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  • अध्याय - 9 क्रिस्टल गैलेरी, उदयपुर

     02.06.2020
    अध्याय - 9 क्रिस्टल गैलेरी, उदयपुर

    अध्याय - 9 क्रिस्टल गैलेरी, उदयपुर

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    फतह प्रकाश महल में अब होटल स्थापित कर दिया गया है। इसी होटल में क्रिस्टल गैलेरी की स्थापना की गई है जिसमें विश्व का सबसे बड़ा क्रिस्टल संग्रह स्थापित किया गया है। यह सम्पूर्ण क्रिस्टल सामग्री महाराणा सज्जनसिंह (ई.1874-84) के निजी संग्रह की है। विक्टोरियन युग में महाराणा ने इसे एफ. एण्ड सी. ऑस्लर को आदेश देकर बनवाया था। इस संग्रह में क्रिस्टल चेयर्स, सोफासैट तथा पलंग भी शामिल हैं। यह प्रातः 9 बजे से सायं 6 बजे तक खुला रहता है।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-46

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-46

    पर्यावरण एवं संस्कृति की चितेरी चित्रकला (1)


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राजस्थान में अत्यंत प्राचीन काल से अब तक विकसित हुई चित्रकला की समृद्ध धारा का प्रवाह देखा जा सकता है। कोटा जिले के आलणियां, दरा, बैराठ तथा भरतपुर जिले के दर नामक स्थानों के शैलाश्रयों में आदिम मानव द्वारा उकेरे गये रेखांकन तथा मृद्भाण्डों पर उकेरी गयी कलात्मक रेखायें प्रदेश की अत्यंत प्राचीन चित्रण परंपरा की कहानी कहती हैं। राजस्थान से प्राप्त विक्रम संवत के पूर्व के सिक्कों पर अंकित मानव, पशु-पक्षी, सूर्य, चंद्र, धनुष, बाण, स्तूप, स्वास्तिक, वज्र, पर्वत, नदी आदि धार्मिक चिह्न प्राप्त होते हैं। बैराठ, रंगमहल तथा आहाड़ से प्राप्त सामग्री पर वृक्षावली तथा ज्यामितीय अंकन देखने को मिलता है। राजस्थान में बड़ी संख्या में जैन साधुओं ने हस्तलिखित पोथियों का निर्माण किया जिसमें अनेक कलात्मक चित्र बनाये।

    राजपूत चित्रकला : राजस्थान में चित्रकला की अनेक शैलियां विकसित हुई। जिनमें मेवाड़ शैली, मारवाड़ शैली, बूंदी शैली, किशनगढ़ शैली, जयपुर शैली, बीकानेरी शैली, अलवर शैली, कोटा शैली, नाथद्वारा शैली, उणियारा शैली, अजमेर शैली, डूंगरपुर शैली, देवगढ़ शैली आदि प्रमुख हैं। इन सब शैलियों को राजपूत चित्रकला के अंतर्गत रखा जा सकता है। राजपूत चित्रकला पर मुगल एवं ईरानी शैलियों का प्रभाव दिखाई देता है। राजस्थानी चित्रकला का वैज्ञानिक वर्गीकरण सर्वप्रथम डॉ. आनंद कुमार स्वामी ने ई.1916 में लिखी अपनी पुस्तक 'राजपूत पेंटिंग'में किया था। आनंद कुमार स्वामी, ओ. सी. गांगुली, हैवेल आदि विद्वानों ने इसे राजपूत चित्रकला कहा जबकि रामकृष्ण दास ने इसे राजस्थानी कला कहा। मुस्लिम प्रभाव से इस शैली में विभिन्न रियासतों में अलग-अलग चित्र शैलियों का विकास हुआ। इन शैलियों को पृष्ठ भूमि, बॉर्डर, पशु पक्षियों का अंकन, पोशाकों का अंकन, आंखों की बनावट, चित्रों की विषय वस्तु, चेहरे की दाढ़ी-मूंछें, चिबुक, होंठ आदि की बनावट से अलग-अलग किया जाता है। रंगों के आधार पर भी वर्गीकरण हो सकता है। जयपुर एवं अलवर शैलियों के चित्रों में हरे रंग का, जोधपुर एवं बीकानेर शैलियों में पीले रंग का, कोटा शैली में नीले रंग का, बूंदी शैली में सुनहरी रंग का तथा किशनगढ़ शैली में सफेद एवं गुलाबी रंग का अधिक प्रयोग होता है। बॉर्डर की पट्टी के रंगों से भी इन्हें अलग किया जाता है। उदयपुर में पीला, किशनगढ़ में गुलाबी एवं हरा, बूंदी में लाल एवं सुनहरी तथा जयपुर में चंदेरी एवं लाल रंग के बॉर्डर अधिक बनाये गये हैं।

    राजस्थानी चित्रकला को अध्ययन की दृष्टि से निम्नलिखित विभागों में विभाजित किया जा सकता है-

    मेवाड़ स्कूल : नाथद्वारा शैली, देवगढ़ उपशैली, शाहपुरा उपशैली, उदयपुर शैली, सावर उपशैली, बागौर ठिकाणे की उपशैली,बेगंू ठिकाणे की उपशैली, केलवा ठिकाणे की उपशैली।

    मारवाड़ स्कूल : जोधपुर शैली, किशनगढ़ शैली, नागौर उपशैली, सिरोही शैली, बीकानेर शैली, जैसलमेर शैली, भिणाय ठिकाणे की उपशैली, घाणेराव शैली, जूनियां शैली।

    हाड़ौती स्कूल : बूंदी शैली, झालावाड़ शैली, कोटा शैली।

    ढूंढाड़ स्कूल : आम्बेर शैली, शेखावाटी शैली, उणियारा ठिकाणे की उपशैली, ईसरदा ठिकाणे की उपशैली, शाहपुरा शैली, जयपुर शैली, अलवर शैली।


    मेवाड़ प्रदेश की चित्रकला

    मेवाड़ प्रदेश की चित्रकला के अंतर्गत उदयपुर शैली, नाथद्वारा शैली, देवगढ़ उपशैली, शाहपुरा उपशैली, चावंड, बनेड़ा, बागौर, सावर, बेगूं तथा केलवा ठिकाणों की चित्रकला आती है।

    मेवाड़ शैली : इसे उदयपुर शैली भी कहते हैं। ई.1260 का श्रावक प्रतिक्रमण चूर्णि नामक चित्रित ग्रंथ मेवाड़ शैली का प्रथम उदाहरण है। यह ग्रंथ ताड़पत्रों से बनाया गया है। इसके चित्र नागदा के सास-बहू मंदिर तथा चित्तौड़ के मोकल मंदिर की तक्षण कला जैसे हैं। गरुड़, नासिका, परवल की खड़ी फांक जैसे नेत्र, घुमावदार एवं लम्बी अंगुलियां, लाल-पीले रंग की प्रचुरता, छोटी ठोड़ी, अलंकारों की प्रधानता आदि इस शैली की विशेषतायें हैं। उदयपुर शैली में कदम्ब के वृक्ष एवं हाथियों का प्रमुखता से अंकन किया गया है। मेवाड़ में राणा कुंभा, राणा सांगा, मीरांबाई, राणा प्रताप, उदयसिंह, जगतसिंह, राजसिंह, जयसिंह, अमरसिंह आदि के काल में चित्रकला का अच्छा विकास हुआ। महाराणा अमरसिंह प्रथम के काल में यह अपने चरम पर पहुंची। इसे मेवाड़ की चित्रकला का स्वर्ण युग भी कहा जाता है। चावण्ड में ई.1605 में चित्रित भेंट, रसिक प्रिया, उदयपुर में ई.1648 में चित्रित रामायण तथा आर्ष रामायण, ई.1741 में चित्रित गीत गोविंद तथा ई.1719 में चित्रित बिहारी सतसई उदयपुर शैली के प्रमुख चित्र हैं। मेवाड़ शैली में चित्रित रागमाला, बारहमासा, पंचतंत्र तथा रसमंजरी भी उल्लेखनीय हैं।

    नाथद्वारा शैली : ई.1670 में श्रीनाथजी के विग्रह के साथ ब्रज की चित्रण परंपरा मेवाड़ में आयी तथा उदयपुर शैली व ब्रज शैली के मिश्रण से नाथद्वारा शैली का विकास हुआ। इस शैली में आंखें हिरण के समान बनाई जाती हैं। गायों का अधिक अंकन किया जाता है। यमुना के तट, अन्नकूट, जन्माष्टमी उत्सव आदि का अंकन भी इस चित्र शैली की प्रमुख विशेषता है। इस शैली के चित्रों में हरे एवं पीले रंग का अधिक प्रयोग किया जाता है।

    मेवाड़ की लघु चित्र शैली : महाराणा जगतसिंह प्रथम (ई.1628 से 1652) के काल में चित्रकला का खूब विकास हुआ। मेवाड़ के राणा शैव मत के उपासक थे किंतु इस काल में वल्लभ संप्रदाय के प्रसार के कारण श्री कृष्ण के जीवन से संबंधित चित्रों का निर्माण अधिक हुआ। इस काल में रागमाला (ई.1628), रसिकप्रिया (ई.1628-30), गीतगोविंद (ई. 1629), भगवद् पुराण (ई.1648) एवं रामायण (ई.1649) आदि विषयों पर लघु चित्रों का निर्माण हुआ। इनमें से अधिकतर चित्र देश-विदेश के संग्रहालयों में सुरक्षित हैं।

    देवगढ़ उपशैली : इस शैली का विकास देवगढ़ के रावत द्वारकादास चूण्डावत द्वारा हुआ। यह मेवाड़ शैली की उपशैली है। मोटी एवं सधी हुई रेखाएं, पीले रंगों का बाहुल्य, मारवाड़ के अनुकूल स्त्री पुरुषों की आकृतियां, शिकार, गोठ, आदि से सम्बन्धित चित्र इसकी विशेषता है।

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  • अध्याय - 10 विंटेज कार संग्रहालय, उदयपुर

     02.06.2020
    अध्याय - 10 विंटेज कार संग्रहालय, उदयपुर

    अध्याय - 10 विंटेज कार संग्रहालय, उदयपुर


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    होटल गार्डन में मेवाड़ के महाराणाओं की पुरानी लक्जरी कारों का संग्रह स्थापित किया गया है। इनमें ई.1939 की रॉल्स रॉयस कार, कैडिलैक ओपन कन्वर्टीबल्स, मर्सीडीज के दुर्लभ मॉडल्स, 1936 का वॉक्सहॉल मॉडल तथा 1937 का ओपल मॉडल भी शामिल हैं। यह भारत के विरले कार सग्रंहों में से एक है। यह प्रातः 9 बजे से सायं 6 बजे तक खुला रहता है।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-47

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-47

    पर्यावरण एवं संस्कृति की चितेरी चित्रकला (2)


    मरुप्रदेश की चित्रकला


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    तिब्बती इतिहासकार तारानाथ (16वीं शताब्दी) ने मरूप्रदेश में 7वीं शताब्दी के श्रीरंगधर चित्रकार का उल्लेख किया है। ई. 1422-23 में लिखित सुपार्श्वनाथ चरितम् के चित्रों में जैन एवं गुजराती शैली का प्रभाव दृष्टिगत होता है। ई. 1450 के लगभग गीत गोविंद तथा बालगोपाल स्तुति की एक-एक प्रति प्राप्त हुई है जिनमें राजस्थान के प्रारंभिक चित्रण को देखा जा सकता है। जोधपुर, बीकानेर, किशनगढ़, जैसलमेर, नागौर, घाणेराव तथा अजमेर शैलियों को मारवाड़ चित्रकला तथा मरुप्रदेश की चित्रकला भी कहते हैं। राजा मालदेव के समय (ई. 1532 से 1568) का जोधपुर शैली का उत्तराध्ययन सूत्र बड़े महत्व का है। अब यह बड़ौदा संग्रहालय में रखा है।

    मारवाड़ शैली : ई. 1623 की पाली रागमाला चित्रावली, 17वीं शताब्दी की ही जोधपुर शैली की सूरसागर पदों पर आधारित चित्रावली तथा रसिकप्रिया में रंगों की चटकता और वस्त्राभूषण आदि का चित्रांकन महत्त्वपूर्ण है। जोधपुर दुर्ग में चौखेलाव महल के भित्ति चित्र, राजा मालदेव के समय में बने थे। राजा सूरसिंह के समय के अनेक लघुचित्र, ढोला मारू तथा भागवत आदि के चित्र भी उल्लेखनीय हैं। उन्नीसवीं सदी में मारवाड़ नाथ संप्रदाय से विशेष रूप से प्रभावित रहा। अतः राजा मानसिंह के समय के नाथ संप्रदाय के मठों के चित्र भी विशिष्ट बन पड़े हैं। इस शैली के पुरुष लम्बे-चौड़े, गठीले बदल के तथा गलमुच्छों, ऊंची पगड़ी तथा राजसी वैभव वाले वस्त्राभूषणों से युक्त हैं। स्त्रियों की वेशभूषा में ठेठ राजस्थानी लहंगा, ओढ़नी, लाल फूंदने आदि का प्रयोग प्रमुख रूप से हुआ है। जोधपुर शैली में भी पीले रंग का अधिक प्रयोग हुआ है। इस शैली के चित्रों में आम के पेड़, कौवा एवं घोड़ा अधिक देखने को मिलते हैं। राम रावण युद्ध, कौंधती बिजली, मरुस्थल के दृश्य, लोक देवताओं के चित्र, दुर्गा सप्तशती का चित्रण भी इस शैली की विशेषतायें हैं।

    बीकानेर शैली : बीकानेर शैली में मुगल शैली के प्रभाव के कारण नारी अंकन में तन्वंगी देह चित्रित की गयी है। इस चित्रांकन में हरे, लाल, बैंगनी, जामुनी तथा सलैटी रंगों का प्रयोग किया गया है। पीले रंग को भी प्रमुखता दी गई है। शाहजहाँ और औरंगजेब शैली की पगड़ियों के साथ ऊंची मारवाड़ी पगड़ियां, ऊँट, हिरण आदि पशुओं और कौवा तथा चील आदि पक्षियों के साथ राजपूती जीवन शैली की छाप दिखायी देती है। ऊँट की खाल पर चित्रों का अंकन इस शैली की विशेषता है। बीकानेर के मंदिरों में मथेरण, उस्ता एवं चूनगर जाति के चित्रकारों ने विशाल संख्या में भित्ति चित्रों का निर्माण किया। भाण्डा शाह के जैन मंदिर के रंगमंडप का शिखर तथा इसकी कलात्मक चित्रकारी अत्यंत आकर्षक है।

    नागौर उपशैली : नागौर उपशैली में पारदर्शी वेशभूषा एवं बुझे हुए रंगों का प्रयोग अधिक किया गया है। नागौर दुर्ग में काष्ठ के दरवाजों एवं किले के भित्तिचित्र तथा घाणेराव के ठिकाने में बने हुए अनेक लघुचित्र देखने योग्य हैं।

    जैसलमेर शैली : इस शैली में दाढ़ी मूंछों की मुखाकृति प्रमुखता से बनाई जाती है। चेहरे पर ओज एवं वीरत्व की प्रधानता होती है। मूमल इस शैली का प्रमुख चित्र है।


    किशनगढ़ शैली की चित्रकला

    किशनगढ़ शैली में राधा कृष्ण की लीलायें, बणी-ठणी, रंग-बिरंगे उपवन आदि की बहुलता है। तारों एवं चंद्रमा से युक्त रातों का अंकन खूबसूरती से किया गया है। इस शैली के चित्रों में पुरुष लम्बे, इकहरे, नील छवि वाले, समुन्नत ललाट, कर्णांत तक खिंचे अरुणाभ नयन, मोती जड़ित श्वेत या मूंगिया पगड़ी वाले चित्रित किये गये हैं। जबकि नारियां तन्वंगी, लम्बी, गौरवर्णा, नुकीली चिबुक, सुराहीदार गर्दन, क्षीणकटि, लम्बी कमल पांखुरी सी आँखों वाली चित्रित की गयी हैं। दूर-दूर तक फैली झीलों में जल क्रीड़ा करते हंस, बत्तख, सारस, नौकायें, केले के गाछ तथा रंग-बिरंगे उपवन किशनगढ़ शैली को दूसरी शैलियों से अलग करते हैं। किशनगढ़ की चित्रकला को चरम पर पहुंचाने का श्रेय सावंतसिंह (ई.1699-1764) को है जो नागरीदास के नाम से प्रसिद्ध हुए। वे राजा राजसिंह के पुत्र थे। उनकी प्रेयसी का नाम बणी ठणी था। वह विदुषी, परम संुदरी, संगीत में दक्ष तथा कवियत्री थी। उसके प्रति राजा नागरीदास का आत्मनिवेदन काव्यधारा के रूप में प्रस्फुट हुआ। जिसने चित्रकारों को विषय वस्तु, कल्पना तथा सौंदर्य का विशाल आकाश प्रदान किया। भारत सरकार ने 5 मई 1973 को बणी ठणी पर एक डाक टिकट भी जारी किया। इस चित्र को ई.1778 में किशनगढ़ के चित्रकार निहालचंद ने बनाया था।


    हाड़ौती की चित्रकला

    चौहान वंशी हाड़ाओं का शासन बूंदी, कोटा तथा झालावाड़ आदि क्षेत्रों पर रहा। इस कारण इन क्षेत्रों से प्राप्त चित्र हाड़ौती शैली के अंतर्गत आते हैं।

    बूंदी शैली : इस शैली में पशु-पक्षियों का सर्वाधिक अंकन किया गया है। वर्षा में नाचते हुए मोर, वृक्षों पर कूदते बंदर और जंगल में विचरण करते हुए सिंह सर्वाधिक इसी शैली के चित्रों में अंकित किये गये हैं। बूंदी शैली की आकृतियां लम्बी, शरीर पतले, स्त्रियों के अधर अरुण, मुख गोल, चिबुक पीछे की ओर झुकी तथा छोटी होती है। प्रकृति तथा स्थापत्य के चित्रांकन में श्वेत, गुलाबी, लाल, हरे रंगों का प्रयोग किया गया है। राग-रागिनी, नायिका भेद, ऋतु वर्णन, बारहमासा, कृष्णलीला, दरबार, हस्तियुद्ध, उत्सव आदि का अंकन इस शैली में प्रमुख स्थान रखता है। इस शैली में सुनहरी रंग का प्रयोग अधिक हुआ है। साथ ही खजूर के पेड़, बत्तख एवं हिरण का बहुतायत से अंकन किया गया है। महाराव उम्मेदसिंह के शासन काल में निर्मित चित्रशाला (रंगीन चित्र) बूंदी चित्र शैली का श्रेष्ठ उदाहरण है।

    कोटा शैली : कोटा शैली बूंदी शैली से आई है। कोटा शैली में शिकार का बहुरंगी तथा वैविध्यपूर्ण चित्रण देखा जा सकता है। इस शैली में नीला रंग, खजूर के वृक्ष, बत्तख एवं शेर आदि का प्रमुखता से अंकन किया गया है। झालावाड़ के राजमहलों में श्रीनाथजी, राधा-कृष्ण लीला, रामलीला तथा राजसी वैभव के चित्र दर्शनीय हैं। प्राचीनतम गुहा चित्र हाड़ौती क्षेत्र में पाये गये हैं।

    तंजौर शैली : भित्ति चित्रों की दृष्टि से कोटा सबसे सम्पन्न है। दक्षिण भारत के चित्रकारों ने भी कोटा में भित्ति चित्र बनाये। तंजौर शैली के अनेक चित्र कोटा के भवनों में चित्रित हैं।


    ढूंढाड़ की चित्रकला

    आमेर, जयपुर, अलवर, शेखावाटी, उणियारा, करौली आदि शैलियां ढूंढाड़ चित्रकला में आती हैं। झिलाय ठिकाणा भी ढूंढाड़ी चित्रकला के अंतर्गत आता है।

    जयपुर शैली : जयपुर शैली में हरे रंग के प्रयोग, पीपल एवं वट के वृक्ष मोर एवं अश्व का अधिक चित्रांकन किया गया है। मुगलों एवं ब्रज क्षेत्र की संस्कृति का प्रभाव भी इस चित्रकला शैली पर देखा जा सकता है। आमेर की छतरियों, बैराठ के मुगल गार्डन, मौजमाबाद के निजी चित्रों में मुगल प्रभाव हावी है। राजा जयसिंह के समय के चित्रों में रीतिकालीन प्रभाव स्पष्ट दिखायी देता है। इस काल में आदम कद चित्रों की भी परंपरा पड़ी। माधोसिंह प्रथम के काल में गलता के मंदिरों, शीशोदिया रानी के महल, चंद्रमहल तथा पुण्डरीक की हवेली में कलात्मक भित्ति चित्रण हुआ। सवाई प्रतापसिंह के काल में राधाकृष्ण की लीलायें, नायिका भेद, राग-रागिनी, बारहमासा आदि का चित्रण प्रमुख रूप से हुआ।

    अलवर शैली : इस शैली में भी जयपुर शैली की सारी विशेषतायें मिलती हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि जयपुर शैली और दिल्ली शैली के मिश्रण से अलवर शैली बनी। हरे रंग के प्रयोग, पीपल एवं वट के वृक्ष, मोर एवं अश्व का अधिक चित्रांकन किया गया है। इस शैली में वेश्याओं के जीवन का खूबसूरती से अंकन किया गया है।

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  • अध्याय - 11 जनजाति संग्रहालय उदयपुर

     02.06.2020
    अध्याय - 11 जनजाति संग्रहालय उदयपुर

    अध्याय - 11 जनजाति संग्रहालय, उदयपुर


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    माणिक्य लाल वर्मा जनजाति शोध संस्थान उदयपुर द्वारा राज्य की विभिन्न जन जातियों की सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था को संरक्षित तथा प्रदर्शित करने के उद्देश्य से 30 दिसम्बर 1983 को संस्थान में जनजाति संग्रहालय की स्थापना की गई। इस संग्रहालय के प्रवेश द्वार पर मेवाड़ के महाराणा का भीलू राजा के साथ चिह्न ‘जो दृढ़ राखे धर्म को तेहि राखे करतार’ रखा हुआ है। संग्रहालय में राजस्थान की विभिन्न जनजातियों के चित्र, वस्त्राभूषण, अस्त्र-शस्त्र, विविध मूर्तियां, देवरा, इष्ट देवता, लोक संस्कृति एवं कला को प्रदर्शित किया गया है।


    विभिन्न वाद्ययंत्र, भित्तिचित्र, मांडणे, सांझी, गोदना, एवं लोकनृत्य एवं मेलों की सचित्र झांकियां प्रस्तुत की गई हैं। इनमें राज्य की प्रमुख जनजातियों- भील, मीणा, गरासिया, कथोड़ी एवं सहारिया जाति की शैली के दर्शन किए जा सकते हैं। खाद्यान्न संग्रहण हेतु पारम्परिक कोठियां, मिट्टी के बर्तन, रोटी सेकने का तवा, उसी रूप में प्रयोग में लाते हुए दर्शाया गया है। चूल्हे पर रोटी बनाती महिला, बांस की टोकरी में रोटियां रखती महिला का चित्र प्रदर्शित किया गया है।

    आदिवासी स्त्री -पुरुषों के आभूषणों को एक पृथक् प्रकोष्ठ में प्रस्तुत किया गया है। विभिन्न आदिवासी स्त्री-पुरुषों के, प्लास्टर ऑफ पेरिस से बने मॉडल प्रदर्शित किए गए हैं। इनमें शृंगार करती बालिकाएं, केश विन्यास करती नवयुवतियां, चटकीले शृंगारों से सजी आदिवासी महिलाएं, मूसल से धान कूटती महिलाएं, भोपा-भोपी आदि प्रमुख हैं।

    बेणेश्वर मेला, त्रिवेणी संगम, मानगढ़ धाम तथा गवरी नृत्य के चित्र प्रदर्शित किए गए हैं। आर्थिक व्यवस्था को प्रदर्शित करते चित्र यथा कृषि करते हुए आदिवासी, जंगल से वन उपज का संकलन करते हुए आदिवासी महिलाएं, देवी-देवताओं की पूजा करते हुए आदिवासी, नृत्य संगीत के कार्यक्रमों में संलग्न आदिवासी भी प्रदर्शित किए गए हैं। भीलों की मादल, खड़ताल, नौपत-नगाड़ा, बांकिया, ढोल, ढोलक, कमायचा, तंदूरा, इकतारा आदि भी प्रदर्शित किए गए हैं।

    आदिवासी क्षेत्रों की वनसम्पदा, खनिज सम्पदा, पशु सम्पदा के चित्र भी रखे गए हैं। वन्य जीव, पक्षी एवं सरीसृप के चित्र और अभयारण्यों के मनोरम दृश्य भी प्रदर्शित किए गए हैं। मोलेला गांव के कुम्हारों की कलाकृतियां, मेवाड़ और बागड़ के देवी-देवताओं की टेराकोटा मूर्तियां भी प्रदर्शित हैं। संग्रहालय में आदिवासियों के जीवन में होने वाले बदलावों को भी दर्शाया गया है। बहुत से चित्रों में मत्स्य पालन करते, आखेट की नवीन तकनीक का प्रयोग करते, सिंचाई सुविधाओं का उपयोग करते, खेती में रासायनिक उर्वरकों का उपयोग करते तथा कीटनाशकों का उपयोग करते हुए आदिवासियों को दर्शाया गया है।

    संग्रहालय में आदिवासी जीवन के दृश्यों के साथ ऑडियो-वीडियो कैसेटों से आदिवासियों के जीवन के रोचक तथा आकर्षक प्रसंगों को प्रदर्शित किया गया है। आदिम जाति शोध संस्थान ने ऐसे ही संग्रहालय दो अन्य स्थानों- शिल्पग्राम उदयपुर तथा आबू पर्वत के राजकीय संग्रहालय में एक खण्ड के रूप में विकसित किए हैं।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-48

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-48

    पर्यावरण को साधती हस्तकलाएं (1)


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    पाषाण युग से लेकर आज तक हस्तकलाएं मनुष्य की साथी रही हैं। मनुष्य के अधिवास से लेकर उसके बौद्धिक विकास, उसकी आवश्यकतायें, उसके धर्म, दर्शन, चिंतन तथा आध्यात्म की पृष्ठभूमि, सामाजिक संरचना, आर्थिक स्थिति, वैज्ञानिक प्रगति, कला प्रतिभा तथा रस निष्पत्ति के दर्शन हस्तकलाओं में होते हैं। राजस्थान में अत्यंत प्राचीन काल से हस्तकलाओं के विकसित अवस्था में होने के प्रमाण मिले हैं जिनमें तीसरी शताब्दी ईस्वी पूर्व के कलात्मक स्तंभ शामिल हैं। राजस्थान की बुनाई, छपाई, रंगाई, जवाहरात की कटाई, मीनाकारी, आभूषण निर्माण, बंधेज, गलीचा, नमदा बुनाई, संगमरमर, हाथी दंात, चंदन, लाख व काष्ठ के कलात्मक कार्य, चीनी मिट्टी का काम, धातु की कारीगरी, चमड़े की जूतियां व थैले, कागज उद्योग, चित्रकला, पुस्तकों का कलात्मक लेखन आदि का काम सदियों से राजस्थान में होता आया है जिससे स्थान-स्थान पर हस्त कलाओं के व्यापारिक केंद्र स्थापित हो गये हैं। यही कारण है कि राजस्थान की दस्तकारी ने न केवल भारत भर में अपितु विश्व भर में अपनी पहचान बनायी हैं जो अपनी उत्कृष्टता के लिये दूर-दूर तक प्रसिद्ध हैं।

    कपड़ा बुनाई

    अत्यंत प्राचीन काल से राजस्थान में कपास का उत्पादन बड़े पैमाने पर होता रहा है। इस कारण गाँव-गाँव में हैण्डलूम्स तथा पिटलूम्स पर मोटा व पतला सूती तथा ऊनी खादी का कपड़ा तैयार किया जाता है। किसी समय जालोर तथा मारोठ की टुकड़ी मारवाड़ के कपड़ों में सर्वाेत्तम समझी जाती थी। मांगरोल (कोटा से लगभग 15 कि.मी. दूर) की मसूरिया साड़ियां, जैसलमेर की जरीदार साड़ी, चित्तौड़गढ़ के बिछौने के जाजम, नाथद्वारा की छपी हुई साड़ियां तथा जोधपुर की मलमल दूर-दूर तक प्रसिद्ध है।

    कपड़ा रंगाई एवं छपाई

    पुराने जमाने में कपड़ों के रंग तथा उनके पहिनने के ढंग से ही लोगों की जाति, निवास स्थान, सामाजिक स्थिति तथा पेशे की पहचान हो जाती थी। कपड़े रंगने वाले नीलगर अथवा रंगरेज कहलाते थे। राजस्थान में बगरू, आकोला, सांगानेर तथा बाड़मेर की छपाई, शेखावाटी तथा जोधपुर का बंधेज व चूनरी का काम और शेखावाटी का पेचवर्क दूर-दूर तक प्रसिद्ध है।

    बगरू की छपाई : बगरू की छपाई में रासायनिक रंगों का उपयोग नहीं किया जाता। वनस्पति रंग, घोड़े की खुरताल, गुड़, गोंद, हरड़ का पाऊडर अनार के छिलके, हल्दी, लोहा आदि प्रयुक्त होते हैं। पिछले चार सौ वर्षों से बगरू में छपाई का काम होता है।

    आकोला की छपाई : आकोला की छपाई में गुड़, अनार की छाल, सकूड़, केसू, हरड़, हरसिंगार, गोंदा, कोचा, हल्दी, मजीठ, कत्था, रतनजोत, नील, लाल चंदन, पोआड़िया, लोहे की जंग, मिट्टी, गोबर, मुल्तानी मिट्टी, खाखरे के पत्ते तथा गेरू के साथ फिटकरी, कास्टिक सोड़ा, नेफ्थोल आदि का प्रयोग किया जाता है।

    सांगानेर की छपाई : राजस्थान के हस्तकला उद्योग में सांगानेर की छपाई विशेष स्थान रखती है। इसमें गोबर, तिल का तेल, बकरी की मेंगनी, सोड़ा, हरड़, गुड़, लोहे का जंग, गोंद, सोड़ा, अनार के छिलके, छान की मिट्टी तथा हल्दी का प्रयोग किया जाता था किंतु कुछ वर्षों से रासायनिक रंगों का प्रयोग किया जाता है तथा प्राकृतिक रंगों का प्रयोग कम हो गया है।

    बाड़मेर की छपाई : बाड़मेर में वस्त्रों की छपाई का काम अधिकतर खत्री जाति के लोग करते हैं। 60-70 परिवारों के लगभग 400 व्यक्ति इस कार्य में लगे हुए हैं। बाड़मेर अजरक प्रिण्ट विश्व प्रसिद्ध है। यहाँ पेचवर्क का कार्य भी अच्छा होता है। ढोला मारू की प्रेम गाथा, नृत्य मुद्रा में महिला-पुरुष, हाथ जोड़कर नमस्कार के रूप में राजस्थानी स्वागत की परम्परा में छपाई के साथ-साथ अजरक प्रिण्ट बाड़मेर की निराली शान है।

    मेण की छपाई, किशनगढ़ी छपाई, दाबू छपाई तथा फद्र की छपाई : सवाई माधोपुर की तरफ मेण की छपाई, किशनगढ़ी छपाई, दाबू छपाई तथा फर्द की छपाई का प्रचलन है जिनमें पापड़ खाद, बकरी की कुटी हुई मेंगनी, तेल, मांड, आल की लकड़ी का पीला रंग, कुटी हुई मिट्टी, गोंद तथा चूल्हे की राख आदि का प्रयोग किया जाता है।

    ब्लॉक छपाई : बाड़मेर जिले में खत्री तथा मुसलमान छींपा रासायनिक एवं वानस्पतिक रंगों के उपयोग से ब्लॉक छपाई करते हैं। वानस्पतिक रंगों में अजरख और दाबू तकनीका का प्रयोग होता है। हरड़ा, टेसू के फूल, इण्डिगो, खींप, फोग बोरड़ी, काचरी, रोहिड़े की टहनियों से रंग बनाये जाते हैं। खींप से आसमानी, केसूला से पीला, खेजड़ी की छाल से भूरा, फोग की लकड़ी से हल्का लाल रंग, बोरड़ी की छाल से गहरा भूरा, गूगल से कत्थई, थोर से हरा रंग प्राप्त करते हैं। कपड़े की धुलाई के लिये ऊँट का मींगणा, गाय का गोबर तथा भेड़ की लेड़ी काम में आती है। इस प्रिंटिंग में मुख्यतः मानव आकृतियां, पशु-पक्षी, पुष्प, और ज्यामितीय बूटियां प्रिंट की जाती हैं। महिलाओं के लिये तिलक छाप ओढ़ने, हारभांत, बावलिया, बेपत्ती घाघरे, सूरज फूलभांत के ओढ़ने, कटारी छींट के घाघरे, धनक ओढ़नी, पीली छींट में मोरिया भांत के घाघरे, दाणो छाप, नागरू घाघरे, केवड़ा भांत घाघरे, घन, गुलबदन, मीनाकारी के घाघरे तैयार किये जाते हैं। इस प्रिंट की चद्दरें तथा तकिये अधिक प्रसिद्ध हैं। बाड़मेर एवं बालोतरा कस्बों में यह कार्य अधिक होता है।

    कढ़ाई व पेचवर्क

    बाड़मेर एवं जैसलमेर जिलों में रंग-बिरंगे रेशमी धागों से कपड़ों पर कढ़ाई और पेचवर्क से सजे घाघरे, कांचलियां, थैले, शॉल, कुशन कवर, चादरें, मेजपोश, बटुए, पासपोर्ट आकार की थैलियां, वॉल हैंगिंग, कुर्ती अंगिया, बुकानी, चांदनी, फ्रॉक, साड़ी फैन कवर, टी. वी. कवर, मैगजीन बैग आदि विविध प्रकार की सामग्री तैयार की जाती है। कांच कशीदाकारी का भी अनूठा कार्य होता है। माना जाता है कि यह कला थारपारकर क्षेत्र की संस्कृति का विशिष्ट हिस्सा थी। आजादी के बाद इसे सिंध और ब्लूचिस्तान से लाकर पुनर्जीवित किया गया। बाड़मेर जिले की चौहटन, शिव, बाड़मेर, गुड़ामालानी और पचपदरा तहसील के सैंकड़ों गाँवों मं 15 से 20 हजार महिलाएं इस कार्य से आजीविका अर्जित करती हैं। कढ़ाई और पेचवर्क दोनों में छोटे-छोटे बटन के आकार की कांच की टिकड़ियां सुईं से तुरपाई करके ऊनी, रेशमी तथा सूती वस्त्रों पर ऐसे जड़ दी जाती हैं कि वे कपड़े का ही अभिन्न अंग प्रतीत होती हैं। इस कला से कपड़ों पर पशु-पक्षी, नदियाँ, पहाड़, फल-फूल तथा शुभ चिह्न बनाये जाते हैं।

    भरत : पश्चिमी राजस्थान में कशीदाकारी को भरत कहते हैं।

    पक्का भरत : इस कशीदे में फूल, पक्षियों के चित्र बहुततायत से बनाये जाते हैं। लड़ी वाले टांके से भरत लम्बे समय तक टिकाऊ रहता है इसलिये इसे पक्का भरत कहते हैं।

    सूफ : इस कशीदे में कपड़े के पीछे से तुरपाई की जाती है। ज्यामितीय आकृतियों वाले इस भरत का आधार त्रिकोण है जिसे सूफ कहते हैं। सूफ दो प्रकार के होते हैं- आठ ताड़ी, जिसमें डिजाइन के आठ तिकोने होते हैं तथा सोलह ताड़ी, जिसमें डिजाइन के सोलह तिकोने होते हैं। सूफ को सुंदरता देने के लिये मोर, बिलंग (आधे सूफ का बोर्डर), पताशिया, कुंजड़ी, पनड़ी, सिलबिली (गतिमान), तारड़ा (तार), धुन, बखिया, घिंघरा, सबकोट बनाये जाते हैं।

    मुक्का : सोने-चांदी की धातु के तारों को धागों में लपेट कर कपड़े पर कशीदा किया जाता है। इसमें बखिया टांके का प्रयोग होता है।

    कम्भीरी : कुम्हार समुदाय की कला होने के कारण इसे कम्भीरी कहते हैं। इसमें कच्चे धागे से आउटलाइन दी जाती है तथा रंग नहीं भरे जाते। अधिकतर चौकोर डिजाइनें बनाई जाती हैं। कपड़े के ताने को गिनकर कशीदा किया जाता है। लाल कपड़े पर पले और काले धागे का प्रयोग होता है। खलीची, पेचकी, कोथली, बड़ा बुचका, राली, ईण्डोणी में इस शैली का उपयोग होता है।

    हुरमजी : इसे बावलिया, कच्छी भरत तथा सिंधी भरत भी कहते हैं। इसमें भरत वाले कपड़े पर धागे की जाली तैयार की जाती है तथा बिना ट्रेसिंग के कशीदा काढ़ते हैं। चटकीले-चमकीले सूती धागों का उपयोग कर गहरे हरे रंग के सूती कपड़े पर कढ़ाई करते हैं।इसमें छोटे-छोटे मोटिफ का प्रयोग होता है। पट्टू पर भी हुरमजी किया जाता है।

    खारक : सूखे खजूर को खारक कहते हैं। इस कशीदे में जो बंद दिये जाते हैं वे सूखे खजरों जैसे लगतक हैं। इसलिये इस कशीदा को खारक कहते हैं। इसमें कच्चे धागों की अड दी जाती है तथा वर्गाकार मोटिफ का प्रयोग होता है।

    आरी : इसका कशीदा जूतों पर की जाने वाली सिलाई के समरूप होता है। इसमें कशीदे के लिये फ्रेम का उपयोग होता है। इसी तरह चमड़े पर भी कशीदा किया जाता है।

    एपलिक : एपलिक कार्य में एक कपड़े पर डिजाइन के अनुरूप कटा हुआ कपड़ा चिपकाकर उसके किनारों की तुरपाई करते हैं। जिस कपड़े पर कार्य किया जाता है उसका रंग प्रकट होता है।

    पेचवर्क : इसमें विभिन्न रंगों के छोटे-छोटे वर्गाकार अथवा तिकोनी आकृतियों के कपड़े काटकर उनकी आपस में सिलाई की जाती है। रालियां तथा तकिये इसी तकनीक से बनाये जाते हैं।

    गलीचा व दरी उद्योग

    आज लगभग पूरे राजस्थान में गलीचे व दरियां बनाने का काम होता है किंतु जयपुर, बीकानेर, ब्यावर, किशनगढ़, टोंक, मालपुरा, केकड़ी, भीलवाड़ा तथा कोटा में गलीचे बनाने का काम बड़े पुराने समय से तथा बड़े पैमाने पर होता है। सामान्यतः भेड़ व ऊँट की ऊन इस काम में आती है किंतु अब पश्मीना तथा मैरीनो ऊन भी बड़ी मात्रा में प्रयुक्त होती है। ऊँट व बकरी की ऊन से ऊनी दरियां तथा फर्श बनाये जाते हैं जो बैठकों में बिछाने से लेकर खेती बाड़ी के कार्यों में प्रयुक्त होते हैं। भेड़ की ऊन को विविध रंगों से रंगकर कलात्मक तरीके से डिजाइनों में बुना जाता है जिनमें बाग-बगीचे, चिड़िया, मोर, तोते, गाय-बैल, फूल, पत्तियां व ज्यामितीय आकृतियां बनायी जाती हैं। जोधपुर जिले के सालावास गाँव की दरियां बड़ी प्रसिद्ध हैं। जोधपुर, नागौर, टांेक, बाड़मेर, भीलवाड़ा, शाहपुरा और केकड़ी, दरी निर्माण के पुराने व प्रसिद्ध केंद्र रहे हैं किंतु अब लगभग पूरे प्रदेश में सूती, ऊनी व मिश्रित तीनों ही प्रकार की दरियां बड़े पैमाने पर बनायी जाती हैं।

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  • अध्याय - 12 पुरातत्व संग्रहालय उदयपुर

     02.06.2020
    अध्याय - 12 पुरातत्व संग्रहालय उदयपुर

    अध्याय - 12 पुरातत्व संग्रहालय, उदयपुर


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    जनार्दनराय नागर विद्यापीठ विश्वविद्यालय उदयपुर के पुरातत्व संग्रहालय में वर्ष 2013 में पुरातात्विक संग्रहालय स्थापित किया गया है। इस संग्रहालय का विकास निरंतर जारी है। डॉ. जीवनसिंह खड़कवाल इसके निदेशक हैं। विद्यापीठ के पुरातत्व विभाग के प्रोफेसर डॉ. कृष्णपालसिंह ने इस संग्रहालय की स्थापना में महतवपूर्ण योगदान दिया है।


    इस संग्रहालय में अनेक प्राचीन सभ्यताओं के स्थलों से प्राप्त पुरावस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं जिनमें पाषाणकालीन, प्राक्-हड़प्पा, राजस्थान, गुजरात, पंजाब, मध्यप्रदेश और हरियाणा के सिंधु सभ्यता-स्थल, हड़प्पा, आहाड़ और चंद्रावती, कानमेर, गिलूण्ड, बालाथल, ईसवाल, पछमता, नठारा की पाल, आहाड़ आदि से प्राप्त अवशेष, चट्टानों के नमूने, फोटोग्राफ आदि प्रदर्शित किए गए हैं।

    संग्रहालय के आरम्भ में, भारत में पाई जाने वाली विभिन्न प्रकार की चट्टानों, लाइम स्टोन, सैण्ड स्टोन, बेसाल्ट रॉक आदि के नमूने प्रदर्शित किए गए हैं। साथ ही मेवाड़ क्षेत्र की चट्टानों में मिलने वाले विभिन्न प्रकार के पत्थरों का प्रदर्शन किया गया है। जावर की खानों से प्राप्त ओर-मिक्स तथा जिंक मैटल्स का भी प्रदर्शन किया गया है। साथ ही मोडी-बाठेड़ा, धारेश्वर और बैराठ आदि स्थलों से प्राप्त रॉक पेंटिंग्स के बड़े-बड़े फोटोग्राफ भी प्रदर्शित किए गए हैं।

    संग्रहालय की सामग्री को तीन स्पष्ट विभागों में विभाजित किया गया है। पहले खण्ड में पाषाणकालीन सामग्री है। दूसरे खण्ड में ताम्रकालीन सामग्री है। तीसरे खण्ड में लौहसभ्यता के विकास से सम्बन्धित सामग्री है। पाषाण काल से मध्ययुगीन संस्कृतियों के अवशेषों के माध्यम से उन कालखण्डों के मानव-ज्ञान, सामाजिक जीवन, सामुदायिक भावना, सुरक्षा प्रबंध, आर्थिक गतिविधियों के बारे में जानकारी प्राप्त होती है तथा यह ज्ञात करने में आसानी होती है कि इन सभ्यताओं के लोग कैसे थे, वे कैसे जीवन यापन करते थे, किस तरह के औजारों, उपकरणों एवं बर्तनों का प्रयोग करते थे, वे क्या पहनते थे तथा उनका भोजन क्या था! इस संग्रहालय में विगत दो दशकों में राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, कर्नाटक तथा उत्तराखण्ड में हुए पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक सर्वेक्षण के दौरान मिली सामग्री तथा खुदाई में मिले अवशेष रखे हैं।

    उदयपुर में आहाड़ के बाद यह दूसरा संग्रहालय है जहाँ से ऐसी जानकारी मिलती है। संग्रहालय में विभिन्न सर्वे और खुदाई के दौरान मिले अवशेष, गुजरात से प्राप्त डम्पा संस्कृति के औजार, बर्तन, घड़े, छाप और अन्य अवशेष, मेवाड़ के 110 गांवों में खुदाई में मिले काले और लाल बर्तन, अनाज के दाने, छाप (सील्स), राजस्थान में मिले लोहे के तीर, खंजर अन्य औजार, बर्तन, राजस्थान, मध्यप्रदेश और कर्नाटक में पाई गई हाथ की कुल्हाड़ी सहित अन्य औजार, पश्चिम एशिया, विशेषकर ईरान-इराक से लाए गए बर्तन एवं अन्य सामग्री रखी गई है। नर्बदा घाटी से मिली एक लाख वर्ष पुरानी एक कुल्हाड़ी भी प्रदर्शित की गई है जो पाषाण कालीन है। निम्न पाषाण काल के औजारों में पशुओं की खाल उतारने की ब्लेड तथा क्लीनर प्रमुख हैं। प्राक्-हड़प्पा संस्कृति से गुजरात में मिले घड़े, विशेष तरह के बर्तन (काली और लाल मिट्टी के बर्तन जो मेवाड़ में पाई गई संस्कृति की विशेषता है) एवं रिजर्व स्लिप वेयर भी प्रदर्शित किए गए हैं जिनसे उस काल में मेवाड़ तथा कच्छ-गुजरात के व्यापारिक और सांस्कृतिक सम्बन्धों का पता चलता है।

    इस काल के मृद्भाण्ड 8000 से 3400 ईसा पूर्व के बीच रखे जाते हैं। आग में पके हुए मिट्टी के कुछ बर्तनों को बजाने से धातु जैसी ध्वनि सुनाई देती है। संग्रहालय में प्रदर्शित सामग्री की फिजिकल रिसर्च लैबोरेट्री अहमदाबाद से रेडियो कार्बन डेटिंग करवाई गई है। प्राक्-हड़प्पा संस्कृति के लोगों ने ही आगे चलकर सिंधु घाटी सभ्यता या हड़प्पा सभ्यता को जन्म दिया। इस काल खण्ड में अनाज संग्रहण की कोठियां मिलती हैं। ये कोठियां विशिष्ट आकृति में बनी हुई हैं। इनके निर्माण में बजरी की अधिक मात्रा का प्रयोग हुआ है। इनका ऊपरी मुँह अधिक चौड़ा है। पाकिस्तान में आमरी, नाल, कोटड़ी से भी ऐसे पात्र मिले हैं।

    इस संग्रहालय के निकट ही आहाड़ सभ्यता का स्थल खोजा गया है जहाँ से सिंधु सभ्यता के नगरों के साथ व्यापार होता था। भारत में इस काल की सभ्यता के अवशेष कच्छ रण के किनारे कानमेर से प्राप्त हुए हैं। हड़प्पा युग के बर्तनों एवं उपकरणों में माइक्रोलिथ्स तथा स्टुड हैण्डल बर्तन अधिक महत्वपूर्ण हैं। इन बर्तनों पर सामान्य पेंटिंग है जिसमें काले एवं गहरे-भूरे रंगों का प्रयोग किया गया है।

    इस संग्रहालय में सिंधु सभ्यता के परफोरेटेड पॉट्स छिद्रयुक्त मृद्भाण्ड प्रदर्शित किए गए हैं जो उस काल का देशी रेफ्रिजिरेटर कहे जा सकते हैं। इन बर्तनों को पानी से गीला कर दिया जाता था। इनके स्पर्श से ठण्डी हुई हवा जब छिद्रों के माध्यम से बर्तन के भीतर पहुंचती थी तो उसमें रखे फल, सब्जी एवं मांस आदि खाद्य सामग्री लम्बे समय तक ताजी बनी रहती थी। ऐसे बर्तन कालीबंगा, सोथी, सीसपाल, भीथाथल, कुनाल, बनवाली आदि स्थानों से प्राप्त हुए हैं।

    इन स्थलों से एक गोबलेट (छोटी सुराही जैसा बर्तन) भी प्राप्त हुई है जो इस संग्रहालय में प्रदर्शित की गई है। कालीबंगा स्थल के नीचे के स्तर से प्राप्त मिट्टी की चूड़ियां, हेयरक्लिप, मिट्टी के मनके प्राप्त हुए हैं जो ऊपरी स्तर की इसी प्रकार की सामग्री से भिन्न हैं। हड़प्पा सभ्यता में स्टेटाइट से बनी चूड़ियां भी मिली हैं। यह चूना पाउडर जैसी सफेद एवं चिकनी मिट्टी होती थी। शंख के मोटे किनारों को काटकर उनसे भी चूड़ियां बनाई जाती थीं जिनके टुकड़े इस संग्रहालय में देखे जा सकते हैं।

    हरे रंग का फेयांस नामक पत्थर, नारंगी रंग का चेल्सीडोनी नामक पत्थर, कार्नेलियन, चर्ट, जाचर, अगेट आदि पत्थरों से बनी सामग्री भी इस संग्रहालय में प्रदर्शित की गई है। अगेट नामक पत्थर को 700 डिग्री सेंटीग्रेड पर तपाने से कार्नेलियन बनता है। पाकिस्तान में रोहरी नामक एक स्थान है जिसकी भौगोलिक संरचना एवं क्षेत्रफल राजस्थान के जोधपुर जिले के फलौदी जैसा है, वहाँ से विभिन्न प्रकार का कीमती चर्ट प्राप्त होता है। इस चर्ट एवं उससे बनी सामग्री को इस संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है।

    सिंधु सभ्यता से गोफन में डालकर फैंकने के पत्थर मिले हैं। मिट्टी के एक बर्तन के भीतरी भाग से कपड़े का प्रमाण मिलता है। इस बर्तन का निर्माण करते समय कुम्हार ने अपने एक हाथ में कपड़ा ले रखा था जो कि बर्तन के भीतरी तरफ था। जब घड़े को बाहर से थपथपाकर आकृति दी गई तो भीतर वाले हाथ के कपड़े की बुनावट के निशान मटके की भीतरी दीवार पर अंकित हो गए तथा उससे जाली जैसी चित्राकृति बन गई। ऐसा एक नमूना इस संग्रहालय में रखा है। लोथल से मिले लगभग 113 ग्राम भार के मिट्टी के बाट भी इस सामग्री के साथ प्रदर्शित किए गए हैं। आहाड़ सभ्यता से प्राप्त 5500-3500 वर्ष पुराने काले एवं लाल मृद्भाण्ड भी प्रदर्शित हैं।

    संग्रहालय में प्लास्टिक के दो डिब्बे प्रदर्शित किए गए हैं जिनमें से एक में 5000 साल पुराना गेहूं तथा दूसरे में 5000 साल पुराना जौ रखा गया है। ये नमूने सिंधु सभ्यता के हैं। बाजोट लगे हुए प्याले इस संग्रहालय में प्रदर्शित अद्भुत वस्तुओं में से हैं। ये गुजरात के भुज जिले में आडेसर तहसील के निकट कानमेर नामक स्थल की खुदाई से मिले हैं। यह भारत में सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख स्थलों में से एक है। इस स्थल की छः साल तक खुदाई की गई।

    यहाँ से महल जैसी रचनाओं वाले भवनों के अवशेष प्राप्त हुए हैं जो लगभग 4500 वर्ष पुराने हैं। यह कला विश्व का प्रथम नगरीकरण चरण था। इस युग में भारत के अतिरिक्त मेसोपोटामिया एवं माया सभ्यता में ही नगरीय मानव सभ्यता विकसित हुई थी। इसके पश्चात् लगभग डेढ़-दो हजार वर्ष तक किसी नवीन सभ्यता के चिह्न नहीं मिलते हैं। नगरीकरण की प्रथम चरण की सभ्यता के बाद नगरीकरण की द्वितीय चरण वाली सभ्यता प्रकट होती हुई दिखाई देती है जो, ताम्र-कांस्य कालीन सभ्यता से नितांत विलग है तथा लौहकालीन सभ्यता है। इस काल में लौह विगलन भट्टियां, कृषि, पशुपालन, भवन निर्माण आदि कार्यकलाप विकसित अवस्था में दिखाई देने लगते हैं।

    प्रथम चरण एवं द्वितीय चरण की नगरीय सभ्यताओं के लोगों की जीवन शैली में पर्याप्त अंतर दिखाई देता है। इस काल में लोहे के औजारों पर धार लगाने के पत्थर, कूटने-पीसने एवं घिसने के पत्थर, कान के कुण्डल, बच्चों के खेलने के पासे, गोटियां, धातु की चूड़ियां मिलती हैं। साथ ही मिट्टी, हाथीदांत, कांच एवं लोहे की सामग्री भी मिलती है। इससे स्पष्ट है कि लोहे के साथ-साथ कांच बनाने की विधि भी इस युग के लोगों को ज्ञात हो गई थी। ऐतिहासिक युग के प्रारंभिक काल में चर्ट, अगेट एवं चेल्सीडोनी का प्रचलन भी जारी रहा। इस समय के लोहे के धनुष, भाले की नोक, ग्रे वेयर (सलेटी मृद्भाण्ड), हाथीदांत की चूड़ी, लोहे के कर्णफूल जैसे आभूषण का एक टुकड़ा तथा लोहे के कड़े भी प्रदर्शित किए गए हैं।

    बालाथल से प्राप्त 2300 वर्ष पुरानी सभ्यता में काम आने वाले मिट्टी से निर्मित सोकपिट्स (रिंगवैल) भी इस संग्रहालय में प्रदर्शित किए गए हैं। कच्छ से मिले चर्ट, मॉस, जाचर, बेंडेट अगेट आदि के नमूने भी इस संग्रहालय में प्रदर्शित हैं। बेंडेट अगेट धारीदार चमकदार पत्थर होता है। 13वीं शताब्दी ईस्वी में मेवाड़ राज्य की जावर खानों से जस्ता निकालने की विधियों के प्रमाण तथा जस्ता बनाने में प्रयुक्त होने वाले लोहे के खोल आदि प्राप्त हुए हैं, इन प्रमाणों के चित्र एवं खोल इस संग्रहालय में प्रदर्शित किए गए हैं। यह विश्व में जस्ता बनाने के सबसे प्राचीन प्रमाण हैं। 1500 टीलों में उस काल का स्लग (जिंक-ओर में से शुद्ध जस्ता निकालने के बाद शेष बचा कीट) जमा हुआ मिला है।

    इस काल में जावर की खानों का जस्ता यूरोप के देशों को जाने लगा था। संग्रहालय में विभिन्न सभ्यता स्थलों से मिली मिट्टी की ईंटें प्रदर्शित की गई हैं। इनमें शुंग एवं कुषाण कालीन ईंटें, अर्थूणा से प्राप्त ईंटें, वीरपुरा सर्वेक्षण में प्राप्त ईंटें तथा वडनगर से प्राप्त ईंटें सम्मिलित हैं। शुंग कालीन मृद्भाण्ड जो तेल तथा सब्जी आदि रखने के काम आते थे। इत्र रखने की कॉर्क युक्त सुराही तथा चाय जैसे किसी पदार्थ को छानने की टोंटीदार केतली की टोंटी जिसके भीतर मिट्टी से बनी चलनी लगी है, आदि प्रदर्शित की गई हैं। यह केतली रंगमहल (गंगानगर जिला), से प्राप्त हुई है।

    वडनगर से बुद्ध के दो स्तूप, दो महाचैत्य एवं मिट्टी के सिंहासन प्राप्त हुए हैं। संग्रहालय में यूनान अथवा रोमन साम्राज्य में निर्मित लगभग 2000 साल पुराना एक ‘वाइन टारपीडो’ प्रदर्शित किया गया है। यूनान एवं रोमन सभ्यता में इस प्रकार के मृदभाण्डों में उस काल में मदिरा का संग्रहण एवं परिवहन किया जाता था। इस टारपीडो के भीतर मिले स्टार्च से पुष्टि होती है कि इसमें किसी समय मदिरा भरी हुई थी। प्राचीन यूनानी सभ्यता यूनान एवं उसके निकटवर्ती क्षेत्रों में लगभग आठवीं शताब्दी ई.पू. से लगभग छठी शताब्दी ईस्वी तक अर्थात् लगभग 1,300 वर्षों तक अस्तित्व में रही।

    आधुनिक पश्चिमी संस्कृतियों का उद्गम इसी यूनानी सभ्यता में माना जाता है। इस सभ्यता के पश्चात् अस्तित्व में आने वाले रोमन साम्राज्य पर प्राचीन यूनान का गहरा प्रभाव था। पश्चिमी रोमन साम्राज्य 27 ईस्वी पूर्व से 476 ईस्वी तक तथा पूर्वी रोमन साम्राज्य 27 ईस्वी पूर्व से 1453 ईस्वी तक यूरोप के रोम नगर में केन्द्रित था। इस साम्राज्य का विस्तार दक्षिणी यूरोप, उत्तरी अफ्रीका और अनातोलिया के क्षेत्रों तक था। उस काल में यह विश्व के विशालतम पाँच साम्राज्यों में से एक था। पाँचवी सदी के अन्त तक इस साम्राज्य का पतन हो गया और इस्तांबुल (कॉन्सटेन्टिनोपल) पूर्वी रोमन साम्राज्य की राजधानी बन गई। ईस्वी 1453 में उस्मानों (ऑटोमन तुर्कों) ने इस पर भी अधिकार कर लिया। रोमन साम्राज्य, यूरोप के इतिहास और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण अंग है।

    जनार्दनराय नागर विद्यापीठ विश्वविद्यालय उदयपुर के पुरातत्व संग्रहालय में प्रदर्शित जार ‘वाइन टारपीडो’ मिट्टी से बना हुआ है जिसे आग में पकाया गया है तथा उस पर एक विशेष प्रकार का लेप किया गया है जिसे उस काल की पॉलिश कहा जाना चाहिए। आधुनिक पनडुब्बियों की आकृति से मेल खाने के कारण इस प्रकार के जारों को रोमन वाइन टारपीडो कहा जाता है। यह बेलनाकार आकृति में है इसका मुंह संकरा, मध्य भाग चौड़ा तथा नीचे का भाग पुनः कम चौड़ा है। इसकी ऊँचाई लगभग 26 इंच है। यह जार पश्चिम एशिया से लेकर सिंधुघाटी सभ्यता के स्थलों से होती है। यह जार गुजरात से प्राप्त किया गया है। इन जारों में मदिरा भरकर उन्हें पानी के जहाजों से दूर-दूर तक निर्यात किया जाता था।

    पानी के जहाजों में इनके परिवहन का समुचित प्रबंध होता था। इन्हें हिलने तथा परस्पर टकराकर टूटने से बचाने के लिए जहाज के भीतर लकड़ी के फ्रेम नुमा रैक बनाए जाते थे। यह जार क्षतिग्रस्त है, इसलिए संग्रहालय के अधिकारियों ने इसे मरम्मत करके फिर से जोड़ा है। इस जार के भारत में मिलने से इस तथ्य की पुष्टि होती है कि उस काल में भारत एवं यूनान के बीच व्यापारिक सम्बन्ध थे। यह भी संभव है कि इस प्रकार के जारों में मदिरा भरकर यूनान अथवा रोम से पश्चिम एशिया तक लाई जाती हो एवं वहाँ के व्यापारी इन्हें भारत जैसे समृद्ध देश के बंदारगाहों तक पहुंचाते हों।

    उदयपुर के विद्यापीठ संग्रहालय में भारत एवं पाकिस्तान के सिंधुघाटी सभ्यता स्थलों से प्राप्त पुरातत्व सामग्री, चर्ट के औजार, कुल्हाड़ियां, पांच हजार साल पुराने गेहूं एवं जौ के दाने आदि भी प्रदर्शित हैं। संग्रहालय में रखी गई 500 वर्ष पुरानी सामग्री में आइवरी की चूड़ियां, हाथीदांत की चूड़ियां आदि सम्मिलित हैं। मेवाड़ के ईसवाल नामक स्थल से मिला मृद्भाण्ड भी प्रदर्शित है। संग्रहालय में कुछ चित्र प्रदर्शित हैं जिनमें सिंधु सभ्यता की गोलाकृति की सीलें (मुहरें) प्रदर्शित हैं। इनके बीच में छेद हैं जिनसे अनुमान होता है कि ये मुहरें गले में पहनने के परिचयपत्र की तरह प्रयुक्त होती होंगी।

    यहाँ प्रदर्शित किए गए प्रत्येक अवशेष की जानकारी के लिए चित्रों सहित साहित्य तैयार किया गया है जिसमें पुरा-अवशेष का प्राप्तिस्थल, सभ्यता का नाम, उसकी विशेषताएं आदि की जानकारी दी गई है। राजस्थान के अब तक के संग्रहालयों में इस प्रकार के साहित्य का अभाव है। यह संग्रहालय पर्यटकों, सामान्य रुचि के दर्शकों एवं छात्रों, अध्यापकों, शोधार्थियों सहित सामान्यजन के लिए मार्गदर्शक का काम कर सकता है।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-49

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-49

    पर्यावरण को साधती हस्तकलाएं (2)


    खेस, कम्बल, पट्टू एवं नमदे

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    राज्य में सूती खेस एवं ऊनी कम्बल तथा पट्टू बनाने का काम गांव-गांव होता है। जालोर जिले के लेटा गाँव के खेसले, बीकानेर एवं जैसलमेर के कम्बल एवं पट्टू तथा बीकानेर व टोंक के नमदे दूर-दूर तक प्रसिद्ध हैं। राज्य के बाड़मेर जिले में शॉल बुनाई एवं बरडी का काम किया जाता है।

    पट्टू बुनाई : पट्टू बुनाई का कार्य पिटलूम पर किया जाता है। बाड़मेर जिले के चौहटन, ईसरोल, धनाऊ, भूणिया, सीलगण, सेड़वा, बावड़ी, बूठ, मांगता, बाछड़ाऊ, भीमथल, देदूसर, बींजराड़, भीमड़ा, गडरारोड, हरसाणी, बालेवा, अदरीम का तला, नवातला, नोखड़ा, कबूली, गिराब, विशाला, भू का पार, शास्त्री गांव, राणी गांव, महाबार, चौहटन गांव में प्रमुखता से होता है। जैसलमेर, बीकानेर, जोधपुर, बाड़मेर एवं जालोर जिलों में भी कलात्मक पट्टू बनाये जाते हैं।

    जाटा पट्टू : जाटा पट्टू के कार्य के लिये बाड़मेर जिले के नोखड़ा, भीमड़ा तथा मिठड़ाऊ गांव अधिक प्रसिद्ध हैं।

    कोट पट्टी : कोट पट्टी बुनाई का काम बाड़मेर जिले के भीमड़ा, नवातला, नोखड़ा तथा भूणियां गांव में प्रमुखता से होता है।

    शॉल बुनाई : शॉल बुनाई का कार्य फ्रेम लूम पर किया जाता है। यह कार्य बाड़मेर जिले में लगभग बीस हजार परिवारों द्वारा किया जाता है।

    बरडी : बरडी का कार्य बायतु, भीमड़ा, नोखड़ा, कबूली, सीलगण में अधिक होता है।

    जट पट्टी उद्योग

    पशुओं के बालों को जट्ट अथवा जटा कहा जाता है। ऊँटों के बालों को ओठी जट्ट तथा बकरी के बालों को बाकरी जट्ट कहते हैं। बकरी और ऊँट के बालों से जट पट्टी की बुनाई की जाती है जिसे जिरोही, भाकला तथा गंदहा भी कहते हैं। बाड़मेर जिले के जसोल गाँव में यह कार्य लगभग 300 वर्षों से होता है। इस कार्य में कुम्हारों के मारू नामक गोत्र के लोग लगे हुए हैं। जाटा मेघवाल भी इस कार्य को करते हैं। बाड़मेर जिले के बेरी, बांटा, पनावली, गांधव, धनवा, दाखा, हेमे की ढाणी, खारा, लोहिड़ा, रोहिली, बामड़ी, करणा भूंका, नीम्बली नाडी, सेवनियाला, सिणधरी, साडो की ढाणी अरणियाली, पायला कला, जैसार, सांवलासी, जसोल पट्टी तथा चोहटन गांव आदि प्रमुख हैं। जालोर जिले के गांवों में भी यह कार्य होता है।

    इस उद्योग में बकरियों तथा ऊँटों के बालों अर्थात् जटाओं से पांवदान, रस्सियां, बोरे, पट्टियां आदि प्रमुखता से बनाये जाते हैं। बकरी के बालों की पिंजाई करके पूनियों से चरखे पर धागा तैयार किया जाता है। उसके बाद दो धागों को मिलाकर चरखे पर ताना तैयार किया जाता है। ताने को दो भारी लट्ठों पर लपेटा जाता है तथा दो व्यक्ति मिलकर उसकी बुनाई करते हैं। इस प्रकार एक मीटर चौड़ी तथा बीस से पच्चीस मीटर लम्बी जट पट्टियां तैयार की जाती हैं जिन्हें विदेशों में निर्यात किया जाता है। देश की आजादी से पहले ये पट्टियां कराची बंदरगाह से ईरान, इराक, कुवैत, सीरिया, सऊदी अरब, जोर्डन, लेबनान आदि अरब देशों को निर्यात की जाती थीं जहाँ इनका निर्यात घुमक्कड़ जातियों द्वारा तम्बू बनाने में किया जाता था। अब इनका निर्यात यूरोपीय देशों में अधिक होता है जहाँ इनका प्रयोग जहाजों के कालीन के रूप में किया जाता है। बर्फीले क्षेत्रों में जिरोही की मांग अधिक रहती है।

    मिट्टी के खिलौने व मूर्तियां

    लोक देवताओं की पूजा के साथ-साथ मिट्टी के खिलौने व मूर्तियां बनाने का काम पूरे प्रदेश में विकसित हुआ। गोगाजी, भैंरूजी, काली देवी तथा मामाजी की पूजा एवं गणगौर पूजन में गौर (पार्वती) की पूजा के लिये बड़े पैमाने पर गाँव-गाँव में मिट्टी की मूर्तियां बनायी जाती हैं। देवी देवताओं की मिट्टी की मूर्तियाँ हिंगाण कहलाती हैं। पशु-पक्षियों की आकृतियां, ढोला मारू, सेठ-सेठानी, देवी, देवता, शिव, गणेश, कृष्ण, घुड़सवार, ईसर-गौर आदि बहुतायत से बनाये जाते हैं। नाथद्वारा के पास मोलेला के कुम्हारों ने टैराकोटा कार्य में देश-विदेश में अपना नाम कमाया है। जालोर जिले में हरजी गाँव के कुम्हार मामाजी की घोड़े बनाते हैं जिन्हें खरीदने के लिये दूर-दूर से लोग पहुँचते हैं।

    मोलेला तथा हरजी दोनों ही स्थानों में कुम्हार मिट्टी में गधे की लीद मिलाकर मूर्तियां बनाते हैं और उन्हें उच्च ताप पर पकाते हैं। बाड़मेर जिले के निम्बला गांव में उपलब्ध सेलड़ी (सफेद मेट) का उपयोग किया जाता है। पानी में घुलनशील इन दोनों रंगों में पीला रंग आग में पकने पर लाल रंग में तब्दील हो जाता है। पीले और सफेद रंग के सूखने के बाद खेत या नाडी में उपलब्ध काले पत्थर के काले रंग और गेरू रंग की मिट्टी से बर्तनों पर विभिन्न आकृतियां उकेर दी जाती हैं।

    मिट्टी एवं खनिज सम्पदा के रंगों से गुली, हिटड़ी, आंगड़ी, ताड़की, बेलड़ी, बिच्छु, नाग, आम्भ, चौकरड़ी, मची, ढेला, रेसा, मकोड़ा, हमरी, हरणी, फूलड़ी डिजाइनों का चित्रांकन करते हैं। बाड़मेर जिले में मोकलसर गांव की मटकियां बड़ी प्रसिद्ध हैं। इन पर काला दाना दिखाई देता है। पचपदार के बर्तन नमक की मात्रा और राख के उपयोग के कारण अलग पहचान रखते हैं। गुडामालानी की लाल रंग की मटकियां प्रसिद्ध हैं। यहाँ मटका, मटकी, घड़ा, बेड़िया, धाकला (ढक्कन), बगती (पीने के पानी का बर्तन), गुडका, सिकोरा, पुगलिया (बेड़की), बिलोणो, परोटी, हाण्डी, कुलड़ी, तावणियो, तवा, भूड़की, भूड़कियो, बीडमो, कुण्डाली, कुण्डियो, परात, तसियो, ढकणी, प्यालियो, बारोलियो, बढबेड़ा, बुजारियो, दीवटिया, धूपिया आदि प्रमुख रूप से बनाये जाते हैं।

    मोलेला का मृण्मूर्ति शिल्प : मोलेला टेराकोटा पद्धति से लोक देवता और जनजातीय देवी देवताओं की प्रतिमाओं के निर्माण के लिये विश्व भर में प्रसिद्ध है। इस कला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें आकृतियाँ बनाते समय सांचों या औजारों का प्रयोग नहीं किया जाता है। इस मूर्ति कला के लिये मोलेला के शिल्पी सोलानाड़ा तालाब की काली चिकनी मिट्टी काम में लेते हैं। गाँवों में स्थापित होने वाली अम्बा माताजी, भूनाजी, महेन्द्रजी, भैंरूजी और देवनारायणजी आदि की प्रतिमाओं यथा को लेने के लिये दूर दूर से भोपे और पुजारी मोलेला आते हैं। इस परम्परा को सिंगान कहते हैं।

    बू के खिलौने : नागौर जिले में मूण्डवा के निकट स्थित बू गांव में बने मिट्टी के खिलौने मारवाड़ में दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे। इनमें गौर, हाथी, घोड़ा, ऊँट, कुत्ता गाड़ी, सेठ-सेठानी, नाहर, खरगोश, शेर, भैंस, मोर चक्की आदि कई प्रकार के खिलौने बनते हैं किंतु गाय नहीं बनती क्योंकि मिट्टी के खिलौनों को आग में पकाया जाता है और गाय को आग में नहीं रखा जाता। इन खिलौनों का एक हिस्सा चाक पर, एक हिस्सा सांचे में तथा एक हिस्सा हाथों से बनता है। कालीबंगा से मिले मिट्टी के खिलौनों की भी यही विशेषता है। गणगौर के मुंह को सांचे में, नीचे का हिस्सा चाक पर तथा हाथ-पैर हाथों से बनते हैं। देवी-देवताओं की मूर्तियों को भी आग में नहीं पकाते।

    लकड़ी का काम

    राजस्थान में अत्यंत प्राचीन काल से लकड़ी का काम होता है। दरवाजों, चौखटों, खिड़कियों, पालनों, झूलों, पलंगों, मेजों तथा कुर्सियों आदि पर लकड़ी की बारीक खुदाई कर उत्कृष्ट कोटि की नक्काशी की जाती है। बाड़मेर, बीकानेर, जोधपुर, जयपुर तथा उदयपुर जिलों में लकड़ी की नक्काशीदार खुदाई, लकड़ी के खिलौने तथा लकड़ी की मूर्तियां बड़े पैमाने पर बनाई जाती हैं। बाड़मेर व शेखावाटी का कलात्मक फर्नीचर विदेशों को निर्यात होता है। बाड़मेर क्षेत्र में पायी जाने वाले रोहिड़ा वृक्ष की लकड़ी इस कार्य के लिये सर्वाधिक उपयुक्त है। बाड़मेर जिले के धनाऊ, आलमसर, गरल, बालोतरा, शिव तथा भुणिया आदि गांवों में आसू, कुलरिया, बरड़वा, ब्रह्मखत्री, आसदेव, ओढाणा, भदरेचा एवं झूंझा गोत्र के सुथार लकड़ी पर नक्काशी का कार्य करते हैं।

    ग्रामीण सुथार गधों के जांतरे, ऊँटों के पलाण, घोड़ों की काठी, लकड़ी के कैंचिये, औरों की सिहाल, झोंपों के घोड़े, बैलों की भाण, घरेलू उपयोग की वस्तुएं यथा- खाट (माचा), कमाड़, उकले, घरटी तले के भाण्ड, कुड़ियों के ढक, अरटी, कुण्डे, घुड़ला, खुदाई की वाली, खिड़किये होंगू (छोटी कुर्सी), पीढ़े, चकरिया, कांईया, पागे (पाये), खेत के औजार, हल, चौकनिये, दांतरे, बई, पावड़ी, कसी, कई, सिरपी, बीजवण, पालणा, पींगा (झूला), घोड़िया, घाणी, निहणी (सीढ़ी) काष्ठ प्रतिमायें, तोरण, बाजोट (पटला), खोरना, मोगरी, लकड़ी के हथौड़े आदि बनाते हैं। बाड़मेर में बने ऊँटों के पलाण तथा घोड़े की काठियों की मांग ईरान-ईराक तक होती है।

    चंदरस तथा पीतल नक्काशी

    बीकानेर व शेखावाटी के मकानों में सम्पूर्ण छत और नीचे की लकड़ी की मठोठ में उत्कृष्ठ चित्रकारी में चंदरस का काम होता है। दरवाजों, खिड़कियों व चौखटों आदि में खुदाई कर पीतल की कटाई भरने का काम शेखावाटी एवं जयपुर में बढ़िया होता है। लकड़ी की शृंगार पेटियां, तम्बाकू के गट्ठे, डेस्क, ट्रे, चिट्ठीदान, शृंगार मेज, ईसर-गौर, पलंग के पाये व पाटियां, पीढ़े, चौकी आदि पर खुदाई व चित्रकारी का काम बीकानेर, चूरू, रामगढ़, मंडावा, फतहपुर आदि में बढ़िया होता है।

    हाथी दांत तथा चंदन का काम

    हाथी दांत व चंदन की कलाकृतियां बनाने का काम जयपुर, मेड़ता, जोधपुर तथा उदयपुर में अच्छा होता है। हाथीदांत पर खुदाई करने वाले कारीगर ही सामान्यतः चंदन का काम करते हैं। चंदन के हाथी, अम्बाबाड़ी, राधाकृष्ण, जालीदार लैम्प शेड, बुक शैल्फ तथा अन्य कई प्रकार की उम्दा वस्तएं बनायी जाती हैं।

    हैण्डीक्राफ्ट एक्सपोर्ट

    गत कई दशकों से विदेशियों द्वारा राजस्थान के प्राचीन बंगलों, हवेलियों तथा महलों आदि से प्राप्त खिड़कियां, दरवाजे, चौखटें, मूर्तियां, खिलौने, संदूक, बाजोट, पीढ़े, छकड़ों के पहिये आदि बड़े पैमाने पर खरीद कर ले जाये गये हैं जिससे इनके निर्यात का काम भी व्यवसाय के रूप में होता है। आजकल कारीगर पुरानी डिजाईनों की ऐसी ही सामग्री बनाकर उसे धुंए व कीचड़ आदि से पोत कर पुराना बताकर बेचते हैं जिससे उनका मूल्य अधिक मिलता है। जोधपुर, जयपुर आदि नगरों व उनके आस पास के कस्बों में इस तरह का कार्य बड़े पैमाने पर होता है। इस धंधे की आड़ में कई गिरोह प्राचीन महलों, हवेलियों, मंदिरों व बंगलों के दरवाजे, खिड़की, पत्थरों के जालीदार झरोखे, मूर्तियां तथा कलात्मक स्तंभ चुराकर विदेशों को तस्करी करते हैं।

    मीनाकारी एवं कांच कला

    बीकानेर, जयपुर, नाथद्वारा तथा प्रतापगढ़ में मीना एवं थेवा का काम होता है। आभूषणों पर तरज की टिपाई चितेरा करता है। यह काम मीनाकार या सुनार भी करते हैं। टिपाई की रेखाओं के बीच-बीच में धातु पर औजारों द्वारा गहराई ली जाती है। गहराई के धरातल को छीलकर समान भी कर लेते हैं जिससे उस स्थान पर लकीरें अथवा सुम्बी पड़ जाती है। गहराई में रंग भरा जाता है। पारदर्शक रंग में लकीरों के कारण छाया-प्रकाश का प्रभाव झलकने लगता है। रंगों को उनकी ताप सहने की क्षमता के क्रम में लगाया जाता है। अर्थात् अधिक ताप सहने वाले रंग को सबसे पहले लगाकर पकाया जाता है फिर कम ताप सहने वाले रंग को लगाकर पकाया जाता है।

    रंग कांच व चपड़ी दो प्रकार के होते हैं। पत्थर के टुकड़ों की तरह का कांच का रंग खरल में पीस कर पानी के साथ मिलाया जाता है तथा कलम द्वारा वांछित स्थान पर लगाया जाता है। रंग तापने से तरल हो जाते हैं। समानता में आने पर उसकी कुरणु से पालिश की जाती है जिससे वे पारदर्शक व उज्जवल हो जाते हैं। जयपुर के मीनाकार लाल रंग बनाने में तथा बीकानेर के मीनाकार कागज जैसे पतले पतरे पर भी मीना करने में कुशल होते हैं। ताम्बे पर केवल सफेद, काले और गुलाबी रंग ही काम में लाये जा सकते हैं। तलवार व छुरियों के मूठ तथा आभूषणों में बाजू बंगड़ी, हार, सिगरेट केस, ताबीज तथा कनागती आदि पर मीना किया जाता है।

    कोटा के रेतवाली क्षेत्र में कांच पर विभिन्न रंगों से मीना का काम किया जाता है। जिसमें गंदा बिरोजा, तरल पेस्ट, चपड़ी में डालने वाले हरे, पीले, लाल और नीले रंग काम में लाये जाते हैं। वायुरोधी बंद कक्ष में कांच को आग में तपाया जाता है और लकड़ी की नुकीली कलम से वांछित रंग से आकृति बनाकर उसमें रंग भरा जाता है। उसके बाद कांच को पुनः गर्म करते हैं जिससे गंदा बिरोजा रसायनों से क्रिया करके कांच पर अपना प्रभाव छोड़ते हैं। कांच को तपाते समय जरा भी हवा लग जाने पर कांच तड़क जाता है। अतः इस कार्य में बड़ी सावधानी बरती जाती है। कटाई के खत और जिलह में रंगीन कांच (रोल्ड ग्लास) काम में लिया जाता है। कांच को वांछित आकार में काटकर, घिसकर तथा पॉलिश करके आधारभूत सामग्री जुटाई जाती है। इस काम में सान (ग्राइण्डर) का बड़ा उपयोग होता है।

    कांच पर गोंद मिले पीले रंग से वांछित आकृति चित्रित की जाती है। अब ग्रेफाइट मार्कर अथवा ग्लास कटर भी काम में लिया जाता है। इसके बाद जम्बूरे से अनावश्यक कांच काट दिया जाता है जिससे वांछित आकृति प्राप्त हो जाती है। इसके बाद एमरी की सान से आकृति के किनारे रफ किये जाते हैं तथा बारीक एमरी से अनावश्यक कांच हटा दिया जाता है। इसके बाद अकीक पत्थर की सान से घिसाई करके किनारों को चिकना किया जाता है। अंत में एड़ की लकड़ी की सान से किनारों पर पॉलिश की जाती है। इसके बाद सिल्वर नाइट्रेट क्रिस्टल, सोडियम टारट्रेटा, लिकर अमोनिया, फोर्ट और डिस्टल वाटर की मदद से कांच पर कलई की जाती है तथा गज मिट्टी अथवा प्लास्टर ऑफ पेरिस से इन कांचों को चिपकाकर कलाकृतियां तैयार की जाती हैं। डाक पन्नी की कलाकारी में कांच की कलई के वक्त कामीं से लिखाई की जाती है। ये कामीं ताम्बे की पतली पत्तर के रूप में होती है। इसे गोल काट कर अकीक की ओपनी से ओपते हैं तो यह एक कटोरी की तरह का आकार ले लेती है। इसके बाद हाइड्रोलिक अम्ल से कांच पर खुदाई और लिखाई का काम किया जाता है।

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  • अध्याय - 13 लोककला संग्रहालय उदयपुर

     02.06.2020
    अध्याय - 13 लोककला संग्रहालय उदयपुर

    अध्याय - 13 लोककला संग्रहालय, उदयपुर


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    उदयपुर में स्थित भारतीय लोककला मण्डल, लोकधर्मी प्रदर्शनकारी कलाओं के संवर्द्धन एवं प्रशिक्षण का विश्व-प्रसिद्ध संस्थान है। इसकी स्थापना 22 फरवरी 1942 को प्रख्यात लोककलाविद् पद्मश्री देवीलाल सामर ने की थी। इसका कलात्मक भवन चेतक सर्कल से पंचवटी जाने वाली मुख्य सड़क पर स्थित है। इस संस्थान में संग्रहालय के साथ-साथ खोज विभाग, प्रदर्शन विभाग तथा काष्ठकला प्रशिक्षण केन्द्र की स्थापना की गई है।

    संस्थान के खोज विभाग द्वारा लोककला विषयक पुस्तकों के प्रकाशन किए जाते हैं तथा प्रदर्शन विभाग द्वारा देश भर में लोकनृत्यों के प्रदर्शन करवाए जाते हैं। काष्ठकला प्रशिक्षण केन्द्र में कलाकारों को काष्ठकला का प्रशिक्षण दिया जाता है। ई.1965 में बुखारेस्ट में आयोजित अंतरराष्ट्रीय कठपुतली समारोह में संस्थान के दल ने कठपुतली प्रदर्शन करके विश्व भर में प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया। इससे राजस्थान की धागा-पुतली कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली।

    लोककला संग्रहालय, बड़ी इमारत में विस्तृत है। इसमें प्रदर्शनकारी लोककलाओं की विशिष्ट कलाकृतियों का संग्रह किया गया है। इसे प्रतिवर्ष एक लाख से अधिक देशी-विदेशी पर्यटक देखने आते हैं। जन-शिक्षण तथा कला-प्रशिक्षण की दृष्टि से यह संग्रहालय देश के महत्वपूर्ण संग्रहालयों में गिना जाता है। संस्थान में आने वाले पर्यटकों को कठपुतलियों का नृत्य दिखाया जाता है।

    संग्रहालय में एक दीवार पर पाबूजी की पड़ लगी हुई है। इसके सामने पड़ वाचक भोपा-भोपिन की, वाचन मुद्रा में मनुष्याकार आकृतियां बनी हुई हैं। इसके निकट गोलाई में राजस्थानी लोक रंगमंच की मुख्य विधाओं- तुर्रा कलंगी, गवरी, रामलीला, भवाई तथा रासलीला की झांकियां सजाई गई हैं। इन झांकियों में मंचसज्जा, कलाकारों की चेष्टाएं तथा लोकजीवन की सहभागिता देखते ही बनती है।

    इसी के निकटवर्ती कक्ष में काष्ठकला की ईसर-गणगौर, होली के खाण्डे, तोरण, नृतकियां, वाद्यवादक, ठाकुरजी की राम-रेबाड़ी, मुखौटे, मणकथंभ आदि से राजस्थान की लोकसंस्कृति का परिचय मिलता है। लम्बी गैलेरी से जुड़े एक अन्य कक्ष में मोलेला की मृण्मूर्तियों में ताखाजी, धर्मराज, गुनामेनू, अम्बा माता, हंसमाता, मुर्गामाता, मच्छी माता, साण्ड माता, रेबारी देव, पाबूजी आदि की टैराकोटा मूर्तियां प्रदर्शित की गई हैं।

    इनके ऊपर दीवार में रामलला तथा कृष्णलला की पड़ें, गले में धारण किए जाने वाले विविध लोक देवी-देवताओं के नावें, कावड़, भैंरूजी का देवरा, मामादेव का काष्ठ तोरण तथा ताखादेव की प्रस्तर प्रतिमा प्रदर्शित हैं। गवरी विसर्जन के समय मिट्टी के बने विशालाकाय हाथी पर देवी गौरज्या का जुलूस भी प्रदर्शित है।

    इसके निकटवर्ती कक्ष में ई.1960 तथा इससे पूर्व के मणिपुर, त्रिपुरा तथा मध्यप्रदेश की आदिमधर्मी जातियों के आकर्षक आयुध, पहनावे तथा दैनिक जीवन से सम्बन्धित आवश्यक वस्तुओं का संग्रह और चित्र प्रदर्शित किए गए हैं। बाहर गैलेरी में मेंहदी के विविध मांडणे, खिलौने, भूमि अलंकरण, दीवार पर बनने वाले आनुष्ठानिक थापे और सांझी कला के चित्र बने हैं।

    इसी गैलेरी से लगा लोकवाद्यों का कक्ष है जिसमें पारम्परिक लोकवाद्यों की प्रदर्शनी तथा वादक कलाकारों के चित्र दिखाए गए हैं। इसके आगे की गैलेरी में आदिवासी भीलों के गवरी के मुख्य पात्र रायबूड़िया, राई, खेतूड़ी, बणजारा तथा हठिया आदि की प्रस्तुतियां प्रदर्शित की गई हैं। आदिवासियों में प्रचलित मृतकों के प्रस्तरांकन चीरा, मातलोक तथा भील-गरासिया-बहरिया आदि आदिवासियों की चित्रमय झांकियां बनी हुई हैं।

    गैलेरी के आगे का कक्ष पुतली कक्ष है जिसमें भारत के विभिन्न प्रांतों- बंगाल, बिहार, उड़ीसा, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, गोवा आदि की विभिन्न शैली की पुतलियों के साथ-साथ विश्व के कई देशों यथा- जर्मनी, पौलेण्ड, इंग्लैण्ड, चेकोस्लोवाकिया, रूस, इण्डोनेशिया, हॉलैण्ड आदि की पुतलियां प्रदर्शित की गई हैं।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-50

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-50

    पर्यावरण को साधती हस्तकलाएं (3)


    ब्लू पॉटरी

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    महाराजा स्कूल ऑफ आर्ट्स, पिंकसिटी संस्थान तथा नाइटा आदि में ब्लू पॉटरी की कलाकृतियां बनायी जाती हैं। नीम का थाना, अजमेर तथा ब्यावर से प्राप्त क्वार्ट्ज पत्थर को पीसकर उसमें मुल्तानी मिट्टी, कथीरा, गोंद, जेलसरी कच्चा तथा कांच का पाऊडर मिलाकर लुगदी बनाते हैं। पानी का छींटा देकर लुगदी को रात भर रखा जाता है। इच्छित वस्तु के प्लास्टर के सांचे को अलग कर देते हैं। सूखने पर राख झाड़कर बर्तन की घिसाई कर ली जाती है। बर्तन का मुँह तथा पैंदा अलग से चाक पर बना कर जोड़ते हैं। पॉलिश के लिये पिसा हुआ कांच तथा क्वाटर्ज बारीक चलनी में छानकर मैदे की लेही में डालकर मथा जाता है और बर्तन पर उसका अस्तर डाल दिया जाता है। डिजाइन, पेंट तथा खत के लिये कोबाल्ट ऑक्साइड को पीस कर रंग बनाते हैं। कॉपर ऑक्साइड से जमीन तथा क्रोमियम से पत्तियां बनाते हैं। मैंगनीज ऑक्साइड से पत्तियों की शेडिंग करते हैं। इसके बाद कांच, सिंदूर तथा सुहागा मिलाकर भुस में गलाकर पानी की तरह पतला कर लिया जाता है और पानी में बुझा लिया जाता है। उसे पानी में से निकालकर सुखा लेते हैं तथा चक्की में पीसकर लेही में मिलाकर बर्तन पर अस्तर डाला जाता है। भट्टी में 800 डिग्री तापमान पर छः घण्टे तक पकाया जाता है। दो दिन बाद भट्टी के ठण्डा होने पर बर्तनों को बाहर निकाल लिया जाता है। चूड़ियों के रंगों के शेड अथवा कांच के रंग फिरोजा आदि में लगाये जाते हैं।

    लाख का काम

    लगभग पूरे राजस्थान में लाख का काम होता है। जयपुर में लाख की चूड़ियां बड़े पैमाने पर बनाई जाती हैं। सवाई माधोपुर, खेड़ला, लक्ष्मणगढ़, इंद्रगढ़ (कोटा), कसैली आदि में लकड़ी के खिलौने व अन्य वस्तुओं पर खराद से लाख का काम किया जाता है जो बहुत पक्का होता है। लाख के काम के पशु-पक्षी, पेंसिल, कलमदान, शृंगारदान व अन्य वस्तुएं भी बनायी जाती हैं जिन पर नगीनों की जड़ाई होती है। लाख की चपड़ी को गर्म करके तरल बनाते हैं तथा उसमें रंग मिलाकर कड़ाही में गर्म करके उसके बेलन तैयार कर लेते हैं। लकड़ी के टुकड़े में चूड़ी की आकृति का खांचा बना होता है जिसमें से बेलन की चपड़ी को भरा जाता है। लकड़ी के शंक्वाकार बेलन पर इस चूड़ी को निकाल लिया जाता है तथा गोल बनाया जाता है। नगीने लगाने के लिये नगीनों को आग पर गर्म किया जाता है तथा चिमटी की सहायता से चूड़ियों पर लगा दिया जाता है।

    चांदी का काम

    चांदी का काम भी पूरे राजस्थान में होता है। चांदी में चिताई, ढलाई तथा थलाई का काम किया जाता है। आभूषणों के अतिरिक्त हस्तावे, लोटे, गंगाजली, गिलास, चिरागदान, फूलदान, गमले, चुस्कियां, सुराहियां तथा विभिन्न पशु-पक्षी बनाये जाते हैं। चिनाई का काम डिजाइन बनाकर कलम से उकेरा जाता है। थलाई डप्पे में रखकर ठोक-ठोक कर उभारी जाती है। बुलंदी में उभरा हुआ काम होता है। महंगे होटलों में उपयोग के लिये तथा विदेशों में निर्यात के लिये कुर्सी, मेज, सोफे, किवाड़ जोड़ियां भी तैयार की जाती हैं। बीकानेर में चांदी के डिब्बे, डिब्बियां, अफीमदानी, सिगरेट केस, कटोरदान तथा किवाड़ जोड़ियां बहुत सुंदर बनायी जाती हैं। चांदी को लगभग एक हजार डिग्री संेटीग्रेड के ताप पर गलाकर उसका पतरा बनाया जाता है और इच्छित आकृति व आकार की वस्तुएं बनायी जाती हैं।

    धातु का काम

    राजस्थान में पीतल, तांबा, कांसा तथा लोहा आदि धातुओं के विभिन्न अस्त्र, शस्त्र, बर्तन तथा अन्य उपयोगी वस्तुएं बनाने का काम बड़े पैमाने पर होता है। लोहे का काम लुहारों द्वारा तथा अन्य धातुओं का काम कसेरों अथवा ठठेरों द्वारा किया जाता है। गाड़िया लुहार, चिमटे, खुरपे, दरांती आदि छोटी-छोटी चीजें बनाते हैं। अलवर तथा सिरोही में तलवारें बनाने का काम उत्कृष्ट कोटि का होता है। उदयपुर में भी तलवारें तथा ढालें बनाने का काम होता है। विभिन्न धातुओं में ढलाई, चिताई, कोफत तथा मीने का काम किया जाता है। पीतल के बर्तनों पर मुरादाबादी काम जयपुर में भी किया जाता है। डिजायन में चिनाई कर जमीन में काली लाख की भराई की जाती है। रेगमाल (सैण्डपेपर) से घिसाई करके फालतू लाख को हटाया जाता है।

    काली जमीन पर चमकता हुआ काम बाहर निकल आता है। दूसरी विधि में डिजाइन में रंग भरा जाता है और जमीन खाली छोड़ दी जाती है। लाख के रंगों के अतिरिक्त मीने के लिये मैंगनीज, कॉबाल्ट ऑक्साइड, कॉपर ऑक्साइड तथा आयरन ऑक्साइड पीले, नीले, हरे, लाल और कत्थई रंगों के लिये काम में लिये जाते हैं। देवी-देवताओं की मूर्तियां, झूले की जंजीरें, हाथी, घोड़े, मोर, डिब्बे, कटोरदान, पंखे, अफीमदानी, सुर्मेदानी, सरौते, पानदान, बंदूकों व तोपों की नाल, हुक्के, थाली आदि ताम्बा, पीतल तथा कांसा आदि धातुओं से बनाये जाते हैं। उदयपुर में व्हाइट मैटल के बड़े आकार के पशु-पक्षी, फर्नीचर आदि बड़े पैमाने पर बनते हैं। जोधपुर में जिंक तथा एल्यूमिनियम की देवी देवताओं की मूर्तियां, विभिन्न सजावटी वस्तुएं, पशु-पक्षी, विजयस्तंभ, फूलदान, तोप-तमंचे आदि बनाये जाते हैं जो भारत से बाहर के देशों में भी निर्यात होते हैं। कोफूतगिरि का काम फौलाद की बनी वस्तुओं पर सोने के पतले तारों की जड़ाई द्वारा होता है। वस्तु पर डिजायन बनाकर उसमें औजार से आड़ी एवं खड़ी रेखाओं में चिराई करते हैं। सोने के बारीक तार चिराई में फंसाकर छोटी हथौड़ी से ठोकते हैं और घूटी से जिलह दी जाती है। फौलाद के काले रंग पर सुनहरी काम बहुत सुंदर दिखता है। तहनिशा के काम में डिजाइन को गहरा किया जाता है और उस खुदाई में पतला तार भर दिया जाता है। यह काम कीमती और टिकाऊ होता है। उदयपुर और अलवर में तहनिशां का काम अधिक होता है।

    पत्थर का काम

    राजस्थान में कई रंग व किस्म का पत्थर मिलता है जिससे बड़े पैमाने पर कलाकृतियां बनती हैं। मकराना से संगमरमर, कोटा से स्लेटी, जालोर से ग्रेनाइट, डूंगरपुर से हरा-काला, तलवाड़ा, छिंछ आवलापुरा तथा धमोतर से कड़ा सफेद, धौलपुर से लाल, भरतपुर से गुलाबी, जोधपुर से बादामी तथा छीतर, राजनगर से छींट व धब्बेदार सफेद, भैंसलाना से काला संगमरमर, खाटू से पीला, निम्बी जोधा (नागौर जिला) से गुलाबी, जैसलमेर से पीला छींटदार (हाबूर) पत्थर बड़ी मात्रा में प्राप्त होता है जिनसे देवी-देवताओं की मूर्तियां, शिवलिंग, नंदी, पशु-पक्षी, जालियां, झरोखे, स्तंभ आदि विभिन्न सजावटी सामग्री यहाँ तक कि सोफे, कुर्सियां, पीढ़े आदि भी बनते हैं।

    मकराना एवं जयपुर में संगमरमर पर कार्विंग का का अच्छा कार्य किया जाता है। भारत भर की विशाल, प्रसिद्ध एवं प्राचीन इमारतें राजस्थान के विभिन्न स्थानों से प्राप्त विभिन्न प्रकार के पत्थरों से निर्मित की गयी हैं। भारत के राष्ट्रपति का निवास स्थल 'राष्ट्रपति भवन' धौलपुर के लाल पत्थर से, आगरा का ताजमहल, दयालबाग मंदिर तथा कलकत्ता का विक्टोरिया मेमोरियल मकराना के संगमरमर से, डीग के महल तथा भरतपुर का किला बांसी और पहाड़पुर के गुलाबी पत्थर से, झालरापाटन का सूर्य मंदिर, जोधपुर का उम्मेदभवन तथा मेहरानगढ़ दुर्ग जोधपुर के गुलाबी रंग के छीतर पत्थर से बने हैं। पत्थरों का काम करने वालों को सिलावट कहते हैं।

    कुट्टी का काम

    कुट्टी का काम जयपुर में अधिक होता है। कागज, चाक, मिट्टी, फेवीकोल तथा गोंद को गलाकर लुगदी बना लेते हैं जिसे सांचे अथवा डाई में दबाकर जमा दिया जाता है। सूखने पर हाथ-पांव, कान, सींग आदि जोड़े जाते हैं। हाथ से फिनिशिंग देते हुए खड़िया या चाइना क्ले का अस्तर किया जाता है। अंत में उसे विभिन्न रंगों से रंगा जाता है। अब से कुछ दशक पूर्व तक कुट्टी का काम गाँव-गाँव में होता था जहाँ औरतें कागज तथा भूसे को गलाकर विभिन्न प्रकार के ठाठिये बनाती थीं। बादला उद्योग जोधपुर में लगभग दो सौ साल से जस्ते के बादले बनाये जाते हैं। जस्ते की चद्दर को काटकर उसे लकड़ी के हथौड़े से पीट-पीटकर बादले का आकार दिया जाता है। जस्ते की चद्दर को इच्छानुसार आकृति में बदलकर उसकी झलाई होती है जिसमें नक्काशी किये हुए एल्यूमिनियम, पीतल आदि के सुंदर टुकड़ों में जोड़ा जाता है। इसके बाद इनकी टेस्टिंग की जाती है। तैयार बादले पर लाल, हरे, नीले, गुलाबी आदि रंगों के सूती व ऊनी नमदे लगाये जाते हैं। किसी समय जोधपुर में 64 प्रकार की डिजाइनों के बादले बनाये जाते थे जिनमें सुराही, केतली, नालदार, मोरदार तथा अण्डाकार आकृतियां प्रमुख थे। पुराने जमाने में धनी लोग चांदी के बादले भी बनवाते थे। अब बादला उद्योग पूरी तरह समाप्त हो गया है।

    थेवा कला

    इस कला का आष्किार आज से लगभग 500 वर्ष पूर्व प्रतागढ़ रियासत के राजा सावंतसिंह के समय में हुआ। प्रतापगढ़ के तत्कालीन राज सोनी ने इस कला के प्रयोग से बनी अपनी पहली कलाकृति राजा सावंतसिंह को भेंट की। राजा ने प्रसन्न होकर उसे जागीर प्रदान की। इस कला के लिये यह परिवार आठ बार राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत हो चुका है। इस कला में कांच पर स्वर्ण का अति सूक्ष्म कार्य किया जाता है। यह कांच साधारण न होकर लाल, नीला अथवा हरे रंग का होता है। इसका कलाकार चित्रकला में पारंगत होता है। सतत साधना के बिना इस कला को नहीं सीखा जा सकता। प्रतापगढ़ के राज सोनी इस कला को अत्यंत गुप्त रखते हैं। यहाँ तक कि बहन बेटी को भी इसका ज्ञान नहीं देते। यही कारण है कि प्रारंभ से लेकर आज तक यह कला एक ही परविार के पास रही है।

    कठपुतली कला

    कोटा शहर में दास्ताना कठपुतली बनाने वाले कलाकार रहते हैं जो 265 तरह की कठपुतलियां बनाते हैं। कठपुतली बनाने के लिये मुलतानी मिट्टी को 24 घण्टे पानी में भिगोकर गलाते हैं। कागज भी अलग से पानी में गलाते हैं। दोनों को अलग-अलग कूटकर लुगदी बनाजी जाती है। मेथी दाने को बारीक मैदे के समान कूटकर इसे कागज एवं मुल्तानी मिट्टी के साथ गंूथ लिया जाता है। लकड़ी के एक चौकोर फ्रेम में गोल छेद करके उसमें 14 इंच का गोल डण्डा लगाया जाता है। डण्डे के ऊपर कठपुतली के मुंह के बराबर कागज की गोल गेंद बनाकर लगाई जाती है। इसके ऊपर तैयार लुगदी चारों ओर चढ़ा दी जाती है। उसमें नाक, कान, मुंह तथा बाल आदि उकेर देते हैं। दो दिन सूखने के बाद सांचे से निकालकर सफेद रंग चढ़ाया जाता है। इसके सूखने पर अन्य रंग लगाय जाते हैं। आकृति के अनुसार कपड़े के हाथ एवं गर्दन से लटकाकर वस्त्र बनाये जाते हैं। एक कठपुतली बनाने में लगभग 10 दिन लगते हैं।

    कावड़ कला

    कावड़ एक चित्रकथा होती है जो लकड़ी के आठ-दस पाटों पर चित्रित की जाती है। लकड़ी के पाटों पर विशिष्ट क्रम में लगभग 300 चित्र बनाये जाते हैं। देहात में रामकथा और कृष्ण कथा को जीवित रखने का श्रेय कावड़ कला को ही जाता है। भाट लोग परम्परागत रूप से पाटों पर चित्रित कथा सुनाते हैं। आज कावड़ बनाने की कला केवल उदयपुर जिले के बस्सी में सीमित होकर रह गई है। एक परिवार के छः-सात घर इस काम को करते हैं। कावड़ बनाने के लिये लकड़ी का काम करने वाले सुथार लकड़ी से डिजाइन तैयार करके गढ़ते हैं। बाद में रंग भरा जाता है।

    पहले पत्थर के रंग काम में आते थे। फिर कथीर का मीना उपयोग में लिया जाने लगा। इसमें कथीर को घोटकर स्प्रिट के साथ मीना तैयार करके बाद में ओपणी से रगड़कर पॉलिश की जाती है। ओपणी से रगड़ने पर मीना चांदी की तरह चमकने लगता है। इस पर चपड़ी, स्प्रिट और रंग मिलाकर रंग भरे जाते हैं। रंग भरने के लिये पहले पाटिये को कच्चा लाल कर देते हैं। फिर पले रंग से टीपाण आकृति माण्डते हैं। गोरे रंग के लिये गुलाबी रंग भरते हैं। आसमानी रंग वस्त्रों और मूर्तियों के चेहरों पर भरा जाता है। रंग भरने से पहले लकड़ी के बूटे की पेंटिंग करते हैं। खुले के इंटालों की खोर लगाते हैं। फिर खड़ी की सफेद पुताई करके सुखा देते हैं। उसके बाद रंग पोतते हैं। रंगों के सूख जाने पर उनपर वार्निश लगाते हैं।

    पातरे तिरपणी

    श्वेताम्बर जैन साधुओं द्वारा काम में लाये जाने वाले लकड़ी के पात्र अर्थात् पातरे और तिरपणी राजस्थान के पीपाड़, जैतारण तथा बगड़ कस्बों में बनते हैं। वैष्णव संतों के काम में आने वाले कमण्डल, कठारी और प्लेटें भी यहीं बनती हैं। इनके निर्माण में रोहिड़े की लकड़ी का प्रयोग होता है। उदयपुर में खिरणी की लकड़ी भी काम में ली जाती है। राजस्थान के शिल्पियांे द्वारा कच्चा माल काम में लिया जा रहा है जो कि स्थानीय संसाधनों से सहज रूप में उपलब्ध है। इस प्रवृत्ति से पर्यावरण को कम क्षति पहुंचती है। यदि कच्चा माल बाहर से मंगवाया जाये तो उसके परिवहन में व्यय होने वाली ऊर्जा पर्यावरण को हानि पहुंचाती है।


    शिल्प एवं माटी कला बोर्ड

    राज्य में परम्परागत विधि से टेराकोटा, ब्ल्यू पॉटरी, मिट्टी के बर्तन, मूर्तियां, आकृतियां एवं अन्य सामग्री बनाने वाले शिल्पकारों के उत्थान एवं सुदृढ़ीकरण के लिये 16 नवम्बर 2009 को शिल्प एवं माटी कला बोर्ड का गठन किया गया है।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


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