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  • अध्याय - 9 क्रिस्टल गैलेरी, उदयपुर

     02.06.2020
    अध्याय - 9 क्रिस्टल गैलेरी, उदयपुर

    अध्याय - 9 क्रिस्टल गैलेरी, उदयपुर

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    फतह प्रकाश महल में अब होटल स्थापित कर दिया गया है। इसी होटल में क्रिस्टल गैलेरी की स्थापना की गई है जिसमें विश्व का सबसे बड़ा क्रिस्टल संग्रह स्थापित किया गया है। यह सम्पूर्ण क्रिस्टल सामग्री महाराणा सज्जनसिंह (ई.1874-84) के निजी संग्रह की है। विक्टोरियन युग में महाराणा ने इसे एफ. एण्ड सी. ऑस्लर को आदेश देकर बनवाया था। इस संग्रह में क्रिस्टल चेयर्स, सोफासैट तथा पलंग भी शामिल हैं। यह प्रातः 9 बजे से सायं 6 बजे तक खुला रहता है।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-46

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-46

    पर्यावरण एवं संस्कृति की चितेरी चित्रकला (1)


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राजस्थान में अत्यंत प्राचीन काल से अब तक विकसित हुई चित्रकला की समृद्ध धारा का प्रवाह देखा जा सकता है। कोटा जिले के आलणियां, दरा, बैराठ तथा भरतपुर जिले के दर नामक स्थानों के शैलाश्रयों में आदिम मानव द्वारा उकेरे गये रेखांकन तथा मृद्भाण्डों पर उकेरी गयी कलात्मक रेखायें प्रदेश की अत्यंत प्राचीन चित्रण परंपरा की कहानी कहती हैं। राजस्थान से प्राप्त विक्रम संवत के पूर्व के सिक्कों पर अंकित मानव, पशु-पक्षी, सूर्य, चंद्र, धनुष, बाण, स्तूप, स्वास्तिक, वज्र, पर्वत, नदी आदि धार्मिक चिह्न प्राप्त होते हैं। बैराठ, रंगमहल तथा आहाड़ से प्राप्त सामग्री पर वृक्षावली तथा ज्यामितीय अंकन देखने को मिलता है। राजस्थान में बड़ी संख्या में जैन साधुओं ने हस्तलिखित पोथियों का निर्माण किया जिसमें अनेक कलात्मक चित्र बनाये।

    राजपूत चित्रकला : राजस्थान में चित्रकला की अनेक शैलियां विकसित हुई। जिनमें मेवाड़ शैली, मारवाड़ शैली, बूंदी शैली, किशनगढ़ शैली, जयपुर शैली, बीकानेरी शैली, अलवर शैली, कोटा शैली, नाथद्वारा शैली, उणियारा शैली, अजमेर शैली, डूंगरपुर शैली, देवगढ़ शैली आदि प्रमुख हैं। इन सब शैलियों को राजपूत चित्रकला के अंतर्गत रखा जा सकता है। राजपूत चित्रकला पर मुगल एवं ईरानी शैलियों का प्रभाव दिखाई देता है। राजस्थानी चित्रकला का वैज्ञानिक वर्गीकरण सर्वप्रथम डॉ. आनंद कुमार स्वामी ने ई.1916 में लिखी अपनी पुस्तक 'राजपूत पेंटिंग'में किया था। आनंद कुमार स्वामी, ओ. सी. गांगुली, हैवेल आदि विद्वानों ने इसे राजपूत चित्रकला कहा जबकि रामकृष्ण दास ने इसे राजस्थानी कला कहा। मुस्लिम प्रभाव से इस शैली में विभिन्न रियासतों में अलग-अलग चित्र शैलियों का विकास हुआ। इन शैलियों को पृष्ठ भूमि, बॉर्डर, पशु पक्षियों का अंकन, पोशाकों का अंकन, आंखों की बनावट, चित्रों की विषय वस्तु, चेहरे की दाढ़ी-मूंछें, चिबुक, होंठ आदि की बनावट से अलग-अलग किया जाता है। रंगों के आधार पर भी वर्गीकरण हो सकता है। जयपुर एवं अलवर शैलियों के चित्रों में हरे रंग का, जोधपुर एवं बीकानेर शैलियों में पीले रंग का, कोटा शैली में नीले रंग का, बूंदी शैली में सुनहरी रंग का तथा किशनगढ़ शैली में सफेद एवं गुलाबी रंग का अधिक प्रयोग होता है। बॉर्डर की पट्टी के रंगों से भी इन्हें अलग किया जाता है। उदयपुर में पीला, किशनगढ़ में गुलाबी एवं हरा, बूंदी में लाल एवं सुनहरी तथा जयपुर में चंदेरी एवं लाल रंग के बॉर्डर अधिक बनाये गये हैं।

    राजस्थानी चित्रकला को अध्ययन की दृष्टि से निम्नलिखित विभागों में विभाजित किया जा सकता है-

    मेवाड़ स्कूल : नाथद्वारा शैली, देवगढ़ उपशैली, शाहपुरा उपशैली, उदयपुर शैली, सावर उपशैली, बागौर ठिकाणे की उपशैली,बेगंू ठिकाणे की उपशैली, केलवा ठिकाणे की उपशैली।

    मारवाड़ स्कूल : जोधपुर शैली, किशनगढ़ शैली, नागौर उपशैली, सिरोही शैली, बीकानेर शैली, जैसलमेर शैली, भिणाय ठिकाणे की उपशैली, घाणेराव शैली, जूनियां शैली।

    हाड़ौती स्कूल : बूंदी शैली, झालावाड़ शैली, कोटा शैली।

    ढूंढाड़ स्कूल : आम्बेर शैली, शेखावाटी शैली, उणियारा ठिकाणे की उपशैली, ईसरदा ठिकाणे की उपशैली, शाहपुरा शैली, जयपुर शैली, अलवर शैली।


    मेवाड़ प्रदेश की चित्रकला

    मेवाड़ प्रदेश की चित्रकला के अंतर्गत उदयपुर शैली, नाथद्वारा शैली, देवगढ़ उपशैली, शाहपुरा उपशैली, चावंड, बनेड़ा, बागौर, सावर, बेगूं तथा केलवा ठिकाणों की चित्रकला आती है।

    मेवाड़ शैली : इसे उदयपुर शैली भी कहते हैं। ई.1260 का श्रावक प्रतिक्रमण चूर्णि नामक चित्रित ग्रंथ मेवाड़ शैली का प्रथम उदाहरण है। यह ग्रंथ ताड़पत्रों से बनाया गया है। इसके चित्र नागदा के सास-बहू मंदिर तथा चित्तौड़ के मोकल मंदिर की तक्षण कला जैसे हैं। गरुड़, नासिका, परवल की खड़ी फांक जैसे नेत्र, घुमावदार एवं लम्बी अंगुलियां, लाल-पीले रंग की प्रचुरता, छोटी ठोड़ी, अलंकारों की प्रधानता आदि इस शैली की विशेषतायें हैं। उदयपुर शैली में कदम्ब के वृक्ष एवं हाथियों का प्रमुखता से अंकन किया गया है। मेवाड़ में राणा कुंभा, राणा सांगा, मीरांबाई, राणा प्रताप, उदयसिंह, जगतसिंह, राजसिंह, जयसिंह, अमरसिंह आदि के काल में चित्रकला का अच्छा विकास हुआ। महाराणा अमरसिंह प्रथम के काल में यह अपने चरम पर पहुंची। इसे मेवाड़ की चित्रकला का स्वर्ण युग भी कहा जाता है। चावण्ड में ई.1605 में चित्रित भेंट, रसिक प्रिया, उदयपुर में ई.1648 में चित्रित रामायण तथा आर्ष रामायण, ई.1741 में चित्रित गीत गोविंद तथा ई.1719 में चित्रित बिहारी सतसई उदयपुर शैली के प्रमुख चित्र हैं। मेवाड़ शैली में चित्रित रागमाला, बारहमासा, पंचतंत्र तथा रसमंजरी भी उल्लेखनीय हैं।

    नाथद्वारा शैली : ई.1670 में श्रीनाथजी के विग्रह के साथ ब्रज की चित्रण परंपरा मेवाड़ में आयी तथा उदयपुर शैली व ब्रज शैली के मिश्रण से नाथद्वारा शैली का विकास हुआ। इस शैली में आंखें हिरण के समान बनाई जाती हैं। गायों का अधिक अंकन किया जाता है। यमुना के तट, अन्नकूट, जन्माष्टमी उत्सव आदि का अंकन भी इस चित्र शैली की प्रमुख विशेषता है। इस शैली के चित्रों में हरे एवं पीले रंग का अधिक प्रयोग किया जाता है।

    मेवाड़ की लघु चित्र शैली : महाराणा जगतसिंह प्रथम (ई.1628 से 1652) के काल में चित्रकला का खूब विकास हुआ। मेवाड़ के राणा शैव मत के उपासक थे किंतु इस काल में वल्लभ संप्रदाय के प्रसार के कारण श्री कृष्ण के जीवन से संबंधित चित्रों का निर्माण अधिक हुआ। इस काल में रागमाला (ई.1628), रसिकप्रिया (ई.1628-30), गीतगोविंद (ई. 1629), भगवद् पुराण (ई.1648) एवं रामायण (ई.1649) आदि विषयों पर लघु चित्रों का निर्माण हुआ। इनमें से अधिकतर चित्र देश-विदेश के संग्रहालयों में सुरक्षित हैं।

    देवगढ़ उपशैली : इस शैली का विकास देवगढ़ के रावत द्वारकादास चूण्डावत द्वारा हुआ। यह मेवाड़ शैली की उपशैली है। मोटी एवं सधी हुई रेखाएं, पीले रंगों का बाहुल्य, मारवाड़ के अनुकूल स्त्री पुरुषों की आकृतियां, शिकार, गोठ, आदि से सम्बन्धित चित्र इसकी विशेषता है।

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  • अध्याय -16 बौद्ध धर्म तथा भारतीय संस्कृति पर उसका प्रभाव

     02.06.2020
    अध्याय -16 बौद्ध धर्म तथा भारतीय संस्कृति पर उसका प्रभाव

    बौद्ध धर्म तथा भारतीय संस्कृति पर उसका प्रभाव


    हे भिक्षुओं, तुम आत्मदीप बनकर विचरो। तुम अपनी ही शरण में जाओ। किसी अन्य का सहारा मत ढूँढो। केवल धर्म को अपना दीपक बनाओ। केवल धर्म की शरण में जाओ। -महात्मा बुद्ध।


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    छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व में ब्राह्मण धर्म के विरुद्ध दूसरी धार्मिक क्रांति के प्रणेता गौतम बुद्ध थे जिन्हें शाक्य मुनि तथा महात्मा बुद्ध भी कहा जाता है। उनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था। उनके पिता शुद्धोदन, शाक्य गणराज्य के प्रधान थे। शाक्यों का गणराज्य भारत की उत्तर-पूर्वी सीमा पर हिमालय की तराई में स्थित था जिसकी राजधानी कपिलवस्तु थी।

    सिद्धार्थ का जन्म

    कपिलवस्तु एवं देवदह के मध्य, वर्तमान नौतनवा स्टेशन से 8 मील पश्चिम में रुक्मिनदेई नामक स्थान है। वहाँ उस काल में लुम्बिनी नामक गांव स्थित था। बौद्ध सूत्रों के अनुसार ईसा से 563 वर्ष पूर्व कपिलवस्तु के राजा शुद्धोदन की महारानी मायादेवी अपने पिता के घर आ रही थीं कि मार्ग में लुम्बिनी वन में वैशाख मास की पूर्णिमा को महारानी ने एक बालक को जन्म दिया। इस बालक का नाम सिद्धार्थ रखा गया।

    सिद्धार्थ का बचपन

    सिद्धार्थ के जन्म के एक सप्ताह पश्चात ही उनकी माता मायादेवी का स्वर्गवास हो गया। अतः सिद्धार्थ का पालन-पोषण उनकी मौसी एवं विमाता प्रजापति ने किया। सिद्धार्थ बचपन से ही विचारवान, करुणावान एवं एकान्तप्रिय थे। संसार में व्याप्त रोग, जरा एवं मृत्यु आदि कष्टों को देखकर उनका हृदय पीड़ित मनुष्यों के लिए करुणा से भर जाता था।

    सिद्धार्थ का वैवाहिक जीवन

    पिता शुद्धोदन ने सिद्धार्थ को क्षत्रियोचित शिक्षा दिलवाई तथा सोलह वर्ष की आयु में उनका विवाह दण्डपाणि नामक राजा की सुंदर राजकन्या यशोधरा के साथ कर दिया। सिद्धार्थ का मन घर-परिवार एवं सांसारिक बातों में नहीं लग सका। वे इन बातों की ओर से उदासीन रहते थे। राजा शुद्धोधन ने सिद्धार्थ के लिए प्रत्येक मौसम के अनुकूल अलग-अलग प्रासाद बनवाए तथा प्रत्येक प्रासाद में विभिन्न ऋतुओं के अनुरूप ऐश्वर्य और भोग विलास की सामग्री उपलब्ध करवाई। सिद्धार्थ को अपने दाम्पत्य जीवन से एक पुत्र भी हुआ जिसका नाम राहुल रखा गया। लगभग 12 वर्ष तक गृहस्थ जीवन का सुख भोग लेने पर भी सिद्धार्थ का मन सांसारिक प्रवृत्तियों में नहीं लग सका।

    महाभिनिष्क्रमण

    लगभग 29 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ ने ज्ञान की खोज में घर छोड़़ने का निर्णय लिया। एक रात्रि में वे अपने घोड़े पर बैठकर 30 योजन दूर निकल गए। गोरखपुर के समीप अनोमा नदी के तट पर उन्होंने अपने राजसी वस्त्र एवं आभूषण उतार दिए और तलवार से अपना जूड़ा काट कर सन्यासी बन गए। इस प्रकार उन्होंने राजसी सुख एवं परिवार का त्याग कर दिया। इस घटना को बौद्ध धर्म एवं साहित्य में 'महाभिनिष्क्रमण' कहा जाता है।

    सत्य और ज्ञान की खोज में

    सन्यासी हो जाने के बाद बुद्ध तप तथा साधना में लीन हो गए। सबसे पहले वे वैशाली के आलाकालाम नामक एक तपस्वी के पास ज्ञानार्जन हेतु गए किन्तु वहाँ उनकी ज्ञान पिपासा शान्त नहीं हो पाई। इसके बाद वे राजगृह के ब्राह्मण उद्रक रामपुत के पास गए। इन दोनों गुरुओं से सिद्धार्थ ने योग साधना और समाधिस्थ होना सीखा परन्तु इससे उन्हें सन्तोष नहीं हुआ। इसलिए वे उरुवेला की वनस्थली में जाकर तपस्या में लीन हो गए। यहाँ उन्हें कौडिल्य आदि पाँच ब्राह्मण सन्यासी भी मिले। अपने इन ब्राह्मण साथियों के साथ वे उरुवेला में कठोर तपस्या करने लगे।

    सिद्धार्थ ने पहले तो तिल और चावल खाकर तप किया परन्तु बाद में उन्होंने आहार का सर्वथा त्याग कर दिया जिससे उनका शरीर सूख गया। तप करते-करते सिद्धार्थ को 6 वर्ष बीत गए परन्तु साधना में सफलता नहीं मिली। जनश्रुति है कि एक दिन नगर की कुछ स्त्रियाँ गीत गाती हुई उस ओर से निकलीं जहाँ सिद्धार्थ तपस्यारत थे। उनके कान में स्त्रियों का एक गीत पड़ा जिसका भावार्थ इस प्रकार था- 'वीणा के तारों को ढीला मत छोड़़ो। ढीला छोड़़ने से उनसे सुरीला स्वर नहीं निकलेगा परन्तु वीणा के तारों को इतना भी मत कसो कि वे टूट जाएं।'

    तपस्वी सिद्धार्थ ने अपने हृदय में गीत के भावों पर विचार किया तथा अनुभव किया कि नियमित आहार-विहार से ही योग साधना सिद्ध हो सकती है। किसी भी बात की अति करना ठीक नहीं है, अतः मनुष्य को मध्यम मार्ग ही अपनाना चाहिए। अतः उन्होंने फिर से आहार करना शुरु कर दिया।

    सिद्धार्थ में यह परिवर्तन देखकर उनके पाँचों ब्राह्मण साथियों ने उन्हें पथ-भ्रष्ट समझकर उनका साथ छोड़़ दिया और वे सारनाथ चले गए।

    बुद्धत्व की प्राप्ति

    साथी तपस्वियों के चले जाने से सिद्धार्थ विचलित नहीं हुए और उन्होंने ध्यान लगाने का निश्चय किया। वे एक पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यान की अवस्था में बैठ गए। सात दिन तक ध्यानमग्न रहने के पश्चात् वैसाख पूर्णिमा की रात को जब सिद्धार्थ ध्यान लगाने बैठे तो उन्हें बोध हुआ। उन्हें साक्षात् सत्य के दर्शन हुए। तभी से वे बुद्ध अथवा गौतम बुद्ध के नाम से विख्यात हुए। बुद्ध के जीवन में ज्ञान-प्राप्ति की यह घटना 'सम्बोधि' कहलाती है। उस समय बुद्ध की आयु 35 वर्ष थी।

    जिस वृक्ष के नीचे उन्हें बोध प्राप्त हुआ, उसे 'बोधि-वृक्ष' कहा गया। जिस स्थान पर यह घटना घटी, वह स्थान 'बोधगया' कहलाया। इस घटना के बाद भी महात्मा बुद्ध चार सप्ताह तक बोधि-वृक्ष के नीचे रहे और धर्म के स्वरूप का चिन्तन करते रहे।

    मज्झिम प्रतिपदा

    बुद्ध ने साधना का मध्यम-मार्ग अपनाया तथा इसी का उपदेश दिया। इस मार्ग के अनुसार काम-वासना अर्थात् विषय-भोग में फंसना और घनघोर तप करके शरीर को कष्ट देना, दोनों ही व्यर्थ हैं। इसी को मध्यम मार्ग अथवा 'मज्झिम प्रतिपदा' कहा जाता है।

    धर्म-चक्र प्रवर्तन

    ज्ञान प्राप्ति के पश्चात महात्मा बुद्ध ने सबसे पहले बोधगया में तपस्यु और मल्लिक नामक दो बनजारों को अपने ज्ञान का उपदेश दिया। इसके बाद बुद्ध अपने ज्ञान एवं विचारों को जनसाधारण तक पहुँचाने के उद्देश्य बोधगया से निकल पड़े और सारनाथ पहुँचे। यहाँ उन्हें वे पाँचों ब्राह्मण साथी मिल गए जो उन्हें छोड़़कर चले गए थे। बुद्ध ने उन्हें अपने ज्ञान की, धर्म के रूप में दीक्षा दी। यह घटना बौद्ध धर्म के इतिहास में 'धर्म-चक्र प्रवर्तन' के नाम से जानी गई तथा वे पांचों शिष्य 'पंचवर्गीय' कहलाए।

    यहाँ से महात्मा बुद्ध काशी गए और वहाँ अपने ज्ञान का प्रसार करने लगे। जब बुद्ध के शिष्यों की संख्या बढ़ गई तब उन्होंने एक संघ की स्थापना की तथा उनके लिए आचरण के नियम निर्धारित किए। इस संघ की सहायता से महात्मा बुद्ध लगभग 45 वर्ष तक अपने धर्म का प्रचार करते रहे। वे अंग, मगध, वज्जि, कौशल, काशी, मल्ल, शाकय, कोलिय, वत्स, सूरसेन आदि जनपदों में घूमते रहे। केवल वर्षा काल में वे एक स्थान पर निवास करते थे। राजगृह एवं श्रावस्ती से उन्हें विशेष प्रेम था।

    अपने उपदेशों में उन्होंने जनभाषा को अपनाया तथा जाति-पाँति और ऊँच-नीच की भावना से दूर रहते हुए मानव समाज को अपने उपदेशों से लाभान्वित किया। अपने शिष्य आनन्द के अनुरोध पर उन्होंने स्त्रियों को भी बौद्धधर्म की दीक्षा देना स्वीकार कर लिया।

    महापरिनिर्वाण

    इस प्रकार जीवन-यापन करते हुए ई.पू. 544 में 80 वर्ष की आयु में गोरखपुर के निकट कुशीनारा में गौतम बुद्ध ने देह-त्याग किया। बुद्ध के शरीर त्यागने की घटना को बौद्ध लोग 'महापरिनिर्वाण' कहते हैं। उनका अन्तिम उपदेश था- 'हे भिक्षुओं, तुम आत्मदीप बनकर विचरो तुम अपनी ही शरण में जाओ। किसी अन्य का सहारा मत ढूँढो। केवल धर्म को अपना दीपक बनाओ। केवल धर्म की शरण में जाओ।'

    नैतिक जीवन पर आधारित धर्म

    बुद्ध के समय में लोगों में आत्मा-परमात्मा, लोक-परलोक, पाप-पुण्य, और मोक्ष आदि विषयों पर घोर वाद-विवाद होते थे। महात्मा बुद्ध इन विवादों में नहीं पड़े। उन्होंने इन प्रश्नों के उत्तर नहीं दिए तथा मनुष्य को नैतिकता पर आधारित जीवन जीने का उपदेश दिया। उन्होंने संसार तथा मानव जीवन को असत्य नहीं माना। वे इस विवाद में नहीं पड़े कि संसार तथा मनुष्य अमर हैं या नश्वर, सीमित हैं या असीम! जीव और शरीर एक है या अलग। जब किसी ने उनसे इन प्र्रश्नों का उत्तर देने का आग्रह किया तो भी वे मौन रहे। उन्होंने जीवन को जैसा भी है, वैसा मानकर व्यावहारिक दृष्टि अपनाने का उपदेश दिया।

    उन्होंने अपने धर्म की इतनी अधिक नैतिक व्याख्या की कि कुछ विद्वानों की दृष्टि में बौद्ध धर्म, वास्तव में धर्म नहीं होकर आचार-शास्त्र मात्र था। मूलतः बौद्ध धर्म कोई पृथक दर्शन नहीं है क्योंकि बुद्ध ने ईश्वरीय सत्ता, आत्मा, मोक्ष, पुनर्जन्म आदि प्रश्नों पर विचार प्रकट नहीं किए। आज जो कुछ भी बौद्ध दर्शन के नाम से विख्यात है, वह महात्मा बुद्ध की मृत्यु के बाद का विकास है। बौद्ध धर्म आध्यात्म शास्त्र भी नहीं है, क्योंकि बुद्ध ने सृष्टि सम्बन्धी विषय पर भी अपने विचार प्रकट नहीं किए।

    उनका धर्म तो व्यावहारिक धर्म था। वह मनुष्य की उन्नति का साधन था। वह जीवन का विषय है और इसी जीवन में निर्वाण दिलाता है। वह नितान्त बुद्धिवादी है, उसमें अन्ध-विश्वासों के लिए स्थान नहीं है तथा उसका आधार मानव मात्र का कल्याण है।


    बौद्ध धर्म के प्रमुख सिद्धान्त

    बौद्ध धर्म के मुख्य सिद्धान्त इस प्रकार थे-

    चार आर्य सत्य (चत्वारि आर्य सत्यानि)

    बौद्ध धर्म की आधारशिला है, उसके चार आर्य सत्य। उसके अन्य समस्त सिद्धान्तों का विकास इन्हीं चार आर्य-सत्यों के आधार पर हुआ है। ये चार आर्य सत्य निम्नलिखित प्रकार से हैं-

    (1.) सर्वं दुःखम्: सर्वं दुःखम् अर्थात् हर जगह दुःख है। महात्मा बुद्ध ने सम्पूर्ण मानवता को ना-ना प्रकार के दुःखों से संत्रस्त देखा। इसलिए वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि मानव तथा मानवेतर जीवन ही दुःख है। जन्म के साथ कष्ट होता है, नाश भी कष्टमय है, रोग कष्टमय है, मृत्यु कष्टमय है, अरुचिकर से संयोग कष्टमय है, सुखकर से वियोग कष्टमय है, जो भी वासना असंतुष्ट रह जाती है, वह भी कष्टप्रद है। राग से उत्पन्न पंचस्कंध ही कष्टमय है। समस्त संसार में आग लगी है तब आनंद मनाने का अवसर कहाँ है!

    सुख मनाने से दुःख उत्पन्न होता है। इन्द्रिय-सुख के विषयों में खो जाने से भी दुःख उत्पन्न होता है। महासागरों में जितना जल है उससे अधिक आंसू तो मानवों ने बहाए होंगे। पृथ्वी पर ऐसा कोई स्थान नहीं है जहाँ मनुष्य पर मृत्यु हावी न हो। दुःख के तीर से घायल मनुष्य को उसे निकाल देना चाहिए। जीवन दुःखों से परिपूर्ण ळै। सभी उत्पन्न वस्तुएं दुःख और कष्ट हैं। जन्म, जरा, रोग, मृत्यु, शोक, क्लेश, आकांक्षा और नैराश्य सभी आसक्ति से उत्पन्न होते हैं। अतः ये सब भी दुःख हैं। इस प्रकार हर ओर दुःख है।

    (2.) दुःख समुदयः- दुःख समुदयः अर्थात् दुःख का कोई न कोई कारण अवश्य होता है। महात्मा बुद्ध के अनुसार जन्म-मरण के चक्र को चलाने वाली तृष्णा दुःखों का मूल कारण है। यह तृष्णा तीन प्रकार की है- (1.) काम-तृष्णा- इन्द्रिय सुखों के लिए, (2.) भव-तृष्णा- जीवन के लिए, (3.) विभव-तृष्णा- वैभव के लिए। उनका कहना था कि यह तृष्णा पुनर्भव को करने वाली, आसक्ति और राग के साथ चलने वाली और यत्र-तत्र रमण करने वाली है।

    यह वैसे ही है जैसे कि काम-तृष्णा या भव तृष्णा। इस तृष्णा का जन्म कैसे होता है? इसका समाधान करते हुए बुद्ध ने कहा- 'रूप, शब्द, गन्ध, रस, स्पर्श तथा मानसिक वितर्क और विचारों से जब मनुष्य आसक्ति करने लगता है तो तृष्णा का जन्म होता है। सभी दुःख उपाधियों से उत्पन्न होते हैं जो कि अविद्या के कारण हैं। अविद्या, दुःखों का मूल है और जीवैष्णा के कारण है।'

    (3.) दुःख निरोध- दुःख निरोध अर्थात् दुःखों का नाश संभव है। जिस प्रकार संसार में दुःख हैं और दुःखों के कारण हैं, उसी प्रकार, दुःखों का नाश भी सम्भव है। बुद्ध की दृष्टि में तृष्णाओं के मूलोच्छेदन से दुःखों से छुटकारा मिल सकता है। उनका कहना था- 'संसार में जो कुछ भी प्रिय लगता है, संसार में जिससे रस मिलता है उसे जो दुःखस्वरूप समझेंगे और उससे डरेंगे वे ही तृष्णा को छोड़ सकेंगे। रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान का विरोध ही दुःख निरोध है।'

    (4.) दुःख निरोधगामिनी प्रतिपद् (दुःखनिरोध मार्ग): दुःख निरोधगामिनी प्रतिपद् अर्थात् दुःखों के नाश के उपाय भी हैं। बुद्ध के अनुसार 'अष्टांगपथ' अथवा 'आर्य अष्टांगिक मार्ग' पर चलकर कोई भी व्यक्ति दुःखों पर विजय प्राप्त कर सकता है। इसमें आठ अंगों की व्यवस्था है। इस मार्ग को 'दुःख निरोधगामिनि प्रतिपद्' तथा 'दुःख निरोध मार्ग' भी कहा जाता है।

    आर्य अष्टांगिक मार्ग

    इसे अष्टांग पथ भी कहते हैं। अष्टांग पथ 'बौद्ध धर्म का नीति-शास्त्र' है। यह मध्यम मार्ग है। इसमें आत्मासक्ति रखना और स्वयं को कष्ट देना दोनों का ही निषेध है। इस प्रकार महात्मा बुद्ध ने आध्यात्मिक और नैतिक दोनों दृष्टि से मध्यम मार्ग अपनाया। दो ऐसी सीमाएं हैं जिनका अनुसरण कभी नहीं करना चाहिए- (1.) इन्द्रिय विषयों के सुखों और वासनाओं की पूर्ति का निम्नतम मार्ग। (2.) दूसरा आत्मा को कष्ट देने की आदत। ये दोनों ही त्याज्य एवं कष्टमय हैं। बुद्ध के अनुसार 'अष्टांग मार्ग मनुष्य की आंख खोलता है और बुद्धि प्रदान करता है, जो शांति, अन्तर्दृष्टि, उच्च प्रज्ञा और निर्वाण की ओर ले जाता है।' अष्टांगिक मार्ग के आठ अंग इस प्रकार से हैं-

    (1.) सम्मादिट्ठि (सम्यक् दृष्टि): अविद्या के कारण संसार तथा आत्मा के सम्बन्ध में मिथ्या दृष्टि प्राप्त होती है। सत्य-असत्य, पाप-पुण्य, सदाचार और दुराचार में भेद करना ही सही सम्यक् दृष्टि है। इसी से चार आर्य सत्यों का सही ज्ञान प्राप्त होता है। यह ज्ञान श्रद्धा और भावना से युक्त होना चाहिए। सम्यक् दृष्टि चारों आर्य सत्यों का 'सत्' ध्यान है जो निर्वाण की ओर ले जाता है।

    (2.) सम्मा संकप्प (सम्यक संकल्प): सम्यक् संकल्प का अर्थ इन्द्रिय सुखों से लगाव तथा दूसरों के प्रति बुरी भावनाओं और उनको हानि पहुँचाने वाले विचारों का मूलोच्छेदन करने का निश्चय है। कामना और हिंसा से मुक्त आत्म-कल्याण का पक्का निश्चय ही सम्यक संकल्प है। सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प में परिवर्तित होनी चाहिए।

    (3.) सम्मा वाचा (सम्यक वाणी): सम्यक् संकल्प से हमारे वचनों का नियंत्रण होना चाहिए। सत्य, विनम्र और मृदु वचन तथा वाणी पर संयम ही सम्यक वाणी है। प्रत्येक को अधम्म (अशुभ) से बचकर धम्म (शुभ) ही बोलाना चाहिए। शत्रुता को कठोर शब्दों से नहीं अपितु अच्छी भावनाओं से दूर किया जा सकता है। मन को शांत करने वाला एक हितकारी शब्द हजारों निरर्थक शब्दों से अच्छा है।

    (4.) सम्मा कम्मन्त (सम्यक् कर्मान्त): सब कर्मों में पवित्रता रखना। हिंसा, द्रोह तथा दुराचरण से बचते रहना और सत्कर्म करना ही सम्यक् कर्मान्त है। जीवनाश, चोरी, कामुकता, झूठ, अतिभोजन, सामाजिक मनोरंजन, प्रसाधन, आभूषण धारण करना, आरामदेह बिस्तरों पर सोना तथा सोना चांदी उपयोग में लाना आदि दुराचरणों से बचना ही सम्यक् कर्मान्त है।

    (5.) सम्मा आजीव (सम्यक् आजीव): न्यायपूर्ण मार्ग से आजीविका चलाना। जीवन-निर्वाह से निषिद्ध मार्गों का त्याग करना ही सम्यक् आजीव है। अस्त्र-शस्त्र, पशु, गोश्त, शराब और जहर आदि का व्यापार नहीं करना चाहिए। दबाव, धोखा, रिश्वत, अत्याचार, जालसाजी, डकैती, लूट, कृतघ्नता आदि से जीविकोपार्जन नहीं करना चाहिए।

    (6.) सम्मा वायाम् (सम्यक् व्यायाम): इसे सम्यक् प्रयत्न भी कहते हैं। इसका अर्थ है सत्कर्मों के लिए निरन्तर उद्योग करते रहना। इसमें आत्म संयम्, इन्द्रिय निग्रह, शुभ विचारों को जाग्रत करने और मन को सर्वभूतहित पर जमाए रखने का 'सत्' प्रयत्न करना शामिल है।

    (7.) सम्मासति (सम्यक स्मृति): सम्यक् समाधि के लिए सम्यक् स्मृति आवश्यक है। इसमें शरीर की अशुद्धियों, संवेदना, सुख, दुःख और तटस्थ वृत्ति का स्वभाव, लोभ, घृणा और भ्रमयुक्त मन का स्वभाव, धर्म, पंचस्कंधों, इन्द्रियों, इन्द्रियों के विषयों, बोधि के साधनों तथा चार आर्यसत्यों का स्मरण सम्मिलित है। सम्यक् स्मृति का अर्थ शरीर, चित्त, वेदना या मानसिक अवस्था को उनके यथार्थ रूप में स्मरण रखना है। उनके यथार्थ स्वरूप को भूल जाने से मिथ्या विचार मन में घर कर लेते हैं और उनके अनुसार क्रियाएं होने लगती हैं, आसक्ति बढ़ती है और दुःख सहन करना पड़ता है। सम्यक् स्मृति से आसक्ति नष्ट होकर दुःखों से छुटकारा मिलता है तथा मनुष्य सम्यक् समाधि में प्रवेश के योग्य हो जाता है।

    (8.) सम्मा समाधि (सम्यक् समाधि): राग-द्वेष से रहित होकर चित्त की एकाग्रता को बनाए रखना ही सम्यक् समाधि है। निर्वाण तक पहुँचने से पूर्व सम्यक् समाधि की चार अवस्थाएं आती हैं-

    (प.) पहली अवस्था में शांत चित्त से चार आर्य सत्यों पर विचार किया जाता है। विरक्ति तथा शुद्ध विचार अपूर्व आनंद प्रदान करते हैं।

    (पप.) दूसरी अवस्था में मनन आदि प्रयत्न दब जाते हैं, तर्क-वितर्क अनावश्यक हो जाते हैं, संदेह दूर हो जाते हैं और आर्य-सत्यों के प्रति निष्ठा बढ़ती है। इस अवस्था में आनंद तथा शांति का अनुभव होता है।

    (पपप.) तीसरी अवस्था में तटस्थता आती है। मन को आनंद तथा शांति से हटाकर उपेक्षाभाव लाने का प्रयत्न किया जाता है। इससे चित्त की साम्यावस्था रहती है परन्तु समाधि में आनंद के प्रति उदासीनता आ जाती है।

    (पअ.) चौथी अवस्था पूर्ण शांति की है जिसमें सुख-दुःख नष्ट हो जाते हैं। चित्त की साम्यावस्था, दैहिक सुख और ध्यान का आनंद आदि किसी बात का ध्यान नहीं रहता अर्थात् चित्त-वृत्तियों का निरोध हो जाता है। यह पूर्ण शांति, पूर्ण विराग और पूर्ण निरोध की अवस्था है। इसमें दुःखों का सर्वथा निरोध होकर अर्हंत पद अथवा निर्वाण प्राप्त हो जाता है। यह पूर्ण प्रज्ञा की अवस्था है।

    मध्यमा प्रतिपदा

    दुःख से छुटकारा पाने के लिए महात्मा बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग बताया। वह विशुद्ध आचार-तत्त्वों पर आधारित था। उसमें न तो शारीरिक कष्ट एवं क्लेश से युक्त कठोर तपस्या को उचित बताया गया और न ही अत्यधिक सांसारिक भोग विलास को। वस्तुतः वह दोनों अतियों के बीच का मार्ग था। इसलिए उसे मध्यमा-प्रतिपदा भी कहा गया है। इसके पालन से मनुष्य निर्वाण-पथ की ओर अग्रसर हो सकता है।

    शील, समाधि और प्रज्ञा

    अष्टांग-पथ का अनुसरण करने से मनुष्य के भीतर शील, समाधि और प्रज्ञा का उदय होता है जो कि बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग के तीन प्रधान अंग हैं। अखण्ड समाधि से 'प्रज्ञा' का उदय होता है। 'प्रज्ञा' पदार्थ ज्ञान है। प्रज्ञा का स्थान बौद्धिक स्थान से बहुत ऊँचा है। प्रज्ञा से कामासव, भवासव और अविद्यासव का नाश होता है तथा यथार्थ ज्ञान उत्पन्न होता है जिसके बिना सदाचार असम्भव है और सदाचार के बिना ज्ञान की पूर्णता असम्भव है।

    दस शील

    महात्मा बुद्ध ने शील या नैतिकता पर अत्यधिक बल दिया। उन्होंने अपने अनुयाइयों को मन, वचन और कर्म से पवित्र रहने को कहा। इसके लिए उन्होंने दस शील का पालन करने को कहा। इन्हें हम सदाचार के नियम भी कह सकते हैं। दस शील इस प्रकार से हैं-

    (1.) अहिंसा व्रत का पालन करना,

    (2.) सदा सत्य बोलना,

    (3.) अस्तेय अर्थात् चोरी न करना,

    (4.) अपरिग्रह अर्थात् वस्तुओं का संग्रह न करना,

    (5.) ब्रहाचर्य अर्थात् भोग विलास से दूर रहना,

    (6.) नृत्य का त्याग,

    (7.) सुगन्धित पदार्थों का त्याग,

    (8.) असमय में भोजन का त्याग,

    (9.) कोमल शय्या का त्याग,

    (10.) कामिनी एवं कंचन का त्याग।

    सदाचार के दस नियमांें में से प्रथम पाँच नियम, महावीर स्वामी के पाँच अणुव्रतों के समान हैं। बुद्ध के अनुसार इन पाँच नियमों का पालन करना गृहस्थ, साधु तथा उपासकों आदि सबके लिए आवश्यक है। इनका पालन करते हुए सांसारिक रहकर भी मनुष्य सन्मार्ग की ओर बढ़ सकता है। अर्थात् बुद्ध ने गृहस्थ लोगों को भी उज्जवल भविष्य का आश्वासन दिया किंतु जो व्यक्ति संसार की मोह-माया छोड़कर भिक्षु-जीवन बिताता है, उसके लिए शील के समस्त दस नियमों का पालन करना आवश्यक है। इस प्रकार, शील के नियमों का पालन करने में गृहस्थों की अपेक्षा भिक्षुओं के लिए कड़े नियम बनाए गए थे।


    वैदिक धर्म की मान्यताओं के सम्बन्ध में बुद्ध के विचार

    वेदों की प्रामाणिकता का खण्डन

    महात्मा बुद्ध श्रद्धा की बजाए तर्क पर बल देते थे। वेदों में कही गई बातों को वे अन्तिम सत्य के रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। उनका मानना था कि इस प्रकार के अन्धविश्वास से मानव बुद्धि कुण्ठित हो जाएगी। वेदों की प्रामाणिकता में विश्वास नहीं रखने के कारण बौद्ध धर्म ईश्वर को इस सृष्टि का निर्माता नहीं मानता है। महात्मा बुद्ध के इस प्रकार के विचारों के कारण कुछ लोगों ने उन्हें 'नास्तिक' कहा। बुद्ध का कहना था कि मनुष्य की बुद्धि परीक्षात्मक होनी चाहिए। उसे किसी के कहे पर पूरा विश्वास न करके अपने आप बात और चीज को परखना चाहिए। स्वयं अपने विषय में उन्होंने कहा- 'जो लोग मुझे सर्वज्ञ मानते हैं, वे मेरी निन्दा करते है।'

    आत्मा के सम्बन्ध में मौन

    वेदों में 'आत्मा' के सम्बन्ध में गहन विचार किया गया है किंतु महात्मा बुद्ध जीवन भर इस विषय पर मौन रहे। उन्होंने न तो यह कहा कि आत्मा है और न यह कहा कि आत्मा नहीं है। उन्होंने आत्मा सम्बन्धी विषय पर विवाद करने से ही मना कर दिया। क्योंकि यदि वे यह कहते कि आत्मा है तो मनुष्य को स्वयं से आसक्ति हो जाती और उनकी दृष्टि में आसक्ति ही दुःख का मूल कारण थी। यदि वे यह कहते कि आत्मा नहीं है तो मनुष्य यह सोचकर दुःखी हो जाता कि मृत्यु के बाद मेरा कुछ भी शेष नहीं रहेगा। अतः उन्होंने इस विवाद में पड़ना उचित नहीं समझा।

    कर्म-फल के सिद्धांत में विश्वास

    महात्मा बुद्ध कर्म-फल के सिद्धांत में विश्वास रखते थे। उनका कहना था कि मनुष्य जैसा कर्म करता है उसे वैसा ही फल भोगना पड़ता है। मनुष्य का यह लोक और परलोक उसके कर्म पर निर्भर हैं परन्तु बुद्ध के कर्म का अर्थ वैदिक कर्मकाण्ड से नहीं था। वे मनुष्यों की समस्त कायिक, वाचिक और मानसिक चेष्टाओं को कर्म मानते थे। हमारे ये कर्म ही सुख-दुःख के दाता हैं। उनका कहना था कि मनुष्य की जाति मत पूछिए। निम्न जाति का व्यक्ति भी अच्छे कर्मों से ज्ञानवान और पापरहित मुनि हो सकता है और आचरणहीन ब्राह्मण, शूद्र हो सकता है। अतः महात्मा बुद्ध ने अन्तःशुद्धि और सम्यक् कर्मों पर जोर देकर समाज में नैतिक आदर्शवाद स्थापित करने पर जोर दिया।

    पुनर्जन्म में विश्वास

    वेदों में मनुष्य के पुनर्जन्म में विश्वास किया गया है। बुद्ध कर्मवादी थे तथा उनकी मान्यता थी कि कर्मों के अनुसार ही मनुष्य अच्छा या बुरा जन्म पाता है किंतु बुद्ध ने आत्मा के अस्तित्त्व के विषय में कुछ नहीं कहा। अतः यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि फिर कर्मों का फल कौन भोगता है? पुनर्जन्म किसका होता है? महात्मा बुद्ध के अनुसार यह पुनर्जन्म आत्मा का नहीं अपितु अहंकार का होता है। जब मनुष्य की तृष्णाएँ एवं वासनाएँ नष्ट हो जाती हैं तो वह पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो जाता है।

    कार्य-कारण सम्बन्ध में विश्वास

    यद्यपि वैदिक धर्म यह मानता है कि सृष्टि का उद्भव केवल ईश्वर की इच्छा से हुआ है तथा उसका कोई कारण नहीं है और ईश्वर बिना किसी कारण के कृपा करते हैं तथापि वैदिक धर्म कर्म-फल सिद्धांत तथा पुनर्जन्म में विश्वास रखने के कारण कार्य-कारण सम्बन्ध में विशवास रखता है। महात्मा बुद्ध भी संसार की प्रत्येक वस्तु और घटना के पीछे किसी न किसी कारण का होना मानते थे। उनका कहना था कि प्रत्येक घटना अथवा स्थिति के कारणों को समझकर ही उससे मुक्ति पाने का उपाय किया जा सकता है। महात्मा बुद्ध का कहना था कि जन्म-मरण सकारण हैं। जन्म के कारण जरा एवं मरण है। कार्य-कारण की श्ृंखला से यह संसार चलता रहता है। संसार को चलाने के लिए किसी सत्ता अथवा ईश्वर की आवश्यकता नहीं पड़ती।

    निब्बान (निर्वाण) में विश्वास

    वैदिक धर्म मोक्ष में विश्वास रखता है जिसका अर्थ है कि मनुष्य के अच्छे कर्मों तथा ईश्वरीय कृपा से मनुष्य की आत्मा जन्म-मरण के चक्र को काटकर पुनः ईश्वर में विलीन हो जाती है तथा उसे फिर कभी जन्म नहीं लेना पड़ता। बौद्ध धर्म का अन्तिम लक्ष्य भी निर्वाण प्राप्त करना है किंतु यह वैदिक मोक्ष से थोड़ा भिन्न है। निर्वाण शब्द का अर्थ है 'बुझना'। बुद्ध का कहना था कि मन में पैदा होने वाली तृष्णा या वासना की अग्नि को बुझा देने पर निर्वाण प्राप्त हो सकता है। यह निर्वाण इसी जन्म में तथा इसी लोक में प्राप्त किया जा सकता है। निर्वाण का अर्थ है- बार-बार होने वाले जन्म-मरण की स्थिति से मुक्ति पाना।

    बुद्ध का कहना था- 'हे भिक्षुओ! यह संसार अनादि है। तृष्णा से संचालित हुए प्राणी इसमें भटकते फिरते हैं। उनके आदि-अन्त का पता नहीं चलता। भव-चक्र में पड़ा हुआ प्राणी अनादि काल से बार-बार जन्म लेता और मरता आया है। इसने संसार में बार-बार जन्म लेकर प्रिय-वियोग और अप्रिय-संयोग के कारण रो-रोकर अपार आँसू बहाए हैं। दीर्घकाल तक तीव्र दुःख का अनुभव किया है। अब तो तुम समस्त संस्कारों से निर्वेद प्राप्त करो, वैराग्य प्राप्त करो, मुक्ति प्राप्त करो।'

    आत्मावलम्बन में विश्वास

    गौतम बुद्ध ने आत्मावलम्बन को बड़ा महत्त्व दिया है। बौद्ध धर्म का एक प्रमुख तत्त्व करुणा है। करुणा के तीन भेद कहे गए हैं-

    (1.) स्वार्थमूलक करुणा: माता-पिता की अपनी संतान के प्रति करुणा स्वार्थमूलक करुणा है।

    (2.) सहेतुकी करुणा: किसी भी प्राणी को कष्ट में देखकर हृदय का द्रवित हो जाना सहेतुकी करुणा है।

    (3.) अहेतुकी या महाकरुणा: इसमें न तो मनुष्य का स्वार्थ होता है और न वह पवित्रता का ही विचार करता है। वह समस्त प्राणियों पर समान रूप से अपनी करुणा बिखेरता है। महात्मा बुद्ध ने मनुष्य को स्वयं अपना भाग्यविधाता माना है। उनका मानना था कि मनुष्य अपने ही प्रयत्नों से दुःखों से छुटकारा प्राप्त कर सकता है। इसके लिए ईश्वरीय कृपा की आवश्यकता नहीं है।

    पाटिच्च समुप्पाद (प्रतीत्य समुत्पाद)

    बुद्ध के द्वितीय आर्य सत्य में द्वादश निदान का उल्लेख हुआ है। यह द्वादशनिदान का सिद्धांत ही प्रतीत्यसमुत्पाद कहलाता है। यह बुद्ध के उपदेशों का मुख्य सिद्धांत है। कर्म का सिद्धांत, क्षणिकवाद, नैरात्म्यवाद, संघातवाद और अर्थक्रियाकारित्व आदि शेष समस्त सिद्धांत प्रतीत्यसमुत्पाद पर आधारित हैं। प्रतीत्यसमुत्पाद का अर्थ है- एक वस्तु के प्राप्त होने पर दूसरी वस्तु की उत्पत्ति अथवा एक कारण के आधार पर एक कार्य की उत्पत्ति। उसका सूत्र है- 'यह होने पर यह होता है।'

    दूसरे शब्दों में, इसे 'कार्य-कारण नियम' भी कह सकते हैं। किसी भी घटना के लिए कोई कारण अवश्य होता है। बिना कारण के कुछ भी नहीं घटित होता। इस सिद्धांत से इस सत्य की स्थापना हुई कि संसार में बारम्बार जन्म और उससे होने वाले दुःखों का सम्बन्ध किसी सृष्टिकर्ता से नहीं है, प्रत्युत उनके कुछ निश्चित कारण एवं प्रत्यय होते हैं। इस कारण बुद्ध को अनीश्वरवादी कहा जाता है।

    प्रतीत्यसमुत्पाद को महात्मा बुद्ध ने इतना अधिक महत्त्व दिया कि उन्होंने इसे 'धम्म' कहा है। प्रतीत्यसमुत्पाद सापेक्ष भी है और निरपेक्ष भी। सापेक्ष दृष्टि से वह संसार है और निरपेक्ष दृष्टि से निर्वाण। जो प्रतीत्यसमुत्पाद देखता है, वह धर्म देखता है और जो धर्म देखता है वह प्रतीत्यसमुत्पाद देखता है। उसको भूल जाना ही दुःख का कारण है। उसके ज्ञान से दुःखों का अंत हो जाता है।

    क्षणिकवाद

    प्रतीत्य समुत्पाद के सिद्धान्त से ही क्षणिकवाद अथवा परिवर्तनवाद का जन्म हुआ। बौद्ध दर्शन के अनुसार संसार और जीवन दोनों में से कोई नित्य नहीं है। उनकी स्वतंत्र सत्ता नहीं है। दोनों परिवर्तनशील हैं, इसलिए नाशवान हैं। महात्मा बुद्ध का कहना था कि यह जगत परिवर्तनशील है। इसकी प्रत्येक वस्तु प्रति क्षण बदलती रहती है, यहाँ तक कि आत्मा व जगत भी निरन्तर बदलता रहता है परन्तु संसार का यह परिवर्तन साधारण मनुष्य को दिखाई नहीं पड़ता। ठीक वैसे ही जैसे नदी का प्रवाह प्रति क्षण बदलते रहने पर भी पूर्ववत् ही प्रतीत होता है।

    महात्मा बुद्ध के समाजिक विचार

    महावीर स्वामी की भाँति महात्मा बुद्ध भी ब्राह्मणवादी जाति-व्यवस्था के विरोधी थे। वे जन्म के आधार पर किसी को छोटा या बड़ा नहीं मानकर कर्म के आधार पर व्यक्ति का मूल्यांकन करने के पक्षधर थे। वे दास-प्रथा के विरोधी थे। उनकी मान्यता थी कि बेकारी एक अभिशाप है और राज्य का कर्त्तव्य है कि वह प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी काम में लगाए रखे। बुद्ध राजतन्त्र के पक्ष में थे तथा राजा को समस्त भूमि का स्वामी मानते थे। उनके अनुसार आदर्श राजा वह है जो शस्त्रबल तथा दण्ड के बिना केवल नीति और धर्म के माध्यम से अच्छा शासन चला सके।

    उन्होंने सामाजिक उन्नति के लिए कई बातों पर बल दिया था। वे हिंसा, निर्दयता, स्त्रियों पर अत्याचार, दुराचारण, चुगलखोरी, कटु भाषा तथा प्रलाप के विरुद्ध थे। उनकी मान्यता थी कि प्रत्येक गृहस्थ को अपने माता-पिता, अचार्य, पत्नी, मित्र, सेवक और साधु-सन्यासियों की सेवा करनी चाहिए। बैर से बैर नहीं मिट सकता अतः प्र्रेम का सहारा लेना चाहिए। अक्रोध से क्रोध को जीतना चाहिए। दूसरे के दोषों को देखने की आदत नहीं रखनी चाहिए। मनुष्य को अपने मन, वचन एवं कर्म को संतुलित रखकर जीवनयापन करना चाहिए।

    बौद्ध-भिक्षु और संघ

    बुद्ध जानते थे कि सब मनुष्य एक जैसे कठोर नियमों का पालन नहीं कर सकते। इसलिए उन्होंने अपने अनुयाइयों को 'भिक्षु' तथा 'उपासक' नामक दो श्रेणियों में विभाजित कर दिया। भिक्षु उन्हें कहते थे जो गृहस्थ जीवन छोड़कर बुद्ध के समस्त उपदेशों का पूर्ण पालन करते हुए बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार में जीवन व्यतीत करते थे। बुद्ध ने स्त्रियों को भी भिक्षुणी बनने का अधिकार दिया। उन्हें भी पुरुष-भिक्षुओं की भाँति कठोर नियमों का पालन करना पड़ता था। गृहस्थ स्त्री-पुरुषों को उपासक एवं उपासिका कहा जाता था। वे गृहस्थ जीवन में रहकर, बुद्ध द्वारा बताए गए नियमों का पालन करते थे।

    भिक्षु-वर्ग को संगठित एवं संयमी बनाए रखने के लिए बुद्ध ने बौद्ध-संघ की स्थापना की। संघ में भिक्षुओं को निर्धारित दिनचर्या और कार्यक्रम के अनुसार जीवन बिताना पड़ता था। संघ में जाति-पाँति का भेद नहीं था और न ही इसका कोई अधिपति होता था। संघ का मुख्य काम बौद्ध धर्म का प्रचार करना था। संघों में रहने वाले भिक्षु-भिक्षुणियों के लिए अलग-अलग मठ बने होते थे जहाँ वे त्यागमय एवं सादा जीवन बिताते थे। वर्ष के आठ माह तक भिक्षुगण घूम-घूमकर बौद्ध धर्म का प्रचार करते थे और चार माह मठ में रहते हुए आत्मचिन्तन एवं साधना करते थे। इनमें से बहुत से मठ शिक्षा के महत्त्वपूर्ण केन्द्र बन गए।

    बौद्ध संघ गणतन्त्रात्मक प्रणाली के आधार पर संगठित किया गया था। संघ सम्बन्धी कार्यों में प्रत्येक भिक्षु के अधिकार समान थे। संघ की बैठकों में उपस्थित रहना अनिवार्य था। अनुपस्थित व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के माध्यम से भी अपना मत प्रकट करवा सकता था। प्रत्येक सदस्य स्वतन्त्रतापूर्वक अपना मत दे सकता था। बहुमत के द्वारा निर्णय लिए जाते थे। प्रत्येक प्रस्ताव को तीन बार प्रस्तुत और स्वीकृत किया जाता था। तभी वह 'नियम' बनता था। संघ की सभाओं में सदस्यों के बैठने की व्यवस्था करने वाले को 'आसन-प्रज्ञापक' कहते थे।

    बैठक में प्रस्ताव रखने वाले को प्रस्ताव की सूचना पहले से देनी होती थी। इस कार्यवाही को 'ज्ञाप्ति' कहा जाता था। प्रस्ताव को 'नति' कहा जाता था। प्रस्ताव प्रस्तुत करने को 'अनुस्सावन' अथवा 'कम्मवाचा' कहा जाता था। विचार-विमर्श के बाद प्रस्ताव पर मतदान होता था। कभी-कभी शलाकाओं द्वारा मतदान की व्यवस्था की जाती थी। संघीय-सभा करने के लिए 30 सदस्यों की उपस्थिति आवश्यक थी। कोरम के अभाव में सभा की कार्यवाही अवैध समझी जाती थी। इस प्रकार, संघ गणतान्त्रिक पद्धति के अनुसार कार्य करता था।

    बौद्ध धर्म की शाखाएं

    गौतम के तीन शिष्यों- उपाली, आनंद तथा महाकश्यप ने बुद्ध के उपदेशों को याद रखा और अपने शिष्यों को बताया। ई.पू.247 में सम्राट अशोक के समय पाटलिपुत्र में तीसरी बौद्ध सभा में गौतम बुद्ध के उपदेश एकत्रित किए गए। बुद्ध के शिष्यों ने उनके उपदेशों को तीन भागों में विभक्त किया जो कि 'विनय पिटक', 'सुत्त पिटक' और 'अभिधम्म पिटक' कहलाते हैं।

    ये ही बौद्ध साहित्य के मूल ग्रंथ हैं। बुद्ध द्वारा स्थापित संघ के भिक्षु, अपनी-अपनी रुचि के अनुसार उनके वचनों का भिन्न-भिन्न अर्थ लगाकर मतों का प्रतिपादन करने लगे। इससे बौद्ध संघ दो मतों में बंट गया- 'महासांघिक' तथा 'स्थविरवादी'। महासांघिक मत क्रमशः अनेक वर्गों में विभाजित हो गया। स्थविरवादी भी पहली शताब्दी ईस्वी के आरम्भ में 'महायान' और 'हीननयान' नामक दो सम्प्रदायों में विभक्त हो गए। महायान सम्प्रदाय में भी कुछ और शाखाएं विकसित हो गईं जिनमें 'विज्ञानवाद' अथवा 'योगाचार' और 'माध्यमिक' अथवा 'शून्यवाद' अधिक प्रसिद्ध हुए। इसी प्रकार हीनयान में उत्पन्न हुई शाखाओं में 'वैभाषिक' तथा 'सौतांत्रिक' प्रसिद्ध दार्शनिक सम्प्रदाय हुए।

    वैदिक धर्म से उत्पन्न भागवत् धर्म का बौद्ध धर्म पर प्रभाव

    बौद्ध धर्म एवं जैन-धर्म के आविर्भाव के बाद भारत की पश्चिमी सीमा से यवन, शक, कुषाण, पह्लव आदि जातियों के आक्रमण हुए। अहिंसा में विश्वास रखने वाले जैन एवं बौद्ध धर्म इन आक्रांताओं का सामना नहीं कर सकते थे। अतः देश को एक ऐसे धर्म की आवश्यकता थी जो हाथ में तलवार लेकर शत्रुओं का संहार कर सके। समाज की इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए एक बार पुनः वैदिक धर्म सामने आया और उसके भीतर 'भागवत् धर्म' का उदय हुआ जिसके परम उपास्य 'वासुदेव' हैं जिन्हें संकर्षण एवं विष्णु भी कहा गया है।

    इस धर्म को सात्वत धर्म, पांचरात्र धर्म तथा नारायणीय आदि नामों से भी जाना जाता है। भागवत् धर्म आगे चलकर वैष्णव धर्म के रूप में प्रकट हुआ। वासुदेव धर्म अथवा वैष्ण्व धर्म का प्रथम उल्लेख ई.पू. पांचवीं शताब्दी में पाणिनी के ग्रंथ 'अष्टाध्यायी' में हुआ है। ई.पू. चौथी शताब्दी में यूनानी राजदूत मेगस्थिनीज ने चन्द्रगुप्त मौर्य की सभा में 'सौरसेनाई' नामक भारतीय जाति का उल्लेख किया है जो 'हेरेक्लीज' की पूजा करती थी।

    इतिहासकारों ने हेरेक्लीज को वासुदेव कृष्ण माना है। ई.पू.113 के भिलसा अभिलेख में कहा गया है- 'भागवत् हेलिओडोरेस ने देवाधिदेव वासुदेव की प्रतिष्ठा में गरुड़-स्तम्भ का निर्माण करवाया।' यह हेलियोडोरस तक्षशिला का निवासी था तथा मालवा नरेश भागभद्र के दरबार में इंडो-बैक्ट्रियन यवन राजा एण्टियालकिडस का राजदूत था। स्पष्ट है कि ई.पू. द्वितीय शती तक भागवत् धर्म का पर्याप्त प्रचार हो चुका था।

    पद्यतंत्र के अनुसार- 'भागवत् धर्म के सम्मुख अन्य पांच मत- योग, सांख्य, बौद्ध, जैन तथा पाशुपत, रात्रि के समान मलिन हो जाते हैं, इसलिए इसे 'पांचरात्र' धर्म भी कहा जाता है।' इस उक्ति से सहज ही अनुमान किया जा सकता है कि भागवत् धर्म के उदय से जैन-धर्म एवं बौद्ध धर्म को बहुत बड़ा धक्का लगा। भागवत् धर्म के आधार वासुदेव थे जिसका अर्थ होता है- 'एक ऐसा सर्वव्यापक देवता जो सर्वत्र वास करता है।' वासुदेव अथवा नारायण अथवा विष्णु का 'चक्रधारी स्वरूप' एवं उनके अवतार 'राम' तथा 'कृष्ण' के 'शत्रुहन्ता' स्वरूप उस काल के क्षत्रियों को अधिक अनुकूल जान पड़े जो हाथों में अस्त्र-शस्त्र धारण करके अपने शत्रुओं एवं दुष्टों का संहार करते हैं।

    भागवत् धर्म ने न केवल अपना शत्रुहंता स्वरूप ही प्रकट किया अपितु वैदिक धर्म की जटिलताओं को दूर करके जनसामान्य को तेजी से अपनी ओर आकर्षित किया। भागवत् धर्म ने जन-सामान्य के लिए वेदवर्णित कर्मकाण्डों एवं खर्चीले यज्ञों के स्थान पर सर्वशक्तिमान 'भगवान' की भक्ति पर जोर दिया। भगवान के 'संकट-मोचन' एवं 'भक्तवत्सल' स्वरूप के कारण भागवत् धर्म को अपार लोकप्रियता प्राप्त हुई।

    उस काल में एक ओर जैन-धर्म अपने तात्विक विवेचन की जटिलता के कारण एवं उच्च जातियों की बहुलता के कारण जनसामान्य से दूर हो रहा था तो दूसरी ओर बौद्ध धर्म में गृहस्थों के लिए निर्वाण की व्यवस्था नहीं होने के कारण वह भी लोकप्रियता खोता जा रहा था। इन कारणों से बौद्ध धर्म ने भी अपने भीतर कई तरह के परिवर्तनों की आवश्यकता अनुभव की। कुछ बौद्धों ने इन परिवर्तनों को मानने से इन्कार कर दिया। इस कारण ईसा की पहली शताब्दी के आसपास बौद्ध धर्म दो भागों में बंट गया।

    जो लोग पुराने नियमों पर चलते रहे उन्हें 'हीनयान' अर्थात् 'छोटी गाड़ी' वाले कहा गया। जिन लोगों ने नए नियमों एवं परिवर्तनों को स्वीकार कर लिया, उन्हें 'महायान' अर्थात् 'बड़ी गाड़ी वाला' कहा गया।

    हीनयान सम्प्रदाय

    हीनयान सम्प्रदाय बौद्ध धर्म के प्राचीन स्वरूप को मानता है। यह सम्प्रदाय महात्मा बुद्ध को 'धर्म-प्रवर्तक' तथा 'निर्वाण प्राप्त व्यक्ति' मानता है न कि ईश्वर का अवतार। हीनयान सम्प्रदाय कर्मवाद एवं पुनर्जन्म में विश्वास रखता है तथा ईश्वर की सत्ता में विश्वास नहीं रखकर स्वयं पर विश्वास रखता है। इस सम्प्रदाय का मानना है कि बुद्ध द्वारा बताए गए मार्ग का अनुसरण करने से निर्वाण की प्राप्ति हो सकती है और निर्वाण प्राप्ति के लिए यही सही मार्ग है। इस सम्प्रदाय का कथन है कि अपने लिए स्वयं प्रकाश बनो किंतु, स्वयं के प्रकाश को पहचान सकना प्रत्येक के वश में नहीं होता।

    शुभ और अशुभ दोनों तरह की वासनाएँ हेय हैं। ये लोग निवृत्ति पर अधिक बल देते हैं। इस सम्प्रदाय को इसलिए 'हीन-सम्प्रदाय' अर्थात् छोटी गाड़ी कहते थे क्योंकि इस सम्प्रदाय के कठोर सिद्धांतों पर चलकर बहुत कम व्यक्ति निर्वाण का प्राप्त कर सकते थे।

    महायान सम्प्रदाय

    महायान सम्प्रदाय की मान्यता है कि बुद्ध के पूर्व भी बौद्ध धर्म के अनेक प्रवर्तक हुए जिन्हें वे 'बोधिसत्व' कहते हैं। प्रत्येक 'कुल पुत्र' 'बोधिचर्चा' से अर्थात् करुणा, मुदिता, मैत्री और अपेक्षा के आचरण द्वारा या दान, शील, क्षमा, वीर्य, ध्यान और प्रज्ञा नामक छः पारमिताओं की साधना द्वारा बुद्धत्व के मार्ग पर चल सकता है किन्तु उसे बुद्ध बनने में रुचि नहीं है।

    वह अकेले बुद्धत्व को प्राप्त करना उचित नहीं समझता जबकि उसके अन्य साथी दुःख और कष्टों के बन्धन में जकड़े हुए हैं। वह ऐसे लोगों की सेवा करने को बुद्धत्व से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण मानते हैं। उसके लिए प्राणी मात्र की भलाई और सेवा करना ही जीवन का चरम लक्ष्य है और वह इसी को निर्वाण मानता है। ऐसे लोगों को महाज्ञानी 'बोधिसत्व' कहते हैं। 'बोधिसत्वचर्या' का एक अंग करुणा है और दूसरा प्रज्ञा। करुणा से लोक-सेवा और परोपकार की भावना विकसित होती है।

    प्रज्ञा से संसार का वास्तविक स्वरूप और आतंरिक मर्म से साक्षात्कार होता हैै। भागवत् धर्म और विदेशी आक्रांताओं के संयुक्त प्रभाव से महायान सम्प्रदाय में बुद्ध की मूर्ति-पूजा का चलन हुआ। बुद्ध तो स्वयं को सर्वज्ञ कहलाने के भी विरुद्ध थे किन्तु उनके अनुयाई उन्हें 'ईश्वर' एवं 'ईश्वर का अवतार' मानने लगे। गान्धार और मथुरा में स्थानीय शैलियों में बुद्ध की प्रतिमाएं बड़ी संख्या में बनने लगीं और 'बुद्ध' तथा 'बोधिसत्वों' की पूजा होने लगी। जिस प्रकार वैष्णव मत की मान्यता थी कि भक्ति के द्वारा ईश्वर तथा मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है, उसी प्रकार, महायान मत की भी मान्यता थी कि ईश्वर के अवतार बुद्ध तथा बोधिसत्वों की भक्ति के द्वारा निर्वाण प्राप्त किया जा सकता है।

    बौद्ध संगीतियाँ एवं बौद्ध धर्म का विभाजन

    बौद्ध धर्म के विकास में बौद्ध संगीतियों का महत्त्वपूर्ण स्थान रहा। चूंकि इन सभाओं में मूलतः बुद्ध के वचनों को उनके शिष्यों द्वारा सर्वजनहिताय दोहराया या गाया गया था इसलिए इन्हें संगीति कहा गया। बौद्ध धर्म के लम्बे इतिहास में चार संगीतियों का विशेष महत्त्व है।

    प्रथम बौद्ध संगीति

    पहली बौद्ध संगीति महात्मा बुद्ध के परिनिर्वाण के बाद ई.पू.483 में राजगृह के समीप सत्तपन्नी गुफाओं में हुई। इसमें पांच सौ भिक्षुओं ने भाग लिया तथा इसकी अध्यक्षता महाकश्यप ने की। इस सभा में बुद्ध के धर्म और विनय सम्बन्धी यत्र-तत्र बिखरे हुए उपदेशों का संकलन किया गया। बुद्ध के धर्म सम्बन्धी उपदेशों का कथन आनंद ने किया तथा उपालि ने विनय सम्बन्धी उपदेश दोहराए। इनका संकलन क्रमशः सुत्तपिटक एवं विनय-पिटक नामक ग्रंथों में किया गया। इस संगीति के लगभग 400 साल बाद अर्थात् ई.पू.90 में इन ग्रंथों को लंका देश में पालि भाषा में लिपिबद्ध किया गया।

    सुत्तपिटक में बुद्ध के उपदेशों का वार्तालाप के रूप में संकलन है। इसी पिटक में जातक कथाएं भी हैं जिनमें बुद्ध के पूर्व जन्मों का वृत्तान्त दिया गया है। इस ग्रंथ से तत्कालीन भारतीय समाज की दशा पर भी प्रकाश पड़ता है। जातक कथाओं से भारतीय धर्म की अवतारवाद की धारणा पर प्रकाश पड़ता है। विनय-पिटक में भिक्षुओं के आचरण सम्बन्धी नियम तथा बौद्धसंघ के नियमों का संकलन है।

    प्रथम बौद्ध संगीति में संघ के नियमों की व्यावहारिकता को लेकर कुछ मतभेद उत्पन्न हुए जिनके कारण बौद्ध संघ दो भागों में बंट गया। जो भिक्षु परम्परागत कठोर नियमों के अनुयाई थे, वे 'स्थविर' कहलाए परन्तु जो भिक्षु संघ में नवीन नियम लागू करने के पक्ष में थे, वे 'महासांघिक' कहलाए।

    द्वितीय बौद्ध संगीति

    जब बौद्ध धर्म का प्रचार विभिन्न जनपदों में हो गया और भिक्षुओं की संख्या बढ़ने लगी तो संघ के अनुशासन के नियमों में परिवर्तनों की मांग होने लगी। वैशाली तथा पाटलिपुत्र के बौद्ध-भिक्षु अनुशासन सम्बन्धी दस नियमों के बन्धन में शिथिलता की मांग करने लगे जबकि कौशाम्बी, अवन्ती आदि के बौद्ध-भिक्षु समस्त नियमों के कड़ाई से पालन के पक्षधर थे। इन मतभेदों को दूर करने के लिए बुद्ध के निधन के सौ वर्ष बाद अर्थात् ई.पू.383 में वैशाली में स्थविर यश नामक बौद्ध आचार्य द्वारा बौद्ध धर्म की दूसरी संगीति बुलाई गई।

    इस संगीति के आयोजन का उद्देश्य भिक्षुओं के मतभेदों पर विचार करके बौद्ध धर्म के सत्य सिद्धांतों का प्रतिपादन करना था किंतु उनके मतभेद और तीव्र हो गए। इस सभा में स्थविरों और महासांघिकों ने अलग-अलग महासमिति करके अपने-अपने ढंग से बौद्ध धर्मशास्त्रों का सम्पादन किया। आगे चलकर बौद्धधर्म 18 निकायों (सम्पद्रायों) में बंट गया। थेरवादी अर्थात् स्थविरों से 11 निकाय तथा महासांघिकों से 7 निकाय निकले।

    तृतीय बौद्ध संगीति

    तीसरी संगीति, द्वितीय बौद्ध संगीति के लगभग 136 वर्षों बाद, ई.पू.247 में मगध सम्राट अशोक के समय में पाटलिपुत्र में हुई। इसकी अध्यक्षता बौद्ध-भिक्षु मोग्गलीपुत्र तीसा (तिष्य) ने की तथा इसमें 1000 बौद्ध-भिक्षुओं ने भाग लिया। यह संगीति लगभग 9 माह तक चली। यद्यपि अशोक ने बौद्ध धर्म के समस्त सम्प्रदायों की एकता के सूत्र में बांधने का प्रयास किया किंतु इस संगीति में स्थ्विरवादियों की प्रधानता रही। इस संगीति में 'अभिधम्मपिटक' नामक तीसरे पिटक की रचना की गई जिसमें प्रथम दो पिटकों के सिद्धांतों और बौद्ध धर्म का दार्शनकि विवेचन तथा अध्यात्म चिंतन था। तिष्य रचित 'कथावत्थु' नामक ग्रंथ इसी संगीति में प्रमाण रूप में स्वीकृत हुआ। अशोक द्वारा बुलाई गई इस संगीति के महत्व को प्रतिपादित करते हुए इतिहासकार हण्टर ने लिखा है- 'इस संगीति के माध्यम से लगभग आधी मानव जाति के लिए साहित्य और धर्म का सृजन किया गया और शेष आधी मानव-जाति के विश्वासों को प्रभावित किया गया।'

    चतुर्थ बौद्ध संगीति

    चौथी संगीति कुषाण शासक कनिष्क के शासनकाल में काश्मीर में हुई। यह ज्येष्ठ वसुमित्र और महान् बौद्ध दार्शनिक एवं कवि अश्वघोष के सभापतित्त्व में सम्पन्न हुई। इसमें भारत भर के प्रसिद्ध बौद्ध आचार्यों एवं भिुक्षुओं के साथ-साथ अन्य देशों के प्रसिद्ध बौद्ध आचार्यों एवं भिक्षुओं को भी आमंत्रित किया गया किंतु इसमें उत्तरी भारत के हीनयान सम्प्रदाय के बौद्धों का बाहुल्य रहा तथा हीनयानियों के 'सर्वास्तिवाद' नामक सम्प्रदाय के आचार्य एवं भिक्षु सर्वाधिक संख्या में उपस्थित रहे। इस संगीति में तीनों पिटकों के तीन विशाल भाष्यों (टीकाओं) की रचना हुई जो 'विभाषाशास्त्र' के नाम से प्रसिद्ध हुए।

    बौद्ध धर्म का मुख्य साहित्य

    बौद्ध धर्म के उदय से पूर्व, समस्त भारतीय साहित्य संस्कृत भाषा में था। जब तक भारत की जनभाषा संस्कृत थी तब तक यह साहित्य सम्पूर्ण समाज को स्वीकार्य था किंतु महात्मा बुद्ध के समय तक संस्कृत भारत की जनभाषा नहीं रह गई थी। वह केवल ग्रंथ-भाषा एवं अभिजात्य वर्ग की भाषा बनकर रह गई थी। इसलिए बुद्ध ने अपने उपदेश जनभाषा पालि में दिए। यही कारण था कि प्रारंभ में बौद्ध ग्रंथों की रचना केवल पालि भाषा में हुई। इस भाषा का समस्त प्रारम्भिक साहित्य बौद्ध धर्म के अभ्युदय का ही परिणाम है।

    बौद्ध धर्म के तीन मूल ग्रंथ सामूहिक रूप से 'त्रिपिटक' कहलाते हैं। इनके नाम- (1.) सुत्तपिटक (2.) विनय-पिटक तथा (3.) अभिधम्मपिटक हैं। पिटकों की टीकाएं 'विभाषाशास्त्र' कहलाती हैं। अन्य महत्त्वपूर्ण बौद्ध ग्रंथों में- (1.) अंगुतर निकाय (2.) खुदक निकाय तथा (3.) कथावत्थु प्रमुख हैं।

    बौद्ध ग्रंथों में बौद्ध धर्म के विभिन्न अंगों, निर्वाण प्राप्ति के साधन, पुनर्जन्म, आत्मज्ञान, आत्मचिन्तन, विश्व की उत्पत्ति, जाति-व्यवस्था की कृत्रितमा आदि विषयों का विवेचन किया गया है। सुत्तपिटक में बुद्ध के उपदेश सूत्रों के रूप में दिए गए हैं। विनय-पिटक में भिक्षुओं के आचरण सम्बन्धी नियम हैं। अभिधम्मपिटक में गौतम बुद्ध के उपदेशों की विवेचना है। यह सात अध्यायांे में विभक्त है। इन त्रिपिटकों की अनेक टीकाएँ तथा व्याख्याएँ रची गईं जिनमें बौद्ध धर्म के नैतिकता सम्बन्धी नियमों की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत की गई है। धम्मद नामक ग्रन्थ को बौद्ध धर्म की गीता कहा जा सकता है।

    इस ग्रंथ में 424 गाथाएँ हैं जिनमें बौद्ध धर्म का सार प्रस्तुत किया गया है। जातक कथाओं में बुद्ध के पूर्वजन्म की 574 कथाएं हैं। बौद्ध विद्वानों ने संस्कृत भाषा में भी अनेक रचनाएँ लिखीं जो भारतीय साहित्य कोष का अक्षय भण्डार हैं। महाकवि अश्वघोष ने 'बुद्धचरितम्' की रचना की जिसमें गौतम बुद्ध के जीवन चरित्र की बहुत अच्छी जानकारी दी गई है। 'महावंश' अथवा 'दीपवंश महाकाव्य' लंका देश का पालि महाकाव्य है। इस ग्रंथ से लंका के इतिहास, धर्म एवं संस्कृति की जानकारी मिलती है।

    'मिलिंद पन्हो' नामक बौद्ध ग्रन्थ में बैक्ट्रियन और भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग पर शासन करने वाले हिंद-यूनानी शासक मैनेन्डर और प्रसिद्ध बौद्ध-भिक्षु नागसेन के संवाद का वर्णन किया गया है। इसमें ईसा की पहली दो शताब्दियों के उत्तर-पश्चिमी भारतीय जीवन की झलक देखने को मिलती है। 'दिव्यावदान' नामक ग्रंथ में सम्राट अशोक, उसके पुत्र कुणाल तथा अनेक तत्कालीन राजाओं की जानकारी मिलती है। प्रकार यह पुस्तक मौर्यकालीन इतिहास को जानने का अच्छा स्रोत है। 'मंजूश्रीमलकल्प' में बौद्ध दृष्टिकोण से गुप्त सम्राटों का विवरण लिखा गया है। साथ ही कुछ अन्य प्राचीन राजवंशों का संक्षिप्त वर्णन प्राप्त होता है। 'अंगुत्तर निकाय' में सोलह प्राचीन महाजनपदों का वर्णन मिलता है। 'ललित विस्तार' और 'वैपुल्य सूत्र' से भी बौद्ध धर्म के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिलती हैं।

    बौद्ध धर्म की लोकप्रियता एवं द्रुत प्रसार के कारण

    बौद्ध धर्म का आविर्भाव नेपाल की तराई में हुआ था किन्तु महात्मा बुद्ध और उनके अनुयाइयों के प्रयासों से बौद्ध धर्म बहुत कम समय में भारत के विभिन्न हिस्सों में फैल गया और तिब्बत, चीन, बर्मा, अफगानिस्तान एवं लंका आदि देशों तक चला गया। बौद्ध धर्म की व्यापक लोकप्रियता के अनेक कारण थे। इनमें से कुछ मुख्य कारण इस प्रकार हैं-

    (1.) बुद्ध के व्यक्तित्त्व की महानता: बौद्ध धर्म की लोकप्रियता तथा उसके दु्रत प्रसार का सबसे बड़ा कारण महात्मा बुद्ध का प्रभावशाली व्यक्तित्त्व था। राजा का पुत्र होते हुए भी उन्होंने समस्त सुख-सुविधाओं को त्यागकर कठोर तपस्या की थी इसलिए जनसामान्य उनके सम्मुख श्रद्धा एवं सम्मान से झुक जाता था। बुद्ध के मधुर व्यवहार के कारण उनके विरोधी भी उनके सम्मुख नतमस्तक हो जाते थे। बुद्ध ने कभी किसी धर्म का अनादर नहीं किया अपितु तर्क के आधार पर प्रतिपक्षी धर्म की भ्रमपूर्ण बातों का खण्डन किया।

    (2.) बुद्ध के सिद्धान्तों की सरलता: महात्मा बुद्ध ने मानव जीवन के कमजोर पक्ष को ध्यान में रखते हुए, भिक्षुओं के लिए अपेक्षाकृत कठोर एवं गृहस्थों के लिए अपेक्षाकृत सरल सिद्धांत स्थिर किए। ये नियम ऐसे थे जिन्हें भिक्षु एवं गृहस्थ दोनों ही, बिना किसी कठिनाई के अपना सकते थे। बुद्ध ने अपने दार्शनिक विचारों का प्रतिपादन करने की बजाए आचरण की शुद्धता पर जोर दिया। उन्होंने जनता को आत्मा-परमात्मा, मोक्ष जैसे गंभीर विषयों पर नहीं उलझाया और न ही जनता को महंगे यज्ञों, कर्मकाण्डों एवं पशु-बलियों की उलझनों में फंसाया।

    (3.) बौद्ध संघ की भूमिका: महात्मा बुद्ध ने जनतांत्रिक मूल्यों पर आधारित बौद्ध संघ का गठन किया जिनमें भिक्षु अपने मन के विचार खुलकर कह सकते थे तथा आचार्य लोग उनकी शंकाओं का समाधान कर सकते थे। बौद्ध संघ के ये भिक्षु वर्षा काल के चार मास तक एक स्थान पर ठहरकर ज्ञान लाभ एवं स्वाध्याय करते थे ताकि शेष आठ माह तक देश के विभिन्न भागों में भ्रमण करके बुद्ध के उपदेशों को व्यापक जनसमुदाय तक पहुँचा सकें। जब ये भिक्षु जनसमुदाय के बीच विचरण करते थे तो उनके सदाचरण, सादगी, त्याग एवं उपदेशों का जनसामान्य पर बड़ा प्रभाव पड़ता था और वे इस नवीन धर्म को आसानी से स्वीकार कर लेते थे।

    (4.) देश-काल की अनुकूलता: बौद्ध धर्म का उदय उस समय में हुआ था, जब भारत की जनता वैदिक धर्म के महंगे यज्ञों, अनुष्ठानों एवं कर्मकाण्डों में फंसी हुई थी और वेदांत दर्शन के रहस्यवाद तथा पुजारी-पुरोहितों के कठोर व्यवहार से क्षुब्ध थी। वर्ण व्यवस्था ने समाज में ऊंच-नीच का वातावरण बना रखा था। ऐसे समय में गौतम बुद्ध ने वैदिक धर्म के महंगे अनुष्ठानों का खण्डन करके अहिंसा एवं नैतिकता पर आधारित धर्म का रास्ता दिखाया तथा धर्म के द्वार सभी वर्णों के लिए बराबरी के आधार पर खोल दिए। जनसामान्य इस सस्ते, सरल एवं सहज सुलभ धर्म को अपनाने के लिए तैयार हो गया। यदि बुद्ध वैदिक युग में हुए होते तो उनके विचारों को शायद ही लोकप्रियता मिलती क्योंकि वैदिक युग में सामाजिक भेदभाव नहीं था तथा धर्म के द्वार समस्त मनुष्यों के लिए बराबरी के स्तर पर खुले हुए थे और उस काल में वैदिक धर्म महंगे यज्ञों, पशुबलियों एवं जटिल अनुष्ठानों से मुक्त था।

    (5.) जन-भाषा का प्रयोग: महात्मा बुद्ध ने अपने उपदेशों का प्रचार उस युग की जन-भाषा 'पालि' में किया था। अतः जनसाधारण उनकी बात को आसानी से समझ लेता था। ऐसी स्थिति में जनता पर उनके उपदेशों का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। बौद्ध धर्म का प्रारम्भिक साहित्य भी जन-भाषा में ही लिखा गया था। इस कारण महात्मा बुद्ध के उपदेश शीघ्र ही लोकप्रिय हो गए और उनके अनुयाइयों की संख्या बढ़ती गई।

    (6.) समानता की भावना: महात्मा बुद्ध ने वर्ण भेद से ऊपर उठकर समाज के निम्नतम व्यक्ति को भी समान रूप से संघ में रहने, भिक्षु बनने एवं बुद्धत्व प्राप्त करने का अधिकारी माना। यह बौद्ध धर्म की सफलता का एक मुख्य कारण था। क्योंकि वैदिक व्यवस्था में शूद्र वर्ण के लोगों के लिए मोक्ष की आशा नहीं थी तथा स्त्रियां भी समाज में बराबरी का अधिकार खोती जा रही थीं। निर्धन लोगों के पास याज्ञिक-अनुष्ठानों को सम्पन्न कराने के लिए धन उपलब्ध नहीं था। एक तरह से वैदिक धर्म को ब्राह्मणों ने अपनी कारा में बंदी बना लिया था। जब बुद्ध ने धर्म पर से वर्ण, लिंग एवं वित्त का भेद हटा दिया तो लाखों लोग बुद्ध के अनुयाई बन गए। समाज में उपेक्षित चल रहे लोगों को नए धर्म के माध्यम से लोक एवं परलोक दोनों के सुधरने की आशा जाग्रत हो गई थी।

    (7.) समाज के प्रभावशाली व्यक्तियों का संरक्षण: गौतम बुद्ध के राज्यवंश से सम्बन्धित होने के कारण तत्कालीन शाक्य, लिच्छवी, मल्ल, कोलीय, मोरीय आदि गणराज्यों के प्रभावशाली एवं सम्पन्न लोगों ने बौद्ध धर्म के प्रसार में अत्यधिक रुचि ली। अनेक राजाओं, विद्वानों तथा धनपतियों ने बुद्ध के उपदेशों को सहज भाव से अपना लिया तथा बौद्ध धर्म के प्रसार में तन, मन और धन से सहयोग दिया। समाज के प्रभावशाली वर्ग का अनुकरण करके जनसाधारण भी इस धर्म में विश्वास रखने को तैयार हो गया। बुद्ध की मृत्यु के सैंकड़ों साल बाद सम्राट अशोक, कनिष्क तथा हर्षवर्धन ने इस धर्म के प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इनमें से सम्राट अशोक द्वारा दिया गया योगदान सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

    (8.) प्रतिस्पर्द्धी धर्मों का अभाव: बौद्ध धर्म के शीघ्र और व्यापक प्रसार का एक महत्त्वपूर्ण कारण उस युग में उसका विरोध करने वाली लोकप्रिय धार्मिक विचारधाराओं अर्थात् धार्मिक सम्प्रदायों का अभाव होना भी था। वैदिक धर्म में प्रचार की प्रवृत्ति नहीं थी और उस युग में जनसाधारण को वैदिक धर्म से अरुचि होने लगी थी। जैन मत अधिक व्यापक नहीं हो पाया था और उसके सिद्धान्तों में शारीरिक क्लेश की प्रधानता के कारण भी वह अधिक लोकप्रिय नहीं बन पाया। इस कारण बौद्ध भिुक्षओं एवं प्रचारकों को बिना विरोध के अपने धर्म का प्रचार करने में सफलता मिल गई।

    (9.) अन्य कारण: बौद्ध धर्म की उदारता एवं समय के साथ होने वाली परिवर्तनशीलता ने भी इस धर्म के प्रसार में योगदान दिया। बौद्ध धर्म की रही-सही कठोरताओं को त्याग कर महान् उदारवादी 'महायान' सम्प्रदाय का जन्म हुआ जिसने बौद्ध धर्म को अत्यधिक लोकप्रिय बनने का मार्ग प्रशस्त किया। तक्षशिला, नालन्दा तथा विक्रमशिला आदि विद्यालयों में विद्यार्थियों के लिए बौद्ध धर्म के सिद्धांतों और साहित्य की शिक्षा दी जाने लगी। इससे बौद्ध धर्म को नैतिक आधार प्राप्त हो गया और बौद्ध धर्म को जानने वाले लोग संस्कृत के पण्डितों के समान ही विद्वान समझे जाने लगे। विदेशी आक्रांताओं एवं चीनी यात्रियों ने बौद्ध धर्म के अध्ययन एवं प्रसार में अत्यधिक रुचि ली इस कारण बौद्ध धर्म, भारत भूमि तक सीमित न रहकर विश्व स्तरीय धर्म-बन गया।

    बौद्ध धर्म को राज्याश्रय

    महात्मा बुद्ध के जीवन काल में कोसल नरेश प्रसेनजित, मगध सम्राट बिम्बिसार और अजातशत्रु, वैशाली की सुप्रसिद्ध गणिका आम्रपाली, राजगृह के नगरश्रेष्ठि अनाथपिण्डक, बुद्ध के पिता शुद्धोधन और पुत्र राहुल ने बुद्ध का शिष्यत्व ग्रहण किया तथा उनके बताए धर्म को स्वीकार कर लिया। इससे बौद्ध धर्म को राज्याश्रय प्राप्त होने लगा।

    मौर्य सम्राट अशोेक (ई.पू.268- ई.पू.232) ने अपनी राजधानी पाटलिपुत्र में तीसरी बौद्ध-संगीति बुलवाई। इस संगीति में बौद्ध-धर्म ग्रन्थों में संशोधन किया गया। बौद्ध-संघ में जो दोष आ गए थे उनको दूर करने का प्रयत्न किया गया। इन संशोधनों तथा सुधारों से बौद्ध-धर्म में जो शिथिलता आ रही थी वह दूर हो गई। अशोक ने देश के विभिन्न भागों में अनेक मठों का निर्माण करवाया और उनकी सहायता की। इन मठों में बहुत बड़ी संख्या में भिक्षु-भिक्षुणी तथा धर्मोपदेशक निवास करते थे जो सदैव धर्म के चिन्तन तथा प्रचार में संलग्न रहा करते थे। ऐसी सुव्यवस्था में धर्म के प्रचार का क्रम तेजी से चलता रहा।

    बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अशोक ने धर्म-विभाग की स्थापना की। इसके प्रधान पदाधिकारी 'धर्म-महामात्र' कहलाते थे। इन धर्म-महामात्रों को यह आदेश दिया गया कि वे प्रजा की नैतिक तथा आध्यात्मिक उन्नति का अधिक से अधिक प्रयत्न करें। धर्म-महामात्र घूम-घूम कर धर्म का प्रचार करते थे। अशोक ने धम्म के प्रचार के लिए धम्म के सिद्धान्तों तथा आदर्शों को पर्वतों की चट्टानों, पत्थरों के स्तम्भों तथा पर्वतों की गुफाओं में लिखवाकर उन्हें सबके लिए तथा सदैव के लिए सुलभ बना दिया।

    ये अभिलेख जन-साधारण की भाषा में लिखवाए गए ताकि समस्त प्रजा उन्हें समझ सके और उनका पालन कर सके। अशोक द्वारा किये गए प्रयत्नों के फलस्वरूप उसके शासनकाल में बौद्ध-धर्म को सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त हो गया। भण्डारकर ने इस तथ्य की ओर संकेत करते हुए लिखा है- 'इस काल में बौद्ध-धर्म को इतना महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त हो गया कि अन्य समस्त धर्म पृष्ठभूमि में चले गए..... परन्तु इसका सर्वाधिक श्रेय तीसरी शताब्दी ई.पू. के बौद्ध सम्राट, चक्रवर्ती धर्मराज को मिलना चाहिए।'

    ई.पू.150-ई.पू.90 में काबुल से मथुरा तक मिनैण्डर(मिलिंद) का शासन था। उसने स्यालकोट, पंजाब तथा अन्य सीमांत प्रदेशों में बौद्ध धर्म का प्रचार किया। कहा जाता है कि उसकी राजधारी शाकल में केवल बौद्ध-भिक्षु तथा विद्वानों का निवास ही संभव था। पाली ग्रंथ 'मिलिंद पन्ह' (मिलिंद प्रश्न) के अनुसार उसने नागसेन नामक बौद्ध आचार्य से दीक्षा लेकर धर्म और दर्शन पर बहुत से प्रश्न किए। मिलिंद के सिक्के बौद्ध धर्म में उसकी आस्था को प्रकट करते हैं। उसके अनेक सिक्कों पर धर्मचक्र बना हुआ है तथा उनकी पदवी धार्मिक अंकित है।

    जब मिलिंद की मृत्यु हुई तब अनेक नगरों ने उसकी अस्थियों (फूलों) को लेना चाहा, जैसा बुद्ध की मृत्यु पर हुआ था। स्यामी अनुश्रुति के अनुसार मिलिंद ने 'अर्हत्' पद पाया। कुषाण सम्राट कनिष्क (ई.127-150), बौद्ध धर्म की महायान शाखा का अनुयाई था। उसे बौद्ध ग्रंथों में दूसरा अशोक कहकर सम्मानित किया गया है। उसने चौथी बौद्ध संगीति बुलाई तथा मध्य-एशिया, तिब्बत, चीन एवं जापान में बौद्ध धर्म का प्रचार करवाया।

    कनिष्क ने पुरुषपुर तथा अनेक स्थानों पर स्तूप एवं विहार आदि बनवाए जिनकी चीनी चात्रियों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की। सर्वप्रथम कनिष्क के सिक्कों पर ही बुद्ध की प्रतिमा अंकित हुई थी। इसके बाद महायान सम्प्रदाय में बौद्धों की मूर्तियाँ बननी आरम्भ हुईं और उनकी पूजा शुरु हुई। कनिष्क ने यूनानी-बौद्ध कला का प्रतिनिधित्व करने वाली गांधार कला तथा हिन्दू कला का प्रतिनिधित्व वाली मथुरा कला को बराबर प्रश्रय दिया।

    कनिष्क ने बौद्ध तथा फारसी दोनों धर्मों की विशेषताओं का अपना लिया था किन्तु उसका झुकाव बौद्ध धर्म की ओर अधिक था। कुषाण साम्राज्य की विभिन्न पुस्तकों में वर्णित बौद्ध शिक्षाओं एवं प्रार्थना शैली के माध्यम से कनिष्क के बौद्ध धर्म के प्रति झुकाव का पता चलता है। बौद्ध स्थापत्य को कनिष्क का सबसे बड़ा योगदान पुष्पपुर (पेशावर) का बौद्ध स्तूप था। इस स्तूप का व्यास 286 फुट था। चीनी-यात्री ह्वेनत्सांग के अनुसार इस स्तूप की ऊंचाई 600 से 700 फुट थी तथा यह बहुमूल्य रत्नों से जड़ा हुआ था।

    प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु अश्वघोष कनिष्क का धार्मिक परामर्शदाता था। कनिष्क काल की बौद्ध मुद्राएं अन्य मुद्राओं की तुलना में लगभग 1 प्रतिशत हैं। कुछ मुद्राओं में कनिष्क को आगे तथा बुद्ध को यूनानी शैली में पीछे खड़े हुए दिखाया गया है। कुछ मुद्राओं में शाक्यमुनि बुद्ध एवं मैत्रेय को भी दिखाया गया है। कनिष्क के सभी सिक्कों की तरह इनके आकार एवं रूपांकन मोटे-मोटे, खुरदरे तथा अनुपात बिगड़े हुए थे। बुद्ध का अंकन यूनानी शैली में किया गया है।

    बुद्ध की आकृति थोड़ी बिगड़ी हुई है। उनके कान बड़े आकार के हैं तथा दोनों पैर कनिष्क की भांति फैले हुए हैं। कनिष्क के बौद्ध सिक्के तीन प्रकार के हैं। कनिष्क के सिक्कों वाली बुद्ध की आकृति अनेक कांस्य प्रतिमाओं में देखने को मिलती है। तीसरी-चौथी शताब्दी की ये प्रतिमाएं गांधार शैली की हैं। इस प्रतिमा में बुद्ध ने यूनानी शैली में अपने वस्त्र का बायां कोना हाथ में पकड़ा हुआ है तथा दायां हाथ अभय मुद्रा में उठा रखा है।

    कुषाण काल के बुद्ध अंकन वाले मात्र छः स्वर्ण सिक्के मिले हैं, इनमें से एक सिक्का, प्राचीन आभूषण में जड़ा हुआ था, जिसमें कनिष्क एवं बुद्ध अंकित हैं तथा हृदयाकार माणियों के गोले से सुसज्जित हैं। कनिष्क के ऐसे सभी सिक्के स्वर्ण में ढले हुए हैं एवं दो भिन्न मूल्यवर्गों में मिले हैं। एक स्वर्णमुद्रा लगभग 8 ग्राम की है। मोटे तौर पर यह रोमन ऑरस से मेल खाता है। एक स्वर्णमुद्रा 2 ग्राम की है जो लगभग एक ओबोल के बराबर है। इन सिक्कों में बुद्ध को भिक्षुकों जैसे चोगे अन्तर्वसक, उत्तरसंग पहने हुए तथा ओवरकोट जैसी सन्घाटी पहने हुए दिखाया गया है।

    उनके अत्यधिक बड़े एवं लम्बे कान बुद्ध के किसी गुण या किसी शक्ति का प्रतीक हो सकते हैं। उनके शिखास्थान पर केशों का जूड़ा बना हुआ है। ऐसा जूड़ा गांधार शैली के बहुत से शिल्पों में देखने को मिलता है। इस प्रकार कह सकते हैं कि, बुद्ध के सिक्कों में उनका रूप उच्च रूप से प्रतीकात्मक बनाया गया है, जो कि पहले की गांधार शिल्पाकृतियों से अलग है। गांधार शिल्प के बुद्ध अपेक्षाकृत अधिक प्राकृतिक दिखाई देते थे। कई मुद्राओं में बुद्ध की मूंछें भी दिखाई गई हैं।

    इनके दाएं हाथ की हथेली पर चक्र का चिह्न है एवं भवों के बीच उर्ण (तिलक) है। बुद्ध द्वारा धारण किया गया चोगा, गांधार शैली से अधिक मेल खाता है, बजाए मथुरा शैली से। कनिष्क कालीन मूर्तियों, शिलालेखों, स्तूपों एवं सिक्कों से सिद्ध होता है कि कनिष्क बौद्ध धर्म का बहुत बड़ा संरक्षक था। गुप्त सम्राट यद्यपि भागवत् धर्म के महान् संरक्षक थे किंतु उन्होंने भी बौद्ध धर्म को अपने राज्य में पूरी स्वतंत्रता प्रदान की। गुप्त काल में बुद्ध की मूर्तियाँ बड़ी संख्या में बनीं तथा बोधिसत्व की पूजा का विशेष प्रचार हुआ।

    गुप्त सम्राट पुरुगुप्त ने भागवत् धर्म को त्यागकर बौद्ध-धर्म ग्रहण किया इस प्रकार बौद्ध धर्म को पुनः राज्याश्रय प्राप्त हो गया। सातवीं शताब्दी में उत्तरी भारत के बहुत बड़े भूभाग के राजा हर्षवर्धन ने बौद्ध धर्म को विशेष प्रोत्साहन दिया। प्रौढ़ावस्था में उसने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। उसने चीनी बौद्ध-भिक्षु ह्वेनत्सांग के प्रवचनों के आयोजन के लिए ई.643 में कन्नौज में बहुत बड़ा धर्म सम्मेलन किया जिसमें मनुष्य की ऊँचाई की स्वर्ण से निर्मित बुद्ध प्रतिमा स्थापित की गई।

    हर्ष द्वारा बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु धर्म सभायें आयोजित करना, स्तूप व विहारों का निर्माण करना तथा नालंदा विश्वविद्यालय को दान देना, काश्मीर नरेश से महात्मा बुद्ध के दांत प्राप्त करना आदि तथ्य हर्ष के बौद्ध धर्म ग्रहण करने की ओर संकेत करते हैं।

    बौद्ध धर्म का विदेशों में प्रसार

    छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व से लेकर छठी शताब्दी ईस्वी तक भिक्षुओं, राजाओं एवं कतिपय विदेशी यात्रियों के प्रयत्नों से बौद्ध धर्म मध्य एशिया, चीन, तिब्बत, बर्मा, अफगानिस्तान, यूनान आदि देशों तथा दक्षिण-पूर्वी एशियाई द्वीपों तथा फैल गया। भारत एवं चीन के मार्ग पर स्थित खोतान प्रदेश में बौद्ध धर्म का खूब प्रचार हुआ। बौद्ध धर्म के विदेशों में प्रचार का कार्य मगध के मौर्य सम्राट अशोक के काल (ई.पू.268-ई.पू.232) में आरम्भ हुआ।

    अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए श्रीलंका, बर्मा, मध्य एशिया तथा पश्चिमी एशियाई देशों में अपने प्रचारक भेजे। अशोक के शिलालेखों से पता चलता है कि बौद्ध प्रचारकों ने सीरिया, मेसोपोटामिया तथा यूनान में मेसीडोनिया, एरिच तथा कोरिन्थ आदि राज्यों में जाकर बौद्ध धर्म का प्रचार किया। अशोक ने धम्म का दूर-दूर तक प्रचार करने के लिए धर्म विजय का आयोजन किया। उसने भारत के भिन्न-भिन्न भागों तथा विदेशों में अपने धर्म के प्रचार का प्रयत्न किया।

    उसने दूरस्थ विदेशी राज्यों के साथ मैत्री की और वहाँ पर मनुष्यों तथा पशुओं की चिकित्सा का प्रबंध किया। उसने इन देशों में बौद्ध धर्म का प्रचार करने तथा हिंसा को रोकने के लिए उपदेशक भेजे। उसने अपने पुत्र महेन्द्र तथा पुत्री संघमित्रा को धर्म का प्रचार करने के लिए सिंहलद्वीप अर्थात् श्रीलंका भेजा। अशोक के धर्म प्रचारक बड़े ही उत्साही तथा निर्भीक थे। उन्होंने मार्ग की कठिनाईयों की चिन्ता न कर श्रीलंका, बर्मा, तिब्बत, जापान, कोरिया तथा पूर्वी द्वीप-समूहों में धर्म का प्रचार किया।

    चीन में सम्राट मिंगती के समय बौद्ध धर्म का अत्यधिक प्रसार हुआ। इस काल में बड़ी संख्या में बौद्ध ग्रन्थों का चीनी भाषा में अनुवाद हुया। सर्वप्रथम कश्यप मातंग ने चीनी भाषा में बौद्ध ग्रंथों का अनुवाद किया। कुछ चीनी यात्रियों ने भारत में आकर बौद्ध धर्म का अध्ययन किया तथा कुछ ग्रंथों को चीन ले जाकर उनका चीनी भाषा में अनुवाद किया। इन ग्रंथों के कारण बौद्ध धर्म का चीन तथा तिब्बत में प्रचार हो गया।

    प्रारम्भिक ईस्वी शताब्दियों में कुमार जीव, गुणवर्मन, बुद्धयश, पुण्यत्रात, गुणभद्र आदि अनेक आचार्य एवं भिक्षु चीन गए। महायान शाखा ने बौद्ध धर्म के विदेशों में प्रचार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। कुषाण सम्राट कनिष्क ने दूसरी शताब्दी ईस्वी में चौथी बौद्ध संगीति बुलाई तथा मध्य एशिया, तिब्बत, चीन और जापान में बौद्ध धर्म का प्रचार करवाया।

    चौथी-पांचवी शताब्दी ईस्वी में बौद्ध धर्म चीन से जापान जा पहुँचा। लगभग इसी काल में जावा, सुमात्रा एवं कम्बोडिया में भी बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ। चीन से बौद्ध धर्म कोरिया, मंगोलिया, फारमोसा तथा जापान आदि द्वीपों में फैला। छठी-सातवीं शताब्दी ईस्वी में बर्बर हूणों के क्रूर हमलों तथा ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी ईस्वी में मुसलमानों द्वारा भारत में शासन स्थापित किए जाने के बाद बौद्ध धर्म अपनी जन्मभूमि भारत से लगभग विलुुप्त हो गया किंतु विदेशों में यह धर्म आज भी पूरे उत्साह के साथ जीवित है।

    वर्तमान समय में (वर्ष 2010 के आंकड़ों के अनुसार) ईसाई धर्म, इस्लाम एवं हिन्दू-धर्म के बाद बौद्ध धर्म विश्व का चौथा सबसे बड़ा धर्म है। विश्व के लगभग 52 करोड़ लोग अर्थात् विश्व की लगभग 7 प्रतिशत जनसंख्या बौद्ध धर्म की अनुयाई है। विश्व के अधिकांश देशों में बौद्ध अनुयायी रहते हैं। चीन, जापान, वियतनाम, थाईलैण्ड, म्यान्मार, भूटान, श्रीलंका, कम्बोडिया, मंगोलिया, तिब्बत, लाओस, हांगकांग, ताइवान, मकाउ, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया एवं उत्तर कोरिया सहित कुल 18 देशों में बौद्ध धर्म 'प्रमुख धर्म' है। भारत, नेपाल, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, रूस, ब्रुनेई, मलेशिया आदि देशों में भी लाखों बौद्ध अनुयायी रहते हैं।

    बौद्ध धर्म का भारत से विलोपन

    भारत में बौद्ध धर्म का जिस तेज गति से प्रसार हुआ, उसी तेज गति से वह भारत से विलुप्त भी हो गया। बारहवीं शताब्दी के बाद भारत में इसके अनुयाइयों की संख्या नाम मात्र की रह गई। भारत में बौद्ध धर्म की अवनति के कई कारण थे-

    (1.) बौद्ध धर्म की कमजोरियाँ: बौद्ध धर्म के भीतर कुछ ऐसी कमजोरियां थीं जो उसे पतन के मार्ग पर जाने से नहीं रोक सकती थीं। बुद्ध ने लोगों को मोक्ष प्राप्ति का एक नवीन मार्ग बताया था परन्तु वे अपने शिष्यों के लिए पृथक सामाजिक व्यवस्था, सामान्य रीति-रिवाज एवं आचार-विचार नहीं बना पाए। इसलिए बौद्ध गृहस्थ सामान्यतः वैदिक संस्कारों का पालन करते रहे। जन्म, विवाह तथा मृत्यु आदि अवसरों पर उन्हें हिन्दू रीति-रिवाजों का ही पालन करना पड़ता था। इस कारण बौद्ध धर्म के गृहस्थ अनुयाई, हिन्दू-धर्म से अधिक दूर नहीं जा पाए और समय आने पर उन्हें पुनः हिन्दू-धर्म अपनाने में अधिक कठिनाई नहीं हुई।

    (2.) बौद्ध धर्म में आडम्बरों का प्रचलन: वैदिक धर्म के जिन आडम्बरों और कर्मकाण्डों की जटिलताओं के विरोध में महात्मा बुद्ध ने नैतिक जीवन पर आधारित सीधा-सादा धर्म चलाया था, वह बुद्ध के निर्वाण के बाद स्वयं अनेक प्रकार के आडम्बरों और जटिलताओं से घिर गया। बौद्ध आचार्यों ने भिक्षुओं के नियमों को पहले से भी अधिक कठोर बना दिया जिससे उनमें इस धर्म के प्रति अरुचि उत्पन्न हो गई। महात्मा बुद्ध को ईश्वर का अवतार मानकर उनकी मूर्तियाँ बनने लगीं तथा उन मूर्तियों की विविध पद्धतियों से पूजा होने लगी। बौद्ध तंत्र भी विकसित हो गया तथा बौद्ध धर्म के भीतर वाममार्गी सम्प्रदाय भी खड़ा हो गया। इससे बौद्ध धर्म अपना मूल स्वरूप खोकर हिन्दू-धर्म के अधिक निकट आ गया।

    (3.) बौद्ध-भिक्षुओं का नैतिक पतन: बौद्ध धर्म की लोकप्रियता का एक मुख्य कारण भिक्षुओं का त्यागमय जीवन और नैतिक आचरण था परन्तु मौर्यों के शासन काल में राज्य की ओर से बौद्ध-भिक्षुओं के लिए विशाल एवं भव्य मठ और विहार बनवाए गए और उनके व्यय के लिए राजकीय कोष से धन दिया गया। मठों के आरामदायक जीवन ने भिक्षुओं के त्यागमय जीवन को विलासी बना दिया। इससे उनमें अनुशासनहीनता आने लगी और कदाचार व्याप्त होने लगा। वज्रयान सम्प्रदाय के उदय के बाद बौद्ध मठ एवं विहार व्यभिचार के केन्द्र बन गए। जनसामान्य की दृष्टि में भिक्षु एवं मठ श्रद्धा के पात्र नहीं रहे।

    (4.) बौद्ध धर्म में विभाजन: बुद्ध की मृत्यु के बाद से ही बौद्ध-भिक्षुओं में आन्तरिक मतभेद उत्पन हो गए और वे हीनयान, महायान, स्थविर और महासांघिक अदि अनेक सम्प्रदायों में बंट गए। अशोक ने बौैद्ध धर्म की एकता बनाए रखने का अथक प्रयास किया और उसे कुछ सफलता भी मिली परन्तु बाद में इन विभिन्न शाखाओं में जबरदस्त संघर्ष आरम्भ हो गया और वे एक-दूसरे की निन्दा और आलोचना करने लगे। उनके आपसी संघर्ष ने बौद्ध धर्म की लोकप्रियता को भारी क्षति पहुँचाई।

    (5.) बौद्ध संघ में स्त्रियों का प्रवेश: बौद्ध धर्म की अवनति का एक मुख्य कारण संघ में स्त्रियों का प्रवेश था। भगवान बुद्ध ने मूल रूप में बौद्ध संघ में स्त्रियों को प्रवेश नहीं दिया था किंतु अपने प्रिय शिष्य आनंद के कहने से उन्होंने स्त्रियों को संघ में प्रवेश देना स्वीकार कर लिया। इस स्वीकृति के बाद बुद्ध ने आनन्द से कहा कि अब यह धर्म 500 वर्र्षाें से अधिक नहीं टिकेगा। बुद्ध की भविष्यवाणी सच सिद्ध हुई। भिक्षुओं एवं भिक्षुणियों के एक साथ रहने से बौद्ध विहारों एवं मठों में आत्म-संयम भंग हो गया और वहाँ व्यभिचार तथा विलासिता पनप गई। इससे उनकी प्रतिष्ठा गिर गई। वज्रयान सम्प्रदाय ने बौद्ध धर्म को वाम मार्ग की ओर धकेल कर बौद्ध धर्म को बड़ा धक्का पहुँचाया।

    (6.) राज्याश्रय का अभाव: अशोक एवं उसके बाद के मौर्य शासकों ने बौद्ध धर्म को संरक्षण प्रदान करके ऊंचाइयों तक पहुँचा दिया। देश भर में बौद्ध विहारों एवं मठों की स्थापना हुई जिन्हें राजकीय अनुदान दिया जाता था। इस कारण लाखों नवयुवक, सैनिक कर्म त्यागकर भिक्खु बन गए और बौद्ध विहारों एवं मठों में आराम का जीवन जीते हुए चैन की रोटी खाने लगे। इस कारण मौर्य शासकों की सेनाएं कमजोर हो गईं एवं शत्रुओं ने स्थान-स्थान पर उन्हें परास्त कर दिया जिससे मौर्य साम्राज्य नष्ट हो गया।

    मौर्यों की ऐसी दुरावस्था देखकर भारत के अधिकांश राजाओं ने बौद्ध धर्म को संरक्षण देना बंद कर दिया। मौर्यों के उत्तराधिकारी शुंग, कण्व और सातवाहन नरेशों ने पुनः ब्राह्मण धर्म को संरक्षण एवं प्रोत्साहन दिया। गुप्त शासकों ने भी वैदिक यज्ञों को पुनः प्रतिष्ठा प्रदान की तथा भागवत् धर्म को अपनाया। दक्षिण भारत में भी चालुक्य नरेशों ने हिन्दू-धर्म को राजकीय संरक्षण प्रदान किया। अतः भारत की जनता पुनः हिन्दू-धर्म की ओर अग्रसर हुई।

    (7.) बौद्ध धर्म की कट्टरता: बौद्ध धर्म आरम्भ से ही अन्य धर्मों के विरुद्ध असहिष्णुता का भाव रखता था। इस कारण दूसरे धर्म भी बौद्ध धर्म के विरुद्ध कट्टरता का भाव रखने लगे। यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि प्रत्येक युग में जनसामान्य, विभिन्न धर्मों की अच्छी बातों को स्वीकार करके उन्हें आदर देता है किंतु बौद्ध संघ को यह स्वीकार्य नहीं था कि दूसरे धर्म की अच्छी बातों को आदर दिया जाए। अशोक ने अपने बारहवें शिलालेख में सब धर्मों के सार की वृद्धि की कामना की है तथा परामर्श दिया है- 'मनुष्य को दूसरे के भी धर्म को सुनना चाहिए। जो मनुष्य अपने धर्म को पूजता है और अन्य धर्मों की निन्दा करता है वह अपने धर्म को बड़ी क्षति पहंुचाता है। इसलिए लोगों में वाक्-संयम होना चाहिए अर्थात् संभल कर बोलना चाहिए।'

    अशोक के इस कथन से अनुमान किया जा सकता है कि अशोक भी बौद्ध धर्म की असहिष्णुता से क्षुब्ध रहा होगा। शुंग वंश के संस्थापक पुष्यमित्र शुंग (ई.पू.185-ई.पू.149) ने मौर्य-वंश का अंत करके शुंग-वंश की स्थापना की तथा बौद्ध-धर्म के स्थान पर भागवत् धर्म को संरक्षण दिया। 'दिव्यावदान' में पुष्यमित्र शुंग को बौद्धों का परम-शत्रु बताया गया है। जबकि उसने बौद्धों को कोई क्षति नहीं पहुँचाई। उसके शासन काल में साँची के स्तूप के कलात्मक द्वार तथा भरहुत स्तूप के अलंकृत भागों का निर्माण हुआ। अपनी कट्टरता के चलते बौद्ध धर्म ने एक तरफ जैन-धर्म को अपना प्रतिद्वंद्वी बना लिया तो दूसरी तरफ भागवत् धर्म के विरुद्ध भी मोर्चा खोल लिया। इस प्रकार वह दोहरे संघर्ष में फंसकर अपनी लोकप्रियता गंवा बैठा।

    (8.) भागवत् धर्म का उदय: मौर्य वंश के पतन के बाद वैदिक धर्म के विद्वानों ने अपने धर्म में निहित दोषों को दूर करके उसे सरल रूप में पुनः प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया। शुंग, कण्व, भारशिव, नाग, गुप्त, वाकाटक और चालुक्य नरेशों ने वैदिक यज्ञों का आयोजन करके हिन्दू-धर्म की उन्नति में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान किया। इन शासकों ने शिव, विष्णु, कार्तिकेय आदि प्राचीन हिन्दू देवताओं की उपासना की और उनके भव्य मन्दिरों का निर्माण करवाया।

    बौद्ध धर्म के प्रति झुकाव रखने वाला हर्षवर्धन भी ब्राह्मण धर्म के प्रति श्रद्धा रखता था। इससे हिन्दू-धर्म को राष्ट्रीय स्तर पर पुनः प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। गुप्तों ने संस्कृत भाषा को राजकीय भाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया जिससे वैदिक साहित्य की खोई हुई प्रतिष्ठा भी पुनः स्थापित हो गई। बुद्ध की मूर्तियों की तर्ज पर देश में विष्णु एवं उनके अवतारों की मूर्तियों का बहुत बड़ी संख्या में निर्माण हुआ तथा विष्णु एवं शिव के भव्य मंदिर बने जिनके कारण प्रजा तेजी से भागवत् धर्म की ओर आकर्षित हुई और बौद्ध धर्म अवनति को प्राप्त हो गया।

    (9.) विदेशी आक्रमण: गुप्तों के बाद भारत पर हूणों के आक्रमण हुए। वे बौद्धों के शत्रु थे। हूणों के नेता मिहिरकुल ने हजारों की संख्या में बौद्ध मठों एवं विहारों को नष्ट किया तथा लाखों बौद्ध-भिक्षुओं को मौत के घाट उतार दिया। इससे पंजाब, राजस्थान और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रान्तों में बौद्ध धर्म का प्रभाव क्षीण हो गया। इन प्रदेशों के बचे हुए बौद्ध-भिक्षु तिब्बत तथा चीन की तरफ भाग गए। मध्ययुग के आरम्भ में मुस्लिम आक्रांताओं ने बंगाल और बिहार में बौद्धों का कत्लेआम किया। उनके मठों और विहारों को भूमिसात किया और नालन्दा विहार आदि शिक्षण संस्थाओं को जला दिया। इससे इन प्रदेशों के बौद्ध-भिक्षु नष्ट हो गए तथा बौद्ध गृहस्थों ने पुनः हिन्दू-धर्म अपना लिया।

    (10.) राजपूत शासकों का उदय: हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद देश में प्राचीन क्षत्रियों के स्थान पर राजपूत शासकों का उदय हुआ और उन्होंने पूरे देश में छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्यों की स्थापना की। राजपूत लोग अपनी शूर-वीरता के लिए प्रख्यात थे और युद्ध तथा सैनिक सेवा उनका मुख्य व्यवसाय था। ऐसे लोगों को अहिंसा से कोई लगाव नहीं था। उन्होंने हिन्दू-धर्म को प्रोत्साहन दिया। राज्याश्रय न मिलने से बौद्ध धर्म का प्रभाव लगभग समाप्त हो गया।

    (11.) शंकराचार्य के प्रयास: आठवीं और नौवीं शताब्दी ईस्वी में शंकराचार्य तथा उनके शिष्य कुमारिल भट्ट ने, पतन की तरफ बढ़ रहे बौद्ध धर्म के प्रभाव को समाप्ति की ओर धकेलने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने स्थान-स्थान पर बौद्ध विद्वानों को सार्वजनिक रूप से आयोजित शास्त्रार्थों में परास्त किया तथा जन-सामान्य के समक्ष हिन्दू-धर्म की श्रेष्ठता एवं अजेयता का प्रदर्शन किया। शंकराचार्य ने देश के चारों दिशाओं में स्थित प्राचीन नगरों में अद्वैत परम्परा के मठों की स्थापना की।

    शंकराचार्य के प्रयत्नों से बौद्ध निस्तेज हो गए और सारे देश में हिन्दू-धर्म व्याप्त हो गया। शंकराचार्य ने भगवत्गीता की टीका लिखकर उसे हिन्दुओं का सर्वाधिक लोकप्रिय ग्रंथ बना दिया जिने करोड़ों लोगों को पुनः हिन्दू-धर्म अपनाने की प्रेरणा दी।

    (12.) बौद्ध धर्म के भीतर वाममार्गी पन्थों का जन्म: बौद्ध धर्म का पतन होने पर छठी शताब्दी ईसवी में महायान सम्प्रदाय से वज्रयान और मन्त्रयान शाखाओं का जन्म हुआ। वज्रयानी, बुद्ध को वज्रगुरु तथा अलौकिक सिद्धि सम्पन्न देवता मानते थे। इन सिद्धियों को पाने के लिए अनेक गुह्य साधनाएँ की जाती थीं। वाममार्गी बौद्धों के प्रभाव से शैव मत में पाशुपत, कापालिक (अघोरी), वैष्णव मत में गोपी-लीला, तन्त्र-सम्प्रदाय में आनन्द भैरवी की पूजा आदि पन्थ विकसित हुए। इन पन्थों का उद्देश्य मन्त्रों तथा अन्य साधनों द्वारा विभिन्न प्रकार की 'सिद्धियाँ' प्राप्त करना था। जनसामान्य इन वाममार्गियों से भय खाता था तथा इनसे दूर रहता था।

    बौद्ध धर्म का भारतीय संस्कति में योगदान

    प्राचीन भारत में बौद्ध धर्म का उदय किसी महान् सांस्कृतिक क्रान्ति से कम नहीं था। भारतीय धर्म, दर्शन, नीतिशास्त्र, राजनीति, साहित्य, कला, शासन-नीति, विदेश नीति आदि विभिन्न क्षेत्रों पर बौद्ध धर्म का गहरा प्रभाव हुआ। विभिन्न क्षेत्रों में बौद्ध धर्म का महत्वपूर्ण योगदान इस प्रकार है-

    (1.) धर्म एवं दर्शन के क्षेत्र में योगदान

    बौद्ध धर्म सरल एवं आडम्बरहीन था। उसमें निरर्थक एवं खर्चीले विधि-विधानों, जटिल नियमों, दीर्घकालिक अनुष्ठानों तथा यज्ञ के लिए आवश्यक पुरोहितों के लिए कोई स्थान नहीं था। इस कारण जनसाधारण तेजी से बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित हुआ। बौद्ध धर्म की लोकप्रियता ने वैदिक धर्म के अस्तित्त्व के लिए खतरा उत्पन्न कर दिया। इस कारण वैदिक धर्म ने भी अपने भीतर सुधार की प्रक्रिया आरम्भ की। यज्ञ, बलि, कर्मकाण्ड आदि आडम्बरों के स्थान पर हिन्दू-धर्म में मानवता, स्नेह, सौहार्द पर आधारित भागवत् धर्म का उदय हुआ।

    बौद्ध धर्म की महायान शाखा ने भारत में मूर्ति-पूजा को अत्यंत लोकप्रिय बना दिया। भागवत् धर्म ने भी विष्णु-पूजा की प्रतिष्ठा के लिए मूर्ति निर्माण एवं मंदिरों का अवलम्बन लिया। बौद्धों की मठ प्रणाली ने भी हिन्दू-धर्म को प्रभावित किया। इससे पूर्व हिन्दू-धर्म में मठ प्रणाली नहीं थी। जगद्गुरु शंकराचार्य ने उतर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम चारों दिशाओं में अपने मठों की स्थापना की। बौद्ध धर्म ने प्रचार-प्रसार की जो शैली अपनाई उसने भी हिन्दू-धर्म को प्रभावित किया।

    इससे पूर्व हिन्दू-धर्म प्रचार-प्रसार में विश्वास नहीं रखता था। बौद्ध धर्म ने अनात्मवाद, अनीश्वरवाद, कार्य-कारण सम्बन्ध, कर्मवाद एवं पुनर्जन्मवाद, आन्तरिक शुद्धि तथा निर्वाण के दार्शनिक विचारों से भारतीय चिन्तन प्रणाली को नवीनता प्रदान की। असंग, नागार्जुन, वसुबन्धु, धर्मकीर्ति आदि बौद्ध आचार्यों ने बौद्ध दर्शन को नई ऊँचाइयाँ दीं। बौद्धों का शून्यवाद तथा माध्यमिक दर्शन, भारत में ही नहीं अपितु वैश्विक दर्शन साहित्य में भी गौरवपूर्ण स्थान रखता है।

    बौद्धों का दार्शनिक साहित्य विचारोत्तेजक था। बौद्धों के दार्शनिक विचारों का खण्डन करने के लिए भागवत धर्म में अनेक दार्शनिक पैदा हुए जिनमें शंकराचार्य एवं कुमारिल भट्ट प्रमुख थे। इन दोनों के योगदान से भारतीय दर्शन में नवीन चेतना जागृत हुई।

    (2.) साहित्य के क्षेत्र में योगदान

    बौद्ध धर्म ने भारतीय साहित्य को काफी प्रभावित किया। बौद्ध धर्म के विद्वानों द्वारा पालि और संस्कृत भाषा में बौद्ध दर्शन और धर्म ग्रंथों के रूप में प्रभूत साहित्य की रचना की गई। महात्मा बुद्ध के जीवन को आधार बनाकर संस्कृत एवं जन भाषाओं में विपुल साहित्य लिखा गया। काव्य एवं नीति सम्बन्धी अनेक ग्रन्थ लिखे गए। इन सबने भारतीय साहित्य को समृद्ध किया और संस्कृत तथा लोक भाषाओं के विकास में सहयोग दिया। बौद्ध विद्वान दिग्नाग ने भारतीय तर्क शास्त्र का विकास किया।

    उन्होंने 'न्याय प्रवेश' और 'आलम्बन परीक्षा' नामक ग्रन्थ लिखे। न्याय वैशेषिक पर इसकी गहरी छाप पड़ी। बौद्ध महाकाव्य 'बुद्ध चरित' और नाटक 'सारिपुत्र प्रकरण' बौद्धों द्वारा ही लिखे गए। 'मिलिन्दपन्हो' तथा 'महावस्तु' नामक ग्रन्थों में प्रचुर मात्रा में ऐतिहासिक सामग्री मिलती है। 'मंजूश्री मूलकल्प' तथा 'दिव्यवदान' नामक बौद्ध ग्रन्थों से भी भारत के प्राचीन इतिहास एवं संस्कृति की महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है।

    (3.) कला के क्षेत्र में योगदान

    भारतीय शिल्प कला, मूर्ति कला एवं चित्रकला का जो निखरा हुआ स्वरूप दिखाई देता है, वह बौद्ध धर्म की ही देन है। गुहा मन्दिरों का निर्माण, मूर्ति कला की गान्धार एवं माथुरी शैली तथा चित्रकला की अजन्ता शैली बौद्ध धर्म के प्रभाव से ही विकसित हुईं। मौर्य सम्राट अशोक ने देश भर में 84 हजार स्तूपों का निर्माण करवाया जिनमें से कुछ स्तूप आज भी मौजूद हैं तथा भारतीय स्थापत्य कला की अनुपम धरोहर हैं। साँची का स्तूप, बौद्ध स्थापत्य कला का श्रेष्ठ नमूना है।

    अशोक द्वारा निर्मित स्तम्भों में उच्चकोटि की शिल्प-कला मौजूद है। साँची, भरहुत और अमरावती में बौद्धों द्वारा उच्चकोटि की कलाकृतियों का निर्माण किया गया। महायान सम्प्रदाय के भिक्षुओं द्वारा गान्धार प्रदेश में महात्मा बुद्ध की प्रतिमाओं का बड़ी संख्या में निर्माण किया गया। इसलिए उस प्रदेश की कला को गाान्धार शैली का नाम दिया गया। गाान्धार कला ने भारतीय मूर्तिकला को नवीन प्रेरणा दी जिसके फलस्वरूप मथुरा, नालन्दा और सारनाथ में मूर्ति कला की अलग-अलग शैलियाँ विकसित हुईं।

    अजन्ता की विश्वप्रसिद्ध गुफाओं में चित्रकला की विशिष्ट शैली विकसित हुई। इन चित्रों का मुख्य उद्देश्य महात्मा बुद्ध के जीवन प्रसंगों तथा बोधिसत्वों का जीवन्त चित्रण करना था। बादामी, बाध, सितनवासल तथा बराबर की गुफाओं की बौद्ध चित्रकला अद्वितीय है।

    (4.) शासन नीति के क्षेत्र में

    बौद्ध धर्म ने भारत की शासन नीति को गहराई तक प्रभावित किया है। बौद्ध संघों की स्थापना जनतान्त्रिक मूल्यों के आधार पर की गई थी जिसमें प्रत्येक भिक्षु को अपने विचार एवं शंका व्यक्त करने का अधिकार था। वहाँ अन्धश्रद्धा को बढ़ावा नहीं दिया गया था। स्वतंत्र भारत की शासन पद्धति में इन्हीं जनतान्त्रिक मूल्यों को ग्रहण किया गया है। शासन की प्रत्येक संस्था में सदस्यों को बराबरी के आधार पर अपने विचार रखने का अधिकार दिया गया है। शासन में समानता, सहिष्णुता और भातृत्व की भावना साफ देखी जा सकती है। बौद्ध धर्म ने उपनिषदों के अहिंसा के विचार को प्रमुखता से अपनाया तथा अहिंसा परमोधर्मः का उद्घोष किया। कलिंग युद्ध के बुरे अनुभव के बाद अशोक ने भी अहिंसा के महत्व को समझा और जीवन भर अहिंसा की नीति का अवलम्बन किया। सेना और युद्ध राज्य की शक्ति के मूल-आधार होते हैं किंतु भारतीय शासकों तथा वर्तमान में भारत सरकार ने भी विश्व-शांति को प्रमुखता दी।

    (5.) आचार-विचार के क्षेत्र में योगदान

    बौद्ध धर्म ने दस शील को अपनाकर भारतीय जनता को जीवन में नैतिकता और सदाचार के पालन का मार्ग दिखाया और भारतीय आचार-विचार को उन्नत बनाने में सहयोग दिया। बौद्ध धर्म के कारण ही परम्परागत भारतीय समाज में जाति-पाँति के बन्धन शिथिल हुए और शासन व्यवस्था में प्रत्येक जाति के व्यक्ति को बराबर माना गया।

    हेवेल ने लिखा है- 'बौद्ध धर्म ने आर्यावर्त के जातीय बन्धनों को तोड़कर उसके आध्यात्मिक वातावरण में घुसे हुए अन्धविश्वासों को दूर कर सम्पूर्ण आर्य जाति को एकरूपता प्रदान करने में योग दिया और मौर्य वंश के विशाल साम्राज्य की नींव रखी। बौद्ध धर्म ने भारतीय लोगों के नैतिक पक्ष को उन्नत बनाने में अपूर्व योग दिया।'

    (6.) अन्य क्षेत्रों में योगदान

    बौद्ध धर्म ने भारत के वैदेशिक सम्बन्धों का क्षेत्र व्यापक किया तथा संसार के अनेक देशों से अपने सम्बन्धों को मजबूत बनाया। जिन देशों में बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ, उन देशों के निवासी भारत को अपना पवित्र तीर्थस्थान मानने लगे और वे बौद्ध स्थलों के दर्शनों के लिए भारत आने लगे। इस कारण विश्व के अनेक देशों के साथ भारत के राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक सम्बन्ध स्थापित हुए और उन देशों में भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का प्रसार हुआ।

    जैन-धर्म और बौद्ध धर्म का तुलनात्मक अध्ययन

    जैन-धर्म और बौद्ध धर्म दोनों का प्रसार एक ही समय में, एक ही प्रकार से, एक जैसी परिस्थितयों में और एक जैसे उद्देश्यों को लेकर हुआ। इस कारण इतिहासकार बहुत समय तक महावीर एवं बुद्ध को एक ही व्यक्ति समझते रहे तथा इन दोनों धर्मों को एक ही धर्म के दो रूप मानते रहे किंतु इन दोनों धर्मों की तुलना करने से दोनों की समानताएं एवं असमानताएं स्पष्ट हो जाती हैं।

    जैन-धर्म एवं बौद्ध धर्म में असमानताएँ

    (1.) बौद्ध एवं जैन दोनों धर्मों का उदय 'ब्राह्मण धर्म' के विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में हुआ था। अतः दोनों ही धर्म ब्राह्मण धर्म के प्रमुख ग्रन्थ वेदों की प्रामाणिकता को स्वीकार नहीं करते और न ही उन्हें ज्ञान का अन्तिम सोपान मानते हैं। इस कारण दोनों की गणना नास्तिक धर्मों में की जाती है।

    (2.) बौद्ध एवं जैन दोनों ही धर्म ब्राह्मण धर्म के यज्ञवाद, बहुदेववाद और जन्म पर आधारित जातिवाद का विरोध करते हैं और सामाजिक एवं धार्मिक व्यवस्थाओं में ब्राह्मणों के प्रभुत्व को स्वीकार नहीं करते।

    (3.) बौद्ध एवं जैन दोनों धर्म ईश्वर को इस सृष्टि का निर्माता नहीं मानते।

    (4.) दोनों ही धर्म ब्राह्मण धर्म के प्रवृत्ति-मार्ग का विरोध करते हैं और निवृत्ति-मार्ग में विश्वास रखते हैं। अर्थात् दोनों संसारिक सुखों से निवृत्ति पर जोर देते हैं परन्तु दोनों ही धर्म गृहस्थ-धर्म की आवश्यकता को स्वीकार करते हैं।

    (5.) दोनों धर्मों में सदाचार और अहिंसा का स्थान प्रमुख है।

    (6.) बौद्ध एवं जैन दोनों ही धर्म कर्म-फल सिद्धांत और पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं। ब्राह्मण धर्म 'यज्ञ' एवं 'कर्मकाण्ड' को कर्म मानता है जबकि बौद्ध एवं जैन दोनों ही धर्म इन्हें 'कर्म' नहीं मानते।

    (7.) बौद्ध एवं जैन दोनों ही धर्मों का लक्ष्य 'निर्वाण' प्राप्त करना है। दोनों धर्मों का विश्वास है कि प्रत्येक मनुष्य को बिना किसी भेदभाव के निर्वाण प्राप्त करने का अधिकार है।

    (8.) बौद्ध एवं जैन दोनों ही धर्म जीवन को दुःखमय समझते हैं। उनमें ब्राह्मण धर्म की आशावादिता का अभाव है।

    (9.) बौद्ध एवं जैन दोनों धर्मों में संघ व्यवस्था है। दोनों धर्मों में अनुयाइयों की दो-दो श्रेणियाँ है- 1. भिक्षु-भिक्षुणी, 2. उपासक-उपासिका।

    (10.) बौद्ध एवं जैन दोनों धर्मों के अपने-अपने त्रिरत्न हैैं।

    (11.) बौद्ध एवं जैन दोनों धर्मों में प्रारम्भ में भक्ति का कोई स्थान नहीं था परन्तु बाद में दोनों मे भी भक्तिवाद का उदय हुआ।

    (12.) बौद्ध एवं जैन दोनों धर्म प्रारम्भ में व्यक्ति-पूजा तथा मूर्ति-पूजा के विरोधी थे परन्तु बाद में दोनों धर्मों ने इन्हें अपना लिया।

    (13.) बौद्ध एवं जैन दोनों धर्मों ने मानव-सेवा पर अधिक जोर दिया।

    (14.) दोनों धर्मों ने संस्कृत की जगह लोकभाषाओं में उपदेश दिए एवं ग्रंथों की रचना की। जैन-धर्म ने प्राकृत भाषा को और बौद्ध धर्म ने पालि भाषा को अपनाया परन्तु बाद में दोनों धर्मों में संस्कृत में ग्रंथ लिखे जाने लगे।

    (15.) बौद्ध एवं जैन दोनों धर्मों के संस्थापकों के जीवन में काफी समानताएं हैं। महावीर एवं बुद्ध दोनों ही क्षत्रिय राजकुमार थे। दोनों ने विवाह करके गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया और दोनों के सन्तान भी हुई। दोनों ने लगभग 30 वर्ष की आयु में पारिवारिक जीवन का त्याग करके सन्यास ग्रहण किया और सत्य-ज्ञान की प्राप्ति के लिए घोर तपस्या की। दोनों ने ही ज्ञान प्राप्ति के बाद मृत्युपर्यन्त जनकल्याण हेतु धर्म प्रचार का कार्य किया।

    जैन-धर्म एवं बौद्ध धर्म में असमानताएँ

    बौद्ध एवं जैन धर्मों में बहुत सी असमानताएँ भी थीं, जो इस प्रकार हैं-

    (1.) जैन-धर्म का मूल स्वरूप बौद्ध धर्म से कहीं अधिक प्राचीन है।

    (2.) दोनों धर्मों का अन्तिम लक्ष्य 'निर्वाण' प्राप्त करना है परन्तु जैन-धर्म में 'निर्वाण' का अर्थ दुःखरहित हो जाना अर्थात् आत्मा का सदानन्द में मिल जाना है परन्तु बौद्ध धर्म में 'निर्वाण' का अर्थ व्यक्तित्त्व की पूर्ण समाप्ति से है। अर्थात् जब व्यक्ति समस्त प्रकार की वासना या आसक्ति से मुक्त हो जाता है तो उसे बुद्धत्व प्राप्त हो जाता है। जैन-धर्म के अनुसार 'निर्वाण' की प्राप्ति मृत्यु के पश्चात ही सम्भव है जबकि बौद्ध धर्म के अनुसार मनुष्य इसी जीवन में 'निर्वाण' प्राप्त कर सकता है।

    (3.) दोनों धर्मों में निर्वाण प्राप्ति के साधनों में भिन्नता है। जैन-धर्म के अनुसार तपस्या, उपासना और काया क्लेश आदि से 'निर्वाण' प्राप्त हो सकता है किन्तु बौद्ध धर्म मध्यम मार्ग पर जोर देता है क्योंकि शारीरिक कष्ट और विलासमय जीवन दोनों ही अवांछनीय हैं।

    (4.) जैन-धर्म त्रिरत्न के अनुसरण पर जोर देता है किंतु बौद्ध धर्म अष्टांगिक मार्ग पर जोर देता है।

    (5.) बौद्ध एवं जैन दोनों धर्म अहिंसावादी है परन्तु व्यवहार रूप में बौद्ध धर्म की अपेक्षा जैन-धर्म अहिंसा पर अधिक जोर देता है।

    (6.) जैन-धर्म आत्मा के अस्तित्त्व में विश्वास करता है परन्तु बौद्ध धर्म अनात्मवादी है।

    (7.) सैद्धांतिक रूप से दोनों धर्म जन्म-आधारित जाति-व्यवस्था के विरोधी तथा सामाजिक समानता के पक्षधर हैं परन्तु व्यावहारिक स्तर पर जैन-धर्म के अनुयाईयों ने निम्न जातियों को नहीं अपनाया जबकि बौद्ध संघ ने बिना किसी भेदभाव के समाज के प्रत्येक वर्ण एवं जाति को प्रवेश दिया।

    (8.) जैन धर्म, अन्य धर्मों के प्रति अधिक सहिष्णु रहा। जबकि बौद्ध धर्म धार्मिक कट्टरता से ग्रस्त रहा। इस कारण अन्य धर्मों से उसका वैमनस्य रहा।

    (9.) जैन-धर्म ने सृष्टि की उत्पत्ति के सम्बन्ध में स्पष्ट रूप में अपने विचारों का उल्लेख किया है किंतु बौद्ध धर्म इस विषय पर चुप है।

    (10.) दोनों धर्मों में संघ व्यवस्था है परन्तु बौद्ध धर्म में संघ-जीवन पर अधिक जोर है जबकि जैन-धर्म की संघ व्यवस्था उतनी संगठित नहीं है।

    (11.) बौद्ध धर्म का प्रसार जिस तेजी से आरम्भ हुआ था उसी गति से उसका पतन भी हो गया और भारत भूमि से उसका लोप हो गया परन्तु जैन-धर्म का प्रचार प्रसार धीमी गति से हुआ और उसका अस्तित्त्व भी भारत में बना रहा।

    (12.) जैन अपने धर्म के सिद्ध-पुरुषों को तीर्थंकर कहते हैं जबकि बौद्ध अपने सिद्ध-पुरुषों को बोधिसत्व कहते हैं।

    (13.) बौद्ध धर्म को अशोक, कनिष्क तथा हर्षवर्धन जैसे चक्रवर्ती सम्राटों का संरक्षण एवं प्रोत्साहन मिला किंतु जैन-धर्म को स्थानीय एवं छोटे राजाओं का संरक्षण मिला। इस कारण जैन-धर्म का प्रसार अपने देश में भी बहुत सीमित रहा जबकि बौद्ध धर्म भारत से बाहर भी फैल गया।

    उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि दोनों धर्मों में पर्याप्त समानताएं होते हुए भी काफी असमानताएं हैं और दोनों धर्म स्पष्टतः अलग हैं। दोनों धर्मों में एक-दूसरे के प्रति ईर्ष्या एवं द्वेष की भावना भी बनी रही। बौद्ध धर्म आरम्भ से ही अन्य धर्मों के प्रति असहिष्णु रहा इसलिए उसने राजकीय संरक्षण प्राप्त करके जैन-धर्म पर प्रहार किए। यही कारण था कि जिस हूण आक्रांता मिहिरकुल ने बौद्धों का बड़ी संख्या में संहार किया था, जैन आचार्य उद्योतन सूरि ने उसी मिहिरकुल को सम्पूर्ण धरती का स्वामी कहकर उसकी प्रशंसा की।

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  • अध्याय - 10 विंटेज कार संग्रहालय, उदयपुर

     02.06.2020
    अध्याय - 10 विंटेज कार संग्रहालय, उदयपुर

    अध्याय - 10 विंटेज कार संग्रहालय, उदयपुर


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    होटल गार्डन में मेवाड़ के महाराणाओं की पुरानी लक्जरी कारों का संग्रह स्थापित किया गया है। इनमें ई.1939 की रॉल्स रॉयस कार, कैडिलैक ओपन कन्वर्टीबल्स, मर्सीडीज के दुर्लभ मॉडल्स, 1936 का वॉक्सहॉल मॉडल तथा 1937 का ओपल मॉडल भी शामिल हैं। यह भारत के विरले कार सग्रंहों में से एक है। यह प्रातः 9 बजे से सायं 6 बजे तक खुला रहता है।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-47

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-47

    पर्यावरण एवं संस्कृति की चितेरी चित्रकला (2)


    मरुप्रदेश की चित्रकला


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    तिब्बती इतिहासकार तारानाथ (16वीं शताब्दी) ने मरूप्रदेश में 7वीं शताब्दी के श्रीरंगधर चित्रकार का उल्लेख किया है। ई. 1422-23 में लिखित सुपार्श्वनाथ चरितम् के चित्रों में जैन एवं गुजराती शैली का प्रभाव दृष्टिगत होता है। ई. 1450 के लगभग गीत गोविंद तथा बालगोपाल स्तुति की एक-एक प्रति प्राप्त हुई है जिनमें राजस्थान के प्रारंभिक चित्रण को देखा जा सकता है। जोधपुर, बीकानेर, किशनगढ़, जैसलमेर, नागौर, घाणेराव तथा अजमेर शैलियों को मारवाड़ चित्रकला तथा मरुप्रदेश की चित्रकला भी कहते हैं। राजा मालदेव के समय (ई. 1532 से 1568) का जोधपुर शैली का उत्तराध्ययन सूत्र बड़े महत्व का है। अब यह बड़ौदा संग्रहालय में रखा है।

    मारवाड़ शैली : ई. 1623 की पाली रागमाला चित्रावली, 17वीं शताब्दी की ही जोधपुर शैली की सूरसागर पदों पर आधारित चित्रावली तथा रसिकप्रिया में रंगों की चटकता और वस्त्राभूषण आदि का चित्रांकन महत्त्वपूर्ण है। जोधपुर दुर्ग में चौखेलाव महल के भित्ति चित्र, राजा मालदेव के समय में बने थे। राजा सूरसिंह के समय के अनेक लघुचित्र, ढोला मारू तथा भागवत आदि के चित्र भी उल्लेखनीय हैं। उन्नीसवीं सदी में मारवाड़ नाथ संप्रदाय से विशेष रूप से प्रभावित रहा। अतः राजा मानसिंह के समय के नाथ संप्रदाय के मठों के चित्र भी विशिष्ट बन पड़े हैं। इस शैली के पुरुष लम्बे-चौड़े, गठीले बदल के तथा गलमुच्छों, ऊंची पगड़ी तथा राजसी वैभव वाले वस्त्राभूषणों से युक्त हैं। स्त्रियों की वेशभूषा में ठेठ राजस्थानी लहंगा, ओढ़नी, लाल फूंदने आदि का प्रयोग प्रमुख रूप से हुआ है। जोधपुर शैली में भी पीले रंग का अधिक प्रयोग हुआ है। इस शैली के चित्रों में आम के पेड़, कौवा एवं घोड़ा अधिक देखने को मिलते हैं। राम रावण युद्ध, कौंधती बिजली, मरुस्थल के दृश्य, लोक देवताओं के चित्र, दुर्गा सप्तशती का चित्रण भी इस शैली की विशेषतायें हैं।

    बीकानेर शैली : बीकानेर शैली में मुगल शैली के प्रभाव के कारण नारी अंकन में तन्वंगी देह चित्रित की गयी है। इस चित्रांकन में हरे, लाल, बैंगनी, जामुनी तथा सलैटी रंगों का प्रयोग किया गया है। पीले रंग को भी प्रमुखता दी गई है। शाहजहाँ और औरंगजेब शैली की पगड़ियों के साथ ऊंची मारवाड़ी पगड़ियां, ऊँट, हिरण आदि पशुओं और कौवा तथा चील आदि पक्षियों के साथ राजपूती जीवन शैली की छाप दिखायी देती है। ऊँट की खाल पर चित्रों का अंकन इस शैली की विशेषता है। बीकानेर के मंदिरों में मथेरण, उस्ता एवं चूनगर जाति के चित्रकारों ने विशाल संख्या में भित्ति चित्रों का निर्माण किया। भाण्डा शाह के जैन मंदिर के रंगमंडप का शिखर तथा इसकी कलात्मक चित्रकारी अत्यंत आकर्षक है।

    नागौर उपशैली : नागौर उपशैली में पारदर्शी वेशभूषा एवं बुझे हुए रंगों का प्रयोग अधिक किया गया है। नागौर दुर्ग में काष्ठ के दरवाजों एवं किले के भित्तिचित्र तथा घाणेराव के ठिकाने में बने हुए अनेक लघुचित्र देखने योग्य हैं।

    जैसलमेर शैली : इस शैली में दाढ़ी मूंछों की मुखाकृति प्रमुखता से बनाई जाती है। चेहरे पर ओज एवं वीरत्व की प्रधानता होती है। मूमल इस शैली का प्रमुख चित्र है।


    किशनगढ़ शैली की चित्रकला

    किशनगढ़ शैली में राधा कृष्ण की लीलायें, बणी-ठणी, रंग-बिरंगे उपवन आदि की बहुलता है। तारों एवं चंद्रमा से युक्त रातों का अंकन खूबसूरती से किया गया है। इस शैली के चित्रों में पुरुष लम्बे, इकहरे, नील छवि वाले, समुन्नत ललाट, कर्णांत तक खिंचे अरुणाभ नयन, मोती जड़ित श्वेत या मूंगिया पगड़ी वाले चित्रित किये गये हैं। जबकि नारियां तन्वंगी, लम्बी, गौरवर्णा, नुकीली चिबुक, सुराहीदार गर्दन, क्षीणकटि, लम्बी कमल पांखुरी सी आँखों वाली चित्रित की गयी हैं। दूर-दूर तक फैली झीलों में जल क्रीड़ा करते हंस, बत्तख, सारस, नौकायें, केले के गाछ तथा रंग-बिरंगे उपवन किशनगढ़ शैली को दूसरी शैलियों से अलग करते हैं। किशनगढ़ की चित्रकला को चरम पर पहुंचाने का श्रेय सावंतसिंह (ई.1699-1764) को है जो नागरीदास के नाम से प्रसिद्ध हुए। वे राजा राजसिंह के पुत्र थे। उनकी प्रेयसी का नाम बणी ठणी था। वह विदुषी, परम संुदरी, संगीत में दक्ष तथा कवियत्री थी। उसके प्रति राजा नागरीदास का आत्मनिवेदन काव्यधारा के रूप में प्रस्फुट हुआ। जिसने चित्रकारों को विषय वस्तु, कल्पना तथा सौंदर्य का विशाल आकाश प्रदान किया। भारत सरकार ने 5 मई 1973 को बणी ठणी पर एक डाक टिकट भी जारी किया। इस चित्र को ई.1778 में किशनगढ़ के चित्रकार निहालचंद ने बनाया था।


    हाड़ौती की चित्रकला

    चौहान वंशी हाड़ाओं का शासन बूंदी, कोटा तथा झालावाड़ आदि क्षेत्रों पर रहा। इस कारण इन क्षेत्रों से प्राप्त चित्र हाड़ौती शैली के अंतर्गत आते हैं।

    बूंदी शैली : इस शैली में पशु-पक्षियों का सर्वाधिक अंकन किया गया है। वर्षा में नाचते हुए मोर, वृक्षों पर कूदते बंदर और जंगल में विचरण करते हुए सिंह सर्वाधिक इसी शैली के चित्रों में अंकित किये गये हैं। बूंदी शैली की आकृतियां लम्बी, शरीर पतले, स्त्रियों के अधर अरुण, मुख गोल, चिबुक पीछे की ओर झुकी तथा छोटी होती है। प्रकृति तथा स्थापत्य के चित्रांकन में श्वेत, गुलाबी, लाल, हरे रंगों का प्रयोग किया गया है। राग-रागिनी, नायिका भेद, ऋतु वर्णन, बारहमासा, कृष्णलीला, दरबार, हस्तियुद्ध, उत्सव आदि का अंकन इस शैली में प्रमुख स्थान रखता है। इस शैली में सुनहरी रंग का प्रयोग अधिक हुआ है। साथ ही खजूर के पेड़, बत्तख एवं हिरण का बहुतायत से अंकन किया गया है। महाराव उम्मेदसिंह के शासन काल में निर्मित चित्रशाला (रंगीन चित्र) बूंदी चित्र शैली का श्रेष्ठ उदाहरण है।

    कोटा शैली : कोटा शैली बूंदी शैली से आई है। कोटा शैली में शिकार का बहुरंगी तथा वैविध्यपूर्ण चित्रण देखा जा सकता है। इस शैली में नीला रंग, खजूर के वृक्ष, बत्तख एवं शेर आदि का प्रमुखता से अंकन किया गया है। झालावाड़ के राजमहलों में श्रीनाथजी, राधा-कृष्ण लीला, रामलीला तथा राजसी वैभव के चित्र दर्शनीय हैं। प्राचीनतम गुहा चित्र हाड़ौती क्षेत्र में पाये गये हैं।

    तंजौर शैली : भित्ति चित्रों की दृष्टि से कोटा सबसे सम्पन्न है। दक्षिण भारत के चित्रकारों ने भी कोटा में भित्ति चित्र बनाये। तंजौर शैली के अनेक चित्र कोटा के भवनों में चित्रित हैं।


    ढूंढाड़ की चित्रकला

    आमेर, जयपुर, अलवर, शेखावाटी, उणियारा, करौली आदि शैलियां ढूंढाड़ चित्रकला में आती हैं। झिलाय ठिकाणा भी ढूंढाड़ी चित्रकला के अंतर्गत आता है।

    जयपुर शैली : जयपुर शैली में हरे रंग के प्रयोग, पीपल एवं वट के वृक्ष मोर एवं अश्व का अधिक चित्रांकन किया गया है। मुगलों एवं ब्रज क्षेत्र की संस्कृति का प्रभाव भी इस चित्रकला शैली पर देखा जा सकता है। आमेर की छतरियों, बैराठ के मुगल गार्डन, मौजमाबाद के निजी चित्रों में मुगल प्रभाव हावी है। राजा जयसिंह के समय के चित्रों में रीतिकालीन प्रभाव स्पष्ट दिखायी देता है। इस काल में आदम कद चित्रों की भी परंपरा पड़ी। माधोसिंह प्रथम के काल में गलता के मंदिरों, शीशोदिया रानी के महल, चंद्रमहल तथा पुण्डरीक की हवेली में कलात्मक भित्ति चित्रण हुआ। सवाई प्रतापसिंह के काल में राधाकृष्ण की लीलायें, नायिका भेद, राग-रागिनी, बारहमासा आदि का चित्रण प्रमुख रूप से हुआ।

    अलवर शैली : इस शैली में भी जयपुर शैली की सारी विशेषतायें मिलती हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि जयपुर शैली और दिल्ली शैली के मिश्रण से अलवर शैली बनी। हरे रंग के प्रयोग, पीपल एवं वट के वृक्ष, मोर एवं अश्व का अधिक चित्रांकन किया गया है। इस शैली में वेश्याओं के जीवन का खूबसूरती से अंकन किया गया है।

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  • अध्याय - 17 पौराणिक धर्म अथवा वैष्णव धर्म का उदय एवं विकास

     02.06.2020
    अध्याय - 17 पौराणिक धर्म अथवा वैष्णव धर्म का उदय एवं विकास

    पौराणिक धर्म अथवा वैष्णव धर्म का उदय एवं विकास


    इस जगत में विष्णु सर्वत्र व्याप्त हैं, इस जगत् का कारण विष्णु हैं।...... विष्णु के समान कोई अन्य देव नहीं है। -नारद पुराण, पूर्व भाग, 6/58


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    जब जैन-धर्म तथा बौद्ध-धर्म ह्रास के मार्ग पर बढ़ रहे थे तब दूसरी ओर वैदिक-धर्म अपने पुनरुत्थान में लगा था। ब्राह्मण-चिंतकों ने खर्चीले वैदिक-यज्ञों, जटिल-कर्मकाण्डों तथा लम्बे-अनुष्ठानों और उपनिषदों के ब्रह्मज्ञान से उकताई हुई प्रजा के लिए भक्ति पर अवलम्बित नवीन धर्म की खोज की जिसमें वेद-वर्णित देवताओं को बलि देने की बजाए उनकी पूजा एवं भक्ति पर जोर दिया गया। वेद-वर्णित सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान एवं भक्तवत्सल परमात्मा को देवताओं का भी स्वामी माना गया जो सम्पूर्ण सृष्टि का सर्जक, पालक एवं संहारक था।

    वह देवताओं का भी स्वामी था। उसकी भक्ति को धर्म एवं मोक्ष का साधन घोषित किया गया। रामायण एवं महाभारत नामक महाकाव्यों में इस नए धर्म का न केवल बीज-वपन हो चुका था अपितु वे भलीभांति पल्लवित भी हो चुका था। यही नवीन धर्म पौराणिक धर्म अथवा वैष्णव धर्म के रूप में विशाल वटवृक्ष बन गया। रामायण के मर्यादा पुरुषोत्तम राम तथा महाभारत के योगेश्वर कृष्ण को पौराणिक धर्म में वेद-वर्णित विष्णु के अवतार घोषित किया गया।

    पौराणिक धर्म अथवा वैष्णव धर्म का विकास

    पौराणिक धर्म अथवा वैष्णव धर्म का मुख्य आधार वेद-वर्णित देवता विष्णु एवं उनके दस अवतार- मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बलराम एवं कल्कि हैं। पहले तीन अवतार अर्थात् मत्स्य, कूर्म और वराह सतयुग में, नृसिंह, वामन, परशुराम और राम त्रेतायुग में तथा कृष्ण और बलराम द्वापरयुग में अवतरित हुए। कलियुग के लिए भविष्य में होने वाला कल्कि अवतार कल्पित किया गया।

    विष्णु एवं उनके अवतारों के साथ-साथ शिव, सूर्य, दुर्गा, गणेश एवं कर्तिकेय भी भक्तों पर प्रसन्न होने वाले, उनके कष्ट हरने वाले, संकट के समय उनकी रक्षा करने वाले देवता घोषित किए गए। इन देवी-देवताओं के प्राकट्य, उनके विविध स्वरूपों, उनमें निहित शक्तियों एवं गुणों तथा उनकी लीलाओं पर आधारित कथाओं की रचना की गई। इन कथाओं को विभिन्न पुराणों में लिखा गया। इसलिए इसे 'पौराणिक धर्म' कहा गया।

    'पुराण' अपने पूर्ववर्ती वेदों, उपनिषदों, ब्राह्मणों, आरण्यकों आदि से बिल्कुल अलग तथा पूरी तरह नवीन ग्रंथ थे किंतु इनके रचयिताओं ने इन्हें 'पुराण' कहकर पुकारा जिसका अर्थ होता है- 'पुराना।' इन नवीन ग्रंथों को पुराना कहकर पुकारे जाने का कारण यह था कि इन ग्रंथों के रचनाकार जनसामान्य को यह संदेश नहीं देना चाहते थे कि उन्होंने किसी नवीन धर्म का प्रतिपादन अथवा निर्माण किया है, अपितु इन ग्रंथों के माध्यम से वे जनसामान्य को यह संदेश देना चाहते थे कि इन ग्रंथों में उन्हीं वेदविहित ईश्वर तथा देवी-देवताओं के स्वरूपों, गुणों एवं लीलाओं का वर्णन किया गया है जिनकी पूजा आर्यजन अनादि काल से करते चले आए हैं।

    भगवान के 'सर्वशक्तिशाली', 'भक्त-वत्सल', 'संकट मोचक' एवं 'मोक्षदायक' स्वरूप ने जनसामान्य को तेजी से अपनी ओर आकर्षित किया। भगवान की कृपा में विश्वास रखने के कारण इस धर्म को 'भागवत् धर्म' कहा गया। चूंकि विष्णु इस धर्म के मुख्य उपास्य थे इसलिए इसे वैष्णव धर्म भी कहा गया। इस धर्म में विष्णु को सर्वशक्ति सम्पन्न तथा सर्वश्रेष्ठ देवता से भी आगे बढ़कर सर्वव्यापी भगवान माना गया। इस कारण उन्हें 'वासुदेव' कहा गया जिसका अर्थ है 'जो सब जगह व्याप्त' है तथा 'जिसमें सारे पदार्थ निवास करते हैं'।

    वह 'ज्ञान, शक्ति, बल, ऐश्वर्य, वीर्य तथा तेज' नामक छः उत्तम गुणों से युक्त तथा हेय गुणों से रहित है। इस धर्म को 'सात्वत धर्म', 'पांचरात्र धर्म' तथा 'नारायणीय धर्म' भी कहा जाता है। कुछ विद्वानों का मानना है कि भागवत् धर्म, सात्वत धर्म, पांचरात्र धर्म तथा नारायणी धर्म उत्तर-पश्चिम भारत में अलग-अलग एवं स्वतंत्र रूप से प्रकट हुए थे।

    उनके देवी-देवता लगभग एक जैसे थे तथा भक्ति एवं ईश्वरीय कृपा ही इन धर्मों के मुख्य आधार थे, इसलिए ये सब धर्म अपने-अपने देवी-देवताओं, धार्मिक मान्यताओं एवं उपासना विधियों को साथ लेकर वैष्णव धर्म में समाहित हो गए जो अपने पूर्ववर्ती धर्मों अर्थात् भागवत् धर्म, सात्वत धर्म, पांचरात्र धर्म तथा नारायणी धर्म से अधिक पुष्ट था। इस प्रकार वैष्णव धर्म का उदय किसी एक व्यक्ति द्वारा रची जाने वाली अथवा किसी एक निश्चित समय में घटित होने वाली घटना नहीं थी अपितु इसका विकास दीर्घकाल में तथा बहुत से लोगों द्वारा अलग-अलग किए गए प्रयासों का परिणाम था।

    वैदिक धर्म तथा पौराणिक धर्म (वैष्णव धर्म) में अंतर

    वैदिक धर्म तथा पौराणिक धर्म (वैष्णव धर्म) में मूल अंतर यह था कि वैदिक धर्म का ऋषि यज्ञ, हवन, अनुष्ठान, कर्मकाण्ड तथा बलि के माध्यम से विभिन्न देवताओं की कृपा प्राप्त करता था जो कि विविध प्राकृतिक शक्तियों की प्रतीक थीं। जबकि वैष्णव धर्म का उपासक अपने उपास्य देव में विश्वास, भक्ति, प्रणाम, निवेदन, समर्पण आदि के माध्यम से उपास्य देव की कृपा प्राप्त करता था जो कि किसी अथवा किन्हीं प्राकृतिक शक्तियों का प्रतीक नहीं था अपितु सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी, भक्तवत्सल एवं संकट मोचन परमात्मा था और समस्त सृष्टि एवं समस्त देवताओं का स्वामी था।

    पौराणिक धर्म (वैष्णव धर्म) का इतिहास

    पौराणिक धर्म (वैष्णव धर्म) का इतिहास जानने के लिए साहित्य, शिलालेख, मुद्राएं, प्रतिमाएं, मंदिरों के ध्वंसावशेष आदि विविध सामग्री का उपयोग किया जाता है। संस्कृत साहित्य के अंतर्गत लिखित विविध उपनिषद्, रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत्, विविध पुराण वैष्णव धर्म के इतिहास को जानने के मूल साधन हैं। इन ग्रंथों में लेखकों द्वारा कुछ अतिरिक्त बातें लिख दिए जाने एवं कुछ मूलभूत बातें छोड़ दिए जाने का अंदेशा रहता है इसलिए शिलालेखों एवं मुद्राओं को अधिक प्रामाणिक माना जाता है।

    भागवत् धर्म अथवा वैष्णव धर्म का सर्वप्रथम उल्लेख ई.पू. पांचवी शती में पाणिनी द्वारा लिखित अष्टाध्यायी (4/3/98) में उपलब्ध होता है। इससे अनुमान किया जाता है कि ई.पू. छठी शताब्दी में अस्तित्त्व में आए जैन धर्म, बौद्ध धर्म एवं उपनिषदों के बाद के किसी काल में वैष्णव धर्म का उदय हुआ। अतः इसे जैन-धर्म एवं बौद्ध धर्म की प्रतिक्रिया में उत्पन्न हुआ धर्म माना जाता है। चौथी शताब्दी ईस्वी में यूनानी राजदूत मेगस्थिनीज ने मगध सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य की सभा में रहा।

    उसने लिखा है कि 'सौरसेनाई' नामक भारतीय जाति 'हेरेक्लीज' का विशेष रूप से पूजन करती थी। विद्वानों ने हेरेक्लीज को वासुदेव कृष्ण माना है। ई.पू.113 का भिलसा अभिलेख कहता है कि 'भागवत् हेलिओडोरस ने देवाधिदेव वासुदेव की प्रतिष्ठा में गरुड़-स्तम्भ का निर्माण करवाया।' यह हेलियोडोरस तक्षशिला निवासी 'दिय' का पुत्र था तथा इण्डो-बैक्ट्रियन यवन राजा एण्टिालकिडस का राजदूत बनकर मालवा नरेश भागभद्र के दरबार में रहता था। इससे स्पष्ट है कि ई.पू. द्वितीय शती में भागवत् धर्म का पर्याप्त प्रचार हो चुका था।

    यह धर्म भारत के पश्चिमोत्तर भाग में फैला हुआ था जिसमें तब का गांधार तथा आज का पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्वी अफगानिस्तान तक का क्षेत्र सम्मिलित था। उस काल में अनेक इण्डो-यूनानी शासकों ने भागवत् धर्म को स्वीकार कर लिया था। चित्तौड़गढ़ के निकट घोसुण्डी में प्राप्त ई.पू.200 के शिलालेख में संकर्षण एवं वासुदेव के उपासना मण्डल के चारों ओर पूजा-शिला प्राकार का निर्माण किए जाने का उल्लेख है। ई.पू. पहली शती के नानाघाट के गुहा अभिलेख के प्रारम्भिक मंगलाचरण में अन्य देवों के नाम के साथ-साथ संकर्षण (अर्थात् बलराम) तथा वासुदेव (अर्थात् कृष्ण) के नाम भी प्राप्त होते हैं।

    मथुरा में जब शक क्षत्रपों का शासन था तब इस मण्डल में वैष्णव धर्म का उत्थान हुआ। ई.पू.80 से ई.पू.57 की अवधि में मथुरा के महाक्षत्रप शोडाश के काल का एक शिलालेख मिला है जिसमें लिखा है कि 'वसु' नामक व्यक्ति ने महास्थान (जन्मस्थान) में भगवान् वासुदेव का एक चतुःशाला मंदिर, तोरण तथा वेदिका (चौकी) का निर्माण करवाया। मथुरा में कृष्णमंदिर के निर्माण का यह पहला उल्लेख है। ईसा पूर्व प्रथम शती के उपरोक्त उल्लेख के लगभग 400 साल बाद तक ब्राह्मण धर्म के किसी भी सम्प्रदाय का अभिलेख अथवा शिल्प सम्बन्धी प्रमाण नहीं मिला है।

    ये प्रमाण पुनः ईसा की चौथी शती के प्रथम भाग में गुप्त शासकों के काल में मिलते हैं। पौराणिक धर्म का सर्वाधिक उन्नयन गुप्त शासकों के काल में हुआ। गुप्तवंशीय राजा स्वयं को 'परमभागवत्' कहते थे। गुप्तकालीन अभिलेखों, मूर्तियों एवं ताम्रपत्रों आदि में पौराणिक धर्म के उन्नयन तथा विकास का सांगोपांग विवरण मिलता है। पौराणिक धर्म का प्रारम्भिक इतिहास अत्यंत अस्पष्ट है जिसमें एक ओर सात्वत, भागवत्, पांचरात्र, नारायणीय, पौराणिक आदि विभिन्न मतों के संयोजन की तथा दूसरी ओर नारायण, वासुदेव, विष्णु तथा कृष्ण नामों के एकीकरण की दीर्घकालीन एवं जटिल प्रक्रिया है।

    वैष्णव धर्म के विकास की जटिल प्रक्रिया को महाभारत के विभिन्न स्थलों पर अनुभव किया जा सकता है। महाभारत के शांति पर्व के नारायणीय खण्ड (अध्याय 334-351) में वासुदेव कृष्ण की नारायण विष्णु से अभेद स्थापना की गई है। वैष्णव धर्म के प्रमुख ग्रंथ श्रीमद्भगवगीता, श्रीहरिवंश पुराण, विष्णु सहस्रनाम तथा अध्यात्म रामायण महाभारत के ही अंश हैं। उत्तर भारत के शूरसेन मण्डल में 'सात्वत' नामक क्षत्रिय जाति निवास करती थी। भागवत् पुराण में परमब्रह्म को भगवत् अथवा वासुदेव कहने वाले तथा वासुदेव की पूजा की विशिष्ट पद्धति रखने वाले सात्वतों का वर्णन है।

    इसमें वासुदेव को 'सात्वतर्षभ' कहा गया है। जिस वृष्णि वंश में वासुदेव (कृष्ण), संकर्षण (बलराम), अनिरुद्ध (कृष्ण के पुत्र) आदि ने जन्म लिया था, उस वृष्णि जाति का ही दूसरा नाम सात्वत था। कुछ विद्वान 'सात्वत' को वृष्णि का पर्यावाची न मानकर 'वृष्णि' का एक गोत्र मानते हैं जिसमें कृष्ण आदि का जन्म हुआ। इस प्रकार एक ही धार्मिक पद्धति 'सात्वत' तथा 'भागवत्' दोनों नामों से प्रसिद्ध हुई। पुराणों तथा महाकाव्यों में कृष्ण के लोकोत्तर कार्यों का वर्णन है।

    यादव वंश का यह असाधारण मेधा सम्पन्न वीर पुरुष शीघ्र ही अपने जन में पूज्य पुरुष के रूप में स्थापित हुआ तथा उनके धर्म का उपास्य देव बना। यही भागवत अथवा सात्वत धर्म कहलाया। महाभारत के शांति पर्व में भागवत धर्म को सात्वत विधि कहा गया है और उसी सात्वत विधि को पांचरात्र नाम भी दिया गया है। वैष्णव तंत्रों में अन्यतम पद्मतंत्र में भागवत् धर्म के लिए सात्वत, एकान्तिक तथा पंचरात्र पर्याय नाम दिए गए हैं।

    उपरोक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि यादव वंश की सात्वत जाति ने एक ऐसे धार्मिक सम्प्रदाय को विकसित किया जिसने बौद्ध एवं जैन धर्म के विपरीत, परमेश्वर के विचार को मान्यता दी तथा मुक्ति प्राप्त करने के लिए उस परमेश्वर की भक्ति का मार्ग बताया। सात्वतों के इस धर्म में परम पुरुष के रूप में वासुदेव की पूजा की जाती थी। मेगस्थिनीज ने सात्वतों तथा उनके द्वारा की जाने वाली वासुदेव कृष्ण की पूजा का स्पष्ट संकेत किया है। महाभारत में सात्वत धर्म के पर्याय के रूप में पांचरात्र मत का नाम दिया गया है। महाभारत के शांति पर्व के नारायणीय खण्ड में सर्वप्रथम पांचरात्र का उल्लेख हुआ है।

    नारायण के उपासक को पांचरात्र तथा स्वयं नारायण को पांचरात्रिक कहा गया है। महाभारत के अनुसार यह मत महोपनिषद् है जिसमें चारों वेदों तथा सांख्य का समावेश है। शतपथ ब्राह्मण में पांच रात्रियों तक चलने वाले एक 'पांचरात्र सत्र' का वर्णन है। पुरुष नारायण ने यह पांचरात्र सत्र किया था जिससे उन्हें समस्त प्राणियों पर आधिपत्य प्राप्त हो गया। अतः इस सत्र के आधार पर इस मत का नाम पांचरात्र पड़ा। नारद संहिता में इस मत में विवेच्य विषयों की संख्या पांच होने से यह पांचरात्र कहलाया।

    रात्र का अर्थ ज्ञान होता है तथा इस धर्म में परमतत्त्व (परमात्मा), मुक्ति (मोक्ष), भुक्ति (भोग अथवा आहार), योग (प्राणायाम एवं ध्यान आदि) तथा विषय (संसार) नामक पांच प्रकार के ज्ञान का निरूपण किया गया है। ईश्वर संहिता के अनुसार शांडिल्य, औपगायन, मौंजायन, कौशिक तथा भारद्वाज नामक पांच ऋषियों की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् ने पांचों को पांच दिन एवं रातों तक इस धर्म की शिक्षा दी थी इसलिए इसका नाम पांचरात्र हुआ।

    शंकराचार्य ने ब्रह्मसूत्र पर अपनी टीका में भागवत् सम्प्रदाय का उल्लेख करते हुए पांच पूजा-विधियां बताई हैं जिनके कारण इस धर्म का नाम पांचरात्र पड़ा-

    (1.) अभिगमन्: मन वचन एवं शरीर को भगवान पर केन्द्रित करके मंदिर में जाना।

    (2.) उपादान: पूजा सामग्री एकत्रित करना।

    (3.) इज्या: पूजा करना।

    (4.) स्वाध्याय: मंत्र का जाप करना।

    (5.) योग: समाधि लगाना।

    पद्मतंत्र के अनुसार इस मत के सम्मुख पांच मत- योग, सांख्य, बौद्ध, जैन तथा पाशुपत रात्रि के सदृश मलिन हो जाते हैं, अतः यह पांचरात्र है। अहिर्बुध्न्य संहिता के अनुसार उपास्य देव के पांच रूपों- पर, व्यूह, विभव, अन्तर्यामिन् तथा अर्चा को स्वीकार करने के कारण इस मत का नाम पांचरात्र हुआ। अहिर्बुध्न्य संहिता पांचरात्र मत की प्रारम्भिक संहिताओं में से एक है। उपरोक्त वर्णित सात्वत, भागवत् तथा पांचरात्र धर्मों का वैष्णव धर्म में एकीकरण कब हुआ, यह कहना कठिन है किंतु निश्चित रूप से यह एक लम्बी प्रक्रिया थी।

    इन सभी मतों के उपास्यदेव वासुदेव ही थे। उन वासुदेव कृष्ण का संश्लेषण विष्णु एवं नारायण से होने की प्रक्रिया भी उतनी ही लम्बी रही होगी। विष्णु, नारायण, वासुदेव, कृष्ण आदि विभिन्न नामों में सर्वाधिक प्राचीन नाम विष्णु ही है। इस नाम का उल्लेख ऋग्वेद में भी कई बार हुआ है। इस प्रकार वैष्णव धर्म में विष्णु की जो महत्ता स्थापित की गई है उसका बीज आर्यों के सर्वप्रथम ग्रंथ ऋग्वेद में उपलब्ध है।

    पौराणिक धर्म अथवा वैष्णव धर्म के इतिहास का काल विभाजन

    पौराणिक धर्म के इतिहास को काल विभाजन की दृष्टि से दो मुख्य युगों मेें बाँटा जा सकता है-

    (1) पौराणिक धर्म (वैष्णव धर्म) का उद्भव काल

    ई.पू. 600 से ई.300 तक लगभग 900 वर्षों का काल भक्ति प्रधान सम्प्रदायों के बीजारोपण, अंकुरण और पल्लवित होने का युग था किन्तु इस सम्पूर्ण समय में बौैद्ध धर्म तथा जैन-धर्म की प्रबलता के कारण पौराणिक धर्म का पूर्ण विकास नहीं हो पाया। इस काल के 1500 से भी अधिक अभिलेख मिले हैं जिनमें से 50 से भी कम अभिलेख शैव, वैष्णव अथवा हिन्दू-धर्म के अन्य सम्प्रदायों से सम्बन्ध रखते हैं शेष समस्त बौद्ध और जैन धर्मों का उल्लेख करते हैं।

    स्पष्ट है कि ई.पू. 600 से ई.पू. 300 तक पौराणिक धर्म का विशेष उत्कर्ष नहीं हुआ। नन्द राजाओं (ई.पू.345-321) तथा चन्द्रगुप्त मौर्य (ई.पू.321-296) के संरक्षण में जैन-धर्म का प्रसार हुआ। सम्राट अशोक (ई.पू.268-ई.पू.232) ने बौद्ध धर्म को राज्याश्रय प्रदान किया। मौर्य शासकों का विनाश करके पुष्यमित्र आदि राजाओं ने अश्वमेध आदि यज्ञों को पुनर्जीवित किया किंतु ई.पू. 200 से ई.100 तक पश्मिोत्तर भारत पर शासन करने वाले मिनेण्डर आदि यवन राजाओं और कनिष्क आदि कुषाण राजाओं ने पुनः बौद्ध धर्म को प्रश्रय दिया।

    इस कारण इस काल में पौराणिक धर्म सात्वत धर्म, भागवत धर्म, नारायणी धर्म, पांचरात्र धर्म आदि प्रारम्भिक स्वरूपों में विद्यमान रहा तथा उनका संशलिष्ट स्वरूप 'वैष्णव धर्म' के रूप में इसके बाद ही सामने आया। तीसरी शताब्दी ईस्वी में कुषाणों का उच्छेदन करने वाले भारशिव-नाग राजाओं ने हिन्दू-धर्म को राजधर्म बनाया। उसने दस अश्वमेध यज्ञ किए। भारशिव-नागों से तथा उनके बाद के गुप्त राजाओं का संरक्षण पाकर पौराणिक हिन्दू-धर्म का उत्कर्ष होने लगा और बौद्ध धर्म में क्षीणता आ गई।

    (2) पौराणिक धर्म (वैष्णव धर्म) का उत्कर्ष काल

    ई.300 से ई.1200 तक लगभग 900 वर्षों का काल पौराणिक धर्म का उत्कर्ष काल माना गया है। इस काल का प्रारम्भ मगध में गुप्त सामाज्य की नींव पड़ने से होता है जो ई.495 तक अस्त्तिव में रहता है। राजनीतिक स्तर पर गुप्त वंश ही सच्चे अर्थों में पौराणिक धर्म का उन्नायक था। गुप्त शासकों के संरक्षण में वैष्णव धर्म की स्थापना राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी धूमधाम से हुई किंतु बौद्ध धर्म अपना अस्त्तिव बनाए रहा। चौथी शताब्दी ईस्वी से भारत में बौद्ध तथा जैन धर्मों की तुलना में पौराणिक हिन्दू-धर्म को प्रधानता मिलने लगी।

    पांचवी शताब्दी ईस्वी के अंत में विदेशी हूण शक्ति ने गुप्त साम्राजय का विनाश किया किंतु हूण बौद्धों के परम-शत्रु सिद्ध हुए। उनके क्रूर प्रहारों से बौद्ध धर्म इतिहास के अस्ताचल में खिसक गया और पौराणिक धर्म को भलीभांति फलने-फूलने का अवसर प्राप्त हुआ। सातवीं शताब्दी ईस्वी में थाणेश्वर में पुष्भूति वंश का उदय हुआ जिसका सर्वाधिक शक्तिशाली राजा हर्षवर्द्धन, सभी धर्मों को आदर देने वाला था किंतु उसने बौद्ध धर्म की पुनर्स्थापना के विशेष प्रयास किए।

    हर्ष की मृत्यु के बाद उत्तरी भारत में राजपूत वंशों का उदय हुआ जिनका राज्य निरंतर होने वाले युद्धों पर टिका था। इसलिए राजपूत राजाओं ने बौद्ध एवं जैन-धर्म की बजाए पौराणिक धर्म को अपनाया जिसमें सर्वशक्तिमान, भक्तवत्सल एवं शत्रुविनाशक विष्णु, शिव एवं दुर्गा तथा उनके विविध अवतारों की पूजा होती थी। राजपूत राज्य 12वीं शताब्दी के अंत तक अपना स्वतंत्र अस्त्तिव बनाए रहे किंतु जब दिल्ली में मुस्लिम सल्तनत की स्थापना हुई तो पौराणिक धर्म की प्रगति अवरुद्ध हो गई।

    दिल्ली के मुस्लिम सुल्तानों ने हजारों मंदिरों एवं मूर्तियों को तोड़ डाला, हिन्दू ग्रंथों को नष्ट कर दिया और लाखों हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसमलमान बनाया। फिर भी पौराणिक धर्म, बौद्ध धर्म की तरह नष्ट नहीं हुआ। वह भक्तवत्सल भगवान की शरण में जीवन जीने की शक्ति प्राप्त करता रहा। पौराणिक धर्म आज भी पूरे उत्साह के साथ जीवित है और भारत की लगभग 80 प्रतिशत जनसंख्या इस धर्म का पालन करती है। 12 वीं शताब्दी के अन्त तक पौराणिक धर्म के दोनों प्रतिद्वंद्वी समाप्त हो गए। बौद्ध धर्म का तो भारत में नामलेवा तक नहीं बचा और जैन-धर्म का प्रभाव नगण्य रह गया।


    पौराणिक धर्म अथवा वैष्णव धर्म के मूल तत्त्व

    विष्णु

    पुराणों का वैचारिक आधार विष्णु की भक्ति एवं उपासना पर अवलम्बित है। विष्णु को हरि, वासुदेव, नारायण, दामोदर आदि नामों से सम्बोधित किया जाता है। उसी को ईश्वर एवं परम-पिता-परमात्मा आदि रूपों में जाना जाता है। वह 'अच्युत' है अर्थात् उसका कभी पतन नहीं होता। वेदों और उपनिषदों में विष्णु की उपासना का उल्लेख कई स्थलों पर हुआ है। ऋग्वेद में विष्णु को सूर्य का रूप माना गया है तथा 'निरुक्त' में बताया गया है कि सूर्य का नाम ही विष्णु है।

    ऋग्वेद में वर्णित 'त्रिविक्रम की कथा' में विष्णु को समस्त विश्व की रक्षा करने वाला माना गया है। विष्णु के इन तीन विस्तीर्ण पदन्यासों ने समस्त लोकों को माप लिया। इनमें से दो चरण ही मनुष्य देख या प्राप्त कर पाते हैं किंतु तृतीय चरण पक्षियों की उड़ान से भी परे है। उसका कोई अतिक्रमण नहीं कर सकता। विष्णु इन्द्र के सखा हैं तथा उसकी सहायता करते हैं। ऋग्वेद में विष्णु का जगत् के नियामक के रूप में वर्णन है। विष्णु के परमपद में मधु का उत्स है जहाँ देवताओं के इच्छुक मनुष्य आनंद करते हैं।

    ऋग्वेद में विष्णु को इतना महत्व दिए जाने के उपरांत भी वहाँ विष्णु मध्यम श्रेणी के देवता हैं तथा इन्द्र से निम्न हैं। ब्राह्मण ग्रंथों के रचना काल में विष्णु की स्थिति ऋग्वेद काल की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देती है। विष्णु इस युग में भी यज्ञ से ही सम्बद्ध हैं, भक्ति से नहीं। वरुण के साथ मिलकर विष्णु यज्ञ की रक्षा किया करते हैं किंतु ब्राह्मण युग में विष्णु के तृतीय चरण अथवा परम पद के प्रति सम्मान भावना ने विष्णु के महत्वोत्कर्ष में सर्वाधिक योगदान दिया।

    ऐतरेय ब्राह्मण में विष्णु का उल्लेख सर्वोच्च देवता के रूप में प्राप्त होता है। शतपथ ब्राह्मण में एक कथा प्राप्त होती है जिसमें देवताओं ने तेज, ऐश्वर्य एवं अन्न प्राप्ति के लिए किए गए यज्ञ में यह प्रस्ताव किया कि देवों में जो अपने कर्म से यज्ञ के अंत को सर्वप्रथम प्राप्त कर ले, वह सर्वोच्च पद प्राप्त करे। विष्णु ने यज्ञ का अंत सर्वप्रथम प्राप्त कर लिया। अतः विष्णु को देवों में श्रेष्ठ माना गया। शतपथ ब्राह्मण से ही वामन विष्णु की कथा भी प्राप्त होती है जिसमें विष्णु को अद्भुत शक्तियों से सम्पन्न कर दिया गया है।

    आरण्यक तथा उपनिषद् काल में विष्णु का महत्व ब्राह्मण ग्रंथों के रचना काल की अपेक्षा बढ़ गया। 'तैत्तिरीय आरण्यक' में यज्ञान्त प्राप्त करने के कारण श्रेष्ठता प्राप्त विष्णु की कथा शतपथ ब्राह्मण की ही भांति प्राप्त होती है। 'मैत्री उपनिषद' में अन्न को जगत के धारक विष्णु का स्वरूप कहा गया है। कठोपनिषद में स्पष्ट उल्लिखित है कि विवेकयुक्त बुद्धि सारथि से युक्त तथा मन पर नियंत्रण रखने वाला व्यक्ति संसार मार्ग से पार होकर विष्णु के परमपद को प्राप्त होता है।

    महाकाव्यों एवं पुराणों के समय तक आते-आते विष्णु परमात्मा के पद पर प्रतिष्ठित हो गए। महाकाव्य काल में इन्द्र केवल देवराज रह गए जिनका सिंहासन विष्णु की कृपा से ही सुरक्षित रहता था। वेद में विष्णु का सूर्य से जो सम्बन्ध था वह परवर्ती युग में भी बना रहा। विभिन्न पुराणों में आदित्यों के नाम की अलग-अलग सूचियां मिलती हैं किंतु विष्णु नाम सब सूचियों में है। वैष्णव चक्र भी विष्णु का सूर्य से ही सम्बन्ध सूचित करता है। ऐसे परम पद प्राप्त विष्णु से वासुदेव का तादात्म्य हुआ।

    महाभारत वासुदेव कृष्ण तथा विष्णु के एकत्व का प्रतिपादन करता है। भीष्म पर्व के 65 एवं 66 वें अध्याय में परमात्मा को नारायण एवं विष्या तथा वासुदेव कहा गया है। शांति पर्व के 43वें अध्याय में युधिष्ठिर कृष्ण की स्तुति करते हुए उन्हें विष्णु कहते हैं। भगवद्गीता में कृष्ण अपना विराट रूप दिखाते हैं। आश्वमेधिक पर्व के 53 से 55 वें अध्याय में उत्तंक ऋषि की प्रार्थना पर कृष्ण उन्हें अध्यात्म ज्ञान की शिक्षा देते हुए पुनः अपने विराट् स्वरूप का दर्शन करवाते हैं किंतु यहाँ उन्हें विष्णु रूप कहा गया है।

    नारायण

    पौराणिक धर्म में नारायण-विष्णु तथा उनके विशिष्ट अवतारों की उपासना एवं भक्ति प्रमुख है। महाकाव्य एवं पुराण गंथों में नारायण तथा विष्णु में कोई भेद नहीं है किंतु पुराण-धर्म के आदि स्वरूप में विष्णु की अपेक्षा नारायण की प्रमुखता थी। महाभारत में भी उपास्य देव को प्रायः नारायण नाम से पुकारा गया है। विष्णु नाम अपेक्षाकृत बहुत कम है। विष्णु एवं नारायण के तादात्म्य का प्रारम्भिक संकेत बोधायन धर्मसूत्र से प्राप्त होता है। मनुस्मृति के अनुसार 'नाराः' का अर्थ है जल और परमात्मा का प्रथम निवास जल है।

    इस कारण 'परमात्मा' नारायण कहे जाते हैं। नारायण नाम का सर्वप्रथम उल्लेख शतपथ ब्राह्मण में हुआ है। इसके अनुसार नारायण ने क्रमशः प्रातः मध्याह्न तथा सायंकाल के समय आहुतियों के द्वारा वसुओं, रुद्रों तथा आदित्यों को यज्ञस्थल से हटा दिया। प्रजापति ने उनसे पुनः यज्ञ करने को कहा। इस प्रकार नारायण ने यज्ञ के द्वारा समस्त लोकों, समस्त देवों, समस्त वेदों तथा सभी प्राणों में स्वयं को प्रतिष्ठित किया और उन सभी को स्वयं में प्रतिष्ठित कर लिया।

    शतपथ ब्राह्मण के ही द्वितीय उल्लेख के अनुसार पुरुष नारायण के द्वारा पांचरात्र सत्र किया गया जिस सत्र के कर लेने से पुरुष नारायण को समस्त भूतों पर सर्वश्रेष्ठता प्राप्त हो गई और वह समस्त भूत बन गया। तैत्तिरीय आरण्यक में नारायण का वर्णन परमात्मा के उन समस्त विशेषणों के द्वारा किया गया जो सामान्यतः उपनिषदों में मिलते हैं। महाभारत में अनेक कथाओं में नारायण का वर्णन है तथा उनका तादात्म्य वासुदेव के साथ किया गया है।

    नारायणीय के प्रथम अध्याय में भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं कि भगवान् नारायण सम्पूर्ण जगत् के आत्मा, चतुर्मूर्ति और सनातन देव हैं। वे ही धर्म के पुत्र रूप में प्रगट हुए थे। स्वायंभू मन्वन्तर के सत्य युग में उनके चार स्वयंभू अवतार हुए थे जिनके नाम हैं- 'नर, नारायण, हरि एवं कृष्ण। इनमें से अविनाशी नर और नारायण ने बदरिकाश्रम में घोर तपस्या की।' पुराणों में सृष्टि रचना के प्रसंग में नारायण का वर्णन परमेश्वर के रूप में हुआ है।

    वासुदेव

    पुराण-धर्म में वासुदेव नाम अत्यंत महत्वपूर्ण है। सात्वत गोत्रीय 'कृष्ण' वसुदेव के पुत्र होने के कारण वासुदेव कृष्ण कहलाए। ईस्वी सन् से पूर्व की अनेक रचनाओं- घट जातक, महाभाष्य तथा कतिपय शिलालेखों में इन्हीं वासुदेव कृष्ण का परम देव के रूप में वर्णन किया गया है जो संकर्षण बलराम के भाई थे किंतु अनेक इतिहास लेखकों ने वसुदेव के पुत्र वासुदेव (कृष्ण) से पूर्ववर्ती एक और वासुदेव की सत्ता स्वीकार की है। वासुदेव कृष्ण से पूर्व एक और दिव्य वासुदेव अवश्य हुए हैं।

    यह नाम किसी देवता का भी हो सकता है। विष्णु-पुराण ने देवता वासुदेव तथा देवकी पुत्र वासुदेव कृष्ण को भिन्न-भिन्न प्रतिपादित किया है कि भगवान् वासुदेव का एक अंश दो भागों में विभक्त होकर कृष्ण और बलराम में स्थापित हुआ। महाभारत के वनपर्व में पौण्ड्रक शाल्व नरेश की कथा है जो स्वयं को वास्तविक वासुदेव घोषित करता है। इस शाल्व राजा को कृष्ण ने युद्ध में मार डाला था। यह कथा स्पष्ट संकेत करती है कि कृष्ण से पूर्व भी वासुदेव की पूजा प्रचलित थी किंतु बाद में ये दोनों वासुदेव एक हो गए।

    कृष्ण

    वसुदेव-देवकी के पुत्र कृष्ण का व्यक्तित्व ऐतिहासिक है किंतु कृष्ण के समय का सही-सही निर्धारण कर पाना कठिन है। कृष्ण के जीवनचरित को जानने के लिए छान्दोग्य उपनिषद्, पतंजलि का महाभाष्य, बौद्ध एवं जैन आख्यान, महाभारत तथा विभिन्न पुराणों का सहारा लिया जाता है। ये सभी स्रोत अलग-अलग समय के हैं तथा इनमें शताब्दियों का अंतराल मौजूद है। इसलिए इनमें दिए गए कृष्ण सम्बन्धी वृत्तांतों में पर्याप्त अंतर है।

    ऋग्वेद के एक उल्लेख के अनुसार इन्द्र ने अंशुमती नदी के तट पर कृष्ण नामक एक अनार्य प्रमुख का संहार किया था। पुरात्तवविदों के अनुसार यह अंशुमती कोई और नदी नहीं अपितु यमुना ही है। छांदोग्य उपनिषद में कृष्ण को देवकी का पुत्र बताया गया है जिसने घोर अंगरिस से शिक्षा ग्रहण की थी। दूसरे स्रोतों से अनुमान होता है कि गीता का उपदेश इसी कृष्ण ने किया था। पतंजलि के महाभाष्य में कृष्ण देवता के रूप में उल्लिखित हैं। बौद्ध ग्रंथ 'घट-जातक' से वासुदेव-कृष्ण के जन्म की कथा उपलब्ध होती है।

    उसके अनुसार वासुदेव-कृष्ण तथा उसके भाई बलदेव, 'कंसभगिनी देवगब्भा' तथा उसके पति 'उपसागर' के पुत्र थे। उन्हें पालन-पोषण के लिए 'अंधकवेण्हु' नामक पुरुष और 'नंदगोपा' नामक उसकी पत्नी को सौंप दिया गया था जो कि देवगब्भा की दासी थी। जैनियों के 'उत्तराध्ययन सूत्र' में वासुदेव को 'केशव' कहा गया है। जैनों के बाइसवें तीर्थंकर अरिष्टनेमि अथवा नेमिनाथ के समकालीन रूप में उनके तिरेसठ शलाका पुरुषों में केशव (वासुदेव) भी वर्णित हैं।

    केशव के माता-पिता वसुदेव एवं देवकी थे। वर्तमान काल में कृष्ण का प्रचलित चरित महाभारत, हरिवंश, श्रीमद्भागवत् तथा अन्य पुराणों के आधार पर विकसित एक मिश्रित रूप है। भिन्न-भिन्न पुराणों में भिन्न-भिन्न युगों में कृष्ण के साथ गोपिकाओं, राधा, असुर संहार आदि की कथाएं जुड़ती चली गईं। विष्णु-नारायण-वासुदेव के साथ कृष्ण की एकरूपता सिद्ध होने में स्वभावतः ही उन देवों के गुणों तथा विशेषताओं को आरोपित कर दिया गया। वेद में विष्णु के साथ गायों का सम्बन्ध था।

    विष्णु के परम पद में 'भूरिश्ृंगा गावः' स्थिति थी। कृष्ण के साथ भी गायों का घनिष्ट सम्बन्ध पौराणिक परम्परा में स्थापित हुआ। कृष्ण का परम लोक 'गोलोक' कहलाता है। बोधायन धर्मसूत्र में आए हुए गोविन्द तथा दामोदर नाम कृष्ण के साथ जुड़कर भिन्न अर्थ प्रकट करने लगे।

    भक्ति

    यद्यपि 'भक्ति' एक ऐसा तत्त्व है जिसने पुराणों को वेदों से अलग किया तथापि भक्ति का बीजारोपण वेदों में ही होता हुआ दिखाई देता है। वैदिक विष्णु का सम्बन्ध सर्वत्र 'यज्ञ' से है किंतु पौराणिक विष्णु का सम्बन्ध 'भक्ति' से है। वैदिक युग में राजा बसु द्वारा यज्ञों में पशुबलि का विरोध करने तथा 'हरि' की उपासना पर बल देने से भक्ति-प्रधान धर्म का बीजारोपण हो गया। उपनिषदों में भी भक्ति करने तथा ईश्वर के शरणागत होने के भाव का उल्लेख मिलता है।

    उपनिषदोें में कहा गया है- 'आत्मा (यहाँ इसका आशय परमात्मा से है) की उपलब्धि किसी बलहीन को नहीं होती और न वह उपनिषदों से, अध्ययन से अथवा यज्ञ से ही सम्भव है। वह जिस किसी को वरण कर लेती है, वही उसे पाने में समर्थ होता है। अतः आत्मा द्वारा वरण किए जाने के पूर्व उसे प्रार्थना या सेवा से प्रसन्न कर लेना आवश्यक है।' इस प्रकार अनेक विद्वानों ने वेदों, सूक्तों एवं उपनिषदों में भी भक्ति तत्त्व को खोजने के प्रयास किए हैं ंिकंतु भगवद्गीता ही वह ग्रंथ है जिसमें भक्ति की पूर्ण व्याख्या उपलब्ध है जिसके अनुसार परमेश्वर के प्रति शुद्ध अनुराग तथा श्रद्धा ही भक्ति ईश्वर विराट् तथा इन्द्रियातीत हैं किंतु एक लौकिक विग्रह धारी परमात्मा भी है जिसके प्रति भक्त ऐसी अंतरंगता अनुभव करता है जैसा मित्र के प्रति मित्र अथवा पिता के प्रति पुत्र।

    इस प्रकार एकमात्र 'हरि' में एकाग्र भाव से 'भक्ति' करने वाली साधना का 'एकांतिक धर्म' के रूप में उदय हुआ। इसकी पूजन विधि 'सस्वत विधि' कहलाती थी जिसके प्रधान अंग- भक्ति, आत्मसमर्पण तथा अहिंसा थे। वासुदेव कृष्ण ने भक्ति-मार्ग का प्रचार किया। इस कारण आगे चलकर इसका नाम भी 'वासुदेव धर्म' पड़ गया तथा हरि का स्थान स्वयं वासुदेव कृष्ण ने ग्रहण कर लिया। विक्रम संवत् के पूर्व तीसरी शताब्दी तक इसकी विधि 'पांचरात्र विधि' मंे परिणित हो गयी और इसका नाम 'भागवत धर्म' के रूप में परिवर्तित हो गया।

    भागवत सम्प्रदाय ने यज्ञों और तप की निरर्थकता, यज्ञों में पशुबलि की निन्दा तथा भक्ति तत्त्व की प्रधानता द्वारा वैदिक विश्वासों और परम्पराओं के विरुद्ध क्रान्ति की किंतु ईश्वर की सत्ता को मानने के कारण यह क्रान्ति बौद्ध और जैनों की क्रान्ति की भाँति उग्र तथा नास्तिक नहीं थी।

    अहिंसा

    वैष्णव धर्म में भक्ति के साथ अहिंसा पर विशेष बल दिया गया जिसका अर्थ होता है- मन, वचन एवं कर्म से किसी को भी कष्ट नहीं पहुँचाना। भगवद्गीता में अहिंसा का उल्लेख तीन बार हुआ है। एक स्थल पर अहिंसा का उल्लेख 'ज्ञान' के अंतर्गत तथा दूसरे स्थल पर 'मुक्ति दिलाने वाली दैवी सम्पदा' के रूप में हुआ है तथा तीसरे स्थल पर 'शरीर सम्बन्धी तप' में शौच, आर्जव, ब्रह्मचर्य आदि के साथ हुआ है। महाभारत के नारायणीय खण्ड में अहिंसा पर विशेष बल दिया गया है। विष्णु-भक्त राजा वसु उपरिचर का आख्यान इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है जिसके द्वारा किए गए अश्वमेध यज्ञ में पशुबलि नहीं दी गई अपितु आरण्यकों के पदों के अनुसार जौ से आहुतियाँ दी गईं।

    इसी नारायणीय खण्ड में भगवान् ने वैष्णव धर्म के सिद्धांत बताते हुए ब्रह्मादिक देवों को उसी देश में रहने का उपदेश दिया जिसमें वेद, यज्ञ, तप, सत्य आदि अहिंसा से संयुक्त होकर प्रचलित हों। विष्णु-पुराण तथा विष्णु धर्मोत्तर पुराण में अहिंसा का महत्त्व प्रतिपादित करने वाले अनेक कथाएं हैं। अवतारवाद अवतारवाद की परिकल्पना भी पौराणिक धर्म का मूल तत्त्व है।

    यह सिद्धांत भागवत् वासुदेव नारायण के साथ वासुदेव कृष्ण का तादात्म्य कर दिए जाने से प्रचारित हुआ। जब भी कोई देवता अवतार ग्रहण करता है तो उसका कोई न कोई विशिट प्रयोजन होता है। महाभारत के नारायणीय खण्ड में नारायण या विष्णु के अवतारों की दो सूचियां उपलब्ध होती हैं। पहली सूची में चार अवतारों का एवं दूसरी सूची में छः अवतारों का उल्लेख है।

    अनेक पुराणों में भी विष्णु के अवतारों को गिनाया गया है जिनमें यह संख्या चार से लेकर चौबीस तक प्राप्त होती है किंतु सामान्यतः इनकी संख्या दस है। इन अवतारों के नामों में भी भिन्नता है किंतु वासुदेव कृष्ण का नाम सर्वत्र ग्रहण किया गया है। वाल्मीकि रामायण के मध्यवर्ती पांच काण्डों में ईक्ष्वाकुवंशीय 'राम' एक महापुरुष हैं किंतु प्रथम एवं अंतिम काण्ड में 'राम', विष्णु के अवतार हैं। राम अपने मानव रूप से उठकर नारायण विष्णु के अवतार किस समय माने जाने लगे, उस काल का निर्धारण नहीं किया जा सकता किंतु इतना निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि ईसा की प्रारम्भिक शताब्दियों में राम के विष्णु अवतार होने का विश्वास विद्यमान था।

    रामोपासना और कृष्णोपासना, दोनों को वैष्णव धर्म में समान रूप से स्वीकार कर लिया गया। पुराणों की मूल सामग्री पुराणों में वेदों के ज्ञान की भक्तिपरक व्याख्या की गई है। इनमें प्राचीन क्षत्रिय राजाओं की वंशावलियां भी दी गई हैं। अश्वमेघ तथा राजसूय आदि यज्ञों में जो आख्यान सुनाये जाते थे, उनमें से अधिकांश आख्यानों ने विकसित एवं परिमार्जित होकर पुराणों का रूप ग्रहण किया। इसीलिए यह उक्ति कही जाती है- 'यज्ञ से पुराण का जन्म हुआ।'

    प्रारम्भ में पुराणों के पाँच विषय थे-

    (1.) सर्ग- सृष्टि की कथा,

    (2.) प्रतिसर्ग- प्रलय के बाद सृष्टि का पुनर्भाव,

    (3.) वंश- देवताओं, राक्षसों, ऋषियों और राजाओं की वंशावलियां,

    (4.) मन्वन्तर- युग चक्रों का आवर्तन

    (5.) वंशानुचरित- राजाओं एवं राजवंशों के वृत्तान्त।

    प्रथम शताब्दी ईस्वी के प्रारम्भ में विभिन्न रूपों में प्रचलित भागवत् धर्मों ने पुराणों को अपने प्रचार का माध्यम बनाया। अतः अधिकतर पुराणों और उप-पुराणों का विस्तार इन धर्मों के आधार पर हुआ। महाभारत-युद्ध के बाद महर्षि वेदव्यास ने प्राचीन वंश-वृत्तों का संग्रह करके अनेक पुराणों की रचना की। इनमें समय-समय पर नई घटनाएँ जुड़ती गईं।

    गुप्तकाल में धर्म और संस्कृति के विभिन्न सूत्रों को संकलित करने का प्रयास हुआ जिसने उस काल के साहित्य की काया ही पलट दी और पुराणों को नया रूप दिया गया। फलस्वरूप पुराणों में भागवत धर्म के साथ-साथ बौद्ध एवं जैन-धर्म की प्रमुख बातों का समन्वय कर दिया गया। इस प्रकार पुराणों में वैदिक ज्ञान और लौकिक-साहित्य का समन्वय हो गया।

    पुराण साहित्य को दो भागों में बाँटा जा सकता है-

    (1.) अठारह महापुराण- वायु पुराण, ब्रह्माण्ड, मार्कण्डेय, विष्णु, मत्स्य, भागवत, कूर्म, वामन, लिंग, वाराह, पद्म, नारद, अग्नि, गरुड़, ब्रह्म, स्कन्द, ब्रह्मवैवर्त और भविष्य महापुराण है।

    (2.) अठारह उप-पुराण- उप-पुराणों की सूचियां अलग-अलग मिलती हैं। बृहद्धर्म पुराण के अनुसार इनकी सूची इस प्रकार है- आदि, आदित्य, बृहन्नारदीय, नन्दीश्वर, बृहन्नन्दीश्वर, साम्ब, क्रियायोगसार, कालिका, धर्म, विष्णुधर्मोत्तर, शिवधर्म, विष्णु धर्म, वामन, वारुण, नारसिंह, भार्गव और बृहद्धर्म।

    महापुराणों में वायु पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, मार्कण्डेय पुराण, विष्णु-पुराण, मत्स्य पुराण और भागवत पुराण सबसे पुराने हैं और इनमें उस काल तक की ऐतिहासिक जानकारी है जब गुप्त सम्राटों का राज्य मगध से लेकर अयोध्या और प्रयाग तक विस्तृत था। आरम्भ में 'वायु पुराण' और 'ब्रह्माण्ड पुराण' एक थे और मूल वायु पुराण की रचना ई.200 के लगभग हुई किन्तु ई.400 के लगभग 'ब्रह्माण्ड पुराण' इससे अलग हो गया। 'वायु पुराण' पाशुपत धर्म का ग्रन्थ रह गया और 'ब्रह्माण्ड पुराण' वैष्णव धर्म का ग्रंथ हो गया। इन दोनों पुराणों में बाद में तांत्रिक और शाक्त सामग्री भी जोड़ दी गई।

    'मार्कण्डेय पुराण' ई.300 के लगभग की रचना है, इसमें देवी महात्म्य बाद में सम्मिलित किया गया। 'कूर्म पुराण' और 'वामन पुराण' ई.500-600 के लगभग पांचरात्र पुराण थे, किंतु ई.800-900 के आसपास इन्हें शैव रूप दिया गया। 'अग्नि पुराण' और 'गरुड़ पुराण' ई.900-1000 के लगभग लिखे गए हैं तथा विश्वकोश प्रकार के ग्रन्थ हैं। 'भविष्य पुराण' बहुत पुराना है, किंतु इसमें अधिक स्वतन्त्रता से वृद्धि की गई और अब इसमें ब्रिटिश शासन तक का उल्लेख मिलता है। कई उप-पुराण भी बहुत पुराने हैं।

    'विष्णु धर्म पुराण' तीसरी शताब्दी ईस्वी का और 'शिव पुराण' ई.200 से 500 के बीच का है किन्तु अधिकतर उप-पुराण ई.650 से 800 की अवधि में लिखे गए थे। उप-पुराणों में 'विष्णुधर्मोत्तर पुराण' को ज्ञान और विद्या का विश्वकोश कहा जा सकता है।

    पौराणिक धर्म (वैष्णव धर्म) को लोकप्रिय बनाने के प्रयास

    जनसामान्य को जैन-धर्म और बौद्ध धर्म के प्रभाव से निकालकर पुनः वैदिक धर्म की ओर लाना अत्यन्त चुनौतीपूर्ण कार्य था। ब्राह्मणों ने इस चुनौती को स्वीकार किया तथा वैदिक धर्म एवं दर्शन सम्बन्धी सिद्धान्तों और मन्तव्यों को श्ृंखलाबद्ध एवं तर्क-संगत रूप देकर महाकाव्यों, स्मृतियों तथा पुराणों की रचना की और वैदिक धर्म के नवीन एवं पूर्णतः परिवर्तित रूप अर्थात् पौराणिक धर्म को लोकप्रिय बनाने के अनेक उपाय किए। इनमें से कुछ उपाय निम्नलिखित हैं-

    (1.) वैदिक धर्म का नवीन रूप: ई.पू.400 से ई.पू.200 तक अर्थात् सम्पूर्ण मौर्यकाल में वैदिक धर्म को प्राचीन यज्ञ-प्रधान धर्म के स्थान पर नया भक्ति-प्रधान पौराणिक रूप दिया गया।

    (2.) दर्शनों का निर्माण: वेदों में भारतीय दर्शनों के मूल विचार मौजूद थे। ब्राह्मण ग्रंथों एवं उपनिषदों में उन्हीं विचारों का विकास हुआ था। पौराणिक काल में उन्ही विचारों को नए सिरे से शास्त्रीय रूप दिया गया। कपिल तथा कणाद आदि ऋषियों को भारतीय दर्शन का प्रणेता समझा जाता है किन्तु उन्होंने पुराने विचारों को नए सिरे से श्ृंखलाबद्ध एवं सुव्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया।

    (3.) लोक-प्रचलित देवताओं को मान्यता: आर्यों में देवताओं की पूजा होती थी जबकि अनार्यों में यक्षों, भूत-प्रेतों, जड़ पदार्थों तथा सर्प आदि जंतुओं की पूजाएँ प्रचलित थीं। बौद्धों ने यक्षों को बुद्ध का उपासक बनाकर उनकी पूजा प्रारम्भ की। हिन्दुओं ने भी उनका अनुकरण किया तथा लोक प्रचलित देवताओं को यथापूर्ण रखते हुए उन्होंने उस पर वैदिक धर्म की हल्की सी छाप लगाकर उन्हें ग्रहण कर लिया। मथुरा में वासुदेव (श्रीकृष्ण) की पूजा प्रचलित थी, उन्हें वैदिक देवता विष्णु से मिलाकर वेदानुयायियों के लिए भी पूज्य बना दिया।

    ऋग्वेद में वर्णित रुद्र को भी नया रूप देकर समस्त जीवों का मंगल करने वाले शिव के रूप में पूजा जाने लगा। वैदिक धर्म के पुनरुत्थान की लहर ने उस समय पूजनीय प्रत्येक जड़ और मनुष्य देवता में किसी न किसी वैदिक देवता का साम्य बिठा दिया। वनचरों के भयंकर देवी-देवता काली और रुद्र के रूप बन गए। भारत भर में पूजित विभिन्न प्रकार के देवी-देवता शिव, विष्णु, सूर्य, स्कन्द आदि विभिन्न शक्तियों के सूचक बन गए। जहाँ किसी पुराने पुरखे की पूजा होती थी, उसे भी किसी न किसी देवता का अवतार मान लिया गया। प्रत्येक पूज्य पदार्थ को किसी न किसी देव-शक्ति का प्रतीक बना दिया गया।

    (4.) लोकप्रिय धर्मग्रन्थों का प्रणयन: बौद्धों की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण जातक कथाएँ और अवदान साहित्य था। इनमें बुद्ध के पूर्वजन्मों तथा बोधिसत्वों की रोचक कथाएँ होती थीं जिनमें उनके दया, दान, आत्मत्याग आदि गुणों पर सुन्दर ढंग से प्रकाश डाला गया था। महात्मा बुद्ध सुन्दर कथाओं और दृष्टांतों द्वारा धर्म के गूढ़ मर्म को जनता तक पहुँचाते थे। उनके शिष्यों ने इस कला को, जातक तथा अवदान साहित्य में पराकाष्ठा तक पहुँचा दिया। प्राचीन वैदिक साहित्य में लोकप्रिय त्तव अत्यल्प था।

    बौद्धों के प्रभाव से ब्राह्मणों ने प्राचीन वीर पुरुषों के शूरतापूर्ण कार्यों पर आधारित ऐतिहासिक गाथाओं को धर्मप्रचार की गाथाओं में बदल दिया। रामायण और महाभारत के नवीन संस्करण तैयार किए गए। महाभारत का प्रधान उद्देश्य आख्यानों द्वारा नए धर्म की शिक्षाओं का प्रचार करना था। अतः श्रीकृष्ण को देवता और विष्णु का अवतार माना गया। विष्णु और शिव की महिमा के गीत गाए गए और भगवद्गीता द्वारा भागवत् धर्म का प्रचार किया गया। महाभारत में 400 ई.पू. से 200 ई. तक की लगभग समस्त धार्मिक और दार्शनिक विचारधाराओं का समावेश है।

    इसी प्रकार रामायण की मूूल कथा में राम एक आदर्श वीर पुरुष थे। रामायण के दूसरे से छठे काण्ड तक राम इसी रूप में चित्रित हैं किन्तु पुराण काल में उसमें पहला और सातवाँ काण्ड जुड़ा और राम भी विष्णु के अवतार बन गए। इन दोनों महाकाव्यों ने भक्ति-प्रधान वैष्णव और शैव-धर्मों को नवीन रूप देने एवं लोकप्रिय बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। वर्तमान पौराणिक हिन्दू-धर्म की आधारशिला रामायण और महाभारत ने रखी और पुराणों ने उसे नया रूप दिया। इसी युग में अधिकांश पुराणों की रचना हुई।

    (5.) ब्राह्मणों के वर्चस्व से बाहर: पुराणों का पठन-पाठन याज्ञिक ब्राह्मणों द्वारा किया जाता था। जब अश्वमेध यज्ञ से आख्यान बाहर निकल गए तो पुराणों से ब्राह्मणों का सम्बन्ध टूट गया और इनके वाचन का कार्य सूतों, चारणों तथा कथावाचकों के पास चला गया। उत्तरवैदिक काल में वेद और उपनिषदों के पठन-श्रवण का अधिकार केवल ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों को था किन्तु रामायण, महाभारत और पुराण सुनने का अधिकार स्त्रियों और शूद्रों को भी था।

    (6.) पौराणिक हिन्दू-धर्म को राज्याश्रय: शुंग एवं गुप्त शासक भागवत धर्म के उपासक और पोषक थे। उनके शक्तिशाली संरक्षण में वैष्णव धर्म का विशेष उत्कर्ष हुआ। गुप्तों के बाद प्रतिहार, चन्देल, मौखरी, कलचुरी, वलभी और कामरूप के राजा वैष्णव या शैव थे। पालवंशी राजा अवश्य बौद्ध अनुयाई थे किन्तु सेनवंशी राजा वैष्णव ओर शैव थे। दक्षिण में शुरुआती चालुक्य राजा जैन-धर्म के पोषक थे किन्तु बाद में वे हिन्दू-धर्म के उपासक बन गए। थे।

    राष्ट्रकूटों में कुछ शासक जैन-धर्म के उपासक थे किन्तु अधिकांश राजा हिन्दू मतावलम्बी थे। पल्लवों और होयसलों के आरम्भिक राजा जैन-धर्म के समर्थक थे किन्तु बाद के पल्लव राजा शैव थे और बाद के होयसल राजा वैष्णव। इससे स्पष्ट है कि पुराण धर्म के उत्कर्ष काल में बौद्ध धर्म और जैन-धर्म को पर्याप्त राज्याश्रय प्राप्त नहीं हुआ और यही उनके ह्रास का एक मुख्य कारण भी था।

    पुराणों का सांस्कृतिक महत्त्व

    पुराण ही पौराणिक हिन्दू-धर्म की आत्मा हैं। पुराणों ने ही हिन्दू-धर्म को वर्तमान स्वरूप प्रदान किया। पुराणों में जिस धार्मिक और सांस्कृतिक समन्वय का परिपाक हुआ उसकी तुलना विश्व के किसी अन्य धर्म से नहीं की जा सकती। गुप्तकाल से लेकर वर्तमान काल तक भारत के साहित्य, शिल्प, स्थापत्य, अध्यात्म, संगीत, नृत्य, गायन, जीवन शैली, वेशभूषा, खानपान आदि जीवन के समस्त अंगों पर उसकी गहरी छाप है।

    वर्णाश्रम धर्म और भागवत धर्म का समन्वय

    उत्तरवैदिक-काल के धर्म को वर्णाश्रम धर्म भी कहा जाता है क्योंकि उसमें मनुष्य के लिए चतुर्वर्ण अधारित कर्म एवं चर्तुआश्रम आधारित जीवन जीने का अनुशासन स्थिर किया गया था। पुराणों ने वर्णाश्रम धर्म को पुनः प्रतिष्ठित किया और शैव तथा वैष्णव धर्मों को इसके साँचे में ढाल दिया। विष्णु-पुराण में राजा सगर के यह पूछने पर कि विष्णु की पूजा कैसे करनी चाहिए, और्व ने उत्तर दिया- 'वही व्यक्ति परमेश्वर की पूजा कर सकता है जो अपने वर्ण और आश्रम सम्बन्धी कर्त्तव्य को पूरा करता हो।'

    कूर्म पुराण में देवी कहती है- 'मोक्ष की प्राप्ति के लिए आत्मज्ञान के साथ-साथ वेदविहित एवं स्मृतिसम्मत वर्णाश्रम धर्म का पालन करो।' वायु पुराण कहता है- 'जब यज्ञों में कमी हो जाती है तो भगवान विष्णु बारम्बार धर्म की स्थापना के लिए जन्म लेते हैं।' इस पुराण में शिव को वर्णों और आश्रमों के पृथक् कर्मों का प्रवर्तक बताया है। पुराणों में वर्णाश्रम धर्म की पुष्टि के लिए अनेक कथाएँ सृजित की गई है।

    विष्णु-पुराण, वायु पुराण और भागवत पुराण में राजा वेन की कथा आती है जिसमें लिखा है- 'वर्णाश्रम धर्म की अवहेलना के अपराध में ऋषियों ने उसे यमलोक पहुँचा दिया।' विष्णु-पुराण में यम अपने दूतों को निर्देशित करते हैं कि वे विष्णु के उपासकों के हाथ न लगाएँ, क्योंकि वे वर्णाश्रम धर्म के नियमों का पालन करते हैं। समस्त पंचरात्र संहिताओं में वर्णाश्रम धर्म को स्वीकार किया गया है। इस प्रकार पुराणों के माध्यम से वैष्णव और शैव धर्म प्राचीन सामाजिक व्यवस्था के पोषक बन गए।

    पुराणों मे वैदिक विचारों का नया रूप

    पुराणों में वैदिक विचारों, देवताओं और विश्वासों को नवीन आख्यानों का सम्बल दिया गया। पुराणों के चिन्तन-मनन का तात्त्विक आधार वैदिक चिंतन ही है। वेद के अव्यय, अक्षर और क्षर पुरुष, पुराणों में ब्रह्म, विष्णु और शिव हो गए। वेद की 'त्रिधाम विद्या' या 'सप्तधाम विद्या' पुराणों में 'विष्णु की वामनावतार' कथा बन गई। वेद की 'दक्ष-अदिति-विद्या' पुराणों में 'दक्ष-यज्ञ-विध्वंस' की कथा बन गई। वेद की 'अग्नि-चयन-विद्या', मत्स्य पुराण की 'कुमार-जन्म-वृत्तान्त' बन गई।

    वेद की 'चित्र-शिशु-विद्या' जिसे शतपथ ब्राह्मण में 'अग्नि-रूप-विद्या' कहा गया है, मार्कण्डेय पुराण के रौद्र सर्ग की 'अष्टमूर्ति विद्या' के साथ जोड़ दी गई। इसी प्रकार वेदों की सोम विद्या, विराजधेनु विद्या, देवासुर विद्या, भृग्वंगिरोमय-अग्निसोम विद्या, पितृ-विद्या, सावित्री विद्या और पशु विद्या क्रमशः समुद्रमंथन, पृथुपृथिविदोहन, इन्द्रवृत्रोपाख्यान, सुकन्याच्यवन विवाह, श्राद्धकल्प, सावित्री सत्यवान कथा और पाशुपतशास्त्र के पौराणिक आख्यानों में परिवर्तित हो गयी है। अतः कहा जा सकता है कि वेदों और पुराणों में कोई मौलिक एवं तात्त्विक अंतर नहीं है।

    महायान धर्म के महाकरुणा तत्त्व का समन्वय

    जिस प्रकार पुराणांे ने वैदिक धर्म को भागवत धर्म के साथ समन्वित किया, उसी प्रकार बौद्ध धर्म के महायान सम्प्रदाय के महाकरुणा और लोकमंगल के आदर्श को भी अपनाया। मार्कण्डेय पुराण में विदेह के राजा विपश्चित की कथा में शान्तिवेद ने बोधिचर्यावतार से मिलते-जुलते विचार प्रकट किए हैं। इस राजा को अच्छे कर्मों के कारण स्वर्ग प्राप्त हुआ किंतु किसी लघु त्रुटि के कारण कुछ क्षणों के लिए नर्क का दण्ड भी मिला। जब वह नर्क में पहुँचा और उसने वहाँ के लोगों की करुण चीत्कार सुनी तो उसका हृदय पिघल गया और उसने संकल्प किया कि स्वर्ग के सुखों का भोग करने की अपेक्षा वह नर्क में रहकर दुःखी लोगों की सेवा करेगा। इन्द्र और यम के समझाने पर भी वह अपने सकंल्प पर दृढ़ रहा।

    अन्त में विवश होकर यम को नर्क के सारे निवासियों का उद्धार करना पड़ा। उसके बाद ही राजा ने स्वर्ग जाना स्वीकार किया। मार्कण्डेय पुराण में राजा हरिश्चन्द्र की कथा में लिखा है कि जब देवदूत उसे शुभ कर्मों के फलस्वरूप स्वर्ग ले जाने लगे तो उसने उत्तर दिया कि राजा जो कुछ करता है, प्रजा के सहयोग से करता है, अतः उसके कर्मों का फल भी समस्त प्रजा में बँटना चाहिए। प्रजा के एक दिन का सुख, राजा के अपने अनन्त सुखों से बेहतर है। इन विचारों और भावों में बोधिसत्व का महाकरुणा तत्त्व निहित है।

    विभिन्न प्रवृत्तियों का समन्वय

    पुराणों मंे कर्म और मोक्ष, प्रवृत्ति और निवृत्ति का सुन्दर समन्वय देखने को मिलता है। पद्म पुराण, अग्नि पुराण, कूर्म पुराण और गरुड़ परुाण में कहा गया है कि संसार में आकर कर्म करना मनुष्य का कर्त्तव्य है। विद्याध्ययन समाप्त कर विवाह करना, गृहस्थ जीवन बिताना, लोकसंग्रह के काम करना प्रत्येक मनुष्य के लिए अनिवार्य है। प्रव्रज्या और गृहत्याग लोक-विरुद्ध होने के कारण निन्दनीय हैं। मनुष्य में कर्म करने और उसके द्वारा सुख प्राप्त करने की जो असीम शक्ति है, उसका विकास लौकिक जीवन द्वारा ही सम्भव है किन्तु लोक-जीवन बिताते हुए उसे 'साधारण धर्म' और 'स्वधर्म' का सामंजस्य करना चाहिए।

    'साधारण धर्म' सार्वजनिक और सार्वभौम है। इनमें अहिंसा, क्षमा, शम, दम (इन्द्रिय निग्रह), दया, दान, शौच, सत्य, तप, ज्ञान आदि सम्मिलित हैं। पद्म पुराण के अनुसार अहिंसा सर्वोपरि है, इसमें समस्त धर्मों का सार है। इसी पुराण के अनुसार अहिंसा के साथ सत्य जुड़ा हुआ है। सत्य वह है जिससे प्राणिमात्र का भला होता है। इसलिए मनुष्य को अप्रिय सत्य नहीं कहना चाहिए।

    नृसिंह पुराण में कहा गया है कि मन को काम और क्रोध से मुक्त रखना अनिवार्य है। इसके लिए इष्टदेव की भक्ति अपेक्षित है। देवताओं में भेद करना या किसी देवता की निन्दा करना बहुत बड़ा अपराध है, क्योंकि समस्त देवता मूलतः एक ही हैं। इस 'साधारण धर्म' की परिधि में व्यक्ति को 'स्वधर्म' का पालन करना चाहिए, जिसका सम्बन्ध उसकी जाति, वर्ण, आश्रम और स्वभाव से है। इसके अनुसार व्रत, दान और प्रायश्चित का विधान है।

    संसार की सबसे बड़ी शांतिपूर्ण धार्मिक क्रांति

    यद्यपि पुराणों में भारत को कर्मभूमि और पुण्यभूमि कहा गया है तथापि पुराणों की दृष्टि विश्व के समस्त प्राणियों पर थी। इस कारण पुराणों में निहित 'धार्मिक और सांस्कृतिक समन्वय का आदर्श' भारत से बाहर भी फैल गया। दक्षिणी-पूर्वी एशियाई द्वीपों में पौराणिक संस्कृति का प्रसार हुआ जो आज भी विद्यमान है। पौराणिक संस्कृति का यह प्रसार किसी तलवार के जोर पर नहीं हुआ अपितु यह विशुद्ध सांस्कृतिक प्रक्रिया थी जिसे विभिन्न द्वीपों की प्रजा ने सहर्ष एवं स्वेच्छा से अंगीकार कर लिया। इस प्रकार की शांति-पूर्ण एवं दिग्दिगन्तर व्यापी धार्मिक क्रांति सम्पूर्ण धरती पर पौराणिक धर्म के अतिरिक्त और किसी धर्म ने घटित नहीं की।

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  • अध्याय - 11 जनजाति संग्रहालय उदयपुर

     02.06.2020
    अध्याय - 11 जनजाति संग्रहालय उदयपुर

    अध्याय - 11 जनजाति संग्रहालय, उदयपुर


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    माणिक्य लाल वर्मा जनजाति शोध संस्थान उदयपुर द्वारा राज्य की विभिन्न जन जातियों की सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था को संरक्षित तथा प्रदर्शित करने के उद्देश्य से 30 दिसम्बर 1983 को संस्थान में जनजाति संग्रहालय की स्थापना की गई। इस संग्रहालय के प्रवेश द्वार पर मेवाड़ के महाराणा का भीलू राजा के साथ चिह्न ‘जो दृढ़ राखे धर्म को तेहि राखे करतार’ रखा हुआ है। संग्रहालय में राजस्थान की विभिन्न जनजातियों के चित्र, वस्त्राभूषण, अस्त्र-शस्त्र, विविध मूर्तियां, देवरा, इष्ट देवता, लोक संस्कृति एवं कला को प्रदर्शित किया गया है।


    विभिन्न वाद्ययंत्र, भित्तिचित्र, मांडणे, सांझी, गोदना, एवं लोकनृत्य एवं मेलों की सचित्र झांकियां प्रस्तुत की गई हैं। इनमें राज्य की प्रमुख जनजातियों- भील, मीणा, गरासिया, कथोड़ी एवं सहारिया जाति की शैली के दर्शन किए जा सकते हैं। खाद्यान्न संग्रहण हेतु पारम्परिक कोठियां, मिट्टी के बर्तन, रोटी सेकने का तवा, उसी रूप में प्रयोग में लाते हुए दर्शाया गया है। चूल्हे पर रोटी बनाती महिला, बांस की टोकरी में रोटियां रखती महिला का चित्र प्रदर्शित किया गया है।

    आदिवासी स्त्री -पुरुषों के आभूषणों को एक पृथक् प्रकोष्ठ में प्रस्तुत किया गया है। विभिन्न आदिवासी स्त्री-पुरुषों के, प्लास्टर ऑफ पेरिस से बने मॉडल प्रदर्शित किए गए हैं। इनमें शृंगार करती बालिकाएं, केश विन्यास करती नवयुवतियां, चटकीले शृंगारों से सजी आदिवासी महिलाएं, मूसल से धान कूटती महिलाएं, भोपा-भोपी आदि प्रमुख हैं।

    बेणेश्वर मेला, त्रिवेणी संगम, मानगढ़ धाम तथा गवरी नृत्य के चित्र प्रदर्शित किए गए हैं। आर्थिक व्यवस्था को प्रदर्शित करते चित्र यथा कृषि करते हुए आदिवासी, जंगल से वन उपज का संकलन करते हुए आदिवासी महिलाएं, देवी-देवताओं की पूजा करते हुए आदिवासी, नृत्य संगीत के कार्यक्रमों में संलग्न आदिवासी भी प्रदर्शित किए गए हैं। भीलों की मादल, खड़ताल, नौपत-नगाड़ा, बांकिया, ढोल, ढोलक, कमायचा, तंदूरा, इकतारा आदि भी प्रदर्शित किए गए हैं।

    आदिवासी क्षेत्रों की वनसम्पदा, खनिज सम्पदा, पशु सम्पदा के चित्र भी रखे गए हैं। वन्य जीव, पक्षी एवं सरीसृप के चित्र और अभयारण्यों के मनोरम दृश्य भी प्रदर्शित किए गए हैं। मोलेला गांव के कुम्हारों की कलाकृतियां, मेवाड़ और बागड़ के देवी-देवताओं की टेराकोटा मूर्तियां भी प्रदर्शित हैं। संग्रहालय में आदिवासियों के जीवन में होने वाले बदलावों को भी दर्शाया गया है। बहुत से चित्रों में मत्स्य पालन करते, आखेट की नवीन तकनीक का प्रयोग करते, सिंचाई सुविधाओं का उपयोग करते, खेती में रासायनिक उर्वरकों का उपयोग करते तथा कीटनाशकों का उपयोग करते हुए आदिवासियों को दर्शाया गया है।

    संग्रहालय में आदिवासी जीवन के दृश्यों के साथ ऑडियो-वीडियो कैसेटों से आदिवासियों के जीवन के रोचक तथा आकर्षक प्रसंगों को प्रदर्शित किया गया है। आदिम जाति शोध संस्थान ने ऐसे ही संग्रहालय दो अन्य स्थानों- शिल्पग्राम उदयपुर तथा आबू पर्वत के राजकीय संग्रहालय में एक खण्ड के रूप में विकसित किए हैं।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-48

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-48

    पर्यावरण को साधती हस्तकलाएं (1)


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    पाषाण युग से लेकर आज तक हस्तकलाएं मनुष्य की साथी रही हैं। मनुष्य के अधिवास से लेकर उसके बौद्धिक विकास, उसकी आवश्यकतायें, उसके धर्म, दर्शन, चिंतन तथा आध्यात्म की पृष्ठभूमि, सामाजिक संरचना, आर्थिक स्थिति, वैज्ञानिक प्रगति, कला प्रतिभा तथा रस निष्पत्ति के दर्शन हस्तकलाओं में होते हैं। राजस्थान में अत्यंत प्राचीन काल से हस्तकलाओं के विकसित अवस्था में होने के प्रमाण मिले हैं जिनमें तीसरी शताब्दी ईस्वी पूर्व के कलात्मक स्तंभ शामिल हैं। राजस्थान की बुनाई, छपाई, रंगाई, जवाहरात की कटाई, मीनाकारी, आभूषण निर्माण, बंधेज, गलीचा, नमदा बुनाई, संगमरमर, हाथी दंात, चंदन, लाख व काष्ठ के कलात्मक कार्य, चीनी मिट्टी का काम, धातु की कारीगरी, चमड़े की जूतियां व थैले, कागज उद्योग, चित्रकला, पुस्तकों का कलात्मक लेखन आदि का काम सदियों से राजस्थान में होता आया है जिससे स्थान-स्थान पर हस्त कलाओं के व्यापारिक केंद्र स्थापित हो गये हैं। यही कारण है कि राजस्थान की दस्तकारी ने न केवल भारत भर में अपितु विश्व भर में अपनी पहचान बनायी हैं जो अपनी उत्कृष्टता के लिये दूर-दूर तक प्रसिद्ध हैं।

    कपड़ा बुनाई

    अत्यंत प्राचीन काल से राजस्थान में कपास का उत्पादन बड़े पैमाने पर होता रहा है। इस कारण गाँव-गाँव में हैण्डलूम्स तथा पिटलूम्स पर मोटा व पतला सूती तथा ऊनी खादी का कपड़ा तैयार किया जाता है। किसी समय जालोर तथा मारोठ की टुकड़ी मारवाड़ के कपड़ों में सर्वाेत्तम समझी जाती थी। मांगरोल (कोटा से लगभग 15 कि.मी. दूर) की मसूरिया साड़ियां, जैसलमेर की जरीदार साड़ी, चित्तौड़गढ़ के बिछौने के जाजम, नाथद्वारा की छपी हुई साड़ियां तथा जोधपुर की मलमल दूर-दूर तक प्रसिद्ध है।

    कपड़ा रंगाई एवं छपाई

    पुराने जमाने में कपड़ों के रंग तथा उनके पहिनने के ढंग से ही लोगों की जाति, निवास स्थान, सामाजिक स्थिति तथा पेशे की पहचान हो जाती थी। कपड़े रंगने वाले नीलगर अथवा रंगरेज कहलाते थे। राजस्थान में बगरू, आकोला, सांगानेर तथा बाड़मेर की छपाई, शेखावाटी तथा जोधपुर का बंधेज व चूनरी का काम और शेखावाटी का पेचवर्क दूर-दूर तक प्रसिद्ध है।

    बगरू की छपाई : बगरू की छपाई में रासायनिक रंगों का उपयोग नहीं किया जाता। वनस्पति रंग, घोड़े की खुरताल, गुड़, गोंद, हरड़ का पाऊडर अनार के छिलके, हल्दी, लोहा आदि प्रयुक्त होते हैं। पिछले चार सौ वर्षों से बगरू में छपाई का काम होता है।

    आकोला की छपाई : आकोला की छपाई में गुड़, अनार की छाल, सकूड़, केसू, हरड़, हरसिंगार, गोंदा, कोचा, हल्दी, मजीठ, कत्था, रतनजोत, नील, लाल चंदन, पोआड़िया, लोहे की जंग, मिट्टी, गोबर, मुल्तानी मिट्टी, खाखरे के पत्ते तथा गेरू के साथ फिटकरी, कास्टिक सोड़ा, नेफ्थोल आदि का प्रयोग किया जाता है।

    सांगानेर की छपाई : राजस्थान के हस्तकला उद्योग में सांगानेर की छपाई विशेष स्थान रखती है। इसमें गोबर, तिल का तेल, बकरी की मेंगनी, सोड़ा, हरड़, गुड़, लोहे का जंग, गोंद, सोड़ा, अनार के छिलके, छान की मिट्टी तथा हल्दी का प्रयोग किया जाता था किंतु कुछ वर्षों से रासायनिक रंगों का प्रयोग किया जाता है तथा प्राकृतिक रंगों का प्रयोग कम हो गया है।

    बाड़मेर की छपाई : बाड़मेर में वस्त्रों की छपाई का काम अधिकतर खत्री जाति के लोग करते हैं। 60-70 परिवारों के लगभग 400 व्यक्ति इस कार्य में लगे हुए हैं। बाड़मेर अजरक प्रिण्ट विश्व प्रसिद्ध है। यहाँ पेचवर्क का कार्य भी अच्छा होता है। ढोला मारू की प्रेम गाथा, नृत्य मुद्रा में महिला-पुरुष, हाथ जोड़कर नमस्कार के रूप में राजस्थानी स्वागत की परम्परा में छपाई के साथ-साथ अजरक प्रिण्ट बाड़मेर की निराली शान है।

    मेण की छपाई, किशनगढ़ी छपाई, दाबू छपाई तथा फद्र की छपाई : सवाई माधोपुर की तरफ मेण की छपाई, किशनगढ़ी छपाई, दाबू छपाई तथा फर्द की छपाई का प्रचलन है जिनमें पापड़ खाद, बकरी की कुटी हुई मेंगनी, तेल, मांड, आल की लकड़ी का पीला रंग, कुटी हुई मिट्टी, गोंद तथा चूल्हे की राख आदि का प्रयोग किया जाता है।

    ब्लॉक छपाई : बाड़मेर जिले में खत्री तथा मुसलमान छींपा रासायनिक एवं वानस्पतिक रंगों के उपयोग से ब्लॉक छपाई करते हैं। वानस्पतिक रंगों में अजरख और दाबू तकनीका का प्रयोग होता है। हरड़ा, टेसू के फूल, इण्डिगो, खींप, फोग बोरड़ी, काचरी, रोहिड़े की टहनियों से रंग बनाये जाते हैं। खींप से आसमानी, केसूला से पीला, खेजड़ी की छाल से भूरा, फोग की लकड़ी से हल्का लाल रंग, बोरड़ी की छाल से गहरा भूरा, गूगल से कत्थई, थोर से हरा रंग प्राप्त करते हैं। कपड़े की धुलाई के लिये ऊँट का मींगणा, गाय का गोबर तथा भेड़ की लेड़ी काम में आती है। इस प्रिंटिंग में मुख्यतः मानव आकृतियां, पशु-पक्षी, पुष्प, और ज्यामितीय बूटियां प्रिंट की जाती हैं। महिलाओं के लिये तिलक छाप ओढ़ने, हारभांत, बावलिया, बेपत्ती घाघरे, सूरज फूलभांत के ओढ़ने, कटारी छींट के घाघरे, धनक ओढ़नी, पीली छींट में मोरिया भांत के घाघरे, दाणो छाप, नागरू घाघरे, केवड़ा भांत घाघरे, घन, गुलबदन, मीनाकारी के घाघरे तैयार किये जाते हैं। इस प्रिंट की चद्दरें तथा तकिये अधिक प्रसिद्ध हैं। बाड़मेर एवं बालोतरा कस्बों में यह कार्य अधिक होता है।

    कढ़ाई व पेचवर्क

    बाड़मेर एवं जैसलमेर जिलों में रंग-बिरंगे रेशमी धागों से कपड़ों पर कढ़ाई और पेचवर्क से सजे घाघरे, कांचलियां, थैले, शॉल, कुशन कवर, चादरें, मेजपोश, बटुए, पासपोर्ट आकार की थैलियां, वॉल हैंगिंग, कुर्ती अंगिया, बुकानी, चांदनी, फ्रॉक, साड़ी फैन कवर, टी. वी. कवर, मैगजीन बैग आदि विविध प्रकार की सामग्री तैयार की जाती है। कांच कशीदाकारी का भी अनूठा कार्य होता है। माना जाता है कि यह कला थारपारकर क्षेत्र की संस्कृति का विशिष्ट हिस्सा थी। आजादी के बाद इसे सिंध और ब्लूचिस्तान से लाकर पुनर्जीवित किया गया। बाड़मेर जिले की चौहटन, शिव, बाड़मेर, गुड़ामालानी और पचपदरा तहसील के सैंकड़ों गाँवों मं 15 से 20 हजार महिलाएं इस कार्य से आजीविका अर्जित करती हैं। कढ़ाई और पेचवर्क दोनों में छोटे-छोटे बटन के आकार की कांच की टिकड़ियां सुईं से तुरपाई करके ऊनी, रेशमी तथा सूती वस्त्रों पर ऐसे जड़ दी जाती हैं कि वे कपड़े का ही अभिन्न अंग प्रतीत होती हैं। इस कला से कपड़ों पर पशु-पक्षी, नदियाँ, पहाड़, फल-फूल तथा शुभ चिह्न बनाये जाते हैं।

    भरत : पश्चिमी राजस्थान में कशीदाकारी को भरत कहते हैं।

    पक्का भरत : इस कशीदे में फूल, पक्षियों के चित्र बहुततायत से बनाये जाते हैं। लड़ी वाले टांके से भरत लम्बे समय तक टिकाऊ रहता है इसलिये इसे पक्का भरत कहते हैं।

    सूफ : इस कशीदे में कपड़े के पीछे से तुरपाई की जाती है। ज्यामितीय आकृतियों वाले इस भरत का आधार त्रिकोण है जिसे सूफ कहते हैं। सूफ दो प्रकार के होते हैं- आठ ताड़ी, जिसमें डिजाइन के आठ तिकोने होते हैं तथा सोलह ताड़ी, जिसमें डिजाइन के सोलह तिकोने होते हैं। सूफ को सुंदरता देने के लिये मोर, बिलंग (आधे सूफ का बोर्डर), पताशिया, कुंजड़ी, पनड़ी, सिलबिली (गतिमान), तारड़ा (तार), धुन, बखिया, घिंघरा, सबकोट बनाये जाते हैं।

    मुक्का : सोने-चांदी की धातु के तारों को धागों में लपेट कर कपड़े पर कशीदा किया जाता है। इसमें बखिया टांके का प्रयोग होता है।

    कम्भीरी : कुम्हार समुदाय की कला होने के कारण इसे कम्भीरी कहते हैं। इसमें कच्चे धागे से आउटलाइन दी जाती है तथा रंग नहीं भरे जाते। अधिकतर चौकोर डिजाइनें बनाई जाती हैं। कपड़े के ताने को गिनकर कशीदा किया जाता है। लाल कपड़े पर पले और काले धागे का प्रयोग होता है। खलीची, पेचकी, कोथली, बड़ा बुचका, राली, ईण्डोणी में इस शैली का उपयोग होता है।

    हुरमजी : इसे बावलिया, कच्छी भरत तथा सिंधी भरत भी कहते हैं। इसमें भरत वाले कपड़े पर धागे की जाली तैयार की जाती है तथा बिना ट्रेसिंग के कशीदा काढ़ते हैं। चटकीले-चमकीले सूती धागों का उपयोग कर गहरे हरे रंग के सूती कपड़े पर कढ़ाई करते हैं।इसमें छोटे-छोटे मोटिफ का प्रयोग होता है। पट्टू पर भी हुरमजी किया जाता है।

    खारक : सूखे खजूर को खारक कहते हैं। इस कशीदे में जो बंद दिये जाते हैं वे सूखे खजरों जैसे लगतक हैं। इसलिये इस कशीदा को खारक कहते हैं। इसमें कच्चे धागों की अड दी जाती है तथा वर्गाकार मोटिफ का प्रयोग होता है।

    आरी : इसका कशीदा जूतों पर की जाने वाली सिलाई के समरूप होता है। इसमें कशीदे के लिये फ्रेम का उपयोग होता है। इसी तरह चमड़े पर भी कशीदा किया जाता है।

    एपलिक : एपलिक कार्य में एक कपड़े पर डिजाइन के अनुरूप कटा हुआ कपड़ा चिपकाकर उसके किनारों की तुरपाई करते हैं। जिस कपड़े पर कार्य किया जाता है उसका रंग प्रकट होता है।

    पेचवर्क : इसमें विभिन्न रंगों के छोटे-छोटे वर्गाकार अथवा तिकोनी आकृतियों के कपड़े काटकर उनकी आपस में सिलाई की जाती है। रालियां तथा तकिये इसी तकनीक से बनाये जाते हैं।

    गलीचा व दरी उद्योग

    आज लगभग पूरे राजस्थान में गलीचे व दरियां बनाने का काम होता है किंतु जयपुर, बीकानेर, ब्यावर, किशनगढ़, टोंक, मालपुरा, केकड़ी, भीलवाड़ा तथा कोटा में गलीचे बनाने का काम बड़े पुराने समय से तथा बड़े पैमाने पर होता है। सामान्यतः भेड़ व ऊँट की ऊन इस काम में आती है किंतु अब पश्मीना तथा मैरीनो ऊन भी बड़ी मात्रा में प्रयुक्त होती है। ऊँट व बकरी की ऊन से ऊनी दरियां तथा फर्श बनाये जाते हैं जो बैठकों में बिछाने से लेकर खेती बाड़ी के कार्यों में प्रयुक्त होते हैं। भेड़ की ऊन को विविध रंगों से रंगकर कलात्मक तरीके से डिजाइनों में बुना जाता है जिनमें बाग-बगीचे, चिड़िया, मोर, तोते, गाय-बैल, फूल, पत्तियां व ज्यामितीय आकृतियां बनायी जाती हैं। जोधपुर जिले के सालावास गाँव की दरियां बड़ी प्रसिद्ध हैं। जोधपुर, नागौर, टांेक, बाड़मेर, भीलवाड़ा, शाहपुरा और केकड़ी, दरी निर्माण के पुराने व प्रसिद्ध केंद्र रहे हैं किंतु अब लगभग पूरे प्रदेश में सूती, ऊनी व मिश्रित तीनों ही प्रकार की दरियां बड़े पैमाने पर बनायी जाती हैं।

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  • अध्याय - 18 शैव एवं शाक्त धर्म

     02.06.2020
    अध्याय - 18 शैव एवं शाक्त धर्म

    शैव एवं शाक्त धर्म


    ऐश्वर्य और पराक्रम प्रदान करने वाली सत्ता को शक्ति कहते हैं। - श्रीदम्देवी भागवत् 9-2-10


    शैव धर्म

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    ऋग्वेद में रुद्र नामक देवता का उल्लेख है, यजुर्वेद के 16वें अध्याय में भवागन रुद्र की व्यापक स्तुति गाई गई है। अथर्ववेद में शिव को भव, शर्व, पशुपति और भूपति कहा गया है। शैवमत का उद्गम ऋग्वेद में वर्णित रुद्र की आराधना से माना जाता है। आगे चलकर यही रुद्र, 'शिव' कहलाए। भगवान शिव तथा उनके अवतारों को आराध्य देव मानने वालों को 'शैव' तथा उनके मत को 'शैव सम्प्रदाय' कहा गया। बारह रुद्रों में प्रमुख रुद्र ही आगे चलकर शिव, शंकर, भोलेनाथ और महादेव कहलाए।

    शिवलिंग उपासना का प्रारंभिक पुरातात्विक साक्ष्य, हड़प्पा सभ्यता (ई.पू.3350-ई.पू.1750) की खुदाई में प्राप्त हुआ है जबकि लिखित रूप में लिंगपूजा का पहला स्पष्ट वर्णन मत्स्य पुराण (उत्तर-वैदिक-काल) में मिलता है। महाभारत के अनुशासन पर्व में भी लिंग पूजा का उल्लेख है। कुषाण शासकों की मुद्राओं पर शिंव और नंदी का एक साथ अंकन प्राप्त होता है। हिन्दुओं के चार मुख्य संप्रदाय हैं- वैदिक, वैष्णव, शैव और स्मार्त ।

    शैव संप्रदाय के अंतर्गत शाक्त, नाथ और संत संप्रदाय आते हैं। दसनामी और गोरखपंथी संप्रदाय भी शैव धर्म के नाथ सम्प्रदाय में सम्मिलित हैं। शैव संप्रदाय एकेश्वरवादी है। इसके संन्यासी जटा रखते हैं तथा सिर भी मुंवडाते हैं किंतु शिखा नहीं रखते। इनके अनुष्ठान रात्रि में होते हैं। इनके अपने तांत्रिक मंत्र होते हैं। शैव साधु निर्वस्त्र भी रहते हैं तथा भगवा वस्त्र भी धारण करते हैं। ये हाथ में कमंडल एवं चिमटा रखते हैं तथा गोल घेरे में अग्नि जलाकर धूनी रमाते हैं। शैव साधुओं को नाथ, अघोरी, अवधूत, बाबा, ओघड़, योगी तथा सिद्ध कहा जाता है।

    शैव संप्रदाय में साधुओं द्वारा समाधि लेने की परंपरा थी। शैव मंदिरों को शिवालय कहते हैं जहाँ शिवलिंग एवं नंदी स्थापित होता है। शैव मावलम्बी आड़ा तिलक लगाते हैं तथा चंद्र तिथियों पर आधारित व्रत उपवास करते हैं। शिव पुराण में शिव के दशावतारों का उल्लेख है।

    ये सभी अवतार तंत्रशास्त्र से सम्बन्धित हैं- (1.) महाकाल, (2.) तारा, (3.) भुवनेश, (4.) षोडश, (5.) भैरव, (6.) छिन्नमस्तक गिरिजा, (7.) धूम्रवान, (8.) बगलामुखी, (9.) मातंग तथा (10.) कमल। अन्य स्रोतों से शिव के अन्य ग्यारह अवतारों के नाम भी मिलते हैं- (1.) कपाली, (2.) पिंगल, (3.) भीम, (4.) विरुपाक्ष, (5.) विलोहित, (6.) शास्ता, (7.) अजपाद, (8.) आपिर्बुध्य, (9.) शम्भ, (10.) चण्ड, (11.) भव। प्रमुख शैव ग्रंथ इस प्रकार हैं- श्वेताश्वतरो उपनिषद, शिव पुराण, आगम ग्रंथ तथा तिरुमुराई।

    प्रमुख शैव तीर्थ इस प्रकार हैं- (1.) काशी विश्वनाथ बनारस, (2.) केदारनाथ धाम, (3.) सोमनाथ, (3.) रामेश्वरम, (4.) चिदम्बरम, (5.) अमरनाथ, (6.) कैलाश मानसरोवर। द्वादश ज्योतिर्लिंग भी प्रमुख शिव तीर्थ हैं।

    शैव मत के विभिन्न सम्प्रदाय

    शैव सम्प्रदाय प्रारम्भ में वैदिक धर्म की शाखा के रूप में विकसित हुआ किंतु आगे चलकर उसमें दो प्रमुख धाराएं दिखाई देती हैं- वैदिक शैव तथा तांत्रिक शैव। महाभारत में माहेश्वरों अर्थात् शैव मतावलम्बियों के चार सम्प्रदाय बताए गए हैं- (1.) शैव (2.) पाशुपत (3.) कालदमन तथा (4.) कापालिक। वामन पुराण में भी शैव संप्रदायों की संख्या चार बताई गई है- (1.) लिंगायत, (2) पाशुपत, (3.) कालमुख, (4.) काल्पलिक।

    वाचस्पति मिश्र ने भी चार माहेश्वर सम्प्रदायों के नाम दिए हैं। आगम प्रामाण्य, शिव पुराण तथा आगम पुराण में विभिन्न तान्त्रिक सम्प्रदायों के भेद बताए गए हैं। समय के साथ, शैव सम्प्रदाय में शाक्त, नाथ, दसनामी, नाग आदि उप संप्रदाय भी स्थापित हो गए।

    लिंगायत सम्प्रदाय (वीर शैव मत)

    वेदों पर आधारित शैव धर्म को उत्तर भारत में 'शिवागम' तथा दक्षिण भारत में 'लिंगायत' कहा गया। सामूहिक रूप से इसे 'वीर शैव मत' कहा गया। तमिल में इसे 'शिवाद्वैत' कहा गया। इस संप्रदाय के लोग शिव लिंग की उपासना करते थे। बसव पुराण में लिंगायत समुदाय के प्रवर्तक उल्लभ प्रभु और उनके शिष्य बासव को बताया गया है। ईसा से लगभग 1700 वर्ष पहले वीर शैव मत के अनुयाई अफगानिस्तान से लेकर काश्मीर, पंजाब तथा हरियाणा आदि विशाल क्षेत्र में निवास करते थे।

    बाद में यह मत दक्षिण भारत में जोर पकड़ गया और कर्नाटक प्रदेश इस धर्म का प्रमुख क्षेत्र बन गया। महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश, केरल और तमिलनाडु में वीर शैव उपासक अधिकतम हैं। यह एकेश्वरवादी धर्म है। वीर शैव की सभ्यता को 'द्राविड़ सभ्यता' भी कहते हैं। पारमेश्वर तंत्र में वीर शैव दर्शन को बाकी वैदिक मतों से जोड़ा गया है। पाणिनि के सूत्रानुसार वीर शैव का अर्थ, 'ज्ञान में रमने' वाला है। लिंगायत समुदाय को दक्षिण भारत में जंगम भी कहा जाता था।

    शक्ति विशिष्टाद्वैत

    वीर शैव दर्शन में 'शक्ति' की प्राधानता होने की कारण, इसे 'शक्ति विशिष्टाद्वैत' भी कहा गया है। 'शक्ति' को ही सत्व, रजस तथा तम नामक त्रिगुण माया कहा गया है। इस तरह शक्ति के दो रूप हैं, एक है- 'सद-चित-आनंद रूप' तथा दूसरा है- गुण-त्रय से मिला हुआ 'मायारूप।' इन दोनों स्वरूपों के मिलन को वीर शैव दर्शन में 'पराशक्ति' कहा गया है। शक्ति की विशिष्ट रूप से उपासना करने के भी कई पंथ हैं, जिनमें से शक्ति विशिष्टाद्वैत प्रमुख है। इसके अनुसार त्रिगुणात्मक माया तथा विशिष्टाद्वैत के अंशी-भाव, दोनों मिल कर शक्ति विशिष्टाद्वैत कहलाते हैं-


    वीर शैवं वैष्णवं च शाक्तं सौरम विनायकं।

    कापालिकमिति विज्नेयम दर्शानानि षडेवहि।।

    पाशुपत सम्प्रदाय (लकुलीश सम्प्रदाय)

    पाशुपत संप्रदाय शैवों का सबसे प्राचीन संप्रदाय है, इसके संस्थापक लकुलीश थे, जिन्हें भगवान शिव के 18 अवतारों में से एक माना जाता है। पाशुपत संप्रदाय के अनुयाइयों को पंचार्थिक कहा गया, इस मत का सैद्धांतिक ग्रंथ 'पाशुपत सूत्र' है। पाशुपत सम्प्रदाय को लकुलीश सम्प्रदाय या 'नकुलीश सम्प्रदाय' भी कहा जाता है। 'लकुलीश' का उत्पत्ति स्थल गुजरात का 'कायावरोहण' क्षेत्र था। यह सम्प्रदाय छठी से नवीं शताब्दी के बीच मैसूर और राजस्थान में भी फैल गया। वैदिक लकुलीश लिंग, रुद्राक्ष और भस्म धारण करते थे जबकि तांत्रिक लकुलीश अथवा पाशुपत, लिंगतप्त चिह्न और शूल धारण करते थे तथा मिश्र पाशुपत समान भावों से पंचदेवों की उपासना करते थे।

    छठी से 10 शताब्दी ईस्वी में लकुलीश के पाशुपत मत और कापालिक संप्रदायों का उल्लेख मिलता है। गुजरात में लकुलीश मत का बहुत पहले ही प्रादुर्भाव हो चुका था। पर पंडितों का मत है कि उसके तत्वज्ञान का विकास विक्रम की सातवीं-आठवीं शताब्दी में हुआ होगा। कालांतर में यह मत दक्षिण और मध्य भारत में फैल गया। शिव के अवतारों की सूची, जो वायुपुराण से लेकर लिंगपुराण और कूर्मपुराण में उद्धृत है, लकुलीश का उल्लेख करती है।

    लकुलीश की मूर्ति का भी उल्लेख किया गया है, जो गुजरात के 'झरपतन' नामक स्थान में है। लकुलीश की यह मूर्ति सातवीं शताब्दी ईस्वी की है। लिंगपुराण में लकुलीश के मुख्य चार शिष्यों के नाम 'कुशिक', 'गर्ग', 'मित्र' और 'कौरुष्य' मिलते हैं। इस संप्रदाय का वृत्तांत शिलालेखों तथा विष्णु-पुराण एवं लिंगपुराण आदि में मिलता है।

    कालमुख संप्रदाय

    कालमुख संप्रदाय के अनुयाइयों को शिव पुराण में 'महाव्रतधर' कहा गया है। इस संप्रदाय के लोग नर-कपाल में ही भोजन, जल और सुरापान करते थे और शरीर पर चिता की भस्म मलते थे।

    कापालिक मत

    कापालिक संप्रदाय के इष्ट देव 'भैरव' थे, इस संप्रदाय का प्रमुख केंद्र श्रीशैल नामक स्थान था। कापालिक संप्रदाय को 'महाव्रत सम्प्रदाय' भी कहा जाता है। यामुन मुनि के शिष्य श्रीहर्ष (ई.1088) ने नैषध में 'समसिद्धान्त' नाम से जिस मत का उल्लेख किया है, वह कापालिक सम्प्रदाय ही है। कपालिक नाम के उदय का कारण नर कपाल धारण करना माना जाता है। वस्तुतः यह भी बहिरंग सिद्धांत है। इसका अन्तरंग रहस्य 'प्रबोध-चन्द्रोदय' की 'प्रकाश' नामक टीका में प्रकट किया गया है।

    इसके अनुसार इस सम्प्रदाय के साधक कपालस्थ अर्थात् ब्रह्मरन्ध्र उपलक्षित नर-कपालस्थ अमृत-पान करते थे। इस कारण ये कापालिक कहलाए। बौद्ध आचार्य हरिवर्मा और असंग के समय में भी कापालिकों के सम्प्रदाय विद्यमान थे। सरबरतन्त्र में आदिनाथ, अनादि, काल, अमिताभ, कराल, विकराल आदि 12 कापालिक गुरुओं और उनके नागार्जुन, जड़भरत, हरिश्चन्द्र, चर्पट आदि 12 शिष्यों के नाम एवं वर्णन मिलते हैं। इन शैव साधुओं को तन्त्रिक शैव मत का प्रवर्तक माना जाता है। कुछ पुराणों में कापालिक मत के प्रवर्तक धनद या कुबेर का उल्लेख है।

    नाथ संप्रदाय

    'नाथ' शब्द का प्रचलन हिन्दू, बौद्ध और जैन संतों के बीच विद्यमान है। 'नाथ' शब्द का अर्थ होता है स्वामी। भगवान शंकर को भोलेनाथ और आदिनाथ भी कहा जाता है। भगवान शंकर के बाद इस परंपरा में सबसे बड़ा नाम भगवान दत्तात्रेय का है। भगवान शंकर की परंपरा को उनके शिष्यों बृहस्पति, विशालाक्ष (शिव), शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज, अगस्त्य मुनि, गौरशिरस मुनि, नंदी, कार्तिकेय, भैरवनाथ आदि ने आगे बढ़ाया। अमरनाथ, केदारनाथ, बद्रीनाथ आदि सुप्रसिद्ध शिव मंदिर नाथों के प्रमुख मंदिर हैं। नाथ गुरुओं एवं शिष्यों को तिब्बती बौद्ध धर्म में महासिद्धों के रूप में जाना जाता है। इन्हें परिव्राजक भी कहते हैं। परिव्राजक का अर्थ होता है घुमक्कड़।

    नाथ परम्परा

    नाथ साधु, विश्व भर में भ्रमण करते हैं तथा आयु के अंतिम चरण में किसी स्थान पर रुक कर अखंड धूनी रमाते हैं या फिर हिमालय क्षेत्र में चले जाते हैं। हाथ में चिमटा तथा कमंडल, कान में कुंडल, कमर में कमरबंध तथा मस्तक पर जटाएं धारण करने वाले एवं धूनी रमाकर ध्यान करने वाले नाथ योगियों को अवधूत एवं सिद्ध कहा जाता है। कुछ योगी अपने गले में एक सींग की नादी तथा काली ऊन का जनेऊ रखते हैं जिन्हें सींगी तथा सेली कहते हैं।

    नाथ पंथ के साधक सात्विक भाव से शिव भक्ति में लीन रहते हैं। नाथ लोग 'अलख' (अलक्ष) शब्द से शिव का ध्यान करते हैं। परस्पर 'आदेश' या 'आदीश' शब्द से अभिवादन करते हैं। 'अलख' और 'आदेश' शब्द का अर्थ 'प्रणव' या 'परम पुरुष' होता है। नाथ सम्प्रदाय में नागा (दिगम्बर) तथा भभूतिधारी साधु भी होते हैं। इन्हें उदासी या वनवासी आदि सम्प्रदाय का माना जाता है। नाथ साधु 'हठयोग' पर विशेष बल देते हैं।

    भगवान दत्तात्रेय

    भगवान दत्तात्रेय को वैष्णव और शैव दोनों ही संप्रदाय का माना जाता है, उनकी गणना प्रमुख अघोरी के रूप में तथा प्रमुख नाथ के रूप में भी होती है जबकि वैष्णव मतावलम्बी उन्हें भगवान शिव, विष्णु एवं ब्रह्मा का सम्मिलित अवतार मानकर पूजते हैं। भगवान भैरवनाथ भी नाथ संप्रदाय के अग्रज माने जाते हैं। उन्होंने वैष्णव और शैव परंपरा में समन्वय स्थापित करने का कार्य किया। दत्तात्रेय को महाराष्ट्र में नाथ परंपरा का विकास करने का श्रेय जाता है। दत्तात्रेय को आदिगुरु माना जाता है।

    मत्स्येन्द्रनाथ एवं गोरखनाथ

    प्राचीन काल से चले आ रहे नाथ संप्रदाय को गुरु मत्स्येन्द्र नाथ (मच्छेन्द्र नाथ) और उनके शिष्य गोरखनाथ ने नवीन व्यवस्थाएं प्रदान कीं। गोरखनाथ ने इस सम्प्रदाय के बिखराव को समाप्त किया तथा योग विद्याओं का एकत्रीकरण किया।

    चौरासी सिद्ध

    आठवीं सदी में बौद्ध धर्म के महायान सम्प्रदाय की वज्रयान शाखा में सिद्ध परम्परा का प्रादुर्भाव हुआ। प्रमुख सिद्धों की संख्या चौरासी मानी गई है। चौरासी सिद्धों को बंगाल, नेपाल, असम, तिब्बत और बर्मा में विशेष रूप से पूजा जाता है।

    प्रारम्भिक नाथ

    चौरासी सिद्धों की परम्परा में नाथ पंथ का उदय हुआ। प्रारम्भिक दस नाथ इस प्रकार से हैं- आदि नाथ, आनंदी नाथ, कराला नाथ, विकराला नाथ, महाकाल नाथ, काल भैरव नाथ, बटुक नाथ, भूत नाथ, वीर नाथ और श्रीकांथ नाथ। इनके बारह शिष्य थे जो इस क्रम में है- नागार्जुन, जड़ भारत, हरिशचंद्र, सत्य नाथ, चर्पट नाथ, अवध नाथ, वैराग्य नाथ, कांताधारी नाथ, जालंधर नाथ और मलयार्जुन नाथ।

    नव नाथ

    नाथ पंथ में नौ नाथ बड़े प्रसिद्ध हुए। इन्हें नवनाथ भी कहा जाता है। महार्णव तंत्र में कहा गया है कि नवनाथ ही नाथ संप्रदाय के मूल प्रवर्तक हैं। नवनाथों की सूची अलग-अलग ग्रंथों में अलग-अलग मिलती है- (1.) मच्छेंद्रनाथ (2.) गोरखनाथ (3.) जालंधरनाथ (4.) नागेश नाथ (5.) भारती नाथ (6.) चर्पटी नाथ (7.) कनीफ नाथ (8.) गेहनी नाथ (9.) रेवन नाथ। इनके अतिरिक्त मीना नाथ, खपर नाथ, सत नाथ, बालक नाथ, गोलक नाथ, बिरुपक्ष नाथ, भर्तृहरि नाथ, अईनाथ, खेरची नाथ तथा रामचंद्र नाथ भी प्रमुख नाथ हुए। अन्य उल्लेखनीय नाथों में ओंकार नाथ, उदय नाथ, सन्तोष नाथ, अचल नाथ, गजबेली नाथ, ज्ञान नाथ, चौरंगी नाथ बाबा शिलनाथ, दादा धूनी वाले, गजानन महाराज, गोगा नाथ, पंढरीनाथ और र्साईं नाथ आदि के नाम लिए जाते हैं।

    नाथ सम्प्रदाय की प्रमुख शाखाएं

    नाथ सम्प्रदाय की अनेक शाखाएं हैं जिनमें से 12 शाखाएं प्रमुख मानी जाती हैं- (1.) भुज के कंठरनाथ, (2.) पागलनाथ, (3.) रावल, (4.) पंख या पंक, (5.) वन, (6.) गोपाल या राम, (7.) चांदनाथ कपिलानी, (8.) हेठनाथ, (9.) आई पंथ, (10). वेराग पंथ, (11.) जैपुर के पावनाथ और (12.) घजनाथ।

    दक्षिण भारत में शैवधर्म

    दक्षिण भारत में शैवधर्म चालुक्य, राष्ट्रकूट, पल्लव और चोल राजाओं के शासन काल में लोकप्रिय रहा। पल्लव काल में शैव धर्म का प्रचार नायनार संतों ने किया। नायनार संतों की संख्या 63 बताई गई है जिनमें उप्पार, तिरूज्ञान, संबंदर और सुंदर मूर्ति के नाम उल्लेखनीय हैं। ऐलोरा के कैलाश मदिंर का निर्माण राष्ट्रकूटों ने करवाया। चोल शालक राजराज (प्रथम) ने तंजौर में राजराजेश्वर शैव मंदिर का निर्माण करवाया।

    तमिल शैव

    तमिल देश में छठी से नवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य, प्रमुख शैव भक्तों का जन्म हुआ जो अपने काल के प्रसिद्ध कवि भी थे। सन्त तिरुमूलर शिवभक्त होने के साथ-साथ, प्रसिद्ध तमिल ग्रंथ 'तिरुमन्त्रम्' के रचयिता थे। इस प्रकार तमिल शैव मत, दक्षिण भारतीय अनेकान्त यथार्थवादी समूह था। इसके अनुसार विश्व वास्तविक है तथा आत्माएं अनेक हैं। तमिल शैव आंदोलन, आदि शैव संतों की काव्य रचनाओं तथा नयनारों की उत्तम भक्ति पूर्ण कविताओं के मिश्रण से विकसित हुआ।

    इस पंथ के मान्य ग्रंथों के चार वर्गों में 2 वेद, 28 आगम, 12 तिमुरई तथा 14 शैव सिद्धान्त शास्त्र सम्मिलित हैं। यद्यपि शैव धर्म में वेदों का स्थान उच्च है तथापि 'एक्यं शिव' द्वारा अपने भक्तों के लिए वर्णित गोपनीय आगमों को अधिक महत्त्व दिया गया है। 13वीं तथा 14वीं सदी के आरम्भ में तमिल शैव मत में 6 आचार्य हुए जिनमें से अधिकांश अब्राह्मण तथा निम्न जाति में उत्पन्न हुए थे। इन आचार्यों द्वारा तमिल शैव सिद्धान्त शास्त्र रचे गए। तमिल शैव ग्रंथों तथा कविताओं में तीन महान शैव आचार्यों- अप्पर तिरुज्ञान, सम्बन्ध एवं सुन्दरमूर्ति की रचनाएँ शामिल हैं। अघोर शिवाचार्य जी को इस मत का प्रमुख संस्थापक माना जाता है।

    आंध्र के कालमुख शैव

    आन्ध्र प्रदेश में काकतीयों की प्राचीन राजधानी वारांगल के दक्षिण-पूर्व में स्थित वारंगल दुर्ग कभी दो दीवारों से घिरा हुआ था जिनमें से भीतरी दीवार के पत्थर के द्वार (संचार) और बाहरी दीवार के अवशेष आज भी मौजूद हैं। ई.1162 में निर्मित 1000 स्तम्भों वाला शिव मन्दिर नगर के भीतर ही स्थित है। इस काल में कालमुख या अरध्य शैव के कवियों ने तेलुगु भाषा की अभूतपूर्व उन्नति की। वारंगल के संस्कृत कवियों में सर्वशास्त्र विशारद के लेखक वीर-भल्लात-देशिक और नल-कीर्ति-कौमुदी के रचयिता अगस्त्य के नाम उल्लेखनीय हैं।

    मान्यता है कि अलंकार शास्त्र के प्रसिद्ध ग्रन्थ प्रताप-रुद्र-भूषण के लेखक विद्यानाथ यही अगस्त्य थे। गणपति का हस्ति सेनापति जयप, नृत्य-रत्नावली का रचयिता था। संस्कृत कवि शाकल्य मल्ल भी इसी का समकालीन था। तेलुगु कवियों में रंगनाथ रामायणुम का लेखक पलकुरिकी सोमनाथ मुख्य है। इसी समय भास्कर रामायणुम भी लिखी गई। आज के प्रसिद्ध तिरुपति मंदिर में बालाजी अथवा वेंकटेश्वर की जो प्रतिमा है, वह मूलतः वीरभद्र स्वामी की प्रतिमा है।

    मान्यता है कि राजा कृष्ण देवराय के काल में रामानुज आचार्य ने इस मंदिर का वैष्णवीकरण किया और वीरभद्र की प्रतिमा को बालाजी नाम दिया। तब से यह प्रतिमा विष्णु विग्रह के रूप में पूजी जाती है।

    काश्मीरी शैव सम्प्रदाय

    वसुगुप्त को काश्मीर शैव दर्शन की परम्परा का प्रणेता माना जाता है। उसने 9वीं शताब्दी के उतरार्द्ध में काश्मीरी शैव सम्प्रदाय का गठन किया। वसुगुप्त के कल्लट और सोमानन्द नामक दो प्रसिद्ध शिष्य थे। इनका दार्शनिक मत 'ईश्वराद्वयवाद' था। सोमानन्द ने 'प्रत्यभिज्ञा मत' का प्रतिपादन किया। प्रतिभिज्ञा शब्द का तात्पर्य है कि साधक अपनी पूर्वज्ञात वस्तु को पुनः जान ले। इस अवस्था में साधक को अनिवर्चनीय आनन्दानुभूति होती है। वे अद्वैतभाव में द्वैतभाव और निर्गुण में भी सगुण की कल्पना कर लेते थे। उन्होंने मोक्ष प्राप्ति के लिए कोरे ज्ञान और निरी भक्ति को असमर्थ बतलाया।

    दोनों के समन्वय से ही मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। यद्यपि शुद्ध भक्ति, बिना द्वैतभाव के संभव नहीं है और द्वैतभाव अज्ञान मूलक है किन्तु ज्ञान प्राप्त कर लेने पर जब द्वैत मूलक भाव की कल्पना कर ली जाती है तब उससे किसी प्रकार की हानि की संभावना नहीं रहती। इस प्रकार इस सम्प्रदाय में कतिपय ऐसे भी साधक थे जो योग-क्रिया द्वारा रहस्य का वास्तविक पता पाना चाहते थे, उनकी धारणा थी कि योग-क्रिया से हम माया के आवरण को समाप्त कर सकते हैं और इस दशा में ही मोक्ष की सिद्धि सम्भव है।

    अघोरी सम्प्रदाय

    अघोर शब्द दो शब्दों- '' और 'घोर' से मिल कर बना है जिसका अर्थ है- 'जो घोर न हो' अर्थात् सहज और सरल हो। चूंकि इनके लिए सब-कुछ सहज और सरल है तथा घोर तथा अशुभ कुछ भी नहीं है, इसलिए ये शमशान में शवों को खाने से लेकर कै तथा विष्ठा खाने तक को भी सहज, सरल, शुभ तथा अघोर कर्म समझते हैं। इसलिए ये अघोरी कहलाते हैं। अघोर पंथ के उत्पत्ति काल के बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता किंतु इन्हें कपालिक संप्रदाय के समकक्ष प्राचीन माना जाता है। यह सम्प्रदाय, शैव धर्म की स्वतंत्र शाखा के रूप में विकसित हुआ।

    अघोरी साधु, समाज से निर्लिप्त रहते हैं तथा अपने विचित्र व्यवहार, एकांत-प्रियता और रहस्यमय क्रियाओं के लिए जाने जाते हैं। अघोर पन्थ की भी कई शाखाएं हैं किंतु मोटे तौर पर इन्हें दो वर्गों में रखा जा सकता है, शैवमार्गी तथा वाममार्गी। शैवमार्गी अघोरी मानव मल का भक्षण नहीं करते जबकि वाममार्गी अघोरी मानव मल का भक्षण करते हैं। इन्हें काक अघोरी भी कहा जाता है। अवधूत भगवान दत्तात्रेय को अघोर शास्त्र का गुरु माना जाता है। अघोर संप्रदाय की मान्यता है कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव इन तीनों के अंश ने स्थूल रूप में दत्तात्रेय अवतार लिया। अघोर संप्रदाय के साधु भगवान शिव के भक्त होते हैं।

    इनके अनुसार शिव स्वयं में संपूर्ण हैं और जड़, चेतन सहित सृष्टि के समस्त रूपों में विद्यमान हैं। शरीर और मन को साध कर और जड़-चेतन आदि समस्त स्थितियों के वास्तविक स्वरूप को जान कर मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है। अघोर मत के अनुसार प्रत्येक मानव जन्म से अघोर अर्थात सहज होता है। बालक ज्यों-ज्यों बड़ा होता है, वह अंतर करना सीख जाता है और उसमें असहजताएं तथा बुराइयां घर कर लेती हैं जिनके कारण वह अपनी मूल प्रकृति अर्थात् अघोर रूप को भूल जाता है। अघोर साधना के द्वारा मनुष्य पुनः अपने सहज और मूल रूप में आ सकता है।

    इस मूल रूप का ज्ञान होने पर ही मोक्ष की प्राप्ति संभव है। अघोर संप्रदाय के साधक प्रत्येक वस्तु के प्रति समदृष्टि विकसित के लिए नरमुंडों की माला पहनते हैं और नरमुंडों को पात्र के तौर पर प्रयुक्त करते हैं। वे चिता की भस्म का शरीर पर लेपन करते हैं और चिता की अग्नि पर भोजन तैयार करते हैं। अघोर दृष्टि में स्थान भेद भी नहीं होता अर्थात महल या श्मशान घाट एक समान होते हैं। इसलिए अघोर साधनाएं मुख्यतः श्मशान घाटों और निर्जन स्थानों पर की जाती हैं। शव साधना अघोर पंथ की एक विशेष क्रिया है जिसके द्वारा स्वयं के अस्तित्व को जीवन के विभिन्न चरणों में अनुभव किया जाता है।

    वाराणसी या काशी को भारत के सर्व-प्रमुख अघोर स्थल के रूप में जाना जाता है। भगवान शिव की नगरी होने से काशी में शैव अघोरियों का वास बड़ी संख्या में रहता है। काशी में स्थित बाबा कीनाराम का स्थल, अघोरियों का महत्त्वपूर्ण तीर्थ है। गुजरात के जूनागढ़ क्षेत्र का गिरनार पर्वत भी अघोरियों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। जूनागढ़ को अवधूत भगवान दत्तात्रेय की तपस्या स्थली के रूप में मान्यता है। भारत में सर्वाधिक अघोरी असम के कामाख्या मंदिर में रहते हैं। मान्यता है कि जब माता सती भस्म हुई थीं तो उनकी योनि इसी स्थान पर गिरी थी।

    पश्चिमी बंगाल के तारापीठ, नासिक के अर्ध ज्योतिर्लिंग और उज्जैन के महाकाल के निकट भी अघोरी देखे जाते हैं। मान्यता है कि इन स्थानों पर अघोरियों को सिद्धियां शीघ्रता से प्राप्त होती हैं। अघोर संप्रदाय के साधक मृतक के मांस के भक्षण के लिए भी जाने जाते हैं। मृतक का मांस जन साधारण में अस्पृश्य होता है किंतु अघोर इसे प्राकृतिक पदार्थ के रूप में देखते हैं और इसे उदरस्थ कर प्राकृतिक चक्र को संतुलित करते हैं। मृतक के मांस भक्षण के पीछे उनकी समदर्शी दृष्टि विकसित करने का सिद्धांत काम करता है।

    कुछ प्रमाणों के अनुसार अघोर साधक मृत मांस से शुद्ध शाकाहारी मिठाइयां बनाने की क्षमता भी रखते हैं। लोक मानस में अघोर संप्रदाय के बारे में अनेक भ्रांतियाँ और रहस्य कथाएं प्रचलित हैं। अघोर विज्ञान में इन सब भ्रांतियों को निरस्त करके अघोर क्रियाओं और विश्वासों को विशुद्ध विज्ञान के रूप में तार्किक ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।

    शाक्त धर्म

    सिंधु घाटी सभ्यता में मातृदेवी की पूजा के प्रमाण मिलते हैं। अतः शाक्त सम्प्रदाय, भारत के प्राचीनतम सम्प्रदायों में से है तथा हिन्दू-धर्म के तीन प्रमुख सम्प्रदायों- वैष्णव, शैव एवं शाक्त में से एक है। शाक्त सम्प्रदाय में भगवती दुर्गा को ही दुनिया की पराशक्ति और सर्वोच्च देवता माना जाता है। गुप्तकाल में शाक्त मत का नवीन रूप दिखाई देता है। इस काल में वैष्णव एवं शैव मतों के समन्वय से नाथ सम्प्रदाय तथा नवीन शाक्त सम्प्रदाय की उत्पत्ति हुई। इसीलिए नाथों और शाक्तों में से कुछ शाखाएं वैष्णव धर्म का तथा कुछ शाखाएं तांत्रिक मत का पालन करती हैं।

    शाक्त धर्म, शक्ति की साधना का विज्ञान है। इसके मतावलंबी शाक्त धर्म को प्राचीन वैदिक धर्म के बराबर ही पुराना मानते हैं। शाक्त धर्म का विकास वैदिक धर्म के साथ-साथ या सनातन धर्म में इसे समावेशित करने की आवश्यकता के साथ हुआ। यह हिन्दू-धर्म में पूजा का एक प्रमुख स्वरूप है। गुप्त काल में शाक्त सम्प्रदाय, उत्तर-पूर्वी भारत, कम्बोडिया, जावा, बोर्निया और मलाया आदि द्वीपों में लोकप्रिय था। भारत में काश्मीर, दक्षिण भारत, असम और बंगाल में शाक्त धर्म का अधिक प्रचलन हुआ।

    वैष्णव मत पर शाक्त मत का प्रभाव हो जाने से ब्रज क्षेत्र में भी शक्ति की पूजा होने लगी। ब्रज क्षेत्र में महामाया, महाविद्या, करौली, सांचोली आदि विख्यात शक्ति पीठ स्थित हैं। मथुरा के राजा कंस ने यशोदा से उत्पन्न जिस कन्या का वध किया था, उसे भगवान श्रीकृष्ण की प्राण रक्षिका देवी के रूप में पूजा जाता है। देवी शक्ति की यह मान्यता ब्रज से लेकर सौराष्ट्र तक विस्तृत है। द्वारका में भगवान द्वारकानाथ के शिखर पर चर्चित सिंदूरी आकर्षक देवी प्रतिमा को श्रीकृष्ण की भगिनी माना जाता है जो शिखर पर विराजमान रहकर सदा श्रीकृष्ण की रक्षा करती हैं।

    ब्रज क्षेत्र आज से 100 वर्ष पूर्व तक तांत्रिकों का प्रमुख गढ़ था। यहाँ के तांत्रिक भारत भर में प्रसिद्ध रहे हैं। कामवन भी राजा कामसेन के समय तंत्र विद्या का मुख्य केंद्र था, उसके दरबार में अनेक तांत्रिक रहते थे। बौद्ध धर्म के प्रचलन के बाद सम्पूर्ण भारत भूमि में शाक्त धर्म के प्रति आकर्षण कम हुआ। सम्पूर्ण भारत वर्ष, अर्थात् हिन्दूकुश पर्वत से लेकर दक्षिण एशियाई द्वीपों में देवी के विभिन्न स्वरूपों के मंदिर एवं शक्ति पीठ प्राप्त होते हैं। शाक्त सम्प्रदाय का प्रमुख ग्रंथ 'श्री दुर्गा भागवत पुराण' है।

    'दुर्गा सप्तशती' भी इसी पुराण का अंश है। इस ग्रंथ में 108 देवी पीठों का वर्णन किया गया है। इनमें से 51-52 शक्ति पीठों का विशेष महत्व है। माँ दुर्गा के प्राचीन मंदिरों की संख्या भी हजारों में है। देवी उपनिषद के नाम से एक उपनिषद भी लिखा गया। विश्व के प्रायः समस्त धर्मों में यह मान्यता है कि ईश्वर, पुरुष जैसा हो सकता है किंतु शाक्त धर्म विश्व का एकमात्र धर्म है जो 'मातृ-तत्व' को सृष्टि की रचयिता मानता है। शाक्त सम्प्रदाय में देवी को ही सर्वशक्तिमान माना जाता है तथा उसी की आराधना होती है।

    इस मत के अनुसार विभिन्न देवियां, एक ही सर्वशक्तिमान देवी के विभिन्न रूप हैं। शाक्त मत के अन्तर्गत भी कई परम्पराएँ मिलतीं हैं जिनमें लक्ष्मी से लेकर रौद्ररूपा काली तक उपस्थित हैं। कुछ शाक्त सम्प्रदाय अपनी देवी का सम्बन्ध शिव या विष्णु से मानते हैं। भगवान शिव की पत्नी, माँ पार्वती को शक्ति भी कहते हैं। यही सती, दुर्गा और भगवती है। उसी की विशेष आराधना के लिए वर्ष में दो बार नवरात्रि उत्सव का आयोजन किया जाता है। वर्ष का पहला नवरात्रि चैत्र माह में आता है इसे 'चैत्रीय नवरात्रि' कहते हैं। दूसरी नवरात्रि आश्विन माह में आती है जिसे 'शारदीय नवरात्रि' कहते हैं।

    शारदीय नवरात्रि के नौ दिन उत्सव की तरह मनाए जाते हैं, जिसे दुर्गोत्सव कहा जाता है। चैत्रीय नवरात्रि शैव तात्रिकों के लिए होती है जिसके अंतर्गत तांत्रिक अनुष्ठान और कठिन साधनाएँ की जाती हैं। शारदीय नवरात्रि सात्विक साधकों के लिए होती है जो माँ की भक्ति तथा अनुकम्पा प्राप्ति हेतु मनाई जाती है। शक्ति के तांत्रिक अनुयाइयों को ही मुख्यतः शाक्त कहा जाता है। शाक्त न केवल शक्ति की पूजा करते हैं, बल्कि उसके शक्ति-आविर्भाव को मानव शरीर एवं जीवित ब्रह्माण्ड की शक्ति या ऊर्जा में संवर्धित, नियंत्रित एवं रूपान्तरित करने हेतु कठिन साधना करते हैं।

    मान्यता है कि शक्ति, 'कुंडलिनी' रूप में मानव शरीर के गुदा आधार पर स्थित होती है। 'जटिल-ध्यान' एवं 'यौन-यौगिक-अनुष्ठानों' के माध्यम से कुंडलिनी शक्ति जागृत की जा सकती है। इस अवस्था में कुंडलिनी, सूक्ष्म शरीर की सुषुम्ना से ऊपर की ओर उठती है तथा मार्ग में कई चक्रों को भेदती हुई सिर के शीर्ष में अन्तिम चक्र में प्रवेश करती है और वहाँ यह अपने पति-प्रियतम शिव के साथ हर्षोन्मादित होकर मिलती है। भगवती एवं भगवान के पौराणिक संयोजन का अनुभव 'हर्षोन्मादी-रहस्यात्मक समाधि' के रूप में 'मनो-दैहिक' रूप से किया जाता है, जिसका विस्फोट ही परमानंद कहलाता है। यह परमानंद ही कपाल क्षेत्र से उमड़कर हर्षोन्माद एवं गहनानंद के प्रवाह के रूप में पूरे शरीर में नीचे की ओर बहता है।

    एक ओर भारत भूमि पर उत्तर से दक्षिण तक वैष्णव धर्म तथा शैव धर्म फल-फूल रहा था तो दूसरी ओर शाक्त धर्म नामक वाममार्गी मत भी विभिन्न दार्शनिक व्याख्याओं के साथ रूप ले रहा था। वामर्माग में पंचमकारों- मद्य, मीन, मांस, मैथुन तथा मुद्रा के माध्यम से साधक की उन्नति का मार्ग ढूंढा गया तथा तंत्र-मंत्र और यंत्र के बल पर सिद्धियों की कामना की गई। इस मत में भैरवी साधना जैसी अनेक साधना पद्धितियों का निर्माण किया गया जिनमें साधक को भैरवी का साहचर्य ग्रहण करना अनिवार्य था।

    इस तंत्र साधना की कुछ मर्यादाएं निश्चित की गईं जिनकी पालना प्रत्येक साधक को करनी पड़ती थी। इस मत के अनुसार भैरवी 'शक्ति' का ही एक रूप होती है तथा तंत्र की सम्पूर्ण भावभूमि 'शक्ति' पर आधारित है। इस साधना के माध्यम से साधक को इस तथ्य का साक्षात् कराया जाता था कि स्त्री केवल वासनापूर्ति का माध्यम नहीं, वरन् शक्ति का उद्गम भी होती है। शक्ति प्राप्ति की यह क्रिया केवल सदगुरु ही अपने निर्देशन में संपन्न करा सकते हैं, क्योंकि उन्हें ही अपने किसी शिष्य की भावनाओं एवं संवेदनाओं का ज्ञान होता है।

    इसी कारण तंत्र के क्षेत्र में स्त्री समागम के साथ-साथ गुरु के मार्गदर्शन की अत्यंत आवश्यकता पड़ती थी। शक्ति उपासकों के वाम मार्गी मत में पहले मद्य को स्थान मिला। उसके बाद बलि प्रथा आई और माँस का सेवन होने लगा। बाद में इसके भी दो हिस्से हो गए। जो साधक मद्य और माँस का सेवन करते थे, उन्हें साधारण-तान्त्रिक कहा जाता था। मद्य और माँस के साथ-साथ मीन (मछली), मुद्रा (विशेष क्रियाएँ), मैथुन (स्त्री संसर्ग) आदि पाँच मकारों का सेवन करने वाले तांत्रिकों को सिद्ध-तान्त्रिक कहा जाता था।

    जन-साधारण इन सिद्ध-तान्त्रिकों से डरने लगा। साधारण-तान्त्रिक एवं सिद्ध-तान्त्रिक, दोनों ही अपनी-अपनी साधनाओं के द्वारा ब्रह्म को पाने का प्रयास करते थे। पाँच मकारों के द्वारा अधिक से अधिक ऊर्जा बनाई जाती थी और उस ऊर्जा को कुण्डलिनी जागरण में प्रयुक्त किया जाता था। कुन्डलिनी जागरण करके सहस्र-दल का भेदन किया जाता था और दसवें द्वार को खोल कर सृष्टि के रहस्यों को समझा जाता था।

    इस प्रकार वाम साधना में काम-भाव का उचित प्रयोग करके ब्रह्म की प्राप्ति की जाती थी। वाम साधना में एक और मत सामने आया जिसमें भैरवी-साधना या भैरवी-चक्र को प्राथमिकता दी गई। इस मत के साधक वैसे तो पाँचों मकारों को मानते थे, किन्तु उनका मुख्य ध्येय काम के द्वारा ब्रह्म की प्राप्ति करना था।

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  • अध्याय - 12 पुरातत्व संग्रहालय उदयपुर

     02.06.2020
    अध्याय - 12 पुरातत्व संग्रहालय उदयपुर

    अध्याय - 12 पुरातत्व संग्रहालय, उदयपुर


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    जनार्दनराय नागर विद्यापीठ विश्वविद्यालय उदयपुर के पुरातत्व संग्रहालय में वर्ष 2013 में पुरातात्विक संग्रहालय स्थापित किया गया है। इस संग्रहालय का विकास निरंतर जारी है। डॉ. जीवनसिंह खड़कवाल इसके निदेशक हैं। विद्यापीठ के पुरातत्व विभाग के प्रोफेसर डॉ. कृष्णपालसिंह ने इस संग्रहालय की स्थापना में महतवपूर्ण योगदान दिया है।


    इस संग्रहालय में अनेक प्राचीन सभ्यताओं के स्थलों से प्राप्त पुरावस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं जिनमें पाषाणकालीन, प्राक्-हड़प्पा, राजस्थान, गुजरात, पंजाब, मध्यप्रदेश और हरियाणा के सिंधु सभ्यता-स्थल, हड़प्पा, आहाड़ और चंद्रावती, कानमेर, गिलूण्ड, बालाथल, ईसवाल, पछमता, नठारा की पाल, आहाड़ आदि से प्राप्त अवशेष, चट्टानों के नमूने, फोटोग्राफ आदि प्रदर्शित किए गए हैं।

    संग्रहालय के आरम्भ में, भारत में पाई जाने वाली विभिन्न प्रकार की चट्टानों, लाइम स्टोन, सैण्ड स्टोन, बेसाल्ट रॉक आदि के नमूने प्रदर्शित किए गए हैं। साथ ही मेवाड़ क्षेत्र की चट्टानों में मिलने वाले विभिन्न प्रकार के पत्थरों का प्रदर्शन किया गया है। जावर की खानों से प्राप्त ओर-मिक्स तथा जिंक मैटल्स का भी प्रदर्शन किया गया है। साथ ही मोडी-बाठेड़ा, धारेश्वर और बैराठ आदि स्थलों से प्राप्त रॉक पेंटिंग्स के बड़े-बड़े फोटोग्राफ भी प्रदर्शित किए गए हैं।

    संग्रहालय की सामग्री को तीन स्पष्ट विभागों में विभाजित किया गया है। पहले खण्ड में पाषाणकालीन सामग्री है। दूसरे खण्ड में ताम्रकालीन सामग्री है। तीसरे खण्ड में लौहसभ्यता के विकास से सम्बन्धित सामग्री है। पाषाण काल से मध्ययुगीन संस्कृतियों के अवशेषों के माध्यम से उन कालखण्डों के मानव-ज्ञान, सामाजिक जीवन, सामुदायिक भावना, सुरक्षा प्रबंध, आर्थिक गतिविधियों के बारे में जानकारी प्राप्त होती है तथा यह ज्ञात करने में आसानी होती है कि इन सभ्यताओं के लोग कैसे थे, वे कैसे जीवन यापन करते थे, किस तरह के औजारों, उपकरणों एवं बर्तनों का प्रयोग करते थे, वे क्या पहनते थे तथा उनका भोजन क्या था! इस संग्रहालय में विगत दो दशकों में राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, कर्नाटक तथा उत्तराखण्ड में हुए पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक सर्वेक्षण के दौरान मिली सामग्री तथा खुदाई में मिले अवशेष रखे हैं।

    उदयपुर में आहाड़ के बाद यह दूसरा संग्रहालय है जहाँ से ऐसी जानकारी मिलती है। संग्रहालय में विभिन्न सर्वे और खुदाई के दौरान मिले अवशेष, गुजरात से प्राप्त डम्पा संस्कृति के औजार, बर्तन, घड़े, छाप और अन्य अवशेष, मेवाड़ के 110 गांवों में खुदाई में मिले काले और लाल बर्तन, अनाज के दाने, छाप (सील्स), राजस्थान में मिले लोहे के तीर, खंजर अन्य औजार, बर्तन, राजस्थान, मध्यप्रदेश और कर्नाटक में पाई गई हाथ की कुल्हाड़ी सहित अन्य औजार, पश्चिम एशिया, विशेषकर ईरान-इराक से लाए गए बर्तन एवं अन्य सामग्री रखी गई है। नर्बदा घाटी से मिली एक लाख वर्ष पुरानी एक कुल्हाड़ी भी प्रदर्शित की गई है जो पाषाण कालीन है। निम्न पाषाण काल के औजारों में पशुओं की खाल उतारने की ब्लेड तथा क्लीनर प्रमुख हैं। प्राक्-हड़प्पा संस्कृति से गुजरात में मिले घड़े, विशेष तरह के बर्तन (काली और लाल मिट्टी के बर्तन जो मेवाड़ में पाई गई संस्कृति की विशेषता है) एवं रिजर्व स्लिप वेयर भी प्रदर्शित किए गए हैं जिनसे उस काल में मेवाड़ तथा कच्छ-गुजरात के व्यापारिक और सांस्कृतिक सम्बन्धों का पता चलता है।

    इस काल के मृद्भाण्ड 8000 से 3400 ईसा पूर्व के बीच रखे जाते हैं। आग में पके हुए मिट्टी के कुछ बर्तनों को बजाने से धातु जैसी ध्वनि सुनाई देती है। संग्रहालय में प्रदर्शित सामग्री की फिजिकल रिसर्च लैबोरेट्री अहमदाबाद से रेडियो कार्बन डेटिंग करवाई गई है। प्राक्-हड़प्पा संस्कृति के लोगों ने ही आगे चलकर सिंधु घाटी सभ्यता या हड़प्पा सभ्यता को जन्म दिया। इस काल खण्ड में अनाज संग्रहण की कोठियां मिलती हैं। ये कोठियां विशिष्ट आकृति में बनी हुई हैं। इनके निर्माण में बजरी की अधिक मात्रा का प्रयोग हुआ है। इनका ऊपरी मुँह अधिक चौड़ा है। पाकिस्तान में आमरी, नाल, कोटड़ी से भी ऐसे पात्र मिले हैं।

    इस संग्रहालय के निकट ही आहाड़ सभ्यता का स्थल खोजा गया है जहाँ से सिंधु सभ्यता के नगरों के साथ व्यापार होता था। भारत में इस काल की सभ्यता के अवशेष कच्छ रण के किनारे कानमेर से प्राप्त हुए हैं। हड़प्पा युग के बर्तनों एवं उपकरणों में माइक्रोलिथ्स तथा स्टुड हैण्डल बर्तन अधिक महत्वपूर्ण हैं। इन बर्तनों पर सामान्य पेंटिंग है जिसमें काले एवं गहरे-भूरे रंगों का प्रयोग किया गया है।

    इस संग्रहालय में सिंधु सभ्यता के परफोरेटेड पॉट्स छिद्रयुक्त मृद्भाण्ड प्रदर्शित किए गए हैं जो उस काल का देशी रेफ्रिजिरेटर कहे जा सकते हैं। इन बर्तनों को पानी से गीला कर दिया जाता था। इनके स्पर्श से ठण्डी हुई हवा जब छिद्रों के माध्यम से बर्तन के भीतर पहुंचती थी तो उसमें रखे फल, सब्जी एवं मांस आदि खाद्य सामग्री लम्बे समय तक ताजी बनी रहती थी। ऐसे बर्तन कालीबंगा, सोथी, सीसपाल, भीथाथल, कुनाल, बनवाली आदि स्थानों से प्राप्त हुए हैं।

    इन स्थलों से एक गोबलेट (छोटी सुराही जैसा बर्तन) भी प्राप्त हुई है जो इस संग्रहालय में प्रदर्शित की गई है। कालीबंगा स्थल के नीचे के स्तर से प्राप्त मिट्टी की चूड़ियां, हेयरक्लिप, मिट्टी के मनके प्राप्त हुए हैं जो ऊपरी स्तर की इसी प्रकार की सामग्री से भिन्न हैं। हड़प्पा सभ्यता में स्टेटाइट से बनी चूड़ियां भी मिली हैं। यह चूना पाउडर जैसी सफेद एवं चिकनी मिट्टी होती थी। शंख के मोटे किनारों को काटकर उनसे भी चूड़ियां बनाई जाती थीं जिनके टुकड़े इस संग्रहालय में देखे जा सकते हैं।

    हरे रंग का फेयांस नामक पत्थर, नारंगी रंग का चेल्सीडोनी नामक पत्थर, कार्नेलियन, चर्ट, जाचर, अगेट आदि पत्थरों से बनी सामग्री भी इस संग्रहालय में प्रदर्शित की गई है। अगेट नामक पत्थर को 700 डिग्री सेंटीग्रेड पर तपाने से कार्नेलियन बनता है। पाकिस्तान में रोहरी नामक एक स्थान है जिसकी भौगोलिक संरचना एवं क्षेत्रफल राजस्थान के जोधपुर जिले के फलौदी जैसा है, वहाँ से विभिन्न प्रकार का कीमती चर्ट प्राप्त होता है। इस चर्ट एवं उससे बनी सामग्री को इस संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है।

    सिंधु सभ्यता से गोफन में डालकर फैंकने के पत्थर मिले हैं। मिट्टी के एक बर्तन के भीतरी भाग से कपड़े का प्रमाण मिलता है। इस बर्तन का निर्माण करते समय कुम्हार ने अपने एक हाथ में कपड़ा ले रखा था जो कि बर्तन के भीतरी तरफ था। जब घड़े को बाहर से थपथपाकर आकृति दी गई तो भीतर वाले हाथ के कपड़े की बुनावट के निशान मटके की भीतरी दीवार पर अंकित हो गए तथा उससे जाली जैसी चित्राकृति बन गई। ऐसा एक नमूना इस संग्रहालय में रखा है। लोथल से मिले लगभग 113 ग्राम भार के मिट्टी के बाट भी इस सामग्री के साथ प्रदर्शित किए गए हैं। आहाड़ सभ्यता से प्राप्त 5500-3500 वर्ष पुराने काले एवं लाल मृद्भाण्ड भी प्रदर्शित हैं।

    संग्रहालय में प्लास्टिक के दो डिब्बे प्रदर्शित किए गए हैं जिनमें से एक में 5000 साल पुराना गेहूं तथा दूसरे में 5000 साल पुराना जौ रखा गया है। ये नमूने सिंधु सभ्यता के हैं। बाजोट लगे हुए प्याले इस संग्रहालय में प्रदर्शित अद्भुत वस्तुओं में से हैं। ये गुजरात के भुज जिले में आडेसर तहसील के निकट कानमेर नामक स्थल की खुदाई से मिले हैं। यह भारत में सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख स्थलों में से एक है। इस स्थल की छः साल तक खुदाई की गई।

    यहाँ से महल जैसी रचनाओं वाले भवनों के अवशेष प्राप्त हुए हैं जो लगभग 4500 वर्ष पुराने हैं। यह कला विश्व का प्रथम नगरीकरण चरण था। इस युग में भारत के अतिरिक्त मेसोपोटामिया एवं माया सभ्यता में ही नगरीय मानव सभ्यता विकसित हुई थी। इसके पश्चात् लगभग डेढ़-दो हजार वर्ष तक किसी नवीन सभ्यता के चिह्न नहीं मिलते हैं। नगरीकरण की प्रथम चरण की सभ्यता के बाद नगरीकरण की द्वितीय चरण वाली सभ्यता प्रकट होती हुई दिखाई देती है जो, ताम्र-कांस्य कालीन सभ्यता से नितांत विलग है तथा लौहकालीन सभ्यता है। इस काल में लौह विगलन भट्टियां, कृषि, पशुपालन, भवन निर्माण आदि कार्यकलाप विकसित अवस्था में दिखाई देने लगते हैं।

    प्रथम चरण एवं द्वितीय चरण की नगरीय सभ्यताओं के लोगों की जीवन शैली में पर्याप्त अंतर दिखाई देता है। इस काल में लोहे के औजारों पर धार लगाने के पत्थर, कूटने-पीसने एवं घिसने के पत्थर, कान के कुण्डल, बच्चों के खेलने के पासे, गोटियां, धातु की चूड़ियां मिलती हैं। साथ ही मिट्टी, हाथीदांत, कांच एवं लोहे की सामग्री भी मिलती है। इससे स्पष्ट है कि लोहे के साथ-साथ कांच बनाने की विधि भी इस युग के लोगों को ज्ञात हो गई थी। ऐतिहासिक युग के प्रारंभिक काल में चर्ट, अगेट एवं चेल्सीडोनी का प्रचलन भी जारी रहा। इस समय के लोहे के धनुष, भाले की नोक, ग्रे वेयर (सलेटी मृद्भाण्ड), हाथीदांत की चूड़ी, लोहे के कर्णफूल जैसे आभूषण का एक टुकड़ा तथा लोहे के कड़े भी प्रदर्शित किए गए हैं।

    बालाथल से प्राप्त 2300 वर्ष पुरानी सभ्यता में काम आने वाले मिट्टी से निर्मित सोकपिट्स (रिंगवैल) भी इस संग्रहालय में प्रदर्शित किए गए हैं। कच्छ से मिले चर्ट, मॉस, जाचर, बेंडेट अगेट आदि के नमूने भी इस संग्रहालय में प्रदर्शित हैं। बेंडेट अगेट धारीदार चमकदार पत्थर होता है। 13वीं शताब्दी ईस्वी में मेवाड़ राज्य की जावर खानों से जस्ता निकालने की विधियों के प्रमाण तथा जस्ता बनाने में प्रयुक्त होने वाले लोहे के खोल आदि प्राप्त हुए हैं, इन प्रमाणों के चित्र एवं खोल इस संग्रहालय में प्रदर्शित किए गए हैं। यह विश्व में जस्ता बनाने के सबसे प्राचीन प्रमाण हैं। 1500 टीलों में उस काल का स्लग (जिंक-ओर में से शुद्ध जस्ता निकालने के बाद शेष बचा कीट) जमा हुआ मिला है।

    इस काल में जावर की खानों का जस्ता यूरोप के देशों को जाने लगा था। संग्रहालय में विभिन्न सभ्यता स्थलों से मिली मिट्टी की ईंटें प्रदर्शित की गई हैं। इनमें शुंग एवं कुषाण कालीन ईंटें, अर्थूणा से प्राप्त ईंटें, वीरपुरा सर्वेक्षण में प्राप्त ईंटें तथा वडनगर से प्राप्त ईंटें सम्मिलित हैं। शुंग कालीन मृद्भाण्ड जो तेल तथा सब्जी आदि रखने के काम आते थे। इत्र रखने की कॉर्क युक्त सुराही तथा चाय जैसे किसी पदार्थ को छानने की टोंटीदार केतली की टोंटी जिसके भीतर मिट्टी से बनी चलनी लगी है, आदि प्रदर्शित की गई हैं। यह केतली रंगमहल (गंगानगर जिला), से प्राप्त हुई है।

    वडनगर से बुद्ध के दो स्तूप, दो महाचैत्य एवं मिट्टी के सिंहासन प्राप्त हुए हैं। संग्रहालय में यूनान अथवा रोमन साम्राज्य में निर्मित लगभग 2000 साल पुराना एक ‘वाइन टारपीडो’ प्रदर्शित किया गया है। यूनान एवं रोमन सभ्यता में इस प्रकार के मृदभाण्डों में उस काल में मदिरा का संग्रहण एवं परिवहन किया जाता था। इस टारपीडो के भीतर मिले स्टार्च से पुष्टि होती है कि इसमें किसी समय मदिरा भरी हुई थी। प्राचीन यूनानी सभ्यता यूनान एवं उसके निकटवर्ती क्षेत्रों में लगभग आठवीं शताब्दी ई.पू. से लगभग छठी शताब्दी ईस्वी तक अर्थात् लगभग 1,300 वर्षों तक अस्तित्व में रही।

    आधुनिक पश्चिमी संस्कृतियों का उद्गम इसी यूनानी सभ्यता में माना जाता है। इस सभ्यता के पश्चात् अस्तित्व में आने वाले रोमन साम्राज्य पर प्राचीन यूनान का गहरा प्रभाव था। पश्चिमी रोमन साम्राज्य 27 ईस्वी पूर्व से 476 ईस्वी तक तथा पूर्वी रोमन साम्राज्य 27 ईस्वी पूर्व से 1453 ईस्वी तक यूरोप के रोम नगर में केन्द्रित था। इस साम्राज्य का विस्तार दक्षिणी यूरोप, उत्तरी अफ्रीका और अनातोलिया के क्षेत्रों तक था। उस काल में यह विश्व के विशालतम पाँच साम्राज्यों में से एक था। पाँचवी सदी के अन्त तक इस साम्राज्य का पतन हो गया और इस्तांबुल (कॉन्सटेन्टिनोपल) पूर्वी रोमन साम्राज्य की राजधानी बन गई। ईस्वी 1453 में उस्मानों (ऑटोमन तुर्कों) ने इस पर भी अधिकार कर लिया। रोमन साम्राज्य, यूरोप के इतिहास और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण अंग है।

    जनार्दनराय नागर विद्यापीठ विश्वविद्यालय उदयपुर के पुरातत्व संग्रहालय में प्रदर्शित जार ‘वाइन टारपीडो’ मिट्टी से बना हुआ है जिसे आग में पकाया गया है तथा उस पर एक विशेष प्रकार का लेप किया गया है जिसे उस काल की पॉलिश कहा जाना चाहिए। आधुनिक पनडुब्बियों की आकृति से मेल खाने के कारण इस प्रकार के जारों को रोमन वाइन टारपीडो कहा जाता है। यह बेलनाकार आकृति में है इसका मुंह संकरा, मध्य भाग चौड़ा तथा नीचे का भाग पुनः कम चौड़ा है। इसकी ऊँचाई लगभग 26 इंच है। यह जार पश्चिम एशिया से लेकर सिंधुघाटी सभ्यता के स्थलों से होती है। यह जार गुजरात से प्राप्त किया गया है। इन जारों में मदिरा भरकर उन्हें पानी के जहाजों से दूर-दूर तक निर्यात किया जाता था।

    पानी के जहाजों में इनके परिवहन का समुचित प्रबंध होता था। इन्हें हिलने तथा परस्पर टकराकर टूटने से बचाने के लिए जहाज के भीतर लकड़ी के फ्रेम नुमा रैक बनाए जाते थे। यह जार क्षतिग्रस्त है, इसलिए संग्रहालय के अधिकारियों ने इसे मरम्मत करके फिर से जोड़ा है। इस जार के भारत में मिलने से इस तथ्य की पुष्टि होती है कि उस काल में भारत एवं यूनान के बीच व्यापारिक सम्बन्ध थे। यह भी संभव है कि इस प्रकार के जारों में मदिरा भरकर यूनान अथवा रोम से पश्चिम एशिया तक लाई जाती हो एवं वहाँ के व्यापारी इन्हें भारत जैसे समृद्ध देश के बंदारगाहों तक पहुंचाते हों।

    उदयपुर के विद्यापीठ संग्रहालय में भारत एवं पाकिस्तान के सिंधुघाटी सभ्यता स्थलों से प्राप्त पुरातत्व सामग्री, चर्ट के औजार, कुल्हाड़ियां, पांच हजार साल पुराने गेहूं एवं जौ के दाने आदि भी प्रदर्शित हैं। संग्रहालय में रखी गई 500 वर्ष पुरानी सामग्री में आइवरी की चूड़ियां, हाथीदांत की चूड़ियां आदि सम्मिलित हैं। मेवाड़ के ईसवाल नामक स्थल से मिला मृद्भाण्ड भी प्रदर्शित है। संग्रहालय में कुछ चित्र प्रदर्शित हैं जिनमें सिंधु सभ्यता की गोलाकृति की सीलें (मुहरें) प्रदर्शित हैं। इनके बीच में छेद हैं जिनसे अनुमान होता है कि ये मुहरें गले में पहनने के परिचयपत्र की तरह प्रयुक्त होती होंगी।

    यहाँ प्रदर्शित किए गए प्रत्येक अवशेष की जानकारी के लिए चित्रों सहित साहित्य तैयार किया गया है जिसमें पुरा-अवशेष का प्राप्तिस्थल, सभ्यता का नाम, उसकी विशेषताएं आदि की जानकारी दी गई है। राजस्थान के अब तक के संग्रहालयों में इस प्रकार के साहित्य का अभाव है। यह संग्रहालय पर्यटकों, सामान्य रुचि के दर्शकों एवं छात्रों, अध्यापकों, शोधार्थियों सहित सामान्यजन के लिए मार्गदर्शक का काम कर सकता है।

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