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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-30

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-30

    पर्यावरण के पहरेदार ओरण और गोचर (1)


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    ओरण


    ओरण शब्द, अरण्य से बना है जिसका अर्थ होता है, जंगल। प्राचीन काल से यह परम्परा चली आ रही है कि गांव की सीमा से संलग्न कुछ क्षेत्र ओरण के रूप में छोड़ा जाये। राजस्थान में वह परम्परा आज भी चल रही है तथा हर गांव के बाहर ओरण के लिये पर्याप्त क्षेत्र खाली छोड़ा गया है। हिन्दू पुराणों के अनुसार ग्राम्य वन अथवा ओरण किसी स्थानीय वीर अथवा लोक देवता के नाम पर समर्पित होता है। ओरण के भीतर उस वीर अथवा लोक देवता का मंदिर बना होता है। ओरण की रक्षा के लिये समस्त ग्रामवासी एक निश्चित एवं कठिन आचार संहिता का पालन करते हैं। ओरण में रहने वाले वन्य जीवों के साथ किसी तरह की छेड़-छाड़ नहीं की जाती। उन्हें पकड़ा अथवा उनका शिकार नहीं किया जाता। ओरण से हरा पेड़ नहीं काटा जाता। केवल सूखी हुई लकड़ी एकत्रित की जा सकती है। किसी भी स्थानीय व्यक्ति का पशु, ओरण में स्वच्छंद रूप से घूम एवं चर सकता है। यदि कोई व्यक्ति ओरण के नियम तोड़ता है तो उसे पंचायत में जुर्माना भरना होता है। बड़ा अपराध करने वाले व्यक्ति का पूरे गांव द्वारा सामाजिक बहिष्कार किया जा सकता है।

    राजस्थान के मरुस्थलीय जिलों में भी ओरणों के प्रति पर्याप्त चेतना है। यहाँ 50 हैक्टेयर से लेकर 7,000 हैक्टेयर क्षेत्रफल तक के ओरण विद्यमान हैं। मरुस्थलीय जोधपुर संभाग में 1,759 गांवों में ओरण विद्यमान हैं जिनका कुल क्षेत्रफल 1,34,750 हैक्टेयर है। बाड़मेर जिले में चोहटन के पास ढोक विरारा माता का ओरण 17,947 बीघा क्षेत्र में तथा शिव के पास उणरोद का ओरण 10,463 बीघा में विस्तृत है। जैसलमेर जिले में भादरियाजी का ओरण 42 हजार बीघा में, रामदेवरा का ओरण 35,171 बीघा में तथा पोकरण के पास एटा में 33,124 बीघा में ओरण स्थित है। जोधपुर जिले में फलौदी के पास बरासिंघा का बाड़ा ओरण 55,315 बीघा में तथा कोलू पाबूजी का ओरण 15,845 बीघा में विस्तृत है।

    देवी-देवताओं को समपर्तित ओरण

    राजस्थान में विभिन्न देवी-देवताओं, संतों, वीरों आदि के नाम पर ओरण समपर्पित किये गये हैं। इन देवी-देवताओं, संतों एवं वीरों के नाम छोड़े गये ओरण इस प्रकार से हैं-

    देवियों को समर्पित ओरण : बांकल माता का ओरण, आवड़ माता का ओरण, देवल माता का ओरण, नागणेची माता का ओरण, जगदम्बा माता का ओरण, करणी माता का ओरण, खूबड़ माता का ओरण, कोटड़िया माता का ओरण, गादेश्वरी माता का ओरण, गोमा माता का ओरण, रावतारी माता का ओरण, शीतलामाता माता का ओरण, आशापूर्णा माता का ओरण, हिंगलाज माता का ओरण, चामुण्डा माता का ओरण, अम्बा माता का ओरण, आशा माता का ओरण, आई माता माता का ओरण।

    देवताओं के ओरण : गणेशजी का ओरण, शिवजी का ओरण, हनुमानजी का ओरण, ठाकुरजी का ओरण, नृसिंहजी का ओरण, श्यामजी का ओरण, सांवलजी का ओरण, मालणजी का ओरण, गोगाजी का ओरण, रामदेवजी का ओरण, पाबूजी का ओरण, माण्डनजी का ओरण।

    नाथ धर्म के साधुओं को समर्पित ओरण : भैंरूनाथजी का ओरण, बालकनाथजी का ओरण, धोरानाथ का ओरण, बादलपुरी का ओरण, मेहरनाथ का ओरण, मोडजी का ओरण, गंगापुरी का ओरण, राघवपुरी का ओरण, संतोष भारती का ओरण, बादलपुरी का ओरण आदि।

    क्षेत्रपाल, वीरजी एवं झुंझारजी के ओरण : खेतपालजी का ओरण, मामाजी का ओरण, भोमियाजी का ओरण, झुंझारजी का ओरण, खंगारजी का ओरण, भूरा राठौड़ का ओरण, पीर सरदार का ओरण, केनाजी का ओरण, जेतजी का ओरण आदि।


    गोचर

    गायों के चरने के लिये छोड़ा गया स्थान गोचर कहलाता है। राजस्थान में परम्परागत रूप से हर गांव के निकट गोचर छोड़ा जाता था। इस भूमि पर न तो मकान बनाये जाते थे और न खेती की जाती थी। आज भी यह परम्परा अस्तित्त्व में है। राजस्थान के गांवों के बाहर वर्तमान में एक हैक्टेयर से लेकर 10 हजार हैक्टैयर तक के गोचर उपलब्ध हैं। इनका रख-रखाव ग्राम पंचायत द्वारा किया जाता है। राजस्थान में 88,56,101 हैक्टेयर गोचर भूमि है जो कि कुल उपलब्ध भूमि का 41.8 प्रतिशत है। इसमें से 9,11,233 हैक्टेयर स्थायी गोचर भूमि, 70,50,577 हैक्टेयर ऊसर भूमि तथा 8,93,691 हैक्टेयर सीमांत भूमि है।

    राज्य के मरुस्थलीय जिलों में भी गोचरों का पर्याप्त प्रावधान किया गया है। मरुस्थलीय जोधपुर संभाग में 2,826 गांवों में गोचर विद्यमान हैं जिनका कुल क्षेत्रफल 3,58,395 हैक्टेयर है। इन भूमियों में सेवण तथा धामण जैसी घासें स्वाभाविक रूप से उगती और पनपती हैं जो पशुओं के लिये उत्तम आहार का काम करती हैं। छोटे गोचरों में तथा मरुस्थलीय गोचरों में वर्षा काल को छोड़कर प्रायः घास का अभाव रहता है तथा झाड़ियों की संख्या कम होने से भी ये पशु चारण की आवश्यकता की पूर्ति नहीं करते हैं। फिर भी राजस्थान के गोचरों के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता। ये भी पर्यावरण के मजबूत प्रहरी है। यदि राजस्थान में गोचर छोड़ने की परम्परा नहीं होती तो पर्यावरण को निःसंदेह बहुत बड़ी क्षति पहुंची होती।

    पारिस्थितिकी तंत्र के पहरेदार

    वर्षा की कमी, मरुस्थलीय प्रसार एवं तेजी से बढ़ती जनसंख्या तथा पालतू पशुओं की बड़ी संख्या में उपस्थिति के कारण राज्य का पारिस्थितिकी तंत्र अत्यंत नाजुक अवस्था में है। राज्य में बड़ी संख्या मंर उपस्थित ओरणों और गोचरों ने राज्य के पारिस्थितिकी तंत्र को सफलतापूर्वक थाम रखा है। इस दृष्टि से ओरण एवं गोचर, पर्यावरण की रक्षा के लिये सबसे मजबूत पहरेदार सिद्ध हुए हैं। ओरण और गोचर क्षेत्र की वनस्पतियां पर्यावरण को ऑक्सीजन, कार्बनिक अवशिष्ट तथा पशु-पक्षियों को आश्रय एवं भोजन देकर और मृदा अपरदन को रोककर पास्थितिकी तंत्र को मजबूत बनाती हैं।

    ग्रामीणों की वानस्पातिक आवश्यकताओं का अक्षय भण्डार

    ओरण एवं गोचरों से स्थानीय लोगों को जलाऊ लकड़ी, पशु चारा, गोंद, कूमट के बीज, खेजड़ी की सांगरियां, गूगल, शहद, विभिन्न प्रकार की औषधियां तथा विविध प्रकार के वानस्पातिक उत्पाद प्राप्त होते हैं। इसलिये इन्हें स्थानीय लोगों के लिये प्राकृतिक सम्पदा का अक्षय गोदाम कहा जा सकता है। ओरण एवं गोचर, ग्रामीण क्षेत्र में उपयोग में ली जाने वाली खाट बुनने के लिये मूंझ, झौंपड़ी बनाने के लिये लकड़ियां, बाड़े की चार दीवारी बनाने के लिये कांटों आदि की आपूर्ति भी करते हैं। ओरणों में पनपने वाला फोग तो ग्रामीण जीवन की धुरी कहा जा सकता है। ओरणों में खड़े देशी बबूल एवं विदेशी बबूल की झाड़ियां जलाऊ लकड़ी से लेकर इमारती लकड़ी एवं पशु चारा तक उपलब्ध कराते हैं। गहरी जड़ों वाली बूई नामक झाड़ी, ग्रामीण क्षेत्रों में झाड़ू की आवश्यकता पूरी करती है।

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  • राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान की चुनी हुई सरकारें

     22.12.2021
    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान की चुनी हुई सरकारें

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी - 202

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान की चुनी हुई सरकारें

    प्रथम विधानसभा (ई.1952-57)

    1. प्रश्न -राज्य में प्रथम आम चुनाव कब हुए?

    उतर- ई.1952 में।

    2. प्रश्न -प्रथम विधान सभा का कार्यकाल क्या था?

    उतर- ई.1952-57

    3. प्रश्न -राज्य की पहली विधान सभा में सदस्यों की संख्या कितनी थी?

    उतर- 160

    4. प्रश्न -कितने विधानसभा क्षेत्रों से दो-दो प्रत्याशी चुने जाने थे?

    उतर- चार विधान सभा क्षेत्र ऐसे थे जहाँ से एक-एक प्रत्याशी सामान्य वर्ग से तथा एक-एक व्यक्ति अनुसूचित जनजाति से चुना गया। 16 विधान सभा क्षेत्र ऐसे थे जिनमें एक-एक सदस्य सामान्य वर्ग से तथा एक-एक सदस्य अनुसूचित जाति से चुना गया।

    5. प्रश्न -पहली विधानसभा की दलवार स्थिति क्या रही?

    उतर- कांग्रेस- 82, रामराज्य परिषद- 24, भारतीय जनसंघ- 8, कृषिकार लोक पार्टी- 7, हिन्दू महासभा- 2, कृषक मजदूर पार्टी- 1, निर्दलीय- 35.

    6. प्रश्न -पहली विधानसभा में बडे़ नेताओं के चुनाव परिणाम क्या रहे?

    उतर- जयनारायण व्यास विधानसभा और लोकसभा दोनों ही सीटें हार गये। गोकुल भाई भट्ट ने लोकसभा चुनावों में परास्त होकर राजनीति छोड़ दी। माणिक्यलाल वर्मा चित्तौड़गढ़ लोकसभा क्षेत्र से पराजित हो गये। टीकाराम पालीवाल दो विधानसभा सीटों पर चुने गये। हीरालाल शास्त्री ने चुनाव नहीं लड़ा।

    7. प्रश्न -पहले आम चुनावों के दौरान किस बड़े प्रत्याशी का निधन हो गया?

    उतर- महाराजा हनवंतसिंह विधानसभा एवं लोकसभा दोनों सीटें जीते किंतु चुनाव परिणाम घोषित होने के दौरान वायुयान दुर्घटना में उनका निधन हो गया।

    8. प्रश्न -राज्य में पहली चुनी हुई सरकार किसके नेतृत्व में बनी?

    उतर- कांग्रेस दल के टीकाराम पालीवाल के नेतृत्व में।

    9. प्रश्न -टीकाराम पालीवाल सरकार ने कब से कब तक काम किया?

    उतर- 3 मार्च 1952 से 31 अक्टूबर 1952 तक।

    10. प्रश्न -टीकाराम पालीवाल के बाद किसके मुख्यमंत्रित्व में सरकार का गठन हुआ?

    उतर- कांग्रेस दल के जयनारायण व्यास।

    11. प्रश्न -जयनारायण व्यास सरकार ने कब से कब तक काम किया? 1 नवम्बर 1952 से 6 नवम्बर 1954 तक। 12. प्रश्न -जयनारायण व्यास के नेतृत्व को उनके किस सहयोगी ने चुनौती दी? कांग्रेस दल के मोहनलाल सुखाड़िया ने। 13. प्रश्न -इस चुनौती का क्या परिणाम रहा? 6 नवम्बर 1954 को कांग्रेस विधायक मण्डल की बैठक में खुला चुनाव हुआ जिसमें सुखाड़िया ने व्यास को 8 मतों से परास्त कर दिया। 14. प्रश्न -मोहनलाल सुखाड़िया की सरकार ने कब से कब तक काम किया? 13 नवम्बर 1954 से 9 जुलाई 1971 द्वितीय विधान सभा (1957-1962) 15. प्रश्न -द्वितीय विधानसभा में सदस्यों की संख्या कितनी थी? अजमेर का विलय हो जाने के कारण विधानसभा में सदस्यों की संख्या 190 हो गई थी किंतु विधान सभा क्षेत्रों का पुनर्सीमांकन के कारण यह घटकर 176 रह गई थी। 16. प्रश्न -कितने विधानसभा क्षेत्रों से दो-दो प्रत्याशी चुने गये? 27 विधानसभा क्षेत्रों में एक सदस्य सामान्य वर्ग से तथा एक सदस्य अनुसूचित जाति से चुना गया। 12 क्षेत्रों में एक सदस्य सामान्य श्रेणी से तथा एक सदस्य अनुसूचित जनजाति से चुना गया। 17. प्रश्न -द्वितीय विधानसभा के गठन के बाद किसके नेतृत्व में सरकार का गठन हुआ? कांग्रेस दल के मोहनलाल सुखाड़िया के नेतृत्व में सरकार का गठन हुआ जिसने अपना 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा किया। तृतीय विधान सभा (1962-67) 18. प्रश्न -तृतीय विधानसभा में सदस्यों की संख्या कितनी थी? 176 19. प्रश्न -कितने विधानसभा क्षेत्रों से दो-दो प्रत्याशी चुने गये? इस बार द्विसदस्यीय क्षेत्र समाप्त करके सभी क्षेत्र एक सदस्यीय कर दिये गये। 20. प्रश्न -तृतीय विधानसभा के गठन के बाद किसके नेतृत्व में सरकार का गठन हुआ? कांग्रेस दल के मोहनलाल सुखाड़िया के नेतृत्व में सरकार का गठन हुआ जिसने अपना 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा किया। चतुर्थ विधान सभा (1967-72) 21. प्रश्न -चतुर्थ विधान सभा में सीटों की संख्या कितनी थी? 184 22. प्रश्न -विधानसभा चुनावों के बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन क्यों लगाया गया? किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने से 13 मार्च 1967 को राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। 23. सरकार का गठन कब हो सका? 26 अप्रेल 1967 को कांग्रेस के मोहनलाल सुखाड़िया के नेतृत्व में सरकार का गठन हुआ तथा राष्ट्रपति शासन हटा दिया गया। 24. प्रश्न -मोहनलाल सुखाड़िया ने त्यागपत्र कब एवं क्यों दिया? मार्च 1971 में भारत की प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के निर्देश पर सुखाड़िया ने मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। 25. प्रश्न -राज्य में अब तक सबसे लम्बे समय तक मुख्यमंत्री रहने का कीर्तिमान किसके नाम है? कांग्रेस दल के मोहनलाल सुखाड़िया 17 वर्ष तक मुख्यमंत्री रहे जो आज भी राजस्थान में कीर्तिमान है। 26. प्रश्न -बरकतुल्ला खां ने अपनी सरकार कब बनायी? 9 जुलाई 1971 को। पंचम विधान सभा (1972-1977) 27. प्रश्न -पंचम विधान सभा का गठन होने के बाद किस नेता ने अपनी सरकार बनाई? 16 मार्च 1972 को कांग्रेस दल के बरकतुल्ला खां ने अपनी दूसरी सरकार बनायी किंतु 11 अक्टूबर 1973 को मुख्यमंत्री बरकतुल्ला खां की आकस्मिक मृत्यु हो जाने से यह सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी। 28. प्रश्न -बरकतुल्ला खां के बाद किसे मुख्यमंत्री बनाया गया? 11 अक्टूबर 1973 को हरिदेव जोशी ने अपनी सरकार बनाई। 1977 में केन्द्र में इंन्दिरा गांधी के स्थान पर मोरारजी देसाई की सरकार बन जाने पर राजस्थान की कांग्रेस सरकार को बर्खास्त कर दिया गया तथा प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। षष्ठम् विधान सभा (1977-80) 29. प्रश्न -छठी विधान सभा में सीटों की संख्या कितनी थी? 200 30. प्रश्न -छठी विधान सभा के गठन के बाद किसकी सरकार बनी? जनता दल के भैंरोसिंह शेखावत ने सरकार बनाई। यह राज्य की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार थी। 31. प्रश्न -भैंरोसिंह शेखावत सरकार अपना कार्यकाल पूरा क्यों नहीं कर सकी? जनवरी 1980 में केन्द्र में कांग्रेस (इ) सरकार बनी जिसने 17 फरवरी 1980 को शेखावत सरकार बर्खास्त करके विधान सभा भंग कर दी। राज्य में तीसरी बार राष्ट्रपति शासन लगाया गया। सप्तम् विधान सभा (1980-1985), प्रथम मध्यावधि चुनाव 32. प्रश्न -राज्य में प्रथम मध्यावधि चुनाव कब हुए? छठी विधान सभा का बीच में ही पतन हो जाने से सातवीं विधान सभा के मई 1980 में पहली बार मध्यावधि चुनाव हुए। 33. प्रश्न -सप्तम् विधान सभा के गठन के बाद किसकी सरकार बनी? कांग्रेस (इ) के जगन्नाथ पहाड़िया ने की। 34. प्रश्न -जगन्नाथ पहाड़िया सरकार अपना कार्यकाल पूरा क्यों नहीं कर सकी? सत्तारूढ़ दल में झगड़ा हो जाने से हाईकमान के निर्देश पर 12 जुलाई 1981 को पहाड़िया ने त्यागपत्र दे दिया जिससे इस सरकार का पतन हो गया। 35. प्रश्न -शिवचरण माथुर सरकार ने कब से कब तक कार्य किया? 14 जुलाई 1981 से 23 फरवरी 1985 तक। 36. प्रश्न -शिवचरण माथुर सरकार को त्यागपत्र क्यों देना पड़ा? 21 फरवरी 1985 को डीग में चुनाव प्रचार के दौरान निर्दलीय प्रत्याशी राजा मानसिंह की पुलिस की गोली से मृत्यु हो जाने के कारण मुख्यमंत्री को त्यागपत्र देना पड़ा। 37. प्रश्न -हीरालाल देवपुरा सरकार ने कब से कब तक काम किया? 23 फरवरी 1985 से 10 मार्च 1985 तक। आठवीं विधान सभा (1985-1990) 38. प्रश्न -आठवीं विधानसभा के गठन के बाद किसके नेतृत्व में सरकार बनी? हरिदेव जोशी ने दूसरी बार अपनी सरकार बनाई। इस सरकार ने 10 मार्च 1985 से 18 जनवरी 1988 तक कार्य किया। 39. प्रश्न -हरिदेव जोशी की दूसरी सरकार ने भी कार्यकाल पूरा क्यों नहीं किया? 18 जनवरी 1988 को कांग्रेस हाई कमान के निर्देश पर मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी को त्यागपत्र देना पड़ा। 40. प्रश्न -शिवचरण माथुर ने अपनी दूसरी सरकार कब बनायी? 20 जनवरी 1988 को। 41. प्रश्न -शिवचरण माथुर की दूसरी सरकार ने भी कार्यकाल पूरा क्यों नहीं किया? नवम्बर 1989 में पूरे देश में नवम् लोक सभा के चुनाव हुए जिसमें कांग्रेस को राजस्थान से एक भी सीट प्राप्त नहीं हुई। इस कारण 29 नवम्बर को माथुर सरकार ने त्यागपत्र दे दिया। 42. प्रश्न -हरिदेव जोशी की तीसरी सरकार ने कब से कब तक काम किया? 4 दिसम्बर 1989 से 1 मार्च 1990 तक। नवम् विधान सभा (1990-92) 43. प्रश्न -नौंवी विधानसभा के गठन के बाद किसके नेतृत्व में सरकार बनी? भाजपा ने जनता दल अविभाजित के सहयोग से सरकार बनाई। भैंरोसिंह शेखावत ने अपनी दूसरी सरकार का गठन किया। 44. प्रश्न -भैंरोसिंह शेखावत की दूसरी सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा क्यों नहीं कर सकी। 6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में हुई गतिविधियों को लेकर केन्द्र सरकार ने शेखावत सरकार को अपदस्थ कर राज्य में चौथी बार राष्ट्रपति शासन लगा दिया। विधान सभा भंग कर दी गयी। दशम् विधान सभा (1993-1998) 45. प्रश्न -दसवीं विधानसभा के गठन के बाद किसके नेतृत्व में सरकार बनी? भाजपा के भैंरोसिंह शेखावत ने तीसरी बार राज्य में अपनी सरकार का गठन किया। 46. प्रश्न -भैंरोसिंह शेखावत की तीसरी सरकार ने कब से कब तक काम किया? 11 दिसम्बर 1993 से दिसम्बर 1998 में विधानसभा का कार्यकाल पूरा होने तक। ग्यारहवीं विधान सभा (1998-2003) 47. प्रश्न -ग्यारहवीं विधानसभा के गठन के बाद किसके नेतृत्व में सरकार बनी? कांग्रेस के अशोक गहलोत ने राज्य में अपनी पहली सरकार बनाई। 48. प्रश्न -अशोक गहलोत सरकार ने कब से कब तक कार्य किया? इस सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया तथा दिसम्बर 1998 से दिसम्बर 2003 तक काम करती रही। बारहवीं विधान सभा (2003 से 2008) 49. प्रश्न -बारहवीं विधानसभा के गठन के बाद किसके नेतृत्व में सरकार बनी? भाजपा की वसुंधरा राजे ने अपनी पहली सरकार बनाई। 50. प्रश्न -वसुंधरा राजे सरकार ने कब से कब तक कार्य किया? इस सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया तथा दिसम्बर 2003 से दिसम्बर 2008 तक काम करती रही। तेरहवीं विधान सभा (2008 से 2013) 51. प्रश्न -तेरहवीं विधानसभा के गठन के बाद किसके नेतृत्व में सरकार बनी? कांग्रेस के अशोक गहलोत ने राज्य में अपनी दूसरी सरकार बनाई। 52. प्रश्न -अशोक गहलोत सरकार ने कब से कब तक कार्य किया? इस सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया तथा दिसम्बर 2008 से दिसम्बर 2013 तक काम करती रही। चौदहवीं विधान सभा (2013 से 2018) 53. प्रश्न -चौदहवीं विधानसभा के गठन के बाद किसके नेतृत्व में सरकार बनी? भाजपा की वसुंधरा राजे ने अपनी दूसरी सरकार बनाई। 13 दिसम्बर 2013 को सरकार ने शपथ ग्रहण की तथा अब तक चल रही है। पन्द्रहवीं विधान सभा (2018 से 2023) 54. प्रश्न -पन्द्रहवीं विधानसभा के गठन के बाद किसके नेतृत्व में सरकार बनी? कांग्रेस के अशोक गहलोत ने राज्य में अपनी तीसरी बार सरकार बनाई।


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  • युग-पुरुष भैरोंसिंह शेखावत

     02.06.2020
    युग-पुरुष भैरोंसिंह शेखावत

    धनतेरस को प्रकट हुई ज्योति

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    श्री भैरोंसिंह शेखावत का जन्म 23 अक्टूबर 1923 को धनतेरस के दिन, राजपूताने की जयपुर रियासत के सीकर ठिकाणे के खाचरियावास गांव में एक सामान्य राजपूत कृषक परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम देवीसिंह शेखावत तथा माता का नाम बन्नेकंवर था। भैरोंसिंह अपने माता-पिता की प्रथम संतान थे। उनके बाद तीन छोटे भाई तथा चार बहिनों का जन्म हुआ। भैरोंसिंह का ननिहाल चूरू जिले के सहनाली बड़ी गांव में था।

    तीस किलोमीटर पैदल

    भैरोंसिंह के पिता देवीसिंह एक आदर्श अध्यापक थे। रूढ़िवाद के विरोधी और समाज में समता के पक्षधर देवीसिंह ने बुराइयों के समक्ष कभी सिर नहीं झुकाया। इसी आदत के कारण एक बार वे अपना गांव छोड़कर सवाईमाधोपुर जिले के बीछीदाना गांव में रहने लगे। वहीं पर उनकी प्रारंभिक शिक्षा हुई। भैरोंसिंह को सुंदर हस्तलेख और अनुशासन पिता से विरासत में मिले। बीछीदाना में पढ़ते हुए जब कुछ साल हो गये तो उन्हें जोबनेर के एंग्लोवैदिक स्कूल में पढ़ने भेजा गया। उस समय मोटरें नहीं थीं। कई बार वे जोबनेर से खाचरियावास तक की 30 किलोमीटर की दूरी वे पैदल ही पार करते थे। हाई स्कूल परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद ई.1941 में उन्हें जयपुर के महाराजा कॉलेज के प्रथम वर्ष में भर्ती करवाया गया। कॉलेज की शिक्षा के दौरान उन्होंने नाटकों में भी भाग लिया।

    पीपल के पेड़ के नीचे बारात

    3 जुलाई 1941 को उनका विवाह जोधपुर रियासत के बुचकला गांव की सूरजकंवर से कर दिया गया। उनकी बारात जोबनेर से पीपाड़रोड तक रेलगाड़ी से पहुंची तथा वहां से बैलगाड़ियों में बैठकर बुचकला पहुंची। बुचकला में उनकी बारात अडूणिया बेरा के पीपल के नीचे दो दिन ठहरी। भैरोंसिंह के ससुराल में ससुर कल्याणसिंह राठौड़, सास सदाकंवर, पांच साले तथा एक साली थी। भैरोंसिंह की पत्नी सूरजकंवर अपने पीहर में सबसे छोटी थीं।

    नाडी का पानी पिया

    भैरोंसिंह अपने विवाह के पश्चात् पीपाड़ रोड से पैदल ही अपने ससुराल बुचकला पहुंचे थे। बीच मार्ग में जब उन्हें प्यास लगी तो उन्होंने एक नाडी में अपने हाथों से पानी पिया। इससे उन्हें नारू रोग हो गया। इस रोग का निशान जीवन भर उनके शरीर पर बना रहा। ई.2004 में भैरोंसिंह जब उपराष्ट्रपति थे, तब वे पुनः बुचकला गये और वहां आम सभा में उन्होंने स्वयं यह किस्सा सुनाया।

    सिर से पिता का साया उठा

    ई.1942 में देवीसिंह शेखावत का निधन हो गया। इसके बाद परिवार के पालन-पोषण की जिम्मेदारी मां बन्ने कंवर ने निभाई। उनकी माँ ने बहुत कठिन परिश्रम करके परिवार को चलाया। भैरोंसिंह स्वयं इस बात को कितनी ही बार दोहराते थे कि उनकी माता किस तरह चक्की चलाती थी। किंतु भैरोंसिंह की पढ़ाई आगे नहीं चल पाई। परिवार के निर्वहन के लिये भैरोंसिंह ने सीकर ठिकाणे के पुलिस विभाग में असिस्टेण्ट सब इंसपैक्टर की नौकरी कर ली किंतु पुलिस की नौकरी उन्हें रास नहीं आई। उनका मन राजनीति की ओर झुकने लगा।

    लगान वसूलने वालों ने बनाया उन्हें भैरोंसिंह

    एक बार उनके गांव में ड्डियों का दल सारे खेतों को चट कर गया। इसके उपरांत भी सरकारी हरकारे लगान लेने पहुंच गये। इस लगान के विरोध की भावना से एक नया भैरोंसिंह निकलकर सामने आया। उनकी मां कहती थी कि एक पण्डित ने उन्हें बताया था कि भैरोंसिंह गांव और परिवार का नाम रोशन करेगा। ई.1952 में विधायक बनने से लेकर अपने अंतिम समय तक उनके व्यवहार में कोई अंतर नहीं आया था।

    बिशनसिंह के कहने से मिला टिकट

    1952 के प्रथम आम चुनावों में जनसंघ को दाता रामगढ़ से कोई उपयुक्त प्रत्याशी नहीं मिल रहा था। तब बिशनसिंह शेखावत ने लालकृष्ण आडवानी को सुझाव दिया कि मेरे एक भाई भैरोंसिंह शेखावत पुलिस में हैं, आप उन्हें टिकट दे दें। इस पर उन्हें विधायक का टिकट दिया गया।

    सूरजकंवर से लिये दस रुपये

    चुनाव लड़ने के लिये सीकर जाना आवश्यक था और सीकर जाने के लिये जेब में रुपये होने आवश्यक थे किंतु मनमौजी भैरोंसिंह की जेब में कुछ भी नहीं था। उन्होंने अपनी पत्नी से दस रुपये मांगे। उदारमना पत्नी ने उनकी मांग पूरी की और भैरोंसिंह दस रुपये लेकर सीकर आ गये। इसके बाद उनका जनसंघ से जुड़ाव हुआ। उन्हें दीपक चुनाव चिह्न के साथ जनसंघ का टिकट मिला और वे 2,833 वोटों से जीत हासिल करके राजस्थान की प्रथम विधानसभा के सदस्य बन गये।

    जागीरदारी प्रथा उन्मूलन का समर्थन

    सितम्बर 1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पं. दीनदयाल उपाध्याय जनसंघ की स्थापना कर चुके थे। जनसंघ की शाखाएं गांवों एवं पंचायतों तक स्थापित करने में जागीरदारों ने अच्छा योगदान दिया। उन्हें आशा थी कि जागीरदारी प्रथा जारी रखवाने में जनसंघ से सहायता मिलेगी। राज्य विधानसभा के पहले चुनाव में जागीदारों की सहायता से जनसंघ ने 50 सीटों पर प्रत्याशी मैदान में उतारे। उनमें से 30 की जमानतें जब्त हो गईं। भैरोंसिंह सहित जनसंघ के केवल आठ विधायक जीते जिनमें से अधिकतर जागीरदार ही थे। राजस्थान की प्रथम निर्वाचित सरकार ने जागीरदारी उन्मूलन का कार्य आरंभ किया तो जनसंघ के विधायक इसके विरोध में खड़े हो गये किंतु भैरोंसिंह शेखावत तथा जगतसिंह झाला ने जागीरदारी प्रथा के उन्मूलन का समर्थन किया। पार्टी के छः विधायकों ने जो कि स्वयं जागीरदार थे, भैरोंसिंह को जनसंघ से निकलवाने के प्रयास आरम्भ कर दिये। इस पर भैरोंसिंह शेखवात दिल्ली जाकर श्यामाप्रसाद मुखर्जी तथा दीनदयाल उपाध्याय से मिले। दोनों नेता भैरोंसिंह के तर्कों से सहमत हुए और जागीरदार विधायकों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही की गई।

    नमस्ते सदा वत्सले

    भारत माता के प्रति उनकी निष्ठा, भक्ति और समर्पण अटूट था। जब 1952 में वे जनसंघ से विधायक बने तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की ओर उनका झुकाव हुआ। वे प्रायः संघ के कार्यक्रमों में संघ का गणवेश धारण करके जाते थे। सदा वत्सला भारत माता के प्रति उनका यह नमन सदैव बना रहा।

    लगातार चार बार विधायक बने

    वर्ष 1952 में दांता रामगढ़ विधान सभा सीट जीतने के बाद भैरोंसिंह शेखावत वर्ष 1957 में श्रीमाधोपुर सीट से विधायक निर्वाचित हुए। 1962 और 1967 में वे जयुपर की किशनपोल सीट से विधायक चुने गये। इस प्रकार वे अपने राजनीतिक जीवन के आरंभ में ही चार बार लगातार विधायक बने।

    गांधीनगर सीट से हारे

    1972 के विधानसभा आम चुनावों में भैरोंसिंह शेखावत ने गांधीनगर सीट से चुनाव लड़ा। उनके सामने कांग्रेस के जनार्दन सिंह गहलोत खड़े हुए। चुनाव प्रचार के दौरा भैरोंसिंह शेखावत वोट मांगने के लिये जनार्दनसिंह के माता-पिता के घर भी गये और उनसे अपने लिये वोट मांगा। एक बार प्रचार के दौरान दोनों प्रत्याशी आमने-सामने हो गये। इस पर भैरोंसिंह शेखावत ने जनार्दनसिंह से सबके सामने कह दिया कि तुम जीत रहे हो। ऐसा ही हुआ। भैरोंसिंह यह चुनाव हार गये।

    बाड़मेर सीट से हारे

    गांधीनगर सीट से चुनाव हारने के बाद भैरोंसिंह शेखावत ने बाड़मेर संसदीय क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव लड़ा किंतु इस चुनाव में भी उन्हें कांग्रेस के अमृत नाहटा से पराजय का सामना करना पड़ा।

    राज्यसभा में

    दो बार लगातार विधान सभा चुनावों में मिली पराजय किसी के लिये भी बड़ा झटका हो सकती थी किंतु वर्ष 1974 में मध्यप्रदेश जनसंघ ने भैरोंसिंह शेखावत को राज्यसभा में मनोनीत कर दिया और वे 1974 से 1977 तक राज्यसभा के सदस्य रहे।

    पौने दो साल जेल में

    ई.1975 में जब देश में आपात् काल लगा तो जून 1975 से मार्च 1977 तक भैरोंसिंह शेखावत मीसा के अंतर्गत जेल में बंद रहे।

    पहली बार मुख्यमंत्री

    आपात्काल समाप्त होने के बाद वर्ष 1977 में देश में जनता पार्टी का गठन हुआ। इस नई पार्टी में जनसंघ का भी विलय हो गया। भैरोंसिंह भी जनता पार्टी में सम्मिलित हो गये। उसी वर्ष राजस्थान में विधानसभा के लिये मध्यावधि चुनाव हुए जिनमें जनता पार्टी को 200 में से 150 स्थान प्राप्त हुए। उस समय बहुत से सदस्य डूंगरपुर के पूर्व महारावल लक्ष्मणसिंह को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे जो कि उच्च कोटि के वक्ता और प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी थे किंतु जनता पार्टी का केन्द्रीय नेतृत्व भैरोंसिंह शेखावत को मुख्यमंत्री बनाना चाहता था। विधायक दल की बैठक में मुख्यमंत्री पद के लिये जनता पार्टी के मास्टर आदित्येन्द्र तथा भैरोंसिंह शेखावत के बीच मुकाबला हुआ जिसमें शेखावत की जीत हुई और उन्होंने राज्य की पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनायी। शेखावत उस समय मध्यप्रदेश से राज्यसभा के सदस्य थे। 22 जून 19977 को चौपन वर्ष की आयु में उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली इस कारण उन्हें राज्यसभा की सदस्यता छोड़ देनी पड़ी।

    पहला मंत्रिमण्डल

    27 जून 1977 को शेखावत सरकार में मास्टर आदित्येन्द्र, प्रो. केदार नाथ, ललित किशोर चतुर्वेदी, सम्पत राम तथा त्रिलोकचंद जैन को कैबीनेट मंत्री, कैलाश मेघवाल, विज्ञान मोदी, महबूब अली और विद्या पाठक को राज्य मंत्री बनाया गया।

    छबड़ा से चुने गये

    शेखावत ने राज्य सभा से त्यागपत्र देकर 18 अक्टूबर 1977 को कोटा जिले के छबड़ा विधानसभा क्षेत्र से उप चुनाव लड़ा तथा विधानसभा की सदस्यता प्राप्त की।

    पहली सरकार का विस्तार

    7 फरवरी 1978 को शेखावत सरकार का विस्तार किया गया। सूर्यनारायण चौधरी, भंवरलाल शर्मा, जयनारायण पूनिया, दिग्विजय सिंह व पुरुषोत्तम मंत्री को कैबीनेट मंत्री के रूप में सम्मिलित किया गया। कैलाश मेघवाल को भी कैबीनेट मंत्री का दर्जा दिया गया। लाल चंद डूडी तथा नन्दलाल मीणा को राज्यमंत्री बनाया गया। जुलाई 1978 में केन्द्र में मोरारजी सरकार गिर गयी और चरणसिंह सरकार का जन्म हुआ। इस कारण राजस्थान में लालचंद डूडी तथा विज्ञान मोदी ने 8 जुलाई 1978 को भैरोंसिंह सरकार से त्यागपत्र दे दिया। 5 नवम्बर 1978 को शेखावत मंत्रिमण्डल का तीसरा विस्तार किया गया। माणकचंद सुराणा, कल्याणसिंह कालवी, डॉ. हरिसिंह और बिरदमल सिंघवी को कैबीनेट मंत्री के रूप में तथा हरिसिंह यादव और भैरवलाल काला बादल को राज्य मंत्री के रूप में सम्मिलित किया गया। 18 मई 1979 को मास्टर आदित्येन्द्र, 21 जुलाई को प्रो. केदार नाथ और 2 अगस्त को डॉ. हरिसिंह ने शेखावत सरकार से त्यागपत्र दे दिया। 20 दिसम्बर 1979 को शिवचरण सिंह गुर्जर को सरकार में कैबीनेट मंत्री के रूप में सम्मिलित किया गया।

    कर्मचारियों को वापस नौकरी में लिया

    आपात्काल में बहुत से कर्मचारियों को राजकीय सेवा से निकला दिया गया था। भैरोंसिंह शेखावत अभावों की मार को अच्छी तरह समझते थे। उन्होंने आपात काल में निकाल गये समस्त कर्मचारियों को फिर से सेवा में रख लिया और जितने समय वे बंदी रहे, उस काल के समस्त वित्तीय लाभ भी उन्हें दे दिये। आपात् काल के बाद प्रमुख लोग तो जेलों से बाहर आ गये किंतु बहुत से सामान्य जन अब भी जेलों में बंद थे। भैरोंसिंह शेखावत की सरकार ने उन सबको भी जेल से बाहर निकाला।

    जस्टिस कानसिंह परिहार आयोग का गठन

    आपात् काल में कुछ सरकारी कर्मचारियों ने जनता के साथ ज्यादतियां कीं। उनका प्रतिकार करने के लिये भैरोंसिंह शेखावत सरकार ने राजस्थान उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त जस्टिस कानसिंह की अध्यक्षता में एक सदस्यीय आयोग का गठन किया। इस आयोग के पास शिकायतों के ढेर लग गये। ये आवेदन आपातकाल में जबरन नसबंदी करने, जबरन सेवानिवृत्ति करने, अकारण बंदी बनाने तथा अतिक्रमण नाम देकर वैध निर्माणों को तोड़ने से सम्बन्धित थे। जस्टिस परिहार ने कड़ी मेहनत करके इन शिकायतों का वर्गीकरण किया तथा उनके सम्बन्ध में पांच सौ प्रतिवेदन तैयार किये। इनमें से कुछ प्रतिवेदनों पर ही सरकार कार्यवाही कर सकी। शेष पर कार्यवाही होने से पहले ही राज्य में पुनः राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया।

    बाण्या की नौकरी कर ले

    मुख्यमंत्री बनने के बाद भैरोंसिंह शेखावत को प्रायः सचिवालय में बैठकर देर रात तक काम करना पड़ता था। उनकी माँ को यह समझ में नहीं आया कि बेटे ने कौनसी नौकरी कर ली है। न तो समय पर घर आता है और न समय पर खाना खाता है। एक दिन मां से रहा नहीं गया और अपने मुख्यमंत्री पुत्र से बोली- बेटा इसी कुण सी नौकरी कर ली, जो खाबा को पतो न सोबा को। तू तो आ नौकरी छोड, कोई बाण्या की नौकरी कर ले।

    अपने विरोध के लिये दी गई पार्टी में पहुंचे

    एक बार जनार्दनसिंह गहलोत ने भैरोंसिंह शेखावत की सरकार के विरोध में कार्यवाही करने के लिये अपने घर पर कुछ नेताओं की पार्टी रखी। इसमें भैरोंसिंह शेखावत मंत्रिमण्डल के कुछ कैबीनेट मंत्री और विधायक भी सम्मिलित हुए। यह बात भैरोंसिंह शेखावत को ज्ञात हो गई। इस पर शेखावत ने उन्हें फोन करके उलाहना दिया कि मुझे भोज में क्यों नहीं बुलाया। मैं आ रहा हूँ। आधे घण्टे में ही शेखावत, जनार्दनसिंह के घर पहुंच गये। जनार्दनसिंह की सारी योजना पर पानी फिर गया।

    उन्होंने निर्धनता का दंश स्वयं झेला था

    भैरोंसिंह शेखावत ने स्वयं निर्धनता का दंश झेला था। निर्धन के उत्थान के प्रति उनके मन में सदैव ललक रहती थी। वे राजस्थान मंक आदर्श गांवों की स्थापना करना चाहते थे। जब वे उपराष्ट्रपति बने तो प्रायः अपने भाषणों में एक बात कहा करते थे कि गरीबों को लोकतंत्र के पांचवे स्तम्भ के रूप में स्थापित कर, देश के संसाधनों पर उनका सर्वोपरि अधिकार स्थापित किया जाना चाहिये।

    अंत्योदय योजना के जनक

    भैरोंसिंह शेखावत गरीबों के सम्मानपूर्ण जीवन के पक्षधर थे। इसके लिये उन्होंने अंत्योदय योजना बनाई और उसे सर्वप्रथम राजस्थान में ही लागू किया। इस योजना के आरंभिक प्रावधानों में प्रत्येक गांव से सबसे गरीब पांच परिवारों को चयन करना, उन्हें विभिन्न आर्थिक गतिविधियों यथा पशुपालन, कुटीर उद्योग, ऊँटगाड़ा आदि के लिये बैंकों से कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध करवाना आदि सम्मिलित थे। बाद में यह योजना पूरे देश में लागू हुई और आगे चलकर एकीकृत ग्रामीण विकास योजना का मुख्य आधार बनी। इस योजना के सम्बन्ध में उनका कहना था- जैसे शरीर के एक अंग में विकृति आने से पूरे शरीर पर असर पड़ता है, इसी तरह समाज में कहीं भी विकृति आने से लोगों पर उसका प्रभाव पड़ता है। इस योजना का अंत्योदय योजना ही सफल प्रयोग है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस योजना की प्रशंसा की। आज भी यह योजना भारत सरकार द्वारा केन्द्र प्रवर्तित योजना के रूप में चला रही है।

    भारत के रॉक्फेलर

    अंत्योदय योजना इतनी प्रसिद्ध हुई कि विश्व बैंक के तत्कालीन अध्यक्ष रॉबर्ट मैक्नमारा ने इस योजना की सराहना करते हुए भैरोंसिंह को भारत का रॉक्फेलर कहा।

    विश्व बैंक भी सहायता के लिये आगे आया

    राजस्थान के मुख्यमंत्री रहते भैरोंसिंह शेखावत ने अपना गांव - अपना काम योजना एवं काम के बदले अनाज योजना आरंभ कीं। इन योजनाओं को गरीबी उन्मूलन के लिये अत्यंत उपयोगी माना गया। कुछ समय बाद केन्द्र सरकार के निर्देश पर अन्त्योदय योजना को काम के बदले अनाज योजना में बदल दिया गया। इस योजना में राजस्थान ने अन्य समस्त राज्यों की अपेक्षा सर्वाधिक कार्य किया तथा 1,80,000 टन अनाज उठाया। इस कारण विश्व बैंक भी इन योजनाओं के संचालन के लिये राज्य सरकार की सहायता करने के लिये आगे आया।

    पंचायतों को काम करने के अधिकार दिये

    उस समय तक पंचायतें कवल पांच सौ रुपये तक की योजनाएं ही हाथ में ले सकती थीं किंतु भैरोंसिंह शेखावत की पहली सरकार ने इस सीमा को पाचास हजार रुपये कर दिया तथा प्रत्येक पंचायत समिति के लिये निर्माण कार्यों की सीमा दस लाख रुपये कर दी।

    भारतीय जनता पार्टी में

    वर्ष 1980 में जनता पार्टी का विघटन हुआ। अटलबिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी तथा भैरोंसिंह शेखावत ने मिलकर भारतीय जनता पार्टी का गठन किया। इस प्रकार वे भाजपा के संस्थापक सदस्यों में से थे।

    राज्य में राष्ट्रपति शासन

    जनवरी 1980 में केन्द्र में कांग्रेस (इ) सरकार का निर्माण हुआ जिसने 17 फरवरी 1980 को राज्य की शेखावत सरकार की प्रथम सरकार को बर्खास्त करके विधान सभा को भंग कर दिया। राज्य मं। तीसरी बार राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। भैरोंसिंह शेखावत की सरकार ने अपनी पहली पारी में 2 वर्ष 8 महीने कार्य किया।

    विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष

    1980 के विधानसभा चुनावों में श्री भैरोंसिंह शेखावत ने छबड़ा से दुबारा चुनाव लड़ा और वे विजयी रहे किंतु उनकी पार्टी चुनाव हार गई तथा कांग्रेस की सरकार बनी। भैरोंसिंह शेखावत भापजा विधायक दल के नेता चुने गये तथा नेता प्रतिपक्ष बने। पूरे पांच साल तक वे इस पद पर बने रहे।

    दुबारा नेता प्रतिपक्ष

    1985 में आठवीं राजस्थान विधान सभा में भी कांग्रेस की सरकार बनी। इस विधानसभा के लिये भैरोंसिंह शेखावत ने निंबाहेड़ा तथा अजमेर विधानसभा सीटों से चुनाव लड़ा और वे दोनों ही सीटों पर विजयी रहे। इस विधानसभा में भी भैरोंसिंह शेखावत नेता प्रतिपक्ष के पद पर कार्य करते रहे।

    सती प्रथा का प्रबल विरोध

    4 सितम्बर 1987 को सीकर जिले के दिवराला गांव में रूपकंवर सती काण्ड हुआ। देश भर में इसकी तीव्र निंदा हुई। उस समय श्री हरिदेव जोशी राजस्थान के मुख्यमंत्री थे। उन्होंने सती प्रथा को समाप्त करने के लिये कानून बनाया। 2 नवम्बर 1987 को राजस्थान विधान सभा में भैरोंसिंह शेखावत ने इस प्रथा का प्रबल विरोध किया भैरोंसिंह शेखावत ने विगत 150 वर्षों में राज्य में सती हुई स्त्रियों के आंकड़े एकत्रित किये तथा यह सिद्ध कर दिया कि यह एक भ्रम है कि सती प्रथा राजपूतों में प्रचलित है। विगत 150 वर्षों में अन्य जातियों में राजपूतों की स्त्रियों से भी अधिक स्त्रियां सती हुई हैं। उनका तर्क था कि इस कुरीति को जड़ से नष्ट करने के लिये प्रभावी उपाय होने चाहिये।

    भैरोंसिंह शेखावत की दूसरी सरकार

    वर्ष 1990 में राजस्थान में नवम् विधानसभा के लिये चुनाव हुए जिनमें भारतीय जनता पार्टी को 85, जनता दल अविभाजित को 54 तथा कांग्रेस (इ) को 50 सीटों पर विजय प्राप्त हुई। भाकपा का एक प्रत्याशी जीता। निर्दलियों को 9 स्थानों पर विजय मिली। भाजपा के प्रत्याशी के रूप में भैरोंसिंह शेखावत ने दो सीटों- छबड़ा और धौलपुर से चुनाव लड़ा और दोनों ही स्थानों से विजयी रहे। इस कारण भाजपा की झोली में केवल 84 विधायक रह गये तथा किसी भी दल को बहुमत प्राप्त नहीं हुआ। भाजपा ने जनता दल (अविभाजित) से सरकार में शामिल होने का अनुरोध किया जो कि स्वीकार कर लिया गया। इस प्रकार 4 मार्च 1990 को भैरोंसिंह शेखावत ने प्रदेश में दूसरी बार सरकार बनायी।

    शेखावत के साथ भाजपा के भंवरलाल शर्मा व ललित किशोर चतुर्वेदी ने और जनता दल के नत्थीसिंह ने कैबीनेट मंत्री पद की शपथ ली। 14 मार्च 1990 को भाजपा के कृष्ण कुमार गोयल, चतुर्भुज वर्मा, विजयसिंह झाला, रामकिशोर मीणा तथा पुष्पा जैन ने और जनता दल के दिग्विजय सिंह, चन्द्रभान एवं सुमित्रासिंह ने कैबीनेट मंत्री पद की शपथ ली। भाजपा के हरलाल सिंह खर्रा, रमजान खां, कालूलाल गुर्जर, मोहन मेघवाल, जीवराज कटारा, कुंदनलाल मिगलानी, चुन्नीलाल गरासिया तथा जनता दल के फतहसिंह ने राज्यमंत्री पद की शपथ ली। 16 मार्च 1990 को हरिशंकर भाभड़ा को विधान सभा का अध्यक्ष चुना गया। 5 जुलाई 1990 को जनता दल के यदुनाथसिंह सर्वसम्मति से उपाध्यक्ष चुने गये। बाद में 19 मार्च 1991 को यदुनाथसिंह ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया एवं भाजपा के हीरासिंह चौहान उपाध्यक्ष बने।

    30 मई 1990 को भाजपा के हरि कुमार औदिच्य तथा विद्या पाठक को एवं जनता दल के प्रो. केदार नाथ, सम्पतराम व मदन कौर को कैबीनेट मंत्री बनाया गया। उसी दिन भाजपा के जोगेश्वर गर्ग तथा शांतिलाल चपलोत को एवं जनता दल के रामेश्वर दयाल यादव, देवीसिंह भाटी, नफीस अहमदखां व गोपालसिंह खण्डेला को राज्यमंत्री बनाया गया। 23 अक्टूबर 1990 को भाजपा की अयोध्या रथ यात्रा के कारण जनता दल ने भाजपा सरकार से अलग होने का निर्णय लिया। 7 कैबीनेट मंत्रियों- नत्थीसिंह, सम्पतराम, प्रो. केदार, दिग्विजय सिंह, चन्द्रभान, सुमित्रा सिंह और मदनकौर तथा चार राज्य मंत्रियों- फतहसिंह, गोपालसिंह खण्डेला, रामेश्वर दयाल यादव तथा नफीस अहमद ने सरकार से त्यागपत्र दे दिये जिससे सरकार अल्पमत में आ गयी। 5 नवम्बर 1990 को जनता दल के 22 विधायकों ने नत्थीसिंह के नेतृत्व को अस्वीकार करते हुए भाजपा को समर्थन जारी रखने की घोषणा की।

    8 नवम्बर 1990 को शेखावत सरकार ने विधान सभा में विश्वास का मत अर्जित कर लिया। सरकार के पक्ष में 116 तथा विरोध में 80 मत आये। विधान सभा अध्यक्ष ने मतदान नहीं किया। 24 नवम्बर 1990 को मंत्रिमण्डल का विस्तार किया गया। जनता दल (दिग्विजय) के दिग्विजय सिंह, गंगाराम चौधरी, लालचंद डूडी, भंवरलाल शर्मा, सम्पतसिंह, जगमालसिंह यादव, रामनारायण विश्नोई को कैबीनेट मंत्री, नफीस अहमद खां, उम्मेदसिंह, जगतसिंह दायमा, मान्धातासिंह, बाबूलाला खाण्डा और रतनलाल जाट को राज्य मंत्री तथा मिश्रीलाल चौधरी एवं डूंगरराम पंवार को उपमंत्री बनाया गया। निर्दलीय मदन मोहन सिंहल को राज्य मंत्री एवं रामप्रताप कासनिया को उपमंत्री बनाया गया। 9 जनवरी 1992 को जनता दल (दिग्विजय) के सम्पतसिंह और जगमाल सिंह ने सरकार से त्यागपत्र दे दिया। 24 जनवरी 1992 को भाजपा के जोगेश्वर गर्ग और चुन्नीलाल गरासिया ने मुरली मनोहर जोशी की यात्रा में सम्मिलित होने के लिये मंत्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया। 17 फरवरी 1992 को भाजपा के कैलाश मेघवाल ने कैबीनेट मंत्री पद की शपथ ली। 1 दिसम्बर 1992 को भाजपा के कैबीनेट मंत्री ललित किशोर चतुर्वेदी ने अयोध्या में कारसेवा में भाग लेने के लिये मंत्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया।

    तीन जिलों का जन्म

    अपनी दूसरी सरकार के कार्यकाल में भैरोंसिंह शेखावत ने दौसा, राजसमंद तथा बारां जिलों का गठन किया। इससे राज्य में जिलों की संख्या 27 से बढ़कर 30 हो गई। अपने इस कार्यकाल में भैरोंसिंह शेखावत केन्द्र सरकार की आठवीं पंचवर्षीय योजना में राजस्थान को 11500 करोड़ रुपये स्वीकृत करवाने में सफल रहे। दूसरी सरकार भी राष्ट्रपति शासन की भेंट चढ़ी 6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में हुई गतिविधियों को लेकर केन्द्र सरकार ने शेखावत सरकार को अपदस्थ कर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया तथा विधानसभा भंग कर दी गयी। भैरोंसिंह शेखावत की तीसरी सरकार राज्य में दसवीं विधान सभा के लिये 11 नवम्बर 1993 को मतदान हुआ। 27 नवम्बर को मतों की गिनती की गयी एवं चुनाव परिणाम घोषित किये गये। भाजपा को 95 स्थान, कांग्रेस (इ) को 76 स्थान, माकपा को 1 स्थान, जनता दल को 6 स्थान एवं निर्दलीय एवं अन्य को 21 स्थान प्राप्त हुए। भाजपा ने बाड़मेर में गंगाराम चौधरी को, चौहटन में भगवान दास डोसी को एवं डीग क्षेत्र में कुंवर अरुणसिंह को समर्थन प्रदान किया। इन तीनों को ही चुनावों में विजय प्राप्त हुई।

    भैरोंसिंह शेखावत ने दसवीं विधानसभा का चुनाव पाली जिले की बाली सीट से लड़ा थाजिसमें वे विजयी रहे। इस प्रकार 11 दिसम्बर 1993 को भैरोंसिंह शेखावत ने निर्दलियों के सहयोग से राज्य में तीसरी बार अपनी सरकार का गठन किया। जब उन्होंने अपनी तीसरी सरकार का गठन किया तो राष्ट्रपति शासन पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने इसे 'सरकारी अवकाश' बताया।

    उनके साथ भाजपा के भंवरलाल शर्मा, ललित किशोर चतुर्वेदी, देवीसिंह भाटी, गुलाबचंद कटारिया, एवं निर्दलीय सुजानसिंह यादव एवं गंगाराम चौधरी को कैबीनेट मंत्री बनाया गया। भाजपा के नाथूसिंह गुर्जर, राजेन्द्रसिंह राठौड़, जसवंतसिंह विश्नोई, श्रीकिशन सोनगरा, नन्दलाल मीणा, रामप्रताप कासनिया, अनंग कुमार जैन, मदन दिलावर, अचलाराम मेघवाल, सांवरलाल जाट, निर्दलीय रोहिताश्व कुमार, ज्ञानसिंह चौधरी, नरेन्द्र कंवर तथा शशि दत्ता को राज्य मंत्री बनाया गया। निर्दलीय गुरजंट सिंह तथा मंगलाराम कोली को उपमंत्री बनाया गया।

    22 दिसम्बर 1993 को भाजपा के अर्जुन सिंह देवड़ा को राज्यमंत्री पद की शपथ दिलवायी गयी। 20 फरवरी 1994 को भाजपा के कैलाश मेघवाल एवं रघुवीरसिंह कौशल को कैबीनेट मंत्री के पद की शपथ दिलवायी गयी। जनता दल के 6 सदस्यों में से तीन सदस्यों ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली। 6 अक्टूबर 1994 को विधानसभा अध्यक्ष हरिशंकर भाभड़ा को कैबीनेट मंत्री, नसरूखां, बृजराजसिंह एवं पूंजालाल गरासिया को राज्यमंत्री बनाया गया। 27 फरवरी 1995 को बृजराजसिंह का निधन हो गया। मुख्यमंत्री से मतभेदों के कारण 17 जनवरी 1997 को शशि दत्ता ने तथा 20 जनवरी 1997 को पूंजालाल गरासिया ने मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। 7 दिसम्बर 1997 को एक वरिष्ठ अधिकारी से अशोभनीय व्यवहार करने पर देवीसिंह भाटी को भी मुख्यमंत्री के निर्देश पर त्यागपत्र देना पड़ा। 21 मार्च 1998 को प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष चुन लिये जाने के बाद रघुवीरसिंह कौशल ने भी त्यागपत्र दे दिया। 1 जून 1998 को ज्ञानसिंह चौधरी ने निजी कारणों से त्यागपत्र दे दिया।

    2 जुलाई 1998 को भाजपा के घनश्याम तिवाड़ी को कैबीनेट मंत्री के रूप में तथा राजपाल सिंह शेखावत, कालीचरण सर्राफ, राजेन्द्र गहलोत, कन्हैयालाल मीणा, भंवरसिंह डांगावास, बाबूलाल वर्मा, सुन्दरलाल, अमराराम चौधरी, दलीचंद, शिवदानसिंह, महावीर भगोरा तथा उजला अरोड़ा को राज्यमंत्री नियुक्त किया गया। 8 जुलाई 1998 को विजयेन्द्रपाल सिंह को कैबीनेट मंत्री तथा चुन्नीलाल धाकड़ को राज्यमंत्री बनाया गया। दो उपमंत्रियों गुरजंट सिंह और मंगलाराम कोली को पदोन्नति देकर राज्यमंत्री बनाया गया।

    नये उद्योगों की स्थापना पर जोर

    भैरोंसिंह शेखावत ने राजस्थान में नये उद्योगों की स्थापना पर जोर दिया और एक लाख तक की जनसंख्या वाले नगरों में नया उद्योग लगाने वालों को राजकीय सहायता देने का निर्णय किया। साक्षरता, वृक्षारोपण, परिवार नियोजन, स्त्री शिक्षा, आदि उनकी प्राथमिकता के मुख्य कार्यक्रम थे। जब 1993 में वे तीसरी बार मुख्यमंत्री बने तो परिवार नियोजन उके लिये पंचायती राज कानून में संशोधन करके एक प्रावधान किया गया कि दो से अधिक संतान वाला व्यक्ति पंच-सरपंच का चुना नहीं लड़ सकता। इसी कार्यकाल में शेखावत ने पंचायती राज तथा स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं में अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ी जातियों तथा महिलाओं के लिये आरक्षण का प्रावधान करके भारत के लोकतंत्रीय इतिहास में नई मिसाल स्थापित की। यह आरक्षण रोटेशन प्रणाली के आधार पर लागू किया गया।

    केन्द्र सरकार हमें रेल दे दे

    राजस्थान के विपुल खनिज भण्डार की शक्ति से भैरोंसिंह भलीभांति परिचित थे। इसलिये वे प्रायः कहते थे कि केन्द्र सरकार हमें रेल दे दे, हमारा राज्य देश भर की सीमेण्ट तथा मार्बल की मांग पूरी करने में सक्षम है।

    चुंगी की समाप्ति

    अपनी तीसरी सरकार के कार्यकाल में भैरोंसिंह शेखावत ने नगर पालिका नाकों पर चुंगी वसूलने में हो रहे भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिये चुंगी समाप्त कर दी।

    नौवीं पंचवर्षीय योजना के आकार में ऐतिहासिक वृद्धि

    राजस्थान को स्वीकृत नौवीं पंचवर्षीय योजना (1997 से 2000) के आकार में, आठवीं पंचवर्षीय योजना की तुलना में लगभग ढाई गुना की वृद्धि हुई। यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी। जहां आठवीं पंचवर्षीय योजना का आकर 11,500 करोड़ रुपये था, वहीं नौंवी पंचवर्षीय योजना का आकार 27,400 करोड़ रुपये हो गया।

    दो जिलों का निर्माण

    इस कार्यकाल में भैरोंसिंह शेखावत सरकार ने राजस्थान में दो नये जिलों का गठन किया। श्रीगंगानगर जिले को विभाजित करके श्रीगंगानगर एवं हनुमानगढ़ जिले बनाये गये तथा सवाईमाधोपुर जिले को विभाजित करके सवाईमाधोपुर एवं करौली जिले बनाये गये। इस प्रकार राज्य में जिलों की संख्या 32 हो गई।

    साक्षरता अभियान को अभूतपूर्व सफलता

    भैरोंसिंह शेखावत की इस तीसरी सरकार ने राज्य में सघन साक्षरता अभियान चलाया जिसे अभूतपूर्व सफलता प्राप्त हुई। वर्ष 1991 की जनगणना में राज्य की साक्षरता 38 प्रतिशत पाई गई थी जो इस अभियान के कारण वर्ष 2001 में बढ़कर 61 प्रतिशत हो गई। इस प्रकार निरक्षर राजस्थान साक्षर राजस्थान में बदल गया।

    तीसरी बार नेता प्रतिपक्ष

    भैरोंसिंह शेखावत की तीसरी सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया किंतु इसके बाद 1998 में ग्यारहवीं विधानसभा के लिये हुए चुनावों में भाजपा परास्त हो गई। उसे केवल 33 सीटें मिलीं जबकि कांग्रेस 150 सीटें जीत कर प्रबल बहुमत के साथ सत्ता में पहुंची। इस विधान सभा के लिये भैरोंसिंह शेखावत ने बाली सीट से चुनाव लड़ा था जिसमें वे विजयी रहे तथा तीसरी बार नेता प्रतिपक्ष बने।

    उपराष्ट्रपति पद पर विजयी

    वर्ष 2002 में भैरोंसिंह शेखावत ने भारत के उपराष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ा। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी श्री सुशील कुमार शिंदे को सीधी टक्कर में परास्त किया। 19 अगस्त 2002 को भैरोंसिंह शेखावत ने भारत के 11वें उपराष्ट्रपति बने।

    जीवन भर पढ़ते रहे

    भैरोंसिंह शेखावत हाई स्कूल तक पढ़े हुए थे किंतु सीखने, जानने और पढ़ने की ललक उनमें जीवन भर बनी रही। वे अपने सहायकों से विविधि विषयों पर नोट्स तैयार करवाते और उनका अध्ययन करके ही किसी विषय पर अपनी धारणा बनाते थे।

    तीन बार डॉक्टर ऑफ लिट्रेचर

    आन्ध्र विश्वविद्यालय, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय तथा महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ वाराणसी ने भैरोंसिंह शेखावत को डॉक्टर ऑफ लिट्रेचर की उपाधियाँ दीं। एशियाटिक सोसाइटी मुम्बई ने उन्हें ऑनरेरी फैलोशिप दी। येरेवान स्टेट मेडिकल यूनिवर्सिटी आर्मेनिया ने उन्हें डॉक्टर ऑफ मेडिसिन की उपाधि एवं स्वर्ण पदक प्रदान किया।

    राष्ट्रपति का चुनाव हारे

    जुलाई 2007 में राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का कार्यकाल पूरा हुआ। भैरोंसिंह शेखावत ने राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने का निर्णय लिया। वे स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में खड़े हुए। एनडीए के समस्त घटक दलों ने उनका समर्थन किया। उनके सामने राजस्थान की राज्यपाल प्रतिभा देवीसिंह पाटील खड़ी हुईं। उन्हें यूपीए के घटक दलों एवं वामपंथी दलों ने समर्थन दिया। इस चुनाव में प्रतिभा देवीसिंह पाटील विजयी रहीं। 21 जुलाई 2007 को भैरोंसिंह शेखावत ने उपराष्ट्रपति पद से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद वे सदैव के लिये सक्रिय राजनीति से हट गये। इस समय तक उनकी आयु 84 वर्ष हो गई थी।

    कैंसर ने झकझोरा

    84 वर्ष की आयु में भैरोंसिंह शेखावत को कैंसर का दंश झेलना पड़ा। भारत के विभिन्न चिकित्सालयों में उनका उपचार करवाया गया किंतु वे पूर्णतः स्वस्थ नहीं हो सके।

    जाति एवं समाज से निर्भय रहे

    4 सितम्बर 1987 को रूपकंवर सती हुई। उन दिनों राज्य के मुख्यमंत्री श्री हरिदेव जोशी थे। भैरोंसिंह उन दिनों इंगलैण्ड की यात्रा पर थे। उन्होंने लंदन से वक्तव्य जारी करके सती काण्ड के दाषियों को दण्डित करने की मांग की। राजपूत समाज का बड़ा हिस्सा ऐसे किसी कदम के विरुद्ध पहले ही प्रतिबद्धता जता चुका था।

    भैरोंसिंह निर्भय होकर, अपने सिद्धांतों पर चले। वे जाति एवं समाज की नाराजगी से कभी डरे नहीं। जब कांग्रेस सरकार सती प्रथा के विरोध में कानून लाई तो भैरोंसिंह उसके समर्थन में खड़े हुए। शेखावत जब लंदन से लौटे तो उन्हें गद्दार कहा गया किंतु वे निर्भीक होक जनसभाओं में गये और अपने तर्को से सबको निरुत्तर कर दिया।

    रामनिवास मिर्धा से मिलता था चेहरा

    भैरोंसिंह शेखावत का चेहरा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रामनिवास मिर्धा से मिलता था। कोई भी आदमी रामनिवास मिर्धा को देखकर उन्हें शेखावत समझने की भूल कर सकता था और कोई भी आदमी शेखावत को देखकर रामनिवास समझने की भूल कर सकता था। रामनिवास मिर्धा की पुत्री के विवाह में भैरोंसिंह साफा पहनकर पहुंचे। दोनों के साफे भी लगभग एक जैसे थे। इस पर रामनिवास मिर्धा ने भैरोंसिंह शेखावत से कहा कि आप तो मेहमानों का स्वागत करो, मैं मण्डप में जा रहा हूँ। इस पर शेखावत, मिर्धा के परिजनों के साथ उनके आगे खड़े हो गये। बहुत से लोग उन्हें मिर्धा समझकर लिफाफे पकड़ा गये। जब मिर्धा मण्डप से बाहर आये तो वे यह देखकर हैरान हो गये कि अतिथि किस तरह शेखावत को मिर्धा समझकर भ्रमित हो रहे हैं। शेखावत ने हँसकर लोगों को अपना परिचय देते हुए कहा कि मैं रामनिवास मिर्धा हूँ और ये भैरोंसिंह शेखावत हैं।

    जूते खाओ, पर पुष्पचक्र चढ़ाओ

    1996 में मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए भैरोंसिंह ने अपने दो मंत्रियों राजेन्द्रसिंह राठौड़ तथा रोहिताश्व शर्मा को प्रबंधन की जानकारी प्राप्त करने के लिये हैदराबाद भेजा। उन्हीं दिनों आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री एन. टी. रामाराव का निधन हो गया। इस पर भैरोंसिंह ने दोनों मंत्रियों को निर्देश दिये कि वे सरकार की ओर से रामाराव की पार्थिव देह पर पुष्पचक्र अर्पित करके आयें। जब राजस्थान सरकार के दोनों मंत्री पुष्पचक्र अर्पित करने गये तो लोगों ने उन पर चप्पलें फैंकनी आरंभ कर दीं तथा वापस जाओ-वापस जाओ के नारे लगाने लगे। इससे राजस्थान सरकार के मंत्री रामाराव की पार्थिव देह तक नहीं पहुंच सके। उन्होंने भैरोंसिंह को यह बात बताई तो भैरोंसिंह ने उन्हें निर्देश दिये कि चाहे कितने ही जूते चप्पल खाने पड़ें, पुष्पचक्र अर्पित करके ही आना। दोनों मंत्री पुनः उस स्थान पर गये जहां रामराव की पार्थिव देह दर्शनार्थियों के लिये रखी गई थी। इस बार वे अपने काम में सफल रहे। बाद में उन्हें ज्ञात हुआ कि लोग राजेन्द्रसिंह राठौड़ को एन. टी. रामाराव को चंद्रबाबू नायडू समझ रहे थे जिन्होंने कुछ दिन पहले ही अपने श्वसुर की सरकार का तख्ता पलट किया था।

    गुटखा खाने वाले बाबोसा

    अपने गांव खाचरियावास में भैरोंसिंह शेखावत को बाबोसा के नाम से जाना जाता था। वे गुटखा (पान मसाला) खाने के शौकीन थे, राजस्थान का शायद ही ऐसा कोई गांव या नगर हो जिसमें उन्होंने अपने ऐसे मित्र न बना रखे हों जिनसे वे गुटखा मांगकर न खाते हों। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नवल किशोर शर्मा भी पान मसाला खाते थे। वे दोनों प्रायः परस्पर परिहास किया करते थे कि पान मसाला बनाने वाले हमें ही अपना ब्राण्ड एम्बेसेडर क्यों नहीं रख लेते।

    दाम्पत्य जीवन से एक पुत्री

    भैरोंसिंह शेखावत और सूरजकंवर को अपने दाम्पत्य जीवन से एक पुत्री प्राप्त हुई जिसका नाम रतनकंवर रखा गया। रतनकंवर का विवाह नरपतसिंह राजवी से हुआ जो वसुंधरा राजे मंत्रिमण्डल में मंत्री रहे। रतनकंवर के दो पुत्र विक्रमादित्यसिंह तथा अभिमन्युसिंह हुए।

    भयभीत सांसद ने पांव पकड़े

    भैरोंसिंह शेखावत जब राज्यसभा के सभापति थे, उन दिनों एक सांसद लगातार तीन बार प्रश्नकाल के दौरान अनुपस्थित रहा। शेखावत राजस्थान विधानसभा के अनुभवों से समृद्ध थे। उन्होंने सांसद की पृष्ठभूमि की जांच करवाई। सांसद को भी जानकारी हो गई कि भैरोंसिंह शेखावत ने उनकी पृष्ठभूमि की जांच करवाई है। जब भैरोंसिंह शेखावत ने उस सांसद को अपने चैम्बर में बुलाया तो उस सांसद ने उनके पांव पकड़कर माफी मांग ली। भैरोंसिंह शेखावत ने उन्हें चेतावनी देकर छोड़ दिया। इसके बाद ऐसे सदस्य या तो प्रश्न पूछते ही नहीं थे, और यदि पूछते थे तो सदन से अनुपस्थित नहीं रहते थे।

    मैं यहाँ क्या लेने आया हूँ

    भैरोंसिंह शेखावत को जातिवाद से बहुत चिढ़ थी। वे व्यक्तिवाद और जातिवाद के स्थान पर समष्टिवाद में विश्वास रखते थे। वर्ष 2007 में वे चक्रेश्वरी देवी के नागाणा मंदिर में दर्शनों के लिये आये। इस अवसर पर आयोजित सार्वजनिक सभा के मंच से चक्रेश्वरी देवी को बार-बार राठौड़ों की देवी कहकर सम्बोधित किया गया। इससे वे खीझ पड़े और अपने भाषण में अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए बोले- देवी देवता किसी व्यक्ति या जाति के नहीं होते, वे तो पूरे समाज के होते हैं। यदि यह राठौड़ों की देवी है और मैं शेखावत हूँ, तो मैं यहाँ क्या लेने आया हूँ!

    अस्पताल पहुंचे अशोक गहलोत

    भैरोंसिंह शेखावत एक वर्ष से बीमार चल रहे थे। 13 मई 2010 को उन्हें 15 मई 2010 की प्रातः मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत को ज्ञात हुआ कि भैरोंसिंह शेखावत की हालत चिंता जनक है, उसी समय प्रातः 9 बजे उन्होंने सवाई मानसिंह अस्पताल के आईसीयू में पहुंचकर डॉक्टरों से उनके स्वास्थ्य एवं चिकित्सा के बारे में जानकारी ली।

    वैशाख की दूज को ज्योति विलीन हुई

    वैशाख की तृतीया को राजस्थान में आखातीज कहा जाता है जो समस्त शुभकार्यों के लिये अबूझ सावे के रूप में विख्यात है। इसी आखातीज से एक दिन पहले, वैशाख माह की द्वितीया अर्थात् 15 मई 2010 को प्रातः 11 बजकर 10 मिनट पर हृदयाघात से उनका निधन हो गया। कार्तिक माह की त्रयोदशी को जो ज्योति प्रकट हुई वह वैशाख माह की द्वितीया को विलीन हो गई।

    सारे काम छोड़कर दौड़े अशोक गहलोत

    मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, भैरोंसिंह के हालचाल पूछकर अभी लौटे ही थे कि उन्हें शेखावत के निधन का सामचार मिला। वे हाथ के सारे काम छोड़कर उसी समय फिर सवाई मानसिंह अस्पताल पहुंचे। उन्होंने शेखावत के परिजनों को ढाढ़स बंधवाया तथा उनके निधन पर राजस्थान में तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया।

    शवयात्रा में सम्मिलित हुआ पूरा देश

    उनके निवास पर पहुंचकर श्रद्धांजलि देने वालों में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे अब्दुल कलाम, पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे, गुजरात की राज्यपाल डॉ. कमला भी शामिल थीं। उनकी शवयात्रा में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, राजस्थान के राज्यपाल शिवराज पाटिल, उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बी- एल- जोशी, हरियाणा के राज्यपाल जगन्नाथ पहाड़िया, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाशसिंह बादल, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह] उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल, पूर्व उपप्रधान मंत्री लालकृष्ण आडवाणी, पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे, केन्द्रीय मंत्री डॉ- सी- पी- जोशी एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री जसवंतसिंह, भाजपा के अध्यक्ष नितिन गडकरी सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति सम्मिलित हुए।

    शेखावत स्मृति संस्थान की घोषणा

    मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत ने भैरोंसिंह शेखावत की स्मृतियों को बनाये रखने के लिये जयपुर में शेखावत स्मृति संस्थान को राज्य सरकार की ओर से भूमि देने की घोषणा की। सीकर रोड पर विद्याधर नगर स्टेडियम के पास इस संस्थान को भूमि आवंटित की गई।

    उनके जैसा व्यक्ति मुश्किल से दिखाई पड़ता है

    शेखावत के निधन पर यूपीए अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने भैरोंसिंह की पत्नी को लिखे एक पत्र में इन शब्दों में शोक प्रकट किया- मुझे भैरोंसिंह शेखावत के देहावसान का बहुत अफसोस हुआ। सार्वजनिक जीवन में उनके जैसा व्यक्ति मुश्किल से दिखाई पड़ता है। शेखावत साहब के सार्वजनिक व्यवहार, उनकी सूझबूझ, और राजनीतिक प्रतिभा का महत्व सभी लोग स्वीकार करते हैं। सभी पक्षों में संवाद का जैसा गुण उनमें था, वह प्रायः विरल होता है। आपका उनसे जीवन भर का साथ रहा है। उनके गुणों के बारे में आपसे ज्यादा कौन जान सकता है। आपके अभाव और पीड़ा की कल्पना मैं कर सकती हूँ। इसलिये ईश्वर से मेरी प्रार्थना है कि वह आपको यह दुःख सहने की शक्ति दे और उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे।

    उन्होंने लोकतांत्रिक मर्यादाओं के उच्च प्रतिमान स्थापित किये

    शेखावत के निधन पर मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत ने कहा- शेखावत उन बिरले नेताओं में से थे जिन्होंने राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। मुख्यमंत्री, प्रतिपक्ष के नेता और उपराष्ट्रपति पद पर रहते हुए उन्होंने अपनी विद्वता, वाक्पटुता और मिलनसार व्यवहार की अमिट छाप छोड़ी। उन्होंने राजनीति में रहकर लोकतांत्रिक मर्यादाओं के उच्च प्रतिमान स्थापित किये। उन्होंने राजनीतिक विचारधारा से ऊपर उठकर व्यक्तिगत सम्पर्कों को सदा महत्व दिया।

    पूरा देश उन्हें सदियों तक याद करता रहेगा

    पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने उनके निधन पर कहा- शेखावत का निधन पूरे देश के लिये अपूर्ण क्षति है। वे विराट व्यक्तित्व के धनी और जन-जन के नेता थे। उनसे राजनीति में बहुत कुछ सीखा है। राजनीति के एक युग का अंत हो गया। पूरा देश उन्हें सदियों तक याद करता रहेगा।

    हम सौभाग्यशाली हैं कि हमने हाड़-मांस का ऐसा मानव देखा

    उनके निधन के बाद सुप्रसिद्ध पत्रकार चंदन मित्रा ने 17 मई 2010 को राजस्थान पत्रिका में एक लेख लिखा जिसकी अंतिम पंक्तियों में लिखा था- उन्होंने पूरी शान से जीवन बिताया। भावी पीढ़ियां उन्हें छपे हुए शब्दों व टीवी फुटेज से जानेंगी। हम सौभाग्यशाली हैं कि हमने हाड़-मांस का ऐसा मानव देखा।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-31

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-31

    पर्यावरण के पहरेदार ओरण और गोचर (2)


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    ओरणों में पाई जाने वाली बहु-उपयोगी वनस्पतियाँ


    राजस्थान के ओरणों में पेड़-पौघों की 680 प्रजातियां चिह्नित की गई हैं। इनमें से अधिकांश वनस्पतियां मनुष्य तथा पशुओं के लिये उपयोगी हैं। इनमें से कुछ प्रमुख वनस्पतियों का विवरण इस प्रकार से है-

    अंग्रेजी बबूल : अंग्रेजी बबूल अर्थात् अरेबिया अकेशिया की झाड़ी वर्ष भर हरी रहती है। विगत एक सौ वर्ष में इस झाड़ी का तेजी से प्रसार हुआ है। यह झाड़ी गांवों में जलाऊ लकड़ी का सबसे बड़ा स्रोत है। लोग इन झाड़ियों को जलाकर कच्चा कोयला तैयार करते हैं। इसकी फलियां पशु चारे के रूप में काम आती हैं। जोधपुर स्थित आफरी ने इसके बीजों से बिस्किट एवं कॉफी पाउडर तैयार किया है।

    अरण्ड : इसके पत्ते कंगूरिया, मोटे आकार के कपास के पत्तों जैसे होते हैं। बीजों का रंग सफेद, गुलाबी, कत्थई होता है जिनमें तेल और गूदा होता है।

    अरणा या अरणी : इसके पत्ते गोल, थोड़े नुकीले तथा कोमल होते हैं। फूल सफेद, सुगन्धित होते हैं जिन पर मक्खी एवं कीट मण्डराते हैं। इसकी बालियां नीचे की ओर झुकी हुई होती हैं। अरणी की लकड़ियां, झौंपड़े बनाने में काम आती हैं।

    आक : यह लगभग 5-6 फीट ऊँचा तथा पत्तों से लदा हुआ होता है। पत्ते मोटे तथा दूधवाले होते हैं। जामुनी रंग के फूल पाये जाते हैं। आमी के आकार के फल लगते हैं जिनसे रुई निकलती है। इसे अंकाला कहा जाता है। अंकाला से रस्सियां बनाकर उनसे पीढ़े तथा चारपाइयां बुनी जाती हैं। इससे तकिये और गद्दे में भी भरे जाते हैं।

    इन्द्रायण (तूम्बा) : इससे पशुओं में अजीर्ण तथा आफरे की दवा बनती है। इसके फूल कपूरी एवं फल मौसमी की तरह होते हैं। जब ऊँट चरना बंद कर देता है तो उसे नमक के साथ तूम्बा उबाल कर देते हैं।

    ऊँटगण : इसे ऊँट चाव से खाता है। यह बल एवं वीर्य वर्धक है। रोगी इनके गोटों को दूध में डालकर पीता है। गोटे फूलकर दूध को गाढ़ा कर देते हैं।

    कटेरी (रींगणी) : इसकी बेल कांटों वाली होती है जिस पर पीले फल लगते हैं। गुलाबी फूलों पर तितलियां मण्डराती हैं।

    कुरण्ड : इसे चामघस भी कहते हैं। यह बलवर्धक होती है। इसे पीस कर खाते हैं। इसके बारीक काले बीजों को भी खाते हैं।

    खेजड़ी : खेजड़ी की पत्तियां पशु चारे के रूप में, लकड़ी ईंधन के रूप में, फलियां सब्जी के रूप में तथा सूखी फलियां फल के रूप में काम आती हैं। इसकी उपस्थिति से खेत में नाइट्रोजन की मात्रा में वृद्धि होती है। इसकी जड़ों में अजोटोबेक्टर नामक बैक्टीरिया रहता है जो वायुमण्डल की नाइट्रोजन को मृदा में स्थिर करता है।

    गोखरू : इसे भाँखड़ा उकाली भी कहते हैं। यह काढ़ा बनाने के काम आता है। इसे ऊँट चाव से खाते हैं।

    चिड़धणियो : ओरी माता में उकाली देने के काम आता है।

    जवासो या धमासो : यह बड़े कांटों एवं छोटे पत्तों की झाड़ी होती है।

    तालमखाणा : यह जलीय पौधा है।

    तुलसी : इसके पत्ते कोमल, सुगन्धित, चरचरे, कड़वे तथा गुणकारी होते हैं। इसके पत्तों की उकाली लेने से बुखार, मलेरिया, खांसी, जुकाम आदि में लाभ होता है। विष्णु पत्नी मानकर इसे हर घर के आंगन में लगाया जाता है तथा संध्या काल में इसके नीचे दीप जलाया जाता है।

    धतूरा : इसके पत्ते पान जैसे, फूल सफेद घण्टी जैसे, फल गोल, कंटीले तथा अधिक बीज वाले होते हैं। यह मादक तथा विषैली वनस्पति है।

    नागरमोथा : यह सुगन्धित पदार्थों में मिलाने के काम आता है। कपूर, कचरी तथा चंदन के साथ हवन में काम लिया जाता है।

    नीम : इसकी कोंपलें रक्तशोधक होने के कारण कच्ची खाई जाती हैं। इसकी छाल को पानी में पीसकर घावों पर लगाया जाता है। इसका तेल पशुओं के घावों पर लगाया जाता है। इसकी दांतुन भी स्वास्थ्य वर्धक मानी जाती हैं। बवासीर की बीमारी में सूखी हुई निबौलियों का पाउडर शहद में मिलाकर खाते हैं।

    पींप : यह वर्षाकाल में फोग के साथ पैदा होता है। इसकी सब्जी बनती है। फूंबी : इसे खूंबी तथा मशरूम भी कहते हैं जो हृदय रोग में तुरंत प्रभाव डालने वाली दवा है। इसकी सब्जी भी बनती हं। इसकी कुछ प्रजातियां जहरीली होती हैं।

    फोग : यह भीषण गर्मी और लू में बालू के धोरों पर उगता है। इसकी जड़ें धरती में फैलकर गुच्छा बनाती हैं तथा पत्तियां तुरंत झड़ जाती हैं। उसके बाद तना पत्तियों की तरह कार्य करता है। गणगौर पूजन में सुहागनें फोग के फूल और डालियों से गवर और ईसरजी की पूजा करती हैं। किसान हल जोतने के समय इसकी डालियों और फूलों से सुगन मनाते हैं। इसकी ऊँचाई एक-दो मीटर तक होती है। रेगिस्तानी पशु इसे चाव से खाते हैं। यात्री इसे चूसकर गला तर करते हैं। इसकी शाखायें मजबूत होती हैं, उनसे घरों में बाड़ा बनाते हैं। इसकी लकड़ी के कोयले लुहार एवं सुनार घड़ाई के काम में लेते हैं क्योंकि उनमें अधिक ताप उत्पन्न होता है। इसकी लकड़ी से ऊँट की नाक बींधने की कील बनती है। इसकी पत्तियों को सुखाकर फोगलो बनाया जाता है जिससे रायता बनता है। यह रायता गर्मी में अमृत्तुल्य माना गया है।

    बूर : यह इलायची जैसी तेज सुगंध वाला होता है। इससे दवा बनती है। पेट की बीमारी दूर होती है। खेतों में पशु चरते हैं।

    भम्फीड़ : यह बसंत के साथ पेड़ों की जड़ पर कीलों के समान निकलते हैं। बच्चों को ओरी निकलने पर सूखी फली उबाल कर पिलाते हैं।

    भाँगरो : यह चटपटा और रूखा होता है। यह पीलिया तथा नेत्ररोगों के उपचार में काम आता है।

    मरवा : इसके पत्ते और पुष्प तुलसी के पत्तों की तरह सुगन्धित होते हैं। इससे बिच्छू का जहर उतारने तथा वात, पित्त, कफ की औषधि बनती है।

    रतनजोत : इसे साटा भी कहते हैं। यह आंख की दवा में काम आता है। इसके सूखे पत्तों का चूरा सब्जी का रंग लाल करने में काम आता है जिसे खाने से बहुत नुक्सान होता है। इसके बीजों के तेल से बायोडीजल बनता है।

    रोहिड़ा : इसके पुष्प लाल एवं पीले होते हैं जो गंधविहीन होते हैं।

    लोलरू : इस दर्द निवारक औषधि को दर्द वाले स्थान पर घोटकर लगाते हैं।

    शंखपुष्पी : यह दस्तावर, मेधा एवं बल बढ़ाने वाली, मन के रोगों को दूर करने वाली तथा कड़वी होती है। इसके पत्तों में दूध निकलता है। इसे दूधेली भी कहते हैं।

    शिवलिंगी : इसे ऊँट खाते हैं। इस पर शक्ति वर्धक फल लगते हैं।

    सुणिया या चुग : यह कड़ी शाखाओं वाली झाड़ी है। इसके रेशे रस्सी बंटने के काम आते हैं। इसकी लकड़ी ऊँटों की नकेल बनाने के लिये अच्छी होती है।


    रेगिस्तानी घासें

    रेगिस्तान में वर्षा काल में भुट्ट, मुट्ट, भूरट, लाँपड़ी, वोभरियो, बेकरियो, घण्ठील, सेवण, बूर, डचाभ, मण्डूसी आदि घासें उत्पन्न होती हैं। धामण, झींटियो घास तथा बरू के बूटे भी कई स्थानों पर पाये जाते हैं। शरद ऋतु में ल्हारड़ो, लहाठियो तथा हिरण चब्बो आदि घासें होती हैं। दूब की सैंकड़ों किस्में मिलती हैं। इसे लॉन में प्रयुक्त किया जाता है। दूब के रस को सूंघने से नक्सीर रुकती है।

    सेवण : यह अत्यधिक प्राटीन युक्त घास है जो रेतीले टीलों पर उगती है। जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, बीकानेर तथा नागौर आदि जिलों में इसके चारागाह विकसित किये गये हैं। इसका औसत उत्पादन लगभग 36 क्विंटल प्रति हैक्टैयर होता है।

    धामण : यह भी रेगिस्तानी घास है। दुधारू पशुओं की मुक्त चराई के लिये इसके चारागाह विकसित किये गये हैं।

    करड़ : यह पशुओं के लिये उत्तम हरी घास है। इसका औसत उत्पादन लगभग 47 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होता है।

    अंजन : गायों एवं घोड़ों के लिये सर्वाधिक उपयुक्त यह घास हर मौसम में उगती है। इसका औसत उत्पादन लगभग 76 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है।


    रेगिस्तानी फल

    काकड़िया : छोटे काचर जब पूर्ण विकसित होकर काकड़िये बन जाते हैं। यह पतले छिलके वाला रेगिस्तानी फल है तथा सब्जी बनाने के काम आता है।

    गूंदिये : गूंदी वृक्ष के सरबती फल होते हैं। यह रसदार और चिपचिपे होते हैं। होली के आसपास पकते हैं। कच्चे फल हरे रंग के और पके फल नारंगीपन लिये हुए होते हैं।

    जालोटिया : जाल के फल पीलू अथवा जालोटिया कहलाते हैं। कच्चे फल हरे रंग के, रसदार और मीठे होते तथा पके फल केसरिया रंग के होते हैं।

    ढीलू : पके हुए कैर ढीलू कहलाते हैं। ये पाचक और मीठे होते हैं। कच्चे कैर हरे रंग के होते हैं जिनसे सब्जी एवं अचार बनता है। पके हुए फल गुलाबी रंग के होते हैं जिन्हें निर्धन ग्रामीण बच्चे खाते हैं।

    निम्बोली : नीम के पके फल पीले रंग के, रसदार और सुगंधित होते हैं। इनकी गोटों से काजल बनती है। इसकी मंजरी दही-रायते में छोंक के काम आती है।

    फोगला : फोग के फोगले (मंजरी) से ढोकले बनते हैं जो घी में चूरने पर मीठे लगते हैं। फोगले के रायते को विशेष प्रकार का खट्टा खाद्य माना जाता है। चैत्र माह में फोगों पर फोगला लगता है। तब उनपर भंवरे ओर मक्ख्यिां आते हैं।

    बेर : कार्तिक माह में बेर की झाड़ियों पर बेर लगते हैं। पकने पर ये गहरे लाल रंग के हो जाते हैं। इनका स्वाद खट्टा-मीठा होता है। बेर को सुखाकर उसके छिलके का पाउडर बनाया जाता है तथा उसमें नमक मिलाकर खाया जाता है। बेर की जड़ों का रांग जड़ी मतीरा मीठा होता है और उसकी शराब बनाई जाती है।

    मतीरा : इसका बाहरी रंग हरा और भीतरी रंग लाल होता है। यह गूदेदार एवं रसदार फल है जो तरबूजे की तरह दिखाई देता है। इसके बीज छीलकर मेवा की तरह खाये जाते हैं। इसके बीजों से अखाद्य तेल निकाला जाता है तथा इसके बीजों को भूनकर एवं नमक लगाकर खाया जाता है। इसके छिलकों की सब्जी बनती है। इसमें मिश्री भरकर रात की ओस में रख दिया जाता है तथा प्रातः काल में भूखे पेट खाया जाता है जिससे पेट की बीमारियां ठीक होती हैं। दीपावली पूजन में मतीरे का बड़ा महत्व माना जाता है।

    बाकोली : इससे धागे, चटाइयां तथा टोकरियों बनाई जाती हैं। खाट बुनने तथा झौंपड़ी की छान एवं बाड़े की दीवारों को बनाने के लिये रस्सियों का निर्माण में भी इस वनस्पति का उपयोग किया जाता है।

    खींप : इससे भी धागे, चटाइयां तथा टोकरियों बनाई जाती हैं। खाट बुनने तथा झौंपड़ी की छान एवं बाड़े की दीवारों को बनाने के लिये रस्सियों का निर्माण में भी इस वनस्पति का उपयोग किया जाता है।

    कूमट : इससे गोंद प्राप्त किया जाता है। इसकी फलियों के बीज सब्जी बनाने के काम आते हैं। इसकी पत्तियां पशुओं के चारे के रूप में तथा कांटे, जलाउ ईंधन एवं बाड़ के रूप में प्रयुक्त होते हैं।

    देशी बबूल : इससे गोंद प्राप्त किया जाता है। इसकी लकड़ी से फर्नीचर बनाया जाता है। इसकी पत्तियां पशुओं के चारे के रूप में तथा कांटे, जलाउ ईंधन एवं बाड़ के रूप में प्रयुक्त होते हैं। वैज्ञानिकों ने इसके बीज से कॉफी पाउडर एवं बिस्किट बनाने की विधि खोज निकाली है जिसे राजस्थान सरकार आने वाले वर्षों में बाजार में विपणन करने की योजना बना रही है।

    ढाक : इससे प्राकृतिक रंग बनाया जाता है।

    जाल : इसका फल पीलू कहलाता है तथा ग्रामीण क्षेत्रों में खाया जाता है। इसके बीजों से अखाद्य तेल बनाया जाता है।

    मेहंदी : इसकी झाड़ी मध्यम आकार की होती है। सुहागन स्त्रियां तथा कुंआरी कन्याएं, तीज-त्यौहार एवं विवाह आदि अवसरों पर इसकी सूखी पत्तियों को पीसकर हाथों पर रचाती हैं। इससे बाल भी रंगे जाते हैं तथा पैरों में जलन होने पर इसका पेस्ट पैरों पर लगाया जाता है।

    तूम्बा : इसका फल बकरियों का प्रिय भोजन है। इसके बीजों से अखाद्य तेल बनाया जाता है। मधुमेह बीमारी के उपचार में भी इसका फल काम आता है।

    गूगल : मरुस्थलीय क्षेत्रों में स्थित मध्यम एवं छोटी ऊँचाई की पहाड़ियों पर गूगल का पेड़ पाया जाता है। इसका गोंद खुशबूदार होता है जो पूजा तथा औषधि निर्माण में काम आता है।

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  • राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान के इतिहास प्रसिद्ध राजा एवं राजकुमार

     22.12.2021
    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान के इतिहास प्रसिद्ध राजा एवं राजकुमार

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी - 203

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान के इतिहास प्रसिद्ध राजा एवं राजकुमार

    1. प्रश्न - महाराजा अजीतसिंह -

    उतर- मारवाड़ नरेश जसवंतसिंह (प्रथम) के पुत्र थे। इनका जन्म ई.1678 में लाहौर में हुआ था। काबुल के मोर्चे पर महाराजा जसवंतसिंह की मृत्यु हो जाने के कारण औरंगजेब ने शिशु अजीतसिंह को उनकी माता सहित दिल्ली बुलाकर कैद कर लिया और मारवाड़ राज्य को खालसा कर लिया। वीर दुर्गादास, गोरां धाय तथा मुकुंददास खींची ने इन्हें चुपके से दिल्ली से निकाल कर सिरोही राज्य के कालिन्द्री गाँव में छिपा दिया तथा वयस्क होने पर प्रकट किया। दुर्गादास के प्रयत्नों से इन्हें फिर से मारवाड़ राज्य प्राप्त हो गया किंतु कुछ समय बाद ही अजीतसिंह ने दुर्गादास को देश निकाला दे दिया। उन्होंने गुणसागर, दुर्गापाठ भाषा, निर्वाण दूहा, अजीतसिंह रा कह्या दूहा तथा गजउद्वार नामक ग्रंथ की रचना की। महाराजा के लिखे कई गीत भी मिलते हैं।

    2. प्रश्न -महाराजा अभयसिंह-

    उतर- अजीतसिंह के बाद अभयसिंह जोधपुर के राजा हुए। उनके आश्रय में कई कवि रहते थे। उन्होंने विरद शंगार के रचियता करणीदान को लाख पसाव दिया तथा स्वयं घोड़े पर सवार होकर और कवि करणीदान को हाथी पर बैठाकर उसकी सवारी निकाली तथा कवि को घर तक पहँुचा कर आये।

    3. प्रश्न -महाराजा अनूपसिंह-

    उतर- बीकानेर नरेश अनूपसिंह का जन्म ई.1638 में हुआ। ये महाराजा कर्णसिंह के पुत्र थे। जब इन्होंने औरंगजेब के साथ दक्षिण का अभियान किया तो ये दक्षिण के ब्राह्मणों से बहुत बड़ी संख्या में संस्कृत के बहुमूल्य ग्रंथ बीकानेर ले आये और बीकानेर में अनूप संस्कृत पुस्तकालय की स्थापना की। ये स्वयं भी संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित थे। इन्होंने अनूप विवेक, प्रतिष्ठा प्रयोग चिंतामणि, श्राद्ध प्रयोग चिंतामणि, अनूप रत्नावली, जयाभिषेक पद्धति कौतुक सारोद्वार आदि ग्रंथों की रचना की। औरंगजेब ने इन्हें माही मरातिब प्रदान किया। अनूपसिंह के आश्रय में भावभट्ट तथा रघुनाथ गोस्वामी आदि विद्वानों ने संगीत के अनेक छंदों एवं ग्रंथों की रचना की।

    4. प्रश्न -राव अमरसिंह राठौड़-

    उतर- जोधपुर के राजा गजसिंह ने अपने बड़े पुत्र अमरसिंह को उसकी स्वतंत्र एवं विद्रोही प्रवृत्ति से नाराज होकर राज्य से निकाल दिया। जहाँगीर ने अमरसिंह को नागौर परगने का स्वतंत्र राजा बनाया। एक दिन शाहजहां के बख्शी सलावतखां ने अमरसिंह को शाहजहां के सामने गंवार कह दिया। अमर सिंह ने उसी समय अपनी कटार निकालकर बख्शी को मार डाला। अमरसिंह तथा उसके आदमी वहीं मारे गये। अमरसिंह की गाथा को कठपुतली कलाकारों द्वारा गाया जाता है।

    5. प्रश्न -महाराजा करणीसिंह-

    उतर- बीकानेर के अंतिम राजा सादूलसिंह के पुत्र करणीसिंह अच्छे निशानेबाज थे। निशानेबाजी के लिये उन्हें अर्जुन पुरस्कार भी मिला। वे ई.1953 से 1977 तक संसद सदस्य रहे। वे पूर्णतः शाकाहारी थे तथा मांस एवं मदिरा को स्पर्श नहीं करते थे। ई.1988 में उनका निधन हुआ।

    6. प्रश्न -कल्ला रायमलोत -

    उतर- ये मारवाड़ नरेश मालदेव के पौत्र तथा राव रायमल के पुत्र थे। इनकी जागीर नागौर में थी। जोधपुर नरेश राव चंद्र सेन ने कल्ला रायमलोत को सिवाना की जागीर दी थी। बादशाह की सेवा में रहते हुए ये बीकानेर के राजकुमार पृथ्वीराज राठौड़ के सम्पर्क में आये। एक बार ये बीकानेर गये और पृथ्वीराज राठौड़ से अनुरोध किया कि मैं धरती के लिये युद्ध करता हुआ वीरगति को प्राप्त करूंगा। इसलिये आप मेरी प्रशंसा में एक कवित्त बनाकर मुझे आज ही सुना दें। इस पर पृथ्वीराज राठौड़ ने एक सुंदर कविता की रचना की जो आज भी डिंगल भाषा की अनुपम धरोहर है। अकबर के आदेश पर जोधपुर नरेश मोटा राजा उदयसिंह ने सिवाना पर हमला किया तब कल्ला रायमलोत युद्ध क्षेत्र में वीरगति को प्राप्त हुआ। कहा जाता है कि सिर कट जाने पर भी इनका धड़ लड़ता रहा। इन्हें लोक देवता के समान पूजा जाता है। सिवाना के दुर्ग में इनका थान बना हुआ है जहां एक समारोह होता है।

    7. प्रश्न -कल्ला राठौड़

    उतर- इनका जन्म ई.1545 में मेड़ता में राव जयमल के छोटे भाई आससिंहजी के यहाँ हुआ। अर्थात् राव जयमल कल्ला राठौड़ के ताऊ थे। मीरां कल्ला राठौड़ की बुआ थी। कल्लाजी ने योगाभ्यास से कई सिद्धियाँ प्राप्त कर लीं। इनके बल पर वे असाध्य रोगों का उपचार कर देते थे। अकबर के चित्तौड़ घेरे के दौरान राठौड़ जयमल जब अकबर की गोली से घायल हो गया तब इसी कल्ला राठौड़ ने जयमल को अपने कंधों पर बैठा कर युद्ध किया था। दोनों ही वीर इस युद्ध में शहीद हुए। दो हाथों से जयमल द्वारा एवं दो हाथों से कल्लाजी द्वारा तलवार चलाये जाने के कारण माना जाता है कि कल्लाजी चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए। उन्हें चार हाथों वाला लोकदेवता भी माना जाता है। उन्हें शेषनाग का अवतार माना जाता है। कल्लाजी सर्पदंश का अचूक उपचार करते थे। राजस्थान, गुजरात तथा मध्यप्रदेश में उनके लगभग पाँच सौ मंदिर हैं। सलूम्बर से 15 किलोमीटर दूर रूंडेड़ा गाँव में इनका थान है। नवरात्रि में इस स्थान पर मेला लगता है तथा कल्ला राठौड़ को लोक देवता की तरह पूजा जाता है। इनके चमत्कार प्रसिद्ध हैं।

    8. प्रश्न -राव कान्हड़ देव

    उतर- चौदहवीं शताब्दी ईस्वी में जालोर के सोनगरा चौहानों में कान्हड़देव प्रबल प्रतापी राजा हुआ। उसने अलाउद्दीन खिलजी का मार्ग रोका जो सोमनाथ का शिवलिंग तोड़कर गुजरात से दिल्ली जा रहा था। कान्हड़देव ने खिलजी से शिवलिंग के टुकड़े छीन लिये और उन्हें जालोर के निकट सराणा (संकराणा) गाँव में स्थापित किया। खिलजी की सेना परास्त होकर भाग खड़ी हुई। कान्हड़देव को सालिगराम का अवतार कहा जाता था।

    9. प्रश्न -महाराणा कुंभा

    उतर- मेवाड़ नरेश कुंभा ने दिल्ली सल्तनत के काल में मालवा, दिल्ली, गुजरात एवं नागौर के सुल्तानों से युद्ध करके उन्हें कई बार परास्त किया तथा मेवाड़ में बहुत से किलों, महलों, मंदिरों एवं विजय स्तंभ आदि का निर्माण करवाया।

    10. प्रश्न -महाराजा गंगासिंह

    उतर- गंगासिंह का जन्म 13 अक्टूबर 1880 को हुआ था। वे महाराज लालसिंह के पुत्र तथा बीकानेर नरेश डूंगरसिंह के छोटे भाई थे। महाराजा डूंगरसिंह का निधन हो जाने के बाद 31 अगस्त 1887 को गंगासिंह, बीकानेर के 21वें राजा बने। ई.1902 में महाराजा ने अपनी रियासत में अलग प्रिवीपर्स और सिविल लिस्ट की पद्धति आरम्भ की। अंतर्राष्ट्रीय युद्धों में गंगासिंह तथा उनकी सेना की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। ई.1900 में चीन युद्ध (बॉक्सर युद्ध) के समय महाराजा तथा उनकी रेजीमेंट ने विभिन्न लड़ाइयों में सक्रिय रूप से भाग लिया। ई.1902 में महाराजा ने सोमानीलैण्ड में गंगा रिसाले अर्थात् ऊँट सेना की सेवाएं अर्पित कीं। प्रथम विश्व युद्ध आरम्भ होने पर अक्टूबर 1914 में गंगारिसाले को स्वेज नहर की रक्षा के लिये नियुक्त किया गया। फरवरी 1915 में तुर्की सेना के विरुद्ध अपनी सेना का नेतृत्व स्वयं गंगासिंह ने किया। युद्ध के दौरान गंगा रिसाले की सेवाएं मिश्र, पर्सिया और ईराक में ली गईं। वायसराय चेम्सफोर्ड ने 1916 में नरेशों का एक औपचारिक सम्मेलन बुलाया। महाराजा को इसका जनरल सेक्रेटरी बनाया गया। ई.1917 में लंदन में साम्राज्यिक सम्मेलन बुलाया गया। इसमें सम्मिलित होने के लिये सर जेम्स मेस्टन तथा सर एस.पी. सिन्हा के साथ गंगासिंह को भी मनोनीत किया गया। प्रथम साम्राज्यिक सम्मेलन में ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड लॉयड ने महाराजा गंगासिंह को ‘पूर्व से आये एक बुद्धिमान व्यक्ति’ तथा ‘अपने महान देश के पौरुष का शानदार नमूना’ की संज्ञा दी। प्रथम विश्व युद्ध के बाद ई.1919 में पेरिस में हुए शांति सम्मेलन में महाराजा गंगासिंह तथा सर एस. पी. सिन्हा को भारतीय प्रतिनिधि के रूप में सम्मिलित किया गया। 28 जून 1919 को गंगासिंह ने वर्साय की संधि पर एक मात्र भारतीय प्रतिनिधि के रूप में हस्ताक्षर किए। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने उन्हें ‘डॉक्टर ऑफ सिविल लॉज’ की उपाधि दी। 8 फरवरी 1921 को नरेन्द्र मण्डल का गठन होने पर गंगासिंह को उसका प्रथम चांसलर नियुक्त किया गया। 1924 में उन्होंने वायसराय रीडिंग के निमंत्रण पर राष्ट्रसंघ के 5वें अधिवेशन को सम्बोधित किया। सितम्बर 1930 में महाराजा ने राष्ट्रसंघ की 11वीं सभा के भारतीय प्रतिनिधि मण्डल का प्रतिनिधित्व किया। महाराजा गंगासिंह ने बीकानेर राज्य में गंगनहर का निर्माण करवाया। भाखरा बांध तथा राजस्थान नहर (अब इंदिरा गांधी नहर) भी गंगासिंह के मस्तिष्क की ही उपज थी। भारत संघ के निर्माण के विचार से ब्रिटिश सरकार द्वारा लंदन में बुलाए गए गोलमेज सम्मेलन में महाराजा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी। गोलमेज सम्मेलन के बाद ई.1935 में गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया एक्ट 1935 तथा संशोधन संविलयन प्रारूप विलेख उत्पन्न हुए। महाराजा गंगासिंह इससे असंतुष्ट थे। इसलिए उन्होंने भी अन्य भारतीय राजाओं की तरह, प्रस्तावित भारत संघ में मिलने से मना कर दिया। जब बीकानेर राज्य में उत्तरदायी शासन के लिए प्रजामण्डल आंदोलन चला तो गंगासिंह ने उसे सख्ती से कुचला। ई.1939 में महाराजा द्वितीय विश्वयुद्ध के मोर्च पर गए। वहाँ से लौटने के बाद 2 फरवरी 1943 को जब द्वितीय विश्वयुद्ध चरम पर था, बम्बई स्थित निवास स्थान पर महाराजा गंगासिंह का देहांत हो गया।

    11. प्रश्न -महाराजा गजसिंह

    उतर- जोधपुर नरेश गजसिंह मुगल बादशाह जहाँगीर और औरंगजेब के समकालीन थे। उनका जन्म ई.1595 में हुआ। जब इन्होंने दक्षिण में अम्बर चम्पू को परास्त किया तो जहाँगीर ने इन्हें दलथंभन की उपाधि दी। महाराजा गजसिंह ने कुल 52 युद्ध किये। इन्होंने 14 कवियों को लाख पसाव दिया। ‘गुण रूपक’ के रचियता केशवदास गाडण और ‘अवतार चरित’ के रचियता कवि नरहरिदास इनके आश्रित थे। गजसिंह ने अपने ज्येष्ठ पुत्र अमरसिंह के स्थान पर आज्ञाकारी पुत्र जसवंतसिंह को अपना उत्तराधिकारी बनाया। ई.1638 में महाराजा का निधन हुआ। उनकी अंत्येष्टि यमुनाजी के किनारे की गयी जहां उनकी छतरी बनी हुई है।

    12. प्रश्न -राव चूण्डा राठौड़

    उतर- खेड़ के जागीरदार वीरमजी का पाँचवा तथा सबसे छोटा पुत्र चूण्डा, राठौड़ों के इतिहास में प्रसिद्ध राजा हुआ है। प्रतिहारों की ईंदा शाखा के मुखिया ने अपनी पुत्री का विवाह चूण्डा के साथ किया एवं मण्डोर का दुर्ग दहेज में दिया। चूण्डा ने राठौड़ों के छोटे से राज्य को विशाल साम्राज्य में बदलने का काम आरंभ किया। उसने नागौर तथा डीडवाना सहित विशाल क्षेत्र पर अधिकार कर लिया।

    13. प्रश्न -राव रणमल

    उतर- मण्डोर के राव चूण्डा का पुत्र राव रणमल; मेवाड़ के महाराणा लाखा, मोकल एवं कुंभा का समकालीन था। मोकल की हत्या हो जाने पर रणमल ने मोकल के राज्य की रक्षा की तथा कुंभा का संरक्षक बनकर शत्रुओं से उसके राज्य को बचाया। रणमल ने मेवाड़ राज्य के लिये कई युद्ध जीते तथा मेवाड़ को विशाल साम्राज्य में बदल दिया। कुंभा ने रणमल की हत्या करवाई तथा उसके राज्य पर अधिकार कर लिया।

    14. प्रश्न - महाराणा राजसिंह

    उतर- ये औरंगजेब के समकालीन मेवाड़ के शासक थे। इन्होंने किशनगढ़ की राजकुमारी चारुमति से विवाह करके उसे औरंगजेब के हाथों में पड़ने से बचाया तथा जब औरंगजेब ने मुगल सल्तनत में जजिया आरम्भ किया तो राजसिंह ने औरंगजेब को फटकार भरा पत्र लिया। राजसिंह ने मेवाड़ में राजसमंद झील का निर्माण करवाया तथा राजप्रशस्ति की रचना करवाई।

    15. प्रश्न - चूण्डा लाखाणी

    उतर- मेवाड़ के महाराणा लाखा का बड़ा पुत्र चूण्डा वीर एवं सत्पुरुष था। जब मारवाड़ की राजकन्या का नारियल चूण्डा के लिये आया तो लाखा ने कहा कि नारियल जवानों के लिये आते हैं, हमारे जैसे बूढ़ों के लिये नहीं आते। यह बात चूण्डा ने सुन ली। उसने कहा कि जिस स्त्री को लेकर मेरे पिता ने परिहास किया है वह स्त्री मेरी माँ के समान है। मैं उससे विवाह नहीं कर सकता। मारवाड़ से आये राजपुरुषों ने कहा कि यदि राजकन्या का विवाह राणा लाखा से हुआ तो इस कन्या से उत्पन्न होने वाला पुत्र ही मेवाड़ का राणा बनेगा। चूण्डा ने यह बात स्वीकार कर ली। मारवाड़ की राजकन्या का विवाह लाखा से हो गया। मारवाड़ की राजकन्या से उत्पन्न पुत्र आगे चलकर मेवाड़ का राणा हुआ। राजकुमार चूण्डा के वंशज चूण्डावत कहलाये।

    16. प्रश्न - जयमल मेड़तिया

    उतर- मेड़ता के राव दूदा के पुत्र राव वीरमदेव के पुत्र जयमल का ई.1507 में जन्म हुआ। वह 36 वर्ष की आयु में मेड़ता की गद्दी पर बैठा। जोधपुर का राव मालदेव मेड़ता के राज्य को समाप्त कर उसे जोधपुर राज्य में मिलाना चाहता था। इस कारण वीरमदेव और मालदेव का आजीवन झगड़ा चला जो जयमल मेड़तिया के समय में भी चलता रहा। अंत में जयमल को मालदेव से परास्त होकर मारवाड़ छोड़कर मेवाड़ के महाराणा की सेवा में चले जाना पड़ा। जब ई.1560 में अकबर ने चित्तौड़ दुर्ग पर आक्रमण किया तब महाराजा उदयसिंह को दुर्ग की रक्षा का भार जयमल पर छोड़कर अन्यत्र चले जाना पड़ा। जयमल वीर, सत्याग्रही और स्वामिभक्त क्षत्रिय था। उसने प्राण रहते चित्तौड़ का दुर्ग न छोड़ने का प्रण लिया। एक रात दुर्ग की दीवार अकबर की तोपों की मार से टूट गयी। इस पर जयमल मशालों का प्रकाश करवाकर दीवार की मरम्मत करवाने लगा। अकबर ने उस पर अपनी बंदूक से निशाना साधा। गोली जयमल की टांग में लगी। उसी रात दुर्ग में हिन्दू वीरांगनाओं ने जौहर किया और अगले दिन सूर्य निकलते ही हिन्दू वीरों ने केसरिया पहनकर दुर्ग के द्वार खोल दिये। युद्ध करने में स्वयं को अक्षम जानकर उन्होंने कल्लाजी राठौड़ से आग्रह किया कि मेरे मन में युद्ध की इच्छा है। इस पर कल्लाजी ने जयमल को अपने कंधे पर बैठा लिया। जयमल दोनों हाथों से तलवार चलाता हुआ वीर गति को प्राप्त हुआ। इस युद्ध में पत्ता सिसोदिया ने भी अद्भुत वीरता दिखायी। दुर्ग अकबर के हाथ लग गया। जयमल तथा पत्ता की वीरता पर रीझकर अकबर ने इन दोनों वीरों की हाथी पर सवार मूर्तियां फतहपुर सीकरी में मुख्य द्वार के बाहर लगवायीं।

    17. प्रश्न - मिर्जाराजा जयसिंह अथवा जयसिंह (प्रथम)

    उतर- जयपुर नरेश भावसिंह की मृत्यु के बाद जयसिंह (प्रथम) सात वर्ष की आयु में आम्बेर का राजा हुआ। उसका जन्म ई.1613 में तथा राज्यारोहण ई.1620 में हुआ। उसे शाहजहाँ ने मिर्जा राजा की उपाधि दी। वह फारसी, तुर्की, उर्दू, हिन्दी, संस्कृत, भूगोल, इतिहास तथा गणित का ज्ञाता था। उसने शाहजहाँ के शासन में हुए खानेजहाँ के भयानक विद्रोह को कुचलकर प्रतिष्ठा प्राप्त की। जयसिंह ने छत्रपति शिवाजी के पिता शाहजी भौंसले के विरुद्ध भी काफी बड़ी विजय प्राप्त की थी। जब ई.1647 में शाहजहाँ काबुल में फंस गया तब जयसिंह ने आगरा से 1.20 करोड़ रुपये तथा सोने की 3 लाख मोहरें ले जाकर उसे पहुंचाईं। हिन्दी के महाकवि बिहारी मिर्जाराजा जयसिंह के दरबारी कवि थे जिन्हें जयसिंह ने प्रत्येक दोहे की रचना पर सोने की एक मोहर दी। इस ग्रंथ में 713 दोहे हैं। जयसिंह को शाहजहाँ ने सात हजारी मनसब दिया। जब औरंगजेब ने शाहजहाँ को कैद कर लिया तब जयसिंह ने औरंगजेब को अपना स्वामी मान लिया और दारा के पीछे पड़ गया। अंत में मिर्जा राजा जयसिंह ने दारा को पकड़कर औरंगजेब को सौंप दिया। जयसिंह ने छत्रपति शिवाजी के 23 दुर्ग छीन लिये और शिवाजी तथा शंभाजी को औरंगजेब से संधि करवाने के लिये आगरा ले गया। ई.1667 में मिर्जा राजा जयसिंह प्रथम का निधन हुआ।

    18. प्रश्न - सवाई राजा जयसिंह अथवा जयसिंह (द्वितीय)

    उतर- जयपुर नरेश जयसिंह (द्वितीय) ई.1699 में आम्बेर का शासक हुआ। इसने जयपुर नगर बसाया। यह संस्कृत, हिन्दी, डिंगल, ज्योतिष एवं खगोल विद्या का प्रकाण्ड पण्डित था। इसने जयपुर, उज्जैन, मथुरा तथा दिल्ली में जंतर-मंतर (वेधशालाओं) की स्थापना की जो आज भी नक्षत्रों की वास्तविक स्थिति और सही समय दर्शाती हैं। जयसिंह ने नक्षत्र गणनाओं के लिये स्वयं भी यंत्रों का आविष्कार किया। उसके लिखे हुए ग्रंथों में ‘जयप्रकाश यंत्र’ और ‘यंत्रराज’ ज्योतिष शास्त्र में विशिष्ट स्थान रखते हैं। इसने एक पुस्तक जीज मुहम्मदशाही के नाम से भी लिखी थी।

    19. प्रश्न - महाराजा जयसिंह

    उतर- अलवर नरेश जयसिंह आधुनिक भारत के इतिहास में महत्वपूर्ण राजा हुआ है। वह अंग्रेजी शासन का विरोधी था। इसकी राष्ट्रभक्ति से प्रभावित होकर जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि यदि यह युवक राजपरिवार में जन्म न लेकर किसी सामान्य घर में जन्म लेता तो भारतवर्ष को एक बड़ा नेता प्राप्त हुआ होता। महाराजा ने उर्दू के स्थान पर हिन्दी को अलवर की राज्यभाषा बनाया जिससे मुस्लिम अधिकारी नाराज रहते थे। महाराजा भारत के उन गिने चुने राजाओं में से था जो नरेन्द्र मण्डल की बैठकों में रुचि पूर्वक भाग लेते थे। वह प्रथम गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिये लंदन गया। महाराजा के कुछ अधीनस्थ अधिकारी अंग्रेज अधिकारियों के बहकावे में आकर महाराजा को बदनाम करना चाहते थे। एक बार अलवर रियासत के नीमूचाणा गाँव में किसानों ने लाग-बाग करने की मांगों को लेकर बैठक की। अलवर रियासत की पुलिस ने इस सम्मेलन पर रोक लगा दी किंतु किसानों द्वारा बैठक करने पर पुलिस ने गोलियां चलाईं जिससे कई किसान मारे गये। अधिकारियों ने महाराजा को बदनाम करने की नीयत से किसानों के घरों में भी आग लगा दी जिसमें कई पशु जल कर मर गये। इससे महाराजा की बड़ी बदनामी हुई किंतु जांच में वे निर्दोष पाये गये। इसके बाद मेवों ने राज्य में विद्रोह कर दिया जिन्हें कुचलने के लिये महाराजा ने सख्त कदम उठाये। इस दौरान हुई गोलीबारी में कुछ उत्पाती मेव मर गये। इस पर अंग्रेज सरकार ने बिना कोई जांच कराये महाराजा को राज्य से निष्कासित कर दिया। महाराजा खद्दर पहनकर लंदन चले गये जहाँ रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी। माना जाता है कि अंग्रेजों ने उनकी हत्या करवा दी।

    20. प्रश्न - महाराजा जसवंतसिंह (प्रथम)

    उतर- जोधपुर नरेश महाराजा जसवंतसिंह (प्रथम) शाहजहाँ और औरंगजेब के समकालीन थे। वे मात्र 11 वर्ष की आयु में राजा बने। वे हिन्दू धर्म के रक्षक, नीतिज्ञ, बहुभाषा विद् और विद्वान लेखक थे। गद्य और पद्य लेखन पर उन्हें बराबर अधिकार था। उन्होंने भाषा भूषण, आनंद विलास, अनुभव प्रकाश, अपरोक्ष सिद्धांत, सिद्धांत बोध, सिद्धांत सार, नायिका भेद आदि ग्रंथों की रचना की। चंद्र प्रबोध आपकी अनुवाद रचना है और फूली जसवंत संवाद आपकी अप्रकट कृति है। जब शाहजहाँ के पुत्रों में उत्तराधिकार का युद्ध हुआ तो जसवंतसिंह ने दारा का पक्ष लिया किंतु धर्मत के युद्ध में कुछ मुसलमान सैनिकों द्वारा ऐन वक्त पर दारा को धोखा देकर औरंगजेब के पक्ष में जा मिलने से जसवंतसिंह युद्ध का मोर्चा छोड़कर जोधपुर आ गये। जसवंतसिंह की रानी ने महाराजा को युद्ध क्षेत्र त्याग कर आने से उन्हें कायर बताकर अपने महल के दरवाजे बंद कर लिये। बाद में जब औरंगजेब बादशाह बन गया तो जसवंतसिंह को औरंगजेब की सेवा में जाना पड़ा। मुगल साम्राज्य में जसवंतसिंह की प्रसिद्धि ‘खतरनाक हिन्दू सरदार’ के रूप में थी। औरंगजेब महाराजा को मरवाना चाहता था इसलिये उसने महाराजा की नियुक्ति काबुल के मोर्चे पर की तथा पीछे से छलपूर्वक महाराजा के बड़े पुत्र पृथ्वीसिंह की हत्या करवा दी जिससे महाराजा का मन संसार से उचाट हो गया और वे काबुल में मृत्यु को प्राप्त हुए। उनकी मृत्यु पर औरंगजेब ने कहा कि कुफ्र का दरवाजा टूट गया। उसी समय औरंगजेब की बेगम ने कहा कि आज शोक का दिन है क्योंकि आज मुगल सल्तनत का मजबूत खम्भा गिर गया। इन दोनों ही उद्गारों में महाराजा जसवंतसिंह के विराट व्यक्तित्व के दर्शन होते हैं।

    21. प्रश्न - राव जोधा राव जोधा

    उतर- मारवाड़ के राजा रणमल का पुत्र था। उसका जन्म ई.1415 में हुआ। जोधा ने ई.1459 में जोधपुर नगर एवं दुर्ग की स्थापना की। वह एक वीर राजा था जिसने मारवाड़ का इतिहास बदल दिया तथा मेवाड़ के अधिकार में पूर्णतः जा चुके राठौड़ राज्य को 15 साल के संघर्ष के बाद पुनर्जीवित किया। उसके 11 रानियों से 19 पुत्र हुए जिनसे राठौड़ों की 12 शाखायें चलीं। ई.1487 में उसका निधन हुआ।

    22. प्रश्न - धरणीवराह

    उतर- यह ग्यारहवीं शती के आस पास परमारों का राजा था। मारवाड़ के किरात कूप क्षेत्र पर भी इनका शासन था। इनके अधीन विस्तृत मरूक्षेत्र था जिसमें नौ दुर्ग थे। इनके पीछे ही मारवाड़ नवकोटि मारवाड़ कहलाया। धरणीवराह तथा उनके पूर्वज राजाओं ने किरात कूप में विशाल दुर्ग, सरोवर तथा कलापूर्ण मंदिर बनवाया जिनके खण्डहर आज भी देखे जा सकते हैं। किरात कूप को अब किराडू के नाम से जाना जाता है और यह बाड़मेर जिले में स्थित है।

    23. प्रश्न - पीपा

    उतर- ये गौगरोन दुर्ग के पंद्रहवी शताब्दी ईस्वी के खींची चौहान राजा थे जिन्होंने राजपाट अपने भाई अचलदास को सौंपकर संन्यास ग्रहण कर लिया तथा रामानंद के शिष्य हो गये। कबीर, धन्ना और नरहरिदास आदि प्रसिद्ध संत इनके गुरुभाई थे।

    24. प्रश्न - पृथ्वीराज चौहान

    उतर- अजमेर के शासक सोमेश्वर के पुत्र पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने ई.1191 में तराइन की पहली लड़ाई में मुहम्मद गौरी को परास्त किया किंतु ई.1192 में गौरी के हाथों मारा गया। इस राजा को इतिहास में राय पिथौरा भी कहा जाता है। इस राजा को भारत वर्ष का अंतिम हिन्दू सम्राट होने का गौरव प्राप्त है। डॉ. दशरथ शर्मा ने इन्हें रहस्यमयी शासक लिखा है। इनके दरबारी कवि एवं बाल सखा कवि चंद वरदाई ने पृथ्वीराज रासो की रचना की। यह पिंगल भाषा का काव्य है जिसमें 69 अध्याय हैं। यह वीर रस और शृगार रस से परिपूर्ण ग्रंथ है।

    25. प्रश्न - पृथ्वीराज राठौड़

    उतर- बीकानेर के राजकुमार पृथ्वीराज राठौड़ ने वेलि क्रिसन रुक्मणि की रचना की। इनका साहित्यिक नाम पीथल था। ये अकबर के दरबारी कवि थे। अकबर ने उन्हें गागरौण का दुर्ग जागीर में दिया था। इन्होंने महाराणा प्रताप को पत्र लिखकर उन्हें अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं करने के लिये प्रेरित किया।

    26. प्रश्न - महाराजा प्रतापसिंह

    उतर- ब्रजनिधि जयपुर नरेश प्रतापसिंह कवियों के आश्रयदाता थे। वे स्वयं भी ब्रजनिधि नाम से कविता लिखते थे। इनकी रचनाओं में प्रीतिलता, स्नेह संग्राम, फागरंग, प्रेम प्रकाश, मुरली विहार, रंग चौपड़, प्रीति पचीसी, प्रेमपंथ, ब्रज शृगार, दुःख हरण वेलि, रमक झमक बत्तीसी, श्री ब्रजनिधि मुक्तावली एवं ब्रजनिधि पद संग्रह प्रसिद्ध हैं। इनकी कविता ढूंढाड़ी एवं ब्रज भाषाओं में है।

    27. प्रश्न - महाराजा बखतसिंह

    उतर- बखतसिंह जोधपुर नरेश अजीतसिंह के पुत्र थे। जयपुर नरेश के कहने पर राजकुमार अभयसिंह ने अपने छोटे भाई बखतसिंह को महाराजा अजीतसिंह की हत्या के लिये तैयार किया। 23 जुलाई 1724 को जब बखतसिंह ने अजीतसिंह की हत्या कर दी तो अभयसिंह जोधपुर का राजा बना तथा बखतसिंह को नागौर का स्वतंत्र राज्य दे दिया गया। महाराजा बखतसिंह बड़ा योद्धा था। उसने कई युद्ध जीते। आगे चलकर वह जोधपुर का राजा बना।

    28. प्रश्न - महाराणा प्रताप

    उतर- महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को कुंभलगढ़ में हुआ। इनके पिता का नाम महाराणा उदयसिंह तथा माता का नाम जीवंतकंवर था। उदयसिंह अपने अन्य पुत्र जगमाल को मेवाड़ का राणा बनाना चाहते थे किंतु मेवाड़ के सरदारों ने उदयसिंह की मृत्यु के बाद प्रतापसिंह को राणा बनाया। इस समय तक मेवाड़ को छोड़कर लगभग समस्त उत्तर भारत तथा अधिकांश दक्षिण भारत मुगलों के अधीन जा चुका था। अकबर ने जयपुर के राजकुमार मानसिंह को प्रताप के पास भेजा किंतु प्रताप ने अकबर की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया। इस पर अकबर ने अपने समस्त सेनापतियों को मेवाड़ के विरुद्ध झौंक दिया। 18 जून 1576 को बनास नदी के कांठे में इतिहास प्रसिद्ध हल्दी घाटी युद्ध हुआ। इस युद्ध में प्रताप ने मुगलों की सेना को भारी क्षति पहुंचायी। उन्होंने मानसिंह पर अपने भाले से भयानक प्रहार किया। मानसिंह ने हाथी के हौदे में छिप कर अपनी जान बचाई। प्रताप मानसिंह को मरा हुआ जानकर पीछे मुड़े किंतु तब तक वे चारों तरफ से घिर गये और उन्हें युद्ध का मोर्चा छोड़कर निकलना पड़ा। उनका स्वामिभक्त घोड़ा चेतक भी बुरी तरह घायल हो गया तथा एक पहाड़ी नाला पार करने के बाद वहीं गिर गया। इसके बाद मेवाड़ का बहुत सा हिस्सा अकबर के अधीन हो गया किंतु प्रताप पहाड़ियों में चले गये तथा उन्होंने अकबर के जीवन काल में ही वह समस्त भू-भाग पुनः मुक्त करवा लिया। जनवरी 1597 में इस वीर राजा का निधन हुआ। प्रताप आज भी देश की आन, बान और शान के प्रतीक हैं।

    29. प्रश्न - महाराजा मानसिंह कच्छवाहा

    उतर- जयपुर का महाराजा मानसिंह अकबर के प्रमुख सेनापतियों और विश्वस्त मित्रों में से था। इसकी बुआ का विवाह अकबर के साथ हुआ था तथा बहन का विवाह सलीम के साथ हुआ था। मानसिंह ने अकबर के राज्य विस्तार में बड़ा योगदान किया। हल्दीघाटी के महान युद्ध में भी अकबर की सेनाएं मानसिंह के नेतृत्व में लड़ी थीं। युद्धक्षेत्र में महाराणा प्रताप ने मानसिंह पर अपना भाला फैंक कर मारा था जिसके कारण मानसिंह झुककर हौदे में गिर पड़ा। प्रताप ने मानसिंह को मरा हुआ जानकर छोड़ दिया। मानसिंह हल्दीघाटी के युद्ध में बुरी तरह परास्त हुआ जिससे नाराज होकर अकबर ने मानसिंह की ड्यौढ़ी बंद कर दी। सलीम ने जहाँगीर के नाम से बादशाह बन जाने के बाद मानसिंह को अपमानित किया और आगरा छोड़कर बंगाल जाने के आदेश दिये। मानसिंह बंगाल चला गया और वहीं मृत्यु को प्राप्त हुआ।

    30. प्रश्न - महाराजा मानसिंह राठौड़

    उतर- मारवाड़ के महाराजा मानसिंह उद्भट विद्वान थे। उन्होंने कई ग्रंथों की रचना की। इनके दरबार में कई कवि एवं विद्वान आश्रय पाते थे। अपने सामंतों के हाथों राज्य की दुर्दशा होते देखकर ई.1918 में उन्होंने अंग्रेजों से संधि की तथा बाद में संधि की शर्तों से बचने के लिये पागल होने का नाटक किया। महाराजा मानसिंह ने नाथ आयसनाथ को अपना गुरु बनाया जिससे इनके राज्य में नाथों का इतना अधिक बोलबाला हो गया कि नाथों ने मारवाड़ की जनता पर अत्याचार करने आरंभ कर दिये। इस पर अंग्रेजी रेजीडेण्ट कप्तान लडलू ने कई नाथों को पकड़ कर अजमेर भिजवा दिया तथा कई प्रमुख नाथों को देश निकाला दे दिया। जिससे ये राज्य के प्रति उदासीन हो गये तथा राज्य त्यागकर मण्डोर चले गये जहाँ इनकी मृत्यु हो गयी। महाराजा ने 27 कवियों को लाख पसाव दिया। ये निःसंतान मृत्यु को प्राप्त हुए।

    31. प्रश्न - महाराजा रामसिंह

    उतर- अभयसिंह का पुत्र रामसिंह निकम्मा शासक सिद्ध हुआ। राज्य के सामंतों ने रामसिंह को गद्दी से उतार कर अभयसिंह के भाई बखतसिंह को जोधपुर का राजा बनाया। रामसिंह तथा बखतसिंह के पुत्र विजयसिंह के बीच जोधपुर की गद्दी को लेकर लम्बा झगड़ा चला जिसके कारण मारवाड़ की राजनीति में मराठों की भूमिका प्रभावी हो गयी।

    32. प्रश्न - महाराजा रायसिंह

    उतर- ये बीकानेर के राव कल्याणमल के पुत्र, सुप्रसिद्ध कवि पृथ्वीराज राठौड़ के बड़े भाई एवं बीकानेर के राजा थे। इन्होंने अकबर और जहाँगीर की बड़ी सहायता की। अकबर ने इन्हें जोधपुर राज्य की सूबेदारी दी। इन्होंने सिरोही के राव सुरताण को पकड़कर आगरा भेज दिया। ये बड़े विद्वान एवं दानी थे। इन्होंने अपने विवाह के अवसर पर उदयपुर में दस लाख रुपये, 50 हाथी, 500 अश्वों का दान दिया। ये डिंगल और संस्कृत भाषाओं के ज्ञाता थे। इन्होंने ‘रायसिंह महोत्सव’ एवं ‘ज्योतिष रत्न माला’ नामक ग्रंथों की रचना की। कहा जाता है कि जब अकबर ने इन्हें दक्षिण अभियान पर भेजा तो एक बार इन्हें दक्षिण भारत के किसी प्रदेश में फोग की झाड़ी दिखायी दे गयी। इस पर ये भाव विह्वल होकर अश्व से नीचे उतर पड़े और उस फोग को बाहों में लपेट कर बोले- थूं तो देसी रूंखड़ो, म्हां परदेशी लोग। म्हाने अकबर तेड़िया, थूं क्यूं आयो फोग।।

    33. प्रश्न - महाराणा सांगा

    उतर- मेवाड़ के महाराणा संग्राम सिंह ने ई.1527 में खानवा के मैदान में बाबर से युद्ध किया किंतु उन्हें युद्धक्षेत्र में घायल हो जाने के कारण युद्ध क्षेत्र का त्याग करना पड़ा।

    34. प्रश्न - महाराजा सादुलसिंह

    उतर- ये अंतिम बीकानेर नरेश थे। भारतीय रियासतों के भारत में विलय के कार्य में इन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी जिसके लिए सरदार पटेल इनकी प्रशंसा किया करते थे।


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  • पर्यावरण का प्रखर प्रहरी - बिश्नोई समाज

     02.06.2020
    पर्यावरण का प्रखर प्रहरी - बिश्नोई समाज

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    उत्तर भारत के पंजाब, हरियाणा एवं राजस्थान आदि प्रांतों में बसने वाली बिश्नोई जाति ने पर्यावरण की सुरक्षा के लिए जो महत्वपूर्ण कार्य किया है, उसकी जितनी प्रशंसा की जाए, कम है। पंद्रहवीं शताब्दी ईस्वी में जब भारत पर दिल्ली सल्तनत के तुर्की शासकों का शासन था और चारों ओर हिंसा का वातावरण था, तब थार रेगिस्तान में जन्म लेने वाले जाम्भोजी नामक प्रसिद्ध संत ने बिश्नोई सम्प्रदाय की स्थापना की। उन्होंने अपने शिष्यों को 29 शिक्षाएं दीं जिनमें धर्म अैर नैतिकता के साथ-साथ पर्यावरण सुरक्षा एवं मानवीय मूल्यों के निर्वहन पर जोर दिया गया। उनके द्वारा दिए गए 29 नियमों में से 8 नियम पशु-पक्षियों-वृक्षों एवं पर्यावरण रक्षा से सम्बन्धित हैं।

    भगवान जांभोजी के जीवन काल में ई.1485 में मारवाड़ में भयानक अकाल पड़ा। इस कारण बहुत से लोग अपने परिवारों एवं पशुओं को लेकर मालवा के लिए प्रस्थान करने लगे। मनुष्यों के इस कष्ट को देखकर जांभोजी ने उन लोगों की सहायता की तथा उन्हें पर्यावरण की सुरक्षा करने के लिए प्रेरित किया। उस काल में जब भारतीयों के पास आधुनिक विज्ञान नहीं था, और उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि खेजड़ी की जड़ में वायुमण्डल की नाइट्रोजन का स्थिरिकरण करने वाले बैक्टीरिया निवास करते हैं, जांभोजी ने खेजड़ी के महत्व को पहचाना और उसकी रक्षा का कार्य धार्मिक अनुष्ठान की तरह पवित्र बना दिया। इसी प्रकार घास खाकर जीवित रहने वाले हिरण की महत्ता भी उनकी आंखों से छिपी नहीं रही। हिरणों के मल-मूत्र से धरती स्वतः उर्वरा बनने की प्रक्रिया के अधीन रहती है क्योंकि हिरण दूर-दूर तक छलांगें लगाता रहता है। इसलिए जांभोजी जंगलों में बसने वाले हिरणों को खेतों और गांवों तक ले आए।

    गुरु जांभोजी की शिक्षाओं का सच्चे अर्थों में अनुसरण करते हुए बिश्नाई समाज ने पर्यावरण संरक्षण को अपने जीवन का प्रमुख हिस्सा बना लिया। जिस-जिस क्षेत्र में बिश्नोई समुदाय निवास करता है, उस सम्पूर्ण क्षेत्र में किसी व्यक्ति को हिरण, खरगोश, नीलगाय आदि वन्य-जीवों का शिकार नहीं करने दिया जाता तथा खेजड़ी के हरे वृक्ष को नहीं काटने दिया जाता। वन्यजीवों के शिकार एवं खेजड़ी की कटाई को रोकने के लिए बिश्नोई समाज का प्रत्येक व्यक्ति सजग रहता है तथा इस कार्य को करते हुए अपने प्राण तक न्यौछावर करने की भावना रखता है। सरकार ने इस समुदाय की भावनाओं का आदर करते हुए बिश्नोई बहुल गांवों के आसपास के क्षेत्रों को आखेट निषिद्ध क्षेत्र घोषित किया है।

    बिश्नोई लोग हिरणों की रक्षा ही नहीं करते, वे हिरणों का उपचार तथा पालन-पोषण भी करते हैं। बिश्नोई माताएं, माताविहीन हिरण शावकों को पुत्रवत् स्तनपान करवाती हैं। इस प्रकार का उदाहरण इस धरती पर निवास करने वाले किसी भी मानव समाज में शायद ही अन्यत्र मिले।

    पश्चिमी राजस्थान में अनेक बार ऐसे प्रसंग हुए जब बिश्नोई समाज के स्त्री-पुरुषों ने वन्यजीवों एवं वृक्षों की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्यौछावर किए। ई.1730 में खेजड़ी वृक्ष को बचाने के लिए बिश्नोई समाज के 363 स्त्री-पुरुषों द्वारा दिया गया बलिदान पूरे विश्व में श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता है। आज भी इस घटना की स्मृति को ताजा करने एवं उन अमर शहीदों को स्मरण करने के लिए देश के बहुत से हिस्सों से लोग खेजड़ली गांव आते हैं।

    बिश्नोई समाज को खेजड़ी के प्रति श्रद्धा, भगवान जांभोजी के जीवन काल से ही होने लगी थी। जांभोजी ने नागौर जिले की जायल तहसील में स्थित रोटू गांव में तीन हजार सात सौ वृक्ष लगाकर पूरे गांव की सीमा में अलग तरह का बगीचा लगा दिया था। मान्यता है कि उन्होंने खेजड़ी के एक सूखे वृक्ष को अपनी दिव्य शक्ति से पुनः हरा-भरा कर दिया था।

    आज से लगभग 21 वर्ष पहले मैंने रोटू गांव की यात्रा की थी। तब मैंने अपनी आंखों से इस गांव में मोर एवं चिड़ियों को स्थान-स्थान पर इस प्रकार बैठे हुए देखा था मानो वे गांव के पालतू पक्षी हों। इसी प्रकार मैंने हिरणों को निर्भय होकर रोटू गांव में विचरण करते हुए देखा था। मूलतः हिरण वन्यजीव है किंतु यह देखना किसी सुखद आश्चर्य से कम नहीं था कि मानव द्वारा दिए जा रहे प्रेम के वशीभूत होकर हिरण जंगल में बसने का अपना स्वभाव भूलकर गांव के बीच घूमते थे।

    जाम्भोजी ने एक नियम बताया था- ‘‘अमर रखावै थाट बैल बंध्यो न करावै’’ मैंने अपनी आंखों से इस गांव में बकरों का एक थाट देखा था। थाट बकरों के उस समूह को कहते हैं जिसमें गांव के समस्त बकरों को रखा जाता है तथा उनका वध नहीं किया जाता, न उन्हें बधिया किया जाता है। उनके पालन-पोषण की जिम्मेदारी समस्त गांव द्वारा उठाई जाती है।

    जोधपुर, नागौर, बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर के धोरों में स्थित कांटेदार शुष्क वनों में बिश्नोई समाज ने हिरणों के लिए स्थान-स्थान पर पेयजल की व्यवस्था की है तथा कुत्तों के काटने से घायल एवं बीमार हिरणों के उपचार के लिए रेसक्यू सेंटर बनाए हैं। इन सेंटरों पर हिरणों के साथ-साथ अन्य घायल पशु-पक्षियों का भी उपचार किया जाता है। बरसात के दिनों में जब हिरणों के पांव मिट्टी में धंसने लगते हैं, तब भी बिश्नोई समुदाय के लोग इनकी रक्षा करते हैं। गुढ़ा बिश्नाईयां तथा खेजड़ली क्षेत्र में बिश्नोई स्त्री-पुरुषों को सहज भाव से पशु-पक्षियों की सेवा-सुश्रुषा करते हुए देखा जा सकता है।

    जोधपुर जिले में बिश्नोई धोरां नामक स्थान पर मैंने आज से लगभग 10 वर्ष पहले प्रातः काल की बेला में बिश्नोई स्त्री-पुरुषों को वैदिक मंत्रों के साथ हवन करते हुए तथा शुद्ध घी की आहुतियां देते हुए देखा था। यह हवन एक ऊंचे से टीले पर बने एक छोटे मंदिर के खुले प्रांगण में बने एक झौंपड़ी नुमा शेड के नीचे हो रहा था और यज्ञ-स्थल के चारों ओर मोर तथा हिरण सहज भाव से विचरण कर रहे थे।

    बिश्नोई समाज द्वारा जीवों की रक्षा के लिए बहुत सजगता बरती जाती है, उसके उपरांत भी शिकारियों द्वारा हिरणों के चोरी-छिपे शिकार की घटनाएं हो जाती हैं। कई बार शिकारियों का प्रतिरोध करते हुए बिश्नोई समाज के लोग अपने प्राण तक न्यौछावर कर चुके हैं। इस समाज ने पर्यावरण की सुरक्षा के भाव को धर्म की तरह धारण किया है जिसकी मिसाल अन्यत्र मिलनी अत्यंत कठिन है।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-32

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-32

    राज्य-पशु, राज्य-पक्षी एवं राज्य-वृक्ष


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    प्राकृतिक धरोहर को लुप्त होने से बचाने की दृष्टि से राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक प्रतीक चिह्नों की घोषणा की जाती है। राष्ट्रीय स्तर पर कमल को राष्ट्रीय पुष्प, बरगद को राष्ट्रीय वृक्ष, मोर को राष्ट्रीय पक्षी तथा बाघ को राष्ट्रीय पशु घोषित किया गया है। उसी प्रकार राजस्थान में रोहिड़ा को राज्य पुष्प, खेजड़ी को राज्य वृक्ष, गोडावण को राज्य पक्षी एवं चिंकारा को राज्य पशु घोषित किया गया है। हाल ही में ऊँट को राज्य पशु घोषित करके उसे राजकीय संरक्षण देने का निर्णय लिया गया है। इस कानून को अभी राष्ट्रपति से स्वीकृति मिलनी शेष है। राज्य-पशु, राज्य-पक्षी एवं राज्य-वृक्ष, राज्य की पर्यावरणीय चेतना के परिचायक हैं।

    राज्य-पुष्प : रोहिड़ा

    यह उष्ण एवं उपोष्ण कटिबंधीय वन क्षेत्रों का वृक्ष है तथा पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्रों में बहुतायत से पाया जाता है। इस वृक्ष पर दो रंगों के पुष्प मिलते हैं। कुछ वृक्षों पर चटक केसरिया तो कुछ वृक्षों पर पीले रंग के फूल लगते हैं। इसके पुष्पों में सुगंध नहीं होती। यह पुष्प मार्च-अप्रेल में खिलता है। जिन दिनों में यह पुष्प खिलता है उन दिनों में पूरा जंगल इसके रंगों की छठा से खिल उठता है। रोहिड़ा वृक्ष को रेगिस्तानी सागवान भी कहा जाता है। इससे कलात्मक खुदाई वाले फर्नीचर बनाये जाते हैं। इसकी लकड़ी बहुत से वाद्ययंत्रों को बनाने में काम आती है। झौंपड़ों को आकार एवं मजबूती देने के लिये अरणी एवं आक की लकड़ी के साथ रोहिड़ा की लकड़ी का प्रयोग किया जाता है।

    राज्य वृक्ष : खेजड़ी

    खेजड़ी को मरुस्थल की रानी तथा मरुस्थल का कल्प वृक्ष भी कहते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम प्रोसोपिस सिनेरारिया है। संस्कृत साहित्य में इस वृक्ष को शमी कहकर पुकारा गया है। आज भी विजया दशमी के दिन रावण दहन से पूर्व शमी पूजन किया जाता है। महाभारत काल में भी इस वृक्ष का उल्लेख मिलता है। पाण्डवों ने अपने अज्ञात वास से पहले इसी वृक्ष पर अपने अस्त्र-शस्त्र छिपाये थे। अकाल के दिनों में भेड़-बकरियों, ऊँटों तथा अन्य पालतू पशुओं को यही पेड़ चारा उपलब्ध कराता है। किसानों द्वारा खेत में खेजड़ी के वृक्ष को नहीं काटा जाता है ताकि उनकी फसल को आवश्यक नाइट्रोजन मिल सके। सदियों के अनुभव ने उन्हें यह बता दिया है कि जिस खेत में खेजड़ी के जितने अधिक पेड़ होंगे, उनकी फसल उतनी ही अधिक अच्छी होगी। इसलिये खेजड़ी को कभी भी पूर्णतः नहीं काटा जाता है अपितु उसकी प्रति वर्ष छंगाई करके उनकी पत्तियां तथा लकड़ी प्राप्त की जाती है। इस पेड़ की फलियां सांगरियां कहलाती हैं जो सब्जी के रूप में खाई जाती हैं। अमृता देवी बिश्नोई तथा उनके साथियों ने इसी वृक्ष की रक्षा के लिये अपने प्राण न्यौछावर किये थे। कन्हैयालाल सेठिया ने खेजड़लो शीर्षक से लिखी कविता में खेजड़ी को मरुस्थल के सुख-दुःख का साथी बताया है-


    जेठ मास में धरती धोळी, फूस पानड़ो मिलै नहीं,

    भूखां मरता ऊंठ फिरै है, अै तकलीफां झिलै नहीं,

    इण मौके भी उण ऊंठा नै, डील चरावै खेजड़लो,

    अंग-अंग में पीड़ भरी पण, पेट भरावै खेजड़लो।

    म्हारै मुरधर रो है सांचो, सुख दुख साथी खेजड़लो।

    तिसां मरै पण छयां करै है, करड़ी छाती खेजड़लो।

    राज्य पक्षी : गोडावण

    इण्डियन ग्रेट बस्टर्ड (गोडावण सोहन पक्षी) को प्रदेश का राज्य पक्षी घोषित किया गया है। यह धरती पर रहने वाली बड़ी चिड़िया है जो छोटे शुतुरमुर्ग जैसी दिखती है। इसे राजस्थान में मालमोरड़ी भी कहते हैं। भूरे-सफेद रंग का यह पक्षी लगभग 18 किलोग्राम भारी होता है। मादा 90 से.मी. लम्बी होती है जबकि नर 120 से.मी. लम्बा होता है। ऊपरी भाग गहरा पीला होता है जिस पर महीन काली लहरियां बनी होती हैं। निचला भाग सफेद किन्तु वक्ष में नीचे की ओर एक चौड़ी काली पट्टी होती है। सिर पर काली कलंगी वाला मुकुट होता है। उड़ते समय, बाहर निकली हुई सफेद गर्दन और निचले भाग, काला मुकुट, गले की पट्टी एवं पंखों के किनारे बड़ा सफेद धब्बा स्पष्ट रूप से दिखता है। नर गोडावण के सिर पर ब्लैक क्राउन लंबा होता है जबकि मादा में ऐसा नहीं होता। मादा में गले की काली पट्टी या तो होती नहीं है और यदि होती है तो सिर्फ किनारों पर। मादा आकार में थोड़ी छोटी तथा वजन में लगभग आधी होती है।

    गोडावण घास के टुकड़ों एवं झाड-झंखाड़ वाले खुले क्षेत्रों में जहाँ खेत भी हों, में रहना पसन्द करती है। यह साधारणतः दो या तीन बच्चों के साथ टोलियों में रहती है। 20-25 गोडावण पक्षियों की टोलियां भी देखी गई हैं। यह काफी तेज भाग सकती है। इसका प्रजनन काल मार्च से सितम्बर के बीच होता है। नर पोलीगैमस (बहुगामी) होता है। एक नर 3 से 5 मादाओं के साथ संसर्ग करता है। प्रजनन काल में नर के गले के नीचे एक ग्रंथी काफी बड़े आकार की हो जाती है जो धरती तक लटकने लगती है। नर पक्षी, मादा को रिझाने के लिए उसके सामने पंख फैलाकर झूमते हुए नृत्य करता है। यह सेवण घास में सामान्यतः एक किन्तु कभी-कभी दो अण्डे देती है जो बादामी या फीके जैतूनी भूरे रंग के होते हैं और उन पर गहरे भूरे रंग की चित्तियाँ होती हैं। अण्डे झाड़ी के नीचे छिछला सा गड्ढा बनाकर उसमें दिये जाते हैं। मादा पक्षी अण्डे सेती है। लगभग एक शताब्दी पहले तक यह समूचे भारत में एक स्थानीय पक्षी की भांति पाया जाता था। 70 के दशक में जैसलमेर जिले में अरब के शहजादों ने उनका अंधाधुंध शिकार किया। अब यह केवल राजस्थान, गुजरात एवं महाराष्ट्र के कुछ भागों में ही पाया जाता है। दो दशक पहले लगभग 1,260 गोडावण होने का अनुमान था किन्तु अब इनकी संख्या 1,000 से भी कम रह गई है जिसमें से भी अधिकतर राजस्थान के राष्ट्रीय मरु उद्यान (बाड़मेर-जैसलमेर), अजमेर जिले में सोंकलिया क्लोज्ड एरिया एवं बारां जिले के सोरसन क्लोज्ड एरिया में पाई जाती है। गोडावण के संरक्षण के लिये राजस्थान सरकार द्वारा ऑपरेशन बस्टर्ड तथा जीन पूल संरक्षण अभियान चलाया जा रहा है।

    राज्य पशु : चिंकारा

    चिंकारा को एंटीलोप (छोटा हिरण) भी कहते हैं। यह हल्के भूरे अखरोटी रंग का सुन्दर जानवर है। भोले मुँह और सुन्दर चक्राकार सींग वाले इस पशु के पेट के नीचे का भाग सफेद होता है। घास, फल और पेड़-पौधों की पत्तियाँ इसका मुख्य भोजन है। इसकी पूंछ छोटी और काली होती है जिसे यह हर समय हिलाता रहता है। इसे संरक्षण देने की दृष्टि से राजस्थान सरकार ने चिंकारा को राजकीय पशु घोषित किया है। यह लगभग पूरे प्रदेश में पाया जाता है। चिंकारा को राष्ट्रीय उद्यान रणथम्भौर, सरिस्का, कुम्भलगढ़, जयसमन्द (उदयपुर), सीतामाता वन विहार, राष्ट्रीय मरु उद्यान जैसलमेर, कैला देवी एवं जवाहर सागर (कोटा) अभयारण्यों में स्वच्छन्द विचरण करते हुए देखा जा सकता है। राज्य में संरक्षित एवं असंरक्षित वन्यजीव क्षेत्रों में लगभग 35 हजार चिंकारे होने का अनुमान है।

    राज्य पशु : ऊँट

    राजस्थान के इतिहास, सामाजिक जीवन एवं अर्थव्यवस्था में ऊँट का बड़ा योगदान है। 2007 की पशुगणना में राज्य में 4,21,836 ऊँट पाये गये। प्रति वर्ष ऊँट के राज्य से बाहर भेजे जाने तथा मांस हेतु काट दिये जाने के कारण इनकी संख्या लगातार घट रही है। इसे देखते हुए राज्य सरकार ने वर्ष 2014 में इसे राज्य पशु घोषित किया है ताकि इसे भी चिंकारा की तरह संरक्षण मिल सके। ऊँट की जैसलमेरी, बीकानेरी एवं जोधपुर नस्लें अधिक प्रसिद्ध हैं। ऊँट को रेगिस्तान का जहाज भी कहते हैं। उसके पैरों में खुरों के स्थान पर गद्दियां (पैड) लगी होती हैं जिनके कारण वह बड़े-बड़े रेतीले टीलों में धंसता नहीं है तथा सरपट दौड़ता चला जाता है।

    कंटीली झाड़ियां खाकर जीवित रहने वाले इस पशु के पेट में जल संग्रहण की थैलियां होती हैं जिनके कारण एक बार पानी ली लेने के बाद ऊँट कई दिनों तक बिना पानी पिये रह सकता है। आजादी के पहले रेगिस्तानी डाकू तथा आजादी के बाद रेगिस्तानी तस्कर इस पशु का प्रयोग बड़े पैमाने पर करते रहे हैं। इस क्षेत्र में तैनात बी.एस.एफ. के जवान तथा पुलिस बल भी उँटों का प्रयोग करते हैं। रेगिस्तान की विरल बस्तियों मंम डाक तथा दवा पहुँचाने के लिये उँटों की पीठ पर चलते-फिरते डाकखानों तथा औषधालयों की स्थापना की गयी है। उँटों की पीठ पर चलती-फिरती बैंक शाखायें भी चल रही हैं। राइका जाति के लोग उँटों के विशाल झुण्ड पालते हैं तथा अकाल की स्थिति में मारवाड़ छोड़कर मालवा की ओर चले जाते हैं। मादा ऊँट के दूध में विटामिन, खनिज लवण, पोषक तत्व तथा घावों को भरने की अपार क्षमता है। यह दूध पारम्परिक दूध की तुलना में थोड़ा खारा होता है। गाय के दूध की अपेक्षा इसमें तीन गुना अधिक विटामिन सी और दस गुना अधिक आयरन होता है। विटामिन बी का यह अच्छा स्रोत है। इसमें उच्च स्तरीय पोषक तत्व मौजूद हैं। इस दूध के कुछ तत्व कैंसर, एचआईवी, एड्स अल्जाइमर और हैपेटाइटिस सी से लड़ने में सक्षम हैं। इसके सेवन से मधुमेह तथा हृदय रोग से लड़ने में भी सहायता मिलती है। इस दूध में वसा की मात्रा केवल 1.85 प्रतिशत ही होती है। जबकि गाय के दूध में लगभग 5 प्रतिशत होती है। मादा ऊँट के दूध में मलाई कम पड़ती है तथा इसे 48 घण्टे तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

    बीकानेर स्थित राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र बीकानेर द्वारा मादा ऊँट के दूध से आइसक्रीम, पाश्चुराइज्ड दूध, दही और खीर का उत्पादन किया जाता है। मादा ऊँट का दूध शुद्ध तथा पाश्चुराइज्ड रूप में जयपुर, दिल्ली तथा बीकानेर में कैमल मिल्क के नाम से बेचा जा रहा है। यूरोपीय देशों एवं अमरीका में भी मादा ऊँट के दूध की मांग है।

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  • राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : रियासती काल के इतिहास प्रसिद्ध व्यक्ति

     22.12.2021
    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी  : रियासती काल के इतिहास प्रसिद्ध व्यक्ति

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी - 204

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : रियासती काल के इतिहास प्रसिद्ध व्यक्ति

    1. प्रश्न - वीर दुर्गादास

    उतर- ये मारवाड़ राज्य के जागीरदार आसकरण के पुत्र थे। अद्भुद वीरता के बल पर इन्होंने पितृहीन अजीतसिंह को औरंगजेब के चंगुल से छुड़वाया और फिर से मारवाड़ की गद्दी पर बैठाया। जब अजीतसिंह ने इन्हें देश निकाला दे दिया तो ये उज्जैन चले गये जहाँ 16 मई 1718 को क्षिप्रा नदी के तट पर इनका निधन हुआ। आज भी क्षिप्रा के तट पर इनकी स्मृति में बनी ‘राठौड़ की छतरी’ खड़ी है।

    2. प्रश्न - धन्ना भगत

    उतर- इनका जन्म ई.1615 में अजमेर के निकट धुअण गाँव में हुआ। ये जाति से जाट थे तथा संत रामानंद के प्रसिद्ध शिष्यों में से थे। भक्तमाल में इनकी भक्ति की अनेक कथाओं का उल्लेख है। इनके शिष्य धन्नावंशी कहलाते हैं। मान्यता है कि एक बार स्वयं भगवान ने उनका खेत बोया।

    3. प्रश्न - भीखणजी

    उतर- तेरह पंथ के प्रवर्तक भीखणजी का जन्म ई.1726 में पाली जिले के कंटालिया में हुआ। इन्होंने अपने तेरह शिष्यों से जैन धर्म में तेरह पंथ की स्थापना की। पंच महाव्रत, पाँच सुमति और तीन गुप्ति को मिलाकर तेरह नियम बनाये। ई.1803 में इनका निधन हुआ।

    4. प्रश्न - मंडन सूत्रधार

    उतर- मेवाड़ राज्य के कुशल शिल्पी मंडन सूत्रधार ने कुंभलगढ़ के देवालयों का निर्माण किया। वे महाराणा कुंभा के समकालीन थे। भवन निर्माण कला पर इनके कई ग्रंथ हैं। इनमें रूप मंडन, प्रासाद मंडन, वास्तु मंडन, कोदंड मण्डन, राज वल्लभ, रूपावतार अधिक प्रसिद्ध है। चित्तौड़ के दुर्ग में स्थित कीर्तिस्तंभ मंडन मिश्र एवं उसके पुत्रों का बनाया हुआ है।

    5. प्रश्न - मुकुनदास खींची

    उतर- जोधपुर नरेश जसवंतसिंह प्रथम के विश्वासप्राप्त सेनापति। जब औरंगजेब ने जसवंतसिंह की मृत्यु के बाद जसवंतसिंह की रानियों एवं पुत्र अजीतसिंह को कैद कर लिया तब दुर्गादास तथा गोरा धाय के साथ मुकुनदास खींची ने राजकुमार को औरंगजेब के चंगुल से निकालने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। जब औरंगजेब ने मारवाड़ खालसा कर लिया तब भी मुकुनदास खींची ने मारवाड़ को मुसलमानों की दाढ़ में जाने से बचाया। मारवाड़ में आज भी इस वीर पुरुष का नाम बड़े आदर से लिया जाता है।

    6. प्रश्न - लोहलंगरी महाराज

    उतर- मारवाड़ के सेनापति जीवणदास राठौड़ स्वाभिमानी व्यक्ति थे। जब जोधपुर की राजकुमारी ने अकबर के साथ विवाह करने का प्रस्ताव किया तो जीवणदास राठौड़ ने अकबर का विरोध किया। इस पर जीवणदास को बड़ा अपमान सहना पड़ा। जीवणदास ने दुनियादारी छोड़कर गलताजी के महात्मा कृष्णदासजी का शिष्यत्व स्वीकार कर लिया। गुरु की शिक्षा से ये अत्यंत विद्वान हो गये तथा सौराष्ट्र में धर्म प्रचार करने लगे। इन्होंने मानवता की बड़ी सेवा की। गोंडले गाँव के पास गोंडले नदी के तट पर आज भी इनका मंदिर बना हुआ है। इस मंदिर में लोहे की नाल व सांकलें बांधी जाती थीं इसलिये इनका नाम लोहलंगरीजी महाराज पड़ा।


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  • संक्षिप्त जीवन वृत्तांत - श्री भैरोंसिंह शेखावत

     02.06.2020
    संक्षिप्त जीवन वृत्तांत - श्री भैरोंसिंह शेखावत

    संक्षिप्त जीवन वृत्तांत - श्री भैरोंसिंह शेखावत 

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    नाम
    - श्री भैरोंसिंह शेखावत

    जन्म - 23 अक्टूबर 1923

    पिता का नाम - श्री देवीसिंह शेखावत

    माता का नाम - श्रीमती बन्नेकंवर

    गांव - खाचरियावास (सीकर जिला)

    ननिहाल - सहनाली बड़ी गांव (चूरू जिला)

    प्रारंभिक शिक्षा - बीछीदाना गांव में (सीकर जिला)

    हाईस्कूल शिक्षा - एंग्लोवैदिक स्कूल जोबनेर

    विवाह - 3 जुलाई 1941

    पत्नी का नाम - श्रीमती सूरजकंवर

    ससुराल - बुचकला (जोधपुर जिला)

    पिता का निधन - ई.1942

    नौकरी - ई.1942 से 1952

    पद - सीकर ठिकाणे की पुलिस में असिस्टेण्ट सब इंसपैक्टर

    राजनीति में प्रवेश - ई.1952

    पहली बार विधायक - ई.1952 में जनसंघ के टिकट पर दांतारामगढ़ सीट से।

    दूसरी बार विधायक - ई.1957 में जनसंघ के टिकट पर श्रीमाधोपुर सीट से।

    तीसरी बार विधयक - ई.1962 में जनसंघ के टिकट पर किशनपोल सीट से।

    चौथी बार विधायक - ई.1967 में जनसंघ के टिकट पर किशनपोल सीट से।

    राज्यसभा सदस्य - ई.1974 से 1977 तक जनसंघ के टिकट पर मध्यप्रदेश

    पांचवीं बार विधायक - ई.1977 में जनता पार्टी के टिकट पर छबड़ा सीट से।

    पहली बार मुख्यमंत्री - 22 जून 1977 से 15 फरवरी 1980

    छठी बार विधायक - ई.1980 में भाजपा के टिकट पर छबड़ा सीट से।

    पहली बार नेता प्रतिपक्ष - 15 जुलाई 1980 से 10 मार्च 1985

    सातवीं बार विधायक - ई.1985 में भाजपा के टिकट पर निंबाहेड़ा तथा अजमेर

    दूसरी बार नेता प्रतिपक्ष - 28 मार्च 1985 से 30 दिसम्बर 1989

    आठवीं बार विधायक -  ई.1990 में भाजपा के टिकट पर धौलपुर तथा छबड़ा 
    सीट से। बाद में अजमेर सीट छोड़ दी।

    दूसरी बार मुख्यमंत्री - 4 मार्च 1990 से 15 दिसम्बर 1992

    नौवीं बार विधायक - ई.1993 में भाजपा के टिकट पर बाली सीट से।

    तीसरी बार मुख्यमंत्री - 4 दिसम्बर 1993 से 31 दिसम्बर 1998

    दसवीं बार विधायक - ई.1998 में भाजपा के टिकट पर बाली सीट से।

    तीसरी बार नेता प्रतिपक्ष - 8 जनवरी 1999 से 18 अगस्त 2002

    भारत के 11वें उपराष्ट्रपति -19 अगस्त 2002 से 21 जुलाई 2007

    निधन - 15 मई 2010, जयपुर।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-33

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-33

    पक्षी प्रेम की मिसाल है खीचण


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    जोधपुर जिले में फलौदी के निकट खीचण गांव में कुरजां (कुरजां) पक्षियों के झुण्ड प्रति वर्ष प्रवास करने आते हैं। यहाँ नदी, झील अथवा चारागाह जैसी कोई सुविधा नहीं है। प्राकृतिक आवास के नाम पर केवल एक छोटा तालाब, रेत के धोरे और कंकरीला मैदान स्थित हैं। फिर भी ये पक्षी सदियों से इस गांव में आ रहे हैं। कुरजां पक्षी, सारस प्रजाति का सदस्य है जिसे अंग्रेजी में 'डेमोजल क्रेन' कहते हैं। शीतकाल में जब उत्तरी रूस, उक्रेन तथा कजाकिस्तान में बर्फ जमने लगती है तो वहाँ निवास करने वाले हजारों-लाखों कुरजां पक्षी पश्चिमी भारत में स्थित राजस्थान तथा गुजरात राज्यों के लिये उड़ जाते हैं।

    सितम्बर-अक्टूबर में कुरजां पक्षियों के झुण्ड पश्चिमी राजस्थान के छह जिलों के सत्रह स्थानों पर पड़ाव डालते हैं। इनमें से पन्द्रह से बीस हजार कुरजां खीचण गांव में आकर बसेरा करते हैं। इन पक्षियों के झुण्ड गांव के पूर्व की तरफ बने तालाब के पेटे में उतरते रहते हैं। ग्रामीणों द्वारा गांव के पश्चिम में बनाये गये चुग्गाघर का गोदाम अनाज से भर दिया जाता है। कुरजां को हिंसक पशुओं से बचाने के लिये ग्रामीणों ने तारबंदी युक्त बाड़ा बनाया है। इस गांव में कुरजां को नवम्बर से फरवरी के बीच 90 मैट्रिक टन अनाज चुग्गे के रूप में डाला जाता है।

    खींचन गांव में आने वाली कुरजांओं से खींचन के निवासियों ने काव्यमय संवाद स्थापित कर लिये हैं-


    भर मुट्ठी दूं रोज कै, कुरजां थानैं जवार।

    चुगनैं मती विसारजै, ओ खींचन को प्यार।।

    आती संदेसो देसस्यूं, जाती थकै ले जाऊँ।

    बाट जोइजै गोरड़ी, पर बरस पाछी आऊँ।

    उड़ती कठां सूं आई तूं, अर उड़र जावै कठै।

    बारों मास लड़ावस्यां, रेहजा कुरजां अठै।

    आ निरख्योड़ी कांकरी, वा धोरां री रेत।

    पाछी बेगी आवस्यूं, थांसूं पड़ग्यो हेत।

    सूती थी रंग महल में, सूतोड़ी नै आयो रे जंजाल।

    कुरजां ए म्हारो भंवर मिला दीजौ ऐ।

    खींचन में आई कुरजाओं का विवरण

    वर्ष 1983 से 1999 की अवधि में खींचन में आने वाली कुरजाओं का अभिलेख रखा गया। वर्तमान में खींचन में प्रतिवर्ष लगभग 20 हजार कुरजाएं आती हैं।

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