतर- भक्तमाल, अष्टयाम और रामचरित्र आदि।

    24. प्रश्न - नाभादास का कौनसा ग्रंथ वैष्णव भक्तों के जीवन चरित्र पर प्रकाश डालता है?

    उतर- भक्त माल।

    25. प्रश्न - राजस्थान में पीथल के नामसे कौनसा कवि प्रसिद्ध हुआ?

    उतर- बीकानेर नरेश रायसिंह के अनुज तथा अकबर के दरबारी कवि पृथ्वीराज राठौड़ को पीथल के नाम से प्रसिद्धि मिली।

    26. प्रश्न - पीथल का जन्म कब हुआ?

    उतर- पृथ्वीराज का जन्म सं.1606 (ई.1549) में बीकानेर में हुआ।

    27. प्रश्न - पृथ्वीराज राठौड़ ने किन ग्रंथों की रचना की?

    उतर- वेलि क्रिसन रुकमणी री, ठाकुर जी रा दूहा, गंगाजी रा दूहा, दसम आगवत रा दूहा, फुटकर पद, गीत आदि।

    28. प्रश्न - किस ग्रंथ को राजस्थानी भाषा का सर्वोत्कृष्ट ग्रंथ माना जाता है?

    उतर- वेलि क्रिसन रुकमणी री।

    29. प्रश्न - ‘वेलि क्रिसन रुकमणी री’ में कौनसी साहित्यिक परम्पराओं का निर्वहन किया गया है?

    उतर- नख-शिख वर्णन, षड्ऋतु वर्णन तथा वयः संधि वर्णन आदि।

    30. प्रश्न - किस भाषाविद् ने पृथ्वीराज राठौड़ को डिंगल का ‘होरेस’ कहा है?

    उतर- टैस्सिटोरी ने।

    31. प्रश्न - किस इतिहास लेखक ने कहा कि पीथल के काव्य में दस सहस्र घोड़ों का बल है?

    उतर- कर्नल टॉड ने।

    32. प्रश्न - किस साहित्यकार ने ‘वेलि क्रिसन रुकमणी री’ को पाँचवा वेद कहा है?

    उतर- दुरसा आढ़ा ने।

    33. प्रश्न - वैष्णव भक्तों के किस प्रसिद्ध ग्रंथ में पृथ्वीराज राठौड़ की गणना भक्तों में की गई है?

    उतर- नाभादास ने इनकी गणना भक्तमाल में की है।

    34. प्रश्न - पृथ्वीराज राठौड़ ने महाराणा प्रताप को क्या सलाह दी?

    उतर- महाराणा प्रताप ने प्रजा को कष्ट पाते देखकर अकबर से मित्रता करनी चाही तो पीथल ने उन्हें कहलवाया कि ईश्वर की इच्छा के अधीन रहें, म्लेच्छ राजा से मित्रता न करें अन्यथा हिन्दुत्व का सूर्य सदैव के लिये नष्ट हो जायेगा। प्रताप ने पीथल का पत्र पाकर अकबर से मित्रता का विचार त्याग दिया।

    35. प्रश्न - पृथ्वीराज राठौड़ की कौनसी रानी कलामर्मज्ञ थी?

    उतर- पृथ्वीराज राठौड़ की रानी चंपादे परम सुंदरी एवं कला मर्मज्ञ थी।

    36. प्रश्न - सुंदर कुंवरि कौन थीं?

    उतर- किशनगढ़ के राजा राजसिंह की पुत्री सुंदर कुंवरि का जन्म संवत् 1791 में किशनगढ़ में हुआ।

    37. प्रश्न - सुंदर कुंवरि की प्रमुख रचनाएं कौनसी हैं?

    उतर- नेह निधि, वृंदावन गोपी माहात्म्य, संकेत युगल, रंगझर, गोपी माहात्म्य, रस पुंज, प्रेम संपुट, सार संग्रह, भावना प्रकाश, राम रहस्य, पद आदि।

    38. प्रश्न - सुंदरदास किस पंथ के रचनाकार हैं?

    उतर- दादूपंथ के।

    39. प्रश्न - सुंदरदास की रचनाओं की क्या विशेषता है?

    उतर- सुंदरदास ने दादू पंथ के दार्शनिक सिद्धांतों को ज्ञानमार्गी पद्वति में पद्यबद्ध किया।

    40. प्रश्न - सुंदरदास का स्मारक कहाँ बना हुआ है?

    उतर- दौसा जिले के गेटोलाव में दादूदयाल का मंदिर एवं सुंदरदास का स्मारक बना हुआ है।

    41. प्रश्न - विश्नोई संप्रदाय के प्रवर्तक जांभोजी ने किस विधा में रचनाएं लिखीं?

    उतर- जांभोजी ने विपुल संत साहित्य की रचना की। ये रचनाएं पद्य में हैं।

    42. प्रश्न - लोक साहित्य किसे कहते हैं?

    उतर- जिस रचना के लेखक का पता नहीं हो और जो लिखित अथवा अलिखित रूप से दीर्घकाल से समाज में प्रचलित हो, उसे लोक साहित्य कहते हैं।

    43. प्रश्न - लोक साहित्य किन रूपों में उपलब्ध है?

    उतर- लोक गीत, लोक कथा, लोकोक्ति तथा लोक नाट्य आदि।

    44. प्रश्न - लोक गीत किन अवसरों पर गाये जाते हैं?

    उतर- तीज, त्यौहार, विवाह, जन्म, देव पूजन, मेले एवं लोकनृत्यों के आयोजन के साथ।


  • Share On Social Media:
  • अध्याय - 4 राजस्थान में संग्रहालयों की स्थापना का इतिहास

     02.06.2020
    अध्याय - 4 राजस्थान में संग्रहालयों की  स्थापना का इतिहास

    अध्याय - 4 राजस्थान में संग्रहालयों की स्थापना का इतिहास


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राजस्थान में पुराप्रस्तर युगों से लेकर आधुनिक काल तक विकसित मानव सभ्यताओं की गाथा नदी घाटियों, पर्वतीय उपत्यकाओं एवं रेतीले धोरों में दबी हुई है। इसे पहचानना, खोजना, उसकी कालावधि का निर्धारिण करना, संग्रहण करना तथा दर्शकों तक उसकी पहुंच बनाना अत्यंत दुष्कर कार्य है। यह समस्त सामग्री राजस्थान में मनुष्य के उद्भव से लेकर सभ्य बनने तक का इतिहास कहती है जो उस काल में लिखित रूप में नहीं मिलता है। उस इतिहास के साक्ष्य उस काल के खेतों, कुओं, चूल्हों, घरों के अवशेषों एवं शवाधानों के साथ-साथ बर्तनों, आभूषणों, मणकों, मूर्तियों, कंकालों आदि के रूप में मिलते हैं। मानव सभ्यताओं की इससे आगे की गाथा शिलालेखों, सिक्कों, मुद्राओं, वस्त्रों, कीर्ति-स्तम्भों, दुर्गों, महलों, हवेलियों, मंदिरों, मूर्तियों, जलाशयों, कलात्मक कुओं, बावड़ियों, ताल-तलैयों, सर-सरोवरों, समाधियों, छतरियों, अभिलेखों, आदि के रूप में मिलती है। यह सब सामग्री हमारी सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा है। इस विरासत में बहुत सी ऐसी है जिसे संग्रहालयों तक नहीं लाया जा सकता है किंतु बहुत सी सामग्री ऐसी भी है जिसे संग्रहालयों तक लाया जा सकता है और किसी विशिष्ट क्रम एवं विधि में प्रदर्शित कर मानव इतिहास को उसकी निरंतरता के साथ देखा, समझा एवं परखा जा सकता है।


    राजपूताना की देशी रियासातें में अपने राजवंश एवं राज्य की ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण एवं प्रदर्शन का विचार उन्नीसवीं सदी में विकसित होने लगा था। यही कारण है कि राजस्थान निर्माण के पूर्व ही राजपूताना की विभिन्न रियासतों में दस संग्रहालय स्थापित हो गए थे। संग्रहालयों की स्थापना के क्रम में सर्वप्रथम ई.1870 के आसपास उदयपुर में संग्रहालय की स्थापना का काम आरम्भ हुआ किंतु राजपूताना में प्रथम संग्रहालय की विधिवत् स्थाना का श्रेय जयपुर को जाता है। जयपुर में प्रथम संग्रहालय की नींव का पत्थर महाराजा सवाई रामसिंह (द्वितीय) (ई.1835-80) के शासनकाल में ई.1876 में प्रिंस एलबर्ट ने रखा और उसी के नाम पर इस संग्रहालय का नाम एलबर्ट म्यूजियम रखा गया। ई.1881 में जयपुर संग्रहालय का संग्रह अस्थायी रूप से किशनपोल बाजार में स्थित स्कूल आफ आर्ट में लाया गया और महाराजा माधोसिंह (ई.1880-1922) के शासनकाल में ई.1886 में इसे वर्तमान संग्रहालय में स्थानान्तरित कर दिया गया। ई.1887 में सर एडवर्ड बेडफोर्ड ने इसका उद्घाटन कर विधिवत् रूप से इसे जनता के लिए खोल दिया। प्रदेश स्तर के इस संग्रहालय मे राजस्थान के जन-जीवन और शिल्प कौशल की जानकारी मिलती है।

    मेवाड़ में महाराणा फतहसिंह (ई.1884-1930) के शासनकाल में संग्रहालय स्थापित करने का निर्णय लिया गया। इसके लिए गुलाब बाग (उदयपुर) में एक भव्य भवन का निर्माण किया गया। इस भवन निर्माण का निर्णय महारानी विक्टोरिया सिल्वर जुबली समारोह के दौरान लिया गया था। भवन निर्माण का कार्य पूर्ण हो जाने पर इसका नाम विक्टोरिया हॉल म्यूजियम रखा गया और ई.1890 में तत्कालीन वायसराय लार्ड लेंसडाउन द्वारा इसका उद्घाटन किया गया।

    लार्ड कर्जन के समय संग्रहालयों की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किए गए। संग्रहालयों को समुचित एवं व्यवस्थित स्वरूप प्रदान करने के लिए ई.1902 में सर जॉन मार्शल को आर्कियोलॉजीकल सर्वे आफ इण्डिया का डायरेक्टर जनरल नियुक्त किया गया। संग्रहालयों की परिकल्पना को मूर्तरूप देने के लिए पहली बार भारतीय विद्वानों की सेवाएं ली गईं और भारतीय संस्कृति एवं पुरासम्पदा की खोज कर उनके संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया गया। गौरीशंकर हीराचन्द ओझा आदि विद्वानों के सक्रिय सहयोग एवं उनके द्वारा किए गए सर्वेक्षण से एकत्र पुरासम्पदा के फलस्वरूप अजमेर के ऐतिहासिक दुर्ग अकबर का किला में राजपूताना म्यूजियम की स्थापना की गई। ई.1908 में राजपूताना के गर्वनर जनरल के एजेन्ट सर इलियट ग्राहम कोल्विन द्वारा इसका विधिवत् रूप से उद्घाटन किया गया। ओझाजी को राजपूताना म्यूजियम का प्रथम अध्यक्ष बनाया गया। ओझा अैर उसके सुयोग्य उत्तराधिकारी यू. सी. आाचार्य द्वारा विभिन्न स्थानों का विस्तृत सर्वेक्षण किया गया। पुरासामग्री का संकलन किया गया। आर. भण्डारकर द्वारा किए गए उत्खनन कार्य से नगरी (चित्तौड़गढ़) से शुंग और कुषाणकालीन टेराकोटाज, सरवानिया (बांसवाड़ा) से क्षत्रप सिक्कों का भण्डार तथा अढाई दिन के झौंपड़े से उत्कीर्ण पाषाण खण्ड प्राप्त किए गए और आगे भी संग्रहालय को समृद्ध करने के प्रयत्न जारी रहे।

    जोधपुर में ई.1909 में संग्रहालय की स्थापना की गई। ई.1914 में पंडित विश्वेश्वर नाथ रेऊ संग्रहालय के सहायक अधीक्षक बने और उनके निर्देशन एवं सहयोग से संग्रहालय को नया स्वरूप प्रदान किया गया। ई.1916 में संग्रहालय को भारत सरकार की मान्यता मिली और आगे चलकर इसका नाम जोधपुर के महाराजा सरदार सिंह (ई.1895-1911) की स्मृति में सरदार म्यूजियम रख दिया गया। रेऊजी की रुचि और रचनात्मक दृष्टिकोण से संग्रहालय में ओसियां, किराड़ू, मण्डोर, डीडवाना, सांभर, नागौर आदि स्थानों से सांस्कृतिक विरासत को एकत्रकर इस संग्रहालय को समृद्ध किया गया।

    हाड़ौती क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने के लिए ई.1915 में झालावाड़ में क्षेत्र का पहला संग्रहालय स्थापित किया गया। झालावाड़ के तत्कालीन महाराजा भवानीसिंह (ई.1874-1929) की गहन रुचि एवं उनके संरक्षण में संग्रहालय में हाड़ौती क्षेत्र के विभिन्न स्थानों से पुरासामग्री का संकलन कर संग्रहालय की श्रीवृद्धि की गई। ई.1929 में उम्मेद भवन पैलेस संग्रहालय की स्थापना की गई।

    संग्रहालय स्थापना की दौड़ में बीकानेर भी पीछे नहीं रहा। रियासत ने इटली के विद्वान डॉ. एल. पी. टेस्सीटोरी को आमंत्रित कर एक विस्तृत सर्वेक्षण करवाया और उन्होंने गंगानगर-बीकानेर क्षेत्र से महत्वपूर्ण पुरासामग्री का संकलन किया। डॉ. टेस्सीटोरी के संग्रह का उपयोग करते हुए ई.1937 में गंगा गोल्डन जुबली म्यूजियम की स्थापना की गई। महाराणा फतहसिंह (ई.1884-1930) ने चित्तौड़गढ़ संग्रहालय का निर्माण करवाया।

    संग्रहालय स्थापना की शृंखला में ई.1940 में अलवर और ई.1944 में भरतपुर रियासतों में संग्रहालय स्थापित किए गए। भरतपुर रियासत में महाराजा ब्रजेन्द्र सवाई वीरेन्द्र सिंह बहादुर जंग (ई.1929-47) की प्रेरणा से मूर्तिशिल्प, स्थापत्य, शिलालेख एवं अन्य पुरा सामग्री का संकलन कर इसे स्थानीय पुस्तकालय परिसर में प्रदर्शित किया गया। संग्रहालय के संस्थापक क्यूरेटर रावत चतुर्भुजदास चतुर्वेदी के अथक प्रयासों से इस संग्रहालय में पुरासम्पदा की अभिवृद्धि की गई। आगे चलकर इसे दुर्ग में स्थित वर्तमान भवन में स्थानान्तरित किया गया तथा ई.1944 में जनता के लिए खोला गया। ई.1951 में इसमें सिलहखाना और कमराखास भी जोड़ दिया गया। संग्रहालय को समृद्ध करने में भरतपुर के तत्कालीन शासकों तथा मेजर हार्वे का उल्लेेखनीय योगदान रहा।

    ई.1944 में कोटा और ई.1949 में आमेर संग्रहालय की स्थापना के साथ संग्रहालयों की संख्या बढ़ कर दस हो गई। राजस्थान निर्माण के बाद ई.1950 में पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग की स्थापना हुई और विभाग ने संग्रहालयों के विस्तार की दिशा में उल्लेेखनीय कदम उठाए। इसके परिणाम स्वरूप ई.1957 में श्री बांगड़ राजकीय संग्रहालय पाली, ई.1959 में डूंगरपुर और ई.1961 में आहाड़ संग्रहालयों की स्थापना संभव हो सकी। संग्रहालयों के पुनर्गठन एवं विकास की प्रक्रिया सतत रूप से चलती रही और ई.1965 में माउण्ट आबू संग्रहालय तथा ई.1968 में मण्डोर संग्रहालय स्थापित किए गए।

    ई.1954 में बिड़ला तकनीकी म्यूजियम की, ई.1959 में जयपुर में सिटी पैलस संग्रहालय की तथा ई.1960 में श्रीरामचरण प्राच्य विद्यापीठ एवं संग्रहालय जयपुर की स्थापना हुई। ई.1964 में लोक संस्कृति शोध संस्थान नगरश्री, चूरू की स्थापना हुई।

    चित्तौड़गढ़ क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत और पुरासामग्री के प्रदर्शन के लिए ई.1969 में चित्तौड़गढ़ संग्रहालय की स्थापना हुई। ई.1977 में आधुनिक कला प्रवृत्तियों को प्रदर्शित करने वाली राज्य की पहली कला दीर्घा स्थापित हुई जिसे आगे चलकर राजस्थान ललित कला अकादमी को सौंप दिया गया। विभाग द्वारा पुरान्वेषण, पुरा सामग्री के संकलन-संग्रहण एवं संरक्षण का कार्य निरन्तर जारी रहा और ई.1983 में हवामहल संग्रहालय तथा ई.1984 में जैसलमेर संग्रहालय की स्थापना की गई। ई.1985-86 में गंगानगर जिले में कालीबंगा के उत्खनन से प्राप्त सामग्री के लिए सभ्यता स्थल पर ही संग्रहालय का निर्माण किया गया। अब यह हनुमानगढ़ जिले में स्थित है।

    30 दिसम्बर 1983 को माणिक्यलाल वर्मा जनजाति शोध संस्थान द्वारा उदयपुर में जनजाति संग्रहालय का निर्माण किया गया। इसका उद्देश्य जनजातियों की सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था को प्रदर्शित करना था।

    संग्रहालयों के विस्तार की
    शृंखला में ई.1987 में विराट नगर संग्रहालय तथा ई.1991 में पाली संग्रहालय की स्थापना हुई। आमेर की सांस्कृतिक धरोहर के वैभव को प्रदर्शित करने के लिए ई.1992 में आमेर में कला दीर्घा स्थापित की गई। संग्रहालयों के विस्तार की यह धारा आज भी सतत रूप से प्रवाहमान है। राजस्थान के आधुनिक संग्रहालयों की यात्रा में सिटी पैलेस म्यूजियम उदयपुर, आहड़ संग्रहालय उदयपुर, राव माधोसिंह ट्रस्ट संग्रहालय कोटा, लोक कला संग्रहालय उदयपुर, मीरा संग्रहालय मेड़ता, हल्दीघाटी संग्रहालय राजसमंद आदि सम्मिलित हैं।


    राजस्थान में संग्रहालयों की समस्या

    राजस्थान, भारत का सबसे बड़ा प्रांत है। इसका 61.11 प्रतिशत भाग मरुस्थल है। इतने बड़े प्रदेश में पुरातात्विक सामग्री, प्राचीन भवन, दुर्ग, महल, देवालय, स्मारक, सरोवर, बावड़ियां, मूर्तियां, शिलालेख, प्राचीन ग्रंथ, शासकीय अभिलेख, सिक्के, ताड़पत्र, ताम्रपत्र आदि का विशाल भण्डार भरा पड़ा है। संग्रहालयोपयोगी सम्पूर्ण सामग्री को राज्य के विभिन्न संग्रहालयों में संजोने के लिए आवश्यक निपुण व्यक्तियों, धन, सुविधाओं तथा भवनों का अभाव है। इस कारण राजस्थान में प्राचीन ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर को संजोकर रख पाना बहुत बड़ी समस्या है। राजस्थान सरकार ने राज्य में 18 राजकीय संग्रहालयों की स्थापना की है। इन संग्रहालयों में कर्मचारियों का अभाव है। राज्य में झालावाड़ राजकीय संग्रहालय जैसे कई संग्रहालय हैं जो केवल चपरासियों और लिपिकों के भरोसे छोड़ दिए गए हैं।

    बहुत से संग्रहालयों को भारत सरकार से सामग्री प्राप्त होती है किंतु वह स्थान, साधन एवं दृष्टि के अभाव में संग्रहालयों के अंधेरे बंद कमरों में पड़ी हुई है, दर्शक वहाँ तक चाह कर भी नहीं पहुंच सकते।

    वसुंधरा राजे सरकार (ई.2013-18) द्वारा राज्य के संग्रहालयों की बुरी तरह से उपेक्षा किए जाने से यह समस्या और भी गंभीर हो गई है।

    राज्य सरकार द्वारा बीकानेर में राजस्थान राज्य अभिलेखागार तथा जोधपुर में प्राच्य विद्या संस्थान की स्थापना की गयी है। जयपुर, बीकानेर, चित्तौड़, जयपुर, अलवर, कोटा तथा उदयपुर में प्राच्य विद्या संस्थान की शाखाएं स्थापित की गयी हैं। राजस्थान में मौजूद पुराने दुर्गों एवं ऐतिहासिक भवनों का संरक्षण करने के लिए भी पर्याप्त संसाधन नहीं हैं जिसके कारण कई दुर्ग, हवेलियाँ, मंदिर एवं महल उपेक्षित पड़े हैं। कुछ वर्ष पूर्व शेखावाटी की कलात्मक हवेलियों में भित्ति चित्रों की दुर्दशा देखकर एक विदेशी महिला नदीन ला प्रैन्स ने एक हवेली खरीदकर उसका पुनरुद्धार करवाया और वहाँ एक सांस्कृतिक केन्द्र बनाया। इसमें भारत और फ्रान्स के चित्रकारों की एक प्रदर्शनी भी लगाई गई। इससे शेखावाटी क्षेत्र की कला को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली। संस्कृृति प्रेमियों, पर्यटन संस्थाओं तथा स्वयं सेवी संगठनों को इस दिशा में और भी प्रयास करने होंगे।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-41

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-41

    पर्यावरण को स्वर देते लोक गीत


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राजस्थान की लोक संस्कृति, सुरीली स्वर लहरियों में ढलकर, लोक गीतों में समाई हुई है। लोक गीतों की यह धारा दो रूपों में प्रवाहित हुई है। एक तो जन साधारण द्वारा सामाजिक उत्सवों, जन्म, विवाह, स्वागत, विदाई, संस्कार, तीज, गणगौर, होली आदि के अवसर पर गाये जाने वाले गीत और दूसरा राजाओं एवं सामंतों की प्रशस्ति में तथा उनके आमोद-प्रमोद के लिये गाया जाने वाले गीत। पारिवारिक उत्सवों तथा सामाजिक पर्वों पर गाये जाने वाले लोक गीतों के भाव बहुत सुकोमल एवं मन को छूने वाले हैं। इन गीतों में पर्यावरण संरक्षण के संदेश निहित हैं। ईंडोणी, कांगसियो, गोरबंद, पणिहारी, लूर, ओलूं, हिचकी, सुपणा, मूमल, कुरजां, काजलिया, कागा, जीरा, पोदीना, चिरमी तथा लांगुरिया आदि लोकगीत गाँव-गाँव में चाव से गाये जाते हैं।

    सामंती परिवेश में प्रयुक्त लोक गीत वीररस एवं शृंगार रस से परिपूर्ण हैं। अधिकांश लोक गीतों में प्रकृति एवं पर्यावरण से बिम्ब तथा उपमाएं ग्रहण की गई हैं। लोक भजनों में देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त करने, उन्हें प्रसन्न करने तथा उनसे मन वांछित फल प्राप्त करने के उद्देश्य से राजस्थान में रात्रि जागरण की प्रथा बड़ी पुरानी है जिसे रतजगा कहा जाता है। विनायक, महादेव, विष्णु, राम, कृष्ण, बालाजी (हनुमान), भैंरू, जुंझार, पाबू, तेजा, गोगा, रामदेव, देवजी, रणक दे, सती माता, दियाड़ी माता, सीतला माता, भोमियाजी आदि के भजन इन रात्रि जागरणों में गाये जाते हैं। मीरां, कबीर, दादू, रैदास, चंद्रस्वामी तथा बख्तावरजी के पद भी बड़ी संख्या में गाये जाते हैं।

    रात्रि जागरण में गाये जाने वाले देवी के गीत चिरजा कहलाते हैं। लोकगीतों की इतनी सुदीर्घ परम्परा का मूल कारण राजस्थान में निवास करने वाली वे अनेक जातियाँ हैं जो केवल गा-बजाकर अपना गुजारा करती हैं। इनके गीत परिष्कृत, भावपूर्ण तथा विविधता लिये हुए होते हैं। शास्त्रीय संगीत की भांति इनमें स्थायी तथा अंतरे का स्वरूप दिखाई देता है। खयाल तथा ठुमरी की भांति इन्हें छोटी-छोटी तानों, मुकरियों तथा विशेष आघात देकर सजाया जाता है। इन गीतों को मांड, देस, सोरठ, मारू, परज, कालिंगड़ा, जोगिया, आसावरी, बिलावल, पीलू खमाज आदि राग-रागिनियों में गाया जाता है।

    जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, जोधपुर आदि मरुस्थलीय क्षेत्रों में कुरजां, पीपली, रतन राणो, मूमल, घूघरी, केवड़ा आदि लोक गीत गाये जाते हैं। जयपुर, कोटा, अलवर, भरतपुर, करौली तथा धौलपुर आदि मैदानी भागों में स्वरों के उतार-चढ़ाव वाले गीत गाये जाते हैं। मंद से तार सप्तक तक गायन होता है। इन क्षेत्रों में सामूहिक रूप से गाये जाने वाले भक्ति और शृंगार रस से ओत-प्रोत गीत गाये जाते हैं। मांड तथा मारू रागों का संक्षिप्त परिचय प्राप्त करना आवश्यक है-

    मांड : राजस्थान की मांड गायिकी अत्यंत प्रसिद्ध है। थोड़े-बहुत अंतर के साथ क्षेत्र विशेष में इन्हें अलग तरह से गाया जाता है। उदयपुर की मांड, जोधपुर की मांड, जयपुर-बीकानेर की मांड, जैसलमेर की मांड, मांड गायिकी में अधिक प्रसिद्ध हैं। राग सोरठ, देस तथा मांड तीनों एक साथ गाई व सुनी जाती हैं।

    मारू : लोक गायकों द्वारा गाये जाने वाले वीर भाव जागृत करने वाले गीत सिंधु तथा मारू रागों पर आधारित होते थे जिन्हें सेनाओं के रण-प्रयाण के समय गाया जाता था। पश्चिमी राजस्थान में गाये जाने वाले लोकगीत ऊंचे स्वर व लम्बी धुन वाले होते हैं जिनमें स्वर विस्तार भी अधिक होता है।


    राजस्थान के प्रमुख लोकगीत

    ओल्यूँ : ओल्यूँ का अर्थ होता है- स्मरण। अतः ओल्यू किसी की स्मृति में गाई जाती है। बेटी की विदाई पर ओल्यूँ इस प्रकार गाई जाती है- कँवर बाई री ओल्यूँ आवै ओ राज।

    ईंडोणी : पानी भरने जाते समय स्त्रियां मटके को सिकर पर टिकाने के लिये मटके के नीचे ईंडोणी का प्रयोग करती हैं। इस अवसर को लक्ष्य करके यह गीत गाया जाता है-


    म्हारी सवा लाख री लूम गम गई ईंडोणी।

    पाड़ोसण बड़ी चकोर ले गई ईंडोणी।।

    कांगसियो : कंघे को कांगसिया कहा जाता है। यह शृंगार रस का प्रमुख गीत है- म्हारै छैल भँवर रो कांगसियो पणिहारियाँ ले गई रे।

    कागा : इस गीत में विरहणी नायिका द्वारा कौए को सम्बोधित करके अपने प्रियतम के आने का शगुन मनाया जाता है-


    उड़-उड़ रे म्हारा काळा रे कागला,

    जद म्हारा पिवजी घर आवै।

    काजलियो : यह शृंगार रस से ओत-प्रोत गीत है जो होली के अवसर पर चंग के साथ गाया जाता है। कामण : वर को जादू टोने से बचाने के लिये स्त्रियाँ कामण गाती हैं।

    कुरजां : प्रियतम को संदेश भिजवाने के लिये कुरजाँ पक्षी के माध्यम से यह गीत गाया जाता है- कुरजां ए म्हारौ भंवर मिलाद्यौ ए।

    केसरिया बालम : यह एक रजवाड़ी गीत है जिसमें विरहणी नारी अपने प्रियतम को घर आने का संदेश देती है- केसरिया बालम आवो नी, पधारौ म्हारे देस।

    गणगौर : पार्वती देवी को समर्पित त्यौहार गणगौर पर गणगौर के गीत गाये जाते हैं- खेलन द्यौ गणगौर, भँवर म्हानै खेलन द्यौ गणगौर।

    गोरबंद : गोरबंद ऊँट के गले का आभूषण होता है जिस पर शेखावाटी क्षेत्र में लोकगीत गाये जाते हैं- गायां चरावती गोरबंद गूंथियो, भैस्यां चरावती पोयो म्हारा राज, म्हारो गोरबंद लूम्बालो।

    घुड़ला : घुड़ला पर्व पर कन्याएं छेदों वाली मटकी में दिया रखकर घर-घर घूमती हुई गाती हैं- घुड़लो घूमेला जी घूमेला, घुड़ले रे बांध्यो सूत।

    घूमर : गणगौर आदि विशेष पर्वों पर घूमर नृत्य के साथ घूमर गाया जाता है- म्हारी घूमर छै नखराली ए माँ। घूमर रमवा म्हैं जास्यां।

    घोड़ी : बारात की निकासी पर घोड़ी गाई जाती है- घोड़ी म्हारी चन्द्रमुखी सी, इन्द्रलोक सूँ आई ओ राज।

    चिरमी : वधू अपने ससुराल में अपने भाई और पिता की प्रतीक्षा में चिरमी के पौधे को सम्बोधित करके गाती है- चिरमी रा डाळा चार वारी जाऊँ चिरमी ने।

    जच्चा : बालक के जन्मोत्सव पर जच्चा या होलर गाये जाते हैं।

    जलो और जलाल : वधू के घर की स्त्रियाँ बारात का डेरा देखने जाते समय जलो और जलाल गाती हैं- म्हैं तो थारा डेरा निरखण आई ओ, म्हारी जोड़ी रा जहाँ।

    जीरा : यह लोकगीत कृषक नारी द्वारा जीरे की खेती में आने वाली कठिनाई को व्यक्त करने के लिये गाया जाता है- ओ जीरो जीव रो बैरी रे, मत बाओ म्हारा परण्या जीरो।

    झोरावा : यह जैसलमेर क्षेत्र में गाया जाने वाला विरह गीत है जो पति के परदेश जाने पर उसके वियोग में गाया जाता है।

    ढोला मारू : सिरोही क्षेत्र में ढाढियों द्वारा गाया जाने वाला गीत जिसमें ढोला मारू की प्रेमकथा का वर्णन है।

    तेजा : जाट जाति के लोगों द्वारा कृषि कार्य आरंभ करते समय लोक देवता तेजाजी को सम्बोधित करके तेजा गाया जाता है।

    पंछीड़ा : हाड़ौती एवं ढूंढड़ी क्षेत्रों में मेले के अवसर पर अलगोजे, ढोलक एवं मंजीरे के साथ पंछीड़ा गाया जाता है।

    पणिहारी : पानी भरने वाली स्त्री को पणिहारी कहते हैं। इस गीत में स्त्रियों को पतिव्रत धर्म पर अटल रहने की प्रेरणा दी गई है। जीव जगत को पेयजल उपलब्ध कराने वाले मनुष्यों की भी प्रशंसा की गई है-


    कणीजी खुदाया कूआं बावड़ी ओ पणिहारी जी रे

    लो चालो साथीड़ा रे लार वालाजी।

    पपैयो : यह दाम्पत्य प्रेम के आदर्श को दर्शाने वाला गीत है जिसमें प्रेयसी अपने प्रियतम से उपवन में आकर मिलने का अनुरोध करती है।

    पावणा : जवांई के ससुराल आने पर स्त्रियाँ उसे भोजन करवाते समय पावणा गाती हैं।

    पीपली : मरुस्थलीय क्षेत्र में वर्षा ऋतु में पीपली गाया जाता है जिसमें विरहणी द्वारा प्रेमोद्गार व्यक्त किये जाते हैं।

    बधावा : शुभ कार्य सम्पन्न होने पर बधावा अर्थात् बधाई के गीत गाये जाते हैं।

    बना-बनी : लड़के के विवाह पर बना तथा लड़की के विवाह पर बनी गीत गाये जाते हैं।

    बीछूड़ो : यह हाड़ौती क्षेत्र का लोकप्रिय गीत है। एक पत्नी को बिच्छू ने डस लिया है और वह मरने से पहले अपने पति को दूसरा विवाह करने का संदेश देती है-


    मैं तो मरी होती राज,

    खा गयो बैरी बीछूड़ो।

    मूमल : जैसलमेर में गाया जाने वाला शंृगारिक गीत जिसमें मूमल के नख शिख का वर्णन किया गया है- म्हारी बरसाले री मूमल, हालौनी एै आलीजे रे देख।

    मोरिया : इस सरस लोकगीत में ऐसी नारी की व्यथा है जिसका सम्बन्ध तो हो चुका है किंतु विवाह होने में देर हो रही है। इसे रात्रि के अंतिम प्रहर में गाया जाता है।

    रसिया : ब्रज क्षेत्र में रसिया गाया जाता है।

    रातीजगा : विवाह, पुत्र जन्मोत्सव, मुण्डन आदि शुभ अवसरों पर रात भर जागकर भजन गाये जाते हैं जिन्हें रातीजगा कहा जाता है।

    लांगुरिया : करौली क्षेत्र में कैला देवी के मंदिर में हनुमानजी को सम्बोधित करके लांगुरिया गाये जाते हैं- इबके तो मैं बहुअल लायो, आगे नाती लाऊंगो, दे-दे लम्बो चौक लांगुरिया, बरस दिनां में आऊंगो। लांगुरिया को सम्बोधित करके कामुक अर्थों वाले गीत भी गाये जाते हैं-


    नैक औढ़ी ड्यौढ़ी रहियो,

    नशे में लांगुर आवैगो।

    लावणी : नायक द्वारा नायिका को बुलाने के लिये लावणी गाई जाती है- शृंगारिक लावणियों के साथ-साथ भक्ति सम्बन्धी लावणियां भी प्रसिद्ध हैं। मोरध्वज, सेऊसंमन, भरथरी आदि प्रमुख लावणियां हैं।

    सीठणे : विवाह समारोह में आनंद के अतिरेक में गाली गीत गाये जाते हैं जिन्हें सीठणे कहते हैं।

    सुपणा : विरहणी के स्वप्न से सम्बन्धित गीत सुपणा कहलाते हैं-


    सूती थी रंग महल में,

    सूताँ में आयो रे जंजाळ,

    सुपणा में म्हारा भँवर न मिलायो जी।

    सूंवटिया : यह विरह गीत है। भील स्त्रियाँ पति के वियोग में सूंवटिया गाती हैं।

    हरजस : भगवान राम और भगवान कृष्ण को सम्बोधित करके सगुण भक्ति लोकगीत गाये जाते हैं जिन्हें हरजस कहा जाता है।

    हिचकी : ऐसी मान्यता है कि प्रिय के द्वारा स्मरण किये जाने पर हिचकी आती है। अलवर क्षेत्र में हिचकी ऐसे गाई जाती है- म्हारा पियाजी बुलाई म्हानै आई हिचकी।

    हींडो : श्रावण माह में झूला झूलते समय हींडा गाया जाता है- सावणियै रौ हींडौ रे बाँधन जाय।

    इस प्रकार लोक गीतों में प्रकृति एवं पर्यावरण से सम्बन्धित विपुल विषय सम्मिलित किये गये हैं। क्षेत्र बदलने के साथ उनके गायन का तरीका भी बदल जाता है।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थानी गद्य साहित्य

     23.12.2021
    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थानी गद्य साहित्य

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी - 213

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थानी गद्य साहित्य

    1. प्रश्न - राजस्थानी गद्य की कौनसी रचनाएं प्रमुखता से मिलती हैं?

    उतर- वात, वचनिका, ख्यात, दवावैत, वंशावली, पट्टावली, पीढ़ियावली, दफ्तर, विगत, हकीकत आदि।

    2. प्रश्न - वात किसे कहते हैं?

    उतर- वात अथवा वार्ता कहानी को कहते हैं। चूंकि कहानियों एवं किस्सों को लोकानुरंजन के लिये कह कर सुनाया जाता था तथा कम से कम एक व्यक्ति हुंकारा (स्वीकारोक्ति) देने वाला होता था, इसलिये कहानी अथवा किस्से के लिये वात एवं वार्ता शब्द काम में लिया जाता था।

    3. प्रश्न - वात किसी शैली में तैयार किया जाता था?

    उतर- इसे प्रायः चम्पू शैली में तैयार किया जाता था। अर्थात् गद्य और पद्य का क्रम एक के बाद एक चलता रहता था।

    4. प्रश्न - वात साहित्य की प्रमुख रचनाएं कौनसी हैं?

    उतर- अजगदेव पंवार री बात, जगमाल मालावत री वात आदि

    5. प्रश्न - वचनिका किसे कहते हैं?

    उतर- गद्य-पद्य मिश्रित रचना को वचनिका कहते हैं।

    उतर- इस विधा में प्रत्येक वचन या वाक्य तुकांत होता है।

    6. प्रश्न - वचनिका किस साहित्स से राजस्थानी में आई है?

    उतर- यह विधा संस्कृत साहित्य से राजस्थानी साहित्य में आयी है। संस्कृत साहित्य में इसे चंपू कहते हैं।

    7. प्रश्न - वचनिका के कितने भेद हैं?

    उतर- वचनिका के दो भेद हैं। पद्य बंध और गद्य बंध।

    8. प्रश्न - वचनिका साहित्य की प्रमुख रचनाएं कौनसी हैं?

    उतर- सिवदास गाडण लिखित अचलदास खींची री वचनिका, खड़िया जग्गा लिखित ‘राठौड़ रतनसिंह महेस दासौत री वचनिका’, शांतिसागर सूरि की वचनिका तथा जिन समुद्रसूरि की वचनिका आदि।

    9. प्रश्न - ख्यात किसे कहते हैं?

    उतर- ख्यात शब्द ख्याति से बना है जिसका अर्थ है वे बातें जो प्रसिद्ध हो चुकी हैं।

    10. प्रश्न - ख्यात का लेखन किस उद्देश्य से किया जाता था?

    उतर- मध्य कालीन राजस्थानी साहित्य में गद्य विधा में इतिहास वृत्त लिखने के लिये ख्यात का संकलन अथवा लेखन किया जाता था।

    11. प्रश्न - ख्यात में क्या लिखा जाता है?

    उतर- इसमें गद्य साहित्य के रूप में वात, वार्ता, हकीकत, वंशावली, वंशवृक्ष, विगत आदि लिखे जाते हैं।

    12. प्रश्न - किस ख्यात को राजस्थान की पहली ख्यात माना जाता है?

    उतर- मूथा नैणसी की ख्यात।

    13. प्रश्न - किस ख्यात को राजस्थान की अंतिम ख्यात माना जाता है?

    उतर- दयालदास सिंढायच ने बीकानेर राज्य की ख्यात लिखी जिसे बीकानेर रै राठौड़ां री ख्यात तथा दयालदास की ख्यात भी कहा जाता है। इस पुस्तक को राजस्थान की अंतिम ख्यात माना जाता है।

    14. प्रश्न - किस पुस्तक को ख्यात कहना गलत है?

    उतर- बांकीदास री ख्यात परम्परागत ख्यात लेखन परम्परा से हटकर लिखी गई है इसलिये इसे ख्यात कहना गलत है। यह राजस्थान की इतिहास सम्बन्धित घटनाओं पर लिखी गई 2000 फुटकर टिप्पणियों का संग्रह है। ये टिप्पणियाँ एक पंक्ति से लेकर 5-6 पंक्तियों में लिखी गई हैं।

    15. प्रश्न - दवावैत किसे कहते हैं?

    उतर- तुकांत गद्य को दवावैत कहते हैं।

    16. प्रश्न - प्रमुख दवावैत रचनाएं कौनसी हैं?

    उतर- जिन सुख सरि दवावैत, जिननाम सूरि दवावैत, नरसिंहदास गौड री दवावैत।

    17. प्रश्न - राजस्थान में वेलि साहित्य किस अवधि में रचा गया?

    उतर- 15वीं शती से लेकर 19वीं शती में।

    18. प्रश्न - वेलि किसे कहते हैं?

    उतर- लम्बी कविता को वेलि कहते हैं।

    19. प्रश्न - वेलि रचनाओं में कौनसे विषय लिखे गये हैं?

    उतर- राजाओं एवं सामंतों का इतिहास, वीरता, स्वामिभक्ति, विद्वता, उदारता, प्रेम भावना, नायक की वंशावली, आदि। धार्मिक एवं पौराणिक कथाओं को भी वेलि साहित्य का आधार बनाया गया है।

    20. प्रश्न - वेलि ग्रंथ किस भाषा में लिखे गये हैं?

    उतर- डिंगल भाषा में।

    21. प्रश्न - राजस्थान के किस बड़े इतिहासकार की मृत्यु राजा की कैद में आत्महत्या करने से हुई?

    उतर- मूथा नैणसी की।

    22. प्रश्न - किस लेखक ने मूथा नैणसी को राजपूताने का अबुल फजल कहा है?

    उतर- मुंशी देवी प्रसाद ने।

    23. प्रश्न - किस लेखक को मारवाड़ राज्य के कानून का निर्माता कहा जाता है?

    उतर- मुंशी देवी प्रसाद को।

    24. प्रश्न - उन्नीसवीं सदी में वह कौनसा इतिहासकार हुआ जिसने पहली बार राजस्थान की सामंतवादी व्यवस्था के बारे में लिखा?

    उतर- जेम्स टॉड ने।

    25. प्रश्न - वह कौनसा लेखक था जिसने राजस्थान की बोलियों का वैज्ञानिक अध्ययन किया?

    उतर- जॉर्ज ग्रियर्सन ने।

    26. प्रश्न - राजस्थान के किस सुप्रसिद्ध इतिहासकार ने अपना नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में लिखवाया?

    उतर- गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने हिंदी में पहली बार ‘भारतीय प्राचीन लिपि माला’ ग्रंथ का शास्त्रीय लेखन कर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपना नाम लिखवाया। इस ग्रंथ में 84 लिपियों का विवेचन है।

    27. प्रश्न - पुरातत्व सर्वेक्षण भारत के महानिदेशक सर जॉन मार्शल ने राजस्थान के किस इतिहासकार की गणना प्राचीन भारतीय लिपि पढ़ने वाले भारत के प्रथम छः विद्वानों में की थी?

    उतर- पंडित रामकरण आसोपा की।


  • Share On Social Media:
  • अध्याय - 5 राज्य में सरकारी क्षेत्र के प्रमुख संग्रहालय एवं अभिलेखागार

     02.06.2020
    अध्याय - 5 राज्य में सरकारी क्षेत्र के प्रमुख संग्रहालय एवं अभिलेखागार

    अध्याय - 5 राज्य में सरकारी क्षेत्र के प्रमुख संग्रहालय एवं अभिलेखागार


    पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग द्वारा संचालित संग्रहालय


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राजस्थान सरकार द्वारा राज्य में राजकीय संग्रहालयों की स्थापना, सरंक्षण एवं विस्तार के लिए अलग से पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग की स्थापना की गई है। इस विभाग द्वारा वर्तमान में निम्नलिखित संग्रहालय संचालित किए जा रहे हैं-

    राज्य स्तरीय संग्रहालय

    1. राजकीय केन्द्रीय संग्रहालय, अलबर्ट हॉल, (अल्बर्ट म्यूजियम), जयपुर

    संभाग स्तरीय संग्रहालय

    1. राजकीय संग्रहालय, उदयपुर,

    2. राजकीय संग्रहालय, जोधपुर,

    3. राजकीय संग्रहालय, बीकानेर,

    4. राजकीय संग्रहालय, कोटा,

    5. राजकीय संग्रहालय, अजमेर,

    6. राजकीय संग्रहालय, हवामहल, जयपुर,

    7. राजकीय संग्रहालय, भरतपुर

    जिला स्तरीय संग्रहालय


    1. राजकीय संग्रहालय, अलवर

    2. राजकीय संग्रहालय, डूंगरपुर

    3. राजकीय संग्रहालय, चित्तौड़गढ़

    4. राजकीय संग्रहालय, जैसलमेर

    5. राजकीय संग्रहालय, पाली

    6. राजकीय संग्रहालय, झालावाड़

    7. राजकीय संग्रहालय, सीकर

    स्थानीय संग्रहालय

    1. राजकीय संग्रहालय, आहाड़, उदयपुर

    2. राजकीय संग्रहालय, मण्डोर, जोधपुर

    3. राजकीय संग्रहालय, माउंट आबू, सिरोही

    संग्रहालय जो आरम्भ किए जाने हैं

    1. राजकीय संग्रहालय, केसरीसिंह बारहठ की हवेली, शाहपुरा, भीलवाड़ा।

    2. टाउन हॉल पुराना विधानसभा भवन, जयपुर।

    3. राजकीय संग्रहालय, बारां।


    राज्य की आर्ट गैलेरी

    1. आर्ट गैलेरी, विराट नगर, जयपुर

    2. प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान जोधपुर की आर्ट गैलेरी


    राजस्थान राज्य अभिलेखागार

    राजस्थान राज्य अभिलेखागार का मुख्यालय बीकानेर में स्थापित किया गया है तथा इसकी शाखाएं जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, कोटा, अजमेर, अलवर एवं भरतपुर में हैं।


    प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान

    राज्य सरकार द्वारा प्राच्य विद्या प्रतिष्ठानों की स्थापना की गई है जिनमें प्राचीन दुर्लभ हस्तलिखित ग्रंथों, चित्रग्रंथों, बहियों आदि का संग्रहण किया गया है। जोधपुर में इसका मुख्यालय है तथा बीकानेर, कोटा, अलवर, उदयपुर, चित्तौड़ में उपशाखाएं कार्यरत हैं।


    अरबी-फारसी शोध संस्थान टोंक

    टोंक में अरबी और फारसी ग्रंथों के संरक्षण के लिए कार्यालय स्थापित हुआ जो अब स्वतंत्र संस्थान के रूप में कार्यरत है तथा मौलाना अबुल कलाम आजाद अरबी फारसी शोध संस्थान के नाम से जाना जाता है।


    विज्ञान केन्द्र एवं संग्रहालय

    विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने राज्य में जयपुर में क्षेत्रीय विज्ञान केन्द्र एवं विज्ञान पार्क स्थापित किया है। साथ ही जोधपुर, नवलगढ़, कोटा, उदयपुर में उपक्षेत्रीय विज्ञान केन्द्र स्थापित किए हैं। झालावाड़ के निकट झालरापाटन में विज्ञान पार्क स्थापित किया गया है। इनमें आम जन को विज्ञान के सिद्धांतों का प्रदर्शन करने के लिए स्वचालित मॉडल प्रदर्शित किये गए हैं।

    प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय

    1. प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय, जयपुर।

    2. प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय, सवाईमाधोपुर।

    प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय, रामसिंहपुरा

    देश का पांचवां राजीव गांधी क्षेत्रीय प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय सवाईमाधोपुर जिले के रामसिंहपुरा गांव में आरम्भ किया गया है। 1 मार्च 2014 को इसे पर्यटकों के लिए खोल दिया गया। इस संग्रहालय में पर्यावरण, वन्यजीव, ज्ञान, विज्ञान, कला एवं संस्कृति आदि से जुड़ी चीजों की पांच गैलेरी, एक लाइब्रेरी, ऑडिटोरियम, छात्रावास आदि बनाये गए हैं।

    बायोलॉजिकल पार्क जयपुर, जोधपुर एवं उदयपुर में बायोलॉजिकल पार्क स्थापित किये गए हैं। बीकानेर जिले में बीछवाल में बायोलॉजिकल पार्क स्थापित किया जा रहा है। यहाँ भी जन्तुओं के सम्बन्ध में जानकारियां पर्यटकों को दी जा रही हैं।


    नेचर पार्क

    वर्ष 2014-15 में चूरू में नेचर पार्क स्थापित किया गया है।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-42

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-42

    पर्यावरण में संगीत घोलते लोकवाद्य


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राजस्थान के लोक कलाकारों ने सदियों से जिस संगीत की साधना की है, उसकी सफलता में लोकवाद्यों का महत्त्वपूर्ण योगदान है। ये लोकवाद्य स्थानीय सामग्री से बनाये जाते हैं। इनमें विभिन्न प्रकार के वृक्षों से प्राप्त होने वाली लकड़ी, तूंबा, नारियल, विभिन्न पशुओं के मृत शरीरों से प्राप्त होने वाली त्वचा, बाल एवं तांत आदि का बड़े स्तर पर उपयोग होता है। राजस्थान के तत् वाद्यों में सारंगी, जंतर, रावण हत्था, रवाज, तंदूरा, इकतारा, अपंग, कमायचा, आदि प्रमुख हैं। सुषिर वाद्यों में बांसुरी, अलगोजा, पुंगी, शहनाई सतारा, मशक, मोरचंग, अनव) वाद्यों में मृदंग, ढोलक, नगाड़ा, नौबत, मादल, चंग, खंजरी तथा घन वाद्यों में मंजीरा, झांझ, थाली और खड़ताल प्रमुख हैं। कुछ प्रमुख लोकवाद्यों का परिचय इस प्रकार से है-

    अलगोजा : यह सुषिर अर्थात् फूंक वाद्य है तथा बांसुरी की तरह होता है। इसमें बांस की दो नलियां होती हैं। नली में 4 से 7 छेद किये जाते हैं। वादक दोनों नलियों को एक साथ मुँह में रखकर बजाता है। एक नली पर स्वर कायम किया जाता है तथा दूसरी नली पर स्वर बजाये जाते हैं। इसे भील एवं कालबेलिया जनजातियों द्वारा बजाया जाता है।

    इकतारा : गोल तूंबे में एक बांस फंसा देते हैं। तूंबे का ऊपरी हिस्सा काटकर उस पर चमड़ा मंढ़ देते हैं। बांस में छेद करके उसमें खूंटी लगाते हैं तथा एक तार कस दिया जाता है।

    कमायचा : यह दो-ढाई फुट लम्बा ईरानी वाद्ययंत्र है जो सारंगी की तरह दिखता है तथा गज की सहायता से बजता है। यह रोहिड़ा या आक की लकड़ी से बनता है जिसके तार बकरी की आंतों को सुखा कर बनाये जाते हैं तथा घोड़े के बालों का भी इस हेतु उपयोग किया जाता है। इस वाद्ययंत्र में दो मोर तथा नौ मोरनियां होती हैं तथा एक तार से लेकर चार तारों तक का उपयोग किया जाता है। इसकी तबली थोड़ी मोटी होती है तथा चमड़े से ढंकी हुई होती है। बाड़मेर तथा जैसलमेर जिलों में इसका प्रयोग बहुतायत से होता है।

    खंजरी : यह ढप का लघु रूप है। ढप की तरह इस पर भी चमड़ा मंढ़ा होता है। इसे कामड़, भील, कालबेलिया आदि बजाते हैं।

    खड़ताल : लकड़ी की चार पट्टिकाओं को खड़ताल कहते हैं। भजनों में बजाया जाने वाले करताल का यह देशज रूप है। इसे दोनों हाथों की अंगुलियों में दो-दो पट्टिकाओं को रखकर बजाया जाता है।

    चंग : यह ताल वाद्य लकड़ी के गोल घेरे से बना होता है। एक तरफ बकरे की खाल मंढ़ी जाती है। यह दोनों हाथों से बजता है। इसे ढप भी कहते हैं। इसे होली पर बजाते हैं।

    डैंरू : यह डमरू का बड़ा रूप है। यह आम की लकड़ी का बनता है। दोनों तरफ बारीक चमड़ा मंढ़ कर रस्सियों से कसते हैं। एक हाथ से डोरियों पर दबाव डालकर कसा और ढीला छोड़ा जाता है तथा दूसरे हाथ से लकड़ी की पतली डंडी के आघात से बजाया जाता है।

    ढोल : लोकवाद्यों में ढोल का प्रमुख स्थान है। यह लोहे अथवा लकड़ी के गोल घेरे पर दोनों तरफ चमड़ा मंढ़ कर बनाया जाता है। इस पर लगी रस्सियों को कड़ियों के सहारे खींचकर इसे कसा जाता है। वादक इसे गले में डालकर लकड़ी के डंडे से बजाता है।

    ढोलक : यह एक साधारण वाद्य है। यह ढोल की तरह ही छोटे आकार की होती है। इसके दोनों तरफ चमड़ा मंढ़ा होता है। इस पर लगी डोरियों को कड़ियों से खींचकर कसा जाता है। यह दोनों हाथों से बजाई जाती है तथा एक प्रमुख ताल वाद्य है।

    जंतर : यह वाद्य वीणा की तरह होता है। वादक इसको गले में डालकर खड़ा-खड़ा ही बजाता है। वीणा की तरह इसमें दो तूंबे होते हैं। इनके बीच बांस की लम्बी नली लगी होती है। इसमें कुल चार तार होते हैं। यह वाद्य गूजर भोपों में प्रचलित है।

    तंदूरा : यह तानपूरे से मिलता-जुलता है। इसमें चार तार होते हैं, इसलिये इसे चौतारा भी कहते हैं। यह लकड़ी का बना होता है। कामड़ जाति के लोग तंदूरा ही बजाते हैं।

    ताशा : तांबे की चपटी परात पर बकरे का पतला चमड़ा मंढ़ा जाता है। इसे बांस की खपच्च्यिों से बजाया जाता है। इस वाद्य को मुसलमान अधिक बजाते हैं।

    धौंसा : यह भी नगाड़े की तरह ही होता है। इसे घोड़े पर दोनों तरफ रखकर लकड़ी के डंडों से बजाया जाता है।

    नड़ : यह भी सुषिर वाद्ययंत्र है। ढाई फीट लम्बे इस वाद्ययंत्र को कंगोर या कैर की लकड़ी से बनाया जाता है। बांसुरीनुमा नड़ में 4 से 6 छेद होते हैं। ये नीचे की ओर होते हैं।

    नगाड़ा : यह दो प्रकार का होता है, एक छोटा तथा दूसरा बड़ा। छोटे नगाड़े के साथ एक नगाड़ी भी होती है। इसे लोकनाट्यों में शहनाई के साथ बजाया जाता है। लोकनृत्यों में नगाड़े की संगत के बिना रंगत नहीं आती। बड़ा नगाड़ा नौबत की तरह का होता है। इसे बम या टामक भी कहते हैं। यह युद्ध के समय बजाया जाता था। नगाड़ा लकड़ी के डंडों से ही बजाया जाता है।

    नौबत : धातु की लगभग चार फुट गहरी अर्ध अंडाकार कुंडी को भैंसे की खाल से मंढ़ कर चमड़े की डोरियों से कसा जाता है। इसे लकड़ी के डंडों से बजाया जाता है। इसे प्रायः मंदिरों में या राजा महाराजा के महलों के मुख्य द्वार पर बजाया जाता था।

    पुंगी : यह वाद्य एक विशेष प्रकार के तूंबे से बनता है। तूंबे का ऊपरी हिस्सा लंबा और पतला तथा नीचे का हिस्सा गोल होता है। तूंबे के निचले हिस्से में छेद करके दो नलियां लगायी जाती हैं। नालियों में स्वरों के छेद होते हैं। अलगोजे के समान ही एक नली में स्वर कायम किया जाता है और दूसरी से स्वर निकाले जाते हैं। यह कालबेलियों का प्रमुख वाद्य है।

    बांकिया : पीतल का बना यह वाद्य ढोल के साथ मांगलिक अवसरों पर बजाया जाता है। आकृति में यह बड़े बिगुल की तरह होता है।

    भपंग : यह वाद्य कटे हुए तंूबे से बनता है जिसके एक सिरे पर चमड़ा मंढ़ते हैं। चमड़े में एक छेद करके उसमें जानवर की आंत का तार डालकर उसके सिर पर लकड़ी का टुकड़ा बांधते हैं। इसे कांख में दबाकर एक हाथ से तांत को खींचकर या ढीला छोड़कर उस पर दूसरे हाथ से लकड़ी के टुकड़े से प्रहार करते हैं। अलवर क्षेत्र में यह वाद्य काफी प्रचलित है।

    भूंगल : यह भवाई जाति के लोगों का वाद्य है। पीतल का बना यह वाद्य तीन हाथ लंबा तथा बांकिया जैसा होता है। इसे भेरी भी कहते हैं। इसे रणक्षेत्र में भी बजाया जाता है।

    मशक : चमड़े की सिलाई करके बनाये गये इस वाद्य के एक सिरे पर लगी नली से मुँह से हवा भरी जाती है तथा दूसरे सिरे पर लगी अलगोजे नुमा नली से स्वर निकाले जाते हैं। इसके स्वर पुंगी की तरह सुनाई देते हैं। भैंरूजी के भोपों का यह प्रमुख वाद्य है।'

    मांदल : मिट्टी से बनी मांदल की शक्ल मृदंग जैसी होती है। इस पर हिरण या बकरे की खाल मंढ़ी होती है। यह आदिवासी भीलों और गरासियों का प्रमुख वाद्य है।

    मोरचंग : मोरचंग मोर की आकृति का होता है तथा लोहे या पीतल से बनता है। इसके मध्य पतला और मजबूत तार होता है। एक सिरा मुंह में रखा जाता है जिसे श्वास की हवा से हवाई स्वर कण्ठ का उपयोग करते हुए दिया जाता है। दूसरे सिरे पर अंगुली से आघात किया जाता है। ग्वारिया जाति के लोग इसे भेड़, बकरी एवं गाय चराते समय बजाते हैं।

    रावण हत्था : रावण हत्था भोपों का मुख्य वाद्य है। बनावट में यह बहुत सरल किंतु स्वर में सुरीला होता है। इसे बनाने के लिये नारियल की कटोरी पर खाल मंढ़ी जाती है जो बांस के साथ लगी होती है। बांस में जगह-जगह खूंटियां लगा दी जाती हैं जिनमें तार बंधे होते हैं। यह वायलिन की तरह गज से बजाया जाता है। एक सिरे पर कुछ घुंघरू बंधे होते हैं। इसे पाबूजी के भोपे तथा डूंगजी जवारजी के भोपे कथा बांचते समय बजाते हैं।

    शहनाई : यह एक मांगलिक वाद्य है। चिलम की आकृति का यह वाद्य शीशम या सागवान की लकड़ी से बनाया जाता है। वाद्य के ऊपरी सिरे पर ताड़ के पत्ते की तूंती बनाकर लगाई जाती है। फूंक देने पर इसमें मधुर स्वर निकलता है।

    सारंगी : राजस्थान में सारंगी के विविध रूप दिखाई देते हैं। लोक कलाकार सारंगी को संगत वाद्य के रूप में बजाते हैं। यह लंगा समुदाय की विशेष पहचान है। उनके अतिरिक्त मिरासी, जोगी, मांगणियार आदि कलाकार भी सारंगी के साथ ही गाते हैं। सारंगी सागवान, कैर तथा रोहिड़ा की लकड़ी से बनती है। सारंगी के तार बकरे की आंत के बनते हैं और गज में घोड़े की पूंछ के बाल बंधे होते हैं।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थानी पद्य साहित्य

     23.12.2021
    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी  : राजस्थानी पद्य साहित्य

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी - 214

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थानी पद्य साहित्य

    1. प्रश्न - राजस्थानी पद्य साहित्य में कौनसा साहित्य आता है?

    उतर- रास, महाकाव्य, दूहा, सोरठा, गीत, कुण्डलियां, छंद, छप्पय आदि।

    2. प्रश्न - रासो किसे कहते हैं?

    उतर- जिस काव्य में युद्ध और नायक की वीरता का वर्णन हो उसे रासो कहते हैं।

    3. प्रश्न - राजस्थान के प्रसिद्ध रासो ग्रंथ कौनसे हैं?

    उतर- पृथ्वीराज रासो, बीसलदेव रासो, विजयपाल रासो, खुमाण रासो आदि।

    4. प्रश्न - राजस्थान का सर्वाधिक प्राचीन एवं लोकप्रिय छंद कौनसा है?

    उतर- दूहा अथवा दोहा।

    5. प्रश्न - दूहा किस साहित्य से राजस्थानी में आया है?

    उतर- अपभूंश साहित्य से।

    6. प्रश्न - दोहा किसे कहते हैं?

    उतर- दोहे में चार चरण होते हैं। प्रथम तथा तृतीय चरण में 13-13 मात्राएं और दूसरे तथा चौथे चरण में 11-11 मात्राएं होती हैं।

    7. प्रश्न - राजस्थानी भाषा में दोहा कितने प्रकार का उपलब्ध होता है?

    उतर- राजस्थानी में दोहे के 21 भेद मिलते हैं जिनमें से सोरठा भी एक है।

    8. प्रश्न - सोरठा किसे कहते हैं?

    उतर- दोहे की मात्राओं को यदि उलटा कर दिया जाये तो उसे सोरठा कहते हैं। इस प्रकार सोरठे के प्रथम तथा तृतीय चरण में ग्यारह-ग्यारह मात्राएं होती हैं और दूसरे तथा चौथे चरण में 13-13 मात्राएं होती हैं।

    9. प्रश्न - सोरठे को राजस्थानी एवं गुजराती में क्या कहते हैं?

    उतर- सोरठिया दूहा।

    10. प्रश्न - प्रश्न - महाकाव्य किसे कहते हैं?

    उत्तर - जिस प्रबंध काव्य में आठ से अधिक सर्ग हों उसे महाकाव्य कहते हैं। इसके अन्य लक्षणों में धीरोदात्त नायक,शंगाररस, शांत रस अथवा वीर रस में से किसी एक रस की प्रधानता, प्रकृति चित्रण, देश, काल आदि का यथा स्थान वर्णन सम्मिलित किया जाता है। महाकाव्य के प्रत्येक सर्ग में अलग-अलग छंद होते हैं। प्रत्येक सर्ग का अंतिम छंद नये सर्ग का छंद होता है।


  • Share On Social Media:
  • अध्याय - 6 राजकीय संग्रहालय, अजमेर

     02.06.2020
    अध्याय - 6 राजकीय संग्रहालय, अजमेर

    अध्याय - 6 राजकीय संग्रहालय, अजमेर


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राजकीय संग्रहालय अजमेर की स्थापना 
    राजपूताना म्यूजियम के नाम से 19 अक्टूबर 1908 को अजमेर नगर के मध्य ‘मैगजीन’ के नाम से विख्यात प्राचीन दुर्ग में की गई जिसे मुगल काल में अकबर का किला कहा जाता था। यह एक प्राचीन दुर्ग था जिसका अकबर के काल में जीर्णोद्धार एवं विस्तार किया गया। इसी दुर्ग में इंग्लैण्ड के राजा जेम्स (प्रथम) का राजदूत ‘सर टामस रो’ जहांगीर के समक्ष उपस्थित हुआ था तथा उसने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लिए भारत में व्यापार करने की अनुमति प्राप्त की थी। ब्रिटिश काल में इस दुर्ग में अंग्रेजों का शस्त्रागार स्थापित किया गया था, इसलिए इसे मैगजीन कहा जाने लगा। ई.1857 की सैनिक क्रांति के समय अंग्रेज अधिकारियों एवं उनके परिवारों को इसी दुर्ग में शरण दी गई थी।

    ई.1902 में भारत का वायसराय एवं गवर्नर जनरल लार्ड कर्जन अजमेर आया। उसने राजपूताना की विभिन्न रियासतों में प्राचीन स्मारकों तथा विभिन्न स्थलों पर बिखरी हुई कलात्मक पुरावस्तुओं को देखा। कर्जन ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक सर जॉन मार्शल को निर्देश दिए कि वे इस प्रभूत सामग्री को संरक्षित करने के लिए एक संग्रहालय की स्थापना करें। ब्रिटिश पुरातत्वविद् अलैक्जेण्डर कनिंघम, आर्चिबाल्ड कार्लेयल, डी. आर. भण्डारकर, आर. डी. बनर्जी, गौरीशंकर हीराचंद ओझा, यू. सी. भट्टाचार्य आदि पुरातत्वविदों एवं इतिहासविदों ने इस संग्रहालय के लिए पुरातत्व सामग्री, प्राचीन प्रतिमाओं, शिलालेखों, सिक्कों, ताम्रपत्रों, पुस्तकों, चित्रों आदि को एकत्रित करने में विशिष्ट योगदान दिया। ब्रिटिश सरकार द्वारा किए जा रहे इस कार्य में सहयोग देने के लिए देशी रियासतों के अनेक राजा भी आगे आए। फलस्वरूप अजमेर संग्रहालय प्राचीन इतिहास, कला एवं संस्कृति का महत्वपूर्ण संग्रहालय बन गया। ई.1908 में गवर्नर जनरल के एजेन्ट सर इलियट ग्राहम कोल्विन ने संग्रहालय का उद्घाटन किया। इसे अजमेर संग्रहालय एवं राजपूताना संग्रहालय कहा जाता था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इसे राजकीय संग्रहालय कहा जाने लगा।

    इस संग्रहालय में प्राचीन प्रतिमाएं, मृण्मय प्रतिमाएं (टेराकोटा), शिलालेख, सिक्के, ताम्रपत्र, लघुरंग चित्र, उत्खनन से प्राप्त सामग्री राजपूत कालीन वेश-भूषाएं, धातु प्रतिमाएं तथा विभिन्न कलाओं से सम्बन्धित सामग्री संगृहीत की गई। इन पुरावस्तुओं एवं कला सामग्री को विभिन्न दीर्घाओं में बनी पीठिकाओं तथा शो-केस में प्रदर्शित किया गया है। वर्तमान में इस संग्रहालय में 652 प्रस्तर प्रतिमाएँ, 84 शिलालेख, 3,986 सिक्के, 18 धातु सामग्री, 149 लघुचित्र, 75 अस्त्र-शस्त्र, 363 टैराकोटा सामग्री, 128 स्थानीय हस्तकला सामग्री एवं पूर्वैतिहासिक काल की सामग्री संगृहीत है।

    उत्खनन से प्राप्त सामग्री

    संग्रहालय के पुरातत्व विभाग में सिन्धु नदी घाटी सभ्यता के प्रमुख स्थल मोहेनजोदड़ो (अब पाकिस्तान में) से उत्खनन में प्राप्त की गई मिट्टी की चूड़ियां, बरछी, तीर-शीर्ष, अनाज के दाने, चाकू के रूप में प्रयोग होने वाले फ्लिट-फ्लेक, शंख, हथियारों में धार करने के पत्थर, मातृदेवी की प्रतिमाएं, खिलौने, विभिन्न प्रकार की ईंटें, कलश, ढक्कन, खिलौना-गाड़ी के पहिये आदि मुख्य हैं। इसके अतिरिक्त उन मुहरों के नमूने भी रखे गए हैं जो सिन्धु नदी घाटी में पाई गई थीं। जिन वास्तविक वस्तुओं के ये नमूने हैं वे ईसा से 3000 वर्ष पूर्व की हैं। कुछ नमूनों में पशुओं के चित्रों के ऊपर चित्रलिपि की एक पंक्ति भी उत्कीर्ण है।

    प्रतिमा दीर्घा

    संग्रहालय की प्रतिमा दीर्घा में अनेक प्राचीन प्रतिमाओं को प्रदर्शित किया गया है जो अजमेर के अढ़ाई दिन का झोंपड़ा (12वीं शताब्दी ईस्वी की चौहान कालीन संस्कृत पाठशाला एवं मंदिर), पुष्कर, पीसांगन, हर्षनाथ, अर्थूणा, ओसियां, मंडोर, चन्द्रावती, कामां, बयाना आदि स्थानों से प्राप्त की गई हैं। इन प्रतिमाओं में सौन्दर्यभाव की अभिव्यक्ति देखते ही बनती है। इन प्रतिमाओं में भद्रता, सरलता, आध्यात्मिकता तथा जनजीवन का अद्भुत दर्शन देखने को मिलता है। इस संग्रह में गुप्तकाल से लेकर 16वीं शती तक की प्रतिमाएं भी प्रदर्शित हैं। इनमें चतुर्मुखी शिवलिंग, शिव-पार्वती तथा शिव-पार्वती विवाह से सम्बन्धित प्रतिमाएं उल्लेखनीय हैं। दर्शक गुप्त कालीन प्रतिमाओं को थोड़े से ही प्रयास से उनकी मांसलता के आधार पर पहचान सकता है।

    चौहानों के शासन काल में नागौर से लेकर सांभर, सीकर एवं अजमेर आदि स्थानों पर स्थापत्य एवं शिल्पकला के क्षेत्र में चहुंमुखी प्रगति हुई। छठी से 12वीं शताब्दी की अवधि में इस क्षेत्र की कला, समृद्धि के शिखर पर पहुँच गई। अजमेर संग्रहालय की प्रतिमा दीर्घा में मुख्यतः चौहान काल में 10वीं से 12वीं शती के मध्य बने शिल्प एवं स्थापत्य कला के नमूने प्रदर्शित किए गए हैं। मुख्य प्रतिमाओं में लिंगोद्भव महेश्वर, नक्षत्र, वराह स्वामी, लक्ष्मीनारायण, कुबेर तथा सूर्य प्रतिमा चित्ताकर्षक हैं जो पुष्कर, अढा़ई दिन का झोंपड़ा, बघेरा, हर्षनाथ (सीकर) आदि स्थलों से प्राप्त की गई हैं। लिंगोद्भव महेश्वर की सीकर से प्राप्त प्रतिमा लंदन एवं रूस में आयोजित कला प्रदर्शनियों में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी है। कटारा से प्राप्त ब्रह्मा-विष्णु-महेश, अर्थूणा के इन्द्र एवं कुबेर, कुसुमा से प्राप्त शिव-पार्वती, आउवा से प्राप्त बलदेव-रेवती एवं विष्णु की चित्ताकर्षक प्रतिमाएं, इस संग्रहालय की उल्लेखनीय प्रतिमाएँ हैं।

    जैन मूर्ति-दीर्घा में लगभग तीन दर्जन प्रतिमाएं प्रदर्शित हैं जो राजस्थान में जैन धर्म के प्रभाव की गाथा कहती हैं। इन प्रतिमाओं को अजमेर, पुष्कर, किशनगढ़, बघेरा, टांटोटी, लाडनूं, तलवाड़ा, अर्थूणा, कटारा, झालरापाटन, बड़ौदा (डूंगरपुर) एवं बदनोर (उदयपुर) आदि स्थानों से प्राप्त किया गया। ये स्थान जैन धर्म के केन्द्र स्थल रहे हैं तथा अधिकतर प्रतिमाएं 10वीं से 17वीं शती का प्रतिनिधित्व करती हैं। बघेरा से प्राप्त कुंथुनाथ, पार्श्वनाथ तथा आदिनाथ, टांटोटी से प्राप्त शांतिनाथ, किशनगढ़ से प्राप्त सुपार्श्वनाथ, अजमेर से प्राप्त शंातिनाथ, चन्द्रप्रभु एवं जैन प्रतिमा का छत्र, पुष्कर से प्राप्त जैन प्रतिमा का छत्र, कटारा से प्राप्त आदिनाथ, महावीर स्वामी तथा पार्श्वनाथ, अर्थूणा से प्राप्त जैन सरस्वती, बड़ौदा से प्राप्त आदिनाथ एवं वासुपूज्य, लाडनूं से प्राप्त कुंथुनाथ एवं हाथनों (जोधपुर) से प्राप्त गौमुखी-यक्ष इस संग्रहालय की विशिष्ट जैन प्रतिमाएँ हैं।

    शिलालेख

    अजमेर संग्रहालय में दूसरी शताब्दी ईस्वी-पूर्व से लेकर मध्य युग तक के प्राचीन महत्वपूर्ण शिलालेख विद्यमान हैं। इसके साथ ही अभिलेखयुक्त प्रतिमाएं, स्मृतिफलक शिलालेख तथा ताम्रपत्रों का भी अच्छा संग्रह है। ये शिलालेख ब्राह्मी, कुटिल एवं देवनागरी आदि लिपियों तथा संस्कृत, हिन्दी, डिंगल एवं फारसी आदि भाषाओं में उत्कीर्ण हैं। बरली का शिलालेख राजस्थान का प्राचीनतम शिलालेख कहलाता है। इस शिलालेख को अजमेर से 36 किलोमीटर दूर बरली के निकट भिलोत माता मंदिर से प्राप्त किया गया। यह दूसरी शताब्दी ईस्वी-पूर्व का है तथा ब्राह्मी लिपि में है। संभवतः यह किसी जैन मंदिर का शिलालेख है। नगरी का लेख वि.सं. 481 का है। इस लेख में वैश्य सत्यसूर्य और उसके भाइयों द्वारा भगवान नारायण (विष्णु) के चरण पर मंदिर बनवाए जाने का उल्लेख है। यह लेख मेवाड़ के नगरी (मध्यमिका) नामक प्राचीन नगर से मिला है।

    प्रतिहार वंशीय राजा बाउक के मण्डोर लेख (वि.सं. 894) में मंडोर के प्रतिहारों का ब्राह्मण हरिश्चन्द्र के वंश में होना तथा हरिश्चन्द्र से लेकर बाउक तक की वंशावली और उनका कुछ वृत्तान्त दिया है। बयाना के नाना अभिलेख (8वीं शर्ती ईस्वी) में बलिआ के पुत्र तथा उकेश्वर के पौत्र दुर्गादित्य का, गायों को छुड़ाने के प्रयास में चोरों के हाथों मारे जाने का उल्लेख है। वाक्पतिराज के पुष्कर लेख में 10वीं शती ईस्वी में रुद्रादित्य नामक व्यक्ति द्वारा एक विष्णु मंदिर बनाए जाने का उल्लेख है। चामुण्डराज अर्थूणा लेख (वि.सं.1137) बागड़ के परमार राजा चामुण्डराज के समय का है। इसमें उसके एक अधिकारी के तीन पुत्रों आसदेव, मत्यासराज तथा अनंतपाल के नाम दिए गए हैं। अनंतपाल ने एक शिव मंदिर बनवाया था, यह लेख अर्थूणा के उक्त शिवालय से मिला है।

    अजमेर के अढाई दिन का झोंपड़ा परिसर से चौहान राजा विग्रहराज (चतुर्थ) के समय के छः शिलापट्ट मिले हैं जिन पर राजा विग्रहराज द्वारा लिखित संस्कृत भाषा का नाटक हरकेलि उत्कीर्ण है। इस नाटक में शिव-पार्वती की अभ्यर्थना की गई है और उनकी विभिन्न क्रीड़ाओं का वर्णन है। इसके एक खण्ड में नारायण तथा अन्य देवी-देवताओं की स्तुति है। बारहवीं शताब्दी ईस्वी का चौहान नरेश विग्रहराज (चतुर्थ) साहित्य प्रेमी राजा था और साहित्यकारों का आश्रयदाता भी। उसके समय के लोग उसे कविबांधव कहते थे। इतिहास में उसे वीसलदेव नाम से भी सम्बोधित किया गया है। उसने अजमेर में एक संस्कृत विद्यालय एवं सरस्वती मंदिर बनवाया जो मुहम्मद गौरी की सेनाओं द्वारा तोड़ दिए जाने के बाद अढ़ाई दिन का झौंपड़ा के नाम से अवशेष रूप में रह गया है। इस विद्यालय परिसर से 75 पंक्तियों का एक विस्तृत शिलालेख प्राप्त हुआ है जो इस बात की घोषणा करता है कि इस विद्यालय का निर्माण वीसलदेव ने करवाया था। सरस्वती कण्ठाभरण मंदिर परिसर से विग्रहराज द्वारा संस्कृत में लिखित हरकेलि नाटक के छः चौके मिले हैं जो 22 नवम्बर 1153 की तिथि के हैं। राजपूताना संग्रहालय में रखा उसका शिलालेख घोषणा करता है कि चौहान शासक सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं।

    रंगचित्र

    संग्रहालय के चित्रकला विभाग में कोटा, बूंदी, उदयपुर, जोधपुर, किशनगढ़ एवं बीकानेर आदि रियासतों से प्राप्त विभिन्न चित्रशैलियों के नमूने प्रदर्शित किए गए हैं। इनमें कोटा, करौली, टोंक, बीकानेर, जोधपुर, डूंगरपुर, भरतपुर, झालावाड़ तथा जयपुर के प्रमुख शासकों के चित्रों के साथ-साथ मथुराधीशजी, वल्लभ संप्रदाय, श्रीनाथजी, वासुदेव द्वारा कृष्ण को लेकर यमुना पार करने के चित्र, विभिन्न राग-रागिनियों के चित्र, गेरखनाथजी, अष्टछाप कवि, गुंसाईजी, चीर हरण, राम-रावण युद्ध, वल्लभाचार्यजी, विट्ठलनाथजी, भीष्म पितामह आदि के चित्र सम्मिलित हैं।

    अस्त्र-शस्त्र

    संग्रहालय के एक कक्ष में विभिन्न प्रकार के प्राचीन अस्त्र-शस्त्र का प्रदर्शन किया गया है। इनमें विभिन्न प्रकार की तलवारें, ढाल, कटार, फरसा, जागनोल, बंदूक, धनुषबाण तथा अनेक प्रकार के हथियार संगृहीत हैं। साथ ही एक मनुष्याकार राजपूत योद्धा का मॉडल रखा है जो मध्य-कालीन युद्धों के समय पहनी जाने वाली वेशभूषा से सुसज्जित है।

    सिक्के एवं मुद्राएं

    अजमेर संग्रहालय में सोना, चांदी, तांबा, लैड तथा निकल के 3000 से अधिक सिक्के सुरक्षित हैं जिनमें भारतवर्ष के पूर्वेतिहासिक काल के पंचमार्का (आहत) सिक्के सबसे पुराने हैं। नगरी से प्राप्त जनपद के सिक्कों पर वृक्ष, स्वास्तिक, ब्रह्मी लिपि के लेख तथा पट्ट और मेहराब युक्त पहाड़ी के नीचे टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं से बने नदी के चिह्न अंकित हैं। तक्षशिला से प्राप्त इण्डोग्रीक सिक्के के चित्त की ओर राजा का ऊर्ध्व चित्र है तथा पट्ट की ओर यूनानी देवी एवं देवता, ‘जियस’ लिखा हुआ है एवं वृषभ के चित्र बने हैं। कुषाणकालीन सिक्कों में ईरानी वेशभूषा में अंकित राजा दाहिने हाथ से अग्नि वेदी पर आहुति देते हुए अंकित है तथा बायां हाथ कटि पर बंधी तलवार थामे दिखाया गया है। राजा के पृष्ठ भाग पर शिव तथा त्रिशूल का अंकन है। राजा का शिरस्त्राण (टोप) नुकीला है।

    कनिंघम को पुष्कर से पश्चिमी क्षत्रपों महपान, पायदामन, रुद्रदामन तथा रुद्रसिंह की कई मुद्राएं प्राप्त हुई थीं। गुप्तकालीन सिक्कों में चन्द्रगुप्त (प्रथम) के राजा-रानी के सिक्के, समुद्रगुप्त के ध्वजधारी, धनुर्धारी, परशुधारी, वीणाधारी तथा अश्वमेध प्रकार के सिक्के, कांच का दुर्लभ सिक्का तथा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के विभिन्न प्रकार के सिक्के इस संग्रहालय की महत्वपूर्ण निधि हैं। चौहान अजयदेव के सिक्के में एक ओर बैठी हुई देवी का अंकन है तथा दूसरी ओर देवनागरी में अजयदेव लिखा हुआ है। अश्वारोही-वृषभ प्रकार के सिक्के के चित भाग पर ढाल और भाला लिए अश्वारोही तथा पट्ट भाग पर शिव-वाहन नंदी बैठा है। गधिया प्रकार के सिक्कों के चित भाग पर राजा का भद्दा चेहरा है तथा पट्ट भाग पर सिंहासन या अग्निवेदी को बिन्दुओं के माध्यम से बनाया गया है। दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों एवं मुगल बादशाहों के विभिन्न सिक्के भी इस संग्रहालय में संगृहीत हैं।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-43

     19.05.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-43

    प्रकृति और मानव मन के उल्लास की संयुक्त अभिव्यक्ति हैं लोकनृत्य


    लोकनृत्यों के मामले में राजस्थान की धरती समृद्ध है। लोकनृत्य प्रकृति और मानव मन के उल्लास की संयुक्त अभिव्यक्ति हैं। मारवाड़ का डांडिया, मारवाड़ व मेवाड़ का गैर, शेखावाटी का गींदड़, जालोर का ढोल नृत्य, जसनाथी सिद्धों का अग्नि नृत्य, अलवर-भरतपुर क्षेत्र का बम नृत्य, लगभग पूरे प्रदेश में होने वाले घूमर, चंग व डांडिया नृत्य देखते ही बनते हैं। वनवासियों के लोकनृत्यों में भीलों के गवरी व राई नृत्य, गरासियों के वालर, लूर नृत्य, कूद नृत्य, घूमर, मांदल नृत्य, गूजरों का चरी नृत्य, रामदेवजी के भोपों को तेरहताली नृत्य, पेशेवर लोक नर्तकों का भवाई नृत्य, मीणों, कंजरों, सांसियों, कालबेलियों, गाड़िया लुहारों तथा बणजारों के नृत्य रंग-बिरंगी छटा बिखेरते हैं। वनवासियों, कंजरों, जोगियों, सांसियों और कालबेलियों के नृत्यों में शृंगार रस की प्रधानता होती है तथा इनमें खुलापन अधिक होता है। इनके लोकनृत्यों में कामुकता अधिक होती है तथा कामुक संकेतों के साथ-साथ अंग प्रदर्शन पर भी जोर दिया जाता है। प्रमुख लोकनृत्यों का विवरण इस प्रकार है-

    गैर नृत्य : गोल घेरे में इस नृत्य की संरचना होने के कारण यह 'घेर' और कालांतर में 'गैर' कहा जाने लगा। नृत्य करने वालों को 'गैरिया' कहते हैं। यह होली के दूसरे दिन से प्रारंभ होता है तथा 15 दिन तक चलता है। उन दिनों मेवाड़ और मारवाड़ में इस नृत्य की धूम मची रहती है। इस नृत्य को देखने से ऐसा लगता है मानो तलवारों से युद्ध चल रहा हो। इस नृत्य की सारी प्रक्रियाएं और पद संचालन तलवार युद्ध और पटेबाजी जैसी लगती हैं। यह नृत्य वृत्त में होता है और नृत्य करते-करते अलग-अलग मंडल बनाये जाते हैं। यह केवल पुरुषों का नृत्य है। मेवाड़ और बाड़मेर के गैर नृत्य की मूल रचना एक ही प्रकार है किंतु नृत्य की लय, चाल और मण्डल में अंतर होता है। इस नृत्य में जाट, ठाकुर, पटेल, पुरोहित, माली, मेघवाल आदि सभी जातियों के पुरुष भाग लेते हैं। अधिकतर स्थानों पर जातियों के अनुसार गैर टोलियां बनी हुई हैं। नर्तक सफेद धोती, सफेद अंगरखी तथा सिर पर लाल अथवा केसरिया रंग की पगड़ी बांधते हैं। जालोर आदि क्षेत्रों में नर्तक फ्रॉक जैसी आकृति का एक घेरदार लबादा पहनते हैं तथा कमर में तलवार बांधने के लिये पट्टा भी धारण करते हैं। गैर नृत्य तीन प्रकार के होते हैं-

    (1.) आंगे-बांगे की गैर- इसे आंगी की गैर भी कहते हैं। इसमें प्रत्येक नर्तक चालीस मीटर के कपड़े से बनी आंगी व बागा पहनता है। कपड़े का रंग सफेद और लाल होता है। नर्तक दोनों हाथों में रोहिड़े या बबूल की डण्डियां लिये हुए ढोल की थाप पर घूमते हुए अपनी डण्डियां आजू-बाजू के नर्तकों की डण्डियों से टकराते हैं।

    (2.) नागी गैर- इसे सादी गैर भी कहते हैं। यह दो प्रकार की होती है।

    (अ.) डण्डियों वाली गैर- इसमें नर्तक परम्परागत वेशभूषा धारण करते हैं। धोती, कुर्ता पूठिया इसकी विशेष पहचान है। पैरों में आठ-आठ किलो के घुंघरू पहनकर नृत्य करते हैं।

    (ब.) रूमाल वाली गैर- नर्तक हाथों में डण्डियों की जगह रंग-बिरंगे रूमाल रखते हैं तथा ढोल की थाप पर लहराते हुए नृत्य करते हैं।

    (3.) स्वांगी गैर- नर्तक हाथ में डण्डियां लेकर नृत्य करते हैं। प्रत्येक नर्तक अलग वेशभूषा में माली, सेठ, सरदार, साधु, आदि रूप धारण करते हैं।

    गींदड़ नृत्य : यह शेखावाटी का लोकप्रिय नृत्य है। सुजानगढ़, चूरू, रामगढ़, लक्ष्मणगढ़, सीकर और उसके आसपास के क्षेत्रों में होली के दिनों में इस नृत्य के सामूहिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। नगाड़ा इस नृत्य का मुख्य वाद्य होता है। नर्तक अपने हाथों में छोटे डण्डे लिये हुए होते हैं। नगाड़े की ताल के साथ इन डंडों को परस्पर टकराकर नर्तक नाचते हैं। जैसे-जैसे नृत्य गति पकड़ता है, नगाड़े की ध्वनि भी तीव्र होती है। इस नृत्य में विभिन्न प्रकार के स्वांग भी बनाये जाते हैं जिनमें साधु, शिकारी, सेठ-सेठानी, डाकिया, दुल्हा, दुल्हन आदि प्रमुख हैं।

    चंग नृत्य : यह पुरुषों का नृत्य है। इस नृत्य में प्रत्येक पुरुष के साथ चंग (डफ) होता है और वह चंग बजाता हुआ वृत्ताकार में नृत्य करता है। इसमें बांसुरी का प्रयोग भी होता है। इस नृत्य में धमाल तथा होली के गीत गाये जाते हैं। नर्तक गोल घेरे में चंग बजाता हुआ एक लय के साथ आगे बढ़ता है और चंग बजाता हुआ अपने स्थान पर चक्कर खाता है। इस नृत्य में अंग संचालन देखने योग्य होता है। यह मारवाड़ तथा शेखावाटी क्षेत्र का नृत्य है। नर्तक चूड़ीदार पायजामा-कुर्ता धारण करते हैं। कमर में रूमाल तथा पांवों में घुंघरू बांधे जाते हैं।

    डांडिया नृत्य : यह मारवाड़ का लोकप्रिय नृत्य है। यों तो गैर, गींदड़ और डांडिया तीनों ही नृत्य वृत्ताकार हैं और इनमें डण्डी का प्रयोग होता है, तीनों ही नृत्य होली के अवसर पर आयोजित होते हैं और इनमें केवल पुरुष ही भाग लेते हैं किंतु पद संचालन, भाव भंगिमा, ताल, गीत और वेशभूषा आदि में तीनों ही अलग-अलग हैं। इस नृत्य में पुरुषों की टोली हाथ में लंबी छड़ियां लेकर नाचती है। इसमें शहनाई और नगाड़ा बजाया जाता है। नर्तक आपस में डांडिया टकराते हुए नृत्य करते हैं। होली के बाद आरंभ होने वाले इस नृत्य में नर्तक राजा-रानी, राम-सीता, शिव-पार्वती, कृष्ण-राधा आदि का वेश धरकर नृत्य करते हैं।

    ढोल नृत्य : यह जालोर का प्रसिद्ध नृत्य है। यह भी पुरुषों द्वारा ही किया जाता है। इसमें एक साथ चार या पाँच ढोल बजाये जाते हैं। इसमें पहले मुखिया ढोल बजाता है फिर अन्य नर्तक मुँह में तलवार, हाथों में डण्डे तथा रूमाल लेकर नृत्य करते हैं। यह नृत्य प्रायः विवाह के अवसर पर किया जाता है। नृत्य के दौरान ढोल को थाकना शैली में बजाया जाता है। थाकना के बाद अलग शैलियों में भी ढोल वादन होता है। यह नृत्य ढोली, माली, सरगरा तथा भील आदि जातियों में अधिक होता है।

    अग्नि नृत्य : धधकते हुए अंगारों पर किया जाने वाला यह नृत्य जसनाथी संप्रदाय के सिद्ध लोग करते हैं। इसका उद्गम क्षेत्र बीकानेर जिले का कतरियासर ग्राम माना जाता है। यह नृत्य रात्रि में आयोजित होता है। इस नृत्य में नर्तक अंगारों के ढेर में प्रवेश करते हैं और नाचते हुए निकलते हैं। इतना ही नहीं नर्तक अंगारों को हाथ में उठा लेते हैं तथा मुँह में भी डाल लेते हैं। कभी-कभी अंगारों को झोली में भरकर नाना प्रकार के करतब किये जाते हैं। नर्तक अग्नि से इस प्रकार खेलते हैं मानो अंगारों से नहीं फूलों से खेल रहे हों। यह नृत्य भी पुरुषों द्वारा ही किया जाता है।

    बमरसिया नृत्य : यह अलवर और भरतपुर क्षेत्र का नृत्य है। इस नृत्य में एक बड़े नगाड़े का प्रयोग किया जाता है। इसे दो आदमी डंडों की सहायता से बजाते हैं और नर्तक रंग-बिरंगे फूंदों तथा पंखों से बंधी लकड़ी हाथों में लेकर हवा में उछालते हुए नाचते हैं। वाद्ययंत्रों में नगाड़े के अलावा थाली, चिमटा, ढोलक, मंजीरा और खड़तालों का प्रयोग किया जाता है। नृत्य के साथ होली के गीत और रसिया गाया जाता है। बम (नगाड़े) के साथ रसिया गाने से इसे बम रसिया कहते हैं। इस नृत्य को नयी फसल आने की प्रसन्नता में किया जाता है। बम नृत्य के दौरान गिलास के ऊपर थाली रखकर बजायी जाती है।

    घूमर नृत्य : यह समूचे राजस्थान का लोकप्रिय नृत्य है। यह नृत्य मांगलिक अवसरों तथा पर्वों पर आयोजित होता है। यह महिलाओं का नृत्य है। स्त्रियाँ जब आकर्षक पोषाकें विशेषकर घुमावदार घाघरा पहनकर तथा चक्कर लेकर गोल घेरे में नृत्य करती हैं तो उनके लहंगों का घेर और हाथों का लचकदार संचालन देखते ही बनता है। घूमर के साथ अष्टताल कहरवा लगाया जाता है जिसे सवाई कहते हैं। इसे अनेक घूमर गीतों के साथ मंच पर भी प्रस्तुत किया जाता है।

    तेरहताली नृत्य : यह कामड़ जाति का अनोखा नृत्य है। यह नृत्य बैठकर किया जाता है। इसमें स्त्रियां अपने हाथ-पैरों में मंजीरे बांध लेती हैं और फिर दोनों हाथों से डोरी से बंधे मंजीरों को दु्रतगति की ताल और लय से शरीर पर बंधे मंजीरों पर प्रहार करती हुई विविध प्रकार की भाव-भंगिमायें प्रदर्शित करती हैं। यह चंचल और लचकदार नृत्य देखते ही बनता है। पुरुष तंदूरे की तान पर मुख्यतः रामदेवजी के भजन गाते हैं।

    भवाई नृत्य : यह नृत्य अपनी चमत्कारिता के लिये अधिक प्रसिद्ध है। इस नृत्य में विभिन्न शारीरिक करतब दिखाने पर अधिक बल दिया जाता है। यह उदयपुर संभाग में अधिक प्रचलित है। अनूठी नृत्य अदायगी, शारीरिक क्रियाओं के अद्भुत चमत्कार तथा लयकारी विविधता इसकी मुख्य विशेषतायें हैं। तेज लय में सिर पर सात-आठ मटके रखकर नृत्य करना, जमीन से मुँह से रूमाल उठाना, गिलासों पर नाचना, थाली के किनारों पर, तलवार की धार पर, कांच के टुकड़ों पर और नुकीली कीलों पर नृत्य करना इस नृत्य की विशेषतायें हैं।

    घुड़ला नृत्य : यह मुख्यतः मारवाड़ में तथा अल्प मात्रा में सम्पूर्ण राजस्थान में किया जाता है। यह स्त्रियों के द्वारा किया जाने वाला सामूहिक नृत्य है। स्त्रियां छिद्र युक्त मटके सिर पर रखकर उसमें दिये जलाती हैं। नृत्य के दौरान घूमर तथा पणिहारी के अंदाज में गोल चक्कर बनाया जाता है। यह नृत्य गणगौर पर्व के आसपास किया जाता है।

    कच्छी घोड़ी नृत्य : यह शेखावाटी क्षेत्र का नृत्य है किंतु अब सम्पूर्ण प्रदेश में किया जाता है। इस नृत्य में पुरुष ही भाग लेते हैं। नर्तक बांस की टोकरियों को घोड़ी की आकृति देता है तथा उस पर घोड़े की आकृति का कपड़े का खोल चढ़ा दिया जाता है। नर्तक इसके बीच में से घुसकर खड़ा होकर नृत्य करता है। देखने वाले को लगता है कि नर्तक घोड़ी पर बैठा है।

    वालर नृत्य : यह गरासियों का नृत्य है। गणगौर त्यौहार के दिनों में गरासिया स्त्री-पुरुष अर्द्धवृत्ताकार में धीमी गति से बिना किसी वाद्य के नृत्य करते हैं। यह नृत्य डूंगरपुर, उदयपुर, पाली व सिरोही क्षेत्रों में प्रचलित है।

    लांगुरिया नृत्य : लांगुरिया हनुमानजी का लोक स्वरूप है। करौली क्षेत्र की कैला मैया, हनुमानजी की माँ अंजना का अवतार मानी जाती हैं। नवरात्रियों के दिनों में करौली क्षेत्र में लांगुरिया नृत्य होता है। इसमें स्त्री-पुरुष सामूहिक रूप से भाग लेते हैं। नृत्य के दौरान नफीरी तथा नौबत बजती है। लांगुरिया को संबोधित करके हल्के-फुल्के हास्य-व्यंग्य किये जाते हैं।

    इण्डोणी : यह कालबेलियों का युगल नृत्य है जो गोल घेरे में होता है। इसमें पुंगी तथा खंजरी का प्रयोग होता है। नर्तक युगल कामुकता का प्रदर्शन करने वाले कपड़े पहनते हैं।

    मांदल : यह कोटा क्षेत्र का नृत्य है। इसे गरासिया जाति की स्त्रियां गोल घेरा बनाकर करती हैं। इस पर गुजराती गरबे का प्रभाव है। इसमें थाली व बांसुरी का प्रयोग होता है।

    गवरी नृत्य : यह भीलों का सामाजिक एवं धार्मिक नृत्य है। डूंगरपुर-बांसवाड़ा, उदयपुर, भीलवाड़ा एवं सिरोही आदि क्षेत्रों में अधिक प्रचलित है। यह गौरी पूजा से सम्बद्ध होने के कारण गवरी कहलाता है। इसमें नतृक नाट्य कलाकारों की भांति अपनी साज-सज्जा करते हैं।

    डांग नृत्य : यह मेवाड़ के नाथद्वारा क्षेत्र में किया जाने वाला नृत्य है। इसे स्त्री-पुरुष साथ-साथ करते हैं। पुरुषों द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की एवं स्त्रियों द्वारा राधाजी की नकल की जाती है तथा वैसे ही वस्त्र धारण किये जाते हैं। यह होली के अवसर पर किया जाता है। इस नृत्य के समय ढोल, मांदल तथा थाली आदि वाद्यों का प्रयोग किया जाता है।

    पणिहारी नृत्य : यह कालबेलियों का नृत्य है जिसमें स्त्री एवं पुरुष दोनों मिलकर नृत्य करते हैं। इस समय पणिहारी गीत गाये जाते हैं।

    शंकरिया नृत्य : यह भी कालबेलियों का युगल नृत्य है जो प्रेम कथाओं को आधार बनाकर किया जाता है। इस नृत्य का अंग लास्य कामुकता से भरा होता है।

    बागड़िया नृत्य : यह नृत्य कालबेलिया स्त्रियों द्वारा भीख मांगते समय किया जाता है। साथ में चंग बजाया जाता है।

    नेजा नृत्य : यह नृत्य होली के तीसरे दिन भील स्त्री-पुरुषों द्वारा युगल रूप में किया जाता है। पाली, सिरोही, उदयपुर एवं डूंगरपुर आदि जिलों में यह अधिक प्रचलित है।

    युद्ध नृत्य : इस नृत्य में भील जाति के पुरुष हाथ में तलवार लेकर युद्ध कला का प्रदर्शन करते हैं। यह नृत्य उदयपुर, पाली, सिरोही व डूंगरपुर क्षेत्र में अधिक प्रचलित है।


    जातीय, क्षेत्रीय एवं अन्य विशेषताओं के आधार पर नृत्यों का वर्गीकरण

    भीलों के नृत्य : गवरी, राई, गैर, घूमर, नेजा एवं युद्ध नृत्य आदि।

    कालबेलियों के नृत्य : इण्डोणी, शंकरिया, पणिहारी, बागड़िया आदि।

    गरासियों के नृत्य : मांदल, गरबा, घूमर, गैर व लूर आदि।

    गूजर जाति के नृत्य : चरी नृत्य।

    शेखावाटी के नृत्य : गींदड़, चंग, डांडिया, कच्छी घोड़ी आदि।

    मारवाड़ के नृत्य : डांडिया, गैर, घुड़ला, तेरह ताली, घूमर, लूर, अग्नि नृत्य, ढोल नृत्य।

    अलवर-भरतपुर क्षेत्र के नृत्य : बमरसिया।

    गृहस्थों द्वारा किये जाने वाले नृत्य : पणिहारी, मेंहदी, दीपक नृत्य, टूटिया, गौरी।

    होली के नृत्य : चंग, गैर, डांडिया, गींदड़, नेजा, बमरसिया एवं डांग नृत्य आदि।

    व्यावसायिक नृत्य : गवरी, राई, गैर, घूमर, नेजा एवं युद्ध नृत्य आदि।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×