Blogs Home / Blogs / /
  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-39

     19.05.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-39

    पर्यावरण के पुजारी : बिश्नोई


    अरावली पवर्तमाला के पश्चिमी भाग में बिश्नोई जाति निवास करती है। ये लोग विष्णु-भक्त हैं तथा जाम्भोजी के अनुयायी हैं। यह जाति, बीस और नौ (कुल उन्तीस) नियमों का पालन करने के कारण बिश्नोई कहलाती है। इनकी पूजा पद्धति में यज्ञ करने पर विशेष जोर दिया जाता है। यह जाति प्रकृति प्रेमी तथा अहिंसा की पुजारी है। जिन गाँवों में बिश्नोई जाति के लोग निवास करते हैं, उन गाँवों के निकट कोई व्यक्ति शिकार नहीं कर सकता। इस कारण राजस्थान में हिरण, नीलगाय तथा खरगोश आदि पशु निर्भय होकर विचरण करते हैं। ये लोग बकरों को भी नहीं काटते तथा उनके समूह को थाट में डाल देते हैं। थाट में रहने वाले बकरे अवध्य होते हैं।

    राजस्थान के पर्यावरण की रक्षा का बहुत बड़ा श्रेय इस अकेले समुदाय को जाता है। ये लोग वन्य पशुओं का शिकार करने वालों से निहत्थे ही भिड़ जाते हैं तथा कई बार इन्हें अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ता है। विश्व के किसी अन्य स्थान पर इस तरह का उदाहरण मिलना कठिन है। ये लोग इस उक्ति को अपना जीवन बलिदान करके चरितार्थ कर रहे हैं- सिर सांटे रूंख रहे तो भी सस्तो जांण। जांभोजी नागौर जिले के पीपासर गाँव में ई.1451 में पंवार राजपूत वंश में बिश्नोईयों के धर्मगुरु जांभोजी का जन्म हुआ। उनका जन्म कृष्ण जन्माष्टमी के दिन हुआ था। इसलिये माता हंसादेवी उन्हें कृष्णजी का अवतार मानती थीं। पीपासर में जांभोजी का जन्म स्थान तथा एक मंदिर भी बना हुआ है।

    जांभोजी ने बीकानेर जिले की नोखा तहसील के मुकाम गाँव के पास समराथल धोरा में तपस्या की थी। उन्होंने यहीं पर समाधि ली। यहाँ उनका एक मंदिर है। मुकाम में प्रतिवर्ष फाल्गुन और आसोज की अमावस्या को मेला लगता है। जांभाजी ने विश्नोई संप्रदाय का प्रवर्तन किया तथा विपुल संत साहित्य की रचना की। ये रचनाएं पद्य में हैं। जांभोजी के उपदेशों से पश्चिमी राजस्थान का ग्रामीण समाज विशेष रूप से प्रभावित हुआ तथा हजारों की संख्या में लोग उनके अनुयायी हो गये।

    राजस्थान, हरियाणा एवं पंजाब में उनके शिष्यों की संख्या काफी थी। उनके शिष्यों में जाट जाति के लोगों की संख्या अधिक थी। जांभोजी को वैदिक देवता विष्णु का अवतार माना जाता है। उनके 29 उपदेश और 120 शब्दों का संग्रह जम्ब सागर में संग्रहीत है जो इनका प्रमुख धार्मिक ग्रंथ है। जांभोजी के अनुसार ईश्वर सर्वव्यापक है और आत्मा अमर है। यदि आत्मा को वश में कर लिया जाये तो मुक्ति का मार्ग खुल जाता है। वे कर्मफल के सिद्धांत को मानते हैं तथा मोक्ष की प्राप्ति हेतु गुरु का होना आवश्यक मानते हैं। जांभोजी के अनुसार अच्छे व्यक्ति में सत्य, अहिंसा, शील, संतोष, तप, दया और क्षमा के गुणों का होना अनिवार्य है। वे भगवान विष्णु की भक्ति पर जोर देते थे तथा विधवा विवाह के समर्थक थे।

    उन्होंने हिन्दू तथा मुस्लिम धर्म में व्याप्त आडंबरों की आलोचना की, जाति व्यवस्था को नकारा, मूर्ति पूजा का निषेध किया तथा तीर्थ यात्रा का भी विरोध किया। उन्होंने शरीर पर राख लगाने, बड़ी-बड़ी जटायें रखने, कान छेदने, सिर का मुण्डन करवाने तथा कड़ा पहनने का भी विरोध किया। कुछ विद्वानों की मान्यता है कि विश्नोई धर्म की बीस और नौ शिक्षाएं वैष्णव, जैन व इस्लाम धर्म से ली गयी हैं तथा उन पर कबीर की छाप दृष्टिगोचर होती है।


    खेजड़ली की बलिदान गाथा

    जोधपुर से 28 किलोमीटर दूर स्थित खेजड़ली गाँव, वृक्ष-प्रेम की अनोखी कहानी के लिये पूरे प्रदेश में प्रसिद्ध हुआ। यह बिश्नाई जाति बहुल क्षेत्र है। ई.1787 में जोधपुर के राजा अभयसिंह के कर्मचारियों ने राजकीय कार्य के लिये लकड़ी प्राप्त करने हेतु खेजड़ी के हरे वृक्षों को काटना आरंभ किया। इस पर बिश्नोई जाति की महिला अमृता देवी बेनीवाल ने कर्मचारियों का विरोध किया। कर्मचारी नहीं माने तो अमृता वृक्ष से लिपट गयी। कर्मचारियों ने उसे भी वृक्ष के साथ ही काट दिया। इस पर बिश्नोई जाति के स्त्री पुरुष घरों से बाहर निकल आये और वे भी पेड़ों से चिपक गये। इस पर 363 स्त्री-पुरुषों को काट दिया गया। किसी तरह यह सूचना राजा तक पहुंची।

    राजा ने यह नर संहार रुकवाया तथा राजाज्ञा प्रसारित करवाई कि बिश्नोई जाति बहुल गाँवों में कोई हरा पेड़ नहीं काटा जायेगा। इस घटना की स्मृति में खेजड़ली गांव में हर वर्ष बड़ा मेला भरता है। राज्य सरकार द्वारा वृक्ष सेवा के लिये प्रति वर्ष अमृता देवी पुरस्कार दिया जाता है जो राजस्थान का अति सम्मानित पुरस्कार है।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • अध्याय - 9 वैदिक सभ्यता एवं साहित्य

     19.05.2020
    अध्याय - 9 वैदिक सभ्यता एवं साहित्य

    वैदिक सभ्यता एवं साहित्य


    न मुझे दाहिने का ज्ञान है और न बाएं, न मैं पूर्व दिशा को जानता हूँ और न पश्चिम को। मेरी बुद्धि परिपक्व नहीं है, मैं हताश तथा व्याकुल हूँ। यदि आप मेरा पथ प्रदर्शन करें तो मुझे इस प्रसिद्ध अभय ज्योति का ज्ञान हो जाएगा। -नासदीय सूक्त, ऋग्वेद।


    प्राचीन आर्यों की बस्तियां यूरोप से लेकर मध्य एशिया एवं भारत में सप्त-सिंधु प्रदेश तथा सरस्वती के तट तक पाई गई हैं किंतु आर्यों की सभ्यता का इतिहास निश्चत रूप से इन बस्तियों से भी पुराना है। आर्यों का प्राचीनतम साहित्य ई.पू. 2500 से मिलना आरम्भ हो जाता है किंतु संभव है कि भारत में आर्य इस अवधि से भी पहले से रह रहे हों। प्राचीन आर्य संस्कृति के बारे में जानने के दो तरह के स्रोत उपलब्ध हैं-

    (1.) पुरातत्त्व सामग्री: मृदभाण्ड, मुद्राएं, अस्त्र-शस्त्र, भवनावशेष आदि।

    (2.) वैदिक साहित्य: वेद, ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक, उपनिषद, सूत्र।

    वैदिक-काल

    वैदिक-काल, उस काल को कहते हैं जिसमें आर्यों ने वैदिक ग्रन्थों की रचना की। ये ग्रन्थ एक दूसरे से सम्बद्ध हैं और इनका क्रमिक विकास हुआ है। सबसे पहले ऋग्वेद तथा उसके बाद अन्य वेदों की रचना हुई। वेदों की रचना के बाद उनकी व्याख्या करने के लिए ब्राह्मण-ग्रन्थ रचे गए। वेदों तथा ब्राह्मण-ग्रन्थों की संख्या और उनका स्वरूप जब इतना विशाल हो गया कि उन्हें कंठस्थ करना कठिन हो गया तो उन्हें संक्षिप्त स्वरूप देने के लिए सूत्रों की रचना हुई।

    इस सम्पूर्ण वैदिक साहित्य की रचना में सहस्रों वर्ष लगे। विद्वानों की मान्यता है कि वैदिक साहित्य की रचना ई.पू.4,000 से ई.पू.600 के बीच हुई। इसलिए इस काल को वैदिक-काल कहा जाता है तथा इस काल की आर्यों की सभ्यता को वैदिक सभ्यता कहा जाता है।

    वैदिक सभ्यता का काल विभाजन

    वैदिक-काल को दो भागों में विभक्त किया गया है-

    (1) ऋग्वैदिक-सभ्यता ( ई.पू.4,000 से ई.पू.1000 ): चारों वेदों में ऋग्वेद सर्वाधिक प्राचीन है। इसलिए ऋग्वेद की सभ्यता सर्वाधिक पुरानी है। ऋग्वेद के रचनाकाल के बारे में विद्वानों में मतभेद हैं। पी. वी. काणे आदि कुछ विद्वान इस ग्रंथ को ई.पू.4000 से ई.पू.2500 के बीच रचा गया मानते हैं तो मैक्समूलर आदि विद्वान इसका रचना काल ई.पू.2500 से ई.पू.1000 के बीच मानते हैं। ऋग्वेद काल में आर्य लोग सप्त-सिन्धु क्षेत्र (सिन्धु, सरस्वती, परुष्णी, वितस्ता, शतुद्रि, अस्किनी, विपाशा नदियों का क्षेत्र) में निवास करते थे। इस काल की सभ्यता को ऋग्वैदिक सभ्यता कहते हैं।

    (2) उत्तर-वैदिक सभ्यता (ई.पू.1000 से ई.पू.600): उत्तर-वैदिक काल में यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद् रचे गए। इनमें से अथर्ववेद की रचना ई.पू.1000 के आसपास हुई जबकि ब्राह्मण-ग्रंथ एवं आरण्यक ई.पू.600 तक रचे जाते रहे। उपनिषदों की रचना ई.पू. से ई.पू. के बीच हुई। इस काल में आर्य सभ्यता सरस्वती, दृशद्वती तथा गंगा नदियों के मध्य की भूमि में पहुँच गई थी और आर्यों ने छोटे-छोटे राज्य स्थापित कर लिए थे। इस प्रदेश का नाम कुरुक्षेत्र था। उत्तर-वैदिक-काल के आर्यों की सभ्यता का यहीं विकास हुआ। यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद की रचना इसी क्षेत्र में हुई। उत्तर-वैदिक-काल में ऋग्वैदिक सभ्यता का क्रमशः विकास होता गया और इसमें अनेक परिवर्तन होते चले गए।

    सूत्रकाल

    उत्तर-वैदिक ग्रंथों की रचना सूत्र-ग्रंथों की रचना के आरम्भ होने के साथ समाप्त होती है। सूत्रों की रचना ई.पू.600 से ई.पू.200 तक हुई। इस अवधि को सूत्रकाल कहा जाता है।

    वैदिक साहित्य

    वैदिक ग्रन्थों को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है- (1.) वेद अथवा संहिता (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद), (2.) ब्राह्मण-ग्रंथ (ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद), (3.) सूत्र (श्रौत सूत्र, गृह्य सूत्र और धर्म सूत्र)। प्रथम दो अर्थात् संहिता तथा ब्राह्मण-ग्रन्थों को श्रुति भी कहा गया है। श्रुति का अर्थ है जो सुना गया हो। प्राचीन आर्यों का विश्वास था कि संहिता और ब्राह्मण किसी मनुष्य की कृति नहीं थे।

    उनमें दिए गए उपदेशों को ऋषियों तथा मुनियों ने ब्रह्मा के मुख से सुना था। इसी से इन ग्रन्थों को श्रुति कहा जाता है। इन ग्रन्थों में दिए गए उपदेश ब्रह्म-वाक्य हैं इसलिए वे सर्वथा सत्य हैं। उन पर संदेह नहीं किया जा सकता। संहिता तथा ब्राह्मण-ग्रन्थों में जो उपदेश दिए गए हैं वे बहुत लम्बे हैं। अतः आर्य-विद्वानों ने जन-साधारण के लिए उपदेशों को संक्षेप में छोटे-छोेटे वाक्यों में लिख दिया। इन्हीं रचनाओं को 'सूत्र' कहते हैं। सूत्र का अर्थ है- 'संक्षेप में कहना।' इन ग्रन्थों में बड़ी-बड़ी बातें संक्षेप में लिखी गई हैं इसलिए इन्हें सूत्र कहा गया।

    (1.) वेद अथवा संहिता

    वेद संस्कृत की विद् धातु से निकला है जिसका अर्थ है- जानना अथवा ज्ञान प्राप्त करना। वेद उन ग्रन्थों को कहते हैं जो ज्ञान की प्राप्ति के एकमात्र साधन समझे जाते थे। वेद-वाक्य ब्रह्म-वाक्य होने के कारण चिरन्तन सत्य थे और उनके अनुसार जीवन व्यतीत करने से इहलोक तथा परलोक दोनों ही सुधरता था। अर्थात् इस संसार में सुख की प्राप्ति होती थी और मृत्यु हो जाने पर मोक्ष मिलता था।

    वेदों का भारतीयों के जीवन में बहुत बड़ा महत्त्व है। वेद भारतीय धर्म और संस्कृति का शाश्वत और अक्षय कोष हैं। वेदों को संस्कृत-साहित्य की जननी कहा जाता है। सिन्धु-घाटी की सभ्यता भारत की प्राचीनतम सभ्यता थी तथा आर्य-सभ्यता का निर्माण वैदिक आर्यों द्वारा किया गया था। वेदों को हम भारतीय समाज का प्राण कह सकते हैं जिसके बिना वह जीवित नहीं रह सकता था।

    वेदों के उपरान्त जितने साहित्य लिखे गए उन सब का आधार वेद ही है। वेदों की संख्या चार है- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद। प्राचीन आर्यों द्वारा केवल ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद की रचना की गई। इन्हें सम्मिलित रूप से 'वेद-त्रयी' अथवा 'त्रयी' कहा गया। अथर्ववेद बहुत बाद का है जो सबसे अन्त में लिखा गया। प्रारम्भ में वेदों का पठन-पाठन मौखिक था। विभिन्न आश्रमों के ऋषि-मुनि अपने-अपने ढंग से इनका पाठ करते थे। इस कारण विभिन्न पाठ-परम्पराएँ चल पड़ीं।

    गुरु-शिष्य परम्परा एवं पिता-पुत्र परम्परा द्वारा ये मंत्र ऋषि कुलों में स्थिर रहते थे और श्रुति द्वारा शिष्य, गुरु से या पुत्र, पिता से जानता था। इस कारण उन्हें श्रुति भी कहा जाता था। विविध ऋषिकुलों में जो विविध सूक्त, श्रुति द्वारा चले आते थे, धीरे-धीरे उन्हें संकलित किया जाने लगा। इस महत्त्वपूर्ण कार्य का प्रधान श्रेय महाभारत कलीन महर्षि वेदव्यास को है।

    उन्होंने वैदिक सूक्तों को एकत्रित करके ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्वेद को संहिता बद्ध किया। जब वेदों को लिखित रूप में संहिताबद्ध कर दिया गया तब इन्हें 'संहिता' कहा जाने लगा। संहिता का अर्थ होता है- संग्रह। चूँकि इन ग्रन्थों में मन्त्रों का संग्रह है, इसलिए इन्हें संहिता कहा गया।

    (1.) ऋग्वेद: यह दो शब्दों से मिलकर बना है- ऋक् तथा वेद। ऋक् का अर्थ होता है स्तुति-मन्त्र। स्तुति-मन्त्र को ऋचा भी कहते हैं। जिस वेद में स्तुति मन्त्रों अर्थात् ऋचाओं का संग्रह किया गया है उसे ऋग्वेद कहते हैं। सूर्य, वायु, अग्नि आदि ऋग्वेद के प्रधान देवता हैं। इसलिए ये ऋचाएँ इन्हीं देवताओं की स्तुति में लिखी गयीं। ऋचाओं का संग्रह किसी एक ऋषि ने नहीं किया। वरन् वे विभिन्न ऋषियों द्वारा विभिन्न समय में संकलित की गईं। ऋग्वेद दस मण्डलों अथवा भागों में विभक्त है।

    प्रत्येक मण्डल कई अनुवाकों में विभक्त है। अनुवाक् का अर्थ होता है जो बाद में कहा गया है। चूँकि इनका स्थान मण्डल के बाद है, इसलिए इन्हें अनुवाक् कहा गया है। प्रत्येक अनुवाक् कई सूक्तों में विभक्त है। सूक्त का अर्थ होता है अच्छी उक्ति अर्थात् जो अच्छी प्रकार कहा गया हो। ऋग्वेद में 10 मण्डल हैं जिनमें 1028 सूक्त हैं। प्रत्येक सूक्त कई ऋचाओं अर्थात् स्तुति-मन्त्रों में विभक्त है, ऋचाओं की कुल संख्या 10,580 है। प्रत्येक सूक्त के साथ किसी ऋषि और देवता का नाम भी मिलता है।

    वस्तुतः ऋषि ही उस सूक्त का रचयिता होता था। इस प्रकार के ऋषियों में गृत्समद, विश्वामित्र, वामदेव, अत्रि, भारद्धाज और वशिष्ठ के नाम उल्लेखनीय हैं। मंत्र रचयिता ऋषियों में कुछ स्त्रियों के नाम भी हैं जिनमें लोपामुद्रा, घोषा, शची, पौलोमी और काक्षवृति के नाम उल्लेखनीय हैं। पहले, नौवें तथा दसवें मण्डल के प्रत्येक सूक्त के रचनाकार अलग-अलग ऋषि हैं।

    सम्भवतः ये ऋषि वैदिक सूक्तों के मूल लेखकों के पुराण पुरुष हैं। नौवें मण्डल के सूक्त केवल सोम से सम्बद्ध हैं। कहीं-कहीं मण्डल के स्थान पर अष्टक शब्द का प्रयोग हुआ है। ऋग्वेद के अधिकांश सूक्त देव-स्तुति और प्रार्थना रूप में हैं तथा यज्ञ और कर्मकाण्ड प्रधान हैं। यज्ञों मंे सुगन्धित सामग्री की आहुति देकर आर्य ऋषि, देवताओं से लम्बी आयु, पुत्र-पौत्र और धन-धान्य की प्राप्ति तथा शत्रुओं का विनाश करने की प्रार्थना करते थे।

    ऋग्वेद आर्यों का प्राचीनतम ग्रन्थ है। इसकी रचना सम्भवतः 4,000 ई.पू. से 2,500 ई.पू. तक के काल में हुई थी। यद्यपि ऋग्वेद स्तुति-मन्त्रों का संग्रह है जिनका प्रधानतः धार्मिक तथा आध्यात्मिक महत्त्व है तथापि ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी इसका बहुत बड़ा महत्त्व है क्योंकि इस काल का इतिहास जानने के लिए यही ग्रन्थ एकमात्र साधन है। कुछ मन्त्रों से आर्यों के पारस्परिक तथा अनार्यों से किए गए युद्धों का पता लगता है।

    यह भारत ही नही, वरन् विश्व का सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ है। इसकी प्राचीनता के कारण ही भारत का मस्तक विश्व की समस्त संस्कृतियों में सबसे ऊँचा है। इसकी रचना सप्त-सिन्धु क्षेत्र में हुई। मैक्समूलर ने लिखा है- 'विश्व के इतिहास में वेद उस रिक्त स्थान की पूर्ति करता है जिसे किसी भी भाषा का कोई भी साहित्यिक ग्रन्थ नहीं भर सकता। यह हमें अतीत के उस काल में पहुँचा देता है जिसका कहीं अन्यत्र उल्लेख नहीं मिलता और उस पीढ़ी के लोगों के वास्तविक शब्दों से परिचित करा देता है जिसका हम इसके अभाव में केवल धुधंला ही मूल्यांकन कर सकते थे।'

    (2.) यजुर्वेद: यह दो शब्दों से मिलकर बना है- यजुः तथा वेद। यज् शब्द का अर्थ होता है यजन करना। यजुः उन मन्त्रों को कहते थे जिसके द्वारा यजन अथवा पूजन किया जाता था अर्थात् यज्ञ किए जाते थे। इसलिए यजुर्वेद उस वेद को कहते हैं जिसमें यज्ञों का विधान है। मूलतः यह कर्म-काण्ड प्रधान ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में बलि की प्रथा, उसकी महत्ता तथा विधियों का वर्णन है। यजुर्वेद में सूक्तों के साथ-साथ अनुष्ठान भी हैं जिन्हें सस्वर पाठ करते जाने का विधान है।

    ये अनुष्ठान अपने समय की उन सामाजिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों के परिचायक हैं जिनमें इनका उद्गम हुआ था। यह ग्रन्थ दो भागों में विभक्त है। पहला भाग शुक्ल यजुर्वेद कहलाता है जो स्वतन्त्र रूप से लिखा गया है और दूसरा भाग कृष्ण यजुर्वेद कहलाता है जिसमें पूर्व साहित्य का संकलन है। शुक्ल यजुर्वेद को 'वाजसनेयी संहिता' भी कहते है। पाठ भेद के कारण इसकी दो शाखाएँ है- 'कृण्व' और 'माध्यन्दनीय'। कृष्ण यजुर्वेद की चार शाखाओं का उल्लेख मिलता है- काठक संहिता, कपिष्ठक संहिता, मैत्रेयी संहिता और तैतिरीय संहिता। इन सब में शुक्ल यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है।

    इसमें चालीस अध्याय हैं जिनमें से प्रत्येक का सम्बन्ध किसी न किसी याज्ञिक अनुष्ठान से है। अन्तिम अध्याय 'इशोपनिषद' है जिसका सम्बन्ध याज्ञिक अनुष्ठान से न होकर अध्यात्म चिन्तन से है। यजुर्वेद की रचना कुरुक्षेत्र में हुए थी। इस वेद की ऐतिहासिक उपयोगिता भी है। इसमें आर्यों के सामाजिक तथा धार्मिक जीवन की झांकी मिलती है।

    इस वेद से ज्ञात होता है कि अब आर्य, सप्त-सिन्धु से कुरुक्षेत्र में चले आए थे तथा अब प्रकृति-पूजा की उपेक्षा होने लगी थी और वर्ण-व्यवस्था का प्रादुर्भाव हो गया था। इस प्रकार यजुर्वेद, ऋग्वैदिक-काल के बाद, आर्यों के जीवन में आए परिवर्तनों को भी प्रकट करता है।

    (3.) सामवेद: साम के दो अर्थ होते हैं- शान्ति तथा गीत। यहाँ पर साम का अर्थ है गीत। इसलिए सामवेद का अर्थ हुआ वह वेद जिसके पद गेय हैं और जो संगीतमय हैं। सामवेद में केवल 66 मन्त्र नए हैं। शेष मंत्र ऋग्वेद से लिए गए हैं। सामवेद के मन्त्र गेय होने के कारण मन को शान्ति देते हैं। यज्ञादि अवसरों पर इन मन्त्रों का पाठ किया जाता है। पाठ-भेद के कारण इसकी तीन शाखाएँ हैं- कौथुम शाखा, राणायीनय शाखा और जैमिनीय शाखा।

    (4.) अथर्ववेद: 'अथ' का अर्थ होता है मंगल अथवा कल्याण, अथर्व का अर्थ होता है अग्नि और अथर्वन् का अर्थ होता है पुजारी। इसलिए अथर्ववेद उस वेद को कहते है जिसमें पुजारी मन्त्रों तथा अग्नि की सहायता से भूत-पिशाचों से रक्षा कर मनुष्य का मंगल अथवा कल्याण करते हैं। इसकी रचना प्रथम तीन वेदों की रचना के बहुत बाद में हुई। अथर्ववेद की दो शाखाएँ मिलती हैं- शौनक और पिप्लाद। इसमें चालीस अध्याय हैं और इसका सम्बन्ध मुख्यतः आर्यों के घरेलू जीवन से है।

    अथर्ववेद में बहुत से प्रेतों तथा पिशाचों का उल्लेख है जिनसे बचने के लिए मन्त्र दिए गए हैं। विपत्तियों और व्याधियों के निवारण के लिए भी मंत्र-तंत्र दिए गए हैं। ये मन्त्र जादू-टोने की सहायता से मनुष्य की रक्षा करतेे हैं। इस ग्रन्थ में कुछ मन्त्र ऋग्वेद के हैं और कुछ सामवेद के। यह आर्यों के पारिवारिक, सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन पर प्रकाश डालता है तथा इसमें आर्येतर लोगों के विश्वासों तथा प्रथाआंे की भी जानकारी मिलती है।

    (2.) ब्राह्मण ग्रंथ

    ब्राह्मण, 'ब्रह्म' शब्द से निकला है, जिसका अर्थ होता है वेद। इसलिए ब्राह्मण उन ग्रन्थों को कहते है जिनमें वैदिक मन्त्रों की व्याख्या की गई है। इनमें यज्ञों के स्वरूप तथा उनकी विधियों का वर्णन किया गया है। चूँकि यज्ञ करने तथा कराने का कार्य पुरोहित करते थे जो ब्राह्मण होते थे, इसलिए केवल ब्राह्मणों से संबंधित होने के कारण इन ग्रन्थों का नाम ब्राह्मण रखा गया। ब्राह्मण-ग्रन्थों की रचना 'ब्रह्मर्षि देश' में हुई थी।

    ब्राह्मण ग्रन्थों के दो भाग हैं- (1.) विधि और (2.) अर्थनाद अर्थात् आख्यानों, पुराणों और इतिहास द्वारा नियमों के अर्थ की व्याख्या। प्रत्येक वेद के अपने-अपने ब्राह्मण हैं। ऋग्वेद के कौषितकी या सांख्यायान और ऐतरेय ब्राह्मण हैं। कृष्ण यजुर्वेद का तैतिरीय ब्राह्मण तथा शुक्ल यजुर्वेद का शतपथ ब्राह्मण है। शतपथ ब्राह्मण एक विशाल ग्रन्थ है जिसमें एक सौ अध्याय हैं। इसके रचयिता याज्ञवल्क्य ऋषि हैं। इस ग्रंथ में याज्ञिक अनुष्ठानों का विस्तार से वर्णन है तथा विविध अनुष्ठानों के प्रयोजनों पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है।

    सामवेद के तीन ब्राह्मण हैं- ताण्ड्य ब्राह्मण, षडविश ब्राह्मण और जैमिनीय ब्राह्मण। सामवेद के छान्दोग्य के मंत्र ब्राह्मण एवं सामविधान ब्राह्मण हैं। अर्थवेद का गोपथ ब्राह्मण है।

    यद्यपि ब्राह्मण-ग्रन्थों की रचना याज्ञिकों के पथ-प्रदर्शन के लिए की गई थी तथापि इनसे आर्यों के सामाजिक, धार्मिक तथा राजनीतिक जीवन पर भी पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। ब्राह्मण-ग्रन्थों की रचना प्रधानतः गद्य में की गई है परन्तु कहीं-कहीं पद्य भी विरल रूप से मिलते हैं। इनकी भाषा परिष्कृत तथा उच्च कोटि की है। आरण्यक तथा उपनिषद् भी ब्राह्मण-ग्रन्थों के अन्तर्गत आते हैं। ब्राह्मणों के परिशिष्ट 'आरण्यक' कहलाते हैं और उनके अन्तिम भाग 'उपनिषद' हैं।

    आरण्यक: आरण्यक उन ग्रन्थों को कहते हैं जिनकी-रचना 'अरण्यों' अर्थात् 'जंगलों' के शान्त वातावरण में हुई और जिनका अध्ययन-चिन्तन भी जंगलों में एकान्तवास में किया जाना चाहिए। ये ग्रन्थ वानप्रस्थाश्रमियों के लिए होते थे। वानप्रस्थाश्रम में प्रवेश करने पर लोग जंगलों में चले जाते थे और वहीं पर चिन्तन तथा मनन किया करते थे। आत्मा क्या है, सृष्टि का निर्माण कैसे हुआ, सृष्टि किन तत्त्वों से बनी है, सृष्टि का नियन्त्रक कौन है, परमसत्ता का स्वरूप कैसा है, इस प्रकार के गूढ़ विषयों का चिन्तन आरण्यक ग्रन्थों में किया गया है। अध्यात्म-चिन्तन आरण्यक ग्रन्थों की सबसे बड़ी विशेषता है।

    उपनिषद्: यह तीन शब्दों से मिलकर बना है- उप$नि$षद्। उप का अर्थ होता है समीप, नि का अर्थ होता है नीचे और षद् का अर्थ होता है बैठना। इसलिए उपनिषद् उन ग्रन्थों को कहते हैं जिनका अध्ययन गुरु के समीप नीचे बैठकर श्रद्धापूर्वक किया जाना चाहिए। उपनिषद ब्राह्मण ग्रन्थ के अन्तिम भाग में आते हैं। ये ज्ञान प्रधान ग्रन्थ हैं। इनमें उच्च कोटि का दार्शनिक विवेचन मिलता है। उपनिषदों की तुलना में संसार में कोई अन्य श्रेष्ठ दार्शनिक ग्रन्थ नहीं है।

    उपनिषदों से हमें ज्ञात होता है कि इस युग में वर्ण तथा वर्णाश्रम व्यवस्था दृढ़ रूप से स्थापित हो गए थे तथा मानव की सभ्यता एवं संस्कृति में बहुत बड़ा परिवर्तन हो गया था। उपलब्ध उपनिषद ग्रन्थों की संख्या लगभग दो सौ है किन्तु उनमें से केवल बारह का स्थान महत्त्वपूर्ण है। उनके नाम हैं- ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैतिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक, कौषितकी और श्वेताश्वतर। अधिकांश उपनिषद ई.पू.1000 से ई.पू.300 के बीच की अवधि में रचे गए। विभिन्न काल-खण्डों में रचे जाने के कारण उपनिषदों की भाषा, कथन-शैली तथा वैचारिक पृष्ठभूमि में अंतर है।

    उपनिषदों का प्रमुख विषय 'दर्शन' है। वेदों में ज्ञान-मार्ग सम्बन्धी जो बातें पाई जाती है, उन्हीं का विकास आगे चलकर उपनिषदों के रूप में हुआ। वस्तुतः उपनिषद्, वेद के उन स्थलों की व्याख्या है जिनमें यज्ञों से अलग हटकर ऋषियों ने जीवन के गहन तत्त्वों पर विचार किया गया है। दूसरे शब्दों में, उपनिषद आर्य मस्तिष्क के धर्म से दर्शन की ओर झुकाव का परिणाम हैं।

    इनकी प्रवृत्ति उपासना से ध्यान की ओर, यज्ञ से चिन्तन की ओर तथा बाह्य प्रकृति की आराधना से अन्तरात्मा की खोज की ओर है। ये ब्रह्मज्ञान के श्रेष्ठतम ग्रन्थ हैं। आत्मा, ब्रह्म, मोक्ष तथा सृष्टि आदि के सम्बन्ध में उपनिषदों में व्यक्त विचार ही शंकर के दर्शन के मूल में है। उपनिषद ही वेदान्त के अन्य सम्प्रदायों- अद्वैत, द्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि को मूल सामग्री उपलब्ध करवाते हैं। गीता में भी उपनिषदों का सार है। बौद्ध और जैन मतों के अधिकांश सिद्धान्त भी इन्हीं पर आधारित हैं।

    वर्तमान समय में हिन्दू-धर्म के प्रमुख सिद्धान्त भी उपनिषदों से ही लिए गए हैं। जर्मन विद्वान शोपेन हावर ने लिखा है- 'सम्पूर्ण विश्व में उपनिषदों के समान जीवन को उँचा उठाने वाला कोई अन्य ग्रन्थ नहीं है। इनसे मुझे जीवन में शान्ति मिली है। इन्हीं से मृत्यु के समय भी शान्ति मिलेगी।'

    (3.) सूत्र

    सूत्र का शाब्दिक अर्थ होता है धागा। इसलिए सूत्र उन ग्रन्थों को कहते हैं जो इस प्रकार लिखे जाते थे मानो कोई चीज धागे में पिरो दी गई हो। और उनमें एक क्रम स्थापित हो गया हो। जब वैदिक साहित्य का रूप अत्यन्त विशाल हो गया तो उसे कंठस्थ करना बहुत कठिन हो गया। इसलिए एक ऐसी रचना-शैली का विकास किया गया जिसमें वाक्य तो छोटे-छोटे हों परन्तु उनमें बड़े-बड़े भावों तथा विचारों का समावेश हो। इन्हीं रचनाओं को सूत्र कहा गया। महर्षि पाणिनि ने सूत्रों की तीन विशेषताएँ बताई हैं-

    (1.) वे कम अक्षरों में लिखे जाते हैं,

    (2.) वे असंदिग्ध होते हैं और

    (3.) वे सारगर्भित होते हैं।

    सूत्र साहित्य के तीन भाग हैं- श्रौत सूत्र, गृह्य सूत्र और धर्म सूत्र। श्रौत सूत्रों में वैदिकयुगीन यज्ञों और उनके वर्गीकरण का समावेश है, गृह्य सूत्रों में गार्हस्थिक संस्कार, अनुष्ठान, आचार-विचार और कर्मकाण्ड का वर्णन है तथा धर्म सूत्रों में धार्मिक नियम, राजा-प्रजा के कर्त्तव्य और अधिकार, सामाजिक वर्ण प्रधान भेद, आश्रम आदि विभिन्न व्यवस्थाओं का उल्लेख है।

    सूत्रों में कल्प-सूत्र सर्वाधिक महत्त्व का है। सूत्रों की रचना करने वालों में महर्षि पाणिनि प्रमुख हैं। इन ग्रन्थों की रचना 700 ई.पू. से 200 ई.पू. के बीच हुई। सूत्रों में आर्यों के धार्मिक, सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन का भी पर्याप्त परिचय मिलता है।

    वेदांग

    विपुल वैदिक साहित्य को पढ़ने एवं उसके अर्थ को समझने के लिए शिक्षा, छन्द, निरुक्त, व्याकरण, ज्योतिष और कल्प नामक छः विधाएं बनाई गईं जिन्हें वेदांग कहते हैं। पाणिनी के अनुसार, व्याकरण वेद का मुख है, ज्योतिष नेत्र, निरुक्त श्रोत्र, कल्प हाथ, शिक्षा नासिका और छन्द दोनों पैर हैं।

    शिक्षा: इसमें वेद मन्त्रों के उच्चारण करने की विधि बताई गई है। अर्थात् वे मंत्रों में प्रयुक्त स्वरों, व्यंजनों एवं विशिष्ट ध्वनियों का उच्चारण कैसे किया जा सकता है, इसका अध्ययन वेदांग की 'शिक्षा' नामक शाखा में करवाया जाता है।

    कल्प: वेदों में यज्ञयाग आदि कर्मकांड के उपदेश आए हैं, किस यज्ञ में किन मंत्रों का प्रयोग करना चाहिए, किसमें कौन सा अनुष्ठान किस रीति से करना चाहिए, इत्यादि कर्मकांड की सम्पूर्ण विधि कल्पसूत्र ग्रंथों में है। इसलिए कर्मकांड की पद्धति जानने के लिए कल्पसूत्र ग्रंथों के अध्ययन की आवश्यकता होती है। यज्ञ यागादि का ज्ञान 'श्रौतसूत्र' से होता है और षोडश संस्कारों का ज्ञान 'स्मार्तसूत्र' से मिलता है। वैदिक कर्मकांड में यज्ञों का बहुत विस्तार है। प्रत्येक यज्ञ की विधि श्रौतसूत्र से देखनी होती है। इसलिए अनेक श्रौतसूत्र उपलब्ध हैं। स्मार्तसूत्र सोलह संस्कारों का वर्णन करते हैं, इसलिए ये भी पर्याप्त विस्तृत हैं। श्रौतसूत्रों में यज्ञयाग के नियम हैं और स्मार्तसूत्रों में अर्थात् गृह्यसूत्रों में उपनयन, जातकर्म, विवाह, गर्भाधान, आदि षोडश संस्कारों का विधि विधान दिया गया है। कल्प की तीसरी शाखा 'धर्मसूत्र' कहलाती है।

    व्याकरण: व्याकरण से प्रकृति और प्रत्यय आदि के योग से शब्दों की सिद्धि और उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित स्वरों की स्थिति का बोध होता है। आचार्य वररुचि ने व्याकरण के पाँच प्रयोजन बताए हैं- (1) रक्षा (2) ऊह (3) आगम (4) लघु तथा (5) असंदेह।

    (1) व्याकरण के अध्ययन का उद्देश्य वेदों की रक्षा करना है।

    (2) ऊह का अर्थ है-कल्पना। वैदिक मन्त्रों में न तो लिंग है और न ही विभक्तियाँ। लिंगों और विभक्तियों का प्रयोग वही व्यक्ति कर सकता है जो व्याकरण का ज्ञाता हो।

    (3) आगम का अर्थ है- श्रुति। श्रुति कहती है कि ब्राह्मण का कर्त्तव्य है कि वह वेदों का अध्ययन करे।

    (4) लघु का अर्थ है- शीघ्र उपाय। वेदों में अनेक ऐसे शब्द हैं जिनकी जानकारी एक जीवन में सम्भव नहीं है। व्याकरण वह साधन है जिससे समस्त शास्त्रों का ज्ञान हो जाता है।

    (5) असंदेह का अर्थ है- संदेह न होना। संदेहों को दूर करने वाला व्याकरण होता है, क्योंकि वह शब्दों का समुचित ज्ञान करवाता है।

    निरुक्त: वेदों में जिन शब्दों का प्रयोग जिन-जिन अर्थों में हुआ है, निरूक्त में उनके उन अर्थों का निश्चयात्मक रूप से उल्लेख किया गया है। शब्द की उत्पत्ति तथा व्युत्पत्ति कैसे हुई, यह निरुक्त बताता है। यास्काचार्य का निरुक्त प्रसिद्ध है। इसको शब्द-व्युत्पत्ति-शास्त्र भी कह सकते हैं। वेद का यथार्थ अर्थ समझने के लिए निरुक्त को जानने की अत्यंत आवश्यकता है।

    ज्योतिष: वेदमंत्रों में नक्षत्रों का जो वर्णन हुआ है, उसे ठीक प्रकार से समझने के लिए ज्योतिष शास्त्र का ज्ञान करवाया जाता है। इससे वैदिक यज्ञों और अनुष्ठानों का समय ज्ञात होता है। यहाँ ज्योतिष से अर्थ वेदांग ज्योतिष से है। अंतरिक्ष में सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि आदि ग्रह किस प्रकार गति करते हैं, सूर्य, चंद्र आदि के ग्रहण कब होंगे, अन्य तारकों की गति कैसी होती है आदि का ज्ञान ज्योतिष शास्त्र में करवाया जाता है।

    इस प्रकार वेदांगों का ज्ञान वेद का उत्तम बोध होने के लिए अत्यंत आवश्यक है।

    छन्द: वेदों में प्रयुक्त गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप्, त्रिष्टुप्, वृहती आदि छंदों का ज्ञान छंद-शास्त्र से होता है। इस शास्त्र में मुख्यतः यह बताया जाता है कि प्रत्येक छंद के पाद कितने होते हैं और ह्रस्व-दीर्घ आदि अक्षर प्रत्येक पाद में कैसे होने चाहिए। छन्द को वेदों का पाद, कल्प को हाथ, ज्योतिष को नेत्र, निरुक्त को कान, शिक्षा को नाक, व्याकरण को मुख कहा गया है-


    छन्दः पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते

    ज्योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते।

    शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम्

    तस्मात्सांगमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते।।

    दर्शन ग्रन्थ

    आर्यों ने अन्य कई महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों की भी रचना की, जिनका विश्व संस्कृति पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा। अनेक ऋषियों ने दर्शन-शास्त्र के ग्रंथों का निर्माण किया। प्रमुख भारतीय दर्शनों की संख्या छः है- (1.) कपिल मुनि का सांख्य-दर्शन, (2.) पतन्जलि का योग-दर्शन, (3.) कण्व का वैशेषिक दर्शन, (4.) गौतम का न्याय-दर्शन, (5.) जैमिनि का पूर्व मीमांसा दर्शन तथा (6.) बादरायण का उत्तर-मीमांसा दर्शन। हिन्दू-धर्म के अध्यात्मवाद का भवन षडदर्शन के इन्हीं छः स्तम्भों पर खड़ा है।

    महाकाव्य

    महाकाव्यों की रचना ई.पू.800 से ई.पू. 400 के बीच हुई। महाकाव्यों का आशय संस्कृत भाषा में लिखे दो महाकाव्यों से है- (1.) रामायण- इस ग्रंथ की रचना महर्षि वाल्मिीकि ने की। (2.) महाभारत- इस ग्रंथ की रचना महर्षि वेदव्यास ने की। महाभारत का एक अंश गीता कहलाता है जिसमें निष्काम कर्म करने का उपदेश दिया गया है। रामायण एवं महाभारत का हिन्दू-समाज पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा है। धर्मशास्त्रों तथा पुराणों का भी भारतीय समाज पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा है।

    स्मृतियाँ

    आर्यों ने स्मृतियों की भी रचना की। स्मृतियों में मनु स्मृति, याज्ञवलक्य स्मृति तथा नारद स्मृति प्रमुख हैं। मनुस्मृति की रचना शुंगकाल में ई.पू.200 से ई.पू.100 के बीच होनी अनुमानित है। याज्ञवलक्य स्मृति की रचना ईस्वी 100 से ईस्वी 300 के बीच होनी अनुमानित है। नारद स्मृति की रचना ई.100 से ई.400 के बीच होनी अनुमानित है। ई.400 से ई.600 की अवधि में कात्यायन स्मृति एवं वृहस्पति स्मृति की भी रचना हुई। ये दोनों ही स्मृतियां अब तक अप्राप्य हैं। कुछ स्मृतियां, यथा- पराशर स्मृति, शंख स्मृति, देवल स्मृति का रचना काल ई.600 से ई.900 के बीच का माना जाता है।

    पुराण

    प्रमुख पुराणों की संख्या 18 है जिनमें विष्णु-पुराण, शिव पुराण, स्कन्द पुराण तथा भागवत पुराण अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। वायु पुराण, विष्णु-पुराण, मार्कण्डेय पुराण, मत्स्य पुराण, कूर्म पुराण आदि प्रमुख पुराणों की रचना ई.300 से ई.600 के बीच हुई। अग्नि पुराण तथा गरुड़ पुराण की रचना ई.600 से ई.900 के बीच मानी जाती है। महाकाव्यों तथा पुराणों में वैदिक आदर्शों का प्रतिपादन किया गया है। अन्तर यह है कि महाकाव्यों में इसे मनुष्य के मुख से और पुराणों मे देवताओं के मुख से प्रतिपादित बताया गया है। 18 प्रमुख पुराणों के बाद 18 उप-पुराणों की रचना हुई। इनमें- आदि, आदित्य, बृहन्नारदीय, नन्दीश्वर, बृहन्नन्दीश्वर, साम्ब, क्रियायोगसार, कालिका, धर्म, विष्णुधर्मोत्तर, शिवधर्म, विष्णु धर्म, वामन, वारुण, नारसिंह, भार्गव और बृहद्धर्म पुराण सम्मिलित हैं।

    महापुराणों में वायु पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, मार्कण्डेय पुराण, विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण और भागवत पुराण सबसे पुराने हैं और इनमें उस काल तक की ऐतिहासिक जानकारी है जब गुप्त सम्राटों का राज्य मगध से लेकर अयोध्या और प्रयाग तक विस्तृत था।

    वैदिक साहित्य का महत्त्व

    (1.) विश्व इतिहास में सर्वोच्च स्थान: वैदिक ग्रन्थों का, विशेषतः ऋग्वेद का विश्व इतिहास में सर्वोच्च स्थान है। वेद विश्व के प्राचीनतम ग्रन्थ हैं। इनकी रचना भारत की पवित्र भूमि में हुई। इन ग्रन्थों के कारण विश्व की समस्त संस्कृतियों में भारत का मस्तक सबसे ऊँचा है। ये ग्रन्थ सिद्ध करते हैं कि भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति, विश्व में सर्वाधिक प्राचीन है। पूरे विश्व को भारतीय संस्कृति से आलोक प्राप्त हुआ।

    (2.) उत्कृष्ट जाति के इतिहास की झांकी: वैदिक साहित्य से, उत्कृष्ट आर्य-जाति की झांकी प्राप्त होती है। आर्यों का विश्व की विभिन्न जातियों में ऊँचा स्थान है। यह जाति शारीरिक बल, मानसिक प्रतिभा तथा आध्यात्मिक चिन्तन में अन्य जातियों से कहीं अधिक श्रेष्ठ रही है इसलिए जिन ग्रन्थों में इन आर्यों के जीवन की झांकी मिलती है वे निश्चय ही बड़े महत्त्वपूर्ण हैं।

    (3.) प्रारम्भिक आर्यों का इतिहास जानने का एकमात्र साधन: आर्यों के मूल-स्थान तथा उनके प्रारम्भिक जीवन का परिचय प्राप्त करने का एकमात्र साधन वैदिक ग्रन्थ हैं। यदि ये ग्रन्थ उपलब्ध न होते तो भारतीय आर्यों का सम्पूर्ण प्रारम्भिक इतिहास अन्धकारमय होता और उसका कुछ भी ज्ञान हमें प्राप्त नहीं हो सकता था।

    (4.) हमारे पूर्वजों के जीवन का प्रतिबिम्ब: वैदिक ग्रन्थ हमारे पूर्वजों के जीवन का प्रतिबिम्ब हैं। इनका अध्ययन करने से हमें अपने पूर्वजों के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक जीवन का परिचय मिलता है। यदि वैदिक ग्रन्थ न होते तो हमें भी किसी बर्बर तथा असभ्य जाति की सन्तान कहा जा सकता था परन्तु इन ग्रन्थों ने हमें अत्यन्त सभ्य तथा सुसंस्कृत जाति की सन्तान होने का गौरव प्रदान किया है।

    (5.) वैदिक धर्म के स्रोत: वैदिक साहित्य ही प्राचीन वैदिक आर्य का मूल स्रोत है।

    (6.) हमारी सभ्यता का मूलाधार: वैदिक ग्रन्थ ही हमारी सभ्यता तथा संस्कृति के मूलाधार तथा प्रबल स्तम्भ हैं। जिन आदर्शों तथा सिद्धान्तों का इन ग्रन्थों में निरूपण किया गया है वे आदर्श तथा सिद्धांत भारतीयों के जीवन के पथ-प्रदर्शक बन गए। इन ग्रन्थों ने हमारे जीवन को सुंदर सांचे में ढाल दिया। यद्यपि भारत पर अनेक बर्बर जातियों के आक्रमण हुए जिन्होंने इसको बदलने का प्रयत्न किया परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली। अनेक शताब्दियों के बीत जाने पर भी हमारे जीवन के आदर्श तथा सिद्धान्त वही हैं जिन्हें वैदिक ऋषियों तथा मुनियों ने निर्धारित किया था।

    (7.) हिन्दू-धर्म का प्राण: वैदिक ग्रन्थ हिन्दू-धर्म के प्राण हैं। हिन्दू-धर्म के मूल सिद्धान्तों का दर्शन हमें वैदिक ग्रन्थों में ही होता है। सम्पूर्ण वैदिक साहित्य वास्तव में धर्ममय है। इसका कारण यह है कि ऋषियों ने भौतिक जीवन की अपेक्षा आध्यात्मिक जीवन को अधिक महत्त्व दिया था। वे इस जगत को नाशवान तथा निस्सार समझते थे। इसी से उन्होंने जीवन के प्रत्येक अंग पर धर्म की छाप डाल दी। हमारे ऋषियों ने समाज को धर्म की एक ऐसे लकुटी प्रदान की जिसके सहारे यह समाज आज तक सुरक्षित चला आ रहा है।

    (8.) आध्यात्मिक विवेचन के कोष: वैदिक ग्रन्थ आध्यात्मिक विवेचन के विशाल कोष हैं। विश्व की किसी भी जाति के इतिहास में इतने विस्तृत तथा गहन रूप से आघ्यात्मिक विवेचन नहीं हुआ जितना वैदिक ग्रन्थों में हुआ है।

    (9.) हिन्दू समाज के स्तम्भ: वैदिक ग्रन्थों को हम हिन्दू समाज का स्तम्भ कह सकते हैं। वैदिक ऋषियों ने हमारे समाज को सुचारू रीति से संचालित करने के लिए दो व्यवस्थाएँ की थीं। इनमें से एक थी वर्ण-व्यवस्था और दूसरी थी वर्णाश्रम धर्म इन्हीं दोनों स्तम्भों पर भारतीय समाज को खड़ा किया गया था और इन्हीं का अनुसरण कर समाज का चूड़ान्त विकास किया जाना था।

    (10.) भारतीय भाषाओं की जननी: वैदिक ग्रन्थ संस्कृत भाषा में लिखे गए हैं। संस्कृत से ही भारत की अधिकांश भाषाएँ निकली हैं। भारत की समस्त भाषाओं पर संस्कृत का थोड़ा-बहुत प्रभाव अवश्य पड़ा है। वास्तव में आर्य-परिवार की समस्त भाषाएँ इसकी पुत्रियां हैं तथा संस्कृत उनकी जननी है।

    वैदिक सभ्यता तथा द्रविड़ सभ्यता में अन्तर

    वैदिक सभ्यता तथा द्रविड़ सभ्यता का तुलनात्मक अध्ययन करने पर इनमें कई अन्तर दिखाई देते हैं। मुख्य अंतर इस प्रकार से हैं-

    (1.) काल सम्बन्धी अन्तर: सिन्धु-घाटी की सभ्यता, वैदिक सभ्यता से अधिक प्राचीन है। माना जाता है कि सिन्धु-सभ्यता, वैदिक सभ्यता से लगभग दो हजार वर्ष अधिक पुरानी है। सिंधु घाटी सभ्यता ताम्र-कांस्य कालीन सभ्यता है जबकि वैदिक सभ्यता लौह युगीन सभ्यता है।

    (2.) नृवंशीय अंतर: द्रविड़ लोग छोटे, काले तथा चपटी नाक वाले होते थे परन्तु आर्य लोग लम्बे, गोरे तथा सुन्दर शरीर के होते थे।

    (3.) स्थान सम्बन्धी अंतर: सिंधु घाटी सभ्यता सिंधु नदी की घाटी में पनपी। इसकी बस्तियां पंजाब में हड़प्पा से लेकर सिंध में मोहनजोदड़ो, राजस्थान में कालीबंगा तथा गुजरात में सुत्कांगडोर तक मिली हैं जबकि आर्य सभ्यता सप्तसिंधु क्षेत्र में पनपी तथा इसका विस्तार गंगा-यमुना के दोआब, मध्य भारत तथा पूर्व में बिहार तथा बंगाल के दक्षिण-पूर्व तक पाया गया है।

    (4.) सभ्यताओं के स्वरूप में अन्तर: सिन्धु-घाटी की सभ्यता नगरीय तथा व्यापार प्रधान थी जबकि वैदिक सभ्यता ग्रामीण तथा कृषि प्रधान थी। सिन्धु-घाटी के लोगों को सामुद्रिक जीवन प्रिय था और वे सामुद्रिक व्यापार में कुशल थे परन्तु आर्यों को स्थलीय जीवन अधिक प्रिय था। सिंधु घाटी की सभ्यता एवं संस्कृति उतनी उन्नत तथा प्रौढ़ नहीं थी जितनी आर्यों की थी।

    (5.) सामाजिक व्यवस्था में अन्तर: द्रविड़ों का कुटुम्ब मातृक था अर्थात् माता कुटुम्ब की प्रधान होती थी, परन्तु आर्यों का कुटुम्ब पैतृक था जिसमें पिता अथवा कुटुुम्ब का अन्य कोई वयोवृद्ध पुरुष प्रधान होता था।

    (6.) विवाह पद्धति में अंतर: सिन्धु-घाटी के लोगों में चचेरे भाई-बहिन में विवाह हो सकता था, परन्तु आर्यों में इस प्रकार के विवाहों का निषेध था।

    (7.) उत्तराधिकार सम्बन्धी परम्पराओं में अंतर: सिन्धु-घाटी सभ्यता के निवासी, अपनी माता के भाई की सम्पत्ति के उत्तराधिकारी होते थे। जबकि आर्य, अपने पिता की सम्पत्ति के उत्तराधिकारी होते थे।

    (8.) जाति-व्यवस्था में अन्तर: सिंधु घाटी के लोगों में जाति-व्यवस्था नहीं थी जबकि आर्यों के समाज का मूलाधार जाति-व्यवस्था थी जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र के कार्य अलग-अलग निश्चित थे।

    (9.) आवास सम्बन्धी अन्तर: सिन्धु-घाटी के लोग नगरों में पक्की ईटों के मकान बनाकर रहते थे किंतु वैदिक आर्य गाँवों में बांस के पर्ण-कुटीर बनाकर रहते थे।

    (10.) धातुओं के प्रयोग में अन्तर: सिन्धु-घाटी के लोग पाषाण उपकरणों के साथ-साथ सोने-चांदी का प्रयोग करते थे तथा लोहे से अपरिचित थे परन्तु वैदिक-काल के आर्य प्रारम्भ में सोने तथा ताम्बे का और बाद में चांदी, लोहे तथा कांसे का भी प्रयोग करने लगे थे।

    (11.) अस्त्र-शस्त्र के प्रयोग में अन्तर: सिन्धु-घाटी के लोग युद्ध कला में प्रवीण नहीं थे। इसलिए उनके अस्त्र-शस्त्र साधारण कोटि के थे। वे युद्ध क्षेत्र में कवच (वर्म) तथा शिरस्त्राण आदि का उपयोग नहीं करते थे जबकि वैदिक आर्य युद्ध कला में अत्यंत प्रवीण थे तथा युद्ध क्षेत्र में आत्मरक्षा के लिए कवच और शिरस्त्राण आदि का प्रयोग करते थे।

    (12.) भोजन में अन्तर: सिन्धु सभ्यता के लोगों का प्रधान आहार मांस-मछली था। वैदिक आर्य भी प्रारम्भ में मांस-भक्षण करते थे, परन्तु उत्तर-वैदिक-काल में मांस भक्षण घृणा की दृष्टि से देखा जाने लगा।

    (13.) पशुओं के ज्ञान तथा महत्त्व में अन्तर: सिन्धु-घाटी के लोग बाघ तथा हाथी से भली-भांति परिचित थे किंतु ऊँट तथा घोड़े से अपरिचित थे। सिन्धु-घाटी के लोग साण्ड को गाय से अधिक महत्त्व देते थे। वैदिक आर्य बाघ तथा हाथी से अनभिज्ञ थे। वेदों में हाथी का बहुत कम उल्लेख है। वैदिक आर्य घोड़े पालते थे जिन्हें वे अपने रथों में जोतते थे तथा युद्ध में काम लेते थे। वैदिक-काल के आर्य गाय को पवित्र मानते थे और उसे पूजनीय समझते थे।

    (14.) धार्मिक धारणा में अन्तर: सिन्धु-घाटी के लोगों में मूर्ति-पूजा की प्रतिष्ठा थी। वे शिव तथा शक्ति की पूजा करते थे और देवी को देवता से अधिक ऊँचा स्थान प्रदान करते थे। वे लिंग-पूजक थे तथा अग्नि को विशेष महत्त्व नहीं देते थे। वे भूत-प्रेतों की भी पूजा करते थे। वैदिक आर्यों ने भी देवी-देवताओं में मानवीय गुणों का आरोपण किया था परन्तु वे मूर्ति-पूजक नहीं थे। ऋग्वैदिक-काल के आर्यों में शिव को कोई स्थान प्राप्त नहीं था तथा वे लिंग-पूजा के विरोधी थे। आर्य लोग सर्वशक्तिमान दयालु ब्रह्म को मानते थे तथा अग्नि-पूजक थे। उनके प्रत्येक घर में अग्निशाला होती थी।

    (15.) कला के ज्ञान में अन्तर: सिन्धु-घाटी के लोग लेखन-कला से परिचित थे और अन्य कलाओं में भी अधिक उन्नति कर गए थे, परन्तु प्रारम्भिक आर्य सम्भवतः लेखन-कला से परिचित नहीं थे और अन्य कलाओं में भी उतने प्रवीण नहीं थे परन्तु काव्य-कला में वे सैंधवों से बढ़कर थे।

    (16.) लिपि एवं भाषागत अंतर: सिन्धु-घाटी के लोगों की लिपि अब तक नहीं पढ़ी जा सकी है किंतु अनुमान है कि वह एक प्रकार की चित्रलिपि थी। इस लिपि के अब तक नहीं पढ़े जाने के कारण सिन्धु-घाटी की भाषा के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं हो सकी है जबकि आर्यों की लिपि वर्णलिपि तथा भाषा संस्कृत थी।

    उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि सिन्धु-घाटी सभ्यता तथा वैदिक-सभ्यता में पर्याप्त अन्तर था। दोनों सभ्यताओं का अलग-अलग कालों में और विभिन्न लोगों द्वारा विकास किया गया था परन्तु दोनों ही सभ्यताएँ, भारत की उच्च कोटि की सभ्यताएँ थीं। दोनों सभ्यताओं में इतना अन्तर होने पर शताब्दियों के सम्पर्क से दोनों ने एक दूसरे की संस्कृति को अत्यधिक प्रभावित किया और उनमें साम्य हो गया। यह साम्य आज भी भारत की संस्कृति पर दिखाई पड़ता है।

    सैंधव एवं आर्य सभ्यताओं के अनसुलझे प्रश्न

    सिंधु सभ्यता एवं आर्य सभ्यता के सम्बन्ध में पश्चिमी इतिहासकारों का मानना है कि-

    1. सिंधु सभ्यता नगरीय सभ्यता है।

    2. हड़प्पा सभ्यता का सर्वाधिक उचित नाम सिंधु सभ्यता है क्योंकि यह सभ्यता, सिंधु नदी घाटी के क्षेत्र में पनपी।

    3. सैंधव सभ्यता, आर्य सभ्यता से लगभग दो हजार साल पुरानी थी।

    4. सिंधु सभ्यता के लोग घोड़े से परिचित नहीं थे।

    5. सिंधु सभ्यता के लोग लोहे का प्रयोग करना नहीं जानते थे।

    6. सिंधु सभ्यता के लोगों के, मेसोपाटामिया (ईराक) के लोगों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध थे।

    7. भारत में आने से पहले आर्य ईरान में रहते थे।

    8. आर्यों ने सैंधव लोगों पर आक्रमण किया तथा उनकी बस्तियों को नष्ट कर दिया। आर्य ऐसा इसलिए कर पाए क्योंकि आर्यों के पास तेज गति की सवारी के लिए घोड़े तथा लड़ने के लिए लोहे के हथियार थे।

    यदि पश्चिमी इतिहासकारों की उपरोक्त बातों को स्वीकार कर लिया जाये तो इतिहास में अनेक उलझनें पैदा हो जाती हैं। इनमें से कुछ विचारणीय बिंदु शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों की सहायता के लिए यहाँ दिए जा रहे हैं-

    1. अब तक सैंधव सभ्यता के 1400 से अधिक स्थलों की खोज की गई है। इनमें से केवल 6 नगर हैं, शेष गांव हैं। ऐसी स्थिति में सैंधव सभ्यता को नगरीय सभ्यता कैसे कहा जा सकता है?

    2. सिंधु सभ्यता के स्थलों में से अधिकांश स्थल सरस्वती नदी की घाटी में पाए गए हैं न कि सिंधु नदी की घाटी में। अतः इस सभ्यता का नाम सिंधु घाटी सभ्यता कैसे हो सकता है?

    3. यदि सिंधुसभ्यता के लोगों के, मेसोपाटामिया के साथ व्यापारिक सम्बन्ध थे तो सिंधु घाटी तथा मेसोपाटिमया का मार्ग, ईरान अथवा उसके आसपास से होकर जाने का रहा होगा जहाँ आर्यों की प्राचीन बस्तियां थीं। तब सैंधव लोग, घोड़े एवं लोहे से परिचित क्यों नहीं हुए?

    4. यदि आर्यों ने सैंधवों पर आक्रमण किया था, तो इस दौरान युद्ध, बीमारी एवं स्वाभाविक मृत्यु से घोड़े भी मरे होंगे किंतु पूरी सैंधव सभ्यता के क्षेत्र से घोड़ों की केवल दो संदिग्ध मूर्तियाँ मिली हैं तथा एक घोड़े के अस्थिपंजर मिले हैं। अतः स्पष्ट है कि आर्यों ने सैंन्धवों पर न तो आक्रमण किए और न उन्हें नष्ट किया।

    5. यदि आर्यों ने सैंधवों पर आक्रमण किया था तो उनके द्वारा प्रयुक्त लोहे के कुछ हथियार युद्ध के मैदानों अथवा सैंधव बस्तियों में गिरे होंगे अथवा छूट गए होंगे अथवा टूटने के कारण आर्य सैनिकों द्वारा फैंक दिए गए होंगे किंतु सैंधव बस्तियों से लोहे के हथियार नहीं मिले हैं। अतः स्पष्ट है कि आर्यों ने सैंधवों पर आक्रमण नहीं किया।

    6. आर्यों के बारे में कहा जाता है कि वे भारत में लोहा लाए। यदि ऐसा था तो लौह-बस्तियां सबसे पहले उत्तर भारत में स्थापित होनी चाहिए थीं किंतु आर्यों के आने के बाद उत्तर भारत में ताम्र कालीन बस्तियां बसीं जबकि उसी काल में दक्षिण भारत में लौह बस्तियां बस रही थीं। यह कैसे हुआ कि भारत में लोहे को लाने वाले आर्यों की बस्तियां उत्तर भारत में थीं जबकि लौह बस्तियां दक्षिण भारत में बस रही थीं ?

    निष्कर्ष

    उपरोक्त विवेचन से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि -

    1. सैंधव सभ्यता को सिंधुु-सरस्वती सभ्यता अथवा सरस्वती सभ्यता कहा जाना चाहिए।

    2. सैंधव सभ्यता, लोहे एवं घोड़े से अपिरिचित रही होगी किंतु वह लोहे के हथियारों से सुसज्जित एवं घोड़ों पर बैठकर आने वाले आर्यों के आक्रमणों में नष्ट हुई इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं।

    3. यूरोपीय इतिहासकारों को यह सिद्धांत प्रतिपादित करना था कि ब्रिटेन वासियों की तरह आर्य भी भारत में बाहर से आए हैं, इसलिए उन्होंने सैंधव सभ्यता को आर्यों के आक्रमण में नष्ट होने का मिथक गढ़ा।

    4. सुदूर संवेदी उपग्रहों द्वारा उपलब्ध कराए गए सिंधु तथा सरस्वती नदी के प्राचीन मार्गों के चित्र बताते हैं कि सरस्वती नदी द्वारा कई बार मार्ग बदला गया। इससे अनुमान होता है कि इसी कारण सिंधु सभ्यता की बस्तियां भी अपने प्राचीन स्थानों से हटकर अन्यत्र चली गई होंगी।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • अध्याय - 3 पुरावशेष संग्रहण में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का योगदान

     19.05.2020
    अध्याय - 3 पुरावशेष संग्रहण में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का योगदान

    अध्याय - 3 पुरावशेष संग्रहण में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का योगदान

    ई.1861 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की स्थापना हुई। इसने पुरावशेषों की खोज एवं संग्रहण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पुरातत्व सर्वेक्षण के माध्यम से सिन्धु सभ्यता के अवशेषों को पहली बार प्रकाश में लाया जा सका। राजस्थान में कालीबंगा एवं पीलीबंगा से प्रस्तर-मूर्तियाँ, धातु-मूर्तियाँ, मृण्मूर्तियाँ, मृदभाण्ड, मणियां, स्नानागार, अन्नागार, मुद्राएं, मुहरें आदि प्राप्त की गईं जिनसे सिन्धु सभ्यता के सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं व्यापारिक जीवन की जानकारी प्राप्त होती है तथा अनुमान होता है कि कालीबंगा, सिंधु सभ्यता के पूर्वी भाग की राजधानी थी। इस सामग्री को देश के विभिन्न संग्रहालयों में रखा गया, जिस पर वैज्ञानिकों, भाषाविदों, इतिहासकारों तथा शोधार्थियों द्वारा शोध कार्य किए जाते रहे हैं। कालीबंगा खुदाई स्थल के निकट एक संगहालय की स्थापना की गई है।

    इसी प्रकार नगरी, खोर, ब्यावर, खेड़ा, बड़ी, अनचर, ऊणचा देवड़ी, हीराजी का खेड़ा, बल्लू खेड़ा (चित्तौड़ जिले में गंभीरी नदी के तट पर), भैंसरोड़गढ़, नगघाट (चम्बल और बामनी के तट पर) हमीरगढ़, सरूपगंज, बीगोद, जहाजपुर, खुरियास, देवली, मंगरोप, दुरिया, गोगाखेड़ा, पुर, पटला, संद, कुंवारिया, गिलूंड (भीलवाड़ा जिले में बनास के तट पर), लूणी (जोधपुर जिले में लूनी के तट पर), सिंगारी और पाली (गुड़िया और बांडी नदी की घाटी में), समदड़ी, शिकारपुरा, भावल, पीचक, भांडेल, धनवासनी, सोजत, धनेरी, भेटान्दा, धुंधाड़ा, गोलियो, पीपाड़, खींवसर, उम्मेदनगर (मारवाड़ में), गागरोन (झालवाड़), गोविंदगढ़ (अजमेर जिले में सागरमती के तट पर), कोकानी, (कोटा जिले में परवन नदी के तट पर), भुवाणा, हीरो, जगन्नाथपुरा, सियालपुरा, पच्चर, तारावट, गोगासला, भरनी (टोंक जिले में बनास तट पर) आदि स्थानों से पुरापाषाण कालीन पत्थर के हथियार प्राप्त हुए हैं जिन्हें विभिन्न संग्रहालयों में रखा गया है।

    चित्तौड़गढ़ जिले में बेड़च एवं गंभीरी नदियों के तट पर, चम्बल और वामनी नदी के तट पर भैंसरोड़गढ़ एवं नवाघाट, बनास के तट पर हमीरगढ़, जहाजपुर, देवली एवं गिलूंड, लूनी नदी के तट पर पाली, समदड़ी, बनास नदी के तट पर टौंक जिले में भरनी, उदयपुर के बागोर तथा मारवाड़ के तिलवाड़ा आदि अनेक स्थानों से उत्तर-पाषाण काल के उपकरण प्राप्त हुए हैं। गणेश्वर (सीकर), आहड़ (उदयपुर), गिलूण्ड (राजसमंद), बागोर (भीलवाड़ा) तथा कालीबंगा (हनुमानगढ़) से ताम्र-पाषाण कालीन, ताम्रयुगीन एवं कांस्य कालीन सभ्यताएं प्रकाश में आई हैं। ताम्रयुगीन प्राचीन स्थलों में पिण्डपाड़लिया (चित्तौड़), बालाथल एवं झाड़ौल (उदयपुर), कुराड़ा (नागौर), साबणिया एवं पूगल (बीकानेर), नन्दलालपुरा, किराड़ोत एवं चीथवाड़ी (जयपुर), ऐलाना (जालोर), बूढ़ा पुष्कर (अजमेर), कोल-माहोली (सवाईमाधोपुर) तथा मलाह (भरतपुर) से ताम्र उपकरणों के भण्डार मिले हैं। नोह (भरतपुर), जोधपुरा (जयपुर) एवं सुनारी (झुंझुनूं) से लौह युगीन सभ्यताओं के उपकरण प्राप्त हुए हैं। रंगमहल, बड़ोपल, मुण्डा, डोबेरी पीलीबंगा, आहाड़, नगरी, आदि अन्य भागों से शुंग कालीन सभ्यताओं के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इस समस्त सामग्री को विभिन्न संग्रहालयों में रखा गया है।


    राजस्थान पुरातत्व तथा संग्रहालय विभाग

    ई.1950 में पुरातत्व तथा संग्रहालय विभाग की स्थापना की गई। यह विभाग प्रदेश में बिखरी हुई पुरा सम्पदा तथा सांस्कृतिक धरोहर की खोज, सर्वेक्षण एवं संग्रहण करता है तथा इस सामग्री का जनसामान्य में प्रचार-प्रसार भी करता है। इस विभाग में निदेशक, उपनिदेशक, क्षेत्रीय अधीक्षक, अधीक्षक खोज एवं उत्खनन, अधीक्षक स्थापत्य सर्वेक्षण, अधीक्षक कला सर्वेक्षण, अधीक्षक आमेर महल, अधीक्षक केन्द्रीय संग्रहालय जयपुर, मुख्य पुरारसायन वेत्ता, मुद्रा विशेषज्ञ आदि विभिन्न अधिकारी कार्यरत हैं। केन्द्र प्रवर्तित योजना में रजिस्ट्रीकरण अधिकारी राज्य के निजी स्वामित्व वाली पुरा सामग्री एवं कला संग्रहों का पंजीकरण करते हैं। विभाग द्वारा 222 स्मारक तथा पुरास्थल संरक्षित घोषित किए गए हैं। विभाग इनका जीणोद्धार भी करवाता है। प्राचीन दुर्गों, स्मारकों, देवालयों, प्रासादों, हवेलियों, भित्तिचित्रों, सिक्कों एवं अन्य कला तथा पुरा सामग्री का अधिग्रहण भी यही विभाग करता है। विभाग की उत्खनन शाखा पुरास्थलों की खुदाई करती है। मुद्रा शाखा सिक्कों का संरक्षण, रासायनिक उपचार तथा कैटलॉगिंग का कार्य करती है। संग्रहालयों के पुनर्गठन एवं विकास का कार्य भी यही विभाग करता है। पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग चित्रकला प्रदर्शनी, पुरासामग्री प्रदर्शनी तथा भाषणमाला का भी आयोजन करता है। विभाग ‘द रिसर्चर’ नाम से एक पत्रिका भी प्रकाशित करता है।


    राजस्थान के संग्रहालयों के लिए पुरातत्व एवं इतिहास

    विषयक सामग्री जुटाने वाले पुरातत्ववेत्ता

    राजस्थान के संग्रहालयों के लिए सामग्री जुटाने में भारत के कई प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ताओं का अमूल्य सहयोग रहा। इनमें अलैक्जेण्डर कनिंघम, टी. एच. हैण्डले, अमलानंद घोष, दयाराम साहनी, रत्नचंद्र अग्रवाल, मुनि जिन विजय आदि उल्लेखनीय हैं।

    अलैक्जेण्डर कनिंघम

    ब्रिटिश पुरातत्ववेत्ता अलैक्जेण्डर कनिंघम ने उन्नीसवीं सदी के अंत में जयपुर रियासत के विविध स्थलों का भ्रमण एवं पुरातात्विक सर्वेक्षण किया जिससे जयपुर रियासत तथा राजपूताना के प्राचीन काल के इतिहास की विश्वसनीय शोध सामग्री उपलब्ध हो सकी।

    टी. एच. हैण्डले

    1880 के दशक में इन्होंने जयपुर रियासत के विविध स्थलों का भ्रमण करके पुरासामग्री जुटाकर कुछ लेख छपवाए। बाद में 1930 के दशक में दयाराम साहनी ने उन लेखों में रह गई त्रुटियों को ठीक किया।

    अमलानंद घोष

    अमलानंद घोष ने ई.1952 में कालीबंगा सभ्यता की खोज की। बाद में ई.1961-69 के बीच कालीबंगा की खुदाई हुई। इस कार्य में देश के सुप्रसिद्ध पुरातत्वविदों- बी. बी. लाल, बी. के. थापर, एन. डी. खरे, के. एम. श्रीवास्तव तथा एस. पी. जैन की सेवाएं ली गईं।

    दयाराम साहनी

    ये स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व जयपुर रियासत में पुरातत्व विभाग के निदेशक थे। इन्होंने जयपुर रियासत के विविधि स्थलों का सर्वेक्षण करके पुरातात्विक महत्व के स्थलों की खोज की तथा पुरा सामग्री जुटाई जिससे जयपुर रियासत के इतिहास लेखन के लिए विश्वसनीय जानकारी एवं प्रमाण उपलब्ध हो सके।

    रत्नचन्द्र अग्रवाल

    श्री रत्नचन्द्र अग्रवाल का जन्म 21 जून 1926 को साढ़ौरा, हरियाणा में हुआ था। वे राजस्थान के महत्त्वपूर्ण पुरातत्वविदों में से थे। वे राजस्थान सरकार के पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के निदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने राजस्थान के प्राचीन शिल्प एवं मूर्ति विज्ञान पर महत्त्वपूर्ण कार्य किया। उनके प्रसिद्ध ग्रंथों में ‘स्कल्पचर्स फ्रॉम उदयपुर म्यूजियम’ तथा ‘पॉटरी हैण्डल्स विद वुमन फिगराइन्स’ प्रमुख हैं।

    मुनि जिन विजय

    मुनि जिन विजय का जन्म मेवाड़ रियासत के रूपाहेली गाँव में ई.1888 में हुआ। इनका बचपन का नाम रिणमल परमार था। वे 15 वर्ष की आयु में जैन धर्म में दीक्षित हो गये। उन्होंने तीन वर्ष तक सूत्र और आगम पढ़े तथा वडोदरा में रहकर कुमार पाल प्रतिबोध नामक ग्रंथ का संपादन किया। लोकमान्य तिलक के सम्पर्क से उन पर देशभक्ति का रंग चढ़ा तथा उन्होंने जैन साहित्य संशोधक समिति की स्थापना की। वे गुजरात पुरातत्व मंदिर के निदेशक रहे। उन्होंने जर्मनी जाकर इण्डो-जर्मन केन्द्र की स्थापना की तथा वापस आकर दाण्डी कूच में भाग लिया। छः माह जेल में भी रहे। इसके बाद वे बम्बई में भारतीय विद्या भवन के संचालक बने। ई.1942 में उन्होंने जैसलमेर आकर 200 ग्रंथों की प्रतिलिपियां तैयार करवाईं। ई.1950 में उनके निर्देशन में राजस्थान पुरातत्व मंदिर की स्थापना की गयी। उनके द्वारा लिखित लेखों और गं्रथों की संख्या सैंकड़ों में है। राजस्थान सरकार ने उन्हें पुरातत्व विभाग का निदेशक बनाया। ई.1976 में उनका निधन हुआ।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-40

     19.05.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-40

    पर्यावरण की रक्षक कला-साधक जातियाँ


    राजस्थान में निवास करने वाली सैंकड़ों जातियाँ विगत हजारों वर्षों से विभिन्न प्रकार की कलाओं के प्रदर्शन को आजीविका का साधन बनाकर, अपना पेट भरती आ रही हैं। कृषि एवं प्राकृतिक संसाधनों पर बंटवारे का दबाव कम करने के लिये ये लोग गायन, वादन एवं नृत्य जैसी प्रदर्शनकारी कलाओं की साधना करने लगे। बहुतों ने पाबूजी और देवनारायणजी की पड़ सुनाने, कठपुतलियों के खेल दिखाने तथा ख्याल एवं रम्मत जैसी चाक्षुष कलाओं को आजीविका का अधार बना लिया। बहुत से लोग बहरूपिये बनकर लोगों का मनोरंजन करते और अपना पेट भरते रहे ताकि प्राकृतिक संसाधनों का बंटवारा न हो। कालबेलियों ने बीन बजाकर सर्प का प्रदर्शन करने और उनकी औरतों ने नृत्य करने के व्यवसाय को अपनाया। लंगा, मांगणियार, कालबेलिया, बंजारा, भाट, बहरूपिया, भाण्ड, जोगी, कंजर, दमामी, ढोली आदि जातियां, खेती नहीं करतीं। इन कला साधकों द्वारा वस्तु एवं सेवा के रूप में कुछ भी उत्पादित नहीं किया जाता किंतु वे लोगों का मनोरंजन करके अपना पेट भरते हैं। प्रकृति के संसाधनों पर अपना अधिकार नहीं जताते। यह उनकी तरफ से राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति को बहुत बड़ी देन है। कुछ प्रमुख गायक जातियों का विवरण इस प्रकार से है-

    कलावंत : अपने हुनर में निष्णात को कलावंत कहा गया है जिसका तात्पर्य निपुण गायक और वादक से है। संगीत सम्राट तानसेन से रिश्ता जोड़ने वाले कलावंतों में गौड़ ब्राह्मण और चौहान राजपूत मुख्य हैं जो मुसलमान बनाये जाने से पूर्व, मंदिरों में कीर्तन किया करते थे। कलावंतों में आज भी कुछ कलाकार अपने नाम के आगे 'सेन' तथा कुछ 'खां' लगाते हैं।

    ढाढी : राजस्थान में ढाढी जाति के लोग भी गा-बजाकर अपना जीवन यापन करते आये हैं। गायन में ये सारंगी का सहारा लेते हैं। इन कलाकारों में हिंदू व मुसलमान दोनों हैं। इनकी उत्त्पत्ति राजपूतों से मानी गयी है। मुसलमान कलाकार भी हिंदू रीति-रिवाजों को मानते हैं। मध्यकाल में ये लोग युद्ध भूमि में जाकर वहाँ जोशीले गीत गाया करते थे और शूरवीरों की प्रशंसा किया करते थे। ढाढी अपने यजमानों की वंशावलियों को याद करके उनकी प्रशंसा में गीत गाया करते हैं। राज्य के जैसलमेर-बाड़मेर जिलों में इनकी संख्या अधिक है। इनकी स्त्रियां भी गाती हैं मगर नाचती नहीं हैं। रेतीले इलाकों में रहने वाले इन कलाकारों के स्वर हर किसी को अपनी ओर खींचते हैं। पश्चिमी राजस्थान के ये कलाकार नमाज पढ़ते हैं तथा हिंदू देवी-देवताओं को भी मानते हैं। ये कलाकार कमायचा, खड़ताल, सुरणई आदि लोकवाद्य बजाते हैं।

    मिरासी : पेशेवर गायकों में मिरासियों का अलग स्थान है। इनके बारे में दो मत मिलते हैं। पहले मत के अनुसार इनके पूर्वज गौड़ ब्राह्मण थे किंतु अब ज्यादातर सुन्नी मुसलमान हैं। दूसरे मत के अनुसार इनका सम्बन्ध अरब के मिरास नामक नगर से है। इन्हें मांगणहार भी कहते हैं। ये लोग, लोक गायन और कविता से जुड़े हुए हैं। सारंगी इनका मुख्य वाद्य है। ये कलाकार, पीढ़ी दर पीढ़ी गाना-बजाना ही करते आये हैं। मारवाड़ क्षेत्र में इन कलाकारों की बहुलता है। भाटों की तरह ये भी वंशावली का बखान करते हैं। मिरासियों में नक्कारची, ताशे वाले और शहनाई वादक भी हैं। बनिये, ब्राह्मण, मेवाती, राजपूत, डांगी, पठान, सैयद, मुगल, खान आदि इनके यजमान हैं। सामंती दौर में कुछ ठिकाणों में मिरासियों को जागीरें भी बख्शी गयीं। सारंगी के साथ-साथ ये कमायचा, खड़ताल, भपंग, घड़ा तथा सुरमण्डल भी बजाते हैं। मिरासी पुरुष दस फुट लम्बे कपड़े का साफा बांधते हैं। स्त्रियां घाघरा, कुरती, कांचली पहनती हैं और ओढ़नी ओढ़ती हैं।

    ढोली : ढोल बजाने के कारण ये कलाकार ढोली कहलाते हैं। इन्हें दमामी और जावड़ भी कहते हैं। ये अपनी उत्त्पत्ति गंधर्वों से मानते हैं और राजपूतों के रीति रिवाज मानते हैं। रजवाड़ों में ढोलणों के गाने-बजाने के अनेक किस्से आज भी मशहूर हैं। मध्यकाल में कुछ ढोली मुसलमान बन गये। पेशेवर कलाकारों में ढोलियों का विशेष स्थान है। इनकी स्त्रियां नाचने-गाने में विशेष स्थान रखती हैं। ढोली मृदुभाषी और चातुर्य पूर्ण बात कहने में दक्ष होते हैं। ये लोग विभिन्न राजपूत कुलों से अपना सम्बन्ध जोड़ते हैं जिनमें चौहान, परिहार, देवड़ा और राठौड़ प्रमुख हैं। मारवाड़ के डांगी राठौड़ वंश से निकले हैं। मुसलमान ढोली इन्हीं डांगी लोगों की संतान हैं जो सुन्नी हैं।

    रावल : यह जाति चारणों को अपना यजमान मानती है। ये लोग गा-बजाकर अपनी आजीविका चलाते हैं तथा खेल-तमाशे करके भी जन सामान्य का मनोरंजन करते हैं। लोक नाट्य परम्परा में रावल कलाकारों का विशिष्ट स्थान है।

    डोम (डूम) : मारवाड़ के डोम मिरासियों के समान ही हैं। इनके रीति रिवाज भी मिरासियों की तरह ही हैं।

    राणा : रण में नगाड़ा बजाने वाले ही कालांतर में 'राणा' कहलाने लगे। ये कलाकार नगाड़ा बजाने में तो सिद्धहस्त हैं ही, गायन के क्षेत्र में भी इन्होंने अपना सिक्का जमाया है। 'राणा' भी राजपूतों के रीति-रिवाज अपनाते हैं। राणा जाति के कलाकार शहनाई भी बजाते हैं।

    लंगा : राज्य के मरुस्थलीय जिलों- जैसलमेर, बाड़मेर तथा जोधपुर में निवास करने वाले लंगा कलाकार, सम्पूर्ण विश्व में अपनी गायकी की छाप छोड़ चुके हैं। इनकी भाषा सिन्धी एवं उर्दू मिश्रित राजस्थानी है। ये चौहान राजपूतों के वाचक हैं। इन कलाकारों को संगीत विरासत में मिला है। इनकी गायकी में शास्त्रीय संगीत का ताना-बाना है। यही कारण है कि लंगों की गायकी देश विदेश में पसंद की जाती है। सारंगी इनका प्रमुख वाद्य है। ये खड़ताल, अलगोजा, सुरंदा, ढोलक, सुरनई, मोरचंग, नड़, पावा, मुरली और पुंगी भी बजाते हैं। स्वरों का सहज उतार-चढ़ाव और ताल की गूढ़ शिक्षा इन कलाकारों की धरोहर है। लंगा फकीरों में राणका फकीर सुषिर वाद्य बजाने के लिये विख्यात हैं। लंगा पुरुष अजरख, पोतिया कमीज तथा तेमल की तरह का सफेट टहटा पहनते हैं। स्त्रियां बूंद (घाघरा), रेहटा (चूंदड़ी) तथा कांचली पहनती हैं।

    भोपा : राजस्थान में भोपों की कई श्रेणियां हैं। भोपे देवी-देवताओं की स्तुति गा-बजाकर ही करते हैं। माताजी, भैंरूजी, गोगाजी, पाबूजी, देबूजी, हड़बूजी आदि के भोपे पड़ गायन ही करते हैं। रावण हत्था इनका प्रमुख लोकवाद्य है। भोपी का सधा हुआ ऊँचा स्वर भोपे की शान है। रामदेवजी के भोपे तंदूरे बजाते हैं। भैंरूजी के भोपे कमर में घुंघरू बांधकर तथा हंटर से अपने ऊपर वार करते हैं। कोई-कोई मशक बजाकर गाते हैं।

    सांसी-कंजर : इन जातियों का व्यवस्थित जीवन नहीं होता किंतु गाना-बजाना इनके दैनिक जीवन का अंग है। इनकी स्त्रियां नाचती हैं। यह जाति अजमेर जिले में बड़ी संख्या में निवास करती है। हाड़ौती क्षेत्र की कंजर बालायें चकरी नृत्य करती हैं जो आज एक लोकप्रिय नृत्य बन गया है।

    जोगी : बीकानेर, जोधपुर, अलवर तथा शेखावाटी क्षेत्र में जोगी जाति के कलाकार प्रमुख रूप से पाये जाते हैं। ये नाथ संप्रदाय को मानते हैं। मुसलमान संप्रदाय के जोगी कलाकार भी नाथ पंथ को मानते हैं। अलवर क्षेत्र के जोगी और मिरासी भृर्तहरि, शिवजी का ब्यावला और पंडून का कड़ा गायन में अपना सानी नहीं रखते।

    भवई : भाव करे सो भवईं भवई जाति के कलाकार घूम-घूम कर अपने यजमानों का मनोरंजन करते हैं। भवई स्वांग भी करते हैं। भवई कलाकार अनेक करतब करके दर्शकों का मनोरंजन करते हैं। आज जो भवई नृत्य देखते हैं वह इस कला का अंश भर है। भवई कलाकार अने करतब दिखाने में सक्षम हैं। वे बांधजी और बीकाजी की नाटिकायें भक करते हैं।

    आदिवासी : उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, सिरोही तथा आबू आदि पहाड़ी क्षेत्रों में भील, मीणा, गरासिया, सहारिया आदि जन जातियाँ निवास करती हैं। इनके संगीत ने आदिम अवस्था से निकलकर अभी दो चार डग ही धरे हैं। गीतों के साथ मादल बजती है तथा स्त्री पुरुष सम्मिलित होकर नृत्य करते हैं। पटेल्या, बीछियो, लालर आदि इनके प्रमुख लोकगीत हैं।

    मारवाड़ा भील : रेगिस्तान के मारवाड़ा भीलों के लोकदेवता पाबूजी हैं। ये रावण हत्थे पर पाबूजी की पड़ गाते हैं तथा तन्मय होकर नृत्य करते हैं। इनके नृत्यों एवं गीतों के प्रमुख विषय वीरता, प्रेम और भक्ति है। ये ढोल बजाने में भी कुशल होते हैं।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • अध्याय - 10 ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म

     19.05.2020
    अध्याय - 10 ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म

    ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म


    हे आदित्य, हे मित्र, हे वरुण, हे इन्द्र! आपके प्रति मैंने बहुत अपराध किए हैं; उन्हें क्षमा करें और मुझे उस अभय-ज्योति का वरदान दें जिससे मुझे अज्ञान का क्लेश न सताए। -ऋग्वेद, 2.27.14.


    भारत में ऋग्वैदिक सभ्यता का प्राकट्य सर्वप्रथम सप्त-सिंधु क्षेत्र तथा सरस्वती नदी के निकट दिखाई देता है। ऋग्वेद में सप्त-सैन्धव प्रदेश तथा सरस्वती नदी का अनेक मंत्रों में गुण-गान किया गया है। यद्यपि अब सरस्वती नदी विद्यमान नहीं है और उसे प्रयाग में गंगा-यमुना के संगम पर अदृश्य मान लिया गया है परन्तु उन दिनों वह सतजल तथा कुरुक्षेत्र के मध्य बहती थी।

    ऋग्वैदिक आर्यों की राजनीतिक व्यवस्था

    यद्यपि ऋग्वेद एक धार्मिक ग्रन्थ है तथापि उसकी अनेक ऋचाओं में उस काल की राजनीतिक व्यवस्था की जानकारी मिलती है।

    दस्युओं अथवा आर्य-पूर्वों से संघर्ष

    ऋग्वेद में वर्णित इंद्र यद्यपि देवताओं का राजा है तथापि इन्द्र ने आर्यों के शत्रुओं को अनेक बार हराया। ऋग्वेद में इंद्र को पुरंदर कहा गया है जिसका अर्थ होता है दुर्गों को तोड़ने वाला परन्तु आर्य-पूर्वों के इन दुर्गों को पहचान पाना सम्भव नहीं है। आर्यों के शत्रुओं के अस्त्र-शस्त्रों के बारे में भी बहुत कम जानकारी मिलती है। इनमें से कुछ हड़प्पा संस्कृति के लोगों की बस्तियां हो सकती हैं परन्तु आर्यों की सफलता के बारे में संदेह नहीं है। इस सफलता का मुख्य कारण वे रथ थे जिनमें घोड़े जोते जाते थे।

    आर्यों के साथ ही पश्चिमी एशिया और भारत में घोड़ों का आगमन हुआ। आर्य सैनिक सम्भवतः कवच (वर्म) पहनते थे और उनके हथियार श्रेष्ठ थे। ऋग्वेद से जानकारी मिलती है कि 'दिवोदास' ने, जो भरत कुल का आर्य राजा था, 'शंबर' को हराया था। शंबर एक दस्यु राजा था जिसने आकाश में नब्बे, निन्यानवे अथवा सौ दुर्गों का निर्माण किया था। आकाश में दुर्ग निर्माण के उल्लेख से अनुमान होता है कि शंबर कोई पर्वतीय अनार्य राजा था जिसने पर्वतों पर बड़ी संख्या में दुर्गों का निर्माण किया था।

    ऋग्वेद के दस्यु सम्भवतः इसी पर्वतीय देश के मूल निवासी थे, और इन्हें हराने वाला योद्धा, एक आर्य-मुखिया था। यहाँ दिवोदास के नाम के साथ दास शब्द जुड़ा हुआ है जिससे अनुमान होता है कि यह आर्य-मुखिया, दासों से तो सहानुभुति रखता था, किन्तु दस्युओं का कट्टर शत्रु था। ऋग्वेद में दस्युहंता शब्द का बार-बार उल्लेख आया है दस्यु सम्भवतः लिंग-पूजक थे और दूध-दही, घी आदि के लिए गाय, भैंस नहीं पालते थे।

    पंच-जनों का युद्ध

    प्राचीन आर्यों का कोई संगठित राज्य नहीं था। आर्य छोटे-छोटे राज्यों (जन) में विभक्त थे जिनमें परस्पर वैमनस्य था। फलतः आर्यों को न केवल अनार्यों से युद्ध करना पड़ा वरन् उनमें आपस में भी युद्ध होता था। इस प्रकार आर्य दोहरे संघर्ष में फंसे हुए थे। आर्यों के भीतर के संघर्ष के कारण उनके जीवन में लंबे समय तक उथल-पुथल मची रही। पांच प्रमुख कबीलों अथवा पंचजनों की आपस में लड़ाइयां हुईं और इसके लिए उन्होंने आर्येतर लोगों की भी सहायता ली। 'भरत' और 'तृत्सु' आर्य जन थे तथा 'वसिष्ठ' नामक ऋषि उनके पक्षधर थे। भरत नाम का उल्लेख पहली बार ऋग्वेद में आया है। इसी नाम के आधार पर हमारे देश का नाम भारतवर्ष पड़ा।

    दाशराज्ञ अथवा दस राजाओं का युद्ध

    ऋग्वैदिक उल्लेख के अनुसार सरस्वती नदी के किनारे भारत नामक जन (राज्य) था, जिस पर सुदास नामक राजा शासन करता था। विश्वामित्र, राजा सुदास के पुरोहित थे। राजा तथा पुरोहित में अनबन हो जाने के कारण राजा सुदास ने विश्वामित्र के स्थान पर वसिष्ठ को अपना पुरोहित बना लिया। इससे विश्वामित्र बड़े अप्रसन्न हुए। उन्होंने दस राजाओं को संगठित करके, राजा सुदास के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया। दस राजाओं के इस समूह में पांच आर्य-राजा थे और पांच अनार्य-राजा थे।

    भरतों और दस राजाओं का जो युद्ध हुआ उसे 'दाशराज्ञ युद्ध' कहते हैं। यह युद्ध परुष्णी (रावी) नदी के तट पर हुआ। इसमें भरत कुल के राजा सुदास की विजय हुई और भरतों का प्रभुत्व स्थापित हो गया। जिन कबीलों की हार हुई उनमें पुरुओं का कबीला सबसे महत्त्वपूर्ण था।

    कुरुओं का उदय

    कालांतर मंे 'भरतों' और 'पुरुओं' का मेल हुआ और परिणामतः 'कुरुओं' का एक नया शासक कबीला अस्तित्त्व में आया। कुरु बाद में 'पांचालों' के साथ मिल गए और उन्होंने उत्तरी गंगा की द्रोणी मं् अपना शासन स्थापित किया। उत्तर-वैदिक-काल में उन्होंने इस क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। आर्यों में परस्पर अन्य युद्ध भी हुए।

    ऋग्वेद कालीन राजनीतिक संस्थाएं

    (1.) गोप अथवा राजन्य: ऋग्वैदिक-काल की राजनीतिक व्यवस्था का मूलाधार कुटुम्ब था जो पैतृक होता था। कुटुम्ब को आधुनिक इतिहासकारों ने कबीला कहकर पुकारा है। कुटुम्ब का प्रधान, पिता अथवा अन्य कोई बड़ा-बूढ़ा पुरुष होता था जो कुटुम्ब के अन्य सदस्यों पर नियन्त्रण रखता था। कई कुटुम्बों को मिला कर एक ग्राम बनता था। ग्राम का प्रधान 'ग्रामणी' कहलाता था। कई ग्रामों को मिला कर 'विस' बनता था। विस का प्रधान 'विसपति' कहलाता था। कई विसों को मिला कर 'जन' बनता था। जन का रक्षक 'गोप' अथवा 'राजन्य' कहलाता था।

    (2.) उत्तराधिकार की परम्परा: ऋग्वैदिक-काल का राजनीतिक संगठन राजतंत्रात्मक था। ऋग्वेद में अनेक राजन्यों का उल्लेख मिलता है। राजन्य का पद आनुवंशिक था और वह उसे उत्तराधिकार के नियम से प्राप्त होता था। अर्थात् राजन्य के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र सिंहासन पर बैठता था। राजन्य का पद यद्यपि वंशानुगत होता था, तथापि समिति अथवा सभा द्वारा किए जाने वाले चुनावों के बारे में भी सूचना मिलती है। राज्य में राजन्य का स्थान सर्वोच्च था। वह सुन्दर वस्त्र धारण करता था और भव्य राज-भवन में निवास करता था जिसमें राज्य के बड़े-बड़े पदाधिकारी, पण्डित, गायक तथा नौकर-चाकर उपस्थित रहते थे। चूँकि उन दिनों गमनागमन के साधनों का अभाव था इसलिए राज्य बहुत छोटे हुआ करते थे।

    (3.) राजन्य के कर्त्तव्य: राजन्य को कबीले का संरक्षक (गोप्ता जनस्य) कहा गया है। वह गोधन की रक्षा करता था, युद्ध का नेतृत्व करता था और कबीले की ओर से देवताओं की आराधना करता था। प्रजा की रक्षा करना, शत्रुओं से युद्ध करना, राज्य में शान्ति स्थापित करना और शान्ति के समय यज्ञादि कर्मों का अनुष्ठान करना, राजन्य के मुख्य कर्त्तव्य होते थे। राजन्य अपनी प्रजा की न केवल भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति का अपितु आध्यात्मिक उन्नति का भी ध्यान रखता था। राजन्य अपनी प्रजा के आचरण की देखभाल के लिए गुप्तचर रखता था जो प्रजा के आचरण के सम्बन्ध में राजन्य को सूचना देते थे। राजन्य, आचरण-भ्रष्ट प्रजा को दण्डित करता था।

    (4.) राज्य के प्रमुख पदाधिकारी: राजन्य की सहायता के लिए बहुत से पदाधिकारी होते थे जिनमें पुरोहित, सेनानी तथा ग्रामणी आदि प्रमुख थे।

    पुरोहित: समस्त पदाधिकारियों में पुरोहित का स्थान सबसे ऊँचा था। उसका पद प्रायः वंशानुगत होता था परन्तु कभी-कभी वह किसी अन्य कुटुम्ब से भी चुन लिया जाता था। पुरोहित को बहुत से कर्त्तव्य करने होते थे। वह राजन्य का धर्मगुरु तथा परामर्शदाता होता था। इसलिए राज्य में उसका बड़ा प्रभाव रहता था। वह रण-क्षेत्र में भी राजन्य के साथ जाता था और अपनी प्रार्थनाओं तथा मन्त्रों द्वारा राजन्य की विजय का प्रयत्न करता था। ऋग्वैदिक-काल में वसिष्ठ और विश्वामित्र नामक दो प्रमुख पुरोहित हुए। उन्होंने राजाओं का पथ-प्रदर्शन किया और बदले में गायों और दासियों के रूप में भरपूर दक्षिणाएं प्राप्त कीं।

    सेनानी: राज्य का दूसरा प्रमुख अधिकारी सेनानी होता था। वह भाला, कुल्हाड़ी, कृपाण आदि का उपयोग करना जानता था। वह सेना का संचालन करता था। उसकी नियुक्ति सम्भवतः राजन्य स्वयं करता था। जिन युद्धों में राजन्य की उपस्थिति आवश्यक नहीं समझी जाती थी, उनमें सेनानी ही सेना का प्रधान होता था जो रण-क्षेत्र में उपस्थित रहकर सेना का संचालन करता था।

    ग्रामणी: ग्रामणी तीसरा प्रधान पदाधिकारी था। वह गाँव के प्रबन्ध के लिए उत्तरदायी होता था। आरम्भ में ग्रामणी योद्धाओं के एक छोटे समूह का नेता होता था परन्तु जब गांव स्थायी रूप से बस गए तो ग्रामणी गांव का मुखिया हो गया और कालांतर में उसका पद व्राजपति के समकक्ष हो गया।

    कुलप: परिवार अथवा कुल का मुखिया कुलप कहलाता था।

    व्राजपति: गोचर-भूमि के अधिकारी को व्राजपति कहा गया है। वह युद्ध में कुलपों और ग्रामणियांे का नेतृत्व करता था।

    (5.) युद्ध-विधि: भारत में ऋग्वैदिक आर्यों की सफलता के दो प्रमुख कारण थे- घोड़ों से चलने वाले रथ और लोहे से बनने वाले हथियार। युद्ध में समस्त सक्षम-पुरुषों को भाग लेना पड़ता था। साधारण लोग पैदल युद्ध करते थे परन्तु राजन्य तथा क्षत्रिय लोग रथों पर चढ़कर युद्ध करते थे। युद्ध में आत्म-रक्षा के लिए कवच आदि का प्रयोग किया जाता था। आक्रमण करने का प्रधान शस्त्र धनुष-बाण था परन्तु आवश्यकतानुसार भालों, फरसों तथा तलवारों का भी प्रयोग किया जाता था। ध्वजा, पताका, दुन्दुभि आदि का भी प्रयोग किया जाता था। युद्ध प्रायः नदियों के तट पर हुआ करते थे।

    (6.) समिति तथा सभा: यद्यपि राजन्य राज्य का प्रधान होता था परन्तु वह स्वेच्छाचारी तथा निंरकुश नहीं होता था। उसे परामर्श देने के लिए कुछ संस्थायें विद्यमान थीं। ऋग्वेद में सभा, समिति, विदथ और गण-जैसी अनेक संस्थाओं के उल्लेख मिलते हैं। इन परिषदों में जनता के हितों, सैनिक अभियानों और धार्मिक अनुष्ठानों के बारे में विचार-विमर्श होता था। ऋग्वैदिक-काल में स्त्रियाँ भी सभा और विदथ में भाग लेती थीं। राजतंत्र की दृष्टि से सर्वाधिक महत्त्व की परिषदें सम्भवतः सभा और समिति थीं। समिति में जन की समस्त प्रजा, सदस्य होती थी परन्तु सभा में केवल उच्च-वंश के वयोवृद्धों को सदस्यता मिलती थी। ये दोनों परिषदें इतने महत्त्व की थीं कि राजन्य भी इनका सहयोग प्राप्त करने का प्रयत्न करता था।

    (7.) न्याय व्यवस्था: राजन्य अपने सहायकों की सहायता से विवादों एवं झगड़ों का निर्णय करता था। न्यायिक कार्य में उसे पुरोहित से बड़ी सहायता मिलती थी। जिन अपराधों का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है, वे चोरी, डकैती, सेंध लगाना आदि हैं। पशुओं की बड़ी चोरी हुआ करती थी। अपराधियों को उस व्यक्ति की इच्छानुसार दण्ड मिलता था जिसे क्षति पहुँचती थी। जल तथा अग्नि-परीक्षा का भी इस युग में प्रचार था।

    (8.) गुप्तचर व्यवस्था: उस काल में चोरियां भी होती थीं, विशेषतः गायों की। आपराधिक गतिविधियों पर दृष्टि रखने के लिए गुप्तचर रखे जाते थे। कर वसूल करने वाले किसी अधिकारी के बारे में हमें जानकारी नहीं मिलती। सम्भवतः ये कर राजाओं को भेंट के रूप में, स्वेच्छा से दिए जाते थे। इस भेंट को बलि कहते थे,

    (9.) अन्य पदाधिकारी: राजन्य कोई नियमित सेना नहीं खड़ी करता था किंतु युद्ध के अवसर पर जो सेना एकत्र की जाती थी उसमें व्रात, गण, ग्राम और शर्ध नामक विभिन्न सैनिक समूह सम्मिलित होते थे। कुल मिलाकर यह एक कौटुम्बिक अथवा कबीलाई व्यवस्था वाला शासन था जिसमें सैनिक भावना का प्राधान्य था। नागरिक व्यवस्था अथवा प्रादेशिक व्यवस्था का अस्तित्त्व नहीं था। लोग अपने स्थान बदलते हुए निरन्तर फैलते जा रहे थे।

    ऋग्वैदिक आर्यों का सामाजिक जीवन

    ऋग्वेद से तत्कालीन समाज की जानकारी मिलती है जिसके अनुसार सामाजिक संरचना का आधार सगोत्रता थी। अनेक ऋग्वैदिक राजाओं के नामों से प्रकट होता है कि व्यक्ति की पहचान उसके कुल अथवा गोत्र से होती थी। लोग जन (कबीले) के हित को सर्वाधिक महत्त्व देते थे। ऋग्वेद में जन शब्द का उल्लेख 275 बार हुआ है परन्तु जनपद शब्द का एक बार भी प्रयोग नहीं हुआ। लोग, जन के सदस्य थे, क्योंकि अभी राज्य की स्थापना नहीं हुई थी। ऋग्वेद में कुटुम्ब अथवा कबीले के अर्थ में जिस दूसरे महत्त्वपूर्ण शब्द का प्रयोग हुआ है, वह है विश्। इस शब्द का उल्लेख 170 बार हुआ है। सम्भवतः विश् को लड़ाई के उद्देश्य से ग्राम नामक छोटी इकाइयों में बांटा गया था। जब ये ग्राम एक-दूसरे से लड़ते थे तो संग्राम हो जाता था। बहुसंख्यक वैश्य वर्ण का उद्भव विश् से ही हुआ।

    (1.) पारिवारिक जीवन: ऋग्वेद में परिवार के लिए कुल शब्द का प्रयोग हुआ है। कुल में न केवल माता, पिता, पुत्र, दास आदि का समावेश होता था अपितु कई अन्य लोग भी होते थे। अनुमान होता है कि पूर्व वैदिक-काल में परिवार के लिए गृह शब्द का प्रयोग होता था। प्राचीनतम हिन्द-यूरोपीय भाषाओं में इसी शब्द का उपयोग भंाजे, भतीजे, पोते आदि के लिए भी हुआ है। इसका अर्थ यह है कि पृथक् कुटुम्बों (अर्थात् कबीलों) की स्थापना की दिशा में पारिवारिक सम्बन्धों का विभेदीकरण बहुत अधिक नहीं हुआ था, और कुटुम्ब एक बड़ी सम्मिलित इकाई था।

    रोमन समाज की तरह यह एक पितृतंत्रात्मक परिवार था, जिसमें पिता मुखिया था। उसे गृहपति कहा जाता था। गृहपति के रूप में परिवार की समस्त सम्पत्ति पर उसका अधिकार होता था। परिवार के समस्त सदस्यों को उसके आदेश का पालन करना होता था। आज्ञा की अवहेलना करने वाले सदस्य को वह अपनी इच्छानुसार कठोर दण्ड दे सकता था। परिवार के समस्त सदस्यों के लालन-पालन, विवाह तथा उनकी उन्नति का ध्यान रखना उसका मुख्य कर्त्तव्य होता था।

    एक परिवार की अनेक पीढ़ियां एक घर में रहती थीं। इस काल के सामाजिक संगठन का मूलाधार भी कुटुम्ब ही था। पिता ही कुटुम्ब का प्रधान होता था। वह अपने कुटुम्ब के सदस्यों पर दया तथा सहानुभूति रखता था परन्तु अयोग्य सन्तान के साथ कठोर व्यवहार करता था। कुटुम्ब में पिता को बहुत अधिकार प्राप्त थे। पुत्र तथा पुत्री के विवाह में पिता की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी। विवाह के उपरान्त भी पुत्र को अपनी पत्नी के साथ अपने पिता के घर में रहना होता था।

    वधू को अपने श्वसुर गृह के अनुशासन में रहना होता था। इस प्रकार इस काल में संयुक्त परिवार प्रथा प्रचलित थी। अतिथि सत्कार पर बल दिया जाता था और इसकी गणना पाँच महायज्ञों में होती थी। भगवानपुुरा में तेरह कमरों वाला एक कच्चा भवन मिला है। इससे यह प्रमाणित हो सकता है कि इस भवन में या तो बड़ा परिवार रहता था या कुटुम्ब का मुखिया रहता था।

    (2.) सन्तान की स्थिति: विवाह का प्रधान लक्ष्य सन्तान उत्पन्न करना होता था। ऋग्वैदिक आर्य युद्धों में लड़ने के लिए अनेक बहादुर पुत्रों की प्राप्ति हेतु भगवान से प्रार्थना करते थे। पुत्र उत्पन्न होने पर बड़ा उत्सव मानाया जाता था। लोग कन्या की आकांक्षा नहीं करते थे परन्तु उत्पन्न हो जाने पर उसके साथ सहानुभूति रखते थे और उसकी शिक्षा-दीक्षा की समुचित व्यवस्था करते थे। विश्ववारा, घोषा, अपाला आदि स्त्रियों को इतनी उच्च-कोटि की शिक्षा दी गई थी कि वे वेद-मन्त्रों की भी रचना कर सकती थीं।

    ऋग्वेद में संतान और गोधन की प्राप्ति के लिए बार-बार इच्छा व्यक्त की गई है, किन्तु किसी भी सूक्त में पुत्री की प्राप्ति के लिए इच्छा व्यक्त नहीं की गई है।

    (3.) विवाह की व्यवस्था: ऋग्वैदिक-काल के विभिन्न संस्कारों मंे विवाह का सर्वाधिक महत्त्व था। विवाह को एक उच्च एवं पवित्र संस्कार समझा जाता था। सामान्यतः माता-पिता ही अपने पुत्र-पुत्री के विवाह सम्बन्ध निर्धारित करते थे परन्तु कुछ स्थानों पर लड़के-लड़की की पूर्व-स्वीकृति लिए जाने के उदाहरण भी मिलते हैं। जन-साधारण में बहु-विवाह की प्रथा का प्रचलन नहीं था परन्तु राजवंशों में बहु-विवाह की प्रथा थी।

    यद्यपि भाई-बहिन तथा पिता-पुत्री में विवाह वर्जित था तथापि आदिम प्रथाओं के प्रतीक बचे हुए थे। यम की जुड़वां बहन यमी ने यम के सम्मुख प्रेम का प्रस्ताव रखा था किंतु यम ने इसका विरोध किया था। बहुपतित्त्व के बारे में भी कुछ सूचना मिलती है। मरुतों ने रोदसी को मिलकर भोगा, और अश्विनी भाई सूर्य-पुत्री सूर्या के साथ रहते थे परन्तु ऐसे उदाहरण बहुत थोड़े मिलते हैं। सम्भवतः ये मातृतंत्रात्मक अवस्था के अवशेष थे। पुत्र को, माता का नाम दिए जाने के भी कुछ उदारहण मिलते है, जैसे, मामतेय।

    कुछ लोग दहेज देकर और कुछ लोग दहेज लेकर कन्यादान करते थे। दहेज वही लोग देते थे जिनकी कन्या में कुछ त्रुटि होती थी। इसी प्रकार धन देकर वही लोग विवाह करते थे जिनके पुत्र में कोई त्रुटि होती थी। विवाह एक पवित्र बन्धन समझा जाता था और एक बार इस बन्धन में बंध जाने पर, आजीवन बन्धन नहीं टूट सकता था। विधवा-विवाह का ऋग्वेद में कहीं संकेत नहीं मिलता।

    दस्युओं के साथ विवाह का निषेध था। ऋग्वेद में नियोग-प्रथा और विधवा-विवाह के अस्तित्त्व के बारे में भी जानकारी मिलती है। बाल-विवाह के अस्तित्त्व का कोई उदाहरण नहीं मिलता। अनुमान होता है कि ऋग्वैदिक-काल में 16-17 वर्ष की आयु में विवाह होते थे। ऋग्वेद में अन्तर्जातीय विवाहों का भी उल्लेख है। अनुलोम तथा प्रतिलोम दोनों प्रकार के विवाहों के उदाहरण मिलते हैं।

    अनुलोम विवाह के अन्तर्गत ब्राह्मण विमद और राजकन्या कमद्यु तथा ब्रह्मर्षि श्यावाश्व तथा राजकन्या दार्भ्य के विवाहों का उल्लेख मिलता है। प्रतिलोम विवाह में देवयानि का राजा ययाति के साथ और ब्राह्मण कन्या शाश्वती का राजा असंग के साथ विवाह का उल्लेख मिलता है।

    (4.) स्त्रियों की दशा: ऋग्वैदिक-काल में पुरुष की प्रधानता होने पर भी स्त्रियों को समाज में उच्च स्थान प्राप्त था। उन्हें आदर की दृष्टि से देखा जाता था। ऋग्वेद में स्त्री को अग्नि देवता के समान माना गया है तथा कुछ मंत्रों में उसे उषा देवी के समान गौरव दिया गया है। फिर भी, ऋग्वेद के अनेक मन्त्रों में पुत्रों की कामना देखने को मिलती है। विवाहिता स्त्रियाँ गृहस्वामिनी समझी जाती थीं और समस्त धार्मिक कार्यों में अपने पति का हाथ बंटाती थीं। पर्दा प्रथा नहीं थी। स्त्रियाँ समस्त उत्सवों में भाग लेती थीं।

    ऋग्वेद के अनेक मन्त्रों में पत्नी ही घर है, पत्नी ही गृहस्थी है, पत्नी ही आनन्द है, जहाँ स्त्रियों का सम्मान होता है, वहाँ देवताओं का निवास होता है आदि विचारों के प्रमाण मिलते हैं। वे पति की अर्द्धागिनी तथा गृह-स्वामिनी समझी जाती थीं। स्त्रियाँ यज्ञ-याजन तथा धार्मिक उत्सवों में स्वतन्त्रतापूर्वक भाग लेती थी किंतु स्त्रियाँ स्वतन्त्र नहीं होती थीं, उन्हें अपने पुरुष-सम्बन्धियों के सरंक्षण तथा नियंत्रण में रहना पड़ता था। विवाह के पूर्व कन्याओं को अपने पिता के संरक्षण तथा नियंत्रण में रहना पड़ता था।

    पिता के न रहने पर वह अपने भाई के संरक्षण में रहती थी। विवाह हो जाने पर वह पति के और विधवा हो जाने पर पुत्र के संरक्षण में रहती थी। इस प्रकार स्त्री को सदैव किसी न किसी पुरुष का संरक्षण प्राप्त था। परिवार में स्त्री का मुख्य कार्य गृह-प्रबन्धन करना तथा बच्चों का लालन-पालन करना था। था। स्त्रियां सभा-समिति में भाग लेती थीं। वे पुत्रियों के साथ यज्ञों में भी सम्मिलित होती थीं।

    सूक्तों की रचना करने वाली घोषा, अपाला, लोपमुद्रा, पांच स्त्रियों के बारे में जानकारी मिलती है, किन्तु बाद के ग्रंथों में ऐसी 20 स्त्रियों के उल्लेख मिलते हैं। सूक्तों की रचना मौखिक रूप में होती थी। उस काल की कोई लिखित सामग्री नहीं मिलती।

    (5.) नियोग-प्रथा: कुछ विद्वानों ने ऋग्वेद के एक अंश के आधार पर सिद्ध करने का प्रयास किया है कि समाज में सती-प्रथा प्रचलित थी परन्तु उनके तर्कों में विशेष बल नहीं है। अधिकांश विद्वानों का माना है कि ऋग्वैदिक-काल में आर्यों में सती-प्रथा प्रचलित नहीं थी अपितु इसके स्थान पर नियोग-प्रथा का प्रचलन था जिसके अन्तर्गत विधवा-स्त्री को पुत्र-प्राप्ति के निमित्त अपने देवर अथवा कुटुम्ब के किसी अन्य व्यक्ति के साथ पत्नी के रूप में रहने की स्वीकृति प्राप्त थी।

    नियोग-प्रथा से उत्पन्न सन्तान समाज में घृणित नहीं समझी जाती थी। कुछ विद्वानों का मानना है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में सधवा स्त्री को भी पुत्र-प्राप्ति के निमित्त अपने पति के जीवनकाल में ही किसी अन्य व्यक्ति से शारीरिक सम्बन्ध बनाने की अनुमति थी। ऋग्वैदिक-काल में विधवा-विवाह के स्पष्ट उदाहरण नहीं मिलते।

    (6.) वेश-भूषा: ऋग्वैदिक आर्य सुन्दर वस्त्र तथा आभूषण धारण करते थे। ये लोग प्रायः तीन वस्त्र पहनते थे। कमर से नीचे धोती जैसा वस्त्र होता था जिसे 'नीवि' कहते थे। दूसरा वस्त्र काम कहलाता था और तीसरा वस्त्र अधिवास अथवा 'द्रापि' था जिसे शॉल की तरह ओढ़ा जाता था। वे सिर पर पगड़ी भी पहनते थे जिसे 'ऊष्णीय' कहते थे। ये लोग रंग-बिरंगे ऊनी तथा सूती वस्त्र पहनते थे। कुछ वस्त्रों पर सोने का भी काम किया जाता था जिन्हें वे उत्सव के अवसर पर पहनते थे।

    स्त्री एवं पुरुष लम्बे बाल रखते थे जिनमें वे तेल डालते थे और कंघी करते थे। स्त्रियाँ चोटी बनाती थीं तथा जूड़ा बांधती थीं और पुरुष अपने बाल कुण्डल के आकार के रखते थे। यद्यपि दाढ़ी रखने की प्रथा थी परन्तु कुछ लोग दाढ़ी मुंडवा भी लेते थे। ऋग्वैदिक आर्य, आभूषणों का भी प्रयोग करते थे जो प्रायः सोने के बने होते थे। भुजबन्ध, कान की बाली, कंगन, नूपुर आदि का प्रयोग स्त्री-पुरुष दोनों करते थे। स्त्रियां सिर पर कुम्ब नामक विशेष प्रकार का आभूषण धारण करती थीं।

    (7.) भोजन: चावल, जौ, फल, तरकारी, घी तथा दूध-दही ऋग्वैदिक आर्यों का मुख्य भोजन था। अनाज को भूनकर अथवा पीसकर, घी-दूध के साथ खाया जाता था। ये लोग फल तथा तरकारी का अधिक प्रयोग करते थे। कुछ पशुओं का मांस खाया जाता था।

    (8.) पेय-पदार्थ: ऋग्वैदिक आर्य दो प्रकार के पेय पदार्थों का प्रयोग करते थे। एक को सोम कहते थे और दूसरे को सुरा। सोम एक वृक्ष के रस से बनाया जाता था जिसमें मादकता नहीं होती थी। यज्ञ के अवसरों पर इसका प्रयोग किया जाता था। सुरा में मादकता होती थी और यह अन्न से बनाई जाती थी। ऋग्वेद में सुरापान की निन्दा की गई है। ब्राह्मण इसे घृणा की दृष्टि से देखते थे।

    (9.) मनोरंजन: ऋग्वैदिक आर्यों के आमोद-प्रमोद के प्रधान साधनों में रथ-संचालन, द्यूतर्कीड़ा, नृत्य एवं गायन, वाद्ययंत्र बजाना तथा पशु-पक्षियों का शिकार करना सम्मिलित थे। वे अपने जीवन को सुखी और आनन्दपूर्ण बनाने के लिए प्रयत्नशील रहते थे। जीवन को उल्लास के साथ बिताना उनका सहज स्वभाव था। वे लोग आमोद-प्रमोद के लिए विविध उत्सवों का आयोजन करते थे जिनमें नृत्य, गायन एवं वाद्यों के प्रदर्शन से अपना मनोरंजन करते थे।

    इन आयोजनों में स्त्री-पुरुष समान रूप से भाग लेते थे। नृत्य के साथ वीणा और करताल का प्रयोग होता था। गान में विभिन्न प्रकार के मन्त्रों तथा गीतों का और वाद्य संगीत में वीणा, दुन्दुभी, शंख, झांझ और मृदंग का प्रयोग होता था। विभिन्न अवसरों पर घुड़दौड़़, रथदौड़़ और मल्ल-युद्ध आयोजित किए जाते थे।

    (10.) लेखन कला: यद्यपि ऋग्वैदिक आर्यों के पास ऋग्वेद जैसा महान् ग्रंथ था तथापि अधिकांश विद्वान मानते हैं कि ऋग्वैदिक-काल के आर्य लेखन कला से अपरिचित थे तथा उस काल का समस्त ज्ञान मौखिक था किंतु यह मत सही प्रतीत नहीं होता। उस काल की संस्कृत भाषा काफी उन्नत थी जिसका व्याकरण सम्बन्धी ठाठ देखते ही बनता है। प्रत्येक क्रिया के अलंकार, वचन, पुरुष आदि सुनिश्चित हैं और कारक एवं विभक्तियाँ के रूप भी नियत हैं।

    इसके उपरांत भी यदि ऋग्वैदिक-काल के आर्य लेखन कला से अपरिचित थे तो यह किसी आश्चर्य से कम नहीं है। डॉ. भण्डारकर ने सिद्ध करने का प्रयास किया है कि आर्यों को ऋग्वैदिक समय से ही लेखन कला का ज्ञान था और उनकी ब्राह्मी लिपि, प्रागैतिहासिक काल के मिट्टी के बर्तनों पर प्राप्त चिह्नों से विकसित हुई परन्तु डॉ. आर. सी. मजूमदार का मानना है कि जब तक निश्चित साक्ष्य नहीं मिलते तब तक यह प्रश्न अनुत्तरित रहेगा।

    (11.) शिक्षा: ऋग्वैदिक-काल में शिक्षा सामान्यतः मौखिक होती थी। गुरु, शिष्यों को वेद-मन्त्रों की शिक्षा देते थे। विद्यार्थी उन्हें कण्ठस्थ कर लेते थे। शिक्षा का उद्देश्य बुद्धि को बढ़ाना तथा आचरण को शुद्ध बनाना होता था। प्रत्येक ऋषिकुल एक वैदिक विद्यालय की तरह था जहाँ ऋषि-मुनि, कुमारों को शिक्षा देते थे। सभंवतः लड़के और लड़कियां दोनों ही पढ़ते थे। इसलिए कुछ स्त्रियां ऋगवेद के मंत्रों का निर्माण करती थीं। गायत्री मन्त्र उस युग के ज्ञान का उच्चतम मंत्र माना जाता था। उच्चारण के सात प्रकार और वाक् की चार अवस्थाओं का उल्लेख भी मिलता है।

    (12.) औषधि: ऋग्वैदिक आर्य, स्वास्थ्य के प्रति सचेत थे। अश्विन औषधि-शास्त्र के देवता थे और उनकी पूजा की जाती थी। औषधियाँ जड़ी-बूटियों की होती थीं। उस काल में चिकित्सा करना व्यवसाय बन गया था।

    (13.) आश्रम-व्यवस्था: ऋग्वैदिक काल में आश्रम-व्यवस्था का स्वरूप सामने नहीं आया था। इस समाज के लोग विभिन्न प्रकार के कर्म करते थे और सभी आर्य कहलाते थे।

    (14.) गृह-व्यवस्था: ऋग्वैदिक आर्यों के घर बांस, लकड़ी तथा सरपत के बने होते थे। प्रत्येक घर में अग्निशाला होती थी जिसमें सदैव अग्नि जलती रहती थी। प्रत्येक घर में पुरुषों के लिए एक अलग बैठक और स्त्रियों के लिए अलग कक्ष होता था।

    (15.) शव विसर्जन: इस काल में आर्य, मृतक शरीर को या तो जलाते थे या गाड़ते थे परन्तु विधवाओं को जलाया नहीं जाता था वरन् उन्हें गाड़ा जाता था।

    (16.) नैतिकता: आर्यों के जीवन में नैतिक मूल्यों को बड़ा महत्त्व दिया गया था। अतिथियों, वृद्धों तथा गुरुजनों का आदर करना तथा अपने से छोटे के साथ स्नेह रखना उत्तम समझा जाता था। चोरी, लूट-पाट, व्यभिचार आदि अनैतिक कार्यों को पाप की दृष्टि से देखा जाता था। आर्यों के जीवन में समाज सेवा की भावना का विशेष महत्त्व था।

    सामाजिक वर्गीकरण

    (1.) वर्ण-व्यवस्था: ऋग्वैदिक-काल में व्यवसाय पर आधारित विभाजन प्रारंभ हो चुका था परन्तु यह विभाजन अभी सुस्पष्ट नहीं था। ऋग्वेद के प्रारम्भिक मण्डलों में वर्ण-व्यवस्था सम्बन्धी उल्लेख नहीं मिलता। वैश्य और शूद्र शब्दों का उल्लेख दसवें मण्डल के पुरुष सूक्त में ही मिलता है। वर्ण-व्यवस्था का प्रारम्भिक स्वरूप कर्म और श्रम के सिद्धान्त पर आधारित था।

    कर्म से कोई भी व्यक्ति ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्व हो सकता था। आवश्यकतानुसार लोग अपना वर्ण बदल भी सकते थे क्योंकि वर्ण-विभाजन जन्मजात नहीं था। इस सम्बन्ध में कठोर नियमांे का अभाव था। वर्णों में परस्पर खान-पान तथा वैवाहिक सम्बन्ध पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं था। शूद्र द्वारा बनाए गए भोजन को करने पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं था और उनके सम्पर्क में आने अथवा उनका स्पर्श करने को अपवित्रता नहीं माना जाता था।

    ऋग्वेद में एक परिवार के सदस्य का कथन है- 'मैं कवि हूूँ, मेरा पिता वैद्य है, और मेरी माँ पत्थर की चक्की चलाती है। धन की कामना करने वाले नाना कर्मों वाले हम एक साथ रहते हैं...।' इसी प्रकार, देवापि और शान्तनु नामक दो भाइयों का उल्लेख मिलता है। देवापि पुरोहित थे और शान्तनु राजा। इससे स्पष्ट है कि ऋग्वैदिक-काल में वर्ण-व्यवस्था कर्म प्रधान थी, न कि जन्म प्रधान।

    (2.) आर्य-अनार्य का विभेद: ऋग्वेद में लगभग ई.पू.1500-1000 के पश्चिमोत्तर भारत के लोगों के शारीरिक रूप-रंग के बारे में जानकारी मिलती है। रंग के लिए वर्ण शब्द का उपयोग हुआ है। आर्य गौर वर्ण के थे जबकि भारत के मूल निवासी काले वर्ण के थे। रंग-भेद ने सामाजिक वर्गीकरण में आंशिक योग दिया होगा किंतु सामाजिक विभेद का सबसे बड़ा कारण, आर्यों की स्थानीय निवासियों पर विजय प्राप्त करना था। आर्यों ने काले वर्ण के स्थानीय निवासियों को अनार्य कहा। आर्यों एवं अनार्यों की शारीरिक रचना में भी भेद था।

    आर्यों की नाक ऊँची होती थी जबकि इसके विरुद्ध अनार्यों की नाक बैठी हुई आर्य लोग यज्ञ-अनुष्ठान, व्रतों का पालन करने वाले थे। आर्यों में अपने रक्त की विशुद्धता को कायम रखने की कामना थी। इस प्रकार समाज में दो वर्ग बन गए। दोनों वर्ग रंग, शरीर रचना, संस्कृति, जाति और भाषा की दृष्टि से नितान्त भिन्न थे। ऋग्वेद में उल्लेख है कि- 'उग्र प्रकृति के ऋषि ने दोनों वर्णों का पोषण किया'।

    (3) आर्यों में विभेद: आर्य कबीलों के मुखिया और पुरोहित, शत्रु राजा की पराजय के बाद मिले धन को परस्पर बांट लेते थे। विजय से प्राप्त धन पर असामान अधिकार के कारण सामाजिक एवं आर्थिक असमानताएं उत्पन्न हुईं। वैश्यों एवं शूद्रों की तुलना में राजा और पुरोहित अधिक ऊंचे उठ गए। सामान्य जन बचा-खुचा धन प्राप्त करते थे। धीरे-धीरे ऋग्वैदिक समाज तीन समूहों में बंट गया- योद्धा, पुरोहित और सामान्य जन।

    (4) दास व्यवस्था: ऋग्वेद के चौथे एवं दसवें मंडल में पहली बार शूद्रों का उल्लेख मिलता है। आर्यों ने दासों और दस्युओं को जीतकर अधीन बनाया तथा उन्हें शूद्र कहा। ऋग्वेद में पुरोहितों को दास सौंपने के उल्लेख बार-बार मिलते हैं। घर का काम करने वाली मुख्यतः दासियां थीं। घरेलू दासों के तो उल्लेख मिलते हैं किंतु श्रमिकों के नहीं। अतः अनुमान होता है कि ऋग्वैदिक-काल के दासों को कृषि अथवा अन्य उत्पादन कार्याें में नहीं लगाया जाता था।

    ऋग्वैदिक आर्यों का आर्थिक जीवन

    ऋग्वैदिक आर्यों का आर्थिक जीवन सरल था, उसमें जटिलता उत्पन्न नहीं हुई थी। प्रारंभिक ऋग्वैदिक आर्यों की अर्थ-व्यवस्था मुख्यतः पशुचारी थी, अन्न-उत्पादक नहीं थी, इसलिए लोगों से नियमित करों की उगाही बहुत कम होती थी। भूमि अथवा अनाज के दान के बारे में कोई उल्लेख नहीं मिलता। समाज में कबीलाई बंधन शक्तिशाली थे। करों की उगाही अथवा भू-संपत्ति के आधार पर सामाजिक वर्ग अभी अस्तित्त्व में नहीं आए थे। इस काल की आर्थिक दशा इस प्रकार से थी-

    (1) गाँवों की व्यवस्था: ऋग्वैदिक आर्य गाँवों में रहते थे। ऋग्वेद में नगरों का कहीं उल्लेख नहीं मिलता। गाँव पास-पास होते थे। वन्य पशुओं एवं शत्रुओं से सुरक्षा के लिए मिट्टी के घरों वाली बस्तियों की झाड़ियों अथवा अन्य कांटों आदि से किलेबंदी की जाती थी। अधिकांश घर बांस तथा लकड़ी के बने होते थे।

    (2) कृषि: ऋग्वैदिक आर्यों का प्रधान व्यवसाय कृषि था। प्रत्येक परिवार का अलग खेत होता था परन्तु चरागाह सबका एक होता था। खेती हल से की जाती थी। ऋग्वेद के आरंभिक भाग में फाल के उल्लेख मिलते हैं। उनके फाल सम्भवतः लकड़ी के बने होते थे। ऋग्वैदिक लोग बुवाई, कटाई और मंडाई से परिचित थे। उन्हें विभिन्न ऋतुओं की भी अच्छी जानकारी थी। ये लोग प्रधानतः गेहूँ तथा जौ की खेती करते थे। इस काल के आर्य, फल तथा तरकारी भी पैदा करते थे।

    (3) पशु-पालन: ऋग्वैदिक आर्यों का दूसरा प्रमुख व्यवसाय पशु-पालन था। पशुओं में गाय का सर्वाधिक महत्त्व था, क्योंकि यह सर्वाधिक उपयोगी होती थी। गाय को अध्न्या कहा गया है अर्थात् जो मारी न जाय। ऋग्वेद में गाय के बारे में आए बहुत सारे उल्लेखों से यही सिद्ध होता है कि आर्य पशुपालक थे। अधिकांश लड़ाइयां उन्होंने गायों के लिए लड़ी थीं। ऋग्वेद में युद्ध के लिए गविष्टि शब्द का उपयोग हुआ हैं। जिसका अर्थ 'गायों की खोज' होता है। गाय को सबसे बड़ी सम्पत्ति समझा जाता था। बैलों से हल जोतने तथा गाड़ी खींचने के काम लिया जाता था। घोड़ों का प्रयोग रथों में किया जाता था। आर्यों द्वारा पाले जाने वाले अन्य पशु, भेड़, बकरी तथा कुत्ते थे। कुत्ते घरों तथा बस्तियों की रखवाली करते थे।

    (4) पशुओं का शिकार: ऋग्वैदिक आर्य मांस खाते थे। इसलिए वन्य पशुओं का शिकार भी उनकी जीविका का साधन था। ये लोग धनुष-बाण तथा लोहे के भालों द्वारा सूअर, हरिण तथा भैंसों का शिकार करते थे और पक्षियों को जाल में फंसा कर पकड़ते थे। शेरों को चारों ओर से घेर कर मारा जाता था।

    (5) मृद्भाण्ड: हरियाणा के भगवानपुरा से और पंजाब के तीन स्थलों से चित्रित धूसर मृदभांड और बाद के काल के हड़प्पा के मिट्टी के बर्तन मिले हैं। भगवानपुरा में मिली वस्तुओं का तिथि निर्धारण ई.पू.1600 से ई.पू.1000 तक किया गया है। ऋग्वेद की रचना इस काल में हो रही थी। इन चारों स्थानों का भौगोलिक क्षेत्र वही है जो ऋग्वेद में दर्शाया गया है। यद्यपि इन चारों स्थलों पर चित्रित धूसर पात्र मिले हैं फिर भी यहाँ से न तो लौह-सामग्री और न ही अनाज मिले हैं। अतः हम चित्रित धूसर मृद्भांड की एक लौह-पूर्व अवस्था के बारे में सोच सकते हैं जो ऋग्वैदिक अवस्था की समकालिक है।

    (6) दस्तकारी के कार्य: ऋग्वेद में बढ़ई, रथकार, बुनकर, चर्मकार, कुम्हार आदि शिल्पकारों के उल्लेख मिलते हैं। इनसे पता चलता है कि आर्य लोग इन शिल्पों से भली-भांति परिचित थे। तांबे अथवा कांसे के लिए प्रयुक्त अयस शब्द से ज्ञात होता है कि उन्हें धातुकर्म की जानकारी थी। जब वे उप-महाखंड के पश्चिमी भाग में बसे हुए थे तब वे सम्भवतः राजस्थान के खेतड़ी की खानों से तांबा प्राप्त करते होंगे। ऋग्वैदिक-काल के बढ़ई रथ तथा गाड़ियाँ बनाते थे। ये लोग लकड़ी के प्याले भी बनाते थे और उन पर बहुत अच्छी नक्काशी करते थे। शिल्पी ताम्बे एवं कांसे के विभिन्न प्रकार के बर्तन, अस्त्र-शस्त्र और अन्य उपयोगी वस्तुएँ बनाते थे। सुनार, सोने-चांदी के आभूषण बनाते थे। चर्मकार लोग चमड़े की वस्तुएँ बनाते थे। सीना-पिरोना, चटाइयां बुनना, ऊनी तथा सूती कपड़े बनाना आदि भी जीविका के साधन थे। कुम्हार चाक पर मिट्टी के बर्तन बनाते थे।

    (7) व्यापार: ऋग्वैदिक आर्यों की जीविका का एक साधन व्यापार भी था। ये लोग विदेशी तथा आन्तरिक दोनों प्रकार का व्यापार करते थे। प्रारम्भ में व्यापार वस्तु-विनिमय द्वारा होता था। बाद में गाय द्वारा मूल्य आंका जाने लगा और अन्त में सोने-चांदी से बनी मुद्राओं का प्रयोग होने लगा। इस काल में निष्क नामक मुद्रा का व्यवहार होने लगा। कपड़े, चमड़े तथा चद्दरें व्यापार की मुख्य वस्तुएँ होती थीं। माल ले जाने के लिए गाड़ियों तथा रथों का प्रयोग किया जाता था। नदियों को पार करने के लिए नावों का प्रयोग होता था।

    (8) ऋण की प्रथा: ऋग्वैदिक-काल में ब्याज पर ऋण देने की प्रथा थी। वैश्य, साहूकार तथा महाजन यह कार्य करते थे और यह उनकी जीविका का प्रमुख साधन होता था। ऋण चुकाना एक धार्मिक कर्त्तव्य समझा जाता था और न चुकाने पर उसे निश्चित समय तक महाजन की सेवा करनी पड़ती थी।

    ऋग्वैदिक सामाज में कलाओं का विकास

    बौद्धिक परिपक्वता के कारण ऋग्वैदिक-काल के लोगों ने विभिन्न प्रकार की रचनात्मक कलाओं का विकास किया। वे सही अर्थों में कला-प्रेमी थे।

    (1) काव्य कला: ऋग्वैदिक आर्य, काव्य-कला में बड़े कुशल थे। ऋग्वेद पद्य शैली में लिखा गया है। ऋग्वेद का अधिकांश काव्य धार्मिक गीति-काव्य है। इस काल की कविता में स्वाभाविकता तथा सौन्दर्य है। उषा की प्रशंसा में ऋषियों ने बड़ी भावुकता प्रकट की है।

    (2) लेखन कला: यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है कि ऋग्वैदिक आर्य लेखन-कला से परिचित थे अथवा नहीं परन्तु डॉ. भण्डारकर आदि अनेक विद्वानों की धारणा है कि वे इस कला को जानते थे। उस काल के मृदभाण्डों पर बनी आकृतियां ब्राह्मी लिपि जैसी दिखती हैं।

    (3) अन्य कलाएँ: ऋग्वैदिक आर्य अन्य कई कलाओं में प्रवीण थे। गृह निर्माण-कला में वे इतने निपुण थे कि सहस्र-स्तम्भ तथा सहस्र-द्वार के भवनों का निर्माण करते थे। ऋग्वैदिक आर्य कताई, बुनाई, रगांई, धातु-कला, संगीत कला, नृत्य कला एवं गायन कला में भी निपुण थे।

    ऋग्वैदिक आर्यों का धार्मिक जीवन

    ऋग्वैदिक आर्यों का जीवन धर्ममय था। जीवन का ऐसा कोई अंग नहीं था जिस पर धर्म की गहरी छाप न हो। इस काल का धर्म बड़ी उच्च-दशा में था तथा प्राकृतिक शक्तियों एवं उनके नियामक देवताओं की पूजा होती थी। इस प्रकार ऋग्वैदिक आर्यों का धर्म बहुदेववादी था।

    ऋग्वैदिक धर्म की विशेषताएँ

    (1.) ईश्वर की परम सत्ता में विश्वास: ऋग्वैदिक आर्यों का ईश्वर की परम सत्ता में विश्वास था जो इस जगत् का निर्माण तथा पालन करने वाला है। प्रारम्भ मंे आर्यों ने वरुण को देवाधिदेव माना परन्तु बाद में उसका स्थान इन्द्र ने ले लिया। बाद में आर्यों ने अनुभव किया कि इन्द्र के ऊपर भी कोई परमसत्ता है, जो समूचे ब्रह्माण्ड को संचालित करती है तथा स्रष्टा ही सृष्टि के रूप में विस्तृत है। वह प्रकाश के रूप में ज्योतिर्मय आकाश में व्याप्त है, वसु के रूप में अन्तरिक्ष में निवास करता है, प्राण के रूप में मनुष्य के अन्तःस्थल में विद्यमान है। वस्तुतः सृष्टा, सृष्टि, प्रकृति और मानव एक ही अनुशासन से निष्पन्न होकर तथा एक ही अनुशासन से ग्रथित होकर समन्वित हैं। ऋग्वेद तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण में कहा गया है- 'अग्नि वाक् में प्रतिष्ठित है और वाक् हृदय में, हृदय मुझ में, मैं अमृत्व में और अमृत्व ब्रहा में सन्निहित है।'

    (2.) ऐकेश्वरवाद में विश्वास: अनेक देवताओं में विश्वास करते हुए भी ऋग्वैदिक आर्यों के धर्म का मूलाधार एकेश्वरवाद था। उनका एक ही ईश्वर था जिसे वे प्रजापति कहते थे जो सर्वव्यापी था। ऋषियों का कहना था- 'सत एक ही है। विद्वान उसे अग्नि, यम, मातरिश्वा आदि विभिन्न नामों से पुकारते है।' आर्यों ने इनके उपर भी एक परम तत्त्व की प्रतिष्ठता की और उसे हिरण्यगर्भ, प्रजापति तथा विश्वकर्मा नामों की संज्ञा दी। एकेश्वरवाद की यही पराकाष्ठा मानी जाती है। इसी एक तत्त्व को आर्यों ने 'सत' नाम से पुकारा। इस प्रकार ऋग्वैदिक आर्य इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि सत का ज्ञान ही आत्मा का ज्ञान है। संसार के विभिन्न जीव विभिन शरीर अवश्य धारण किए हुए हैं पर उन सब की आत्मा एक ही है। मोह जनित भेदों को नष्ट करके उस परमसत् से साक्षात्कार करना ही जीवन का परम लक्ष्य है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आर्य-ऋषि परम-तत्त्व की ओर उन्मुख होने लगे।

    (3.) प्राकृतिक शक्तियों की उपासना: प्राकृतिक घटनाएं यथा- वर्षारंभ, सूर्य एवं चंद्र का उदय, नदियांे तथा पर्वतों आदि का अस्तित्त्व, आर्यों के लिए पहेली-जैसे थे। ऋग्वेद में ऐसी अनेक दैवी शक्तियों का समावेश है जिनकी स्तुति में विभिन्न ऋषि-कुलों ने सूक्तों की रचना की। इस प्रकार ऋग्वैदिक-काल में प्राकृतिक शक्तियों की पूजा आरंभ हुई। ऋग्वैदिक आर्यों का विश्वास था कि सूर्य, चन्द्र, वायु, मेघ आदि में ईश्वर निवास करता है। इसलिए वे इन सबकी उपासना करते थे। आर्यों ने सर्वप्रथम 'द्यौस' तथा 'पृथ्वी' की पूजा की। आर्यों का विश्वास था कि द्यौस तथा पृथ्वी की अनुकम्पा से ही मानव-जीवन सम्भव था। इन दोनों को अन्य समस्त देवताओं का जन्मदाता मान लिया गया।

    आकाश देवता को 'वरुण' कहा जाने लगा। पृथ्वी और आकाश के मध्य में विद्यमान समस्त वस्तुओं में वरुण का वास माना गया। ऋग्वेद में वरुण के दो रूपों का उल्लेख मिलता है। एक रूप में सुख-समृद्धि देने वाला, सहृदय, सृष्टि के निर्माता का, तो दूसरा रूप है विनाश तथा अभिशाप देने वाले का। ऋग्वैदिक आर्यों की मान्यता थी कि वरुण की भक्ति, पूजा तथा प्रार्थना से वह प्रसन्न होता है और पापियों के पाप क्षमा कर देता है। कुछ विद्वानों का माना है कि वरुण की उपासना से ही आर्यों में कर्मवाद और भक्तिमार्ग के सिद्धान्तों का उदय हुआ। जब वरुण को वृत्रासुर ने बंदी बना लिया तब इंद्र ने वृत्रासुर को मारकर वरुण को मुक्त करवाया तथा तथा उसे पुनः देवत्व प्रदान किया।

    वरुण के साथ ही 'मित्र' की भी पूजा की जाने लगी। आर्यों ने बहिर्जगत् के प्रकाश का मानवीकरण करके उसे 'मित्र' का नाम दिया। दोनों को संयुक्त रूप से 'मित्रावरुण' कहा गया। बहिर्जगत में 'सूर्य' का भी बड़ा महत्त्व था। अतः आर्यों ने सूर्य को भी देवता माना। उसे सम्पूर्ण चर-अचर का रक्षक तथा मनुष्यों के समस्त सत् असत् कर्मों का दृष्टा माना गया। सूर्य के व्यापक रूप को 'सविता' कहा गया। सविता में सूर्य का व्यक्त तथा रात्रि को अव्यक्त रहने वाला रूप दोनों ही सम्मिलित हैं।

    सविता को पाप-मोचन देवता भी माना गया है। ऋग्वैदिक आर्यों ने 'विष्णु' को विश्व का संरक्षक माना। विष्णु, भक्तों की प्रार्थना पर तुरन्त सहायता के लिए पहॅुंचने वाला देवता है। ऋग्वेद में उसके तीन पदों का उल्लेख है, जिसके अनुसार वह समस्त ब्रह्मण्ड में भ्रमण करता है। विष्णु के व्यापक स्वरूप के कारण उसे 'उरु-गाय' अर्थात् व्यापक रूप से गमनशील, और 'उरु-क्रम' अर्थात् व्यापक रूप से अतिक्रमण करने वाला आदि नामों से पुकारा गया है।

    ऋग्वैदिक आर्यों के लिए विष्णु के समान ही 'अग्नि' का भी विशेष महत्त्व था। ऋग्वेद में अग्नि की प्रार्थना सम्बन्धी लगभग 200 मंत्र हैं जो अग्नि के महत्त्व को प्रकट करते हैं। यज्ञ में अग्नि का विशेष महत्त्व था। इसीलिए उसे 'पुरोहित', 'यज्ञिय' और 'होता' कहा गया। अग्नि को देवताओं का मुख्य माना गया है, क्योंकि उसी के द्वारा आहुतियाँ समस्त देवताओं तक पहुँचती हैं। दाहकर्म के लिए भी अग्नि अनिवार्य थी। अग्नि को समस्त लोकों के राक्षसों को भगाने वाला कहा गया है।

    वैदिक आर्य 'सोमरस' के प्रेमी थे। उन्होंने 'सोम' को भी देवता मान लिया तथा सोम को सूर्य और विद्युत से उत्पन्न हुआ बताया। ऋग्वेद के अनेक सूक्तों में वनस्पति से इस पेय के तैयार करने की विधि का वर्णन मिलता है परन्तु इस वनस्पति की सही पहचान अभी तक नहीं हो पाई है। देवताआंे के अनुरोध पर सोम चंद्रमा में समा गया जहाँ से वह जल एवं वनस्पतियों को प्राप्त हुआ। आँधी, तूफान और वर्षा का देवता 'इन्द्र' था।

    ऋग्वेद में इसे सर्वाधिक शक्तिशाली देवता माना गया है। उसे आकाश, अन्तरिक्ष और पृथ्वी से भी अधिक बड़ा माना गया है। एक स्थान पर उसे 'वृत्र' नामक असुर का वध करके बादलों में रुके हुए जल को मुक्त कराने वाला कहा गया है। वृत्र को शीत, कोहरे और पाले का असुर माना गया है। ऋग्वेद में इन्द्र की प्रार्थना करने वाली लगभग 250 ऋचाएँ हैं। ऋग्वेद में उपरोक्त देवताओं के साथ-साथ मरुत, वात, पर्जन्य, अश्विन, यम, रुद्र, पूषण आदि देवताओं का उल्लेख है।

    देवियों में उषा, अदिति, सिन्धु, आरुयानी और सरस्वती के नाम उल्लेखनीय हैं। 'उषा' का अर्थ है- अरुणोदय के पूर्व की वेला। 'अदिति' का अर्थ है- सर्वव्यापिनी प्रकृति। 'आरुयानी' का तात्पर्य वन-देवी से है और मानवी बुद्धि का दैवीकरण 'सरस्वती' के रूप में किया गया था।

    (4.) देवताओं का मानवीकरण: ऋग्वेद के अधिकांश मंत्र, विभिन्न देवताओं की स्तुतियाँ हैं। आराध्य और उपास्य देवों की प्रशंसा करते हुए ऋषिगण उनके गुणों का निर्देशन करते हैं। प्रारम्भिक स्तुतियाँ देवताओं को प्राकृतिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करती हैं किन्तु बाद में अग्नि को अग्निदेव तथा सूर्य को सूर्यदेव आदि संज्ञाओं से सम्बोधित किया गया है। इससे आभास होता है कि प्राकृतिक शक्ति को ही दिव्य शक्ति में परिवर्तित किया गया। इसके लिए उन्होंने प्राकृतिक शक्तियों का मानवीकरण किया।

    उनमें मानव अथवा पशु गुणों का आरोपण करके उन्हें जीवित शक्तियाँ माना। धीरे-धीरे प्रत्येक देवता की एक पत्नी भी स्वीकार कर ली गई तथा उसे देवी माना गया। कालान्तर में वैदिक देवता और देवियों में मानवीय दुर्बलताओं का भी दिग्दर्शन किया गया तथा यह माना गया कि वे मनुष्यों की तरह कार्य कर सकते हैं।

    (5.) देवताओं का वर्गीकरण: ऋग्वेद में 33 देवताओं की प्रार्थना की गई है जिन्हें तीन वर्गों में बांटा गया है। प्रत्येक वर्ग में 11 देवता हैं, जिनमें से एक सर्वप्रधान है- (1) आकाश के देवता: आकाश के देवता में द्यौस, वरुण, मित्र, सविता, पूषण, उषा, अदिति तथा अश्विन आदि सम्मिलित थे। आकाश के सर्वश्रेष्ठ देवता सूर्य हैं। (2) मध्य-स्थान के देवता- मध्य स्थान के देवताओं में इन्द्र, मरुत, वायु, पर्जन्य आदि आते हैं। मध्य-स्थान के सर्वश्रेष्ठ देवता वायु अथवा इन्द्र हैं। (3) पृथ्वी के देवता- पृथ्वी के देवताओं में पृथ्वी, अग्नि, सोम, बृहस्पति, सरस्वती आदि आते थे। पृथ्वी के प्रधान देवता अग्नि हैं।

    (6.) देवताओं की विशेषताएँ: ऋग्वैदिक-काल के देवताओं में कुछ निश्चित विशेषताएँ पाई जाती हैं- (1) समस्त देवी-देवता सदाचार तथा नैतिकता के प्रतीक हैं। (2) समस्त देवता दयावान तथा शुभचिन्तक हैं। कोई भी देवता दुष्ट स्वभाव का नहीं है। (2) समस्त देवता अलग-अलग गुणों एवं शक्तियों वाले हैं और इनके कार्य भी विभिन्न प्रकार के हैं। (3) समस्त देवता जन्म लेते हैं परन्तु फिर अमर हो जाते हैं। (4) समस्त देवता वायु में भ्रमण करते हैं जिनके रथों में घोड़े अथवा अन्य पशु-पक्षी जुते रहते हैं। (5) इन्हें मानव-स्वरूप में प्रदर्शित किया गया है तथा इन्हें मनुष्य के खाद्य-पदार्थ, यथा दूध, अन्न आदि की बलि दी जाती है।

    (7.) देवियों की तुलना में देवताओं को प्रमुखता: आर्यों ने उषा काल का प्रतिनिधित्व करने वाली उषस् और अदिति जैसी देवियों की भी पूजा की किंतु ऋग्वैदिक-काल में इन देवियों को विशेष महत्त्व नहीं दिया गया। पितृत्ंात्रात्मक समाज के वातावरण में देवियों की अपेक्षा इन्द्र एवं वरुण आदि देवताओं को अधिक महत्त्व मिलना स्वाभाविक था।

    (8.) धार्मिक कृत्य: देवताओं की आराधना मुख्यतः स्तुतिपाठ और यज्ञाहुति से की जाती थी। ऋग्वैदिक-काल में स्तुति पाठ का बड़ा महत्त्व था। स्तुति पाठ अकेले और सामूहिक रूप में होते थे। आर्यों का विश्वास था कि प्रार्थना ईश्वर तक पहुँचती है और ईश्वर प्रार्थनाओं से प्रसन्न होता है। गायत्री मन्त्र का बड़ा महत्त्व था और इसका पाठ दिन में तीन बार अर्थात् प्रातःकाल, मध्याह्न तथा सन्ध्या समय किया जाता था। आरम्भ में प्रत्येक कबीले अथवा कुल का अपना एक विशिष्ट देवता होता था। अनुमान होता है कि सम्पूर्ण कबीले के सदस्य इस स्तुतिगान में भाग लेते थे।

    'यज्ञ' ऋग्वैदिक आर्यों की उपासना पद्धति के मुख्य अंग थे। इसलिए ऋग्वेद-धर्म को 'यज्ञ-धर्म' कहा जाता है। यज्ञों में अन्न, घी, जौ तथा सुगन्धित सामग्री की आहुति दी जाती थी तथा देवताओं से लम्बी आयु, पुत्र-पौत्र, धन-धान्य की प्राप्ति तथा शत्रुओं का विनाश करने की प्रार्थना की जाती थी। प्रारम्भ में प्रत्येक आर्य यजन कार्य स्वयं करत था, परन्तु बाद में ब्राह्मण अथवा पुरोहित की सहायता ली जाने लगी।

    सम्पूर्ण 'जन' अर्थात् 'कबीले' द्वारा दी जाने वाली यज्ञबलि को ग्रहण करने के लिए अग्नि और इंद्र का आह्नान किया जाता था। ऋग्वैदिक-काल में यज्ञाहुति के अवसर पर कोई अनुष्ठान अथवा मंत्रपाठ नहीं होता था। उस समय शब्द की चमत्कारिक शक्ति को उतना महत्त्व नहीं दिया जाता था जितना कि उत्तर-वैदिक-काल में दिया जाने लगा था।

    ऋग्वैदिक-काल में आर्य, आध्यात्मिक उन्नति अथवा मोक्ष के लिए देवताओं की आराधना नहीं करते थे। वे इन देवताओं से मुख्यतः संतति, पशु, अन्न, धन, स्वास्थ्य आदि मांगते थे। ऋग्वेद में वृहत एवं व्ययात्मक यज्ञों का भी उल्लेख मिलता है, जो प्रायः राजाओं और धनी व्यक्तियों द्वारा करवाए जाते थे।

    (9.) पितरों की पूजा: ऋग्वैदिक आर्यों में पितरों की पूजा प्रचलित थी। उनका मानना था कि पितरों की कृपा प्राप्त करने से कष्ट क्षीण होते हैं।

    (10.) सदाचार पर बल: ऋग्वैदिक आर्यों में सदाचार पर बहुत बल दिया जाता था। चोरी, डकैती, मिथ्या भाषण, निरपराधों एवं निःशक्तों की हत्या, पराये धन का हरण आदि कार्य निकृष्ट माने जाते थे। जादू, टोना-टोटका, धोखा, व्यभिचार आदि को पाप समझते थे। ऋग्वेद में पाप पुण्य और स्वर्ग-नर्क की परिकल्पना भी मिलती है। आर्यों का विश्वास था कि पुण्यकर्म करने वाले लोग मृत्यु के पश्चात् स्वर्ग में रहते हैं तथा पापकर्म करने वाले लोग नर्क एवं अन्धकूप में धकेले जाते हैं।

    (11.) दान: ऋग्वैदिक आर्यों में दान देने की परम्परा थी। आर्य अपने पुरोहितों को गाय, रथ, घोड़े, दास-दासियां दान करते थे। पुरोहितों को दान देने के जितने भी उल्लेख मिलते हैं उनमें गायों और स्त्री दासों के रूप में दान देना बताया गया है, भूखंड के रूप में कभी नहीं।

    (12.) मंदिरों तथा मूर्तियों का अभाव: ऋग्वैदिक-काल में मन्दिरों का निर्माण नहीं हुआ था और न मूर्ति-पूजा प्रचलित थी किन्तु ऋग्वेद में एक स्थान पर दस गायें देकर इन्द्र की प्रतिमा लेने का उल्लेख आया है। इससे ज्ञात होता है कि ऋग्वैदिक आर्य मूर्ति-पूजा से परिचित थे। उनकी पूर्ववर्ती एवं समकालीन सैन्धव सभ्यता में मूर्ति-पूजा बड़े स्तर पर प्रचलित थी।

    (13.) आत्मा एवं मोक्ष सम्बन्धी विचार: आर्य लोग अमरता में विश्वास करते थे। कुछ विद्वानों का माना है कि ऋग्वैदिक आर्यों में पुनर्जन्म की भावना का उदय हो चुका था। ऋग्वेद में मोक्ष का उल्लेख नहीं मिलता परन्तु पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में इस सम्बन्ध में निश्चयपूर्वक कहना कठिन है।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • अध्याय - 4 राजस्थान में संग्रहालयों की स्थापना का इतिहास

     19.05.2020
    अध्याय - 4 राजस्थान में संग्रहालयों की  स्थापना का इतिहास

    अध्याय - 4 राजस्थान में संग्रहालयों की स्थापना का इतिहास


    राजस्थान में पुराप्रस्तर युगों से लेकर आधुनिक काल तक विकसित मानव सभ्यताओं की गाथा नदी घाटियों, पर्वतीय उपत्यकाओं एवं रेतीले धोरों में दबी हुई है। इसे पहचानना, खोजना, उसकी कालावधि का निर्धारिण करना, संग्रहण करना तथा दर्शकों तक उसकी पहुंच बनाना अत्यंत दुष्कर कार्य है। यह समस्त सामग्री राजस्थान में मनुष्य के उद्भव से लेकर सभ्य बनने तक का इतिहास कहती है जो उस काल में लिखित रूप में नहीं मिलता है। उस इतिहास के साक्ष्य उस काल के खेतों, कुओं, चूल्हों, घरों के अवशेषों एवं शवाधानों के साथ-साथ बर्तनों, आभूषणों, मणकों, मूर्तियों, कंकालों आदि के रूप में मिलते हैं। मानव सभ्यताओं की इससे आगे की गाथा शिलालेखों, सिक्कों, मुद्राओं, वस्त्रों, कीर्ति-स्तम्भों, दुर्गों, महलों, हवेलियों, मंदिरों, मूर्तियों, जलाशयों, कलात्मक कुओं, बावड़ियों, ताल-तलैयों, सर-सरोवरों, समाधियों, छतरियों, अभिलेखों, आदि के रूप में मिलती है। यह सब सामग्री हमारी सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा है। इस विरासत में बहुत सी ऐसी है जिसे संग्रहालयों तक नहीं लाया जा सकता है किंतु बहुत सी सामग्री ऐसी भी है जिसे संग्रहालयों तक लाया जा सकता है और किसी विशिष्ट क्रम एवं विधि में प्रदर्शित कर मानव इतिहास को उसकी निरंतरता के साथ देखा, समझा एवं परखा जा सकता है।

    राजपूताना की देशी रियासातें में अपने राजवंश एवं राज्य की ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण एवं प्रदर्शन का विचार उन्नीसवीं सदी में विकसित होने लगा था। यही कारण है कि राजस्थान निर्माण के पूर्व ही राजपूताना की विभिन्न रियासतों में दस संग्रहालय स्थापित हो गए थे। संग्रहालयों की स्थापना के क्रम में सर्वप्रथम ई.1870 के आसपास उदयपुर में संग्रहालय की स्थापना का काम आरम्भ हुआ किंतु राजपूताना में प्रथम संग्रहालय की विधिवत् स्थाना का श्रेय जयपुर को जाता है। जयपुर में प्रथम संग्रहालय की नींव का पत्थर महाराजा सवाई रामसिंह (द्वितीय) (ई.1835-80) के शासनकाल में ई.1876 में प्रिंस एलबर्ट ने रखा और उसी के नाम पर इस संग्रहालय का नाम एलबर्ट म्यूजियम रखा गया। ई.1881 में जयपुर संग्रहालय का संग्रह अस्थायी रूप से किशनपोल बाजार में स्थित स्कूल आफ आर्ट में लाया गया और महाराजा माधोसिंह (ई.1880-1922) के शासनकाल में ई.1886 में इसे वर्तमान संग्रहालय में स्थानान्तरित कर दिया गया। ई.1887 में सर एडवर्ड बेडफोर्ड ने इसका उद्घाटन कर विधिवत् रूप से इसे जनता के लिए खोल दिया। प्रदेश स्तर के इस संग्रहालय मे राजस्थान के जन-जीवन और शिल्प कौशल की जानकारी मिलती है।

    मेवाड़ में महाराणा फतहसिंह (ई.1884-1930) के शासनकाल में संग्रहालय स्थापित करने का निर्णय लिया गया। इसके लिए गुलाब बाग (उदयपुर) में एक भव्य भवन का निर्माण किया गया। इस भवन निर्माण का निर्णय महारानी विक्टोरिया सिल्वर जुबली समारोह के दौरान लिया गया था। भवन निर्माण का कार्य पूर्ण हो जाने पर इसका नाम विक्टोरिया हॉल म्यूजियम रखा गया और ई.1890 में तत्कालीन वायसराय लार्ड लेंसडाउन द्वारा इसका उद्घाटन किया गया।

    लार्ड कर्जन के समय संग्रहालयों की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किए गए। संग्रहालयों को समुचित एवं व्यवस्थित स्वरूप प्रदान करने के लिए ई.1902 में सर जॉन मार्शल को आर्कियोलॉजीकल सर्वे आफ इण्डिया का डायरेक्टर जनरल नियुक्त किया गया। संग्रहालयों की परिकल्पना को मूर्तरूप देने के लिए पहली बार भारतीय विद्वानों की सेवाएं ली गईं और भारतीय संस्कृति एवं पुरासम्पदा की खोज कर उनके संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया गया। गौरीशंकर हीराचन्द ओझा आदि विद्वानों के सक्रिय सहयोग एवं उनके द्वारा किए गए सर्वेक्षण से एकत्र पुरासम्पदा के फलस्वरूप अजमेर के ऐतिहासिक दुर्ग अकबर का किला में राजपूताना म्यूजियम की स्थापना की गई। ई.1908 में राजपूताना के गर्वनर जनरल के एजेन्ट सर इलियट ग्राहम कोल्विन द्वारा इसका विधिवत् रूप से उद्घाटन किया गया। ओझाजी को राजपूताना म्यूजियम का प्रथम अध्यक्ष बनाया गया। ओझा अैर उसके सुयोग्य उत्तराधिकारी यू. सी. आाचार्य द्वारा विभिन्न स्थानों का विस्तृत सर्वेक्षण किया गया। पुरासामग्री का संकलन किया गया। आर. भण्डारकर द्वारा किए गए उत्खनन कार्य से नगरी (चित्तौड़गढ़) से शुंग और कुषाणकालीन टेराकोटाज, सरवानिया (बांसवाड़ा) से क्षत्रप सिक्कों का भण्डार तथा अढाई दिन के झौंपड़े से उत्कीर्ण पाषाण खण्ड प्राप्त किए गए और आगे भी संग्रहालय को समृद्ध करने के प्रयत्न जारी रहे।

    जोधपुर में ई.1909 में संग्रहालय की स्थापना की गई। ई.1914 में पंडित विश्वेश्वर नाथ रेऊ संग्रहालय के सहायक अधीक्षक बने और उनके निर्देशन एवं सहयोग से संग्रहालय को नया स्वरूप प्रदान किया गया। ई.1916 में संग्रहालय को भारत सरकार की मान्यता मिली और आगे चलकर इसका नाम जोधपुर के महाराजा सरदार सिंह (ई.1895-1911) की स्मृति में सरदार म्यूजियम रख दिया गया। रेऊजी की रुचि और रचनात्मक दृष्टिकोण से संग्रहालय में ओसियां, किराड़ू, मण्डोर, डीडवाना, सांभर, नागौर आदि स्थानों से सांस्कृतिक विरासत को एकत्रकर इस संग्रहालय को समृद्ध किया गया।

    हाड़ौती क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने के लिए ई.1915 में झालावाड़ में क्षेत्र का पहला संग्रहालय स्थापित किया गया। झालावाड़ के तत्कालीन महाराजा भवानीसिंह (ई.1874-1929) की गहन रुचि एवं उनके संरक्षण में संग्रहालय में हाड़ौती क्षेत्र के विभिन्न स्थानों से पुरासामग्री का संकलन कर संग्रहालय की श्रीवृद्धि की गई। ई.1929 में उम्मेद भवन पैलेस संग्रहालय की स्थापना की गई।

    संग्रहालय स्थापना की दौड़ में बीकानेर भी पीछे नहीं रहा। रियासत ने इटली के विद्वान डॉ. एल. पी. टेस्सीटोरी को आमंत्रित कर एक विस्तृत सर्वेक्षण करवाया और उन्होंने गंगानगर-बीकानेर क्षेत्र से महत्वपूर्ण पुरासामग्री का संकलन किया। डॉ. टेस्सीटोरी के संग्रह का उपयोग करते हुए ई.1937 में गंगा गोल्डन जुबली म्यूजियम की स्थापना की गई। महाराणा फतहसिंह (ई.1884-1930) ने चित्तौड़गढ़ संग्रहालय का निर्माण करवाया।

    संग्रहालय स्थापना की शृंखला में ई.1940 में अलवर और ई.1944 में भरतपुर रियासतों में संग्रहालय स्थापित किए गए। भरतपुर रियासत में महाराजा ब्रजेन्द्र सवाई वीरेन्द्र सिंह बहादुर जंग (ई.1929-47) की प्रेरणा से मूर्तिशिल्प, स्थापत्य, शिलालेख एवं अन्य पुरा सामग्री का संकलन कर इसे स्थानीय पुस्तकालय परिसर में प्रदर्शित किया गया। संग्रहालय के संस्थापक क्यूरेटर रावत चतुर्भुजदास चतुर्वेदी के अथक प्रयासों से इस संग्रहालय में पुरासम्पदा की अभिवृद्धि की गई। आगे चलकर इसे दुर्ग में स्थित वर्तमान भवन में स्थानान्तरित किया गया तथा ई.1944 में जनता के लिए खोला गया। ई.1951 में इसमें सिलहखाना और कमराखास भी जोड़ दिया गया। संग्रहालय को समृद्ध करने में भरतपुर के तत्कालीन शासकों तथा मेजर हार्वे का उल्लेेखनीय योगदान रहा।

    ई.1944 में कोटा और ई.1949 में आमेर संग्रहालय की स्थापना के साथ संग्रहालयों की संख्या बढ़ कर दस हो गई। राजस्थान निर्माण के बाद ई.1950 में पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग की स्थापना हुई और विभाग ने संग्रहालयों के विस्तार की दिशा में उल्लेेखनीय कदम उठाए। इसके परिणाम स्वरूप ई.1957 में श्री बांगड़ राजकीय संग्रहालय पाली, ई.1959 में डूंगरपुर और ई.1961 में आहाड़ संग्रहालयों की स्थापना संभव हो सकी। संग्रहालयों के पुनर्गठन एवं विकास की प्रक्रिया सतत रूप से चलती रही और ई.1965 में माउण्ट आबू संग्रहालय तथा ई.1968 में मण्डोर संग्रहालय स्थापित किए गए।

    ई.1954 में बिड़ला तकनीकी म्यूजियम की, ई.1959 में जयपुर में सिटी पैलस संग्रहालय की तथा ई.1960 में श्रीरामचरण प्राच्य विद्यापीठ एवं संग्रहालय जयपुर की स्थापना हुई। ई.1964 में लोक संस्कृति शोध संस्थान नगरश्री, चूरू की स्थापना हुई।

    चित्तौड़गढ़ क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत और पुरासामग्री के प्रदर्शन के लिए ई.1969 में चित्तौड़गढ़ संग्रहालय की स्थापना हुई। ई.1977 में आधुनिक कला प्रवृत्तियों को प्रदर्शित करने वाली राज्य की पहली कला दीर्घा स्थापित हुई जिसे आगे चलकर राजस्थान ललित कला अकादमी को सौंप दिया गया। विभाग द्वारा पुरान्वेषण, पुरा सामग्री के संकलन-संग्रहण एवं संरक्षण का कार्य निरन्तर जारी रहा और ई.1983 में हवामहल संग्रहालय तथा ई.1984 में जैसलमेर संग्रहालय की स्थापना की गई। ई.1985-86 में गंगानगर जिले में कालीबंगा के उत्खनन से प्राप्त सामग्री के लिए सभ्यता स्थल पर ही संग्रहालय का निर्माण किया गया। अब यह हनुमानगढ़ जिले में स्थित है।

    30 दिसम्बर 1983 को माणिक्यलाल वर्मा जनजाति शोध संस्थान द्वारा उदयपुर में जनजाति संग्रहालय का निर्माण किया गया। इसका उद्देश्य जनजातियों की सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था को प्रदर्शित करना था।

    संग्रहालयों के विस्तार की
    शृंखला में ई.1987 में विराट नगर संग्रहालय तथा ई.1991 में पाली संग्रहालय की स्थापना हुई। आमेर की सांस्कृतिक धरोहर के वैभव को प्रदर्शित करने के लिए ई.1992 में आमेर में कला दीर्घा स्थापित की गई। संग्रहालयों के विस्तार की यह धारा आज भी सतत रूप से प्रवाहमान है। राजस्थान के आधुनिक संग्रहालयों की यात्रा में सिटी पैलेस म्यूजियम उदयपुर, आहड़ संग्रहालय उदयपुर, राव माधोसिंह ट्रस्ट संग्रहालय कोटा, लोक कला संग्रहालय उदयपुर, मीरा संग्रहालय मेड़ता, हल्दीघाटी संग्रहालय राजसमंद आदि सम्मिलित हैं।


    राजस्थान में संग्रहालयों की समस्या

    राजस्थान, भारत का सबसे बड़ा प्रांत है। इसका 61.11 प्रतिशत भाग मरुस्थल है। इतने बड़े प्रदेश में पुरातात्विक सामग्री, प्राचीन भवन, दुर्ग, महल, देवालय, स्मारक, सरोवर, बावड़ियां, मूर्तियां, शिलालेख, प्राचीन ग्रंथ, शासकीय अभिलेख, सिक्के, ताड़पत्र, ताम्रपत्र आदि का विशाल भण्डार भरा पड़ा है। संग्रहालयोपयोगी सम्पूर्ण सामग्री को राज्य के विभिन्न संग्रहालयों में संजोने के लिए आवश्यक निपुण व्यक्तियों, धन, सुविधाओं तथा भवनों का अभाव है। इस कारण राजस्थान में प्राचीन ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर को संजोकर रख पाना बहुत बड़ी समस्या है। राजस्थान सरकार ने राज्य में 18 राजकीय संग्रहालयों की स्थापना की है। इन संग्रहालयों में कर्मचारियों का अभाव है। राज्य में झालावाड़ राजकीय संग्रहालय जैसे कई संग्रहालय हैं जो केवल चपरासियों और लिपिकों के भरोसे छोड़ दिए गए हैं।

    बहुत से संग्रहालयों को भारत सरकार से सामग्री प्राप्त होती है किंतु वह स्थान, साधन एवं दृष्टि के अभाव में संग्रहालयों के अंधेरे बंद कमरों में पड़ी हुई है, दर्शक वहाँ तक चाह कर भी नहीं पहुंच सकते।

    वसुंधरा राजे सरकार (ई.2013-18) द्वारा राज्य के संग्रहालयों की बुरी तरह से उपेक्षा किए जाने से यह समस्या और भी गंभीर हो गई है।

    राज्य सरकार द्वारा बीकानेर में राजस्थान राज्य अभिलेखागार तथा जोधपुर में प्राच्य विद्या संस्थान की स्थापना की गयी है। जयपुर, बीकानेर, चित्तौड़, जयपुर, अलवर, कोटा तथा उदयपुर में प्राच्य विद्या संस्थान की शाखाएं स्थापित की गयी हैं। राजस्थान में मौजूद पुराने दुर्गों एवं ऐतिहासिक भवनों का संरक्षण करने के लिए भी पर्याप्त संसाधन नहीं हैं जिसके कारण कई दुर्ग, हवेलियाँ, मंदिर एवं महल उपेक्षित पड़े हैं। कुछ वर्ष पूर्व शेखावाटी की कलात्मक हवेलियों में भित्ति चित्रों की दुर्दशा देखकर एक विदेशी महिला नदीन ला प्रैन्स ने एक हवेली खरीदकर उसका पुनरुद्धार करवाया और वहाँ एक सांस्कृतिक केन्द्र बनाया। इसमें भारत और फ्रान्स के चित्रकारों की एक प्रदर्शनी भी लगाई गई। इससे शेखावाटी क्षेत्र की कला को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली। संस्कृृति प्रेमियों, पर्यटन संस्थाओं तथा स्वयं सेवी संगठनों को इस दिशा में और भी प्रयास करने होंगे।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-41

     19.05.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-41

    पर्यावरण को स्वर देते लोक गीत


    राजस्थान की लोक संस्कृति, सुरीली स्वर लहरियों में ढलकर, लोक गीतों में समाई हुई है। लोक गीतों की यह धारा दो रूपों में प्रवाहित हुई है। एक तो जन साधारण द्वारा सामाजिक उत्सवों, जन्म, विवाह, स्वागत, विदाई, संस्कार, तीज, गणगौर, होली आदि के अवसर पर गाये जाने वाले गीत और दूसरा राजाओं एवं सामंतों की प्रशस्ति में तथा उनके आमोद-प्रमोद के लिये गाया जाने वाले गीत। पारिवारिक उत्सवों तथा सामाजिक पर्वों पर गाये जाने वाले लोक गीतों के भाव बहुत सुकोमल एवं मन को छूने वाले हैं। इन गीतों में पर्यावरण संरक्षण के संदेश निहित हैं। ईंडोणी, कांगसियो, गोरबंद, पणिहारी, लूर, ओलूं, हिचकी, सुपणा, मूमल, कुरजां, काजलिया, कागा, जीरा, पोदीना, चिरमी तथा लांगुरिया आदि लोकगीत गाँव-गाँव में चाव से गाये जाते हैं।

    सामंती परिवेश में प्रयुक्त लोक गीत वीररस एवं शृंगार रस से परिपूर्ण हैं। अधिकांश लोक गीतों में प्रकृति एवं पर्यावरण से बिम्ब तथा उपमाएं ग्रहण की गई हैं। लोक भजनों में देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त करने, उन्हें प्रसन्न करने तथा उनसे मन वांछित फल प्राप्त करने के उद्देश्य से राजस्थान में रात्रि जागरण की प्रथा बड़ी पुरानी है जिसे रतजगा कहा जाता है। विनायक, महादेव, विष्णु, राम, कृष्ण, बालाजी (हनुमान), भैंरू, जुंझार, पाबू, तेजा, गोगा, रामदेव, देवजी, रणक दे, सती माता, दियाड़ी माता, सीतला माता, भोमियाजी आदि के भजन इन रात्रि जागरणों में गाये जाते हैं। मीरां, कबीर, दादू, रैदास, चंद्रस्वामी तथा बख्तावरजी के पद भी बड़ी संख्या में गाये जाते हैं।

    रात्रि जागरण में गाये जाने वाले देवी के गीत चिरजा कहलाते हैं। लोकगीतों की इतनी सुदीर्घ परम्परा का मूल कारण राजस्थान में निवास करने वाली वे अनेक जातियाँ हैं जो केवल गा-बजाकर अपना गुजारा करती हैं। इनके गीत परिष्कृत, भावपूर्ण तथा विविधता लिये हुए होते हैं। शास्त्रीय संगीत की भांति इनमें स्थायी तथा अंतरे का स्वरूप दिखाई देता है। खयाल तथा ठुमरी की भांति इन्हें छोटी-छोटी तानों, मुकरियों तथा विशेष आघात देकर सजाया जाता है। इन गीतों को मांड, देस, सोरठ, मारू, परज, कालिंगड़ा, जोगिया, आसावरी, बिलावल, पीलू खमाज आदि राग-रागिनियों में गाया जाता है।

    जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, जोधपुर आदि मरुस्थलीय क्षेत्रों में कुरजां, पीपली, रतन राणो, मूमल, घूघरी, केवड़ा आदि लोक गीत गाये जाते हैं। जयपुर, कोटा, अलवर, भरतपुर, करौली तथा धौलपुर आदि मैदानी भागों में स्वरों के उतार-चढ़ाव वाले गीत गाये जाते हैं। मंद से तार सप्तक तक गायन होता है। इन क्षेत्रों में सामूहिक रूप से गाये जाने वाले भक्ति और शृंगार रस से ओत-प्रोत गीत गाये जाते हैं। मांड तथा मारू रागों का संक्षिप्त परिचय प्राप्त करना आवश्यक है-

    मांड : राजस्थान की मांड गायिकी अत्यंत प्रसिद्ध है। थोड़े-बहुत अंतर के साथ क्षेत्र विशेष में इन्हें अलग तरह से गाया जाता है। उदयपुर की मांड, जोधपुर की मांड, जयपुर-बीकानेर की मांड, जैसलमेर की मांड, मांड गायिकी में अधिक प्रसिद्ध हैं। राग सोरठ, देस तथा मांड तीनों एक साथ गाई व सुनी जाती हैं।

    मारू : लोक गायकों द्वारा गाये जाने वाले वीर भाव जागृत करने वाले गीत सिंधु तथा मारू रागों पर आधारित होते थे जिन्हें सेनाओं के रण-प्रयाण के समय गाया जाता था। पश्चिमी राजस्थान में गाये जाने वाले लोकगीत ऊंचे स्वर व लम्बी धुन वाले होते हैं जिनमें स्वर विस्तार भी अधिक होता है।


    राजस्थान के प्रमुख लोकगीत

    ओल्यूँ : ओल्यूँ का अर्थ होता है- स्मरण। अतः ओल्यू किसी की स्मृति में गाई जाती है। बेटी की विदाई पर ओल्यूँ इस प्रकार गाई जाती है- कँवर बाई री ओल्यूँ आवै ओ राज।

    ईंडोणी : पानी भरने जाते समय स्त्रियां मटके को सिकर पर टिकाने के लिये मटके के नीचे ईंडोणी का प्रयोग करती हैं। इस अवसर को लक्ष्य करके यह गीत गाया जाता है-


    म्हारी सवा लाख री लूम गम गई ईंडोणी।

    पाड़ोसण बड़ी चकोर ले गई ईंडोणी।।

    कांगसियो : कंघे को कांगसिया कहा जाता है। यह शृंगार रस का प्रमुख गीत है- म्हारै छैल भँवर रो कांगसियो पणिहारियाँ ले गई रे।

    कागा : इस गीत में विरहणी नायिका द्वारा कौए को सम्बोधित करके अपने प्रियतम के आने का शगुन मनाया जाता है-


    उड़-उड़ रे म्हारा काळा रे कागला,

    जद म्हारा पिवजी घर आवै।

    काजलियो : यह शृंगार रस से ओत-प्रोत गीत है जो होली के अवसर पर चंग के साथ गाया जाता है। कामण : वर को जादू टोने से बचाने के लिये स्त्रियाँ कामण गाती हैं।

    कुरजां : प्रियतम को संदेश भिजवाने के लिये कुरजाँ पक्षी के माध्यम से यह गीत गाया जाता है- कुरजां ए म्हारौ भंवर मिलाद्यौ ए।

    केसरिया बालम : यह एक रजवाड़ी गीत है जिसमें विरहणी नारी अपने प्रियतम को घर आने का संदेश देती है- केसरिया बालम आवो नी, पधारौ म्हारे देस।

    गणगौर : पार्वती देवी को समर्पित त्यौहार गणगौर पर गणगौर के गीत गाये जाते हैं- खेलन द्यौ गणगौर, भँवर म्हानै खेलन द्यौ गणगौर।

    गोरबंद : गोरबंद ऊँट के गले का आभूषण होता है जिस पर शेखावाटी क्षेत्र में लोकगीत गाये जाते हैं- गायां चरावती गोरबंद गूंथियो, भैस्यां चरावती पोयो म्हारा राज, म्हारो गोरबंद लूम्बालो।

    घुड़ला : घुड़ला पर्व पर कन्याएं छेदों वाली मटकी में दिया रखकर घर-घर घूमती हुई गाती हैं- घुड़लो घूमेला जी घूमेला, घुड़ले रे बांध्यो सूत।

    घूमर : गणगौर आदि विशेष पर्वों पर घूमर नृत्य के साथ घूमर गाया जाता है- म्हारी घूमर छै नखराली ए माँ। घूमर रमवा म्हैं जास्यां।

    घोड़ी : बारात की निकासी पर घोड़ी गाई जाती है- घोड़ी म्हारी चन्द्रमुखी सी, इन्द्रलोक सूँ आई ओ राज।

    चिरमी : वधू अपने ससुराल में अपने भाई और पिता की प्रतीक्षा में चिरमी के पौधे को सम्बोधित करके गाती है- चिरमी रा डाळा चार वारी जाऊँ चिरमी ने।

    जच्चा : बालक के जन्मोत्सव पर जच्चा या होलर गाये जाते हैं।

    जलो और जलाल : वधू के घर की स्त्रियाँ बारात का डेरा देखने जाते समय जलो और जलाल गाती हैं- म्हैं तो थारा डेरा निरखण आई ओ, म्हारी जोड़ी रा जहाँ।

    जीरा : यह लोकगीत कृषक नारी द्वारा जीरे की खेती में आने वाली कठिनाई को व्यक्त करने के लिये गाया जाता है- ओ जीरो जीव रो बैरी रे, मत बाओ म्हारा परण्या जीरो।

    झोरावा : यह जैसलमेर क्षेत्र में गाया जाने वाला विरह गीत है जो पति के परदेश जाने पर उसके वियोग में गाया जाता है।

    ढोला मारू : सिरोही क्षेत्र में ढाढियों द्वारा गाया जाने वाला गीत जिसमें ढोला मारू की प्रेमकथा का वर्णन है।

    तेजा : जाट जाति के लोगों द्वारा कृषि कार्य आरंभ करते समय लोक देवता तेजाजी को सम्बोधित करके तेजा गाया जाता है।

    पंछीड़ा : हाड़ौती एवं ढूंढड़ी क्षेत्रों में मेले के अवसर पर अलगोजे, ढोलक एवं मंजीरे के साथ पंछीड़ा गाया जाता है।

    पणिहारी : पानी भरने वाली स्त्री को पणिहारी कहते हैं। इस गीत में स्त्रियों को पतिव्रत धर्म पर अटल रहने की प्रेरणा दी गई है। जीव जगत को पेयजल उपलब्ध कराने वाले मनुष्यों की भी प्रशंसा की गई है-


    कणीजी खुदाया कूआं बावड़ी ओ पणिहारी जी रे

    लो चालो साथीड़ा रे लार वालाजी।

    पपैयो : यह दाम्पत्य प्रेम के आदर्श को दर्शाने वाला गीत है जिसमें प्रेयसी अपने प्रियतम से उपवन में आकर मिलने का अनुरोध करती है।

    पावणा : जवांई के ससुराल आने पर स्त्रियाँ उसे भोजन करवाते समय पावणा गाती हैं।

    पीपली : मरुस्थलीय क्षेत्र में वर्षा ऋतु में पीपली गाया जाता है जिसमें विरहणी द्वारा प्रेमोद्गार व्यक्त किये जाते हैं।

    बधावा : शुभ कार्य सम्पन्न होने पर बधावा अर्थात् बधाई के गीत गाये जाते हैं।

    बना-बनी : लड़के के विवाह पर बना तथा लड़की के विवाह पर बनी गीत गाये जाते हैं।

    बीछूड़ो : यह हाड़ौती क्षेत्र का लोकप्रिय गीत है। एक पत्नी को बिच्छू ने डस लिया है और वह मरने से पहले अपने पति को दूसरा विवाह करने का संदेश देती है-


    मैं तो मरी होती राज,

    खा गयो बैरी बीछूड़ो।

    मूमल : जैसलमेर में गाया जाने वाला शंृगारिक गीत जिसमें मूमल के नख शिख का वर्णन किया गया है- म्हारी बरसाले री मूमल, हालौनी एै आलीजे रे देख।

    मोरिया : इस सरस लोकगीत में ऐसी नारी की व्यथा है जिसका सम्बन्ध तो हो चुका है किंतु विवाह होने में देर हो रही है। इसे रात्रि के अंतिम प्रहर में गाया जाता है।

    रसिया : ब्रज क्षेत्र में रसिया गाया जाता है।

    रातीजगा : विवाह, पुत्र जन्मोत्सव, मुण्डन आदि शुभ अवसरों पर रात भर जागकर भजन गाये जाते हैं जिन्हें रातीजगा कहा जाता है।

    लांगुरिया : करौली क्षेत्र में कैला देवी के मंदिर में हनुमानजी को सम्बोधित करके लांगुरिया गाये जाते हैं- इबके तो मैं बहुअल लायो, आगे नाती लाऊंगो, दे-दे लम्बो चौक लांगुरिया, बरस दिनां में आऊंगो। लांगुरिया को सम्बोधित करके कामुक अर्थों वाले गीत भी गाये जाते हैं-


    नैक औढ़ी ड्यौढ़ी रहियो,

    नशे में लांगुर आवैगो।

    लावणी : नायक द्वारा नायिका को बुलाने के लिये लावणी गाई जाती है- शृंगारिक लावणियों के साथ-साथ भक्ति सम्बन्धी लावणियां भी प्रसिद्ध हैं। मोरध्वज, सेऊसंमन, भरथरी आदि प्रमुख लावणियां हैं।

    सीठणे : विवाह समारोह में आनंद के अतिरेक में गाली गीत गाये जाते हैं जिन्हें सीठणे कहते हैं।

    सुपणा : विरहणी के स्वप्न से सम्बन्धित गीत सुपणा कहलाते हैं-


    सूती थी रंग महल में,

    सूताँ में आयो रे जंजाळ,

    सुपणा में म्हारा भँवर न मिलायो जी।

    सूंवटिया : यह विरह गीत है। भील स्त्रियाँ पति के वियोग में सूंवटिया गाती हैं।

    हरजस : भगवान राम और भगवान कृष्ण को सम्बोधित करके सगुण भक्ति लोकगीत गाये जाते हैं जिन्हें हरजस कहा जाता है।

    हिचकी : ऐसी मान्यता है कि प्रिय के द्वारा स्मरण किये जाने पर हिचकी आती है। अलवर क्षेत्र में हिचकी ऐसे गाई जाती है- म्हारा पियाजी बुलाई म्हानै आई हिचकी।

    हींडो : श्रावण माह में झूला झूलते समय हींडा गाया जाता है- सावणियै रौ हींडौ रे बाँधन जाय।

    इस प्रकार लोक गीतों में प्रकृति एवं पर्यावरण से सम्बन्धित विपुल विषय सम्मिलित किये गये हैं। क्षेत्र बदलने के साथ उनके गायन का तरीका भी बदल जाता है।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • अध्याय - 11 उत्तर-वैदिक समाज एवं धर्म

     19.05.2020
    अध्याय - 11 उत्तर-वैदिक समाज एवं धर्म

    उत्तर-वैदिक समाज एवं धर्म


    हे परमेश्वर! हम शिष्य और आचार्य दोनों की साथ-साथ रक्षा कर, हम दोनों को विद्या के फल का साथ-साथ भोग करा, हम दोनों एकसाथ मिलकर विद्या प्राप्ति का सामर्थ्य प्राप्त करें, हम दोनों का पढ़ा हुआ तेजस्वी हो, हम दोनों परस्पर द्वेष न करें। - - कृष्ण यजुर्वेद, कठोपनिषद।


    ऋग्वेद के बाद यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद एवं ब्राह्मण गं्रथों (ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद) की रचना हुई। ऋग्वेद के बाद में लिखे गए, इन ग्रन्थों के रचना काल को उत्तर-वैदिक-काल कहते हैं। पी. वी. काणे के अनुसार उत्तर-वैदिक-कालीन ग्रंथ, उत्तरी गंगा की घाटी में लगभग ई.पू.1000-600 में रचे गए थे। ऋग्वैदिक तथा उत्तर-वैदिक-काल की सभ्यता एवं संस्कृति में पर्याप्त अन्तर है।

    उत्तर-वैदिक स्थलों की पुरातात्त्विक खुदाइयों एवं अन्वेषण के परिणाम स्वरूप 500 बस्तियों के अवशेष मिले हैं। इन्हंे चित्रित धूसर भाण्ड वाले स्थल कहते हैं क्योंकि इन स्थलों पर बसे हुए लोगों ने मिट्टी के चित्रित एवं भूरे कटोरों और थालियों का उपयोग किया। वे लोहे के औजारों का भी उपयोग करते थे। बाद के वैदिक ग्रंथों और चित्रित धूसर भाण्डों के लौह अवस्था वाले पुरातात्त्विक प्रमाणों के आधार पर हम ईसा पूर्व प्रथम सहòाब्दी के पूर्वार्द्ध के पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्र, हरियाणा और राजस्थान के लोगों के जीवन के बारे में कुछ जानकारियाँ प्राप्त कर सकते हैं।

    उत्तर-वैदिक-कालीन बस्तियाँ

    कृषि और विविध शिल्पों के कारण उत्तर-वैदिक-काल के लोग अब स्थायी जीवन बिताते थे। पुरातात्त्विक खुदाई तथा अन्वेषण से हमें उत्तर-वैदिक-काल की बस्तियों के बारे में कुछ जानकारी मिलती है। चित्रित धूसर भांडों वाले स्थान न केवल पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दिल्ली (कुरु-पांचाल) में, अपितु पंजाब एवं हरियाणा के समीपवर्ती क्षेत्र मद्र और मत्स्य (राजस्थान) में भी मिले हैं। कुल मिलाकर ऐसे 500 स्थल मिले हैं जो प्रायः ऊपरी गंगा की घाटी में स्थित हैं। इनमें से हस्तिनापुर, अतरंजीखेड़ा और नोह जैसे चंद स्थलों की ही खुदाई हुई है।

    चूँकि यहाँ की बस्तियों के भौतिक अवशेष एक मीटर से तीन मीटर की ऊँचाई तक व्याप्त हैं, इसलिए अनुमान होता है कि यहाँ एक से तीन सदियों तक बसवाट रही। ये अधिकतर नई बस्तियाँ थीं। इनके पहले इन स्थानों पर बस्तियाँ नहीं थीं। लोग मिट्टी की ईटों के घरों में अथवा लकड़ी के खंभों पर आधारित टट्टर और लेप के घरों में रहते थे।

    यद्यपि उनकेे घर घटिया प्रकार के थे परन्तु चूल्हों और अनाजों (चावल) के अवशेषों से पता चलता है कि चित्रित धूसर भांडों का उपयोग करने वाले उत्तर-वैदिक-कालीन लोग खेती करते थे और स्थायी जीवन बिता रहे थे। वे लोग लकड़ी के फालों वाले हल से खेत जोतते थे, इसलिए किसान अधिक पैदा नहीं कर पाते थे। इस समय का किसान, नगरों के उत्थान में अधिक योगदान करने में समर्थ नहीं था।

    उत्तरवैदिक-कालीन आर्यों की राजनीतिक व्यवस्था

    उत्तर-वैदिक-काल में आर्यों की राजनीतिक स्थिति में बड़ा परिवर्तन हो गया था। इस काल में राजन्य ने शेष तीन वर्णों पर अपना अधिकार स्थापित करने का प्रयास किया। ऐतरेय ब्राह्मण में राजन्य के सापेक्ष, ब्राह्मण को जीविका-खोजी और दान ग्रहण करने वाला कहा गया है। राजन्य द्वारा उसे हटाया जा सकता था। वैश्य को दान देने वाला कहा गया है। राजन्य द्वारा उसका इच्छापूर्वक दमन किया जा सकता था। सबसे कठोर बातें शूद्रों के बारे में पढ़ने को मिलती हैं। उसे दूसरों का सेवक, दूसरों के आदेश पर काम करने वाला और दूसरों द्वारा मनमर्जी से पीटने योग्य कहा गया है।

    (1.) शासन क्षेत्र में परिवर्तन: ऋग्वैदिक आर्यों की राज-सत्ता केवल सप्त-सिन्धु क्षेत्र तक सीमित थी, परन्तु अब वे पंजाब से लेकर गंगा-यमुना के दोआब में स्थित समस्त पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फैल गए थे। भरत और पुरु नामक दो प्रमुख कबीले एकत्र हुए और इस प्रकार कुरु-जन कहलाए। आरम्भ में ये लोग दोआब के सीमांत में सरस्वती और दृषद्वती नदियों के बीच के प्रदेश में बसे हुए थे परन्तु कुरुओं ने शीघ्र ही दिल्ली और दोआब के उत्तरी भाग पर अधिकार जमा लिया।

    इस क्षेत्र को कुरुदेश कहते हैं। शनैःशनैः ये लोग पंचालों से मिलते गए। वर्तमान बरेली, बदायूँ और फर्रूखाबाद जिलों में फैला हुआ, उस समय का पंचाल राज्य अपने दार्शनिक राजाओं और ब्राह्मण पुरोहितों के लिए प्रसिद्ध था। कुरु-पंचालों का दिल्ली और उत्तरी तथा मध्य दोआब पर अधिकार स्थापित हो गया। मेरठ जिले के हस्तिनापुर स्थान पर उन्होंने अपनी राजधानी स्थापित की। महाभारत युद्ध की दृष्टि से कुरु कबीले के इतिहास का बड़ा महत्त्व है, और यही युद्ध महाभारत की प्रमुख घटना है।

    समझा जाता है कि यह युद्ध ई.पू.950 के आसपास कौरवों और पाण्डवों के बीच लड़ा गया था। ये दोनों ही कुरु जन के सदस्य थे। परिणामतः लगभग सम्पूर्ण कुरु कबीला नष्ट हो गया। कालान्तर में आर्यों ने दक्षिण-भारत में भी अपनी सभ्यता तथा संस्कृति का प्रसार आरम्भ किया। उत्तर-वैदिक-काल के अंतिम चरण में, ई.पू.600 के आसपास, वैदिक लोग दोआब से पूर्व की ओर कोशल (पूर्वी उत्तर प्रदेश) और विदेह (उत्तरी बिहार) में फैल चुके थे।

    यद्यपि कोसल का रामकथा से बड़ा सम्बन्ध है, पर वैदिक साहित्य में राम का कोई उल्लेख नहीं मिलता। पूर्वी उत्तर प्रदेश और उत्तरी बिहार में वैदिक आर्यों को ऐसे लोगों का सामना करना पड़ा जो ताम्बे के औजारों और काले एवं लाल रंग के मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग करते थे। ये लोग यहाँ लगभग 1800 ई.पू. में बसे हुए थे। आर्यों को इस क्षेत्र में सम्भवतः ऐसे लोगों की बस्तियां भी जहां-तहां मिलीं जो काले और लाल बर्तनों का उपयोग करते थे।

    अनुमान होता है कि ये लोग एक मिश्रित संस्कृति वाले थे जिसे हड़प्पा कालीन संस्कृति नहीं कहा जा सकता। उत्तर-वैदिक लोगों के शत्रु जो भी रहे हों, उनका प्रत्यक्षतः किसी बड़े और सुसम्बद्ध क्षेत्र पर अधिकार नहीं था और उनकी संख्या उत्तरी गंगा की घाटी में बहुत अधिक नहीं थी, विस्तार के दूसरे चरण में भी उत्तर-वैदिक आर्यों की सफलता का कारण लोहे के औजारों और घोड़ों वाले रथों का उपयोग किया जाना था।

    (2.) राजन्य की शक्तियांे में वृद्धि: ऋग्वैदिक-काल में राज्य का आकार बहुत छोटा होता था परन्तु उत्तर-वैदिक-काल में बड़े-बड़े राज्यों की स्थापना की गई और राजन्य अर्थात् राजा पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली हो गए। अब वीर विजयी राजन्य स्वयं को र्साभौम, एकराट् आदि उपाधियों से विभूषित करने लगे। राजन्य अपने प्रभाव में वृद्धि के लिए राजसूय, वाजपेय, अश्वमेध आदि यज्ञ करने लगे। ये यज्ञ राजन्य की सार्वभौम सत्ता के सूचक होते थे।

    समझा जाता था कि राजसूय यज्ञों से राजाओं को दिव्य शक्ति प्राप्त होती है। अश्वमेध यज्ञ में जितने क्षेत्र में राजा का घोड़ा निर्बाध विचरण करता था उतने क्षेत्र पर उस राजा का अधिकार हो जाता था। वाजपेय यज्ञ में अपने सगोत्रीय बंधुओं के साथ रथों की दौड़़ होती थी। इन सब आयोजनों और अनुष्ठानों से लोग प्रभावित होते थे। साथ ही राजा की शक्ति और प्रभाव भी बढ़ता था। अब राजन्य को देवता का स्वरूप समझा जाने लगा। राजन्य की आज्ञा का पालन करना आवश्यक था। यद्यपि राजन्य का पद अब भी वंशानुगत था परन्तु निर्वाचन-प्रणाली भी आरम्भ हो गई थी। निर्वाचन राजवंश तक ही सीमित था।

    (3.) जनपद एवं राष्ट्र की धारणा का उदय: राज्य के विस्तार के साथ राजन्य अथवा राजा की शक्ति बढ़ती गई। कबीलाई अधिकार प्रदेश-विशेष तक सीमित थे। राजन्य का शासन कई कबीलों पर होता था परन्तु आर्यों के प्रमुख कबीलों ने उन प्रदेशों पर भी अधिकार जमा लिया जहाँ दूसरे कबीले बसे हुए थे। आरम्भ में प्रत्येक प्रदेश को वहाँ बसे हुए कबीले का नाम दिया गया था, पर अंत में जनपद नाम, प्रदेश नाम के रूप में रूढ़ हो गया। आरम्भ में पंचाल एक कबीले का नाम था परन्तु बाद में यह एक प्रदेश का नाम हो गया। राष्ट्र शब्द, जो प्रदेश का सूचक है, पहली बार इसी काल में प्रकट हुआ।

    (4.) सीमित राजतंत्र: यद्यपि इस काल में राजन्य ऋग्वैदिक-काल की अपेक्षा अधिक स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश हो गया था परन्तु राजन्य पर पुरोहित का नियन्त्रण होता था। पुरोहित सोम को अपना राजन्य मानता था और वह राजन्य की समस्त आज्ञाएँ मानने के लिए बाध्य नहीं था। कभी-कभी पुरोहित, राजन्य के विरुद्ध विद्रोह भी कर देता था। राजन्य को यह शपथ लेनी पड़ती थी कि वह पुरोहित के साथ कभी भी धोखा नहीं करेगा। राज्य के नियमों की पालना करना तथा ब्राह्मणों की रक्षा करना राजन्य का परम धर्म होता था। राजन्य पर धर्म का भी बहुत बड़ा नियन्त्रण रहता था। अतः उसे धर्मानुकूल शासन करना होता था।

    (5.) पदाधिकारियों में वृद्धि: उत्तर-वैदिक-काल में ऋग्वैदिक-काल की अपेक्षा पदाधिकारियों की संख्या तथा उनके अधिकारों में बड़ी वृद्धि हो गयी। ऋग्वैदिक-काल में केवल तीन पदाधिकरी थे- पुरोहित, सेनानी तथा ग्रामणी परन्तु अब स्थपति, निषाद-स्थपति, शतपति आदि नये पदाधिकारी भी उत्पन्न हो गए थे। स्थपति सम्भवतः राज्य के एक भाग का शासक होता था और उसे शासन के साथ-साथ न्यायिक कार्य भी करने होतेे थे। निषाद-स्थपति सम्भवतः उस पदाधिकरी को कहते थे जो उन आदिवासियों पर शासन करता था, जिन पर आर्यों ने विजय प्राप्त कर ली थी।

    शतपति नामक पदाधिकरी के अनुशासन में सम्भवतः सौ गाँव रहते थे। अब पुराने पदाधिकारियों के अधिकारों में भी वृद्धि हो गयी थी। राजन्य अपने सिंहासन से उतर कर पुरोहित को प्रणाम करता था। अब राजन्य रण-क्षेत्र में कम ही जाया करता था, इसलिए सेनानी रण-क्षेत्र में सेना का संचालन करता था। फलतः उसके प्रभाव में भी वृद्धि हो गयी थी। उत्तर-वैदिक-काल में भी राजन्य की कोई स्थायी सेना नहीं होती थी। युद्ध के अवसर पर जन से सैनिक टुकड़ियां एकत्र की जाती थीं।

    युद्ध में सफलता प्राप्त करने के लिए एक अनुष्ठान यह था कि राजन्य को अपनी प्रजा (विश्) के साथ एक पात्र में भोजन करना पड़ता था। ग्रामणी के अधिकार तथा प्रभाव में तो इतनी वृद्धि हो गयी थी कि उसे राजकृत अर्थात् राजन्य को बनाने वाला कहने लगे थे। राजकाज चलाने में राजमहिषी भी राजन्य की सहायता करती थी।

    (6.) सभा तथा समिति के अधिकारों में कमी: यद्यपि सभा तथा समिति का अस्तित्त्व उत्तर-वैदिक-काल में भी बना रहा परन्तु अब उनके अधिकार तथा प्रभाव में बड़ी कमी हो गयी। समिति बड़ी संस्था थी और सभा छोटी। अब राज्य-विस्तार बढ़ जाने के कारण समिति का जल्दी-जल्दी बुलाया जाना सम्भव नहीं था। इसलिए राजन्य उसके परामर्श की उपेक्षा करने लगा और अधिकांश कार्य अपने निर्णय से करने लगा। सभा का महत्त्व भी घट गया।

    (7.) न्याय व्यवस्था में सुधार: उत्तर-वैदिक-कालीन न्याय-व्यवस्था ऋग्वैदिक-काल की न्याय-व्यवस्था की अपेक्षा अधिक सुदृढ़़ तथा व्यापक हो गई थी। अब राजन्य न्यायिक कार्य में पहले से अधिक रुचि लेने लगा परन्तु वह अपने न्यायिक अधिकारों को प्रायः अपने पदाधिकारियों को दे देता था। गाँवों के झगड़ों का निर्णय ग्राम्यवादिन करता था जो गाँव का न्यायाधीश होता था। ब्राह्मण की हत्या बहुत बड़ा अपराध समझा जाता था। ब्राह्मण को प्राण-दण्ड नहीं दिया जाता था। सोने की चोरी तथा सुरापान बड़े अपराध समझे जाते थे। दीवानी मुकदमों का निर्णय प्रायः पंचों द्वारा किया जाता था।

    (8.) जनपद राज्यों का आरम्भ: उत्तर-वैदिक-काल में कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। जनपद राज्यों का आरम्भ हुआ। न केवल गोधन की प्राप्ति के लिए, अपितु भूमि पर अधिकार के लिए भी युद्ध होने लगे। कौरवों और पांडवों के बीच लड़ा गया महाभारत युद्ध सम्भवतः इसी काल में हुआ।

    (9.) राजन्य को भेंट व्यवस्था: वैदिक-काल का प्रधानतः पशुपालक समाज, अब कृषक बन गया। अब वह अपने राजन्य को प्रायः भेंट देने में समर्थ था। कृषकों के बल पर राजाओं की शक्ति बढ़ी और उन्होंने उन पुरोहितों को खूब दान-दक्षिणा दी जिन्होंने वैश्यों अर्थात् सामान्य प्रजा के विरोध में अपने आश्रयदाताओं की सहायता की। शूद्रों के छोटे समुदाय का काम सेवा करना था।

    (10.) कर व्यवस्था: इस काल में करों की वसूली और दक्षिणा आम बात हो गई। इन्हें सम्भवतः संगृहित्री नामक अधिकारी जमा करता था।

    उत्तरवैदिक-कालीन आर्यों की सामाजिक दशा

    नारद संहिता, गार्गी संहिता और वृहत संहिता ज्योतिष साहित्य के ऐसे ग्रन्थ हैं जिनसे तत्कालीन सामाजिक जीवन की जानकारी प्राप्त होती है। कल्पसूत्र साहित्य में विविध सामाजिक और धार्मिक विधि-विधानों तथा नियम- निर्देशों का वर्णन है। यद्यपि उत्तर-वैदिक-काल के आर्यों के गृह-निर्माण, वेश-भूषा, खान-पान, मनोरंजन आदि में विशेष परिवर्तन नहीं हुए थे परन्तु सामाजिक जीवन के कई क्षेत्रों में बड़े परिवर्तन हुए।

    (1.) पिता की शक्तियों में वृद्धि: उत्तर-वैदिक-काल में, परिवार में पिता की शक्ति बहुत अधिक बढ़ गई। अब पिता अपने पुत्र को उत्तराधिकार से वंचित कर सकता था। राज-परिवारों में ज्येष्ठाधिकार को अधिकाधिक महत्त्व दिया जाने लगा। राज-परिवारों के अतिरिक्त अन्य परिवारों में परिवार की संयुक्त सम्पत्ति पर पिता के समस्त पुत्रों का समान अधिकार होता था। कभी-कभी पिता अपने जीवन-काल में ही अपने पुत्रों में परिवार की संयुक्त सम्पत्ति का विभाजन कर देता था और फिर उन्हें अपना अलग परिवार बसाने की अनुमति दे-देता था। इस काल में पूर्व-पुरुषों की पूजा होने लगी।

    (2.) गोत्र व्यवस्था: उत्तर-वैदिक-काल में गोत्र व्यवस्था दृढ़ हुई। गोत्र शब्द का अर्थ है गोष्ठ अथवा वह स्थान जहाँ समस्त कुल के गोधन को एक साथ रखा जाता था परन्तु बाद में इस शब्द का अर्थ हो गया- एक मूल पुरुष के वंशज। गोत्रीय बहिर्विवाह की प्रथा आरम्भ हो गई। एक ही गोत्र अथवा पूर्व-पुरुष वाले समुदाय के सदस्यों के बीच विवाह पर प्रतिबंध लग गया।

    (3.) नगरों का प्रादुर्भाव: ऋग्वैदिक आर्य गाँवों में निवास करते थे। ऋग्वेद में नगर शब्द का उल्लेख नहीं मिलता है परन्तु जब उत्तर-वैदिक आर्य गंगा-यमुना के उपजाऊ मैदानों में आ गए तब उन्होंने बड़े-बड़े नगरों को बसाया तथा नगरों में निवास करना आरम्भ किया। अब यही नगर, राजनीतिक तथा सामाजिक जीवन के केन्द्र बन गए। नगरों की वास्तविक शुरूआत का आभास उत्तर-वैदिक-काल के अंतिम दौर में मिलता है। हस्तिनापुर और कौशाम्बी को उत्तर-वैदिक-काल के अंतिम दौर के आदिम पद्धति के नगर माना जा सकता है। इन्हें प्राक्-नगरीय स्थल कहा जा सकता है।

    (4.) खान-पान: उत्तरवैदिक-काल के आर्यों का भोजन ऋग्वैदिक-काल जैसा ही था। उसमें विशेष अन्तर नहीं आया था। अन्न, दूध, वनस्पति से बने हुए पदार्थ एवं माँस उनके भोजन के मुख्य अंग थे। अन्न में गेहूँ, जौ, चावल मुख्य थे। चावल की खेती अधिक की जाने लगी थी। दूध से दही, मक्खन और घी तैयार किया जाता था। दूध में दूसरी वस्तुओं को पकाकर कई प्रकार के व्यंजन बनाए जाते थे। वैदिक साहित्य में ओदन, क्षीरोदन तथा तिलोदन आदि शब्दों का उल्लेख अनेक बार हुआ है। दूध में चावलों को पकाकर 'क्षीरोदन' अर्थात् खीर और तिलों को पकाकर 'तिलोदन' बनाई जाती थी।

    ऋग्वैदिक-काल की भाँति इस युग में भी साग-सब्जियों तथा फलों का सेवन प्रचुरता से होता था। सामान्यतः भेड़, बकरा-बकरी, बैल और कभी-कभी घोड़े का माँस खाया जाता था। शिकार में मारे गए पशु-पक्षियों का मांस भी खाया जाता था किंतु सामान्यतः मांस-भक्षण को घृणा की दृष्टि से देखा जाता था, ब्राह्मणों के लिए इसका निषेध हो गया था। अथर्ववेद के एक सूक्त में मांस-भक्षण तथा सुरापान को पाप बताया गया है। अतः स्पष्ट है कि अंहिसा के विचार को श्रेष्ठ समझा जाता था। अब सोम के स्थान पर मासर, पूतिका, अर्जुनानी आदि अन्य पेय पदार्थों का प्रयोग होने लगा था। समाज के निम्न वर्गों में सुरापान बढ़ रहा था।

    (5.) स्त्रियों की दशा में परिवर्तन: उत्तर-वैदिक-काल में स्त्रियों की दशा पहले से बिगड़ गई। राजवंशों तथा सम्पन्न परिवारों में बहु-विवाह की प्रथा प्रचलित हो गई थी। इसलिए घरों में स्त्रियों का जीवन कलहपूर्ण हो गया। कन्याओं को दुःख का कारण समझा जाने लगा। अथर्ववेद में पुत्री के जन्म पर खिन्नता का उल्लेख मिलता है। ऐतरेय ब्राह्मण में एक स्थान पर पुत्री के लिए 'कृषण' शब्द का उल्लेख किया गया है। 'गोमिल-गृह सूत्र' में कन्याओं द्वारा यज्ञोपतीत धारण करने का उल्लेख मिलता है। यज्ञोपवीत विधाध्ययन का चिह्न है। स्पष्ट है कि इस युग में भी स्त्रियाँ शिक्षा प्राप्त करती थीं। उपनिषदों में कुछ विदुषी स्त्रियों का उल्लेख है।

    जनक की राजसभा में गार्गी ने याज्ञवल्क्य के साथ शास्त्रार्थ किया था। गन्धर्व-गृहीता नामक महिला परम विदुषी तथा भाषण कला में निपुण थी। मैत्रेयी जैसी विदुषी महिला भी इसी युग में हुई। यज्ञादि धार्मिक अवसरों और सार्वजनिक सभाओं में स्त्रियाँ अब भी भाग लेती थीं। गोद लेने की प्रथा का विकास हो गया था। गोद के लिए भाई की सन्तान को प्राथमिकता दी जाती थी।

    कुछ कन्याएँ अविवाहित रूप में आजीवन अपने पति के परिवार में रहती थी। यदा-कदा कन्याओं का विक्रय होता था और दहेज-प्रथा प्रचलित हो गई थी। विधवा स्त्री के लिए नियोग की प्रथा अब भी प्रचलित थी। विधवा स्त्री को विवाह करने का अधिकार था। सती-प्रथा का उल्लेख इस युग में भी नहीं मिलता है। पर्दा-प्रथा का प्रचलन नहीं हुआ था।

    (6.) वैवाहिक सम्बन्ध में जटिलता: उत्तर-वैदिक-काल में भी विवाह को पवित्र एवं आवश्यक संस्कार समझा जाता था किंतु विवाह सम्बन्धी नियम कठोर हो गए थे। अविवाहित पुरुष को यज्ञ करने का अधिकार नहीं था। यज्ञादि के लिए पुत्र का होना आवश्यक था और पुत्र-प्राप्ति के लिए विवाह आवश्यक था। 'सगोत्री विवाह' अच्छा नहीं समझा जाता था।

    भिन्न गोत्र में विवाह करना अच्छा समझा जाता था। अथर्ववेद से ज्ञात होता है कि विधवा-विवाह तथा बहु-विवाह प्रथाओं का प्रचलन हो गया था। मनु की दस पत्नियाँ थीं। याज्ञवल्क्य ऋषि के मैत्रेयी और कात्यायनी नामक दो पत्नियाँ थी। ऐतरेय ब्राह्मण में हरिश्चन्द्र नामक व्यक्ति की 100 पत्नियों का उल्लेख है परन्तु बहु-विवाह के ये उदाहरण धनी एवं राजपरिवारों तक ही सीमित थे। साधारण लोग केवल एक विवाह करते थे। 'एक पुरुष-एक पत्नी', यही सामान्य व्यवस्था थी।

    एक स्त्री के एक से अधिक पति नहीं होते थे। विवाह युवावस्था में किया जाता था तथा बाल-विवाह का प्रचलन नहीं था। सपिण्ड, सगोत्र और सप्रवर विवाहों पर प्रतिबन्ध लगने लगा था और सूत्रकाल के आते-आते इस प्रकार के विवाहों पर स्पष्ट रूप से निषेध कर दिया गया। विवाह सामान्यतः सजातीय होते थे। उच्च-वर्ण की कन्या का विवाह निम्न-वर्ण में नहीं होता था। उत्तरवैदिक साहित्य में अन्तर्जातीय विवाहों के उल्लेख भी मिलते हैं। तैतिरीय संहिता में आर्य पुरुष और शूद्र कन्या के विवाह का उल्लेख है।

    शतपथ ब्राह्मण में ऋषि च्यवन और राजकन्या सुकन्या के विवाह का उल्लेख है। इस प्रकार के अन्तर्जातीय विवाहों के बारे में विद्वानों की मान्यता है कि साधारणतः श्रेष्ठ जाति के पुरुष निम्न जाति की स्त्रियों के साथ विवाह कर सकते थे। अर्थात् अनुलोम विवाह होते थे परन्तु प्रतिलोम विवाह वर्जित थे। स्त्री, पुरुष की सहधर्मिणी थी तथा घर एवं समाज में स्त्री का बहुत सम्मान था। शतपथ ब्राह्मण में उसे पुरुष की अर्धांगिनी कहा गया है। धर्म-सूत्रों में तो स्त्रियों के प्रति उदार रुख अपनाया गया है।

    उदाहरणार्थ, वशिष्ठ धर्मसूत्र में लिखा है कि चाहे पत्नी दोषी हो, झगड़ालू हो, घर छोड़कर चली गई हो, उसके साथ बलात्कार हुआ हो, उसे त्यागा नहीं जाएगा। धर्मसूत्रों में पत्नी को त्यागने वाले पति के लिए कठोर दण्ड की व्यवस्था की गई है। आपस्तम्ब सूत्र में लिखा है कि जिस पति ने अन्याय से अपनी पत्नी का परित्याग किया हो, वह गधे का चमड़ा ओढकर प्रतिदिन सात गृहों में यह कहते हुए भिक्षा माँगे कि उस पुरुष को भिक्षा प्रदान करो, जिसने अपनी पत्नी को त्याग दिया है। इस युग में माता के पद को बहुत उँचा और पवित्र समझा जाता था।

    वशिष्ठ सूत्र में माता का स्थान उपाध्याय, आचार्य और पिता से श्रेष्ठ माना गया है। इस प्रकार इस युग में स्त्रियों की स्थिति सम्मानजनक थी। परन्तु कुछ विद्वानों का मानना है कि उत्तरवैदिक युग के अन्तिम चरण में स्त्रियों की स्थिति में काफी गिरावट आ गई थी। कन्याओं को बेचने तथा दहेज लेने के उल्लेख मिलते हैं। ऐतरेय ब्राह्मण में लिखा है कि एक अच्छी स्त्री वह है जो उत्तर नहीं देती।

    शतपथ ब्राह्मण कहता है कि पत्नी को पति के पहले भोजन नहीं करना चाहिए। ऐतरेय ब्राह्मण में पुत्री को दुःख का कारण माना गया है। मैत्रायनी संहिता में स्त्री को जुआ और शराब की भाँति पुरुष का दोष माना गया है।

    (7.) वर्ण-व्यवस्था में जटिलता: ऋग्वैदिक युग के रथेष्ठ और राजन्य उत्तर-वैदिक-काल में क्षत्रिय कहलाने लगे। यज्ञकर्ता, ब्रह्मवादी एवं तत्त्वचिन्तक, ब्राह्मण कहलाते थे। कृषि, पशुपालन एवं वाणिज्य करने वाले लोगों को वैश्य कहा जाता था। अनार्य लोग शूद्र कहलाते थे। उत्तर-वैदिक-कालीन गं्रथों में प्रथम तीन वर्णों को उच्च और शूद्रों को निम्न समझा जाता था। तीनों उच्च वर्णों- ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यों का उपनयन संस्कार होता था। चौथे वर्ण का उपनयन संस्कार नहीं हो सकता था।

    ब्राह्मणों और क्षत्रियों की सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ गई थी। ब्राह्मणों को देवताओं का प्रिय माना जाने लगा। इस युग में सामाजिक प्रभुता तथा प्रतिष्ठा के लिए ब्राह्मणों और क्षत्रियों में प्रतिस्पर्धा होती थी। इस कारण कुछ क्षत्रियों ने विशिष्ट ज्ञान अर्जित किया। उनकी विद्वता से प्रभावित होकर ब्राह्मण भी उन क्षत्रियों के पास ज्ञान प्राप्त करने के लिए जाने लगे। श्वेतकेतु आरुणेय ने जैवलि नामक क्षत्रिय से और गार्ग्य नामक ब्राह्मण ने राजा अजातशुत्र से शिक्षा प्राप्त की थी।

    ऋग्वैदिक-काल में वैश्य शब्द का उल्लेख नहीं है किंतु उत्तरवैदिक साहित्य से ज्ञात होता है कि वैश्यों का सामाजिक स्तर ब्राह्मणों तथा क्षत्रिय से निम्न था। चूँकि यह वर्ण विविध व्यवसायों के द्वारा राष्ट्र की समृद्धि के लिए प्रयत्नशील था, अतः इसकी उपेक्षा करना सम्भव नहीं था। इसलिए वैश्यों को भी विद्या की प्राप्ति तथा यज्ञोपवीत धारण करने का अधिकार था। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों को द्विज कहा जाता था। शूद्रों पर कई तरह के प्रतिबंध थे किंतु राज्याभिषेक से सम्बन्धित ऐसे कई सार्वजनिक अनुष्ठान थे जिनमें शूद्र, सम्भवतः मूल कबीले के सदस्यों की हैसियत से भाग लेते थे।

    कुछ विशेष वर्गों के शिल्पियों को, जैसे रथकारों को, समाज में ऊंचा स्थान प्राप्त था और उन्हें उपनयन संस्कार के अधिकारियों की सूची में सम्मिलित किया गया था। वर्ण-व्यवस्था जाति-प्रथा का रूप लेती जा रही थी। कार्य अथवा व्यवसाय के स्थान पर जन्म, जाति का आधार होने लगा था। उत्तर-वैदिक-काल में ऋग्वैदिक-काल की चार जातियों के अतिरिक्त दो और जातियाँ बन गयी थीं। इनमें से एक निषाद कहलाती थी और दूसरी व्रात्य। निषाद लोग अनार्य थे। सम्भवतः ये लोग भील जाति के थे।

    व्रात्य लोग सम्भवतः आर्य एवं अनार्य रक्त-मिश्रण से उत्पन्न हुए थे। विभिन्न व्यवसायों के अनुसार बढ़ई, लोहार, मोची आदि उपजातियाँ बनने लगी थीं और अन्तर्जातीय-विवाह को घृणा की दृष्टि से देखा जाने लगा था।

    (8.) आश्रम-व्यवस्था की दृढ़ता: ऋग्वेद में आश्रम व्यवस्था की जानकारी नहीं मिलती। उत्तरवैदिक-काल के गं्रथांे में केवल तीन आश्रमों- (1.) ब्रह्ाचर्य (2.) गृहस्थ (3.) वानप्रस्थ आश्रम की जानकारी मिलती है, अंतिम अथवा चौथे आश्रम की स्थापना स्पष्ट रूप से नहीं हुई थी। सूत्र-ग्रन्थों में चारों आश्रमों की जानकारी मिलती है- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास। आश्रम व्यवस्था केवल द्विज जातियों के लिए थी। शूद्रों के लिए एकमात्र गृहस्थ आश्रम ही बताया गया था।

    (9.) वंशानुगत उद्योग-धन्धे: अब व्यवसाय वंशानुगत हो गया था और एक परिवार के लोग एक ही व्यवसाय करने लगे थे। यही कारण था कि उपजातियों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ने लगी।

    (10.) शिक्षा के महत्त्व में वृद्धि: वैदिक यज्ञों में वृद्धि हो जाने के कारण शिक्षा के महत्त्व में वृद्धि हो गई। यद्यपि शिक्षा का मुख्य विषय वेदों का अध्ययन ही था परन्तु वैदिक मन्त्रों के साथ-साथ विज्ञान, गणित, भाषा, युद्ध-विद्या आदि की भी शिक्षा दी जाने लगी। विद्यार्थी, गुरु के आश्रम में रहकर शिक्षा ग्रहण करता था और ब्रह्मचर्य धर्म का पालन करता था। शिक्षा समाप्त होने पर वह गुरु को दक्षिणा देकर घर आता था और गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता था।

    उत्तरवैदिक-कालीन आर्यों की आर्थिक स्थिति

    उत्तर-वैदिक-काल में आर्यों की आर्थिक दशा में क्रमशः परिवर्तन होता गया था तथा अब उसमें जटिलता आने लगी थी। अब वे गाँवों के अतिरिक्त नगरों में भी निवास करने लगे थे और उनका जीवन अधिक सम्पन्न हो गया था।

    (1.) धातु-ज्ञान में वृद्धि: आर्यों को ऋग्वैदिक-काल में ताम्र, स्वर्ण तथा अयस् आदि धातुओं का ज्ञान प्राप्त था परन्तु उत्तर-वैदिक-काल में उन्हें लौह-अयस्, ताम्र-अयस्, रांगा, सीसा तथा चांदी का भी ज्ञान था। इस काल में लाल-अयस् तथा कृष्ण-अयस् का भी उल्लेख मिलता है। सम्भवतः लाल-अयस का तात्पर्य ताम्बे से और कृष्ण-अयस् का तात्पर्य लोहे से था।

    (2.) लोहे के उपयोग में वृद्धि: उत्तर-वैदिक-काल में लोहे का अधिकाधिक उपयोग होने लगा। पाकिस्तान के गांधार प्रदेश में 1000 ई.पू. के आसपास गाढ़े गए शवों के साथ लोहे के बहुत सारे औजार और उपकरण मिले हैं। इस प्रकार की लौह निर्मित वस्तुएं बिलोचिस्तान से भी मिली हैं। लगभग उसी समय से पूर्र्वी पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान में भी लोहे का उपयोग हो रहा था। पुरातात्विक अन्वेषण से ज्ञात होता है कि 800 ई.पू. के लगभग पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तीरों के फलक और भालों के फलक जैसे लोहे के औजार बनने लग गए थे।

    लोहे के इन हथियारों से उत्तर-वैदिक आर्यों ने उत्तरी दो आब में बसे अपने बचे-खुचे शत्रुओं को परास्त किया होगा। उत्तरी गंगा की घाटियों के जंगलों को साफ करने के लिए लोहे की कुल्हाड़ी का उपयोग हुआ होगा। उस काल में वर्षामान 35 से 65 सेंटीमीटर तक होने से ये जंगल बहुत घने नहीं रहे होंगे। वैदिक-काल के अंतिम चरण में लोहे का ज्ञान पूर्वी उत्तर प्रदेश और विदेह में फैल गया था। ई.पू. सातवीं सदी से इन प्रदेशों में लोहे के औजार मिलने लग जाते हैं।

    पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार में लोहे का प्रयोग सर्वाधिक हुआ। लोहे के हथियारों का उपयोग लगातार बढ़ते जाने के कारण योद्धा-वर्ग महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करने लगा। नए कृषि औजारों और उपकरणों की सहायता से किसान आवश्यकता से अधिक अनाज पैदा करने लगे। राजा, सैनिक और प्रशासकीय आवश्यकताओं के लिए, इस अतिरिक्त उपज को एकत्र कर सकता था। इस अतिरिक्त उपज को ईसा-पूर्व छठी सदी में स्थापित हुए नगरों के लिए भी जमा किया जा सकता था।

    इन भौतिक लाभों के कारण किसान का कृषि कार्य में लगातार लगे रहना स्वाभाविक था। लोग अपनी पुरानी बस्तियों से बाहर निकलकर समीप के नए क्षेत्रों में फैलने लगे। इस प्रकार लोहे का उपयोग बढ़ते जाने से आर्यों का ग्राम्य प्रधान जीवन नगरीकरण की ओर बढ़ने लगा तथा छोटे-छोटे जन के स्थान पर बड़े-बड़े जनपद राज्यों की स्थापना का मार्ग खुल गया।

    (3.) भूमिपतियों का प्रादुर्भाव: ऋग्वैदिक-काल में भूमिपतियों का कहीं नाम नहीं था परन्तु अब बड़े-बड़े भूमिपतियों का प्रादुर्भाव हो रहा था। बहुत से भूमिपति सम्पूर्ण गाँव के स्वामी होते थे। गाँव के लोगों पर उनका बड़ा प्रभाव रहता था।

    (4.) वैश्यों के काम का निर्धारण: उत्तर-वैदिक-काल में वैश्य वर्ग के अंतर्गत सामान्य प्रजा का समावेश होता था। उन्हें कृषि और पशुपालन जैसे उत्पादक कार्य सौंपे गए थे। कुछ वैश्य शिल्पकार भी थे। वैदिक-काल के अंत में वे व्यापार में जुट गए। उत्तर-वैदिक-काल में सम्भवतः केवल वैश्य ही भेंट अथवा उपहार देते थे। क्षत्रिय, वैश्यों से प्राप्त भेंट पर अपनी जीविका चलाते थे। सामान्य कबीलाई प्रजा को भेंट देने वालों की स्थिति में पहुँचने में लंबा समय लगा। कई ऐसे अनुष्ठान थे जिनके माध्यम से विश् अथवा वैश्यों को राजन्य के अधीन बनाया जाता था।

    (5.) कृषि में आमूलचूल परिवर्तन: वैदिक-काल के आर्य मुख्यतः पशुपालक थे किंतु उत्तर-वैदिक-काल मे कृषि में बड़ी उन्नति हो गयी थी। अब आर्य लोग गंगा-यमुना की अत्यन्त उपजाऊ भूमि में पहुँच गए थे। अब वे बड़े-बड़े हलों का प्रयोग करने लगे थे। कृषि सम्बन्धी लोहे के औजार बहुत थोड़े मिले हैं किंतु इसमें संदेह नहीं कि उत्तर-वैदिक-कालीन लोगों की जीविका का मुख्य साधन कृषि ही था। कुछ वैदिक ग्रंथों में छः आठ, बारह और चौबीस बैलों द्वारा जोते जाने वाले हलों के उल्लेख मिलते हैं।

    इसमें अतिश्योक्ति हो सकती है। हलों के फाल लकड़ी के होते थे। उत्तरी गंगा की नरम मिट्टी में इनसे संभवतः काम चल जाता था। यज्ञों में होने वाली पशु-बलि के कारण पर्याप्त बैल उपलब्ध नहीं हो सकते थे। इसलिए कृषि आदिम स्तर की थी परन्तु इसमें संदेह नहीं कि यह व्यापक स्तर पर होती थी। शतपथ ब्राह्मण में हल की जुताई से सम्बन्धित अनुष्ठानों के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है।

    प्राचीन आख्यानों के अनुसार सीता के पिता विदेहराज जनक भी स्वयं हल जोतते थे। उस जमाने में राजन्य और राजकुमार भी शारीरिक श्रम करने में संकोच नहीं करते थे। कृष्ण के भाई बलराम को हलधर कहा जाता है। बाद में उच्च वर्णों के लोगों द्वारा हल जोतने पर निषेध लग गया। इस काल के कृषक विभिन्न प्रकार की खादों का भी प्रयोग करने लगे थे।

    वैदिक लोग यव (जौ) पैदा करते रहे परन्तु उत्तर-वैदिक काल में उनकी मुख्य पैदावार धान (चावल) और गेहूँ बन गया। कालांतर में गेहूँ का स्थान प्रमुख हो गया। आज भी उत्तर प्रदेश और पंजाब के लोगों का मुख्य अनाज गेहूँ ही है। दोआब में पहुँचने पर वैदिक लोगों को चावल की भी जानकारी मिली। वैदिक ग्रंथों में चावल को व्रीहि कहा गया है। हस्तिनापुर से चावल के जो अवशेष मिले हैं वे ईसा पूर्व आठवीं सदी के हैं। अनुष्ठानों में चावल के उपयोग के विधान मिलते हैं परन्तु अनुष्ठानों में गेहँू का बहुत कम उपयोग होता था। उत्तर-वैदिक-काल में कई तरह की दालें भी उगाई जाती थीं।

    (6.) वाणिज्य तथा व्यापार में उन्नति: उत्तर-वैदिक-काल में, ऋग्वैदिक-काल की अपेक्षा व्यापार तथा वाणिज्य मंे अधिक वृद्धि हो गयी थी। यह स्वाभाविक भी था क्योंकि अब वे एक विशाल मैदान के निवासी बन गए थे जो बड़ा ही उपजाऊ तथा धन-सम्पन्न था। इस काल में व्यापारियों का एक अलग वर्ग बन गया था जिन्हें वणिक कहते थे। धनी व्यापारी श्रेष्ठिन् कहलाता था। आर्य लोगों का आन्तरिक व्यापार पहाड़ियों में रहने वाले किरातों के साथ होता था, जिन्हें ये कपड़े देकर औषधि के लिए जड़ी-बूटियाँ प्राप्त करते थे।

    अब ये लोग समुद्र से भी परिचित हो गए थे और बड़ी-बड़ी नावों द्वारा सामुद्रिक व्यापार भी करते थे। अब आर्य लोग निष्क, शतमान तथा कृष्णाल नाम की मुद्राओं का प्रयोग करने लगे थे जिससे व्यापार मं् बड़ी सुविधा होने लगी।

    (7.) अन्य व्यवसायों की उन्नति: ऋग्वैदिक-काल की अपेक्षा अब उद्योग धन्धों में भी अधिक वृद्धि हो गई थी और कार्य विभाजन का सिद्धान्त दृढ़ हो गया था। यजुर्वेद में उन सब व्यवसायों का उल्लेख है जिन्हें इस काल की आर्य प्रजा करती थी। इनमें शिकारी, मछुए, पशुपालक, हलवाह, जौहरी, चटाई बनाने वाले, धोबी, रंगरेज, जुलाहे, कसाई, सुनार, बढ़ई आदि आते हैं।

    उत्तरवैदिक-काल में कलाओं का विकास

    उत्तर-वैदिक-काल में कला के क्षेत्र में भी कई परिवर्तन दिखाई देते हैं। काव्य-कला का स्वरूप अत्यन्त व्यापक हो गया था।

    (1.) नगर एवं गृह निर्माण कला: ऋग्वैदिक-काल के बड़े गांव, उत्तरवैदिक-काल में बड़े-बड़े नगरों में परिवर्तित होने लगे थे। तैत्तिरीय ब्राह्मण में नगर में निवास करने वालों को नगरिन कहा गया है। राज्यों की राजधानियों में बडे-बड़े विशाल भवन एवं महल बनने लगे थे। हस्तिनापुर में ई.पू.900 से ई.पू. 500 की अवधि के स्तरों की खुदाई में बस्ती के अस्तित्त्व और नगरीय जीवन के प्रारंभ होने के प्रमाण मिलते हैं परन्तु पुरातत्त्व की यह जानकारी हस्तिनापुर के सम्बन्ध मंे महाभारत से मिलने वाली जानकारी से मेल नहीं खाती।

    क्योंकि इस महाकाव्य का वर्तमान स्वरूप बहुत बाद में, ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में लिखा गया था, जब भौतिक जीवन की काफी उन्नति हो चुकी थी। उत्तर-वैदिक काल के लोग कच्ची और पक्की ईटों, मिट्टी बाँस तथा अन्य प्रकार की लकड़ी की सहायता से बनाए जाते थे। लकड़ी के बड़े बड़े लठ्ठों की सहायता से घर की छत बनाई जाती थी। घास-फूस और रबर इत्यादि की सहायता से छत पाटी जाती थी। घर में अनेक कक्ष होते थे जिनमें फर्नीचर भी प्रयुक्त होता था। हस्तिनापुर की खुदाई में मिट्टी के जो स्मारक मिले हैं वे भव्य और टिकाऊ नहीं रहे होंगे। आगे चलकर हस्तिनापुर बाढ़ में बह गया। इसलिए कुरु-जन प्रयाग के समीप कौशाम्बी में जाकर बस गया।

    (2.) धातु शिल्प कला: उत्तर-वैदिक-काल में अनेक कलाओं और शिल्पों का उदय हुआ। हमें लुहारों और धातुकारों के बारे में जानकारी मिलती है। लगभग 1000 ई.पू. के आसपास निश्चय ही इनका सम्बन्ध लोहे के उत्पादन से रहा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बिहार से 1000 ई.पू. के पहले के तांबे के कई औजार मिले हैं उनसे वैदिक और अवैदिक दोनों ही समाजों में ताम्रकारों का अस्तित्त्व सूचित होता है। वैदिक लोगों ने सम्भवतः राजस्थान के खेतड़ी की तांबे का उपयोग किया था। वैदिक लोगों ने सर्वप्रथम ताम्र धातु का उपयोग किया था। चित्रित धूसर भांडों वाले स्थलों से भी तांबे के औजार मिले हैं। इन ताम्र-वस्तुओं का उपयोग मुख्यतः युद्ध, आखेट और आभूषणों के लिए भी होता था।

    (3.) बर्तन निर्माण कला: उत्तर-वैदिक-काल के लोग चार प्रकार के मिट्टी के बर्तनों से परिचित थे- काले एवं लाल भांड, काले रंग के भांड, चित्रित धूसर भांड और लाल भांड। अंतिम किस्म के भांड उन्हें अधिक प्रिय थे। ये भांड प्रायः पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश से मिले हैं परन्तु इस युग के विशिष्ठ भांड हैं- चित्रित धूसर भांड। इनमें कटोरे और थालियां मिली हैं जिनका उपयोग उच्च वर्णों के लोगों द्वारा पूजा-पाठ अथवा भोजन अथवा दोनों कामों के लिए होता था। चित्रित धूसर भांडों के साथ कांच की वस्तुएं और कंकण मिले हैं। उनका उपयोग भी उच्च वर्ग के सदस्य ही करते होंगे।

    (4.) वस्त्र कला: इस काल में सूती, ऊनी और रेशमी वस्त्रों का प्रयोग किया जाता था। वस्त्र रंग-बिरंगे एवं सिले हुए होते थे। ऋग्वैदिक-काल की भांति वास, अधिवास, नीवी, तार्प्य, पगड़ी, उत्तरीय, अन्तरीय, कम्बल, शॉल आदि वस्त्रों का प्रयोग किया जाता था। धनी और राजपरिवारों के सदस्यों के वस्त्रों पर सोने-चाँदी की जरी का काम होता था। साधु-सन्यासी एवं आदिवासी लोग मृग चर्म का प्रयोग करते थे।

    (5.) आभूषण निर्माण कला: पुरातात्त्विक खुदाई और वैदिक ग्रंथों से विशिष्ट शिल्पों के अस्तित्त्व के बारे में जानकारी मिलती है। उत्तर-वैदिक-काल के गं्रथों में जौहरियों के भी उल्लेख मिलते हैं। ये सम्भवतः समाज के धनी लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करते थे। स्त्री पुरुष दोनों आभूषण पहनते थे। उनके आभूषण ऋग्वैदिक-काल के समान ही थे। आभूषणों में कीमती पत्थरों को जड़ा जाता था। इस युग में चाँदी के आभूषणों का प्रयोग बढ़ गया जबकि ऋग्वैदिक-काल में चाँदी के आभूषण बहुत कम थे।

    (6.) मनोरंजन: आमोद-प्रमोद एवं मनोरंजन के साधनों में ऋग्वेदकाल की तुलना में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया था। पहले की भाँति नृत्य, संगीत, जुआ, घुड़दौड़़, रथ-दौड़़ आदि मनोरंजन के मुख्य साधन थे।

    (7.) बुनाई कला: बुनाई का काम केवल स्त्रियाँ करती थीं, फिर भी यह काम बड़े पैमाने पर होता था।

    (8.) काव्य कला: ऋग्वेद में केवल स्तुति-मन्त्रों का संग्रह है, परन्तु यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, ब्राह्मण-ग्रन्थों तथा सूत्रों की रचना के द्वारा काव्य-क्षेत्र को अत्यन्त विस्तृत कर दिया गया। यजुर्वेद में यज्ञों का विस्तृत विवेचन है। सामवेद गीति-काव्य है। संगीत-कला पर उसका बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा। अथर्ववेद में भूत-प्रेत से रक्षा तथा तन्त्र-मन्त्र का विधान है। ब्राह्मण-ग्रन्थों में उच्चकोटि की दार्शनिक विवेचना है। सूत्रों की रचना इसी काल में हुई। सूत्रों के प्रादुर्भाव से, सूचनाओं को संक्षेप में लिखने की कला की उन्नति हुई।

    (9.) खगोल विद्या: इस काल में खगोल विद्या की भी उन्नति हुई तथा आर्यों को अनेक नए नक्षत्रों का ज्ञान प्राप्त हो गया।

    (10.) अन्य कलाएं: उत्तर-वैदिक-काल में चर्मकार, कुम्हार तथा बढ़ई आदि शिल्पों ने बहुत उन्नति की।

    (11.) औषधि विज्ञान: औषधि-विज्ञान अब भी अवनत दशा में था।


    उत्तरवैदिक-काल में आर्यों की धार्मिक दशा

    ऋग्वैदिक-काल का धर्म, सरल तथा आडम्बरहीन था परन्तु उत्तर-वैदिक काल का धर्म जटिल तथा आडम्बरमय हो गया। इस काल में उत्तरी दोआब में ब्रह्माण धर्म के प्रभाव के अंतर्गत आर्य संस्कृति का विकास हुआ। अनुमान होता है कि सम्पूर्ण उत्तर-वैदिक साहित्य का संकलन कुरु-पांचाल प्रदेश में हुआ। यज्ञकर्म और इससे सम्बन्धित अनुष्ठान और विधियां इस संस्कृति की मेरूदंड थीं।

    (1.) ब्राह्मणों की प्रधानता: इस युग में ब्राह्मणों की प्रधानता तथा उनका महत्त्व अत्यधिक बढ़ गया। ब्राह्मण-ग्रन्थों की रचना इसी काल में हुई। इन ग्रन्थों के रचयिता ब्राह्मण थे और इनका सम्बन्ध भी ब्राह्मणों से ही था। वेदों तथा ब्राह्मण-ग्रन्थों के सच्चे ज्ञान का अधिकारी ब्राह्मणों को ही समझा जाता था। ब्राह्मण ही यज्ञ करता और कराता था, इसलिए उसका आदर-सम्मान भी अधिक था। इस काल में ब्राह्मण का स्थान इतना ऊँचा हो गया था कि वह भू-सुर, भू-देव आदि नामों से सम्बोधित किया जाने लगा।

    यज्ञों के प्रसार के कारण ब्राह्मणों की शक्ति अत्यधिक बढ़ गई थी। आरम्भ में पुरोहितों के सोलह वर्गों में से ब्राह्मण एक वर्ग मात्र था, परन्तु शनैः शनैः इन्होंने दूसरे पुरोहित-वर्गोंं को पछाड़ दिया और ये सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण वर्ग बन गए। ये अपने और अपने यजमानों के लिए पूजा-पाठ और यज्ञ करते थे। साथ ही, कृषि कर्म से सम्बन्धित समारोहों का आयोजन भी करते थे। ये अपने आश्रयदाता राजा के लिए युद्ध में सफलता की कामना करते थे और बदले में राजा की ओर से दान-दक्षिणा तथा सुरक्षा का वचन मिलता था।

    उच्चाधिकार के लिए ब्राह्मणों का कभी-कभी योद्धा वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले क्षत्रियों से संघर्ष भी होता था परन्तु जब इन दो उच्च वर्णों का निम्न वर्णों से मुकाबला होता था तो ये आपसी मतभेदों को भुला देते थे। उत्तर-वैदिक-काल के अंत में इस बात पर बल दिया जाने लगा कि इन दो उच्च वर्णों को परस्पर सहयोग करके शेष समाज पर शासन करना चाहिए।

    (2.) यज्ञ के महत्त्व में वृद्धि: इस युग में यज्ञों के महत्त्व में इतनी अधिक वृद्धि हो गई थी कि इसे यज्ञों का युग कहा जाना चाहिए। इस काल में रचा जाने वाला यजुर्वेद, यज्ञ प्रधान ग्रन्थ है। उसमें यज्ञों के विधान की विस्तृत विवेचना की गई है। यज्ञों को करने में भी सरलता न रह गई थी। गृहस्थ स्वयं यज्ञ नहीं कर सकता था वरन् उसे याज्ञिकों की आवश्यकता पड़ती थी। यज्ञ में समय भी अधिक लगता था। बहुत से यज्ञ वर्ष भर चलते थे और उनमें बहुत अधिक धन व्यय करना पड़ता था। राजसूय तथा अश्वमेध यज्ञ केवल राजा ही कर सकते थे। इस कारण सर्वसाधारण के लिए यज्ञ करवाना कठिन कार्य हो गया।

    यज्ञों का आयोजन सामूहिक रूप से और निजी रूप से भी होता था। सामूहिक यज्ञों में राजन्य और उस जन-समुदाय के समस्त सदस्य भाग लेते थे। निजी यज्ञ अलग-अलग लोगों द्वारा अपने-अपने घरों में आयोजित किए जाते थे, क्यांेकि इस काल में वैदिक लोग स्थायी जीवन बिताते थे और उनके अपने सुव्यवस्थित कुटुम्ब थे। अग्नि को व्यक्तिगत रूप से आहुति दी जाती थी और ऐसी प्रत्येक क्रिया एक अनुष्ठान अथवा यज्ञ का रूप धारण कर लेती थी।

    (3.) विभिन्न प्रकार के यज्ञों का प्रारम्भ: उत्तर-वैदिक-काल में पूरी आर्य संस्कृति ही यज्ञमय दिखाई देती है। शतपथ ब्राह्मण कहता है- 'ऋक् पृथ्वी है, यजुष् अन्तरक्षि है और साम द्युलोक है, अतः इनमें विहित उपचारों के द्वारा अर्थात् अग्नि, इन्द्र, और सूर्य के आह्वान द्वारा मनुष्य इन तीनों लोकों को जीत लेता है।' भौतिक यज्ञ करने से मनुष्य विश्व की शक्तियों का आह्वान करके उन्हें अपने में धारण करता है। अतः इस युग में विभिन्न उद्देश्यों को लेकर विभिन्न प्रकार के यज्ञों का विधान हुआ।

    दैनिक यज्ञ: प्रत्येक परिवार में प्रतिदिन पाँच महायज्ञ होते थे-

    (अ) देवयज्ञ- इस यज्ञ में अग्नि को भोजन, घी, दूध, दही की आहुति दी जाती है।

    (ब) भूतयज्ञ- इस यज्ञ में प्रजापति, काम, विश्वैदेवी तथा पृथ्वी, जल, वायु एवं आकाश नामक चारों तत्त्वों को भोजन की बलि दी जाती है,

    (स) पितृयज्ञ- इसमें पितरों के लिए दक्षिण दिशा की ओर भोजन एवं जल फेंका जाता है।

    (द) ब्रह्मयज्ञ- इसमें वैदिक पाठों का स्वाध्याय करना पड़ता है।

    (य) मनुष्य यज्ञ- इसमें स्वयं भोजन करने से पहले किसी अतिथि को भोजन कराया जाता है।

    अग्निहोत्र: इन पांच यज्ञों के साथ-साथ व्यक्ति को प्रतिदिन प्रातः एवं सायंकाल में 'अग्निहोत्र' करना होता था जिसके अंतर्गत सूर्योदय से पहले सूर्य और प्रजापति को और सूर्यास्त के बाद अग्नि और प्रजापति को जौ और चावल की आहुति दी जाती थी।

    मासिक यज्ञ: दैनिक यज्ञों के साथ-साथ प्रत्येक मास में कुछ निश्चित यज्ञों को करने का प्रावधान किया गया था। महीने में दो बार, प्रतिपदा और पूर्णिमा को 'दर्शपूर्णमासेष्टि' की जाती है, इनमें क्रमशः अग्नि और इन्द्र तथा अग्नि और सोम को 'पुरोडाश' दिया जाता था। उत्तरवैदिक आर्यों के अनुसार अग्नि तीन प्रकार की होती है- गार्हपत्य, दक्षिण और आह्वनीय। गार्हपत्य अग्नि की वेदी गोल होती है। दक्षिण-अग्नि की वेदी अर्द्धवृत्त के आकार की होती है। आह्वनीय अग्नि की वेदी चौकोर होती है।

    वार्षिक यज्ञ: वर्ष में तीन बार बसन्त ऋतु, वर्षा ऋतु और शरद् ऋतु के आरम्भ में क्रमशः 'वैश्वदेव', 'वरुणप्रधान' और 'साकमेध' यज्ञ किए जाते थे। पहले में अग्नि, सोम सविता, सरस्वती और पूषा के लिए पाँच तर्पण किए जाते थे और इसके बाद मरुतों को पुरोडाश, विश्वदेवों को दूध और द्यावा एवं पृथ्वी को पुराडोश दिया जाता था। दूसरे अर्थात् वरुण-प्रधान यज्ञ में आटे से बनी मेण्ढे और भेड़ की मूर्तियाँ दूध के साथ वरुण और मरुतों को भेंट की जाती थीं। वर्षा के लिए करीर के फलों की बलि दी जाती थी। इसके बाद हल के दो भागों की पूजा होती थी। गृह उपचारों में श्रावण पूर्णिमा को विष्णु, वर्षा ऋतु और श्रावण के देवता को पकवान चढ़ाया जाता था। मार्ग-शीर्ष की पूर्णिमा को आग्रहायणी पर्व मनाया जाता था। इस अवसर पर घरों की सफाई व सफेदी की जाती थी। शरद या वसन्त में पशुधन की वृद्धि के लिए शुलगव यज्ञ किया जाता था जिसमें रुद्र को बैल की बलि दी जाती थी।

    सोमयज्ञ: वैदिक यज्ञों में सोमयज्ञ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण था। इसे धनी व्यक्ति करते थे। यह प्रायः वसन्त में नए वर्ष के आरम्भ में किया जाता था। इसे करने से पहले 16 याज्ञिक नियुक्त किए जाते थे जो यजमान और उसकी पत्नी को दीक्षित करते थे। फिर सोम की बूँटी गाड़ी में भर कर लाई जाती थी। पहले दिन गर्म दूध की आहुति होती थी। दूसरे दिन सोम को वेदी पर लाकर सिलबटे से पीसा और छन्ने से छाना जाता था। फिर इसे कलशों में भरकर दूध में मिलाया जाता था और कटोरों में देवताओं को भेट किया जाता था। प्रायः दिन में तीन बार सोम की स्तुति होती था। तीसरे दिन अग्नि और सोम को बलि दी जाती थी और अन्त में यजमान अवभृव नामक स्नान करता था। सोमयज्ञ भी सात प्रकार के थे। इनमें 'वाजपेय यज्ञ' शक्ति प्राप्त करने के लिए किये जाते थे। इसमें रथों की दौड़़ होती थी। 'राजसूय यज्ञ' और 'अश्वमेध यज्ञ' राजाओं के लिए थे तथा लम्बे चलते थे। कुछ यज्ञों में पशु-बलि दी जाती थी किन्तु पशुबलि को सामान्यतः अच्छा नहीं समझा जाता था। पशुबलि के समय लोग मुँह दूसरी ओर फेर लेते थे और इस अपराध के लिए देवताओं से क्षमा माँगते थे।

    (4.) यज्ञों में बलि का चलन: ऋग्वेद काल में यज्ञ में केवल फल तथा दूध की बलि दी जाती थी परन्तु अब यज्ञ में पशु तथा सोम की बलि का महत्त्व हो गया। बड़ी-बड़ी बलियों और यज्ञों के अवसर पर राजाओं की ओर से समाज के समस्त वर्गों के लोगों को जिमाया जाता था।

    (5.) याज्ञिक वर्ग की उत्पत्ति: यज्ञों की संख्या तथा महत्त्व में वृद्धि हो जाने तथा उनमें जटिलता आ जाने से ब्राह्मणों में एक ऐसा वर्ग उत्पन्न हो गया जो यज्ञों का विशेषज्ञ होता था। इस वर्ग का एकमात्र व्यवसाय अपने यजमान के यहाँ यज्ञ कराना तथा उससे यज्ञ-शुल्क एवं दान प्राप्त करना हो गया। ब्राह्मण उन सोलह प्रकार के पुरोहितों में से एक थे जो यज्ञों का नियोजन करते थे। समस्त पुरोहितों को उदारतापूर्वक दान-दक्षिणा दी जाती थी। यज्ञों के अवसर पर जो मंत्र पढ़े जाते थे, उनका उच्चारण यज्ञकर्ता को बड़ी सावधानी से करना होता था। यज्ञकर्ता को यजमान कहते थे।

    यज्ञ की सफलता यज्ञ के अवसर पर उच्चारित चमत्कारिक शक्ति वाले शब्दों पर निर्भर करती थी। वैदिक आर्यों द्वारा किए जाने वाले अनुष्ठान दूसरे हिन्द-यूरोपीय लोगों में भी देखने को मिलते हैं परन्तु अनेक अनुष्ठानों का विकास भारत भूमि में हुआ। यज्ञ विधियों का आविष्कार, संयोजन एवं विकास ब्राह्मण पुरोहितों ने किया। उन्होंने बहुत सारे अनुष्ठानों का आविष्कार किया, इनमें से अनेक अनुष्ठान आर्येतर प्रजाओं से लिए गए थे। उत्तरवैदिक साहित्य में मिलने वाले उल्लेखों के अनुसार राजसूय यज्ञ करने वाले प्रधान पुरोहित को 2,40,000 गायें दक्षिणा के रूप में दी जाती थीं।

    पुरोहितों को यज्ञों में, गायों के साथ-साथ सोना, कपड़ा और घोड़े भी दिए जाते थे। यद्यपि पुरोहित दक्षिणा के रूप में कभी-कभी भूमि भी मांगते थे, तथापि यज्ञ की दक्षिणा के रूप भूमि-दान की प्रथा उत्तर-वैदिक-काल में भली-भाँति स्थापित नहीं हुई थी। शतपथ ब्राह्मण में उल्लेख है कि अश्वमेध यज्ञ में उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम इन समस्त दिशाओं का, पुरोहित को दान कर देना चाहिए।

    बड़े स्तर पर पुरोहितों को भूमि-दान किया जाना सम्भव नहीं था। एक उल्लेख ऐसा भी मिलता है कि पुरोहितों को दी जाने वाली भूमि ने अपना हस्तांतरण सम्भव नहीं होने दिया।

    (6.) उच्चकोटि का दार्शनिक विवेचन: ई.पू.600 के आसपास, उत्तर-वैदिक-काल का अंतिम चरण आरंभ हुआ। इस काल में, विशेषतः पंचाल और विदेह में, पुरोहितों के आधिपत्य, कर्मकांड एवं अनुष्ठानों के विरुद्ध प्रबल आंदोलन आरम्भ हुआ तथा उपनिषदों की रचना हुई। इन दार्शनिक ग्रंथों में अनुष्ठानों की आलोचना की गई और सम्यक् विश्वासों एवं ज्ञान पर बल दिया गया। इस काल के याज्ञवल्क्य आदि ऋषियों द्वारा आत्मन् को पहचानने और आत्मन् तथा ब्रह्म के सम्बन्ध को सही रूप में समझने पर बल दिया गया।

    ब्रह्मा सर्वोच्च देव के रूप में उदित हुए। पंचाल और विदेह के कुछ क्षत्रिय राजाओं ने भी इस प्रकार के चिन्तन में भाग लिया और पुरोहितों के एकाधिकार वाले धर्म में सुधार करने के लिए वातावरण तैयार किया। उनके उपदेशों से स्थायित्व और एकीकरण की विचारधारा को बल मिला। आत्मा की अपरिवर्तनशीलता और अमरता पर बल दिए जाने से स्थायित्व की संकल्पना मजबूत हुई, राजशक्ति को इसी की आवश्यकता थी। आत्मा और ब्रह्मा के सम्बन्धों पर बल दिए जाने से उच्च अधिकारियों के प्रति स्वामिभक्ति की विचारधारा को बल मिला।

    इस काल की दार्शनिक विवेचना के अन्य प्रधान ग्रन्थ आरण्यक हैं। पुनर्जन्म के सिद्धान्त का अनुमोदन भी इसी युग में किया गया। इसके अनुसार मनुष्य का आगामी जन्म उसके कर्मों पर निर्भर रहता है तथा अच्छा कार्य करने वाला, अच्छी योनि में और बुरा कार्य करने वाला बुरी योनि में जन्म लेता है। इस युग में ज्ञान की प्रधानता पर बल दिया गया।

    मोक्ष प्राप्त करने के लिए ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक समझा गया। षड्दर्शन अर्थात् सांख्य, योग, न्याय वैशेषिक, पूर्व-मीमांसा तथा उत्तर-मीमांसा की रचना इसी काल में हुई।

    स्तुति पाठ: जिन भौतिक कारणों से लोग पूर्वकाल में देवताओं की आराधना करते थे, उन्हीं कारणों से अब भी करते थे परन्तु पूजा-पद्धति में काफी परिवर्तन हो गया था। स्तुति पाठ पहले की तरह ही होते थे, पर देवताओं को संतुष्ट करने की दृष्टि से अब उनका उतना महत्त्व नहीं रह गया था।

    (7.) देवताओं के महत्त्व में परिवर्तन: उत्तर-वैदिक-काल में ऋग्वैदिक-काल के देवताओं का महत्त्व घट रहा था और उनका स्थान अन्य नये देवता ग्रहण कर रहे थे। इन्द्र और अग्नि को, पहले जैसा महत्त्व नहीं था। इस युग में प्रजापति का महत्त्व देवताओं से अधिक हो गया। ऋग्वैदिक-काल के दूसरे कई गौण देवताओं को भी उच्च स्थान प्रदान किए गए। पशुओं के देवता रुद्र, उत्तर-वैदिक-काल में एक महत्त्वपूर्ण देवता बन गए। रुद्र को महादेव तथा पशुपति के नाम से पुकारा जाने लगा।

    रुद्र के साथ-साथ शिव का महत्त्व बढ़ने लगा। विष्णु अब उन लोगों के संरक्षक देवता समझे जाने लगे जो ऋग्वैदिक-काल में अर्द्ध-घुमंतू जीवन बिताते थे और अब स्थायी जीवन बिताने लगे थे। विष्णु, वासुदेव कहलाने लगे। भागवत सिद्धान्त का बीजारोपण भी इसी युग में हो गया था। जब समाज चार वर्गों- ब्राह्मण, राजन्य, वैश्य और शूद्र में विभाजित हो गया तो प्रत्येक वर्ण के पृथक देवता अस्तित्त्व में आ गए। पूषन को प्रारम्भ में गौ-रक्षक समझा जाता था किंतु बाद में शूद्रों का देवता बन गया।

    (8.) आडम्बर तथा अन्ध विश्वासों में वृद्धि: उत्तर-वैदिक-काल के आर्यों के उत्तरी मैदान में बस जाने के कारण वे मानसून पर अत्यधिक निर्भर रहने लगे। फलतः उन्हें अतिवृष्टि तथा अनावृष्टि का सामना करना पड़ा। कृषि पर कीट-पतंगों एवं रोगों का आक्रमण होता था। अतः फसलों को नष्ट होने से बचाने के लिए मन्त्र-तन्त्र का प्रयोग होने लगा जिनका उल्लेख अथर्ववेद में मिलता है।

    ऋग्वैदिक-काल का विशुद्ध धर्म अब धीरे-धीरे आडम्बरों तथा अन्ध-विश्वासों का जाल बनने लगा था। अब यह विश्वास हो गया था कि यज्ञों तथा मन्त्रों द्वारा न केवल देवताओं को वश में किया जा सकता है वरन् उन्हें समाप्त भी किया जा सकता है। अब भूत-प्रेत तथा मन्त्र-तन्त्र में लोगों का विश्वास बढ़ता जा रहा था। अथर्ववेद में भूत-प्रेतों का वर्णन है और तन्त्र-मन्त्रों द्वारा इनसे रक्षा का उपाय भी बताया गया है। कुछ प्रतीक-वस्तुओं की भी पूजा होने लगी। उत्तर-वैदिक-काल में मूर्ति-पूजा भी आरम्भ हो गई।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • अध्याय - 5 राज्य में सरकारी क्षेत्र के प्रमुख संग्रहालय एवं अभिलेखागार

     19.05.2020
    अध्याय - 5 राज्य में सरकारी क्षेत्र के प्रमुख संग्रहालय एवं अभिलेखागार

    अध्याय - 5 राज्य में सरकारी क्षेत्र के प्रमुख संग्रहालय एवं अभिलेखागार


    पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग द्वारा संचालित संग्रहालय


    राजस्थान सरकार द्वारा राज्य में राजकीय संग्रहालयों की स्थापना, सरंक्षण एवं विस्तार के लिए अलग से पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग की स्थापना की गई है। इस विभाग द्वारा वर्तमान में निम्नलिखित संग्रहालय संचालित किए जा रहे हैं-

    राज्य स्तरीय संग्रहालय

    1. राजकीय केन्द्रीय संग्रहालय, अलबर्ट हॉल, (अल्बर्ट म्यूजियम), जयपुर

    संभाग स्तरीय संग्रहालय

    1. राजकीय संग्रहालय, उदयपुर,

    2. राजकीय संग्रहालय, जोधपुर,

    3. राजकीय संग्रहालय, बीकानेर,

    4. राजकीय संग्रहालय, कोटा,

    5. राजकीय संग्रहालय, अजमेर,

    6. राजकीय संग्रहालय, हवामहल, जयपुर,

    7. राजकीय संग्रहालय, भरतपुर

    जिला स्तरीय संग्रहालय


    1. राजकीय संग्रहालय, अलवर

    2. राजकीय संग्रहालय, डूंगरपुर

    3. राजकीय संग्रहालय, चित्तौड़गढ़

    4. राजकीय संग्रहालय, जैसलमेर

    5. राजकीय संग्रहालय, पाली

    6. राजकीय संग्रहालय, झालावाड़

    7. राजकीय संग्रहालय, सीकर

    स्थानीय संग्रहालय

    1. राजकीय संग्रहालय, आहाड़, उदयपुर

    2. राजकीय संग्रहालय, मण्डोर, जोधपुर

    3. राजकीय संग्रहालय, माउंट आबू, सिरोही

    संग्रहालय जो आरम्भ किए जाने हैं

    1. राजकीय संग्रहालय, केसरीसिंह बारहठ की हवेली, शाहपुरा, भीलवाड़ा।

    2. टाउन हॉल पुराना विधानसभा भवन, जयपुर।

    3. राजकीय संग्रहालय, बारां।


    राज्य की आर्ट गैलेरी

    1. आर्ट गैलेरी, विराट नगर, जयपुर

    2. प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान जोधपुर की आर्ट गैलेरी


    राजस्थान राज्य अभिलेखागार

    राजस्थान राज्य अभिलेखागार का मुख्यालय बीकानेर में स्थापित किया गया है तथा इसकी शाखाएं जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, कोटा, अजमेर, अलवर एवं भरतपुर में हैं।


    प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान

    राज्य सरकार द्वारा प्राच्य विद्या प्रतिष्ठानों की स्थापना की गई है जिनमें प्राचीन दुर्लभ हस्तलिखित ग्रंथों, चित्रग्रंथों, बहियों आदि का संग्रहण किया गया है। जोधपुर में इसका मुख्यालय है तथा बीकानेर, कोटा, अलवर, उदयपुर, चित्तौड़ में उपशाखाएं कार्यरत हैं।


    अरबी-फारसी शोध संस्थान टोंक

    टोंक में अरबी और फारसी ग्रंथों के संरक्षण के लिए कार्यालय स्थापित हुआ जो अब स्वतंत्र संस्थान के रूप में कार्यरत है तथा मौलाना अबुल कलाम आजाद अरबी फारसी शोध संस्थान के नाम से जाना जाता है।


    विज्ञान केन्द्र एवं संग्रहालय

    विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने राज्य में जयपुर में क्षेत्रीय विज्ञान केन्द्र एवं विज्ञान पार्क स्थापित किया है। साथ ही जोधपुर, नवलगढ़, कोटा, उदयपुर में उपक्षेत्रीय विज्ञान केन्द्र स्थापित किए हैं। झालावाड़ के निकट झालरापाटन में विज्ञान पार्क स्थापित किया गया है। इनमें आम जन को विज्ञान के सिद्धांतों का प्रदर्शन करने के लिए स्वचालित मॉडल प्रदर्शित किये गए हैं।

    प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय

    1. प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय, जयपुर।

    2. प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय, सवाईमाधोपुर।

    प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय, रामसिंहपुरा

    देश का पांचवां राजीव गांधी क्षेत्रीय प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय सवाईमाधोपुर जिले के रामसिंहपुरा गांव में आरम्भ किया गया है। 1 मार्च 2014 को इसे पर्यटकों के लिए खोल दिया गया। इस संग्रहालय में पर्यावरण, वन्यजीव, ज्ञान, विज्ञान, कला एवं संस्कृति आदि से जुड़ी चीजों की पांच गैलेरी, एक लाइब्रेरी, ऑडिटोरियम, छात्रावास आदि बनाये गए हैं।

    बायोलॉजिकल पार्क जयपुर, जोधपुर एवं उदयपुर में बायोलॉजिकल पार्क स्थापित किये गए हैं। बीकानेर जिले में बीछवाल में बायोलॉजिकल पार्क स्थापित किया जा रहा है। यहाँ भी जन्तुओं के सम्बन्ध में जानकारियां पर्यटकों को दी जा रही हैं।


    नेचर पार्क

    वर्ष 2014-15 में चूरू में नेचर पार्क स्थापित किया गया है।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-42

     19.05.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-42

    पर्यावरण में संगीत घोलते लोकवाद्य


    राजस्थान के लोक कलाकारों ने सदियों से जिस संगीत की साधना की है, उसकी सफलता में लोकवाद्यों का महत्त्वपूर्ण योगदान है। ये लोकवाद्य स्थानीय सामग्री से बनाये जाते हैं। इनमें विभिन्न प्रकार के वृक्षों से प्राप्त होने वाली लकड़ी, तूंबा, नारियल, विभिन्न पशुओं के मृत शरीरों से प्राप्त होने वाली त्वचा, बाल एवं तांत आदि का बड़े स्तर पर उपयोग होता है। राजस्थान के तत् वाद्यों में सारंगी, जंतर, रावण हत्था, रवाज, तंदूरा, इकतारा, अपंग, कमायचा, आदि प्रमुख हैं। सुषिर वाद्यों में बांसुरी, अलगोजा, पुंगी, शहनाई सतारा, मशक, मोरचंग, अनव) वाद्यों में मृदंग, ढोलक, नगाड़ा, नौबत, मादल, चंग, खंजरी तथा घन वाद्यों में मंजीरा, झांझ, थाली और खड़ताल प्रमुख हैं। कुछ प्रमुख लोकवाद्यों का परिचय इस प्रकार से है-

    अलगोजा : यह सुषिर अर्थात् फूंक वाद्य है तथा बांसुरी की तरह होता है। इसमें बांस की दो नलियां होती हैं। नली में 4 से 7 छेद किये जाते हैं। वादक दोनों नलियों को एक साथ मुँह में रखकर बजाता है। एक नली पर स्वर कायम किया जाता है तथा दूसरी नली पर स्वर बजाये जाते हैं। इसे भील एवं कालबेलिया जनजातियों द्वारा बजाया जाता है।

    इकतारा : गोल तूंबे में एक बांस फंसा देते हैं। तूंबे का ऊपरी हिस्सा काटकर उस पर चमड़ा मंढ़ देते हैं। बांस में छेद करके उसमें खूंटी लगाते हैं तथा एक तार कस दिया जाता है।

    कमायचा : यह दो-ढाई फुट लम्बा ईरानी वाद्ययंत्र है जो सारंगी की तरह दिखता है तथा गज की सहायता से बजता है। यह रोहिड़ा या आक की लकड़ी से बनता है जिसके तार बकरी की आंतों को सुखा कर बनाये जाते हैं तथा घोड़े के बालों का भी इस हेतु उपयोग किया जाता है। इस वाद्ययंत्र में दो मोर तथा नौ मोरनियां होती हैं तथा एक तार से लेकर चार तारों तक का उपयोग किया जाता है। इसकी तबली थोड़ी मोटी होती है तथा चमड़े से ढंकी हुई होती है। बाड़मेर तथा जैसलमेर जिलों में इसका प्रयोग बहुतायत से होता है।

    खंजरी : यह ढप का लघु रूप है। ढप की तरह इस पर भी चमड़ा मंढ़ा होता है। इसे कामड़, भील, कालबेलिया आदि बजाते हैं।

    खड़ताल : लकड़ी की चार पट्टिकाओं को खड़ताल कहते हैं। भजनों में बजाया जाने वाले करताल का यह देशज रूप है। इसे दोनों हाथों की अंगुलियों में दो-दो पट्टिकाओं को रखकर बजाया जाता है।

    चंग : यह ताल वाद्य लकड़ी के गोल घेरे से बना होता है। एक तरफ बकरे की खाल मंढ़ी जाती है। यह दोनों हाथों से बजता है। इसे ढप भी कहते हैं। इसे होली पर बजाते हैं।

    डैंरू : यह डमरू का बड़ा रूप है। यह आम की लकड़ी का बनता है। दोनों तरफ बारीक चमड़ा मंढ़ कर रस्सियों से कसते हैं। एक हाथ से डोरियों पर दबाव डालकर कसा और ढीला छोड़ा जाता है तथा दूसरे हाथ से लकड़ी की पतली डंडी के आघात से बजाया जाता है।

    ढोल : लोकवाद्यों में ढोल का प्रमुख स्थान है। यह लोहे अथवा लकड़ी के गोल घेरे पर दोनों तरफ चमड़ा मंढ़ कर बनाया जाता है। इस पर लगी रस्सियों को कड़ियों के सहारे खींचकर इसे कसा जाता है। वादक इसे गले में डालकर लकड़ी के डंडे से बजाता है।

    ढोलक : यह एक साधारण वाद्य है। यह ढोल की तरह ही छोटे आकार की होती है। इसके दोनों तरफ चमड़ा मंढ़ा होता है। इस पर लगी डोरियों को कड़ियों से खींचकर कसा जाता है। यह दोनों हाथों से बजाई जाती है तथा एक प्रमुख ताल वाद्य है।

    जंतर : यह वाद्य वीणा की तरह होता है। वादक इसको गले में डालकर खड़ा-खड़ा ही बजाता है। वीणा की तरह इसमें दो तूंबे होते हैं। इनके बीच बांस की लम्बी नली लगी होती है। इसमें कुल चार तार होते हैं। यह वाद्य गूजर भोपों में प्रचलित है।

    तंदूरा : यह तानपूरे से मिलता-जुलता है। इसमें चार तार होते हैं, इसलिये इसे चौतारा भी कहते हैं। यह लकड़ी का बना होता है। कामड़ जाति के लोग तंदूरा ही बजाते हैं।

    ताशा : तांबे की चपटी परात पर बकरे का पतला चमड़ा मंढ़ा जाता है। इसे बांस की खपच्च्यिों से बजाया जाता है। इस वाद्य को मुसलमान अधिक बजाते हैं।

    धौंसा : यह भी नगाड़े की तरह ही होता है। इसे घोड़े पर दोनों तरफ रखकर लकड़ी के डंडों से बजाया जाता है।

    नड़ : यह भी सुषिर वाद्ययंत्र है। ढाई फीट लम्बे इस वाद्ययंत्र को कंगोर या कैर की लकड़ी से बनाया जाता है। बांसुरीनुमा नड़ में 4 से 6 छेद होते हैं। ये नीचे की ओर होते हैं।

    नगाड़ा : यह दो प्रकार का होता है, एक छोटा तथा दूसरा बड़ा। छोटे नगाड़े के साथ एक नगाड़ी भी होती है। इसे लोकनाट्यों में शहनाई के साथ बजाया जाता है। लोकनृत्यों में नगाड़े की संगत के बिना रंगत नहीं आती। बड़ा नगाड़ा नौबत की तरह का होता है। इसे बम या टामक भी कहते हैं। यह युद्ध के समय बजाया जाता था। नगाड़ा लकड़ी के डंडों से ही बजाया जाता है।

    नौबत : धातु की लगभग चार फुट गहरी अर्ध अंडाकार कुंडी को भैंसे की खाल से मंढ़ कर चमड़े की डोरियों से कसा जाता है। इसे लकड़ी के डंडों से बजाया जाता है। इसे प्रायः मंदिरों में या राजा महाराजा के महलों के मुख्य द्वार पर बजाया जाता था।

    पुंगी : यह वाद्य एक विशेष प्रकार के तूंबे से बनता है। तूंबे का ऊपरी हिस्सा लंबा और पतला तथा नीचे का हिस्सा गोल होता है। तूंबे के निचले हिस्से में छेद करके दो नलियां लगायी जाती हैं। नालियों में स्वरों के छेद होते हैं। अलगोजे के समान ही एक नली में स्वर कायम किया जाता है और दूसरी से स्वर निकाले जाते हैं। यह कालबेलियों का प्रमुख वाद्य है।

    बांकिया : पीतल का बना यह वाद्य ढोल के साथ मांगलिक अवसरों पर बजाया जाता है। आकृति में यह बड़े बिगुल की तरह होता है।

    भपंग : यह वाद्य कटे हुए तंूबे से बनता है जिसके एक सिरे पर चमड़ा मंढ़ते हैं। चमड़े में एक छेद करके उसमें जानवर की आंत का तार डालकर उसके सिर पर लकड़ी का टुकड़ा बांधते हैं। इसे कांख में दबाकर एक हाथ से तांत को खींचकर या ढीला छोड़कर उस पर दूसरे हाथ से लकड़ी के टुकड़े से प्रहार करते हैं। अलवर क्षेत्र में यह वाद्य काफी प्रचलित है।

    भूंगल : यह भवाई जाति के लोगों का वाद्य है। पीतल का बना यह वाद्य तीन हाथ लंबा तथा बांकिया जैसा होता है। इसे भेरी भी कहते हैं। इसे रणक्षेत्र में भी बजाया जाता है।

    मशक : चमड़े की सिलाई करके बनाये गये इस वाद्य के एक सिरे पर लगी नली से मुँह से हवा भरी जाती है तथा दूसरे सिरे पर लगी अलगोजे नुमा नली से स्वर निकाले जाते हैं। इसके स्वर पुंगी की तरह सुनाई देते हैं। भैंरूजी के भोपों का यह प्रमुख वाद्य है।'

    मांदल : मिट्टी से बनी मांदल की शक्ल मृदंग जैसी होती है। इस पर हिरण या बकरे की खाल मंढ़ी होती है। यह आदिवासी भीलों और गरासियों का प्रमुख वाद्य है।

    मोरचंग : मोरचंग मोर की आकृति का होता है तथा लोहे या पीतल से बनता है। इसके मध्य पतला और मजबूत तार होता है। एक सिरा मुंह में रखा जाता है जिसे श्वास की हवा से हवाई स्वर कण्ठ का उपयोग करते हुए दिया जाता है। दूसरे सिरे पर अंगुली से आघात किया जाता है। ग्वारिया जाति के लोग इसे भेड़, बकरी एवं गाय चराते समय बजाते हैं।

    रावण हत्था : रावण हत्था भोपों का मुख्य वाद्य है। बनावट में यह बहुत सरल किंतु स्वर में सुरीला होता है। इसे बनाने के लिये नारियल की कटोरी पर खाल मंढ़ी जाती है जो बांस के साथ लगी होती है। बांस में जगह-जगह खूंटियां लगा दी जाती हैं जिनमें तार बंधे होते हैं। यह वायलिन की तरह गज से बजाया जाता है। एक सिरे पर कुछ घुंघरू बंधे होते हैं। इसे पाबूजी के भोपे तथा डूंगजी जवारजी के भोपे कथा बांचते समय बजाते हैं।

    शहनाई : यह एक मांगलिक वाद्य है। चिलम की आकृति का यह वाद्य शीशम या सागवान की लकड़ी से बनाया जाता है। वाद्य के ऊपरी सिरे पर ताड़ के पत्ते की तूंती बनाकर लगाई जाती है। फूंक देने पर इसमें मधुर स्वर निकलता है।

    सारंगी : राजस्थान में सारंगी के विविध रूप दिखाई देते हैं। लोक कलाकार सारंगी को संगत वाद्य के रूप में बजाते हैं। यह लंगा समुदाय की विशेष पहचान है। उनके अतिरिक्त मिरासी, जोगी, मांगणियार आदि कलाकार भी सारंगी के साथ ही गाते हैं। सारंगी सागवान, कैर तथा रोहिड़ा की लकड़ी से बनती है। सारंगी के तार बकरे की आंत के बनते हैं और गज में घोड़े की पूंछ के बाल बंधे होते हैं।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×