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  • अध्याय - 4 राजस्थान में संग्रहालयों की स्थापना का इतिहास

     02.06.2020
    अध्याय - 4 राजस्थान में संग्रहालयों की  स्थापना का इतिहास

    अध्याय - 4 राजस्थान में संग्रहालयों की स्थापना का इतिहास


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राजस्थान में पुराप्रस्तर युगों से लेकर आधुनिक काल तक विकसित मानव सभ्यताओं की गाथा नदी घाटियों, पर्वतीय उपत्यकाओं एवं रेतीले धोरों में दबी हुई है। इसे पहचानना, खोजना, उसकी कालावधि का निर्धारिण करना, संग्रहण करना तथा दर्शकों तक उसकी पहुंच बनाना अत्यंत दुष्कर कार्य है। यह समस्त सामग्री राजस्थान में मनुष्य के उद्भव से लेकर सभ्य बनने तक का इतिहास कहती है जो उस काल में लिखित रूप में नहीं मिलता है। उस इतिहास के साक्ष्य उस काल के खेतों, कुओं, चूल्हों, घरों के अवशेषों एवं शवाधानों के साथ-साथ बर्तनों, आभूषणों, मणकों, मूर्तियों, कंकालों आदि के रूप में मिलते हैं। मानव सभ्यताओं की इससे आगे की गाथा शिलालेखों, सिक्कों, मुद्राओं, वस्त्रों, कीर्ति-स्तम्भों, दुर्गों, महलों, हवेलियों, मंदिरों, मूर्तियों, जलाशयों, कलात्मक कुओं, बावड़ियों, ताल-तलैयों, सर-सरोवरों, समाधियों, छतरियों, अभिलेखों, आदि के रूप में मिलती है। यह सब सामग्री हमारी सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा है। इस विरासत में बहुत सी ऐसी है जिसे संग्रहालयों तक नहीं लाया जा सकता है किंतु बहुत सी सामग्री ऐसी भी है जिसे संग्रहालयों तक लाया जा सकता है और किसी विशिष्ट क्रम एवं विधि में प्रदर्शित कर मानव इतिहास को उसकी निरंतरता के साथ देखा, समझा एवं परखा जा सकता है।


    राजपूताना की देशी रियासातें में अपने राजवंश एवं राज्य की ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण एवं प्रदर्शन का विचार उन्नीसवीं सदी में विकसित होने लगा था। यही कारण है कि राजस्थान निर्माण के पूर्व ही राजपूताना की विभिन्न रियासतों में दस संग्रहालय स्थापित हो गए थे। संग्रहालयों की स्थापना के क्रम में सर्वप्रथम ई.1870 के आसपास उदयपुर में संग्रहालय की स्थापना का काम आरम्भ हुआ किंतु राजपूताना में प्रथम संग्रहालय की विधिवत् स्थाना का श्रेय जयपुर को जाता है। जयपुर में प्रथम संग्रहालय की नींव का पत्थर महाराजा सवाई रामसिंह (द्वितीय) (ई.1835-80) के शासनकाल में ई.1876 में प्रिंस एलबर्ट ने रखा और उसी के नाम पर इस संग्रहालय का नाम एलबर्ट म्यूजियम रखा गया। ई.1881 में जयपुर संग्रहालय का संग्रह अस्थायी रूप से किशनपोल बाजार में स्थित स्कूल आफ आर्ट में लाया गया और महाराजा माधोसिंह (ई.1880-1922) के शासनकाल में ई.1886 में इसे वर्तमान संग्रहालय में स्थानान्तरित कर दिया गया। ई.1887 में सर एडवर्ड बेडफोर्ड ने इसका उद्घाटन कर विधिवत् रूप से इसे जनता के लिए खोल दिया। प्रदेश स्तर के इस संग्रहालय मे राजस्थान के जन-जीवन और शिल्प कौशल की जानकारी मिलती है।

    मेवाड़ में महाराणा फतहसिंह (ई.1884-1930) के शासनकाल में संग्रहालय स्थापित करने का निर्णय लिया गया। इसके लिए गुलाब बाग (उदयपुर) में एक भव्य भवन का निर्माण किया गया। इस भवन निर्माण का निर्णय महारानी विक्टोरिया सिल्वर जुबली समारोह के दौरान लिया गया था। भवन निर्माण का कार्य पूर्ण हो जाने पर इसका नाम विक्टोरिया हॉल म्यूजियम रखा गया और ई.1890 में तत्कालीन वायसराय लार्ड लेंसडाउन द्वारा इसका उद्घाटन किया गया।

    लार्ड कर्जन के समय संग्रहालयों की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किए गए। संग्रहालयों को समुचित एवं व्यवस्थित स्वरूप प्रदान करने के लिए ई.1902 में सर जॉन मार्शल को आर्कियोलॉजीकल सर्वे आफ इण्डिया का डायरेक्टर जनरल नियुक्त किया गया। संग्रहालयों की परिकल्पना को मूर्तरूप देने के लिए पहली बार भारतीय विद्वानों की सेवाएं ली गईं और भारतीय संस्कृति एवं पुरासम्पदा की खोज कर उनके संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया गया। गौरीशंकर हीराचन्द ओझा आदि विद्वानों के सक्रिय सहयोग एवं उनके द्वारा किए गए सर्वेक्षण से एकत्र पुरासम्पदा के फलस्वरूप अजमेर के ऐतिहासिक दुर्ग अकबर का किला में राजपूताना म्यूजियम की स्थापना की गई। ई.1908 में राजपूताना के गर्वनर जनरल के एजेन्ट सर इलियट ग्राहम कोल्विन द्वारा इसका विधिवत् रूप से उद्घाटन किया गया। ओझाजी को राजपूताना म्यूजियम का प्रथम अध्यक्ष बनाया गया। ओझा अैर उसके सुयोग्य उत्तराधिकारी यू. सी. आाचार्य द्वारा विभिन्न स्थानों का विस्तृत सर्वेक्षण किया गया। पुरासामग्री का संकलन किया गया। आर. भण्डारकर द्वारा किए गए उत्खनन कार्य से नगरी (चित्तौड़गढ़) से शुंग और कुषाणकालीन टेराकोटाज, सरवानिया (बांसवाड़ा) से क्षत्रप सिक्कों का भण्डार तथा अढाई दिन के झौंपड़े से उत्कीर्ण पाषाण खण्ड प्राप्त किए गए और आगे भी संग्रहालय को समृद्ध करने के प्रयत्न जारी रहे।

    जोधपुर में ई.1909 में संग्रहालय की स्थापना की गई। ई.1914 में पंडित विश्वेश्वर नाथ रेऊ संग्रहालय के सहायक अधीक्षक बने और उनके निर्देशन एवं सहयोग से संग्रहालय को नया स्वरूप प्रदान किया गया। ई.1916 में संग्रहालय को भारत सरकार की मान्यता मिली और आगे चलकर इसका नाम जोधपुर के महाराजा सरदार सिंह (ई.1895-1911) की स्मृति में सरदार म्यूजियम रख दिया गया। रेऊजी की रुचि और रचनात्मक दृष्टिकोण से संग्रहालय में ओसियां, किराड़ू, मण्डोर, डीडवाना, सांभर, नागौर आदि स्थानों से सांस्कृतिक विरासत को एकत्रकर इस संग्रहालय को समृद्ध किया गया।

    हाड़ौती क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने के लिए ई.1915 में झालावाड़ में क्षेत्र का पहला संग्रहालय स्थापित किया गया। झालावाड़ के तत्कालीन महाराजा भवानीसिंह (ई.1874-1929) की गहन रुचि एवं उनके संरक्षण में संग्रहालय में हाड़ौती क्षेत्र के विभिन्न स्थानों से पुरासामग्री का संकलन कर संग्रहालय की श्रीवृद्धि की गई। ई.1929 में उम्मेद भवन पैलेस संग्रहालय की स्थापना की गई।

    संग्रहालय स्थापना की दौड़ में बीकानेर भी पीछे नहीं रहा। रियासत ने इटली के विद्वान डॉ. एल. पी. टेस्सीटोरी को आमंत्रित कर एक विस्तृत सर्वेक्षण करवाया और उन्होंने गंगानगर-बीकानेर क्षेत्र से महत्वपूर्ण पुरासामग्री का संकलन किया। डॉ. टेस्सीटोरी के संग्रह का उपयोग करते हुए ई.1937 में गंगा गोल्डन जुबली म्यूजियम की स्थापना की गई। महाराणा फतहसिंह (ई.1884-1930) ने चित्तौड़गढ़ संग्रहालय का निर्माण करवाया।

    संग्रहालय स्थापना की शृंखला में ई.1940 में अलवर और ई.1944 में भरतपुर रियासतों में संग्रहालय स्थापित किए गए। भरतपुर रियासत में महाराजा ब्रजेन्द्र सवाई वीरेन्द्र सिंह बहादुर जंग (ई.1929-47) की प्रेरणा से मूर्तिशिल्प, स्थापत्य, शिलालेख एवं अन्य पुरा सामग्री का संकलन कर इसे स्थानीय पुस्तकालय परिसर में प्रदर्शित किया गया। संग्रहालय के संस्थापक क्यूरेटर रावत चतुर्भुजदास चतुर्वेदी के अथक प्रयासों से इस संग्रहालय में पुरासम्पदा की अभिवृद्धि की गई। आगे चलकर इसे दुर्ग में स्थित वर्तमान भवन में स्थानान्तरित किया गया तथा ई.1944 में जनता के लिए खोला गया। ई.1951 में इसमें सिलहखाना और कमराखास भी जोड़ दिया गया। संग्रहालय को समृद्ध करने में भरतपुर के तत्कालीन शासकों तथा मेजर हार्वे का उल्लेेखनीय योगदान रहा।

    ई.1944 में कोटा और ई.1949 में आमेर संग्रहालय की स्थापना के साथ संग्रहालयों की संख्या बढ़ कर दस हो गई। राजस्थान निर्माण के बाद ई.1950 में पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग की स्थापना हुई और विभाग ने संग्रहालयों के विस्तार की दिशा में उल्लेेखनीय कदम उठाए। इसके परिणाम स्वरूप ई.1957 में श्री बांगड़ राजकीय संग्रहालय पाली, ई.1959 में डूंगरपुर और ई.1961 में आहाड़ संग्रहालयों की स्थापना संभव हो सकी। संग्रहालयों के पुनर्गठन एवं विकास की प्रक्रिया सतत रूप से चलती रही और ई.1965 में माउण्ट आबू संग्रहालय तथा ई.1968 में मण्डोर संग्रहालय स्थापित किए गए।

    ई.1954 में बिड़ला तकनीकी म्यूजियम की, ई.1959 में जयपुर में सिटी पैलस संग्रहालय की तथा ई.1960 में श्रीरामचरण प्राच्य विद्यापीठ एवं संग्रहालय जयपुर की स्थापना हुई। ई.1964 में लोक संस्कृति शोध संस्थान नगरश्री, चूरू की स्थापना हुई।

    चित्तौड़गढ़ क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत और पुरासामग्री के प्रदर्शन के लिए ई.1969 में चित्तौड़गढ़ संग्रहालय की स्थापना हुई। ई.1977 में आधुनिक कला प्रवृत्तियों को प्रदर्शित करने वाली राज्य की पहली कला दीर्घा स्थापित हुई जिसे आगे चलकर राजस्थान ललित कला अकादमी को सौंप दिया गया। विभाग द्वारा पुरान्वेषण, पुरा सामग्री के संकलन-संग्रहण एवं संरक्षण का कार्य निरन्तर जारी रहा और ई.1983 में हवामहल संग्रहालय तथा ई.1984 में जैसलमेर संग्रहालय की स्थापना की गई। ई.1985-86 में गंगानगर जिले में कालीबंगा के उत्खनन से प्राप्त सामग्री के लिए सभ्यता स्थल पर ही संग्रहालय का निर्माण किया गया। अब यह हनुमानगढ़ जिले में स्थित है।

    30 दिसम्बर 1983 को माणिक्यलाल वर्मा जनजाति शोध संस्थान द्वारा उदयपुर में जनजाति संग्रहालय का निर्माण किया गया। इसका उद्देश्य जनजातियों की सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था को प्रदर्शित करना था।

    संग्रहालयों के विस्तार की
    शृंखला में ई.1987 में विराट नगर संग्रहालय तथा ई.1991 में पाली संग्रहालय की स्थापना हुई। आमेर की सांस्कृतिक धरोहर के वैभव को प्रदर्शित करने के लिए ई.1992 में आमेर में कला दीर्घा स्थापित की गई। संग्रहालयों के विस्तार की यह धारा आज भी सतत रूप से प्रवाहमान है। राजस्थान के आधुनिक संग्रहालयों की यात्रा में सिटी पैलेस म्यूजियम उदयपुर, आहड़ संग्रहालय उदयपुर, राव माधोसिंह ट्रस्ट संग्रहालय कोटा, लोक कला संग्रहालय उदयपुर, मीरा संग्रहालय मेड़ता, हल्दीघाटी संग्रहालय राजसमंद आदि सम्मिलित हैं।


    राजस्थान में संग्रहालयों की समस्या

    राजस्थान, भारत का सबसे बड़ा प्रांत है। इसका 61.11 प्रतिशत भाग मरुस्थल है। इतने बड़े प्रदेश में पुरातात्विक सामग्री, प्राचीन भवन, दुर्ग, महल, देवालय, स्मारक, सरोवर, बावड़ियां, मूर्तियां, शिलालेख, प्राचीन ग्रंथ, शासकीय अभिलेख, सिक्के, ताड़पत्र, ताम्रपत्र आदि का विशाल भण्डार भरा पड़ा है। संग्रहालयोपयोगी सम्पूर्ण सामग्री को राज्य के विभिन्न संग्रहालयों में संजोने के लिए आवश्यक निपुण व्यक्तियों, धन, सुविधाओं तथा भवनों का अभाव है। इस कारण राजस्थान में प्राचीन ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर को संजोकर रख पाना बहुत बड़ी समस्या है। राजस्थान सरकार ने राज्य में 18 राजकीय संग्रहालयों की स्थापना की है। इन संग्रहालयों में कर्मचारियों का अभाव है। राज्य में झालावाड़ राजकीय संग्रहालय जैसे कई संग्रहालय हैं जो केवल चपरासियों और लिपिकों के भरोसे छोड़ दिए गए हैं।

    बहुत से संग्रहालयों को भारत सरकार से सामग्री प्राप्त होती है किंतु वह स्थान, साधन एवं दृष्टि के अभाव में संग्रहालयों के अंधेरे बंद कमरों में पड़ी हुई है, दर्शक वहाँ तक चाह कर भी नहीं पहुंच सकते।

    वसुंधरा राजे सरकार (ई.2013-18) द्वारा राज्य के संग्रहालयों की बुरी तरह से उपेक्षा किए जाने से यह समस्या और भी गंभीर हो गई है।

    राज्य सरकार द्वारा बीकानेर में राजस्थान राज्य अभिलेखागार तथा जोधपुर में प्राच्य विद्या संस्थान की स्थापना की गयी है। जयपुर, बीकानेर, चित्तौड़, जयपुर, अलवर, कोटा तथा उदयपुर में प्राच्य विद्या संस्थान की शाखाएं स्थापित की गयी हैं। राजस्थान में मौजूद पुराने दुर्गों एवं ऐतिहासिक भवनों का संरक्षण करने के लिए भी पर्याप्त संसाधन नहीं हैं जिसके कारण कई दुर्ग, हवेलियाँ, मंदिर एवं महल उपेक्षित पड़े हैं। कुछ वर्ष पूर्व शेखावाटी की कलात्मक हवेलियों में भित्ति चित्रों की दुर्दशा देखकर एक विदेशी महिला नदीन ला प्रैन्स ने एक हवेली खरीदकर उसका पुनरुद्धार करवाया और वहाँ एक सांस्कृतिक केन्द्र बनाया। इसमें भारत और फ्रान्स के चित्रकारों की एक प्रदर्शनी भी लगाई गई। इससे शेखावाटी क्षेत्र की कला को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली। संस्कृृति प्रेमियों, पर्यटन संस्थाओं तथा स्वयं सेवी संगठनों को इस दिशा में और भी प्रयास करने होंगे।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-41

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-41

    पर्यावरण को स्वर देते लोक गीत


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    राजस्थान की लोक संस्कृति, सुरीली स्वर लहरियों में ढलकर, लोक गीतों में समाई हुई है। लोक गीतों की यह धारा दो रूपों में प्रवाहित हुई है। एक तो जन साधारण द्वारा सामाजिक उत्सवों, जन्म, विवाह, स्वागत, विदाई, संस्कार, तीज, गणगौर, होली आदि के अवसर पर गाये जाने वाले गीत और दूसरा राजाओं एवं सामंतों की प्रशस्ति में तथा उनके आमोद-प्रमोद के लिये गाया जाने वाले गीत। पारिवारिक उत्सवों तथा सामाजिक पर्वों पर गाये जाने वाले लोक गीतों के भाव बहुत सुकोमल एवं मन को छूने वाले हैं। इन गीतों में पर्यावरण संरक्षण के संदेश निहित हैं। ईंडोणी, कांगसियो, गोरबंद, पणिहारी, लूर, ओलूं, हिचकी, सुपणा, मूमल, कुरजां, काजलिया, कागा, जीरा, पोदीना, चिरमी तथा लांगुरिया आदि लोकगीत गाँव-गाँव में चाव से गाये जाते हैं।

    सामंती परिवेश में प्रयुक्त लोक गीत वीररस एवं शृंगार रस से परिपूर्ण हैं। अधिकांश लोक गीतों में प्रकृति एवं पर्यावरण से बिम्ब तथा उपमाएं ग्रहण की गई हैं। लोक भजनों में देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त करने, उन्हें प्रसन्न करने तथा उनसे मन वांछित फल प्राप्त करने के उद्देश्य से राजस्थान में रात्रि जागरण की प्रथा बड़ी पुरानी है जिसे रतजगा कहा जाता है। विनायक, महादेव, विष्णु, राम, कृष्ण, बालाजी (हनुमान), भैंरू, जुंझार, पाबू, तेजा, गोगा, रामदेव, देवजी, रणक दे, सती माता, दियाड़ी माता, सीतला माता, भोमियाजी आदि के भजन इन रात्रि जागरणों में गाये जाते हैं। मीरां, कबीर, दादू, रैदास, चंद्रस्वामी तथा बख्तावरजी के पद भी बड़ी संख्या में गाये जाते हैं।

    रात्रि जागरण में गाये जाने वाले देवी के गीत चिरजा कहलाते हैं। लोकगीतों की इतनी सुदीर्घ परम्परा का मूल कारण राजस्थान में निवास करने वाली वे अनेक जातियाँ हैं जो केवल गा-बजाकर अपना गुजारा करती हैं। इनके गीत परिष्कृत, भावपूर्ण तथा विविधता लिये हुए होते हैं। शास्त्रीय संगीत की भांति इनमें स्थायी तथा अंतरे का स्वरूप दिखाई देता है। खयाल तथा ठुमरी की भांति इन्हें छोटी-छोटी तानों, मुकरियों तथा विशेष आघात देकर सजाया जाता है। इन गीतों को मांड, देस, सोरठ, मारू, परज, कालिंगड़ा, जोगिया, आसावरी, बिलावल, पीलू खमाज आदि राग-रागिनियों में गाया जाता है।

    जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, जोधपुर आदि मरुस्थलीय क्षेत्रों में कुरजां, पीपली, रतन राणो, मूमल, घूघरी, केवड़ा आदि लोक गीत गाये जाते हैं। जयपुर, कोटा, अलवर, भरतपुर, करौली तथा धौलपुर आदि मैदानी भागों में स्वरों के उतार-चढ़ाव वाले गीत गाये जाते हैं। मंद से तार सप्तक तक गायन होता है। इन क्षेत्रों में सामूहिक रूप से गाये जाने वाले भक्ति और शृंगार रस से ओत-प्रोत गीत गाये जाते हैं। मांड तथा मारू रागों का संक्षिप्त परिचय प्राप्त करना आवश्यक है-

    मांड : राजस्थान की मांड गायिकी अत्यंत प्रसिद्ध है। थोड़े-बहुत अंतर के साथ क्षेत्र विशेष में इन्हें अलग तरह से गाया जाता है। उदयपुर की मांड, जोधपुर की मांड, जयपुर-बीकानेर की मांड, जैसलमेर की मांड, मांड गायिकी में अधिक प्रसिद्ध हैं। राग सोरठ, देस तथा मांड तीनों एक साथ गाई व सुनी जाती हैं।

    मारू : लोक गायकों द्वारा गाये जाने वाले वीर भाव जागृत करने वाले गीत सिंधु तथा मारू रागों पर आधारित होते थे जिन्हें सेनाओं के रण-प्रयाण के समय गाया जाता था। पश्चिमी राजस्थान में गाये जाने वाले लोकगीत ऊंचे स्वर व लम्बी धुन वाले होते हैं जिनमें स्वर विस्तार भी अधिक होता है।


    राजस्थान के प्रमुख लोकगीत

    ओल्यूँ : ओल्यूँ का अर्थ होता है- स्मरण। अतः ओल्यू किसी की स्मृति में गाई जाती है। बेटी की विदाई पर ओल्यूँ इस प्रकार गाई जाती है- कँवर बाई री ओल्यूँ आवै ओ राज।

    ईंडोणी : पानी भरने जाते समय स्त्रियां मटके को सिकर पर टिकाने के लिये मटके के नीचे ईंडोणी का प्रयोग करती हैं। इस अवसर को लक्ष्य करके यह गीत गाया जाता है-


    म्हारी सवा लाख री लूम गम गई ईंडोणी।

    पाड़ोसण बड़ी चकोर ले गई ईंडोणी।।

    कांगसियो : कंघे को कांगसिया कहा जाता है। यह शृंगार रस का प्रमुख गीत है- म्हारै छैल भँवर रो कांगसियो पणिहारियाँ ले गई रे।

    कागा : इस गीत में विरहणी नायिका द्वारा कौए को सम्बोधित करके अपने प्रियतम के आने का शगुन मनाया जाता है-


    उड़-उड़ रे म्हारा काळा रे कागला,

    जद म्हारा पिवजी घर आवै।

    काजलियो : यह शृंगार रस से ओत-प्रोत गीत है जो होली के अवसर पर चंग के साथ गाया जाता है। कामण : वर को जादू टोने से बचाने के लिये स्त्रियाँ कामण गाती हैं।

    कुरजां : प्रियतम को संदेश भिजवाने के लिये कुरजाँ पक्षी के माध्यम से यह गीत गाया जाता है- कुरजां ए म्हारौ भंवर मिलाद्यौ ए।

    केसरिया बालम : यह एक रजवाड़ी गीत है जिसमें विरहणी नारी अपने प्रियतम को घर आने का संदेश देती है- केसरिया बालम आवो नी, पधारौ म्हारे देस।

    गणगौर : पार्वती देवी को समर्पित त्यौहार गणगौर पर गणगौर के गीत गाये जाते हैं- खेलन द्यौ गणगौर, भँवर म्हानै खेलन द्यौ गणगौर।

    गोरबंद : गोरबंद ऊँट के गले का आभूषण होता है जिस पर शेखावाटी क्षेत्र में लोकगीत गाये जाते हैं- गायां चरावती गोरबंद गूंथियो, भैस्यां चरावती पोयो म्हारा राज, म्हारो गोरबंद लूम्बालो।

    घुड़ला : घुड़ला पर्व पर कन्याएं छेदों वाली मटकी में दिया रखकर घर-घर घूमती हुई गाती हैं- घुड़लो घूमेला जी घूमेला, घुड़ले रे बांध्यो सूत।

    घूमर : गणगौर आदि विशेष पर्वों पर घूमर नृत्य के साथ घूमर गाया जाता है- म्हारी घूमर छै नखराली ए माँ। घूमर रमवा म्हैं जास्यां।

    घोड़ी : बारात की निकासी पर घोड़ी गाई जाती है- घोड़ी म्हारी चन्द्रमुखी सी, इन्द्रलोक सूँ आई ओ राज।

    चिरमी : वधू अपने ससुराल में अपने भाई और पिता की प्रतीक्षा में चिरमी के पौधे को सम्बोधित करके गाती है- चिरमी रा डाळा चार वारी जाऊँ चिरमी ने।

    जच्चा : बालक के जन्मोत्सव पर जच्चा या होलर गाये जाते हैं।

    जलो और जलाल : वधू के घर की स्त्रियाँ बारात का डेरा देखने जाते समय जलो और जलाल गाती हैं- म्हैं तो थारा डेरा निरखण आई ओ, म्हारी जोड़ी रा जहाँ।

    जीरा : यह लोकगीत कृषक नारी द्वारा जीरे की खेती में आने वाली कठिनाई को व्यक्त करने के लिये गाया जाता है- ओ जीरो जीव रो बैरी रे, मत बाओ म्हारा परण्या जीरो।

    झोरावा : यह जैसलमेर क्षेत्र में गाया जाने वाला विरह गीत है जो पति के परदेश जाने पर उसके वियोग में गाया जाता है।

    ढोला मारू : सिरोही क्षेत्र में ढाढियों द्वारा गाया जाने वाला गीत जिसमें ढोला मारू की प्रेमकथा का वर्णन है।

    तेजा : जाट जाति के लोगों द्वारा कृषि कार्य आरंभ करते समय लोक देवता तेजाजी को सम्बोधित करके तेजा गाया जाता है।

    पंछीड़ा : हाड़ौती एवं ढूंढड़ी क्षेत्रों में मेले के अवसर पर अलगोजे, ढोलक एवं मंजीरे के साथ पंछीड़ा गाया जाता है।

    पणिहारी : पानी भरने वाली स्त्री को पणिहारी कहते हैं। इस गीत में स्त्रियों को पतिव्रत धर्म पर अटल रहने की प्रेरणा दी गई है। जीव जगत को पेयजल उपलब्ध कराने वाले मनुष्यों की भी प्रशंसा की गई है-


    कणीजी खुदाया कूआं बावड़ी ओ पणिहारी जी रे

    लो चालो साथीड़ा रे लार वालाजी।

    पपैयो : यह दाम्पत्य प्रेम के आदर्श को दर्शाने वाला गीत है जिसमें प्रेयसी अपने प्रियतम से उपवन में आकर मिलने का अनुरोध करती है।

    पावणा : जवांई के ससुराल आने पर स्त्रियाँ उसे भोजन करवाते समय पावणा गाती हैं।

    पीपली : मरुस्थलीय क्षेत्र में वर्षा ऋतु में पीपली गाया जाता है जिसमें विरहणी द्वारा प्रेमोद्गार व्यक्त किये जाते हैं।

    बधावा : शुभ कार्य सम्पन्न होने पर बधावा अर्थात् बधाई के गीत गाये जाते हैं।

    बना-बनी : लड़के के विवाह पर बना तथा लड़की के विवाह पर बनी गीत गाये जाते हैं।

    बीछूड़ो : यह हाड़ौती क्षेत्र का लोकप्रिय गीत है। एक पत्नी को बिच्छू ने डस लिया है और वह मरने से पहले अपने पति को दूसरा विवाह करने का संदेश देती है-


    मैं तो मरी होती राज,

    खा गयो बैरी बीछूड़ो।

    मूमल : जैसलमेर में गाया जाने वाला शंृगारिक गीत जिसमें मूमल के नख शिख का वर्णन किया गया है- म्हारी बरसाले री मूमल, हालौनी एै आलीजे रे देख।

    मोरिया : इस सरस लोकगीत में ऐसी नारी की व्यथा है जिसका सम्बन्ध तो हो चुका है किंतु विवाह होने में देर हो रही है। इसे रात्रि के अंतिम प्रहर में गाया जाता है।

    रसिया : ब्रज क्षेत्र में रसिया गाया जाता है।

    रातीजगा : विवाह, पुत्र जन्मोत्सव, मुण्डन आदि शुभ अवसरों पर रात भर जागकर भजन गाये जाते हैं जिन्हें रातीजगा कहा जाता है।

    लांगुरिया : करौली क्षेत्र में कैला देवी के मंदिर में हनुमानजी को सम्बोधित करके लांगुरिया गाये जाते हैं- इबके तो मैं बहुअल लायो, आगे नाती लाऊंगो, दे-दे लम्बो चौक लांगुरिया, बरस दिनां में आऊंगो। लांगुरिया को सम्बोधित करके कामुक अर्थों वाले गीत भी गाये जाते हैं-


    नैक औढ़ी ड्यौढ़ी रहियो,

    नशे में लांगुर आवैगो।

    लावणी : नायक द्वारा नायिका को बुलाने के लिये लावणी गाई जाती है- शृंगारिक लावणियों के साथ-साथ भक्ति सम्बन्धी लावणियां भी प्रसिद्ध हैं। मोरध्वज, सेऊसंमन, भरथरी आदि प्रमुख लावणियां हैं।

    सीठणे : विवाह समारोह में आनंद के अतिरेक में गाली गीत गाये जाते हैं जिन्हें सीठणे कहते हैं।

    सुपणा : विरहणी के स्वप्न से सम्बन्धित गीत सुपणा कहलाते हैं-


    सूती थी रंग महल में,

    सूताँ में आयो रे जंजाळ,

    सुपणा में म्हारा भँवर न मिलायो जी।

    सूंवटिया : यह विरह गीत है। भील स्त्रियाँ पति के वियोग में सूंवटिया गाती हैं।

    हरजस : भगवान राम और भगवान कृष्ण को सम्बोधित करके सगुण भक्ति लोकगीत गाये जाते हैं जिन्हें हरजस कहा जाता है।

    हिचकी : ऐसी मान्यता है कि प्रिय के द्वारा स्मरण किये जाने पर हिचकी आती है। अलवर क्षेत्र में हिचकी ऐसे गाई जाती है- म्हारा पियाजी बुलाई म्हानै आई हिचकी।

    हींडो : श्रावण माह में झूला झूलते समय हींडा गाया जाता है- सावणियै रौ हींडौ रे बाँधन जाय।

    इस प्रकार लोक गीतों में प्रकृति एवं पर्यावरण से सम्बन्धित विपुल विषय सम्मिलित किये गये हैं। क्षेत्र बदलने के साथ उनके गायन का तरीका भी बदल जाता है।

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  • अध्याय - 5 राज्य में सरकारी क्षेत्र के प्रमुख संग्रहालय एवं अभिलेखागार

     02.06.2020
    अध्याय - 5 राज्य में सरकारी क्षेत्र के प्रमुख संग्रहालय एवं अभिलेखागार

    अध्याय - 5 राज्य में सरकारी क्षेत्र के प्रमुख संग्रहालय एवं अभिलेखागार


    पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग द्वारा संचालित संग्रहालय


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    राजस्थान सरकार द्वारा राज्य में राजकीय संग्रहालयों की स्थापना, सरंक्षण एवं विस्तार के लिए अलग से पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग की स्थापना की गई है। इस विभाग द्वारा वर्तमान में निम्नलिखित संग्रहालय संचालित किए जा रहे हैं-

    राज्य स्तरीय संग्रहालय

    1. राजकीय केन्द्रीय संग्रहालय, अलबर्ट हॉल, (अल्बर्ट म्यूजियम), जयपुर

    संभाग स्तरीय संग्रहालय

    1. राजकीय संग्रहालय, उदयपुर,

    2. राजकीय संग्रहालय, जोधपुर,

    3. राजकीय संग्रहालय, बीकानेर,

    4. राजकीय संग्रहालय, कोटा,

    5. राजकीय संग्रहालय, अजमेर,

    6. राजकीय संग्रहालय, हवामहल, जयपुर,

    7. राजकीय संग्रहालय, भरतपुर

    जिला स्तरीय संग्रहालय


    1. राजकीय संग्रहालय, अलवर

    2. राजकीय संग्रहालय, डूंगरपुर

    3. राजकीय संग्रहालय, चित्तौड़गढ़

    4. राजकीय संग्रहालय, जैसलमेर

    5. राजकीय संग्रहालय, पाली

    6. राजकीय संग्रहालय, झालावाड़

    7. राजकीय संग्रहालय, सीकर

    स्थानीय संग्रहालय

    1. राजकीय संग्रहालय, आहाड़, उदयपुर

    2. राजकीय संग्रहालय, मण्डोर, जोधपुर

    3. राजकीय संग्रहालय, माउंट आबू, सिरोही

    संग्रहालय जो आरम्भ किए जाने हैं

    1. राजकीय संग्रहालय, केसरीसिंह बारहठ की हवेली, शाहपुरा, भीलवाड़ा।

    2. टाउन हॉल पुराना विधानसभा भवन, जयपुर।

    3. राजकीय संग्रहालय, बारां।


    राज्य की आर्ट गैलेरी

    1. आर्ट गैलेरी, विराट नगर, जयपुर

    2. प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान जोधपुर की आर्ट गैलेरी


    राजस्थान राज्य अभिलेखागार

    राजस्थान राज्य अभिलेखागार का मुख्यालय बीकानेर में स्थापित किया गया है तथा इसकी शाखाएं जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, कोटा, अजमेर, अलवर एवं भरतपुर में हैं।


    प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान

    राज्य सरकार द्वारा प्राच्य विद्या प्रतिष्ठानों की स्थापना की गई है जिनमें प्राचीन दुर्लभ हस्तलिखित ग्रंथों, चित्रग्रंथों, बहियों आदि का संग्रहण किया गया है। जोधपुर में इसका मुख्यालय है तथा बीकानेर, कोटा, अलवर, उदयपुर, चित्तौड़ में उपशाखाएं कार्यरत हैं।


    अरबी-फारसी शोध संस्थान टोंक

    टोंक में अरबी और फारसी ग्रंथों के संरक्षण के लिए कार्यालय स्थापित हुआ जो अब स्वतंत्र संस्थान के रूप में कार्यरत है तथा मौलाना अबुल कलाम आजाद अरबी फारसी शोध संस्थान के नाम से जाना जाता है।


    विज्ञान केन्द्र एवं संग्रहालय

    विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने राज्य में जयपुर में क्षेत्रीय विज्ञान केन्द्र एवं विज्ञान पार्क स्थापित किया है। साथ ही जोधपुर, नवलगढ़, कोटा, उदयपुर में उपक्षेत्रीय विज्ञान केन्द्र स्थापित किए हैं। झालावाड़ के निकट झालरापाटन में विज्ञान पार्क स्थापित किया गया है। इनमें आम जन को विज्ञान के सिद्धांतों का प्रदर्शन करने के लिए स्वचालित मॉडल प्रदर्शित किये गए हैं।

    प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय

    1. प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय, जयपुर।

    2. प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय, सवाईमाधोपुर।

    प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय, रामसिंहपुरा

    देश का पांचवां राजीव गांधी क्षेत्रीय प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय सवाईमाधोपुर जिले के रामसिंहपुरा गांव में आरम्भ किया गया है। 1 मार्च 2014 को इसे पर्यटकों के लिए खोल दिया गया। इस संग्रहालय में पर्यावरण, वन्यजीव, ज्ञान, विज्ञान, कला एवं संस्कृति आदि से जुड़ी चीजों की पांच गैलेरी, एक लाइब्रेरी, ऑडिटोरियम, छात्रावास आदि बनाये गए हैं।

    बायोलॉजिकल पार्क जयपुर, जोधपुर एवं उदयपुर में बायोलॉजिकल पार्क स्थापित किये गए हैं। बीकानेर जिले में बीछवाल में बायोलॉजिकल पार्क स्थापित किया जा रहा है। यहाँ भी जन्तुओं के सम्बन्ध में जानकारियां पर्यटकों को दी जा रही हैं।


    नेचर पार्क

    वर्ष 2014-15 में चूरू में नेचर पार्क स्थापित किया गया है।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-42

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-42

    पर्यावरण में संगीत घोलते लोकवाद्य


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राजस्थान के लोक कलाकारों ने सदियों से जिस संगीत की साधना की है, उसकी सफलता में लोकवाद्यों का महत्त्वपूर्ण योगदान है। ये लोकवाद्य स्थानीय सामग्री से बनाये जाते हैं। इनमें विभिन्न प्रकार के वृक्षों से प्राप्त होने वाली लकड़ी, तूंबा, नारियल, विभिन्न पशुओं के मृत शरीरों से प्राप्त होने वाली त्वचा, बाल एवं तांत आदि का बड़े स्तर पर उपयोग होता है। राजस्थान के तत् वाद्यों में सारंगी, जंतर, रावण हत्था, रवाज, तंदूरा, इकतारा, अपंग, कमायचा, आदि प्रमुख हैं। सुषिर वाद्यों में बांसुरी, अलगोजा, पुंगी, शहनाई सतारा, मशक, मोरचंग, अनव) वाद्यों में मृदंग, ढोलक, नगाड़ा, नौबत, मादल, चंग, खंजरी तथा घन वाद्यों में मंजीरा, झांझ, थाली और खड़ताल प्रमुख हैं। कुछ प्रमुख लोकवाद्यों का परिचय इस प्रकार से है-

    अलगोजा : यह सुषिर अर्थात् फूंक वाद्य है तथा बांसुरी की तरह होता है। इसमें बांस की दो नलियां होती हैं। नली में 4 से 7 छेद किये जाते हैं। वादक दोनों नलियों को एक साथ मुँह में रखकर बजाता है। एक नली पर स्वर कायम किया जाता है तथा दूसरी नली पर स्वर बजाये जाते हैं। इसे भील एवं कालबेलिया जनजातियों द्वारा बजाया जाता है।

    इकतारा : गोल तूंबे में एक बांस फंसा देते हैं। तूंबे का ऊपरी हिस्सा काटकर उस पर चमड़ा मंढ़ देते हैं। बांस में छेद करके उसमें खूंटी लगाते हैं तथा एक तार कस दिया जाता है।

    कमायचा : यह दो-ढाई फुट लम्बा ईरानी वाद्ययंत्र है जो सारंगी की तरह दिखता है तथा गज की सहायता से बजता है। यह रोहिड़ा या आक की लकड़ी से बनता है जिसके तार बकरी की आंतों को सुखा कर बनाये जाते हैं तथा घोड़े के बालों का भी इस हेतु उपयोग किया जाता है। इस वाद्ययंत्र में दो मोर तथा नौ मोरनियां होती हैं तथा एक तार से लेकर चार तारों तक का उपयोग किया जाता है। इसकी तबली थोड़ी मोटी होती है तथा चमड़े से ढंकी हुई होती है। बाड़मेर तथा जैसलमेर जिलों में इसका प्रयोग बहुतायत से होता है।

    खंजरी : यह ढप का लघु रूप है। ढप की तरह इस पर भी चमड़ा मंढ़ा होता है। इसे कामड़, भील, कालबेलिया आदि बजाते हैं।

    खड़ताल : लकड़ी की चार पट्टिकाओं को खड़ताल कहते हैं। भजनों में बजाया जाने वाले करताल का यह देशज रूप है। इसे दोनों हाथों की अंगुलियों में दो-दो पट्टिकाओं को रखकर बजाया जाता है।

    चंग : यह ताल वाद्य लकड़ी के गोल घेरे से बना होता है। एक तरफ बकरे की खाल मंढ़ी जाती है। यह दोनों हाथों से बजता है। इसे ढप भी कहते हैं। इसे होली पर बजाते हैं।

    डैंरू : यह डमरू का बड़ा रूप है। यह आम की लकड़ी का बनता है। दोनों तरफ बारीक चमड़ा मंढ़ कर रस्सियों से कसते हैं। एक हाथ से डोरियों पर दबाव डालकर कसा और ढीला छोड़ा जाता है तथा दूसरे हाथ से लकड़ी की पतली डंडी के आघात से बजाया जाता है।

    ढोल : लोकवाद्यों में ढोल का प्रमुख स्थान है। यह लोहे अथवा लकड़ी के गोल घेरे पर दोनों तरफ चमड़ा मंढ़ कर बनाया जाता है। इस पर लगी रस्सियों को कड़ियों के सहारे खींचकर इसे कसा जाता है। वादक इसे गले में डालकर लकड़ी के डंडे से बजाता है।

    ढोलक : यह एक साधारण वाद्य है। यह ढोल की तरह ही छोटे आकार की होती है। इसके दोनों तरफ चमड़ा मंढ़ा होता है। इस पर लगी डोरियों को कड़ियों से खींचकर कसा जाता है। यह दोनों हाथों से बजाई जाती है तथा एक प्रमुख ताल वाद्य है।

    जंतर : यह वाद्य वीणा की तरह होता है। वादक इसको गले में डालकर खड़ा-खड़ा ही बजाता है। वीणा की तरह इसमें दो तूंबे होते हैं। इनके बीच बांस की लम्बी नली लगी होती है। इसमें कुल चार तार होते हैं। यह वाद्य गूजर भोपों में प्रचलित है।

    तंदूरा : यह तानपूरे से मिलता-जुलता है। इसमें चार तार होते हैं, इसलिये इसे चौतारा भी कहते हैं। यह लकड़ी का बना होता है। कामड़ जाति के लोग तंदूरा ही बजाते हैं।

    ताशा : तांबे की चपटी परात पर बकरे का पतला चमड़ा मंढ़ा जाता है। इसे बांस की खपच्च्यिों से बजाया जाता है। इस वाद्य को मुसलमान अधिक बजाते हैं।

    धौंसा : यह भी नगाड़े की तरह ही होता है। इसे घोड़े पर दोनों तरफ रखकर लकड़ी के डंडों से बजाया जाता है।

    नड़ : यह भी सुषिर वाद्ययंत्र है। ढाई फीट लम्बे इस वाद्ययंत्र को कंगोर या कैर की लकड़ी से बनाया जाता है। बांसुरीनुमा नड़ में 4 से 6 छेद होते हैं। ये नीचे की ओर होते हैं।

    नगाड़ा : यह दो प्रकार का होता है, एक छोटा तथा दूसरा बड़ा। छोटे नगाड़े के साथ एक नगाड़ी भी होती है। इसे लोकनाट्यों में शहनाई के साथ बजाया जाता है। लोकनृत्यों में नगाड़े की संगत के बिना रंगत नहीं आती। बड़ा नगाड़ा नौबत की तरह का होता है। इसे बम या टामक भी कहते हैं। यह युद्ध के समय बजाया जाता था। नगाड़ा लकड़ी के डंडों से ही बजाया जाता है।

    नौबत : धातु की लगभग चार फुट गहरी अर्ध अंडाकार कुंडी को भैंसे की खाल से मंढ़ कर चमड़े की डोरियों से कसा जाता है। इसे लकड़ी के डंडों से बजाया जाता है। इसे प्रायः मंदिरों में या राजा महाराजा के महलों के मुख्य द्वार पर बजाया जाता था।

    पुंगी : यह वाद्य एक विशेष प्रकार के तूंबे से बनता है। तूंबे का ऊपरी हिस्सा लंबा और पतला तथा नीचे का हिस्सा गोल होता है। तूंबे के निचले हिस्से में छेद करके दो नलियां लगायी जाती हैं। नालियों में स्वरों के छेद होते हैं। अलगोजे के समान ही एक नली में स्वर कायम किया जाता है और दूसरी से स्वर निकाले जाते हैं। यह कालबेलियों का प्रमुख वाद्य है।

    बांकिया : पीतल का बना यह वाद्य ढोल के साथ मांगलिक अवसरों पर बजाया जाता है। आकृति में यह बड़े बिगुल की तरह होता है।

    भपंग : यह वाद्य कटे हुए तंूबे से बनता है जिसके एक सिरे पर चमड़ा मंढ़ते हैं। चमड़े में एक छेद करके उसमें जानवर की आंत का तार डालकर उसके सिर पर लकड़ी का टुकड़ा बांधते हैं। इसे कांख में दबाकर एक हाथ से तांत को खींचकर या ढीला छोड़कर उस पर दूसरे हाथ से लकड़ी के टुकड़े से प्रहार करते हैं। अलवर क्षेत्र में यह वाद्य काफी प्रचलित है।

    भूंगल : यह भवाई जाति के लोगों का वाद्य है। पीतल का बना यह वाद्य तीन हाथ लंबा तथा बांकिया जैसा होता है। इसे भेरी भी कहते हैं। इसे रणक्षेत्र में भी बजाया जाता है।

    मशक : चमड़े की सिलाई करके बनाये गये इस वाद्य के एक सिरे पर लगी नली से मुँह से हवा भरी जाती है तथा दूसरे सिरे पर लगी अलगोजे नुमा नली से स्वर निकाले जाते हैं। इसके स्वर पुंगी की तरह सुनाई देते हैं। भैंरूजी के भोपों का यह प्रमुख वाद्य है।'

    मांदल : मिट्टी से बनी मांदल की शक्ल मृदंग जैसी होती है। इस पर हिरण या बकरे की खाल मंढ़ी होती है। यह आदिवासी भीलों और गरासियों का प्रमुख वाद्य है।

    मोरचंग : मोरचंग मोर की आकृति का होता है तथा लोहे या पीतल से बनता है। इसके मध्य पतला और मजबूत तार होता है। एक सिरा मुंह में रखा जाता है जिसे श्वास की हवा से हवाई स्वर कण्ठ का उपयोग करते हुए दिया जाता है। दूसरे सिरे पर अंगुली से आघात किया जाता है। ग्वारिया जाति के लोग इसे भेड़, बकरी एवं गाय चराते समय बजाते हैं।

    रावण हत्था : रावण हत्था भोपों का मुख्य वाद्य है। बनावट में यह बहुत सरल किंतु स्वर में सुरीला होता है। इसे बनाने के लिये नारियल की कटोरी पर खाल मंढ़ी जाती है जो बांस के साथ लगी होती है। बांस में जगह-जगह खूंटियां लगा दी जाती हैं जिनमें तार बंधे होते हैं। यह वायलिन की तरह गज से बजाया जाता है। एक सिरे पर कुछ घुंघरू बंधे होते हैं। इसे पाबूजी के भोपे तथा डूंगजी जवारजी के भोपे कथा बांचते समय बजाते हैं।

    शहनाई : यह एक मांगलिक वाद्य है। चिलम की आकृति का यह वाद्य शीशम या सागवान की लकड़ी से बनाया जाता है। वाद्य के ऊपरी सिरे पर ताड़ के पत्ते की तूंती बनाकर लगाई जाती है। फूंक देने पर इसमें मधुर स्वर निकलता है।

    सारंगी : राजस्थान में सारंगी के विविध रूप दिखाई देते हैं। लोक कलाकार सारंगी को संगत वाद्य के रूप में बजाते हैं। यह लंगा समुदाय की विशेष पहचान है। उनके अतिरिक्त मिरासी, जोगी, मांगणियार आदि कलाकार भी सारंगी के साथ ही गाते हैं। सारंगी सागवान, कैर तथा रोहिड़ा की लकड़ी से बनती है। सारंगी के तार बकरे की आंत के बनते हैं और गज में घोड़े की पूंछ के बाल बंधे होते हैं।

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  • अध्याय - 6 राजकीय संग्रहालय, अजमेर

     02.06.2020
    अध्याय - 6 राजकीय संग्रहालय, अजमेर

    अध्याय - 6 राजकीय संग्रहालय, अजमेर


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    राजकीय संग्रहालय अजमेर की स्थापना 
    राजपूताना म्यूजियम के नाम से 19 अक्टूबर 1908 को अजमेर नगर के मध्य ‘मैगजीन’ के नाम से विख्यात प्राचीन दुर्ग में की गई जिसे मुगल काल में अकबर का किला कहा जाता था। यह एक प्राचीन दुर्ग था जिसका अकबर के काल में जीर्णोद्धार एवं विस्तार किया गया। इसी दुर्ग में इंग्लैण्ड के राजा जेम्स (प्रथम) का राजदूत ‘सर टामस रो’ जहांगीर के समक्ष उपस्थित हुआ था तथा उसने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लिए भारत में व्यापार करने की अनुमति प्राप्त की थी। ब्रिटिश काल में इस दुर्ग में अंग्रेजों का शस्त्रागार स्थापित किया गया था, इसलिए इसे मैगजीन कहा जाने लगा। ई.1857 की सैनिक क्रांति के समय अंग्रेज अधिकारियों एवं उनके परिवारों को इसी दुर्ग में शरण दी गई थी।

    ई.1902 में भारत का वायसराय एवं गवर्नर जनरल लार्ड कर्जन अजमेर आया। उसने राजपूताना की विभिन्न रियासतों में प्राचीन स्मारकों तथा विभिन्न स्थलों पर बिखरी हुई कलात्मक पुरावस्तुओं को देखा। कर्जन ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक सर जॉन मार्शल को निर्देश दिए कि वे इस प्रभूत सामग्री को संरक्षित करने के लिए एक संग्रहालय की स्थापना करें। ब्रिटिश पुरातत्वविद् अलैक्जेण्डर कनिंघम, आर्चिबाल्ड कार्लेयल, डी. आर. भण्डारकर, आर. डी. बनर्जी, गौरीशंकर हीराचंद ओझा, यू. सी. भट्टाचार्य आदि पुरातत्वविदों एवं इतिहासविदों ने इस संग्रहालय के लिए पुरातत्व सामग्री, प्राचीन प्रतिमाओं, शिलालेखों, सिक्कों, ताम्रपत्रों, पुस्तकों, चित्रों आदि को एकत्रित करने में विशिष्ट योगदान दिया। ब्रिटिश सरकार द्वारा किए जा रहे इस कार्य में सहयोग देने के लिए देशी रियासतों के अनेक राजा भी आगे आए। फलस्वरूप अजमेर संग्रहालय प्राचीन इतिहास, कला एवं संस्कृति का महत्वपूर्ण संग्रहालय बन गया। ई.1908 में गवर्नर जनरल के एजेन्ट सर इलियट ग्राहम कोल्विन ने संग्रहालय का उद्घाटन किया। इसे अजमेर संग्रहालय एवं राजपूताना संग्रहालय कहा जाता था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इसे राजकीय संग्रहालय कहा जाने लगा।

    इस संग्रहालय में प्राचीन प्रतिमाएं, मृण्मय प्रतिमाएं (टेराकोटा), शिलालेख, सिक्के, ताम्रपत्र, लघुरंग चित्र, उत्खनन से प्राप्त सामग्री राजपूत कालीन वेश-भूषाएं, धातु प्रतिमाएं तथा विभिन्न कलाओं से सम्बन्धित सामग्री संगृहीत की गई। इन पुरावस्तुओं एवं कला सामग्री को विभिन्न दीर्घाओं में बनी पीठिकाओं तथा शो-केस में प्रदर्शित किया गया है। वर्तमान में इस संग्रहालय में 652 प्रस्तर प्रतिमाएँ, 84 शिलालेख, 3,986 सिक्के, 18 धातु सामग्री, 149 लघुचित्र, 75 अस्त्र-शस्त्र, 363 टैराकोटा सामग्री, 128 स्थानीय हस्तकला सामग्री एवं पूर्वैतिहासिक काल की सामग्री संगृहीत है।

    उत्खनन से प्राप्त सामग्री

    संग्रहालय के पुरातत्व विभाग में सिन्धु नदी घाटी सभ्यता के प्रमुख स्थल मोहेनजोदड़ो (अब पाकिस्तान में) से उत्खनन में प्राप्त की गई मिट्टी की चूड़ियां, बरछी, तीर-शीर्ष, अनाज के दाने, चाकू के रूप में प्रयोग होने वाले फ्लिट-फ्लेक, शंख, हथियारों में धार करने के पत्थर, मातृदेवी की प्रतिमाएं, खिलौने, विभिन्न प्रकार की ईंटें, कलश, ढक्कन, खिलौना-गाड़ी के पहिये आदि मुख्य हैं। इसके अतिरिक्त उन मुहरों के नमूने भी रखे गए हैं जो सिन्धु नदी घाटी में पाई गई थीं। जिन वास्तविक वस्तुओं के ये नमूने हैं वे ईसा से 3000 वर्ष पूर्व की हैं। कुछ नमूनों में पशुओं के चित्रों के ऊपर चित्रलिपि की एक पंक्ति भी उत्कीर्ण है।

    प्रतिमा दीर्घा

    संग्रहालय की प्रतिमा दीर्घा में अनेक प्राचीन प्रतिमाओं को प्रदर्शित किया गया है जो अजमेर के अढ़ाई दिन का झोंपड़ा (12वीं शताब्दी ईस्वी की चौहान कालीन संस्कृत पाठशाला एवं मंदिर), पुष्कर, पीसांगन, हर्षनाथ, अर्थूणा, ओसियां, मंडोर, चन्द्रावती, कामां, बयाना आदि स्थानों से प्राप्त की गई हैं। इन प्रतिमाओं में सौन्दर्यभाव की अभिव्यक्ति देखते ही बनती है। इन प्रतिमाओं में भद्रता, सरलता, आध्यात्मिकता तथा जनजीवन का अद्भुत दर्शन देखने को मिलता है। इस संग्रह में गुप्तकाल से लेकर 16वीं शती तक की प्रतिमाएं भी प्रदर्शित हैं। इनमें चतुर्मुखी शिवलिंग, शिव-पार्वती तथा शिव-पार्वती विवाह से सम्बन्धित प्रतिमाएं उल्लेखनीय हैं। दर्शक गुप्त कालीन प्रतिमाओं को थोड़े से ही प्रयास से उनकी मांसलता के आधार पर पहचान सकता है।

    चौहानों के शासन काल में नागौर से लेकर सांभर, सीकर एवं अजमेर आदि स्थानों पर स्थापत्य एवं शिल्पकला के क्षेत्र में चहुंमुखी प्रगति हुई। छठी से 12वीं शताब्दी की अवधि में इस क्षेत्र की कला, समृद्धि के शिखर पर पहुँच गई। अजमेर संग्रहालय की प्रतिमा दीर्घा में मुख्यतः चौहान काल में 10वीं से 12वीं शती के मध्य बने शिल्प एवं स्थापत्य कला के नमूने प्रदर्शित किए गए हैं। मुख्य प्रतिमाओं में लिंगोद्भव महेश्वर, नक्षत्र, वराह स्वामी, लक्ष्मीनारायण, कुबेर तथा सूर्य प्रतिमा चित्ताकर्षक हैं जो पुष्कर, अढा़ई दिन का झोंपड़ा, बघेरा, हर्षनाथ (सीकर) आदि स्थलों से प्राप्त की गई हैं। लिंगोद्भव महेश्वर की सीकर से प्राप्त प्रतिमा लंदन एवं रूस में आयोजित कला प्रदर्शनियों में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी है। कटारा से प्राप्त ब्रह्मा-विष्णु-महेश, अर्थूणा के इन्द्र एवं कुबेर, कुसुमा से प्राप्त शिव-पार्वती, आउवा से प्राप्त बलदेव-रेवती एवं विष्णु की चित्ताकर्षक प्रतिमाएं, इस संग्रहालय की उल्लेखनीय प्रतिमाएँ हैं।

    जैन मूर्ति-दीर्घा में लगभग तीन दर्जन प्रतिमाएं प्रदर्शित हैं जो राजस्थान में जैन धर्म के प्रभाव की गाथा कहती हैं। इन प्रतिमाओं को अजमेर, पुष्कर, किशनगढ़, बघेरा, टांटोटी, लाडनूं, तलवाड़ा, अर्थूणा, कटारा, झालरापाटन, बड़ौदा (डूंगरपुर) एवं बदनोर (उदयपुर) आदि स्थानों से प्राप्त किया गया। ये स्थान जैन धर्म के केन्द्र स्थल रहे हैं तथा अधिकतर प्रतिमाएं 10वीं से 17वीं शती का प्रतिनिधित्व करती हैं। बघेरा से प्राप्त कुंथुनाथ, पार्श्वनाथ तथा आदिनाथ, टांटोटी से प्राप्त शांतिनाथ, किशनगढ़ से प्राप्त सुपार्श्वनाथ, अजमेर से प्राप्त शंातिनाथ, चन्द्रप्रभु एवं जैन प्रतिमा का छत्र, पुष्कर से प्राप्त जैन प्रतिमा का छत्र, कटारा से प्राप्त आदिनाथ, महावीर स्वामी तथा पार्श्वनाथ, अर्थूणा से प्राप्त जैन सरस्वती, बड़ौदा से प्राप्त आदिनाथ एवं वासुपूज्य, लाडनूं से प्राप्त कुंथुनाथ एवं हाथनों (जोधपुर) से प्राप्त गौमुखी-यक्ष इस संग्रहालय की विशिष्ट जैन प्रतिमाएँ हैं।

    शिलालेख

    अजमेर संग्रहालय में दूसरी शताब्दी ईस्वी-पूर्व से लेकर मध्य युग तक के प्राचीन महत्वपूर्ण शिलालेख विद्यमान हैं। इसके साथ ही अभिलेखयुक्त प्रतिमाएं, स्मृतिफलक शिलालेख तथा ताम्रपत्रों का भी अच्छा संग्रह है। ये शिलालेख ब्राह्मी, कुटिल एवं देवनागरी आदि लिपियों तथा संस्कृत, हिन्दी, डिंगल एवं फारसी आदि भाषाओं में उत्कीर्ण हैं। बरली का शिलालेख राजस्थान का प्राचीनतम शिलालेख कहलाता है। इस शिलालेख को अजमेर से 36 किलोमीटर दूर बरली के निकट भिलोत माता मंदिर से प्राप्त किया गया। यह दूसरी शताब्दी ईस्वी-पूर्व का है तथा ब्राह्मी लिपि में है। संभवतः यह किसी जैन मंदिर का शिलालेख है। नगरी का लेख वि.सं. 481 का है। इस लेख में वैश्य सत्यसूर्य और उसके भाइयों द्वारा भगवान नारायण (विष्णु) के चरण पर मंदिर बनवाए जाने का उल्लेख है। यह लेख मेवाड़ के नगरी (मध्यमिका) नामक प्राचीन नगर से मिला है।

    प्रतिहार वंशीय राजा बाउक के मण्डोर लेख (वि.सं. 894) में मंडोर के प्रतिहारों का ब्राह्मण हरिश्चन्द्र के वंश में होना तथा हरिश्चन्द्र से लेकर बाउक तक की वंशावली और उनका कुछ वृत्तान्त दिया है। बयाना के नाना अभिलेख (8वीं शर्ती ईस्वी) में बलिआ के पुत्र तथा उकेश्वर के पौत्र दुर्गादित्य का, गायों को छुड़ाने के प्रयास में चोरों के हाथों मारे जाने का उल्लेख है। वाक्पतिराज के पुष्कर लेख में 10वीं शती ईस्वी में रुद्रादित्य नामक व्यक्ति द्वारा एक विष्णु मंदिर बनाए जाने का उल्लेख है। चामुण्डराज अर्थूणा लेख (वि.सं.1137) बागड़ के परमार राजा चामुण्डराज के समय का है। इसमें उसके एक अधिकारी के तीन पुत्रों आसदेव, मत्यासराज तथा अनंतपाल के नाम दिए गए हैं। अनंतपाल ने एक शिव मंदिर बनवाया था, यह लेख अर्थूणा के उक्त शिवालय से मिला है।

    अजमेर के अढाई दिन का झोंपड़ा परिसर से चौहान राजा विग्रहराज (चतुर्थ) के समय के छः शिलापट्ट मिले हैं जिन पर राजा विग्रहराज द्वारा लिखित संस्कृत भाषा का नाटक हरकेलि उत्कीर्ण है। इस नाटक में शिव-पार्वती की अभ्यर्थना की गई है और उनकी विभिन्न क्रीड़ाओं का वर्णन है। इसके एक खण्ड में नारायण तथा अन्य देवी-देवताओं की स्तुति है। बारहवीं शताब्दी ईस्वी का चौहान नरेश विग्रहराज (चतुर्थ) साहित्य प्रेमी राजा था और साहित्यकारों का आश्रयदाता भी। उसके समय के लोग उसे कविबांधव कहते थे। इतिहास में उसे वीसलदेव नाम से भी सम्बोधित किया गया है। उसने अजमेर में एक संस्कृत विद्यालय एवं सरस्वती मंदिर बनवाया जो मुहम्मद गौरी की सेनाओं द्वारा तोड़ दिए जाने के बाद अढ़ाई दिन का झौंपड़ा के नाम से अवशेष रूप में रह गया है। इस विद्यालय परिसर से 75 पंक्तियों का एक विस्तृत शिलालेख प्राप्त हुआ है जो इस बात की घोषणा करता है कि इस विद्यालय का निर्माण वीसलदेव ने करवाया था। सरस्वती कण्ठाभरण मंदिर परिसर से विग्रहराज द्वारा संस्कृत में लिखित हरकेलि नाटक के छः चौके मिले हैं जो 22 नवम्बर 1153 की तिथि के हैं। राजपूताना संग्रहालय में रखा उसका शिलालेख घोषणा करता है कि चौहान शासक सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं।

    रंगचित्र

    संग्रहालय के चित्रकला विभाग में कोटा, बूंदी, उदयपुर, जोधपुर, किशनगढ़ एवं बीकानेर आदि रियासतों से प्राप्त विभिन्न चित्रशैलियों के नमूने प्रदर्शित किए गए हैं। इनमें कोटा, करौली, टोंक, बीकानेर, जोधपुर, डूंगरपुर, भरतपुर, झालावाड़ तथा जयपुर के प्रमुख शासकों के चित्रों के साथ-साथ मथुराधीशजी, वल्लभ संप्रदाय, श्रीनाथजी, वासुदेव द्वारा कृष्ण को लेकर यमुना पार करने के चित्र, विभिन्न राग-रागिनियों के चित्र, गेरखनाथजी, अष्टछाप कवि, गुंसाईजी, चीर हरण, राम-रावण युद्ध, वल्लभाचार्यजी, विट्ठलनाथजी, भीष्म पितामह आदि के चित्र सम्मिलित हैं।

    अस्त्र-शस्त्र

    संग्रहालय के एक कक्ष में विभिन्न प्रकार के प्राचीन अस्त्र-शस्त्र का प्रदर्शन किया गया है। इनमें विभिन्न प्रकार की तलवारें, ढाल, कटार, फरसा, जागनोल, बंदूक, धनुषबाण तथा अनेक प्रकार के हथियार संगृहीत हैं। साथ ही एक मनुष्याकार राजपूत योद्धा का मॉडल रखा है जो मध्य-कालीन युद्धों के समय पहनी जाने वाली वेशभूषा से सुसज्जित है।

    सिक्के एवं मुद्राएं

    अजमेर संग्रहालय में सोना, चांदी, तांबा, लैड तथा निकल के 3000 से अधिक सिक्के सुरक्षित हैं जिनमें भारतवर्ष के पूर्वेतिहासिक काल के पंचमार्का (आहत) सिक्के सबसे पुराने हैं। नगरी से प्राप्त जनपद के सिक्कों पर वृक्ष, स्वास्तिक, ब्रह्मी लिपि के लेख तथा पट्ट और मेहराब युक्त पहाड़ी के नीचे टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं से बने नदी के चिह्न अंकित हैं। तक्षशिला से प्राप्त इण्डोग्रीक सिक्के के चित्त की ओर राजा का ऊर्ध्व चित्र है तथा पट्ट की ओर यूनानी देवी एवं देवता, ‘जियस’ लिखा हुआ है एवं वृषभ के चित्र बने हैं। कुषाणकालीन सिक्कों में ईरानी वेशभूषा में अंकित राजा दाहिने हाथ से अग्नि वेदी पर आहुति देते हुए अंकित है तथा बायां हाथ कटि पर बंधी तलवार थामे दिखाया गया है। राजा के पृष्ठ भाग पर शिव तथा त्रिशूल का अंकन है। राजा का शिरस्त्राण (टोप) नुकीला है।

    कनिंघम को पुष्कर से पश्चिमी क्षत्रपों महपान, पायदामन, रुद्रदामन तथा रुद्रसिंह की कई मुद्राएं प्राप्त हुई थीं। गुप्तकालीन सिक्कों में चन्द्रगुप्त (प्रथम) के राजा-रानी के सिक्के, समुद्रगुप्त के ध्वजधारी, धनुर्धारी, परशुधारी, वीणाधारी तथा अश्वमेध प्रकार के सिक्के, कांच का दुर्लभ सिक्का तथा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के विभिन्न प्रकार के सिक्के इस संग्रहालय की महत्वपूर्ण निधि हैं। चौहान अजयदेव के सिक्के में एक ओर बैठी हुई देवी का अंकन है तथा दूसरी ओर देवनागरी में अजयदेव लिखा हुआ है। अश्वारोही-वृषभ प्रकार के सिक्के के चित भाग पर ढाल और भाला लिए अश्वारोही तथा पट्ट भाग पर शिव-वाहन नंदी बैठा है। गधिया प्रकार के सिक्कों के चित भाग पर राजा का भद्दा चेहरा है तथा पट्ट भाग पर सिंहासन या अग्निवेदी को बिन्दुओं के माध्यम से बनाया गया है। दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों एवं मुगल बादशाहों के विभिन्न सिक्के भी इस संग्रहालय में संगृहीत हैं।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-43

     19.05.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-43

    प्रकृति और मानव मन के उल्लास की संयुक्त अभिव्यक्ति हैं लोकनृत्य


    लोकनृत्यों के मामले में राजस्थान की धरती समृद्ध है। लोकनृत्य प्रकृति और मानव मन के उल्लास की संयुक्त अभिव्यक्ति हैं। मारवाड़ का डांडिया, मारवाड़ व मेवाड़ का गैर, शेखावाटी का गींदड़, जालोर का ढोल नृत्य, जसनाथी सिद्धों का अग्नि नृत्य, अलवर-भरतपुर क्षेत्र का बम नृत्य, लगभग पूरे प्रदेश में होने वाले घूमर, चंग व डांडिया नृत्य देखते ही बनते हैं। वनवासियों के लोकनृत्यों में भीलों के गवरी व राई नृत्य, गरासियों के वालर, लूर नृत्य, कूद नृत्य, घूमर, मांदल नृत्य, गूजरों का चरी नृत्य, रामदेवजी के भोपों को तेरहताली नृत्य, पेशेवर लोक नर्तकों का भवाई नृत्य, मीणों, कंजरों, सांसियों, कालबेलियों, गाड़िया लुहारों तथा बणजारों के नृत्य रंग-बिरंगी छटा बिखेरते हैं। वनवासियों, कंजरों, जोगियों, सांसियों और कालबेलियों के नृत्यों में शृंगार रस की प्रधानता होती है तथा इनमें खुलापन अधिक होता है। इनके लोकनृत्यों में कामुकता अधिक होती है तथा कामुक संकेतों के साथ-साथ अंग प्रदर्शन पर भी जोर दिया जाता है। प्रमुख लोकनृत्यों का विवरण इस प्रकार है-

    गैर नृत्य : गोल घेरे में इस नृत्य की संरचना होने के कारण यह 'घेर' और कालांतर में 'गैर' कहा जाने लगा। नृत्य करने वालों को 'गैरिया' कहते हैं। यह होली के दूसरे दिन से प्रारंभ होता है तथा 15 दिन तक चलता है। उन दिनों मेवाड़ और मारवाड़ में इस नृत्य की धूम मची रहती है। इस नृत्य को देखने से ऐसा लगता है मानो तलवारों से युद्ध चल रहा हो। इस नृत्य की सारी प्रक्रियाएं और पद संचालन तलवार युद्ध और पटेबाजी जैसी लगती हैं। यह नृत्य वृत्त में होता है और नृत्य करते-करते अलग-अलग मंडल बनाये जाते हैं। यह केवल पुरुषों का नृत्य है। मेवाड़ और बाड़मेर के गैर नृत्य की मूल रचना एक ही प्रकार है किंतु नृत्य की लय, चाल और मण्डल में अंतर होता है। इस नृत्य में जाट, ठाकुर, पटेल, पुरोहित, माली, मेघवाल आदि सभी जातियों के पुरुष भाग लेते हैं। अधिकतर स्थानों पर जातियों के अनुसार गैर टोलियां बनी हुई हैं। नर्तक सफेद धोती, सफेद अंगरखी तथा सिर पर लाल अथवा केसरिया रंग की पगड़ी बांधते हैं। जालोर आदि क्षेत्रों में नर्तक फ्रॉक जैसी आकृति का एक घेरदार लबादा पहनते हैं तथा कमर में तलवार बांधने के लिये पट्टा भी धारण करते हैं। गैर नृत्य तीन प्रकार के होते हैं-

    (1.) आंगे-बांगे की गैर- इसे आंगी की गैर भी कहते हैं। इसमें प्रत्येक नर्तक चालीस मीटर के कपड़े से बनी आंगी व बागा पहनता है। कपड़े का रंग सफेद और लाल होता है। नर्तक दोनों हाथों में रोहिड़े या बबूल की डण्डियां लिये हुए ढोल की थाप पर घूमते हुए अपनी डण्डियां आजू-बाजू के नर्तकों की डण्डियों से टकराते हैं।

    (2.) नागी गैर- इसे सादी गैर भी कहते हैं। यह दो प्रकार की होती है।

    (अ.) डण्डियों वाली गैर- इसमें नर्तक परम्परागत वेशभूषा धारण करते हैं। धोती, कुर्ता पूठिया इसकी विशेष पहचान है। पैरों में आठ-आठ किलो के घुंघरू पहनकर नृत्य करते हैं।

    (ब.) रूमाल वाली गैर- नर्तक हाथों में डण्डियों की जगह रंग-बिरंगे रूमाल रखते हैं तथा ढोल की थाप पर लहराते हुए नृत्य करते हैं।

    (3.) स्वांगी गैर- नर्तक हाथ में डण्डियां लेकर नृत्य करते हैं। प्रत्येक नर्तक अलग वेशभूषा में माली, सेठ, सरदार, साधु, आदि रूप धारण करते हैं।

    गींदड़ नृत्य : यह शेखावाटी का लोकप्रिय नृत्य है। सुजानगढ़, चूरू, रामगढ़, लक्ष्मणगढ़, सीकर और उसके आसपास के क्षेत्रों में होली के दिनों में इस नृत्य के सामूहिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। नगाड़ा इस नृत्य का मुख्य वाद्य होता है। नर्तक अपने हाथों में छोटे डण्डे लिये हुए होते हैं। नगाड़े की ताल के साथ इन डंडों को परस्पर टकराकर नर्तक नाचते हैं। जैसे-जैसे नृत्य गति पकड़ता है, नगाड़े की ध्वनि भी तीव्र होती है। इस नृत्य में विभिन्न प्रकार के स्वांग भी बनाये जाते हैं जिनमें साधु, शिकारी, सेठ-सेठानी, डाकिया, दुल्हा, दुल्हन आदि प्रमुख हैं।

    चंग नृत्य : यह पुरुषों का नृत्य है। इस नृत्य में प्रत्येक पुरुष के साथ चंग (डफ) होता है और वह चंग बजाता हुआ वृत्ताकार में नृत्य करता है। इसमें बांसुरी का प्रयोग भी होता है। इस नृत्य में धमाल तथा होली के गीत गाये जाते हैं। नर्तक गोल घेरे में चंग बजाता हुआ एक लय के साथ आगे बढ़ता है और चंग बजाता हुआ अपने स्थान पर चक्कर खाता है। इस नृत्य में अंग संचालन देखने योग्य होता है। यह मारवाड़ तथा शेखावाटी क्षेत्र का नृत्य है। नर्तक चूड़ीदार पायजामा-कुर्ता धारण करते हैं। कमर में रूमाल तथा पांवों में घुंघरू बांधे जाते हैं।

    डांडिया नृत्य : यह मारवाड़ का लोकप्रिय नृत्य है। यों तो गैर, गींदड़ और डांडिया तीनों ही नृत्य वृत्ताकार हैं और इनमें डण्डी का प्रयोग होता है, तीनों ही नृत्य होली के अवसर पर आयोजित होते हैं और इनमें केवल पुरुष ही भाग लेते हैं किंतु पद संचालन, भाव भंगिमा, ताल, गीत और वेशभूषा आदि में तीनों ही अलग-अलग हैं। इस नृत्य में पुरुषों की टोली हाथ में लंबी छड़ियां लेकर नाचती है। इसमें शहनाई और नगाड़ा बजाया जाता है। नर्तक आपस में डांडिया टकराते हुए नृत्य करते हैं। होली के बाद आरंभ होने वाले इस नृत्य में नर्तक राजा-रानी, राम-सीता, शिव-पार्वती, कृष्ण-राधा आदि का वेश धरकर नृत्य करते हैं।

    ढोल नृत्य : यह जालोर का प्रसिद्ध नृत्य है। यह भी पुरुषों द्वारा ही किया जाता है। इसमें एक साथ चार या पाँच ढोल बजाये जाते हैं। इसमें पहले मुखिया ढोल बजाता है फिर अन्य नर्तक मुँह में तलवार, हाथों में डण्डे तथा रूमाल लेकर नृत्य करते हैं। यह नृत्य प्रायः विवाह के अवसर पर किया जाता है। नृत्य के दौरान ढोल को थाकना शैली में बजाया जाता है। थाकना के बाद अलग शैलियों में भी ढोल वादन होता है। यह नृत्य ढोली, माली, सरगरा तथा भील आदि जातियों में अधिक होता है।

    अग्नि नृत्य : धधकते हुए अंगारों पर किया जाने वाला यह नृत्य जसनाथी संप्रदाय के सिद्ध लोग करते हैं। इसका उद्गम क्षेत्र बीकानेर जिले का कतरियासर ग्राम माना जाता है। यह नृत्य रात्रि में आयोजित होता है। इस नृत्य में नर्तक अंगारों के ढेर में प्रवेश करते हैं और नाचते हुए निकलते हैं। इतना ही नहीं नर्तक अंगारों को हाथ में उठा लेते हैं तथा मुँह में भी डाल लेते हैं। कभी-कभी अंगारों को झोली में भरकर नाना प्रकार के करतब किये जाते हैं। नर्तक अग्नि से इस प्रकार खेलते हैं मानो अंगारों से नहीं फूलों से खेल रहे हों। यह नृत्य भी पुरुषों द्वारा ही किया जाता है।

    बमरसिया नृत्य : यह अलवर और भरतपुर क्षेत्र का नृत्य है। इस नृत्य में एक बड़े नगाड़े का प्रयोग किया जाता है। इसे दो आदमी डंडों की सहायता से बजाते हैं और नर्तक रंग-बिरंगे फूंदों तथा पंखों से बंधी लकड़ी हाथों में लेकर हवा में उछालते हुए नाचते हैं। वाद्ययंत्रों में नगाड़े के अलावा थाली, चिमटा, ढोलक, मंजीरा और खड़तालों का प्रयोग किया जाता है। नृत्य के साथ होली के गीत और रसिया गाया जाता है। बम (नगाड़े) के साथ रसिया गाने से इसे बम रसिया कहते हैं। इस नृत्य को नयी फसल आने की प्रसन्नता में किया जाता है। बम नृत्य के दौरान गिलास के ऊपर थाली रखकर बजायी जाती है।

    घूमर नृत्य : यह समूचे राजस्थान का लोकप्रिय नृत्य है। यह नृत्य मांगलिक अवसरों तथा पर्वों पर आयोजित होता है। यह महिलाओं का नृत्य है। स्त्रियाँ जब आकर्षक पोषाकें विशेषकर घुमावदार घाघरा पहनकर तथा चक्कर लेकर गोल घेरे में नृत्य करती हैं तो उनके लहंगों का घेर और हाथों का लचकदार संचालन देखते ही बनता है। घूमर के साथ अष्टताल कहरवा लगाया जाता है जिसे सवाई कहते हैं। इसे अनेक घूमर गीतों के साथ मंच पर भी प्रस्तुत किया जाता है।

    तेरहताली नृत्य : यह कामड़ जाति का अनोखा नृत्य है। यह नृत्य बैठकर किया जाता है। इसमें स्त्रियां अपने हाथ-पैरों में मंजीरे बांध लेती हैं और फिर दोनों हाथों से डोरी से बंधे मंजीरों को दु्रतगति की ताल और लय से शरीर पर बंधे मंजीरों पर प्रहार करती हुई विविध प्रकार की भाव-भंगिमायें प्रदर्शित करती हैं। यह चंचल और लचकदार नृत्य देखते ही बनता है। पुरुष तंदूरे की तान पर मुख्यतः रामदेवजी के भजन गाते हैं।

    भवाई नृत्य : यह नृत्य अपनी चमत्कारिता के लिये अधिक प्रसिद्ध है। इस नृत्य में विभिन्न शारीरिक करतब दिखाने पर अधिक बल दिया जाता है। यह उदयपुर संभाग में अधिक प्रचलित है। अनूठी नृत्य अदायगी, शारीरिक क्रियाओं के अद्भुत चमत्कार तथा लयकारी विविधता इसकी मुख्य विशेषतायें हैं। तेज लय में सिर पर सात-आठ मटके रखकर नृत्य करना, जमीन से मुँह से रूमाल उठाना, गिलासों पर नाचना, थाली के किनारों पर, तलवार की धार पर, कांच के टुकड़ों पर और नुकीली कीलों पर नृत्य करना इस नृत्य की विशेषतायें हैं।

    घुड़ला नृत्य : यह मुख्यतः मारवाड़ में तथा अल्प मात्रा में सम्पूर्ण राजस्थान में किया जाता है। यह स्त्रियों के द्वारा किया जाने वाला सामूहिक नृत्य है। स्त्रियां छिद्र युक्त मटके सिर पर रखकर उसमें दिये जलाती हैं। नृत्य के दौरान घूमर तथा पणिहारी के अंदाज में गोल चक्कर बनाया जाता है। यह नृत्य गणगौर पर्व के आसपास किया जाता है।

    कच्छी घोड़ी नृत्य : यह शेखावाटी क्षेत्र का नृत्य है किंतु अब सम्पूर्ण प्रदेश में किया जाता है। इस नृत्य में पुरुष ही भाग लेते हैं। नर्तक बांस की टोकरियों को घोड़ी की आकृति देता है तथा उस पर घोड़े की आकृति का कपड़े का खोल चढ़ा दिया जाता है। नर्तक इसके बीच में से घुसकर खड़ा होकर नृत्य करता है। देखने वाले को लगता है कि नर्तक घोड़ी पर बैठा है।

    वालर नृत्य : यह गरासियों का नृत्य है। गणगौर त्यौहार के दिनों में गरासिया स्त्री-पुरुष अर्द्धवृत्ताकार में धीमी गति से बिना किसी वाद्य के नृत्य करते हैं। यह नृत्य डूंगरपुर, उदयपुर, पाली व सिरोही क्षेत्रों में प्रचलित है।

    लांगुरिया नृत्य : लांगुरिया हनुमानजी का लोक स्वरूप है। करौली क्षेत्र की कैला मैया, हनुमानजी की माँ अंजना का अवतार मानी जाती हैं। नवरात्रियों के दिनों में करौली क्षेत्र में लांगुरिया नृत्य होता है। इसमें स्त्री-पुरुष सामूहिक रूप से भाग लेते हैं। नृत्य के दौरान नफीरी तथा नौबत बजती है। लांगुरिया को संबोधित करके हल्के-फुल्के हास्य-व्यंग्य किये जाते हैं।

    इण्डोणी : यह कालबेलियों का युगल नृत्य है जो गोल घेरे में होता है। इसमें पुंगी तथा खंजरी का प्रयोग होता है। नर्तक युगल कामुकता का प्रदर्शन करने वाले कपड़े पहनते हैं।

    मांदल : यह कोटा क्षेत्र का नृत्य है। इसे गरासिया जाति की स्त्रियां गोल घेरा बनाकर करती हैं। इस पर गुजराती गरबे का प्रभाव है। इसमें थाली व बांसुरी का प्रयोग होता है।

    गवरी नृत्य : यह भीलों का सामाजिक एवं धार्मिक नृत्य है। डूंगरपुर-बांसवाड़ा, उदयपुर, भीलवाड़ा एवं सिरोही आदि क्षेत्रों में अधिक प्रचलित है। यह गौरी पूजा से सम्बद्ध होने के कारण गवरी कहलाता है। इसमें नतृक नाट्य कलाकारों की भांति अपनी साज-सज्जा करते हैं।

    डांग नृत्य : यह मेवाड़ के नाथद्वारा क्षेत्र में किया जाने वाला नृत्य है। इसे स्त्री-पुरुष साथ-साथ करते हैं। पुरुषों द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की एवं स्त्रियों द्वारा राधाजी की नकल की जाती है तथा वैसे ही वस्त्र धारण किये जाते हैं। यह होली के अवसर पर किया जाता है। इस नृत्य के समय ढोल, मांदल तथा थाली आदि वाद्यों का प्रयोग किया जाता है।

    पणिहारी नृत्य : यह कालबेलियों का नृत्य है जिसमें स्त्री एवं पुरुष दोनों मिलकर नृत्य करते हैं। इस समय पणिहारी गीत गाये जाते हैं।

    शंकरिया नृत्य : यह भी कालबेलियों का युगल नृत्य है जो प्रेम कथाओं को आधार बनाकर किया जाता है। इस नृत्य का अंग लास्य कामुकता से भरा होता है।

    बागड़िया नृत्य : यह नृत्य कालबेलिया स्त्रियों द्वारा भीख मांगते समय किया जाता है। साथ में चंग बजाया जाता है।

    नेजा नृत्य : यह नृत्य होली के तीसरे दिन भील स्त्री-पुरुषों द्वारा युगल रूप में किया जाता है। पाली, सिरोही, उदयपुर एवं डूंगरपुर आदि जिलों में यह अधिक प्रचलित है।

    युद्ध नृत्य : इस नृत्य में भील जाति के पुरुष हाथ में तलवार लेकर युद्ध कला का प्रदर्शन करते हैं। यह नृत्य उदयपुर, पाली, सिरोही व डूंगरपुर क्षेत्र में अधिक प्रचलित है।


    जातीय, क्षेत्रीय एवं अन्य विशेषताओं के आधार पर नृत्यों का वर्गीकरण

    भीलों के नृत्य : गवरी, राई, गैर, घूमर, नेजा एवं युद्ध नृत्य आदि।

    कालबेलियों के नृत्य : इण्डोणी, शंकरिया, पणिहारी, बागड़िया आदि।

    गरासियों के नृत्य : मांदल, गरबा, घूमर, गैर व लूर आदि।

    गूजर जाति के नृत्य : चरी नृत्य।

    शेखावाटी के नृत्य : गींदड़, चंग, डांडिया, कच्छी घोड़ी आदि।

    मारवाड़ के नृत्य : डांडिया, गैर, घुड़ला, तेरह ताली, घूमर, लूर, अग्नि नृत्य, ढोल नृत्य।

    अलवर-भरतपुर क्षेत्र के नृत्य : बमरसिया।

    गृहस्थों द्वारा किये जाने वाले नृत्य : पणिहारी, मेंहदी, दीपक नृत्य, टूटिया, गौरी।

    होली के नृत्य : चंग, गैर, डांडिया, गींदड़, नेजा, बमरसिया एवं डांग नृत्य आदि।

    व्यावसायिक नृत्य : गवरी, राई, गैर, घूमर, नेजा एवं युद्ध नृत्य आदि।

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  • अध्याय - 7 राजकीय संग्रहालय, उदयपुर

     02.06.2020
    अध्याय - 7 राजकीय संग्रहालय, उदयपुर

    अध्याय - 7 राजकीय संग्रहालय, उदयपुर


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    महाराणा शम्भुसिंह (ई.1861-74) के शासन काल में कर्नल हैचिन्सन की सलाह पर उदयपुर रियासत में तवारीख महकमा (इतिहास विभाग) स्थापित किया गया। इसी दौरान ई.1873 में उदयपुर संग्रहालय की स्थापना का काम आरम्भ हुआ। महाराणा सज्जनसिंह (ई.1874-84) के शासनकाल में इतिहास विभाग की अच्छी प्रगति हुई। उनके शासन काल में ही राज्य में ई.1879 में कविराजा श्यामलदास की अध्यक्षता में ऐतिहासिक और पुरा सामग्री का अनुसंधान कार्य प्ररम्भ हुआ। प्रसिद्ध इतिहासविद् गोविन्द गंगाधर देशपाण्डे ने एक वर्ष तक उदयपुर में रहकर प्राचीन शिलालेखों का अध्ययन किया।


    ई.1887 में महाराणा फतहसिंह (ई.1884-1930) ने महारानी विक्टोरिया (ई.1837-1901) के शासन की स्वर्ण जयंती के अवसर पर उदयपुर के सज्जन निवास बाग में विक्टोरिया हॉल का निर्माण करवाया। इस भवन का निर्माण इण्डो-ब्रिटिश स्थापत्य शैली में किया गया था। इस उद्यान को अब गुलाब बाग कहते हैं। 1 नवम्बर 1890 को भारत के तत्कालीन वाइसराय लार्ड लेन्सडाउन ने इस भवन में विक्टोरिया हॉल म्यूजियम और पुस्तकालय का उद्घाटन किया। उसी दिन से यह जनसाधारण के लिए खोल दिया गया। प्रसिद्ध इतिहासकार गौरीशंकर ओझा को क्यूरेटर के पद पर नियुक्त किया गया। वे ई.1908 तक इस पद पर तक कार्यरत रहे। उनके पश्चात् पण्डित अक्षय कीर्ति व्यास और रत्नचन्द्र अग्रवाल भी इस संग्रहालय एवं पुस्तकालय के अध्यक्ष रहे। उन्होंने पूरे राज्य से शिलालेख, सिक्के, प्रतिमाएँ, कलात्मक सामग्री एवं वस्त्रों के नमूने प्राप्त करके इस संग्रहालय में प्रदर्शित किए। आगे चलकर पं. अक्षय कीर्ति व्यास ने मेवाड़ क्षेत्र के शिलालेखों एवं रतनचन्द्र अग्रवाल ने मेवाड़ क्षेत्र की प्राचीन प्रतिमाओं को प्रकाशित करने पर विशेष ध्यान दिया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सरस्वती भण्डार से बहुत बड़ी संख्या में चित्रित पाण्डुलिपियों का अधिग्रहण किया गया।

    महारानी विक्टोरिया की ऐतिहासिक प्रतिमा

    इस संग्रहालय के लिए लंदन से महारानी विक्टोरिया की एक विशाल मूर्ति मंगवाई गई जिसका समस्त व्यय महाराणा द्वारा वहन किया गया। इस प्रतिमा को संग्रहालय भवन के समक्ष स्थापित किया गया जहाँ यह वर्षों तक खड़ी रही। ई.1948 में उदयपुर के स्वतंत्रता सेनानी तथा भारत की संविधान सभा के सदस्य वीरभद्र जोशी तथा मास्टर बलवंत सिंह मेहता इस प्रतिमा पर चढ़ गए और इसके मुंह पर काला रंग पोत दिया। इसके बाद इस प्रतिमा को उठाकर संग्रहालय के भवन में रख दिया गया और विक्टोरिया की प्रतिमा के स्थान पर गांधीजी की प्रतिमा स्थापित की गई। स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा इसे राष्ट्रवाद की विजय बताया गया। ई.1968 में यह संग्रहालय सज्जन निवास बाग से सिटी पैलेस के कर्ण विलास या हिसाब दफ्तर महल में स्थानान्तरित किया गया और इसका नाम प्रताप संग्रहालय रखा गया। भारत की स्वतंत्रता के बाद यह राजकीय संग्रहालय उदयपुर के नाम से जाना जाता है। विक्टोरिया हॉल अब गवर्नमेंट सरस्वती पुस्तकालय कहलाने लगा किंतु विक्टोरिया की वह प्रतिमा आज भी इस भवन की एक गैलेरी के कोने में उपेक्षित अवस्था में रखी हुई है।

    क्षेत्रीय संग्रहालय

    वर्तमान में राजकीय संग्रहालय उदयपुर एक क्षेत्रीय संग्रहालय है। इसमें मेवाड़ क्षेत्र के प्राचीन शिलालेख, प्रतिमाएं, लघु चित्र, प्राचीन सिक्के, एवं अस्त्र-शस्त्र संगृहीत हैं। संग्रहालय की पुरा सामग्री एवं कला सामग्री को पांच दीर्घाओं में रखा गया है।

    बाल दीर्घा

    प्रथम दीर्घा को बाल दीर्घा का रूप दिया गया है। इसमें बालकों की रुचि की सामग्री प्रदर्शित है जिसमें स्टफ किया गया कंगारू, बन्दर, सफेद सांभर, कस्तूरी हिरन और घड़ियाल प्रमुख हैं।

    सांस्कृतिक दीर्घा

    इस दीर्घा में मेवाड़ की छपाई के वó, हाथी दाँत के कलात्मक नमूने, मेवाड़ी पगड़ियाँ, साफे, चोगा, भीलों के आभूषण, महाराणाओं के पोट्रेट्स, भीलों के जीवन पर आधारित आधुनिक चित्र, और अó-शó प्रमुख हैं। सांस्कृतिक दीर्घा की सबसे मूल्यवान निधि शहजादा खुर्रम की पगड़ी है। ई.1622 में शहजादा खुर्रम अपने पिता जहांगीर से बगावत करके दक्षिण की ओर जाते हुए कुछ दिनों के लिए उदयपुर ठहरा था। वह मेवाड़ के राणा 
    कर्णसिंह का पगड़ी बदल भाई बना था। वही यादगार पगड़ी राजकीय संग्रहालय उदयपुर में प्रदर्शित है। हाथी दांत से निर्मित बहुत सी कलाकृतियां इस संग्रहालय में देखी जा सकती हैं। इनमें हाथीदांत से बने मुग्दर, खड़ाऊं, पालकी ले जाते कहार, पानी का जहाज, चंदन से बनी खड़ाऊं, भेड़ पर आक्रमण करता शेर, कुत्तों को घुमाने ले जाता आदमी, हाथीदांत की कार बहुत ही परिश्रम से बनाई गई प्रतीत होती हैं। धातुओं से बनी बहुत सी मूर्तियां भी महत्वपूर्ण हैं। पीतल से बनी भील ज्वैलरी भी दर्शनीय है। पीतल से बनी 13वीं सदी की महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा इतिहास की दृष्टि से बहुमूल्य है। इस प्रतिमा में देवी के चार हाथ दर्शाए गए हैं। पीतल से बनी जैन तीर्थंकरों की भी कई प्रतिमाएँ हैं। संग्रहालय में नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर का लकड़ी का मॉडल भी प्रदर्शित किया गया है जिसकी कला देखते ही बनती है।

    अस्त्र-शस्त्र

    संग्रहालय में मध्यकालीन एवं रियासती इतिहास को जानने की दृष्टि से महत्वपूर्ण अस्त्र-शस्त्रों को बड़ी संख्या में प्रदर्शित किया गया है। हथियार बनाने वालों ने कुछ हथियारों पर उनसे सम्बन्धित सूचनाएं भी अंकित की हैं। कुछ तलवारों की मूठ सोने से बनी हुई हैं तथा कुछ तलवारों की म्यान पर सोने का काम किया गया है। संग्रहालय में कलाई पर पहनने वाला पहुंचा, बरछी, पेशकब्ज, छुरी तथा नारजा भी प्रदर्शित किए गए हैं। एक तलवार पर बांसवाड़ा के महारावल पृथ्वीसिंह का नाम अंकित है। स्टील से बने धनुष एवं बाण, बांस से बने बाण, 17वीं शताब्दी में जैसलमेर में बनी मैचलॉक बंदूक जिस पर सोने की कोफ्तकारी का काम है, अठारहवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में निर्मित हाथी का अंकुश, 18वीं शताब्दी का भीलों के काम आने वाला चमड़े का तरकश, दो सौ साला पुरानी लोहे की गुप्ती, थ्री नॉट थ्री राइफल, तुर्किश तोप, विभन्न रियासतों के चांदी के सिक्के, बीकानेर में बनी 18वीं सदी की लोहे की ढाल जिस पर चंद्रस का काम हुआ है तथा ताम्बे के फूलों से सजी हुई है, विभिन्न प्रकार की पेशकब्ज, खुखरी, कैंची कटार, टाइगर कटार, 17वीं शताब्दी में बूंदी में निर्मित लोहे की दस्तेद्रस (दाओ) संग्रहालय में प्रदर्शित की गई हैं।

    संग्रहालय में विभिन्न प्रकार की तलवारें रखी गई हैं जो 17वीं से 19 शताब्दी तक भारत में प्रयुक्त होती थीं। इनमें तोते की आकृति वाली मूठ युक्त तलवार, ई.1850 के आसपास बनी लहरिया तलवार जिसकी मूठ पर सोने की कोफ्ताकारी है, घोड़े की मुखाकृति की मूठ वाली कुलाबा (पतली तलवार), पक्षी की चोंच के समान चिरे हुए मुंह वाली जुल्फिकार तलवार, स्टील की गुर्ज, लोहे की ढालें जिन पर चांदी का काम किया हुआ है, चांदी की कोफ्तकारी से युक्त नागिन के समान लहराती हुई आकृति में बनी तलवार, लोहे की तेगा तलवार, कोरबंदी कोफ्तकारी से युक्त लहरिया पैटर्न की लोहे की तलवार, सोने के काम वाली मूठ की पट्टा तलवार जो 17वीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में दक्षिण भारत में बनी थी, सम्मिलित हैं।

    शिलालेख दीर्घा

    इस संग्रहालय के प्रथम क्यूरेटर गौरीशंकर ओझा ने रियासत के विभिन्न भागों से इतिहास की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी शिलालेख एकत्रित किए थे जिनमें से बहुत से शिलालेख अब भी इस संग्रहालय में हैं, कुछ शिलालेख अन्य संग्रहालयों को भेज दिए गए हैं। इस संग्रहालय के क्यूरेटर रत्नचंद्र अग्रवाल भी बहुत से शिलालेखों को प्रकाश में लाए।

    इस दीर्घा में मेवाड़ क्षेत्र से प्राप्त द्वितीय शताब्दी ई.पू. से 19वीं शताब्दी ईस्वी तक के शिलालेख संगृहीत हैं जो मेवाड़ क्षेत्र के इतिहास को जानने का प्रमुख साधन हैं। इन शिलालेखों में सबसे प्राचीन घोसुण्डी शिलालेख है जो द्वितीय शताब्दी ई. पू. का है। यह चित्तौड़ से सात मील दूर नगरी के निकट घोसुण्डी से प्राप्त हुआ। यह लेख कई खण्डों में टूटा हुआ है। इनमें से एक बड़ा खण्ड उदयपुर संग्रहालय में सुरक्षित है। लेख की भाषा संस्कृत और लिपि ब्राह्मी है। इस शिलालेख में संकर्षण और वासुदेव के पूजा गृह नारायण वाटिका के चारों ओर पत्थर की चारदीवारी बनाने और गजवंश के पराशरी के पुत्र सर्वतात द्वारा अश्वमेध यज्ञ करने का उल्लेख है। जोगेन्द्रनाथ घोष के विचार से इस लेख में वर्णित राजा कण्ववंशीय ब्राह्मण होना चाहिए। जॉनसन के विचार से यह लेख किसी ग्रीक, शुंग या आन्ध्रवंशीय शासक का होना चाहिये। आन्ध्रों में ‘गाजायन’ नामक गोत्र तथा ‘सर्वतात्’ आदि नाम पाए जाते थे। इसके अतिरिक्त भीलवाड़ा जिले का वि.सं. 282 का नान्दसा यूप शिलालेख, छोटी सादड़ी का वि.सं. 547 का भामरमाता शिलालेख, कल्याणपुर शिलालेख एवं कुम्भलगढ़ से प्राप्त कुम्भा कालीन चार विशाल शिलालेख उल्लेखनीय हैं।

    चित्तौड़ से छः मील दूर स्थित नगरी (प्राचीन नाम माध्यमिका) से प्राप्त एक शिलालेख प्रदर्शित किया गया है। कुंद शिलालेख वि.सं. 718 का है जो सूर्यवंशी राजा अपराजित से सम्बन्धित है। राजा धवलप्पदेव का धौद शिलालेख, परमार वंश का डबोक शिलालेख, तेजसिंह का घाघसा बावड़ी का शिलालेख, चौहान वंश का अलावदा और लोहारी सती लेख, सूचिवर्मन एवं शक्तिकुमार का आहार शिलालेख भी इस संग्रहालय के प्रमुख आकर्षण हैं। संग्रहालय में एक फारसी शिलालेख भी उल्लेखनीय है जो गयासुद्दीन तुगलक के शासन के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण सूचना प्रदान करता है। इसी दीर्घा में कुम्भलगढ़ से प्राप्त 16 लेखयुक्त प्रतिमाएँ प्रदर्शित हैं जिनमें ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वाराही, दामोदर, वासुदेव, केशव, माधव, मधूसूदन एवं पुरुषोत्तम प्रमुख हैं।

    कुछ प्राचीन ताम्रपत्र भी इस संग्रहालय में प्रदर्शित किए गए हैं जिन पर धार्मिक प्रयोजन हेतु ब्राह्मणों को भूमिदान दिए जाने का उल्लेख है।

    प्रतिमा दीर्घा

    इस दीर्घा में मेवाड़ क्षेत्र से प्राप्त छठी शताब्दी से 18वीं शताब्दी ईस्वी की प्रस्तर प्रतिमाएँ प्रदर्शित की गई हैं। इन प्रतिमाओं को शैव सम्प्रदाय, वैष्णव सम्प्रदाय, जैन सम्प्रदाय तथा अन्य विषयों से सम्बन्धित प्रतिमाओं से विभक्त किया जा सकता है। इनमें जगत से प्राप्त इन्द्राणी की प्रतिमा तथा तनेसर से प्राप्त शिशु क्रीड़ा, छठी शताब्दी ईस्वी की मूर्ति कला का प्रतिनिधित्व करती हैं। बान्सी क्षेत्र के रानीमल्या का जैन कुबेर और कल्याणपुर से प्राप्त घुंघराले बालों से युक्त शिवमस्तक आठवीं शताब्दी ईस्वी की प्रमुख प्रतिमाएं हैं। कल्याणपुर से प्राप्त एक पुरुष प्रतिमा का भारी मस्तक भी इस संग्रहालय में रखा गया है। कल्याणपुर से ही त्रिनेश शिव प्रतिमा का एक मस्तक भी प्राप्त किया गया है। इसमें परमात्मा के चेहरे पर बहुत ही शांत भाव हैं। मस्तक पर बहुविध अलंकरण किया गया है।

    केजड़ा से प्राप्त नृत्यलीन वाराही तथा नागदा से प्राप्त शेषशायी विष्णु, आहार से प्राप्त भगवान विष्णु के मत्स्यावतार एवं कच्छप अवतार प्रतिमाएँ भी संग्रहालय का विशिष्ट आकर्षण हैं। कमल पुष्प पर आसीन देवी लक्ष्मी की एक प्रतिमा विभिन्न प्रकार के आभूषणों से अलंकृत है। इसमें देवी की देहयष्टि अत्यंत पुष्ट दिखाई दिखाई गई है। आहार से प्राप्त एक भारी कांस्य प्रतिमा भी प्रदर्शित की गई है। गुप्तोत्तर काल में दक्षिण-पश्चिम राजस्थान में हरे-नीले पत्थर (परेवा पत्थर) पर बहुत बड़ी संख्या में प्रतिमाओं का निर्माण किया गया। इस संग्रहालय में इस पत्थर की बहुत सी प्रतिमाएँ प्रदर्शित की गई हैं। भगवान शिव की परेवा पत्थर की 8वीं शताब्दी की एक प्रतिमा में भगवान किंचित बांकपन लेकर खड़े हैं। चार हाथों की इस प्रतिमा के तीन हाथ ही दिखाई देते हैं। एक हाथ में भगवान ने त्रिशूल पकड़ रखा है। एक हाथ में पुष्प है। भगवान के चरणों के पास नंदी खड़ा है।

    परेवा पत्थर पर ही चामुण्डा की एक प्रतिमा आठवीं शताब्दी की है। इसमें देवी के चार हाथ हैं, माथे पर सुंदर केश-सज्जा एवं मुकुट दिखाई दे रहे हैं। आठवीं शताब्दी की परेवा पत्थर की एक शिव प्रतिमा में भगवान शिव के मुखमण्डल पर प्रसन्नता विराज रही है। उन्होंने भीलों की तरह छोटा सा बाघम्बर बांध रखा है। सिर पर केशों की भारी सजावट की गई है। भगवान, नंदी का सहारा लेकर खड़े हैं। इस प्रतिमा की चार भुजाएं थीं किंतु अब केवल एक ही रह गई है।

    परेवा पत्थर से बनी नागिनी की एक प्रतिमा 9वीं-10वीं शताब्दी ईस्वी की है। परेवा पत्थर से बनी भगवान के वराह अवतार की एक दुर्लभ प्रतिमा दर्शनीय है। इसी प्रकार की एक वराह प्रतिमा जो कम से कम एक हजार वर्ष पुरानी रही होगी, लेखक ने बारां जिले में परवन नदी के किनारे काकूनी के भग्नावशेषों में पड़ी देखी थी जिसे एक मंदिर के परिसर में रखा गया था। सिंहवाहिनी क्षेमंकरी माता की प्रतिमा सौम्य भाव की है, यह 10वीं-11वीं शताब्दी की है। देवी के चरणों के पास सिंह का अंकन किया गया है। देवी के माथे पर जूड़ा एवं मुकुट है तथा मस्तक के पीछे प्रभामण्डल बनाया गया है। इसी काल का लाल पत्थर का एक कुबेर देखते ही बनता है, वह एक छोटे हाथी पर पालथी लगाकर बैठा है तथा उसके भारी शरीर के कारण हाथी दबा हुआ प्रतीत होता है। परेवा पत्थर पर बनी भगवान विष्णु की खड़ी प्रतिमा एवं शेषशायी प्रतिमा भी देखते ही बनती हैं। शेषशायी प्रतिमा में देवी लक्ष्मी भगवान के चरण चाप रही हैं। शिव-पार्वती की एक युगल प्रतिमा 10वीं-12 शताब्दी की है। यह भी परेवा पत्थर पर बनी है तथा अपेक्षाकृत अच्छी अवस्था में है।

    पंद्रहवीं शताब्दी ईस्वी में मेवाड़ राज्य के शिल्पिी सूत्रधार मण्डन ने इस क्षेत्र की मूर्ति कला को प्रभावित किया। उसके प्रभाव से युक्त मूर्तिकला की कई मूर्तियां इस संग्रहालय में देखी जा सकती हैं। साधारण लाल पत्थर से 15वीं शताब्दी में बनी कई प्रतिमाएँ इस संग्रहालय में हैं जिनमें ब्रह्माणी माता का एक पैनल, भगवान विष्णु का खड़ा विग्रह, दामोदर स्वरूप का विग्रह, वासुदेव स्वरूप का विग्रह, अनिरुद्ध स्वरूप का विग्रह, केशव स्वरूप, प्रद्युम्न स्वरूप तथा भगवान के पुरुषोत्तम स्वरूप के विग्रह प्रदर्शित किए गए हैं। पंद्रहवीं शताब्दी का अधोक्षजा स्वरूप का विग्रह भी दर्शनीय है। इस प्रतिमा के दोनों हाथ तथा वैजयंती माला का काफी भाग खण्डित हैं। कुंभलगढ़ से प्राप्त वैष्णवी की एक प्रतिमा पर ई.1458 का शिलालेख अंकित है। पंद्रहवीं शताब्दी ईस्वी की भगवान संकषर्ण की प्रतिमा अपेक्षाकृत अच्छी अवस्था में है। यह लाल पत्थर से निर्मित है। परेवा पत्थर पर बनी एक चतुर्भुजी ब्रह्मा की प्रतिमा के चारों ओर अलंकृत परिकर बनाया गया है। यह 17वीं शताब्दी की प्रतिमा है तथा परेवा पत्थर से निर्मित है।

    परेवा पत्थर पर निर्मित भगवान विष्णु एवं देवी लक्ष्मी की रागात्मक भाव की एक सौम्य प्रतिमा 16वीं शताब्दी ईस्वी की है। परेवा पत्थर से बनी इंद्राणी की एक प्रतिमा मध्यकाल की है। इसमें इन्द्र की पत्नी कमल असन पर विराजमान है। उसकी सवारी ऐरावत भी कमल के नीचे अंकित है। इन्द्राणी के चार हाथ हैं, मस्तक एवं गले में बहुत सुंदर आभूषण एवं अलंकरण हैं। यह छठी शताब्दी ईस्वी की प्रतिमा है जो जगत से प्राप्त हुई थी। इन्द्राणी ने अपना बायां पैर मोड़कर अपनी दायीं जंघा के पास रखा हुआ है तथा दायां पैर आसन से नीचे लटक रहा है। देवी के चेहरे पर आत्म गौरव एवं आत्मविश्वास के भाव हैं। परेवा पत्थर पर बनी द्वारपाल की एक प्रतिमा 16वीं शताब्दी की है।

    वाराही की एक मनुष्याकार प्रतिमा 15वीं शती की है तथा लाल पत्थर पर निर्मित है। यह भी मातृका का ही अंकन है। इस पर उसी काल का एक लेख अंकित है जिसके अनुसार महाराणा कुंभा (ई.1433-68) ने इस प्रतिमा को लगवाया। यह प्रतिमा कुंभलगढ़ से लाई गई प्रतीत होती है। सोलहवीं शती की लाल पत्थर की गणेश प्रतिमा का शिल्प देखते ही बनता है। भगवान की दोनों जंघाओं पर रिद्धि एवं सिद्धि विराजमान हैं। मध्यकाल के एक अत्यंत सुंदर पैनल में अष्ट भुजाओं वाले शिव का अंकन किया गया है किंतु इस प्रतिमा का सिर उपलब्ध नहीं है। भगवान ने अपने हाथों में कमल, त्रिशूल, खट्वांग, सर्प तथा कपाल धारण कर रखे हैं। भगवान ने अपने दो हाथ अपनी गोद में रख रखे हैं। भगवान के दोनों तरफ चंवरधारिणियों का अंकन किया गया है। सूर्य एवं सुरसुन्दरी आदि प्रतिमाएँ दर्शकों को पंद्रहवी शती के कालखण्ड का अनुभव करावाने में सक्षम हैं।

    जैन प्रतिमाओं में 7वीं-8वीं शती की जैन कुबेर की भारी शरीर सौष्ठव वाली प्रतिमा अपेक्षाकृत बहुत अच्छी अवस्था में है। पंद्रहवीं-सोलहवीं शती की आदिनाथ की प्रतिमा तथा तीर्थंकर की एक मस्तक विहीन प्रतिमा प्रमुख हैं। जैन तीर्थंकर का एक घुंघराले बालों के अंकन वाला मस्तक अलग से प्रदर्शित किया गया है। संभवतः यह मस्तक संग्रहालय की ही मस्तक विहीन प्रतिमा का हो। क्षीण कटि एवं स्थूल पीन पयोधरों से युक्त एक मनोहारी जैन देवी की प्रतिमा इस क्षेत्र में पाए जाने वाले साधारण लाल पत्थर से बनी हुई है। संग्रहालय में मध्यकालीन शिल्पकला का एक अनुपम नमूना तोरण के एक खण्ड के रूप में उपलब्ध है। इसमें गुलाब की पत्तियों एवं ज्यामितीय आकृतियों का अद्भुत अंकन किया गया है।

    चित्रकला दीर्घा

    राजीय संग्रहालय उदयपुर की चित्रकला दीर्घा में लगभग आठ हजार लघु चित्र प्रदर्शित किए गए हैं जो संसार में मेवाड़ शैली का सबसे विशाल संग्रह है। इस संग्रह का अध्ययन करने के लिए देश-विदेश के शोधकर्ता उदयपुर संग्रहालय आते हैं। ई.1979 में बनेड़ा निवासी अक्षय देराश्री ने 143 लघुचित्र उदयपुर संग्रहालय को भेंट किए जिनमें जयपुर और मालपुरा शैली के चित्र भी प्रमुख हैं। इन लघु चित्रों का काल ई.1630 से ई.1900 तक विस्तृत है। संग्रहालय में सबसे प्राचीन लघुचित्र रसिकप्रिया पर आधारित हैं। इन लघुचित्रों का चित्रकार साहबदीन था जिसकी शैली इतनी स्वभाविक एवं समृद्ध थी कि उस परम्परा का प्रभाव मेवाड़ की कला पर आज भी देखा जा सकता है। महाराणा अमरसिंह (द्वितीय) (ई.1698-1710) के काल के रसिकप्रिया के 47 चित्र संग्रहालय की अमूल्य निधि हैं। कुछ चित्र एकलिंग महात्म्य से सम्बन्धित हैं। कृष्ण द्वैपायन द्वारा लिखित हरिवंश के श्लोकों में आए प्रसंगों को आधार बनाकर, मध्यकाल में चित्र बनाने की परम्परा रही है। इस परम्परा के कुछ चित्र इस संग्रहालय में रखे हैं।

    महाभारत, कृष्णावतार चरित (भागवत), कादम्बरी, रघुवंश, रसिकप्रिया, वेलि कृष्ण रुक्मणि, मालती माधव, गीत गोविन्द, पृथ्वीराज रासो, सूरसागर, बिहारी सतसई एवं पंच-तंत्र पर आधारित लघुचित्र भी उल्लेखनीय हैं। फारसी एवं अरबी ग्रन्थों पर आधारित ‘कलीला-दमना’ और ‘मुल्ला दो प्याजा’ के लतीफों पर आधारित लघुचित्र भी संग्रहालय में संगृहीत हैं। एक चित्रित एलबम ‘दर्शनों की किताब’ के नाम से उपलब्ध है। एक एलबम में मेवाड़ के राणा उदयसिंह से महाराणा भीमसिंह (ई.1778-1828) तक के चित्र हैं। इस एलबम में मीराबाई का चित्र भी महत्वपूर्ण है। प्रति वर्ष लगभग दस हजार देशी एवं डेढ़ हजार विदेशी दर्शक संग्रहालय को देखने आते हैं।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-44

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-44

    पर्यावरणीय संस्कृति की अभिव्यक्ति हैं लोकनाट्य


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    लोकनाट्यों की समृद्ध परंपरा में ख्याल, रम्मत, फड़, नौटंकी, स्वांग, गवरी, गंधर्व-नाट्य, भवाई, तमाशा, आदि प्रमुख हैं। कुचामन, चिड़ावा तथा शेखावाटी के ख्याल, जयपुर क्षेत्र का तमाशा, भरतपुर तथा धौलपुर की नौटंकी एवं लगभग पूरे प्रदेश में दिखाये जाने वाले स्वांग, लीला, फड़, भवाई आदि प्रमुख हैं। भाण्ड, बहरूपिये तथा भोपे आदि एकल लोक नाट्यों के लिये प्रसिद्ध हैं।

    रम्मत

    रम्मत का अर्थ खेल होता है किंतु प्राचीन काल में अभिनीत काव्य रचनाओं को रम्मत कहा जाता था। राजस्थान में बीकानेरी रम्मतें सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। इस खेल को खेलने वाले को खेलार कहा जाता है। सामान्यतः पौराणिक आख्यानों को केंद्र में रखकर रम्मतें खेली जाती हैं। बीकानेर के मनीराम व्यास, फागू महाराज, सूआ महाराज, तुलसीराम आदि रचनाकारों ने रम्मत लोक नाट्य के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। हेडाऊ मेरी री रम्मत, अमरसिंह री रम्मत, सांग मेरी री रम्मत आदि अत्यधिक लोकप्रिय हैं। बीकानेर के अतिरिक्त पोकरण, फलौदी एवं जैसलमेर में भी रम्मत खेली जाती हैं। रम्मत का प्रदर्शन धरातल से थोड़े ऊँचे एवं साज सज्जा युक्त रंगमंच पर किया जाता है। रम्मत आरंभ होने से पहले सारे मुख्य कलाकार मंच पर आकर दर्शकों के सामने आकर बैठ जाते हैं। रम्मत के मुख्य वाद्य नगाड़ा एवं ढोल होते हैं। रम्मत के प्रदर्शन से पूर्व चौमासा गीत, लावणी गीत, गणपति वंदना और रामदेवजी के भजन गाये जाते हैं।

    ख्याल

    जब ओपन थियेटर में नृत्य विधा के साथ नाटक किया जाता है तो उसे ख्याल कहते हैं। इसमें नाटक के सभी तत्व गायन, वादन, नृत्य तथा अभिनय आदि मौजूद रहते हैं। माना जाता है कि आधुनिक नाटक की उत्त्पत्ति ख्याल से ही हुई है। 18 वीं शताब्दी से लोक नाट्य के रूप में ख्याल का प्रचलन आरंभ हुआ। राजस्थान में सैंकड़ों ख्याल खेले जाते थे। राजस्थान में कुचामणी, जयपुरी, तुर्रा कलंगी, हाथरसी, शेखावाटी, अलीबख्शी, किशनगढ़ी, मांची आदि ख्याल लोकप्रिय थे।

    चिड़ावी ख्याल : इसे शेखावाटी ख्याल भी कहते हैं। इसमें अच्छा पद संचालन, सरल भाषा, मुद्रा में गीत गायन, वाद्य यंत्र की उचित संगत होती है। शेखावाटी ख्याल की रचना नानूराम द्वारा की गयी थी। उनके हीर रांझा, हरिश्चंद्र, भृतहरि, जयदेव नामक ख्याल अधिक प्रसिद्ध हुए। इलिया राणा भी शेखावाटी ख्याल के प्रमुख कलाकार हैं।

    तुर्रा कलंगी ख्याल : तुर्रा कलंगी ख्याल का निर्माण शाह अली और तुकनगीर नामक व्यक्तियों द्वारा किया गया था। तुर्रा व कलंगी को हिन्दू व मुसलमान खिलाड़ियों द्वारा प्रस्तुत किया जाता था। शिवदयाल द्वारा नागौरी चतुर सुजाण, सूरत की वन मालन, कंवर रिसालू और राणी बालक दे नामक ख्यालों की रचना की गयी।

    बीकानेर ख्याल : बीकानेर ख्याल भी अत्यधिक लोकप्रिय थे। मोतीलाल एवं गांपीचंद द्वारा अमरसिंह राठौड़ पर आधारित ख्यालों की रचना की गयी। खींवो आभल, हीर रांझा, पूरणमल भगत आदि ख्याल भी बड़े प्रसिद्ध हैं।

    कुचामणी ख्याल : कुचामणी ख्यालों का निर्माण लच्छी राम द्वारा किया गया।

    जयपुर ख्याल : जयपुर ख्यालों में स्त्रियां भी भूमिकाएं करती हैं।

    फड़

    फड़ चित्रकला की एक विशिष्ट शैली होती है जिसे भोपा जाति के व्यक्तियों द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। फड़ का निर्माण 30 फुट लम्बे और 5 फुट चौड़े कपड़े पर किया जाता है। इस कपड़े पर लोक देवता अथवा लोक नायक का जीवन चरित्र चित्रों के माध्यम से लोक शैली में चित्रित किया जाता है। भोपा इस फड़ को दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं तथा भोपी इस फड़ के समक्ष नृत्य करती है। वह जो नृत्य प्रस्तुत करती है उसके बारे में फड़ पर बने चित्र की ओर संकेत करती रहती है। इस समय भोपा भी जंतर मंतर अथवा रावण हत्था बजाता है। पाबूजी की फड़ एवं देवजी की फड़ अत्यधिक प्रसिद्ध हैं। लोक देवता देवनारायण के जीवन चरित्र पर आधारित एक फड़ पश्चिमी जर्मनी के कला संग्रहालय में विद्यमान है।

    नौटंकी

    नौटंकी का खेल प्रायः विवाह समारोह, मांगलिक अवसर, मेले, प्रदर्शनी, त्यौहार एवं सामाजिक उत्सव के समय किया जाता है। यह लोक नाट्य भरतपुर, करौली, धौलपुर, अलवर, सवाई माधोपुर और गंगापुर आदि स्थानों पर अत्यधिक लोकप्रिय है। भरतपुर क्षेत्र में हाथरस शैली की नौटंकी अत्यधिक प्रसिद्ध है। नौटंकी एक पुरानी ख्याल शैली है। इस शैली में मुख्यतः नक्कारे का प्रयोग होता है। उसके साथ शहनाई, सारंगी, ढोलक, डफली, हारमोनियम व चिकारा आदि वाद्ययंत्र भी बजाये जाते हैं। भरतपुर क्षेत्र में नौटंकी पार्टियों द्वारा अमरसिंह राठौड़, आल्हा ऊदल, शियोपोष, शंकरगढ़, इन्द्रलहरण, हरिश्चंद्र-तारामती, माधवानल, कामदेव, सत्यवान-सावित्री, फूलमदे, लैला मजनूं, भक्त पूरणमल आदि के आधार पर नाटकों का प्रदर्शन किया जाता है। नौटंकियों में महिला पात्र भी भाग लेती हैं तथा पुरुष भी महिला पात्रों के वस्त्र पहन कर उनका अभिनय करते हैं। नौटंकी में ख्याल गायकी के संवादों में लावणी, सादी, हाथरसी रंगत, बहरतबील, रसिया, लंगड़ी, दबोला, चौबोला, कव्वाली, गजल, दादरा और ठुमरी आदि की प्रमुखता रहती है।

    स्वांग

    स्वांग लोक नाट्य का एक महत्त्वपूर्ण स्वरूप है। इसके अंतर्गत किसी लोक नायक अथवा देवी, देवता, पौराणिक अथवा ऐतिहासिक पात्र, पौराणिक अथवा ऐतिहासिक कथानक के आधार पर स्वांग रचा जाता है। स्वांग रचने वाले व्यक्ति को बहरूपिया कहा जाता है। राजस्थान में इस लोकनाट्य का प्रारंभ 13-14वीं शताब्दी माना जाता है। मारवाड़ क्षेत्र में रावल जाति के लोग स्वांग रचा करते थे। इस क्षेत्र के स्वांग नाट्यों में चाचा बोहरा, मियां बीवी, जोगी जोगन, कालबेलिया, बीकाजी, मेना गूजरी, सेठ सेठानी और अर्द्धनारीश्वर आदि स्वांगों की प्रधानता थी। भांड एवं भानमती जाति के व्यक्तियों द्वारा स्वांग नाट्य प्रस्तुत किया जाता है। राजस्थान के जानकीलाल भांड ने बहुरूपिया कला को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलायी है। स्वांग नाट्य कला हास्य प्रधान होती है। कलाकार विचित्र भेष धारण करके लोगों का मनोरंजन करते हैं। इस कला को खुले स्थान पर प्रस्तुत किया जाता है। लकड़ी के दो तख्तों पर विभिन्न वाद्ययंत्र रख दिये जाते हैं और स्वांग कलाकार विभिन्न भेष धरकर हास्य संवादों एवं गीतों के माध्यम से लोगों का मनोरंजन करते हैं। भरतपुर क्षेत्र में होली के अवसर पर स्वांग कला का प्रदर्शन किया जाता है। इस अवसर पर स्त्रियां ब्रज रसिया और होली के गीत गाती हैं तथा पुरुषों पर रंग गुलाल की वर्षा और लकड़ी से वार करती हैं।

    रासलीला

    इस लोक नाट्य का मंचन पौराणिक लोक कथाओं के आधार पर किया जाता है। इनमें धार्मिक भावनाओं की प्रधानता होती है। वस्तुतः रासलीला में समस्त नौ रंगों का समावेश पाया जाता है। राधा व कृष्ण की प्रेम लीलाओं को दर्शक अधिक पसंद करते हैं। भरतपुर जिले में रासलीलाओं का आयोजन होता रहता है। इस क्षेत्र में हर गोविंद स्वामी और रामसुख स्वामी के रासलीला मंडल अधिक प्रसिद्ध हैं। इन दोनों दलों द्वारा रासलीला का प्रदर्शन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी किया जाता है। ये दोनों दल ब्रज भाषा में ही रासलीलाओं का प्रदर्शन करते हैं।

    गवरी

    यह मेवाड़ के अरावली क्षेत्र के भीलों की एक नाट्य शैली है। भील जाति के लोग गवरी उत्सव का आयोजन करते हैं। यह उत्सव उदयपुर क्षेत्र में 40 दिनों तक आयोजित किया जाता है। इस अवसर पर भील जाति के लोग एक दिन में एक बार ही भोजन करते हैं। इस कला में स्त्रियों की भूमिका को भी पुरुषों द्वारा निभाया जाता है। गवरी नृत्य का मुख्य नायक एक वृद्ध व्यक्ति होता है जिसे शिव का अवतार माना जाता है। इस नृत्य में खेड़लिया, खेतड़ी, बणजारा, नट-नटी, बादशाह की सवारी आदि प्रसंग महत्त्वपूर्ण होते हैं। यह नृत्य विचित्र वेशभूषा एवं मुद्रा में प्रस्तुत किया जाता है। इस नाट्य के प्रत्येक प्रसंग की समाप्ति पर पुजारी (भोपा) के शरीर में भैरवनाथ का प्रवेश होता है। इस अवसर पर सभी भील एक गोला बनाकर नाचने लगते हैं। गवरी नाट्य शैली राजस्थान की एक विशिष्ट नाट्य शैली है।

    भवाई

    यह नृत्य नाटिका सगोजी और सगीजी (समधी और समधन) के रूप में भोपा और भोपी के द्वारा प्रस्तुत की जाती है। इस नृत्य नाटिका में बीकाजी के खेलों की प्रधानता होती है। इस अवसर पर ढोलक, झांझ और सारंगी आदि वाद्यों और मशाल का प्रयोग किया जाता है।

    तमाशा

    जयपुर नरेश प्रतापसिंह द्वारा तमाशे की परंपरा को आरंभ किया गया। यह लोक नाट्य जयपुर ख्याल और धु्रपद गायकी का मिश्रित रूप है। इसके प्रवर्तक पं. बंशीधर भट्ट हैं। यह लोक नाट्य प्रायः गोपीचंद, हीर रांझा आदि पर आधारित होता है।

    नाट्य

    गंधर्व नाट्य : मारवाड़ क्षेत्र में 'गंधर्व'जाति पायी जाती है। यह जाति पेशेवर नृत्य एवं गायन करती है। इनके द्वारा अंजना सुंदरी और मैना सुंदरी नामक संगीत नाट्यों का प्रदर्शन किया जाता है। यह संगीत नाट्य जैन धर्म पर आधारित होते हैं। अतः जैन समाज के व्यक्ति इन संगीत नाट्यों को अत्यधिक पसंद करते हैं। यह संगीत नाट्य धार्मिक उद्देश्य से खेले जाते हैं।

    बैट्की नाट्य : यह लोक नाट्य जमीन पर बैठकर प्रदर्शित किया जाता है। इस नाट्य को प्रस्तुत करने वाले दो दल आमने-सामने बैठकर छंदबद्ध सवाल जवाब करते हैं। यह नाट्य प्रायः दो रूप में प्रस्तुत किया जाता है। प्रथम प्रेम भाव से तथा द्वितीय जीत हार के भाव से। जीत हार वाले नाट्य में विजयी दल पराजित दल के वाद्ययंत्र प्राप्त कर लेता है। बैट्की नाट्य प्राचीन तुर्रा कलंगी ख्यालों का रूप है।

    दंगली नाट्य : इस लोक नाट्य में लोग सैंकड़ों की संख्या में दो दलों में आमने सामने खड़े हो जाते हैं और बारी बारी से नाचते हुए किसी कथा अथवा समसायिक घटना को काव्य शैली में प्रारंभ करते हैं। ऐसे लोक नाट्य को संगीत दंगल भी कहा जाता है। दंगली नाट्यों में कन्हैया, हेला, भेंट और ढपली ख्याल के दंगल अत्यधिक लोकप्रिय हैं। करौली क्षेत्र कन्हैया के दंगल और धौलपुर का बाड़ी-बसेड़ी क्षेत्र भेंट के दंगल के लिये प्रसिद्ध है।

    सवारी नाट्य : सवारी अथवा जुलूस के रूप में नाट्य प्रदर्शन राजस्थान की एक प्राचीन परंपरा है। यह नाट्य धार्मिक एवं पौराणिक आख्यानों पर आधारित होता है। सांगोद का न्हाण, चित्तौड़ जिले के बसी गाँव का गणेश, ब्रह्मा, कालिया, काला गोरा देव, नृसिंहावतार तथा जयपुर के गीजगढ़ में नृसिंह-प्रहलाद, नारद, शुक्राचार्य, महादेव तथा कादरा भूतरा के स्वांग आदि सवारी नाट्य अधिक लोकप्रिय हैं। रामलीलाओं की सवारी का आयोजन पूरे राजस्थान में किया जाता है। भरतपुर जिले के जुरहरा नामक स्थान की रामलीला सवारी अत्यधिक प्रसिद्ध है।

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  • अध्याय - 8 सिटी पैलेस म्यूजियम उदयपुर

     02.06.2020
    अध्याय - 8 सिटी पैलेस म्यूजियम उदयपुर

    अध्याय - 8 सिटी पैलेस म्यूजियम, उदयपुर


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    उदयपुर के राजमहलों की नींव महाराणा उदयसिंह (द्वितीय) (ई.1540-72) ने ई.1559 में रखी। इसे सजाने-संवारने में मेवाड़ राजघराने की 24 पीढ़ियों का अनवरत योगदान रहा है। वर्तमान में यह परिसर 1800 फुट लम्बा तथा 800 फुट चौड़ा है, इसकी सर्वाधिक ऊँचाई 105 फुट है। राजमहल का एक हिस्सा ‘मर्दाना महल’ कहा जाता है। इसे महाराणा भगवत सिंह मेवाड़ ने ई.1969 में संग्रहालय का रूप दिया। ई.1971 के पश्चात् इससे सटे ‘जनाना महल’ को भी इसके साथ जोड़कर संग्रहालय का विस्तार किया गया। यह संग्रहालय 1028 फुट लम्बा एवं 300 फुट चौड़ा है। सिटी पैलेस का ऐतिहासिक भवन वास्तुकला का एक अनूपम उदाहरण है। इसमें शुद्ध भारतीय शैली से लेकर मुगल एवं ब्रिटिश शैली का सुन्दर समायोजन देखा जा सकता है, इस कारण यह वास्तुशास्त्र के विद्यार्थियों के लिए अध्ययन का प्रमुख केन्द्र भी है।


    सिटी पैलेस म्यूजियम का प्रथम प्रवेश द्वार ‘बड़ीपोल’ के नाम से जाना जाता है। इसका निर्माण महाराणा अमर सिंह (प्रथम) (ई.1597-1620) ने करवाया था। इसके निकट स्थित बुकिंग काउण्टर से संग्रहालय में प्रवेश करने के लिए टिकिट प्राप्त किये जाते हैं। बड़ी पोल के ठीक सामने तीन पोलों वाला ‘त्रिपोलिया’ स्थित है, जिसे महाराणा संग्राम सिंह (द्वितीय) (ई.1710-34) ने बनवाया था। इससे आगे ‘माणक चौक’ है। इसी चौक के दाईं ओर के महल को संग्रहालय के रूप में प्रयुक्त किया गया है। संग्रहालय में प्रवेश ‘दरीखाने की पोल’ से होकर किया जाता है।

    इस पोल से आगे बढ़ने पर बाईं ओर ‘सभा शिरोमणि का दरीखाना’ है, जहाँ महाराणाओं के दरबार लगा करते थे तथा दाईं ओर ‘सलेहखाना’ (शस्त्रागार) स्थित है। इसकी स्थापना महाराणा सज्जन सिंह (ई.1874-84) के राज्यकाल में हुई। इसमें महराणाओं के निजी उपयोग के शस्त्रास्त्र- तलवारें, ढालें, छुरियां, कटारें, बन्दूकें, पिस्तोलें आदि प्रदर्शित की गई हैं। इससे आगे बढ़ने पर ‘गणेश चौक’ आता है। इसके उत्तर पूर्वी कोने में गणेश ड्योढ़ी स्थित है। यहाँ स्थापित गणेश एवं लक्ष्मी की सुन्दर प्रतिमाओं के चारों ओर रंगीन कांच की पच्चीकारी का काम किया गया है। यहाँ से सीढ़ियां चढ़कर ‘राय आंगन’ में प्रवेश किया जाता है।

    राय आंगन के पश्चिम में गोस्वामी प्रेमगिरी की धूणी (नव चौकी महल) है, इन्हीं के आशीर्वाद से महाराणा उदयसिंह (ई.1540-72) ने उदयपुर नगर की स्थापना की थी। यहीं पर महाराणाओं का राजतिलक होता आया है। जबकि पूर्व दिशा में ‘नीका की चौपाड़’ एवं प्रताप कक्ष है। प्रताप कक्ष में महाराणा प्रताप (ई.1572-97) के अस्त्र-शस्त्रों को प्रदर्शित किया गया है। नीका की चौपाड़ और इससे संलग्न कक्षों में महाराणा प्रताप से सम्बन्धित बड़े-बड़े तैल चित्र लगे हैं जो हिन्दुआ सूर्य प्रताप की गौरव गाथा कहते हैं।

    नवचौकी महल से सीढ़ी चढ़कर ऊपर जाने पर चंद्रमहल आता है। इसमें एक ही पत्थर का बना सफेद संगमरमर का कुंड है। महाराणा के राजतिलक के समय इस कुंड को चांदी के एक लाख सिक्कों से भरा जाता था। इस कारण इसे ‘लक्खु कुंड’ कहा जाता है। ये सिक्के पास ही स्थित ‘लक्खु गोखड़े’ से प्रजा को लुटाए जाते थे। इस भवन के आगे शिव प्रसन्न अमर विलास महल (बाड़ी महल) में पहुंचा जाता है। यह महल श्वेत संगमरमर से निर्मित है। इसमें बना मुगल शैली का चारबाग (उद्यान) कुण्ड एवं फव्वारे पर्यटकों को बरबस ही आकर्षित करते हैं। यहाँ लगे विशाल वृक्ष एवं सुगन्धित फूलों के पौधे पर्यटकों का मन मोह लेते हैं। यहीं एक कक्ष में महाराणा फतहसिंह (ई.1884-1930) का चित्र और उसके पास ही वह ऐतिहासिक कुर्सी रखी हुई है जो 12 दिसम्बर 1911 को ब्रिटिश सम्राट जार्ज पंचम द्वरा आयोजित इम्पीरियल दरबार में महाराणा फतहसिंह के लिए लगायी गई थी। महाराणा अपने कुलाभिमान एवं किसी शासक के आगे सर नहीं झुकाने की अपनी गौरवशाली वंश परम्परा के कारण दिल्ली जाकर भी इस दरबार में उपस्थित नहीं हुए थे।

    बाड़ी महल के दक्षिण में स्थित द्वार से ‘दिलखुशाल महल’ में जाया जाता है। इस परिसर में मेवाड़ शैली के कई चित्र लगे हैं, जिनमें महाराणाओं के विभिन्न अवसरों पर बनाए गए चित्र प्रदर्शित किये गए हैं। दिलखुशाल महल के उत्तर में स्थित ‘कांच की बुर्ज’ में दीवारों और छत पर रंगीन कांच का आकर्षक कार्य किया गया है वहीं दक्षिण में स्थित ‘चित्राम की बुर्ज’ में महाराणा संग्राम सिंह (द्वितीय) (ई.1710-34) एवं महाराणा भीमसिंह (ई.1778-1828) द्वारा उत्सवों, सवारियों और त्यौहारों के सुन्दर भित्तिचित्रों का अंकन करवाया गया है, इन चित्रों में मेवाड़ के प्राचीन वैभव की झलक मिलती है।

    इससे आगे बढ़ने पर ‘चीनी चित्रशाली’ है जिसमें डेल्फ तथा पुर्तगाली ब्लू टाइलें जड़ी हुई हैं। यहाँ से उदयपुर का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। इसके उत्तर में स्थित ‘वाणी विलास’ महाराणा सज्जन सिंह (ई.1874-84) द्वारा स्थापित पुस्तकालय का कक्ष है तथा दक्षिण में ‘शिव विलास’ स्थित है। शिव विलास के उत्तर में मदन विलास है जिसमें कर्नल जेम्स टोड के चित्र तथा उससे सम्बन्धित सामग्री प्रदर्शित की गई है। यहीं किशन विलास सात ताका नामक महल भी है, जिसकी दीवारों के नीचे एक पट्टी में सुन्दर ग्लास इन्ले वर्क के साथ काले कागज़ पर सुनहरी चित्रांकन किया गया है। यहीं उत्तरी दीवार की खिड़कियों से पिछोला झील का मनोरम दृश्य दिखाई देता है।

    इसके आगे संकरे गलियारों और घुमावदार सीढ़ियों से होते हुए ‘मोर चौक’ तक पहुंचा जा सकता है। इस बीच मोती महल, भीम विलास, सूर्य प्रकाश गैलेरी और पीतम निवास आते हैं, इनमें भी रंगीन कांच की पच्चीकारी का काम दर्शनीय है। पीतम निवास ई.1955 तक महाराणा भूपाल सिंह (ई.1930-55) का निवास स्थान रहा, इसे उसी रूप में अब तक संरक्षित रखा गया है। यहाँ से नीचे सीढ़ियां उतरकर सूर्य चौपाड़ आती है इसमें स्वर्ण मुलम्मा चढ़ा सूर्य लगा हुआ है। ऐसा ही एक सूर्य पूर्व में स्थित सूर्य गोखड़े में लगा है। इस कक्ष में दीवारों के नीचे एक पट्टी में आराई के उभरमा अंकन पर सुन्दर चित्रकारी की गई है।

    इसके आगे छोटी चित्रशाली है जिसमें महाराणा अपने अतिथियों का स्वागत-सत्कार करते थे। यहीं आमोद-प्रमोद के लिए गायन वादन के आयोजन होते थे। इसके आगे मोर चौक है जिसमें रंगीन कांच की बारीक कतरनों के ‘इन्ले वर्क’ से मोरों का निर्माण किया गया है। इस चौक की सम्पूर्ण पूर्वी दीवार कांच की कारीगरी का अनूठा दृश्य उपस्थित करती है। इस चौक के उत्तर में स्थित माणक महल भी रंगीन कांच की कारीगरी के लिए पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है।

    इससे आगे संकरे गलियारे से होते हुए ‘जनाना महल’ में जाया जा सकता है। यहाँ सबसे पहले शरबत विलास एवं ब्रज विलास आते हैं, यह महाराणा भूपाल सिंह की तृतीय महाराणी का निवास स्थान था, इसे भी अब तक अपने पुराने रूप में ही संरक्षित किया हुआ है। यहाँ उनकी दैनिक उपयोग की वस्तुओं को प्रदर्शित किया गया है। यहीं से कुछ दूरी पर भूपाल विलास है, यहाँ महाराणियाँ अपने अतिथियों से भेंट एवं स्वागत-सत्कार करती थीं, इसे भी उसी रूप में संरक्षित रखा गया है।

    महाराणा मेवाड़ चैरिटेबल फाउण्डेशन के अध्यक्ष एवं प्रबन्ध न्यासी श्रीजी अरविन्द सिंह मेवाड़ संग्रहालय को विश्वस्तरीय पहचान दिलाने में निरन्तर प्रयत्नशील हैं। सम्पूर्ण महल के कायाकल्प के साथ जनाना महल में विभिन्न गैलेरियों (वीथिकाओं) का निर्माण करवाया गया है। इनमें मेवाड़ के गौरवशाली अतीत की संस्कृति से पर्यटकों का साक्षात्कार होता है। इन अलग-अलग वीथिकाओं में मूर्तियां, वस्त्र, वाद्य यंत्र, पालकियाँ एवं म्यानें, मेवाड़ शैली के चित्र तथा छायाचित्र कलात्मक ढंग से सजाए गए हैं। अमर महल में स्थित रजत वीथिका दर्शकों के आकर्षण का केन्द्र है, इसमें महाराणाओं एवं उनके आराध्य देवों के उपयोग में ली जाने वाली चांदी की वस्तुओं को प्रदर्शित किया गया है, इनमें चांदी की बग्गी, हाथी का हौदा, पालकी एवं हाथी-घोड़ों के आभूषण विशेष दर्शनीय हैं।

    यहाँ से मौती चौक होते हुए तोरण पोल पहुंचकर संग्रहालय दर्शन पूरा होता है। तोरण पोल पर राजपरिवार में होने वाले विवाहों के अवसर पर तोरण बांधा जाता है। इसके अतिरिक्त भी सिटी पैलेस संग्रहालय में देखने को बहुत कुछ है। प्रतिवर्ष लाखों देशी-विदेशी पर्यटक उदयपुर भ्रमण के लिए आते हैं, इनमें से अधिकांश सिटी पैलेस संग्रहालय देखने आते हैं।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-45

     19.05.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-45

    पर्यावरणीय चेतना की द्योतक राजस्थान की विशिष्ट लोककलाएं


    राजस्थान की मूर्तिकला, चित्रकला, नृत्यकला तथा संगीतकला के अतिरिक्त कुछ विशिष्ट लोककलाएं भी राजस्थान के जनजीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं तथा राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति को विशिष्ट आकार प्रदान करती हैं। ये लोककलाएं हैं- पथवारी, पाना, फड़, मांडणा, रंगोली, मेहंदी, सांझी, कावड़, वील तथा गोदणा।

    पथवारी

    गाँवों में पथ रक्षक के रूप में पूजा जाने वाला स्थल जिस पर चित्र बने होते हैं, उसे पथवारी कहते हैं। धार्मिक यात्रा पर जाते समय तथा वहाँ से लौटकर आते समय पथवारी की पूजा होती है।

    पाना

    राजस्थान में कागज पर बने देवी देवताओं के चित्रों को पाना कहा जाता है जैसे गणेशजी का पाना, लक्ष्मीजी का पाना आदि। श्रीनाथजी का पाना सबसे अधिक कलात्मक होता है जिसमें श्रीनाथजी के चौबीस शृंगारों का चित्रण किया जाता है।

    फड़

    कपड़े पर किये गये चित्रांकन को फड़ कहते हैं। छींपा जाति के जोशी, ज्योतिषी एवं चितरों द्वारा इसका चित्रांकन किया जाता है। भीलवाड़ा जिले के शाहपुरा कस्बे में फड़ बनाई जाती हैं। सामान्यतः इसका आकार 5 फुट चौड़ा एवं 24 फुट लम्बा होता है। पाबूजी की फड़ सबसे अधिक प्रसिद्ध है। देवनारायणजी की फड़ सबसे अधिक लम्बी है।

    मांडणा

    मांडणा का अर्थ होता है चित्रित अथवा लिखित। वस्तुतः ये मांगलिक चित्र हैं जो घर के आंगन तथा द्वार पर बनाये जाते हैं। ये श्री एवं समृद्धि के प्रतीक हैं। सबसे छोटा मांडणा स्वास्तिक चिह्न होता है। यह गणेशजी का प्रतीक है। इसका प्रयोग स्वतंत्र रूप से अथवा अन्य माण्डणों के साथ किया जाता है। स्वास्तिक के अतिरिक्त जिस माण्डणे का सर्वाधिक प्रयोग किया जाता है, वह है- पद चिह्न। ये लक्ष्मीजी के चरण कमल हैं। ये पद चिह्न घर की तरफ आते हुए प्रदर्शित किये जाते हैं। इसका भाव यह है कि लक्ष्मीजी घर में प्रवेश कर चुकी हैं तथा उनके चरण चिह्न यहाँ अंकित हैं। इस सम्बन्ध में एक लोककथा कही जाती है- एक स्त्री के सात बेटे व बहुएं थीं। दीपावली के दिन छोटी बहू लिपाई पुताई करके मांडणे मांडने बैठी ही थी कि लक्ष्मीजी का आगमन हो गया। बहू ने लक्ष्मीजी की आवभगत की, उन्हें आसन दिया और कहा कि आप विराजें मैं मांडणे पूरे करके आती हूँ। बहू सारी रात मांडणे मांडती रही और लक्ष्मीजी वहीं रह गयीं। वहीं उनका वास हो गया। इसीलिये लक्ष्मीजी के पदचिह्न दीपावली पर अवश्य बनाये जाते हैं।

    मांडणे बनाने के लिये सफेद खड़िया, हिरमिच या गेरू का प्रयोग किया जाता है। खड़िया, हिरमिच या गेरू को पानी में भिगोकर घोल तैयार किया जाता है और लकड़ी में कपड़ा बांध कर ब्रुश तैयार किया जाता है। अनामिका (कनिष्का के पास वाली अंगुली) पर कपड़े की पट्टी बांध कर उसे घोल में डुबोकर भी मांडणे बनाये जाते हैं। भित्ति चित्रों वाले सिद्धांत को मानते हुए गोबर तथा मिट्टी से लिपे आंगन के सूखने से थोड़ा पहले ही मांडणों का चित्रांकन किया जाता है। सूखे फर्श पर रंग अच्छी तरह से नहीं जमते। मांडणों का निश्चित विधान है। इन्हें केंद्र से आंरभ करते हैं और आगे बढ़ते हैं। इनकी कुछ इकाइयां हैं जिनसे मांडणे के आकार को छोटा या बड़ा किया जाता है। तरह-तरह के पुष्प (इन्हें फलड़ियां कहा जाता है), स्वस्तिक (इन्हें सथिए कहा जाता है), पान, हटड़ी, चौक, गलीचा, चौपड़, डमरू, दीपक, बीजाणी (पंखे), जलेबी, चंग (एक तरह का वाद्य), गायों के खुर तथा विविध जोड़ के मांडणे बनाये जाते हैं। बेलों में फूल की बेल, बीजणी की बेल, सकरपारे की बेल, डमरू की बेल, पान की बेल व लड्डू की बेल बनायी जाती हैं।

    किनारों पर कई प्रकार के झंवर (पतले कंगूरे) और खाली त्रिभुजों, चतुर्भुजों को भरने के लिये चीरण के अनगिनत प्रकार बनते हैं। सथिए और पगल्ये सभी शुभ अवसरों पर बनाये जाते हैं। विशिष्ट त्यौहारों से जुड़े मांडणे भी हैं। जैसे दीपावली पर लक्ष्मीजी की पगल्ये, दीपक, दीपक का चौक, साट्या का जोड़ (स्वस्तिक का संयोजन), बीजणी, चौक, चौपड़ आदि। श्रावण की हरियाली तीज पर तरह-तरह की फलड़िएं और उनके संयोजन- सात फूल, पाँच फूल आदि तथा नाग पंचमी पर नागों का जोड़ा बनता है। संक्रांतिपर फीणी का अलंकरण बनाने का विधान है। चैत्र नवरात्रि पर माता, शीतला, होली पर चंग और बीजणी तथा मेहमानों के स्वागत के लिये बैलगाड़ी, रथ, हटड़ी, चौक, पगल्ये और सथिये बनते हैं। हाड़ौती और ढूंढार क्षेत्र में सफेद खड़िया और गेरू से ही अंकन किया जाता है। पश्चिमी राजस्थान में नीले और भूरे रंगों का भी प्रयोग होता है। सवाई माधोपुर जिले की मीणा स्त्रियां अपने घरों की दीवारों पर पशु-पक्षियों के विभिन्न प्रकार के चित्रण करती हैं। बाड़मेर का मोरिया (मोर) अलग ढंग का होता है।

    बाड़मेर जिले के जयनारायण दवे ने राजस्थान के माण्डणों के संरक्षण तथा माण्डणों से जुड़े विविध पक्षों को जनसामान्य के समक्ष लाने के लिये काफी कार्य किया है।

    रंगोली

    सामाजिक, सांस्कृतिक एवं पारिवारिक मंगल अवसरों पर विभिन्न सूखे रंगों के द्वारा इसे घर के बाहर, दरवाजे के पास, आंगन में तथा अन्य खुले स्थानों पर बनाया जाता है। राजस्थान में विभिन्न संस्थायें इस कला को प्रोत्साहित करने के लिये लड़कियों के बीच रंगोली बनाने की प्रतियोगितायें आयोजित करवाती हैं।

    मेहंदी

    मेहंदी का प्रयोग पश्चिमी भारत की महिलाएं शृंगार के लिये करती हैं। मांगलिक अवसरों पर कुमारी कन्यायें और सुहागिन स्त्रियां हाथ-पांवों में मेहंदी लगाती हैं। मेहंदी एक प्रकार की झाड़ी है जिसके पत्तों को पीसकर लेई (पेस्ट) बना लेते हैं और उसे हाथ-पांवों पर लगाते हैं। थोड़़ी देर में वह स्थान जहाँ मेहंदी लगी होती है, लाल हो जाता है। मेहंदी का प्रयोग भारतीय चिकित्सा पद्धति में प्राचीन काल से होता था पर शृंगार के लिये इसका उपयोग मध्यकाल से आरंभ हुआ और जन-जीवन का अंग बन गया। आज कोई भी मांगलिक कार्य बिना मेहंदी के संपन्न नहीं होता। राजस्थान में सोजत की मेहंदी प्रसिद्ध है। उसकी रंगत अच्छी होती है। विशिष्ट अवसरों के लिये विशेष अलंकरणों का विधान है। होली पर चंग, दीपावली पर गलीचा तथा गणगौर पर गुणा बनाते हैं। सावन में स्त्रियां लहरिया की ओढ़नी ओढ़ती हैं और अपनी हथेली पर लहरिया का अलंकरण बनाती हैं। तीज पर घेवर की आकृति बनायी जाती है।

    सांझी

    सांझी बनाने की परंपरा भगवान श्रीकृष्ण ने आरंभ की। एक बार राधाजी रूठ गयीं। कृष्णजी उन्हें मनाने का कोई उपाय नहीं कर पाये। सारा दिन बीत गया किंतु राधारानी रूठी ही रहीं। तब भगवान ने जगन्माया राधाजी को रिझाने के लिये सांझ के समय पृथ्वी पर फूल और पत्तियों से राधाजी का चित्र बनाया। तभी से सांझी बनाने की परंपरा चल पड़ी। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्यप्रदेश तथा दिल्ली के क्षेत्र में सांझी को देवी माना जाता है। यह राधिकाजी का लौकिक रूपांतरण है।

    राजस्थान में सांझी बनाने की परंपरा वृंदावन से आयी। जब श्रीनाथजी नाथद्वारा पधारे तो उनके पुजारी वृंदावन के मंदिरों की भांति नाथद्वारा में सांझी बनाने लगे। वंृदावन के पुजारी जहाँ-जहाँ गये, सांझी बनाने की परंपरा अपने साथ ले गये। राजस्थान में सांझी पितृपक्ष में बनायी जाती है। कुमारी कन्यायें दीवार पर गोबर से सांझी बनाती हैं और उसे आटा हल्दी, कुंमुम तथा कौड़ियों से सजाती हैं। पितृपक्ष के पहले दस दिन तक सांझी के रूप एवं सज्जा में परिवर्तन किया जाता है। ग्यारहवें दिन बड़ी सांझी बनायी जाती है जिसे अमावस्या तक सुरक्षित रखा जाता है। सांझी के केंद्र में देवी बनायी जाती है तथा उसके चारों ओर विविध प्रकार की आकृतियां बनायी जाती हैं। इन आकृतियों में लड़कियां अपने भाई का चित्र बनाती हैं तथा यह कामना करती हैं कि भाई का अमंगल न हो। घर में समृद्धि के लिये डाल पर बैठे तोते बनाये जाते हैं। दाम्पत्य जीवन सुखी रहे इसके लिये चौपड़ बनाया जाता है। घर में चोरी न हो, इस कामना से उल्टा चोर बनाया जाता है। कंघा, पंखा, हुक्का, दर्पण, ढोलक, बैण्डबाजा तथा फूल-पत्तियां बनायी जाती हैं। श्रीनाथजी के मंदिर में केले के पत्तों की सांझी बनायी जाती है। इस सांझी में मथुरा तथा वृंदावन के विविध दृश्य अंकित किये जाते हैं।

    कावड़

    यह मंदिर जैसी काष्ठ कलाकृति होती है। कावड़ पर बने आकर्षक एवं रंगीन धार्मिक चित्रों के माध्यम से पौराणिक कथाओं का वाचन किया जाता है। चित्तौड़गढ़ जिले के बस्सी कस्बे में कावड़ें बनाई जाती हैं।

    वील

    ग्रामीण अंचलों की महिलायें घर सजाने तथा दैनिक उपयोग कीचीजों को सुरक्षित रखने के लिये मिट्टी की महलनुमा कलाकृतियां बनाती हैं। बोलचाल की भाषा में इन्हें वील कहा जाता है। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक प्राचीन घरों में एक से बढ़कर एक प्राचीन वील देखी जा सकती हैं। नवनिर्मित मकानों में इनका चलन कम हो गया है। इस कारण यह कला लुप्त होती जा रही है। एक साधारण वील बनाने में औसतन बीस से पच्चीस दिन लगते हैं परंतु वील शैली पर आधारित महल बनाने में दो माह से भी अधिक समय लगता है।

    वील बनाने के लये बांस की पतली-पतली खपच्चियों को धागे से बांध कर किसी दीवार के सहारे ढांचा खड़ा किया जाता है। उसके बाद चिकनी मिट्टी में घोड़े की लीद मिलाकर उसे ढांचे पर चिपका देते हैं। इसके लिये मिट्टी और सूखी हुई लीद को खूब बारीक कूट कर गूंदा जाता है। घोड़े की लीद मिलाने से मिट्टी तड़कती नहीं है। लीद के अभाव में ऊँट के मींगणे मिलाये जाते हैं। इस तरह से तैयार वील को कांच के छोटे-छोटे टुकड़ों से अलंकृत किया जाता है। इसकी सुंदरता बढ़ाने के लिये इसमें कई छोटे-छोटे गवाक्ष, जालियां और कंगूरे बनाये जाते हैं। परंपरागत वीलों पर सफेद रंग का प्रयोग किया जाता है किंतु उनके सौंदर्य में अभिवृद्धि के लिये कहीं-कहीं अभ्रक मिश्रित पीला रंग भी पोत दिया जाता है। पुताई के लिये मंूज की बनी कूंची, पुराने झाड़ू, और कहीं-कहीं बेकार कपड़े का टुकड़ा भी काम में लिया जाता है। रंगों के लिये लाल, पीली और सफेद मिट्टी का ही उपयोग किया जाता है।

    गोदना

    शरीर पर गोदना गोदने की कला का आरंभ भगवान श्रीकृष्ण ने किया था। वे संसार के सबसे पहले गोदना गोदने वाले थे। उन्होंने अपनी चिर किशोरी प्रेमिका महामाया राधिकाजी के शरीर पर स्मृति चिह्न गोदा। तब से मानव देह पर गोदना गोदने की परम्परा चल पड़ी। ग्रामीण संस्कृति में गोदना गुदवाना, नारी की शरीर सज्जा का महत्त्वपूर्ण एवं सजीव अंग है। आजकल के हलचल भरे युग में भी गोदना गुदवाना ग्रामीण नारी का प्रिय अलंकरण है। अपनी देह पर अपने आराध्य देव, प्रेमी, पति, पशु-पक्षी आदि का अंकन ग्रामीण एवं आदिवासी महिलाओं में काफी लोकप्रिय है। आदिवासी महिलाओं में इस बात की प्रतिस्पर्धा होती है कि किसके शरीर पर आकर्षक गोदने गुदे हैं।

    पुरुष भी अपने शरीर पर विभिन्न देवताओं, प्रेमिका, पत्नी या वांछित भावांकन को गुदवा गुदवा कर संतोष पाते हैं। राजस्थान के ग्रामीण अंचल में अनेक समुदाय तथा जातियों में गोदना करा कर देह सजाना सामाजिक परंपरा है। इसके मूल में लोक विश्वास यह है कि मृत्यु के बाद सोने चांदी के कीमती आभूषण इस नश्वर संसार में छूट जाते हैं किंतु गोदना ही एकमात्र आभूषण है जो मृत्यु के बाद भी स्त्रियों के पास रहता है। गूजर, भील, बंजारा, मीणा, कालबेलिया और बागरिया आदि जाति की महिलाएं अपनी देह के विभिन्न अंगों- बांह, छाती, पैर, ललाट, नेत्र, कपोल आदि पर गोदना गुदवाती हैं। गोदने का कार्य अधिकतर नट जाति के स्त्री-पुरुष करते हैं। मेले आदि में तो वे इस कार्य से कमा ही लेते हैं साथ ही गाँव-गाँव में घूमकर भी गोदना गोदने का कार्य करते हैं।

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