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  • अध्याय - 14 राजकीय संग्रहालय आहाड़

     19.05.2020
    अध्याय - 14 राजकीय संग्रहालय आहाड़

     अध्याय - 14 राजकीय संग्रहालय, आहाड़

    उदयपुर नगर के प्रताप नगर रेलवे स्टेशन को जाने वाली सड़क के समीप आहाड़ नदी के उत्तर पूर्वी किनारे पर एक प्राचीन टीला है जिसे धूलकोट के नाम से जाना जाता है। किसी समय यह टीला आयड़ नदी के बाएं किनारे पर बसा हुआ था। यही नदी आगे चलकर बेड़च कहलाती है। राजस्थान में बेड़च, बनास एवं चम्बल के कांठे में ऐसे कई टीले प्रकाश में आए हैं जहाँ से सिन्धु सभ्यता के बाद की ‘ग्रे वेयर’ वाली सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं। चूंकि इस सभ्यता के लोग ताम्बे एवं पत्थरों के उपकरणों एवं औजारों का प्रयोग करते थे इसलिए इस सभ्यता को पुरातत्व जगत में ‘ताम्र पाषाण’ संस्कृति के नाम से जाना जाता है।

    राजस्थान में इसका प्रमुख केन्द्र ‘आहाड़’ माना गया है। यह सभ्यता ईसा से चार हजार साल पहले से लेकर ईसा से दो हजार साल पहले तक अस्तित्व में रही। उदयपुर, डूंगरपुर, चित्तौड़गढ़ भीलवाड़ा, अजमेर, कोटा एवं बूंदी जिलों में इस संस्कृति के एक सौ से अधिक गांव खोजे जा चुके हैं।

    इस नगर को प्राचीन शिलालेखों में ताम्बावती नगर, मध्यकालीन शिलालेखों में आघाटपुर और वर्तमान में आहाड़ या आयड़ कहा जाता है। वर्तमान आयड़ ग्राम भी एक प्राचीन टीले पर बसा हुआ है। इस टीले की सर्वप्रथम खुदाई मेवाड़ रियासत के पुरातत्व विभाग के तत्कालीन अध्यक्ष श्री अक्षय कीर्ति व्यास ने बहुत सीमित क्षेत्र में की थी। इसके पश्चात् ई.1954-55 में श्री रत्नचन्द्र अग्रवाल ने राजस्थान सरकार की ओर से उत्खनन कार्य किया। ई.1960-61 में राजस्थान सरकार के पुरातत्व विभाग, डेक्क्न कॉलेज पुणे एवं मेलबॉर्न विश्वविद्यालय ऑस्ट्रेलिया के संयुक्त दल ने इस टीले का उत्खनन किया। इस खुदाई का नेतृत्व डा. एच. डी. सांकलिया ने किया। इस टीले की खुदाई से जो सामग्री प्राप्त हुई उसके प्रदर्शन के लिए इसी टीले के निकट आहाड़ संग्रहालय की स्थापना की गई है।

    आहाड़ टीले से प्राप्त चार हजार वर्ष पुरानी सभ्यता को आहाड़ सभ्यता कहा जाता है। इसमें चित्रित लाल, काले मृद-पात्रों का उपयोग करने वाली सभ्यता के अवशेष मिले हैं। यह ताम्र-पाषाण युगीन सभ्यता है। यहाँ से चौकोर एवं आयताकार मकानों के अवशेष मिले हैं। उस काल में हड़प्पा सभ्यता के अतिरिक्त केवल आहाड़ सभ्यता के लोग ही पक्की दीवारें एवं पक्के घरों का उपयोग कर रहे थे। आहाड़, बालाथल एवं गिलूण्ड में इसके प्रमाण देखे जा सकते हैं। आहाड़ संस्कृति की पहचान मुख्य रूप से विशिष्ट प्रकार के मिट्टी के बर्तनों से होती है।

    इस टीले से सफेद रंग के चित्रित काले एवं लाल बर्तन, चमकीले लाल, राखिया, दूधिया रंग वाले, टैन पॉलिश युक्त, रिजर्व स्लिप्ड वाले बर्तन मिले हैं। इनमें से टैन पॉलिश तथा थिन रैड स्लिप वाले बर्तन आहाड़ सभ्यता के प्रारम्भिक चरण में नहीं मिले हैं, वे आहाड़ संस्कृति के समृद्ध चरण में प्रयुक्त होते थे। आहाड़ टीले के सबसे नीचे के स्तर से हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो के विशिष्ट आकृति वाले डिशऑन स्टेण्ड (मृदपात्र) मिले हैं जो इसी संग्रहालय की दीर्घा में प्रदर्शित हैं। इन मृदपात्रों के यहाँ मिलने से यह स्पष्ट हो जाता है कि आज से चार हजार वर्ष पूर्व अर्थात सिन्धु सभ्यता के अंतिम चरण में सिन्धु सभ्यता का मेवाड़ में प्रवेश हो चुका था। यद्यपि उस समय आहाड़ में काले-लाल रंग के मृद-भाण्डों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग हो रहा था।

    सिन्धु मृद-भाण्ड कला के सम्पर्क का प्रभाव यहाँ तक पहुँचा कि काली-लाल मृद्भाण्ड कला में भी ‘डिश-ऑन स्टैण्ड’ का अनुकरण किया जाने लगा। इस प्रकार की महत्वपूर्ण सामग्री ‘माहेश्वर-नवदाटोली’ के टीलों की खुदाई से भी मिली है। आहाड़ एवं माहेश्वर ‘काली एवं लाल मृदभाण्ड संस्कृति’ के प्रमुख केन्द्र थे। आहाड़ के काले-लाल धरातल वाले चमकीले बर्तनों पर सफेद मांडने बने हुए हैं जो हजारों वर्षों के बाद भी नष्ट नहीं हुए हैं। ये बर्तन सबसे नीचे के स्तर से ऊपर की ओर 20 फुट के जमाव तक मिले हैं। रतलाम से कोटा जाने वाले मार्ग पर स्थित नागदा नामक स्थान की खुदाई में भी काले-लाल मृद्भाण्ड पर्याप्त मात्रा में मिले हैं। आहाड़ के समीपवर्ती क्षेत्र में ‘गिलूण्ड’ नामक स्थान से प्लास्टर युक्त कच्ची दीवारों के बनाने की जानकारी भी मिली है।

    सौराष्ट्र में ‘रोजड़ी’ नामक स्थल से भी इस प्रकार के प्रमाण मिले हैं। इस काल की सभ्यता का प्रमुख केन्द्र आहाड़ ही था। आहाड़ की खुदाई से चार हजार वर्ष पुरानी संस्कृति पर पर्याप्त प्रकाश पड़ा है। इस काल में कच्ची ईटों के मकान का निर्माण करते थे। कुछ घरों के अवशेष खाइयों (ट्रेंचेज) में विद्यमान हैं जिनका आकार 23 गुणा 15 फुट तथा 9 गुणा 9 फुट है। उनमें कच्ची छतों के नीचे बांस के प्रयोग का भी पता चला है। इन छतों को लकड़ी की बल्लियों द्वारा उठा कर रखा जाता था जो नीचे कच्चे फर्श में गाड़ दी जाती थीं।

    आहाड़ के प्राचीन निवासी अपने घरों का गन्दा पानी निकालने की वैज्ञानिक पद्धति से भी परिचित थे। इसके लिए 15 गुणा 20 फुट के गड्ढे़ खोद कर उसमें पकाई हुई मिट्टी के घेरे एक दूसरे के ऊपर रखकर (रिंग वैल) बना लिए जाते थे और उनमें गन्दा पानी गिरता था। इसका एक नमूना पुरा स्थल पर संरक्षित है। आहाड़ में ऐतिहासिक युग की बसावट का जमाव ताम्रपाषाण काल की तुलना में छोटा है। इस काल में भी लोगों ने मिट्टी, पत्थर तथा ईंटों से चौकोर भवन बनाए।

    इस काल के मिट्टी के बर्तन लाल तथा राखिया प्रकार के हैं। उत्खनन में अनेक छोटी वस्तुओं यथा मिट्टी के मणके, झांवे, चूड़ियां, गोफण, घोड़े, हाथी तथा लोहे के औजार यथा कुल्हाड़ी, छैनी, भाले, तीन हल का फाल, कीलें, कांच की चूड़ियां आदि खोजे गए।

    आहाड़ संग्रहालय में तीन दीर्घाएँ हैं। प्रथम दीर्घा में काले चित्रित धूसर मृदपात्र, काले और लाल मृदपात्र, चमकीले लाल रंग के मृदपात्र एवं कुषाण-कालीन मृदपात्र रखे हैं जिनमें लाल टोंटीदार लोटे तथा घड़े इत्यादि सम्मिलित हैं।

    द्वितीय दीर्घा में मणके, मृण-मूर्तियां, धूप-दान, जानवरों के सींग, दीपक, ठप्पे, मोहरें इत्यादि प्रदर्शित हैं।

    तृतीय दीर्घा में आहाड़ क्षेत्र से प्राप्त धातु एवं पाषाण की प्रतिमाएं है। ये प्रतिमाएं सातवीं से पन्द्रहवीं शताब्दी की हैं। इनमें सूर्य, शिव-पार्वती, कच्छपावतार, मत्स्य अवतार और त्रिमुख विष्णु प्रतिमाएं प्रमुख हैं। कच्छप एवं मत्स्यावतार की प्रस्तर प्रतिमाएँ विशेष स्थान रखती हैं। मत्स्य तथा तथा कूर्मावतार को पद्म के ऊपर विग्रह रूप में दर्शाया गया है तथा नीचे विष्णु के आयुध दर्शाए गए हैं। संग्रहालय में प्रदर्शित 8वीं शती ईस्वी की जैन तीर्थंकर की कांस्य प्रतिमा विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-51

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-51

    पर्यावरण के पोषक : तीज-त्यौहार


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    समस्त तीज-त्यौहार ऋतु परिवर्तन एवं प्रकृति में निरंतर आने वाले मौसमी परिवर्तनों से जुड़े हुए हैं। प्रत्येक तीज-त्यौहार के मूल में धार्मिक एवं सामाजिक मान्यताएं हैं, प्रकृति में घट रही घटनाएं हैं, फसलों की बुवाई तथा कटाई जैसी आर्थिक गतिविधियां हैं तो पर्यावरण की सुरक्षा के गहन-गंभीर भाव भी निहित हैं।

    अक्षय तृतीया : यह त्यौहार वैसाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। इस दिन बाजरा, गेंहूं, चना, जौ, तिल आदि सात अन्नों की पूजा की जाती है तथा शीघ्र वर्षा होने की कामना की जाती है। घर के द्वार पर अनाज की बालों के चित्र बनाये जाते हैं।

    निर्जला एकादशी : ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी सर्वाधिक फलदायिनी मानी जाती है। इस दिन व्रत रखने से शेष सभी एकादशियों के व्रत का पुण्य प्राप्त होता है। इस व्रत में जल नहीं पिया जाता है।

    तीज : श्रावण शुक्ला तुतीया को छोटी तीज मनायी जाती है। भाद्रपद की तृतीया को बड़ी तीज कहते हैं। छोटी तीज का महत्व अधिक है। यह त्यौहार ग्रीष्म काल के व्यतीत हो जाने के बाद आने वाला प्रथम त्यौहार है। तीज और गणगौर के बारे में कहा जाता है कि 'तीज त्यौहारां बावड़ी, ले डूबी गणगौर।' अर्थात् तीज अपने साथ त्यौहारों को लेकर आती है और गणगौर अपने साथ त्यौहारों को वापिस ले जाती है। तीज बालिकाओं और सधवा स्त्रियों का त्यौहार है। एक दिन पूर्व बालिकाओं का सिंझारा (शृंगार) किया जाता है। इस सम्बन्ध में एक उक्ति कही जाती है- 'आज सिंझारा तड़के तीज, छोरियां ने लेगी पीर।' विवाहिता स्त्रियाँ एवं कन्याएं हाथ पैरों पर मेंहदी लगाती हैं। विवाहित स्त्रियों के माता-पिता अपनी पुत्री के ससुराल में सिंझारा, वस्त्र आदि भेजते हैं। विवाहिता स्त्रियां इस त्यौहार पर अपने पिता के घर जाती हैं। वे व्रत रखती हैं तथा व्रत में जल भी ग्रहण नहीं करतीं। सायंकाल भगवान शिव एवं पार्वती की पूजा करती हैं तथा रात्रि में चंद्र दर्शन करके भोजन करती हैं। इस त्यौहार पर झूला झलने का विशेष महत्व है। इस दिन किसी सरोवर के पास मेला भरता है। कहीं-कही गणगौर की सवारी भी निकाली जाती है। लोकगीत गाये जाते हैं।

    नाग पंचमी : श्रावण शुक्ला पंचमी को नाग पूजा की जाती है। इस दिन घर के दरवाजों के दोनों ओर गोबर से नाग के चित्र बनाये जाते हैं। सपेरों को दान दिया जाता है।

    रक्षा बंधन : श्रावण मास की पूर्णिमा को रक्षाबंधन का त्यौहार मनाया जाता है। यह मुख्यतः ब्राह्मणों का त्यौहार है। रक्षाबंधन को नया यज्ञोपवीत धारण किया जाता है। इस दिन बहिनें अपने भाईयों को तथा ब्राह्मण अपने यजमानों को राखी बांधते हैं। इसके बदले में समाज अपना कर्तव्य पालन करने तथा अपने आश्रितों की सुरक्षा करने का आश्वासन देता है। इस दिन औरतें अपने घर के दरवाजों के दोनों ओर खड़िया तथा गेरू से राखियां तथा लघु चित्रों का अंकन करती हैं जिन्हें गेरू कहा जाता है। राखी वाले दिन इन चित्रांकनों की पूजा की जाती है।

    ऊभ छट : श्रावण मास में कुंआरी कन्याएं ऊभ छट का त्यौहार मनाती हैं। इस दिन वे व्रत करती हैं तथा सारे दिन खड़ी रहती हैं। रात्रि में वे किसी मंदिर में सम्मिलित प्रार्थना करती हैं तथा रात्रि में चंद्रमा के दर्शन करने के बाद ही भोजन करती हैं।

    हरियाली अमावस्या : श्रावण मास में अमावस्या के दिन हरियाली अमावस्या मनायी जाती है। इस दिन राजस्थान के कुछ हिस्सों में माल पुाए बनाये जाते हैं।

    बच्छबारस : श्रावण मास में द्वादशी के दिन बच्छ बारस मनायी जाती है। इस दिन गायों एवं बछड़ों की पूजा की जाती है तथा उन्हें बाजरी, मोठ व चनों का दलिया खिलाया जाता है।

    जल झूलनी एकादशी : भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जल झूलनी एकादशी मनायी जाती है। इस दिन देव मूर्तियों को पालकियों और विमानों में बैठाकर गाजे बाजे के साथ जलाशय पर ले जाया जाता है तथा स्नान करवाया जाता है।

    गवरी पूजन : भाद्रपद कृष्ण 10 को मेवाड़ क्षेत्र में गवरी पूजन उत्सव आरंभ होता है जो शरद आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की नवमी को समाप्त होता है। इन दिनों में भील जाति के लोग गवरी नृत्य करते हैं।

    गोगानवमी : भाद्रपद माह में नवमी को गोगानवमी मनायी जाती है।

    जन्माष्टमी : भगवान श्रीकृष्ण के जन्म दिवस पर भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को यह त्यौहार मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। हिंदू धर्मावलम्बी इस दिन निराहार रहकर व्रत करते हैं तथा रात्रि में चंद्रोदय तक जागरण करते हैं। लगभग 12 बजे चंद्रमा निकलने पर अर्घ्य देते हैं तथा धनिये का प्रसाद चढ़ाते हैं।

    श्राद्ध पक्ष : भाद्रपद शुक्ला 15 से आश्विन कृष्णा अमावस्या तक श्राद्ध पक्ष मनाया जाता है। हिन्दू धर्म के अनुसार पूर्वजों की मृत्यु के बाद उनकी तिथि के दिन श्राद्ध, तर्पण एवं ब्राह्मण को भोजन करवाया जाता है। इन दिनों में मांस मदिरा का सेवन वर्जित है। कुछ लोग इन दिनों में दाढ़ी एवं बाल भी नहीं कटवाते हैं।

    नवरात्रा : चैत्र माह के शुक्ल पक्ष में प्रतिपदा से नवमी तक तथा आश्विन माह के शुक्ल पक्ष में प्रतिपदा से नवमी तक नवरात्रियों का आयोजन होता है। इन दिनों में देवी दुर्गा की पूजा होती है तथा सप्तशती का पाठ किया जाता है। अनेक देवी मंदिरों में इन दिनों में मेला भरता है। कार्तिक माह की नवरात्रियों में नवमी को रामनवमी के रूप में मनाया जाता है। आश्विन माह की दशमी को दशहरा का आयोजन किया जाता है।

    दशहरा : आश्विन माह की दशमी को दशहरा का आयोजन किया जाता है। इस दिन भगवान राम ने रावण पर विजय प्राप्त की थी, इसलिये इस त्यौहार को बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में मनाया जाता है। यह क्षत्रियों का त्यौहार माना जाता है। इस दिन शस्त्र पूजन होता है तथा शाम के समय रावण, कुंभकर्ण एवं मेघनाद के पुतले जलाये जाते हैं।

    करवा चौथ : सुहागिन स्त्रियों द्वारा कार्तिक कृष्णा चतुर्थी को करवा चौथ का व्रत किया जाता है। चंद्रमा के दर्शन करके उसे अर्घ्य देने के बाद ही स्त्रियां व्रत खोलती हैं। इस व्रत के पालन से घर में सुख-सौभाग्य में वृद्धि तथा पुत्र एवं पति को दीघार्यु प्राप्त होती है।

    दीपावली : कार्तिक माह की अमावस्या को दीपावली मनायी जाती है। इससे दो दिन पहले धनवंतरी त्रयोदशी मनायी जाती है जिसे धनतेरस भी कहते हैं। इस दिन एक दिया जमदीप के नाम से जलाया जाता है। धनतेरस के अगले दिन नरकासुर का वध किया गया था। इसे नर्क चौदस भी कहते हैं। हिन्दुओं में इसे रूप चौदस के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन प्रातः शीघ्र स्नान करने का महत्व है। अमावस्या के दिन दीपावली होती है। रबी फसल पकने की प्रसन्नता में इस पर्व का आयोजन किया जाता है। इस दिन व्यापारी लोग नयी बहियां लगाते हैं। लक्ष्मीजी का पूजन किया जाता है। लक्ष्मीजी के साथ गणेशजी, कौड़ी, शंख तथा बहियों का भी पूजन किया जाता है। घर, दुकान, व्यापारिक कार्यालय, गली, मौहल्ले एवं बाजार में दीप मालाओं एवं बिजली की झालरों से प्रकाश किया जाता है। हिन्दू लोग इसे भगवान श्रीराम के वनवास के बाद पुनः अयोध्या आगमन की प्रसन्नता में मनाते हैं। जैन धर्म के लोग इस दिन महावीर स्वामी का निर्वाण दिवस मनाते हैं। आर्य समाजी दयानंद सरस्वती के निर्वाण दिवस के रूप में मनाते हैं। दीपावली के अगले दिन लोग अपने परिवारों सहित एक दूसरे की कुशल क्षेम पूछने जाते हैं।

    गोवर्धन पूजा एवं अन्नकूट : दीपावली के अगले दिन गोवर्धन का त्यौहार मनाया जाता है। इस दिन बछड़े का पूजन कर उसके कंधे पर हल रखा जाता है। बैलों के सींग रंगे जाते हैं और उनके शरीर पर रंग के छापे लगाये जाते हैं। मंदिरों में अन्नकूट का आयोजन किया जाता है। छप्पन तरह के व्यंजन बनाकर भगवान को अर्पित किये जाते हैं। अन्नकूट के पश्चात् नाथद्वारा तथा कांकरोली में भीलों को भोजन, मिठाई तथा चावलों की लूट करवायी जाती है।

    भाई दूज : गोवर्धन के अगले दिन भाई दूज का पर्व मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन यम ने अपनी बहिन यमी का निमंत्रण स्वीकार करके उनके यहाँ भोजन किया था। इस दिन बहिनें भाई को तिलक निकाल कर उसकी दीर्घायु की कामना करती हैं।

    देवोत्थान एकादशी : कार्तिक शुक्ला एकादशी को देवोत्थान एकादशी मनायी जाती है। मान्यता है कि इसी दिन क्षीर सागर में सोये हुए भगवान विष्णु जागे थे। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है तथा नयी ईख की पूजा करके उसे चूसा जाता है। इसी दिन भगवान विष्णु से तुलसी का विवाह करवाया जाता है। इस दिन से अगले आठ माह तक (हरियाली एकादशी तक) विवाह कार्य संपन्न करने का मुहूर्त रहता है।

    कार्तिक पूर्णिमा : कार्तिक पूर्णिमा को गंगा स्नान और दीपदान का विशेष महत्व है। राजस्थान के लोग इस दिन नदियों एवं तालाबों पर जाकर स्नान करते हैं। इस दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य के रूप में अवतार लिया था। सिक्ख धर्म के गुरु नानक देव का जन्म भी इसी दिन हुआ था। इस दिन गुरुद्वारों में गुरु ग्रंथ साहब का पाठ होता है तथा प्रसाद बांटा जाता है।

    मकर संक्रांति : प्रति वर्ष सूर्य देव के उत्तरायण होने के दिन को मकर संक्रांतिके रूप में मनाया जाता है। यह सामान्यतः 14 जनवरी को ही होता है। इस दिन सूर्य भगवान की पूजा की जाती है। लोग नदियों एवं तालाबों पर जाकर स्नान करते हैं तथा खिचड़ी एवं तिलों का दान करते हैं। इस दिन अनेक स्थानों पर पतंग उड़ाई जाती है। इस दिन मल मास समाप्त हो जाता है तथा लोग फिर से शुभ कार्य आरंभ कर देते हैं।

    बसंत पंचमी : माघ शुक्ल पंचमी को बसंत पंचमी का त्यौहार मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु तथा माता सरस्वती की पूजा की जाती है। काम देव तथा रति की भी पूजा की जाती है। लोग बसंती रंग के वस्त्र पहनते हैं। प्राचीन काल में इस दिन नृत्य तथा संगीत के बड़े आयोजन होते थे।

    शिवरात्रि : माघ कृष्णा त्रयोदशी को शिवरात्रि का आयोजन किया जाता है तथा भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिये व्रत किया जाता है। इस व्रत में अन्न ग्रहण नहीं किया जाता। उसके स्थान पर फलाहार किया जाता है।

    होली : फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होलिका दहन किया जाता है तथा अगले दिन फाग खेला जाता है। यह त्यौहार रबी की फसल के पकने की प्रसन्नता में मनाया जाता है। मान्यता है कि इसी दिन हिरण्यकश्यपु की बहिन होलिका ने भक्त प्रहलाद को अपनी गोदी में बैठकार अग्निस्नान किया था। इस प्रयास में होलिका तो जल कर मर गयी किंतु भक्त प्रहलाद चमत्कारिक रूप से बच गये। पश्चिमी राजस्थान में ईलोजी की सवारी निकालने की परंपरा है। मेवाड़ तथा मारवाड़ में गैर नृतकों की टोलियां इस त्यौहार पर गैर नृत्यों का अयोजन करती हैं। आदिवासी लोगों में होली पर भागोरिया खेला जाता है। ब्रज से लगते हुए क्षेत्र में लट्ठ मार होली खेली जाती है। जालोर जिले में होली के अगले दिन भाटा गैर खेली जाती है।

    शीतला सप्तमी : राजस्थान में चैत्र शुक्ला सप्तम को शीतला सप्तमी मनायी जाती है। इस दिन शीतला देवी की पूजा होती है तथा एक दिन पहले बना हुआ शीतल भोजन किया जाता है। मान्यता है कि शीतला माता की पूजा करने से बच्चों में ओरी, चेचक तथा बोदरी जैसी बीमारियां नहीं होती हैं। जोधपुर राज्य में शीतला सप्तमी की जगह शीतला अष्टमी मनायी जाती है क्योंकि जोधपुर राज्य के राजा विजयसिंह के पुत्र सरदारसिंह की शीतला सप्तमी के दिन ओरी से मृत्यु हो गयी थी। शोक विह्वल राजा ने शीतला माता की मूर्ति को हाथी के पैरों से कुचलवाकर उसे पहाड़ियों से नीचे फैंक दिया। शोक से उबरने पर राजा को अपने कृत्य पर पश्चाताप हुआ और वह सपरिवार माता की पूजा के लिये उपस्थित हुआ।

    गणगौर : गणगौर का त्यौहार होली से लगभग 15 दिन बाद मनाया जाता है। चैत्र कृष्णा प्रतिपदा से गणगौर पूजा प्रारंभ होकर चैत्र शुक्ला तृतीया को समाप्त होती है। गण से तात्पर्य भगवान शिव से तथा गौर से तात्पर्य गौरी अर्थात् माता पार्वती से है। यह त्यौहार पार्वतीजी के गौने का सूचक है। प्रतिदिन संध्याकाल में सौभाग्यवती स्त्रियाँ तथा कुमारियाँ सिर पर कलश रखकर इस अवसर पर गीत गाती हुई तालाबों पर जाती हैं। ईसर और गणगौर की काष्ठ मूर्तियों का जुलूस निकाला जाता है। यह सवारी जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, बीकानेर, कोटा व जैसलमेर में विशेष ठाट बाट के साथ निकाली जाती है। नृत्य एवं संगीत इस अवसर के विशेष आकर्षण होते हैं। इस दौरान ऊँटों एवं घोड़ों की दौड़ भी आयोजित की जाती है। इस सम्बन्ध में एक कहावत कही जाती है- गणगौरियाँ ने ही घोड़ नहीं दौड़ैला तो दौड़ैला कद। उदयपुर में तालाब के बीच नावों पर नृत्य किये जाते हैं। कुंआरी कन्याएं अच्छे दूल्हे की कामना से इस त्यौहार को मनाती हैं। बहिनें माता पार्वती से अपने भाई के लिये अच्छी दुलहन मांगती हैं। इस त्यौहार पर घूमर नृत्य किया जाता है। विवाहित स्त्रियां अपने अखण्ड सौभाग्य की कामना से 15 या 18 दिन तक व्रत करती हैं तथा प्रतिदिन माँ पार्वती की पूजा करती हैं।

    घुड़ला : चैत्र शुक्ला तृतीया को घुड़ले का त्यौहार मनाया जाता है। स्त्रियाँ एकत्रित होकर कुम्हार के घर जाती हैं तथा एक छिद्र युक्त घड़ा लेकर उसमें दिया रखती हैं। इस घड़े को घर घर घुमाया जाता है। बाद में इस घड़े को तालाब में बहा दिया जाता है। इस त्यौहार के पीछे एक ऐतिहासिक घटना है। मारवाड़ के राजा सातलदेव के समय में अजमेर के सूबेदार मल्लूखां का सेनापति घुड़ला खां एक बार मारवाड़ की कन्याओं को उठाकर ले गया। उस दिन चैत्र शुक्ला तृतीया थी तथा कन्याएं गौरी पूजन के लिये गाँव से बाहर तालाब पर आयी हुई थीं। जब सातल देव को यह समाचार मिला तो उसने अपने भाई बीकानेर नरेश बीका तथा मेड़ता नरेश दूदा को भी संदेश भिजवाया। सातल देव के दूसरे भाई भी आ जुटे। इन राठौड़ राजाओं ने घुड़ले खां का पीछा किया और उसे अजमेर पहुंचने से पहले ही धर दबोचा। इस युद्ध में घुड़ले खां मारा गया तथा कन्याएं छुड़ा ली गयीं। घुड़ले खां का सिर काटकर कन्याओं को दे दिया गया। छुड़ा लाया। कन्याओं ने घुड़ले खां का सिर पूरे गाँव में घुमाया। आज भी उसकी स्मृति में घुड़ला घुमाया जाता है। मटकी को घुड़ले खां का सिर माना जाता है तथा उसके छेद घुड़ला खां के सिर के घाव माने जाते हैं। इस अवसर पर कन्याओं द्वारा गाये जाने वाले गीत में कहा जाता है कि मारवाड़ की कन्याएं बेधड़क घूम रही हैं। घुड़लेखां में हिम्मत हो तो उन्हें आकर रोक ले।

    पर्यूषण : यह जैन मतावलंबियों का त्यौहार है जो भाद्रपद माह में मनाया जाता है। इस उत्सव का अंतिम दिन संवत्सरी कहलाता है। इसके दूसरे दिन आश्विन कृष्णा प्रतिपदा को क्षमापणी पर्व मनाया जाता है। इस दिन श्रावक लोग एक दूसरे से क्षमा याचना करते हैं।

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  • अध्याय - 15 बागोर की हवेली संग्रहालय उदयपुर

     02.06.2020
    अध्याय - 15 बागोर की हवेली संग्रहालय उदयपुर

    अध्याय - 15 बागोर की हवेली संग्रहालय, उदयपुर


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    उदयपुर नगर में पिछोला के किनारे गणगौर घाट पर बागोर की हवेली स्थित है। यह मेवाड़ के बागोर ठिकाने के सामंत की हवेली है। दिसम्बर 1997 में इस हवेली के 18 कमरों में एक संग्रहालय स्थापित किया गया है जिसमें राजपूत जीवन शैली, वेशभूषा, आभूषण, अस्त्र-शस्त्र, उनके मनोरंजन के साधन, तीज-त्यौहार एवं उत्सव आदि की झांकियां प्रस्तुत की गई हैं। साथ ही इस संग्रहालय में मेवाड़ के शूरवीर महाराणाओं की सामाजिक, सांस्कृतिक जीवन शैली को संजोया गया है।

    हवेली के कक्षों की दीवारों पर भित्तिचित्र बने हुए हैं। हवेली के शयन कक्षों में रीति कला (इरोटिक आर्ट) के चित्र बने हैं। अन्य कक्षों में गणगौर की सवारी, पशु-पक्षी एवं युद्ध के दृश्यों का चित्रांकन हुआ है। कलाकृतियों में गजानन की 700 वर्ष पुरानी प्रतिमा दर्शनीय है। संग्रहालय में हस्तशिल्प, कारीगरी, बुनाई, छपाई, रंगाई और पड़कला को प्रदर्शित किया गया है। मेवाड़ के राजपरिवार में प्रयुक्त कुछ आभूषण भी यहाँ प्रदर्शित किए गए हैं।

    शयन कक्ष में कलाकारी युक्त पलंग एवं अन्य प्रसाधन सामग्रियां, बड़े कांच, मदिरा की सुराहियां, प्याले आदि संगृहीत हैं। दरबार हॉल, जनाना कक्ष एवं मर्दाना कक्षों को प्राचीन हस्तकलाओं के नमूनों से सजाया गया है। एक कक्ष में राजस्थान में धारण किए जाने वाले लगभग 50 प्रकार की साफे और पाग-पगड़ियां प्रदर्शित की गई हैं। इस संग्रहालय में महिलाओं के 40 मॉडल रखे गए हैं जिनके माध्यम से राजस्थान की विभिन्न प्रकार की बंधेज, चूनड़ी एवं लहरिया की साड़ियां प्रदर्शित की गई हैं।

    कुंकुम के तिलक के लिए कलात्मक चौपड़े, बाजोट, तोरण, रोड़ी धाम एवं पाटियां आदि कलाकृतियां भी रखी हुई हैं। मांगलिक प्रसंगों, उत्सवों, गुरु आगमनों तथा मंदिर प्रतिष्ठा के अवसरों पर नाटक, ख्याल, तमाशे, नृत्य एवं भवाई किए जाते थे। हवेली में उन अवसरों के दृश्य चित्रित किए गए हैं। लोक चित्रकारी भी प्रदर्शित की गई है। चित्रमय सांप-सीढ़ी में 72 खंड प्रदर्शित किए गए हैं जिनमें चंद्र लोक, सूरजलोक, तपलोक, दिक्पाल लोक आदि प्रमुख हैं।

    बहुरंगी माण्डणों, पलंग के पायों पर राग-रागिनियों के चित्र, दरियों में विभिन्न प्रकार की नृत्य मुद्राएं तथा पशु-पक्षियों की आकृतियां बुनी हुई हैं। गणगौर का मेला, पाड़ीनाथ का मेला, होली, दीपावली, कालाबावजी का मेला, हरियाली अमावस्या का मेला और निर्जला ग्यारस का मेला, फूलडोल का मेला, शीतलामाता का मेला, आदि भी चित्रित किए गए हैं। एक कक्ष बड़ी महारानी का कहलाता है जिसमें धार्मिक वातावरण प्रस्तुत किया गया है।

    भजन-कीर्तन हेतु विविध वाद्ययंत्र, एकलिंगजी, श्रीकृष्ण एवं श्रीराम के चित्र व्यवस्थित रूप से रखे हुए हैं। बागोर की हवेली में पश्चिमी क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र का कार्यालय भी चलता है। इस सांस्कृतिक केन्द्र द्वारा महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात और गोआ दमन एवं दीव में सांस्कृतिक गतिविधियां चलाई जाती हैं।

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  • युग निर्माता महाराजा सूरजमल- 1

     02.06.2020
    युग निर्माता महाराजा सूरजमल- 1

    प्राक्कथन


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    महाराजा सूरजमल अठारहवीं सदी के भारत का निर्माण करने के लिये उत्तरदायी प्रमुख व्यक्तियों में से एक थे। उनका जन्म ऐसे समय में हुआ जब उत्तर भारत की राजनीति जबर्दस्त हिचकोले खा रही थी तथा देश विनाशकारी शक्तियों द्वारा जकड़ लिया गया था। नादिरशाह तथा अहमदशाह अब्दाली ने उत्तर भारत में बहुत बड़ी संख्या में मनुष्यों तथा गायों को मार डाला और तीर्थों तथा मंदिरों को नष्ट कर दिया। देश पर चढ़कर आने वाले आक्रांताओं को रोकने वाला कोई नहीं था। श्रीविहीन हो चुके मुगल, न तो दिल्ली का तख्त छोड़ते थे और न अफगानिस्तान से आने वाले आक्रांताओं को रोक पाते थे।

    उस काल में उत्तर भारत के शक्तिशाली राजपूत राज्य, मराठों की दाढ़ में पिसकर छटपटा रहे थे। मराठे स्वयं भी नेतृत्व की लड़ाई में उलझे हुए थे। होलकर, सिंधिया, गायकवाड़ और भौंसले, उत्तर भारत के गांवों को नौंच-नौंच कर खा रहे थे। जब एक मराठा सरदार चौथ और सरदेशमुखी लेकर जा चुका होता था तब दूसरा आ धमकता था। बड़े-बड़े महाराजाओं से लेकर छोटे जमींदारों की बुरी स्थिति थी। जाट और मराठे निर्भय होकर भारत की राजधानी दिल्ली के महलों को लूटते थे। जब शासकों की यह दुर्दशा थी तब जन-साधारण की रक्षा भला कौन करता! भारत की आत्मा करुण क्रंदन कर रही थी।

    चोरों ओर मची लूट-खसोट के कारण जन-जीवन की प्रत्येक गतिविधि- कृषि, पशुपालन, कुटीर धंधे, व्यापार, शिक्षण, यजन एवं दान ठप्प हो चुके थे। शिल्पकारों, संगीतकारों, चित्रकारों, नृतकों और विविध कलाओं की आराधना करने वाले कलाकार भिखारी होकर गलियों में भीख मांगते फिरते थे। निर्धनों, असहायों, बीमारों, वृद्धों, स्त्रियों और बच्चों की सुधि लेने वाला कोई नहीं था। ऐसे घनघोर तिमिर में महाराजा सूरजमल का जन्म उत्तर भारत के इतिहास की एक अद्भुत घटना थी।

    उन्होंने राजनीति में विश्वास और वचनबद्धता को पुनर्जीवित किया। हजारों शिल्पियों एवं श्रमिकों को काम उपलब्ध कराया। ब्रजभूमि को उसका क्षीण हो चुका गौरव लौटाया। गंगा-यमुना के हरे-भरे क्षेत्रों से रूहेलों, बलूचों तथा अफगानियों का खदेड़कर किसानों को उनकी धरती वापस दिलवाई तथा हर तरह से उजड़ चुकी बृज भूमि को धान के कटोरे में बदल लिया। उन्होंने मुगलों और दुर्दान्त विदेशी आक्रान्ताओं को भारतीय शक्ति से परिचय कराया तथा अपने पिता की छोटी सी जागीर को न केवल भरतपुर, मथुरा, बल्लभगढ़ और आगरा तक विस्तृत किया अपितु चम्बल से लेकर यमुना तक के विशाल क्षेत्रों का स्वामी बन कर प्रजा को अभयदान दिया।

    इस लघु पुस्तिका में महाराजा सूरजमल के उसी अवदान को भारत की युवा पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है। आशा है यह पुस्तक आज की युवा पीढ़ी को महाराजा सूरजमल की विमल कीर्ति का ज्ञान कराने और विषम से विषम परिस्थितियों में धैर्य न खोकर अपना मार्ग ढूंढ लेने के लिये प्रेरित करेगी। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में लिखा है- 'नहीं असत सम पातक पुंजा।’राजा सूरजमल ने कभी सत्य का साथ नहीं छोड़ा। उनके जीवन चरित्र से प्रत्येक व्यक्ति को प्रेरणा लेने की आवश्यकता है।

    आज जिन लोगों के कंधों पर देश को चलाने की जिम्मेदारी है, उनके लिये भी महाराजा सूरजमल प्रेरणा के स्रोत सिद्ध हो सकते हैं जिन्होंने विपत्ति में पड़े अपने शत्रुओं को शरण देने और सार्वजनिक जीवन में शुचिता को कभी न त्यागने का काम जीवन भर पूरी दृढ़ता से किया। आज यदि भारत को अपना पुनरुत्थान करना है तो देश के कर्णधारों को महाराजा सूरजमल की तरह निजी जीवन एवं सार्वजनिक जीवन में शुचिता एवं ईमानदारी का समावेश करना आवश्यक है।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • अध्याय - 16 महाराणा प्रताप संग्रहालय हल्दीघाटी

     02.06.2020
    अध्याय - 16 महाराणा प्रताप संग्रहालय हल्दीघाटी

    अध्याय - 16 महाराणा प्रताप संग्रहालय हल्दीघाटी


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    राजसमन्द जिले में स्थित हल्दीघाटी में बने चेतक स्मारक से कुछ ही दूरी पर महाराणा प्रताप संग्रहालय स्थित है। इसे महाराणा प्रताप (ई.1572-97) कालीन परिवेश एवं शिल्प में बनाने का प्रयास किया गया है। दर्शकों के समक्ष उस काल की स्मृतियों को पुनजीर्वित करने के उद्देश्य से इतिहास को उसके मूल स्वरूप में प्रदर्शित करने का प्रयास किया गया है। यहाँ प्रतिदिन बड़ी संख्या में दर्शक आते हैं।

    संग्रहालय में आने वाले दर्शकों के लिए थोड़े-थोड़े अंतराल में प्रकाश एवं ध्वनि शो दिखाया जाता है जिसमें महाराणा प्रताप के जीवन वृत्त पर आधारित एक लघु फिल्म भी दिखाई जाती है, साथ ही विभिन्न शस्त्रों, छायाचित्रों, पुस्तकों आदि की प्रदर्शनी भी दिखाई जाती है। तत्पश्चात बड़े से एक मानचित्र पर युद्धस्थल एवं युद्ध की प्रमुख घटनाओं के स्थलों को दिखाया जाता है।

    आगे महाराणा प्रताप की जीवनी से सम्बन्धित घटनाओं का विवरण प्रदर्शित किया गया है। इस विवरण में पन्ना धाय के बलिदान की कहानी, महाराणा प्रताप का साथियों सहित युद्ध की तैयारी हेतु विचार-विमर्श, राणा प्रताप का जंगल में निवास, घास की रोटी खाते हुए महाराणा प्रताप और हल्दीघाटी युद्ध के समय एक पांव से घायल चेतक का बलिदान आदि का प्रदर्शन किया गया है।

    एक प्रतिमा में महाराणा के घोड़े में मानसिंह के हाथी के मस्तक पर पैर रखे हुए हैं तथा महाराणा प्रताप मानसिंह पर वार करने की तैयारी में है। हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप का साथ देने वाले भील राजा, हकिम खां सूरी, राणा पुंजा, दानवीर भामाशाह आदि के चित्र भी प्रदर्शित किए गए हैं। अन्त में हल्दीघाटी में गुलाब की खेती, गुलाबजल कैसे बनता है, आदि दिखाया गया है।

    संग्रहालय के बाहर छाोटा सा बाजार है जहाँ हस्तशिल्प की वस्तुएं, पुस्तकें, चाय नाश्ता, गन्ने का रस, पारंपरिक पोशाकों में फोटोग्राफी, ऊँट तथा घोड़े की सवारी एवं नौकायन आदि की सुविधाएं उपलब्ध हैं।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-52

     02.06.2020
     राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-52

    पर्यावरण के उन्नायक एवं संस्कृति के संवाहक धार्मिक मेले


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    राजस्थान में मेलों की अत्यंत प्राचीन परंपरा है। इसलिये राजस्थान में आयोजित होने वाले मेलों की संख्या सैंकड़ों में है। इनमें से अधिकतर मेले धार्मिक विश्वासों के कारण आरंभ हुए किंतु बाद में वे व्यावसायिक एवं सांस्कृतिक उन्नयन का माध्यम बन गये। राजस्थान के प्रमुख मेलों में अजमेर जिले का पुष्कर मेला, सवाई माधोपुर जिले का श्री महावीरजी मेला, करौली जिला मुख्यालय का कैला मैया मेला, जैसलमेर जिले का रामदेवजी का मेला, सवाईमाधोपुर जिले के रणथंभौर में आयोजित होने वाला गणेशमेला, डूंगरपुर जिले के बेणेश्वर में आयोजित होने वाला आदिवासियों का मेला हैं। राज्य के बड़े पशु मेले नागौर जिले के मेड़ता, परबतसर तथा नागौर में, अजमेर जिले के पुष्कर में, जालोर जिले के रानीवाड़ा में तथा बाड़मेर जिले के तिलवाड़ा में आयोजित होते हैं।

    श्रीमहावीरजी मेला : सवाईमाधोपुर की हिण्डौन तहसील में चैत्र शुक्ला त्रयोदशी से वैशाख कृष्णा प्रतिपदा तक श्रीमहावीरजी मंदिर में प्रतिवर्ष यह मेला भरता है जिसमें गूजर, मीणा, अहीर तथा चर्मकार आदि जातियों के लोग बड़ी संख्या में भाग लेते हैं। यह राजस्थान के प्रमुख मेलों में गिना जाता है। इस मंदिर का चढ़ावा चर्मकार जाति के परिवारों को जाता है। मेले में निकाली जाने वाली रथयात्रा में सबसे पहले चर्मकारों से हाथ लगवाये जाने की परंपरा है।

    कैला देवी मेला : करौली जिले में जिला मुख्यालय के निकट ही हनुमानजी की माता अंजना देवी का मंदिर है जिसे लोक संस्कृति में कैला मैया कहा जाता है। यहाँ हनुमानजी को लांगुरिया कहा जाता है। यहाँ प्रतिवर्ष चैत्रमास में मेला भरता है। इसे लक्खी मेला भी कहते हैं। इस मेले में पशु विक्रय बड़े पैमाने पर होता है।

    गौतमेश्वर मेला : सिरोही जिले में पोसालिया नदी के तट पर गौतमेश्वर में प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ला एकादश से पूर्णिमा तक यह मेला लगता है। यह मीणा समाज का मेला है जिसमें मीणा समाज अपने कुल देवता गौतमगुआ की पूजा करते हैं। माना जाता है कि गंगा मैया ने गौतमगुआ मीणा को दर्शन दिये। मीणा समाज मृतकों की अस्थियां यहाँ विसर्जित करते हैं। राजस्थान, गुजरात तथा मध्यप्रदेश से भी मीणा समाज के लोग इस मेले में भाग लेने के लिये आते हैं। मान्यता है कि इस स्थान पर एक कुण्ड जो सदैव रिक्त रहता है किंतु जब मीणा समाज का पुरोहित यहाँ आकर पूजा करता है तो इस कुण्ड में स्वतः ही जल आ जाता है तथा मेला समाप्त होने पर स्वतः ही समाप्त हो जाता है। यहाँ पर बहुत से लोग रंग-बिरंगी पोषाक पहन कर नाचते गाते हैं। इसी नाम से एक मेला प्रतापगढ़ तहसील के अरणोद गाँव में भरता है। इसे आत्मशुद्धि का तीर्थ माना जाता है।

    घोटिया आंबा मेला : यह बांसवाड़ा जिले का सबसे बड़ा मेला है। यह प्रतिवर्ष चैत्र माह की अमावस्या को भरता है जिसमें राजस्थान, गुजरात तथा मध्यप्रदेश आदि प्रांतों से आदिवासी आते हैं। मान्यता है कि पाण्डव अपने अज्ञात वास के समय कुछ दिन यहाँ भी रहे थे। उन्होंने भगवान कृष्ण की सहायता से 88 हजार ऋषियों को केले के पत्ते पर चावल तथा आमरस का भोजन करवाया। यहाँ आज भी पुष्प विहीन केलों के वृक्ष तथा चावलों के पौधे पाये जाते हैं।

    रानी सती का मेला : झुंझुनूं में रानी सती के प्रसिद्ध मंदिर में प्रतिवर्ष भाद्रपद मास में मेला भरता है। 1988 के बाद से सती निषेध कानून के तहत इस पर रोक लगा दी गयी है।

    रामदेवजी का मेला : जैसलमेर जिले के रामदेवरा (रूणेचा) गाँव में प्रतिर्ष भाद्रपद माह में लोकदेवता रामदेवजी का मेला भरता है। इसमें राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश तथा उत्तर प्रदेश आदि राज्यों से श्रद्धालु बोलना के लिये आते हैं। अब इस मेले में भी पशु विक्रय बड़ी संख्या में होता है।

    रणथंभौर का गणेश मेला : सवाई माधोपुर जिले में रणथंभौर दुर्ग में गणेशजी के सुविख्यात मंदिर में प्रतिवर्ष गणेश चतुर्थी को विशाल मेला भरता है। इस मेले में देश-विदेश से लाखों लोग आते हैं।

    खाटू श्यामजी का मेला : सीकर जिले के खाटू श्यामजी नामक गाँव में प्रतिवर्ष फाल्गुन मास की एकादशी को मेले का आयोजन होता है। इसमें राज्य के बाहर से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं।

    केसरिया नाथ का मेला : उदयपुर जिले के ऋषभदेव में प्रति वर्ष चैत्र वदी अष्टमी को विशाल मेले का आयोजन होता है जिसमें हजारों आदिवासी भाग लेते हैं।

    गोगामेड़ी का मेला : हनुमागढ़ जिले में गोगामेड़ी नामक स्थान पर प्रतिवर्ष भाद्रपद माह में विशाल मेले का आयोजन होता है जिसमें राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश तथा पंजाब राज्यों के श्रद्धालु आते हैं।

    चारभुजा का मेला : राजसमंद जिले के गढ़बोर नामक स्थान पर भगवान कृष्ण का विख्यात मंदिर है जिसे श्री चारभुजा नाथ मंदिर भी कहते हैं। यहाँ प्रतिवर्ष भाद्रपद मास में मेला भरता है।

    जीणमाता मेला : सीकर जिले के रेवासा गाँव में ग्यारहवीं सदी का जीणमाता मंदिर स्थित है जहाँ जीणमाता की अष्ट भुजा मूर्ति स्थापित है। यहाँ प्रतिवर्ष चैत्र एवं आश्विन माह की नवरात्रियों में मेले भरते हैं। इस अवसर पर श्रद्धालु लोग अपने बच्चों का मुण्डन करवाने, जात देने तथा मनौती मानने के लिये आते हैं।

    जंभेश्वरजी का मेला : बीकानेर जिले के नोखा कस्बे में फाल्गुन माह व आसोज माह में विश्नोईयों के धर्मगुरु जंभेश्वरजी (जांभोजी) के मेले लगते हैं। इस मेले में विश्नोई संप्रदाय के लोग भाग लेते हैं।

    करणीमाता मेला : बीकानेर जिले के देशनोक कस्बे में प्रतिवर्ष चैत्र माह के नवरात्रों में करणीमाता का मेला भरता है।

    कपिल मुनि का मेला : बीकानेर जिले के कोलायत तीर्थ में प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा को सांख्य दर्शन के प्रणेता कपिल मुनि का मेला भरता है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु कोलायत झील में स्नान करते हैं।

    बेणेश्वर मेला : डूंगरपुर जिले के बेणेश्वर में प्रतिवर्ष माघ मास में आदिवासियों का सबसे बड़ा मेला लगता है। इसमें लाखों आदिवासी परंपरागत रूप से भाग लेते हैं। इस अवसर पर बड़ी संख्या में वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये जाते हैं।

    सील डूंगरी का मेला : जयपुर के चाकसू के निकट चैत्र माह में सील डूंगरी का मेला शीतला सप्तमी के दिन भरता है। इस दिन शीतला माता का पूजन किया जाता है। इस मंदिर का चढ़ावा कुम्हारों को जाता है।

    भृतहरि का मेला : अलवर में सरिस्का अभयारण्य के निकट योगीराज भृतहरि का स्थान है। यहाँ वर्ष में दो बार लक्खी मेला भरता है। वर्षा ऋतु में भाद्रपद माह में भरने वाले मेले में राजस्थान के साथ-साथ कई पड़ौसी राज्यों के श्रद्धालु भी भाग लेते हैं।

    डिग्गी का मेला : जयपुर से लगभग 75 कि.मी. दूर स्थित डिग्गी नामक स्थान पर कल्याणजी का मेला प्रतिवर्ष श्रावण माह की अमावस्या को भरता है। इस मेले में भी राजस्थान के साथ-साथ कई पड़ौसी राज्यों के श्रद्धालु भाग लेते हैं।

    तेजाजी का मेला : नागौर जिले के परबतसर नामक स्थान पर भाद्रपद कृष्णा दशम् से भाद्रपद शुक्ला एकादशम् तक तेजाजी का मेला भरता है। इस मेले में लोक देवता तेजाजी के गीत गाये जाते हैं तथा विभिन्न नस्लों के पशुओं का विक्रय होता है।

    शिवाड़ का मेला : सवाई माधोपुर में जिले में ईसरदा से तीन कि.मी. दूर स्थित शिवाड़ मंदिर में स्थापित शिवलिंग को बारहवें ज्योर्तिलिंग की मान्यता प्राप्त है। इन्हें घुश्मेश्वर कहा जाता है। यहाँ स्थित सरोवर के जल को गंगाजल के समान पवित्र माना जाता है। यहाँ भी प्रतिवर्ष मेला भरता है।

    माता कुण्डलिनी का मेला : चित्तौड़गढ़ जिले के राशमी में कुण्डलिनी माता के मंदिर में कार्तिक माह में मेला भरता है। जिसमें हजारों लोग भाग लेते हैं।

    पार्श्वनाथ मेला : नागौर जिले के मेड़ता रोड रेलवे स्टेशन के निकट फलौदी गाँव में प्रति वर्ष पार्श्वनाथ का मेला भरता है। यह मेला अत्यंत प्राचीन है तथा पश्चिमी राजस्थान एवं मध्य राजस्थान से बड़ी संख्या में जैन श्रद्धालु एवं हिन्दू मतावम्बी इस मेले में सम्मिलित होते हैं।

    मरु महोत्सव : जैसलमेर जिला मुख्यालय पर राजस्थान पर्यटन विभाग की ओर से प्रतिवर्ष मरुमहोत्सव का आयोजन होता है। इसमें विदेशी पर्यटक भी बड़ी संख्या में भाग लेते हैं।

    बादशाह का मेला : अजमेर जिले के ब्यावर कस्बे में प्रतिवर्ष धुलण्डी के दूसरे दिन बादशाह का मेला भरता है। इस मेले में बादशाह की सवारी निकाली जाती है। (प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालय अध्यापक प्रतियोगी परीक्षा 2004, बादशाह मेला कहाँ भरता है?)

    डोलमेला : भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को बारां के डोल तालाब के किनारे डोलमेला आयोजित होता है। माना जाता है कि डोल तालाब 12 तालाबों को पाटकर बनाया गया।

    ख्वाजा का उर्स : अजमेर स्थित ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर सालाना उर्स का आयोजन होता है जिसमें देश-विदेश के मुस्लिम धर्मावलंबी भाग लेते हैं जिन्हें जायरीन कहा जाता है। इस उर्स का सबसे बड़ा आकर्षण कव्वालों द्वारा अपनी प्रस्तुतियां देना है।

    गलियाकोट का उर्स : डूंगरपुर जिले के गलियाकोट नामक स्थान पर दाऊदी बोहरों द्वारा सय्यद फखरूद्दीन की मजार पर सालाना उर्स आयोजित किया जाता है।

    सूफी तारेकीन का उर्स : नागौर जिला मुख्यालय पर जामादि अव्वल को सालाना उर्स का आयोजन होता है।

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  • मैं नाथद्वारा जाकर सन्यासी हो जाउंगा, स्वामी पर हथियार नहीं उठाऊंगा

     02.06.2020
    मैं नाथद्वारा जाकर सन्यासी हो जाउंगा, स्वामी पर हथियार नहीं उठाऊंगा

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    जब कोटा का महाराव किशोरसिंह अपने आदमियों पृथ्वीसिंह तथा गोरधन दास को साथ लेकर कोटा से रंगबाड़ी चला गया और वहाँ से जालिमसिंह पर हमला करने की तैयारियां करने लगा तो पोलिटिकल एजेण्ट ने जालिमसिंह से पूछा कि अब वह क्या करेगा?

    इस पर जालिमसिंह ने उत्तर दिया कि मैं नाथद्वारा जाकर सन्यासी हो जाउंगा किंतु अपने स्वामी पर हथियार नहीं उठाउंगा। इस उत्तर को सुनकर एजेण्ट रंगबाड़ी गया और महाराव को समझा बुझा कर फिर से कोटा ले आया जहाँ महाराव का नये सिरे से राज्याभिषेक किया गया। गोरधनदास को कोटा से निकाल दिया गया। उसे दिल्ली में रहने के लिये मकान दे दिया गया।

    वस्तुतः सारे विवाद की जड़ महाराव किशोरसिंह तथा दीवान माधोसिंह के मध्य चल रहा शक्ति परीक्षण था। किशोरसिंह की शिकायत थी कि माधोसिंह मेरे साथ आदर से व्यवहार नहीं करता। जबकि माधोसिंह कोटा राज्य पर उसी तरह निर्बाध शासन करना चाहता था जैसा कि उसके पिता जालिमसिंह ने किया था। महाराव किशोरसिंह चाहता था कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी ई.1917 में हुई उस संधि का पालन करे जिसमें कोटा राज्य को आंतरिक विद्रोह तथा सामंतों की अनुशासनहीनता को दबाने में मदद किये जाने का प्रावधान था अतः माधोसिंह को हटाया जाये। जबकि माधोसिंह चाहता था कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी इस संधि में ई.1918 में जोड़ी गयी उन दो गुप्त धाराओं पर दृढ़ रहे जिनमें झाला जालिमसिंह और उसके वंशजों को सदैव के लिये सम्पूर्ण अधिकार युक्त प्रधानमंत्री बने रहने का अधिकार दिया गया था।

    कम्पनी सरकार की स्पष्ट धारणा थी कि कोटा राज्य का वास्तविक शासक जालिमसिंह है न कि महाराव किशोरसिंह। इसलिये वह माधोसिंह के विरुद्ध किसी तरह की कार्यवाही नहीं करना चाहती थी। परिस्थतियों से क्षुब्ध होकर कुछ दिन बाद महाराव किशोरसिंह ने फिर से झाला जालिमसिंह को मारने का षड़यंत्र किया। जालिमसिंह ने अपने चारों ओर पहरा बैठा दिया तथा महाराव से मिलने से मना कर दिया। इस पर भी महाराव नहीं माना तो जालिमसिंह ने नगर के दरवाजे बंद करवा दिये और सूरजपोल के कोट की तोपों के मुँह गढ़ की ओर फेर दिये।

    सायं काल से लेकर मध्यरात्रि तक तोपें गोले बरसाती रहीं। आधी रात के बाद महाराव गुप्त मार्ग से नाव में बैठकर चम्बल के पार निकल गया। उसके साथ उसका छोटा भाई पृथ्वीसिंह, कुंवर रामसिंह, विश्वस्त साथी एवं नौकर थे। जालिमसिंह उस समय नगर से बाहर के डेरे में रहा करता था। जब उसने यह समाचार सुना तो वह गढ़ में आया। उसने गढ़ में उपस्थित लोगों के शस्त्र छीन लिये। भण्डारों तथा अंतःपुर का यथोचित प्रबंध किया तथा कोटा की राजगद्दी पर महाराव किशोरसिंह की खड़ाऊँ मंगवाकर स्थापित कर दीं। जालिमसिंह ने घोषणा की कि कुछ बदमाश मेरे स्वामी को बहकाकर ले गये हैं। अतः उनके लौटने तक यही खड़ाऊँ शासन करेंगी।

    किशोरसिंह कोटा के महलों से निकलकर सीधा बूंदी गया। बूंदी के शासक विष्णुसिंह ने महाराव का स्वागत किया। वस्तुतः कोटा राज्य बूंदी राज्य से ही अलग हुआ था तथा कोटा का राजवंश बूंदी के राजवंश की कनिष्ठ शाखा थी। कु्रछ दिनों बाद झाला जालिमसिंह का दुष्ट पुत्र गोरधनसिंह भी महाराव किशोरसिंह से आ मिला किंतु अंग्रेजों के दबाव के कारण गोरधनसिंह पुनः दिल्ली चला गया।

    अंग्रेजों ने बूंदी नरेश को संदेश भेजा कि वह किशोरसिंह को सेना एकत्र न करने दे तथा किशोरसिंह का अधिक समय तक बूंदी में रहना वांछनीय नहीं है। इस कारण कुछ समय बाद किशोरसिंह बूंदी से वृंदावन चला गया। कुछ दिन वृंदावन में बिताकर किशोरसिंह भी दिल्ली पहुंचा और वहाँ जाकर रेजीडेंट से मिला। रेजीडेंट ने किशोरसिंह से कहा कि वह कोटा लौट जाये किंतु किशोरसिंह यह स्वीकार करने को तैयार नहीं हुआ कि वह नाम मात्र का राजा बनकर रहे तथा जालिमसिंह का पुत्र माधोसिंह वास्तविक राजा रहे। अतः किशोरसिंह पुनः कोटा पर आक्रमण करने के उद्देश्य से चम्बल के तट पर आ ठहरा।

    किशोरसिंह ने समस्त हाड़ा राजपूतों को अपनी ओर से लड़ने के लिये आमंत्रित किया। सारे हाड़ा सरदार किशोरसिंह से आ मिले तथा 3000 हाड़ा राजपूत बाणगंगा के तट पर जालिमसिंह पर हमला करने के लिये डट कर खड़े हो गये। इस पर जालिमसिंह ने पोलिटिकल एजेण्ट से सहायता मांगी। जालिमसिंह का संदेश पाकर कर्नल टॉड नीमच से कम्पनी सरकार की दो पलटनें, नौ रिसाले, एक तोपखाना तथा लेफ्टीनेंट क्लार्क, लेफ्टीनेंट मिलन और लेफ्टीनेंट कर्नल रिज को अपने साथ लेकर कोटा पहुँचा। जालिमसिंह की निजी आठ पलटनें, चौदह रिसाले और तेईस तोपें थीं। जालिमसिंह और कर्नल टॉड की संयुक्त सेनाओं ने किशोरसिंह की सेनाओं पर आक्रमण कर दिया।

    युद्ध बड़ा भयानक सिद्ध हुआ। इसमें महाराव का छोटा भाई पृथ्वीसिंह, लेफ्टीनेंट क्लार्क, लेफ्टीनेंट रीड तथा दोनों ओर के अनेक सैनिक मारे गये। पृथ्वीसिंह ने मरते समय अपना खंजर तथा अपने गले की मोतियों की माला पोलिटिकल एजेण्ट कर्नल टॉड को दे दीं तथा निवेदन किया कि मेरे पुत्र रामसिंह को याद रखना। किशोरसिंह पराजय स्वीकार करके नाथद्वारा चला गया। उसके साथ पृथ्वीसिंह का पुत्र कुंवर रामसिंह भी था। किशोरसिंह ने पाँच विवाह किये थे। केवल एक रानी के गर्भ से एक पुत्र उत्पन्न हुआ था। जो चार वर्ष का होकर मर गया था। अतः किशोरसिंह रामसिंह को ही अपना पुत्र मानता था।

    किशोरसिंह नाथद्वारा में श्रीनाथजी के चरणों में बैठकर भजन करता रहा और उसकी खड़ाऊँ कोटा में शासन करती रहीं। वह लगभग 9 माह तक नाथद्वारा में रहा। अंत में उसे श्रीनाथजी की पाद सेवा का फल प्राप्त हुआ और मेवाड़ महाराणा के प्रयत्नों से किशोरसिंह तथा जालिमसिंह में समझौता हो गया। ई.1822 में किशोरसिंह कोटा लौट आया। झाला जालिमसिंह तथा पोलिटिकल एजेण्ट कर्नल टॉड ने कोटा से 6 किलोमीटर बाहर आकर महाराव का स्वागत किया। कोटा में भारी खुशियां मनायी गयीं। जालिमसिंह ने महाराव को फिर से गद्दी पर बैठाकर उसे 25 स्वर्ण मोहरें भेंट कीं।

    कर्नल टॉड के कहने पर किशोरसिंह तथा जालिमसिंह का पुत्र माधोसिंह गले मिले तथा दोनों ने पिछली बातों के लिये एक दूसरे के प्रति खेद प्रकट किया। सारे गड़बड़ झाले के लिये झाला जालिमसिंह ने अपने आप को तो धिक्कारा ही साथ ही अपने पुत्र माधोसिंह से भरे दरबार में कहा कि यह सब तेरे कुकृत्यों का फल है जो मेरे स्वामी को इतना कष्ट हुआ और मुझे इतनी लज्जा उठानी पड़ी।

    ई.1824 में 85 वर्ष की आयु में जालिमसिंह की मृत्यु हुई। यद्यपि सूर्यमल्ल मिश्रण, कर्नल टॉड तथा मथुरालाल शर्मा ने उसकी स्वामिभक्ति पर अंगुली उठायी है किंतु इतिहास की नंगी सच्चाई यह है कि वह युग जो दुनिया भर की मक्कारियों से भरा हुआ था, उसमें जालिमसिंह जैसा वीर, लड़ाका, बुद्धिमान, नेक और स्वामिभक्त फौजदार मिलना मुश्किल था। वह अपने पिता झाला हिम्मतसिंह का दत्तक पुत्र था। उसने कोटा को जयपुर, मेवाड़, मराठों तथा पिण्डारियों से बचाया था। अन्यथा कोटा राज्य को इनमें से कोई शक्ति निगल चुकी होती और किशोरसिंह जैसे अयोग्य, अदूरदर्शी राजा का कोई निशान भी नहीं मिलता।

    वस्तुतः महाराव किशोरसिंह उस युग की अभिशप्त राजनीति से ग्रस्त राजा था जो चापलूसों की भीड़ में घिरे रहकर केवल अपने अधिकार को भोगने के लिये लालायित रहते थे। यदि उसके स्थान पर कोई अन्य बुद्धिमान राजा होता तो वह जालिमसिंह जैसे सेवक की सेवाओं का उपयोग अपने और अपने राज्य के भाग्य को संवारने में लगाता।

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  • अध्याय - 17 शिल्पग्राम संग्रहालय उदयपुर

     02.06.2020
    अध्याय - 17 शिल्पग्राम संग्रहालय उदयपुर

    अध्याय - 17 शिल्पग्राम संग्रहालय उदयपुर


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    शिल्पग्राम संग्रहालय, उदयपुर नगर के पश्चिम में हवाला गांव के निकट ग्रामीण शिल्प एवं लोककला परिसर ‘शिल्पग्राम’ में स्थित है। यह संग्रहालय अरावली पर्वतमालाओं के ग्रामीण परिवेश के बीच स्थित होने से दर्शकों को अनूठा अनुभव प्रदान करता है। इसकी स्थापना 70 एकड़ भूमि में की गई है।

    यह अरावली उपत्यकाओं के ग्रामीण तथा आदिम संस्कृति एवं जीवन शैली को दर्शाने वाला एक जीवन्त संग्रहालय है। इस परिसर में पश्चिमी भारत के पांच राज्यों की पारंपरिक वास्तु कला को दर्शाने वाली झौंपड़ियाँ निर्मित की गई हैं जिनमें इन राज्यों के भौगोलिक एवं सांस्कृतिक परिवेश तथा आदिवासियों के रहन-सहन को दर्शाया गया है।

    इस संग्रहालय में ग्रामीण अंचल में बनने वाली हस्तशिल्प कलाकृतियां प्रदर्शित की गई हैं जिन्हें दर्शक खरीद भी सकते हैं। यहाँ हथकरघों पर कार्य करते हुए बुनकरों को देखना बहुत रोमांचकारी होता है। मोलेला के कलाकारों द्वारा बनाई गई टैराकोटा कलाकृतियां भी प्रदर्शित की गई हैं। इस परिसर में राजस्थान की सात झौंपड़ियाँ हैं। दो झौंपड़ियाँ बनुकरों का आवास हैं जिनका प्रतिरूप राजस्थान के रेगिस्तान में स्थित गांव ‘रामा’ (जिला जालोर) तथा ‘सम’ (जिला जैसलमेर) से लिया गया है।

    मेवाड़ के पर्वतीय अंचल में रहने वाले कुंभकार की झौंपड़ी उदयपुर जिले के गांव ‘ढोल’ से ली गई है। दो अन्य झौंपड़ियाँ दक्षिणी राजस्थान की भील तथा सहरिया आदिवासियों की हैं जो मूलतः कृषक हैं। शिल्पग्राम में गुजरात राज्य की प्रतीकात्मक बारह झौंपड़ियाँ हैं। इनमें से छः झौंपड़ियाँ गुजरात प्रांत के कच्छ क्षेत्र के ‘बन्नी’ तथा ‘भुजोड़ी’ गांव से ली गई हैं।

    बन्नी झोंपड़ियों में रहने वाली रेबारी, हरिजन एवं मुस्लिम जाति के परिवारों की 2-2 झौंपड़ियाँ है जो कांच की कशीदाकारी, भरथकला तथा रोगनकाम के सिद्धहस्त शिल्पी माने जाते हैं। लांबड़िया उत्तर गुजरात के गांव ‘पोशीना’ के मृण-शिल्पी का आवास है जो विशेष प्रकार के घोड़े बनाते हैं। इसी के समीप पशिचमी गुजरात के छोटा उदयपुर क्षेत्र के ‘वसेड़ी’ गांव के बुनकर का आवास है।

    गुजरात के आदिम-कृषक-समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली राठवा और डांग जनजातियों की झौंपड़ियाँ हैं जो अपने पारंपरिक वास्तु-शिल्प एवं भित्ति-अलंकरणों के कारण सबसे अलग दिखाई देती हैं। लकड़ी की श्रेष्ठ नक्काशी से तराशी गई पेठापुर हवेली गुजरात के गांधीनगर जिले की काष्ठ कला का बेजोड़ नमूना है।

    शिल्पग्राम में शिल्प-बाजार, मृण-कला संग्रहालय, कांच जड़ित कार्य, भित्तिचित्र, बच्चों के लिए झूले, घोड़ा एवं ऊँट की सवारी आदि मुख्य आकर्षण हैं। यह प्रतिदिन प्रातः 11 बजे से सायं 7.00 बजे तक दर्शकों के लिए खुला रहता है।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-53

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-53

    पर्यावरणीय संस्कृति की पहचान : पशुमेले


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    पशुओं के क्रय-विक्रय के लिये पूरे प्रदेश में प्रति वर्ष 250 से अधिक पशु मेले लगते हैं जिनमें दूर-दूर के प्रांतों के पशु पालक एवं पशु व्यापारी आते हैं। राज्य सरकार द्वारा 12 मेलों को राज्य स्तरीय पशु मेलों में सम्मिलित किया गया है। इन मेलों में पशुओं के क्रय-विक्रय से राज्य के पशु पालकों को 50 से 60 करोड़ रुपयों की आय होती है। अधिकतर पशु मेले लोक देवताओं के नाम पर लगते हैं। मेलों में पशुपालकों को राज्य सरकार की ओर से पानी, बिजली, आवास, सुरक्षा, पशु चिकित्सा एवं टीकाकरण, मानव चिकित्सा आदि की सुविधाएं उपलब्ध करवाती है।

    राज्य स्तरीय मेलों में नागौर जिले में तीन मेले (श्री रामदेव पशु मेला नागौर, श्री बलदेव पशु मेला मेड़ता सिटी एवं श्री वीर तेजाजी पशु मेला परबतसर), झालवाड़ जिले में दो (श्री गोमती सागर पशु मेला झालरापाटन तथा श्री चंद्रभागा पशु मेला झालरापाटन), हनुमानगढ़ जिले में एक (श्री गोगामेड़ी पशु मेला गोगामेड़ी), भरतपुर जिले में एक (श्री जसवंत प्रदर्शनी एवं पशु मेला भरतपुर), अजमेर जिले में एक (श्री कार्तिक पशु मेला पुष्कर), करौली जिले में एक (श्री महा शिव रात्रि पशु मेला करौली), बाड़मेर जिले में एक (श्री मल्लीनाथ पशु मेला तिलवाड़ा), अलवर जिले में एक (बहरोड़ पशुमेला) तथा चित्तौड़गढ़ जिले में एक (चित्तौड़गढ़ पशु मेला) सम्मिलित हैं। इनमें से श्रीरामदेव पशु मेला नागौर, श्री बलदेव पशुमेला मेड़तासिटी, गोगामेड़ी पशुमेला गोगामेड़ी, पुष्कर पशु मेला पुष्कर तथा मल्लीनाथ पशु मेला तिलवाड़ा राजस्थान के पाँच प्रमुख पशु मेलों में गिने जाते हैं।

    राजस्थान के नागौर जिले में राज्य सरकार सर्वाधिक पशु मेलों का आयोजन करती है। नागौर जिले में तीन बड़े पशु मेले लगते हैं। ये तीनों ही प्रदेश स्तरीय हैं। इन तीनों ही मेलों में नागौर नस्ल के बैलों की बड़ी भारी संख्या में बिक्री होती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार आदि राज्यों में जहाँ कि कृषि जोत काफी छोटी है तथा उन खेतों में टैªक्टर आदि मशीनें नहीं चलाई जा सकतीं वहाँ नागौरी बैलों से खेती की जाती है। यही कारण है कि उत्तर एवं मध्य भारत के कई राज्यों के कृषक इन मेलों में आते हैं और बड़ी संख्या में बैलों को खरीद कर ले जाते हैं। नागौर जिला मुख्यालय, मेड़तासिटी तथा परबतसर में आयोजित होने वाले पशु मेलों में हजारों की संख्या में नागौरी नस्ल के बैल बिकते हैं।

    श्री रामदेव पशु मेला

    इस मेले का आयोजन जिला मुख्यालय नागौर पर होता है। किसी समय मानासर गाँव के समतल भू-भाग पर रामदेवजी की मूर्ति स्वतः प्रकट हुई। श्रद्धालुओं ने यहाँ पर छोटा सा मंदिर बना दिया। आस-पास के गाँवों के पशु पालक इस मंदिर में अपने पशुओं के स्वास्थ्य के लिये मनौती मांगने आने लगे। धीरे-धीरे इस स्थान पर पशुओं का मेला भरने लगा। आजादी के बाद राजस्थान सरकार ने इसे राज्य स्तरीय पशु मेलों में शामिल कर लिया। फरवरी 1958 से पशु पालन विभाग इस मेले का संचालन करता आ रहा है। यह मेला प्रति वर्ष नागौर कस्बे से लगे हुए मानासर गाँव में माघ माह में भरता है। इस मेले में नागौरी बैलों की बड़ी संख्या में बिक्री होती है।

    श्री बलदेव पशु मेला, मेड़ता सिटी

    राज्य सरकार द्वारा यह पशु मेला बलदेव राम मिर्धा की स्मृति में मेड़ता सिटी में चैत्र सुदी 1 से चैत्र सुदी 15 तक आयोजित किया जाता है। इस मेले में नागौरी बैलों की खरीद फरोख्त अधिक होती है। बैलों के साथ-साथ ऊँट, गधे, बकरी, भैंस आदि पशु भी बिकने आते हैं।

    श्री वीर तेजाजी पशु मेला, परबतसर

    यह पशु मेला लोक देवता वीर तेजाजी की स्मृति में श्रावण मास की पूर्णिमा से भाद्रपद की अमावस्या तक लगता है। पशु पालन विभाग ने इस मेले की बागडोर सन 1957 में संभाली। यह पशु मेला आमदनी के लिहाज से प्रदेश का सबसे बड़ा मेला है। 1734 ई. में जोधपुर के महाराजा अजीत सिंह ने तेजाजी का देवल बनाकर तथा तेजाजी की मूर्ति स्थापित कर इस पशु मेले की शुरूआत की।

    श्री कार्तिक पशु मेला, पुष्कर

    अजमेर जिले में हिंदुओं का प्राचीन तीर्थ पुष्कर राज स्थित है जिसे तीर्थ राज प्रयाग का गुरु कहा जाता है। यहाँ प्रत्येक वर्ष कार्तिक माह की एकादशी से पूर्णिमा तक पशु मेले का आयोजन होता है। इस मेले का आरंभ इन तिथियों में सरोवर स्नान के महात्म्य को लेकर हुआ था। यह कई हजार वर्ष पुराना धार्मिक मेला है जिसने अब पशु मेले का रूप ले लिया है। पुष्कर मेले में बड़ी संख्या में ऊँटों के क्रय-विक्रय तथा लोक कलाओं का प्रदर्शन होता है। यह मेला अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर चुका है। इस कारण प्रति वर्ष सैंकड़ों विदेशी पर्यटक इस मेले को देखने आते हैं। राज्य सरकार इस मेले में कई तरह की सुविधाएं उपलब्ध करवाती है। मेला परिसर में राज्य सरकार के विभिन्न विभागों की ओर से प्रदर्शनी भी लगायी जाती है।

    मल्लीनाथ पशु मेला, तिलवाड़ा

    बाड़मेर जिले के तिलवाड़ा मेले में थारपारकर एवं कांकरेज नस्ल की गायें तथा मालानी नस्ल के घोड़े बड़ी संख्या में बिकने के लिये आते हैं। इस मेले का आयोजन प्रति वर्ष चैत्रमास में किया जाता है। इन मेलों के आयोजन से पर्यावरण को बचाने में बड़ी सहायता मिलती है। इन मेलों के माध्यम से राजस्थान का पशुधन देश के दूरस्थ भागों में पहुंचता है जिससे देश की कृषि के यांत्रिकीकरण की गति रुकती है। पशुमेलों के माध्यम से पशुओं के विक्रय के कारण पशुवध की गति पर विराम लगता है। यदि राज्य में इतनी बड़ी संख्या में पशु मेलों का आयेाजन नहीं होता तो बड़ी संख्या में पशुओं के राजस्थान में ही निवास करने के कारण उनमें भेाजन, पानी एवं स्थान के लिये संघर्ष होता तथा बड़ी संख्या में पशुओं को मरने से नहीं बचाया जा सकता था।

    गधों का मेला, भावगढ़ बंध्या

    जयपुर जिले की सांगानेर पंचायत समिति में स्थित भावगढ़ बंध्या में प्रतिवर्ष गधों, खच्चरों एवं घोड़ों का एक मेला भरता है। किसी समय इस मेले में पच्चीस हजार गधे आते थे किंतु अब इनकी संख्या घटकर पाँच हजार रह गयी है। इस मेले का प्रारंभ बिना किसी उद्घाटन के होता है। क्योंकि कोई भी जन प्रतिनिधि इस मेले के उद्घाटन के लिये उपलब्ध नहीं होता है।

    जालोर जिले के मेले

    जालोर जिले के रानीवाड़ा एवं सांचोर कस्बों में प्रतिवर्ष विशाल पशु मेलों का आयोजन होता है। इन मेलों में अन्य पशुओं के अतिरिक्त सांचोरी किस्म की गायें बड़ी संख्या में बिकने के लिये आती हैं।

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  • मेवाड़ से अलग हो गए डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ और शाहपुरा

     02.06.2020
    मेवाड़ से अलग हो गए डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ और शाहपुरा

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    अंग्रेजों के भारत में आगमन के समय मेवाड़ राजवंश धरती भर के राजवशों में सबसे पुराना था। डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ और शाहपुरा राज्य भी पहले मेवाड़ के ही हिस्से थे। महाराणा सामंतसिंह के वंशजों ने बारहवीं शताब्दी में वागड़ राज्य की स्थापना की थी। इसकी राजधानी वटपद्रक थी जो बड़ौदा कहलाती थी। यह बड़ौदा अब भी डूंगरपुर जिले में छोटे से गाँव के रूप में स्थित है। वागड़ के राजा डूंगरसिंह ने ई.1358 में डूंगरपुर नगर की स्थापना की। बाबर के समय में उदयसिंह वागड़ का राजा था जिसने मेवाड़ के महाराणा के संग्रामसिंह के साथ मिलकर खानुआ के मैदान में बाबर का मार्ग रोका था। उदयसिंह के दो पुत्र थे- पृथ्वीराज तथा जगमाल। उदयसिंह ने अपनी जीवन काल में ही अपने राज्य के दो हिस्से कर दिये। माही नदी को सीमा मानकर पश्चिम का भाग छोटे पुत्र जगमाल के लिये स्थिर कर दिया तथा पूर्व का भाग बड़े पुत्र पृथ्वीराज को दिया गया।

    इस प्रकार डूंगरपुर तथा बांसवाड़ा राज्य अस्तित्व में आये। इन राज्यों के शासक अपने आपको पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न शासक मानते थे किंतु मेवाड़ के महाराणा दोनों राज्यों को अपने अधीन मानते थे। इस कारण प्रायः मेवाड़ राज्य इन राज्यों से कर लेने, राज्यारोहण के समय होने वाले टीके की रस्म की राशि वसूलने तथा अन्य विवादों के कारण इन पर आक्रमण करते रहते थे। इन आक्रमणों में प्रायः बड़ी संख्या में सैनिकों का रक्तपात होता था जिससे तीनों ही राज्य कमजोर होते जा रहे थे। चूंकि डूंगरपुर और बांसवाड़ा ने मुगलों का संरक्षण प्राप्त कर लिया था इसलिये महाराणा चाहकर भी इन राज्यों को पूर्ण रूप से मेवाड़ में नहीं मिला पाते थे।

    जब मुगलों का राज अस्ताचल को चला गया और मराठों का परचम लहराने लगा तो इन तीनों ही राज्यों को मराठों ने कुचल कर धर दिया। मराठों ने बांसवाड़ा राज्य का जीना हराम कर रखा था। ई.1737 में उन्होंने बांसवाड़ा नगर में घुसकर लूटमार मचाई। उस समय बांसवाड़ा का शासक उदयसिंह मात्र 4 साल का था तथा राज्यकार्य अर्थूणा का ठाकुर गुलालसिंह चौहान चलाता था जो उदयसिंह का मामा भी था। बांसवाड़ा के सरदार महारावल को लेकर भूतवे की पाल में चले गये। मराठों ने धन प्राप्ति की आशा में पूरा महल खोद डाला किंतु उनके हाथ कुछ नहीं लगा।

    कुछ स्वामिभक्त लोगों ने राज्य की इज्जत बचाने की चेष्टा की तथा परिवार सहित कट मरे। मात्र साढ़े तेरह वर्ष की आयु में महारावल उदयसिंह मर गया तथा उसका छोटा भाई पृथ्वीसिंह बांसवाड़ा का शासक हुआ। उसी समय मराठे फिर बांसवाड़ा में घुस आये और जबर्दस्त लूट मार करने लगे। इस पर सरदार लोग महारावल को लेकर पहाड़ों में चले गये। मराठा आनन्दराव ने निर्दयता पूर्वक लोगों से 25 हजार रुपये वसूल किये तथा शेष राशि की वसूली हेतु राज्य के प्रतिष्ठित लोगों को पकड़ कर धार ले गया। इसी बीच आनन्दराव मर गया और उसका पुत्र जसवंत राव (प्रथम) धार का स्वामी हुआ। उसने अपने सेनानायक मेघश्याम बापूजी को पुनः बांसवाड़ा भेजा। मेघश्याम ने अगला-पिछला कुल 72 हजार रुपया तय किया तथा रुपये प्राप्त होने पर ही राज्य के प्रतिष्ठित लोगों को छोड़ने का निर्णय सुनाया। इस पर महारावल पृथ्वीसिंह सितारा जाकर राजा शाहू से मिला और मराठा सरदारों की दुष्टता की शिकायत की। शाहू ने पृथ्वीसिंह को आदेश दिया कि वह चौथ की सारी रकम नियमित रूप से सितारा भेजे।

    इस प्रकार बांसवाड़ा को मराठों के आतंक से कुछ मुक्ति मिली। मराठों से निरंतर लड़ते रहने के कारण राज्य में राजपूतों की कमी हो गयी इस पर महारावल ने बाहर से मुसलमानों को बुलाकर सेना में भरती किया। ई.1800 में मराठों ने फिर से बांसवाड़ा को घेर लिया। उस समय महारावल विजयसिंह (ई.1786-1816) बांसवाड़ा का शासक था। उसने मराठों का जमकर मुकाबला किया और उन्हें मार भगाया। बांसवाड़ा की सेना ने मराठों की सेना के झण्डे और तोपें छीन लिये। जब ई.1817 में पिण्डारी करीमखां बांसवाड़ा राज्य में लूटमार करने लगा तो ई.1818 में महारावल ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी से दोस्ती कर ली।

    मेवाड़ राज्य में जहांगीर के शासन काल तक देवलिया ठिकाना था। जहांगीर के सेनापति महावतखां के उकसाने पर ई.1626 में देवलिया के ठिकानेदार सींहा ने अपने आप को स्वतंत्र घोषित कर दिया। महाराणा उसे दबाने में असफल रहा। 8 अप्रेल 1627 को सींहा की मृत्यु हो गयी और उसका बड़ा पुत्र जसवंतसिंह देवलिया का रावत बना। 7 नवम्बर 1627 को जहांगीर भी मर गया।

    जसवंतसिंह ने मेवाड़ के मोड़ी गाँव पर आक्रमण करके बहुत से मेवाड़ी सैनिकों को मार डाला। महाराणा जगतसिंह (प्रथम) ने जसवंतसिंह को समझाने के लिये उदयपुर बुलवाया। जब जसवंतसिंह महाराणा की बात मानने को तैयार नहीं हुआ तो मेवाड़ की सेना ने उसे तथा उसके एक हजार आदमियों को चम्पाबाग में घेर कर मार डाला। जसवंतसिंह का छोटा पुत्र हरिसिंह देवलिया का रावत हुआ। शाहजहां ने हरिसिंह को देवलिया का स्वतंत्र शासक स्वीकार कर लिया। इस प्रकार ई.1628 में देवलिया राज्य अस्तित्व में आया जिसक कुल क्षेत्रफल 889 वर्ग मील था।

    ई.1659 में औरंगजेब ने डूंगरपुर, बांसवाड़ा तथा देवलिया महाराणा को लौटा दिये इस पर हरिसिंह दर-दर भटकने लगा। हरिसिंह की माता ने हरिसिंह को एक हाथी, एक हथिनी तथा 50 हजार रुपये देकर महाराणा की सेवा में भेजा। महाराणा ने उसे अपना सामंत स्वीकार कर लिया। ई.1673 में हरिसिंह मर गया तथा उसका पुत्र प्रतापसिंह देवलिया का जागीरदार हुआ। ई.1698 में महाराणा जयसिंह की मृत्यु होने पर अमरसिंह द्वितीय मेवाड़ का महाराणा हुआ किंतु इस अवसर पर डूंगरपुर के रावल खुमानसिंह, बांसवाड़ा के रावल आबसिंह तथा देवलिया के रावत प्रतापसिंह ने उपस्थित होकर टीके का दस्तूर पेश नहीं किया। इस पर महाराणा ने तीनों राज्यों पर आक्रमण कर उनसे टीका वसूल किया।

    ई.1699 में प्रतापसिंह ने डोडेरिया का खेड़ा नामक स्थान पर प्रतापगढ़ नामक नगर बसाया और उसे मुख्यालय बनाया तब देवलिया ठिकाणा प्रतापगढ़ राज्य के नाम से जाना जाने लगा। प्रतापगढ़ का रावत सालिमसिंह (ई.1756 से 1774) प्रतापी राजा हुआ। मल्हार राव होलकर जैसा प्रबल शत्रु भी उससे चौथ वसूल नहीं कर पाया। सालिमसिंह ने मुगल बादशाह शाहआलम से सिक्का ढालने की स्वीकृति प्राप्त की। इसे सालिमसाही सिक्का कहा गया। प्रतापगढ़ राज्य मुगलों को 15 हजार मुगलिया रुपये वार्षिक कर दिया करता था। सालिमसिंह के पुत्र सामंतसिंह (ई.1774-1818) ने मुगलों को कर देना बंद करके 72 हजार 720 सालिमसाही सिक्के जसवंतराव होलकर को चौथ के रूप में देने स्वीकार कर लिये।

    ई.1804 में सामंतसिंह ने कर्नल मरे के माध्यम से ईस्ट इण्डिया कम्पनी से संधि की तथा जो राशि चौथ के रूप में मराठों को दी जाती थी वह खिराज के रूप में अंग्रेजों को देनी स्वीकार की किंतु लॉर्ड कार्नवालिस ने इसे स्वीकार नहीं किया तथा अगले 14 वर्ष तक प्रतापगढ़ राज्य दुख के सागर में गोते खाता रहा। 5 अक्टूबर 1818 को प्रतापगढ़ राज्य तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के बीच दूसरा समझौता हुआ। संधि की अन्य शर्तों के अतिरिक्त यह भी तय हुआ कि प्रतापगढ़ राज्य ने अब तक मराठों को 1 लाख 24 हजार 657 रुपये छः आने नहीं चुकाये हैं, नियमित खिराज (72,700 रुपये वार्षिक) के अतिरिक्तयह राशि भी चुकानी होगी। प्रतापगढ़ राज्य अरबों तथा मकरानियों को नौकर नहीं रखेगा। इस संधि के होने से पूर्व प्रतापगढ़ राज्य की औसत वार्षिक आय दो लाख रुपये थी। संधि के बाद राज्य की आय में पहले साल 42 हजार रुपये तथा दूसरे साल 50 हजार रुपये की वृद्धि हुई।

    शाहपुरा राज्य की स्थापना महाराणा अमरसिंह के द्वितीय पुत्र सूरजमल के वंशजों ने शाहजहां के समय की थी।

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