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  • राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान की इतिहास प्रसिद्ध महिलायें

     22.12.2021
    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान की इतिहास प्रसिद्ध महिलायें

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी - 205

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान की इतिहास प्रसिद्ध महिलायें

    1. प्रश्न - अनारा

    उतर-  यह जोधपुर नरेश गजसिंह की प्रीत पात्री थी। एक दिन राजा अनारां के महल में बैठा हुआ था, तब राजा का द्वितीय पुत्र जसवंतसिंह किसी काम से राजा के पास आया। उसे देखते ही गजसिंह तथा अनारां उठ कर खड़े हो गये। यह देखकर जसवंतसिंह ने अनारां के जूते उठाकर अनारां के सामने रख दिये। इस पर अनारां ने राजकुमार को टोका कि राजकुमार यह क्या करते हैं, मैं तो महाराज की दासी हूँ। इस पर जसवंतसिंह ने उत्तर दिया कि आप मेरी माता के समान हैं। अनारां बड़े राजकुमार अमरसिंह के स्वेच्छाचारी स्वभाव के कारण अमरसिंह से नाराज रहती थी। अनारां ने महाराजा से वचन ले लिया कि वह जसवंतसिंह को ही अपना उत्तराधिकारी बनायेंगे। महाराजा ने जसवंतसिंह को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया और अमरसिंह को मारवाड़ राज्य का त्याग करके शाहजहाँ की सेवा में चले जाना पड़ा।

    2. प्रश्न - अल्ला जिलाई बाई

    उतर- मांड गायकी के लिये विख्यात हाजन अल्ला जिलाई बाई ने सात-आठ वर्ष की आयु में उस्ताद हुसैन बख्श से संगीत की शिक्षा ली। वे शास्त्रीय आधार पर गांठ, चौताला, झूमर, अर्द्धा आदि कठिन तालों में लोक गीत गाती थीं। उनकी गायकी में ख्याल एवं गज़ल शैली का अनूठा मेल था। उनके गाये हुए गीत ‘केसरिया बालम आवो नी पधारो म्हारे देस’ को राष्ट्रीय ख्याति मिली। मई 1987 में उन्होंने लन्दन के अल्बर्ट हॉल में गायन किया। इस कार्यक्रम का पूरे यूरोप में सीधा प्रसारण किया गया। अल्ला जिलाई बाई को 20 मई 1982 को राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया। 15 मई 1982 को उन्हें ‘राजस्थान श्री’ सम्मान मिला। महाराणा मेवाड़ फाउण्डेशन ने उन्हें ‘डागर घराना पुरस्कार’ दिया। उन्होंने अंतिम कार्यक्रम राजस्थान दिवस पर 31 मार्च 1989 को बीकानेर के टाउन हॉल में दिया। 1992 में उनका निधन हुआ। राजस्थान सरकार ने 17 दिसम्बर 2012 को उन्हें राजस्थान रत्न पुरस्कार दिया।

    3. प्रश्न - आनंद कुंवरी

    उतर- अलवर नरेश विजयसिंह की पटरानी आनंद कुंवरी ने भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति से ओत-प्रोत होकर ई.1910 के लगभग 105 गेय पद तथा 5 दोहों का एक ग्रंथ लिखा जिसमें प्रत्येक पद अलग रागिनी पर आधारित है। इस ग्रंथ में मेवाती भाषा मिश्रित ब्रज का उपयोग किया गया है। पूरा ग्रंथ वात्सल्य औरशंगाररस से सराबोर है।

    4. प्रश्न - करमा बाई

    उतर- ये नागौर जिले की रहने वाली थीं और जाट जाति में जन्मी थीं। करमा बाई भगवान जगन्नाथ की भक्त कवयित्री थीं। मान्यता है कि भगवान ने उनके हाथ से खीचड़ा खाया था। उस घटना की स्मृति में आज भी जगन्नाथ पुरी में भगवान को खीचड़ा परोसा जाता है।

    5. प्रश्न - राजकुमारी कृष्णा कुमारी

    उतर- यह मेवाड़ के महाराणा भीमसिंह की पुत्री थी। इसकी सगाई जोधपुर के राजा भीमसिंह से हुई किंतु ई.1803 में भीमसिंह की मृत्यु हो गई तथा मानसिंह जोधपुर का राजा हुआ। महाराणा भीमसिंह ने कृष्णा कुमारी का सम्बन्ध जयपुर के राजा जगतसिंह से कर दिया। जोधपुर के राजा मानसिंह ने महाराणा को लिखा कि कृष्णाकुमारी का विवाह जोधपुर नरेश से होना निश्चित हुआ था। इसलिये राजकुमारी का विवाह मेरे साथ किया जाये। इस बात पर जयपुर एवं जोधपुर राज्य में युद्ध हो गया। मानसिंह ने पिण्डारी अमीरखां की सहायता ले ली। अमीरखां ने महाराणा भीमसिंह को विवश करके कृष्णाकुमारी को विष दिलवा दिया।

    6. प्रश्न - गवरी देवी

    उतर- ई.1920 में जोधपुर में जन्मी गवरी देवी माण्ड गायकी के लिये प्रसिद्ध हुईं। पिता बंसीलाल, बीकानेर नरेश गंगासिंह के दरबारी गायक थे। ये 24 वर्ष की आयु में विधवा हो गयीं। जोधपुर नरेश उम्मेदसिंह के दरबार में भी रहीं। बाद में रींवा चली गयीं। इन्होंने ई.1979 में रूस में आयोजित भारत महोत्सव में भाग लिया। ई.1988 में 68 वर्ष की आयु में इनका निधन हुआ।

    7. प्रश्न - गवरी बाई

    उतर- डूंगरपुर के ब्राह्मण परिवार में जन्मीं गवरी बाई बाल विधवा थीं। कृष्ण भक्ति के कारण इन्हें वागड़ प्रदेश की मीरां कहा जाता है। इन्होंने ‘कीर्तन माला’ नामक ग्रंथ की रचना की जिसमें 801 पद हैं। ई.1818 में इन्होंने यमुनाजी में जल समाधि ली।

    8. प्रश्न - गींदोली राव

    उतर- मल्लीनाथ के समय, मारवाड़ के मालाणी परगने के सिणली गाँव की स्त्रियां गौरी पूजन के लिये गाँव से बाहर स्थित तालाब पर गयीं। गुजरात का बादशाह उनका अपहरण करके ले गया। इस पर मल्लीनाथ का वीर पुत्र जगमाल उनके पीछे गया। उसने बादशाह को युद्ध में परास्त करके हिन्दू स्त्रियों को छुड़वा लिया तथा बादशाह की शहजादी गींदोली को उठा लाया। मारवाड़ में आज भी गींदोली की स्मृति में यह गीत गाया जाता है- गींदोली जगमाल म्हाले, गींदोली किम दीजे हो राज।। बादशाह ने गींदोली को छुड़वाने के कई प्रयास किये किंतु जगमाल ने गींदोली को नहीं छोड़ा और अपने रंग महल में रख लिया। इसके सम्बन्ध में कहा जाता है- गींदोली गुजरात सूं, असपत री थी आण। राखी रंग निवास में, थे जगमा जुवान।।

    9. प्रश्न - गुलाब राय

    उतर- मारवाड़ नरेश विजयसिंह की प्रीतपात्री गुलाबराय गोकुलिये गुसांईयों की परम भक्त थी। वह अद्वितीय सुंदरी तथा अत्यंत विदुषी थी। उसके प्रभाव के कारण राजा ने कसाईयों तथा पशुवध करने वालों को राज्य से बाहर निकाल दिया तथा पशुवध पर पूर्ण रोक लगा दी। राजकुमार मानसिंह पर गुलाबराय का बड़ा स्नेह था। मारवाड़ के सामंतों ने गुलाबराय की हत्या कर दी जिससे राजा को बड़ा क्लेश हुआ। गुलाबराय ने जोधपुर में गुलाब झालरा बनवाया।

    10. प्रश्न - गोरा धाय

    उतर- यह माली जाति की स्त्री थी जिसने जोधपुर नरेश अजीतसिंह को औरंगजेब की दाढ़ से निकालने में प्रमुख भूमिका निभाई थी।

    11. प्रश्न - चंद्रसखि

    उतर- मीरां की भांति ये भी प्रसिद्ध भक्त कवयित्री हुई हैं। इनके द्वारा लिखित पदों के चार संग्रह अब तक प्रकाशित हो चुके हैं। इनके पद लोक में चाव से गाये जाते हैं।

    12. प्रश्न - नन्ही भगतन

    उतर- मारवाड़ नरेश जसवंत सिंह (द्वितीय) की प्रीतपात्री नन्ही भगतन जोधपुर राज्य में अत्यंत प्रभावशाली महिला थी। एक बार महर्षि दयानंद सरस्वती ने राजा जसवंतसिंह को मदिरा के नशे में धुत्त होकर नन्हीं की पालकी को अपने कंधे पर उठाये हुए देख लिया। इससे क्रुद्व होकर महर्षि दयानन्द ने राजा को धिक्कारा। इससे कुपित होकर नन्हीं ने महर्षि दयानन्द को विष दे दिया। महर्षि को अजमेर ले जाया गया जहाँ कुछ दिनों बाद उनका निधन हो गया।

    13. प्रश्न - पन्ना धाय

    उतर- यह मेवाड़ रियासत की गुर्जर स्त्री थी जिसने महाराणा उदयसिंह के प्राणों की रक्षा करने के लिए अपने पुत्र का बलिदान किया।

    14. प्रश्न - पोपा बाई

    उतर- पोपा बाई के नाम से राजस्थान के इतिहास में कम से कम तीन स्त्रियां हुई हैं जिनमें से एक जालोर राज्य की चौहान शासिका पोपा बाई थी। उसने जोधपुर के राठौड़ों की प्रबल सेना को मार भगाया। राठौड़ राज्य में अव्यवस्था को पोपाबाई का राज कहने लगे। इस पोपाबाई को उसके पठान सेनापति मलिक खुर्रम ने धोखा देकर दुर्ग को घेर लिया और रानी के सामने शर्त रखी कि वह मलिक खुर्रम से विवाह कर ले। स्वाभिमानी रानी ने मलिक की बात मानने से इन्कार कर दिया और वह तलवार लेकर धोखेबाज सेनापति का सामना करने के लिये उठ खड़ी हुई। रानी को परास्त होकर गुजरात की तरफ के पहाडों में भाग जाना पड़ा।

    15. प्रश्न - प्रताप कुंवरी

    उतर- ये भाटी गोविंददास की पुत्री एवं जोधपुर नरेश मानसिंह की रानी थीं। इन्हें तीसरी भटियाणी कहा जाता था। इन्होंने महंत पूर्णदास से दीक्षा ली। इस राम भक्त रानी ने कुल पन्द्रह ग्रंथ लिखे जिनका संग्रह ईडर की महारानी रतनकंवर ने प्रकाशित करवाया।

    16. प्रश्न - प्रतापबाला

    उतर- जाड़ेचीजी इनका जन्म ई.1744 में सौराष्ट्र के जामनगर में हुआ। ये महाराजा रणमल की पुत्री तथा जोधपुर नरेश तख्तसिंह की रानी थीं। ये रामस्नेही सम्प्रदाय में दीक्षित हुईं। इन्होंने जोधपुर में रामोला का रामद्वारा, कई मंदिर और तालाब बनवाये। इनके लिखे पदों का संग्रह साधु प्यारेराम ने ‘प्रतापकंवरी पद रत्नावली’ शीर्षक से किया तथा ई.1893 में जामनगर से प्रकाशित करवाया।

    17. प्रश्न - बनीठनी

    उतर- यह किशनगढ़ रियासत के सुरसरी गाँव की गूजरी थी तथा किशनगढ़ नरेश सावंतसिंह की प्रीतपात्री थी। राजा सावंतसिंह ने बनीठनी में राधाजी के रूप सौंदर्य की कल्पना करके राधाजी के अद्भुत चित्र बनाये जो बनीठनी के चित्र कहलाते हैं। इसी से किशनगढ़ चित्रशैली का विकास हुआ। बनीठनी स्वयं भी कृष्ण भक्त थीं तथा सदैव कृष्ण भक्ति में लीन रहती थीं। भारत सरकार ने बनीठनी पर एक डाक टिकट जारी किया।

    18. प्रश्न - ब्रजकंवरी बांकावती

    उतर- जयपुर राज्य के लिवाणा ठिकाने में ई.1703 में जन्मी ब्रजकंवरी का विवाह किशनगढ़ के महाराजा राजसिंह से हुआ था। वह भगवान कृष्ण की बड़ी भक्त थीं। उन्होंने ब्रजदासी के नाम से भक्ति परक काव्य की रचना की। श्री मद्भागवत का दोहा चौपाई में पाँच खण्डों में अनुवाद भी किया जिसे ब्रजदासी भागवत कहा जाता है। इनके अन्य ग्रंथों में सालव जुद्ध, आशीष संग्रह तथा व्याव विहारी हैं। इनकी भाषा राजस्थानी मिश्रित ब्रज है।

    19. प्रश्न - रणछोड़ कंवरी

    उतर- वाघेली रीवां की राजकुमारी रणछोड़ कंवरी का विवाह जोधपुर नरेश तख्तसिंह से हुआ था। इन्हें वाघेलीजी कहते थे। ये कृष्ण भक्ति के लिये प्रसिद्ध हुईं। वे अपने विवाह के समय राधावल्लभ की मूर्ति लायीं थीं। उन्होंने अवध विलास, कृष्ण विलास तथा राधा विलास नामक ग्रंथों की रचना की। उनकी रचनाओं पर ब्रज और अवधी का प्रभाव अधिक है।


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  • सेवाड़ी के शिलालेखों का महत्व

     02.06.2020
    सेवाड़ी के शिलालेखों का महत्व

    ई.1107 का शिलालेख

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राजस्थान के पाली जिले में सेवाड़ी नामक एक अत्यंत प्राचीन गांव स्थित है। बारहवीं शताब्दी ईस्वी में इस गांव को शमीपाटी कहा जाता था। इस गांव में स्थित महावीर स्वामी के मंदिर से बारहवीं शताब्दी ईस्वी के दो शिलालेख मिले हैं। इनमें से पहला शिलालेख तीन पंक्तियों का है। इस शिलालेख को 3‘ 6‘‘ गुणा 2‘ 3/4‘‘ के पत्थर पर उत्कीर्ण किया गया है। लेख संस्कृृृृत भाषा तथा देवनागरी लिपि में उत्कीर्ण है। लेख का मूल पाठ इस प्रकार है-

    ‘‘सं.1164 चै. सु 6 महाराजाधिराज श्री अश्वराज राज्य श्री कटुकराज युवराज्ये समीपाठीय चैत्ये श्री धर्म्मनाथ देवसां नित्य पूज्यार्थ महसाहणिय पूअविपौत्रेण उत्तिम राजपुत्रैण उप्पल राईन मा गढ आंवल। वि. सलखण जोगादि कुटुंब सम। पद्राडा ग्रामो मेद्रचा ग्रामे तथा छेडड़िया मद्दवडी ग्रामे।। अरहर्ट प्रतिदत्तः जवाहरर्कः ’’

    इस लेख में कहा गया है कि विक्रम संवत् 1164 की चैत्र शुक्ला 6 (ईस्वी 1107) का महाराजाधिराज अश्वराज चौहान जिसका कि युवराज कटुकराज था, ने महावीरजी के चैत्य को पद्राड़ा, मेद्रचा, छेछड़िया तथा महड़ी गांवों से प्रत्येक रहट से एक हारक (एक डलिया की नाप) यव (जौ) प्रदान करने का आदेश दिया गया है। इस दान की वैधानिक व्यवस्था महासाणिय उप्पलराक के द्वारा की जाएगी। यदि कोई व्यक्ति इस व्यवस्था को रोकेगा तो वह गौ, स्त्री, और ब्राह्मण की हिंसा के तुल्य पाप होगा। उस काल में साहणिय, अस्तबल का अधिकारी होता था। इस शिलालेख से ज्ञात होता हे कि महासाणिय अर्थात् मुख्य अस्तबल अधिकारी को दान आदि की व्यस्थाएं सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी दी जाती थी।

    ई.1115 का शिलालेख

    सेवाड़ी के महावीर मंदिर का दूसरा शिलालेख वि.सं. 1172 (ईस्वी 1115) का है। यह आठ पंक्तियों का लेख है जिसे 2‘ 1.25‘‘ गुणा 4.5‘‘ क्षेत्र में उत्कीर्ण किया गया है। शिलालेख की मुख्य पंक्तियां इस प्रकार हैं-

    पंक्ति 4: इतश्चासीत् वि (शु) द्वात्मा यशोदेवो बलाधिपः। राज्ञं महाजनस्यापि सभायामग्रणी स्थितः।

    पंक्ति 7: पिता महे (न) तस्येदं समीपाट्यां जिनालये। कारितं शांतिनाथस्य बिंबं जन मनोहरं।।

    इस शिलालेख में अणहिल, जिंदराज, अश्वराज और कटुकराज आदि चौहान शासकों, यशोदेव नामक सेनाध्यक्ष (बलाधिप), बाहड़ नामक शिल्पी तथा उसके पुत्र थल्लक के नाम का उल्लेख किया गया है। इस शिलालेख में सेवाड़ी गांव का नाम शमीपाटी लिखा गया है। इस शिलालेख में बलाधिप के गुणों का उल्लेख किया गया है जिनके आधार पर किसी व्यक्ति को बलाधिप नियुक्त किया जाता था। इस शिलालेख से अनुमान होता है कि थल्लक का पितामह भी चौहान शासकों का विश्वासप्राप्त शिल्पी था जिसने शांतिनाथ की प्रतिमा का निर्माण किया था।

    इस शिलालेख में कहा गया है कि शमीपत्तन नामक नगर में महाराजा कटुकराज ने मंदिर के निमित्त जो दान दिया है उसकी अवहेना करने वाला पाप का भागी होगा तथा कामना की गई है कि इस दान को स्थायित्व प्राप्त हो।

    सेवाड़ी के शिलालेखों में ऐतिहासिक तत्व

    ये दोनों शिलालेख देखने में भले ही बहुत छोटे लगें किंतु इतिहास निर्माण की दृष्टि से अत्यंत महत्व के हैं। इन शिलालेखों से कई बातों की पुष्टि होती है। ये इस बात की पुष्टि करते हैं कि 12वीं शताब्दी ईस्वी में इस क्षेत्र पर चौहानों का शासक था। ये चौहान शासक जैन धर्म के मंदिरों को भी दान देते थे। उस काल में राजदरबार की भाषा संस्कृत थी और लेखन के लिए देवनागरी लिपि प्रयुक्त होती थी। इन शिलालेखों से इस बात की भी पुष्टि होती थी कि राज्य के सेनाधिकारी यथा सेनापति, अश्वशाला का मुख्य अधिकारी आदि भी दान व्यवस्था को बनाए रखने में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाते थे। राजा की कामना होती थी कि जो दान वह दे रहा है, वह चिरकाल तक चलता रहे। उस युग में पाली क्षेत्र के किसान अरहट से सिंचाई करते थे। गौ, स्त्री, और ब्राह्मण की हिंसा को सर्वाधिक गर्हित पाप समझा जाता था। सेनापतियों की नियुक्ति उनके गुणों के आधार पर होती थी। शिल्पियों के परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी किसी राजवंश से जुड़े हुए रहते थे।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-34

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-34

    राज्य में अधिक अन्न उत्पादन के पर्यावरणीय उपाय (1)


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    कृषि कार्य के दौरान पर्यावरण को सर्वाधिक क्षति पहुंचती है। खेत में बार-बार हल चलाने से मृदा संरचना खराब होती है तथा मिट्टी को बार-बार पलटने से भूमि से जल वाष्पन की गति तेज हो जाती है। खेत में सिंचाई करने से मिट्टी के पोषक तत्व पानी में घुलकर मिट्टी के नीचे की परतों में चले जाते हैं। फसल को कीट-पतंगों से बचाने के लिये कीटनाशकों का तथा खरपतवार को नष्ट करने के लिये खरपतवार नाशकों का छिड़काव किया जाता है जिनका सम्पूर्ण पर्यावरण पर अत्यंत घातक प्रभाव होता है। अतः कृषि क्रियाओं के दौरान ऐसी विधियों को अपनाने की आवश्यकता होती है जिनसे पर्यावरण को हानि न पहुंचे। लगभग सम्पूर्ण राजस्थान में जल की सीमित मात्रा तथा जलवायु की शुष्कता फसल उत्पादन के लिये बड़ी चुनौती है। अतः भूमि की ऊर्वरा शक्ति की रक्षा करते हुए, फसल उत्पादन को बढ़ाने के विविध उपाय किये जा रहे हैं जिनमें परम्परागत ज्ञान से लेकर आधुनिक वैज्ञानिक शोधों का सहारा लिया जा रहा है। वर्तमान युग में यांत्रिक खेती, रासायानिक ऊर्वरकों के उपयोग तथा कीट-नाशकों के छिड़काव पर अधिक जोर है। कम परिश्रम एवं कम समय में अधिकतम उपज प्राप्त करने की अनिवार्यता है किंतु साथ ही साथ किसानों द्वारा पर्यावरण सुरक्षा के विविध उपाय किये जा रहे हैं जो कि राजस्थान की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं।


    पर्यावरण संरक्षण हेतु की जाने वाली कृषि-क्रियाएं

    पड़ती खेती

    यदि किसी भूमि पर बरसों तक लगातार खेती की जायेगी तो उसकी मिट्टी में से पोषक तत्त्वों की कमी हो जायेगी तथा फसल की अच्छी पैदावाार लेना संभव नहीं रहेगा। इसलिये भूमि पर वर्ष प्रति वर्ष लगातार फसल न लेकर उसे कुछ समय के लिये खाली छोड़ दिया जाता है। इसे पड़ती छोड़ना कहते हैं। इससे मृदा को अपनी खोई हुई ऊर्वरा शक्ति फिर से प्राप्त करने का समय मिल जाता है।

    सूड़

    जब खेत खाली पड़ा रहता है तो उसमें कई प्रकार की खरपतवारें एवं झाड़ियां उग आती हैं। खेत को बोने से पहले इन खरपतवारों एवं झाड़ियों को काटकर खेत की सफाई की जाती है, उसे खेत को सूड़ना कहते हैं। इस विधि से खेत की मिट्टी से होने वाला वाष्पीकरण रुकता है।

    खड़ाई

    जब वर्षा होती है तो पानी रिसकर भूमि में जाता है। इस कारण पूरे खेत में महीन केशिकाएं (कैपीलरी) बन जाती हैं। इन केशिकाओं से तेज गर्मी के समय मिट्टी में दबा हुआ पानी वाष्प बनकर उड़ता रहता है। वाष्पन की इस क्रिया को तोड़ने के लिये केशिकीय संरचनाओं को नष्ट करना आवश्यक होता है। इसलिये खेत को बोने से पहले उसमें देशी हल से जुताई कर दी जाती है, इसे खड़ाई करना कहते हैं। खड़ाई करने से खरपतवार के साथ-साथ केशिकाएं भी नष्ट हो जाती हैं तथा भूमि का जल भूमि में ही संरक्षित रहता है।

    निदाण

    पशु-पक्षियों के गोबर, मींगनी, बीट तथा हवाओं के द्वारा खेत में खरपतवारों के बीज आ जाते हैं। खरपतवारों के पौधे, मुख्य फसल के साथ उगकर उनसे पानी, प्रकाश, पोषक तत्व एवं स्थान के लिये संघर्ष करते हैं। इस कारण फसल की उपज कम हो जाती है। इन खरपतवारों को नष्ट करने के लिये यूरोप एवं अमरीका आदि विकसित देशों में रासायनिक खरपतवार नाशकों का प्रयोग किया जाता है। जबकि भारत में खड़ी फसल के बीच से खरपतवार को खोदकर हटा दिया जाता है। इस प्रक्रिया को निदाण कहते हैं। राजस्थान के किसान भी रासायनिक खरपतवार नाशकों के स्थान पर निदाण प्रक्रिया पर ही जोर देते हैं।

    कणाबंदी

    मिट्टी की सबसे ऊपरी परत में पोषक तत्व तथा ह्यूमस होती है। तेज हवाओं के चलने पर इस परत के उड़कर नष्ट हो जाने का खतरा रहता है। इसलिये मिट्टी को उड़ने से बचाने के लिये खेत में 50 से 250 फीट की दूरी पर, सिणिया, कैर, आक, बुआड़ी तथा फोग की कटी हुई झाड़ियों से 1.5-2 फुट ऊँची कतारें बनाई जाती हैं, इसे कणाबंदी कहते हैं। कणा का अर्थ किनारा होता है।

    फसल चक्र

    एक ही प्रकार की फसलों को लगातार बोते रहने से भूमि की संरचना खराब हो जाती है तथा उसमें आवश्यक तत्वों की कमी हो जाती है। इसलिये किसानों द्वारा फसल चक्र अपनाया जाता है। इस विधि में अनाज की फसलों के बाद दलहनी फसलें अथवा हरी खाद की फसलें बोई जाती हैं। अनाज की फसलों के बाद दलहनी फसलों को उगाने से मृदा में नाईट्रोजन की मात्रा बनी रहती है। इसी प्रकार अनाज की फसलों के बाद हरी खाद की फसलें अर्थात् सन, सनई, ढंेचा आदि बोने से मृदा में जीवांश की पर्याप्त मात्रा बनी रहती है तथा मृदा अपरदन कम होता है। हरी खाद की खेती को लक्ष्य करके कन्हैयालाल सेठिया ने लिखा है-


    दाणां नहीं तो तूंतड़ा ही बा,

    उगो'र मत उगो, भौम तो दबा।

    शुष्क खेती

    राज्य में कृषि योग्य भूमि का लगभग तीन चौथाई भाग बारानी एवं असिंचित है। वर्षा का वार्षिक औसत भी मात्र 60 से.मी. अथवा उससे कम ही है। इस कारण राज्य में सूखा रोधी किस्मों को उन्नत कृषि विधियों से उगाया जाता है। इसे शुष्क खेती कहते हैं।

    जल बजट योजना

    राज्य में जल की कमी को देखते हुए जल बजट आधारित कृषि का प्रसार किया जा रहा है जिसमें बूंद-बूंद सिंचाई योजना, फव्वारा सिंचाई योजना, पक्की नालियों एवं पाइपों के माध्यम से जल का वितरण, सामुदायिक नल कूपों की स्थापना आदि उपाय अपनाये जाते हैं।

    राष्ट्रीय सूक्ष्म सिंचाई मिशन

    फसल उत्पादकता बढ़ाने एवं पानी बचाने के लिए लघु सिंचाई पद्धति (ड्रिप एवं फव्वारा सिंचाई पद्धति) के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय सूक्ष्म सिंचाई मिशन क्रियान्वित किया जा रहा है जिसमें लघु एवं सीमान्त कृषकों को 60 प्रतिशत व अन्य कृषकों को 50 प्रतिशत अनुदान का प्रावधान है। राज्य सरकार द्वारा ड्रिप इरिगेशन तंत्र को स्थापित करने हेतु अतिरिक्त सहायता प्रदान की जाती है।

    विशेष खाद्यान्न उत्पादन कार्यक्रम

    सातवीं पंचवर्षीय योजना की मध्यावधि समीक्षा के दौरान देश के 14 राज्यों के 169 जिलों में यह कार्यक्रम चलाया गया। इस योजना के तहत गेहूँ, चना, मक्का एवं बाजरा के उत्पादन में वृद्धि के उपाय किये गये हैं।

    तिलहन विकास कार्यक्रम

    राजस्थान में वर्ष 1979-80 में तिलहनों का उत्पादन केवल 2.51 लाख टन था जो राज्य में तिलहन उत्पादन की संभावनाओं को देखते हुए काफी कम था। इसलिये राज्य सरकार द्वारा तिलहन विकास कार्यक्रम चलाया गया। इसके परिणाम स्वरूप राज्य में 1989-90 में तिलहन उत्पादन सात गुना बढ़कर 18.45 लाख टन पहुंच गया। आठवीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक राज्य में 35.29 लाख टन तिलहन उत्पादन रिकॉर्ड किया गया। वर्ष 2012-13 में राज्य में कुल 63.31 लाख टन तिलहन उत्पादन अनुमानित था जिसमें से 24.45 लाख टन खरीफ में तथा 38.36 लाख टन तिलहन रबी में पैदा होना अुमानित किया गया। तिलहन उत्पादन में वृद्धि के लिये खरीफ के दौरान सोयाबीन, अरण्डी, तिल, सूरजमुखी, मूंगफली तथा रबी के दौरान रायड़ा एवं सरसों की खेती के प्रसार पर अधिक ध्यान दिया गया है। राजस्थान की तिलहनों में सरसों तथा राई का उत्पादन सर्वाधिक होता है।

    दलहन विकास कार्यक्रम

    राज्य में दलहनी फसलों की खेती 35 से 40 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में की जाती है जबकि इन फसलों का उत्पादन 10 से 20 लाख टन रहता है। राज्य के कुल दलहनी क्षेत्र के 40 प्रतिशत हिस्से में मोठ बोयी जाती है। राजस्थान की दलहनों में चने का उत्पादन सर्वाधिक होता है। इसके अतिरिक्त उड़द, मूंग, मोठ, अरहर, मसूर तथा मटर भी उत्पन्न होता है। दलहन उत्पादन को बढ़ावा देने के लिये ई.1998-90 से जैसलमेर, जालोर, पाली व सिरोही जिलों को छोड़कर शेष राज्य में दलहन विकास योजना चलाई जा रही है।

    यांत्रिक कृषि

    जिन क्षेत्रों में जनसंख्या घनत्व कम है, वहाँ कृषि यंत्रों की सहायता से विस्तृत खेती कर भूमि का उचित उपयोग किया जा रहा है। राज्य में इस कृषि का विकास गंगानगर एवं हनुमानगढ़ जिलों में अधिक हुआ है। तत्कालीन सोवियत रूस सरकार के सहयोग से सूरतगढ़ में 15 अगस्त 1956 को 12,410 हैक्टेयर क्षेत्रफल में सूरतगढ़ यांत्रिक कृषि फार्म की स्थापना की गयी। श्रीगंगानगर जिले के जैतसर में भी सोवियत रूस के सहयोग से 30 हजार एकड़ भूमि में यांत्रिक कृषि फार्म की स्थापना की गयी।

    मिश्रित कृषि

    कृषि कार्य के साथ-साथ पशुपालन व्यवसाय को अपनाना मिश्रित कृषि कहलाता है। राजस्थान में कृषि कार्यों में संलग्न 70 प्रतिशत जनसंख्या मिश्रित कृषि करती है।

    झूमिंग कृषि

    इस कृषि में वृक्षों को काटकर सुखाया जाता है तथा वर्षा ऋतु के आगमन से पूर्व उन्हें जलाकर उनकी राख खेतों में बिखेर दी जाती है। वर्षा होने पर उस खेत में बीज डाल दिये जाते हैं। यह कृषि पर्यावरण के लिये अत्यंत हानिकारक है। यह पद्धति आदिवासियों द्वारा अपनायी जाती है। झूमिंग प्रणाली की वालरा कृषि भीलों द्वारा उदयपुर, डूंगरपुर तथा बांसवाड़ा जिलों में की जाती है।

    राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आर.के.वी.वाई.)

    कृषि एवं सम्बद्ध क्षेत्रों में लगातार गिरते हुए निवेश को देखते हुए केन्द्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय कृषि विकास योजना प्रारम्भ की गई है जिसमें कृषि जलवायु स्थितियां, प्राकृतिक संसाधन से सम्बन्धित मुद्दों एवं तकनीक को दृष्टिगत रखते हुए कृषि क्षेत्र के लिए विस्तृत योजना बनाने का कार्य किया जाएगा।

    कृषि उपज विपणन

    राजस्थान में कृषि उपज को नष्ट होने से बचाने के लिये सशक्त विपणन व्यवस्था की गई है। 6 जून 1974 को राजस्थान राज्य कृषि विपणन बोर्ड का गठन किया गया और 1980 में कृषि विपणन निदेशालय की स्थापना की गयी। राजस्थान में 129 कृषि उपज मण्डियां तथा 302 गौण मण्डियां हैं जिन्हें चार श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है।

    कृषि वानिकी एवं चारा उत्पादन

    राज्य में एक ओर तो वर्षा की कमी है तथा दूसरी ओर पशुओं की बहुलता है। इसलिये राज्य को अपने पड़ौसी राज्यों से चारा मंगावाना पड़ता है। पशु चारे की आपूर्ति एवं ग्रामीण ईंधन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये कृषि वानिकी एवं चारा उत्पादन के उपाय किये जा रहे हैं। इन उपायों को भागीरथ योजना में सम्मिलित किया गया है। राजस्थान राज्य बीज निगम द्वारा किसानों को 50 प्रतिशत अनुदानित दर पर चारे वाली फसलों के प्रमाणित बीज दिये जाते हैं। छोटे पत्तों वाले वृक्षों को उगाने के लिये 20 पैसे की दर से पौध उपलब्ध करवायी जाती है। किसानों को 25,000 पौधों की पौधशाला के विकास के लिये 50 पैसे प्रति पौध की दर से आर्थिक सहायता दी जाती है।

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  • राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान के प्रसिद्ध इतिहासकार

     22.12.2021
    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी  : राजस्थान के प्रसिद्ध इतिहासकार

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी - 206

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान के प्रसिद्ध इतिहासकार

    1. प्रश्न - अबुल फजल

    उतर- अबुल फजल मारवाड़ राज्य के नागौर कस्बे के रहने वाले थे। वे तथा उनके भाई फैजी अकबर के नवरत्नों में से थे। अकबर के आदेश से अबुल फजल ने ई.1589 में मुगल साम्राज्य का इतिहास लिखना आरंभ किया। उन्होंने अकबर नामा (तीन भाग), आईन ए अकबरी (तीन भाग) लिखा। ये फारसी भाषा के ग्रंथ हैं। उनकी लेखन शैली उस युग के अनुरूप दरबारी परम्परा का निर्वहन करती है। अबुल फजल के लेखन से प्रभावित होकर राजपूताने की रियासतों में भी इतिहास लेखन की परम्परा आरंभ हुई।

    2. प्रश्न - गोपीनाथ शर्मा

    उतर- गोपीनाथ शर्मा का जन्म 3 मई 1909 को उदयपुर में हुआ। वे मेवाड़ रियासत में इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स थे तथा घोड़े पर बैठकर स्कूलों का निरीक्षण करने जाते थे। इस कारण उन्हें मेवाड़ के कई गाँवों एवं कस्बों को देखने का अवसर मिला। इसी दौरान उन्होंने मेवाड़ के मंदिरों, पुरातात्विक महत्व के स्थलों, शिलालेखों एवं ताम्रपत्रों को देखा। उन्होंने सोशियल लाइफ इन मिडावल राजस्थान, मेवाड़ एण्ड द मुगल एम्परर्स, बिबलियोग्राफी ऑफ मिडाइवल राजस्थान, राजस्थान स्टडीज, ऐतिहासिक निबंध राजस्थान, दी मुगल इन्फ्ल्यूऐंस इन मेवाड़, राजस्थान के इतिहास के स्रोत, ग्लोरीज ऑफ मेवाड़, मेवाड़-मुगल सम्बन्ध, राजस्थान का इतिहास, हिस्ट्री ऑफ फ्रीडम मूवमेंट इन राजस्थान, राजस्थान की स्वतंत्रता के सोपान, कविराजा श्यामलदास एण्ड वीर विनोद, बांसवाड़ा का स्वतंत्रता का इतिहास, हकीकत बहियां, आधुनिक राजस्थान, राजस्थान थू्र दी ऐजेज आदि पुस्तकें लिखीं।

    3. प्रश्न - गौरीशंकर हीराचंद ओझा

    उतर- इनका जन्म ई.1863 में सिरोही जिले के रोहिड़ा गाँव में हुआ। ओझाजी ने हिंदी में पहली बार ‘भारतीय प्राचीन लिपि माला’ ग्रंथ का शास्त्रीय लेखन कर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपना नाम लिखवाया। इस ग्रंथ में 84 लिपियों का विवेचन है। ओझाजी ने कर्नल टॉड की पुस्तक ‘एनल्स एण्ड एण्टीक्विटीज ऑफ राजस्थान’ का हिंदी में अनुवाद किया। 13 वर्ष तक उन्होंने नागरी प्रचारणी पत्रिका का सम्पादन किया। उन्होंने उदयपुर, जोधपुर प्रतापगढ़, सिरोही, बांसवाड़ा, डूंगरपुर तथा बीकानेर रियासतों का इतिहास लिखा तथा मुहता नैणसी की ख्यात का संपादन किया। ओझाजी ने सोलंकियों का इतिहास तथा कर्नल जेम्स टॉड का जीवन चरित्र भी लिखा। ई.1914 में इन्हें रायबहादुर की पदवी मिली। काशी विश्वविद्यालय ने इन्हें डी लिट. की मानद उपाधि दी।

    4. प्रश्न - जगदीशसिंह गहलोत

    उतर- जगदीशसिंह गहलोत का जन्म ई.1896 में मण्डोर के किसान परिवार में हुआ। ई.1918 में जोधपुर रियासत के प्लेग के दौरान उन्होंने असाधारण समाज सेवा की। उन्होंने जोधपुर राज्य एवं राजपूताना की अन्य रियासतों का इतिहास लिखा। उनके ग्रंथों में मारवाड़ का संक्षिप्त वृत्तांत, मारवाड़ राज्य का इतिहास, महाराजा सर प्रताप, मंडोवर का इतिहास, भारतीय नरेश, राजपूताने का इतिहास तथा वीर दुर्गादास राठौड़ प्रमुख हैं। ई.1958 में उनका निधन हुआ।

    5. प्रश्न - कर्नल जेम्स टॉड

    उतर- जेम्स टॉड मूलतः स्कॉटलैण्ड के रहने वाले थे। उनका जन्म 1782 में इंगलैण्ड के इंगलिस्टन नामक शहर में हुआ। ई.1817 में उन्हें भारत के वायसराय ने राजपूताने में अपना पॉलिटिकल एजेंट (ए.जी.जी.) नियुक्त किया था। उन्होंने राजपूताने के इतिहास को लेकर ‘एनल्स एण्ड एण्टिक्विटीज ऑफ राजस्थान’ की रचना की। इस ग्रंथ में उन्होंने मेवाड़, मारवाड़, बीकानेर, जैसलमेर, जयपुर, शेखावाटी, बूंदीतथा कोटा रियासतों का इतिहास लिखा। यहीं से राजस्थान के इतिहास का क्रमबद्ध लेखन आरंभ हुआ। राजपूताने को ‘राजस्थान’ नाम भी उन्हीं का दिया हुआ माना जाता है। उन्होंने अपना दूसरा ग्रंथ ‘पश्चिमी राजस्थान की यात्रा’ शीर्षक से लिखा। ई.1835 में टॉड का निधन हुआ। वे पहले इतिहासकार थे जिन्होंने राजस्थान की सामंतवादी व्यवस्था के बारे में लिखा।

    6. प्रश्न - दयालदास सिंढायच

    उतर- दयालदास का जन्म ई.1798 में बीकानेर रियासत के कूबिया गाँव में हुआ। 93 वर्ष की आयु में ई.1891 में उनका निधन हुआ। उन्होंने बीकानेर राज्य की ख्यात लिखी जिसे बीकानेर रै राठौड़ां री ख्यात तथा दयालदास की ख्यात भी कहा जाता है। उन्हें राजस्थान का अंतिम ख्यातकार माना जाता है। उन्होंने देश दर्पण, बीकानेर रै पट्टा रै गाँवां री विगत, आर्याख्यान कल्पदु्रम, जस रत्नाकर, सुजस बावनी, पंवार वंश दर्पण आदि पुस्तकें लिखीं।

    7. प्रश्न - दशरथ शर्मा

    उतर- दशरथ शर्मा का जन्म चूरू में ई.1903 में हुआ। वे सादूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट बीकानेर के निदेशक रहे। नेशनल आर्काइव्ज तथा हिन्दू कॉलेज दिल्ली में प्राध्यापक रहे। दिल्ली विश्वविद्यालय में रीडर रहे। राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान के निदेशक रहे। उन्होंने ‘राजस्थान थ्रू दी एजेज’ तथा ‘लैक्चर्स ऑन राजपूत हिस्ट्री एण्ड कल्चर’ नामक ग्रंथों की रचना की। संगीत रघुनंदनम्, दयालदास री ख्यात, कयामखां रासो, हम्मीरायण, पंवार वंश दर्पण, इन्द्रप्रस्थ प्रबंध, अमराभिषेक काव्य तथा ओझा निबंध संग्रह भाग-1 आदि ग्रंथों का संपादन किया। 500 से अधिक शोध निबंध लिखे। ई.1976 में उनका निधन हुआ।

    8.प्रश्न - मुंशी देवीप्रसाद

    उतर- देवीप्रसाद मुंशी का जन्म ई.1848 में एक कायस्थ परिवार में हुआ। वे जोधपुर के महकमा अपील में नायब सारिश्तेदार के पद पर नियुक्त होकर उन्नति करते हुए मुंसिफ (न्यायाधिकारी) के पद तक पहुंचे। उन्होंने मारवाड़ राज्य के कानून पर 13 पुस्तकें लिखीं। इस कारण उन्हें मारवाड़ राज्य के कानून का निर्माता भी कहा जाता है। उन्होंने मध्यकालीन इतिहास की 66 पुस्तकें लिखीं जिनमें राव मालदेव का जीवन चरित्र, महाराजा मानसिंह की जीवनी, बाबर बादशाह, हुमायूं बादशाह, आमेर के राजा पृथ्वीराज से भगवन्तदास तक की जीवनी, बीकानेर के राव बीकाजी तथा नराजी का जीवन चरित्र, राव लूणकरणजी की जीवनी, राव जैतसी की जीवनी, राव कल्याणमल की जीवनी, मारवाड़ का भूगोल, महाराणा सांगा का सचित्र जीवन चरित्र, महाराणा उदयसिंह का सचित्र जीवन चरित्र, महाराणा प्रतापसिंह का सचित्र जीवन चरित्र, मारवाड़ के प्राचीन शिलालेखों का संग्रह, महाराजा जसवंतसिंह की जीवनी, अकबरनामा, शाहजहाँनामा (तीन भाग), मीरांबाई की जीवनी, जहाँगीरनामा, औरंगजेबनामा (तीन भाग), शेरशाह बादशाह की जीवनी, बाबरनामा, पड़िहार वंश प्रकाश, हुमायूंनामा, कृष्णाकुमारी बाई, यवनराज वंशावली, खानखाना नामा आदि प्रमुख हैं।

    9.प्रश्न - नाथूराम खड़गावत

    उतर- राजस्थान पुरालेखागार के पूर्व निदेशक खड़गावत का जन्म ई.1920 में जोधपुर में हुआ। उन्होंने राजस्थान भर से पांडुलिपियों, पोथियों, पट्टावलियों, फरमानों और बातों का संकलन कर उनका वैज्ञानिक पद्धति से वर्गीकरण किया। उनके प्रयत्नों से पुरालेखागारों में माइक्रोफिल्म कैमरे से माइक्रोफिल्म प्रोजेक्टर पर पांडुलिपियों के चित्र लेने की व्यवस्था हुई। उनकी कृति ‘राजस्थान थ्रू दी एजेज’ का प्रकाशन राजस्थान पुरालेखागार द्वारा किया गया। राजस्थान में स्वतंत्रता संग्राम का सांगोपांग इतिहास भी उन्होंने तैयार किया था। 3 अप्रेल 1970 को उनका निधन हुआ।

    10.प्रश्न - कविराजा बांकीदास

    उतर- इन्होंने 26ग्रंथो की रचना की। इनमें से ‘बांकीदास री ख्यात’ सर्वप्रमुख रचना है। इसे ख्यात कहना गलत है। यह राजस्थान के इतिहास से सम्बन्धित घटनाओं पर लिखी गई 2000 फुटकर टिप्पणियों का संग्रह है। ये टिप्पणियाँ एक पंक्ति से लेकर 5-6 पंक्तियों में लिखी गई हैं लेकिन राजस्थान के इतिहास लेखन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

    11. प्रश्न - मथुरालाल शर्मा

    उतर- मथुरालाल शर्मा का जन्म ई.1896 में बारां जिले के समसपुर गाँव में हुआ। गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने सिरोही, उदयपुर, जोधपुर, बीकानेर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ रियासतों का इतिहास लिखा किंतु जयपुर, जैसलमेर एवं कोटा रियासत पर काम नहीं किया। वीर विनोद में भी जयपुर रियासत के नाम का ही उल्लेख है इसलिये मथुरालाल शर्मा ने कोटा राज्य का इतिहास, जयपुर राज्य का इतिहास, प्राचीन भारत, भारत का सांस्कृतिक विकास, मुगल साम्राज्य का पतन, दिल्ली सल्तनत, मराठों का इतिहास, राजस्थान, मुगलों का उदय और वैभव, पेशवाओं का इतिहास, अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध, कल्चर एण्ड सिविलाइजेशन ऑफ इण्डिया नामक पुस्तकें लिखीं। उन्होंने तुजुक ए बाबरी, अकबरनामा, इकबाल ए जहाँगीरी आदि पुस्तकों का अनुवाद किया तथा जर्नल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च का सम्पादन किया।

    12. प्रश्न - मुहणोत नैणसी

    उतर- मुहणोत नैणसी को मुहता नैणसी तथा मूथा नैणसी भी कहा जाता है। इनका जन्म संवत 1667 में जोधपुर राज्य में हुआ। वे जोधपुर नरेश जसवंत सिंह प्रथम के दीवान थे। नैणसी ने अपने समय की समस्त महत्त्वपूर्ण घटनाओं का प्रामाणिक संकलन ‘नैणसी री ख्यात’ तैयार किया जिसे पहली ख्यात माना जाता है। मुंशी देवी प्रसाद ने इन्हें राजपूताने का अबुल फजल कहा है। मारवाड़ नरेश से विवाद हो जाने पर इन्हें इनके भ्राता सहित कैद कर लिया गया था। कैद में अपमानित किये जाने के कारण इन्होंने तथा इनके भ्राता ने आत्मघात कर लिया था।

    13. प्रश्न - महाराजकुमार रघुवीरसिंह

    उतर- इनका जन्म 13 फरवरी 1908 को सीतामऊ में हुआ। उन्होंने पूर्व आधुनिक राजस्थान, महाराणा प्रताप, महाराणा प्रताप जीवन महत्व व देन, महाराणा प्रताप और स्वाधीन भारत, दुर्गादास, राजस्थान के प्रमुख इतिहासकार और उनका कृतित्व आदि पुस्तकों का लेखन किया। उन्होंने जोधपुर राज्य की ख्यात एवं जोधपुर हुकूमत की बही आदि ग्रंथों का सम्पादन भी किया।

    14. प्रश्न - पं. रामकरण आसोपा

    उतर- रामकरण आसोपा का जन्म जोधपुर राज्य के बड़लू गाँव में हुआ था। वे हिंदी, डिंगल व संस्कृत भाषाओं के जानकार थे। उन्होंने नैणसी की ख्यात का संपादन किया तथा मारवाड़ का इतिहास लिखा। सूरज प्रकाश तथा राजरूपक भी उनकी प्रसिद्ध रचनायें हैं। उन्होंने डिंगल भाषा का एक विशाल कोश भी तैयार किया। 1945 में उनका निधन हुआ। पं. आसोपा मण्डोर के पुराने दुर्ग से 33 टुकड़ों में प्राप्त पृथ्वीराज चौहान के 12वीं शताब्दी के शिलालेख को प्रकाश में लाये। पुरातत्व सर्वेक्षण भारत के महानिदेशक सर जॉन मार्शल ने आसोपा की गणना प्राचीन भारतीय लिपि पढ़ने वाले भारत के प्रथम छः विद्वानों में की थी।

    15. प्रश्न - डॉ. लुईजि पिया टैस्सीटोरी

    उतर- बीकानेर का इतिहास लिखने में महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाले टैस्सीटोरी का जन्म 13 दिसम्बर 1887 को इटली में हुआ। इन्हें राजस्थान में तैस्सितौरी भी कहा जाता है। आपने इटली के फ्लोरेंस विश्वविद्यालय से रामचरित मानस विषय पर डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। वे बार्डिक एण्ड हिस्टोरिकल सर्वे ऑफ राजपूताना के सुपरिंटेण्डेण्ट नियुक्त किये गये। जोधपुर एवं बीकानेर प्रवास के दौरान टैस्सीटोरी ने कई शिलालेखों, मूर्तियों, सिक्कों एवं ऐतिहासिक अभिलेखों की खोज की। इन्होंने राजस्थानी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य किया तथा कईग्रंथो का संपादन किया। उन्होंने प्राचीन राजस्थानी भाषा व्याकरण पर भी कार्य किया। ई.1918 में 31 वर्ष की आयु में बीकानेर में उनका निधन हुआ। इनका समस्त शोध कार्य बंगाल की एशियाटिक सोसायटी की सन् 1914 से 1916 तक प्रकाशित चार रिपोर्टों में संकलित किया गया है। तैस्सीतोरी द्वारा संपादित एवं बंगाल की एशियाटिक सोसायटी द्वारा प्रकाशित तीन ग्रंथों- ‘वेली क्रिसन रुक्मणी री, राठौड़ राजा प्रिथीराज री कही’, वचनिका राठौड़ रतनसिंहजी महेसदासोत री, खिड़िया जगा री कही’ एवं ‘छंद राउ जैतसी रो, वीठू सूजे रो कह्यो’ राजस्थान के साहित्य एवं इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं।

    16. प्रश्न - पं. विश्वेश्वर नाथ रेउ

    उतर- विश्वेश्वरनाथ रेउ का जन्म 1890 ईस्वी में कश्मीरी ब्राह्मण परिवार में हुआ। ई.1917 में वे सरदार संग्रहालय तथा सुमेर पब्लिक लाइब्रेरी के अधीक्षक नियुक्त हुए। वे पं. रामकर्ण आसोपा, मुंशी देवी प्रसाद तथा जगदीश सिंह गहलोत के समकालीन थे। उन्होंने आबू के परमार, पाल वंश का इतिहास, भारत के प्राचीन राजवंश, वीर दुर्गादास राठौड़, राष्ट्रकूटों का इतिहास, कॉइन्स ऑफ मारवाड़, ग्लोरीज ऑफ मारवाड़ एण्ड द ग्लोरियस राठौड्स, शैव सुधाकर, वेदांत पंचक, कृष्ण विलास, विश्वेश्वर स्मृति, ऋग्वेद पर एक दृष्टि आदि ग्रंथों की रचना की।

    17. प्रश्न - सूर्यमल्ल मीसण

    उतर- महाकवि सूर्यमल्ल मिश्रण का जन्म ई.1815 में कालानगरी बूंदी में हुआ। वे 15 से अधिक महाकाव्यों के रचनाकार, आठ भाषाओं के पण्डित और हाड़ा वंश के प्रमाणिक इतिहासकार थे। वे बूंदी नरेश रामसिंह के राज्याश्रित कवि थे किंतु 1857 के स्वाधीनता आंदोलन में उन्होंने जन चेतना जागृत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी रचनाओं में वीर सतसई, वंश भास्कर, सती रासो, राम रजाट, धातु रूपाली, छंदोमयूख तथा बल्बद विलास प्रमुख हैं। वंश भास्कर में बूंदी का प्रामाणिक इतिहास है। जब बूंदी नरेश ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया तो सूर्यमल्ल मिश्रण हाथी पर बैठकर युद्ध भूमि में जाते थे और वहाँ अपनी कवितायें लिखते थे। वे वीर सतसई के 700 दोहे पूरे नहीं कर सके। ई. 1886 में उनका निधन हुआ।

    18. प्रश्न - हर विलास शारदा

    उतर- अंग्रेजी शासन में बाल विवाह निषेघ कानून बनवाने वाले हर विलास शारदा का जन्म 8 जून 1867 को अजमेर में हुआ। वे दयानंद सरस्वती के सम्पर्क में रहे तथा इतिहास पर कई पुस्तकें लिखीं जिनमें हिन्दू सुपीरियोरिटी, अजमेर हिस्टॉरिकल एण्ड डिस्क्रिप्टिव, महाराणा सांगा, हमीर ऑफ रणथंभौर, वर्क्स ऑफ महर्षि दयानंद सरस्वती एण्ड परोपकारिणी सभा, महाराणा कुंभा, शंकराचार्य एण्ड दयानंद, लाइफ ऑफ विरजानंद सरस्वती सम्मिलित हैं। 20 जून 1955 को अजमेर में अनका निधन हुआ।


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  • भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण

     02.06.2020
    भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण का विचार जीवन के हर अंग पर रहा है। इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण चाहिए तो केवल ये दो कहावतें देख लेनी पर्याप्त होंगी-


    संतोषी सदा सुखी।

    सादा जीवन उच्च विचार।


    जब मनुष्य संतोष से जीना सीख जाएगा और जीवन में सादगी को धारण करने का अभ्यास करेगा तो पर्यावरण संरक्षण के लिए उसे अलग से विचार करने की आवश्यकता नहीं रह जाएगी। किंतु आज हमने ‘कर लो दुनिया मुट्ठी में, चक दे इण्डिया और तेरी कमीज मेरी कमीज से ज्यादा सफेद कैसे ? जैसी बातों के बहकावे में आकर संतोष और सादा जीवन पर आधारित जीवन शैली त्याग दी है।

    यदि संस्कृत वांगमय में झांक कर देखे तो ऐसी उक्तियां भरी पड़ी हैं जिन्हें अपने जीवन में ढालें तो पर्यावरण संरक्षण का लक्ष्य स्वतः सिद्ध हो जाएगा- अथर्ववेद का सूक्तकार कहता है-

    ‘माता भूमिः पुत्रो ऽहं पृथिव्याः।’

    जब व्यक्ति पृथ्वी को अपनी माता समझ लेता है, तो उसे वह नुक्सान कैसे पहुंचा सकता है। उपनिषद कहता है-

    ऋते ज्ञानात् न मुक्तिः।

    अर्थात् ज्ञान प्राप्त किए बिना मुक्ति नहीं होती। यह ज्ञान कौनसा है ? यह प्रकृति की व्यवस्था का ज्ञान है। इसके बिना किसी मनुष्य को मुक्ति नहीं मिलती। प्रकृति क्या है? इसे कौन चलाता है? उसके साथ हमारा क्या सम्बन्ध है? उसे अपने अनुकूल कैसे बनाया जा सकता है? आदि बातों को जानना ही तो वास्तविक ज्ञान है। मानव द्वारा आज तक संचित समस्त ज्ञान तथा आने वाले युगों में अर्जित किया जाने वाला ज्ञान प्रकृति और उसके रहस्यों को जानने तक ही तो सीमित है।

    जब कोई मनुष्य प्रकृति की व्यवस्था के ज्ञान को प्राप्त करने का प्रयास करेगा तो पर्यावरण संरक्षण उसके जीवन का ध्येय बन जाएगा। पर्यावरण केवल वनस्पतियों और वायुमण्डल में उपस्थित गैसों को ही नहीं कहते। पर्यावरण में वे पांचों तत्व- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश भी आते हैं जिनसे यह प्रकृति बनी है।

    पर्यावरण में वनस्पति जगत, जीव जगत, वायुमण्डल, धरती तक पहुंचने वाली सूर्य किरणें, अंतरिक्ष से आने वाले विकीरण आदि विभिन्न तत्व भी आते हैं। ये एक दूसरे से सम्बद्ध हैं, ये एक दूसरे को सहारा देते हैं और नियंत्रित करते हैं।

    जब हम किसी जीव-जंतु को मारते हैं तो हमें यह जानना चाहिए कि हम उस समय केवल एक जीव को नहीं मार रहे होते अपितु ऐसा करके हम जीव जगत के साथ-साथ वायुमण्डल, वनस्पति मण्डल और अंतरिक्षीय शक्तियों पर भी प्रहार कर रहे होते हैं, प्रकृति के मूलाधार पांचों तत्वों को भी कुपित कर रहे होते हैं।

    केवल पेड़ को मारने से ही जीव नहीं मरता, जीव को मारने से पेड़ भी मरता है, यह बात सुनने में अटपटी लग सकती है, किंतु यह सच्चाई है जिसे विज्ञान से लेकर हमारा अध्यात्म तक मानता है।

    यहां मैं यह कह रहा हूं कि केवल पेड़ को मारने से हिरण नहीं मरता, हिरण को मारने से पेड़ भी मरता है।

    क्योंकि केवल वृक्ष जीव का सहारा नहीं है, जीव और वृक्ष दोनों एक दूसरे का सहारा हैं। जब हम किसी पहाड़ को काटते हैं तो भी प्रकृति में ठीक वैसी ही प्रतिक्रिया होती है जैसी कि जंगल में आग लगाने पर होती है। यह ठीक वैसा ही है कि जंगल से शेर को समाप्त कर देने से पूरे जंगल के ही सूख जाने का खतरा उत्पन्न हो जाता है।

    मुगल एवं ब्रिटिश काल में पूरे भारत में शेरों का बड़ी संख्या में शिकार हुआ, आज जंगलों की क्या हालत है, हमारे सामने है।

    ऐसा कैसे होता है, इस बात को समझने के लिए हमें कोशिका का उदाहरण लेना होगा। यह सम्पूर्ण सृष्टि एक जीवित कोशिका की तरह कार्य करती है। जिस प्रकार एक कोशिका के किसी भी अवयव को भंग करने पर पूरी कोशिका को क्षति पहुंचती है, ठीक वैसा ही धरती या सृष्टि के बारे में है।

    जब उपनिषदों ने आज से हजार साल पहले ‘अहिंसा परमो धर्मः’ की घोषणा की तो यह केवल धार्मिक या आध्यात्मिक उद्घोष नहीं था, मनुष्य को इस धरती पर कैसे व्यवहार करना चाहिए, कैसा जीवन जीना चाहिए, उसकी गाइड लाइन थी। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति का मूल आधार अहिंसा का विचार ही रहा है। जब जीवों के प्राण नहीं लिए जाएंगे तो प्रकृति में एक संतुलन स्थापित होगा।

    भारतीय संस्कृति में विगत हजारों वर्षों से स्थापित परम्पराएं, सिद्धांत एवं व्यवहार में लाई जाने वाली ऐसी अनगिनत बातें हैं जिन्होंने पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए मानव को आनंददायी जीवन की ओर अग्रसर किया है।

    मानव सभ्यता प्रकृति की कोख से प्रकट होती है। उसे जो कुछ भी मिलता है, प्रकृति से ही मिलता है। इस कारण मानव को, प्रकृति के अनुकूल ही आचरण करना होता है। हमारे ऋषियों ने भारतीय संस्कृति का निर्माण इस प्रकार किया कि प्रकृति के मूल कोश को भंग नहीं किया जाए। पेड़, नदी, पर्वत और जंगल; प्रकृति के मूल कोश हैं। उन्हें नष्ट करना, अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना है।

    मनुष्य धरती पर आया है तो उसे अपना जीवन जीने के लिए प्रकृति के संसाधन काम में लेने ही होंगे। फिर क्या किया जाए ?

    इसका एक मात्र उपाय है कि प्रकृति के किसी भी संसाधन को इस प्रकार काम में लिया जाए कि उसकी रीसाइक्लिंग हो सके। मिट्टी के सकोरे या पत्ते के दोने-पत्तल को प्लास्टिक और पॉलिथीन ने रिप्लेस किया। प्लास्टिक या पॉलिथीन का प्रयोग प्रकृति के मूल कोश को खर्च करने जैसा है जबकि मिट्टी के सकोरे या पत्ते के दोने-पत्तल का प्रयोग रीसाइक्लिंग की प्रक्रिया का हिस्सा है।

    बहुत से लोग कहेंगे कि आज के युग मेें मिट्टी के सकोरे या पत्ते के दोने-पत्तल का प्रयोग अव्यावहारिक है। यह ठीक वैसा ही है जैसे हवाई जहाज की जगह बैलगाड़ी को अपनाया जाए। मिट्टी के सकोरे या पत्ते के दोने-पत्तल का प्रयोग इसलिए अव्यावहारिक है, क्योंकि ऐसा हम सोचते हैं। जिस दिन हम सोचेंगे कि यह किया जा सकता है, उस दिन यह व्यावहारिक हो जाएगा। दक्षिण भारत में आज भी केले के पत्ते का प्रयोग बड़े पैमाने पर होता है।

    मेरी उम्र कोई बहुत अधिक नहीं हुई है किंतु मैने अपनी आंखों से उस परम्परा को देखा है, जिसमें शादी-विवाह में जीमण के लिए गांव के लोग अपने घरों से बर्तन लेकर जाते थे। मैंने अपनी आंखों से मिट्टी के सकोरे या पत्ते के दोने-पत्तल का प्रयोग ठीक उसी रूप में देखा है, जिस रूप में आज प्लास्टिक और पॉलिथीन हो रहा है।

    मैंने अपनी आंखों से उस संस्कृति को देखा है जब निमंत्रण देने के लिए पीले चावल दिए जाते थे। और आज............। आज किसी परिवार में विवाह होता है तो हजार-हजार की संख्या में निमंत्रण पत्र छपते हैं। क्या हजार-हजार की संख्या में छपने वाला निमंत्रण पत्र, कागज अर्थात् पेड़ अर्थात् जंगल अर्थात् शेर अर्थात् हिरण की हत्या करने जैसा नहीं है !

    हमारे सामने दो रास्ते हैं, या तो प्रकृति के संसाधनों को बचाएं या फिर उन्हें आज ही उपभोग करके नष्ट कर दें और अपने बच्चों को कागज अर्थात् पेड़ अर्थात् जंगल अर्थात् शेर अर्थात् हिरण से वंचित करके चले जाएं। उनके लिए एक ऐसी दुनिया छोड़ जाएं जो सूरज की गर्मी से झुलस रही होगी, जिसमें पानी नहीं होगा, जिसमें कचरे और प्लास्टिक के ढेर होंगे। जहां गायें घास नहीं, प्लास्टिक खा रही होंगी। वो दुनिया कितनी वीरान होगी जिसमें लिखने पढ़ने के लिए कागज नहीं होगा! केवल इण्टरनेट और इलेक्ट्रोनिक गेजेट्स होंगे।

    बात यहाँ समाप्त नहीं होती। यहां से शुरु होती है। प्लास्टिक खाकर गाय जीवित नहीं रहेगी, बिना गाय के दूध नहीं मिलेगा, बिना दूध के बच्चे कैसे बनेंगे ! ये दुनिया कैसी होगी! मैं आपको अपना आंखों देखा अनुभव बताता हूँ कि बिना गाय के दुनिया कैसी होगी !

    इण्डोनेशिया का नाम हमने सुना है। आज से पांच सौ साल पहले इण्डोनेशिया में केवल हिन्दू और बौद्ध निवास करते थे। आज यह दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम देश है। इसके उपरांत भी इण्डोनेशिया के बाली द्वीप में आज भी 80 प्रतिशत हिन्दू आबादी निवास करती है। मैंने पिछले वर्ष अपने परिवार के साथ इण्डोनेशिया के कुछ द्वीपों की यात्रा की। हमें यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि वहां सड़कों पर गायें नहीं हैं। हमें यह सोचकर दुःख हुआ कि भारत में गाएं सड़कों पर मारी-मारी फिरती हैं।

    हमने जावा, जकार्ता और बाली में अपने 11 दिन के प्रवास के लिए होटल बुक नहीं कराए थे अपितु सर्विस अपार्टमेंट्स बुक करवाए थे ताकि वहाँ हम अपना भोजन स्वयं बना सकें। इसके लिए कच्ची रसोई अपने साथ ले गए थे। जब हमने चाय बनाने के लिए बाजार से दूध खरीदना चाहा तो वहाँ दूध की थैलियां नहीं मिलीं। मालूम हुआ कि यहाँ गायें नहीं हैं इसलिए बाजार में दूध नहीं बिकता। ऑस्ट्रेलिया और नीदरलैण्ड आदि देशों से लिक्विड वैजीटेबल दूध के डिब्बे आते हैं जो मक्का, सोयाबीन, तेलों और कुछ घासों से बनाए जाते हैं। इस दूध पर लिखा रहता है, बच्चों के लिए हानिकारक। आप अनुमान लगा सकते हैं कि इस दूध का स्वाद और गुण कैसा होगा !

    हमारे जैसे शुद्ध शाकाहारी भारतीय परिवार को दिन में चार-पांच बार चाय चाहिए और सोने से पहले दूध का एक गिलास चाहिए। बाद में पता चला कि सड़कों पर गायें और बाजार में दूध आएंगे कहां से! गायें तो बूचड़ खानों में ले जाई जाकर लोगों के पेट में पहुंच चुकी हैं।

    हमने पूछा इण्डोनेशिया के एक हिन्दू परिवार से पूछा- आपके बच्चे क्या पीते है !

    उन्होंने कहा- मां का दूध। हमने पूछा- और मां का दूध छूटने पर।

    इस सवाल के जवाब में जो कुछ हमें सुनने का मिला वह बेहद चौंकाने वाला था।

    उन्होंने जवाब दिया कि मां का दूध छोड़ने पर बच्चे चिकन, फिश, पोर्क और राइस खाते हैं।

    जब हमने पूछा कि आप लोग चाय नहीं पीते, इस पर उन्होंने कहा कि हम ब्लैक कॉफी पीते हैं, वह भी केवल गेस्ट के आने पर।

    मेरे पिता केन्द्र सरकार में अच्छे पद पर थे किंतु मुझे याद है कि गर्मियों में स्कूलों की छुट्टियां होने पर हमसे अपनी पिछले साल की कॉपियों से कागज की थैलियां बनवाती थीं और कुछ कॉपियों को पानी में गलाकर उन्हें कूटकर और मुल्तानी मिट्टी मिलाकर छोटी-छोटी टोकरियां बनवाती थी जिन्हें मारवाड़ में ठाठिए कहते थे।

    मां दीपावली आने पर हमें घर में ही रंगीन कागज से कंदील बनाना सिखाती थीं। वे हम भाई-बहिनों को घर में सूत से दरियां बनाना सिखाती थीं। गेहूं के सूखे तनों को पानी में भिगोकर उनसे हाथ के पंखे बनाना सिखाती थीं।

    उन्होंने एक और अद्भुत काम हमें सिखाया। मेरा अनुमान है कि यह कार्य बहुत कम बच्चों को उनकी माताओं ने सिखाया होगा। उन दिनों गैस नहीं थी, गांवों में तो चूल्हे होते थे जिनमें लकड़ी जलती थी और शहरों में अंगीठियां होती थीं जिनमें कोयला जलाया जाता था। मेरी मां बाजार से कोयले की चूरी मंगवाती थीं और उसमें काली मिट्टी तथा गोबर मिलाकर हमसे उनके लड्डू बनवाती थीं। जब ये लड्डू कोयले की अंगीठी में डाले जाते थे तो वे घण्टों तक दहकते रहते थे। इससे कोयले की बचत होती थी और अंगीठी में से धुंआ कम निकलता था।

    जब हम पूछते थे कि आप हमसे गर्मियों की छुट्टियों में इतना काम क्यों करवाती हैं तो वे हंसकर जवाब देतीं कि मैं चाहती हूं कि तुम मेलों में जाने के लिए जेबखर्ची मुझसे नहीं मांगो, स्वयं अपने पैसे से मेला देखकर आओ।

    आज सोचता हूं तो लगता है कि मां भले ही अपनी ओर से हमें स्वावलम्बी होने का मंत्र सिखाती थीं किंतु इस कार्य में पर्यावरण संरक्षण का कितना बड़ा संदेश छिपा हुआ था।

    दुर्भाग्य से आधुनिक समय में हम रेडीमेड संस्कृति की ओर अग्रसर हो गए हैं। हाथ से बने हुए सामान की जगह केवल मशीनों द्वारा किए गए उत्पादन ही हमें स्वीकार्य हैं। हमारी यही प्रवृत्ति प्रकृति एवं पर्यावरण के संतुलन को तेजी से समाप्त कर रही है।

    समय की आवश्यकता है जब हम अपनी मूल संस्कृति की ओर लौटें जो प्रकृति को माता और पर्यावरण को अपना सुरक्षा चक्र मानती है। जो उदाहरण मैंने दिए हैं, वे हो सकता है आज की तरीख में आउट डेटेड बातें हों किंतु जो विषय आज के लिए प्रासंगिक हैं, उन्हें तो हम कर ही सकते हैं।

    एक उदाहरण लेते हैं। बाजार में बिकने वाली मिठाइयों एवं पान पर चांदी का बर्क लगाया जाता है। वास्तव में यह चांदी का बर्क नहीं है, एल्यूमिनियम का है। जब यह मिठाई और पान के साथ हमारे शरीर में पहुंचता है। इसे बकरे की खाल में रखकर कूटा जाता है। मनुष्य की आंते इस बर्क को अवशोषित करने का प्रयास करती हैं और लीवर से निकला जूस इसे पचाने का प्रयास करता है। जब आंतें और लीवर इस काम को नहीं कर पाते तो यह बर्क किडनी तक पहुंचता है। किडनी इसे छानने का प्रयास करती है किंतु यह छनता नहीं है इससे किडनी पर जोर पड़ता है किडनी को अधिक काम करना पड़ता है। अंत में हमारे मल-मूत्र के साथ निकला हुआ बर्क सीवरेज चैनल के माध्यम से भूमि में प्रवेश करता है और मिट्टी को खराब करता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि जब मिट्टी खराब होती है तो पूरे पर्यावरण चक्र में विक्षोभ होता है।

    क्या हम बर्क को खाना छोड़ सकते हैं। यदि समस्त मनुष्य बर्क खाना छोड़ दें तो देश की मिट्टी पर इसका कितना सकारात्मक प्रभाव होगा, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। यदि यह बर्क सोने या चांदी का भी होता तो भी यह मनुष्य की आंतों, लीवर और किडनी को इसी तरह नुक्सान पहुंचाता। हमारे केवल इस एक छोटे से कदम से पर्यावरण का संरक्षण होगा।

    भारतीय संस्कृति शारीरिक श्रम पर आधारित है। गांवों में आज भी महिलाएं प्रातःकाल में चक्की चलाकर अनाज पीसती हैं। घरों में ही पापड़, बड़ियां, राबोड़ी, खीचिये, खीच, राबड़ी, आदि विविधि व्यंजन बनाती हैं। बाजरे, ज्वार तथा गेहूं की रोटियां, टुक्कड़ अथवा सोगरे को प्याज, लहसुन, चटनी, मिर्च, अचार, घी तथा छाछ जैसी घरेलू लगावण के साथ खाया जाता है जबकि पश्चिम की संस्कृति से आई ब्रेड के लिये महंगे बटर और जैम की आवश्यकता होती है जो पर्यावरणीय संस्कृति की बजाय पूंजीवादी संस्कृति के उपकरण हैं।

    ऐसी संस्कृति जिसमें शारीरिक श्रम का अभाव हो, यूज एण्ड थ्रो कल्चर तथा डिस्पोजेबल कल्चर, को बढ़ावा देती है। उपभोक्तावादी मानसिकता एवं बाजारीकरण की प्रवृत्तियां पर्यावरण को क्षति पहुंचाने वाली एवं विनाशकारी संस्कृति की प्रवृत्ति है।

    शादी विवाह में पहले मिट्टी के सकोरों और रामझारों का प्रयोग होता था। आज प्लास्टिक तथा थर्मोकोल के गिलास प्रयुक्त होते हैं। ये गिलास मिट्टी में गलकर नष्ट नहीं होते। एक-एक शादी में पांच-दस हजार गिलासों का ढेर लगना मामूली बात है।

    हमें एक शादी में इतने लोग क्यों बुलाने चाहिए। यह हम केवल इतना समझ लें कि विवाह एक पारिवारिक उत्सव है न कि सामाजिक फंक्शन न कि दशहरे का मेला, तो हमराी तरफ से यह, पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बहुत बड़ा योगदान होगा।

    फाउण्टेन इंक पैन का उपयोग पर्यावरणीय संस्कृति का उदाहरण है तो बॉल पॉइण्ट पैन डिस्पोजेबल कल्चर है।

    शेविंग के बाद केवल ब्लेड बदलना, पर्यावरण के लिये कम क्षतिकारक है जबकि पूरा रेजर ही फैंक देना, पर्यावरण के लिये अधिक विनाशकारी है।

    उत्तर भारत में कुछ स्थानों पर यह परम्परा थी कि जब लड़की के पीहर वाले अपनी बहन के ससुराल मायरा भरने जाते थे तो वहाँ तालाब से मिट्टी खोदकर बाहर निकालते थे। अब यह काम सरकार करवाती है। पंजाब में यह परम्परा थी कि लड़की जब विवाह के पश्चात् ससुराल जाती थी तो उससे एक पेड़ लगवाते थे। लड़की जब ससुराल से अपने पीहर आती थी और इस पेड़ को देखती थी, पेड़ हरा-भरा मिलता था तो लड़की समझ जाती थी कि उसके पीहर में आज भी उससे प्रेम किया जाता है, उसके लगाए बिरवे को भाई और भाभियां स्नेह जल से सींच कर पाल रही हैं।

    हमारे पुरखों ने वृक्षों, नदियों, समुद्रों तथा पर्वतों की पूजा करने से लेकर गायों को रोटी देने, कबूतरों एवं चिड़ियों को दाना डालने, कीड़ीनगरा सींचने, गर्मियों में पक्षियों के लिये पानी के परिण्डे बांधने, बच्छ बारस को बछड़ों की पूजा करने, श्राद्ध पक्ष में कौओं को ग्रास देने, नाग पंचमी पर नागों की पूजा करने, प्रतिदिन पीपल तथा तुलसी सींचने, सूर्यदेव को अर्घ्य देने एवं विशिष्ट पर्वों एवं व्रतों पर चंद्रदेव को अर्घ्य देने, द्वितीया को चंद्र दर्शन करने जैसे धार्मिक विधान बनाए जिनसे मानव में प्रकृति के प्रति संवेदना, आदर और कृतज्ञता का भाव उत्पन्न हो।

    प्राकृतिक शक्तियों द्वारा जो कुछ भी निर्मित किया जाता है एवं वनस्पति जगत द्वारा जो कुछ भी उपलब्ध कराया जाता है, उस सबका उपभोक्ता जीव जगत है। जीव जगत में भी मनुष्य ऐसा प्राणी है जो प्रकृति द्वारा उत्पन्न किये जाने वाले एवं उपलब्ध कराये जाने वाले संसाधनों को अंतिम उपभोक्ता की तरह प्रयुक्त करता है।

    यही कारण है कि मनुष्य इस प्रकृति का पुत्र होते हुए भी, प्रकृति में उपलब्ध हर वस्तु का स्वामी है या नेचुरल रिसोर्सेज नामक कम्पनी का सबसे बड़ा शेयर होल्डर है। स्वाभाविक है कि मालिक या सबसे बड़े शेयर होल्डर को अधिक जिम्मेदारी का प्रदर्शन करना होता है। व्यवहार रूप में उसे प्राकृतिक संसाधनों का मालिक बनकर नहीं अपितु सेवक बनकर रहना होगा, तभी हम पर्यावरण का सच्चे अर्थों में संरक्षण कर सकते हैं।

    संत पीपा के इस दोहे पर अपनी मानसिकता को जांचकर देखें जो मनुष्य को मनुष्य बनाने के लिए बहुत जरूरी है-

    स्वामी होना सहज है, दुरलभ होणो दास।

    पीपा हरि के नाम बिन, कटे न जम की फांस।।


    हम प्रकृति के सेवक होकर रहें न कि स्वामी।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-35

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-35

    राज्य में अधिक अन्न उत्पादन के पर्यावरणीय उपाय (2)


    अन्न एवं चारा संरक्षण के ग्रामीण उपाय

    कराई

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    चारा भण्डारण के लिये खुले स्थान में कराई बनाई जाती है। इसके लिये 8 से 15 फीट के व्यास के घेरे में 50-60 तगारी राख बिछाकर थळा बनाते हैं। कराई के चारों ओर अंदर की तरफ एक-एक फुट पाई का बाटा लगाते हैं। बोरड़ी के कांटों की बींट गुंथली को गोल घेरे में रखकर बेवली चौकनी से कूटते हैं। जब यह बींट 3-4 फुट की बन जाती है, इसमें बोरड़ी के पत्ते अलग कर देते हैं। बींटे को आधा काटा जाता है, चंद्राकार बींटे के राख वाले गोल घेरे के चारों ओर भीतर की तरफ एक-एक फुट में लगाते हैं। इसे पाई का बाटा लगाना कहते हैं। बाटे के अंदर खाली जगह में बाजरे का डूर भर दिया जाता है। इसके ऊपर धामण, भूरट, बेकरिया, मूंग और ग्वार का गुणा के बाटे बनाते हैं। एक-एक फुट का बाटा लगाते हैं तथा बीच के रिक्त स्थान में बाजरे के डोकों को काटकर डालते जाते हैं। मूंग-मोठ की पानड़ी(पत्ते), ग्वार की ग्वारटी या फलगटी डालकर खूंदते जाते हैं। दस फुट बाद कांकड़ी बनाई जाती है। इसे पेट निकालना भी कहते हैं। अंत में कराई को छाजते हैं। कराई की ऊँचाई 12 से 25 फीट होती है।

    पचावा

    पचावा में डोकों को बिना कुतर के रखा जाता है। इसमें मिट्टी या ईंटों की थर पंक्तिबद्ध तरीके में दी जाती है। दो पंक्तियों के बीच स्थान छोड़ा जाता है। थर के ऊपर अरणी के डोकों की नाथ देकर इसे मिट्टी से भर दिया जाता है। उसके बाद डोकों की थई दी जाती है। कराई झौंपड़ी के आकार में होती है जबकि पचावा चौकोर आकार में होता है।

    कणारा

    फसल को चूहों, कीट-पतंगों एवं फफूंदियों द्वारा नष्ट कर दिये जाने की आशंका रहती है। इसलिये धान के कणों को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से गांवों में कणारे बनाये जाते हैं। ये मिट्टी और गोबर से बनाये जाने वाली बड़ी कोठियां होती हैं। कोठियां कणारा से छोटी होती हैं। चोकोर आकार की कोठी को कोठलिया कहते हैं। जब किसी वर्ष अनाज अत्यधिक पैदा होता है तो उसे कणारा या कोठी में नहीं रखा जा सकता। ऐसी स्थिति में चारे की कराई में, चारे के साथ सिट्टे भी रख दिये जाते हैं।


    कृषि के संदर्भ में जिलेवार महत्वपूर्ण तथ्य

    अजमेर : राज्य में गुलाब के फूल तथा अमरूद का सर्वाधिक उत्पादन अजमेर जिले में होता है। पुष्कर क्षेत्र में गुलाब की रोज इण्डिया किस्म का सर्वाधिक उत्पादन होता है। अजमेर में फूलों की आधुनिक मण्डी विकसित की गई है।

    अलवर : राज्य में तम्बाखू का सर्वाधिक उत्पादन अलवर जिले में होता है। जिले के तिन कारुड़ी में बीज फार्म स्थापित किया गया है। जिले के नौगावां नामक स्थान पर सरसों अनुसंधान का अग्रणी कृषि विज्ञान केन्द्र स्थापित किया गया है। अलवर में राज्य की प्रमुख प्याज मण्डी है। जिले का शाहजहाँपुर कस्बा फूड प्रोसेसिंग की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

    उदयपुर : राज्य में मशरूम, हल्दी, पपीता तथा ककड़ी का सर्वाधिक उत्पादन उदयपुर जिले में होता है।

    कोटा : राज्य में सर्वाधिक ज्वार, अलसी, सोयाबीन तथा मसालों का उत्पादन कोटा जिले में होता है। यहाँ समन्वित सोयाबीन परियोजना स्थापित की गई है। कोटा में राज्य का पहला एग्रो फूड पार्क स्थापित किया गया। कोटा जिले के बोरखेड़ा में सोयाबीन शोध संस्थान खोला गया है।

    चित्तौड़गढ़ : राज्य में मूंगफली, अफीम, सिंघाड़ा, सीताफल, लहसुन अजवायन एवं बेर का सर्वाधिक उत्पादन चित्तौड़गढ़ जिले में होता है।

    चूरू : जैसलमेर तथा चूरू जिलों में कपास का उत्पादन बिलकुल नहीं होता।

    जयपुर : राज्य में सर्वाधिक जौ, आम तथा नाशपति का उत्पादन जयपुर जिले में होता है। जयपुर में राष्ट्रीय कृषि विपणन संस्थान स्थापित किया गया है। जयपुर में सब्जी सुधार की अखिल भारतीय समन्वित परियोजना का उपकेन्द्र स्थापित किया गया है।

    जालोर : राज्य में जीरा, ईसबगोल, अरण्डी, बेदाना अनार तथा भांग-गांजा का सर्वाधिक उत्पादन जालोर जिले में होता है। यह जिला उच्च कोटि के टमाटरों के उत्पादन के लिये भी प्रसिद्ध है।

    जैसलमेर : जैसलमेर जिले में शुष्क वन अनुसंधान संस्थान द्वारा बांस की खेती की जा रही है। राज्य में कार्यशील जोतों का सबसे बड़ा औसत आकार (16.99 हैक्टेयर) जैसलमेर जिले में है।

    जोधपुर : राज्य में मिर्च, अनार, दालों तथा जोजोबा का सर्वाधिक उत्पादन जोधपुर जिले में होता है। जोधपुर से औषधीय महत्व की सोनामुखी की पत्तियों का निर्यात होता है। मण्डोर में ईसबगोल अनुसंधान केन्द्र खोला गया है।

    झालावाड़ : सर्वाधिक संतरा उत्पादन के कारण झालावाड़ को राजस्थान का नागपुर कहते हैं।

    टोंक : राज्य में मतीरा (तरबूज) का सर्वाधिक उत्पादन टोंक जिले में होता है। टोंक के खरबूजे भी प्रसिद्ध हैं।

    डूंगरपुर : राज्य में कार्यशील जोतों का सबसे छोटा औसत आकार (1.47 हैक्टेयर) डूंगरपुर जिले में है।

    धौलपुर : राज्य में नींबू का सर्वाधिक उत्पादन धौलपुर तथा भरतपुर जिलों में होता है।

    नागौर : राज्य में सर्वाधिक तिल उत्पादन नागौर जिले में होता है। नागौर जिले में खुशबूदार मेथी का उत्पादन होता है जिसे देश विदेश में निर्यात किया जाता है।

    पाली : राज्य में खरबूजा का सर्वाधिक उत्पादन पाली जिले में होता है। टोंक के खरबूजे भी प्रसिद्ध हैं।

    बाड़मेर : राज्य में बाजरा तथा सिनकोना का सर्वाधिक उत्पादन बाड़मेर जिले में होता है। इस जिले में मोठ तथा खरीफ की दालें सर्वाधिक पैदा होती हैं।

    बारां : राज्य में धनिया का सर्वाधिक उत्पादन बारां जिले में होता है।

    बांसवाड़ा : राज्य में केले का सर्वाधिक उत्पादन बांसवाड़ा जिले में होता है। बांसवाड़ा जिले के बोखर गाँव में मक्का शोध संस्थान खोला गया है।

    बीकानेर : राज्य में खजूर तथा अंजीर का सर्वाधिक उत्पादन बीकानेर जिले में होता है। जिले के लूणकरणसर क्षेत्र को मूंगफली उत्पादन के लिये राजस्थान का राजकोट कहा जाता है। बीकानेर में खजूर एवं बेर अनुसंधान केन्द्र खोले गये हैं।

    बूंदी : राज्य में सर्वाधिक चावल उत्पादन बूंदी जिले में होता है। यहाँ सैला बासती चावल उगाया जाता है।

    भरतपुर : राज्य में सर्वाधिक सरसों उत्पादन भरतपुर जिले में होता है। राज्य में नींबू का सर्वाधिक उत्पादन धौलपुर तथा भरतपुर जिलों में होता है। जिले के सेवर नामक स्थान पर सरसों शोध संस्थान खोला गया है।

    राजसमंद : राज्य में अदरक का सर्वाधिक उत्पादन राजसमंद जिले में होता है। जिले के खमनौर नामक स्थान पर दश्मक गुलाब (चैती गुलाब) उगाया जाता है।

    सवाईमाधोपुर : सवाईमाधोपुर में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने कृषि विज्ञान केन्द्र स्थापित किया है।

    सिरोही : राज्य में सौंफ तथा चीकू का सर्वाधिक उत्पादन सिरोही जिले में होता है। जिले के माउण्ट आबू में सेब का उत्पादन सर्वप्रथम आरंभ हुआ। सिरोही एवं बांसवाड़ा जिलों में लीची एवं बादाम की खेती की संभावनाएं मौजूद हैं। जिले में मॉलवी किस्म की कपास की खेती होती है।

    सीकर : राज्य का पहला कृषि विज्ञान केन्द्र फतहपुर शेखावाटी में स्थापित किया गया।

    श्रीगंगानगर : राजस्थान में जिले के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल में से शुद्ध बोया गया सर्वाधिक क्षेत्रफल श्रीगंगानगर जिले में है। एक से अधिक बार बोया गया क्षेत्रफल के मामले में भी यह अन्य जिलों से आगे है। यह जिला गेहूँ, गन्ना, कपास, चुकंदर, किन्नू तथा मालटा उत्पादन में सब जिलों से आगे है। इसे राजस्थान का अन्न भण्डार भी कहते हैं। समस्त जिलों में सर्वाधिक फल उत्पादन के कारण श्रीगंगानगर को बागानों की भूमि कहा जाता है। राज्य में चुकंदर आधारित मिल केवल इस जिले में है। राजस्थान में हरित क्रांति इस जिले से आरंभ हुई। इस जिले में नाइट्रोजन उर्वरक का प्रयोग अन्य जिलों से अधिक होता है। राज्य में सर्वाधिक कृषि मण्डियां तथा स्टेट वेयर हाउस इस जिले में हैं। एशिया का सबसे बड़ा कृषि केन्द्र- सूरतगढ़ यांत्रिक फार्म इस जिले के सूरतगढ़ कस्बे में है। इसकी स्थापना रूस के सहयोग से 15 अगस्त 1956 को हुई थी। चारे के प्रमाणिक बीजों के उत्पादन और प्रचार-प्रसार का कार्य इसी केन्द्र में किया जाता है। यह भारत का राष्ट्रीय बीज केन्द्र है। राजस्थान की प्रमुख कपास मण्डी तथा कपास शोध संस्थान भी श्रीगंगानगर में है। कपास को सफेद सोना भी कहा जाता है। राज्य में किन्नू की मण्डी केवल श्रीगंगानगर में है। इस जिले के जैतसर नामक स्थान पर कनाडा के सहयोग से जैतसर यांत्रिक फार्म स्थापित किया गया है। गंगानगर एवं हनुमानगढ़ जिलों में अमरीकन कपास का नगदी फसल के रूप में बड़ी मात्रा में उत्पादन होता है।

    हनुमानगढ़ : राज्य में चने तथा ग्वार का सर्वाधिक उत्पादन हनुमानगढ़ जिले में होता है।


    राजस्थान में बागवानी

    बागवानी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को कृषि प्रसंस्करण एवं अन्य गौण गतिविधियों में परिवर्तित कर ग्रामीण लोगों को अतिरिक्त रोजगार के अवसर उपलब्ध कराती है। बागवानी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए निम्नलिखित योजनाएं संचालित की जा रही हैं-

    राष्ट्रीय बागवानी मिशन : राज्य के चयनित 24 जिले क्रमशः जयपुर, अजमेर, अलवर, चित्तौड़गढ़, कोटा,बारां, झालावाड,जोधुपर, पाली, जालौर, बाड़मेर, नागौर, बांसवाड़ा, टोंक, करौली, सवाईमाधोपुर, उदयपुर,डूंगरपुर, भीलवाड़ा, बून्दी, झुंझुनूं, सिरोही, जैसलमेर एवं श्रीगंगानगर में विभिन्न उद्यानिकी फसलों यथा- फल, मसाला, फूल एवं औषधीय फसलों के क्षेत्रफल, उत्पादन व उत्पादकता बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय बागवानी मिशन चलाया जा रहा है।

    राष्ट्रीय बम्बू मिशन : योजनान्तर्गत बाँस की खेती को बढ़ावा देने के लिए राज्य के करौली, सवाईमाधोपुर, उदयपुर, चितौड़गढ़, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, सिरोही, बांरा, झालावाड़, भीलवाड़ा, राजसमन्द एवं प्रतापगढ़ जिलों को सम्मिलित किया गया है।

    राष्ट्रीय कृषि विकास योजना : कृषि एवं सम्बद्ध क्षेत्र में लगातार गिरते हुए निवेश को देखते हुए केन्द्र सरकार ने यह योजना आरम्भ की है जिसमें कृषि जलवायु स्थितियों, प्राकृतिक संसाधनों से सम्बद्ध विषयों एवं तकनीक को दृष्टिगत रखते हुए कृषि क्षेत्र के लिये विस्तृत योजना बनाई गई है। इसके अंतर्गत राज्य में उद्यानिकी विकास परियोजना के लिये वर्ष 2012-13 में खजूर की खेती, अनार का उत्पादन, अंगूर पौधारोपण, खजूर टिश्यू कल्चर प्रयोगशाला, गैर राष्ट्रीय बागवानी मिशन वाले जिलों में उद्यानिकी विकास कार्यक्रम, ग्रीन हाउस पौधारोपण सामग्री, शेड व नेट हाउस में में सब्जी उत्पादन, सब्जी मिनी किट्स वितरण, ढिढोल नर्सरी विकास, सोलर पम्पसैट पर सहायता आदि कार्यों हेतु 123.15 करोड़ रुपये स्वीकृत किये गये हैं।


    राजस्थान में औषधि सम्पदा

    हिमालय पर्वत के बाद राजस्थान ही एक मात्र ऐसा क्षेत्र है जिसे सृष्टिकर्ता ने सर्वाधिक औषधियां प्रदान की हैं। यहाँ की साधारण तथा घास-फूस समझी जाने वाली वनस्पतियां भी मनुष्य एवं पशुओं के आरोग्य हेतु बड़ी चमत्कारी औषधियां हैं। मरू प्रदेश में कैर, कुमटी, खेजड़ी, धतूरा, आसलिया, जीरा, ईसबगोल, शंखपुष्पी, रोहिषतृण (देशी बूर), गांगेरुकी, कर्पूरगंधा, महाबला, हरमल, इंद्रायण, लाल व सफेद आकड़ा, भूरांगणी, ऊँटकटो, खारी, बेर, भाऊ, फोग, धव, खींप, नागबेल, कनेर, थूहर, सर्पगंधा, अश्वगंधा, गोंद तथा गूगल आदि अनेक बहुमूल्य औषधियां पायी जाती हैं। अरावली के पर्वतीय वन-क्षेत्र में बाय हाकल, काली हाकल, चित्राल, बरकड़ा, गारह गोटा, बिदार कंद, तोलिया कन्द, सफेद मूसली, बिल्व, गंेगची, अपामार्ग, शालपर्णी, शैफाली, नागरमोथा, घातकी पाठा, कम्पलीक, मिर्चीकन्द, सूरवाल घास, खाट खटूम्बर, बटेड़ा, पलाश, हस्तकर्ण, ट्रायडक्स आदि दुर्लभ औषधियों का भण्डार है।

    राष्ट्रीय औषधीय पादप मिशन (एन.एम.एम.पी.) : राज्य में औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देने एवं फार्मा सेक्टर को आसानी से कच्चा माल उपलब्ध कराने के लिए भारत सरकार द्वारा वर्ष 2009-10 से यह कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया है।

    औषधीय पौध संरक्षित क्षेत्र : राज्य में औषधीय प्रजातियों के संरक्षण हेतु 9 औषधीय पौध संरक्षित क्षेत्र की स्थापना की जा रही है जिनमें से 7 क्षेत्र स्थापित किये जा चुके हैं।

    ईसबगोल की खेती : मरुस्थलीय क्षत्रों में जहाँ थोड़ी बहुत वर्षा होती है तथा सिंचाई के कृत्रिम साधन उपलब्ध हैं, ईसबगोल की खेती सफलता से की जाती है। इसके बीजों में सफेद रंग की भूसी पाई जाती है जिसे औषधि के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।

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  • राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान के प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता

     22.12.2021
    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान के प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी - 207

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान के प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता

    1. प्रश्न - ए. घोष

    उतर- इन्होंने 1952 ई. में कालीबंगा की सभ्यता की खोज की। कालीबंगा की खुदाई 1961 से 1969 के बीच हुई। इस खुदाई से जुड़े अन्य पुरातत्वविदों में बी. बी. लाल, बी. बी. के. थापर, एन. डी. खरे, के.एम. श्रीवास्तव तथा एस. पी. जैन थे।

    2. प्रश्न - अलैक्जेण्डर कनिंघम

    उतर- इन्होंने उन्नीसवीं सदी के अंत में जयपुर रियासत के विविध स्थलों का भ्रमण करके इस क्षेत्र का पुरातात्विक सर्वेक्षण किया जिससे जयपुर रियासत तथा राजपूताना के प्राचीन काल के इतिहास के लिये विश्वसनीय शोध सामग्री उपलब्ध हो सकी।

    3. प्रश्न - टी. एच. हैण्डले

    उतर- 1880 के दशक में इन्होंने जयपुर रियासत के विविध स्थलों का भ्रमण करके पुरासामग्री जुटाकर कुछ लेख छपवाये। बाद में 1930 के दशक में दयाराम साहनी ने उन लेखों में रह गई त्रुटियों को ठीक किया।

    4. प्रश्न - रत्नचन्द्र अग्रवाल

    उतर- रत्नचन्द्र अग्रवाल का जन्म 21 जून 1926 को साढ़ौरा, हरियाणा में हुआ। ये राजस्थान के पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के निदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए। राजस्थान के प्राचीन शिल्प एवं मूर्ति विज्ञान पर आपने महत्त्वपूर्ण कार्य किया। आपके प्रसिद्ध ग्रंथों में ‘स्कल्पचर्स फ्रॉम उदयपुर म्यूजियम, पोटरी हैण्डल्स विद वुमन फिगराइन्स’ प्रमुख है।


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  • राजस्थान के प्रमुख संग्रहालय - अनुक्रमणिका

     02.06.2020
    राजस्थान के प्रमुख संग्रहालय - अनुक्रमणिका

    राजस्थान के प्रमुख संग्रहालय 

    लेखक: डॉ. मोहनलाल गुप्ता


    संग्रहालयों का इतिहास


    1. संग्रहालय की अवधारणा का विकास

    2. राजस्थान के संग्रहालयों की आधारभूत सामग्री

    3. पुरावशेष संग्रहण में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का योगदान

    4. राजस्थान में संग्रहालयों की स्थापना का इतिहास


    राज्य में सरकारी क्षेत्र के प्रमुख संग्रहालय एवं अभिलेखागार

    अजमेर संभाग के संग्रहालय

    6. राजकीय संग्रहालय, अजमेर

    उदयपुर संभाग के संग्रहालय

    7. राजकीय संग्रहालय, उदयपुर

    8. सिटी पैलेस म्यूजियम, उदयपुर

    9. क्रिस्टल गैलेरी, उदयपुर

    10. विंटेज कार संग्रहालय, उदयपुर

    11. जनजाति संग्रहालय, उदयपुर

    12. पुरातत्व संग्रहालय, उदयपुर

    13. लोककला संग्रहालय, उदयपुर

    14. राजकीय संग्रहालय, आहाड़

    15. बागोर की हवेली संग्रहालय, उदयपुर

    16. महाराणा प्रताप संग्रहालय, हल्दीघाटी

    17. शिल्पग्राम संग्रहालय, उदयपुर

    18. वैक्स म्यूजियम, उदयपुर

    19. बी. जी. शर्मा चित्रालय, उदयपुर

    20. राजकीय संग्रहालय, चित्तौड़गढ़

    21. राजमाता देवेन्द्र कुंवर राजकीय संग्रहालय, डूंगरपुर

    कोटा संभाग के संग्रहालय

    22. राजकीय संग्रहालय, कोटा

    23. राव माधोसिंह ट्रस्ट संग्रहालय, कोटा

    24. राजकीय संग्रहालय, झालावाड़

    जयपुर संभाग के संग्रहालय

    25. केन्द्रीय संग्रहालय: अल्बर्ट म्यूजियम, जयपुर

    26. वैक्स म्यूजियम, नाहरगढ़, जयपुर

    27. राजकीय संग्रहालय, हवामहल

    28. प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय, जयपुर

    29. महाराजा मानसिंह संग्रहालय: सिटी पैलेस, जयपुर

    30. जवाहर कला केन्द्र, जयपुर

    31. आधुनिक कला संग्रहालय, जयपुर

    32. श्री रामचरण प्राच्य विद्यापीठ एवं संग्रहालय, जयपुर

    33. दिलाराम बाग संग्रहालय, आमेर

    34. गुड़िया एवं कठपुतली संग्रहालय, जयपुर

    35. श्री संजय शर्मा संग्रहालय, जयपुर

    36. जयपुर के कतिपय विशिष्ट संग्रहालय

    37. बिड़ला साइंस म्यूजियम, जयपुर

    38. राजकीय संग्रहालय, अलवर

    39. राजकीय संग्रहालय, विराटनगर

    40. श्री राजकुमार हरदयाल सिंह राजकीय संग्रहालय, सीकर

    41. बिड़ला तकनीकी संग्रहालय, पिलानी

    42. ज्योतिष यंत्र संग्रहालय, जयपुर

    जोधपुर संभाग के संग्रहालय

    43. सरदार राजकीय संग्रहालय, जोधपुर

    44. राजकीय संग्रहालय, मण्डोर

    45. मेहरानगढ़ दुर्ग, संग्रहालय, जोधपुर 46. छीतर पैलेस संग्रहालय, जोधपुर

    47. लोकवाद्य संग्रहालय, जोधपुर

    48. अरणा-झरणा मरुस्थल संग्रहालय, जोधपुर

    49. राजकीय संग्रहालय आबू पर्वत

    50. श्री बांगड़ राजकीय संग्रहालय, पाली

    51. राजकीय संग्रहालय, जैसलमेर

    52. लोक-सांस्कृतिक संग्रहालय: जैसलमेर

    53. युद्ध संग्रहालय, जैसलमेर

    54. नेशनल वुडन फॉसिल पार्क, जैसलमेर

    बीकानेर संभाग के संग्रहालय

    55. गंगा-गोल्डन जुबली संग्रहालय, बीकानेर

    56. करणी संग्रहालय, बीकानेर

    57. सार्दूल संग्रहालय, बीकानेर

    58. प्राचीना, बीकानेर

    59. सर छोटूराम स्मारक संग्रहालय, संगरिया

    60. पुरातत्व संग्रहालय, कालीबंगा

    61. नाहटा कला संग्रहालय, सरदारशहर

    62. भित्तिचित्रों की ओपन आर्ट गैलेरी: शेखावाटी की हवेलियाँ

    भरतपुर संभाग के संग्रहालय

    63. राजकीय संग्रहालय, भरतपुर

    64. राजकीय संग्रहालय, डीग

    राजस्थान के विज्ञान केन्द्र एवं संग्रहालय

    65. राजीव गांधी क्षेत्रीय प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय

    66. राजस्थान के विज्ञान केन्द्र एवं संग्रहालय

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-36

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-36

    कृषि-उपज एवं पशु-धन पर आधारित उद्योगों की स्थापना


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राज्य में कृषि-उपज एवं पशु-धन पर आधारित छोटे-बड़े सैंकड़ों उद्योग विकसित एवं उन्नत अवस्था में हैं जिनसे लाखों परिवारों को रोजगार प्राप्त होता है।


    कृषि-उपज आधारित उद्योग

    कृषिगत कच्चे माल पर आधारित उद्योग, इस श्रेणी में आते हैं। राजस्थान में खाद्यान्न पर आधारित बेकरी, कन्फेक्शनरी इकाइयां तथा तथा अन्य फूड प्रोसेसिंग इकाइयां लगी हुई हैं। तिलहन पर आधारित तेल मिलें, वनस्पति घी मिलें व साबुन निर्माण इकाइयां लगायी गयी हैं। दलहन पर आधारित दाल मिलें, कपास पर आधारित कॉटन जिनिंग मिलें एवं सूती कपड़ा मिलें, गन्ना एवं चुकंदर पर आधारित चीनी मिलें, ग्वार पर आधारित ग्वार गम मिलें आदि उद्योग लगे हुए हैं। राज्य में कृषि पर आधारित प्रमुख उद्योगों में सूती वस्त्र उद्योग, शक्कर उद्योग, वनस्पति घी एवं तेल उद्योग तथा ग्वार गम उद्योग हैं।

    कॉटन जिनिंग एण्ड प्रेसिंग इण्डस्ट्री

    कपास में से बिनौलों को अलग करना जिनिंग कहलाता है। यह काम छोटी मशीनों द्वारा किया जाता है। राजस्थान में बड़े स्तर पर कपास का उत्पादन होता है। इस कारण राज्य के कई जिलों यथा श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, भीलवाड़ा आदि में कॉटन जिनिंग एण्ड प्रेसिंग यूनिट्स बड़ी संख्या में लगी हुई हैं।

    सूती वस्त्र उद्योग

    राजस्थान के निर्माण उद्योगों में यह सबसे प्राचीन एवं संगठित उद्योग है। इस उद्योग से ग्रामीण जनसंख्या को सर्वाधिक रोजगार प्राप्त होता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय राज्य में 7 सूती वस्त्र मिलें थीं। वर्तमान में राज्य में कुल 28 सूती वस्त्र मिलें हैं जिनमें से 17 निजी क्षेत्र में, 7 संयुक्त क्षेत्र में, 4 सहकारी क्षेत्र में तथा 3 मिलें राष्ट्रीय कपड़ा निगम के अधीन हैं। इनमें से 23 कताई मिलें तथा 5 कम्पोजिट मिलें हैं। राज्य का 75 प्रतिशत कपास क्षेत्र गंगानगर एवं हनुमानगढ़ जिले में है जहाँ राज्य का 80 प्रतिशत कपास उत्पन्न होता है। कपास उत्पादित करने वाले अन्य जिलों में पाली, बीकानेर, अलवर, भीलवाड़ा, बांसवाड़ा, कोटा और उदयपुर हैं। राज्य में स्थित 28 कपड़ा मिलों में से 7 भीलवाड़ा जिले में, 5 उदयपुर जिले में, 5 अलवर जिले में, 4 मिलें बांसवाड़ा जिले में, 4 मिलें गंगानगर जिले में हैं। जोधपुर, जयपुर, पाली, कोटा और सिरोही जिले में 2-2 मिलें हैं। राज्य में भीलवाड़ा सूती वस्त्र उद्योग का प्रमुख केंद्र है। मयूर (गुलाबपुरा एवं बी.एस.एल. (भीलवाड़ा) मिलों का कपड़ा उन्नत किस्म के कपड़े के लिये भारत भर में प्रसिद्ध है। भीलवाड़ा में जर्मन करघों से कपड़ा बुना जाता है। राज्य में एडवर्ड मिल्स एवं श्री महालक्ष्मी मिल्स राष्ट्रीय कपड़ा निगम के अधीन हैं। सहकारी कताई मिलें गंगापुर (भीलवाड़ा), गुलाबपुरा (भीलवाड़ा) और हनुमानगढ़ में कार्यरत हैं। राज्य में सहकारी कॉटन कॉम्पलैक्स की स्थापना विश्व बैंक की सहायता से की गयी हैं।

    राजस्थान में 34 स्पिनिंग मिलें हैं जिनमें से 14 भीलवाड़ा जिले में स्थापित हैं। इन स्पिनिंग मिलों में कुल 7.31 लाख स्पिण्डल हैं। राज्य के कुल स्पिण्डल्स में से 46.50 प्रतिशत भीलवाड़ा जिले में हैं। भीलवाड़ा जिले में धागे का उत्पादन 1.30 लाख टन है जो राज्य में कुल धागा उत्पादन का 44 प्रतिशत है। प्रदेश का 64 प्रतिशत धागा भीलवाड़ा से निर्यात होता है। यहाँ 425 से अधिक टैक्सटाइल वीविंग इकाइयां हैं। इनमें 16,246 लूम स्थापित हैं। इनमें से 85 प्रतिशत लूम आधुनिक तकनीक के शटल लैस अथवा एयर जेट लूम्स हैं। इस प्रकार भीलवाड़ा देश का आधुनिकतम पावरलूम सेंटर बन गया है।

    भीलवाड़ा में 19 आधुनिक प्रोसेस हाउस हैं जिनकी क्षमता प्रतिवर्ष 65 से 70 लाख मीटर कपड़ा प्रोसेस करने की है। टैक्सटाइल व्यवसाय का कुल टर्न ओवर 15 हजार करोड़ रुपये है। इस उद्योग में भीलवाड़ा जिले में 45 हजार लोगों को प्रत्यक्ष एवं 60 हजार लोगों को परोक्ष रोजगार मिला हुआ है। भारत सरकार के वाणिजय एवं उद्योग मंत्रालय ने भीलवाड़ा को टाउन ऑफ एक्सपोर्ट एक्सीलेंस फॉर टैक्सटाइल घोषित किया है। भीलवाड़ा से प्रतिवर्ष 550 करोड़ रुपये मूल्य का 7-8 करोड़ मीटर फैब्रिक (सूटिंग उत्पाद) निर्यात होता है। जिले की विभिन्न औद्योगिक इकाइयों द्वारा प्रति वर्ष 2,150 करोड़ रुपये का निर्यात किया जाता है। इनमें टैक्सटाइल क्षेत्र से 1485 करोड़ रुपये का, मिनरल क्षेत्र से 545 करोड़ रुपये का तथा अन्य विविध क्षेत्रों से 120 करोड़ रुपये का वार्षिक निर्यात किया जाता है। भीलवाड़ा को राजस्थान का मैनचेस्टर कहते हैं।

    डाइंग एण्ड प्रिंटिंग इण्डस्ट्री

    जोधपुर में प्रतिदिन चार लाख मीटर प्रिंण्ट फैब्रिक कपड़े का निर्माण होता है। यह कपड़ा 20 मुख्य वस्त्र निर्माताओं एवं 50 अन्य निर्माताओं द्वारा तैयार किया जाता है। जोधपुर के फैब्रिक वस्त्र निर्माता इस कपड़े को जयपुर आदि स्थानीय बाजारों में बेचते हैं जहाँ से यह विदेशों को निर्यात किया जाता है। जोधपुर में प्रतिवर्ष 200 करोड़ रुपये का कपड़ा बेचा जाता है। जोधपुर, पाली एवं बालोतरा का डाइंग-प्रिण्टिंग उद्योग विश्व के कई देशों में प्रसिद्ध था किंतु लूनी, बाण्डी एवं जोजरी आदि नदियों में हो रहे प्रदूषण के कारण इस उद्योग को कानूनी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है। निश्चित रूप से डाइंग एवं प्रिंटिंग इण्डस्ट्री पर्यावरण के लिये बहुत बड़ा संकट है किंतु राज्य की जनता इस दिशा में पूरी तरह जागरूक है तथा इसे रोकने के लिये पर्याप्त कदम उठाये गये हैं।

    रेडीमेड गारमेंट इण्डस्ट्री

    राज्य में 600 बड़ी इकाइयां रेडमेड गारमेंट तैयार करती हैं जिनसे उत्पादित माल विदेशों को निर्यात किया जाता है। राज्य से प्रतिवर्ष लगभग 1200 करोड़ रुपये का रेडिमेड गारमेंट निर्यात किया जाता है।

    चीनी उद्योग

    राज्य में गन्ने का उत्पादन बूंदी, चित्तौड़गढ़, गंगानगर और उदयपुर जिलों में अधिक होता है। राज्य में चीनी बनाने के बड़े कारखाने इन्ही जिलों में स्थित हैं। दी मेवाड़ शुगर मिल्स भोपाल सागर (चित्तौड़गढ़) की स्थापना 1932 में की गयी थी। यह राज्य का सबसे पुराना चीनी कारखाना है। दी गंगानगर शुगर मिल्स लि. गंगानगर की स्थापना 1946 में हुई थी। इसके 97 प्रतिशत अंशों पर राज्य सरकार का तथा 3 प्रतिशत हिस्सों पर निजी व्यक्तियों का अधिकार है। इस मिल के अधीन शराब एवं स्पिरिट बनाने का कारखाना भी कार्य करता है जिसके केन्द्र अजमेर, अटरू, जोधपुर एवं प्रतापगढ़ में हैं। श्री केशोराय पाटन शुगर मिल्स लि. जिला बूंदी की स्थापना 1965 में की गयी। गन्ना उत्पादक कृषक इसके सदस्य हैं।

    खाद्य एवं अखाद्य तेल उद्योग

    राज्य में व्यापक स्तर पर मूंगफली, तिल, सरसों, रायड़ा, सूरजमुखी, बिनौले (कॉटन सीड) आदि फसलें तैयार की जाती हैं जिनके बीजों से तेल निकालने के लियेएक्सपैलर एवं ऑयल प्रोसेसिंग यूनिट्स लगी हुई हैं। अलसी तथा अरण्डी आदि अखाद्य तेलों को निकालने का काम भी राज्य में बड़े स्तर पर होता है जिनका उपयोग रंग, वार्निश, साबुन तथा शृंगार एवं प्रसाधन सामग्री के निर्माण में होता है। बीजों से तेल निकालने के बाद जो खल बचती है, वह पशु आहार के रूप में तथा खेतों में खाद के रूप में काम ली जाती है।

    वनस्पति घी उद्योग

    राज्य में वनस्पति घी बनाने का पहला कारखाना भीलवाड़ा में स्थापित किया गया था। राज्य में वनस्पति घी बनाने के 9 कारखाने हैं जो भीलवाड़ा, जयपुर, चित्तौड़गढ़, उदयपुर, गंगानगर, अलवर तथा टोंक में स्थित हैं। वनस्पति तेल के कारखाने भरतपुर, जयपुर, अलवर, टोंक, सवाईमाधोपुर, अजमेर, नागौर, दौसा और बीकानेर जिलों में स्थित हैं।

    ग्वार गम उद्योग

    ग्वार के दानों में 28 से 30 प्रतिशत गोंद पाया जाता है जिसका उपयोग कपड़ा उद्योग, दवा उद्योग, खाद्य पदार्थ, शृंगार एवं प्रसाधन सामग्री बनाने में किया जाता है। राज्य में ग्वार दाने से पाउडर बनाने की 50 इकाइयां हैं जो जोधपुर, बीकानेर, बाड़मेर और सरदार शहर (चूरू) जिले में स्थित हैं।

    मसाला प्रसंस्करण उद्योग

    राज्य में जीरा, मिर्च, धनिया, मेथी, राई, सौंफ, अजवायन, हल्दी, सौंठ आदि मसाले प्रचुर मात्रा में होते हैं। इनके प्रसंस्करण का काम छोटे-छोटे स्तर पर होता रहा है। व्यापक स्तर पर ग्रेडिंग एवं प्रोसेसिंग के लिये देश का सातवां एवं राज्य का पहला स्पाईस पार्क जोधपुर जिले के ओसियां उपखण्ड के रामपुरा भाटियान गांव में बनाया गया है। इस पार्क का उद्देश्य मसालों की गुणवत्ता में सुधार लाना, ग्रेडिंग, प्रोसेसिंग, पैकिंग को बढ़ावा देना एवं किसानों को अंतर्राष्ट्रीय बाजार उपलब्ध करवाना है।


    पशुधन आधारित उद्योग

    डेयरी उद्योग

    राज्य में बड़ी संख्या में दुधारू पशुओं की उपस्थिति से राज्य की डेयरियों में मिल्क पाश्चुराइजेशन का काम वृहत् स्तर पर होता है। दूध से क्रीम निकालकर उससे घी बनाया जाता है। दूध की अतिरिक्त मात्रा उपलब्ध होने पर मिल्क पाउडर तैयार किया जाता है। निजी स्तर पर घरों में बनाये जाने वाले घी के साथ-साथ सहकारी डेयरियों में भी अच्छी गुणवत्ता का घी तैयार होता है। स्थानीय मांग को पूरा करने के साथ-साथ इसका निर्यात भी किया जाता है। सहकारी डेयरियों में श्रीखण्ड, छाछ, दही आदि उत्पाद भी तैयार करके बड़े स्तर पर बेचे जाते हैं।

    ऊन उद्योग

    ऊन उत्पादन में राजस्थान का देश में पहला स्थान है। भारत की कुल ऊन का 40 से 45 प्रतिशत भाग राजस्थान में उत्पादित होता है। राजस्थान की ऊन विश्व के गलीचा उद्योग में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। राज्य में चोकला भेड़ की ऊन उत्तम किस्म की मानी जाती है। सूरतगढ़, जैतसर, बीकानेर आदि केंद्रों पर काराकुल एवं मेरिनो भेड़ें पाली जा रही हैं। राज्य में ऊनी धागा बनाने वाली प्रमुख मिलें इस प्रकार से हैं- (1) जोधपुर ऊन मिल, जोधपुर, (2) फोरेन एक्सपोर्ट एण्ड इम्पोर्ट मिल, कोटा (3) नगरपाल कॉम्बिंग मिल, कोटा, (4) राजस्थान ऊन मिल, बीकानेर (5) भारत ऊन मिल, बीकानेर। बीकानेर एशिया में ऊन की सबसे बड़ी मण्डी है। बीकानेर एवं टोंक में ऊन से नमदे बनाये जाते हैं जिनकी देश-विदेश में बहुत मांग है।

    चमड़ा उद्योग

    राज्य में बड़ी संख्या में पशुधन पाया जाता है। गौ-वंशीय पशुओं, ऊँट, भेड़, बकरी के मृत शरीरों के चमड़े से चप्पल, जूते, सैण्डल, मोजरी, पर्स, बैग तथा बैल्ट आदि बनते हैं। चमड़े से हैण्डीक्राफ्ट की विभिन्न प्रकार की सामग्री तैयार होती है। बीकानेर के उस्ता कलाकर चमड़े पर उस्ता कला के माध्यम से बेहतरीन सजावट करते हैं। उस्ता कलाकर ऊँट की खाल पर सोने की उत्तम नक्काशी करते हैं।

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  • राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : आधुनिक काल के प्रसिद्ध व्यक्ति

     22.12.2021
    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : आधुनिक काल के प्रसिद्ध व्यक्ति

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी - 208

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : आधुनिक काल के प्रसिद्ध व्यक्ति

    1. प्रश्न - आचार्य महाप्रज्ञ

    उतर- जैन श्वेताम्बर तेरापंथ के दसवें आचार्य और अणुव्रत अनुशास्ता।

    2. प्रश्न - करणाराम भील

    उतर- जैसलमेर का प्रसिद्ध नड़वादक, कुख्यात डाकू। छः फुट आठ इंच लम्बी मूंछों के लिये विख्यात।

    3. प्रश्न - के.के. बिड़ला

    उतर- 30 अगस्त, जाने-माने उद्योगपति एवं राज्य सभा सदस्य के.के. बिड़ला 18 वर्षों तक राज्यसभा के सदस्य रहे। उनका जन्म पिलानी में हुआ था। वे जीवनभर समाज सेवा से जुड़े हुए रहे। 90 वर्ष की आयु में कोलकाता में उनका निधन हुआ। के.के. बिड़ला हिन्दुस्तान टाइम्स प्रकाशन समूह के चैयरमैन भी थे।

    4. प्रश्न - कोमल कोठारी

    उतर- जन्म 1929 ई. में कपासन में, जोधपुर कर्मभूमि रही। भारत में प्रदर्शनकारी कलाओं के प्रलेखन के प्रमुख प्रणेता। 400 प्रकार की सारंगियों की पहचान करके उनकी सूचनाएं अंकित कीं। लोकगीतों एवं लोकसंगीत की 10 हजार घण्टों की रिकॉर्डिंग एकत्रित की। 1965 ई. में विजयदान देथा के साथ मिलकर रूपायन संस्थान की स्थापना। लंगा, मांगणियार तथा कालबेलिया जातियों के कुशल लोक गायकों और तेरहताली नर्तकों को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत किया तथा बातपोशी की कला को उजागर किया। उन्होंने 20 हजार कथायें, 17 हजार गीत तथा 12 हजार लोकोक्तियां संग्रहीत कीं। उन्होंने कमायचा तथा सिंधी सारंगी को लुप्त होने से बचाया। पाबूजी की पड़ जैसी लोक वार्ताएं तथा रम्मत-ख्याल जैसे लोक नाट्य उनके कार्यक्षेत्र के मुख्य अंग थे।

    5. प्रश्न - खेमचंद प्रकाश

    उतर- सुप्रसिद्ध संगीतकार खेमचंद प्रकाश का जन्म 12 दिसम्बर 1907 को सुजानगढ़ में हुआ था। लता मंगेशकर को सिनेमा में गीत गाने का प्रथम अवसर उन्होंने ही प्रदान किया था। राजस्थानी लोक संगीत पर आधारित फिल्म जिद्दी का गाना चंदा रे जारे जारे ....... बहुत लोकप्रिय हुआ। उनके द्वारा निर्देशित फिल्म ‘तानसेन’ उनकी अमर कृति है। उन्होंने 45 फिल्मों में संगीत दिया।

    6. प्रश्न - गणपत लाल डांगी

    उतर- इनका जन्म जोधपुर में ई.1920 में हुआ। ये लोक गीत गायक एवं लोकनृत्य कलाकार थे। इन्होंने सिनेमा में भी ख्याति अर्जित की। इनके बनाये रेडियो रूपकों में ‘गीगला रा बापू’ तथा ‘लड़े सूरमा आज जी’ बड़े प्रसिद्ध हुए।

    7. प्रश्न - गायत्री देवी

    उतर- ये कूच बिहार की राजकुमारी थीं। इनका विवाह जयपुर रियासत के अंतिम महाराजा सवाई मानसिंह से हुआ। ब्रिटिश फैशन पत्रिका वॉग ने साठ के दशक में उन्हें दुनिया की सबसे सुंदर दस महिलाओं में से एक माना था। 1962 में गायत्री देवी सक्रिय राजनीति में आईं और स्वतंत्र पार्टी की प्रदेश अध्यक्ष बनीं। वे इस पार्टी के टिकट पर 1962, 1967 एवं 1971 में लोकसभा के लिये चुनी गईं। 1962 के आम चुनावों में वे पूरे देश में सर्वाधिक मतों से लोकसभा के लिये चुनी गईं। 1977 में वे राजस्थान पर्यटन विकास निगम की अध्यक्ष बनीं। 29 जुलाई 2010 को 90 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

    8. प्रश्न - गोविंद अग्रवाल

    उतर- चूरू से प्रकाशित मरुश्री पत्रिका के सम्पादक गोविंद अग्रवाल ने ‘शेखर का सोरठा’ तथा ‘वातां ही चाले’ पुस्तकों का सम्पादन किया। आपने चूरू मंडल का शोध पूर्ण इतिहास तथा राजस्थानी लोक कथाएं भाग-1 तथा भाग-2 का भी प्रकाशन करवाया। आप ‘नगर श्री चूरू’ नामक संस्था भी चलाते हैं।

    9. प्रश्न - सेठ गोविंद दास

    उतर- सेठ गोविंददास के पिता राजा गोकुलदास मूलतः जैसलमेर के रहने वाले थे किंतु बाद में वे जबलपुर में निवास करने लगे थे। उनके पुत्र सेठ गोविंददास हिन्दी भाषा के ख्यातिनाम नाटककार हुए। वे कांग्रेस में शामिल होकर देश की स्वतंत्रता के लिये कई बार जेल भी गये।

    10. प्रश्न - घनश्यामदास बिड़ला

    उतर- घनश्यामदास बिड़ला, उद्योगपति, स्वतंत्रता सेनानी, लेखक तथा आधुनिक भारत के महान निर्माताओं में से एक थे। उन्होंने भारत की आजादी के लिये लगभग 20 करोड़ रुपये कांग्रेस तथा अन्य संस्थाओं को दिये। उनका जन्म ई.1894 में पिलानी में हुआ। बिड़लाजी की पुस्तकों में गांधीजी के साथ पंद्रह दिन, गांधीजी की छत्रछाया में, मार्सेल्स से जिनेवा, हम पराधीन क्यों?, राड़ की जड़ हँसी, रुपये की कहानी, बिखरे विचारों की भरोटी, कृष्णं वंदे जगद्गुरु तथा विद्यार्थी जीवन प्रमुख हैं। उन्होंने पिलानी में अंतर्राष्ट्रीय स्तर के तकनीकी शिक्षण संस्थान की स्थापना की। बिड़लाजी ‘हरिजन सेवक संघ’ के संस्थापकों में से थे। वे स्वतंत्रता संग्राम के दौरान प्रकाशित समाचार पत्र ‘हरिजन’ के संपादक रहे। उन्होंने हिन्दुस्तान टाइम्स प्रकाशन समूह की स्थापना की। भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण से अलंकृत किया। कांग्रेस को स्वतंत्रता संग्राम के लिये तैयार करने, उसे विपुल धन, विचार एवं नैतिक शक्ति उपलब्ध करवाने और कांग्रेस के बड़े नेताओं को प्रश्रय देने में बिड़लाजी का अतुल योगदान था। प्रसिद्ध वैज्ञानिक सी.वी. रमण जिन दिनों अपना शोध कार्य करने के लिये आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे तब बिड़लाजी ने 20 हजार रुपये सी. वी. रमण को प्रयोगशाला की स्थापना के लिये दिये। आगे चलकर सी. वी. रमण को विज्ञान का नोबल पुरस्कार प्राप्त हुआ।

    11. प्रश्न - जगजीत सिंह

    उतर- जगजीतसिंह का वास्तविक नाम जगमोहनसिंह था। उनका जन्म 8 फरवरी 1941 को श्रीगंगानगर कस्बे के सिख परिवार में हुआ। अपनी पत्री चित्रा के साथ उन्होंने सत्तर तथा अस्सी के दशक में गज़ल गायकी की विधा को फिर से जीवित कर दिया था। ई.1976 में जगजीतसिंह तथा चित्रासिंह का पहला सम्मिलित एलबम अनफॉरगेटेबल्स जारी हुआ। इस एलबम से उन्हें अप्रत्याशित प्रसिद्धि मिली। जगजीतसिंह ग़ज़ल गायन, भक्ति संगीत गायन, लोक गीत गायन तथा शास्त्रीय गायन में निष्णात थे। म्यूजिक कम्पोजर, गायक, संगीत निर्देशक तथा सामाजिक कार्यकर्त्ता के रूप में उन्होंने अनुपम सेवाएं प्रदान कीं। जगजीतसिंह ने प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के लिखे गीतों को दो एलबमों- नई दिशा (1999) तथा संवेदना (2002) में गाया। वर्ष 1998 में उन्हें मिर्जा गालिब के साहित्य को लोकप्रिय बनाने के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया। मध्यप्रदेश सरकार ने उन्हें लता मंगेशकर पुरस्कार दिया। 2003 में भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्मभूषण से अलंकृत किया गया। वर्ष 2005 में उन्हें गालिब अकादमी दिल्ली द्वारा पुरस्कृत किया गया। 10 अक्टूबर 2011 को 70 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। राजस्थान सरकार ने 2012 में इन्हें राजस्थान रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया।

    12. प्रश्न - जमनालाल बजाज

    उतर- जमनालाल बजाज का जन्म ई.1889 में सीकर जिले के कासी रो वास में हुआ। उन्होंने पाँच वर्ष की आयु में ही कमाना आरंभ कर दिया था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा वर्धा में हुई। अत्यल्प शिक्षित होने पर भी वे शीघ्र ही देश के अग्रणी उद्योगपतियों में गिने जाने लगे। 18 वर्ष की आयु में अंग्रेज सरकार ने उन्हें ऑनरेरी मजिस्ट्रेट नियुक्त किया। ई.1915 में गांधीजी से मिलने के बाद बजाज ने देश के स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाने का निर्णय लिया तथा अपना पूरा समय तथा सम्पूर्ण सम्पत्ति गांधीजी को समर्पित कर दी। गांधीजी ने उन्हें अपना पाँचवा पुत्र कहाँ। 1917 में अंग्रेज सरकार ने बजाज को राय बहादुर की उपाधि दी। 1920 में वे नागपुर में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष चुने गये। 1924 में वे अपना सारा काम त्यागकर गांधीजी की निजी सेवा में लग गये। 1937 में वे मद्रास हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष चुने गये। 1938 में वे जयपुर प्रजामंडल के अध्यक्ष बने। 1942 में उन्हें गौ सेवा संघ का अध्यक्ष बनाया गया। उसी वर्ष उनका निधन हुआ। वे गांधी पुस्तक भण्डार तथा सस्ता साहित्य मण्डल अजमेर के अध्यक्ष रहे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कई बार जेल गये। बाल गंगाधर तिलक, सुभाष चंद्र बोस तथा लाला लाजपतराय जैसे दिग्गज नेताओं द्वारा गांधीजी की नीतियों को पसंद न किये जाने के उपरांत भी यदि गांधीजी भारतीय राजनीति में आमरण शीर्ष पर बने रहे तो उसका श्रेय देश के दो बड़े उद्योगपतियों- जमनालाल बजाज तथा घनश्यामदास बिड़ला को जाता है। इन दोनों उद्योगपतियों के सहयोग से कांग्रेस को राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन चलाने के लिये पूरे भारत से अग्रवाल एवं माहेश्वरी वैश्य जातियों से करोड़ों रुपये मिले।

    13. प्रश्न - सेठ जयदयाल गोयन्दका

    उतर- सेठ जयदयाल गोयन्दका अपने युग की महान विभूतियों में से थे। उनका जन्म ई.1885 में हुआ था। एक बार सेठजी ने जनसाधारण में वितरण के उद्देश्य से श्रीमद् भगवत््गीता की पाँच हजार प्रतियां मुद्रित करवायीं। मुद्रण की अशुद्धियां देखकर सेठजी का मन बड़ा खिन्न हुआ। उन्होंने गीताजी की प्रतियां फिर से मुद्रित करवायीं किंतु लाख प्रयास करने पर भी मुद्रण की अशुद्धियां रह गयीं। सेठजी ने प्रण लिया कि वे भारतीय जनता को अशुद्धि रहित सत् साहित्य उपलब्ध करवायेंगे। उन्होंने 1923 में गोरखपुर में गीता प्रेस की स्थापना की। सेठ जयदयाल गोयन्दका ने भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार के सहयोग से राम चरित मानस, गोस्वामी तुलसीदास कृत समस्त साहित्य, उपनिषद, पुराण एवं प्रचुर अध्यात्मिक साहित्य का प्रकाशन करवाया। भारत की सर्वाधिक पठित कल्याण पत्रिका भी इसी संस्थान से प्रकाशित हुई। सेठजी ने श्रीमद्भगवत् गीता की टीका लिखी जो गीता तत्व विवेचनी के नाम से भी जानी जाती है। सेठजी द्वारा लिखित समस्त अध्यात्मिक सामग्री लगभग 50 पुस्तकों में संग्रहीत है।

    14. प्रश्न - जॉर्ज ग्रियर्सन

    उतर- ये प्रसिद्ध अंग्रेज भारतीय भाषाविद् थे। इन्होंने ‘लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया’ नामक ग्रंथ लिखा जिसमें भारतीय भाषाओं का विस्तृत सर्वेक्षण किया गया था। उन्होंने ‘मॉडर्न वर्नाकुलर लिट्रेचर ऑफ नॉर्थ इण्डिया’ नामक ग्रंथ लिखा। ये एशियाटिक सोसायटी ऑफ कलकत्ता से सम्बद्ध थे। जॉर्ज ने डॉ. तैस्सितोरी की प्रतिभा को पहचान कर ब्रिटिश सरकार को लिखा कि उन्हें एशियाटिक सोसायटी में नियुक्त करके राजस्थान में डिंगल साहित्य शोध का काम सौंपा जाये। ग्रियर्सन पहले व्यक्ति थे जिन्होंने राजस्थान की बोलियों का वैज्ञानिक अध्ययन किया।

    15. प्रश्न - मुनि जिन विजय

    उतर- इनका जन्म मेवाड़ रियासत के रूपाहेली गाँव में ई.1888 में हुआ। इनका बचपन का नाम रिणमल परमार था। वे 15 वर्ष की आयु में जैन धर्म में दीक्षित हुए। उन्हें तीन वर्ष तक सूत्र और आगम पढ़ाये गये। उसके बाद उन्होंने संस्कृत की व्याकरण और छंदों का ज्ञान प्राप्त करने के लिये जैन धर्म त्याग दिया और भाग खड़े हुए। अंत में पाली में वे फिर से सुंदरविजय के सम्पर्क में आये और पुनः जैन धर्म में दीक्षित हुए। इस बार उनका नाम जिन विजय रखा गया। उन्होंने कुमार पाल प्रतिबोध नामक ग्रंथ का संपादन किया। लोकमान्य तिलक के सम्पर्क से उन पर देशभक्ति का रंग चढ़ा तथा उन्होंने जैन साहित्य संशोधक समिति की स्थापना की, एक त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन किया और एक ग्रंथ माला भी प्रकाशित करवायी। गांधीजी के आदेश से गुजरात पुरातत्व मंदिर के निदेशक बने। जर्मनी जाकर वहाँ उन्होंने इण्डो जर्मन केन्द्र की स्थापना की। वापस आकर दाण्डी कूच में भाग लिया। छः माह जेल में भी रहे। इसके बाद वे बम्बई में भारतीय विद्या भवन के संचालक बने। ई.1942 में उन्होंने जैसलमेर आकर 200 ग्रंथों की प्रतिलिपियां तैयार करवाईं। ई.1950 में उनके निर्देशन में राजस्थान पुरातत्व मंदिर की स्थापना की गयी। उनके द्वारा लिखित लेखों औरग्रंथो की संख्या सैंकड़ों में है। राजस्थान सरकार ने उन्हें पुरातत्व विभाग का निदेशक बनाया। ई.1976 में उनका निधन हुआ। 16. प्रश्न - डूंगजी-जवारजी

    उतर- 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में शेखावाटी क्षेत्र के ये काका-भतीजा प्रसिद्ध देशभक्त हुए। डूंगजी शेखावाटी ब्रिगेड में रिसालेदार थे। बाद में वे नौकरी छोड़कर धनी लोगों से देश की आजादी के लिये धन मांगने लगे और धन नहीं मिलने पर उनके यहाँ डाका डालने लगे। इस धन से वे निर्धन व्यक्तियों की भी सहायता करते। इन दोनों ने अपने साथियों की सहायता से कई बार अंग्रेज छावनियों को भी लूटा। डूंगजी के साले भैंरूसिंह ने डूंगजी को भोजन पर अपने यहाँ बुलवाया और वहाँ अत्यधिक शराब पिलाकर उन्हें पकड़वा दिया। अंग्रेजों ने उन्हें आगरा के दुर्ग में बंद कर दिया। डूंगजी की पत्नी की फटकार से जवारजी ने उन्हें छुड़वाने की प्रतिज्ञा की। लोटिया जाट अपनी वीरता और बुद्धिमत्ता से डूंगजी को छुड़वाकर लाया। बीकानेर के पास घड़सीसर में अंग्रेजी फौज ने बीकानेर और जोधपुर राज्य की फौजों के साथ मिलकर डूंगजी-जवारजी को घेर लिया। जवारजी भागकर बीकानेर रियासत के खैरखट्टा पहुंच गये जहाँ महाराजा रतनसिंह ने उन्हें प्रेम पूर्वक रखा। डूंगजी जैसलमेर में गिरदड़ा की काकीमैडी पहुंच गये जहाँ जोधपुर की सेना ने उन्हें छलपूर्वक कैद करके अंग्रेज सेना को सौंप दिया। इससे लोगों में असंतोष की ज्वाला भड़क उठी। अंग्रेजों ने डूंगजी को वापस जोधपुर राज्य की सेना को सौंप दिया। जोधपुर दुर्ग में ही डूंगजी का निधन हुआ। गाँव-गाँव में भोपे डूंगजी के नाम का गीत गाते थे- भला भला रा टूक उड़ावे लड़े डूंगजी न्हार। लोटिया जाट, करणियो मीणो, वध वध वावे तरवार।। तोड़ आगरो बाहर निसरया, बोल्या जै जै कार। राम दुहाई फिरी किले में, रोकणियो कोई नायं।।

    17. प्रश्न - दयाराम साहनी

    उतर- ये स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व जयपुर रियासत में पुरातत्व विभाग के निदेशक थे। इन्होंने जयपुर रियासत के विविधि स्थलों का सर्वेक्षण करके पुरातात्विक महत्व के स्थलों की खोज की तथा पुरा सामग्री जुटाई जिससे जयपुर रियासत के इतिहास लेखन के लिये विश्वसनीय जानकारी एवं प्रमाण उपलब्ध हो सकी।

    18. प्रश्न - देवीलाल सामर

    उतर- इनका जन्म ई.1911 में उदयपुर में हुआ। इन्होंने मात्र 11 वर्ष की आयु में वीर अभिमन्यु नाटक में अभिमन्यु का जोरदार अभिनय किया जिससे इन्हें मदनमोहन मालवीय पुरस्कार मिला। इन्होंने हिन्दी की समस्त विधाओं में लेखन किया। ये विद्याभवन उदयपुर में 21 वर्ष तक शिक्षक रहे। इन्होंने भारतीय लोक कला मण्डल की स्थापना की। इन्हे रूमानिया तथा ट्यूनीशिया में भी पुरस्कृत किया गया। राजस्थान संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष रहे। भारत सरकार ने इन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया। ई.1982 में मुम्बई में इनका निधन हुआ।

    19. प्रश्न - दौलतसिंह कोठारी

    उतर- इस प्रतिभाशाली वैज्ञानिक का जन्म ई.1906 में उदयपुर में हुआ। आप डॉ.मेघनाद साहा के प्रिय शिष्यों में से थे। वे दिल्ली विश्वविद्यालय में भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर रहे। उन्होंने श्वेत वामन, सितारों तथा अणुओं की आयनीकरण प्रक्रिया पर कार्य किया। पं.नेहरू ने उन्हें रक्षा मंत्रालय का सलाहकार बनाया। 1964 से 1966 तक शिक्षा आयोग के अध्यक्ष रहे। भारतीय विज्ञान कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण तथा पद्म विभूषण से अलंकृत किया। ई.1993 में उनका निधन हो गया।

    20. प्रश्न - नगेन्द्र सिंह

    उतर- डूंगरपुर राजपरिवार के सदस्य नगेन्द्र सिंह का जन्म ई.1914 में तथा निधन ई.1988 में हॉलैण्ड में हुआ। ये पहले भारतीय थे जिन्हें अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय हेग में जज बनाया गया। वे अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश भी रहे। इन्होंने कानून के कई ग्रंथ लिखे।

    21. प्रश्न - नारायण सिंह

    उतर- माणकलाव ये अफीम नशा मुक्ति कार्यक्रम के लिये प्रसिद्ध हुए। जब ये माणकलाव गांव के सरपंच बने तो राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने उनके गांव में अत्योंदय योजना का शुभारम्भ किया। वर्ष 1992 में इन्होंने जोधपुर के निकट माणकलाव गांव में सुचेता कृपलानी शिक्षा निकेतन को पुनः आरंभ किया तथा पोलियोग्रस्त बच्चों की सेवा करने लगे। वर्ष 2003 में उन्हें राष्ट्रपति ने राज्यसभा में सांसद मनोनीत किया।

    22. प्रश्न - डॉ. पी. के. सेठी

    उतर- इन्हें जयपुर फुट के जनक के रूप में जाना जाता है। इस कार्य के लिये उन्हें रमन मैगसेसे पुरस्कार, डॉ. बी.सी. रॉय पुरस्कार, पद्मश्री सम्मान, रोटरी इंटरनेशनल अवार्ड फॉर वर्ल्ड अण्डरस्टेण्डिंग एण्ड पीस जैसे पुरस्कार प्राप्त हुए थे।

    23. प्रश्न - पण्डित भरत व्यास

    उतर- भरत व्यास का जन्म 1917 में बीकानेर में हुआ। छायावादी कविता की सुसंस्कृत शब्दावली को चलचित्र के गीतों में ढालने का श्रेय भारत के तीन कवियों- पं. भरत व्यास, पं. नरेन्द्र शर्मा तथा प्रदीप को जाता है। भरत व्यास ने अपने गीतों में आध्यात्मिक भावों को पिरोया। उन्होंने 100 से भी अधिक चलचित्रों के लिये गीत लिखे जिनमें रामराज्य, दो आँखें बारह हाथ, परिणिता, चैतन्य महाप्रभु, तूफान और दिया, नवरंग, जन्माष्टमी, भोलाशंकर, रिमझिम, राज मुकुट, रानी रूपमती तथा कवि कालिदास प्रमुख हैं। उनका निधन 64 वर्ष की आयु में ई.1982 में बम्बई में हुआ।

    24. प्रश्न - बिशनसिंह शेखावत

    उतर- पत्रकारिता के क्षेत्र में ख्याति प्राप्त व्यक्ति। इन्होंने राजस्थान पत्रिका में ‘आओ गाँव चलें’ स्तंभ लिखा। ये कर्मचारी नेता भी रहे।

    25. प्रश्न - सेठ मंगनीराम बांगड़

    उतर- सेठ रामप्रसाद बांगड़ के पुत्र मंगनीराम बांगड़ का जन्म ई.1875 में नागौर जिले के डीडवाना कस्बे में हुआ। इन्होंने कलकत्ता जाकर अपना व्यापार जमाया और विशाल धन अर्जित कर उसे जन सामान्य के हितार्थ व्यय किया। इन्होंने कई मंदिर, प्याऊ, धर्मशालाएं एवं विद्यालयों की स्थापना की। वि.सं. 2007 में इस महापुरुष का निधन हो गया।

    26. प्रश्न - राज्यवर्द्धनसिंह राठौड़

    उतर- बीकानेर के डबल ट्रेप निशानेबाज, राष्ट्रमण्डल खेल (मेनचेस्टर) में दो स्वर्ण पदक एवं एथेन्स ओलम्पिक 2004 में रजत पदक जीता। राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित।

    27. प्रश्न - लक्ष्मी निवास मित्तल

    उतर- चूरू के रहने वाले स्टील किंग लक्ष्मी निवास मित्तल ब्रिटेन के सबसे अमीर आदमी हैं। ईस्टर्न आई पत्रिका ने उन्हें वर्ष 2010 में एशिया का सबसे अमीर व्यक्ति घोषित किया। मित्तल की सम्पत्ति 17 अरब पाउण्ड अर्थात् लगभग 1,143 अरब रुपये है। वर्ष 2008 में उन्हें पद्म भूषण दिया गया।

    28. प्रश्न - पं. विश्वमोहन भट्ट

    उतर- पं. विश्वमोहन भट्ट का जन्म 12 जुलाई 1950 को जयपुर में हुआ। उनके पिता मनमोहन भट्ट, माता चंद्रकला भट्ट तथा बड़े भ्राता पं. शशिमोहन भट्ट भी उच्च कोटि के संगीतकार थे। विश्वमोहन ने सितारवादक पं. रविशंकर को अपना गुरु बनाया। 1965 ई. से वे देश-विदेश के संगीत सम्मेलनों में प्रस्तुतियां देने लगे। एक बार वे अमरीका में स्पेनिश गिटार वादक राई कूडर का गिटार वादन सुन रहे थे तो उसमें उन्हें हिन्दुस्तानी राग ‘धानी’ के स्वर सुनाई दिये। भट्ट ने कूडर के साथ प्रयोगात्मक जुगलबंदी की। इस सम्मेलन में श्रीलंका डिस्क निर्माता, कवि चंद्रन एलेक्जेण्डर भी थे। उन्होंने ‘ए मीटिंग बाई दी रीवर’ नाम से इसकी कॉम्पेक्ट डिस्क बनाई। राईकूडर के साथ जुगलबंदी की इस कॉम्पेक्ट डिस्क पर वर्ष 1994 में विश्वमोहन भट्ट को विश्वविख्यात ‘ग्रेमी पुरस्कार’ मिला। विश्वमोहन ने गिटार में सितार, सरोद और वीणा के 14 अतिरिक्त तारों के सटीक और अद्भुत मुहावरों का समन्वय करके ‘मोहनवीणा’ बनाई। उन्होंने विश्व वीणा का भी निर्माण किया है। पं.विश्वमोहन भट्ट ने राग ‘गौरीम्मा’ का सृजन किया। राजस्थान सरकार ने 2012 में इन्हें राजस्थान रत्न पुरस्कार दिया।

    29. प्रश्न - हनुमान प्रसाद पोद्दार

    उतर- आधुनिक भारत के महान निर्माता हनुमान प्रसाद पोद्दार का जन्म 17 सितम्बर 1892 को वैश्यों में अग्रगण्य अग्रवाल जाति के बंसल गोत्र में हुआ था। वे देश के एक मात्र ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने भारत रत्न लेने से मना कर दिया। उनके पिता भीमराज रतनगढ़ के रहने वाले थे तथा कलकत्ता मैं जाकर व्यापार करते थे। हनुमान प्रसादजी का पहला लेख ई.1911 में मर्यादा मासिक में ‘मातृभूमि की पूजा’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। उनके 114 पदों का पहला संग्रह ‘पत्र पुष्प’ शीर्षक से ई.1923 में प्रकाशित हुआ। उनके द्वारा रचित 15 हजार पृष्ठों का साहित्य 86 पुस्तकों में प्रकाशित हुआ है जो हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि है। उन्होंने गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘कल्याण’ का संपादन किया। उनके जीवन काल में कल्याण के 44 विशेषांक निकले जो हिन्दू धर्म का विश्वकोष कहलाते हैं। उन्होंने सैंकड़ों संस्कृत ग्रंथों एवं रचनाओं का हिन्दी अनुवाद किया। गोस्वामी तुलसीदास के सम्पूर्ण वांगमय की टीका लिखी एवं उनका संपादन करके प्रकाशति करवाया। उनके द्वारा संपादित तुलसीकृत रामचरित मानस सबसे पहले कल्याण में विशेषांक के रूप में प्रकाशित हुई थी। भारत पर चीनी आक्रमण के समय उन्होंने ‘चीन दमन की साधना और सिद्धि’ नामक कविता लिखी। स्त्री धर्म प्रश्नोत्तरी उनकी प्रसिद्ध पुस्तकों में से है। पोद्दारजी के निधन के बाद उनकी सम्पूर्ण पद्य रचनाओं का संग्रह पद रत्नाकर नाम से प्रकाशित हुआ जिसमें 1557 पद हैं। मानव कल्याण के लिये उन्होंने कई लाख रुपयों का कोष एकत्र कर उसे अकाल पीड़ित क्षेत्रों में बांटा। सुप्रसिद्ध साहित्यकार यशपाल ने लिखा है कि पोद्दारजी ने 600 ग्रंथ लिखे और 1600 पदों की रचना की। 22 मार्च 1971 को उनका निधन हुआ।

    30. प्रश्न - घनश्याम दास बिड़ला

    उतर- प्रख्यात उद्योगपति।

    31. प्रश्न - माणिक्यलाल वर्मा

    उतर- राज्य के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी, प्रजामंडल आंदोलन के नेता, 1948 में गठित संयुक्त राजस्थान के प्रधानमंत्री।

    32. प्रश्न -मोहनसिंह मेहता

    उतर- प्रख्यात शिक्षा शास्त्री, सेवा मंदिर उदयपुर के संस्थापक।

    33. प्रश्न -नगेन्द्रसिंह

    उतर- विख्यात न्यायविद्, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के पूर्व अध्यक्ष।

    34. प्रश्न -कालूलाल श्रीमाली

    उतर- प्रमुख शिक्षा शास्त्री, पूर्व केन्द्रीय शिक्षा मंत्री।

    35. प्रश्न -जगत सिंह मेहता

    उतर- पद्मभूषण, उदयपुर निवासी, ई.1976-79 तक विदेश सचिव रहे।

    36. प्रश्न -कंवरसेन

    उतर- विख्यात अभियंता, इंदिरा गांधी नहर के योजनाकार।

    37. प्रश्न -राव राजा हणूतसिंह

    उतर- प्रसिद्ध पोलो खिलाड़ी।

    38. प्रश्न -ले. जन. सगतसिंह

    उतर- बांग्ला देश की आजादी में प्रमुख भूमिका निभाने के लिये।

    39. प्रश्न -श्रीमती रतन शास्त्री

    उतर- महिला शिक्षा में योगदान, वनस्थली विद्यापीठ की संस्थापक अध्यक्ष, प्रदेश के पहले मुख्य मंत्री हीरालाल शास्त्री की धर्मपत्नी। पद्म पुरस्कार पाने वाली राज्य की पहली महिला।

    40. प्रश्न -भोगी लाल पंड्या

    उतर- प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी, आदिवासी नेता, राज्य के पूर्व मंत्री।

    41. प्रश्न -झाबरमल्ल शर्मा

    उतर- राजस्थान में पत्रकारिता के पितामह।

    42. प्रश्न -टी. एन. चतुर्वेदी

    उतर- भारत के पूर्व महालेखा नियंत्रक।

    43. प्रश्न -राम नारायण शर्मा

    उतर- विख्यात सारंगी वादक।

    44. प्रश्न -नटवर सिंह

    उतर- भरतपुर निवासी, पूर्व राजनयिक, पूर्व केन्द्रीय मंत्री।

    45. प्रश्न -लक्ष्मीमल सिंघवी

    उतर- विख्यात विधिवेत्ता, सांसद एवं ब्रिटेन में हाईकमिश्नर।

    46. प्रश्न -रामनारायण अग्रवाल

    उतर- अग्नि मिसाइल प्रक्षेपण में महत्त्वपूर्ण भूमिका।

    47. प्रश्न -राहुल बजाज सेठ

    उतर- जमनालाल बजाज के पौत्र, प्रमुख उद्योगपति।

    48. प्रश्न -जसदेव सिंह

    उतर- क्रिकेट कमण्ट्रेटर।

    49. प्रश्न -डी. आर. मेहता

    उतर- जोधपुर निवासी, समाज सेवा में उल्लेखनीय योगदान।

    50. प्रश्न -रहीम डागर

    उतर- कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान।

    51. प्रश्न -उस्ताद सुल्तानखां

    उतर- सारंगीवादन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान।

    52. प्रश्न -भगवतसिंह मेहता

    उतर- लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण योजना के सूत्रधार।

    53. प्रश्न -देवीलाल सामर

    उतर- भारतीय लोक कला मण्डल उदयपुर के संस्थापक निदेशक।

    54. प्रश्न -खेलशंकर

    उतर- दुर्लभजी रत्न व्यवसायी और समाज सेवी।

    55. प्रश्न -पं. रामनारायण

    उतर- विख्यात सारंगी वादक।

    56. प्रश्न -कृपालसिंह शेखावत

    उतर- प्रमुख ब्लू पॉटरी चित्रकार।

    57. प्रश्न -सीताराम लालस

    उतर- राजस्थानी शब्द कोश के निर्माता।

    58. श्रीमती अल्ला जिलाई बाई

    उतर- प्रमुख मांड गायिका।

    59. प्रश्न - गुरु हनुमान चिड़ावा  निवासी

    उतर-  भारतीय कुश्ती जगत के पितामह।

    60. प्रश्न - रामगोपाल विजयवर्गीय

    उतर- अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त चित्रकार।

    61. प्रश्न - लक्ष्मीकुमारी चूण्डावत

    उतर- राजस्थानी भाषा में साहित्य लेखन।

    62. प्रश्न - जसदेवसिंह

    उतर- खेल कमंट्रेटर।

    63. प्रश्न - हिसामुद्दीन उस्ता

    उतर- ऊंट की खाल पर सोने की नक्काशी।

    64. प्रश्न - रामनारायण अग्रवाल

    उतर- देश के प्रथम लम्बी दूरी के प्रक्षेपास्त्र ‘अग्नि’ के निर्माता।

    65. प्रश्न - पं. दुर्गालाल

    उतर- जयपुर शैली के कत्थक कलाकार।

    66. प्रश्न - पुरुषोत्तम नाथद्वारा निवासी

    उतर- विख्यात पखावज वादक।

    67. प्रश्न - कैलाश सांखला

    उतर- वन्य जीव विशेषज्ञ।

    68. प्रश्न - सुधीर तैलंग

    उतर- कार्टूनिस्ट।

    69. प्रश्न - विजयदान देथा

    उतर- लोककथा संग्रहण एवं लेखन।

    70. प्रश्न - वसीफुद्दीन डागर

    उतर- धु्रपद गायकी।

    71. प्रश्न - कृष्णा पूनिया

    उतर- कॉमनवैल्थ गेम्स में डिस्क्स थ्रो में गोल्ड मेडल।

    72. प्रश्न - इरफान खान

    उतर- सिनेमा।

    73. प्रश्न - साकरखां

    उतर- कमायचा वादन।

    74. प्रश्न - डॉ. अशोक

    उतर- पानगड़िया चिकित्सा।

    75. प्रश्न - मोइनुद्दीन खां

    उतर- सारंगीवादन।

    76. प्रश्न - जगजीतसिंह

    उतर- गजल गायक।

    77. प्रश्न - हसरत

    उतर- जयपुरी सिनेमा एवं साहित्य।

    78. प्रश्न - गवरी देवी

    उतर- लोक गायिका।

    79. प्रश्न - बसंत काबरा

    उतर- सरोद वादन।

    80. प्रश्न - गाजी खां

    उतर- मांगणियार लोक संगीत।

    81. प्रश्न - मेहरद्दीन लंगा

    उतर- लोकवाद्य वादन।

    82. प्रश्न - मांगीबाई तेरहताली

    उतर- लोकनृत्य।

    83. प्रश्न - नेहा भटनागर एवं दीपिका राठौड़

    उतर- माउण्टेनियरिंग (एवरेस्ट पर चढ़ने में सफल)

    84. प्रश्न - फरीदुद्दीन डागर धु्रवपद

    उतर- गायक, उदयपुर निवासी।

    85. प्रश्न - लक्ष्मणसिंह सोढ़ा

    उतर- 1962-65 तक पाकिस्तानी प्रधानमंत्री मोहम्मद अयूब के मंत्रिमण्डल में रेलमंत्री रहे। पाकिस्तान से विस्थापित होकर भारत आये तथा चोहटन पंचायत समिति के प्रधान रहे।

    86. प्रश्न - वाई.डी. सिंह

    उतर- वन्यजीव विशेषज्ञ एवं जोधपुर जंतुआलय के पूर्व अधीक्षक, राज्य पक्षी गोडावण के संरक्षण पर कार्य किया। वन्यजीवों, जलस्रोतों एवं पर्यावरण पर कई पुस्तकें लिखीं।

    87. प्रश्न - सुल्तान खाँ सारंगी वादक,

    उतर- जोधपुर निवासी, पद्मभूषण।

    88. प्रश्न - कानसिंह परिहार

    उतर- राजस्थान उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश, 1977 में इमरजेंसी एक्सेस कमीशन के चेयरमैन रहे।

    89. प्रश्न - जगमोहन मूंदड़ा

    उतर- सामाजिक विषयों पर सिनेमा बनाने वाले निर्देशक जगमोहन मूंदड़ा बीकानेर के मारवाड़ी परिवार से थे। उन्होंने बवण्डर एवं प्रोवोक्ड फिल्मों का निर्देशन किया था।

    90. प्रश्न - फहीमुद्दीन डागर

    उतर- धु्रवपद गायक।

    91. प्रश्न - मणिकौल

    उतर- जोधपुर निवासी, फिल्म निर्देशक। उसकी रोटी, आषाढ़ का एक दिन, सतह से उठता आदमी आदि यथार्थ परक फिल्में निर्देशित।

    92. प्रश्न - महाराजा भवानीसिंह

    उतर- जयपुर के पूर्व महाराजा। 1971 के भारत-पाक युद्ध में उन्होंने छाछरो एवं वीरवाह चौकी पर पैराशूट टुकड़ी का नेतृत्व किया। महावीर चक्र विजेता। 1993 से 1997 तक ब्रुनेई में भारत के हाई कमिश्नर रहे। पोलो के अच्छे खिलाड़ी थे।

    93. प्रश्न - सेठना

    उतर- परमाणु वैज्ञानिक। 6 सितम्बर 2010 के पोकरण-1 के सूत्रधार। 1974 में पोकरण में किये गये परमाणु परीक्षण स्माइलिंग बुद्धा के परीक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

    94. प्रश्न - नगेन्द्र बाला स्वतंत्रता सेनानी,

    उतर- पूर्व विधायक, ठाकुर केसरीसिंह की पौत्री थीं।


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