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  • अध्याय - 12 उपनिषदों का चिंतन

     02.06.2020
    अध्याय - 12 उपनिषदों का चिंतन

    उपनिषदों का चिंतन


    दो सुन्दर पंखों वाले पक्षी, घनिष्ठ सखा, समान वृक्ष पर रहते हैं; उनमें से एक वृक्ष के स्वादिष्ट फलों को खाता है, दूसरा पक्षी फल नहीं खाता अपितु अपने सखा को देखता है। - मुण्डक उपनिषद 3-1-1


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    ई.पू.600 के आसपास, उत्तर-वैदिक-काल का अंतिम चरण आरंभ हुआ। इस काल की दार्शनिक विवेचना के अन्य प्रधान ग्रन्थ आरण्यक हैं। आरण्यकों ने यज्ञीय प्रक्रिया से स्वतंत्र तथा ज्ञान की श्रेष्ठता से सम्पन्न जिस 'तत्त्व चिंतन प्रधान धर्म' की प्रवृत्ति आरम्भ की थी उसका चरमोत्कर्ष उपनिषदों में हुआ। इस काल में, विशेषतः पंचाल और विदेह में, पुरोहितों के आधिपत्य, कर्मकांड एवं अनुष्ठानों के विरुद्ध प्रबल आंदोलन आरम्भ हुआ तथा अनेक उपनिषदों की रचना हुई।

    इन दार्शनिक ग्रंथों में अनुष्ठानों की आलोचना की गई और सम्यक् विश्वासों एवं ज्ञान पर बल दिया गया। ऋग्वेद में बहुदेववाद के साथ-साथ एक ही परम शक्ति का भी किंचित् वर्णन किया गया था। उपनिषद् काल में यह चिंतन निष्कर्ष तक पहुँच गया। इस सृष्टि से परे एक अपरिवर्तनशील शक्ति है जिसे 'ब्रह्म' कहा गया। वह इस सृष्टि का निर्माता, नियंत्रणकर्ता और संहारकर्ता है। यह 'परमात्मा' आत्मा के रूप में सभी जीवों में निवास करता है। व्यक्ति की मृत्यु के बाद यह आत्मा नए शरीर में प्रवेश करता है।

    इस प्रकार आत्मा बार-बार नए शरीर धारण करता हुआ अपने सत्कर्मों के बल पर अपने बंधनों से मुक्त होकर पुनः परमात्मा से युक्त हो जाता है। इस चिंतन के अनुसार कोई भी कर्म निष्फल नहीं जाता। किसी भी प्रकार का उचित या अनुचित कर्म परिपक्व होकर फलदायी अवश्य होता है। इसी कर्मफल को भोगने के लिए आत्मा को पुनर्जन्म लेना पड़ता है। कर्म और आत्मा के इन सिद्धांतों के साथ मोक्ष का सिद्धांत जुड़ा हुआ है जो कि मनुष्य मात्र का अंतिम गंतव्य है।

    उपनिषद काल में जीव, सृष्टि, आत्मा आदि के सम्बन्ध में बड़े स्तर पर चिंतन हुआ। याज्ञवल्क्य आदि ऋषियों द्वारा 'आत्मन्' को पहचानने और 'आत्मन्' तथा 'ब्रह्म' के सम्बन्ध को सही रूप में समझने पर बल दिया गया। 'ब्रह्मा' सर्वोच्च देव के रूप में उदित हुए। पंचाल और विदेह के कुछ क्षत्रिय राजाओं ने भी इस प्रकार के चिन्तन में भाग लिया और पुरोहितों के एकाधिकार वाले धर्म में सुधार करने के लिए वातावरण तैयार किया। उनके उपदेशों से स्थायित्व और एकीकरण की विचारधारा को बल मिला।

    आत्मा की अपरिवर्तनशीलता और अमरता पर बल दिए जाने से स्थायित्व की संकल्पना मजबूत हुई, राजशक्ति को इसी की आवश्यकता थी। आत्मा और ब्रह्मा के सम्बन्धों पर बल दिए जाने से उच्च अधिकारियों के प्रति स्वामिभक्ति की विचारधारा को बल मिला। मृत्यु के बाद आत्मा कहाँ जाता है? इस प्रश्न ने पुनर्जन्म के सिद्धान्त को जन्म दिया।

    इस सिद्धांत के अनुसार मनुष्य का अगला जन्म उसके कर्मों पर निर्भर रहता है तथा अच्छा कार्य करने वाला, अच्छी योनि में और बुरा कार्य करने वाला बुरी योनि में जन्म लेता है। अच्छी और बुरी योनि के विचार ने स्वर्ग और नर्क की अवधारणा को जन्म दिया। इस युग में ज्ञान की प्रधानता पर बल दिया गया। मोक्ष प्राप्त करने के लिए ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक समझा गया। ज्ञान, विश्वास, संयम, सत्य और श्रद्धा आदि उत्तम गुणों से सम्पन्न तपस्वी तथा सन्यासी मृत्यु के बाद देवयान से जाकर ब्रह्म से सायुज्य प्राप्त कर लेता है।

    कर्त्तव्यपालन तथा यज्ञादि करने वालो गृहस्थ मृत्यु के बाद पितृयान से जाकर चन्द्रमा में पहुँचता है। अपना उत्तम कर्मफल समाप्त होने पर वह पुनः पृथ्वी पर पहले पौधे के रूप में और फिर द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य) के रूप में जन्म लेता है। पापाचरण में रत व्यक्ति मर कर पुनः शूद्र वर्ण में अथवा कुत्ते आदि की योनि में जन्म लेता है, ये सारी धारणाएं इस युग में स्थापित हुईं। मृत्यु के सम्बन्ध में धार्मिक विश्वासों ने इस युग के धर्म को निराशावादी बना दिया तथा संसार को दुःखमय मानकर त्यागने के लिए प्रेरित किया।

    वैदिक युग के आर्यों का धर्म आशावादी तथा आनंदपूर्ण था, उसमें मोक्ष की धारण और चिंता नहीं थी। उत्तर-वैदिक युग के धर्म में स्वर्ग की प्राप्ति का विश्वास था किंतु उपनिषद् युग में धर्म का चरम लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति बन गया। मोक्ष के सम्मुख इहलोक के सुख या आनंद का कोई मूल्य नहीं था। वृहदारण्यक उपनिषद् में यह तथ्य बहुत मार्मिक रूप में समझाया गया है। वानप्रस्थ ग्रहण करते समय याज्ञवल्क्य ऋषि ने अपनी सम्पत्ति अपनी दोनों पत्नियों- कात्यायनी तथा मैत्रेयी में बांट दी।

    मैत्रेयी ने याज्ञवलक्य से पूछा- 'यदि धन सम्पत्ति, गायों से भरी यह पृथ्वी मेरी हो जाए, तो क्या मैं अमर हो जाऊंगी?' याज्ञवलक्य के मना करने पर मेत्रैयी ने कहा- 'जिस धन सम्पत्ति से मैं अमर नहीं होती, उसे लेकर मैं कया करूंगी? इसलिए आप मुझे ज्ञान ही दे दीजिए।' मैत्रेयी के इस सम्भाषण से प्रसन्न होकर याज्ञवलक्य ने उसे आत्मत्तव का ज्ञान दिया।

    उपनिषद् तथा सूत्र युग के धर्म में नैतिकता का स्तर पूर्ववत् ही उच्च था। इस काल में नैतिकता पर सर्वाधिक बल दिया गया। सत्य, तप, श्रद्धा, दृढ़संकल्प, शुचिता, शरीर, वाणी और मन का संयम इन्द्रियों का वशीकरण, पापाचरण से विरति आदि से ही मनुष्य कर्म बंधन से छूटकर मोक्ष पद का अधिकारी बन जाता है। प्रत्येक मनुष्य से उच्च नैतिकता की अपेक्षा करने के कारण इस काल में तीन ऋणों- पितृऋण, देवऋण तथा ऋषिऋण से उऋण होने तथा प्रतिदिन पंच महायज्ञ- ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, अतिथि यज्ञ तथा भूतयज्ञ करने को धार्मिक कार्यों में सम्मिलित किया गया।

    उपनिषद्कालीन ज्ञान और तपस्या पर बल देने वाली धार्मिक विचारधारा के साथ-साथ ब्राह्मण ग्रंथों की यज्ञीय कर्मकाण्ड की धारा भी इस युग में बनी रही। असंख्य पशुबलि तथा अनेक दीर्घकालिक यज्ञों की संख्या नगण्य रह गई किंतु फिर भी अनेक प्रकार के यज्ञ किए जाते रहे। श्रौतसूत्रों तथा गृह्यसूत्रों से इस धार्मिक प्रक्रिया का ज्ञान होता है। इस काल में रचे गए धर्मसूत्रों ने समाज को प्राणवान इकाई के रूप में ग्रहण किया था, व्यक्ति को नहीं।

    समाज का उत्कर्ष एवं अभ्युत्थान ही चरम लक्ष्य था। राजा हो या प्रजा, सभी के कर्त्तव्यों का निर्धारण धर्म के रूप में किया गया था। महत्व कर्त्तव्य का था, अधिकार का नहीं। इन कर्त्तव्यों का सफल पालन ही मनुष्य जीवन का चरम ध्येय था और वह उसी से मोक्ष प्राप्त कर सकता था। कर्त्तव्य और धर्म की इस पृष्ठभूमि में धर्मसूत्रों में शासन तथा राजनीति का विवेचन हुआ है। उपरोक्त विवेचन के आधार पर वैदिक धर्म तथा उपनिषद काल के धर्म में निम्नलिखित अंतर स्पष्ट किए जा सकते हैं-

    1. वेदों का बहुदेववाद, इस युग में एकेश्वरवाद में परिणत हो गया।

    2. धर्म के तात्विक चिंतन ने दर्शन को जन्म दिया।

    3. पुनर्जन्म, मोक्ष और कर्मवाद के सिद्धांत प्रतिपादित हुए।

    4. मृत्यु के पश्चात् कालीन जीवन के लिए स्वर्ग एवं नर्क की अवधारण पुष्ट हुई।

    5. उच्च नैतिक गुणों एवं सत्कर्मों पर बहुत बल दिया गया।

    उपनिषद कालीन धर्म की कठिनाइयाँ

    ऋग्वेद काल में धर्म का स्वरूप सरल एवं सहज स्फूर्त था, ब्राह्मण ग्रंथों के काल में धर्म बाह्याडम्बर तथा कर्मकाण्ड बोझिल हो गया। उपनिषद काल में धर्म के उस आडम्बर-प्रधान कर्मकाण्ड तथा यज्ञों का विरोध करके निर्गुण ब्रह्म, आत्मा, कर्म, मोक्ष आदि का प्रतिपादन किया गया किंतु धर्म का यह रूप भी मनुष्यों को संतुष्ट नहीं कर सका। उपनिषदों का इन्द्रियातीत निर्गुण ब्रह्म इतना अधिक गूढ़ तथा सूक्ष्म था कि स्थूल बुद्धि जनसामान्य के लिए वह अगम्य तथा दुर्बोध था। इसके साथ ही मोक्ष की प्राप्ति के लिए श्रवण, मनन, निदिध्यासन, समाधि आदि जो साधन बताए गए थे, वे स्वयं में इतने कष्टसाध्य थे कि जन-सामान्य द्वारा उनका पालन करना अत्यंत दुष्कर था।

    सांसारिक मोहमाया का त्याग करके परिव्राजक या सन्यासी बनकर ब्रह्मप्राप्ति करना अधिकांश जनता के लिए दुराशा मात्र ही था। इसलिए धर्म के स्वतंत्र चिंतकों ने जीवन के विभिन्न प्रश्नों और धर्म के विभिन्न दृष्टिकोणों पर पुनः विचार किया। जो आश्रम व्यवस्था उपनिषद् काल में सुनिश्चित हो चुकी थी, उसके अंतिम दो चरण वानप्रस्थ तथा सन्यास इस चिंतन के लिए सर्वाधिक उपादेय बने।

    उनके कारण भारत का आध्यात्मिक तथा धार्मिक नेतृत्व ऋषियों एवं ब्राह्मणों के हाथों से निकलकर वानप्रस्थी परिव्राजकों और सन्यासियों के हाथों में चला गया। इस कारण देश में अनेक नवीन धार्मिक मत-मतांतर उत्पन्न होने लगे।

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  • अध्याय - 6 राजकीय संग्रहालय, अजमेर

     02.06.2020
    अध्याय - 6 राजकीय संग्रहालय, अजमेर

    अध्याय - 6 राजकीय संग्रहालय, अजमेर


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राजकीय संग्रहालय अजमेर की स्थापना 
    राजपूताना म्यूजियम के नाम से 19 अक्टूबर 1908 को अजमेर नगर के मध्य ‘मैगजीन’ के नाम से विख्यात प्राचीन दुर्ग में की गई जिसे मुगल काल में अकबर का किला कहा जाता था। यह एक प्राचीन दुर्ग था जिसका अकबर के काल में जीर्णोद्धार एवं विस्तार किया गया। इसी दुर्ग में इंग्लैण्ड के राजा जेम्स (प्रथम) का राजदूत ‘सर टामस रो’ जहांगीर के समक्ष उपस्थित हुआ था तथा उसने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लिए भारत में व्यापार करने की अनुमति प्राप्त की थी। ब्रिटिश काल में इस दुर्ग में अंग्रेजों का शस्त्रागार स्थापित किया गया था, इसलिए इसे मैगजीन कहा जाने लगा। ई.1857 की सैनिक क्रांति के समय अंग्रेज अधिकारियों एवं उनके परिवारों को इसी दुर्ग में शरण दी गई थी।

    ई.1902 में भारत का वायसराय एवं गवर्नर जनरल लार्ड कर्जन अजमेर आया। उसने राजपूताना की विभिन्न रियासतों में प्राचीन स्मारकों तथा विभिन्न स्थलों पर बिखरी हुई कलात्मक पुरावस्तुओं को देखा। कर्जन ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक सर जॉन मार्शल को निर्देश दिए कि वे इस प्रभूत सामग्री को संरक्षित करने के लिए एक संग्रहालय की स्थापना करें। ब्रिटिश पुरातत्वविद् अलैक्जेण्डर कनिंघम, आर्चिबाल्ड कार्लेयल, डी. आर. भण्डारकर, आर. डी. बनर्जी, गौरीशंकर हीराचंद ओझा, यू. सी. भट्टाचार्य आदि पुरातत्वविदों एवं इतिहासविदों ने इस संग्रहालय के लिए पुरातत्व सामग्री, प्राचीन प्रतिमाओं, शिलालेखों, सिक्कों, ताम्रपत्रों, पुस्तकों, चित्रों आदि को एकत्रित करने में विशिष्ट योगदान दिया। ब्रिटिश सरकार द्वारा किए जा रहे इस कार्य में सहयोग देने के लिए देशी रियासतों के अनेक राजा भी आगे आए। फलस्वरूप अजमेर संग्रहालय प्राचीन इतिहास, कला एवं संस्कृति का महत्वपूर्ण संग्रहालय बन गया। ई.1908 में गवर्नर जनरल के एजेन्ट सर इलियट ग्राहम कोल्विन ने संग्रहालय का उद्घाटन किया। इसे अजमेर संग्रहालय एवं राजपूताना संग्रहालय कहा जाता था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इसे राजकीय संग्रहालय कहा जाने लगा।

    इस संग्रहालय में प्राचीन प्रतिमाएं, मृण्मय प्रतिमाएं (टेराकोटा), शिलालेख, सिक्के, ताम्रपत्र, लघुरंग चित्र, उत्खनन से प्राप्त सामग्री राजपूत कालीन वेश-भूषाएं, धातु प्रतिमाएं तथा विभिन्न कलाओं से सम्बन्धित सामग्री संगृहीत की गई। इन पुरावस्तुओं एवं कला सामग्री को विभिन्न दीर्घाओं में बनी पीठिकाओं तथा शो-केस में प्रदर्शित किया गया है। वर्तमान में इस संग्रहालय में 652 प्रस्तर प्रतिमाएँ, 84 शिलालेख, 3,986 सिक्के, 18 धातु सामग्री, 149 लघुचित्र, 75 अस्त्र-शस्त्र, 363 टैराकोटा सामग्री, 128 स्थानीय हस्तकला सामग्री एवं पूर्वैतिहासिक काल की सामग्री संगृहीत है।

    उत्खनन से प्राप्त सामग्री

    संग्रहालय के पुरातत्व विभाग में सिन्धु नदी घाटी सभ्यता के प्रमुख स्थल मोहेनजोदड़ो (अब पाकिस्तान में) से उत्खनन में प्राप्त की गई मिट्टी की चूड़ियां, बरछी, तीर-शीर्ष, अनाज के दाने, चाकू के रूप में प्रयोग होने वाले फ्लिट-फ्लेक, शंख, हथियारों में धार करने के पत्थर, मातृदेवी की प्रतिमाएं, खिलौने, विभिन्न प्रकार की ईंटें, कलश, ढक्कन, खिलौना-गाड़ी के पहिये आदि मुख्य हैं। इसके अतिरिक्त उन मुहरों के नमूने भी रखे गए हैं जो सिन्धु नदी घाटी में पाई गई थीं। जिन वास्तविक वस्तुओं के ये नमूने हैं वे ईसा से 3000 वर्ष पूर्व की हैं। कुछ नमूनों में पशुओं के चित्रों के ऊपर चित्रलिपि की एक पंक्ति भी उत्कीर्ण है।

    प्रतिमा दीर्घा

    संग्रहालय की प्रतिमा दीर्घा में अनेक प्राचीन प्रतिमाओं को प्रदर्शित किया गया है जो अजमेर के अढ़ाई दिन का झोंपड़ा (12वीं शताब्दी ईस्वी की चौहान कालीन संस्कृत पाठशाला एवं मंदिर), पुष्कर, पीसांगन, हर्षनाथ, अर्थूणा, ओसियां, मंडोर, चन्द्रावती, कामां, बयाना आदि स्थानों से प्राप्त की गई हैं। इन प्रतिमाओं में सौन्दर्यभाव की अभिव्यक्ति देखते ही बनती है। इन प्रतिमाओं में भद्रता, सरलता, आध्यात्मिकता तथा जनजीवन का अद्भुत दर्शन देखने को मिलता है। इस संग्रह में गुप्तकाल से लेकर 16वीं शती तक की प्रतिमाएं भी प्रदर्शित हैं। इनमें चतुर्मुखी शिवलिंग, शिव-पार्वती तथा शिव-पार्वती विवाह से सम्बन्धित प्रतिमाएं उल्लेखनीय हैं। दर्शक गुप्त कालीन प्रतिमाओं को थोड़े से ही प्रयास से उनकी मांसलता के आधार पर पहचान सकता है।

    चौहानों के शासन काल में नागौर से लेकर सांभर, सीकर एवं अजमेर आदि स्थानों पर स्थापत्य एवं शिल्पकला के क्षेत्र में चहुंमुखी प्रगति हुई। छठी से 12वीं शताब्दी की अवधि में इस क्षेत्र की कला, समृद्धि के शिखर पर पहुँच गई। अजमेर संग्रहालय की प्रतिमा दीर्घा में मुख्यतः चौहान काल में 10वीं से 12वीं शती के मध्य बने शिल्प एवं स्थापत्य कला के नमूने प्रदर्शित किए गए हैं। मुख्य प्रतिमाओं में लिंगोद्भव महेश्वर, नक्षत्र, वराह स्वामी, लक्ष्मीनारायण, कुबेर तथा सूर्य प्रतिमा चित्ताकर्षक हैं जो पुष्कर, अढा़ई दिन का झोंपड़ा, बघेरा, हर्षनाथ (सीकर) आदि स्थलों से प्राप्त की गई हैं। लिंगोद्भव महेश्वर की सीकर से प्राप्त प्रतिमा लंदन एवं रूस में आयोजित कला प्रदर्शनियों में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी है। कटारा से प्राप्त ब्रह्मा-विष्णु-महेश, अर्थूणा के इन्द्र एवं कुबेर, कुसुमा से प्राप्त शिव-पार्वती, आउवा से प्राप्त बलदेव-रेवती एवं विष्णु की चित्ताकर्षक प्रतिमाएं, इस संग्रहालय की उल्लेखनीय प्रतिमाएँ हैं।

    जैन मूर्ति-दीर्घा में लगभग तीन दर्जन प्रतिमाएं प्रदर्शित हैं जो राजस्थान में जैन धर्म के प्रभाव की गाथा कहती हैं। इन प्रतिमाओं को अजमेर, पुष्कर, किशनगढ़, बघेरा, टांटोटी, लाडनूं, तलवाड़ा, अर्थूणा, कटारा, झालरापाटन, बड़ौदा (डूंगरपुर) एवं बदनोर (उदयपुर) आदि स्थानों से प्राप्त किया गया। ये स्थान जैन धर्म के केन्द्र स्थल रहे हैं तथा अधिकतर प्रतिमाएं 10वीं से 17वीं शती का प्रतिनिधित्व करती हैं। बघेरा से प्राप्त कुंथुनाथ, पार्श्वनाथ तथा आदिनाथ, टांटोटी से प्राप्त शांतिनाथ, किशनगढ़ से प्राप्त सुपार्श्वनाथ, अजमेर से प्राप्त शंातिनाथ, चन्द्रप्रभु एवं जैन प्रतिमा का छत्र, पुष्कर से प्राप्त जैन प्रतिमा का छत्र, कटारा से प्राप्त आदिनाथ, महावीर स्वामी तथा पार्श्वनाथ, अर्थूणा से प्राप्त जैन सरस्वती, बड़ौदा से प्राप्त आदिनाथ एवं वासुपूज्य, लाडनूं से प्राप्त कुंथुनाथ एवं हाथनों (जोधपुर) से प्राप्त गौमुखी-यक्ष इस संग्रहालय की विशिष्ट जैन प्रतिमाएँ हैं।

    शिलालेख

    अजमेर संग्रहालय में दूसरी शताब्दी ईस्वी-पूर्व से लेकर मध्य युग तक के प्राचीन महत्वपूर्ण शिलालेख विद्यमान हैं। इसके साथ ही अभिलेखयुक्त प्रतिमाएं, स्मृतिफलक शिलालेख तथा ताम्रपत्रों का भी अच्छा संग्रह है। ये शिलालेख ब्राह्मी, कुटिल एवं देवनागरी आदि लिपियों तथा संस्कृत, हिन्दी, डिंगल एवं फारसी आदि भाषाओं में उत्कीर्ण हैं। बरली का शिलालेख राजस्थान का प्राचीनतम शिलालेख कहलाता है। इस शिलालेख को अजमेर से 36 किलोमीटर दूर बरली के निकट भिलोत माता मंदिर से प्राप्त किया गया। यह दूसरी शताब्दी ईस्वी-पूर्व का है तथा ब्राह्मी लिपि में है। संभवतः यह किसी जैन मंदिर का शिलालेख है। नगरी का लेख वि.सं. 481 का है। इस लेख में वैश्य सत्यसूर्य और उसके भाइयों द्वारा भगवान नारायण (विष्णु) के चरण पर मंदिर बनवाए जाने का उल्लेख है। यह लेख मेवाड़ के नगरी (मध्यमिका) नामक प्राचीन नगर से मिला है।

    प्रतिहार वंशीय राजा बाउक के मण्डोर लेख (वि.सं. 894) में मंडोर के प्रतिहारों का ब्राह्मण हरिश्चन्द्र के वंश में होना तथा हरिश्चन्द्र से लेकर बाउक तक की वंशावली और उनका कुछ वृत्तान्त दिया है। बयाना के नाना अभिलेख (8वीं शर्ती ईस्वी) में बलिआ के पुत्र तथा उकेश्वर के पौत्र दुर्गादित्य का, गायों को छुड़ाने के प्रयास में चोरों के हाथों मारे जाने का उल्लेख है। वाक्पतिराज के पुष्कर लेख में 10वीं शती ईस्वी में रुद्रादित्य नामक व्यक्ति द्वारा एक विष्णु मंदिर बनाए जाने का उल्लेख है। चामुण्डराज अर्थूणा लेख (वि.सं.1137) बागड़ के परमार राजा चामुण्डराज के समय का है। इसमें उसके एक अधिकारी के तीन पुत्रों आसदेव, मत्यासराज तथा अनंतपाल के नाम दिए गए हैं। अनंतपाल ने एक शिव मंदिर बनवाया था, यह लेख अर्थूणा के उक्त शिवालय से मिला है।

    अजमेर के अढाई दिन का झोंपड़ा परिसर से चौहान राजा विग्रहराज (चतुर्थ) के समय के छः शिलापट्ट मिले हैं जिन पर राजा विग्रहराज द्वारा लिखित संस्कृत भाषा का नाटक हरकेलि उत्कीर्ण है। इस नाटक में शिव-पार्वती की अभ्यर्थना की गई है और उनकी विभिन्न क्रीड़ाओं का वर्णन है। इसके एक खण्ड में नारायण तथा अन्य देवी-देवताओं की स्तुति है। बारहवीं शताब्दी ईस्वी का चौहान नरेश विग्रहराज (चतुर्थ) साहित्य प्रेमी राजा था और साहित्यकारों का आश्रयदाता भी। उसके समय के लोग उसे कविबांधव कहते थे। इतिहास में उसे वीसलदेव नाम से भी सम्बोधित किया गया है। उसने अजमेर में एक संस्कृत विद्यालय एवं सरस्वती मंदिर बनवाया जो मुहम्मद गौरी की सेनाओं द्वारा तोड़ दिए जाने के बाद अढ़ाई दिन का झौंपड़ा के नाम से अवशेष रूप में रह गया है। इस विद्यालय परिसर से 75 पंक्तियों का एक विस्तृत शिलालेख प्राप्त हुआ है जो इस बात की घोषणा करता है कि इस विद्यालय का निर्माण वीसलदेव ने करवाया था। सरस्वती कण्ठाभरण मंदिर परिसर से विग्रहराज द्वारा संस्कृत में लिखित हरकेलि नाटक के छः चौके मिले हैं जो 22 नवम्बर 1153 की तिथि के हैं। राजपूताना संग्रहालय में रखा उसका शिलालेख घोषणा करता है कि चौहान शासक सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं।

    रंगचित्र

    संग्रहालय के चित्रकला विभाग में कोटा, बूंदी, उदयपुर, जोधपुर, किशनगढ़ एवं बीकानेर आदि रियासतों से प्राप्त विभिन्न चित्रशैलियों के नमूने प्रदर्शित किए गए हैं। इनमें कोटा, करौली, टोंक, बीकानेर, जोधपुर, डूंगरपुर, भरतपुर, झालावाड़ तथा जयपुर के प्रमुख शासकों के चित्रों के साथ-साथ मथुराधीशजी, वल्लभ संप्रदाय, श्रीनाथजी, वासुदेव द्वारा कृष्ण को लेकर यमुना पार करने के चित्र, विभिन्न राग-रागिनियों के चित्र, गेरखनाथजी, अष्टछाप कवि, गुंसाईजी, चीर हरण, राम-रावण युद्ध, वल्लभाचार्यजी, विट्ठलनाथजी, भीष्म पितामह आदि के चित्र सम्मिलित हैं।

    अस्त्र-शस्त्र

    संग्रहालय के एक कक्ष में विभिन्न प्रकार के प्राचीन अस्त्र-शस्त्र का प्रदर्शन किया गया है। इनमें विभिन्न प्रकार की तलवारें, ढाल, कटार, फरसा, जागनोल, बंदूक, धनुषबाण तथा अनेक प्रकार के हथियार संगृहीत हैं। साथ ही एक मनुष्याकार राजपूत योद्धा का मॉडल रखा है जो मध्य-कालीन युद्धों के समय पहनी जाने वाली वेशभूषा से सुसज्जित है।

    सिक्के एवं मुद्राएं

    अजमेर संग्रहालय में सोना, चांदी, तांबा, लैड तथा निकल के 3000 से अधिक सिक्के सुरक्षित हैं जिनमें भारतवर्ष के पूर्वेतिहासिक काल के पंचमार्का (आहत) सिक्के सबसे पुराने हैं। नगरी से प्राप्त जनपद के सिक्कों पर वृक्ष, स्वास्तिक, ब्रह्मी लिपि के लेख तथा पट्ट और मेहराब युक्त पहाड़ी के नीचे टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं से बने नदी के चिह्न अंकित हैं। तक्षशिला से प्राप्त इण्डोग्रीक सिक्के के चित्त की ओर राजा का ऊर्ध्व चित्र है तथा पट्ट की ओर यूनानी देवी एवं देवता, ‘जियस’ लिखा हुआ है एवं वृषभ के चित्र बने हैं। कुषाणकालीन सिक्कों में ईरानी वेशभूषा में अंकित राजा दाहिने हाथ से अग्नि वेदी पर आहुति देते हुए अंकित है तथा बायां हाथ कटि पर बंधी तलवार थामे दिखाया गया है। राजा के पृष्ठ भाग पर शिव तथा त्रिशूल का अंकन है। राजा का शिरस्त्राण (टोप) नुकीला है।

    कनिंघम को पुष्कर से पश्चिमी क्षत्रपों महपान, पायदामन, रुद्रदामन तथा रुद्रसिंह की कई मुद्राएं प्राप्त हुई थीं। गुप्तकालीन सिक्कों में चन्द्रगुप्त (प्रथम) के राजा-रानी के सिक्के, समुद्रगुप्त के ध्वजधारी, धनुर्धारी, परशुधारी, वीणाधारी तथा अश्वमेध प्रकार के सिक्के, कांच का दुर्लभ सिक्का तथा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के विभिन्न प्रकार के सिक्के इस संग्रहालय की महत्वपूर्ण निधि हैं। चौहान अजयदेव के सिक्के में एक ओर बैठी हुई देवी का अंकन है तथा दूसरी ओर देवनागरी में अजयदेव लिखा हुआ है। अश्वारोही-वृषभ प्रकार के सिक्के के चित भाग पर ढाल और भाला लिए अश्वारोही तथा पट्ट भाग पर शिव-वाहन नंदी बैठा है। गधिया प्रकार के सिक्कों के चित भाग पर राजा का भद्दा चेहरा है तथा पट्ट भाग पर सिंहासन या अग्निवेदी को बिन्दुओं के माध्यम से बनाया गया है। दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों एवं मुगल बादशाहों के विभिन्न सिक्के भी इस संग्रहालय में संगृहीत हैं।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-43

     19.05.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-43

    प्रकृति और मानव मन के उल्लास की संयुक्त अभिव्यक्ति हैं लोकनृत्य


    लोकनृत्यों के मामले में राजस्थान की धरती समृद्ध है। लोकनृत्य प्रकृति और मानव मन के उल्लास की संयुक्त अभिव्यक्ति हैं। मारवाड़ का डांडिया, मारवाड़ व मेवाड़ का गैर, शेखावाटी का गींदड़, जालोर का ढोल नृत्य, जसनाथी सिद्धों का अग्नि नृत्य, अलवर-भरतपुर क्षेत्र का बम नृत्य, लगभग पूरे प्रदेश में होने वाले घूमर, चंग व डांडिया नृत्य देखते ही बनते हैं। वनवासियों के लोकनृत्यों में भीलों के गवरी व राई नृत्य, गरासियों के वालर, लूर नृत्य, कूद नृत्य, घूमर, मांदल नृत्य, गूजरों का चरी नृत्य, रामदेवजी के भोपों को तेरहताली नृत्य, पेशेवर लोक नर्तकों का भवाई नृत्य, मीणों, कंजरों, सांसियों, कालबेलियों, गाड़िया लुहारों तथा बणजारों के नृत्य रंग-बिरंगी छटा बिखेरते हैं। वनवासियों, कंजरों, जोगियों, सांसियों और कालबेलियों के नृत्यों में शृंगार रस की प्रधानता होती है तथा इनमें खुलापन अधिक होता है। इनके लोकनृत्यों में कामुकता अधिक होती है तथा कामुक संकेतों के साथ-साथ अंग प्रदर्शन पर भी जोर दिया जाता है। प्रमुख लोकनृत्यों का विवरण इस प्रकार है-

    गैर नृत्य : गोल घेरे में इस नृत्य की संरचना होने के कारण यह 'घेर' और कालांतर में 'गैर' कहा जाने लगा। नृत्य करने वालों को 'गैरिया' कहते हैं। यह होली के दूसरे दिन से प्रारंभ होता है तथा 15 दिन तक चलता है। उन दिनों मेवाड़ और मारवाड़ में इस नृत्य की धूम मची रहती है। इस नृत्य को देखने से ऐसा लगता है मानो तलवारों से युद्ध चल रहा हो। इस नृत्य की सारी प्रक्रियाएं और पद संचालन तलवार युद्ध और पटेबाजी जैसी लगती हैं। यह नृत्य वृत्त में होता है और नृत्य करते-करते अलग-अलग मंडल बनाये जाते हैं। यह केवल पुरुषों का नृत्य है। मेवाड़ और बाड़मेर के गैर नृत्य की मूल रचना एक ही प्रकार है किंतु नृत्य की लय, चाल और मण्डल में अंतर होता है। इस नृत्य में जाट, ठाकुर, पटेल, पुरोहित, माली, मेघवाल आदि सभी जातियों के पुरुष भाग लेते हैं। अधिकतर स्थानों पर जातियों के अनुसार गैर टोलियां बनी हुई हैं। नर्तक सफेद धोती, सफेद अंगरखी तथा सिर पर लाल अथवा केसरिया रंग की पगड़ी बांधते हैं। जालोर आदि क्षेत्रों में नर्तक फ्रॉक जैसी आकृति का एक घेरदार लबादा पहनते हैं तथा कमर में तलवार बांधने के लिये पट्टा भी धारण करते हैं। गैर नृत्य तीन प्रकार के होते हैं-

    (1.) आंगे-बांगे की गैर- इसे आंगी की गैर भी कहते हैं। इसमें प्रत्येक नर्तक चालीस मीटर के कपड़े से बनी आंगी व बागा पहनता है। कपड़े का रंग सफेद और लाल होता है। नर्तक दोनों हाथों में रोहिड़े या बबूल की डण्डियां लिये हुए ढोल की थाप पर घूमते हुए अपनी डण्डियां आजू-बाजू के नर्तकों की डण्डियों से टकराते हैं।

    (2.) नागी गैर- इसे सादी गैर भी कहते हैं। यह दो प्रकार की होती है।

    (अ.) डण्डियों वाली गैर- इसमें नर्तक परम्परागत वेशभूषा धारण करते हैं। धोती, कुर्ता पूठिया इसकी विशेष पहचान है। पैरों में आठ-आठ किलो के घुंघरू पहनकर नृत्य करते हैं।

    (ब.) रूमाल वाली गैर- नर्तक हाथों में डण्डियों की जगह रंग-बिरंगे रूमाल रखते हैं तथा ढोल की थाप पर लहराते हुए नृत्य करते हैं।

    (3.) स्वांगी गैर- नर्तक हाथ में डण्डियां लेकर नृत्य करते हैं। प्रत्येक नर्तक अलग वेशभूषा में माली, सेठ, सरदार, साधु, आदि रूप धारण करते हैं।

    गींदड़ नृत्य : यह शेखावाटी का लोकप्रिय नृत्य है। सुजानगढ़, चूरू, रामगढ़, लक्ष्मणगढ़, सीकर और उसके आसपास के क्षेत्रों में होली के दिनों में इस नृत्य के सामूहिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। नगाड़ा इस नृत्य का मुख्य वाद्य होता है। नर्तक अपने हाथों में छोटे डण्डे लिये हुए होते हैं। नगाड़े की ताल के साथ इन डंडों को परस्पर टकराकर नर्तक नाचते हैं। जैसे-जैसे नृत्य गति पकड़ता है, नगाड़े की ध्वनि भी तीव्र होती है। इस नृत्य में विभिन्न प्रकार के स्वांग भी बनाये जाते हैं जिनमें साधु, शिकारी, सेठ-सेठानी, डाकिया, दुल्हा, दुल्हन आदि प्रमुख हैं।

    चंग नृत्य : यह पुरुषों का नृत्य है। इस नृत्य में प्रत्येक पुरुष के साथ चंग (डफ) होता है और वह चंग बजाता हुआ वृत्ताकार में नृत्य करता है। इसमें बांसुरी का प्रयोग भी होता है। इस नृत्य में धमाल तथा होली के गीत गाये जाते हैं। नर्तक गोल घेरे में चंग बजाता हुआ एक लय के साथ आगे बढ़ता है और चंग बजाता हुआ अपने स्थान पर चक्कर खाता है। इस नृत्य में अंग संचालन देखने योग्य होता है। यह मारवाड़ तथा शेखावाटी क्षेत्र का नृत्य है। नर्तक चूड़ीदार पायजामा-कुर्ता धारण करते हैं। कमर में रूमाल तथा पांवों में घुंघरू बांधे जाते हैं।

    डांडिया नृत्य : यह मारवाड़ का लोकप्रिय नृत्य है। यों तो गैर, गींदड़ और डांडिया तीनों ही नृत्य वृत्ताकार हैं और इनमें डण्डी का प्रयोग होता है, तीनों ही नृत्य होली के अवसर पर आयोजित होते हैं और इनमें केवल पुरुष ही भाग लेते हैं किंतु पद संचालन, भाव भंगिमा, ताल, गीत और वेशभूषा आदि में तीनों ही अलग-अलग हैं। इस नृत्य में पुरुषों की टोली हाथ में लंबी छड़ियां लेकर नाचती है। इसमें शहनाई और नगाड़ा बजाया जाता है। नर्तक आपस में डांडिया टकराते हुए नृत्य करते हैं। होली के बाद आरंभ होने वाले इस नृत्य में नर्तक राजा-रानी, राम-सीता, शिव-पार्वती, कृष्ण-राधा आदि का वेश धरकर नृत्य करते हैं।

    ढोल नृत्य : यह जालोर का प्रसिद्ध नृत्य है। यह भी पुरुषों द्वारा ही किया जाता है। इसमें एक साथ चार या पाँच ढोल बजाये जाते हैं। इसमें पहले मुखिया ढोल बजाता है फिर अन्य नर्तक मुँह में तलवार, हाथों में डण्डे तथा रूमाल लेकर नृत्य करते हैं। यह नृत्य प्रायः विवाह के अवसर पर किया जाता है। नृत्य के दौरान ढोल को थाकना शैली में बजाया जाता है। थाकना के बाद अलग शैलियों में भी ढोल वादन होता है। यह नृत्य ढोली, माली, सरगरा तथा भील आदि जातियों में अधिक होता है।

    अग्नि नृत्य : धधकते हुए अंगारों पर किया जाने वाला यह नृत्य जसनाथी संप्रदाय के सिद्ध लोग करते हैं। इसका उद्गम क्षेत्र बीकानेर जिले का कतरियासर ग्राम माना जाता है। यह नृत्य रात्रि में आयोजित होता है। इस नृत्य में नर्तक अंगारों के ढेर में प्रवेश करते हैं और नाचते हुए निकलते हैं। इतना ही नहीं नर्तक अंगारों को हाथ में उठा लेते हैं तथा मुँह में भी डाल लेते हैं। कभी-कभी अंगारों को झोली में भरकर नाना प्रकार के करतब किये जाते हैं। नर्तक अग्नि से इस प्रकार खेलते हैं मानो अंगारों से नहीं फूलों से खेल रहे हों। यह नृत्य भी पुरुषों द्वारा ही किया जाता है।

    बमरसिया नृत्य : यह अलवर और भरतपुर क्षेत्र का नृत्य है। इस नृत्य में एक बड़े नगाड़े का प्रयोग किया जाता है। इसे दो आदमी डंडों की सहायता से बजाते हैं और नर्तक रंग-बिरंगे फूंदों तथा पंखों से बंधी लकड़ी हाथों में लेकर हवा में उछालते हुए नाचते हैं। वाद्ययंत्रों में नगाड़े के अलावा थाली, चिमटा, ढोलक, मंजीरा और खड़तालों का प्रयोग किया जाता है। नृत्य के साथ होली के गीत और रसिया गाया जाता है। बम (नगाड़े) के साथ रसिया गाने से इसे बम रसिया कहते हैं। इस नृत्य को नयी फसल आने की प्रसन्नता में किया जाता है। बम नृत्य के दौरान गिलास के ऊपर थाली रखकर बजायी जाती है।

    घूमर नृत्य : यह समूचे राजस्थान का लोकप्रिय नृत्य है। यह नृत्य मांगलिक अवसरों तथा पर्वों पर आयोजित होता है। यह महिलाओं का नृत्य है। स्त्रियाँ जब आकर्षक पोषाकें विशेषकर घुमावदार घाघरा पहनकर तथा चक्कर लेकर गोल घेरे में नृत्य करती हैं तो उनके लहंगों का घेर और हाथों का लचकदार संचालन देखते ही बनता है। घूमर के साथ अष्टताल कहरवा लगाया जाता है जिसे सवाई कहते हैं। इसे अनेक घूमर गीतों के साथ मंच पर भी प्रस्तुत किया जाता है।

    तेरहताली नृत्य : यह कामड़ जाति का अनोखा नृत्य है। यह नृत्य बैठकर किया जाता है। इसमें स्त्रियां अपने हाथ-पैरों में मंजीरे बांध लेती हैं और फिर दोनों हाथों से डोरी से बंधे मंजीरों को दु्रतगति की ताल और लय से शरीर पर बंधे मंजीरों पर प्रहार करती हुई विविध प्रकार की भाव-भंगिमायें प्रदर्शित करती हैं। यह चंचल और लचकदार नृत्य देखते ही बनता है। पुरुष तंदूरे की तान पर मुख्यतः रामदेवजी के भजन गाते हैं।

    भवाई नृत्य : यह नृत्य अपनी चमत्कारिता के लिये अधिक प्रसिद्ध है। इस नृत्य में विभिन्न शारीरिक करतब दिखाने पर अधिक बल दिया जाता है। यह उदयपुर संभाग में अधिक प्रचलित है। अनूठी नृत्य अदायगी, शारीरिक क्रियाओं के अद्भुत चमत्कार तथा लयकारी विविधता इसकी मुख्य विशेषतायें हैं। तेज लय में सिर पर सात-आठ मटके रखकर नृत्य करना, जमीन से मुँह से रूमाल उठाना, गिलासों पर नाचना, थाली के किनारों पर, तलवार की धार पर, कांच के टुकड़ों पर और नुकीली कीलों पर नृत्य करना इस नृत्य की विशेषतायें हैं।

    घुड़ला नृत्य : यह मुख्यतः मारवाड़ में तथा अल्प मात्रा में सम्पूर्ण राजस्थान में किया जाता है। यह स्त्रियों के द्वारा किया जाने वाला सामूहिक नृत्य है। स्त्रियां छिद्र युक्त मटके सिर पर रखकर उसमें दिये जलाती हैं। नृत्य के दौरान घूमर तथा पणिहारी के अंदाज में गोल चक्कर बनाया जाता है। यह नृत्य गणगौर पर्व के आसपास किया जाता है।

    कच्छी घोड़ी नृत्य : यह शेखावाटी क्षेत्र का नृत्य है किंतु अब सम्पूर्ण प्रदेश में किया जाता है। इस नृत्य में पुरुष ही भाग लेते हैं। नर्तक बांस की टोकरियों को घोड़ी की आकृति देता है तथा उस पर घोड़े की आकृति का कपड़े का खोल चढ़ा दिया जाता है। नर्तक इसके बीच में से घुसकर खड़ा होकर नृत्य करता है। देखने वाले को लगता है कि नर्तक घोड़ी पर बैठा है।

    वालर नृत्य : यह गरासियों का नृत्य है। गणगौर त्यौहार के दिनों में गरासिया स्त्री-पुरुष अर्द्धवृत्ताकार में धीमी गति से बिना किसी वाद्य के नृत्य करते हैं। यह नृत्य डूंगरपुर, उदयपुर, पाली व सिरोही क्षेत्रों में प्रचलित है।

    लांगुरिया नृत्य : लांगुरिया हनुमानजी का लोक स्वरूप है। करौली क्षेत्र की कैला मैया, हनुमानजी की माँ अंजना का अवतार मानी जाती हैं। नवरात्रियों के दिनों में करौली क्षेत्र में लांगुरिया नृत्य होता है। इसमें स्त्री-पुरुष सामूहिक रूप से भाग लेते हैं। नृत्य के दौरान नफीरी तथा नौबत बजती है। लांगुरिया को संबोधित करके हल्के-फुल्के हास्य-व्यंग्य किये जाते हैं।

    इण्डोणी : यह कालबेलियों का युगल नृत्य है जो गोल घेरे में होता है। इसमें पुंगी तथा खंजरी का प्रयोग होता है। नर्तक युगल कामुकता का प्रदर्शन करने वाले कपड़े पहनते हैं।

    मांदल : यह कोटा क्षेत्र का नृत्य है। इसे गरासिया जाति की स्त्रियां गोल घेरा बनाकर करती हैं। इस पर गुजराती गरबे का प्रभाव है। इसमें थाली व बांसुरी का प्रयोग होता है।

    गवरी नृत्य : यह भीलों का सामाजिक एवं धार्मिक नृत्य है। डूंगरपुर-बांसवाड़ा, उदयपुर, भीलवाड़ा एवं सिरोही आदि क्षेत्रों में अधिक प्रचलित है। यह गौरी पूजा से सम्बद्ध होने के कारण गवरी कहलाता है। इसमें नतृक नाट्य कलाकारों की भांति अपनी साज-सज्जा करते हैं।

    डांग नृत्य : यह मेवाड़ के नाथद्वारा क्षेत्र में किया जाने वाला नृत्य है। इसे स्त्री-पुरुष साथ-साथ करते हैं। पुरुषों द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की एवं स्त्रियों द्वारा राधाजी की नकल की जाती है तथा वैसे ही वस्त्र धारण किये जाते हैं। यह होली के अवसर पर किया जाता है। इस नृत्य के समय ढोल, मांदल तथा थाली आदि वाद्यों का प्रयोग किया जाता है।

    पणिहारी नृत्य : यह कालबेलियों का नृत्य है जिसमें स्त्री एवं पुरुष दोनों मिलकर नृत्य करते हैं। इस समय पणिहारी गीत गाये जाते हैं।

    शंकरिया नृत्य : यह भी कालबेलियों का युगल नृत्य है जो प्रेम कथाओं को आधार बनाकर किया जाता है। इस नृत्य का अंग लास्य कामुकता से भरा होता है।

    बागड़िया नृत्य : यह नृत्य कालबेलिया स्त्रियों द्वारा भीख मांगते समय किया जाता है। साथ में चंग बजाया जाता है।

    नेजा नृत्य : यह नृत्य होली के तीसरे दिन भील स्त्री-पुरुषों द्वारा युगल रूप में किया जाता है। पाली, सिरोही, उदयपुर एवं डूंगरपुर आदि जिलों में यह अधिक प्रचलित है।

    युद्ध नृत्य : इस नृत्य में भील जाति के पुरुष हाथ में तलवार लेकर युद्ध कला का प्रदर्शन करते हैं। यह नृत्य उदयपुर, पाली, सिरोही व डूंगरपुर क्षेत्र में अधिक प्रचलित है।


    जातीय, क्षेत्रीय एवं अन्य विशेषताओं के आधार पर नृत्यों का वर्गीकरण

    भीलों के नृत्य : गवरी, राई, गैर, घूमर, नेजा एवं युद्ध नृत्य आदि।

    कालबेलियों के नृत्य : इण्डोणी, शंकरिया, पणिहारी, बागड़िया आदि।

    गरासियों के नृत्य : मांदल, गरबा, घूमर, गैर व लूर आदि।

    गूजर जाति के नृत्य : चरी नृत्य।

    शेखावाटी के नृत्य : गींदड़, चंग, डांडिया, कच्छी घोड़ी आदि।

    मारवाड़ के नृत्य : डांडिया, गैर, घुड़ला, तेरह ताली, घूमर, लूर, अग्नि नृत्य, ढोल नृत्य।

    अलवर-भरतपुर क्षेत्र के नृत्य : बमरसिया।

    गृहस्थों द्वारा किये जाने वाले नृत्य : पणिहारी, मेंहदी, दीपक नृत्य, टूटिया, गौरी।

    होली के नृत्य : चंग, गैर, डांडिया, गींदड़, नेजा, बमरसिया एवं डांग नृत्य आदि।

    व्यावसायिक नृत्य : गवरी, राई, गैर, घूमर, नेजा एवं युद्ध नृत्य आदि।

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  • अध्याय - 13 महाकाव्य काल में भारतीय संस्कृति तथा रामायण एवं महाभारत का प्रभाव

     02.06.2020
    अध्याय - 13 महाकाव्य काल में भारतीय संस्कृति तथा रामायण एवं महाभारत का प्रभाव

    महाकाव्य काल में भारतीय संस्कृति तथा रामायण एवं महाभारत का प्रभाव


    चाहे धनी हो या निर्धन, दुःखी हो या सुखी, निर्दाेष हो या सदोष, मित्र ही मनुष्य का सबसे बड़ा सहारा होता है। - वाल्मीकि रामायण।


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    भारतीय लोक-जीवन में रामायण, महाभारत एवं पुराणों का महत्व सदियों से है। इन ग्रंथों को वेदों के समान आदर दिया जाता है। रामायण भारतीयों का आदि-काव्य है जिसकी रचना महर्षि वाल्मीकि ने संस्कृत में की थी। महाभारत की रचना महर्षि वेदव्यास ने संस्कृत में की थी। रामायण एवं महाभारत के रचनाकालों में सदियों का अंतर है किंतु इनके रचनाकाल को सम्मिलित रूप से महाकाव्य काल कहा जाता है। पुराणों की रचना भी सदियों के अंतराल में होती रही किंतु उनके रचना काल को भी समग्र रूप से पुराण काल कहा जाता है।

    महाकाव्यों के अवतरण की पृष्ठभूमि

    उपनिषदों में वैदिक धर्म के आडम्बर युक्त जटिल कर्मकाण्डों तथा यज्ञों का विरोध किया गया था और निर्गुण ब्रह्म, कर्मवाद, मोक्ष आदि सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया किन्तु उपनिषदों का अगोचर निर्णुण ब्रह्म इतना गूढ़ और सूक्ष्म था कि केवल बुद्धिजीवी वर्ग ही उसे समझ सकता था। सामान्य मनुष्यों के लिए वह अत्यन्त कठिन था। इस कारण उपनिषदों के ज्ञान से जनसाधारण की धार्मिक आकांक्षाएँ पूरी नहीं हो सकीं।

    उपनिषदों ने मोक्ष प्राप्ति के लिए ब्रह्म से साक्षात्कार, मनन निदिध्यासन तथा समाधि आदि नवीन साधन बताए किंतु उनका पालन भी जनसाधारण के लिए सम्भव नहीं था। न उनके लिए घर-बार छोड़़कर परिव्राजक बनना और ब्रह्म की प्राप्ति का प्रयत्न करना सम्भव था। इस कारण जनसाधारण की धार्मिक आकांक्षाओं को पूरा करने की लिए वैदिक धर्म के अंतर्गत कतिपय नवीन धार्मिक मत उत्पन्न हुए जिन्होंने उपनिषदों की मूल विचारधारा को सुरक्षित रखा किंतु उनके बाह्य रूप पर्याप्त भिन्नता लिए हुए थे।

    इनमें से कुछ आस्तिक धर्म थे जो वेद, ईश्वर तथा ब्राह्मणों में आस्था रखते थे किंतु यज्ञादि कर्मकाण्डों के स्थान पर ईश्वर के किसी विशिष्ट रूप शिव, विष्णु, दुर्गा आदि को अपना आराध्य मानते थे तथा अपने आराध्यदेव को प्रसन्न करने के लिए भक्ति को एकमात्र साधन मानते थे। दूसरे नास्तिकवादी धर्म एवं मत थे जो वेदों के प्रामाण्य, ईश्वरवाद तथा ब्राह्मणों के प्रभुत्व को अस्वीकर करते थे तथा उचित आचार-विचार को ही संसार तथा कर्मबंधन से छूटने का उपाय मानते थे।

    आस्तिक एवं नास्तिक विचारधाराओं के अंतर्गत बहुत से मत उत्पन्न हुए जिनमें से अधिकांश अल्पजीवी सिद्ध हुए किंतु चार धर्म जनमानस में गहराई तक अपनी पैठ बनाने में सफल रहे। इनमें से आस्तिक विचारधारा के अंतर्गत वैष्णव धर्म एवं शैव धर्म तथा नास्तिक विचारधारा के अंतर्गत जैन-धर्म एवं बौद्ध धर्म थे। आस्तिक विचारधारा के अंतर्गत वैष्णव धर्म का बीज वेदों में उपलब्ध था। महाकाव्य काल में यह बीज प्रस्फुटित होकर सुंदर पौधे का आकार लेने लगा।

    रामायण में राम को तथा महाभारत में श्रीकृष्ण को युग-पुरुष के रूप में वर्णित किया गया तथा उन्हें विष्णु का अवतार घोषित किया गया। राम तथा कृष्ण के रूप में जनसामान्य के समक्ष भक्त-वत्सल भगवान का विराट रूप सामने आया जो सर्वशक्तिमान, शत्रुहंता, दयालु, भक्तों की पुकार सुनने वाला, दुष्टों का विनाश करने वाला तथा धर्म की स्थापना करने वाला रूप था। इन दोनों ग्रंथों में विविध कथाओं के माध्यम से भगवान के गुणों और विशेषताओं का निरूपण किया गया जिससे जनसामान्य में भगवान के प्रति आस्था का उदय हो सके।


    रामायण का भारतीय संस्कृति पर प्रभाव

    श्रीराम का काल

    पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान राम का जन्म त्रेता युग में हुआ। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार त्रेता युग की कुल अवधि 12,96,000 वर्ष थी। इस युग में भगवान विष्णु के तीन अवतार- वामन, परशुराम एवं श्रीराम हुए। इनमें से राम तीसरे थे जो कि विष्णु के सातवें अवतार थे। इसके बाद द्वापर युग आया जिसकी अवधि 8,64,000 वर्ष रही। द्वापर के बाद ई.पू. 3,102 में कलियुग आरम्भ हुआ। यदि भगवान श्रीराम को त्रेता के अंतिम खण्ड में माना जाए तो उनका जन्म आज से कम से कम 8,69,119 वर्ष पहले हुआ।

    वैज्ञानिक इस तिथि को स्वीकार नहीं करते क्योंकि तब तक धरती पर मानव सभ्यता विकसित नहीं हुई थी। कतिपय वैज्ञानिक शोधों के अनुसार भगवान राम का जन्म ई.पू. 5,114 अर्थात् आज से लगभग 7,133 वर्ष पूर्व हुआ। पश्चिमी वैज्ञानिकों द्वारा रामेश्वरम् और श्रीलंका के बीच स्थित रामसेतु को कार्बन डेटिंग के आधार पर 7000 वर्ष पुराना आकलित किया है।

    रामायण का रचनाकाल

    रामायण तथा महाभारत के वास्तविक रचना काल के बारे में विद्वानों ने अलग-अलग धारणाएं प्रस्तुत की हैं किंतु अधिकांश भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वान रामायण तथा महाभारत की रचना को बुद्ध से भी पहले की मानते हैं। इनमें से भी रामायण की रचना महाभारत की रचना से पहले हुई थी। महाभारत में महर्षि वाल्मीकि का उल्लेख हुआ है।

    रामायण के अयोध्या काण्ड के 109वें सर्ग के चौतीसवें श्लोक में बुद्ध का स्पष्ट उल्लेख इस प्रकार हुआ है- 'यथा हि चोरः तथा हि बुद्धस्तथागतं नास्तिकमत्र विद्धि।' अर्थात् 'बुद्ध यानी जो नास्तिक है और नाम मात्र का बुद्धिजीवी है, वह चोर के समान दंड का अधिकारी है।' निश्चित रूप से यह श्लोक रामायण में बहुत बाद में जोड़ा गया है किंतु इस उक्ति के आधार पर कुछ विद्वान मानते हैं कि रामायण की रचना, बुद्ध के आविर्भाव के पश्चात् हुई।

    मैकडॉनल ने रामायण के मूल रूप को ई.पू. 500 की रचना स्वीकार किया है। विख्यात पाश्चात्य विद्वान वेबर ने रामायण में उल्लिखित 'यवन' शब्द के आधार पर रामायण को यवन आक्रमण के बाद की अर्थात् ई.पू. चौथी शताब्दी की रचना माना है। अर्थात् इन दोनों के अनुसार रामायण की रचना बुद्ध के बाद हुई। विन्टरनित्स के अनुसार इस ग्रन्थ की मूल रचना ई.पू. चौथी शताब्दी में हुई तथा इसका अन्तिम स्वरूप दूसरी शताब्दी ईस्वी के लगभग निश्चित हुआ था।

    बौद्ध साहित्य के कई प्रारम्भिक ग्रंथों पर रामायण का प्रभाव देखा जा सकता है। दशरथ जातक पर यह प्रभाव सर्वाधिक दिखाई देता है तथा इस जातक में श्रवण कुमार की कथा का भी उल्लेख है। प्रसिद्ध विद्वान सिलवा लेवी के अनुसार सद्धर्मस्मृति उपाख्यान निश्चित रूप से वाल्मीकि का ऋणी है क्यांेकि इस ग्रन्थ में जम्बू द्वीप का वर्णन काफी अंशों में रामायण के वर्णन से मेल खाता है। सद्धर्मस्मृति उपाख्यान में नदियों, समुद्रों, देशों एवं द्वीपों को उन्हीं नामों से सम्बोधित किया गया है जिन नामों से उनका उल्लेख वाल्मीकि रामायण में हो चुका है।

    रामायण के अयोध्या काण्ड में मिथिला एवं विशाला नामक दो भिन्न नगरों का उल्लेख है जब कि बुद्ध के समय तक दोनों नगर वैशाली के रूप में एक हो गए थे। अतः इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि रामायण, बुद्ध पूर्व की रचना है। रामायण की रचना महाभारत से पहले हुई। महाभारत में न केवल महर्षि वाल्मीकि एवं रामायण का उल्लेख हुआ है अपितु राम से सम्बन्धित स्थानों को तीर्थ के रूप में स्वीकार किया गया है। रामायण में वर्णित भारतीय भौगोलिक सीमाएं महाभारत कालीन भारत की अपेक्षा काफी न्यून हैं। इसके विपरीत रामायण में कहीं भी महाभारत एवं उसके किसी पात्र का उल्लेख नहीं हुआ है।

    अतः रामायण महाभारत के पूर्व की रचना है। महर्षि पाणिनी का काल ई.पू. पांचवीं शताब्दी सिद्ध हो चुका है। रामायण में यत्र-तत्र अपाणिनीय प्रयोग मिलते हैं जिनसे सिद्ध होता है कि रामायण की रचना पाणिनी के आविर्भाव से पूर्व हुई।

    डा. याकोबी ने रामायण की भाषा के आधार पर इसे ई.पू. 800 से ई.पू. 600 के बीच की रचना माना है। याकोबी के अनुसार रामायण के प्रथम एवं सप्तम काण्ड प्रक्षिप्त हैं। उनमें आए हुए बुद्ध एवं यवनों के उल्लेख मूल रामायण के नहीं हैं। रामायण के वे भाग जिनमें राम, पुरुषोत्तम के रूप में निरूपित हैं, निश्चित ही बुद्ध से पहले लिखे गए।

    महर्षि वाल्मीकि का परिचय

    महर्षि वाल्मीकि 'रामायण' के रचियता थे। इस ग्रंथ का प्रधान लक्ष्य मानव के चरित्र का उच्चतम आदर्श प्रस्तुत करना था। महर्षि वाल्मीकि आर्य संस्कृति के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं। वाल्मीकि के सम्बन्ध में महाभारत एवं पुराणों में कथाएं मिलती हैं। इन ग्रंथों में वाल्मीकि को 'भार्गव' अर्थात् भृगुवंश में उत्पन्न बताया गया है। महाभारत के 'रामोपाख्यान' के रचयिता को भी भार्गव कहा गया है।

    एक आख्यान के अनुसार वाल्मीकि जन्म से ब्राह्मण थे किन्तु किरातों के साथ रहने से वे 'रत्नाकर' नामक डाकू बन गए। एक बार उन्होंने देवर्षि नारद आदि सप्त-ऋषियों को लूटने के लिए उनका मार्ग रोका। उन ऋषियों ने वाल्मीकि से कहा कि जिन कुटुम्बियों के लिए तुम नित्य पाप-संचय करते हो, उनसे जाकर पूछो कि वे तुम्हारे इस पाप के सहभागी बनने के लिए तैयार हैं या नहीं!

    इस पर वाल्मीकि ने नारद आदि सप्तऋषियों को वृक्ष से बांध दिया और अपने घर जाकर वही प्रश्न पूछा। वाल्मीकि के परिजनों ने उत्तर दिया कि परिवार का भरण-पोषण करना तुम्हारा कर्त्तव्य है और परिवार तुम्हारे पाप का भागीदार नहीं है। यह उत्तर सुनकर वाल्मीकि के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया। नारद ने उन्हें राम-राम जपने का उपदेश दिया किंतु वाल्मीकि राम-राम नहीं बोल सके और 'मरा-मरा' जपने लगे। इस प्रकार 'मरा-मरा' स्वतः ही 'राम-राम' हो गया। कई वर्षों तक निश्चल रहकर तपस्या करने से दीमकों ने उनके शरीर पर अपना घर अर्थात् 'वाल्मीक' बना लिया।

    उनकी घनघोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उन्हें दर्शन दिए और उन्हें 'वाल्मीक' से बाहर निकलने का निर्देश देते हुए कहा कि वाल्मीक में तपस्या करने के कारण तुम्हारा दूसरा जन्म हुआ है। आज से तुम वाल्मीकि नाम से जाने जाओगे। कुछ पुराणों के अनुसार इससे पूर्व उनका नाम 'च्यवन' था किंतु स्कन्द पुराण में ऋषि बनने से पूर्व इनका नाम 'अग्निशर्मन' दिया गया हैै। ऋषि बन जाने के बाद वाल्मीकि ने आध्यात्मिक जीवन आरम्भ किया। बहुत से लोग उनके शिष्य बन गए।

    ऋषि भरद्वाज भी उनके शिष्य थे। एक बार वे भरद्वाज के साथ नदी में स्नान करके लौट रहे थे, तब मार्ग में उन्होंने एक व्याध को, अपने बाण से मैथुनासक्त क्रौंच पक्षियों का शिकार करते हुए देखा। उनमें से एक पक्षी मर गया और उसका साथी करुण क्रंदन करने लगा। वाल्मीकि का हृदय करुणा से द्रवित हो उठा और उनके मुख से एक छन्द फूट पड़ा-


    मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमरू शास्वती समा।

    यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्।।

    अर्थात- हे निषाद! तुझे कभी भी शांति न मिले, क्योंकि तूने इस क्रौंच के जोड़े में से एक की, जो काम से मोहित हो रहा था, बिना किसी अपराध के ही हत्या कर डाली।

    मुख से अकस्मात निकले हुए शब्दों को एक श्लोक का रूप प्राप्त होते देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ किन्तु क्रोध में निषाद को इतना बड़ा शाप देने का उन्हें दुःख भी हुआ। तभी परमपिता ब्रह्मा प्रकट हुए और कहा- 'पछताने का कोई कारण नहीं है। यह श्लोक तुम्हारी कीर्ति का कारण बनेगा। इसी छन्द में तुम राम के चरित्र की रचना करो।' ब्रह्माजी के आदेशानुसार वाल्मीकि ने चौबीस हजार श्लोकों से युक्त 'रामायण' नामक महाकाव्य का सृजन किया।

    वाल्मीकि रामायण में आए एक उल्लेख के अनुसार एक बार तप एवं स्वाध्याय में मग्न एवं भाषण-कुशल नारद से वाल्मीकि ने प्रश्न किया कि इस संसार में ऐसा कौन महापुरुष है जो आचार-विचार एवं पराक्रम में आदर्श माना जा सकता है? नारद ने उन्हें रामकथा का सार सुनाया, वाल्मीकि ने उसी कथा को श्लोकबद्ध करके रामायण की रचना की। इस वृत्तान्त से प्रतीत होता है कि उस काल में श्रीराम के जीवन से सम्बन्धित कुछ कथाएं प्रचलित थीं, वाल्मीकि ने उन्हीं को आधार बनारक छन्देबद्ध महाकाव्य की रचना की।

    रामायण में आए एक उल्लेख के अनुसार श्रीराम द्वारा अपनी पत्नी सीता का त्याग करने पर महर्षि वाल्मीकि ने ही गर्भवती सीता को अपने आश्रम में आश्रय दिया। वाल्मीकि के आश्रम में सीता के दो जुडवां पुत्र हुए। महर्षि ने ही उन बालकों के नाम 'कुश' एवं 'लव' रखे। सीता के दोनों पुत्र वाल्मीकि के आश्रम में पलकर बड़े हुए। वाल्मीकि ने ही लव और कुश के बड़े होने पर उन्हें स्वयं के द्वारा रचित रामायण का सस्वर पाठ करना सिखाया।

    लव और कुश स्थान-स्थान पर जाकर रामायण का गायन करने लगे। जिस समय श्रीराम अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे, तब कुश एवं लव ने यज्ञ के घोड़े को पकड़ लिया और वे अयोध्या पहुँचे। वहाँ भी उन्होंने रामायण का गायन किया। उनके गायन से श्रीराम मन्त्रमुग्ध हो गए और राम को ज्ञात हुआ कि ये ऋषिकुमार नहीं अपितु श्रीमराम और सीता के पुत्र हैं। श्रीराम ने सीता को अपने पास बुलवा लिया। वाल्मीकि स्वयं सीता के साथ राम-सभा में उपस्थित हुए और उन्होंने सीता के सतीत्व की साक्षी दी।

    उन्होंने अपने सहस्र वर्षों के तप एवं सत्यप्रतिज्ञा को साक्षी बनाकर श्रीराम से सीता को स्वीकार करने की प्रार्थना की। वाल्मीकि के कहने पर ही देवी सीता ने पतिव्रत धर्म की शपथ लेकर भूमि में प्रवेश किया। महर्षि वाल्मीकि के सम्बन्ध में केवल यही वृत्तान्त प्राप्त होता है।

    रामायण का वर्तमान रूप

    रामायण के वर्तमान स्वरूप में बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, लंकाकाण्ड एवं उत्तरकाण्ड नामक सात अध्याय हैं तथा 24,000 श्लोक हैं। विद्वानों की मान्यता है कि मूल रामायण में अयोध्याकाण्ड से लेकर लंकाकाण्ड तक केवल पांच काण्ड ही थे, बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड बाद में जोड़े गए। बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड की रचना-शैली अन्य अध्यायों से भिन्न है तथा इन अध्यायों के बहुत से कथन अन्य पांच अध्यायों से मेल भी नहीं खाते।

    वाल्मीकि ने पांच अध्यायों वाले मूल रामायण ग्रन्थ में राम को उनके युग का महान् पुरुष माना है और उसी रूप में उनका चरित्र चित्रण किया है किन्तु बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड में राम को विष्णु के अवतार के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। इससे स्पष्ट है कि ये दोनों काण्ड बाद के युग के हैं। पाठ की दृष्टि से वाल्मीकि रामायण के चार प्रामाणिक संस्करण उलपब्ध है- उदिच्य पाठ, दक्षिणात्य पाठ, गौड़ीय पाठ और पश्चिमोत्तरीय पाठ। वर्तमान में तीन लेखकों की अत्यंत प्रसिद्ध रामायण उपलब्ध हैं- वाल्मीकि रामायण, वेदव्यास कृत अध्यात्म रामायण और तुलसीदास कृत रामचरित मानस।

    इन तीनों की मूल कथा समान है किंतु कवियों ने तत्कालीन सामाजिक एवं धार्मिक धारणाएं अपने-अपने ढंग से वर्णित की हैं। इस कारण तीनों ग्रंथों के पात्रों के चरित्र-चित्रण में परिवर्तन हो गया है। महर्षि वाल्मीकि के राम एक महापुरुष हैं जिनमें मानवीय दृढ़ताएं एवं दुर्बलताएं हैं किन्तु वेदव्यास एवं तुलसीदास के राम घट-घटवासी एवं सर्वशक्तिमान विष्णु के अवतार हैं। वे पतित-पावन एवं मोक्षदायक हैं।

    रामायण की कथा

    रामायण की कथा संक्षेप में इस प्रकार से है- अयोध्या के ईक्ष्वाकुवंशी राजा दशरथ की तीन रानियां- कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी थीं। उनके चार पुत्र- राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न हुए। राम का विवाह विदेह के राजा जनक की पुत्री सीता के साथ हुआ। वृद्धावस्था में दशरथ, अपने ज्येष्ठ पुत्र राम को राज्य देकर संसार से निवृत्त होना चाहते थे किंतु रानी कैकेयी ने राजा दशरथ से दो वर मांगे- अपने पुत्र भरत के लिए अयोध्या का राज्य और कौशल्या-पुत्र राम को चौदह वर्ष का बनवास। राम ने अपनी पत्नी सीता और छोटे भाई लक्ष्मण के साथ वन-गमन किया और चित्रकूट में रहने लगे।

    राजा दशरथ की, पुत्र-वियोग में मृत्यु हो गयी। कैकेयी के पुत्र भरत ने राज्य पर बड़े भाई राम का अधिकार माना और वे राम-लक्ष्मण एवं सीता को वापस लाने के लिए वन गए। राम अपने पिता के वचनों का पालन करने के लिए चौदह वर्ष वन में व्यतीत करने के निश्चय पर अडिग रहे। तब राजकुमार भरत श्रीराम की चरण-पादुकाएं लेकर अयोध्या लौट गए। राम, लक्ष्मण और सीता, चित्रकूट छोड़कर गोदावरी नदी के तट पर चले गए तथा वहाँ पंचवटी नामक स्थान पर पर्णकुटी बनाकर रहने लगे।

    लंका का राजा रावण, राम और लक्ष्मण की अनुपस्थिति में सीता का अपहरण करके लंका ले गया। राम ने किष्किन्धा के राजा सुग्रीव, उनके सेनानायक हनुमान एवं उनकी सेना की सहायता से रावण पर आक्रमण किया तथा उसे पराजित करके सीता को वापस प्राप्त किया। इस कार्य में रावण के छोटे भाई विभीषण ने राम की सहायता की। राम, लक्ष्मण और सीता चौदह वर्ष की अवधि पूर्ण होने पर अयोध्या लौट आए जहाँ राम का राज्याभिषेक किया गया।

    रावण के यहाँ रहने के कारण कुछ अयोध्यावासी, देवी सीता की पवित्रता पर संदेह करते हुए राजा रामचंद्र की आलोचना करने लगे। अतः राम ने गर्भवती सीता का त्याग कर दिया। देवी सीता महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में रहने लगीं जहाँ उन्होंने कुश एवं लव नामक जुड़वां पुत्रों को जन्म दिया। वाल्मीकि ने उन्हें स्वयं द्वारा रचित रामायण सुनाई तथा उन्हें रामायण के गायन का निर्देश दिया। जब राम ने अश्वमेध यज्ञ किया तब कुश और लव ने यज्ञ का घोड़ा पकड़ लिया तथा वे अयोध्या पहुँचे।

    कुश और लव ने राम के समक्ष रामायण का गायन किया। राम को ज्ञात हुआ कि वे देवी सीता एवं श्रीराम के ही पुत्र हैं तो राम ने सीता को अयोध्या बुलवाया। वाल्मीकि सीता को लेकर अयोध्या पहुँचे, जहाँ वाल्मीकि के कहने पर देवी सीता ने पतिव्रत धर्म की शपथ ली तथा भूमि में प्रवेश किया।

    आर्य-संस्कृति का प्रतिनिधि ग्रन्थ

    रामायण प्राचीन आर्यों की उच्च आदर्श युक्त संस्कृति की संवाहक है। रामकथा के माध्यम से वाल्मीकि ने आर्यों के संघर्षमय जीवन, त्याग, वचन पालन एवं सामाजिक मर्यादा-पालन के लिए प्राण तक त्यागने की परम्पराओं का वर्णन किया है। आर्यों के साथ-साथ इस ग्रन्थ में वानर संस्कृति एवं राक्षस संस्कृति की परम्पराओं का भी वर्णन किया गया है। वानर एवं राक्षस दोनों ही अनार्य संस्कृतियां थीं किंतु इन दोनों में बहुत अंतर था।

    वानर जाति आर्यों की मित्र थी जबकि राक्षस जाति आर्यों की शत्रु थी। वाल्मीकि ने आर्य संस्कृति के प्रतिनिधि के रूप में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को, वानर संस्कृति के प्रतीकों के रूप में सुग्रीव, बाली एवं हनुमान को तथा राक्षस संस्कृति के प्रतिनिधि के रूप में रावण को प्रस्तुत किया गया है। राम उच्च सामाजिक मर्यादाओं के पालन के पक्षधर हैं तथा निजी स्वार्थों की अपेक्षा परिवार एवं समाज में नैतिकता, सत्य, न्याय और त्याग का आदर्श प्रस्तुत करना चाहते हैं किंतु राक्षस-राज रावण अनीति, अन्याय एवं अत्याचार के माध्यम से विजय प्राप्त करना चाहता है।

    उसके लिए पारिवारिक सम्बन्ध, सामाजिक मर्यादाएं एवं नैतिकता कुछ भी मूल्य नहीं रखती है। राम-रावण का युद्ध वस्तुतः आर्य और अनार्य संस्कृतियों के संघर्ष की गाथा है जिसमें सत्य की असत्य पर, न्याय की अन्याय पर तथा नैतिकता की अनैतिकता पर विजय होती है। रामायण मंे आर्य पारिवारिक जीवन के उच्चतम आदर्शों का निरूपण हुआ है। राम अपने सम्पूर्ण जीवन में स्वयं को आदर्श पुत्र, आदर्श भ्राता, आदर्श पति, आदर्श मित्र एवं आदर्श राजा के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनका जीवन-चरिर्त्र आज भी भारतीय संस्कृति का आदर्श माना जाता है। राम, आर्य जीवन के उच्च आदर्श के प्रतीक हैं।

    वे आदर्श पुत्र होने के कारण, पिता की आज्ञा शिरोधार्य करके, चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करते हैं, आदर्श भाई होने के कारण वे सहर्ष अपने भाई भरत को राज्य देना स्वीकार करते हैं। राजकुमार भरत भी आदर्श भाई का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं तथा ज्येष्ठ भाई राम के होते हुए राजपद स्वीकार नहीं करते। देवी सीता आदर्श पत्नी का कर्त्तव्य निभाती हैं और राजमहलों का सुख त्यागकर अपने पति राम के साथ वन-गमन करती हैं। लक्ष्मण भी भ्रातृत्व भावना का उच्च आदर्श प्रस्तुत करते हैं।

    वे अपने पिता का राज्य, अपना परिवार और महलों के सुख छोड़कर वनवासी भाई के साथ वन के कष्टों को सहर्ष स्वीकार करते हैं। आदर्श राजा होने के कारण ही राम ने प्रजा द्वारा की जा रही आलोचना को स्वीकार किया और अपनी प्राणप्रिय सीता का त्याग किया किन्तु आदर्श पति होने के कारण उन्होंने किसी अन्य स्त्री से विवाह नहीं किया और एक-पत्नीव्रत का पालन किया जो उस युग में असाधारण बात थी। देवी सीता का चरित्र भारतीय नारीत्व का साक्षात् प्रतीक है।

    भारतीय स्त्रियों के दैनिक जीवन में सीता की पवित्रता और पतिव्रत धर्म आज भी आदर्श का प्रतिमान है। पतिव्रत एवं पत्नीव्रत का जैसा सुन्दर आदर्श राम-सीता के दाम्पत्य जीवन से मिलता है, वह अन्यत्र मिलना दुष्कर है। दशरथ ने पिता का, भरत और लक्ष्मण ने भाई का, कौशल्या और सुमित्रा ने माता का, सुग्रीव ने मित्र का तथा हनुमान ने सेवक का जो आदर्श प्रस्तुत किया है, वह आज भी भारतीयों के लिए प्रेरणा स्रोत है। रामायणकार वाल्मीकि ने यथार्थ जीवन के सम्बन्ध में दृष्टि प्रस्तुत की है न कि काल्पनिक आदर्श के सम्बन्ध में।

    वालमीकि ने राम के एक पत्नीव्रत की असाधारणता को कहीं गौरव प्रदान नहीं किया। जबकि वाल्मीकि रामायण के एक प्रसंग के अनुसार राजा दशरथ की तीन सौ पचास रानियां बताई गई हैं। स्वयं दशरथ के पुत्र इस बात का उपालम्भ देते हैं कि राजा दशरथ काम-पाश में बंधे हुए कैकयी के वशवर्ती थे। राम का अपनी पत्नी सीता के प्रति अनुराग कम नहीं था। वे शरद् ऋतु में स्वयं को अकेला जानकर लक्ष्मण से कहते हैं' 'सीता को न देखकर शोक से अभितप्त शरद् के चार मास मुझे सौ वर्षों जैसे जान पड़ते हैं। मैं प्रिया के बिना दुःखी हूँ।'

    सीता का अपहरण हो जाने के बाद विलाप करते हुए क्रुद्ध राम लक्ष्मण से कहते हैं- 'यदि सीता मुझे सकुशल वापिस नहीं मिली तो मैं तीनों लोकों को नष्ट कर दूँगा। तुम इस समय मेरे पराक्रम से जगत् को आकुल और मर्यादाहीन हुआ देखोगे।' सीता के लिए राम का जगत् को नष्ट करने का संकल्प अपनी पत्नी के प्रति समर्पण भाव को व्यक्त करता है।

    एक स्थान पर राम पुनः लक्ष्मण से कहते हैं- 'लोगों की ऐसी धारणा है कि समय बीतने से शोक दूर हो जाता है किन्तु प्राणप्रिय सीता को न देखकर मेरा शोक तो उत्तरोत्तर बढ़ रहा है। मुझे इस बात का दुःख नहीं कि सीता दूर है और उसका हरण कर लिया गया है, मुझे दुःख इस बात का है कि उसका यौवन बीता जा रहा है।'

    इससे स्पष्ट है कि वाल्मीकि द्वारा प्रस्तुत भारतीय संस्कृति काल्पनिक एवं खोखले आदर्शवाद पर नहीं अपितु जीवन के कटु यथार्थ को भी पूरी तरह समझती है। वाल्मीकि ने अपने महाकाव्य के नायक राम को महापुरुष ही रहने दिया, उन्हें अवतार घोषित नहीं किया जबकि सोलहवीं सदी के कवि तुलसीदास ने राम को विष्णु का अवतार बनाकर शील, सौन्दर्य एवं शक्ति का चरम रूप प्रस्तुत किया। वाल्मीकि के राम आर्य-संस्कृति के पूर्णतम प्रतिनिधि हैं। हजारों साल तक आर्य जाति राम के आदर्शों पर चलती रही। आज भी भारतीय समाज का सबसे बड़ा आदर्श राम ही हैं।

    रामायण में धर्म एवं नैतिकता

    रामायण का प्रधान लक्ष्य मनुष्य के चरित्र का वह आदर्श प्रस्तुत करना है जिससे मनुष्य देवत्व पर पहुँचता है। रामायण के अनुसार चरित्र ही धर्म है और चरित्रवान राम धर्म के मूर्तरूप हैं। यह चरित्र सत्यनिष्ठा, वचन पालन एवं शौर्य पर आधारित है। इस धर्म की कुँजी मन का संयम, इन्द्रियों पर अधिकार और कर्त्तव्यपालन की तत्परता है। परिवार एवं समाज के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करना, लोक-जीवन की मर्यादा की रक्षा करना और समाज की व्यवस्था को बनाए रखने में योगदान करना इसका महान् आचार है। यही वह धर्म-बन्धन है जो जीवन को उचित मार्ग पर ले जाता है।

    इस धर्म-बन्धन में बंधा हुआ मनुष्य स्वार्थ से परमार्थ को श्रेष्ठ समझते हुए लोक-कल्याण की साधना में लगा रहता है। इसीलिए राम विमाता कैकेयी के कहने मात्र से राज्य पर अपने नैसर्गिक अधिकार को त्याग देते हैं। वाल्मीकि के राम युद्ध-भीरू नहीं हैं। वे प्रजाजनों को आश्वस्त करते हुए कहते हैं- 'मैं अकेला ही सारी पृथ्वी को अपने बाणों से नष्ट करके अपना अभिषेक करा सकता हूँ किंतु मैं अधर्म से डरता हूँ, क्योंकि मैं धर्म के बन्धन से बंधा हुआ हूँ।' अतः राम का संकल्प है कि वह लोभ, मोह, अज्ञान या किसी भी तामसी प्रवृत्ति से सत्य के सेतु को नहीं तोड़ेंगे।

    जीवन का अमूल्य कोष धर्म और सत्य है जिसके खो जाने से मनुष्य सर्वथा दरिद्र हो जाता है किन्तु इस कोष की वृद्धि से वह देवता बन जाता है। वाल्मीकि के राम ने किसी काल्पनिक मोक्ष के लिए धर्म का मार्ग अपनाने की बजाए मर्यादा पुरुषोत्तम बनकर सन्तुलित समाज, व्यवस्थित राष्ट्र, मर्यादित आचार और संयत व्यवहार की आधारशिला पर धर्म का सुदृढ़ प्रसाद खड़ा किया है। मनुष्य मानवीय-दुर्बलताओं से ग्रस्त होता है किंतु वाल्मीकि ने राम के जिन गुणों का उल्लेख किया है वे गुण एक साधारण व्यक्ति में नहीं हो सकते।

    राम में पिता के प्रति आज्ञाकारिता, छोटे भाइयों भरत एवं लक्ष्मण के प्रति वात्सल्य, गुरुओं के प्रति आदर, पत्नी के प्रति अनुराग, सुग्रीव एवं विभीषण के प्रति मित्रता, राज्य तथा ऐश्वर्य के प्रति अनासक्ति, रावण जैसे दुष्ट के विरुद्ध प्रति पराक्रम आदि गुण बताए हैं। वाल्मीकि ने राम के भीतर सहृदयता, कोमलता, अनुकम्पा, शास्त्रज्ञान, सौम्यता तथा जितेन्द्रिय आदि गुणों को भी दर्शाया है। राम अपने जीवन में प्रत्येक स्थल पर आदर्शों की प्रतिष्ठा करते हुए दिखाई देते हैं।

    राम ने प्रजा और परिवारजनों के आग्रह को अस्वीकार करके अपने पिता के वचनों को सत्य सिद्ध करने के लिए वन-गमन स्वीकार किया। उनके इस आचरण में बड़प्पन दिखाने का भाव नहीं है अपितु नैतिकता की भव्यता है। राम भली-भांति जानते थे कि राजा का आचरण, प्रजा के लिए अनुकरणीय हो जाता है इसलिए राजा को जीवन के हर क्षण में प्रजाजन के समक्ष उच्च-आदर्श रखना चाहिए। जब जबालि ने राम से यह कहा कि माता, पिता, भाई आदि कोई किसी का नहीं होता, अतः राम को चाहिए कि वह लौटकर अयोध्या चला जाए और राज्य का भोग करे।

    तब राम ने उत्तर दिया- 'ऐसा करके मैं यथेष्टचारी कहलाऊँगा और प्रजा-जन भी मेरा ही अनुसरण करेंगे, क्योंकि प्रजा, राजा का अनुसरण करती है। देवताओं एवं ऋषियों ने सत्य को मान्यता दी है, सत्यवादी इस लोक और परलोक दोनों में शाश्वत कल्याण को प्राप्त होता है।' इस प्रकार वाल्मीकि ने राम के माध्यम से धर्म एवं नैतिकता के मानदण्डों की स्थापना की है।

    आदर्श स्त्री के रूप में सीता

    जिस प्रकार वाल्मीकि के राम, भारतीय पुरुषों के आदर्श हैं उसी प्रकार देवी सीता, भारतीय नारियों की आदर्श हैं। वह पति-परायण, कर्त्तव्यनिष्ठ तथा विकट परिस्थितियों में भी पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली नारी हैं। जब राम को वन-गमन का आदेश होता है, तब जनक जैसे बड़े राजा की पुत्री और दशरथ जैसे बड़े राजा की पुत्रवधू होते हुए भी वे चौदह वर्ष की दीर्घ अवधि का वनवास स्वीकार करती हैं क्योंकि भारतीय नारी का आदर्श हर स्थिति में अपने पति का साथ निभाना है।

    वनवास में सीता अपने देवर लक्ष्मण को पुत्रवत् स्नेह देती हैं। जब रावण पंचवटी से सीता का अपहरण करके लंका ले जाता है और उन्हें नाना प्रकार के भय दिखाकर अपनी पत्नी बनने को कहता है, तब भी सीता रावण को अपने पति के बल का परिचय देकर अपने सतीत्व की रक्षा करती हैं। जब राम-रावण युद्ध में राम विजयी होते हैं तब सीता अपने सतीत्व को सिद्ध करने के लिए अग्नि परीक्षा देने को सहर्ष तत्पर हो जाती हैं।

    एक साधारण धोबी के कहने पर जब राम, सीता का त्याग कर देते हैं, तब भी वह अपने पति के प्रति किसी प्रकार का दुर्भाव मन में न लाकर वाल्मीकि आश्रम में जीवन व्यतीत करती हैं और अपने पुत्रों- कुश एवं लव का समुचित पालन-पोषण करके मातृत्व के कर्त्तव्य का निर्वाह करती हैं। अन्त में अपने पति की मर्यादा की रक्षा करने के लिए, ताकि भविष्य में भी कोई व्यक्ति उनके पति पर अंगुली न उठा सके, सीता भूमि में प्रवेश करती हैं। इस प्रकार सीता का आचरण और उनका पातिव्रत्य आज भी भारतीय नारियों के लिए सबसे बड़ा आदर्श है।

    रामायण का साहित्यिक महत्त्व

    रामायण संस्कृत भाषा का ही नहीं अपितु विश्व की किसी भी भाषा का पहला महाकाव्य है। साहित्यिक दृष्टि से रामायण एक अनुपम ग्रंथ है। भाव, भाषा और कथा तीनों ही स्तर पर रामायण एक विलक्षण ग्रंथ है। इसमें संस्कृत भाषा के क्लिष्टमत और सरलतम छन्दों एवं अलंकारों का प्रयोग किया गया है। पूरे ग्रंथ में अलंकारों का चमत्कारपूर्ण-विन्यास तथा रसों का पूर्ण परिपाक मिलता है। रामायण की कथा में शृंगार, वीर, शान्त, रौद्र, वात्सल्य, प्रेम, करुणा, वीभत्स, भक्ति आदि समस्त रसों का यथास्थान प्रयोग किया गया है। पाठक की रुचि एवं उत्सुकता को बनाए रखने के लिए शृंगार, वीर तथा करुणा रसों के माध्यम से कथा को अत्यंत रोचक एवं ग्राह्य बनाया गया है।

    अयोध्याकाण्ड में राम को वनवास का आदेश देते समय पिता दशरथ की मनोदशा, माता कौशल्या एवं सुमित्रा का भाव-विह्वल होकर मातृ-प्रेम का प्रदर्शन, सीता का पातिव्रत्य धर्म, लंका मंे सीता की मनोदशा, दुःख के क्षणों में भी राम का सौम्य चरित्र आदि विभिन्न भावों का मनोवैज्ञानिक ढंग से अत्यन्त सुन्दर चित्रण किया गया है। साहित्यिक-सौन्दर्य की अनुभूति इस महाकाव्य की प्रमुख विशेषता है। ग्रंथ में प्राकृतिक सौन्दर्य के वर्णन के साथ-साथ नारी-सौन्दर्य का अनुपम वर्णन किया गया है।

    चित्रकूट, गंगा नदी, पम्पासरोवर, पंचवटी वन, दण्डक वन के मनोरम दृश्य तथा शरद् एवं वर्षा ऋतु के मनोहारी वर्णन के साथ ही बाली की पत्नी तारा के अनुपम सौन्दर्य का भी सुंदर वर्णन किया गया है। नारी-सौन्दर्य के अन्तर्गत वाल्मीकि ने लंका-काण्ड में हनुमान द्वारा लंका में सीता को खोजते समय जिन अनेक सुन्दर स्त्रियों को देखा उन स्त्रियों के अंग-प्रत्यंगों तथा चेष्टाओं का भी आकर्षक वर्णन किया गया है।

    सुन्दर-काण्ड में जब हनुमान लंका में पहुँच कर रावण के अन्तःपुर में प्रवेश करते हैं, तब महल की नारियों के सौन्दर्य का अनुपम वर्णन करते हुए वाल्मीकि ने लिखा है- 'रति के परिश्रम से खिन्न रावण की सूक्ष्म कटि वाली स्त्रियां जहाँ-तहाँ खाली स्थानों में सो रही थीं। कोई सुन्दर वर्ण की नृत्य-कुशल नारी अपने लिटाए अंगों में नृत्य के विभ्रमों को प्रकट कर रही थी, कोई सर्वांग-सुन्दरी पटह नामक वाद्य यन्त्र को वैसे ही आलिंगित किए हुए थी जैसे कोई अपने प्रियतम का आलिंगन करती है। इसी प्रकार कोई कमल-लोचना वीणा का आलिंगन किए हुए थी। रावण की पत्नी मन्दोदरी मुक्ता-मणियों से युक्त आभूषणों से अलंकृत थी और अपनी शोभा से स्वयं भवन को सुन्दर बना रही थी। उसका गोरा बदन स्वर्ण की आभा की भांति प्रकाशवान था।'

    रामायण में मानव की अन्तः-प्रकृति और मनोवृत्तियों का बड़ा स्वाभाविक चित्रण हुआ है। इन समस्त दृष्टियों से रामायण काव्य-कला का सुन्दर उदाहरण है। संस्कृत साहित्य एवं भारत की विभिन्न साहित्यिक कृतियों पर इसका प्रभाव है। संस्कृत के महाकवि कालीदास एवं भवभूति तथा लोकभाषा के कवि गोस्वामी तुलसीदास की कृतियां वाल्मीकि की रामायण से सर्वाधिक प्रभावित हुई हैं। निःसन्देह रामायण संस्कृत भाषा एवं भारतीय संस्कृति का ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व एवं साहित्यिक जगत् का अनूठा ग्रंथ है।

    रामायण का ऐतिहासिक महत्त्व

    ऐतिहासिक तथ्यों की उपलब्धता की दृष्टि से भी रामायण का अत्यधिक महत्त्व है। डॉ. याकोबी के अनुसार, विषय-वर्णन की दृष्टि से वाल्मीकि रामायण दो भागों में विभाजित की जा सकती है- (1.) बालकाण्ड और अयोध्याकाण्ड में वर्णित अयोध्या की घटनाएं जिनका केन्द्र बिन्दु इक्ष्वाकुवंशी राजा दशरथ हैं, (2.) दण्डकारण्य एवं रावण-वध से सम्बन्धित घटनाएं जिनका केन्द्र बिन्दु रावण है।

    इनमें से अयोध्या की घटनाएं ऐतिहासिक हैं, जिनका सम्बन्ध निर्वासित इक्ष्वाकुवंशीय राजकुमार से है। रावण-वध से सम्बन्धित घटनाओं का मूल उद्गम वेदों में वर्णित देवताओं की कथाओं में देखा जा सकता है। अतः डॉ. याकोबी के अनुसार, रामकथा से सम्बन्धित इन सारे आख्यान काव्यों की रचना इक्ष्वाकु वंश के सूतों ने सर्वप्रथम की, जिनमें रावण और हनुमान से सम्बन्धित प्रचलित आख्यानों को मिलाकर वाल्मीकि ने रामायण की रचना की। रामायण में वर्णित रामकथा, आर्यों द्वारा की गई दक्षिण विजय का प्रथम वर्णन है।

    दक्षिण भारत के प्राचीनतम शिलालेखों में उत्तरी भारत के इक्ष्वाकुवंशीय राजा रामचन्द्र का उल्लेख है। इससे प्रतीत होता है कि राम के दक्षिण प्रवेश के पश्चात् दक्षिण भारत मंे आर्यों की सभ्यता और संस्कृति का प्रभाव फैला। इसमें कोई सन्देह नहीं कि महर्षि वाल्मीकि ने अपनी अद्भुत प्रतिभा द्वारा विविध सूत्रांे को समेट कर एक उत्कृष्ट मौलिक काव्य की सृष्टि की।


    महाभारत का भारतीय संस्कृति पर प्रभाव

    महाभारत युद्ध का काल

    नृवंश विज्ञानी, जीव विज्ञानी, पुरातत्व विज्ञानी तथा भौतिक विज्ञानी मानते हैं कि धरती पर वर्तमान मानव अर्थात् होमो सेपियन सेपियन की शुरुआत आज से लगभग 1 लाख 20 हजार साल पहले हुई एवं उसकी उन्नत पीढ़ी 'क्रोमैगनन मैन' की शुरुआत आज से लगभग 40 हजार साल पहले हुई। पश्चिम एशिया से मिले प्रमाणों के अनुसार आज से लगभग 10,000 साल पहले आदमी ने कृषि और पशु पालन करना आरंभ किया। भारत में भी खेती आरम्भ होने का काल यही माना जाता है।

    अतः महाभारत का युद्ध इस काल के बाद का ही है। क्योंकि महाभारत के युद्ध का समय मनुष्य के कृषि आरम्भ करने से काफी बाद का है। भारत में आदमी द्वारा हाथों से मिट्टी के बर्तन बनाने के प्राचीनतम अवशेष आज से लगभग 6600 वर्ष पुराने मिले हैं। अतः माना जा सकता है कि महाभारत का युद्ध इस तिथि के बाद ही हुआ क्योंकि महाभारत काल में मिट्टी के बर्तन बनाने की कला काफी विकसित हो चुकी थी।

    हस्तिनापुर से हुई खुदाई में पेंटेड ग्रे रंग के मिट्टी के बर्तन तथा ताम्बे के तीर, तलवारें आदि मिले हैं। इनकी अवधि ई.पू. 3138 से लेकर ई.पू. 3000 अर्थात् आज से लगभग 5156 वर्ष से लेकर 5018 वर्ष पुरानी है। कुरुक्षेत्र में हुई खुदाई से प्राप्त ताम्बे के शस्त्रों की अवधि भी यही है। सी. वी. वैद्य एवं करन्दीकर के अनुसार महाभारत के युद्ध का काल ई.पू. 3102 है। ताकेश्वर भट्टाचार्य ने इसका काल ई.पू. 1432 माना है।

    अन्य साहित्यिक, पौराणिक स्रोतों के आधार पर भी भारत में मान्यता है कि महभारत का युद्ध ईस्वी पूर्व 3102 में अर्थात् आज से लगभग 5120 वर्ष पूर्व हुआ।

    महाभारत ग्रंथ का रचना काल

    महाभारत की रचना का मूल समय ई.पू.चौथी शताब्दी माना जाता है। इसका वर्तमान स्वरूप चौथी शताब्दी ईस्वी (गुप्तकाल) में सामने आया। मूल महाभारत में चौबीस हजार श्लोक थे जिससे इसे 'चतुर्विंशति साहस्री संहिता' अथवा 'साहस्री संहिता' कहा जाता था। बाद में इसके श्लोकों की संख्या बढ़कर एक लाख हो गई जिसके कारण इसे 'शतसाहस्री संहिता' कहा गया।

    पाणिनि के अष्टाध्यायी में वेदव्यास या महाभारत का उल्लेख नहीं मिलता, किंतु पतंजलि के व्याकरण-महाभाष्य में महाभारत की कथा का उल्लेख अनेक बार हुआ है। इससे प्रतीत होता है कि महाभारत का निर्माण पाणिनि के बाद में एवं पतंजलि से पहले हुआ होगा। रामायण में दिए गए भौगोलिक विवरण, महाभारत से प्राचीनतर हैं। महाभारत में महर्षि वाल्मीकि तथा रामायण दोनों का उल्लेख है।

    महाभारत में संक्षिप्त रामकथा भी दी गई है जिसे अलग से 'अध्यात्म रामायण' कहा जाता है। महाभारत का एक हिस्सा 'हरिवंश पुराण' कहलाता है। इसमें भी रामायण के नाट्य प्रदर्शन का विवरण है। इनसे स्पष्ट है कि महाभारत की रचना, रामायण की रचना के बाद हुई। भाषा की दृष्टि से महाभारत की भाषा कई स्थानों पर 'ब्राह्मणों' और 'उपनिषदों' की भाषा से साम्य रखती है। इससे प्रतीत होता है कि महाभारत के कुछ अंश उत्तर-वैदिक युग के बाद के है।

    महाभारत के अनेक स्थलों पर यूनानी, शक,पह्लव आदि विदेशी जातियों का उल्लेख है। ये जातियाँ ई.पू. पहली और दूसरी शताब्दी में भारत में आयीं। मेक्डॉनल्ड ने इसे ई.पू. 500 और डॉ. राधाकुमुद मुकर्जी ने इसे ई.पू. 200 की रचना माना है। आर.जी. भण्डारकर का मत है कि ई.पू. 500 तक महाभारत एक प्रसिद्ध धार्मिक ग्रन्थ बन चुका था। हैप्किन्स का मत है कि महाभारत ग्रंथ को वर्तमान स्वरूप में आने के लिए पांच चरणों से गुजरना पड़ा-

    (1.) भारतवंश के गान, जो ई.पू.400 तक बन चुके थे, (मौर्यकाल से पूर्व)

    (2.) पाण्डवों का वीरकाव्य जो ई.पू.400 और ई.पू.200 के बीच में लिखा गया, (मौर्यकाल)

    (3.) श्रीकृष्ण को भगवान मानने वाले भागवत धर्म का ग्रन्थ जिसकी रचना ई.पू.200 से ई.200 के मध्य हुई, (शुंगकाल)

    (4.) कुछ बाद के पर्व और आरम्भिक पर्व की प्रस्तावनाएं जो ई.200 से ई.400 के बीच किसी समय जोड़ी गई (गुप्तकाल)

    (5.) बाद के प्रक्षेप और सम्पूर्ण ग्रन्थ का सम्पादन जो ई.400 के बाद हुआ। (गुप्तकाल)

    ई.442 का एक गुप्तकालीन अभिलेख प्राप्त हुआ है जिसमें एक लाख श्लोक वाले महाभारत का उल्लेख है। अतः इस समय तक महाभारत का वर्तमान रूप निश्चित रूप से तैयार हो चुका था।

    उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि महाभारत की मूल रचना र्ई.पू. चार सौ के आसपास अर्थात् मौर्यकाल में हुई तथा इसका वर्तमान स्वरूप चौथी शताब्दी ईस्वी अर्थात् गुप्तकाल में सामने आया।

    वेदव्यास का परिचय

    ताम्रयुगीन भारतीय सभ्यता में हुए एक युद्ध की कथा के माध्यम से प्राचीन आर्य संस्कृति के वैभव को समग्र रूप से प्रस्तुत करने वाले 'महाभारत' नामक महाकाव्य के रचियता वेद व्यास हैं। उन्हें वैदिक संहिताओं को लिपिबद्ध करने, वैदिक शाखाओं का प्रवर्तन करने, ब्रह्मसूत्रों का प्रणयन करने, महाभारत ग्रन्थ की रचना करने तथा वैदिक संस्कृति को पुनर्जीवित करने वाला तत्त्वज्ञानी माना जाता है।

    वेदव्यास को सर्वज्ञ, सत्यवादी, सांख्य, योग, धर्म आदि शास्त्रों का ज्ञाता एवं दिव्य दृष्टि वाला महापुरुष माना जाता है। उन्हें भगवान कहकर उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व की महानता का ज्ञान कराया जाता है। वेदव्यास का मूल नाम कृष्ण द्वैपायन था। उनके पिता महर्षि पाराशर थे। महाभारत के आदि पर्व में आए उल्लेख के अनुसार एक बार महर्षि पाराशर तीर्थयात्रा करते हुए यमुना नदी के किनारे पहुँचे। उस समय धीवरों के राजा दाशराज की कन्या सत्यवती नाव खे रही थी। महर्षि पाराशर उस नाव में बैठे। नाव में महर्षि, सत्यवती के सौन्दर्य पर मोहित हो गए और उन्होंने सत्यवती के समक्ष रति-इच्छा प्रकट की।

    सत्यवती धीवर की कन्या थी इसलिए उसकी देह से सदैव मछली की दुर्गन्ध निकला करती थी, उसे मत्स्यगंधा भी कहते थे। सत्यवती ने महर्षि पाराशर से कहा कि नदी के दोनों तरफ महर्षिगण स्नान कर रहे हैं, इसलिए यह कैसे सम्भव है! तब पाराशर ने अपनी तपस्या के प्रभाव से चारों ओर कोहरा पैदा कर दिया। उस कोहरे में पाराशर ने रति-इच्छा पूरी की, फिर सत्यवती को वरदान दिया कि पुत्र को जन्म देने के बाद वह फिर से कन्या बन जोयगी और उसके शरीर से दुर्गन्ध की बजाए सुगन्ध आया करेगी।

    महर्षि पाराशर के वरदान से सत्यवती की कोख से यमुना के एक द्वीप पर एक पुत्र पैदा हुआ। घने अन्धकार मंे वीर्याधान करने के कारण यह पुत्र एकदम कृष्ण-वर्ण का उत्पन्न हुआ, इसलिए उसका नाम कृष्ण पड़ा और चूँकि वह यमुना के एक द्वीप पर उत्पन्न हुआ इसलिए द्वैपायन कहलाया। पुत्र को जन्म देने के बाद सत्यवती पुनः कन्या बन गई और उसकी देह से सुगंध निकलने लगी जो एक योजन अर्थात् आठ मील दूर से भी अनुभव की जा सकती थी। इस कारण सत्यवती का नाम योजनगंधा भी पड़ गया।

    इसी सत्यवती का विवाह कुरुवंशी राजा शान्तनु से हुआ था जिनसे चित्रांगद एवं विचित्रवीर्य नामक पुत्र उत्पन्न हुए और उसी से कुरुवंश आगे बढ़ा। सामविधान ब्राह्मण ग्रन्थ के अनुसार वेदव्यास विष्वक्सेन नामक आचार्य के शिष्य थे। पौराणिक साहित्य में उन्हें भगवान का अवतार कहा गया है। वैशाख पूर्णिमा को उनकी जयन्ती मनाई जाती है। आषाढ़ पूर्णिमा को उन्हीं के नाम पर 'व्यास पूर्णिमा' कहा जाता है। पुराणों के अनुसार कृष्ण द्वैपायन ने चतुष्पाद वैदिक ग्रन्थ (संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद) का विभाजन कर उसकी तीन स्वतन्त्र संहिताएं (ऋग्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद) बनायीं, इस कारण इन्हें वेद-व्यास कहा गया। घृताची नामक अप्सरा से इन्हें शुकदेव नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। घृताची को अरणी भी कहा जाता है।

    कुरुवंशी राजा विचित्रवीर्य के रुग्ण होने के कारण वेदव्यास ने माता सत्यवती के निर्देश से विचित्रवीर्य की रानियों अम्बिका एवं अम्बालिका तथा एक दासी से नियोग किया जिससे क्रमशः धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर नामक नियोगज पुत्र उत्पन्न हुए। शांतनु, विचित्रवीर्य, धृतराष्ट्र, पाण्डु, अभिमन्यु, परीक्षित, जनमेजय तथा शतानीक नामक आठ पीढ़ी के कुरूवंशी राजा वेदव्यास के समकालीन थे। प्राचीन साहित्य में वेदव्यास को चिरंजीव कहा गया है।

    वेदव्यास ने अत्यन्त कठोर तपस्या करके बहुत सी सिद्धियां प्राप्त कीं। वे दूर-श्रवण, दूर-दर्शन आदि अनेक विद्याओं में प्रवीण थे। द्रौपदी स्वयंवर तथा इन्द्रप्रस्थ के राजा युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में महर्षि वेदव्यास स्वयं उपस्थित थे। पाण्डवों के वनवासकाल में वे पाण्डवों को धीरज बंधाते रहते थे। महाभारत-युद्ध के समय वेदव्यास ने संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की ताकि संजय धृतराष्ट्र को युद्ध का वर्णन सुना सके। पाण्डवों की विजय के बाद वेदव्यास ने युधिष्ठिर को राजधर्म और राजदण्ड का उपदेश दिया।

    महाभारत की रचना प्रक्रिया एवं वर्तमान स्वरूप

    महाभारत की रचना मूलतः वेदव्यास ने की। शतपथ ब्राह्मण, तैत्तिरीय आरण्यक एवं छान्दोग्य उपनिषद् में 'इतिहास पुराण' का उल्लेख मिलता है किन्तु इन ग्रन्थों में उल्लिखित 'इतिहास पुराण' स्वतन्त्र ग्रन्थ न हेाकर, आख्यान एवं उपाख्यान के रूप में ब्राह्मण ग्रन्थों में सम्मिलित किए गए थे। ये आख्यान अत्यन्त छोटे होते थे। इस कारण उनका विभाजन 'पर्व' एवं 'उपपर्व' आदि में नहीं किया जाता था। वेदव्यास ने ब्राह्मण ग्रन्थों में निर्दिष्ट 'इतिहास पुराण' के आख्यानों को पर्व एवं उपपर्व आदि से युक्त साहित्य में ढाल दिया।

    इस प्रकार उनकी कृति एक नवीन साहित्यिक ग्रंथ बन गई। वर्तमान समय में महाभारत मंे 18 पर्व और एक लाख श्लोक हैं। आकार की विशालता तथा विषय-वस्तु की विविधता के कारण यह विश्व का सबसे बड़ा ग्रन्थ और सबसे बड़ा महाकाव्य है किंतु वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत इतना बड़ा नहीं था। महाभारत ग्रन्थ के विकास के सम्बन्ध में तीन अवस्थाओं का उल्लेख मिलता है। वेदव्यास ने वैशम्पायन आदि अपने पांच शिष्यों को महाभारत सिखाया।

    वैशम्पायन ने सर्पसत्र के समय जनमेजय के सामने महाभारत की कथा सुनाई। वैशम्पायन का यह आख्यान प्रश्नोत्तर के रूप में है। इस प्रकार वेदव्यास के मूल महाभारत में वैशम्पायन द्वारा परिवर्द्धन हुआ। इसके बाद शौनक ऋषि ने द्वादशवर्षीय यज्ञ के अन्त में नैमिषारण्य में महाभारत की कथा सुनाई। वेदव्यास ने महाभारत को 'जय' नाम दिया। जब वैशम्पायन ने जनमेजय को इसकी कथा सुनाई तब इसके 24,000 श्लोक थे और इसका नाम 'भारत' पड़ गया। शौनक ऋषि ने इस कथा मंे परिवर्द्धन करके इसका नाम 'महाभारत' कर दिया।

    आश्वलायन गृह्यसूत्र के समय महाभारत नाम प्रचलित था। इस समय तक इसके श्लोकों की संख्या एक लाख हो गयी जिसके कारण इसे 'शतसाहस्री संहिता' कहा गया। वर्तमान समय में अध्यात्म रामायण, भगवद्गीता, विष्णु सहस्रनाम तथा हरिवंश पुराण महाभारत के भीतर समाहित हैं। महाभारत में प्राचीन भारत की राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक स्थितियों की जानकारी मिलती है। यह ग्रंथ धर्म, अर्थ, नीति, दर्शन, तत्त्वज्ञान एवं मोक्ष आदि सिद्धांतों का ज्ञान कराने वाले अपूर्व ग्रन्थ है।

    महाभारत की कथा-वस्तु

    हस्तिनापुर के कुरुवंशी राजा शान्तनु के बड़े पुत्र का नाम देवव्रत था। जब शान्तनु ने धीवर-कन्या सत्यवती से विवाह किया तब सत्यवती द्वारा शर्त रखे जाने पर कि मेरी कोख से जन्मा पुत्र ही हस्तिनापुर का राजा होगा, देवव्रत ने आजीवन ब्रह्मचारी होने की शपथ ली ताकि देवव्रत या उसके वंशज कभी राज्य पर दावा नहीं करें। इस भीषण प्रतिज्ञा के कारण देवव्रत को भीष्म कहा जाता था। राजा शांतनु को रानी सत्यवती से चित्रांगद एवं विचित्रवीर्य नामक पुत्र हुए। इनमें से चित्रांगद राजा बना किंतु उसकी शीघ्र ही मृत्यु हो गई तो छोटा पुत्र विचित्रवीर्य राज्य का अधिकारी हुआ।

    विचित्रवीर्य संतान उत्पन्न करने में अक्षम थे इसलिए माता सत्यवती के आदेश पर वेदव्यास ने विचित्रवीर्य की दो रानियों अम्बा एवं अम्बिका से तथा उसकी एक दासी से नियोग किया जिससे क्रमशः धृतराष्ट्र, पाण्डु एवं विदुर नामक तीन पुत्र हुए। इनमें से बड़े पुत्र धृतराष्ट्र जन्म से नेत्रहीन थे और पाण्डु जन्म से ही पाण्डु-रोग (पीलिया) से ग्रस्त थे। विदुर दासी-पुत्र थे। बड़े पुत्र धृतराष्ट्र के नेत्रहीन होने के कारण छोटे पुत्र पाण्डु को हस्तिनापुर का राजा बनाया गया। धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी, गांधार देश की राजकुमारी थी। उसे एक सौ पुत्र हुए जो कौरव कहलाते थे। महाराज पाण्डु की दो रानियां थीं- कुंती एवं माद्री।

    एक बार महाराज पाण्डु ने शिकार खेलते हुए भ्रमवश एक ऋषि को मार डाला। ऋषि ने महाराज पाण्डु को भयानक शाप दे दिया। महाराज पाण्डु शाप-मुक्त होने के उद्देश्य से तपस्या करने के लिए अपनी दोनों रानियों के साथ वन को चले गए। महाराज पाण्डु के लौट आने तक के लिए धृतराष्ट्र को हस्तिनापुर का राजा बनाया गया। बनवास काल में कुन्ती ने युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन को तथा माद्री ने नकुल एवं सहदेव को जन्म दिया।

    पाण्डु पुत्र होने के कारण ये पांचों राजकुमार पाण्डव कहलाए। वनवास काल में ही महाराज पाण्डु की मृत्यु हो गई और छोटी रानी माद्री सती हो गई। महारानी कुंती, स्वर्गीय महाराज पाण्डु के पांचों राजकुमारों को लेकर हस्तिनापुर लौट आई। गुरु द्रोणाचार्य ने एक सौ कौरव राजकुमारों एवं पांच पाण्डव राजकुमारों को शिक्षा दी। हस्तिनापुर का भावी राजा कौन होगा, इस प्रश्न पर कौरव एवं पाण्डव एक दूसरे के शत्रु हो गए।

    तीसरे पाण्डव अर्जुन ने एक स्वयंवर को जीतकर पांचाल देश की राजकुमारी द्रोपदी से विवाह किया किन्तु माता कुन्ती द्वारा अनजाने में कहे गए एक कथन के कारण शेष चारों पाण्डवों का भी द्रोपदी से विवाह कर दिया गया। भीष्म पितामह की मध्यस्थता में पाण्डवों ने अपने पिता के राज्य का कुछ भाग प्राप्त कर इन्द्रप्रस्थ को अपनी राजधानी बनाया।

    पाण्डवों ने दिग्विजय का आयोजन करके अपने राज्य को काफी विस्तृत कर लिया और ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिर चक्रवर्ती सम्राट हो गया। उसने राजसूय यज्ञ का आयोजन किया जिसमें देश भर के राजा उपस्थित हुए। ज्येष्ठ कौरव दुर्योधन पाण्डवों का इतना उत्थान सहन नहीं कर सका। उसने पाण्डवों का सर्वनाश करने के उद्देश्य से उन्हें द्यूत-क्रीड़ा के लिए आमंत्रित किया। उस काल में द्यूतक्रीड़ा के निमंत्रण को युद्ध के निमत्रण की तरह समझा जाता था तथा कोई भी क्षत्रिय इसे अस्वीकार नहीं कर सकता था।

    दुर्योधन तथा उसके मामा शकुनि की धूर्तता के कारण राजा युधिष्ठिर जुए में अपना राज्य तथा अपनी महारानी द्रोपदी को खो बैठे। श्रीकृष्ण के धिक्कारने पर धृतराष्ट्र ने द्रोपदी पुनः पाण्डवों को लौटा दी तथा पांचों पाण्डवों को अपनी पत्नी द्रोपदी सहित तेरह वर्षों के लिए वनवास में जाना पड़ा जिनमें से तेरहवां वर्ष अज्ञातवास के रूप में व्यतीत करना था। पकड़े जाने पर दुबारा वनवास जाने की शर्त थी। पांचों पाण्डव बारह वर्ष वनवास में तथा तेरहवां वर्ष विराट नगर के राजा के यहाँ अज्ञातवास में बिताकर हस्तिनापुर लौटे और अपना राज्य मांगा किंतु दुर्योधन ने सुईं की नोक जितनी भूमि भी पाण्डवों को देने से मना कर दिया।

    पाण्डवों के ममेरे भाई एवं यदु-वंशी राजा श्रीकृष्ण, कौरवों और पाण्डवों में मेल कराने के लिए हस्तिनापुर गए किंतु दुर्योधन ने उनकी बात भी नहीं मानी। इस पर दोनों पक्षों में युद्ध हुआ। श्रीकृष्ण ने पाण्डवों का पक्ष ग्रहण किया। जब दोनों सेनाएं युद्धक्षेत्र में पहुँचीं तो अर्जुन ने यह कहकर युद्ध करने में संकोच दिखाया कि मैं भूमि के लिए अपने बांधवों को नहीं मारना चाहता। इस पर श्रीकृष्ण ने उसे कर्म करने का उपदेश दिया और अर्जुन को अपना विराट स्वरूप दिखाया। श्रीकृष्ण के उपदेश से अर्जुन पुनः युद्ध के लिए तैयार हुआ और कुरूक्षेत्र के मैदान में कौरवों और पाण्डवों के बीच 18 दिन तक तक भीषण युद्ध हुआ।

    चूंकि इस युद्ध में समस्त बड़े भारत वंशी राजाओं ने युद्ध किया था इसलिए इसे महाभारत का युद्ध कहा जाता है। युद्ध में दोनों पक्षों को भयानक क्षति पहुँची किंतु अन्त में पाण्डव विजयी रहे। समस्त कौरव भाई अपनी सेनाओं एवं परिजनों सहित मृत्यु को प्राप्त हुए। युद्ध में विजय के उपलक्ष्य में पाण्डवों ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया और छत्तीस वर्ष तक राज्य करने के बाद अर्जुन के पौत्र परीक्षित को राज्य सौंपकर द्रोपदी सहित तपस्या करने हिमाचल में चले गए और वहीं उन्होंने देहत्याग किया।

    महाभारत के दो प्रमुख संस्करण उपलब्ध होते हैं- उत्तरी तथा दक्षिणी। इनेक कथावृत्तांत में कुछ अन्तर है। महाभारत के प्रकाशित तथा पूर्ण संस्करणों में कलकत्ता, बम्बई तथा कुम्भकोणम् के संस्करण महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं। यद्यपि अब भण्डारकर ओरियण्टल रिसर्च इन्स्टीट्यूट, पूना द्वारा प्रकाशित महाभारत का संस्करण ही सर्वाधिक प्रामाणिक माना जाता है तथापि गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित महाभारत के संस्करण को भारत में अत्यधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई है।

    महाभारत में वर्णित धार्मिक परिस्थितियाँ

    यद्यपि महाभारत की कथा कौरवों और पाण्डवों के बीच हुए युद्ध से सम्बन्धित है तथापि इसमें अनेक आख्यानों, उपाख्यानों एवं धर्म-दर्शन की चर्चाओं के माध्यम से विशाल ताना-बाना बुना गया है। मूल कथा के साथ-साथ अनेक प्राचीन कथाओं को भी स्थान दिया गया है। नीति सम्बन्धी प्रवचानों का अविरल प्रवाह पूरी कथा के साथ-साथ चलता है। इस ग्रंथ में आर्यों के प्राचीन धर्म के विविध रूप एवं पक्ष दर्शाए गए हैं।

    वैदिक यज्ञों एवं विविध अनुष्ठानों का विशद वर्णन किया गया है जिनसे तत्कालीन संस्कृति के दर्शन सहज ही हो जाते हैं। विष्णु के दशावतारों की कथाएं एवं रामकथा उपाख्यानों के रूप में प्राप्त होती हैं। भगवान शिव, दुर्गा, राम एवं कृष्ण की पूजा बार-बार बताई गई है। पाण्डवों का भगवान शिव, हनुमान एवं स्वर्ग के विभिन्न देवी-देवताओं का पाण्डवों के साथ सम्पर्क एवं सम्बन्ध बताया गया है। इस ग्रंथ में भारत की बहुत सी नदियों, पर्वतों, वनों एवं वृक्षों आदि का उल्लेख हुआ है तथा उनकी पूजा होती हुई दिखाई गई है।

    लोक के अंतर्गत प्रचलित भूत, प्रेत, पिशाच, विद्याधर, नाग, यक्ष, गन्धर्व एवं किन्नर आदि का भी वर्णन किया गया है और कई स्थानों पर बलि प्रथा का उल्लेख हुआ है। सम्पूर्ण ग्रंथ में ऋषि-आश्रमों, राजप्रासादों और ब्रह्मणों के घरों में वैदिक यज्ञों का उल्लेख किया गया है जिनमें सूर्य, इन्द्र और अग्नि आदि देवताओं का आह्वान होता हुआ दिखाया जा रहा है। सामान्य गृहस्थों को ब्रह्मा, विष्णु, शिव और दुर्गा आदि की पूजा करते हुए दिखाया गया है।

    महाभारत में यज्ञों और पशु-बलियों के साथ-साथ हिडिम्बा की कथा के माध्यम से नरबलि का भी उल्लेख किया गया है जो राक्षसों में प्रचलित थी और आर्य इसे उचित नहीं मानते थे। ऐतरेय, शतपथ एवं तैत्तिरीय ब्राह्मणों में पुरुषमेध के उन्मूलन का उल्लेख है। रामायण एवं महाभारत में इस सम्बन्ध में वर्णित उल्लेख संभवतः वहीं से लिए गए हैं। वेदव्यास के महाभारत में प्राचीन भारतीय समाज में गाने-बजाने, खेलने-कूदने, मेले-तमाशे करने, कुश्ती-दंगल करने, देवताओं के निमित्त उत्सव मनाने, शिशु जन्म के संस्कार करने, नंदीमुख कर्म, षष्ठी पूजा, श्राद्ध कर्म, धार्मिक मेलों के आयोजन आदि का वर्णन मिलता है।

    महाभारत में आए उल्लेखों के अनुसार तत्कालीन समाज में हाथी, बैल, हंस, गरुड़ आदि पशु-पक्षियों को पवित्र माना जाता था। समाज में भूत-प्रेत एवं पिशाचों को वश में करना, टोने-टोटके करना आदि अंध-विश्वासों का भी वर्णन है।

    महाभारत में जीवन-दृष्टियाँ

    महाभारत के उद्योग पर्व के 42वें अध्याय में जीवन जीने की तीन दृष्टियों का उल्लेख हुआ है- (1.) नियतिवादी, (2.) प्रज्ञावादी और (3.) अध्यात्मवादी।

    धृतराष्ट्र नियतिवादी दृष्टिकोण के पक्षधर हैं। वे कहते हैं- 'किसी बात के होने या न होने में मनुष्य का केाई हाथ नहीं होता, सब कुछ भाग्य पर निर्भर है। अतः किसी प्रकार के परिश्रम या अध्यवसाय के चक्कर मंे नहीं पड़ना चाहिए, काम-धन्धे के प्रति उपेक्षा भाव रखना चाहिए और किसी वस्तु की भी इच्छा नहीं करनी चाहिए।'

    विदुर धृतराष्ट्र के इस दर्शन से सहमत नहीं हैं। वे कहते हैं- 'पुरुषार्थ एवं पराक्रम से अनर्थ को टाला जा सकता है और बुद्धि से अपना भविष्य सुधारा जा सकता है। मनुष्य का लक्षण कर्म है और कर्म को छोड़कर बैठना मृत्यु है। अतः सदाचारपूर्वक कर्म करते हुए अपना उत्थान करना चाहिए यही मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है।'

    जब धृतराष्ट्र और विदुर एक-दूसरे के मत से सहमत नहीं होते हैं तब ऋषि सनत्सुजात को बुलाया जाता है। सनत्सुजात कहते हैं- 'प्रमाद ही मृत्यु है और अप्रमाद अमृत या अमरता है। प्रमाद के कारण आसुरी वृत्ति वाले मनुष्य मृत्यु से पराजित होते हैं और अप्रमाद अर्थात् संत प्रवृत्ति वाले ब्रह्मस्वरूप या अमर हो जाते हैं। कुछ लोग प्रमाद के स्थान पर यम को मृत्यु का एक रूप कहते हैं। दृढ़तापूर्वक यम-नियमों का पालन करके जो ब्रह्माचर्य प्राप्त होता है, उसे ही कुछ लोग अमृत और अमरता से जोड़ते हैं।'

    इस प्रकार महाभारत के इस अध्याय में इन तीनों जीवन-दृष्टियों पर गहनता से विचार किया गया है।

    वर्णाश्रम व्यवस्था और सदाचार

    महाभारत ने शील और सदाचार को सामाजिक व्यवस्था का मूल आधार माना है। महाभारत के अनुसार समाज के चारों वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र) गुण और कर्म पर आधारित हैं। बालक के उपनयन के बाद शिक्षा, शील और सदाचार से उसके वर्ण का निर्णय होता है। महाभारत के वन-पर्व में अजगर के प्रश्न करने पर कि, 'ब्राह्मण कौन है?' युधिष्ठिर कहते हैं- 'जिस व्यक्ति में सत्य, दान, क्षमा, शील, दया, दम और अंहिसा हो वही ब्राह्मण है।'

    अजगर फिर प्रश्न करता है कि क्या ये गुण शूद्र में हो तो वह ब्राह्मण कहलाएगा? युधिष्ठिर कहते हैं- 'यदि शूद्र में ये गुण हैं तो निश्चय ही वह ब्राह्मण है, जिसमें चरित्र नहीं है, वह शूद्र है।' इस प्रकार महाभारत कालीन समाज में वर्णों की व्यवस्थाएं गुण, कर्म और स्वभाव पर टिकी हैं न कि जाति, कुल और परम्परा पर। महाभारत के शान्ति पर्व में चारों आश्रमों में गृहस्थाश्रम को सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

    महाभारत के शान्ति पर्व में कहा गया है- 'सबसे गहरा रहस्य यह है कि मनुष्य से अधिक श्रेष्ठ और कुछ नहीं है।' इस प्रकार महाभारत मनुष्य के मनुष्य होने को बड़ा मानता है न कि उसके वर्ण या व्यवासाय को।

    महाभारत में आदर्श

    महर्षि वेदव्यास ने महाभारत के रूप में आर्य संस्कृति के प्रतिमानों को धर्म एवं नीति के सुदृढ़ आधार पर स्थापित करने का प्रयास किया है। महाभारत का प्रत्येक पात्र अपने आप में विशिष्ट है और वह किसी न किसी गुण अथवा अवगुण का प्रतिनिधित्व करता है। वेदव्यास ने श्रीकृष्ण को नारायण का अवतार मानकर ही उनसे सम्बन्धित प्रसंग लिखे हैं। कुरुराज्य का मंत्री विदुर भी श्रीकृष्ण की भांति एक आदर्श पात्र है। वह नीतिशास्त्र एवं धर्मशास्त्र का ज्ञाता है। स्पष्टभाषी होने के कारण वह राज्यलोभी धृतराष्ट्र को धर्म एवं नीति पर चलने के लिए प्रेरित करता है तथा धृतराष्ट्र को उसके पुत्रमोह के लिए धिक्कारता है।

    भीष्म के रूप में वेदव्यास ने एक अलग तरह का आदर्श प्रस्तुत किया है। वे धर्म और न्याय के प्रतीक होते हुए भी अपनी प्रतिज्ञा के कारण हस्तिानापुर के राजसिंहासन से बंधे हुए हैं और द्रौपदी के वस्त्रहरण पर भी चुप रहते हैं। इतना ही नहीं भगवान श्रीकृष्ण के परमभक्त होते हुए भी भीष्म युद्ध-भूमि में अधर्मी दुर्योधन की तरफ से लड़ते हैं। वे चाहते हैं कि इस युद्ध में धर्म अर्थात् पाण्डव पक्ष की विजय हो, इसलिए वे पाण्डवों को अपनी मृत्यु का तरीका बताते हैं।

    इसी प्रकार धर्मराज युधिष्ठिर का चरित्र-चित्रण भी मनुष्य के गुणों की पराकाष्ठा है। वे सत्यवादी हैं, कष्ट सहकर भी धर्म के पथ से च्युत नहीं होते। वनपर्व में वे अदृश्य यक्ष द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तरों में धर्म का पक्ष लेते हैं और अपने बलशाली भाई भीम या अर्जुन के स्थान पर अपनी विमाता माद्री के पुत्र को जीवित करने की प्रार्थना करते हैं। उनमें सत्य और धर्म पर अडिग रहने के प्रति उत्साह है न कि युद्ध में विजय प्राप्त करने पर। वेदव्यास ने भीमसेन के रूप में शारीरिकि बल एवं नीति का समन्वय किया है।

    अर्जुन के रूप में उन्होंने शौर्य, ईश-भक्ति और भ्रातृत्व प्रेम से युक्त अदुभुत पात्र की रचना की है। नकुल और सहदेव के रूप में उन्होंने विमाता के पुत्रों को अपने बड़े भाइयों के प्रति विनय एवं सदाशयी रहने वाला दिखाया है। पांचों भाई अत्यंत बलशाली होते हुए भी धर्म के मार्ग पर चलते हैं और बड़ों के सामने विनम्रतापूर्ण व्यवहार करते हैं। वे निरंतर विपत्तियों का सामना करते हुए भी धैर्य नहीं खोते।

    महाभारत की द्रौपदी एक आदर्श नारी है। पांच पतियों की पत्नी होते हुए भी वह सती, साध्वी और पतिव्रता है। महारानी द्रौपदी के चरित्र के द्वारा वेदव्यास ने भारतीय नारियों के समक्ष अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत किया है। वन-पर्व में द्रौपदी के गुणों का बहुत सुन्दर वर्णन हुआ है। पाण्डवों के वन में निवास करने के दौरान एक बार श्रीकृष्ण और सत्यभामा उनसे मिलने आते हैं। सत्यभामा द्रौपदी से पूछती है- 'उसके पांचों पति किस तरह उसके अनुकूल रहते हैं?' द्रौपदी कहती है- 'मैं अंहकार, काम और क्रोध को छोड़कर पाण्डवों की सेवा करती हूँ। मैं कभी उन्हें कटु-वचन नहीं कहती, असभ्य की भांति व्यवहार नहीं करती। पतियों के अभिप्रायपूर्ण संकेत का सदैव अनुसरण करती हूँ। देवता, मनुष्य, गन्धर्व या कितना भी रूपवान-सम्पन्न पुरुष मेरे सामने आ जाए, फिर भी मेरा मन पाण्डवों को नहीं छोड़ता। पतियों और उनके सेवकों को भोजन कराए बिना मैं कभी भोजन नहीं करती। उनके सोने के बाद ही मैं सोती हूँ। बाहर से जब मेरे पति आते हैं, तब मैं मुस्कराकर उनका स्वागत करती हूँ। मेरे पति जिस बात को या वस्तु को पसन्द नहीं करते, मैं भी उसे त्याग देती हूँ। गुरुजनों की सेवा-सुश्रुषा से ही मेरे पति मेरे अनुकूल रहते हैं।'

    द्रौपदी के इस कथन में आदर्श नारी का चरित्र स्पष्ट होता है। इस आख्यान के माध्यम से वेदव्यास भारतीय नारियों को पति से प्रेम करने एवं उसके प्रति अनुरक्त रहने की शिक्षा देते हैं।

    ज्ञान का विश्व-कोष

    महाभारत ज्ञान का विश्व-कोष है। इस ग्रन्थ में मानवीय व्यवहार की जटिलताओं एवं सुंदरताओं की विशद व्याख्या की गई है। इसकी समग्रता के सम्बन्ध में स्वयं वेदव्यास ने कहा है- 'इस ग्रन्थ में जो कुछ सत्य है, वह अन्यत्र है परन्तु जो कुछ इसमें नहीं है, वह अन्यत्र कहीं भी नहीं है।' निःसन्देह यह ग्रन्थ तत्कालीन धार्मिक, नैतिक और ऐतिहासिक आदर्शों का अमूल्य भण्डार है। महाभारत समस्त दर्शनों का सार एवं स्मृतियों का विस्तृत विवेचन-ग्रन्थ है तथा इसमें स्थान-स्थान पर आए उपाख्यानों के द्वारा लोकधर्म के विभिन्न अंगों पर बड़ी गहराई तक प्रकाश डाला गया है।

    मानव जीवन की ऐसी कोई समस्या या ऐसा कोई पक्ष नहीं है, जिस पर इस ग्रन्थ में विस्तृत विवेचन न किया गया हो। आदि पर्व में महाभारत को केवल इतिहास ही नहीं, अपितु धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र, नीतिशास्त्र तथा मोक्षशास्त्र भी कहा गया है। महाभारत में कौरव-पाण्डवों के राजनीतिक संघर्ष का इतिहास तो है ही परन्तु साथ ही वह आर्य-संस्कृति और हिन्दू-धर्म के सर्वांगीण विकास की गाथा भी है। इस विशाल ग्रंथ में अनेक प्राचीन कथाएं सुंदर बागीचों की तरह सजाई गई हैं।

    इन कथाओं में दुष्यन्त-शकुन्तला की कथा, रामकथा, शिव-कथा, सावित्री एवं सत्यवान की कथा, मत्स्यावतार सहित दशावतार की कथा, नल और दमयन्ती की कथा आदि प्रमुख हैं। महाभारत एक श्रेष्ठ धर्मशास्त्र है जिसमें पारिवारिक तथा सामाजिक जीवन के विधि-विधानों तथा धर्म की विस्तृत व्याख्या की गई है। शान्ति-पर्व में राजधर्म, आपद्धर्म एवं मोक्ष का तथा अनुशासन-पर्व मंे दान का विस्तृत विवेचन किया गया है। यह नीतिशास्त्र का भी महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है।

    शान्ति-पर्व में भीष्म पितामह द्वारा धर्म एवं राजनीति पर लम्बा व्याख्यान दिया गया है। सभा-पर्व में नारद का राजनीतिक विषय पर व्याख्यान है। विदुर के रूप में महाभारत की कथा को एक ऐसा दुर्लभ पात्र दिया गया है जिसकी कल्पना करना भी कठिन हैं। दासी-पुत्र, मंत्री एवं कनिष्ठ-भ्राता होते हुए भी विदुर सत्य के तेज से प्रकाशित हैं और धर्म एवं नीति के व्याख्याकार हैं। विदुर की भांति संजय भी अंधे राजा को सदैव सत्य ही बताते हैं किंतु पुत्र मोह से ग्रस्त धृतराष्ट्र उनकी बातों से सहमत नहीं होता और उन्हें बार-बार झिड़कता है किंतु न तो विदुर और न संजय कभी भी अपने कर्त्तव्य से च्युत होते हैं।

    इस कारण विदुर नीति एवं संजय नीति का भारतीय संस्कृति में बहुत आदर हुआ। उन्हें आज भी अनुकरणीय माना जाता है। महाभारत अध्यात्म का भी अनुपम ग्रन्थ है। इसमें श्रीमद्भागवद्गीता, सनत्सुजात के उपदेश, अनुगीता, पाराशर गीता, मोक्ष धर्म आदि महत्त्वपूर्ण अंश संकलित हैं। महाभारत में श्रेष्ठ धार्मिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक सिद्धान्तों का समावेश होने से इसे 'हिन्दू-धर्म का वृहत् कोष' कहा गया है। पौराणिक आख्यानों-उपाख्यानों का समावेश होने से इसे 'पुराण-संहिता' भी माना गया है।

    महाभारत में मोक्ष के साधनों के रूप में कर्म, भक्ति, ज्ञान, तप आदि मार्गों का विवेचन होने से इसे 'मोक्षशास्त्र' भी कहते हैं। महाभारत में मोक्ष के साधनों और सांसारिक सुखों के बीच समन्वय किया गया है और चार पुरुषार्थों- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की, मानव-जीवन के लक्ष्य के रूप में प्रतिष्ठा हुई है। धर्म को प्रधान पुरुषार्थ माना गया है।

    महाभारत के अनुसार मनुष्य को धर्म का उल्लंघन किए बिना अर्थ और काम का सेवन करना चाहिए। इस ग्रन्थ में प्रवृत्ति, निवृृति, कर्म और सन्यास सम्बन्धी विचारों का सुन्दर ढंग से प्रतिपादन एवं समन्वयन हुआ है। महाभारत की शिक्षा का सार यह है कि मनुष्य व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर लोककल्याण के लिए धर्मसम्मत कर्त्तव्य का पालन करता रहे।

    साहित्यिक महत्त्व

    साहित्य की दृष्टि से महाभारत अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। एक प्रौढ़ महाकाव्य में जो लक्षण होने चाहिए, वे सभी लक्षण इस ग्रंथ में अपनी उच्चता के साथ उपस्थित हैं। भाषा, विचार, भाव, कथा, रोचकता, लोकोपयोगिता आदि विभिन्न दृष्टियों से यह उच्च कोटि का साहित्यिक ग्रंथ है। छंद, अलंकार, रस आदि की दृष्टि से भी यह एक प्रौढ़ रचना है। इस ग्रंथ की कथा में शृंगार रस, भक्ति रस और शान्त रस का परिपाक स्थान-स्थान पर हुआ है। वात्सल्य रस एवं वीभत्स रस भी अपने चरमोत्कर्ष के साथ उपस्थित हैं। स्वयं वेदव्यास ने इस ग्रंथ के बारे में लिखा है कि भविष्य में जितने भी लेखक होंगे, वे अपने ग्रंथों का लेखन इस ग्रंथ को आधार बनाकर करेंगे।

    महाकाव्यों में इतिहास

    रामायण तथा महाभारत दोनों ही महाकाव्यों में प्राचीन हिन्दू सभ्यता का वर्णन है। कुछ पाश्चात्य विद्वानों की धारणा है कि ये ग्रन्थ पूर्णतः लाक्षणिक हैं जिनमें कोई ऐतिहासिक सामग्री नहीं हैं परन्तु उनका मत गलत है। यह माना जा सकता है कि आलंकारिक वर्णनों एवं क्षेपकों आदि के कारण इनमें उपलब्ध तत्कालीन ऐतिहासिक सामग्री और बाद की ऐतिहासिक सामग्री को अलग कर पाना कठिन है किंतु ये ग्रंथ पूर्णतः अनैतिहासिक नहीं हैं।

    राम तथा उनकी अयोध्या, रावण तथा उसकी लंका, रामसेतु निर्माण, राम-रावण युद्ध, कौरव तथा उनका हस्तिनापुर, पाण्डव तथा उनका इंद्रप्रस्थ, कौरव-पाण्डव युद्ध, श्रीकृष्ण एवं उनकी द्वारिका और कुरुक्षेत्र का मैदान सभी कुछ ऐतिहासिक सिद्ध हो चुके हैं। भौतिक साक्ष्यों की कार्बन डेटिंग राम के काल को ई.पू. 5000 सिद्ध कर चुकी है। इसी प्रकार महाभारत का युद्ध ई.पू.3102 के लगभग निर्धारित करते हैं। माना जाता है कि राम के वास्तविक काल के बाद रामायण का तथा महाभारत के वास्तविक काल के बाद महाभारत ग्रंथ का प्रणयन हुआ होगा।

    महाकाव्य काल में आर्यों की राजनीतिक दशा

    महाकाव्य काल तक आते-आते आर्यों का प्रसार पूर्व की ओर अंग तक हो गया। देश में बड़े-बड़े राज्यों की स्थापना हुई। कुरु, पांचाल, कौशाम्बी, कौशल, काशी, विदेह, मगध तथा अंग इस युग के विशाल राज्य थे। महाजनपद की अवधारणा महाकाव्य काल के पश्चवर्ती बुद्धकाल में आई। महाकाव्य काल के राजा 'महाराजाधिराज, सम्राट तथा चक्रवर्ती' जैसी उपाधियाँ धारण करते थे जो उनके राज्य विस्तार एवं प्रभुत्व की शक्ति प्रतीक थीं।

    चक्रवर्ती राजा चतुरंगिणी सेना रखते थे जिसमें अश्व, गज, रथ तथा पैदल सैनिक होते थे। शक्तिशाली राजा दिग्विजय का आयोजन करते थे तथा उसके पश्चात् राजसूय तथा अश्वमेध आदि यज्ञों के अनुष्ठान करते थे। श्रीराम एवं युधिष्ठिर ने दिग्विजय यज्ञ किए। महाकाव्य काल में राजपद वंशानुगत होता था तथ ज्येष्ठ पुत्र को मिलता था परन्तु ज्येष्ठ पुत्र यदि शरीर से दोषपूर्ण होता था तो उसे राजपद नहीं दिया जाता था। महाभारत में धृतराष्ट्र को अन्धा होने के कारण राजा नहीं बनाया गया।

    राजा धर्मानुकूल शासन करते थे और वे सर्वाधिकार सम्पन्न होते हुए भी निरंकुश नहीं होते थे। राज्याभिषेक के अवसर पर राजा को प्रजा-पालन की शपथ लेनी पड़ती थी। राजा के लिए दुष्टों का दमन करना आवश्यक समझा जाता था। रामायण एवं महाभारत दोनों में प्रजापलन एवं दुष्टों का दमन राजा के आवश्यक गुण बताए गए हैं। महाभारत स्पष्टतः अन्यायी एवं दुराचारी शासकों के वध का निर्देश करता है।

    वेण, नहुष, निमि तथा सुदास आदि अत्याचारी राजाओं को प्रजा द्वारा मार डाला गया था। राजा मंत्रिपरिषद् की सलाह पर शासन-कार्य करता था। रामायण में राजदरबार में मन्त्रियों के अतिरिक्त गुरु, ऋषि, पुरोहित, विद्वान तथा सैनिक पदाधिकारियों का उल्लेख है जो विभिन्न विषयों पर राजा को परामर्श देते थे। राम के राजतिलक के समय राज्य के प्रमुख पुरुषों की एक सभा हुई थी।

    रामायण के अयोध्याकाण्ड में शासन के 18 विभागों का उल्लेख हुआ है जो निम्नलिखित अधिकारियों के अधीन थे- (1) मन्त्री, (2) पुरोहित, (3) युवराज, (4) चमूपति (मुख्य सेनापति), (5) द्वारपाल, (6) अन्तर्वेशक (अन्तःपुर का निरीक्षक), (7) कारागार अधिकारी, (8) द्रव्य संचयकृत (राजभवन का मुख्य परिचारक), (9) विनियोजक (मुख्य कायाधिकारी), (10) प्रदेष्टा (मुख्य न्यायाधीश), (11) नगराध्यक्ष, (12) कार्य-निर्माणकृत (मुख्य अभियन्ता), (13) धर्माध्यक्ष, (14) सभाध्यक्ष, (15) दण्डपाल, (16) दुर्गपाल, (17) राष्ट्रान्तपालक (सीमारक्षक) तथा (18) अटवीपाल (अरण्य संरक्षक)।

    महाभारत में भी राजा के अनेक मन्त्रियों का उल्लेख है। एक स्थान पर कहा गया है कि जिस प्रकार पशु मेघ पर, स्त्री अपने पति पर तथा ब्राह्मण वेद पर निर्भर करते हैं उसी प्रकार राजा अपने मन्त्रियों पर निर्भर करता है। इस ग्रन्थ में मन्त्रियों की संख्या 36 उल्लिखित है जो चारों वर्णों से लिए जाते थे। शासन में पुरोहितों का स्थान महत्वपूर्ण था। मंत्रियों के विभागों को तीर्थ कहा जाता था।

    महाभारत काल में मुख्यतः राजतन्त्रीय व्यवस्था प्रचलित थी किंतु महाभारत में पाँच गणतन्त्रात्मक राज्यों का भी उल्लेख है- अन्धक, वृष्णि, यादव, कुकुर तथा भोज। इन पाँचों का एक संघ था जिसके अध्यक्ष श्रीकृष्ण थे। इस संघ के अन्तर्गत प्रत्येक गण को स्वायत्तता प्राप्त थी।

    महाकाव्य काल में आर्यों की धार्मिक स्थिति

    महाकाव्य काल तक आते-आते वैदिक धर्म का स्वरूप बिल्कुल परिवर्तित हो गया। पूर्व-वैदिक कालीन 'कर्मकाण्ड-प्रधान धर्मों' तथा उत्तर-वैदिक कालीन 'ज्ञान प्रधान धर्मों' का समन्वय होकर इस समय धर्म का व्यावहारिक रूप सामने आया जो सर्व-साधारण के लिए सुलभ था। प्राचीन वैदिक देवताओं का महत्व कम हो गया था तथा नए देवी-देवताओं की प्रतिष्ठा हो रही थी। इनमें विष्णु, शिव, गणेश, पार्वती, दुर्गा आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

    ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश (शिव) को त्रिमूर्ति कहा गया तथा उन्हें क्रमश. सृष्टि का कर्त्ता, धर्त्ता एवं संहर्त्ता स्वीकार किया गया। शीघ्र ही ब्रह्मा का महत्व कम हो गया तथा शिव और विष्णु महाकाव्य कालीन धर्म के प्रमुख देवता हो गए। अवतारवाद एवं पुनर्जन्म की अवधारणाओं का समावेश हुआ। राम और कृष्ण विष्णु के अवतार मान लिए गए। यह धारणा प्रचलित हुई कि ईश्वर अपने भक्तों की सहायता के लिए समय-समय पर पृथ्वी पर मनुष्य रूप में अवतार लेते हैं।

    वह धर्म की स्थापना करते हैं, सज्जनों की रक्षा करते हैं तथा दुष्टों का विनाश करते हैं। महाभारत के भगवत्गीता वाले अंश में भगवान के बारे में यह धारणा प्रमुख रूप से स्थापित की गई है। महाकाव्यों ने सामान्य जनता के समक्ष मोक्ष-प्राप्ति का एक सरल उपाय प्रस्तुत किया। यह था भक्ति का साधन जो सभी के लिए समान रूप से सुलभ था। इसके अनुसार ईश्वर, अपने उपासक द्वारा की गई भक्ति से प्रसन्न होकर उपासक को सभी पापों से मुक्त करके अपनी शरण में ले लेते हैं।

    महाभारत में पंचरात्र धर्म का वर्णन मिलता है जो आगे चलकर वैष्णव-धर्म के रूप में प्रतिष्ठापित हुआ। महाभारत में कहा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मान्यता के अनुसार धर्मपालन की स्वतंत्रता होनी चाहिए। इसमें शैव तथा शाक्त धर्मों के प्रति सहिष्णुता तथा उदारता पर भी बल दिया गया है। भगवद्गीता महाभारत के 'भीष्म-पर्व' का अंश है। इसमें कर्म, भक्ति तथा ज्ञान इन तीनों का सुन्दर समन्वय मिलता है।

    गीता में कर्म की महत्ता प्रतिपादित की गयी है। भक्ति का महत्व बताते हुए कृष्ण स्वयं यह कहते हैं- 'सभी धर्मों को छोड़कर केवल मेरी ही शरण में आ। मैं तुझे सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत कर।' रामायण तथा महाभारत में अनेक वैदिक यज्ञों का उल्लेख मिलता है परन्तु यज्ञों में होने वाली हिंसा का विरोध किया गया है तथा चित्त-शुद्धि को ही एकमात्र साधन स्वीकार किया गया। दोनों महाकाव्यों में सत्य, अहिंसा, सदाचार, तप, त्याग आदि के पालन का उपदेश दिया गया है।

    महाकाव्यों का मुख्य उद्देश्य समाज में सत्य और न्याय की प्रतिष्ठा करना था। विभिन्न कथाओं तथा चरित्रों के माध्यम से असत्य पर सत्य तथा अन्याय पर न्याय की विजय प्रदर्शित की गयी है। रामायण में सच्चरित्रता पर विशेष बल दिया गया है तथा कहा गया है कि यह चरित्र ही है जो मनुष्य को देवता की कोटि में पहुँचाता है। महाकाव्यों द्वारा प्रतिपादित आदर्श प्रत्येक युग के लिए अनुकरणीय है।

    निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि वैदिक युग से चले आ रहे धार्मिक विश्वासों तथा क्रियाकलापों में महाकाव्य काल में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। उपनिषद काल में स्वतंत्र धार्मिक चिंतन की जो प्रवृत्ति प्रारम्भ हुई थी, वह इस युग में अपने चरम पर पहुँच गई।

    महाकाव्य काल में आर्यों की सामाजिक दशा

    महाकाव्य युगीन समाज भी वर्णाश्रम व्यवस्था पर आधारित था। ऋग्वेद के समान रामायण में भी कहा गया है कि विराट पुरुष के मुँह से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, उरुभाग से वैश्य तथा पैरों से शूद्र वर्णों की उत्पत्ति हुई। चारों वर्णों में ब्राह्मण अब भी सर्वश्रेष्ठ माने जाते थे। रामायण तथा महाभारत में ब्राह्मणों की कई कोटियां बताई गई हैं। कुछ ब्राह्मण क्षत्रिय कर्म करते थे तथा कुछ ब्राह्मण कृषि तथा पशुपालन द्वारा भी अपनी जीविका चलाते थे। सामाजिक व्यवस्था में शूद्रों का स्थान सबसे नीचे था। उन्हें न तो तपस्या का अधिकार था और न वे विद्याध्ययन के लिए गुरुकुलों में जा सकते थे।

    रामायण में शम्बूक नामक एक शूद्र का उल्लेख हुआ है जो अनाधिकार तप करने के कारण राम के हाथों मारा गया किंतु राम ने निषादराज तथा शबरी का आतिथ्य स्वीकार किया तथा केवट का अनुरोध स्वीकार करके उसे भी सम्मान दिया। अतः कहा जा सकता है कि इए काल में शूद्रों के सम्मान की आवश्यकता अनुभव की जा रही थी।

    महाभारत में आए एक प्रसंग के अनुसार एकलव्य नामक निषाद बालक को द्रोणाचार्य ने शिक्षा देने से मना कर दिया, जब उसने अपनी निष्ठा एवं लगन से स्वयं ही धनुर्विद्या में निपुणता प्राप्त कर ली तो द्रोणाचार्य ने उसके दायें हाथ का अंगूठा कटवा लिया किन्तु इस काल में शूद्रों की स्थिति में सुधार के चिह्न भी मिलते है। महाभारत के शान्तिपर्व में कहा गया है कि शूद्र-सेवकों का भरण-पोषण करना द्विज का कर्त्तव्य है। राजा की मंत्रिपरिषद में शूद्र प्रतिनिधि भी रखे जाते थे।

    युधिष्ठिर ने राजसूय यंत्र के अवसर पर शूद्र प्रतिनिधियों को भी आमंत्रित किया था। महाभारत के शान्तिपर्व में लिखा गया है कि चारों वर्णों को वेद पढ़ना चाहिए तथा शूद्र से भी ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। महाभारत में विदुर, मातंग, कायव्य आदि व्यक्तियों को, जन्मना शूद्र होते हुए भी प्रतिष्ठित स्थान दिए गए। उन्हें सेवावृत्ति, कृषि, पशुपालन, वाणिज्य आदि का भी अधिकार था।

    महाकाव्य काल में वर्णों के साथ-साथ जातियों के नाम भी मिलते हैं। रामायण में यवन और शक तथा महाभारत में यवन, शक, किरात, पह्लव, आदि विदेशी जातियों का भी उल्लेख है। समाज में चार आश्रमों का विधान इस युग में भी देखने को मिलता है। शान्तिपर्व में चारों आश्रमों को ब्रह्मलोक में पहुँचने के चार सोपान बताए गए हैं। चारों आश्रमों में गृहस्थ आश्रम का सर्वाधिक महत्व था।

    महाकाव्य काल में स्त्रियों की दशा वैदिक-काल की अपेक्षा हीन थी। फिर भी समाज में उनके महत्व को पूर्णतः नकारा नहीं गया था। बाल-विवाह नहीं होते थे। उच्च-वर्ग की स्त्रियाँ शिक्षित होती थीं। रामायण में कौशल्या और तारा को 'मंत्रविद्' कहा गया है। अत्रेयी 'वेदान्त' का अध्ययन करती हुई तथा सीता 'संध्या' करती हुई दिखाई गई हैं। महाभारत में द्रौपदी को 'पण्डिता' कहा गया है। वह युधिष्ठिर तथा भीष्म से धर्म एवं नैतिकता पर वार्तालाप करती है। महाभारत स्त्री को धर्म, अर्थ तथा काम का मूल बताता है।

    अनुशासन पर्व में कहा गया है कि स्त्रियाँ समृद्धि की देवी हैं। अतः समृद्धि चाहने वाले व्यक्ति को उनका सम्मान करना चाहिये। समाज में बहुविवाह तथा अन्तर्जातीय-विवाह का प्रचलन था। उच्च कुल के लोग अनेक पत्नियाँ रखते थे। क्षत्रिय कुलों में विवाह स्वयंवर प्रथा द्वारा होते थे। नियोग की प्रथा भी प्रचलित थी जिसमें पति के नपुंसक अथवा रुग्ण होने पर पत्नी पर-पुरुष के साथ सन्तानोत्पत्ति हेतु सम्पर्क कर सकती थी।

    महाभारत में सती-प्रथा के उदाहरण भी प्राप्त होते हैं, जैसे- माद्री अपने पति पाण्डु के साथ सती हो गई थी किन्तु ऐसे उदाहरण भी हैं जहाँ स्त्रियों ने अपने पतियों की मृत्यु के बाद सतीत्व का अनुसरण नहीं किया। महारानी कुंती महाराज पाण्डु के साथ सती नहीं हुईं। अभिमन्यु, घटोत्कच तथा द्रोण की पत्नियाँ भी सती नहीं हुई थीं। महाभारत में हजारों यादव-विधवाओं का उल्लेख है जो अर्जुन के साथ द्वारिका से हस्तिनापुर तक गयी थीं।

    ऐसा प्रतीत होता है कि शक-सीथियनों के आक्रमणों के कारण समाज में सती-प्रथा का प्रचलन बढ़ने लगा था। कहीं-कहीं पर्दा-प्रथा के उल्लेख भी मिलते हैं। इस प्रथा पर भी विदेशी आक्रमणों का ही प्रभाव था। महाभारत में वेश्याओं के भी उल्लेख मिलते है।

    महाकाव्य काल में आर्यों की आर्थिक दशा

    ऋग्वैदिक-काल, उत्तरवैदिक-काल तथा उपनिषद काल की तरह महाकाव्य काल में भी कृषि तथा पशुपालन आर्थिक जीवन के मुख्य आधार थे। हलों द्वारा कृषि होती थी जिन्हें बैलों की सहायता से खींचा जाता था। रामायण में राजा जनक को तथा महाभारत में युधिष्ठिर को हल चलाते हुए दिखाया गया है। इससे कृषि की महत्ता प्रतिपादित होती है। सिंचाई के लिए अधिकतर वर्षा पर ही निर्भर रहना पड़ता था किंतु 'कुल्याओं' (छोटी नहरों) का भी उल्लेख मिलता है।

    राज्य कृषि की उन्नति की ओर विशेष ध्यान देता था। उस काल में गेहूँ, जौ, उड़द, चना, तिल तथा चावल प्रमुख फसलें थी। भूमि उपजाऊ थी। गाय, बैल, हाथी, घोड़े भेड़ प्रमुख पालतू पशु थे। पशुओं की देख-रेख के लिए राज्य की ओर से 'गोपाध्यक्ष' नामक पदाधिकारी नियुक्त किया जाता था। कृषि एवं पशुपालन के साथ-साथ व्यवसाय एवं व्यापार भी उन्नति पर थे। महाभारत में अनेक व्यवसाइयों का उल्लेख मिलता है जो विभिन्न स्थानों में श्रेणियाँ बनाकार निवास करते थे।

    प्रमुख व्यवसायियों में स्वर्णकार, लौहकार, बढ़ई, खनक, कुम्भकार, चर्मकार, रजक, शौण्डिक, तन्तुवाय, कम्बलकार, वैद्य, मालाकार, नापित आदि सम्मिलित थे। शिल्पी अपने कार्य में निपुणता प्राप्त कर चुके थे। वे हाथीदांत, स्वर्ण, मणि तथा विविध रत्नों से सुन्दर आभूषण बनाते थे। आन्तरिक तथा बाह्य दोनों ही व्यापार उन्नति पर थे। व्यापार मुख्यतः वैश्य जाति के लोग ही करते थे। रामायण में 'यवद्वीप (वर्तमान में जावा)' तथा 'सुवर्णद्वीप (वर्तमान में सुमात्रा)' का उल्लेख हुआ है जहाँ भारतीय व्यापारी जाया करते थे।

    महाभारत में भी समुद्री यात्राओं, द्वीपों, जलपोतों आदि का उल्लेख है निससे ज्ञात होता है कि उस समय समुद्री व्यापार उन्नति पर था। कम्बोज, गन्धार, सिन्ध, प्राग्ज्योतिष (असम), विन्ध्यप्रदेश, चीन तथा बाह्लीक आदि देशों से व्यापार होता था तथा अनेक वस्तुएं मंगवायी जाती थीं। कम्बोज तथा बाह्लीक उत्तम घोड़ों के लिए विख्यात थे।

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  • अध्याय - 7 राजकीय संग्रहालय, उदयपुर

     02.06.2020
    अध्याय - 7 राजकीय संग्रहालय, उदयपुर

    अध्याय - 7 राजकीय संग्रहालय, उदयपुर


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    महाराणा शम्भुसिंह (ई.1861-74) के शासन काल में कर्नल हैचिन्सन की सलाह पर उदयपुर रियासत में तवारीख महकमा (इतिहास विभाग) स्थापित किया गया। इसी दौरान ई.1873 में उदयपुर संग्रहालय की स्थापना का काम आरम्भ हुआ। महाराणा सज्जनसिंह (ई.1874-84) के शासनकाल में इतिहास विभाग की अच्छी प्रगति हुई। उनके शासन काल में ही राज्य में ई.1879 में कविराजा श्यामलदास की अध्यक्षता में ऐतिहासिक और पुरा सामग्री का अनुसंधान कार्य प्ररम्भ हुआ। प्रसिद्ध इतिहासविद् गोविन्द गंगाधर देशपाण्डे ने एक वर्ष तक उदयपुर में रहकर प्राचीन शिलालेखों का अध्ययन किया।


    ई.1887 में महाराणा फतहसिंह (ई.1884-1930) ने महारानी विक्टोरिया (ई.1837-1901) के शासन की स्वर्ण जयंती के अवसर पर उदयपुर के सज्जन निवास बाग में विक्टोरिया हॉल का निर्माण करवाया। इस भवन का निर्माण इण्डो-ब्रिटिश स्थापत्य शैली में किया गया था। इस उद्यान को अब गुलाब बाग कहते हैं। 1 नवम्बर 1890 को भारत के तत्कालीन वाइसराय लार्ड लेन्सडाउन ने इस भवन में विक्टोरिया हॉल म्यूजियम और पुस्तकालय का उद्घाटन किया। उसी दिन से यह जनसाधारण के लिए खोल दिया गया। प्रसिद्ध इतिहासकार गौरीशंकर ओझा को क्यूरेटर के पद पर नियुक्त किया गया। वे ई.1908 तक इस पद पर तक कार्यरत रहे। उनके पश्चात् पण्डित अक्षय कीर्ति व्यास और रत्नचन्द्र अग्रवाल भी इस संग्रहालय एवं पुस्तकालय के अध्यक्ष रहे। उन्होंने पूरे राज्य से शिलालेख, सिक्के, प्रतिमाएँ, कलात्मक सामग्री एवं वस्त्रों के नमूने प्राप्त करके इस संग्रहालय में प्रदर्शित किए। आगे चलकर पं. अक्षय कीर्ति व्यास ने मेवाड़ क्षेत्र के शिलालेखों एवं रतनचन्द्र अग्रवाल ने मेवाड़ क्षेत्र की प्राचीन प्रतिमाओं को प्रकाशित करने पर विशेष ध्यान दिया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सरस्वती भण्डार से बहुत बड़ी संख्या में चित्रित पाण्डुलिपियों का अधिग्रहण किया गया।

    महारानी विक्टोरिया की ऐतिहासिक प्रतिमा

    इस संग्रहालय के लिए लंदन से महारानी विक्टोरिया की एक विशाल मूर्ति मंगवाई गई जिसका समस्त व्यय महाराणा द्वारा वहन किया गया। इस प्रतिमा को संग्रहालय भवन के समक्ष स्थापित किया गया जहाँ यह वर्षों तक खड़ी रही। ई.1948 में उदयपुर के स्वतंत्रता सेनानी तथा भारत की संविधान सभा के सदस्य वीरभद्र जोशी तथा मास्टर बलवंत सिंह मेहता इस प्रतिमा पर चढ़ गए और इसके मुंह पर काला रंग पोत दिया। इसके बाद इस प्रतिमा को उठाकर संग्रहालय के भवन में रख दिया गया और विक्टोरिया की प्रतिमा के स्थान पर गांधीजी की प्रतिमा स्थापित की गई। स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा इसे राष्ट्रवाद की विजय बताया गया। ई.1968 में यह संग्रहालय सज्जन निवास बाग से सिटी पैलेस के कर्ण विलास या हिसाब दफ्तर महल में स्थानान्तरित किया गया और इसका नाम प्रताप संग्रहालय रखा गया। भारत की स्वतंत्रता के बाद यह राजकीय संग्रहालय उदयपुर के नाम से जाना जाता है। विक्टोरिया हॉल अब गवर्नमेंट सरस्वती पुस्तकालय कहलाने लगा किंतु विक्टोरिया की वह प्रतिमा आज भी इस भवन की एक गैलेरी के कोने में उपेक्षित अवस्था में रखी हुई है।

    क्षेत्रीय संग्रहालय

    वर्तमान में राजकीय संग्रहालय उदयपुर एक क्षेत्रीय संग्रहालय है। इसमें मेवाड़ क्षेत्र के प्राचीन शिलालेख, प्रतिमाएं, लघु चित्र, प्राचीन सिक्के, एवं अस्त्र-शस्त्र संगृहीत हैं। संग्रहालय की पुरा सामग्री एवं कला सामग्री को पांच दीर्घाओं में रखा गया है।

    बाल दीर्घा

    प्रथम दीर्घा को बाल दीर्घा का रूप दिया गया है। इसमें बालकों की रुचि की सामग्री प्रदर्शित है जिसमें स्टफ किया गया कंगारू, बन्दर, सफेद सांभर, कस्तूरी हिरन और घड़ियाल प्रमुख हैं।

    सांस्कृतिक दीर्घा

    इस दीर्घा में मेवाड़ की छपाई के वó, हाथी दाँत के कलात्मक नमूने, मेवाड़ी पगड़ियाँ, साफे, चोगा, भीलों के आभूषण, महाराणाओं के पोट्रेट्स, भीलों के जीवन पर आधारित आधुनिक चित्र, और अó-शó प्रमुख हैं। सांस्कृतिक दीर्घा की सबसे मूल्यवान निधि शहजादा खुर्रम की पगड़ी है। ई.1622 में शहजादा खुर्रम अपने पिता जहांगीर से बगावत करके दक्षिण की ओर जाते हुए कुछ दिनों के लिए उदयपुर ठहरा था। वह मेवाड़ के राणा 
    कर्णसिंह का पगड़ी बदल भाई बना था। वही यादगार पगड़ी राजकीय संग्रहालय उदयपुर में प्रदर्शित है। हाथी दांत से निर्मित बहुत सी कलाकृतियां इस संग्रहालय में देखी जा सकती हैं। इनमें हाथीदांत से बने मुग्दर, खड़ाऊं, पालकी ले जाते कहार, पानी का जहाज, चंदन से बनी खड़ाऊं, भेड़ पर आक्रमण करता शेर, कुत्तों को घुमाने ले जाता आदमी, हाथीदांत की कार बहुत ही परिश्रम से बनाई गई प्रतीत होती हैं। धातुओं से बनी बहुत सी मूर्तियां भी महत्वपूर्ण हैं। पीतल से बनी भील ज्वैलरी भी दर्शनीय है। पीतल से बनी 13वीं सदी की महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा इतिहास की दृष्टि से बहुमूल्य है। इस प्रतिमा में देवी के चार हाथ दर्शाए गए हैं। पीतल से बनी जैन तीर्थंकरों की भी कई प्रतिमाएँ हैं। संग्रहालय में नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर का लकड़ी का मॉडल भी प्रदर्शित किया गया है जिसकी कला देखते ही बनती है।

    अस्त्र-शस्त्र

    संग्रहालय में मध्यकालीन एवं रियासती इतिहास को जानने की दृष्टि से महत्वपूर्ण अस्त्र-शस्त्रों को बड़ी संख्या में प्रदर्शित किया गया है। हथियार बनाने वालों ने कुछ हथियारों पर उनसे सम्बन्धित सूचनाएं भी अंकित की हैं। कुछ तलवारों की मूठ सोने से बनी हुई हैं तथा कुछ तलवारों की म्यान पर सोने का काम किया गया है। संग्रहालय में कलाई पर पहनने वाला पहुंचा, बरछी, पेशकब्ज, छुरी तथा नारजा भी प्रदर्शित किए गए हैं। एक तलवार पर बांसवाड़ा के महारावल पृथ्वीसिंह का नाम अंकित है। स्टील से बने धनुष एवं बाण, बांस से बने बाण, 17वीं शताब्दी में जैसलमेर में बनी मैचलॉक बंदूक जिस पर सोने की कोफ्तकारी का काम है, अठारहवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में निर्मित हाथी का अंकुश, 18वीं शताब्दी का भीलों के काम आने वाला चमड़े का तरकश, दो सौ साला पुरानी लोहे की गुप्ती, थ्री नॉट थ्री राइफल, तुर्किश तोप, विभन्न रियासतों के चांदी के सिक्के, बीकानेर में बनी 18वीं सदी की लोहे की ढाल जिस पर चंद्रस का काम हुआ है तथा ताम्बे के फूलों से सजी हुई है, विभिन्न प्रकार की पेशकब्ज, खुखरी, कैंची कटार, टाइगर कटार, 17वीं शताब्दी में बूंदी में निर्मित लोहे की दस्तेद्रस (दाओ) संग्रहालय में प्रदर्शित की गई हैं।

    संग्रहालय में विभिन्न प्रकार की तलवारें रखी गई हैं जो 17वीं से 19 शताब्दी तक भारत में प्रयुक्त होती थीं। इनमें तोते की आकृति वाली मूठ युक्त तलवार, ई.1850 के आसपास बनी लहरिया तलवार जिसकी मूठ पर सोने की कोफ्ताकारी है, घोड़े की मुखाकृति की मूठ वाली कुलाबा (पतली तलवार), पक्षी की चोंच के समान चिरे हुए मुंह वाली जुल्फिकार तलवार, स्टील की गुर्ज, लोहे की ढालें जिन पर चांदी का काम किया हुआ है, चांदी की कोफ्तकारी से युक्त नागिन के समान लहराती हुई आकृति में बनी तलवार, लोहे की तेगा तलवार, कोरबंदी कोफ्तकारी से युक्त लहरिया पैटर्न की लोहे की तलवार, सोने के काम वाली मूठ की पट्टा तलवार जो 17वीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में दक्षिण भारत में बनी थी, सम्मिलित हैं।

    शिलालेख दीर्घा

    इस संग्रहालय के प्रथम क्यूरेटर गौरीशंकर ओझा ने रियासत के विभिन्न भागों से इतिहास की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी शिलालेख एकत्रित किए थे जिनमें से बहुत से शिलालेख अब भी इस संग्रहालय में हैं, कुछ शिलालेख अन्य संग्रहालयों को भेज दिए गए हैं। इस संग्रहालय के क्यूरेटर रत्नचंद्र अग्रवाल भी बहुत से शिलालेखों को प्रकाश में लाए।

    इस दीर्घा में मेवाड़ क्षेत्र से प्राप्त द्वितीय शताब्दी ई.पू. से 19वीं शताब्दी ईस्वी तक के शिलालेख संगृहीत हैं जो मेवाड़ क्षेत्र के इतिहास को जानने का प्रमुख साधन हैं। इन शिलालेखों में सबसे प्राचीन घोसुण्डी शिलालेख है जो द्वितीय शताब्दी ई. पू. का है। यह चित्तौड़ से सात मील दूर नगरी के निकट घोसुण्डी से प्राप्त हुआ। यह लेख कई खण्डों में टूटा हुआ है। इनमें से एक बड़ा खण्ड उदयपुर संग्रहालय में सुरक्षित है। लेख की भाषा संस्कृत और लिपि ब्राह्मी है। इस शिलालेख में संकर्षण और वासुदेव के पूजा गृह नारायण वाटिका के चारों ओर पत्थर की चारदीवारी बनाने और गजवंश के पराशरी के पुत्र सर्वतात द्वारा अश्वमेध यज्ञ करने का उल्लेख है। जोगेन्द्रनाथ घोष के विचार से इस लेख में वर्णित राजा कण्ववंशीय ब्राह्मण होना चाहिए। जॉनसन के विचार से यह लेख किसी ग्रीक, शुंग या आन्ध्रवंशीय शासक का होना चाहिये। आन्ध्रों में ‘गाजायन’ नामक गोत्र तथा ‘सर्वतात्’ आदि नाम पाए जाते थे। इसके अतिरिक्त भीलवाड़ा जिले का वि.सं. 282 का नान्दसा यूप शिलालेख, छोटी सादड़ी का वि.सं. 547 का भामरमाता शिलालेख, कल्याणपुर शिलालेख एवं कुम्भलगढ़ से प्राप्त कुम्भा कालीन चार विशाल शिलालेख उल्लेखनीय हैं।

    चित्तौड़ से छः मील दूर स्थित नगरी (प्राचीन नाम माध्यमिका) से प्राप्त एक शिलालेख प्रदर्शित किया गया है। कुंद शिलालेख वि.सं. 718 का है जो सूर्यवंशी राजा अपराजित से सम्बन्धित है। राजा धवलप्पदेव का धौद शिलालेख, परमार वंश का डबोक शिलालेख, तेजसिंह का घाघसा बावड़ी का शिलालेख, चौहान वंश का अलावदा और लोहारी सती लेख, सूचिवर्मन एवं शक्तिकुमार का आहार शिलालेख भी इस संग्रहालय के प्रमुख आकर्षण हैं। संग्रहालय में एक फारसी शिलालेख भी उल्लेखनीय है जो गयासुद्दीन तुगलक के शासन के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण सूचना प्रदान करता है। इसी दीर्घा में कुम्भलगढ़ से प्राप्त 16 लेखयुक्त प्रतिमाएँ प्रदर्शित हैं जिनमें ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वाराही, दामोदर, वासुदेव, केशव, माधव, मधूसूदन एवं पुरुषोत्तम प्रमुख हैं।

    कुछ प्राचीन ताम्रपत्र भी इस संग्रहालय में प्रदर्शित किए गए हैं जिन पर धार्मिक प्रयोजन हेतु ब्राह्मणों को भूमिदान दिए जाने का उल्लेख है।

    प्रतिमा दीर्घा

    इस दीर्घा में मेवाड़ क्षेत्र से प्राप्त छठी शताब्दी से 18वीं शताब्दी ईस्वी की प्रस्तर प्रतिमाएँ प्रदर्शित की गई हैं। इन प्रतिमाओं को शैव सम्प्रदाय, वैष्णव सम्प्रदाय, जैन सम्प्रदाय तथा अन्य विषयों से सम्बन्धित प्रतिमाओं से विभक्त किया जा सकता है। इनमें जगत से प्राप्त इन्द्राणी की प्रतिमा तथा तनेसर से प्राप्त शिशु क्रीड़ा, छठी शताब्दी ईस्वी की मूर्ति कला का प्रतिनिधित्व करती हैं। बान्सी क्षेत्र के रानीमल्या का जैन कुबेर और कल्याणपुर से प्राप्त घुंघराले बालों से युक्त शिवमस्तक आठवीं शताब्दी ईस्वी की प्रमुख प्रतिमाएं हैं। कल्याणपुर से प्राप्त एक पुरुष प्रतिमा का भारी मस्तक भी इस संग्रहालय में रखा गया है। कल्याणपुर से ही त्रिनेश शिव प्रतिमा का एक मस्तक भी प्राप्त किया गया है। इसमें परमात्मा के चेहरे पर बहुत ही शांत भाव हैं। मस्तक पर बहुविध अलंकरण किया गया है।

    केजड़ा से प्राप्त नृत्यलीन वाराही तथा नागदा से प्राप्त शेषशायी विष्णु, आहार से प्राप्त भगवान विष्णु के मत्स्यावतार एवं कच्छप अवतार प्रतिमाएँ भी संग्रहालय का विशिष्ट आकर्षण हैं। कमल पुष्प पर आसीन देवी लक्ष्मी की एक प्रतिमा विभिन्न प्रकार के आभूषणों से अलंकृत है। इसमें देवी की देहयष्टि अत्यंत पुष्ट दिखाई दिखाई गई है। आहार से प्राप्त एक भारी कांस्य प्रतिमा भी प्रदर्शित की गई है। गुप्तोत्तर काल में दक्षिण-पश्चिम राजस्थान में हरे-नीले पत्थर (परेवा पत्थर) पर बहुत बड़ी संख्या में प्रतिमाओं का निर्माण किया गया। इस संग्रहालय में इस पत्थर की बहुत सी प्रतिमाएँ प्रदर्शित की गई हैं। भगवान शिव की परेवा पत्थर की 8वीं शताब्दी की एक प्रतिमा में भगवान किंचित बांकपन लेकर खड़े हैं। चार हाथों की इस प्रतिमा के तीन हाथ ही दिखाई देते हैं। एक हाथ में भगवान ने त्रिशूल पकड़ रखा है। एक हाथ में पुष्प है। भगवान के चरणों के पास नंदी खड़ा है।

    परेवा पत्थर पर ही चामुण्डा की एक प्रतिमा आठवीं शताब्दी की है। इसमें देवी के चार हाथ हैं, माथे पर सुंदर केश-सज्जा एवं मुकुट दिखाई दे रहे हैं। आठवीं शताब्दी की परेवा पत्थर की एक शिव प्रतिमा में भगवान शिव के मुखमण्डल पर प्रसन्नता विराज रही है। उन्होंने भीलों की तरह छोटा सा बाघम्बर बांध रखा है। सिर पर केशों की भारी सजावट की गई है। भगवान, नंदी का सहारा लेकर खड़े हैं। इस प्रतिमा की चार भुजाएं थीं किंतु अब केवल एक ही रह गई है।

    परेवा पत्थर से बनी नागिनी की एक प्रतिमा 9वीं-10वीं शताब्दी ईस्वी की है। परेवा पत्थर से बनी भगवान के वराह अवतार की एक दुर्लभ प्रतिमा दर्शनीय है। इसी प्रकार की एक वराह प्रतिमा जो कम से कम एक हजार वर्ष पुरानी रही होगी, लेखक ने बारां जिले में परवन नदी के किनारे काकूनी के भग्नावशेषों में पड़ी देखी थी जिसे एक मंदिर के परिसर में रखा गया था। सिंहवाहिनी क्षेमंकरी माता की प्रतिमा सौम्य भाव की है, यह 10वीं-11वीं शताब्दी की है। देवी के चरणों के पास सिंह का अंकन किया गया है। देवी के माथे पर जूड़ा एवं मुकुट है तथा मस्तक के पीछे प्रभामण्डल बनाया गया है। इसी काल का लाल पत्थर का एक कुबेर देखते ही बनता है, वह एक छोटे हाथी पर पालथी लगाकर बैठा है तथा उसके भारी शरीर के कारण हाथी दबा हुआ प्रतीत होता है। परेवा पत्थर पर बनी भगवान विष्णु की खड़ी प्रतिमा एवं शेषशायी प्रतिमा भी देखते ही बनती हैं। शेषशायी प्रतिमा में देवी लक्ष्मी भगवान के चरण चाप रही हैं। शिव-पार्वती की एक युगल प्रतिमा 10वीं-12 शताब्दी की है। यह भी परेवा पत्थर पर बनी है तथा अपेक्षाकृत अच्छी अवस्था में है।

    पंद्रहवीं शताब्दी ईस्वी में मेवाड़ राज्य के शिल्पिी सूत्रधार मण्डन ने इस क्षेत्र की मूर्ति कला को प्रभावित किया। उसके प्रभाव से युक्त मूर्तिकला की कई मूर्तियां इस संग्रहालय में देखी जा सकती हैं। साधारण लाल पत्थर से 15वीं शताब्दी में बनी कई प्रतिमाएँ इस संग्रहालय में हैं जिनमें ब्रह्माणी माता का एक पैनल, भगवान विष्णु का खड़ा विग्रह, दामोदर स्वरूप का विग्रह, वासुदेव स्वरूप का विग्रह, अनिरुद्ध स्वरूप का विग्रह, केशव स्वरूप, प्रद्युम्न स्वरूप तथा भगवान के पुरुषोत्तम स्वरूप के विग्रह प्रदर्शित किए गए हैं। पंद्रहवीं शताब्दी का अधोक्षजा स्वरूप का विग्रह भी दर्शनीय है। इस प्रतिमा के दोनों हाथ तथा वैजयंती माला का काफी भाग खण्डित हैं। कुंभलगढ़ से प्राप्त वैष्णवी की एक प्रतिमा पर ई.1458 का शिलालेख अंकित है। पंद्रहवीं शताब्दी ईस्वी की भगवान संकषर्ण की प्रतिमा अपेक्षाकृत अच्छी अवस्था में है। यह लाल पत्थर से निर्मित है। परेवा पत्थर पर बनी एक चतुर्भुजी ब्रह्मा की प्रतिमा के चारों ओर अलंकृत परिकर बनाया गया है। यह 17वीं शताब्दी की प्रतिमा है तथा परेवा पत्थर से निर्मित है।

    परेवा पत्थर पर निर्मित भगवान विष्णु एवं देवी लक्ष्मी की रागात्मक भाव की एक सौम्य प्रतिमा 16वीं शताब्दी ईस्वी की है। परेवा पत्थर से बनी इंद्राणी की एक प्रतिमा मध्यकाल की है। इसमें इन्द्र की पत्नी कमल असन पर विराजमान है। उसकी सवारी ऐरावत भी कमल के नीचे अंकित है। इन्द्राणी के चार हाथ हैं, मस्तक एवं गले में बहुत सुंदर आभूषण एवं अलंकरण हैं। यह छठी शताब्दी ईस्वी की प्रतिमा है जो जगत से प्राप्त हुई थी। इन्द्राणी ने अपना बायां पैर मोड़कर अपनी दायीं जंघा के पास रखा हुआ है तथा दायां पैर आसन से नीचे लटक रहा है। देवी के चेहरे पर आत्म गौरव एवं आत्मविश्वास के भाव हैं। परेवा पत्थर पर बनी द्वारपाल की एक प्रतिमा 16वीं शताब्दी की है।

    वाराही की एक मनुष्याकार प्रतिमा 15वीं शती की है तथा लाल पत्थर पर निर्मित है। यह भी मातृका का ही अंकन है। इस पर उसी काल का एक लेख अंकित है जिसके अनुसार महाराणा कुंभा (ई.1433-68) ने इस प्रतिमा को लगवाया। यह प्रतिमा कुंभलगढ़ से लाई गई प्रतीत होती है। सोलहवीं शती की लाल पत्थर की गणेश प्रतिमा का शिल्प देखते ही बनता है। भगवान की दोनों जंघाओं पर रिद्धि एवं सिद्धि विराजमान हैं। मध्यकाल के एक अत्यंत सुंदर पैनल में अष्ट भुजाओं वाले शिव का अंकन किया गया है किंतु इस प्रतिमा का सिर उपलब्ध नहीं है। भगवान ने अपने हाथों में कमल, त्रिशूल, खट्वांग, सर्प तथा कपाल धारण कर रखे हैं। भगवान ने अपने दो हाथ अपनी गोद में रख रखे हैं। भगवान के दोनों तरफ चंवरधारिणियों का अंकन किया गया है। सूर्य एवं सुरसुन्दरी आदि प्रतिमाएँ दर्शकों को पंद्रहवी शती के कालखण्ड का अनुभव करावाने में सक्षम हैं।

    जैन प्रतिमाओं में 7वीं-8वीं शती की जैन कुबेर की भारी शरीर सौष्ठव वाली प्रतिमा अपेक्षाकृत बहुत अच्छी अवस्था में है। पंद्रहवीं-सोलहवीं शती की आदिनाथ की प्रतिमा तथा तीर्थंकर की एक मस्तक विहीन प्रतिमा प्रमुख हैं। जैन तीर्थंकर का एक घुंघराले बालों के अंकन वाला मस्तक अलग से प्रदर्शित किया गया है। संभवतः यह मस्तक संग्रहालय की ही मस्तक विहीन प्रतिमा का हो। क्षीण कटि एवं स्थूल पीन पयोधरों से युक्त एक मनोहारी जैन देवी की प्रतिमा इस क्षेत्र में पाए जाने वाले साधारण लाल पत्थर से बनी हुई है। संग्रहालय में मध्यकालीन शिल्पकला का एक अनुपम नमूना तोरण के एक खण्ड के रूप में उपलब्ध है। इसमें गुलाब की पत्तियों एवं ज्यामितीय आकृतियों का अद्भुत अंकन किया गया है।

    चित्रकला दीर्घा

    राजीय संग्रहालय उदयपुर की चित्रकला दीर्घा में लगभग आठ हजार लघु चित्र प्रदर्शित किए गए हैं जो संसार में मेवाड़ शैली का सबसे विशाल संग्रह है। इस संग्रह का अध्ययन करने के लिए देश-विदेश के शोधकर्ता उदयपुर संग्रहालय आते हैं। ई.1979 में बनेड़ा निवासी अक्षय देराश्री ने 143 लघुचित्र उदयपुर संग्रहालय को भेंट किए जिनमें जयपुर और मालपुरा शैली के चित्र भी प्रमुख हैं। इन लघु चित्रों का काल ई.1630 से ई.1900 तक विस्तृत है। संग्रहालय में सबसे प्राचीन लघुचित्र रसिकप्रिया पर आधारित हैं। इन लघुचित्रों का चित्रकार साहबदीन था जिसकी शैली इतनी स्वभाविक एवं समृद्ध थी कि उस परम्परा का प्रभाव मेवाड़ की कला पर आज भी देखा जा सकता है। महाराणा अमरसिंह (द्वितीय) (ई.1698-1710) के काल के रसिकप्रिया के 47 चित्र संग्रहालय की अमूल्य निधि हैं। कुछ चित्र एकलिंग महात्म्य से सम्बन्धित हैं। कृष्ण द्वैपायन द्वारा लिखित हरिवंश के श्लोकों में आए प्रसंगों को आधार बनाकर, मध्यकाल में चित्र बनाने की परम्परा रही है। इस परम्परा के कुछ चित्र इस संग्रहालय में रखे हैं।

    महाभारत, कृष्णावतार चरित (भागवत), कादम्बरी, रघुवंश, रसिकप्रिया, वेलि कृष्ण रुक्मणि, मालती माधव, गीत गोविन्द, पृथ्वीराज रासो, सूरसागर, बिहारी सतसई एवं पंच-तंत्र पर आधारित लघुचित्र भी उल्लेखनीय हैं। फारसी एवं अरबी ग्रन्थों पर आधारित ‘कलीला-दमना’ और ‘मुल्ला दो प्याजा’ के लतीफों पर आधारित लघुचित्र भी संग्रहालय में संगृहीत हैं। एक चित्रित एलबम ‘दर्शनों की किताब’ के नाम से उपलब्ध है। एक एलबम में मेवाड़ के राणा उदयसिंह से महाराणा भीमसिंह (ई.1778-1828) तक के चित्र हैं। इस एलबम में मीराबाई का चित्र भी महत्वपूर्ण है। प्रति वर्ष लगभग दस हजार देशी एवं डेढ़ हजार विदेशी दर्शक संग्रहालय को देखने आते हैं।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-44

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-44

    पर्यावरणीय संस्कृति की अभिव्यक्ति हैं लोकनाट्य


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    लोकनाट्यों की समृद्ध परंपरा में ख्याल, रम्मत, फड़, नौटंकी, स्वांग, गवरी, गंधर्व-नाट्य, भवाई, तमाशा, आदि प्रमुख हैं। कुचामन, चिड़ावा तथा शेखावाटी के ख्याल, जयपुर क्षेत्र का तमाशा, भरतपुर तथा धौलपुर की नौटंकी एवं लगभग पूरे प्रदेश में दिखाये जाने वाले स्वांग, लीला, फड़, भवाई आदि प्रमुख हैं। भाण्ड, बहरूपिये तथा भोपे आदि एकल लोक नाट्यों के लिये प्रसिद्ध हैं।

    रम्मत

    रम्मत का अर्थ खेल होता है किंतु प्राचीन काल में अभिनीत काव्य रचनाओं को रम्मत कहा जाता था। राजस्थान में बीकानेरी रम्मतें सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। इस खेल को खेलने वाले को खेलार कहा जाता है। सामान्यतः पौराणिक आख्यानों को केंद्र में रखकर रम्मतें खेली जाती हैं। बीकानेर के मनीराम व्यास, फागू महाराज, सूआ महाराज, तुलसीराम आदि रचनाकारों ने रम्मत लोक नाट्य के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। हेडाऊ मेरी री रम्मत, अमरसिंह री रम्मत, सांग मेरी री रम्मत आदि अत्यधिक लोकप्रिय हैं। बीकानेर के अतिरिक्त पोकरण, फलौदी एवं जैसलमेर में भी रम्मत खेली जाती हैं। रम्मत का प्रदर्शन धरातल से थोड़े ऊँचे एवं साज सज्जा युक्त रंगमंच पर किया जाता है। रम्मत आरंभ होने से पहले सारे मुख्य कलाकार मंच पर आकर दर्शकों के सामने आकर बैठ जाते हैं। रम्मत के मुख्य वाद्य नगाड़ा एवं ढोल होते हैं। रम्मत के प्रदर्शन से पूर्व चौमासा गीत, लावणी गीत, गणपति वंदना और रामदेवजी के भजन गाये जाते हैं।

    ख्याल

    जब ओपन थियेटर में नृत्य विधा के साथ नाटक किया जाता है तो उसे ख्याल कहते हैं। इसमें नाटक के सभी तत्व गायन, वादन, नृत्य तथा अभिनय आदि मौजूद रहते हैं। माना जाता है कि आधुनिक नाटक की उत्त्पत्ति ख्याल से ही हुई है। 18 वीं शताब्दी से लोक नाट्य के रूप में ख्याल का प्रचलन आरंभ हुआ। राजस्थान में सैंकड़ों ख्याल खेले जाते थे। राजस्थान में कुचामणी, जयपुरी, तुर्रा कलंगी, हाथरसी, शेखावाटी, अलीबख्शी, किशनगढ़ी, मांची आदि ख्याल लोकप्रिय थे।

    चिड़ावी ख्याल : इसे शेखावाटी ख्याल भी कहते हैं। इसमें अच्छा पद संचालन, सरल भाषा, मुद्रा में गीत गायन, वाद्य यंत्र की उचित संगत होती है। शेखावाटी ख्याल की रचना नानूराम द्वारा की गयी थी। उनके हीर रांझा, हरिश्चंद्र, भृतहरि, जयदेव नामक ख्याल अधिक प्रसिद्ध हुए। इलिया राणा भी शेखावाटी ख्याल के प्रमुख कलाकार हैं।

    तुर्रा कलंगी ख्याल : तुर्रा कलंगी ख्याल का निर्माण शाह अली और तुकनगीर नामक व्यक्तियों द्वारा किया गया था। तुर्रा व कलंगी को हिन्दू व मुसलमान खिलाड़ियों द्वारा प्रस्तुत किया जाता था। शिवदयाल द्वारा नागौरी चतुर सुजाण, सूरत की वन मालन, कंवर रिसालू और राणी बालक दे नामक ख्यालों की रचना की गयी।

    बीकानेर ख्याल : बीकानेर ख्याल भी अत्यधिक लोकप्रिय थे। मोतीलाल एवं गांपीचंद द्वारा अमरसिंह राठौड़ पर आधारित ख्यालों की रचना की गयी। खींवो आभल, हीर रांझा, पूरणमल भगत आदि ख्याल भी बड़े प्रसिद्ध हैं।

    कुचामणी ख्याल : कुचामणी ख्यालों का निर्माण लच्छी राम द्वारा किया गया।

    जयपुर ख्याल : जयपुर ख्यालों में स्त्रियां भी भूमिकाएं करती हैं।

    फड़

    फड़ चित्रकला की एक विशिष्ट शैली होती है जिसे भोपा जाति के व्यक्तियों द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। फड़ का निर्माण 30 फुट लम्बे और 5 फुट चौड़े कपड़े पर किया जाता है। इस कपड़े पर लोक देवता अथवा लोक नायक का जीवन चरित्र चित्रों के माध्यम से लोक शैली में चित्रित किया जाता है। भोपा इस फड़ को दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं तथा भोपी इस फड़ के समक्ष नृत्य करती है। वह जो नृत्य प्रस्तुत करती है उसके बारे में फड़ पर बने चित्र की ओर संकेत करती रहती है। इस समय भोपा भी जंतर मंतर अथवा रावण हत्था बजाता है। पाबूजी की फड़ एवं देवजी की फड़ अत्यधिक प्रसिद्ध हैं। लोक देवता देवनारायण के जीवन चरित्र पर आधारित एक फड़ पश्चिमी जर्मनी के कला संग्रहालय में विद्यमान है।

    नौटंकी

    नौटंकी का खेल प्रायः विवाह समारोह, मांगलिक अवसर, मेले, प्रदर्शनी, त्यौहार एवं सामाजिक उत्सव के समय किया जाता है। यह लोक नाट्य भरतपुर, करौली, धौलपुर, अलवर, सवाई माधोपुर और गंगापुर आदि स्थानों पर अत्यधिक लोकप्रिय है। भरतपुर क्षेत्र में हाथरस शैली की नौटंकी अत्यधिक प्रसिद्ध है। नौटंकी एक पुरानी ख्याल शैली है। इस शैली में मुख्यतः नक्कारे का प्रयोग होता है। उसके साथ शहनाई, सारंगी, ढोलक, डफली, हारमोनियम व चिकारा आदि वाद्ययंत्र भी बजाये जाते हैं। भरतपुर क्षेत्र में नौटंकी पार्टियों द्वारा अमरसिंह राठौड़, आल्हा ऊदल, शियोपोष, शंकरगढ़, इन्द्रलहरण, हरिश्चंद्र-तारामती, माधवानल, कामदेव, सत्यवान-सावित्री, फूलमदे, लैला मजनूं, भक्त पूरणमल आदि के आधार पर नाटकों का प्रदर्शन किया जाता है। नौटंकियों में महिला पात्र भी भाग लेती हैं तथा पुरुष भी महिला पात्रों के वस्त्र पहन कर उनका अभिनय करते हैं। नौटंकी में ख्याल गायकी के संवादों में लावणी, सादी, हाथरसी रंगत, बहरतबील, रसिया, लंगड़ी, दबोला, चौबोला, कव्वाली, गजल, दादरा और ठुमरी आदि की प्रमुखता रहती है।

    स्वांग

    स्वांग लोक नाट्य का एक महत्त्वपूर्ण स्वरूप है। इसके अंतर्गत किसी लोक नायक अथवा देवी, देवता, पौराणिक अथवा ऐतिहासिक पात्र, पौराणिक अथवा ऐतिहासिक कथानक के आधार पर स्वांग रचा जाता है। स्वांग रचने वाले व्यक्ति को बहरूपिया कहा जाता है। राजस्थान में इस लोकनाट्य का प्रारंभ 13-14वीं शताब्दी माना जाता है। मारवाड़ क्षेत्र में रावल जाति के लोग स्वांग रचा करते थे। इस क्षेत्र के स्वांग नाट्यों में चाचा बोहरा, मियां बीवी, जोगी जोगन, कालबेलिया, बीकाजी, मेना गूजरी, सेठ सेठानी और अर्द्धनारीश्वर आदि स्वांगों की प्रधानता थी। भांड एवं भानमती जाति के व्यक्तियों द्वारा स्वांग नाट्य प्रस्तुत किया जाता है। राजस्थान के जानकीलाल भांड ने बहुरूपिया कला को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलायी है। स्वांग नाट्य कला हास्य प्रधान होती है। कलाकार विचित्र भेष धारण करके लोगों का मनोरंजन करते हैं। इस कला को खुले स्थान पर प्रस्तुत किया जाता है। लकड़ी के दो तख्तों पर विभिन्न वाद्ययंत्र रख दिये जाते हैं और स्वांग कलाकार विभिन्न भेष धरकर हास्य संवादों एवं गीतों के माध्यम से लोगों का मनोरंजन करते हैं। भरतपुर क्षेत्र में होली के अवसर पर स्वांग कला का प्रदर्शन किया जाता है। इस अवसर पर स्त्रियां ब्रज रसिया और होली के गीत गाती हैं तथा पुरुषों पर रंग गुलाल की वर्षा और लकड़ी से वार करती हैं।

    रासलीला

    इस लोक नाट्य का मंचन पौराणिक लोक कथाओं के आधार पर किया जाता है। इनमें धार्मिक भावनाओं की प्रधानता होती है। वस्तुतः रासलीला में समस्त नौ रंगों का समावेश पाया जाता है। राधा व कृष्ण की प्रेम लीलाओं को दर्शक अधिक पसंद करते हैं। भरतपुर जिले में रासलीलाओं का आयोजन होता रहता है। इस क्षेत्र में हर गोविंद स्वामी और रामसुख स्वामी के रासलीला मंडल अधिक प्रसिद्ध हैं। इन दोनों दलों द्वारा रासलीला का प्रदर्शन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी किया जाता है। ये दोनों दल ब्रज भाषा में ही रासलीलाओं का प्रदर्शन करते हैं।

    गवरी

    यह मेवाड़ के अरावली क्षेत्र के भीलों की एक नाट्य शैली है। भील जाति के लोग गवरी उत्सव का आयोजन करते हैं। यह उत्सव उदयपुर क्षेत्र में 40 दिनों तक आयोजित किया जाता है। इस अवसर पर भील जाति के लोग एक दिन में एक बार ही भोजन करते हैं। इस कला में स्त्रियों की भूमिका को भी पुरुषों द्वारा निभाया जाता है। गवरी नृत्य का मुख्य नायक एक वृद्ध व्यक्ति होता है जिसे शिव का अवतार माना जाता है। इस नृत्य में खेड़लिया, खेतड़ी, बणजारा, नट-नटी, बादशाह की सवारी आदि प्रसंग महत्त्वपूर्ण होते हैं। यह नृत्य विचित्र वेशभूषा एवं मुद्रा में प्रस्तुत किया जाता है। इस नाट्य के प्रत्येक प्रसंग की समाप्ति पर पुजारी (भोपा) के शरीर में भैरवनाथ का प्रवेश होता है। इस अवसर पर सभी भील एक गोला बनाकर नाचने लगते हैं। गवरी नाट्य शैली राजस्थान की एक विशिष्ट नाट्य शैली है।

    भवाई

    यह नृत्य नाटिका सगोजी और सगीजी (समधी और समधन) के रूप में भोपा और भोपी के द्वारा प्रस्तुत की जाती है। इस नृत्य नाटिका में बीकाजी के खेलों की प्रधानता होती है। इस अवसर पर ढोलक, झांझ और सारंगी आदि वाद्यों और मशाल का प्रयोग किया जाता है।

    तमाशा

    जयपुर नरेश प्रतापसिंह द्वारा तमाशे की परंपरा को आरंभ किया गया। यह लोक नाट्य जयपुर ख्याल और धु्रपद गायकी का मिश्रित रूप है। इसके प्रवर्तक पं. बंशीधर भट्ट हैं। यह लोक नाट्य प्रायः गोपीचंद, हीर रांझा आदि पर आधारित होता है।

    नाट्य

    गंधर्व नाट्य : मारवाड़ क्षेत्र में 'गंधर्व'जाति पायी जाती है। यह जाति पेशेवर नृत्य एवं गायन करती है। इनके द्वारा अंजना सुंदरी और मैना सुंदरी नामक संगीत नाट्यों का प्रदर्शन किया जाता है। यह संगीत नाट्य जैन धर्म पर आधारित होते हैं। अतः जैन समाज के व्यक्ति इन संगीत नाट्यों को अत्यधिक पसंद करते हैं। यह संगीत नाट्य धार्मिक उद्देश्य से खेले जाते हैं।

    बैट्की नाट्य : यह लोक नाट्य जमीन पर बैठकर प्रदर्शित किया जाता है। इस नाट्य को प्रस्तुत करने वाले दो दल आमने-सामने बैठकर छंदबद्ध सवाल जवाब करते हैं। यह नाट्य प्रायः दो रूप में प्रस्तुत किया जाता है। प्रथम प्रेम भाव से तथा द्वितीय जीत हार के भाव से। जीत हार वाले नाट्य में विजयी दल पराजित दल के वाद्ययंत्र प्राप्त कर लेता है। बैट्की नाट्य प्राचीन तुर्रा कलंगी ख्यालों का रूप है।

    दंगली नाट्य : इस लोक नाट्य में लोग सैंकड़ों की संख्या में दो दलों में आमने सामने खड़े हो जाते हैं और बारी बारी से नाचते हुए किसी कथा अथवा समसायिक घटना को काव्य शैली में प्रारंभ करते हैं। ऐसे लोक नाट्य को संगीत दंगल भी कहा जाता है। दंगली नाट्यों में कन्हैया, हेला, भेंट और ढपली ख्याल के दंगल अत्यधिक लोकप्रिय हैं। करौली क्षेत्र कन्हैया के दंगल और धौलपुर का बाड़ी-बसेड़ी क्षेत्र भेंट के दंगल के लिये प्रसिद्ध है।

    सवारी नाट्य : सवारी अथवा जुलूस के रूप में नाट्य प्रदर्शन राजस्थान की एक प्राचीन परंपरा है। यह नाट्य धार्मिक एवं पौराणिक आख्यानों पर आधारित होता है। सांगोद का न्हाण, चित्तौड़ जिले के बसी गाँव का गणेश, ब्रह्मा, कालिया, काला गोरा देव, नृसिंहावतार तथा जयपुर के गीजगढ़ में नृसिंह-प्रहलाद, नारद, शुक्राचार्य, महादेव तथा कादरा भूतरा के स्वांग आदि सवारी नाट्य अधिक लोकप्रिय हैं। रामलीलाओं की सवारी का आयोजन पूरे राजस्थान में किया जाता है। भरतपुर जिले के जुरहरा नामक स्थान की रामलीला सवारी अत्यधिक प्रसिद्ध है।

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  • अध्याय - 14 श्रीमद्भगवत्गीता का धर्म-दर्शन

     02.06.2020
    अध्याय - 14 श्रीमद्भगवत्गीता का धर्म-दर्शन

    श्रीमद्भगवत्गीता का धर्म-दर्शन


    बौद्ध धर्म के प्रतिकार के लिए ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने भगवद्गीता को एक अस्त्र के रूप में प्रयोग किया। - डॉ. भीमराव अम्बेडकर


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    महाभारत नामक महाकाव्य में कौरव-पाण्डव युद्ध की मूल कथा के साथ-साथ अध्यात्म-रामायण, विष्णु-सहस्रनाम, अनुगीता, श्रीमद्भगवत्गीता और हरिवंश-पुराण आदि ग्रंथ भी समाहित हैं। महाभारत की कथा के आधार पर भारतीय जन मानस में यह धारणा प्रचलित है कि भगवद्गीता, भगवान श्रीकृष्ण के मुख से प्रकट हुुई। भगवान ने गीता का उपदेश अपने शिष्य अर्जुन को कुरुक्षेत्र के मैदान में दिया। महाभारत के भीष्मपर्व में 23 से 40वें अध्याय तक गीता के अट्ठारह अध्याय वर्णित हैं। साहित्यिक एवं पुरातात्विक स्रोतों के आधार पर भारत में मान्यता है कि महभारत का युद्ध ईस्वी पूर्व 3102 में अर्थात् आज से लगभग 5120 वर्ष पूर्व हुआ। अतः भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र में गीता का उपदेश देने की घटना उसी समय हुई होगी।

    श्रीमद्भगवत्गीता का रचनाकाल

    आधुनिक भाषाशास्त्री, इतिहासकार, दर्शनत्रशास्त्री तथा अन्य क्षेत्रों के विद्वान महाभारत युद्ध के काल को महाभारत ग्रंथ का रचना काल नहीं मानते। उनके अनुसार ग्रंथ की रचना, युद्ध के बहुत बाद में हुई। महाभारत नामक ग्रंथ की रचना का मूल समय ई.पू. चौथी शताब्दी माना जाता है। इसका वर्तमान स्वरूप चौथी शताब्दी ईस्वी में सामने आया। अतः गीता भी उसी काल की अथवा उसके बाद के किसी काल की रचना होनी चाहिए।

    बाली द्वीप से गीता की एक अत्यंत प्राचीन पाण्डुलिपि प्राप्त हुई है जिसमें केवल अस्सी श्लोक ही हैं। बहुत से विद्वान इसी को गीता की मूल प्रति मानते हैं जिसे बाद में 700 श्लोकों में बदल दिया गया। भारतीय मुख्य भूमि और बाली द्वीप के बीच आर्यों एवं द्रविड़ों का आना-जाना रामायण काल एवं उससे भी पहले से है। अतः बाली में मिली गीता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

    आधुनिक काल में प्राप्त श्रीमद्भगवत्गीता में चार मनुओं का उल्लेख है-

    विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवे अब्रवीत्। (4, 1)

    महर्षयरू सप्त पूर्वे चत्वारो मनुस्तथा। (10, 6)

    बाद में मनुओं की संख्या बढ़कर 14 हो गई। कुछ पुराणों में 28 मनुओं की मान्यता भी है। अतः यह कहा जा सकता है कि गीता का लेखन पौराणिक काल से पहले उस समय हुआ जब देश में चार मनुओं को ही मान्यता थी। यह काल उपनिषदों का काल है। पुराण उस समय भविष्य के गर्भ में थे। इसीलिए गीता पुराण नहीं है, उपनिषद है। गीता में उपलब्ध सामग्री पर ध्यान देने से ज्ञात होता है कि वर्तमान गीता में ब्रह्मसूत्र, तीन वेद तथा वेदांत का उल्लेख है।

    सांख्य दर्शन तथा योग का विचार भी गीता में अपने चरम पर है। गीता में अहिंसा, शील, यज्ञकर्म, पीपल की श्रेष्ठता, कुबेर यक्ष आदि की पूजा का उल्लेख किया गया है। ऐसे ही प्रमाणों के आधार पर गीता की रचना के काल का अनुमान लगाया जा सकता है। गीता में अवतारवाद को पूरी तरह स्थापित किया गया है और श्रेष्ठ कर्म को भी योग बताया गया है। आधुनिक भाषाशास्त्री, इतिहासकार तथा दर्शनशास्त्री यह सिद्ध करने में सफल रहे हैं कि मूल रूप में भगवद्गीता, महाभारत का हिस्सा नहीं थी, यह गुप्त शासकों के काल में प्रक्षेपक के रूप में महभारत में जोड़ी गई।

    इस घटना का उल्लेख पांचवी शताब्दी ईस्वी में गुप्त शासकों के समय भारत आए फाह्यान ने किया है। वह लिखता है- 'भाइयों के बीच झगड़े को लेकर लिखे गए एक बड़े ग्रंथ में उपदेशात्मक वचनों को जोड़ने को लेकर उन दिनों देशवासी चर्चा करते थे।' गीता के काल पर विशद् शोध करने वाले प्रोफसर दामोदर धर्मानंद कोसंबी ने माना है कि गीता पहले अलग गं्रथ थी, गुप्तकाल के आसपास यह महाभारत में सन्निवेशित हुई। इस कथन से यह सिद्ध होता है कि गुप्तकाल में गीता न केवल मौजूद थी अपितु महाभारत का हिस्सा बन गई थी।

    इससे यह भी अनुमान लगाया जा सकता है कि गीता के 80 श्लोक, महाभारत में जुड़ने से पहले ही 700 श्लोकों में बदले गए होंगे। आधुनिक शोधों के आधार पर माना गया है कि भगवद्गीता की रचना ई.पू. पांचवी शताब्दी में हुई। अर्थात् मौर्य काल से भी सौ साल पहले। बाद में इसके मूल पाठ में अनेक हेर-फेर होते रहे। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन् के अनुसार गीता की मूल रचना ई.पू.200 में अर्थात् शुंगकाल में हुई थी और इसका वर्तमान स्वरूप ईसा की दूसरी शताब्दी में किसी वेदांती द्वारा तैयार किया गया था।

    गीता का प्राचीन स्वरूप

    गुप्तकाल से पहले भारत में एक भी ग्रंथ ऐसा नहीं मिला है जिसमें भगवद्गीता का उल्लेख किया गया हो किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि गीता इससे पहले अस्तित्व में नहीं थी। वह किसी स्वतंत्र ग्रंथ की तरह दर्शनशास्त्र का एक ग्रंथ थी। उसे भगवान की वाणी के रूप में मान्यता नहीं मिली थी और उस काल की गीता का दर्शन भी आज की गीता से भिन्न था। होपकिन्स का विचार है कि गीता का अब जो कृष्ण-प्रधान स्वरूप मिलता है, वह पहले कोई पुरानी विष्णु-प्रधान कविता थी और उससे भी पहले वह कोई निस्सम्प्रदाय रचना थी। संभवतः विलम्ब से लिखा गया कोई उपनिषद्।

    पाश्चात्य विद्वान गर्बे के अनुसार भगवद्गीता पहले, सांख्य-योग सम्बन्धी एक ग्रंथ था जिसमें बाद में कृष्ण-वासुदेव की पूजा पद्धति आ मिली और ईस्वी पूर्व तीसरी शताब्दी में कृष्ण को विष्णु का रूप मानकर, इसका मेल, वैदिक परम्परा के साथ बिठा दिया गया। भारत में गर्बे का सिद्धांत सामान्यतः अस्वीकार किया जाता है। हाल्ट्ज्मन गीता को एक सर्वेश्वरवादी कविता का बाद में विष्णु-प्रधान बनाया गया स्वरूप मानते हैं। कीथ का विश्वास है कि मूलतः गीता, श्वेताश्वतर के ढंग की एक उपनिषद् थी परंतु बाद में उसे कृष्णपूजा के अनुकूल ढाल दिया गया।

    बार्नेट का विचार है कि गीता के लेखक के मन में परम्परा की विभिन्न धाराएं गड्डमड्ड हो गईं। फर्कुहार लिखता है कि यह एक पुरानी पद्य-उपनिषद् है जो संभवतः श्वेताश्वतर के बाद लिखी गई है और जिसे किसी कवि ने कृष्णवाद का समर्थन करने के लिए ईसा के बाद के किसी सन् में भगवद्गीता के वर्तमान स्वरूप में ढाल दिया है। रूडोल्फ ओटो का कथन है कि मूल गीता, किसी महाकाव्य का एक शानदार खण्ड थी और उसमें किसी प्रकार का कोई सैद्धांतिक साहित्य नहीं था।

    ओटो का विश्वास है कि सैद्धांतिक अंश प्रक्षिप्त है। इस विषय में उसका जैकोबी से मतैक्य है, जिसका विचार है कि विद्वानों ने मूल छोटे से केन्द्र-बिन्दु को विस्तृत करके वर्तमान रूप दे दिया है। इन विभिन्न मतों का कारण यह तथ्य प्रतीत होता है कि गीता में दार्शनिक और धार्मिक विचारों की अनेक धाराएं अनेक ढंगों से घुमा-फिरा कर एक जगह मिलाई गई हैं।

    पश्चिमी दार्शनिक सुकरात की मृत्यु ईसा से 399 साल पहले हुई। उनके विचारों में गीता के बहुत से सिद्धांतों का समावेश है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि उस काल में गीता का दर्शन धरती के अन्य हिस्सों में भी फैल चुका था। पुराने आचार्यों ने भगवद्गीता को, भक्त को सुनाई गई देववाणी की बजाए एक दार्शनिक विमर्श के धरातल पर ही देखा है। बहुत से भारतीय मानते हैं कि भारत में श्रीकृष्ण के जन्म से बहुत पहले से बहुत से उपनिषद मौजूद थे।

    भगवान श्री कृष्ण ने उन उपनिषदों के श्रेष्ठ विचारों के सार को गीता के रूप में उच्चारित किया। अतः यह कहा जा सकता है कि गीता के विचार किसी एक समय में प्रकट नहीं हुए। ये सैंकड़ों वर्षों के चिंतन का परिणाम हैं जो ईसा से लगभग पांच सौ साल पहले ठोस रूप ले चुके थे। बाली द्वीप से मिली गीता के 80 श्लोकों को गीता का एक प्रारम्भिक रूप माना जाना चाहिए।

    भगवद्गीता का वास्तविक लेखक

    भारतीय जनमानस इस बात को मानता है कि भगवद्गीता मूलतः भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सखा अर्जुन को कुरुक्षेत्र के युद्ध से पहले, उपदेश के रूप में कही। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण गीता का उपदेश देने से पहले, अर्जुन से कहते हैं- 'तुझसे पहले मैं गीता का पावन ज्ञान सूर्यदेव को सुना चुका हूँ।'

    डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्ण ने लिखा है कि जिस प्रकार हमें भारत के प्रारम्भिक साहित्य की लगभग सभी पुस्तकों के लखकों के नाम ज्ञात नहीं हैं, उसी प्रकार हमें गीता के रचयिता का नाम भी ज्ञात नहीं है। सर्वपल्ली राधाकृष्ण के अनुसार, गीता की रचना का श्रेय, भगवान वेदव्यास को दिया जाता है जो महाभारत के पौराणिक संकलनकर्ता हैं।

    आधुनिक काल के अनेक विद्वानों का मानना है कि युद्ध क्षेत्र में श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को 700 श्लोक बोलकर सुनाना संभव नहीं हुआ होगा। उन्होंने कुछ महत्वूपर्ण बातें कही होंगी जिन्हें बाद में किसी लेखक ने एक विशाल रचना के रूप में विस्तार से लिख दिया होगा। कृष्ण का उद्देश्य, मुक्ति का कोई लोकोत्तर उपाय प्रस्तुत करने का नहीं था, अपितु अर्जुन को उस भगवान की सर्वशक्तिशाली इच्छा को पूरा करने की विशेष सेवा के लिए तैयार करना था जो युद्धों के भाग्य का निर्णय करता है।

    चौथी शताब्दी ईस्वी के गुप्तकालीन कवि कालीदास के ग्रंथों रघुवंश एवं कुमारसंभव में गीता का उल्लेख हुआ है। सातवीं शताब्दी के हर्षकालीन कवि बाणभट्ट के ग्रंथ कादंबरी में भी गीता का उल्लेख मिलता है। पांचवी शताब्दी ईस्वी में गुप्तों के शासन काल में चीनी-यात्री फाह्यान भारत आया। उसने लिखा है कि 'भाइयों के बीच झगड़े को लेकर लिखे गए एक बड़े ग्रंथ में उपदेशात्मक वचनों को जोड़ने को लेकर उन दिनों भारतवासी चर्चा किया करते थे।' अर्थात् फाह्यान यह कहता है कि उसके भारत में आने से कुछ समय पहले महाभारत में गीता का समावेश किया गया था।

    इससे पहले 'गीता' एक स्वतंत्र ग्रंथ था। यह बात फाह्यान को किसी भारतीय ने बताई होगी। सातवीं शताब्दी में भारत की यात्रा पर आए चीनी यात्री-यात्री ह्वेनसांग ने अपने यात्रा वृत्तांत में एक ऐसी कथा का उल्लेख किया है जो गीता के प्रसंग से मिलती-जुलती है। गीता के विधिवत् और नियमित अध्ययन एवं टीका लिखने का काम आदि जगद्गुरु शंकराचार्य से प्रारंभ होता है।

    शंकराचार्य इस ग्रंथ के पहले टीकाकार माने जाते हैं। प्रोफेसर दामोदर धर्मानंद कोसंबी ने माना है कि गीता, गुप्तकाल के आसपास ही महाभारत में सन्निवेशित हुई। प्रोफेसर मेघनाद देसाई मानते हैं कि आदि शंकराचार्य के पूर्व, भारतीय ग्रंथों में गीता का उल्लेख बहुत कम हुआ है। आदि शंकराचार्य का जन्म ई.788 में माना जाता है। अर्थात् आठवीं शताब्दी के बाद ही भारत के साहित्य में गीता का उल्लेख होने लगा।

    प्रो. देसाई विभिन्न स्रोतों का हवाला देते हुए कहते हैं कि गीता के लिखने वाले कम से कम तीन लेखक थे, जो तीन अलग-अलग समयों में हुए। वे यह भी मानते हैं कि गीता अलग-अलग कालखंडों में अलग-अलग श्रोताओं को संबोधित थी। प्रो. देसाई के अनुसार प्रथम लेखक के श्रोता- पंडित, मुनि, योगी, तत्वदर्शी इत्यादि थे। दूसरे लेखक के श्रोता- चुने हुए यति, योगी आदि थे, जबकि तीसरे लेखक के श्रोता आमजन थे। डॉ. देसाई इस विवेचना में वे डॉ. गजानन खेर से काफी सहायता लेते हैं। खेर ने मराठी में 'मूल गीता की खोज' नामक शोध ग्रंथ लिखा था।

    प्रो. देसाई का मानना है कि गीता के तीसरे लेखक बादरायण थे जिन्होंने ब्रह्मसूत्र की रचना की थी। वे इन दोनों ग्रंथों में बहुत सी समानताएं पाते हैं। डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने गीता पर काफी विस्तार से लिखा है। उनकी मान्यता है कि बौद्ध धर्म के प्रतिकार के लिए ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने भगवद्गीता को एक अस्त्र के रूप में प्रयोग किया। स्वामी विवेकानंद ने लिखा है- 'गीता एक ऐसा सुंदर गुलदस्ता है, जिसमें उपनिषदों से चुन-चुनकर दार्शनिक सूक्तियों के खूबसूरत फूल सजाए गए हैं। गीता के लेखक ने अद्वैत, योग, ज्ञान, भक्ति आदि को सम्मिश्रित करने का काम किया है। उसने सभी सम्प्रदायों से सर्वश्रेष्ठ चुनाव किया और गीता की माला में पिरो दिया।'

    इस प्रकार कहा जा सकता है कि गीता किसी एक लेखक की लिखी हुई नहीं है, उसे बहुत लम्बे कालखण्ड में बार-बार परिवर्द्धित करके वर्तमान स्वरूप तक लाया गया। गीता का विचार निश्चित रूप से भगवान श्रीकृष्ण से पहले भी मौजूद था। इसीलिए वैष्णवीय तन्त्रसार में कहा गया है-


    सर्वोपनिषदो गावो, दोग्धा गोपाल नंदनः

    पार्थो वत्स सुधीर्भोक्ता, दुग्धम् गीतामृतम् महत्।

    अर्थात् भगवान श्रीकृष्ण ने समस्त उपनिषदों रूपी गायों को दुह कर गीतामृत रूपी दुग्ध प्राप्त किया तथा पृथा के पुत्र अर्जुन ने श्रद्धापूर्वक उसका सेवन किया।

    गीता की उपनिषदों से समानता

    गीता और उपनिषदों में शब्दों और विचारों की पर्याप्त समानता पाई जाती है। कठोपनिषद् का निम्नलिखित श्लोक गीता के द्वितीय अध्याय के बीसवें श्लोक से लगभग शब्दशः उद्धृत किया गया है-


    न जायते भ्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चित्र बभूव कश्चित्।

    अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।

    (कठोपनिषद्, 1.2.18)

    इसी प्रकार कठोपनिषद के निम्नलिखित श्लोक का गीता के द्वितीय अध्याय के उन्नीसवें श्लोक से तादाम्य है-


    हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम्।

    उभौ तौ न विजानोतो नायं हन्ति न हन्यते।।

    (कठोपनिषद्, 1.2.19)

    भगवत्गीता के द्वितीय अध्याय के उन्नीसवें श्लोक में कठोपनिषद के निम्नलिखित श्लोक से भाव ग्रहण किया गया है-


    श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यतः श्रृण्वन्तोऽपि बहवो यन्न विद्युः।

    आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धाश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः।।

    (कठोपनिषद्, 1.2.7)

    भगवत्गीता के आठवें अध्याय के ग्यारहवें श्लोक में कठोपनिषद का निम्नलिखित श्लोक लगभग शब्दशः उद्धृत किया गया है-


    सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वयन्ति।

    यदिच्छतो ब्रह्मचर्य चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत्।

    (कठोपनिषद्, 1.2.15)

    देवयान और पितृयान मार्गों का विचार सर्वप्रथम वेदों में आया था। इस विचार को उपनिषदों ने ग्रहण किया और बाद में गीता ने भी ग्रहण कर लिया। गीता के आठवें अध्याय के चौबीसवें एवं पच्चीसवें श्लोक में इसका वर्णन है-


    कुर्वन्नेह कर्माणि जिजीविषेच्छत समाः।

    एवं त्ययि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे।।

    (ईशावास्योपनिषद्, 2)

    गीता के ग्यारहवें अध्याय का विषय 'विश्वरूप दर्शन' मुण्डकोपनिषद् के निम्नलिखित श्लोक से प्रेरित है-


    अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यो दिशः श्रोत्रे, वाग् विवृताश्च वेदाः।

    वायुः प्राणो, हृदय विश्वमस्य पदभ्यां ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा।।

    (मुण्डकोेपनिषद्, प्प्ण्1.4.)

    गीता के तृतीय अध्याय का बयालीसवां श्लोक कठोपनिषद के निम्नलिखित श्लोक के दर्शन से साम्य रखता है-


    इन्द्रियेभ्यः पराहह्यार्था अर्थेभ्यश्चः परं मनः।

    मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः।

    (कठोपनिषद्, प्ण्3,10-11)

    गीता ने श्वेताश्वतरोपनिषद् के ईश्वरवाद और भक्ति तथा उपसना के महत्व को भी ग्रहण किया है। कठोपनिषद् में जिस अश्वत्थ वृक्ष का वर्णन किया गया है ठीक वैसा ही गीता के पन्द्रहवें अध्याय में भी किया गया है परन्तु जहां कठोपनिषद् ने अश्वत्थ वृक्ष को 'ब्रह्म' माना है और 'सद्' मानने के कारण उसका नाश असम्भव माना है वहीं गीता ने उसको 'संसार' और 'असद्' माना है और इसलिए उसको उखाड़ फैंकने का उपदेश दिया है। अश्वत्थ शब्द का प्रयोग संसार के लिए ही उचित बैठता है क्योंकि अश्वत्थ का शाब्दिक अर्थ है- जो कल तक नहीं ठहरता, अर्थात् नाशवान्।

    यहाँ यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि वेदों एवं उपनिषदों से लिए गए संदर्भों की गीता में पुनरावृत्ति मात्र नहीं की गई है अपितु उन दार्शनिक सिद्धांतों का आगे विकास करने की दृष्टि से उन्हें ग्रहण किया गया है। उपनिषद् शास्त्रार्थ की तरह लिखे गए हैं जबकि गीता व्याख्यान की तरह है। उपनिषदों में ज्ञान, कर्म और भक्ति तीनों मार्गों का विवरण होने पर भी ज्ञान पर अधिक जोर दिया गया है, गीता उपनिषदों से अधिक व्यावहारिक और समन्वयवादी है। गीता में 'कर्म' और 'भक्ति' पर विशेष बल दिया गया है तथा प्रवृत्ति और निवृत्ति का समन्वय किया गया है।

    डॉ. राधाकृष्णन् के अनुसार गीता में परस्पर विरोधी तत्वों का समवन्य करके उन्हें पूर्णता दी गई है। स्वयं वेदव्यासजी ने गीता के अंत में कहा है-


    गीता सुगीता कर्त्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरै।

    यां स्वयं पद्मानाभस्य मुखपद्माद्विनिसृता।।

    अर्थात् गीता को भली प्रकार पढ़कर अर्थ और भाव सहित अन्तःकरण में धारण कर लेना मुख्य कर्त्तव्य है। जो कि स्वयं श्री पद्मनाभ भगवान् विष्णु के मुखारविन्द से निकली हुई है। फिर अन्य शास्त्रों से क्या प्रयोजन है! विलियम वॉन हम्बोल्ट ने लिखा है- 'गीता किसी ज्ञात भाषा में उपस्थित गीतों में सम्भवतः सर्वाधिक सुन्दर और एकमात्र दार्शनिक गीत है।'

    क्या गीता में बहुत से गं्रथों के सिद्धांतों का मेल है ?

    भारतीय चिंतन परम्परा अनेक दार्शनिक मतों का उदय हुआ जिनमें परस्पर विरोधी विचार प्रकट किए गए हैं। गीता के लेखक ने इन विरोधी एवं असंगत दिखाई पड़ने वाले तत्वों को मिलकार एक क्रमबद्ध सूत्र में पिरो दिया है जिन्हें स्वीकार करके, पाठक सच्चे आत्मिक जीवन की ओर बढ़ सकता है। गीता पर भाष्य एवं टीकाएँ संस्कृत साहित्य परम्परा में उन ग्रन्थों को 'भाष्य' कहते हैं जो दूसरे ग्रन्थों के अर्थ की वृहद व्याख्या या टीका प्रस्तुत करते हैं। भारतीय दार्शनिक परंपरा में किसी भी नये दर्शन को मान्यता पाने के लिए उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र तथा गीता पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करना पड़ता था अर्थात् उनका भाष्य उनकी टीकाएँ लिखनी होती थीं। इस कारण गीता पर अनेक दार्शनिकों एवं धर्माचार्यों ने टीकाएँ लिखीं। संप्रदायों के अनुसार उन टीकाओं की संक्षिप्त सूची इस प्रकार है-

    (1.) अद्वैत सम्पद्राय के आचार्यों द्वारा गीता की टीकाएँ: ;पद्ध शंकराचार्य कृत शांकराभाष्य, ;पपद्ध श्रीधर कृत सुबोधिनी, ;पपपद्ध मधुसूदन सरस्वती कृत गूढ़ार्थ दीपिका।

    (2.) विशिष्टाद्वैत सम्पद्राय के आचार्यों द्वारा गीता की टीकाएँ : ;पद्ध यामुनाचार्य कृत गीता अर्थसंग्रह, जिस पर वेदांत देशिक कृत गीतार्थ-संग्रह रक्षा टीका है। ;पपद्ध रामानुजाचार्य कृत गीताभाष्य, जिस पर वेदांत देशिक कृत तात्पर्य चंद्रिका टीका है।

    (3.) द्वैत सम्पद्राय के आचार्यों द्वारा गीता की टीकाएँ : ;पद्ध मध्वाचार्य कृत गीताभाष्य, जिस पर जयतीर्थकृत प्रमेय दीपिका टीका है, ;पपद्ध मध्वाचार्य कृत गीता-तात्पर्य निर्णय।

    (4.) शुद्धाद्वैत सम्पद्राय के आचार्यों द्वारा गीता की टीकाएँ : वल्लभाचार्य कृत तत्व दीपिका, जिस पर पुरुषोत्तम कृत अमृत तरंगिणी टीका है।

    (5.) कश्मीरी लेखकों द्वारा गीता की टीकाएँ: (अ) अभिनव गुप्त कृत गीतार्थ संग्रह। (आ) आनंदवर्धन कृत ज्ञानकर्मसमुच्चय।

    आधुनिक काल के लेखकों द्वारा गीता की टीकाएं -

    भावार्थ दीपिका                 संत ज्ञानदेव या ज्ञानेश्वरकृत

    ज्ञानेश्वरी                           संत ज्ञानेश्वर (मराठी अनुवाद)

    गीतारहस्य                       बालगंगाधर तिलक

    म्ेेंले वद ळपजं               अरविन्द घोष

    ईश्वरार्जुन संवाद                परमहंस योगानन्द

    गीता तत्व विवेचनी टीका    जयदयाल गोयन्दका

    भगवदगीता का सार          स्वामी क्रियानन्द

    गीता साधक संजीवनी        स्वामी रामसुखदास

    अनासक्ति योग                 मोहनदास गांधी

    गीता-प्रवचन                    विनोबा भावे

    गीता में धर्म-दर्शन

    वर्तमान समय में गीता में 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। नौवीं शताब्दी ईस्वी में शंकराचार्य द्वारा रचित गीताभाष्य में भी श्लोकों की संख्या 700 बताई गई है- 'तं धर्मं भगवता यथोपदिष्ट वेदव्यासः सर्वज्ञोभगवान् गीताख्यैः सप्तभिः श्लोकशतैः पनिबंध।' 20वीं सदी के लगभग जावा की भाषा में भीष्मपर्व का एक अनुवाद हुआ जिसमें गीता के अनेक मूल श्लोक सुरक्षित हैं।

    श्रीपाद कृष्ण बेल्वेलकर के अनुसार जावा के इस प्राचीन संस्करण में गीता के केवल साढ़े इक्यासी श्लोक मूल संस्कृत के हैं। उनसे भी वर्तमान पाठ का समर्थन होता है। गीता, उपनिषद् और ब्रह्मसूत्र की गणना 'प्रस्थानत्रयी' में की जाती है। गीता के माहात्म्य में उपनिषदों को गौ और गीता को उसका दुग्ध कहा गया है। इसका तात्पर्य यह है कि उपनिषदों की जो अध्यात्म विद्या थी, उसको गीता सर्वांश में स्वीकार करती है। उपनिषदों की अनेक विद्याएँ गीता में हैं।

    जैसे, संसार के स्वरूप के सम्बन्ध में अश्वत्थ विद्या, अनादि अजन्मा ब्रह्म के विषय में अव्ययपुरुष विद्या, परा प्रकृति या जीव के विषय में अक्षरपुरुष विद्या और अपरा प्रकृति या भौतिक जगत के विषय में क्षरपुरुष विद्या। इस प्रकार वेदों का ब्रह्मवाद और उपनिषदों का अध्यात्म, दोनों ही गीता में संयोजित हैं, उसे ही ब्रह्मविद्या कहा गया है। गीता में ब्रह्मविद्या का आशय निवृत्तिपरक ज्ञानमार्ग से है।

    इसे सांख्य-मत कहा जाता है जिसके साथ निवृत्ति-मार्गी जीवन-पद्धति जुड़ी हुई है किंतु गीता उपनिषदों के युग से आगे बढ़कर उस काल की देन है जब भारत में एक नया दर्शन जन्म ले रहा था और जो गृहस्थों के प्रवृत्ति-धर्म को निवृत्ति-मार्ग के समान फलदायी मानता था। गीता में 'योगशास्त्रे' शब्द का प्रयोग हुआ है जिसका अभिप्राय 'कर्मयोग' से है। गीता में योग की दो परिभाषाएँ बताई गई हैं। एक निवृत्ति मार्ग की सृष्टि से जिसमें 'समत्वं योग उच्यते' कहा गया है अर्थात् गुणों के वैषम्य में साम्यभाव रखना ही योग है।

    यह सांख्य सम्मत परिभाषा है। गीता में योग की दूसरी परिभाषा 'योगः कर्मसु कौशलम' के रूप में दी गई है जिसका अर्थ है कि ऐसे उपाय से कर्म करना जिससे वह कर्म, बंधन का कारण न बने और कर्म करनेवाला व्यक्ति स्वयं को उसी असंग या निर्लेप स्थिति में रखे जो ज्ञानमार्गियों को मिलती है। इसी युक्ति का नाम बुद्धियोग है और यही गीता के योग का सार है।

    गीता के दूसरे अध्याय में प्रयुक्त 'तस्य प्रज्ञाप्रतिष्ठिता' का अभिप्राय 'निर्लेप कर्म की क्षमतावली बुद्धि' से है। यह संन्यास द्वारा वैराग्य प्राप्त करने की स्थिति नहीं थी अपितु कर्म करते हुए प्रतिक्षण मन को वैराग्ययुक्त स्थिति में स्थिर करने की युक्ति थी। यही गीता का कर्मयोग है। गीता में अनेक स्थलों में 'सांख्य के निवृत्ति मार्ग' और 'कर्म के प्रवृत्तिमार्ग' की व्याख्या की गई है और दोनों को श्रेयस्कर बताया गया है।

    गीता के अठारह अध्याय

    गीता के अठारह अध्यायों में दिए गए उपदेशों में एक निश्चित क्रम दिखाई देता है तथा वे एक दूसरे से सम्बद्ध प्रतीत होते हैं।

    प्रथम अध्याय

    गीता के प्रथम अध्याय का नाम अर्जुन-विषाद-योग है। वह गीता के उपदेश का विलक्षण दृश्य प्रस्तुत करता है जिसमें श्रोता अर्जुन और वक्ता श्रीकृष्ण जीवन की प्रगाढ़ समस्या के समाधान के लिये प्रवृत्त होते हैं। अर्जुन वीर क्षत्रिय था किंतु अपने ही बंधु-बांधवों को युद्ध के मैदान में खड़ा देखकर वह क्षत्रियोचित कर्म भूलकर श्रीकृष्ण से युद्ध से विमुख होने की आज्ञा मांगने लगा। उसका तर्क धर्मयुक्त जान पड़ता है जिसमें वह भूमि के लिए स्वजनों का वध नहीं करना चाहता किंतु उसने स्वयं ही उसे कायरता कहा है। इस प्रकार पहले अध्याय में भूमिका रूप में अर्जुन ने भगवान से अपनी स्थिति कही है।

    द्वितीय अध्याय

    दूसरे अध्याय का नाम सांख्य-योग है। अर्जुन को प्रियजनों के जीवन के लिए कातर होकर रोते हुए देखकर कृष्ण उसे ध्यान दिलाते हैं कि क्षत्रिय होने के कारण उसे इस प्रकार का क्लैव्य प्रदर्शित करना उचित नहीं है। वे अर्जुन को भारत के दो प्राचीन एवं विख्यात दर्शनों की जानकारी देते हैं जिससे अर्जुन को कर्त्तव्य का वास्वतिक ज्ञान हो तथा वह कातरता एवं क्लैव्य का त्याग कर दे।

    कृष्ण ने अर्जुन की युक्तियों को प्रज्ञावाद का झूठा रूप कहा। कृष्ण कहते हैं कि प्रज्ञादर्शन काल, कर्म और स्वभाव से होने वाले संसार की सब घटनाओं और स्थितियों को अनिवार्य रूप से स्वीकार करता है। जीना और मरना, जन्म लेना और बढ़ना, विषयों का आना और जाना। सुख और दुःख का अनुभव, ये तो संसार में होते ही हैं, इसी को प्राचीन आचार्य पर्यायवाद का नाम भी देते थे। काल की चक्रगति इन समस्त स्थितियों को लाती और ले जाती है। जीवन के इस स्वभाव को जान लेने पर शोक नहीं होता।

    यही भगवान का व्यंग्य है कि प्रज्ञायुक्त दृष्टिकोण को मानते हुए भी अर्जुन इस प्रकार के मोह में क्यों पड़ा है? प्रज्ञावाद के अनुसार जीवन की नित्यता और शरीर की अनित्यता निश्चित है। 'नित्य जीव' के लिए शोक करना उतना ही व्यर्थ है जितना 'अनित्य शरीर' को बचाने की चिंता। ये दोनों अपरिहार्य हैं। जन्म और मृत्यु बारी-बारी से होते ही हैं, ऐसा समझकर शोक करना उचित नहीं है। दूसरा दृष्टिकोण स्वधर्म का है। जन्म से ही प्रकृति ने सबके लिए एक धर्म नियत किया है।

    उसमें जीवन का मार्ग, इच्छाओं की परिधि, कर्म की शक्ति सभी कुछ आ जाता है। इससे निकल कर भागा नहीं जा सकता। कोई भागे भी तो प्रकृति उसे फिर खींच लाती है। इस प्रकार भगवान ने अर्जुन को काल के परिवर्तन, जीव की नित्यता और व्यक्ति के स्वधर्म का ज्ञान कराया है जिसे सांख्य की बुद्धि कहा गया है। इससे आगे भगवान ने योगमार्ग की बुद्धि का भी वर्णन किया। यह बुद्धि कर्म या प्रवृत्ति मार्ग के आग्रह की बुद्धि है। कर्मयोगी को कर्म करते हुए कर्म के फल की आसक्ति से बचना आवश्यक है।

    अर्जुन को संदेह हुआ कि क्या इस प्रकार की बुद्धि प्राप्त करना संभव है, व्यक्ति कर्म करे और फल की इच्छा न करे? इसलिए अर्जुन ने पूछा कि इस प्रकार का दृढ़ प्रज्ञावाला व्यक्ति जीवन का व्यवहार कैसे करता है? आना, जाना, खाना, पीना, कर्म करना, उनमें लिप्त होकर भी निर्लेप कैसे रहा जा सकता है? कृष्ण ने मन के संयम की व्याख्या करते हुए अर्जुन को बताया कि काम, क्रोध, भय, राग, द्वेष के द्वारा मन का सौम्यभाव बिगड़ जाता है और इंद्रियाँ वश में नहीं रहतीं।

    बाहर से कोई विषयों को छोड़ भी दे तो भी भीतर का मन नहीं मानता। विषयों का स्वाद जब मन से जाता है, तभी मन प्रफुल्लित, शांत और सुखी होता है। इसे गीता में ब्राह्मी-स्थिति कहा है।

    तीसरा अध्याय

    तीसरे अध्याय का नाम कर्म-योग है। अर्जुन भगवान से प्रश्न करता है कि सांख्य और योग इन दोनों मार्गों में आप किसे अच्छा समझते हैं और क्यों नहीं यह निश्चित कहते कि मैं इन दोनों में से किसे अपनाऊँ? इस पर श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया कि लोक में दो निष्ठाएँ या जीवन-दृष्टियाँ हैं- सांख्यवादियों के लिए ज्ञानयोग और कर्ममार्गियों के लिए कर्मयोग।

    श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि संसार में कोई व्यक्ति कर्म छोड़ ही नहीं सकता। प्रकृति तीनों गुणों (सत्, रज एवं तम) के प्रभाव से व्यक्ति को कर्म करने के लिए बाध्य करती है। कर्म से बचने वाले बाहरी रूप से तो कर्म छोड़कर बैठ जाते हैं किंतु मन उसमें ही डूबा रहता है। यह मिथ्याचार है। मन में कर्मेद्रियों को रोककर कर्म करना ही श्रेयस्कर है। कर्म के बिना तो भोजन के लिए अन्न भी नहीं मिल सकता। श्रीकृष्ण ने कर्म के विधान को चक्र के रूप में उपस्थित किया।

    न केवल विभिन्न मनुष्यों के कर्मचक्र सामाजिक व्यवस्था में अरों की तरह परस्पर पिरोए हुए हैं अपितु पृथ्वी के मनुष्य और स्वर्ग के देवता दोनों का सम्बन्ध भी कर्मचक्र पर आश्रित है। धरती पर मनुष्य कृषि करते हैं और दैवीय शक्तियाँ वृष्टि का जल भेजती हैं। अन्न और पर्जन्य दोनों कर्म से उत्पन्न होते हैं। एक में मानवीय कर्म, दूसरे में दैवीय कर्म। कर्म के पक्ष में लोकसंग्रह की युक्ति भी दी गई है, अर्थात् कर्म के बिना समाज का ढाँचा खड़ा नहीं रह सकता। राजा जनक जैसे ज्ञानी भी कर्म में प्रवृत्त रहते हैं।

    कृष्ण ने स्वयं अपना ही दृष्टांत देकर कहा कि मैं नारायण का रूप हूँ, मेरे लिए कुछ कर्म शेष नहीं है। फिर भी तंद्रारहित होकर कर्म करता हूँ और अन्य लोग मेरे मार्ग पर चलते हैं। अंतर इतना ही है कि मूर्ख लिप्त होकर कर्म करते हैं और ज्ञानी असंग-भाव से कर्म करते हैं।

    चौथा अध्याय

    गीता के चौथे अध्याय का नाम ज्ञान-कर्म-संन्यास-योग है। इसमें बाताया गया है कि ज्ञान प्राप्त करके कर्म करते हुए भी कर्मसंन्यास का फल किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है। इसमें सच्चे कर्मयोग को चक्रवर्ती राजाओं की परंपरा में घटित माना है। मांधाता, सुदर्शन आदि अनेक चक्रवर्ती राजाओं के दृष्टांत दिए गए हैं। भगवान अर्जुन को अपना संकल्प भी बताते हैं कि जब भी धर्म की हानि होती है मैं साधुओं की रक्षा एवं धर्म के उत्थान के लिए अवतार लेता हूँ।

    गीता के इसी अध्याय में कहा गया है- 'क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा।' अर्थात् इस लोक में कर्मां से सिद्धि शीघ्र ही मिल जाती है। अर्थात् इस अध्याय में कर्म का महत्व भलीभांति स्थापित कर दिया गया है किंतु उस कर्म में असंग भाव होना चाहिए अर्थात् फल की आसक्ति से बचकर कर्म करना चाहिए।

    पांचवा अध्याय

    गीता के पाँचवे अध्याय का नाम कर्म-संन्यास-योग है। इस अध्याय में फिर मनुष्य के कर्म और अनासक्ति भाव सम्बन्धी युक्तियाँ और भी दृढ़ रूप में कही गई हैं। इसमें कर्म के साथ मन के सम्बन्ध को विशुद्ध करने पर बल दिया गया है। यह भी कहा गया है कि साधना के उच्च धरातल पर पहुँचकर सांख्य और योग में कोई भेद नहीं रह जाता। किसी एक मार्ग पर ठीक प्रकार से चले तो समान फल प्राप्त होता है।

    जीवन के समस्त कर्मों का समर्पण कर देने से व्यक्ति शांति के ध्रुव-बिंदु पर पहुँच जाता है और जल में खिले कमल के समान कर्म रूपी जल से लिप्त नहीं होता।

    छठा अध्याय

    गीता के छठे अध्याय का नाम आत्म-संयम-योग है जिसका विषय नाम से ही प्रकट है। जितने विषय हैं उन सबसे इंद्रियों का संयम ही कर्म और ज्ञान का निचोड़ है। सुख और दुःख में मन की समान स्थिति को ही योग कहते हैं।

    सातवाँ अध्याय

    गीता के सातवें अध्याय का नाम ज्ञान-विज्ञान-योग है। वैदिक दृष्टि में मानव मात्र के लिए विज्ञान जानना अत्यंत महत्वपूर्ण है। सृष्टि के वैविध्य का ज्ञान ही विज्ञान है और वैविध्य से एकत्व स्थापित करना ज्ञान है। ये दोनों दृष्टियाँ मानव के लिए उचित हैं। विज्ञान की दृष्टि से गीता ने प्रकृति के दो रूपों- अपरा और परा की सुनिश्चित व्याख्या दी है। अपरा प्रकृति में आठ तत्व हैं, पंचभूत, मन, बुद्धि और अहंकार। जिस अंड से मानव का जन्म होता है। उसमें ये आठों तत्व रहते हैं किंतु यह प्राकृत सर्ग है अर्थात् यह जड़ है। इसमें ईश्वर की चेष्टा के संपर्क से जो चेतना आती है उसे परा प्रकृति कहते हैं; वही जीव है।

    आठ तत्वों के साथ मिलकर जीवन नौवाँ तत्व हो जाता है। इस अध्याय में भगवान के अनेक रूपों का उल्लेख किया गया है (जिनका और अधिक विस्तार विभूतियोग नामक दसवें अध्याय में है)। सातवें अध्याय में विशेष भगवती दृष्टि का भी उल्लेख है जिसका सूत्र- 'वासुदेवः सर्वमिति' अर्थात् सब वसु या शरीरों में एक ही देवतत्व है, उसी की संज्ञा 'विष्णु' है किंतु लोक में अपनी-अपनी रुचि के अनुसार अनेक नामों और रूपों में उसी एक देवतत्व की उपासना की जाती है।

    आठवाँ अध्याय

    गीता के आठवें अध्याय का नाम 'अक्षर-ब्रह्म-योग' है। उपनिषदों में अक्षर विद्या का विस्तार हुआ। गीता में उस अक्षर विद्या का सार दिया गया है- 'अक्षर ब्रह्म परमं' अर्थात् परब्रह्म की संज्ञा अक्षर है। मनुष्य, अर्थात् जीव और शरीर की संयुक्त रचना का ही नाम अध्यात्म है। जीवसंयुक्त भौतिक देह की संज्ञा क्षर है और केवल शक्तितत्व की संज्ञा आधिदैवक है। देह के भीतर जीव, ईश्वर तथा भूत ये तीन शक्तियाँ मिलकर जिस प्रकार कार्य करती हैं उसे अधियज्ञ कहते हैं। गीता के अनुसार 'ऊँ' एकाक्षर ब्रह्म है।

    नौवाँ अध्याय

    गीता के नौवें अध्याय का नाम राज-गुह्य-योग है। इसमें कहा गया है कि अध्यात्म विद्या विद्याराज्ञी है और यह गुह्य ज्ञान सबमें श्रेष्ठ है। राजा शब्द का एक अर्थ मन भी था। अतएव मन की दिव्य शक्तियों को किस प्रकार ब्रह्ममय बनाया जाय, इसकी युक्ति ही राजविद्या है। इस क्षेत्र में ब्रह्मतत्व का निरूपण ही प्रधान है, उसी से व्यक्त जगत का बारंबार निर्माण होता है। वेद का समस्त कर्मकांड, यज्ञ, अमृत, और मृत्यु, संत और असंत, और जितने भी देवी देवता है, सबका पर्यवसान ब्रह्म में है। लोक में जो अनेक प्रकार की देवपूजा प्रचलित है, वह भी अपने अपने स्थान में ठीक है।

    दसवाँ अध्याय

    गीता के दसवें अध्याय का नाम विभूति-योग है। इसका सार यह है कि लोक में स्थित समस्त देवता एक ही भगवान की विभूतियाँ हैं। मनुष्य के समस्त गुण और अवगुण भगवान की शक्ति के ही रूप हैं। कोई पीपल पूज रहा है। कोई पहाड़, नदी या समुद्र को, कोई उनमें रहने वाले मछली और कछुओं को। इस प्रकार कितने ही देवी-देवता हैं, उनका कोई अंत नहीं। विश्व के इतिहास में देवताओं की यह भरमार सर्वत्र पाई जाती है। भागवतों ने इनकी सत्ता को स्वीकारते हुए सबको विष्णु का रूप मानकर समन्वय की एक नई दृष्टि प्रदान की। इसी का नाम विभूति-योग है। जो सत्व जीव बल युक्त अथवा चमत्कार युक्त हैं, वे सब भगवान का रूप हैं। इतना मान लेने से मनुष्य 'चित्त-निर्विरोध' स्थिति में पहुँच जाता है।

    ग्यारहवाँ अध्याय

    गीता के ग्यारहवें अध्याय का नाम विश्व-रूप-दर्शन-योग है। इसमें भगवान ने अर्जुन को अपना विश्वरूप दिखाया। विराट रूप का अर्थ है मानवीय धरातल और परिधि के ऊपर जो अनंत विश्व का प्राणवंत रचना विधान है, उसका साक्षात दर्शन। विष्णु का जो चतुर्भुज रूप है, वह मानवीय धरातल पर सौम्यरूप है। बारहवाँ अध्याय गीता के बारहवें अध्याय का नाम भक्तियोग है। जब अर्जुन ने भगवान का विराट रूप देखा तो उसके मस्तक का विस्फोट होने लगा। उसने कहा- 'दिशो न जाने न लभे च शर्म।' तब भगवान ने अर्जुन को बताया कि मेरे शुद्ध प्रेम को प्राप्त करने का सबसे सुगम एवं सर्वोच्च साधन भक्ति है। इस पथ का अनुसरण करने वाले व्यक्ति में दिव्यगुण उत्पन्न हो जाते हैं।

    तेरहवाँ अध्याय

    गीता के तेरहवें अध्याय का नाम क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ है। इस अध्याय में भगवान ने अर्जुन को प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, ज्ञान और ज्ञेय के बारे में बताया है। भगवान कहते हैं कि शरीर क्षेत्र है, उसको जानने वाला जीवात्मा क्षेत्रज्ञ है। प्रकृति अचेतन गतिविधि है और पुरुष निष्क्रिय चेतना है। शरीर वह क्षेत्र है जिसमें वृद्धि, ह्रास और मृत्यु जैसी घटनाएं घटती हैं तथा निष्क्रिय और अनासक्त चेतन इन सब घटनाओं का साक्षी होता है, वह क्षेत्रज्ञ है।

    चौदहवाँ अध्याय

    चौदहवें अध्याय का नाम गुणत्रय-विभाग-योग है। यह अध्याय समस्त वैदिक, दार्शनिक और पौराणिक चिंतन का निचोड़ है। इसमें सत्व, रज तथा तम नामक तीन गुणों की अनेक व्याख्याएँ हैं। गुणों की साम्यावस्था का नाम प्रधान या प्रकृति है। गुणों के वैषम्य से ही वैकृत सृष्टि का जन्म होता है। अकेला सत्व शांत स्वभाव से निर्मल प्रकाश की तरह स्थिर रहता है और अकेला तम भी जड़वत निश्चेष्ट रहता है किंतु दोनों के बीच में छाया हुआ रजोगुण उन्हें चेष्टा के धरातल पर खींच लाता है। गति तत्व का नाम ही रजस है।

    पन्द्रहवाँ अध्याय

    पन्द्रहवें अध्याय का नाम पुरुषोत्तम-योग है। इसमें विश्व का अश्वत्थ (पीपल) के रूप में वर्णन किया गया है जिसकी जड़ें ऊपर की ओर हैं। उसके पत्ते वेद हैं और शाखाएं नीचे की ओर एवं शाश्वत हैं। यह अश्वत्थ रूपी संसार महान विस्तार वाला है। देश और काल में इसका कोई अंत नहीं है किंतु इसका मूल या केंद्र जिसे जिसे ऊर्ध्व भी कहते हैं, वह ब्रह्म ही है। एक ओर वह परम तेजवान है जो विश्वरूपी अश्वत्थ को जन्म देता है तथा सूर्य और चंद्र के रूप में प्रकट है, दूसरी ओर वही चैतन्य, प्राणी शरीर में आया हुआ है।

    श्रीकृष्ण कहते हैं- 'अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः। नर या पुरुष के तीन प्रकार हैं- क्षर, अक्षर और अव्यय। पंचभूतों का नाम क्षर है, प्राण का नाम अक्षर है और मनस्तत्व या चेतना की संज्ञा अव्यय है। इन्हीं तीन नरों की एकत्र स्थिति से मानवी चेतना का जन्म होता है उसे ही ऋषियों ने वैश्वानर अग्नि कहा है। सोलहवाँ अध्याय गीता के सोलहवें अध्याय का नाम दैवासुर-सम्पद-विभाग-योग है। इस अध्याय में देवों एवं असुरों की संपत्तियों का वर्णन किया गया है।

    ये दोनों सम्पदाएं एक-दूसरे से बिलकुल विरुद्ध हैं। दैवी संपत्ति कल्याण करने वाली है और आसुरी-संपत्ति बाँधने वाली तथा नीच योनियों और नरकों में ले जाने वाली है। जो साधक इन दोनों विभागों को ठीक रीति से जान लेगा, वह आसुरी संपत्ति का सर्वथा त्याग कर देगा। आसुरी संपत्ति का सर्वथा त्याग होते ही दैवी संपत्ति स्वतः प्रकट हो जाएगी। दैवी संपत्ति प्रकट होते ही एकमात्र परमात्मा से सम्बन्ध रह जाएगा।

    सत्रहवाँ अध्याय

    सत्रहवें अध्याय का नाम 'श्रद्धा-त्रय-विभाग-योग' है। इस अध्याय का सम्बन्ध सत, रज और तम नामक तीन गुणों से ही है। जिस मनुष्य में जिस गुण का प्रादुर्भाव होता है, उसकी श्रद्धा या जीवन की निष्ठा वैसी ही बन जाती है। यज्ञ, तप, दान, कर्म ये सब तीन प्रकार की श्रद्धा से संचालित होते हैं। यहाँ तक कि आहार भी तीन प्रकार का है। भगवान ने उनके भेद और लक्षण बताए हैं।

    अठारहवाँ अध्याय

    अठारहवें अध्याय का नाम 'मोक्ष-संन्यास-योग' है। इसमें गीता के समस्त उपदेशों का सार एवं उपसंहार दिया गया है। यहाँ पुनः मानव जीवन के लिए तीन गुणों का महत्व कहा गया है। पृथ्वी के मानवों में और स्वर्ग के देवताओं में कोई भी ऐसा नहीं जो प्रकृति के चलाए हुए इन तीन गुणों से बचा हो। मनुष्य को सतर्क होकर चलना आवश्यक है जिससे वह अपनी बुद्धि और वृत्ति को बुराई से बचा सके और क्या कार्य है, क्या अकार्य है, इसको पहचान सके। धर्म और अधर्म को, बंध और मोक्ष को, वृत्ति और निवृत्ति को जो बुद्धि ठीक से पहचनाती है, वही सात्विक बुद्धि है और वही मानव की सच्ची उपलब्धि है।

    गीता के अठारह अध्यायों की समाप्ति पर अर्जुन को ज्ञान की प्राप्ति होती है और वह समस्त संदेहों को त्यागकर कर्म के पथ पर प्रवृत्त होता है।

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  • अध्याय - 8 सिटी पैलेस म्यूजियम उदयपुर

     02.06.2020
    अध्याय - 8 सिटी पैलेस म्यूजियम उदयपुर

    अध्याय - 8 सिटी पैलेस म्यूजियम, उदयपुर


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    उदयपुर के राजमहलों की नींव महाराणा उदयसिंह (द्वितीय) (ई.1540-72) ने ई.1559 में रखी। इसे सजाने-संवारने में मेवाड़ राजघराने की 24 पीढ़ियों का अनवरत योगदान रहा है। वर्तमान में यह परिसर 1800 फुट लम्बा तथा 800 फुट चौड़ा है, इसकी सर्वाधिक ऊँचाई 105 फुट है। राजमहल का एक हिस्सा ‘मर्दाना महल’ कहा जाता है। इसे महाराणा भगवत सिंह मेवाड़ ने ई.1969 में संग्रहालय का रूप दिया। ई.1971 के पश्चात् इससे सटे ‘जनाना महल’ को भी इसके साथ जोड़कर संग्रहालय का विस्तार किया गया। यह संग्रहालय 1028 फुट लम्बा एवं 300 फुट चौड़ा है। सिटी पैलेस का ऐतिहासिक भवन वास्तुकला का एक अनूपम उदाहरण है। इसमें शुद्ध भारतीय शैली से लेकर मुगल एवं ब्रिटिश शैली का सुन्दर समायोजन देखा जा सकता है, इस कारण यह वास्तुशास्त्र के विद्यार्थियों के लिए अध्ययन का प्रमुख केन्द्र भी है।


    सिटी पैलेस म्यूजियम का प्रथम प्रवेश द्वार ‘बड़ीपोल’ के नाम से जाना जाता है। इसका निर्माण महाराणा अमर सिंह (प्रथम) (ई.1597-1620) ने करवाया था। इसके निकट स्थित बुकिंग काउण्टर से संग्रहालय में प्रवेश करने के लिए टिकिट प्राप्त किये जाते हैं। बड़ी पोल के ठीक सामने तीन पोलों वाला ‘त्रिपोलिया’ स्थित है, जिसे महाराणा संग्राम सिंह (द्वितीय) (ई.1710-34) ने बनवाया था। इससे आगे ‘माणक चौक’ है। इसी चौक के दाईं ओर के महल को संग्रहालय के रूप में प्रयुक्त किया गया है। संग्रहालय में प्रवेश ‘दरीखाने की पोल’ से होकर किया जाता है।

    इस पोल से आगे बढ़ने पर बाईं ओर ‘सभा शिरोमणि का दरीखाना’ है, जहाँ महाराणाओं के दरबार लगा करते थे तथा दाईं ओर ‘सलेहखाना’ (शस्त्रागार) स्थित है। इसकी स्थापना महाराणा सज्जन सिंह (ई.1874-84) के राज्यकाल में हुई। इसमें महराणाओं के निजी उपयोग के शस्त्रास्त्र- तलवारें, ढालें, छुरियां, कटारें, बन्दूकें, पिस्तोलें आदि प्रदर्शित की गई हैं। इससे आगे बढ़ने पर ‘गणेश चौक’ आता है। इसके उत्तर पूर्वी कोने में गणेश ड्योढ़ी स्थित है। यहाँ स्थापित गणेश एवं लक्ष्मी की सुन्दर प्रतिमाओं के चारों ओर रंगीन कांच की पच्चीकारी का काम किया गया है। यहाँ से सीढ़ियां चढ़कर ‘राय आंगन’ में प्रवेश किया जाता है।

    राय आंगन के पश्चिम में गोस्वामी प्रेमगिरी की धूणी (नव चौकी महल) है, इन्हीं के आशीर्वाद से महाराणा उदयसिंह (ई.1540-72) ने उदयपुर नगर की स्थापना की थी। यहीं पर महाराणाओं का राजतिलक होता आया है। जबकि पूर्व दिशा में ‘नीका की चौपाड़’ एवं प्रताप कक्ष है। प्रताप कक्ष में महाराणा प्रताप (ई.1572-97) के अस्त्र-शस्त्रों को प्रदर्शित किया गया है। नीका की चौपाड़ और इससे संलग्न कक्षों में महाराणा प्रताप से सम्बन्धित बड़े-बड़े तैल चित्र लगे हैं जो हिन्दुआ सूर्य प्रताप की गौरव गाथा कहते हैं।

    नवचौकी महल से सीढ़ी चढ़कर ऊपर जाने पर चंद्रमहल आता है। इसमें एक ही पत्थर का बना सफेद संगमरमर का कुंड है। महाराणा के राजतिलक के समय इस कुंड को चांदी के एक लाख सिक्कों से भरा जाता था। इस कारण इसे ‘लक्खु कुंड’ कहा जाता है। ये सिक्के पास ही स्थित ‘लक्खु गोखड़े’ से प्रजा को लुटाए जाते थे। इस भवन के आगे शिव प्रसन्न अमर विलास महल (बाड़ी महल) में पहुंचा जाता है। यह महल श्वेत संगमरमर से निर्मित है। इसमें बना मुगल शैली का चारबाग (उद्यान) कुण्ड एवं फव्वारे पर्यटकों को बरबस ही आकर्षित करते हैं। यहाँ लगे विशाल वृक्ष एवं सुगन्धित फूलों के पौधे पर्यटकों का मन मोह लेते हैं। यहीं एक कक्ष में महाराणा फतहसिंह (ई.1884-1930) का चित्र और उसके पास ही वह ऐतिहासिक कुर्सी रखी हुई है जो 12 दिसम्बर 1911 को ब्रिटिश सम्राट जार्ज पंचम द्वरा आयोजित इम्पीरियल दरबार में महाराणा फतहसिंह के लिए लगायी गई थी। महाराणा अपने कुलाभिमान एवं किसी शासक के आगे सर नहीं झुकाने की अपनी गौरवशाली वंश परम्परा के कारण दिल्ली जाकर भी इस दरबार में उपस्थित नहीं हुए थे।

    बाड़ी महल के दक्षिण में स्थित द्वार से ‘दिलखुशाल महल’ में जाया जाता है। इस परिसर में मेवाड़ शैली के कई चित्र लगे हैं, जिनमें महाराणाओं के विभिन्न अवसरों पर बनाए गए चित्र प्रदर्शित किये गए हैं। दिलखुशाल महल के उत्तर में स्थित ‘कांच की बुर्ज’ में दीवारों और छत पर रंगीन कांच का आकर्षक कार्य किया गया है वहीं दक्षिण में स्थित ‘चित्राम की बुर्ज’ में महाराणा संग्राम सिंह (द्वितीय) (ई.1710-34) एवं महाराणा भीमसिंह (ई.1778-1828) द्वारा उत्सवों, सवारियों और त्यौहारों के सुन्दर भित्तिचित्रों का अंकन करवाया गया है, इन चित्रों में मेवाड़ के प्राचीन वैभव की झलक मिलती है।

    इससे आगे बढ़ने पर ‘चीनी चित्रशाली’ है जिसमें डेल्फ तथा पुर्तगाली ब्लू टाइलें जड़ी हुई हैं। यहाँ से उदयपुर का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। इसके उत्तर में स्थित ‘वाणी विलास’ महाराणा सज्जन सिंह (ई.1874-84) द्वारा स्थापित पुस्तकालय का कक्ष है तथा दक्षिण में ‘शिव विलास’ स्थित है। शिव विलास के उत्तर में मदन विलास है जिसमें कर्नल जेम्स टोड के चित्र तथा उससे सम्बन्धित सामग्री प्रदर्शित की गई है। यहीं किशन विलास सात ताका नामक महल भी है, जिसकी दीवारों के नीचे एक पट्टी में सुन्दर ग्लास इन्ले वर्क के साथ काले कागज़ पर सुनहरी चित्रांकन किया गया है। यहीं उत्तरी दीवार की खिड़कियों से पिछोला झील का मनोरम दृश्य दिखाई देता है।

    इसके आगे संकरे गलियारों और घुमावदार सीढ़ियों से होते हुए ‘मोर चौक’ तक पहुंचा जा सकता है। इस बीच मोती महल, भीम विलास, सूर्य प्रकाश गैलेरी और पीतम निवास आते हैं, इनमें भी रंगीन कांच की पच्चीकारी का काम दर्शनीय है। पीतम निवास ई.1955 तक महाराणा भूपाल सिंह (ई.1930-55) का निवास स्थान रहा, इसे उसी रूप में अब तक संरक्षित रखा गया है। यहाँ से नीचे सीढ़ियां उतरकर सूर्य चौपाड़ आती है इसमें स्वर्ण मुलम्मा चढ़ा सूर्य लगा हुआ है। ऐसा ही एक सूर्य पूर्व में स्थित सूर्य गोखड़े में लगा है। इस कक्ष में दीवारों के नीचे एक पट्टी में आराई के उभरमा अंकन पर सुन्दर चित्रकारी की गई है।

    इसके आगे छोटी चित्रशाली है जिसमें महाराणा अपने अतिथियों का स्वागत-सत्कार करते थे। यहीं आमोद-प्रमोद के लिए गायन वादन के आयोजन होते थे। इसके आगे मोर चौक है जिसमें रंगीन कांच की बारीक कतरनों के ‘इन्ले वर्क’ से मोरों का निर्माण किया गया है। इस चौक की सम्पूर्ण पूर्वी दीवार कांच की कारीगरी का अनूठा दृश्य उपस्थित करती है। इस चौक के उत्तर में स्थित माणक महल भी रंगीन कांच की कारीगरी के लिए पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है।

    इससे आगे संकरे गलियारे से होते हुए ‘जनाना महल’ में जाया जा सकता है। यहाँ सबसे पहले शरबत विलास एवं ब्रज विलास आते हैं, यह महाराणा भूपाल सिंह की तृतीय महाराणी का निवास स्थान था, इसे भी अब तक अपने पुराने रूप में ही संरक्षित किया हुआ है। यहाँ उनकी दैनिक उपयोग की वस्तुओं को प्रदर्शित किया गया है। यहीं से कुछ दूरी पर भूपाल विलास है, यहाँ महाराणियाँ अपने अतिथियों से भेंट एवं स्वागत-सत्कार करती थीं, इसे भी उसी रूप में संरक्षित रखा गया है।

    महाराणा मेवाड़ चैरिटेबल फाउण्डेशन के अध्यक्ष एवं प्रबन्ध न्यासी श्रीजी अरविन्द सिंह मेवाड़ संग्रहालय को विश्वस्तरीय पहचान दिलाने में निरन्तर प्रयत्नशील हैं। सम्पूर्ण महल के कायाकल्प के साथ जनाना महल में विभिन्न गैलेरियों (वीथिकाओं) का निर्माण करवाया गया है। इनमें मेवाड़ के गौरवशाली अतीत की संस्कृति से पर्यटकों का साक्षात्कार होता है। इन अलग-अलग वीथिकाओं में मूर्तियां, वस्त्र, वाद्य यंत्र, पालकियाँ एवं म्यानें, मेवाड़ शैली के चित्र तथा छायाचित्र कलात्मक ढंग से सजाए गए हैं। अमर महल में स्थित रजत वीथिका दर्शकों के आकर्षण का केन्द्र है, इसमें महाराणाओं एवं उनके आराध्य देवों के उपयोग में ली जाने वाली चांदी की वस्तुओं को प्रदर्शित किया गया है, इनमें चांदी की बग्गी, हाथी का हौदा, पालकी एवं हाथी-घोड़ों के आभूषण विशेष दर्शनीय हैं।

    यहाँ से मौती चौक होते हुए तोरण पोल पहुंचकर संग्रहालय दर्शन पूरा होता है। तोरण पोल पर राजपरिवार में होने वाले विवाहों के अवसर पर तोरण बांधा जाता है। इसके अतिरिक्त भी सिटी पैलेस संग्रहालय में देखने को बहुत कुछ है। प्रतिवर्ष लाखों देशी-विदेशी पर्यटक उदयपुर भ्रमण के लिए आते हैं, इनमें से अधिकांश सिटी पैलेस संग्रहालय देखने आते हैं।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-45

     19.05.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-45

    पर्यावरणीय चेतना की द्योतक राजस्थान की विशिष्ट लोककलाएं


    राजस्थान की मूर्तिकला, चित्रकला, नृत्यकला तथा संगीतकला के अतिरिक्त कुछ विशिष्ट लोककलाएं भी राजस्थान के जनजीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं तथा राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति को विशिष्ट आकार प्रदान करती हैं। ये लोककलाएं हैं- पथवारी, पाना, फड़, मांडणा, रंगोली, मेहंदी, सांझी, कावड़, वील तथा गोदणा।

    पथवारी

    गाँवों में पथ रक्षक के रूप में पूजा जाने वाला स्थल जिस पर चित्र बने होते हैं, उसे पथवारी कहते हैं। धार्मिक यात्रा पर जाते समय तथा वहाँ से लौटकर आते समय पथवारी की पूजा होती है।

    पाना

    राजस्थान में कागज पर बने देवी देवताओं के चित्रों को पाना कहा जाता है जैसे गणेशजी का पाना, लक्ष्मीजी का पाना आदि। श्रीनाथजी का पाना सबसे अधिक कलात्मक होता है जिसमें श्रीनाथजी के चौबीस शृंगारों का चित्रण किया जाता है।

    फड़

    कपड़े पर किये गये चित्रांकन को फड़ कहते हैं। छींपा जाति के जोशी, ज्योतिषी एवं चितरों द्वारा इसका चित्रांकन किया जाता है। भीलवाड़ा जिले के शाहपुरा कस्बे में फड़ बनाई जाती हैं। सामान्यतः इसका आकार 5 फुट चौड़ा एवं 24 फुट लम्बा होता है। पाबूजी की फड़ सबसे अधिक प्रसिद्ध है। देवनारायणजी की फड़ सबसे अधिक लम्बी है।

    मांडणा

    मांडणा का अर्थ होता है चित्रित अथवा लिखित। वस्तुतः ये मांगलिक चित्र हैं जो घर के आंगन तथा द्वार पर बनाये जाते हैं। ये श्री एवं समृद्धि के प्रतीक हैं। सबसे छोटा मांडणा स्वास्तिक चिह्न होता है। यह गणेशजी का प्रतीक है। इसका प्रयोग स्वतंत्र रूप से अथवा अन्य माण्डणों के साथ किया जाता है। स्वास्तिक के अतिरिक्त जिस माण्डणे का सर्वाधिक प्रयोग किया जाता है, वह है- पद चिह्न। ये लक्ष्मीजी के चरण कमल हैं। ये पद चिह्न घर की तरफ आते हुए प्रदर्शित किये जाते हैं। इसका भाव यह है कि लक्ष्मीजी घर में प्रवेश कर चुकी हैं तथा उनके चरण चिह्न यहाँ अंकित हैं। इस सम्बन्ध में एक लोककथा कही जाती है- एक स्त्री के सात बेटे व बहुएं थीं। दीपावली के दिन छोटी बहू लिपाई पुताई करके मांडणे मांडने बैठी ही थी कि लक्ष्मीजी का आगमन हो गया। बहू ने लक्ष्मीजी की आवभगत की, उन्हें आसन दिया और कहा कि आप विराजें मैं मांडणे पूरे करके आती हूँ। बहू सारी रात मांडणे मांडती रही और लक्ष्मीजी वहीं रह गयीं। वहीं उनका वास हो गया। इसीलिये लक्ष्मीजी के पदचिह्न दीपावली पर अवश्य बनाये जाते हैं।

    मांडणे बनाने के लिये सफेद खड़िया, हिरमिच या गेरू का प्रयोग किया जाता है। खड़िया, हिरमिच या गेरू को पानी में भिगोकर घोल तैयार किया जाता है और लकड़ी में कपड़ा बांध कर ब्रुश तैयार किया जाता है। अनामिका (कनिष्का के पास वाली अंगुली) पर कपड़े की पट्टी बांध कर उसे घोल में डुबोकर भी मांडणे बनाये जाते हैं। भित्ति चित्रों वाले सिद्धांत को मानते हुए गोबर तथा मिट्टी से लिपे आंगन के सूखने से थोड़ा पहले ही मांडणों का चित्रांकन किया जाता है। सूखे फर्श पर रंग अच्छी तरह से नहीं जमते। मांडणों का निश्चित विधान है। इन्हें केंद्र से आंरभ करते हैं और आगे बढ़ते हैं। इनकी कुछ इकाइयां हैं जिनसे मांडणे के आकार को छोटा या बड़ा किया जाता है। तरह-तरह के पुष्प (इन्हें फलड़ियां कहा जाता है), स्वस्तिक (इन्हें सथिए कहा जाता है), पान, हटड़ी, चौक, गलीचा, चौपड़, डमरू, दीपक, बीजाणी (पंखे), जलेबी, चंग (एक तरह का वाद्य), गायों के खुर तथा विविध जोड़ के मांडणे बनाये जाते हैं। बेलों में फूल की बेल, बीजणी की बेल, सकरपारे की बेल, डमरू की बेल, पान की बेल व लड्डू की बेल बनायी जाती हैं।

    किनारों पर कई प्रकार के झंवर (पतले कंगूरे) और खाली त्रिभुजों, चतुर्भुजों को भरने के लिये चीरण के अनगिनत प्रकार बनते हैं। सथिए और पगल्ये सभी शुभ अवसरों पर बनाये जाते हैं। विशिष्ट त्यौहारों से जुड़े मांडणे भी हैं। जैसे दीपावली पर लक्ष्मीजी की पगल्ये, दीपक, दीपक का चौक, साट्या का जोड़ (स्वस्तिक का संयोजन), बीजणी, चौक, चौपड़ आदि। श्रावण की हरियाली तीज पर तरह-तरह की फलड़िएं और उनके संयोजन- सात फूल, पाँच फूल आदि तथा नाग पंचमी पर नागों का जोड़ा बनता है। संक्रांतिपर फीणी का अलंकरण बनाने का विधान है। चैत्र नवरात्रि पर माता, शीतला, होली पर चंग और बीजणी तथा मेहमानों के स्वागत के लिये बैलगाड़ी, रथ, हटड़ी, चौक, पगल्ये और सथिये बनते हैं। हाड़ौती और ढूंढार क्षेत्र में सफेद खड़िया और गेरू से ही अंकन किया जाता है। पश्चिमी राजस्थान में नीले और भूरे रंगों का भी प्रयोग होता है। सवाई माधोपुर जिले की मीणा स्त्रियां अपने घरों की दीवारों पर पशु-पक्षियों के विभिन्न प्रकार के चित्रण करती हैं। बाड़मेर का मोरिया (मोर) अलग ढंग का होता है।

    बाड़मेर जिले के जयनारायण दवे ने राजस्थान के माण्डणों के संरक्षण तथा माण्डणों से जुड़े विविध पक्षों को जनसामान्य के समक्ष लाने के लिये काफी कार्य किया है।

    रंगोली

    सामाजिक, सांस्कृतिक एवं पारिवारिक मंगल अवसरों पर विभिन्न सूखे रंगों के द्वारा इसे घर के बाहर, दरवाजे के पास, आंगन में तथा अन्य खुले स्थानों पर बनाया जाता है। राजस्थान में विभिन्न संस्थायें इस कला को प्रोत्साहित करने के लिये लड़कियों के बीच रंगोली बनाने की प्रतियोगितायें आयोजित करवाती हैं।

    मेहंदी

    मेहंदी का प्रयोग पश्चिमी भारत की महिलाएं शृंगार के लिये करती हैं। मांगलिक अवसरों पर कुमारी कन्यायें और सुहागिन स्त्रियां हाथ-पांवों में मेहंदी लगाती हैं। मेहंदी एक प्रकार की झाड़ी है जिसके पत्तों को पीसकर लेई (पेस्ट) बना लेते हैं और उसे हाथ-पांवों पर लगाते हैं। थोड़़ी देर में वह स्थान जहाँ मेहंदी लगी होती है, लाल हो जाता है। मेहंदी का प्रयोग भारतीय चिकित्सा पद्धति में प्राचीन काल से होता था पर शृंगार के लिये इसका उपयोग मध्यकाल से आरंभ हुआ और जन-जीवन का अंग बन गया। आज कोई भी मांगलिक कार्य बिना मेहंदी के संपन्न नहीं होता। राजस्थान में सोजत की मेहंदी प्रसिद्ध है। उसकी रंगत अच्छी होती है। विशिष्ट अवसरों के लिये विशेष अलंकरणों का विधान है। होली पर चंग, दीपावली पर गलीचा तथा गणगौर पर गुणा बनाते हैं। सावन में स्त्रियां लहरिया की ओढ़नी ओढ़ती हैं और अपनी हथेली पर लहरिया का अलंकरण बनाती हैं। तीज पर घेवर की आकृति बनायी जाती है।

    सांझी

    सांझी बनाने की परंपरा भगवान श्रीकृष्ण ने आरंभ की। एक बार राधाजी रूठ गयीं। कृष्णजी उन्हें मनाने का कोई उपाय नहीं कर पाये। सारा दिन बीत गया किंतु राधारानी रूठी ही रहीं। तब भगवान ने जगन्माया राधाजी को रिझाने के लिये सांझ के समय पृथ्वी पर फूल और पत्तियों से राधाजी का चित्र बनाया। तभी से सांझी बनाने की परंपरा चल पड़ी। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्यप्रदेश तथा दिल्ली के क्षेत्र में सांझी को देवी माना जाता है। यह राधिकाजी का लौकिक रूपांतरण है।

    राजस्थान में सांझी बनाने की परंपरा वृंदावन से आयी। जब श्रीनाथजी नाथद्वारा पधारे तो उनके पुजारी वृंदावन के मंदिरों की भांति नाथद्वारा में सांझी बनाने लगे। वंृदावन के पुजारी जहाँ-जहाँ गये, सांझी बनाने की परंपरा अपने साथ ले गये। राजस्थान में सांझी पितृपक्ष में बनायी जाती है। कुमारी कन्यायें दीवार पर गोबर से सांझी बनाती हैं और उसे आटा हल्दी, कुंमुम तथा कौड़ियों से सजाती हैं। पितृपक्ष के पहले दस दिन तक सांझी के रूप एवं सज्जा में परिवर्तन किया जाता है। ग्यारहवें दिन बड़ी सांझी बनायी जाती है जिसे अमावस्या तक सुरक्षित रखा जाता है। सांझी के केंद्र में देवी बनायी जाती है तथा उसके चारों ओर विविध प्रकार की आकृतियां बनायी जाती हैं। इन आकृतियों में लड़कियां अपने भाई का चित्र बनाती हैं तथा यह कामना करती हैं कि भाई का अमंगल न हो। घर में समृद्धि के लिये डाल पर बैठे तोते बनाये जाते हैं। दाम्पत्य जीवन सुखी रहे इसके लिये चौपड़ बनाया जाता है। घर में चोरी न हो, इस कामना से उल्टा चोर बनाया जाता है। कंघा, पंखा, हुक्का, दर्पण, ढोलक, बैण्डबाजा तथा फूल-पत्तियां बनायी जाती हैं। श्रीनाथजी के मंदिर में केले के पत्तों की सांझी बनायी जाती है। इस सांझी में मथुरा तथा वृंदावन के विविध दृश्य अंकित किये जाते हैं।

    कावड़

    यह मंदिर जैसी काष्ठ कलाकृति होती है। कावड़ पर बने आकर्षक एवं रंगीन धार्मिक चित्रों के माध्यम से पौराणिक कथाओं का वाचन किया जाता है। चित्तौड़गढ़ जिले के बस्सी कस्बे में कावड़ें बनाई जाती हैं।

    वील

    ग्रामीण अंचलों की महिलायें घर सजाने तथा दैनिक उपयोग कीचीजों को सुरक्षित रखने के लिये मिट्टी की महलनुमा कलाकृतियां बनाती हैं। बोलचाल की भाषा में इन्हें वील कहा जाता है। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक प्राचीन घरों में एक से बढ़कर एक प्राचीन वील देखी जा सकती हैं। नवनिर्मित मकानों में इनका चलन कम हो गया है। इस कारण यह कला लुप्त होती जा रही है। एक साधारण वील बनाने में औसतन बीस से पच्चीस दिन लगते हैं परंतु वील शैली पर आधारित महल बनाने में दो माह से भी अधिक समय लगता है।

    वील बनाने के लये बांस की पतली-पतली खपच्चियों को धागे से बांध कर किसी दीवार के सहारे ढांचा खड़ा किया जाता है। उसके बाद चिकनी मिट्टी में घोड़े की लीद मिलाकर उसे ढांचे पर चिपका देते हैं। इसके लिये मिट्टी और सूखी हुई लीद को खूब बारीक कूट कर गूंदा जाता है। घोड़े की लीद मिलाने से मिट्टी तड़कती नहीं है। लीद के अभाव में ऊँट के मींगणे मिलाये जाते हैं। इस तरह से तैयार वील को कांच के छोटे-छोटे टुकड़ों से अलंकृत किया जाता है। इसकी सुंदरता बढ़ाने के लिये इसमें कई छोटे-छोटे गवाक्ष, जालियां और कंगूरे बनाये जाते हैं। परंपरागत वीलों पर सफेद रंग का प्रयोग किया जाता है किंतु उनके सौंदर्य में अभिवृद्धि के लिये कहीं-कहीं अभ्रक मिश्रित पीला रंग भी पोत दिया जाता है। पुताई के लिये मंूज की बनी कूंची, पुराने झाड़ू, और कहीं-कहीं बेकार कपड़े का टुकड़ा भी काम में लिया जाता है। रंगों के लिये लाल, पीली और सफेद मिट्टी का ही उपयोग किया जाता है।

    गोदना

    शरीर पर गोदना गोदने की कला का आरंभ भगवान श्रीकृष्ण ने किया था। वे संसार के सबसे पहले गोदना गोदने वाले थे। उन्होंने अपनी चिर किशोरी प्रेमिका महामाया राधिकाजी के शरीर पर स्मृति चिह्न गोदा। तब से मानव देह पर गोदना गोदने की परम्परा चल पड़ी। ग्रामीण संस्कृति में गोदना गुदवाना, नारी की शरीर सज्जा का महत्त्वपूर्ण एवं सजीव अंग है। आजकल के हलचल भरे युग में भी गोदना गुदवाना ग्रामीण नारी का प्रिय अलंकरण है। अपनी देह पर अपने आराध्य देव, प्रेमी, पति, पशु-पक्षी आदि का अंकन ग्रामीण एवं आदिवासी महिलाओं में काफी लोकप्रिय है। आदिवासी महिलाओं में इस बात की प्रतिस्पर्धा होती है कि किसके शरीर पर आकर्षक गोदने गुदे हैं।

    पुरुष भी अपने शरीर पर विभिन्न देवताओं, प्रेमिका, पत्नी या वांछित भावांकन को गुदवा गुदवा कर संतोष पाते हैं। राजस्थान के ग्रामीण अंचल में अनेक समुदाय तथा जातियों में गोदना करा कर देह सजाना सामाजिक परंपरा है। इसके मूल में लोक विश्वास यह है कि मृत्यु के बाद सोने चांदी के कीमती आभूषण इस नश्वर संसार में छूट जाते हैं किंतु गोदना ही एकमात्र आभूषण है जो मृत्यु के बाद भी स्त्रियों के पास रहता है। गूजर, भील, बंजारा, मीणा, कालबेलिया और बागरिया आदि जाति की महिलाएं अपनी देह के विभिन्न अंगों- बांह, छाती, पैर, ललाट, नेत्र, कपोल आदि पर गोदना गुदवाती हैं। गोदने का कार्य अधिकतर नट जाति के स्त्री-पुरुष करते हैं। मेले आदि में तो वे इस कार्य से कमा ही लेते हैं साथ ही गाँव-गाँव में घूमकर भी गोदना गोदने का कार्य करते हैं।

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  • अध्याय - 15 जैन-धर्म तथा भारतीय संस्कृति पर उसका प्रभाव

     02.06.2020
    अध्याय - 15 जैन-धर्म तथा भारतीय संस्कृति पर उसका प्रभाव

    अध्याय - 15 जैन-धर्म तथा भारतीय संस्कृति पर उसका प्रभाव


    किसी बात को, सिद्धान्त को एक तरफ से मत देखो, एक ही तरह उस पर विचार मत करो। तुम जो कहते तो वह सच होगा, पर दूसरे जो कहते हैं, वह भी सच हो सकता है। इसलिए सुनते ही भड़को मत। वक्ता के दृष्टिकोण से विचार करो। -भगवान् महावीर।


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    ईसा के जन्म से लगभग 3500 वर्ष पहले भारत भूमि पर सिंधु-संस्कृति का उद्भव हुआ था जो लगभग 2000 वर्ष तक अपनी सुगन्ध बिखेरकर ई.पू. 1500 के आसपास काल के गाल में समा गई। सिंधु-घाटी के ऊपरी क्षेत्र अर्थात् सप्तसिंधु प्रदेश में वैदिक-आर्य-संस्कृति प्रकाश में आनी आरम्भ हुई। कुछ विद्वान ऋग्वेद का रचना काल ई.पू.2500 से ई.पू.1000 के बीच मानते हैं। अर्थात् इन विद्वानों के अनुसार वैदिक संस्कृति के प्रकाश में आने की घटना ई.पू.2500 से कुछ पहले हुई होगी।

    जबकि पी. वी. काणे के अनुसार ऋग्वेद की रचना ई.पू.4000 से लेकर ई.पू.1000 के बीच की अवधि में हुई। अतः काणे आदि विद्वानों के अुनसार वैदिक संस्कृति का उद्भव ई.पू. 4000 से पहले हुआ होगा। इस दृष्टि से वैदिक संस्कृति, सिंधु-संस्कृति की पूर्ववर्ती अथवा समकालीन थी। वैदिक संस्कृति ईसा के जन्म से लगभग 600 वर्ष पूर्व तक बिना किसी बाधा के निरंतर विकास करती रही। छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व में वैदिक संस्कृति के सामने जैन-धर्म तथा बौद्ध धर्म नामक दो बड़ी चुनौतियों ने जन्म लिया जिनके कारण ईसा पूर्व की छठी शताब्दी को भारतीय संस्कृति के इतिहास में बौद्धिक एवं आध्यात्मिक क्रांति का समय माना जाता है।

    वैदिक धर्म का आधार ज्ञान अर्थात् वेद था किंतु समय के साथ यज्ञों एवं कर्मकाण्डों की जटिलता बढ़ती गई तथा समाज में अनेक प्रकार के अन्धविश्वास पनप गए। ईसा पूर्व छठी शताब्दी तक आते-आते जीवन के प्रत्येक अंग में विभिन्न प्रकार की रुढ़ियों तथा पुराहितों के बढ़ते हुए अधिकारों के कारण अनेक प्रकार की विकृतियों ने जन्म ले लिया। इस कारण जन साधारण में वैदिक-काल से चली आ रही तार्किकता और संतुलित चिंतन पद्धति का अभाव हो गया।

    पुरातन परम्पराओं एवं मान्यताओं की आड़ में जनता का शोषण किया जाने लगा। इसलिए कुछ लोगों में वैदिक परम्पराओं से विश्वास उठने लगा और वे सत्य की खोज में लग गए। ये लोग किसी भी बात को स्वीकार करने से पूर्व उसे परखना चाहते थे। इस दृष्टि से हम इस युग को धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आन्दोलन का युग भी कह सकते हैं।

    वैश्विक स्तर पर वैचारिक क्रांति का युग

    पुरातन परम्पराओं को संदेह की दृष्टि से देखने की यह प्रवृत्ति उस काल में न केवल भारत में अपितु विश्व की अन्य सभ्यताओं में भी देखी जा सकती है। उस काल में अनेक देशों में ऐसे बड़े विचारक हुए जिन्होंने परम्परागत धार्मिक मान्यताओं, रूढ़ियों और सामाजिक कुरीतियों को अमान्य घोषित करके मानव जाति को चिंतन की नवीन दिशा प्रदान की।

    चीन में महात्मा कन्फयूशियस और लाओत्से ने, यूनान में हिराक्लिटस और पाइथोगेरस ने, ईरान में महात्मा जरथ्रुस्त्र ने और भारत में महावीर स्वामी तथा महात्मा बुद्ध ने परम्परागत धार्मिक मान्यताओं को चुनौती दी। उनके विचारों ने अपने अपने देश के धार्मिक, सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन में क्रान्तिकारी परिवर्तन किए जिनके कारण मानव संस्कृति ने अगले चरण में प्रवेश किया।

    भारत में सामाजिक एवं धार्मिक जागृति के कारण

    भारत में छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व की सामाजिक एवं धार्मिक जागृति के मुख्य कारण निम्नलिखित थे-

    (1.) धर्म के वास्तविक स्वरूप की खोज के प्रयास: ऋग्वैदिक-काल में मनुष्य जीवन को सुखपूर्वक व्यतीत करने के लिए आश्रम व्यवस्था आरम्भ होने लगी थी। उत्तरवैदिक-काल में आश्रम व्यवस्था पूरी तरह विकसित हो गई। इस व्यवस्था के अंतर्गत मनुष्य को 50 वर्ष की आयु के पश्चात् वानप्रस्थ आश्रम में एवं 75 वर्ष की आयु के पश्चात् सन्यास आश्रम में व्यतीत करने का प्रावधान किया गया। वानप्रस्थ एवं सन्यास के दौरान मनुष्य धर्म, अध्यात्म तथा दर्शन के विविध पक्षों से लेकर मनुष्य जीवन की सार्थकता एवं मृत्यु के बाद मिलने वाले पुनर्जन्म, कर्मानुसार गति आदि विषयों पर निरंतर चिंतन करता था। तीर्थों एवं वनों में भ्रमण करते रहने से उसका सम्पर्क अपने ही जैसे बहुत से चिंतनशील व्यक्तियों से होता था। निरंतर चिंतन एवं सम्पर्क के कारण वे धर्म के वास्तविक स्वरूप को खोजने का प्रयास करने लगे। इन लोगों के भीतर धर्म के वर्तमान स्वरूप के बारे में असंतोष उत्पन्न होने लगा। इसी असंतोष ने आगे चलकर भारतीय धर्म का स्वरूप बदल दिया।

    (2.) उपनिषदों के विचारों का प्रचार: अनेक उपनिषदों में वैदिक धर्म की कमजोरियों की चर्चा की गई जिन्होंने प्रबुद्ध वर्ग का ध्यान आकर्षित किया तथा वे इन बुराइयों का विरोध करने लगे। अनेक उपनिषदों ने कर्मकाण्ड की भी आलोचना की तथा ज्ञान की प्राप्ति को ही मोक्ष का साधन बताया। उन्होंने अहिंसा तथा आचरण की पवित्रता पर जोर दिया। इस प्रकार उपनिषदों ने ही जैन एवं बौद्ध मत की पृष्ठभूमि तैयार कर दी।

    (3.) ब्राह्मणों की प्रधानता से असंतोष: उत्तरवैदिक-काल में पुरोहितों, यज्ञकर्ताओं एवं अनुष्ठानकर्ताओं की स्थिति सर्वाेपरि हो गई। इन्हें ब्राह्मण कहा जाता था। वे समाज की शिक्षण और यजन सम्बन्धी बौद्धिक एवं आध्यात्मिक आवश्यकताएं पूरी करते थे। सम्पूर्ण समाज उन्हें विशेष आदर देता था। यज्ञों तथा धार्मिक कर्मकाण्डों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ ब्राह्मणों की प्रधानता भी बढ़ गई। उस युग में जीवन की प्रत्येक समस्या को सुलझाने का एकमात्र आधार वेद ही माने जाते थे और वेदों को पढ़ने और उनकी व्याख्या करने का विशेषाधिकार ब्राह्मण वर्ग के पास था, अतः उनका प्रभुत्व बढ़ने लगा।

    शिशु के जन्म से लेकर वृद्धावस्था में मृत्यु होने तक ऐसा कोई कार्य नहीं था जो ब्राह्मणों से पूछे बिना पूरा हो सके। इससे ब्राह्मण वर्ग अहंकारी और सुविधाभोगी बन गया। पौराणिक काल तक आते-आते समाज में ब्राह्मणों का प्रभुत्व सर्वोपरि हो गया। ब्राह्मणों के इस प्रभुत्व के विरुद्ध प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक था। जैन एवं बौद्ध मत, ब्राह्मण प्रभुत्व के विरुद्ध उत्पन्न प्रतिक्रिया के परिणाम थे।

    (4.) बहुदेववाद से असंतोष: यद्यपि ऋग्वैदिक आर्यों ने एकेश्वरवाद के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था तथापि एकेश्वरवाद का सिद्धान्त आर्य प्रजा में लोकप्रिय नहीं हो पाया था। इस कारण वैदिक धर्म बहुदेववादी हो गया। सृष्टि की लगभग समस्त शक्तियाँ देवी-देवता मान ली गईं। यहाँ तक कि राजा-रानियों और प्रसिद्ध योद्धाओं को भी देवता मान लिया गया। देवी-देवताओं को संतुष्ट रखने के लिए अनेक प्रकार के यज्ञ, हवन, उपासना, जप-तप आदि किए जाते थे।

    बुद्ध एवं महावीर के प्रयासों से इस काल में पुनः एकेश्वरवाद ने जोर पकड़ा और लोग सोचने लगे कि जब 'ब्रह्म' सर्वत्र व्याप्त है तो इतने सारे देवी-देवताओं की उपासना की क्या आवश्यता है? उनका यह भी मानना था कि मनुष्य को अपने आत्मोत्कर्ष के लिए देवताओं पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य के कर्म ही उसके भाग्य-विधाता हैं। इस नवीन चिंतन के कारण समाज में बहुदेववादी ब्राह्मण धर्म के विरुद्ध असन्तोष उठ खड़ा हुआ।

    (5.) यज्ञ एवं कर्मकाण्ड से असंतोष- ऋग्वैदिक-काल में आर्यों का धर्म सरल तथा आडम्बरहीन था। वे यज्ञ और अनुष्ठान स्वयं कर लेते थे। यज्ञ के लिए पुरोहित की आवश्यकता नहीं थी परन्तु धीरे-धीरे कर्मकाण्ड और तरह-तरह के विधि विधानों की प्रधानता बनी। अब पुरोहितों की सहायता लेना आवश्यक हो गया। उन्हें भी देवताओं के समान पूज्य समझा जाने लगा। पहले एक पुरोहित से काम चल जाता था। अब उनकी संख्या सात और सात से बढ़कर सत्रह हो गई। कुछ यज्ञ तो वर्षों तक चलते थे।

    ब्राह्मणों ने यज्ञों को अपने रोजगार का मुख्य साधन बना लिया था इसलिए उन्होंने यज्ञों को कर्मकाण्ड से पूर्ण, अत्यधिक जटिल, कठोर तथा खर्चीला बना दिया। यज्ञों में पशुबलि पर अत्यधिक जोर दिया जाने लगा। साधारण व्यक्ति के लिए ऐसे यज्ञों को करवाना असम्भव हो गया। ब्राह्मणों ने धर्म के आधार पर पुनर्जन्म और स्वर्ग-नर्क की धारणाएँ पैदा करके जनता का शोषण करना शुरु कर दिया। वे जादू-टोना, झाड़-फूंक, तन्त्र-मन्त्र आदि के नाम पर प्रजा से धन लेते थे।

    इस कारण जनसामान्य में विरोध की भावना पनपने लगी। निर्धन लोग मौजूदा धर्म के द्वारा मोक्ष प्राप्त करने में असमर्थ थे और उन्हें भी मोक्ष प्राप्त करने की अभिलाषा थी। पशुबलि के विरुद्ध भी समाज में बड़ा विरोध था। यही कारण था कि जब महावीर तथा बुद्ध ने धर्म के सरल एवं अहिंसक स्वरूप को प्रस्तुत किया तो बड़ी संख्या में लोग उनके अनुयाई बन गए।

    (6.) क्षत्रियों एवं ब्राह्मणों की प्रतिस्पर्द्धा: ऋग्वैदिक आर्यों की सामाजिक व्यवस्था उदार एवं लचीली थी। यद्यपि वर्ण व्यवस्था अस्तित्त्व में आ चुकी थी किंतु वह कर्म पर आधारित थी और कोई भी व्यक्ति अपनी योग्यता के आधार पर अपना वर्ण बदल सकता था। चारों वर्णों की समाज में समान आवश्यकता थी परन्तु धार्मिक जटिलता के साथ-साथ सामाजिक व्यवस्था भी जटिल होने लगी। अब चारों वर्णों को वंशानुगत सीमाओं में बाँध दिया गया। अर्थात् अब वर्ण का निश्चय व्यक्ति के कर्म के आधार पर न होकर जन्म के आधार पर होने लगा।

    ऋग्वैदिक समाज में ब्राह्मणों को उनके साधनामय, त्यागमय एवं सादगीपूर्ण जीवन के लिए सर्वाेपरि स्थान दिया गया था तथा क्षत्रियों को देश की रक्षा तथा शासन-व्यवस्था का भार सौंपा गया था। अतः समाज में इन दोनों वर्णों की स्थिति श्रेष्ठ थी परन्तु बाद में क्षत्रियों को ब्राह्मणों की प्रभुता अखरने लगी। वे स्वयं को ब्राह्मणों से श्रेष्ठ मानने लगे। शतपथ ब्राह्मण में उनकी प्रतिक्रिया का सर्वप्रथम उल्लेख मिलता है जिसमें क्षत्रिय को ब्राह्मण से श्रेष्ठ बताया गया है। उपनिषद् काल में ब्राह्मण और क्षत्रियों के बीच प्रभुत्व की प्रतिस्पर्द्धा और अधिक बढ़ गई।

    इस काल में क्षत्रियों ने भी दार्शनिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्र में अपनी धाक जमाने का प्रयत्न किया। भारतीय दर्शन की एक विशेष शाखा 'ब्रह्मविद्या' की स्थापना का श्रेय क्षत्रिय विद्वानों को ही है। ब्राह्मणों और क्षत्रियों के इस संघर्ष की झलक साहित्यिक रचनाओं में भी मिलती है। ब्राह्मण ग्रन्थों में जहाँ कहीं भी चतुर्वर्णों का उल्लेख है, वहाँ सदैव पहले ब्राह्मणों का उल्लेख है, उनके बाद क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र का। जबकि बौद्ध-ग्रन्थों में पहले क्षत्रिय वर्ण का उल्लेख है और फिर ब्राह्मण, वैश्य तथा शूद्र वर्णों का।

    वैश्यों के पास धन-सम्पत्ति थी परन्तु ब्राह्मण वैष्यों को अपने बराबर सम्मान देने को तैयार नहीं थे। अतः वैश्यों में भी ब्रह्मणों के प्रभुत्व के विरुद्ध असन्तोष उत्पन्न हो गया और उन्होंने क्षत्रियों का साथ दिया। शूद्र पहले से ही उपेक्षित थे। इसलिए उन्हें मौजूदा धार्मिक तथा सामाजिक व्यवस्था से कोई लगाव नहीं था। यही कारण था कि जब महावीर और बुद्ध ने एक नवीन धार्मिक तथा सामाजिक व्यवस्था प्रस्तुत की तो क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों ने उसका स्वागत किया।

    (7.) अनार्य संस्कृतियों में असंतोष: यद्यपि उत्तरी भारत में वैदिक धर्म ईसा से ढाई हजार साल पहले से फल-फूल रहा था तथापि ई.पू. छठी शताब्दी तक पूर्वी भारत पूर्ण रूपेण आर्य संस्कृति के प्रभाव में नहीं आया था। वह अनार्य संस्कृति का गढ़ समझा जाता था। आर्य प्रवृत्ति-मार्गी थे। वे संसार-त्याग, वैराग्य, काया-क्लेश आदि सिद्धान्तों में विश्वास नहीं करते थे। इसके विपरीत पूर्वी भारत में उत्पन्न होने वाले जैन एवं बौद्ध मत, दोनों ही निवृत्ति-मूलक थे। यह आर्यों की प्रवृत्ति-मूलक संस्कृति के विरुद्ध विद्रोह था।

    ब्राह्मणों के विरुद्ध असन्तोष का एक बड़ा कारण वेद तथा उन पर आधारित ग्रंथ थे। ब्राह्मणों की दृष्टि में वैदिक ज्ञान ईश्वर प्रदत्त था और कोई भी वेद विरुद्ध बात अधर्म थी परन्तु समाज में एक ऐसा प्रबुद्ध वर्ग तैयार हो रहा था जो वेदों को पूर्ण मानने को तैयार नहीं था। उनकी दृष्टि में वैदिक-ज्ञान सीमित था और उसमें अनेक त्रुटियाँ थीं। उनका मानना था कि केवल वेद मन्त्रों में आस्था रखने और मन्त्रों का उच्चारण करते रहने से सभ्यता का विकास नहीं होगा।

    उपनिषदों में भी इसी प्रकार की भावना दिखाई पड़ती है। बौद्ध साहित्य से ज्ञात होता है कि समाज का एक वर्ग 'वेद प्रामाण्य' के विषय पर ब्राह्मणों का कट्टर आलोचक था। जैन-धर्म के बाइसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ तथा तेबीसवें तीर्थंकर महावीर और बौद्ध धर्म के प्रवर्तक महात्मा बुद्ध ने भी वेदों की मान्यताओं के विरुद्ध विचार व्यक्त किए।

    (8.) संस्कृत के विरुद्ध असंतोष: इस काल में बोलचाल की भाषा प्राकृत तथा पालि थी परन्तु समस्त धार्मिक ग्रन्थ संस्कृत भाषा में थे। धार्मिक कर्मकाण्ड भी संस्कृत भाषा में सम्पादित कराये जाते थे। केवल ब्राह्मण ही इस भाषा में व्यवहार कर सकते थे। जनसामान्य को न तो संस्कृत लिखना-पढ़ना आता था और न वह संस्कृत के मन्त्रों का अर्थ समझ पाती थी। अतः इस भाषा के विरुद्ध भी असन्तोष पनप रहा था। लोग धार्मिक कर्मकाण्डों के लिए भी किसी सरल भाषा को चाहते थे ताकि वे भी धार्मिक बातों को समझ सकंे।

    इस प्रकार छठी शताब्दी ई.पू. तक आते-आते जनसामान्य धार्मिक रुढ़ियों तथा सामाजिक बन्धनों को तोड़ने के लिए तत्पर हो चुका था। वैदिक धर्म के कर्मकाण्डों एवं वर्ण आधारित सामाजिक व्यवस्था से उसका विश्वास उठने लगा था। अतः इस समय जनसामान्य में ऐसी किसी भी नवीन धार्मिक एवं सामाजिक व्यवस्था का अवतरण हो सकता था जो समाज के प्रत्येक वर्ग को एक समान समझने एवं एक समान व्यवहार करने की सुविधा देती हो।

    जैन धर्म

    जैन-धर्म का जन्म कब हुआ, इसके बारे में ठीक से नहीं कहा जा सकता। जैन साहित्य के अनुसार जैन-धर्म आर्यों के वैदिक धर्म से भी पुराना है किंतु जैन-धर्म का प्रादुर्भाव वैदिक धर्म की प्रतिक्रिया में हुआ था इसलिए जैन-धर्म वैदिक धर्म से पुराना नहीं हो सका। जैन-धर्म की स्थापना एवं विकास में योग देने वाले तपस्वी सन्यासियों को तीर्थंकर कहा जाता है। जैन-धर्म के पहले तीर्थंकर ऋषभदेव तथा दूसरे तीर्थंकर अरिष्टनेमि का नाम ऋग्वेद के सूक्तों से ग्रहण किया गया है।

    विष्णु-पुराण एवं भागवत् पुराण में भी ऋषभदेव की कथा का उल्लेख है जहाँ ये नारायण के अवतार माने गए हैं। तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ तथा चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी थे। प्रथम बाईस तीर्थंकरों की ऐतिहासिकता संदिग्ध है क्योंकि उनके बारे में निश्चित ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलते किंतु तेईसवें एवं चौबीसवें तीर्थंकर निश्चित रूप से ऐतिहासिक व्यक्ति थे।

    भगवान पार्श्वनाथ

    जैन साहित्य के अनुसार पार्श्वनाथ का जन्म महावीर से लगभग 250 वर्ष पूर्व आठवीं सदी ईसा पूर्व में हुआ था। उनका उल्लेख ब्राह्मण साहित्य में भी मिलता है। वे काशी के राजा अश्वसेन के पुत्र थे। उनकी माता का नाम वामा था। भारतीय पुराणों में अश्वसेन नामक एक नागराजा का उल्लेख मिलता है। जैन मूर्तियों में मिलने वाला नाग पार्श्वनाथ का प्रतीक है। पार्श्वनाथ का विवाह कुशस्थल की राजकन्या प्रभावती के साथ हुआ था। 30 वर्ष की अवस्था तक उन्होंने वैभव-विलास का जीवन व्यतीत किया। फिर गृहस्थ जीवन को त्याग कर सत्य की खोज में निकल गए।

    83 दिनों की घोर तपस्या के बाद उन्हें वाराणसी के सम्मेद पर्वत पर ज्ञान प्राप्त हुआ। ज्ञान प्राप्ति के बाद लगभग 70 वर्ष तक उन्होंने धर्म प्रचार का काम किया। 100 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। पार्श्वनाथ द्वारा प्रतिपादित मार्ग का अनुसरण करने वाले 'निग्रन्थ' कहलाए, जिसका अर्थ होता है- 'सांसरिक बन्धनों से मुक्त हो जाने वाले।' इस प्रकार जैन-धर्म का पुराना नाम 'निग्रन्थ धर्म' है जिसमें राग-द्वेष का कोई स्थान नहीं है। पार्श्वनाथ के अनुयाइयों की संख्या बहुत अधिक थी।

    जैन साहित्य में पार्श्वनाथ की अनुयाई स्त्रियों का भी उल्लेख मिलता है। महावीर स्वामी के माता-पिता भी पार्श्वनाथ के अनुयाई थे। पार्श्वनाथ ने अपने अनुयाइयों को संगठित करके चार गणों की स्थापना की तथा उन्हें अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह नामक चार सिद्धान्तों पर चलने को कहा। पार्श्वनाथ ने ब्राह्मणों के बहुदेववाद और यज्ञवाद का विरोध किया। वे वेदों की प्रामाणिकता में विश्वास नहीं रखते थे तथा हिंसात्मक यज्ञों के विरोधी थे। जन्म आधारित वर्ण-व्यवस्था में भी उनका विश्वास नहीं था। पार्श्वनाथ के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति मोक्ष का अधिकारी है।

    अतः स्पष्ट है कि महावीर स्वामी, जैन-धर्म के संस्थापक नहीं थे। उनके जन्म से सैंकड़ों वर्ष पूर्व जैन-धर्म संगठित हो चुका था। उसके अपने विधि-विधान थे। जीवन-यापन की विशेष व्यवस्था थी। उनके अपने चार संघ थे। प्रत्येक संघ एक-एक गणधर की देखरेख में काम करता था। महावीर स्वामी ने उनकी मौजूदा व्यवस्था में सुधार करके उसे लोकप्रिय बनाया। इसीलिए उन्हंे जैन-धर्म का सुधारक माना जाता है।

    महावीर स्वामी

    जैन-धर्म के 24वें तथा अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी का जन्म ई.पू. 599 में वैशाली के निकट कुण्डग्राम के ज्ञातृक क्षत्रिय कुल में हुआ। कुछ स्रोत महावीर का जन्म ई.पू. 540 में होना बताते हैं। उनके पिता सिद्धार्थ, ज्ञातृक क्षत्रियों के छोटे से राज्य कुण्डग्राम के राजा थे। महावीर की माता का नाम त्रिशला था जो लिच्छवी वंश के प्रसिद्ध राजा चेटक की बहिन थी। महावीर स्वामी के बचपन का नाम वर्धनाम था। उनके जन्म पर ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि बड़ा होने पर वह या तो चक्रवर्ती राजा बनेगा अथवा परमज्ञानी भिक्षु। वर्धमान को बाल्यकाल में क्षत्रियोचित शिक्षा दी गई।

    युवावस्था में उनका विवाह यशोदा नामक सुन्दर राजकन्या के साथ किया गया। इस वैवाहिक सम्बन्ध से उनके एक पुत्री भी हुई जिसका विवाह जमालि नामक क्षत्रिय सरदार के साथ किया गया। वर्धमान जब 30 वर्ष के हुए तब उनके पिता का स्वर्गवास हो गया। इस घटना से उनकी निवृत्तिमार्गी प्रवृत्ति और अधिक मजबूत हो गयी। उन्होंने अपने बड़े भाई नन्दिवर्धन से आज्ञा लेकर घर त्याग दिया और भिक्षु बन गए। महावीर ने तेरह माह तक भिक्षु के वस्त्र धारण करके घोर तपस्या की। परन्तु उन्हें अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफलता नहीं मिली।

    इस पर उन्होंने भगवान पार्श्वनाथ के सम्प्रदाय को छोड़़ दिया और अकेले ही तपस्या करने लगे। उनके वस्त्र जीर्ण-शीर्ण होकर गिर गए तब वर्धमान निर्वस्त्र रहने लगे। उनके नग्न शरीर को कीट-पतंग काटने लगे परन्तु वे पूर्णतः उदासीन रहे। बारह वर्ष तक शरीर की उपेक्षा कर वे सब प्रकार के कष्ट सहते रहे। उन्होंने संसार के समस्त बन्धनों का उच्छेद कर दिया। संसार से वे सर्वथा निर्लिप्त हो गए। अन्त में जम्भियग्राम (जृम्भिका) के समीप उज्जुवालिया (ऋजुपालिका) सरिता के तट पर महावीर को कैवल्य ज्ञान प्राप्त हुआ।

    तभी उन्हें 'केवलिन्' की उपाधि मिली। इन्द्रियों को जीत लेने के कारण वे 'जिन' कहलाए। साधना में अपूर्व साहस दिखलाने के लिए वे महावीर कहलाए। समस्त सांसारिक बन्धनों को तोड़ देने से वे 'निग्रन्थ' कहलाए। सत्य का ज्ञान हो जाने के बाद महावीर ने जनसामान्य को जीवनयापन का सही मार्ग दिखाने का कार्य प्रारम्भ किया। वे अपने विचारों का प्रचार करने के लिए स्थान-स्थान पर घूमने लगे। मगध, काशी, कोसल आदि राज्य उनके प्रचार क्षेत्र थे। महावीर स्वामी का कई राजवंशों से निकट का सम्बन्ध था, इसलिए उन्हें अपने विचारों के प्रचार में उन राजवंशों से काफी सहायता मिली।

    उनकी सत्यवाणी तथा जीवन के सरल मार्ग से प्रभावित होकर सैंकड़ों लोग उनके अनुयाई बन गए। राजा-महाराजा, वैश्य-व्यापारी तथा अन्य लोग उनके उपदेशों का अनुसरण करने लगे और धीरे-धीरे उनके अनुयाइयों की संख्या काफी बढ़ गई। जैन साहित्य के अनुसार लिच्छवी का राजा चेटक, अवन्ती का प्रद्योत, मगध के राजा बिम्बिसार और अजातशत्रु, चम्पा का राजा दधिवाहन और सिन्धु-सौबीर का राजा उदयन सहित अनेक तत्कालीन राजा, महावीर स्वामी के अनुयाई थे।

    बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार बिम्बिसार और प्रद्योत, महात्मा बुद्ध के अनुयाई थे। इससे पता चलता है कि उस युग के हिन्दू शासक धार्मिक दृष्टि से काफी उदार तथा सहिष्णु थे और वे ज्ञानी पुरुषों का समान रूप से आदर करते थे। इसी कारण जैन और बौद्ध दोनों धर्मों ने उन्हें अपना-अपना अनुयाई मान लिया। अन्त में ई.पू.527 में 72 साल की आयु में पावापुरी (पटना) में महावीर स्वामी को मोक्ष प्राप्त हुआ। कुछ स्रोत उनका निधन ई.पू. 467 में होना मानते हैं। उनके निधन के बाद भी जैन-धर्म उनके बताए सिद्धांतों पर चलता रहा तथा उनके मुख्य शिष्य जैन-संघ का प्रबंध करते रहे।

    पार्श्वनाथ एवं महावीर के सिद्धांतों में अंतर

    भगवान पार्श्वनाथ तथा महावीर स्वामी के सिद्धान्तों में विशेष अंतर नहीं था। पार्श्वनाथ ने चार व्रतों की आवश्यकता पर जोर दिया था, महावीर स्वामी ने उनके साथ 'ब्रहाचर्य' नामक एक और व्रत जोड़ दिया। पार्श्वनाथ ने अपने अनुयाइयों को वस्त्र पहनने की स्वीकृति दे दी थी परन्तु महावीर स्वामी ने जैन भिक्षुओं को निर्वस्त्र रहने को कहा। महावीर अपने बताए सिद्धांतों में से दो सिद्धांतों- ब्रह्मचर्य एवं वैराग्य पर अधिक जोर देते थे।

    जैन गण

    महावीर के शिष्यों में साधु एवं गृहस्थ, स्त्री एवं पुरुष, धनी एवं निर्धन सभी थे। ये शिष्य आगे चलकर 11 समूहों में बंट गए जिन्हें 'गण' कहते थे। प्रत्येक समूह का नेता 'गणधर' कहलाता था। इस प्रकार के 13 गणों का उल्लेख पाया जाता है।


    जैन-धर्म के सिद्धान्त

    निवृत्ति मार्ग

    जैन धर्म, आर्यों के प्रवृत्तिमूलक धर्म के विरुद्ध निवृत्तिमार्गी था। वह आर्यों की भाँति इस संसार के समस्त सुखों की कामना नहीं करता। उसके लिए संसार के समस्त सुख, दुःखमूलक तथा व्याधि रूप हैं। क्योंकि संसार के सुखों को भोगने से कामनाएँ शान्त नहीं होतीं, अपितु बढ़ती हैं। मनुष्य जन्म-मृत्यु के चक्र से पीड़ित है। गृहस्थ जीवन में भी सुख-शान्ति नहीं है। जैन-धर्म के अनुसार सारा संसार दुःखमय है। इस दुःख का कारण कभी तृप्त न होने वाली तृष्णा है जिससे मनुष्य आजीवन घिरा रहता है।

    बौद्ध धर्म की भाँति जैन-धर्म की मुख्य समस्या भी दुःख और दुःख-विरोध हैं। जैन-धर्म के अनुसार मनुष्य का सुख सांसारिक सुखों को भोगने में नहीं है अपितु इस संसार को त्यागने में है। मनुष्य को सब कुछ त्यागकर, कभी अन्त न होने वाले दुःखों को त्यागकर, संसार से कोई सम्बन्ध न रखकर तथा भिक्षु बनकर जीवन व्यतीत करना चाहिए। इस प्रकार जैन-धर्म वस्तुतः भिक्षु धर्म है। यह निवृत्ति मार्ग है जो आर्यों की प्रवृत्तिमूलक विचारधारा के विपरीत था।

    जीव और अजीव

    महावीर के अनुसार सम्पूर्ण दृश्य जगत् 'जीव' और 'अजीव' नामक दो तत्त्वों में विभक्त है। ये दोनों ही तत्त्व शाश्वत हैं, अनादि और अनन्त हैं। इनसे ही मिलकर यह जगत् बनता है। इसलिए जगत भी अनादि और अनन्त है। जीव तथा अजीव का कर्त्ता कोई नहीं है। जीव चैतन्य द्रव्य है और अजीव चैतन्य रहित है। जैन-धर्म में आत्मा के अस्तित्त्व को विश्वास सहित और ज्ञानपूर्वक माना गया है। जीव ही आत्मा है तथा यह सृष्टि के कण-कण में विद्यमान है।

    जीव का विस्तार शरीर के अनुसार होता है। इसका कार्य अनुभूति है अर्थात् जीव को सुख दुःख सन्देह, ज्ञान आदि का अनुभव होता है। जीव, अजीव के ढाँचे (शरीर) में रहता है। अजीव अवस्था अर्थात् जड़ पदार्थ को पुद्गल कहते हैं। पुद्गल उस वस्तु को कहते हैं जिसे जोड़कर बड़ा किया जा सके अथवा तोड़कर छोटा किया जा सके। इसके सबसे लघुत्तम भाग अर्थात् परमाणुओं के आपस में मिलने से भौतिक संसार के विभिन्न रूप बनते हैं, जिनके पाँच गुण हैं- स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण और शब्द।

    इस प्रकार, जीव और अजीव के मिलने से जगत् की रचना होती है। जीव और अजीव के सम्बन्ध का माध्यम कर्म है। पुद्गल ही कर्म है जो जीव को घेरे रहता है जैसे खान के भीतर धातु मिट्टी में मिली रहती है, इसी प्रकार जीव इस कर्म नामक बारीक मैटर से सना रहता है। वह हर समय जीवन से चिपटा रहता है। कर्म, जीव पर रूप, रंग, रस और गन्ध की विशिष्ट छाप लगाते हैं जिसे 'लेश्या' कहते हैं।

    इनसे पृथक होना अर्थात् पुद्गल से अलग होना, कर्म के बन्धन को तोड़ना है। कर्म के बन्धन को तोड़ने का अर्थ है- जन्म-मरण और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त होना। इसी का नाम मोक्ष है। इस प्रकार जीव के दो रूप होते हैं- मुक्त जीव और बद्ध जीव। जो जीव त्रिरत्न तथा पंचव्रतों के पालन के कारण जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो गए, वे मुक्त जीव हैं किंतु जो जीव जन्म-मरण के बंधने में बंधे होते हैं, वे बद्ध जीव हैं।

    बद्ध जीव भी दो प्रकार के होते हैं- स्थावर एवं जंगम। जल, पृथ्वी, वायु और वनस्पति स्थावर जीव हैं जिनमें एक ही इन्द्रिय होती है। मुष्य, पशु और पक्षी जंगम जीव हैं जिनमें पांच इंद्रियां होती हैं। अजीव अचेतन तत्त्व हैं इसके अंतर्गत पांच पदार्थ आते हैं- धर्म, अधर्म, काल, आकाश तथा पुद्गल। यह समस्त संसार जीव एवं अजीव के घात-प्रतिघात से संचालित होता है।

    बन्ध और मुक्ति

    बन्ध के दो मुख्य कारण हैं- राग और द्वेष। इनसे ही चार कषायों- क्रोध, मान, माया और लोभ का उदय एवं विकास होता है। राग और द्वेष जीव में आसक्ति या कामना उत्पन्न करते हैं। इससे जीव अपना विवेक खो बैठता है और संसार में भटकता रहता है। वह राग और द्वेष से उत्पन्न कषायों- हिंसा, झूठ, चोरी, लोभ आदि का आश्रय लेता है। जैन आगम में कर्म, 'क्रिया' को नहीं कहते अपितु 'पुद्गल-परमाणुओं' को कहते हैं।

    पुद्गल-परमाणुओं का बहना या बनना 'आश्रव' कहलाता है। यही आश्रव व्यक्ति के कर्मबन्ध का कारण होता है। वह हिंसा आदि को सत्य और पाने योग्य समझकर आचरण करता है तथा कर्मों के बन्धनों में बंध जाता है। इसी को बन्ध कहते हैं। आश्रव और बन्ध पुनर्जन्म के मुख्य कारण हैं। राग और द्वेष दुःख ही पैदा नहीं करते, सुख भी पैदा करते हैं। जो कर्म दुःख के कारण होते हैं उन्हे पाप कहा जाता है और सुख के कारण होते है उन्हें पुण्य कहा जाता है।

    पाप और पुण्य दोनों का जन्म आसक्ति के कारण होता है। 'पुण्य-बन्ध' से जीव का जो शरीर बनता है वह 'पाप-बन्ध' से बनने वाले शरीर से भिन्न किस्म का होता है। 'पाप बन्ध' की अवस्था में जीव पूर्ण रूप से 'कषाय-ग्रस्त' हो जाता है परन्तु 'पुण्य-बन्ध' की अवस्था में 'कषाय' जीव की विवेक शक्ति को पूरी तरह से नहीं दबा पाते। 'पुण्य-बन्ध' की अवस्था में जीव में यह विवेक बना रहता है कि क्या चीज ग्रहण करने योग्य है और क्या त्याज्य है?

    इस प्रकार की जिज्ञासा का उदय ही राग-द्वेष पर रोक लगाता है। इस रोक को 'संवर' कहते हैं। संवर के परिणामस्वरूप धीरे-धीरे संचित कर्म कटते हैं या नष्ट हो जाते हैं। कर्म-नाश की इस प्रकिया को 'निर्जरा' कहते हैं। पूर्ण निर्जरा की स्थिति का ही दूसरा नाम 'मुक्ति' है।

    मोक्ष अथवा निर्वाण

    राग-द्वेष या आसक्ति के बन्धन से मुक्ति ही 'मोक्ष' है। मोक्ष का ही दूसरा नाम 'निर्वाण' है। निर्वाण, जैन-धर्म का चरम लक्ष्य है। इसके लिए कर्म-फल से मुक्ति पाना आवश्यक है। निर्वाण की अवस्था में मनुष्य समस्त प्रकार की कामनाओं से मुक्त होकर अन्नत शान्ति को प्राप्त करता है। निर्वाण का अर्थ अस्तित्त्व की समाप्ति नहीं है। इसका अभिप्राय जीव के भौतिक अंश अर्थात् पुद्गल के विनाश से है। जीव का आत्मिक तत्त्व कभी समाप्त नहीं होता। निर्वाण का अर्थ शून्यता, अकर्मण्यता अथवा निष्क्रियता भी नहीं है। निर्वाण प्राप्त व्यक्ति विशुद्ध रूप में देख-सुन सकता है।

    त्रिरत्न

    जीव के लिए कैवल्य अथवा मोक्ष की प्राप्ति सरल नहीं है। महावीर ने कैवल्य प्राप्ति के लिए तीन साधन बताए जो जैन-धर्म में 'त्रिरत्न' के नाम से प्रसिद्ध हैं- सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र। जैन-धर्म के अनुसार पूर्व जन्म के कर्म-फल को नष्ट करने तथा इस जन्म के कर्म-फल से बचने के लिए 'त्रिरत्नों' का पालन करना आवश्यक है। इसी से मनुष्य निर्वाण की ओर अग्रसर हो सकता है।

    (1.) सम्यक ज्ञान: सम्यक ज्ञान का अर्थ है सही विचार अर्थात् सत् और असत् का भेद समझ लेना। जैन-धर्म के अनुसार तीर्थंकरों की शिक्षाओं के ध्यानपूर्वक अध्ययन से सत् और असत् का भेद ग्रहण हो जाता है। यह सत्य और पूर्ण ज्ञान ही सम्यक् ज्ञान है। ज्ञान पाँच प्रकार का होता है- 1. मति ज्ञान- जो इन्द्रियों द्वारा प्राप्त होता है, जैसे नाक के द्वारा गन्ध का ज्ञान होना। 2. श्रुति ज्ञान- वह ज्ञान जो सुनकर अथवा वर्णन के द्वारा प्राप्त होता है। इसे शास्त्र ज्ञान भी कहते हैं। 3. अवधि ज्ञान- अर्थात् दूर देश और काल का ज्ञान। 4. मन पर्याय- अन्य व्यक्तियों के भावों और विचारों को जान लेने वाला ज्ञान और 5. केवल्य ज्ञान- देश-काल की सीमाओं से परे का सम्पूर्ण ज्ञान। यह पूर्ण ज्ञान है, जो निग्रन्थों को प्राप्त होता है। जीव में पूर्ण ज्ञान रहता है परन्तु भौतिक आवरण के कारण वह छिप जाता है। भौतिक तत्त्व का नाश होते ही जीव को पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो जाता है और वह निग्रन्थ हो जाता है।

    (2.) सम्यक् दर्शन: सम्यक् दर्शन का अर्थ है- यथार्थ ज्ञान के प्रति श्रद्धा। तीर्थंकरों और जैन शास्त्रों में निहित ज्ञान के प्रति संशय रहित पूर्ण आस्था एवं श्रद्धा ही सम्यक् दर्शन है। इसके आठ अंग हैं- (1.) सन्देह अथवा संशय को दूर करना, (2.) सांसारिक सुखों की इच्छा को दूर करना, (3.) आसक्ति-विरक्ति को दूर करना, (4.) गलत रास्ते से दूर रहना, (5.) मिथ्या धारणाओं से दूर रहना, (6.) सही विश्वास पर जमे रहना, (7.) समस्त प्राणियों से समान प्रेम रखना और (8.) जैन-धर्म के सिद्धान्तों में पूर्ण आस्था रखना।

    इन आठ अंगों का पालन करने के लिए तीन प्रकार की गलतियों से बचना आवश्य है- (1.) अन्ध-विश्वास से बचना (2.) देवी-देवताओं के पूजन से पुण्य प्राप्ति की आशा से बचना और (3.) कपटी साधु सन्तों के कपटजाल से बचना।

    (3.) सम्यक चरित्र: तीर्थंकरों द्वारा प्रदर्शित मार्ग पर चलकर नैतिक एवं सदाचार पूर्ण जीवन-यापन करना ही सम्यक चरित्र है। इन्द्रियाँ जीव के बाह्य उपकरण हैं और इनकी सहायता से वह बाह्य जगत की जानकारी प्राप्त करता है। उदाहरण के लिए आँख का काम है देखना। प्रत्येक जीव सुन्दर दृश्य को देखना पसन्द करेगा और असुन्दर दृश्य से आँखें हटा लेगा अर्थात् सुन्दर दृश्य में उसकी आसक्ति है परन्तु जो जीव सुन्दर-असुन्दर के भेद के प्रति उदासीन होकर अनासक्त हो जाता है, उसके लिए समस्त दृश्य एक समान हो जाते हैं। इसी को सम्यक-आचरण कहते हैं।

    बाह्य जगत के विषयों के प्रति सम-दुःख-सुख-भाव ही सम्यक आचरण है और इसी को सम्यक-चरित्र कहते हैं। सम्यक् चरित्र के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए पंच अणुव्रतों का पालन किया जाना चाहिए। पंचव्रत के पालन में महावीर ने गृहस्थों और यतियों में भेद किया है। क्योंकि ये दोनों एक जैसे नियम नहीं पाल सकते। सामान्य श्रावक के लिए ये पंच-अणुव्रत रूप में और मुनियों के लिए पंच-महाव्रत के रूप में हैं।

    पंच अणुव्रत

    (1.) अहिंसा अणुव्रत: निरपराध को दण्डित या पीड़ित नहीं करना।

    (2.) सत्य अणुव्रत: प्रेम, द्वेष एवं उद्वेग आदि वृत्तियों को संयमित करके सच बोलना।

    (3.) अस्तेय अणुव्रत अथवा अचौर्याणुव्रत: किसी की वस्तु न चुराना और कोई पड़ी हुई वस्तु न उठाना।

    (4.) ब्रह्मचर्य अणुव्रत: अपने दाम्पत्य में संतुष्ट रहना तथा मन-वचन-कर्म से पर-स्त्री या पर-पुरुष से सम्पर्क न रखना।

    (5.) अपरिग्रह अणुव्रत अथवा परिग्रह परमाणु व्रत: आवश्यकता से अधिक धन तथा धान्य का संग्रह नहीं करना।

    जैन यतियों एवं साधुओं के लिए निर्धारित पंचव्रत, पंच महाव्रत कहलाते हैं।

    पंच महाव्रत

    (1.) अहिंसा: मन, वचन और कर्म से किसी का अहित नहीं करना ही अहिंसा है। अहिंसा का उपदेश ही महावीर स्वामी की शिक्षाओं और जैन-धर्म के सिद्धान्तों का मूल मन्त्र है। अहिंसा का व्यापक अर्थ प्राणी-मात्र के प्रति दया, समानता और उपकार की भावना रखने से है। गृहस्थों के लिए पूर्ण अहिंसाव्रत धारण करना कठिन है, इसलिए उनके लिए स्थूल अहिंसा का विधान किया गया है जिसका अर्थ है- निरपराधियों की हिंसा नहीं करना।

    (2.) सत्य: महावीर स्वामी ने सत्य वचन पर अत्यधिक जोर दिया, क्योंकि बिना सत्य भाषण के अहिंसा का पालन सम्भव नहीं है। महावीर स्वामी का उपदेश था कि मनुष्य को प्रत्येक परिस्थिति में सत्य बोलना चाहिए।

    (3.) अस्तेय: अस्तेय का अर्थ है- 'जो वस्तु अपनी नहीं है, उसे ग्रहण नहीं करना।' महावीर स्वामी ने चोरी को महान् अनैतिक कार्य बताया तथा इससे दूर रहने को कहा। उन्होंने गृहपति की अनुमति के बिना किसी के घर में नहीं जाने तथा भिक्षा में प्राप्त अन्न को गुरु की इच्छा के बिना ग्रहण न करने को भी अस्तेय में सम्मिलित किया।

    (4.) अपरिग्रह: अपरिग्रह का अर्थ है- 'संग्रह न करना' और इसका व्यापक अर्थ है- 'किसी भी वस्तु में ममत्व नहीं रखना।' महावीर के अनुसार जो व्यक्ति सांसारिक वस्तुओं का संग्रह नहीं रखता, वह संसार के मायाजाल से दूर रहता है।

    (5.) ब्रह्मचर्य: पार्श्वनाथ ने उपरोक्त चार महाव्रत ही बताए थे, महावीर स्वामी ने चार व्रतों में पाँचवाँ व्रत जोड़कर इन्हें त्रिरत्नोें की प्राप्ति का साधन बताया। ब्रह्मचर्य का अर्थ विपरीत लिंगी शरीर से दूर रहना होता है।

    सात शील व्रत

    महावीर के धर्म में पाँच व्रतों के साथ-साथ सात शील व्रतों के पालन का भी निर्देशन किया गया-

    (1.) दिग्व्रत: अपनी क्रिया को कुछ विशिष्ट दिशाओं में सीमित करना।

    (2.) देशव्रत: अपना कार्य कुछ विशिष्ट देशों तक सीमित रखना।

    (3.) अनर्थ दण्डव्रत: बिना कारण अपराध का भागी न बनाना।

    (4.) सामयिक: अपने ऊपर विचार करने के लिए समय का कुछ भाग निश्चित करना।

    (5.) प्रोषधोपवास: प्रत्येक मास के दोनों पक्षों की अष्टमियों और चतुर्दशियों को उपवास करना।

    (6.) उपभोग-प्रतिभोग परिणाम: दैनिक उपभोग की वस्तुओं और पदार्थों को नियमित करना।

    (7.) अतिथि संविभाग: घर आए साधु या उपासक को भोजन कराने के बाद भोजन करना।

    पाँच समिति

    जैन-धर्म के अनुसार मनुष्य को अपने दैनिक जीवन में पाँच बातों की सतर्कता बरतनी चाहिए-

    (1.) ईर्या समिति: चलते-फिरते समय सावधानी रखना ताकि किसी जीव को कष्ट न पहँुचे।

    (2.) भाषा समिति: बोलते समय सावधानी रखना ताकि किसी मानव को ठेस न पहुँचे।

    (3.) एषणा समिति: खाना खाते समय सावधानी बरतना ताकि कोई जीव न मरे।

    (4.) आदान निक्षेप समिति: वस्तुओं को उठाते, रखते और प्रयोग करते समय सावधानी रखना जिससे दूसरे को कष्ट न हो।

    (5.) उत्सर्ग समिति: मल-मूत्र त्याग में सावधानी रखना तथा गन्दगी न फैलाना।

    अनेकान्तवाद अथवा स्याद्वाद

    जैन दर्शन के अनुसार वस्तु के अनन्त स्वरूप हैं। ज्ञानी अथवा अर्हत् या जीवनमुक्त व्यक्ति ही उन वस्तुओं की अनन्त्ता को जान सकते हैं। सामान्य जन वस्तु के कुछ स्वरूपों को ही जानते हैं। ज्ञान की यह विभिन्नता सात प्रकार की हो सकती है-

    (1.) है,

    (2.) नहीं है,

    (3.) है और नहीें है,

    (4.) कहा नहीं जा सकता,

    (5.) है, किन्तु कहा नहीं जा सकता,

    (6.) नहीं है और कहा नहीं जा सकता,

    (7.) है और नहीं है, किन्तु कहा नहीं जा सकता।

    जैन-धर्म में इसे अनेकान्तवाद, स्याद्वाद अथवा सप्त-भंगी का सिद्धान्त कहते हैं। यह भी हो सकता है कि एक व्यक्ति किसी एक स्वरूप को जाने हुए हो और दूसरा किसी और स्वरूप को।यह भी सम्भव है कि वक्ता जाने हुए स्वरूप को भी आवश्यकतानुसार अंशमात्र ही कहे। भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के इस प्रकार के कथन परस्पर-विरोधी प्रतीत हो सकते हैं। जबकि वे अपनी-अपनी दृष्टि से ठीक हैं। यदि मनुष्य तटस्थ भाव से उसी वस्तु का दर्शन करता है और जैसी वह उसे दिखाई देती है, वह वैसी ही उसे बताता है तो वह बताना सत्य ही कहा जाएगा, असत्य नहीं।

    समझ और विवेक के परिणाम की भिन्नता के कारण स्वरूप को समझने में कल्पना की अधिकता रहेगी ही। अनेकान्तावाद अथवा स्यादवाद इसी दृष्टि को जगाता है। वस्तु के अनेक स्वरूपों को जानने के लिए 'आविष्ट बुद्धि' नहीं अपितु 'निर्मल बुद्धि' चाहिए। यदि बुद्धि निर्मल है तो विविधता चाहे भाव की हो या विचार या कर्म की हो, वह विचित्र न लग कर स्वाभाविक लगेगी। स्याद्वादी वही हो सकता है जो निर्मल अन्तःकरण वाला है, प्रशान्त है और जिसकी संवेदना सूक्ष्म को ग्रहण करती है।

    तपस्या और उपवास

    महावीर ने आत्मा को वश में करने तथा पाँच आचरणों का पालन करने में तपस्या और उपवास पर सर्वाधिक बल दिया। उन्होंने दो प्रकार की तपस्या बताई- एक बाह्य तथा दूसरी आन्तरकि। बाह्य तपस्या में व्रत, अन्न त्याग, भिक्षाचार्य तथा कष्ट सहन करना मुख्य हैं। आन्तरिक तपस्या में नम्रता, सेवा, स्वाध्याय, ध्यान तथा शरीर त्याग सम्मिलित है। बाह्य तपस्या करने से व्यक्ति में आन्तरिक तपस्या करने की क्षमता आती है और उससे आदमी में अच्छे विचारों का विकास होता है। महावीर स्वामी ने तपस्या का सबसे सरल उपाय उपवास बताया है। इससे शरीर एवं आत्मा शुद्ध होते हैं और मनुष्य मोक्ष प्राप्त करता है।

    सामाजिक मान्यताओं के सम्बन्ध में महावीर स्वामी के विचार

    उपर्युक्त दर्शन के साथ-साथ महावीर स्वामी ने उस युग में प्रचलित धार्मिक और सामाजिक बुराइयों के सम्बन्ध में कई बातें कहीं-

    (1.) वेदों के ज्ञान में विश्वास नहीं

    महावीर ने जीवन में नैतिकता का पालन करने पर जोर दिया तथा ब्राह्मण धर्म के सिद्धांतों, वेदों, यज्ञों और कर्मकाण्ड का विरोध किया। उनका कहना है था कि यह विश्वास करने का कोई कारण नहीं कि वैदिक ज्ञान ही एकमात्र पूर्ण और निर्विवाद है। उनके अनुसार वेद ईश्वरीय कृति न होकर मानवीय कृति थे। अहिंसावादी होने के कारण महावीर, हिंसक यज्ञों को स्वीकार नहीं कर सकते थे। उनके अनुसार यज्ञ तथा कर्मकाण्ड यांत्रिक थे और उनसे मनुष्य की अन्तःशुद्धि सम्भव नहीं थी।

    (2.) ईश्वर के अस्तित्त्व में विश्वास नहीं

    महावीर का विचार था कि मनुष्य की आत्मा में जो कुछ महान् है और शक्ति तथा नैतिकता है, वही भगवान् है। इसके आधार पर माना जाता है कि जैन-धर्म ईश्वर के अस्तित्त्व में विश्वास नहीं करता तथा वह ईश्वर को सृष्टि का निर्माता नहीं मानता। जैन-धर्म के अनुसार संसार वास्तविक है और इसका कभी भी विनाश नहीं होता। संसार छः द्रव्यों का समुच्चय है। ये द्रव्य हैं- (1.) जीव, (2.) पुद्गल, (3.) धर्म, (4.) अधर्म, (5.) आकाश और (6.) काल। ये समस्त द्रव्य शाश्वत, नित्य और अनश्वर हैं। अतः सृष्टि भी अनादि और अनन्त है। उपरोक्त द्रव्यों के संगठन एवं विघटन के कारण इनसे निर्मित पदार्थों के रूप में परिवर्तन होता रहता है।

    (3.) आत्मा के अस्तित्त्व में विश्वास

    महावीर आत्मा की अमरता में विश्वास करते थे। उनके अनुसार प्रकृति में परिवर्तन हो सकते हैं किन्तु आत्मा अजर-अमर है और सदैव एक सी बनी रहती है। वे जीव को ही आत्मा मानते हैं और उनके अनुसार जीव केवल मनुष्य, पशु और वनस्पति में ही नहीं है, अपितु विश्व के कण-कण में समाया है।

    (4.) कर्मफल एवं पुनर्जन्म में विश्वास

    महावीर स्वामी का मानना था कि यदि वासनाओं पर विजय प्राप्त कर ली जाए तो कर्मों के बन्धन नष्ट हो सकते हैं और निर्वाण प्राप्त हो सकता है। उनका उपदेश था-'मनुष्य अपने पूर्वजन्म के कर्म-फल का नाश करे और इस जन्म में किसी प्रकार का कर्म-फल संगृहीत न करे, ऐसा करने से मनुष्य को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाएगी।' इसका अर्थ यह हुआ कि जैन-धर्म कर्म-फल एवं पुनर्जन्म दोनों में विश्वास रखता है। मनुष्य की उन्नति-अवनति स्वयं उसके कर्मों पर निर्भर करती है। किए हुए कर्माें का फल भोगे बिना जीव का छुटकारा नहीं हो सकता। इस प्रकार, कर्म ही पुनर्जन्म का कारण है।

    (5.) सामाजिक समानता में विश्वास

    महावीर स्वामी ने आर्यों की वर्ण व्यवस्था का विरोध किया और जैन-धर्म का द्वार बिना किसी भेदभाव के समस्त वर्णों के लिए खोल दिया। उनकी मान्यता थी कि समस्त देहधारियों की आत्मा एक जैसी है तथा निर्वाण व्यक्तिगत पुरुषार्थ के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए मोक्ष प्राप्ति के सम्बन्ध में किसी भी व्यक्ति के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता। महावीर स्वामी के बाद उनके अनुयाई समानता के इस सिद्धान्त को व्यवहार में नहीं ला सके और उनमें जाति-भेद के संस्कार विद्यमान रहे। यही कारण है कि जैन-धर्म शूद्र कही जाने वाली जातियों को नहीं अपना सका।

    (6.) स्त्री स्वातन्त्र्य में विश्वास

    बाईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने स्त्रियों को निर्वाण-प्राप्ति की अधिकारिणी माना था। महावीर स्वामी ने भी उनके इस विचार का अनुसरण किया तथा अपने धर्म तथा संघ के द्वार स्त्रियों के लिए खोल दिए। इस कारण अनेक स्त्रियों ने जैन-धर्म की दीक्षा ली। पुरुषों की भाँति स्त्रियों के भी दो वर्ग थे- एक श्रमणियों का और दूसरा श्राविकाओं का। इन्हें भी उपासना करने तथा मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रयास करने का अधिकार था।

    जैन-धर्म का संगठन

    अनुश्रुति के अनुसार महावीर स्वामी के शिष्य समुदाय में 14 हजार श्रमण, 36 हजार श्रमणियाँ, 1 लाख 69 हजार श्रावक तथा 3 लाख 18 हजार श्राविकाएं थीं। महावीर ने पावापुरी में जैन-संघ की स्थापना की जिसके अध्यक्ष वे स्वयं थे। महावीर स्वामी के जीवन में 11 गणधर अर्थात् मुख्य प्रचारक थे। जब महावीर का निधन हुआ तब केवल केवल एक गणधर सुधर्मन् ही जीवित बचे थे। अगले 22 वर्ष तक यही सुधर्मन् जैन संघ के अध्यक्ष रहे। तदनंतर जम्बू स्वामी जैन संघ के नायक हुए जो लगभग 44 वर्षों तक जैन संघ के प्रमुख रहे।

    उन्होंने मथुरा तथा शूरसेन में जैन-धर्म का व्यापक प्रचार किया। उनके उपरांत जैन संघ का विशेष विवरण प्राप्त नहीं होता। मगध के अंतिम नंद शासक के समय सम्भूति विजय जैन संघ के अध्यक्ष थे। उनके बाद भद्रबाहु जैन संघ के छठे अध्यक्ष हुए जो सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के समकालीन थे। भद्रबाहु ने जैन-धर्म के प्रमुख ग्रंथ कल्पसूत्र की रचना की।

    इसमें तेईस तीर्थंकरों की जीवनियां, जैन संघ के प्रमुखों तथा मतों के विवरण हैं एवं जैन साधुओं के लिए बनाए गए नियम लिखे हुए हैं। जैन-धर्म के इतिहास में आचार्य भद्रबाहु का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

    जैन-धर्म का प्रचार एवं प्रसार

    महावीर स्वामी के प्रयत्नों से जैन-धर्म का प्रचार बड़े उत्साह से आरम्भ हुआ। लोगों द्वारा इस धर्म को तेजी से अपनाने के कई कारण थे-

    (1.) इसका मुख्य कारण स्वयं महावीर स्वामी का इसके प्रचार-प्रसार में भाग लेना था। वे स्वयं साल के आठ माह तक स्थान-स्थान पर घूम-घूमकर अपने मत का प्रचार करते थे तथा वर्षा ऋतु के चार मास किसी एक स्थान पर बिताते थे।

    (2.) महावीर स्वामी ने जन-भाषा 'पालि' में अपने सिद्धान्तों का प्रचार किया जिससे लोगों ने उनके उपदेशों एवं विचारों को बड़ी सरलता से समझ लिया। अन्य लोक-भाषाओं में जैन-धर्म के साहित्य की रचना हुई जिससे यह धर्म आसानी से लोकप्रिय बन गया।

    (3.) जैन-धर्म के शीघ्र प्रसार का एक महत्त्वपूर्ण कारण सामाजिक समानता की भावना थी। महावीर ने अपने धर्म का द्वार समस्त जाति के लिए समान रूप से खोल रखा था। इस कारण वैदिक धर्म की कठोर वर्ण व्यवस्था में उपेक्षित अनुभव कर रहे लोगों ने महावीर के विचारों को अपना लिया।

    (4.) जैन-धर्म के प्रचार-प्रसार में महावीर स्वामी द्वारा संस्थापित जैन-संघों ने भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

    (5.) जैन-धर्म के दार्शनिक ग्रंथों ने इस धर्म को जनता की दृष्टि में आदरणीय बना दिया। जैन मुनि इन्द्रभूति, वायुभूति, भद्रबाहु, जिनसेन, गुणभद्र, हेमचन्द्र आदि ने विविध ग्रन्थों की रचना करके इसके प्रचार-प्रसार में विपुल योगदान दिया।

    (6.) महावीर की सफलता को ब्राह्मणों के विरुद्ध क्षत्रियों की सफलता के रूप में देखा गया। इस भावना से प्रेरित होकर बहुत से राजाओं, राजपुत्रों एवं क्षत्रियों ने इस धर्म को अपना लिया।

    (7.) महावीर स्वामी राजवंश से सम्बन्धित थे और भारत में कई राजवंशों के साथ उनके पारिवारिक सम्बन्ध थे। इस कारण इस धर्म को राज्याश्रय मिल गया जिसने इस धर्म के प्रचार-प्रसार में बड़ी भूमिका निभाई। ईस्वी सन् के प्रारम्भ होने तक जैन-धर्म लगभग सम्पूर्ण भारत में फैल गया किंतु जैन-धर्म का प्रसार बौद्ध धर्म तथा वैष्णव धर्म की भाँति नहीं हो पाया। समय-समय पर इसका विकास अवरुद्ध भी होता रहा किंतु यह भारत में स्थायित्व प्राप्त करने में सफल रहा।

    राजपूतकाल में इसका आंशिक रूप में पुनरुत्थान भी हुआ। आज भी महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात सहित भारत के अनेक प्रांतों में जैन-धर्म के लगभग 45 लाख अनुयाई निवास करते हैं। भारत की जनसंख्या में इनका योगदान लगभग 0.4 प्रतिशत है।

    जैन-धर्म को राज्याश्रय

    महावीर स्वामी ने समकालीन मगध शासकों- बिम्बिसार, अजातशत्रु और उदायीभद्र अथवा उदयन ने जैन-धर्म को संरक्षण प्रदान किया। अवन्ती, वत्स, अंग, चम्पा, सौबीर आदि राज्यों के शासकों ने भी इसे स्वीकार कर इसके प्रसार में सहयोग दिया। वज्जि, लिछच्वी एवं मगध वंश से महावीर का पारिवारिक सम्बन्ध होने से उस पूरे क्षेत्र में जैन-धर्म का तेजी से प्रसार हुआ। सिकन्दर के आक्रमण के समय जैन साधु सिंधु-नदी के तट तक विद्यमान थे।

    जैन जैन ग्रंथों के अनुसार सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने अंतिम समय में जैन-धर्म स्वीकार कर लिया था। मौर्य-सम्राट चन्द्रगुप्त के प्रपौत्र सम्प्रति ने जैन-धर्म को दक्षिण भारत में फैलाने में सहयोग दिया। ईसा पूर्व द्वितीय शती में कलिंगराज खारवेल ने जैन-धर्म ग्रहण किया और विशाल जैन प्रतिमा का निर्माण करवाया। उज्जैन नरेश गर्दभिल्ल, उसके पुत्र विक्रम तथा जैन मुनि कालकाचार्य के उल्लेखों से ज्ञात होता है कि ईसा पूर्व पहली शती में मालवा की राजधानी उज्जैन इस धर्म का प्रसिद्ध केन्द्र थी।

    कुषाण नरेशों के समय मथुरा में जैन-धर्म का खूब प्रसार हुआ। पांचवीं से बारहवीं शती ईस्वी तक दक्षिण भारत के गंग, कदम्ब, चौलुक्य तथा राष्ट्रकूट राजाओं ने जैन-धर्म को आश्रय एवं प्रोत्साहन दिया। राष्ट्रकूट नरेश अमोघवर्ष (ई.814-74) ने जैन-धर्म के प्रचार में विशेष रुचि दिखाई। चौलुक्य राजा सिद्धराज एवं उसके पुत्र कुमारपाल, जैन-धर्म के महान् संरक्षक थे।

    हेमचंद्र नामक प्रसिद्ध जैन मुनि कुमारपाल की सभा में ही था। राजपूत काल में अनेक चौहान, प्रतिहार, परमार आदि राजपूत राजा भी जैन-धर्म के प्रति आदर का भाव रखते थे और जैन मंदिरों तथा उपाश्रयों को भूमि एवं भेंट आदि प्रदान करते थे। जब भाारत भूमि पर मुसलमानों के आक्रमण आरम्भ हो गए तब राजपूत राजाओं ने जैन-धर्म को संरक्षण देना लगभग समाप्त कर दिया। इससे जैन-धर्म की क्षति हुई।

    जैन-धर्म में विभाजन

    महावीर स्वामी के जीवनकाल में ही जैन-धर्म में मतभेद उत्पन्न हो गया। स्वयं उन्हीं के दामाद जमालि क्षत्रिय का महावीर स्वामी से 'क्रियमाणकृत' के सिद्धान्त पर मतभेद हो गया और वह जैन-संघ से अलग हो गया। महावीर स्वामी की पुत्री 'प्रियदर्शना' भी लगभग 1000 भिक्षुणियों के साथ जैन-संघ से पृथक हो गई परन्तु कालान्तर में वह अपनी समस्त अनुयाइयों के साथ संघ में वापस लौट आई। इस घटना से जैन-धर्म के प्रचार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। महावीर स्वामी के बाद जैन यातियों में भी आचार सम्बन्धी परिवर्तन होने लगे।

    महावीर के निर्वाण के 160 वर्ष पश्चात् मगध में 12 वर्ष का लम्बा अकाल पड़ा जिसके फलस्वरूप बहुत से जैन भिक्षुओं को आचार्य भद्रबाहु के नेतृत्व में मगध छोड़़कर मैसूर चले जाना पड़ा। बहुत से जैन साधु, आचार्य सम्भूति विजय के शिष्य स्थूलभद्र के नेतृत्व में मगध में ही रह गए। मगध के इस जैन समुदाय ने प्राचीन जैन ग्रंथों के संकलन के लिए पाटलिपुत्र में एक सम्मेलन बुलाया। इस सम्मेलन में द्वादष अंगों का संकलन किया गया जिन्हें जैन-धर्म के सिद्धांतों का महत्त्वपूर्ण संकलन माना जाता है।

    इस संकलन के समय महावीर के बताए सिद्धांतों में बहुत से परिवर्तन कर दिए गए। प्राचीन जैन साधु नग्न रहते थे परन्तु अब कुछ साधु वस्त्र धारण करने लगे। इस सम्मेलन को 'प्रथम जैन परिषद्' एवं 'पाटलिपुत्र-वाचना' कहा जाता है। अकाल समाप्त होने के बाद जब भद्रबाहु अपने शिष्यों के साथ पाटलिपुत्र आए तो उन्होंने इन परिवर्तनों को स्वीकार करने से मना कर दिया।

    इस कारण जैन-धर्म दो शाखाओं- दिगम्बर और श्वेताम्बर में बंट गया। मगध के जैन साधुओं ने श्वेत वस्त्र पहनने आरम्भ कर दिए थे इसलिए वे श्वेताम्बर कहलाए जबकि नग्न रहने वाले साधुओं को दिगम्बर कहा गया। श्वेताम्बरों की तुलना में दिगम्बर सम्प्रदाय को अधिक लोकप्रियता हुई।

    इसलिए इन दोनों सम्प्रदायों में मतभेद और बढ़े। यद्यपि इन दोनों सम्प्रदायों के सिद्धांतों एवं दार्शनिक चिंतन में विशेष अंतर नहीं है तथापि बाह्य स्वरूप में कुछ अन्तर हैं। कालान्तर में जैन-धर्म की दोनों शाखाएं भी तेरापन्थी, मन्दिर मार्गी, स्थानकवासी आदि अन्य उपशाखाओं में बंट गई और जैन-धर्म भी, हिन्दू-धर्म की भांति अनेक मत-मतान्तरों में विभाजित हो गया।

    जैन-धर्म को व्यापक लोकप्रियता न मिलने के कारण

    बौद्ध धर्म की तुलना में जैन-धर्म अधिक व्यापक नहीं हो पाया। इसके कई कारण थे-

    (1.) जैन-धर्म के सीमित प्रसार का मुख्य कारण इस धर्म में दार्शनिक पक्ष की प्रधानता होना और इसके आचरण सम्बन्धी नियमों में कठोरता का होना था। अहिंसा, नग्नता, केशलुंचन, संथारा तथा काया-क्लेश के सिद्धान्त जनसामान्य के लिए कभी भी आकर्षण का विषय नहीं हो सकते थे।

    (2.) महावीर स्वामी ने जाति-प्रथा का विरोध किया था परन्तु उनके अनुयाई इस सिद्धान्त को हृदय से नहीं अपना पाए और संघ में प्रवेश के लिए उच्च जातियों के लोगों को ही प्राथमिकता दी जाती रही। इससे जैन-धर्म निम्न जातियों में अलोकप्रिय हो गया।

    (3.) महावीर ने ईश्वर एवं देवी-देवताओं की पूजा का निषेध किया था किंतु जैन धर्मावलम्बियों ने ईश्वर की जगह तीर्थंकरों को पूजना आरम्भ कर दिया तथा अपनी सुविधानुसार नए देवी-देवताओं के अस्तित्त्व की कल्पना कर ली। सामान्य हिन्दू ईश्वर को छोड़़कर तीर्थंकरों तथा वैदिक देवी-देवताओं के स्थान पर जैन देवी-देवताओं को पूजने को तैयार नहीं हुआ।

    (4.) ब्राह्मण धर्म की तुलना में जैन-धर्म अधिक लोकप्रियता प्राप्त नहीं कर सका। समय के साथ-साथ जैन-धर्म में ब्राह्मण धर्म की अनेक बातें घुस गईं। ब्राह्मण धर्म की जाति-व्यवस्था, धार्मिक तथा सामाजिक संस्कार, भक्तिवाद और उसके देवी देवता भी जैन-धर्म में प्रवेश पा गए। इसलिए जैन-धर्म का बाह्य स्वरूप हिन्दू-धर्म जैसा ही हो गया और उसमें नवीनता का अभाव हो गया।

    (5.) भारतीय जनसमुदाय सैंकड़ों सालों से कर्म-फल के सिद्धांत में विश्वास करता आया था किंतु जैन दर्शन में संचित कर्मों की पुद्गल के रूप में कल्पना की गई जो एक प्रकार का अजीव अर्थात् 'मैटर' था। परम्परागत भारतीय समाज पुद्गल के सिद्धांत पर विश्वास नहीं कर सका।

    (6.) जैन संघों का संगठन जनतन्त्रात्मक नहीं था। जैन संघों की शक्ति प्रारम्भ से ही धर्माचार्यों अथवा गणधरों के हाथों में केन्द्रित रही। इस कारण अन्य लोगों ने स्वयं को उपेक्षित अनुभव किया।

    (7.) जैन संघों में प्रगतिशील वैधानिक व्यवस्था का अभाव था। इसलिए संघों की व्यवस्था पर कुछ लोग हावी हो गए और उन्होंने मनमाने ढंग से कार्य किया जिससे शेष लोग दूर छिटक गए।

    (8.) जैन संघों में उद्देश्य के लिए समर्पित ऐसे विद्वानों की कमी रही जो अन्य धर्मों के दार्शनिक विचारों का खण्डन करके अपने धर्म की प्रतिष्ठा स्थापित कर पाते। इस कारण जैन-धर्म अन्य धर्मों की दौड़़ में बहुत पीछे रह गया।

    (9.) भारत के कुछ शासकों ने जैन-धर्म को आश्रय अवश्य दिया परन्तु जैन-धर्म को अशोक, कनिष्क तथा हर्ष जैसे आश्रयदाता नहीं मिल पाए जो उसे देशव्यापी बना देते।

    (10.) अन्य धर्मों की प्रतिद्वन्द्विता के कारण जैन-धर्म के प्रसार को धक्का लगा। यद्यपि बौद्ध धर्म उसका मुख्य प्रतिद्वन्द्वी था तथापि हिन्दू-धर्म की शैव एवं वैष्णव शाखाओं के उत्थान ने भी जैन-धर्म की प्रगति को अवरुद्ध किया।

    (11.) दिगम्बर, श्वेताम्बर, तेरापंथी, मंदिरमार्गी, स्थानकवासी आदि शाखाओं के परस्पर मतभेदों ने भी जैन-धर्म के विकास को अवरुद्ध किया।

    जैन-धर्म का साहित्य

    जैन-धर्म का साहित्य बहुत विशाल है। अधिकांश में वह दार्शनिक साहित्य है। जैन-धर्म का मूल साहित्य 'प्राकृत' भाषा में लिखा गया है। मागधी भाषा में लिखा गया जैन साहित्य भी प्रचुर मात्रा में मिलता है। जैन विद्वानों ने कन्नड़, तमिल और तेलगु भाषाओं में भी अनेक ग्रन्थ लिखे। महावीर स्वामी के बाद जैन विद्वानों ने संस्कृत भाषा में भी अनेक ग्रन्थों की रचना की। महावीर स्वामी की गतिविधियों का केन्द्र मगध था इसलिए उन्होंने लोकभाषा अर्धमागधी में उपदेश दिए जो जैन आगमों में सुरक्षित हैं। श्वेताम्बर सम्प्रदाय 'आगमों' को प्रमाण मानता है जबकि दिगम्बर सम्प्रदाय आगमों को प्रमाण नहीं मानता। दिगम्बर सम्प्रदाय की मान्यताओं के अनुसार आगम साहित्य कालदोष से विच्छिन्न हो गया है, इसलिए मान्य नहीं है। दिगंबर सम्प्रदाय 'षट्खंडागम' को स्वीकार करता है जो 12वें अंग दृष्टिवाद का अंश माना गया है। दिगंबरों के प्राचीन साहित्य की भाषा 'शौरसेनी' है। जैन मुनियों ने आगे चलकर अपभ्रंश तथा अपभ्रंश की उत्तरकालीन लोक-भाषाओं में भी ग्रंथों की रचना की।

    विषय-वस्तु की दृष्टि से सम्पूर्ण जैन साहित्य को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-

    (1.) आगम साहित्य- आगम, ज्ञान के अक्षय भण्डार होने के कारण गणिपिटक तथा संख्या में बारह होने से द्वादशांगी नाम से भी पुकारे जाते हैं। आगम साहित्य के भी दो भाग हैं-

    (अ.) अर्थागम- तीर्थंकरों द्वारा उपदिष्ट वाणी अर्थागम है।

    (ब.) सूत्रागम- तीर्थंकरों के प्रवचन के आधार पर गणधरों द्वारा रचित साहित्य सूत्रागम है। आचरंगसूत्र में जैन भिक्षुओं के आचरण सम्बन्धी नियम दिए गए हैं। भगवतीसूत्र में महावीर स्वामी के माध्यम से जैन-धर्म के सिद्धान्तों की विवेचना की गई है। आचार्य भद्रबाहु रचित 'कल्पसूत्र' अत्यंत प्रसिद्ध है।

    (2.) आगमेतर साहित्य- स्वयंभू, पुष्प दंत, हेमचंद्र, सोमप्रभ सूरी आदि जैन रचनाकारों ने पुराण काव्य, चरित काव्य, कथा काव्य, रास काव्य आदि विविध ग्रंथों की रचना की। उन्होंने संस्कृत साहित्य में प्रचलित लोक-कथाओं को भी अपनी रचनाओं का आधार बनाया और उन कथाओं की परिणति अपने धर्म के अनुसार दिखाई।

    आगमों का संकलन

    जैन-आगमों में तीर्थंकरों के उपदेशों तथा गणधरों द्वारा की गई उनकी व्याख्याओं का संकलन है। इनका प्रथम संकलन महावीर स्वामी के निधन के लगभग 160 वर्ष पश्चात् पाटलिपुत्र में हुआ। इसे प्रथम जैन परिषद कहा जाता है। इस संकलन के समय महावीर के बताए सिद्धांतों में बहुत से परिवर्तन कर दिए गए। इस सम्मेलन में आगमों के 12 अंग संकलित किए गए। कुछ समय पश्चात् जब आगम साहित्य का विच्छेदन होने लगा तो महावीर के निर्वाण के 827 या 840 वर्ष बाद (ईस्वी 300 या 313 में) मथुरा में आर्य स्कन्दिल की अध्यक्षता में एक और जैन सम्मेलन आयोजित हुआ। इसे द्वितीय जैन परिषद् कहा जाता है। इसमें विभिन्न साुधओं की स्मृति के आधार पर आगमों के 12 अंगों का नए सिरे से संकलन किया गया। इन्हें 'माथुरी-वाचना' कहते हैं।

    मथुरा सम्मेलन के लगभग 153 वर्ष बाद अर्थात् महावीर के निर्वाण के 980 या 993 वर्ष बाद (ईस्वी 453-466 में) वलभी में देवर्षि क्षमाश्रमण की अध्यक्षता में जैन साधुओं का तीसरा सम्मेलन हुआ, जिसे तृतीय जैन परिषद भी कहा जाता है। इस परिषद् में आगमों का अन्तिम बार संकलन किया गया। इन्हें 'वलभी-वाचना' भी कहा जाता है। वर्तमान आगम इसी संकलना के रूप हैं।

    प्रथम परिषद में जिन द्वादश अंगों की रचना हुई थी, उनमें से एक अंग लुप्त हो गया। ग्यारह अंग ही शेष बचे थे। कुछ विद्वान इस सम्मेलन का समय ई.512 मानते हैं। जैन आगमों की उक्त तीन संकलनाओं के इतिहास से अनुमान होता है कि आगम साहित्य को बार-बार विपुल क्षति उठानी पड़ी जिसके कारण आगम साहित्य अपने मौलिक रूप में सुरक्षित नहीं रह सका।

    संभवतः इसी कारण बौद्ध साहित्य की तुलना में जैन साहित्य अत्यल्प है तथा इसमें अनेक विकार आ जाने की संभावना से दिगम्बर सम्प्रदाय ने आगमों को अस्वीकार कर दिया।

    जैन आगमों का महत्त्व

    वैदिक साहित्य में जो स्थान वेदों का और बौद्ध साहित्य में त्रिपिटक का है, वही स्थान जैन साहित्य में आगमों का है। जैन आगमों की संख्या 46 है-

    (क) 12 अंग: आयारंग, सूयगडं, ठाणांग, समवायांग, भगवती, नायाधम्मकहा, उवासगदसा, अंतगडदसा, अनुत्तरोववाइयदसा, पण्हवागरण, विवागसुय, दिठ्ठवाय।

    (ख) 12 उपांग: ओवाइय, रायपसेणिय, जीवाभिगम, पन्नवणा, सूरियपन्नति, जम्बुद्दीवपन्नति, निरयावलि, कप्पवडंसिया, पुप्फिया, पुप्फचूलिया, वण्हिदसा।

    (ग) 10 पइन्ना: चउसरण, आउरपचक्खाण, भत्तपरिन्ना, संथर, तंदुलवेयालिय, चंदविज्झय, देविंदत्थव, गणिविज्जा, महापंचक्खाण, वोरत्थव।

    (घ) 6 छेदसूत्र: निसीह, महानिसीह, ववहार, आचारदसा, कप्प (बृहत्कल्प), पंचकप्प।

    (च) 4 मूलसूत्र: उत्तरज्झयण, आवस्सय, दसवेयालिय, पिंडनिज्जुति। नंदि और अनुयोग।

    ईसा पूर्व चौथी शताब्दी से पाँचवी शताब्दी ईस्वी तक के भारत की आर्थिक तथा सामाजिक दशा का चित्रण करने वाला यह साहित्य अनेक दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है। आयारंग, सूयगडं, उत्तरज्झयण, दसवेयालिय आदि ग्रन्थों में जैन भिक्षुओं के आचार-विचारों का विस्तृत वर्णन है। यह वर्णन बौद्धों के धम्मपद, सुत्तानिपात तथा महाभारत (शान्ति पर्व) आदि ग्रन्थों से काफी मेल खाता है। डॉ. विण्टरनीज आदि पश्चिमी विद्वानों के अनुसार यह साहित्य, श्रमण-काव्य (।ेबमजपब चवमजतल) का प्रतीक है।

    भगवती कल्पसूत्र, ओवाइय, ठाणांग, निरयावलि आदि ग्रन्थों में श्रमण भगवान महावीर, उनकी चर्या, उनके उपदेशों तथा तत्कालीन राजा, राजकुमार और उनके युद्धों आदि का विस्तृत वर्णन है, जिससे तत्कालीन इतिहास की अनेक अनुश्रुतियों का पता लगता है। नायाधम्मकहा, उवासगदसा, अन्तगडदसा, अनुत्तरोववाइयदसा, विवागसुय आदि ग्रन्थों में महावीर द्वारा कही हुई कथा-कहानियों तथा उनकी शिष्य-शिष्याओं का वर्णन है, जिनसे जैन परम्परा सम्बन्धी अनेक बातों का परिचय मिलता है।

    रायपणेसिय, जीवाभिगम तथा पन्नवणा आदि ग्रन्थों में वास्तुशास्त्र, संगीत, वनस्पति आदि सम्बन्धी अनेक महत्त्वपूर्ण विषयों का वर्णन है जो प्रायः अन्यत्र उपलब्ध नहीं होता है। छेदसूत्रों में साधुओं के आहार-विहार तथा प्रायश्चित आदि का विस्तृत वर्णन है, जिसकी तुलना बौद्धों के विनय-पिटक से की सकती है। वृहत्कल्पसूत्र (1-50) में बताया गया है कि जब महावीर साकेत (अयोध्या) सुभूमिभाग नामक उद्यान में विहार करते थे तो उस समय उन्होंने भिक्षु-भिक्षुणियों को साकेत के पूर्व में अंग-मगध तक दक्षइ के कौशाम्बी तक तथा उत्तर में कुणाला (उत्तरोसल) तक विहार करने की अनुमति दी।

    इससे पता लगता है कि आरम्भ में जैन-धर्म का प्रचार सीमित था तथा जैन श्रमण मगध और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों को छोड़़कर अन्यत्र नहीं जा सकते थे। निस्सन्देह छेदसूत्रों का यह भाग उतना ही प्राचीन है जितने स्वयं महावीर। कनिष्क कालीन मथुरा के जैन शिलालेखों में भिन्न-भिन्न गण, कुल और शाखाओं का उल्लेख है। यह वर्णन भद्रबाहु के कल्पसूत्र में वर्णित गण, कुल और शाखाओं से मेल खाता है। इससे जैन आगम ग्रन्थों की प्रामाणिकता का पता चलता है।

    संभवतः इस समय तक जैन-धर्म में श्वेताम्बर और दिगम्बर का भेद नहीं था। जैन आगमों के विषय, भाषा आदि में जो पालि-त्रिपिटक से समानता है, वह भी इस साहित्य की प्राचीनता को दर्शाती है। बौद्धों के पालि-सूत्रों की अट्टकथाओं की तरह जैनों के आगमों की भी अनेक टीका-टिप्पणियाँ, दीपिका, निवृत्ति, विवरण, अवचूरि आदि लिखी गईं। इस साहित्य को सामान्यतः चार भागों- निर्युक्ति, भाष्य, चूर्णि और टीका में विभक्त किया जाता है, आगम को मिलाकर इन्हें 'पांचांगी' कहा जाता है।

    आगम साहित्य की तरह यह साहित्य भी महत्त्वपूर्ण है तथा इसमें आगमों के विषयों का विस्तार किया गया है। इस साहित्य में अनेक अनुश्रुतियाँ संकलित हैं तथा ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। वृहत्कल्पभाष्य, व्यवहारभाष्य, निशीथचूर्णि, आवश्यकचूर्णि, आवश्यकटीका, उत्तराध्ययन टीका आदि टीका-ग्रन्थों में पुरातत्त्व सम्बन्धी विविध सामग्री मिलती है, जिससे प्राचीन भारत के रीति-रिवाज, मेले त्यौहार, साधु-सम्प्रदाय, अकाल, बाढ़, चोर-लुटेरे, सार्थवाह, व्यापाारिक मार्ग, शिल्पकला, वास्तुकला, पाककला, आभूषण निर्माण आदि विविध विषयों की जानकारी मिलती है।

    लोक-कथा और भाषा शास्त्र की दृष्टि से भी यह साहित्य महत्त्वपूर्ण है। चूर्णि-साहित्य में प्राकृत मिश्रित संस्कृत का उपयोग किया गया है, जो भाषाशास्त्र की दृष्टि से विशेष महत्त्व का है, और साथ ही यह उस महत्त्वपूर्ण काल का द्योतक है जब जैन विद्वान 'प्राकृत' का आश्रय छोड़़कर संस्कृत भाषा की ओर बढ़ रहे थे।

    जैन-धर्म की भारतीय संस्कृति को देन

    यद्यपि जैन-धर्म का व्यापक प्रचार-प्रसार नहीं हुआ तथापि इस धर्म ने भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के विभिन्न पक्षों को गहराई तक प्रभावित किया और भारतीय दर्शन, साहित्य तथा कला के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। जैन-धर्म की भारतीय संस्कृति को प्रमुख देन इस प्रकार से है-

    (1.) दार्शनिक क्षेत्र में

    जैन विचारधारा ने ज्ञान-सिद्धान्त, स्याद्वाद और अहिंसा आदि के विचारों को पनपाकर भारतीय दार्शनिक चिन्तन को अधिक तटस्थ और गौरवपूर्ण बनाने में योगदान दिया। ज्ञान सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक जीव की आत्मा पूर्ण ज्ञानयुक्त है किंतु सांसारिक पर्दा उसके ज्ञान के प्रकाश को प्रकट नहीं होने देता। अतः प्राणी मात्र को इस पर्दे को हटाकर ज्ञान को समझना चाहिए। ऐसा करने पर वह 'निग्रन्थ' हो जाता है। विचार-समन्वय के लिए अनेकान्त दर्शन जैन-धर्म की महत्त्वपूर्ण देन है।

    भगवान् महावीर ने इस दर्शन की मूल भावना का विश्लेषण करते हुए सांसारिक प्राणियों को बोध दिया- 'किसी बात को, सिद्धान्त को एक तरफ से मत देखो, एक ही तरह उस पर विचार मत करो। तुम जो कहते तो वह सच होगा, पर दूसरे जो कहते हैं, वह भी सच हो सकता है। इसलिए सुनते ही भड़को मत। वक्ता के दृष्टिकोण से विचार करो।' आज संसार में जो तनाव और द्वन्द्व है, वह दूसरों के दृष्टिकोण को न समझने के कारण है।

    संस्कृति के रक्षण और प्रसार में जैन-धर्म की यह देन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। भारतीय समाज को सत्य और अहिंसा का पाठ पढ़ाकर जैन-धर्म ने भारतीय जीवन में नवीन चेतना का प्रसार किया। अहिंसा की नीति आज भी भारत की आन्तरिक एवं बाह्य नीतियों की प्रमुख अंग है।

    (2.) साहित्य के क्षेत्र में

    भाषा और साहित्य के क्षेत्र में भी जैन-धर्म ने सांस्कृतिक समन्वय को प्रोत्साहन दिया। जैनाचार्यों ने देश में प्रचलित विभिन्न भाषाओं एवं लोक-भाषाओं को अपनाकर उन्हें समुचित सम्मान दिया। जैन-साधु एवं प्रचारक जहाँ कहीं भी वे गए, उन्होंने वहाँ की भाषाओं को अपने उपदेश और साहित्य का माध्यम बनाया। उनकी इसी उदार प्रवृत्ति के कारण मध्ययुगीन विभिन्न जनपदीय भाषाओं के मूल रूप सुरक्षित रह सके।

    जैन लेखकों ने प्राकृत और संस्कृत भाषा को समृद्ध किया और भारतीय पौराणिक सामग्री को अपनी मान्यताओं के साथ समन्वित किया। इससे भारत के आध्यात्मिक चिन्तन को सर्वसाधारण तक पहुँचाने में बड़ी सहायता मिली। विमल सूरी ने प्राकृत भाषा में 'षडमचरिय' लिखकर राम कथा को जैन रूप दिया। सातवीं सदी में रविषेण ने 'पद्मपुराण' की रचना की और स्वयंम्भू ने अपभ्रंश में 'षडमचरिउ' लिखा।

    आठवीं सदी में जिनसेन (द्वितीय) ने 'हरिवंश पुराण' की रचना की जो महाभारत और हरिवंश पुराण का जैन रुपान्तरण था। तेरहवीं सदी में देवप्रभ ने 'पाण्डव चरित' लिखा। सोलहवीं सदी में शुभचन्द्र ने 'पाण्डव पुराण' की रचना की।

    कथा साहित्य के विकास में भी जैन लेखकों ने विपुल योगदान दिया। पादलिप्त ने 'तरंगवती' की रचना की। चौदहवी सदी में इसी रचना के आधार पर 'तरंगलीला' बनी। आठवीं सदी में हरिभद्र ने 'समरादित्य कथा' की रचना की। दसवीं सदी में सिद्धर्षि ने 'उपमिति प्रपंच कथा', चौदहवीं सदी में धर्मचन्द्र ने 'मलय सुन्दरी कथा' और बाद में बुद्धि विजय ने 'पद्मावती कथा' की रचना की।

    नाटक और गीत काव्य के क्षेत्र में भी जैन लेखकों की बड़ी देन है। उनके लिखे 'हमीर-मद मर्दन', 'मोहराज पराजय' और 'एरबुद्ध-रोहिणेय' उल्लेखनीय नाटक हैं। जैन मुनियों ने नीति, दर्शन, व्याकरण, ज्योतिष तथा चिकित्सा पर भी अनेक ग्रन्थों की रचना की।

    (3.) कला के क्षेत्र में

    जैन-धर्म ने भारतीय कला-संसार के निर्माण महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्राचीन एवं मध्य-काल में जैन मुनियों द्वारा निर्मित कलात्मक स्मारक, मूर्तियां, मन्दिर, मठ और गुफाएं देश के विभिन्न प्रांतों में आज भी देखी जा सकती हैं। उड़ीसा के पुरी जिले में उदयगिरी और खण्डगिरी में 35 जैन गुफाएं मिली हैं। एलोरा में भी कई जैन गुफाएँ स्थित हैं। इन गुफाओं में जैन-धर्म प्रतिमाओं की तक्षण-कला देखते ही बनती है। मध्य भारत में खजुराहो नामक स्थान पर 10वीं तथा 11वीं शताब्दी के कई मन्दिर बने हुए हैं।

    राजस्थान में आबूपर्वत पर देलवाड़ा के प्रसिद्ध जैन मन्दिर हैं जो संगमरमर पत्थर से बने हुए हैं। इन मन्दिरों में मूर्ति कला के साथ-साथ बेल-बूटों, तोरणद्वारों, नक्काशी आदि का काम भारत की तक्षण कला के चरम को प्रदर्शित करता है। कठियावाड़ की गिरनार और पालीताना पहाड़ियों में, राजस्थान में रणकपुर नामक स्थान पर, बिहार में पारसनाथ और मैसूर में श्रवण-बेलगोला नामक स्थान पर जैन मन्दिर अथवा मंदिर समूह बने हुए हैं। शत्रुंजय पहाड़ी पर 500 जैन मन्दिर हैं।

    यहाँ जैन तीर्थंकरों की चतुर्मुखी मूर्तियाँ हैं। श्रवण बेलगोला में गोमतेश्वर की प्रतिमा दर्शकों को अचंभित कर देती है। 60 फुट उँची यह प्रतिमा एक पर्वत-शिखर पर स्थित है। पूरे देश में फैली हुई जैन-धर्म की ये कलाकृतियाँ समकालीन भारतीय कला पर पर्याप्त प्रकाश डालती हैं। जैन साधुओं ने चित्रकला के क्षेत्र में अद्भुत कार्य किया। उन्होंने हजारों की संख्या में चित्रित पोथियां तैयार कीं जो आज भी देश के अनेक पोथी भण्डारों में संकलित हैं। इनमें चमकीले रंगों का प्रयोग किया गया है जो आज भी बिल्कुल नए दिखाई देते हैं।

    (4.) अन्य क्षेत्रों में योगदान

    जैन-धर्म ने प्राचीन आर्यों की धार्मिक एवं सामाजिक विषमताओं का विरोध किया जिसके कारण ब्राह्मणों ने वैदिक धर्म के भीतर व्याप्त कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया। जैन-धर्म ने मनुष्य के कुल के आधार पर 'उच्च' और 'हेय' का निर्णय करने वाले ब्राह्मणों की आलोचना की तथा कर्म के आधार पर व्यक्ति की पहचान करने पर जोर दिया।

    जैन-धर्म ने स्त्री को धर्म ग्रन्थों को पढ़ने का अधिकार देकर तथा उन्हें मोक्ष की अधिकारिणी मानकर स्त्री के ऋग्वैदिक-कालीन गौरव एवं आत्मसम्मान को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। इस प्रकार जैन-धर्म ने सामाजिक समानता एवं समरता को पुनः प्रतिष्ठित करने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण कार्य किया। जैन-धर्म ने सांस्कृतिक समन्वय स्थापित करने की दिशा में भी महत्त्वपूर्ण कार्य किया। विचार-समन्वय के लिए 'अनेकान्त दर्शन' जैसी उदार चिंतन भावना, जैन-धर्म की महत्त्वपूर्ण देन है।

    आचार-समन्वय की दिशा में जैन-धर्म ने 'मुनि धर्म' और 'गृहस्थ धर्म' की व्यवस्था दी तथा प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों मार्गों का संतुलन स्थापित किया। जैन-धर्म में जातिवाद, क्षेत्रीयता तथा भाषाई विवाद आदि संकुचित मानसिकता को स्वीकार नहीं किया गया और उसने स्वयं को भारत के किसी एक क्षेत्र, या जाति या भाषा तक सीमित नहीं किया। जैन-धर्म अपनी समन्वय भावना के कारण ही सगुण और निर्गुण भक्ति के विवाद में नहीं पड़ा। प्राचीन साहित्य के संरक्षक के रूप में जैन-धर्म की विशेष भूमिका रही है।

    जैन साधुओं ने जीर्ण-शीर्ष एवं दुर्लभ ग्रन्थों का प्रतिलेखन कर उनकी रक्षा की और स्थान-स्थान पर ग्रन्थ भण्डारों की स्थापना कर, इस अमूल्य निधि को सुरक्षित रखा। जैन-धर्म पर आरोप लगाया जाता है कि उसने संसार को दुःखमूलक बताकर निराशा की भावना फैलाई है, जीवन में वैराग्य की अधिकता पर बल देकर मानव के मन में पलने वाली अनुराग भावना और कला-प्रेम को कुण्ठित किया है। जैन-धर्म पर इस प्रकार के आरोप लगाना उचित नहीं है। जैन-धर्म ने जीवन के इस पक्ष को कभी भी भुलाया नहीं।

    लेखनकला, काव्य, साहित्य, चित्रकला, मूर्तिकला, संगीत, गायन एवं वादन सभी क्षेत्रों के उन्नयन में जैन-धर्म ने अपना विपुल योगदान दिया। जैन-धर्म की वैराग्य भावना मनुष्य मात्र को आसक्ति से उत्पन्न होने वाले दुःखों से दूर करके उन्हें परम आनंद की उपलब्धि कराने के लिए है। जैन-धर्म ने ईश्वर अथवा देवी-देवताओं का मुखापेक्षी बनने की बजाए मनुष्य को स्वयं अपना भाग्य-विधाता बनने का मार्ग सुझाया है। जैन-धर्म की दृष्टि में मनुष्य का कर्म एवं पुरुषार्थ ही उसे ऊंचा उठा सकता है। जैन धर्म की यह विचारधारा मानव समाज की उन्नति का सबसे बड़ा कारण है।

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