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  • राजस्थान के प्रमुख संग्रहालय - अनुक्रमणिका

     02.06.2020
    राजस्थान के प्रमुख संग्रहालय - अनुक्रमणिका

    राजस्थान के प्रमुख संग्रहालय 

    लेखक: डॉ. मोहनलाल गुप्ता


    संग्रहालयों का इतिहास


    1. संग्रहालय की अवधारणा का विकास

    2. राजस्थान के संग्रहालयों की आधारभूत सामग्री

    3. पुरावशेष संग्रहण में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का योगदान

    4. राजस्थान में संग्रहालयों की स्थापना का इतिहास


    राज्य में सरकारी क्षेत्र के प्रमुख संग्रहालय एवं अभिलेखागार

    अजमेर संभाग के संग्रहालय

    6. राजकीय संग्रहालय, अजमेर

    उदयपुर संभाग के संग्रहालय

    7. राजकीय संग्रहालय, उदयपुर

    8. सिटी पैलेस म्यूजियम, उदयपुर

    9. क्रिस्टल गैलेरी, उदयपुर

    10. विंटेज कार संग्रहालय, उदयपुर

    11. जनजाति संग्रहालय, उदयपुर

    12. पुरातत्व संग्रहालय, उदयपुर

    13. लोककला संग्रहालय, उदयपुर

    14. राजकीय संग्रहालय, आहाड़

    15. बागोर की हवेली संग्रहालय, उदयपुर

    16. महाराणा प्रताप संग्रहालय, हल्दीघाटी

    17. शिल्पग्राम संग्रहालय, उदयपुर

    18. वैक्स म्यूजियम, उदयपुर

    19. बी. जी. शर्मा चित्रालय, उदयपुर

    20. राजकीय संग्रहालय, चित्तौड़गढ़

    21. राजमाता देवेन्द्र कुंवर राजकीय संग्रहालय, डूंगरपुर

    कोटा संभाग के संग्रहालय

    22. राजकीय संग्रहालय, कोटा

    23. राव माधोसिंह ट्रस्ट संग्रहालय, कोटा

    24. राजकीय संग्रहालय, झालावाड़

    जयपुर संभाग के संग्रहालय

    25. केन्द्रीय संग्रहालय: अल्बर्ट म्यूजियम, जयपुर

    26. वैक्स म्यूजियम, नाहरगढ़, जयपुर

    27. राजकीय संग्रहालय, हवामहल

    28. प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय, जयपुर

    29. महाराजा मानसिंह संग्रहालय: सिटी पैलेस, जयपुर

    30. जवाहर कला केन्द्र, जयपुर

    31. आधुनिक कला संग्रहालय, जयपुर

    32. श्री रामचरण प्राच्य विद्यापीठ एवं संग्रहालय, जयपुर

    33. दिलाराम बाग संग्रहालय, आमेर

    34. गुड़िया एवं कठपुतली संग्रहालय, जयपुर

    35. श्री संजय शर्मा संग्रहालय, जयपुर

    36. जयपुर के कतिपय विशिष्ट संग्रहालय

    37. बिड़ला साइंस म्यूजियम, जयपुर

    38. राजकीय संग्रहालय, अलवर

    39. राजकीय संग्रहालय, विराटनगर

    40. श्री राजकुमार हरदयाल सिंह राजकीय संग्रहालय, सीकर

    41. बिड़ला तकनीकी संग्रहालय, पिलानी

    42. ज्योतिष यंत्र संग्रहालय, जयपुर

    जोधपुर संभाग के संग्रहालय

    43. सरदार राजकीय संग्रहालय, जोधपुर

    44. राजकीय संग्रहालय, मण्डोर

    45. मेहरानगढ़ दुर्ग, संग्रहालय, जोधपुर 46. छीतर पैलेस संग्रहालय, जोधपुर

    47. लोकवाद्य संग्रहालय, जोधपुर

    48. अरणा-झरणा मरुस्थल संग्रहालय, जोधपुर

    49. राजकीय संग्रहालय आबू पर्वत

    50. श्री बांगड़ राजकीय संग्रहालय, पाली

    51. राजकीय संग्रहालय, जैसलमेर

    52. लोक-सांस्कृतिक संग्रहालय: जैसलमेर

    53. युद्ध संग्रहालय, जैसलमेर

    54. नेशनल वुडन फॉसिल पार्क, जैसलमेर

    बीकानेर संभाग के संग्रहालय

    55. गंगा-गोल्डन जुबली संग्रहालय, बीकानेर

    56. करणी संग्रहालय, बीकानेर

    57. सार्दूल संग्रहालय, बीकानेर

    58. प्राचीना, बीकानेर

    59. सर छोटूराम स्मारक संग्रहालय, संगरिया

    60. पुरातत्व संग्रहालय, कालीबंगा

    61. नाहटा कला संग्रहालय, सरदारशहर

    62. भित्तिचित्रों की ओपन आर्ट गैलेरी: शेखावाटी की हवेलियाँ

    भरतपुर संभाग के संग्रहालय

    63. राजकीय संग्रहालय, भरतपुर

    64. राजकीय संग्रहालय, डीग

    राजस्थान के विज्ञान केन्द्र एवं संग्रहालय

    65. राजीव गांधी क्षेत्रीय प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय

    66. राजस्थान के विज्ञान केन्द्र एवं संग्रहालय

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-36

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-36

    कृषि-उपज एवं पशु-धन पर आधारित उद्योगों की स्थापना


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राज्य में कृषि-उपज एवं पशु-धन पर आधारित छोटे-बड़े सैंकड़ों उद्योग विकसित एवं उन्नत अवस्था में हैं जिनसे लाखों परिवारों को रोजगार प्राप्त होता है।


    कृषि-उपज आधारित उद्योग

    कृषिगत कच्चे माल पर आधारित उद्योग, इस श्रेणी में आते हैं। राजस्थान में खाद्यान्न पर आधारित बेकरी, कन्फेक्शनरी इकाइयां तथा तथा अन्य फूड प्रोसेसिंग इकाइयां लगी हुई हैं। तिलहन पर आधारित तेल मिलें, वनस्पति घी मिलें व साबुन निर्माण इकाइयां लगायी गयी हैं। दलहन पर आधारित दाल मिलें, कपास पर आधारित कॉटन जिनिंग मिलें एवं सूती कपड़ा मिलें, गन्ना एवं चुकंदर पर आधारित चीनी मिलें, ग्वार पर आधारित ग्वार गम मिलें आदि उद्योग लगे हुए हैं। राज्य में कृषि पर आधारित प्रमुख उद्योगों में सूती वस्त्र उद्योग, शक्कर उद्योग, वनस्पति घी एवं तेल उद्योग तथा ग्वार गम उद्योग हैं।

    कॉटन जिनिंग एण्ड प्रेसिंग इण्डस्ट्री

    कपास में से बिनौलों को अलग करना जिनिंग कहलाता है। यह काम छोटी मशीनों द्वारा किया जाता है। राजस्थान में बड़े स्तर पर कपास का उत्पादन होता है। इस कारण राज्य के कई जिलों यथा श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, भीलवाड़ा आदि में कॉटन जिनिंग एण्ड प्रेसिंग यूनिट्स बड़ी संख्या में लगी हुई हैं।

    सूती वस्त्र उद्योग

    राजस्थान के निर्माण उद्योगों में यह सबसे प्राचीन एवं संगठित उद्योग है। इस उद्योग से ग्रामीण जनसंख्या को सर्वाधिक रोजगार प्राप्त होता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय राज्य में 7 सूती वस्त्र मिलें थीं। वर्तमान में राज्य में कुल 28 सूती वस्त्र मिलें हैं जिनमें से 17 निजी क्षेत्र में, 7 संयुक्त क्षेत्र में, 4 सहकारी क्षेत्र में तथा 3 मिलें राष्ट्रीय कपड़ा निगम के अधीन हैं। इनमें से 23 कताई मिलें तथा 5 कम्पोजिट मिलें हैं। राज्य का 75 प्रतिशत कपास क्षेत्र गंगानगर एवं हनुमानगढ़ जिले में है जहाँ राज्य का 80 प्रतिशत कपास उत्पन्न होता है। कपास उत्पादित करने वाले अन्य जिलों में पाली, बीकानेर, अलवर, भीलवाड़ा, बांसवाड़ा, कोटा और उदयपुर हैं। राज्य में स्थित 28 कपड़ा मिलों में से 7 भीलवाड़ा जिले में, 5 उदयपुर जिले में, 5 अलवर जिले में, 4 मिलें बांसवाड़ा जिले में, 4 मिलें गंगानगर जिले में हैं। जोधपुर, जयपुर, पाली, कोटा और सिरोही जिले में 2-2 मिलें हैं। राज्य में भीलवाड़ा सूती वस्त्र उद्योग का प्रमुख केंद्र है। मयूर (गुलाबपुरा एवं बी.एस.एल. (भीलवाड़ा) मिलों का कपड़ा उन्नत किस्म के कपड़े के लिये भारत भर में प्रसिद्ध है। भीलवाड़ा में जर्मन करघों से कपड़ा बुना जाता है। राज्य में एडवर्ड मिल्स एवं श्री महालक्ष्मी मिल्स राष्ट्रीय कपड़ा निगम के अधीन हैं। सहकारी कताई मिलें गंगापुर (भीलवाड़ा), गुलाबपुरा (भीलवाड़ा) और हनुमानगढ़ में कार्यरत हैं। राज्य में सहकारी कॉटन कॉम्पलैक्स की स्थापना विश्व बैंक की सहायता से की गयी हैं।

    राजस्थान में 34 स्पिनिंग मिलें हैं जिनमें से 14 भीलवाड़ा जिले में स्थापित हैं। इन स्पिनिंग मिलों में कुल 7.31 लाख स्पिण्डल हैं। राज्य के कुल स्पिण्डल्स में से 46.50 प्रतिशत भीलवाड़ा जिले में हैं। भीलवाड़ा जिले में धागे का उत्पादन 1.30 लाख टन है जो राज्य में कुल धागा उत्पादन का 44 प्रतिशत है। प्रदेश का 64 प्रतिशत धागा भीलवाड़ा से निर्यात होता है। यहाँ 425 से अधिक टैक्सटाइल वीविंग इकाइयां हैं। इनमें 16,246 लूम स्थापित हैं। इनमें से 85 प्रतिशत लूम आधुनिक तकनीक के शटल लैस अथवा एयर जेट लूम्स हैं। इस प्रकार भीलवाड़ा देश का आधुनिकतम पावरलूम सेंटर बन गया है।

    भीलवाड़ा में 19 आधुनिक प्रोसेस हाउस हैं जिनकी क्षमता प्रतिवर्ष 65 से 70 लाख मीटर कपड़ा प्रोसेस करने की है। टैक्सटाइल व्यवसाय का कुल टर्न ओवर 15 हजार करोड़ रुपये है। इस उद्योग में भीलवाड़ा जिले में 45 हजार लोगों को प्रत्यक्ष एवं 60 हजार लोगों को परोक्ष रोजगार मिला हुआ है। भारत सरकार के वाणिजय एवं उद्योग मंत्रालय ने भीलवाड़ा को टाउन ऑफ एक्सपोर्ट एक्सीलेंस फॉर टैक्सटाइल घोषित किया है। भीलवाड़ा से प्रतिवर्ष 550 करोड़ रुपये मूल्य का 7-8 करोड़ मीटर फैब्रिक (सूटिंग उत्पाद) निर्यात होता है। जिले की विभिन्न औद्योगिक इकाइयों द्वारा प्रति वर्ष 2,150 करोड़ रुपये का निर्यात किया जाता है। इनमें टैक्सटाइल क्षेत्र से 1485 करोड़ रुपये का, मिनरल क्षेत्र से 545 करोड़ रुपये का तथा अन्य विविध क्षेत्रों से 120 करोड़ रुपये का वार्षिक निर्यात किया जाता है। भीलवाड़ा को राजस्थान का मैनचेस्टर कहते हैं।

    डाइंग एण्ड प्रिंटिंग इण्डस्ट्री

    जोधपुर में प्रतिदिन चार लाख मीटर प्रिंण्ट फैब्रिक कपड़े का निर्माण होता है। यह कपड़ा 20 मुख्य वस्त्र निर्माताओं एवं 50 अन्य निर्माताओं द्वारा तैयार किया जाता है। जोधपुर के फैब्रिक वस्त्र निर्माता इस कपड़े को जयपुर आदि स्थानीय बाजारों में बेचते हैं जहाँ से यह विदेशों को निर्यात किया जाता है। जोधपुर में प्रतिवर्ष 200 करोड़ रुपये का कपड़ा बेचा जाता है। जोधपुर, पाली एवं बालोतरा का डाइंग-प्रिण्टिंग उद्योग विश्व के कई देशों में प्रसिद्ध था किंतु लूनी, बाण्डी एवं जोजरी आदि नदियों में हो रहे प्रदूषण के कारण इस उद्योग को कानूनी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है। निश्चित रूप से डाइंग एवं प्रिंटिंग इण्डस्ट्री पर्यावरण के लिये बहुत बड़ा संकट है किंतु राज्य की जनता इस दिशा में पूरी तरह जागरूक है तथा इसे रोकने के लिये पर्याप्त कदम उठाये गये हैं।

    रेडीमेड गारमेंट इण्डस्ट्री

    राज्य में 600 बड़ी इकाइयां रेडमेड गारमेंट तैयार करती हैं जिनसे उत्पादित माल विदेशों को निर्यात किया जाता है। राज्य से प्रतिवर्ष लगभग 1200 करोड़ रुपये का रेडिमेड गारमेंट निर्यात किया जाता है।

    चीनी उद्योग

    राज्य में गन्ने का उत्पादन बूंदी, चित्तौड़गढ़, गंगानगर और उदयपुर जिलों में अधिक होता है। राज्य में चीनी बनाने के बड़े कारखाने इन्ही जिलों में स्थित हैं। दी मेवाड़ शुगर मिल्स भोपाल सागर (चित्तौड़गढ़) की स्थापना 1932 में की गयी थी। यह राज्य का सबसे पुराना चीनी कारखाना है। दी गंगानगर शुगर मिल्स लि. गंगानगर की स्थापना 1946 में हुई थी। इसके 97 प्रतिशत अंशों पर राज्य सरकार का तथा 3 प्रतिशत हिस्सों पर निजी व्यक्तियों का अधिकार है। इस मिल के अधीन शराब एवं स्पिरिट बनाने का कारखाना भी कार्य करता है जिसके केन्द्र अजमेर, अटरू, जोधपुर एवं प्रतापगढ़ में हैं। श्री केशोराय पाटन शुगर मिल्स लि. जिला बूंदी की स्थापना 1965 में की गयी। गन्ना उत्पादक कृषक इसके सदस्य हैं।

    खाद्य एवं अखाद्य तेल उद्योग

    राज्य में व्यापक स्तर पर मूंगफली, तिल, सरसों, रायड़ा, सूरजमुखी, बिनौले (कॉटन सीड) आदि फसलें तैयार की जाती हैं जिनके बीजों से तेल निकालने के लियेएक्सपैलर एवं ऑयल प्रोसेसिंग यूनिट्स लगी हुई हैं। अलसी तथा अरण्डी आदि अखाद्य तेलों को निकालने का काम भी राज्य में बड़े स्तर पर होता है जिनका उपयोग रंग, वार्निश, साबुन तथा शृंगार एवं प्रसाधन सामग्री के निर्माण में होता है। बीजों से तेल निकालने के बाद जो खल बचती है, वह पशु आहार के रूप में तथा खेतों में खाद के रूप में काम ली जाती है।

    वनस्पति घी उद्योग

    राज्य में वनस्पति घी बनाने का पहला कारखाना भीलवाड़ा में स्थापित किया गया था। राज्य में वनस्पति घी बनाने के 9 कारखाने हैं जो भीलवाड़ा, जयपुर, चित्तौड़गढ़, उदयपुर, गंगानगर, अलवर तथा टोंक में स्थित हैं। वनस्पति तेल के कारखाने भरतपुर, जयपुर, अलवर, टोंक, सवाईमाधोपुर, अजमेर, नागौर, दौसा और बीकानेर जिलों में स्थित हैं।

    ग्वार गम उद्योग

    ग्वार के दानों में 28 से 30 प्रतिशत गोंद पाया जाता है जिसका उपयोग कपड़ा उद्योग, दवा उद्योग, खाद्य पदार्थ, शृंगार एवं प्रसाधन सामग्री बनाने में किया जाता है। राज्य में ग्वार दाने से पाउडर बनाने की 50 इकाइयां हैं जो जोधपुर, बीकानेर, बाड़मेर और सरदार शहर (चूरू) जिले में स्थित हैं।

    मसाला प्रसंस्करण उद्योग

    राज्य में जीरा, मिर्च, धनिया, मेथी, राई, सौंफ, अजवायन, हल्दी, सौंठ आदि मसाले प्रचुर मात्रा में होते हैं। इनके प्रसंस्करण का काम छोटे-छोटे स्तर पर होता रहा है। व्यापक स्तर पर ग्रेडिंग एवं प्रोसेसिंग के लिये देश का सातवां एवं राज्य का पहला स्पाईस पार्क जोधपुर जिले के ओसियां उपखण्ड के रामपुरा भाटियान गांव में बनाया गया है। इस पार्क का उद्देश्य मसालों की गुणवत्ता में सुधार लाना, ग्रेडिंग, प्रोसेसिंग, पैकिंग को बढ़ावा देना एवं किसानों को अंतर्राष्ट्रीय बाजार उपलब्ध करवाना है।


    पशुधन आधारित उद्योग

    डेयरी उद्योग

    राज्य में बड़ी संख्या में दुधारू पशुओं की उपस्थिति से राज्य की डेयरियों में मिल्क पाश्चुराइजेशन का काम वृहत् स्तर पर होता है। दूध से क्रीम निकालकर उससे घी बनाया जाता है। दूध की अतिरिक्त मात्रा उपलब्ध होने पर मिल्क पाउडर तैयार किया जाता है। निजी स्तर पर घरों में बनाये जाने वाले घी के साथ-साथ सहकारी डेयरियों में भी अच्छी गुणवत्ता का घी तैयार होता है। स्थानीय मांग को पूरा करने के साथ-साथ इसका निर्यात भी किया जाता है। सहकारी डेयरियों में श्रीखण्ड, छाछ, दही आदि उत्पाद भी तैयार करके बड़े स्तर पर बेचे जाते हैं।

    ऊन उद्योग

    ऊन उत्पादन में राजस्थान का देश में पहला स्थान है। भारत की कुल ऊन का 40 से 45 प्रतिशत भाग राजस्थान में उत्पादित होता है। राजस्थान की ऊन विश्व के गलीचा उद्योग में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। राज्य में चोकला भेड़ की ऊन उत्तम किस्म की मानी जाती है। सूरतगढ़, जैतसर, बीकानेर आदि केंद्रों पर काराकुल एवं मेरिनो भेड़ें पाली जा रही हैं। राज्य में ऊनी धागा बनाने वाली प्रमुख मिलें इस प्रकार से हैं- (1) जोधपुर ऊन मिल, जोधपुर, (2) फोरेन एक्सपोर्ट एण्ड इम्पोर्ट मिल, कोटा (3) नगरपाल कॉम्बिंग मिल, कोटा, (4) राजस्थान ऊन मिल, बीकानेर (5) भारत ऊन मिल, बीकानेर। बीकानेर एशिया में ऊन की सबसे बड़ी मण्डी है। बीकानेर एवं टोंक में ऊन से नमदे बनाये जाते हैं जिनकी देश-विदेश में बहुत मांग है।

    चमड़ा उद्योग

    राज्य में बड़ी संख्या में पशुधन पाया जाता है। गौ-वंशीय पशुओं, ऊँट, भेड़, बकरी के मृत शरीरों के चमड़े से चप्पल, जूते, सैण्डल, मोजरी, पर्स, बैग तथा बैल्ट आदि बनते हैं। चमड़े से हैण्डीक्राफ्ट की विभिन्न प्रकार की सामग्री तैयार होती है। बीकानेर के उस्ता कलाकर चमड़े पर उस्ता कला के माध्यम से बेहतरीन सजावट करते हैं। उस्ता कलाकर ऊँट की खाल पर सोने की उत्तम नक्काशी करते हैं।

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  • अध्याय - 4 भारत की पाषाण सभ्यताएँ एवं संस्कृतियाँ

     02.06.2020
    अध्याय - 4 भारत की पाषाण सभ्यताएँ एवं संस्कृतियाँ

    भारत की पाषाण सभ्यताएँ एवं संस्कृतियाँ


    उस समय न तो मृत्यु थी, न अमरत्व था। रात और दिन का पार्थक्य भी नहीं हुआ था। उस समय केवल एक ही था जो वायु के बिना भी अपने सामर्थ्य से साँस ले रहा था। उससे अतिरिक्त और कोई वस्तु थी ही नहीं। - ऋग्वेद, 10.129


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    आधुनिक विज्ञान के अनुसार आज से लगभग 454 करोड़ वर्ष पहले, आग के गोले के रूप में धरती का जन्म हुआ जो धीरे-धीरे ठण्डी होती हुई आज से लगभग 380 करोड़ साल पहले इतनी ठण्डी हो गई कि धरती पर एक-कोषीय जीव का पनपना संभव हो गया। आज से लगभग 2.80 करोड़ वर्ष पहले धरती पर बंदरों का उद्भव हुआ। माना जाता है कि इन्हीं बंदरों में से कुछ बुद्धिमान बंदर अपने मस्तिष्क के आयतन, हाथ-पैरों के आकार, रीढ़ की हड्डी एवं स्वर-रज्जु (वोकल कॉड) की लम्बाई में सुधार करते हुए और विकास की विभिन्न अवस्थाओं से गुजरते हुए, आदि-मानवों में बदल गए। विकास की विभिन्न अवस्थाओं से गुजरते हुए इन्हीं आदि मानवों ने पाषाण सभ्यताओं को जन्म दिया। ये पाषाण सभ्यताएं भी अनेक चरणों से होकर गुजरीं।


    पाषाण-कालीन मानव संस्कृति का विकास

    आस्ट्रेलोपिथेकस

    धरती पर मानव का आगमन हिमयुग अथवा अभिनूतन युग (प्लीस्टोसीन) में हुआ जो एक भूवैज्ञानिक युग है। कहा नहीं जा सकता कि अभिनूतन युग का आरम्भ ठीक किस समय हुआ। पूर्वी अफ्रीका के क्षेत्रों में पत्थर के औजारों के साथ लगभग 35 लाख वर्ष पुराने मानव अवशेष मिले हैं। इस युग के मानव को आस्ट्रेलोपिथेकस कहते हैं। इस आदिम मानव के मस्तिष्क का आकार 400 मिलीलीटर था। यह दो पैरों पर खड़ा होकर चलता था किंतु यह सीधा तन कर खड़ा नहीं हो सकता था और शब्दों का उच्चारण करने में असमर्थ था, इसलिए इसे आदमी एवं बंदर के बीच की प्रजाति कहा जाता है। यह पहला प्राणी था जिसने धरती पर पत्थर का उपयोग हथियार के रूप में किया। उसके द्वारा उपयोग में लाये गए पत्थरों की पहचान करना संभव नहीं है। क्योंकि उसने प्रकृति में मिलने वाले पत्थर को ज्यों का त्यों उपयोग किया था, उसके आकार या रूप में कोई परिवर्तन नहीं किया था।

    होमो इरेक्टस

    होमो इरैक्टस का अर्थ होता है- 'सीधे खड़े होने में दक्ष।' इस मानव के 10 लाख वर्ष पुराने जीवाश्म इण्डोनेशिया के 'जावा' द्वीप से प्राप्त किए गए हैं। होमो इरैक्टस के मस्तिष्क का आयतन 1,000 मिलीलीटर था। इस आकार के मस्तिष्क वाला प्राणी बोलने में सक्षम होता है। इनके जीवाश्मों के पास बहुत बड़ी संख्या में दुधारी, अश्रुबंूद आकृति की हाथ की कुल्हाड़ियां और तेज धारवाले काटने के औजार तथा कच्चे कोयले के अवशेष मिले हैं। अनुमान है कि यह प्राणी कच्चा मांस खाने के स्थान पर पका हुआ मांस खाता था। उसने पशु-पालन सीख लिया था तथा वह अपने पशुओं के लिए नए चारागाहों की खोज में अधिक दूरी तक यात्राएं करता था। यह मानव लगभग 10 लाख साल पहले अफ्रीका से बाहर निकला। इसके जीवाश्म चीन, दक्षिण-पूर्व एशिया तथा भारत में नर्मदा नदी की घाटी में भी मिले हैं। वह यूरोप तथा उत्तरी धु्रव में हिम युग होने के कारण उन क्षेत्रों तक नहीं गया। यूरोप में उसने काफी बाद में प्रवेश किया। लगभग 7 लाख साल पहले तक वह 20 या 30 प्रकार के उपकरण बनाता था जो नोकदार, धारदार तथा घुमावदार थे। होमो इरैक्टस प्रजाति से दो उप-पजातियों ने जन्म लिया- (1.) निएण्डरथल और (2.) होमो सेपियन।

    निएण्डरथल

    आज से लगभग ढाई लाख साल पहले 'निएण्डरथल' नामक मानव अस्तित्त्व में आया जो आज से 30 हजार साल पहले तक धरती पर उपस्थित था। ये लम्बी-लम्बी भौंह वाले, ऐसे मंद-बुद्धि पशु थे जिनकी चेष्टाएं पशुओं के जैसी अधिक और मानवों जैसी कम थीं। अर्थात् ये भारी भरकम शरीर वाले ऐसे उपमानव थे जिनमें बुद्धि एवं समझ कम थी। चेहरे-मोहरे से नीएण्डरतल आज के आदमी से अधिक अलग नहीं थे फिर भी वे हमसे काफी तगड़े थे। उनका मस्तिष्क भी आज के आदमी की तुलना में काफी बड़ा था किंतु उसमें जटिलता कम थी, सलवटें भी कम थीं और उसका मस्तिष्क उसके शरीर के अनुपात में काफी कम था। इस कारण निएण्डरतल अपने बड़े मस्तिष्क का लाभ नहीं उठा पाया। वस्तुतः निएण्डरतल आज की होमोसपियन जाति का ही सदस्य था। इसने भी पत्थरों के औजारों का उपयोग किया। आज से 30 हजार साल पहले यह उप-मानव धरती से पूरी तरह समाप्त हो गया।

    होमो सेपियन

    आज से 5 लाख साल पहले 'होमो इरेक्टस' काफी-कुछ हमारी तरह दिखाई देने लगा। इसे 'होमो सेपियन' अर्थात् 'हमारी जाति के' नाम दिया गया। इस मानव के मस्तिष्क का औसत आयतन लगभग 1300 मिलीलीटर था। भारत में मानव का प्रथम निवास, जैसा कि पत्थर के औजारों से ज्ञात होता है, इसी समय आरम्भ हुआ। इस युग में धरती के अत्यंत विस्तृत भाग को हिम-परतों ने ढक लिया था।

    होमो सेपियन सेपियन

    आज से लगभग 1 लाख 20 हजार साल पहले आधुनिक मानव अस्तित्त्व में आ चुके थे। ये होमो सेपियन जाति का परिष्कृत रूप थे। इन्हें 'होमो सेपियन सेपियन' कहा जाता है।

    क्रो-मैगनन मैन

    आज से लगभग 40 हजार वर्ष पहले 'होमो सेपियन सेपियन' जाति के कुछ मनुष्य यूरोप में जा बसे। वे बौद्धिक रूप में अपने समकालीन नीएण्डरतलों से अधिक श्रेष्ठ थे। उनमें नए काम करने की सोच थी। वे अधिक अच्छे हथियार बना सकते थे जिनके फलक अधिक बारीक थे। वे शरीर को ढकना सीख गए थे। उनके आश्रय स्थल अच्छे थे और उनकी अंगीठियां खाना पकाने में अधिक उपयोगी थीं। वे बोलने की शक्ति रखते थे। इन्हें क्रो-मैगनन मैन कहा जाता है। यह मानव लगभग 10 हजार वर्षों तक नीएण्डरथलों के साथ रहा जब तक कि नीएण्डरथल समाप्त नहीं हो गए।

    क्रो-मैगनन का शरीर निएण्डरथल के शरीर से बड़ा था। इसके मस्तिष्क का औसत आयतन लगभग 1600 मिलीलीटर था। आज से 30 हजार साल पहले जब नीएण्डरथल समाप्त हो गए तब पूरी धरती पर केवल क्रो-मैगनन मानव जाति का ही बोलबाला हो गया जो आज तक चल रहा है। वस्तुतः क्रो-मैगनन मानव ही प्रथम वास्तविक मानव है जो आज से लगभग 40 हजार साल पहले अस्तित्त्व में आया। इस समय धरती पर उत्तरवर्ती हिमयुग आरम्भ हो रहा था तथा लगभग पूरा यूरोप हिम की चपेट में था।

    गर्म युग

    आज से 12 हजार वर्ष पहले धरती पर 'होलोसीन पीरियड' आरंभ हुआ जो आज तक चल रहा है। यह गर्म युग है तथा वर्तमान हिमयुग के बीच में स्थित 'अंतर्हिम काल' है। इस गर्म युग में ही आदमी ने तेजी से अपना मानसिक विकास किया और उसने कृषि, पशु-पालन तथा समाज को व्यवस्थित किया। आज तक धरती पर वही गर्म युग चल रहा है और मानव निरंतर प्रगति करता हुआ आगे बढ़ रहा है। आज से लगभग 10 हजार साल पहले आदमी ने कृषि और पशु-पालन आरंभ किया। यह इस गर्म युग की सबसे बड़ी देन है। पश्चिम एशिया से मिले प्रमाणों के अनुसार आज से लगभग 8000 साल पहले अर्थात् 6000 ई.पू. में आदमी ने हाथों से मिट्टी के बर्तन बनाना और उन्हें आग में पकाना आरंभ कर दिया था।

    भारत की आदिम जातियाँ

    भारत में छः नृवंश जातियों के कंकाल एवं खोपड़ियाँ पाई गई हैं। इन्हें भारत की आदिम जातियाँ माना जाता है-

    (1.) नीग्रेटो: यह भारत की प्राचीनतम जाति थी जो अफ्रीका से भारत में आई थी। यह नितांत असभ्य एवं बर्बर जाति थी। ये लोग जंगली पशुओं का मांस, मछली, कंद-मूल एवं फल खाकर पेट भरते थे और कृषि-कर्म एवं पशुपालन से अपरिचित थे। यद्यपि अब यह जाति भारत की मुख्य भूमि से विलुप्त हो चुकी है तथापि अण्डमान द्वीपों में इस जाति के कुछ लोग निवास करते हैं। असम की नागा जातियों तथा त्रावणकोर-कोचीन आदि कुछ क्षेत्रों की आदिम जातियों में भी इस जाति की कुछ विशेषताएं दृष्टिगत होती हैं।

    (2.) प्रोटो ऑस्ट्रेलॉयड: ये संभवतः फिलीस्तीन से भारत आए थे। भारत की कोल और मुण्डा जातियों में प्रोटो ऑस्ट्रेलॉयड जाति के गुण पाए जाते हैं। जब आर्य भारत में आए तब यह जाति पंजाब एवं उसके आसपास रहती थी। आर्यों ने इन्हें 'अनास', 'कृष्णवर्ण' और 'निषाद' कहकर पुकारा। यह एक विकसित जाति थी। उन्हें कृषि, पशुपालन एवं वस्त्र निर्माण का ज्ञान था। माना जाता है कि अण्डे से सृष्टि की कल्पना इन्हीं प्रोटो ऑस्ट्रेलॉयड लोगों की देन है। ये लोग पुनर्जन्म के सिद्धांत में विश्वास करते थे। 'अमंगल निवारण' के लिए 'न्यौछावर करने' की प्रथा भी इन्हीं की दी हुई है। हिन्दू-धर्म के पशु-देवता- नाग, मकर, गणेश आदि भी इन्हीं की देन है। यह जाति आर्यों के आगमन के बाद उन्हीं में घुल-मिलकर एकाकार हो गई।

    (3.) मंगोलायड: इस प्रजाति का निवास केवल एशिया महाद्वीप में पाया जाता है। इससे सम्बन्धित लोगो की त्वचा का रंग पीला, शरीर पर बालों की कमी और माथा चौड़ा होता है। इस प्रजाति की सबसे प्रमुख विशेषता इसकी अधखुली आंखें हैं। कतिपय प्रादेशिक विभिन्नताओं के साथ यह जाति सिक्किम, आसाम और भारत-बर्मा की सीमा पर निवास करती है।

    (4.) भूमध्यसागरीय द्रविड़: दुनिया भर में इस जाति की कई शाखाएं हैं। भारत में इस जाति को द्रविड़ कहा जाता है। इनका सिर बड़ा, कद नाटा, नाक छोटी और रंग काला होता है। आर्यों के भारत आगमन के समय द्रविड़ जाति ईरान से लेकर अफगानिस्तान तथा बलोचिस्तान से लेकर पंजाब, सिंध, मालवा एवं महाराष्ट्र तक विस्तृत क्षेत्र में रहती थी। आर्यों के भारत में आगमन से पूर्व यह जाति नीग्रेटो एवं प्रोटोऑस्ट्रेलॉयड जातियों के साथ मिलकर रह रही थी। पाकिस्तान के बलोचिस्तान प्रांत में आज भी ब्राहुई भाषा का प्रयोग होता है, यह भाषा भूमध्यसागरीय द्रविड़ों की ही देन है। दक्षिण भारत की अनेक भाषाओं की जननी द्रविड़ भाषा माना जाती है। ऋग्वेद में प्रयुक्त 'दस्यु' और 'दास' शब्दों का प्रयोग द्रविड़ों के लिए किया गया है। ईरानी भाषा में भी दस्यु शब्द मिलता है। कैस्पियन सागर के दक्षिण-पूर्व में 'दहइ' जाति रहती थी। माना जाता है कि वही दहई जाति भारत में 'द्रविड़' कहलाई। भारत की संस्कृति पर पर द्रविड़ जाति का विशेष प्रभाव पड़ा जिसे आज भी देखा जा सकता है। इस जाति की सभ्यता एवं संस्कृति का अध्ययन हम 'सैन्धव सभ्यता, धर्म एवं समाज' नामक अध्याय में करेंगे।

    (5.) पश्चिमी ब्रेचीसेफल्स: इस जाति के लोग बहुत छोटे समुदाय में भारत में रहते होंगे। भारत की सभ्यता एवं संस्कृति पर इन लोगों का विशेष प्रभाव नहीं पड़ा।

    (6.) नॉर्डिक: यह भी एक छोटा आदिम समुदाय था जिसका भारतीय संस्कृति पर कोई प्रभाव दिखाई नहीं दिया है।

    पाषाण कालीन सभ्यताएं एवं संस्कृतियाँ

    पाषाण-काल मानव सभ्यता की उस अवस्था को कहते हैं जब मनुष्य अपने दिन प्रतिदिन के कामों में पत्थर से बने औजारांे एवं हथियारों का प्रयोग करता था तथा धातु का प्रयोग करना नहीं जानता था। मनुष्य ने ज प्रथम बार पृथ्वी पर आखें खोलीं तो पत्थर को अपना हथियार बनाया। उस काल का मनुष्य, नितांत अविकसित अवस्था में था और जंगली जीवन व्यतीत करता था। जैसे-जैसे उसके मस्तिष्क का विकास होता गया, वह पत्थरों के हथियारों तथा औजारों को विकसित करता चला गया। इसी के साथ वह सभ्य जीवन की ओर बढ़ा। मानव की इस अवस्था के बारे में इतिहासकार डॉ. इश्वरी प्रसाद ने लिखा है- 'मनुष्य औजार प्रयुक्त करने वाला पशु है।' निःसंदेह संस्कृति की समस्त उन्नति, जीवन को सुखी एवं आरामदायक बनाने के लिए प्रकृति के साथ चल रहे युद्ध में, औजारों तथा उपकरणों के बढ़ते हुए उपयोग के कारण हुई है। मनुष्य का भौतिक इतिहास, मनुष्य के औजार विहीन अवस्था से निकलकर वर्तमान में पूर्ण मशीनी अवस्था में पहुँचने तक का लेखा-जोखा है।

    अध्ययन की दृष्टि से पाषाण युग को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है-

    (1.) पूर्व-पाषाण काल

    (2.) मध्य-पाषाण काल

    (3.) नव-पाषाण काल

    संस्कृति के ये तीनों काल एक के बाद एक करके अस्तित्त्व में आए किंतु ऐसे स्थल बहुत कम मिले हैं जहाँ तीनों अवस्थाओं के अवशेष देखने को मिलते हैं। विंध्य के उत्तरी भागों तथा बेलन घाटी में पूर्व-पाषाण-काल, मध्य-पाषाण-काल और नव-पाषाण-काल की तीनों अवस्थाएं क्रमानुसार देखने को मिलती हैं।

    पूर्व-पाषाण कालीन सभ्यताएं (पेलियोलीथिक पीरियड)

    मानव-सभ्यता के प्रारम्भिक काल को पूर्व-पाषाण-काल के नाम से पुकारा गया है। इसे पुरा पाषाण काल तथा उच्च पुरापाषाण युग भी कहते हैं। मानव की 'होमो सेपियन' प्रजाति इस संस्कृति की निर्माता थी।

    काल निर्धारण

    भारत में इस काल का आरम्भ आज से लगभग पाँच लाख वर्ष पहले हुआ। भारत में मानव आज से लगभग दस हजार साल पहले तक संस्कृति की इसी अवस्था में रहा। आज से लगभग दस हजार वर्ष पहले अर्थात् ई.पू. 8000 में, पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति का अन्त हुआ।

    पूर्व-पाषाण-कालीन स्थल

    पूर्व-पाषाण-कालीन स्थल कश्मीर, पंजाब की सोहन नदी घाटी (अब पाकिस्तान), मध्यभारत, पूर्वी भारत तथा दक्षिणी भारत में पाए गए हैं। इस संस्कृति के औजार छोटा नागपुर के पठार में भी मिले हैं। ये ई.पू. 1 लाख तक पुराने हो सकते हैं। बिहार के सिंहभूमि जिले में लगभग 40 स्थानों पर पूर्व पाषाण कालीन स्थल मिले हैं। बंगाल के मिदनापुर, पुरुलिया, बांकुरा, वीरभूम, उड़ीसा के मयूरभंज, केऊँझर, सुंदरगढ़ तथा असम के कुछ स्थानों से भी इस काल के पाषाण-औजार प्राप्त हुए हैं।

    आन्ध्र प्रदेश के कुर्नूल नगर से लगभग 55 किलोमीटर दूर ऐसे औजार मिले हैं जिनका समय ई.पू.25 हजार से ई.पू.10 हजार के बीच का है। इनके साथ हड्डी के उपकरण और जानवरांे के अवशेष भी मिले हैं। आंध्रप्रदेश के चित्तूर जिले से, कर्नाटक के शिमोगा जिले तथा मालप्रभा नदी के बेसिन से भी इस युग के औजार मिले हैं। नागार्जुन कोंडा से भी पत्थर के फाल एवं अन्य उपकरण मिले हैं।

    लिखित उल्लेख

    पुराणों में पूर्व पाषाण कालीन मानवों के उल्लेख मिलते हैं जो कंद-मूल खाकर गुजारा करते थे। ऐसी पुरानी पद्धति से जीविका चलाने वाले लोग पहाड़ी क्षेत्रों में और गुफाओं में आधुनिक काल तक मौजूद रहे हैं।

    शैल चित्र

    भारत के अनेक स्थानों पर उपलब्ध पहाड़ियों में शैलचित्रों की प्राप्ति हेाती है जिनसे आदिमकालीन संस्कृति का ज्ञान होता है। विंध्याचल की पहाड़ियों में भीमबेटका नामक स्थान पर 200 से अधिक गुफाएं पाई गई हैं जिनमें पूर्व-पाषाण कालीन मानव द्वारा बनाए गए के शैल चित्र प्राप्त हुए हैं। इन चित्रों की संख्या कई हजार है। इनका काल एक लाख वर्ष पूर्व माना जाता है। इन गुफाओं में वे औजार भी मिले हैं जिनसे ये गुफाएं बनाई गई होंगी तथा इन चित्रों को उकेरा गया होगा। इन गुफाओं से 5,000 से भी अधिक वस्तुएं मिली हैं जिनमें से लगभग 1,500 औजार हैं।

    जीवाश्म

    कुर्नूल जिले की गुफाओं से बारहसिंघे, हिरन, लंगूर तथा गेंडे के जीवाश्म भी मिले हैं। ये जीवाश्म पूर्व-पाषाण युग के हैं। इन जीवाश्मों के क्षेत्र से पूर्व-पाषाण कालीन औजार मिले हैं।

    पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति की विशेषताएं

    इस काल का मानव पूर्णतः आखेटक अवस्था में था। वह पशु-पालन, कृषि, संग्रहण आदि मानवीय कार्यकलापों से अपरिचित था। इस काल के मानव की संस्कृति की विशेषताएं इस प्रकार से हैं-

    निवासी: इतिहासकारों, पुरातत्त्ववेत्ताओं एवं समाजशास्त्रियों की धारणा है कि पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के लोग 'हब्शी' जाति के थे। इन लोगों का रंग काला और कद छोटा था। इनके बाल ऊनी थे और नाक चिपटी थी। ऐसे मानव आज भी अण्डमान एवं निकोबार द्वीपों में पाए जाते हैं।

    औजार: पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति का मानव, पत्थर के अनगढ़ और अपरिष्कृत औजार बनाता था। वह कठोर चट्टानों से पत्थर प्राप्त करता था तथा उनसे हथौड़े एवं रुखानी आदि बनाता था जिनसे वह ठोकता, पीटता तथा छेद करता था। ये औजार अनगढ़ एवं भद्दे आकार के होते थे। पत्थर के औजारों से वह पशुओं का शिकार करता था। इन औजारों में लकड़ी तथा हड्डियों के हत्थे लगे रहते थे, लकड़ी तथा हड्डियों के भी औजार होंगे परन्तु अब वे नष्ट हो गए हैं।

    आवास: पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति का मानव किसी एक स्थान पर स्थिर नहीं रहता था वरन् जहाँ कहीं उसे शिकार, कन्द, मूल, फल आदि पाने की आशा होती थी वहीं पर चला जाता था। प्राकृतिक विषमताओं एवं जंगली जानवरों से बचने के लिए वह नदियों के किनारे स्थित जंगलों में ऊँचे वृक्षों एवं पर्वतीय गुफाओं का आश्रय लेता था। समझ विकसित होने पर इस युग के मानव ने वृक्षों की डालियों तथा पत्तियों की झोपड़ियां बनानी आरम्भ कीं।

    आहार: पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के लोग अपनी जीविका के लिए पूर्ण रूप से प्रकृति पर निर्भर थे। भोजन प्राप्त करने के लिए जंगली पशुओं का शिकार करते थे और नदियों से मछलियाँ पकड़ते थे। वनों में मिलने वाले कन्द-मूल एवं फल भी उनके मुख्य आहार थे।

    कृषि: पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति का मानव कृषि करना नहीं जानता था।

    पशु-पालन: उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले की बेलन घाटी में मिले घरेलू पशुओं के अवशेषों से अनुमान होता है कि ई.पू.25 हजार के आसपास बकरी, भेड़ और गाय-भैंस आदि पाले जाते थे किंतु सामान्यतः इस युग का आदमी पशुपालन नहीं करता था।

    वस्त्र: पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के मानव पूर्णतः नंगे रहते थे। प्राकृतिक विषमताओं से बचने के लिए उन्होंने वृक्षों की पत्तियों, छाल तथा पशुचर्म से अपने शरीर को ढंकना प्रारम्भ किया होगा।

    सामाजिक संगठन: पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के मानव टोलियां बनाकर रहते थे। प्रत्येक टोली का एक प्रधान होता होगा जिसके नेतृत्व में ये टोलियाँ आहार तथा आखेट की खोज में एक स्थान से दूसरे स्थान को जाया करती होंगी।

    शव-विसर्जन: अनुमान है कि पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के आरंभिक काल में शवों को जंगल में वैसे ही छोड़़ दिया जाता था जिन्हें पशु-पक्षी खा जाते थे। बाद में शवों के प्रति दायित्व की भावना विकसित होने पर वे शवों को लाल रंग से रंगकर धरती में गाड़ देते थे।

    मध्य-पाषाण कालीन सभ्यताएं (मीजोलिथिक पीरियड)

    ई.पू.8000 में धरती पर अब तक के अंतिम हिमयुग की समाप्ति हुई। इसी के साथ धरती की जलवायु शुष्क तथा ऊष्ण हो गई। जलवायु में हुए परिवर्तनों के साथ-साथ वनस्पति एवं जीव-जन्तुओं में भी परिवर्तन हुए। इस काल में धरती पर क्रो-मैगनन मानव का बोलबाला था। उसका मस्तिष्क पूर्वपाषाण कालीन मानव से काफी विकसित था। इस कारण इस मानव ने तेजी से सभ्यता एवं संस्कृति का विकास किया जिससे उसके जीवन में पहले की अपेक्षा बहुत बड़ा परिवर्तन आ गया। यह मानव अपने अधिवास के लिए अधिक अनुकूल एवं नए क्षेत्रों की तरफ बढ़ा तथा इसने एक नई संस्कृति को जन्म दिया। इस संस्कृति को मध्य-पाषाण-कालीन संस्कृति अथवा उत्तर-पाषाण कालीन संस्कृति कहते हैं।

    काल निर्धारण: मध्य-पाषाण-काल वस्तुतः पूर्व-पाषाण-काल और नव-पाषाण काल के बीच संक्रांति काल है जिसे उत्तर पाषाण युग भी कहते हैं। भारत में इस संस्कृति का आरम्भ ई.पू.8000 के लगभग हुआ और लगभग ई.पू. 4000 तक चला।

    मध्य-पाषाण-संस्कृति स्थल: मध्य-पाषाण-संस्कृति के कई स्थल छोटा नागपुर, मध्य भारत और कृष्णा नदी के दक्षिण में मिले हैं। मध्य भारत में नर्मदा के तटों पर, गोदावरी के नदीमुख-क्षेत्र में और तुंगभद्रा तथा पेन्नार के बीच के क्षेत्र में भी मध्य-पाषाण-कालीन संस्कृति स्थल मिले हैं। बेलन की घाटी में भी इस युग के मानव के आवास मिले हैं। इस संस्कृति के स्थल सोहन नदी घाटी में भी मिले हैं। यहाँ हिमालय क्षेत्र के तृतीय हिमाच्छादन के समकालीन स्तर में हम एक अनगढ़ प्रस्तर उपकरण उद्योग को देखते हैं।

    मध्य-पाषाण-कालीन संस्कृति की विशेषताएं

    औजार: मध्य-पाषाण-संस्कृति के विशिष्ट औजार लघु-पाषाण हैं। इस संस्कृति के मानव ने प्रमुखतः शल्क औजारों का उत्पादन किया। ये शल्क समस्त भारत में पाए गए हैं और इनमें क्षेत्रीय भेद भी देखने को मिले हैं। इनमें मुख्य औजार शल्कों से निर्मित विभिन्न प्रकार की खुरचनियां हैं। बरमे और धार वाले उपकरण भी भारी संख्या में मिले हैं। हाथ की कुल्हाड़ियों का उपयोग इस काल की प्रमुख विशेषता है। भारत में प्राप्त ऐसी कुल्हाड़ियाँ काफी सीमा तक वैसी ही हैं जैसी की पश्चिमी एशिया, यूरोप और अफ्रीका में मिली कुल्हाड़ियाँ हैं। पत्थरों के औजारों का उपयोग मुख्यतः काटने एवं छीलने के लिए होता था। भोपाल से 40 किलोमीटर दक्षिण में स्थित भीमबेटका से हाथ की कुल्हाड़ियाँ, विदारक, पत्तियाँ, खुरचनियाँ तथा तक्षणियाँ पायी गयी हैं। गुजरात के टिब्बों के ऊपरी स्तरों में भी पत्तियां, तक्षणियां, खुरचनियां आदि मिले हैं। हाथ की कुल्हाड़ियां हिमालय के दूसरे हिमनद निक्षेप में भी मिली हैं। नर्मदा तट के अनेक स्थानों पर और तुंगभद्रा के दक्षिण में भी अनेक स्थानों पर इस युग के औजार मिले हैं।

    औजारों का विकास: मध्य-पाषाण-कालीन संस्कृति का मानव भी अपने औजार पत्थर से ही बनाता था परन्तु उसके औजार पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के औजारों की अपेक्षा अधिक साफ तथा सुन्दर होते थे। अब वे उतने भद्दे नहीं रह गए थे। इन औजारों को रगड़ एवं घिस कर चिकना कर लिया जाता था। इससे वे सुडौल तथा चमकीले हो जाते थे। इस काल में औजार एवं हथियार बनाने के लिए लकड़ी तथा हड्डियों का प्रयोग पहले से भी अधिक होने लगा। इससे औजारों में विविधता आ गई और धनुष, बाण, भाले, चाकू, कुल्हाड़ी के अतिरिक्त हल, हँसिया, घिरनी, सीढ़ी, डोंगी, तकली आदि भी बनायी जाने लगी।

    आवास: बेलन घाटी में गुफाओं और चट्टानों से बने शरण-स्थल पाए गए हैं जो विशेष मौसमों में मनुष्यों द्वारा शिविर के रूप में उपयोग किए जाते रहे होंगे। भोपाल से 40 किलोमीटर दक्षिण में भीम बेटका में भी मनुष्यों के उपयोग मेें आने वाली गुफाएं और चट्टानों से बने शरण-स्थान पाए गए हैं।

    जलवायु: हिमकाल की समाप्ति के बाद धरती पर शुष्क एवं उष्ण जलवायु आरंभ हुआ था। मध्य-पाषाण काल में धरती की जलवायु कम आर्द्र थी। इस काल के आरंभ होने के बाद से धरती की जलवायु की परिस्थितियों में अब तक कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ है।

    कृषि का आरम्भ: मध्य-पाषाण-काल के मानव ने ई.पू. 8000 अर्थात् आज से लगभग 10 हजार साल पहले, हल तथा बैलों की सहायता से कृषि करना आरम्भ कर दिया। वह पौधों को काटने के लिए हँसिया तथा अनाज पीसने के लिए चक्कियों का प्रयोग करने लग गया। इस काल का मानव गेहूँ, जौ, बाजरा आदि की खेती करता था।

    पशु-पालन: कुछ स्थानों पर पशु-पालन पूर्व-पाषाण-काल में आरम्भ हो गया था। मध्य-पाषाण-काल के मानव ने पशुओं की उपयोगिता को अनुभव करके पशु-पालन का काम बड़े स्तर पर आरम्भ कर दिया। इस काल का मानव गाय, बैल, भैंस, भेड़, बकरी, कुत्ता, घोड़ा आदि जानवरों को पालता था।

    मिट्टी के बर्तनों का निर्माण: मध्य-पाषाण-काल के मानव ने मिट्टी के बर्तन बनाना आरम्भ किया। कृषि तथा पशु-पालन का काम आरम्भ हो जाने से इस संस्कृति के मानव के पास सामान अधिक हो गया। अपने सामान को सुरक्षित रखने के लिए इस युग के मानव ने मिट्टी के छोटे-बड़े बर्तन बनाने आरम्भ किए। इस काल का मानव चाक का अविष्कार नहीं कर पाया था। अतः बर्तन हाथ से ही बनाए जाते थे।

    वस्त्र-निर्माण: मध्य-पाषाण-काल के मानव ने पौधों के रेशों तथा ऊन के धागों की कताई आरम्भ की। इन धागों को बुनकर वह वस्त्र बनाने लगा। खुदाई में बहुत-सी तकलियाँ तथा करघे मिले हैं। इस संस्कृति का मानव वस्त्रों को रंगना भी सीख गया था।

    गृह-निर्माण: मध्य-पाषाण-काल के मानव ने अपने निवास के लिए स्थाई घर बनाना आरम्भ किया। इस काल के घरों की दीवारें लट्ठों तथा नारियल के तनों से बनी होती थीं और उन पर मिट्टी का लेप लगाया जाता था। इनकी छतें लकड़ी, पत्ती, छाल आदि से बनती थी और फर्श कच्ची मिट्टी से बनता था।

    कार्य-विभाजन तथा वस्तु-विनिमय: मध्य-पाषाण-काल के मानव ने भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्यों को करना आरम्भ कर दिया था। कोई खेती करता था तो कोई मिट्टी के बर्तन बनाता था और कोई लकड़ी के काम किया करता था। इस प्रकार सबका काम अलग-अलग बंट गया। इससे वस्तु-विनिमय आरम्भ हो गया। एक गाँव के लोग अपनी विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं को पूरा करने लिए चीजों की अदली-बदली किया करते थे। बढ़ई तथा कुम्हार अपनी वस्तुएँ किसान को देकर उनसे अन्न प्राप्त करते थे।

    युद्ध का प्रारम्भ: पुरा-पाषाण-काल का मानव झुण्डों में रहता था जिनमें प्रायः संघर्ष हो जाया करता था। मध्य-पाषाण-काल में विभिन्न मानव बस्तियों के बीच युद्ध होने आरम्भ हो गए। इसलिए आत्म-रक्षा के लिए गांव के चारों और खाई बनाई जाने लगी ताकि शत्रु अचानक गांव में न घुस सकें। इस काल का मानव, युद्ध में पत्थर के हथियारों का प्रयोग करता था।

    धर्म: खुदाई में कुछ नारी-मूर्तियाँ मिली हैं जिनसे अनुमान लगाया गया है कि मध्य-पाषाण-संस्कृति का मानव मातृदेवी का उपासक था। देवी को प्रसन्न करने के लिए वह सम्भवतः पशुओं की बलि भी देता था। उसका विश्वास था कि ऐसा करने से पृथ्वी माता प्रसन्न होती है और पशु तथा कृषि में वृद्धि होती है।

    शव-विसर्जन: मध्य-पाषाण-काल का मानव भी शवों को धरती में गाड़ता था। इस कार्य के लिए अलग से स्थान निर्धारित किया जाता था। कभी-कभी घर के भीतर अथवा उनके निकट ही शव को गाड़ा जाता था। शव के साथ उपयोगी वस्तुएँ रखी जाती थीं। इस काल में शव को जलाने की प्रथा भी आरम्भ हो गई थी। शव दहन के पश्चात् उसकी राख को मिट्टी के बर्तन में रख कर आदरपूर्वक भूमि में गाड़ा जाता था।

    निष्कर्ष: मध्य-पाषण-कालीन संस्कृति में मानव जीवन में आए परिवर्तन अत्यंत क्रान्तिकारी थे। इस काल का मानव, सभ्यता की होड़़ में बहुत आगे बढ़ गया था। कृषि तथा पशु-पालन का कार्य आरम्भ हो जाने के कारण उसमें सहकारिता की भावना विकसित हो गई थी जिससे वह एक स्थान पर गाँवों में स्थायी रूप से निवास करने लगा था। उसे अपनी धरती से प्रेम होने लगा था। इस कारण मध्य-पाषण-कालीन संस्कृति के मानव में मातृभूमि की धारणा विकसित हो गई। मानव के पास भूमि, घर, पशु, अन्न तथा अन्य उपयोगी वस्तुएँ होने से व्यक्तिगत सम्पत्ति का उदय हो गया और लोगों में सम्पन्नता तथा दरिद्रता का भाव भी जन्म लेने लगा था। अपनी सम्पत्ति की रक्षा के लिए विभिन्न प्रकार की व्यवस्थाएँ भी की जाने लगीं। सारांश यह है कि मध्य-पाषाण-काल, पूर्व-पाषाण-काल की अपेक्षा सभ्यता तथा संस्कृति के क्षेत्र में बहुत आगे बढ़ गया था।

    नव-पाषाण-कालीन सभ्यताएं (निओलिथिक पीरियड)

    धरती पर पूर्व-पाषाण-कालीन सभ्यता लगभग 35 लाख वर्ष तक चलती रही। भारत में इस संस्कृति की आयु लगभग 5 लाख साल सिद्ध हुई। इतने लम्बे समय तक मानव का संस्कृति के एक ही चरण में बने रहने का कारण यह था कि पूर्वपाषाण कालीन संस्कृति को जन्म देने वाले 'होमो सेपियन' मानव का मस्तिष्क अधिक विकसित नहीं था।

    मध्यपाषाण काल ई.पू.8000 से ई.पू.4000 तक अर्थात् लगभग 4 हजार साल तक धरती पर रहा। इसका कारण यह था कि मध्यपाषाण कालीन संस्कृति को जन्म देने वाला 'क्रोमैगनन मानव' अधिक बड़े एवं विकसित मस्तिष्क का स्वामी था। इस कारण उसने लगभग चार हजार साल में ही मध्यपाषाण-कालीन संस्कृति को त्यागकर नव-पाषाण कालीन संस्कृति को जन्म दिया।

    काल निर्धारण: पश्चिमी एशिया के इतिहास में ई.पू.8000 से ई.पू. 4000 के बीच की अवधि में पहली प्रौद्योगिक क्रांति घटित हुई, क्योंकि इसी अवधि में कृषि, कपड़़ा बुनाई, गृह-निर्माण आदि कलाओं का आविष्कार हुआ। इस प्रकार धरती पर ई.पू.4000 के आसपास नव-पाषाण-काल आरम्भ हुआ परन्तु भारतीय प्रायद्वीप में भी नवपाषाण युग का आरम्भ ई.पू.4000 के लगभग हुआ। इसी युग में भारतीय प्रायद्वीप में चावल, गेहूँ और जौ आदि महत्त्वपूर्ण अनाजों की खेती आरम्भ हुई। इस भूभाग में आरंभिक गांवों की स्थापना भी इसी युग में हुई। मानव अब सभ्यता की देहली पर पैर रखने जा रहा था। दक्षिणी भारत और पूर्वी भारत में ऐसी कुछ बस्तियों की स्थापना 1000 ई.पू. में भी होती रही।

    नव-पाषाण-कालीन संस्कृति की विशेषताएं

    नव-पाषाण-कालीन मानव का जीवन: नव-पाषाण-कालीन संस्कृति के मानव का जीवन पर्याप्त कष्टमय था। उसे पत्थरों के औजारों और हथियारों पर ही पूर्णतः आश्रित रहना पड़ता था, इसलिए वह पहाड़ी क्षेत्रों से अधिक दूरी पर अपनी बस्तियों की स्थापना नहीं कर पाया। बहुत अधिक परिश्रम करने पर भी वह केवल अपने निर्वहन भर के लिए अनाज पैदा कर पाता था।

    नव-पाषाण-कालीन संस्कृति के औजार: नव-पाषाण-कालीन संस्कृति के मानव ने पॉलिशदार पत्थर के औजारों का उपयोग किया। पत्थर की कुल्हाड़ियां उसका प्रमुख औजार थीं जो प्रायः समस्त भारत में बड़ी संख्या में मिली हैं। उस युग के लोगों ने काटने के इस औजार का कई प्रकार से उपयोग किया। परशु (कुल्हाड़ी) चलाने में प्रवीण वीर परशुराम का प्रचीन आख्यान प्रसिद्ध है। इस युग के पॉलिशदार औजारों में लघु-पाषाणों के फलक भी हैं।

    नव-पाषाण-कालीन संस्कृति के स्थल: नवपाषाण युग के मनुष्यों की बस्तियों को, उनके द्वारा प्रयुक्त कुल्हाड़ियों की किस्मों के आधार पर, तीन महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में बांट सकते हैं- (1.) उत्तर दिशा में बर्जेहोम, (2.) पूर्व दिशा में चिरंड तथा (3.) दक्षिण दिशा में गोदावरी नदी के दक्षिण में।

    (1.) बुर्जहोम: कश्मीर की घाटी में श्रीनगर से 20 किलोमीटर दूर बर्जेहोम नामक स्थान है। यहाँ के नव-पाषाण-कालीन मानव, एक प्लेट पर, गड्ढे वाले घरों में रहते थे। पशुओं और मछलियों के आखेट पर ही उनका जीवन आश्रित था। अनुमान होता है कि वे कृषि अथवा पालतू पशुओं से परिचित नहीं थे। वे पत्थर के पॉलिशदार औजारों का उपयोग करते थे, उनके बहुत से औजार और हथियार हड्ड्यिों से बने हुए हैं। बुर्जहोम के लोग अपरिष्कृत धूसर मृद्भाण्डों का उपयोग करते थे। बुर्जहोम में पालतू कुत्ते भी स्वामियों के शवों के साथ शवाधानों में गाढ़े जाते थे। गड्ढों वाले घरों में रहने और स्वामी के शव के साथ उसके पालतू कुत्ते को गाढ़ने की प्रथा भारत में नवपाषाण युगीन लोगों में अन्यत्र कहीं भी देखने को नहीं मिलती। बुर्जहोम की बस्ती ई.पू.2400 की है।

    (2.) चिरंड: भारत में दूसरा स्थान चिरंड है जहाँ से नवपाषाण-कालीन उपकरणों के साथ पर्याप्त मात्रा में हड्डियों के औजार भी मिले हैं। यह स्थल पटना से 40 किलोमीटर पश्चिम में गंगा के उत्तर में स्थित है। ये औजार उत्तर नवपाषाण-युगीन स्तरों वाले ऐसे क्षेत्र में मिले हैं जहाँ लगभग 100 संेटीमीटर वर्षा होती है। यहाँ पर चार नदियों- गंगा, सोन, गंडक और घाघरा का मिलन-स्थल होने के कारण खुली धरती उपलब्ध थी। चिरंड से प्राप्त हड्डियों के औजार ई.पू.1600 लगभग के हैं।

    (3.) गोदावरी नदी: नवपाषाण युगीन लोगों के एक समूह का निवास दक्षिण भारत में गोदावरी नदी के दक्षिण में निवास करता था। इन्होंने अपनी बस्तियां सामान्यतः ग्रेनाइट की पहाड़ियों के ऊपर अथवा नदी तट के समीप के टीलों पर स्थापित कीं। ये लोग पत्थर की कुल्हाड़ियों के साथ-साथ एक प्रकार के प्रस्तर-फलकों का भी उपयोग करते थे। आग मंे पकायी गयी लघु मृण्मूर्तियों को देखने से अनुमान होता है कि वे कई पशुओं को पालते थे। वे गाय-बैल, भेड़ और बकरियां रखते थे। वे सिलबट्टे का उपयोग करते थे, जिससे ज्ञात होता है कि वे अनाज पैदा करने की कला जानते थे।

    (4.) अन्य स्थल: भारत के पूर्वोत्तर में स्थित असम की पहाड़ियों तथा मेघालय की गारो पहाड़ियों में नव-पाषण-संस्कृति के औजार मिले हैं। इनका काल निर्धारित नहीं किया जा सका है। इनके अतिरिक्त विंध्याचल के उत्तरी भागों में उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर और इलाहाबाद जिलों से भी अनेक नवपाषाण युगीन स्थल मिले हैं। इलाहाबाद जिले के नवपाषाण युगीन स्थलों की विशेषता यह है कि यहाँ ईसा पूर्व की छठी सहस्राब्दी में भी चावल की खेती की जाती थी। बलोचिस्तान में भी नवपाषाण युग के कुछ स्थल मिले हैं।

    नव-पाषाण युगीन स्थलों का उत्खनन: भारत में अब तक जिन नवपाषाण युगीन स्थलों अथवा स्तरों का उत्खनन हुआ है, उनमें प्रमुख हैं- कर्नाटक में मास्की, ब्रह्मगिरी, हल्लुर, कीड़कल, संगनकल्लु, टी. नरसीपुर तथा तैक्कलकोट, तमिलनाडु में पेयमपल्ली, आन्ध्रप्रदेश में पिकलीहल और उतनूर। यहाँ नवपाषाण अवस्था का चरण लगभग ई.पू.2500 से ई.पू.1000 तक रहा, यद्यपि उतनूर के लिए प्राचीनतम कार्बन-तिथि ई.पू.2300 है।

    आवास: नव-पाषाण युगीन मानव ने प्राकृतिक आवासों अर्थात् पर्वतीय गुफाओं एवं पेड़ों का आश्रय त्यागकर नदी तटों एवं पर्वतों के समतल स्थानों पर पेड़ों की टहनियों, तनों, सूखी लकड़ियों, घास, पशुओं की हड्डियों तथा खालों आदि से आवास बनाने आरम्भ किए। ये आवास झुण्ड में बनते थे।

    औजार: इस युग के औजार एवं हथियार पत्थर से ही बनाए जाते थे किंतु अब उनमें पहले की अपेक्षा अधिक वैविध्य, कौशल एवं सौन्दर्य का समावेश किया गया। नव-पाषाण-कालीन औजारों एवं हथियारों पर पॉलिश की जाने लगी। इनके निर्माण के लिए अच्छे दाने के गहरे हरे रंग के ट्रप का उपयोग किया जाने लगा। इस युग के औजारों मंे कुल्हाड़ियाँ, चाकू, तीर, ओखली, मूसल, पीसने के औजार, स्क्रैपर तथा पॉइण्टर उपलब्ध हुए हैं।

    कृषि: नवपाषाण युग की कुल्हाड़ियां उड़ीसा के पहाड़ी क्षेत्रों में भी मिली हैं। देश के इस भाग में चावल की खेती और छोटे पैमाने की बस्तियों की शुरूआत काफी पहले हुई थी। बाद के नवपाषाण युगीन अधिवासी ऐसे कृषक थे जो मिट्टी और सरकंडों से बनाए गए गोलाकार अथवा चौकोर घरों में रहते थे। गोलाकार घरों में रहने वाले लोगों की सम्पत्ति सामूहिक होती थी। यह निश्चित है कि ये लोग स्थायी अधिवासी बन गए थे। ये रागी और कुलथी पैदा करते थे।

    पशु-पालन: पिकलीहल के नवपाषाण युगीन अधिवासी पशुपालक थे। वे गाय-बैल, भेड़-बकरी आदि पालते थे। वे मौसमी पड़ाव डालकर खंभों और खूँटों से गौशालाएं खड़ी करते थे और बाड़ों के भीतर गोबर का ढेर लगाते थे। फिर इस पड़ाव को आग लगाकर आगामी मौसम के पड़ाव के लिए इसे साफ करते थे। पिकलीहल में ऐसे राख के ढेर ओर पड़ावस्थल दोनों ही मिले हैं।

    बर्तन: चूँकि नवपाषाण अवस्था के कई अधिवासी समूह अनाजों की खेती करते थे और पालतू-पशु भी पालते थे, इसलिए उन्हें अनाज और दूध रखने और पकाने-खाने के लिए उन्हें बर्तनों की आवश्यकता थी। चाक पर मिट्टी के बर्तन बनाना इस युग का महत्त्वपूर्ण अविष्कार था। इसी युग में मानव ने मिट्टी के बर्तनों को आग में पकाकर मजबूत बनाना सीखा।

    धर्म: नव-पाषाण काल में धार्मिक अनुष्ठान प्रारंभ हो गए। चूँकि शवों के साथ दैनिक आवश्यकता की वस्तुएं भी शवाधानों से प्राप्त हुई हैं इसलिए अनुमान होता है कि इस काल का मानव पुर्नजन्म में अथवा मृत्यु के बाद के किसी विशेष तरह के जीवन में विश्वास करता था।

    तीनों पाषाण सभ्यताओं का तुलनात्मक अध्ययन

    काल का अंतर: पूर्व पाषाण काल आज से लगभग पांच लाख साल पहले आरंभ होकर आज से लगभग 10 हजार साल पहले तक अर्थात् ई.पू.8000 तक चला। मध्य-पाषाण-काल आज से 10 हजार साल पहले आरम्भ होकर आज से लगभग 6 हजार साल पहले तक अर्थात् ई.पू.4000 तक चला। नव-पाषाण-काल आज से लगभग 6 हजार साल पहले आरंभ हुआ तथा लगभग ई.पू.1000 तक चलता रहा।

    स्थल: पूर्व पाषाण कालीन स्थल कश्मीर, पंजाब, सोहन नदी घाटी, छोटा नागपुर के पठार, विंध्याचल की पहाड़ियों में भीम बेटका, बिहार का सिंहभूम जिला, बंगाल, असम, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक मालप्रभा नदी बेसिन आदि विस्तृत क्षेत्र से प्राप्त हुए हैं। मध्य पाषाण कालीन स्थल हिमालय के द्वितीय हिमनद निक्षेप, बेलन घाटी, भीम बेटका, गुजरात, नर्मदा तट तथा तुंगभद्रा के दक्षिण में मिले हैं। नवपाषाण काल के स्थल कश्मीर की घाटी में बुर्जहोम, पटना के निकट चिरंड, गोदावरी नदी के दक्षिणी क्षेत्र, असम की पहाड़ियां, मेघालय की गारो पहाड़ियां, उड़ीसा, कर्नाटक में मास्की, ब्रह्मगिरि, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश आदि स्थानों पर पाए गए हैं।

    औजार: पूर्व-पाषाण-कालीन औजार क्वार्टजाइट से बनते थे। मध्य-पाषाण कालीन औजार कैल्सेडोनी, जेस्पर, चर्ट और ब्लडस्टोन से बनते थे। नव-पाषाण-काल के औजार अच्छे दाने के गहरे हरे रंग के ट्रप से बनते थे। पूर्व-पाषाण-कालीन औजारों पर किसी तरह की पॉलिश नहीं है। वे अनगढ़, भद्दे और स्थूल हैं। मध्य-पाषाण-कालीन औजार बहुत छोटे हैं इसलिए इन्हें लघुपाषाण, अणुपाषाण ;डपबतवसपजीद्ध तथा लघु औजार भी कहा जाता है। इनका आकार आधा इंच से पौने दो इंच तक पाया गया है। नव-पाषाण-कालीन औजारों पर पॉलिश पाई गई है। अधिकांशतः पूरे औजारों पर पॉलिश की गई है। कुछ औजारों पर ऊपर तथा नीचे की ओर पॉलिश की गई है।

    आवास: पूर्व-पाषाण-कालीन मानव पर्वतीय कंदराओं, वृक्षों एवं प्राकृतिक आवासों में आश्रय लेता था। मध्य-पाषाण कालीन मानव भी आवास बनाने की कला से लगभग अपरिचित था। वह भी प्राकृतिक आवासों पर निर्भर था। नव-पाषाण-कालीन मानव पेड़ों की टहनियों एवं पशुओं की हड्डियों की सहायता से झौंपड़ियां बनाना सीख गया था।

    कृषि: पूर्व-पाषाण-कालीन मानव कृषि करना नहीं जानता था। मध्य-पाषाण कालीन मानव बैलों एवं मानवों की सहायता से कृषि करना सीख गया था। वह पौधों को काटने के लिए हँसिया तथा अनाज को पीसने के लिए चक्कियों का प्रयोग करता था। वह गेहूँ, जौ बाजरा आदि की खेती करता था। नव-पाषाण-काल का मानव चावल, रागी और कुलथी भी पैदा करने लगा था। इनके पॉलिशदार औजारों में लघुपाषाणों के फलक भी हैं।

    पशु-पालन: पूर्व-पाषाण-कालीन मानव ने ई.पू.25,000 के आसपास बकरी, भेड़ और गाय-भैंस आदि पालना आरंभ किया। मध्य-पाषाण-काल का मानव गाय, बैल, भैंस, भेड़, बकरी, कुत्ता, घोड़ा आदि जानवरों को पालता था। पशुओं पर उसकी निर्भरता बढ़ गई। नव-पाषाण काल का मानव पशु-पालन पर और अधिक निर्भर हो गया। बोझा ढोने से लेकर हल खींचने तक के काम पशुओं से लिए जाने लगे।

    बर्तन: पूर्व-पाषाण-कालीन मानव बर्तन बनाना नहीं जानता था। मध्य पाषाण-काल के मानव ने मिट्टी के बर्तन बनाना आरम्भ किया किंतु इस काल के बर्तन न तो चाक पर बनाए जाते थे और न उन्हें आग में पकाया जाता था। नव-पाषाण काल के मानव ने बर्तन बनाने के लिए चाक का अविष्कार किया तथा उन्हें पक्का बनाने के लिए आग में पकाना आरंभ किया।

    सामाजिक संगठन: पूर्व-पाषाण-कालीन मानव टोलियां बनाकर रहता था। उसमें परिवार की भावना विकसित नहीं हुई थी। उनका नेतृत्व एक प्रधान मानव करता था। मध्यपाषाण कालीन मानव में सहकारिता की भावना विकसित हो चुकी थी। उसने परिवार का निर्माण कर लिया था। इसलिए वह कार्य विभाजन एवं वस्तु विनिमय की समझ विकसित कर सका। अल्मोड़ा के निकट दलबंद की एक गुफा में मिले एक चित्र में दो वयस्क और दो बालक पांव से पांव एवं हाथ से हाथ मिलाकर चलते हुए दिखाये गए हैं। यह चित्र परिवार की एकता एवं सुबद्धता का परिचायक है। नव-पाषाण-काल में दूर-दूर रहने वाले मानवों ने समुदायों का गठन कर लिया जिससे कबीलाई संस्कृति का जन्म हुआ। एक कबीले में कई परिवार एक साथ रहते थे। कबीले का एक मुखिया होता था, जिसने आगे के युगों में चलकर राजा का रूप ले लिया।

    कार्य विभाजन: पूर्व-पाषाण-कालीन मानव आखेटजीवी था इसलिए कार्य विभाजन नहीं हुआ था। वह आवास बनाना तथा खेती करना नहीं जानता था। मध्य-पाषाण-काल का मानव आवास निर्माण, कृषि, पशु-पालन एवं मिट्टी के बर्तन बनाने से परिचित हो चुका था इसलिए इस युग के मानव ने कार्य विभाजन आरंभ किया। नव-पाषाण काल में कार्य विभाजन और सुस्पष्ट हो गया।

    शव विसर्जन: पूर्व-पाषाण-कालीन सभ्यता के आरंभिक चरण में शवों को जंगल में छोड़़ दिया जाता था जहाँ वह पशु-पक्षियों द्वारा खा लिया जाता था। बाद में शवों को लाल रंग से रंगकर धरती में गाढ़ना आरंभ किया गया। मध्य-पाषाण-काल का मानव भी शवों को धरती में गाड़ता था। इस कार्य के लिए अलग से स्थान निर्धारित किया जाता था। कभी-कभी घर के भीतर अथवा उनके निकट ही शव को गाड़ा जाता था। शव के साथ उपयोगी वस्तुएँ रखी जाती थीं। इस काल में शव को जलाने की प्रथा भी आरम्भ हो गई थी। शव दहन के पश्चात् उसकी राख को मिट्टी के बर्तन में आदरपूर्वक भूमि में गाड़ा जाता था। नव पाषाण काल में भी शव विसर्जन की यही परम्पराएं अपनाई गईं।

    धर्म: पूर्व-पाषाण-कालीन सभ्यता के बाद के वर्षों में शवों को लाल रंग से रंगकर धरती में गाढ़ना आरंभ कर दिया गया था। इसलिए अनुमान होता है कि उस काल से ही मानव में धार्मिक भावना पनपने लगी। मध्य-पाषाण-संस्कृति का मानव मातृदेवी का उपासक था। देवी को प्रसन्न करने के लिए वह सम्भवतः पशुओं की बलि भी देता था। उसका विश्वास था कि ऐसा करने से पृथ्वी माता प्रसन्न होती है और पशु तथा कृषि में वृद्धि होती है। नव पाषाण काल में धार्मिक भावना और पुष्ट हो गई।

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  • राजस्थान के प्रमुख संग्रहालय - भूमिका

     02.06.2020
    राजस्थान के प्रमुख संग्रहालय  - भूमिका

    भूमिका


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    संग्रहालय किसी भी नृवंश, देश, प्रांत अथवा नगर के इतिहास, संस्कृति, विज्ञान, कला, लेखन आदि विभिन्न क्षेत्रों में हुए विकास को दिखाने वाला विश्वसनीय दर्पण है। यह दर्शक के समय, श्रम एवं धन की बचत करता है, उसकी बौद्धिक उत्सुकता को परिष्कृत करता है एवं जिज्ञासाओं को शांत करता है। वर्तमान युग में संग्रहालय, सम्पूर्ण विश्व में पर्यटकों के आकर्षकण का मुख्य केन्द्र बनते जा रहे हैं।

    विश्व भर के अनेक देशों से 1 करोड़ से अधिक पर्यटक प्रतिवर्ष भारत आते हैं। विदेशी पर्यटक भारत की आय में 27 बिलियन अमरीकी डॉलर का योगदान करते हैं। यह योगदान भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 6.88 प्रतिशत का होता है। प्रत्येक विदेशी पर्यटक भारत में एक-दो अथवा कुछ संग्रहालयों का अवलकोन अवश्य करता है। इस कारण संग्रहालय विदेशी मुद्रा अर्जित करने के सशक्त एवं विश्वसनीय स्रोत बनते जा रहे हैं।

    कहा जा सकता है कि संग्रहालय, विदेशी पर्यटकों के लिए सच्चे राजदूत का काम करते हैं। विदेशी पर्यटकों के साथ-साथ देशी पर्यटक, इतिहास, कला एवं विज्ञान के विद्यार्थी, शिक्षक एवं जनसाधारण भी अपने जीवन में संग्रहालयों का भ्रमण एवं अवलोकन अवश्य करते हैं। संग्रहालयों को देखने से ज्ञान समृद्ध होता है और यह एक अनूठा अनुभव भी होता है। वर्तमान समय के कई महान नगर अपने श्रेष्ठ संग्रहालयों के कारण विश्व भर में जाने जाते हैं।

    राजस्थान में प्रतिवर्ष लगभग 15 लाख विदेशी एवं 4 करोड़ स्वदेशी पर्यटक आते हैं। इन पर्यटकों की सुविधा के लिए पूरे राज्य में सरकारी क्षेत्र में 18 संग्रहालय स्थापित किए गए हैं। अनेक निजी संस्थाएं, व्यक्ति एवं परिवार भी अपने संग्रहालयों का संचालन करते हैं। इस पुस्तक में इन संग्रहालयों में संगृहीत सामग्री के साथ-साथ उनकी विशेषताओं को भी समाहित करने का प्रयास किया गया है।

    पाठकों की सुविधा के लिए पुस्तक के प्रारंभ में संग्रहालय की अवधारणा का विकास, आदिम संग्रहालयों के चिह्न, परग्रही जीवों द्वारा छोड़े गए संग्रहालय, राजस्थान में संग्रहालयों की स्थापना का इतिहास तथा राजस्थान के संग्रहालयों की आधारभूत सामग्री का परिचय दिया गया है।

    आशा है यह पुस्तक शिक्षकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों, पर्यटकों एवं विभिन्न वर्गों के पाठकों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    63, सरदार क्लब योजना

    वायुसेना क्षेत्र जोधपुर

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-37

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-37

    पर्यावरण की रक्षक राजस्थान की विशिष्ट जातियाँ (1)


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    जातियों की विविधता की दृष्टि से राजस्थान समृद्ध प्रदेश है। जातियों का निर्माण, उनकी सामाजिक प्रथाएं तथा उनके आर्थिक क्रिया कलाप इतिहास में गहराई तक जड़ें जमाये हुए हैं। रेबारी, गाड़िया लुहार, कालबेलिया, कठपुतली नट, लखारा तथा भाट आदि जातियों की जीवन शैली बहुत कुछ एक जैसी होते हुए भी काफी अंतर लिये हुए है। इन जातियों के रीति-रिवाजों में भिन्नता है तथा उनके खान-पान, वेश-भूषा एवं लोकाचार आदि में भी विविधता पायी जाती है। इनमें से बहुत सी जातियों ने कला एवं संस्कृति को अपने जीवन यापन के साधन के रूप में अपनाया। इस कारण राजस्थान में लोकनृत्य, लोक संगीत, तथा लोक कलाओं की जितनी विविधता देखने को मिलती है, उतनी विविधता बहुत कम प्रदेशों में देखने को मिलती है। चारणों, भाटों एवं रावों ने अपनी बहियों के माध्यम से प्रदेश के इतिहास और रीति रिवाजों को लेखनीबद्ध करके उसे सदियों तक जीवित रखा है। चारणों एवं भाटों ने डिंगल भाषा में तथा रावों ने पिंगल भाषा में काव्य की रचना करके प्रदेश के शासक एवं जन सामान्य वर्ग की तत्कालीन आवश्यकताओं की पूर्ति की। लखारा, सुनार, मणिहार आदि बहुत सी जातियों ने आभूषणों के निर्माण एवं उनके व्यवसाय का विकास किया। आदिवासी जातियों में भील, मीणा, कथोड़ी, सहरिया आदि प्रमुख हैं। इनकी जीवन शैली, शेष समाज से काफी अंतर लिये हुए है। ये समस्त जातियाँ पर्यावरण के प्रति अत्यंत जागरूक हैं क्योंकि इनमें प्राकृतिक शक्तियों के प्रति आदर भाव है तथा बहुत सीमा तक वे प्रकृति के पुजारी हैं।


    कार्य विशेष से जुड़ी हुई जातियां

    रेबारी

    रेबारी शब्द चरवाहा से बना है। सभ्यता के आदि काल से मनुष्य, पशुओं के साथ जीवन जीता आया है। उसका आरंभिक जीवन यायावर का ही था। इस यायावरी में पशु उसका सहचर था। जब मनुष्य ने खेती करना सीखा तो घर बनाकर एक ही स्थान पर रहने लगा। उसका यायावरी जीवन छूट गया किंतु कुछ लोग अपने पुराने कार्य को अपनाये रहे और चरवाहों में परिणित हो गये। यही चरवाहे राजस्थान में रेबारी तथा राइका कहलाते हैं। ये स्वयं को आर्य तथा उच्च रक्तवंशी मानते हैं। सभ्यता के क्रमिक विकास में जहाँ अधिसंख्य आर्य, कृषि, व्यापार, पौरोहित्य, युद्ध तथा अन्य कमों में लग गये वहीं कुछ आर्य चरवाहे ही बने रहे किंतु उससे उनके रक्त की श्रेष्ठता में कोई अंतर नहीं आया। रेबारियों के पूरे जीवन दर्शन में यह बात देखने को मिलती है।

    राजस्थान के जालोर-सिरोही एवं पाली क्षेत्र में बड़ी संख्या में रेबारी रहते हैं। अपनी उच्च रक्त एवं वंश परंपरा के अनुरूप ये सफेद अंगरखी और सफेद धोती पहनते हैं। सिर पर गहरे लाल रंग की भारी भरकम पगड़ी बांधते हैं। त्यौहार आदि विशेष अवसरों पर पगड़ी पर सुनहरी जरी एवं गोटे-पट्टी की पगड़ियां धारण करते हैं। कंधे पर लम्बी लाठी होती है जिसके एक किनारे पर पेड़ों की टहनियां काटने के लिये हंसिया और दूसरे किनारे पर मिट्टी का छोटा जलपात्र एवं भोजन की पोटली बंधी रहती है। रेबारी महिलायें रंगीन कपड़े पहनती हैं। उनके घाघरे अपेक्षाकृत गहरे रंग के, बड़े घेर वाले और वजन में काफी भारी होते हैं। उनके पैरों में चांदी के भारी कड़े, सिर से पांव तक चांदी के छोटे बड़े ढेर से आभूषण, आँखों में काजल, माथे पर चौड़ी बिंदिया और सिर से लेकर पैरों तक गोदने गुदे हुए होते हैं। रेबारी स्त्री-पुरुषों की ऊँचाई काफी अच्छी होती है। शरीर सामान्यतः इकहरा, गौरवर्ण एवं हाथ-पैर खुले हुए होते हैं।

    रेबारियों में शिक्षा का अभाव है क्योंकि इन्हें अपने पशुओं के साथ-साथ दूर-दूर तक की यात्रायें करनी पड़ती हैं तथा इनका अधिकांश जीवन पशुओं को चराने के लिये 'डेंग' पर ही निकल जाता है। इनमें सम्पन्नता की कोई कमी नहीं है। प्रत्येक रेबारी के कानों में सोने की मुरकियां, स्त्री और पुरुष दोनों के पैरों में चांदी के कड़े तथा रेबारी औरतों के गले में सोने की कंठियां सहज रूप से देखी जा सकती हैं। इनमें बाल विवाह की परंपरा है। प्रायः घर की सारी लड़कियों का विवाह एक साथ किया जाता है। दहेज प्रथा के स्थान पर दापा प्रथा है। विवाह के अवसर पर एक या दो दिन पहले घर के किसी मृत बड़े-बूढ़े का मौसर करते हैं। राजस्थान में राइका मुख्यतः ऊँट एवं भेड़ पालन से जुड़े हुए हैं। रेबारियों में विधवा स्त्री को पुनर्विवाह का अधिकार है किंतु यह उसी की इच्छा पर निर्भर है, कोई जोर-जबर्दस्ती नहीं की जाती। महिलायें पुरुषों से पर्दा करती हैं।

    कालबेलिया

    गेरुए वस्त्रधारी, यायावर जिंदगी जीने वाले, कांवड़नुमा झोलों में सांप, बिच्छू, गोहरे, नेवले आदि विषैले जीव-जंतुओं को रखे हुए, लोगों का भरपूर मनोरंजन करने की कला में निष्णात कालबेलिये, भारतीय समाज में अलग पहचान रखते हैं। कालबेलिये नाथ मतावलम्बी एवं आदिनाथ शिव के उपासक होते हैं। चूंकि 'शिव' को 'नाग' प्रिय होते हैं, इसलिये कालबेलिये भी सांप की आराधना करते हैं। जब कालबेलिये किसी सांप को पकड़ते हैं, तो उसी समय सांप से एक मांत्रिक वायदा करते हैं कि इतने वर्षों बाद उसे मुक्त कर दिया जायेगा। ये लोग 'सांप'को दिये गये वचन का अनिवार्यतः पालन करते हैं। संभवतः इसीलिये इन्हें कालबेलिये (काल अर्थात् सांप, बेली अर्थात् मित्र) 'सांपों का मित्र'कहते हैं। नाथ संप्रदाय के साढ़े बारह पंथों में से एक है, 'कानपा पंथ'। इस पंथ का प्रवर्तन 'जलंधर नाथ' के शिष्य 'कानपा नाथ' ने किया था। कालबेलिये इन्हीं कानपानाथ को अपना गुरु मानते हुए, उनके द्वारा निर्दिष्ट प्राणायाम, ओमकार मंत्र सिद्धि तथा अलख निरंजन की साधना में जीवन का अधिकांश समय व्यतीत करते हैं। ग्राम्यांचलों में कालबेलियों की मदद से लोग, अपने घरों में घुसे हुए सांप को पकड़वाते हैं।

    कालबेलिये सर्पदंश की चिकित्सा करने में निपुण होते हैं तथा जड़ी बूटियों का विशद् ज्ञान रखते हैं। सर्प विष का व्यापार करने वाले कालबेलिये भी मिलते हैं। महाशिवरात्रि के अवसर पर कालबेलिये विशेष रूप से गाँवों तथा बस्तियों में विचरण करने लगते हैं। इस अवसर पर बीन की सुमधुर धुनों पर सांप को नचाने का उपक्रम करते हुए ये लोग शिवभक्तों की कृपा के पात्र बनते हैं। बीन बजाने की कला में कालबेलियों का कोई जवाब नहीं है। कालबेलियों के छोटे बच्चे भी बीन बजाने की कला में महारत रखते हैं। नृत्य व संगीत से कालबेलियों को बेहद लगाव है। ये लोग भर्तृहरि गाथा, शिवाजी का ब्याहला इत्यादि लोकाख्यानों को गाते हैं। लोकप्रिय 'कालबेलिया' नृत्य इन्हीं कालबेलियों की देन है जिसकी आज देश-विदेश में धूम मची हुई है। यह नृत्य कालबेलिया युवतियों द्वारा किया जाता है। इस दौरान पुरुष, बीन की मनोहारी धुनें निकालते हैं तथा भपंग वादन करते हैं।

    कालबेलियों के चौमासा, चिरमी, मोरिया नामक लोकगीत बेहद पसंद किये जाते हैं। कालबेलिया नृत्यांगना 'गुलाबो' का नाम उल्लेखनीय है जिसने अपनी कालबेलिया नृत्यकला की बदौलत कालबेलियों को विशिष्ट पहचान दी और राजस्थान का नाम विश्व भर में ऊँचा किया। गुलाबो इस नृत्यकला का प्रदर्शन अनेक देशों में कर चुकी है।

    भोपा

    भोपे पेशे से पुजारी होते हैं। ये मंदिर में देवता के आगे या संरक्षकों के द्वार पर जाकर गायन एवं नृत्य दिखाते हैं। 'पाबू प्रकाश' के अनुसार भोपा जाति भीलों की वंशज है। भीलों से नायक और नायकों से भोपे अलग हुए। भोपों की कई शाखाएं हैं- गूजर भोपा, नायक भोपा, कामड़ भोपा और भील भोपा। पारंपरिक लोकगायक होते हुए भी ये, रोटी-बेटी के व्यवहार में सर्वथा भिन्न हैं। भीलों के भोपे पाबूजी की फड़ गाते हैं। गूजरों के भोपे देवनारायण (बगड़ावतों) की फड़ गाते हैं। गोगाजी के भोपे सामूहिक नृत्य एवं गायन करते हैं तथा डैरूं एवं मीठ नामक ढोल बजाते हैं। रामदेवजी के भोपे कामड़ जाति के होते हैं और मंजीरे बजाकर तेरहताली नृत्य करते हैं। माताजी के भोपे करणीमाता एवं जीणमाता की चमत्कारपूर्ण दैविक शक्ति में आस्था रखते हैं तथा दूल्हे की वेशभूषा पहनते हैं। भैंरूजी के भोपे कपड़ों पर तेल, चेहरे पर राख, माथे पर सिन्दूर लगाकर हाथ में त्रिशूल धारण करते हैं। मशक नामक वाद्य यंत्र को मुंह से बजाते हैं।

    राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात में भोपों को देखा जा सकता है। जोधपुर, नागौर, बीकानेर, चूरू, सीकर, झुंझनूं और जयपुर से श्रीगंगानगर के बीच जो भोपा लोक गायक मिलते हैं, उनकी अलग पहचान है। ये पाबूजी के भोपा होते हैं। अर्थात् पाबूजी राठौड़ की कहानी को गाकर सुनाना और इसी आधार पर अपनी वंश परंपरा को कायम रखना इनकी विशेषता है। एक जगह से दूसरी जगह घूमते-फिरते रहने वाली यह जाति गाँव या बस्ती से बाहर खुले में अपना डेरा लगाती है। आमतौर पर दो-चार डेरे यानी परिवार एक साथ रहते हैं। डेरा लगाने का विशेष तरीका होता है। ये लोग अपने तम्बू या 'सरकी' को अर्द्ध-गोलाकार आकृति में बनाते हैं, ताकि बरसात और आंधी तूफान से बचाव हो सके। इसी कारण इनको 'सरकी बंद' कहा जाता है। आजकल गाँवों में भोपों के कुछ परिवार स्थायी तौर पर भी बस गये हैं किंतु एक गाँव में मूलतः एक ही परिवार बसता है।

    पुरुष भोपा धोती-कुर्ता पहनते हैं तथा माथे पर साफा बांधते हैं। कानों में 'गुड़दा' या 'मुरकी' एवं गले में 'मूरत' धारण करते हैं। स्त्रियां घाघरा, कुर्ती और ओढ़नी पहनती हैं। शृंगार के लिये आभूषणों का प्रयोग किया जाता है। सोना-चांदी उपलब्ध हो तो प्रतिष्ठा बनती है अन्यथा गिलट, रांगा, तांबा और अन्य सुलभ धातुओं के आभूषण काम में लिये जाते हैं। गाँव में फेरी के लिये घूम कर 'मांगणी' करते हुए जो खाद्य सामग्री मिल जाती है, उसको घर लाकर पका खाते हैं। भोजन में मांसाहार मुख्य होता है। भोपा पुरुष अकेले में या टोली बनाकर शिकार करते हैं। शिकार करने के लिये इनके पालतू कुत्ते सहायक होते हैं। कुत्ते इनके डेरे और सामान की चौकसी करते हैं। पाबूजी भोपाओं के आराध्य देव हैं। शक्ति रूपा मातेश्वरी और भैरवदेव की भी पूजा करते हैं। भोपा हिंदू होते हैं तथा हिंदुओं के ही त्यौहार मनाते हैं। एक जगह से दूसरी जगह जीविकोपार्जन के लिये घूमते हुए ही इस जाति के जनम, परण एवं मरण आदि महत्त्वपूर्ण पारिवारिक एवं सामाजिक मसले हल होते हैं। लड़का और लड़की दोनों की ही गायकी में योग्यता, रिश्ता तय होने में सहायक होती है। शादी से पहले और बाद में भी लड़की और लड़के वाले, साथ-साथ घूमते-फिरते, खाते-कमाते रह सकते हैं। दस-पंद्रह परिवार इकट्ठे होते हैं तो आपसी मन-मुटावों को दूर किया जाता है। झगड़े-फसाद की स्थिति में भी मामला भोपा बिरादरी द्वारा सुलझाया जाता है। इसके लिये पंचायत बैठाई जाती है। 'लाग' और 'ढो' अर्थात् दोनों पक्षों को एक जगह बैठाया जाता है। 'मुचलके' भरवाये जाते हैं। यह 'मुचलका' नगद या पेशगी होती है। मुचलका भर देने के बाद दोनों पक्षों पर पाबंदी लग जाती है। तेज आवाज में बोलना मात्र भी पंचायत का अपमान माना जाता है। पंचायत कई दिनों तक चल सकती है। तब तक पंचगणों और मुखियाओं का खाने-पीने का पूरा खर्च विवाद वाले दोनों पक्षों को भुगतना पड़ता है।

    कठपुतली नट

    कठपुतली नट, कठपुतलियों के माध्यम से नाट्यकला का प्रदर्शन करते हैं। किसी समय राजस्थान में कठपुतली नटों की संख्या काफी थी किंतु अब ये कम संख्या में रह गये हैं। रामायण, महाभारत, पंचतंत्र आदि ग्रंथों में पुतलियों का उल्लेख है और उनसे संदेशवाहक का काम भी लिया गया है। महाभारत में वृहन्नला (अर्जुन) द्वारा उत्तरा को पुतलियां बनाना सिखाने का उल्लेख है। इसी ग्रंथ में 'रूपजीवन' शब्द पुतलियों के तमाशे के लिये कई बार आया है। 'वीर कारिता' नामक एक भारतीय ग्रंथ में कहा गया है कि पार्वतीजी के पास एक बहुत ही मनमोहिनी पुतली थी जो उन्होंने शिवजी से छिपाकर रखी थी। पंचतंत्र में भी मानवी करतब करने वाली पुतलियों के बारे में बताया गया है।

    विक्रमादित्य के समय 'सिंहासन बत्तीसी' नामक एक सिंहासन था जिसकी 32 पुतलियां रात को अपने राग रंग से सम्राट को रिझाती थीं। पिरचेल नामक विद्वान का मानना है कि विश्व की समस्त पुतलियों का उद्गम स्थल भारत है। भारत में कठपुतली कला की सात शैलियां हैं। इनमें से राजस्थान की सूत्र संचालित पुतलियां, दक्षिण भारत की बम्बोलोटम पुतलियां, आंध्र की छाया एवं काष्ठ पुतलियां, बंगाल की छड़ आदि पुतलियां प्रमुख हैं। राजस्थान की कठपुतलियां भाटों तथा नटों द्वारा नचाई जाती हैं। ये नट पहले राजा-महाराजाओं के दरबार की शोभा बढ़ाते थे। धीरे-धीरे इनका सामाजिक और आर्थिक स्तर गिरता चला गया। कठपुतली के खेल में 'सिंहासन बत्तीसी', 'पृथ्वीराज संयोगिता'और 'अमरसिंह राठौड़ का खेल'नामक तीन कथायें बहुत प्रचलित हैं। अमरसिंह राठौड़ का खेल सबसे अधिक सुनाया जाता है।

    सड़क, गली, कल कारखानों, बस्तियों आदि स्थलों पर दो खाटों को सीधा खड़ा करके उन्हें बांसों से बांध देते हैं और रंगमंच की शक्ल दे देते हैं। आगे पर्दा लगाते हैं और पीछे काली, सफेद अथवा रंगीन चादर लगा कर कठपुतलियों का संचालन करते हैं। राजस्थानी वेशभूषा में कठपुतलियां आकर्षक लगती हैं। इनकी भाषा सीटी की आवाज जैसी होती है जो ढोल के साथ दर्शकों को बांधे रखती है। कठपुतली चालक स्वयं ही कठपुतलियों को बनाते हैं और इन्हें बड़े आदर-भाव से देखते हैं। सूत्र द्वारा संचालित करने के कारण नट कठपुतली को ऊपर-नीचे, दांयें, बांयें कुदा सकते हैं। नट के हाथ यंत्रवत् चलते हैं। कठपुतलियों को नचाने वाले पुतलीकार जीविकोपार्जन के लिये एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते हैं।

    भाट

    भाट जाति का मुख्य कार्य राजवंशों, गाँव के ठाकुरों तथा श्रेष्ठि परिवारों की वंशावलियां संग्रहीत करना तथा उन्हें बहियों के माध्यम से लिपिबद्ध करना रहा है। भाटों की बहियां राजस्थान के इतिहास की टूटी कड़ियों को जोड़ने में महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुई हैं। प्रत्येक जाति का अपना भाट होता था। ये लोग बच्चों के जन्म, विवाह आदि उत्सवों पर परिवार की वंशावली तथा उनके पूर्वजों द्वारा किये गये प्रमुख कार्यों का बखान करते थे।

    चेजारा

    राजस्थान में कुओं की खुदाई का काम परम्परागत रूप से चेजारा जाति के पुरुष करते आये हैं। इन्हें चेलवां भी कहा जाता है। मरुस्थल में कुओं की खुदाई का कम अत्यंत जोखिम भरा है। कुओं एवं कुइयों की खुदाई बसूली अथवा बसौली से की जाती है। कुइयां अत्यंत संकरी होती है। इसलिये इसकी खुदाई का काम फावड़े, गेंती अथवा कुल्हाड़ी से नहीं किया जा सकता क्योंकि कुएं की मिट्टी के ढहने का खतरा रहता है। चेजारा जाति के पुरुष सिर पर लोहे का टोप पहनकर बसौली से धीरे-धीरे खुदाई करते हैं ताकि कुएं की मिट्टी न ढहे। जैसे-जैसे कुएं की गहराई बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे गर्मी बढ़ती जाती है तथा ऑक्सीजन की कमी होती जाती है। चेजारे को इन्हीं परिस्थितियों में काम करना होता है।

    गहराई में काम कर रहे चेजारे तक हवा तथा ऑक्सीजन पहुंचाने के लिये, ऊपर धरती पर खड़े लोग थोड़ी-थोड़ी देर में मुट्ठियों में धूल भरकर तेजी के साथ कुएं में फैंकते हैं। इस धूल के साथ धरती की स्वच्छ एवं ऑक्सीजन युक्त वायु नीचे जाती है। इस मिट्टी से सिर को बचाने के लिये सिर पर लोहे का टोप पहना जाता है। थोड़ी-थोड़ी देर में लोहे की बाल्टी कुएं में उतारी जाती है। नीचे काम कर रहा चेजारा बाल्टी में, खुदी हुई मिट्टी भर देता है, जिसे धरती पर खड़े लोग खींच लेते हैं। एक दिन में दस हाथ की गहराई तक अर्थात् 12 से 15 फुट तक खुदाई हो जाती है। जैसे ही कुएं या कुईयां की खुदाई आरम्भ होती है, वैसे ही धरती पर खड़े कुछ लोग खींप काटकर उससे रस्सी बंटना आरम्भ कर देते हैं।

    पहले दिन की खुदाई पूरी होने पर कुइयां के भीतर इस रस्सी को गोल घेरे में बैठाया जाता है। दूसरे दिन की खुदाई पूरी होने पर रस्सी के इस घेरे को नीचे सरका दिया जाता है तथा उसके ऊपर के हिस्से में फिर से रस्सी का घेरा लगाया जाता है। इस प्रकार जैसे-जैसे कुइयां गहरी होती जाती है, रस्सी का घेरा नीचे सरकता रहता है तथा ऊपर के घेरे में रस्सी का घेरा बनाया जाता है। यह घेरा मिट्टी को ढहने से रोकता है। तीस हाथ गहरी कुइयां में लगभग चार हजार हाथ लम्बी रस्सी से घेरा बनता है। कहीं-कहीं रस्सी लगाने के स्थान पर पत्थर से चिनाई की जाती है। जब खुदाई करते-करते चूना पत्थर की पर्त आती है, तो खुदाई का काम बंद कर दिया जाता है तथा वहाँ पर धार लगाकर चेजारा बाहर आ जाता है। इस धार में से होकर भूगर्भ का जल कुइयां में आने लगता है। अब कुओं एवं कुइयों का स्थान टॅयूबवैल लेते जा रहे हैं।

    ओड

    राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उड़ीसा आदि राज्यों में ओड जाति निवास करती है। इस जाति के स्त्री-पुरुष, तालाब तथा कुएं बनाने में कुशल होते हैं। इनके लिये कहावत कही जाती है कि ओड हर दिन नए कुएं से पानी पीते हैं। ये लोग गधे पालते हैं तथा गधों पर मिट्टी ढोकर तालाब की पाल बनाते हैं। ये मिट्टी के पारखी होते हैं तथा मिट्टी के गुण एवं स्वभाव को जानते हैं। राजस्थान में कहावत है कि ओड कभी दब कर नहीं मरते। इस जाति के स्त्री-पुरुष एक साथ काम करते हैं।

    उत्तरी भारत के प्रांतों में जसमा ओढ़न की गाथा कही जाती है जिसका कथानक इस प्रकार से है- एक परिवार मिट्टी खोदने का काम करता था। इस परिवार की जसमा नाम की स्त्री अत्यंत सुंदरी थी। एक बार उस देश के राजा की दृष्टि जसमा पर पड़ी और वह उस पर मुग्ध होकर उससे विवाह करने के लिये तत्पर हो गया। जसमा पतिव्रता स्त्री थी और अपने पति से बहुत प्रेम करती थी। उसने राजा से विवाह करने से मना कर दिया। इस पर राजा ने सारे ओड पुरुषों को मरवा दिया। जसमा अपने पति के साथ सती हो गयी।

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  • अध्याय - 5 भारत में ताम्राश्म संस्कृतियाँ

     02.06.2020
    अध्याय - 5 भारत में ताम्राश्म संस्कृतियाँ

    भारत में ताम्राश्म संस्कृतियाँ


    ताम्र धातु का प्रयोग तत्कालीन मनुष्य के बौद्धिक विकास की सूचना देता है। - विमलचन्द्र पाण्डेय


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    धातु काल में प्रवेश


    मानव सभ्यता ने पाषाण-काल से निकलकर धातु-काल में प्रवेश किया। कुछ विद्वानों का विचार है कि धातु-काल के लोग पाषाणकाल के लोगों से भिन्न थे और उत्तर-पश्चिम के मार्गों से भारत में आए थे। कतिपय अन्य विद्वानों का मत है कि धातु-काल के लोग नव-पाषाण-काल के लोगों की ही सन्तान थे। इस मत के समर्थन में दो बातें कही जाती हैं। पहली बात यह है कि धातु-काल के प्रारम्भ में, पाषाण तथा धातुओं का प्रयोग साथ-साथ होता था और दूसरी यह है कि इस सन्धि-काल की वस्तुओं के आकार तथा बनावट में बड़ी समानता है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि नवपाषाणकाल की सभ्यता धीरे-धीरे उन्नति करके धातु-काल की सभ्यता में बदल गयी।

    धातु की खोज: अनुमान होता है कि मनुष्य द्वारा भोजन पकाने के लिए बनाए गए चूल्हों में लगे पत्थरों के गर्म होने से उनमें से धातु पिघलकर अलग हो गई होगी, जब यह घटना कई बार हुई होगी तो नव पाषाण कालीन मानव ने धातु की खोज का कार्य सम्पन्न कर लिया होगा। बहुत से विद्धानों का मानना है कि मानव ने सबसे पहले सोने की खोज की, उसके बाद ताम्बे की खोज हुई। चूँकि सोना अत्यंत अल्प मात्रा में मिलता था इसलिए औजार एवं हथियार बनाने में ताम्बे का उपयोग किया गया।

    धातु-काल का अर्थ: धातु-काल से तात्पर्य उस कालावधि से है जब मनुष्य ने पत्थर के स्थान पर धातु का प्रयोग करना आरम्भ किया। सबसे पहले ताम्बे का, उसके बाद काँसे का और अन्त में लोहे का प्रयोग आरम्भ हुआ। चूँकि इन धातुओं का प्रयोग निरन्तर आधुनिक काल तक होता चला आ रहा है इसलिए नव-पाषाण-काल के पश्चात् से लेकर आज तक के काल को धातु-काल कहा जाता है। इस लम्बे काल में मानव-सभ्यता का विकास तेज गति से होता गया है। धातुकाल का मानव, विज्ञान के बल पर इतने आश्चर्यजनक कार्य कर रहा है जो पाषाणकाल में सम्भव नहीं थे।

    धातु-काल का विभाजन: धातु-काल को तीन भागों में बांटा जाता है- (1.) ताम्र-काल, (2.) कंास्य-काल तथा (3.) लौह-काल।

    ताम्र-कांस्य सम्यता का विकास उत्तर भारत में ही हुआ। दक्षिण भारत में ताम्रकाल के बाद सीधे ही लोहे का प्रयोग आरम्भ हो गया।

    ताम्र काल

    मानव द्वारा, धातुओं में सबसे पहले ताम्बे का प्रयोग आरम्भ हुआ। ताम्र-काल उस काल को कहते है जब मनुष्य ने अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ ताम्बे से बनाना आरम्भ किया। ताम्र-काल का आरम्भ नव-पाषाण काल के अंतिम चरण में हुआ। ताँबे की खोज का वास्तविक काल ज्ञात नहीं है किंतु अनुमान है कि इसकी खोज ई.पू. 5,000 के आसपास हुई। मैलूकाइट नामक हरे अयस्क को कोयले के साथ ढेरी लगाकर, गर्म करने से ताँबा बहकर नीचे आ जाता था।

    इसका सबसे प्राचीन प्रमाण मिस्र में मिला है। मिस्र में ई.पू. 5,000 की कब्रों से तांबे के हथियार मिले है। साइप्रस में लगभग ई.पू. 3,000 में ताँबे का बहुत अधिक मात्रा में उत्पादन होता था। उन दिनों रोम देश के निवासी साइप्रस से ताँबा खरीदते थे। एशिया में ताम्र का प्रयोग प्रथम बार कब हुआ, यह ठीक से ज्ञात नहीं हैं। शू किंग की गाथाओं के अनुसार चीन देश में ई.पू. 2,500 के आसपास ताम्र के प्रयोग का उल्लेख मिलता है। भारत में प्रमुख ताम्र-पाषाणिक बस्तियों का प्रसार लगभग ई.पू.2150 से ईस्वी 600 (सैन्धव सभ्यता से गुप्तकाल) तक रहा।

    भारत में ताम्बे का सर्वप्रथम उपयोग सैंधव सभ्यता द्वारा अथवा उसके समकालीन किसी प्राचीन सभ्यता द्वारा किया गया होगा जो आर्यों के आगमन से पहले उत्तरी भारत के मैदानों में मौजूद रही होगी। ताम्बे को प्रयोग में लाने के कई कारण थे। पत्थर को गलाया नहीं जा सकता परन्तु ताम्बे को गलाया जा सकता है। इसलिए ताम्बे को गलाकर उससे छोटी-बड़ी कई तरह की वस्तुएँ बनाई जा सकती थीं। पत्थर की अपेक्षा ताम्बे की बनी हुई वस्तुएँ अधिक सुन्दर, सुडौल, सुदृढ़़ तथा चिकनी होती थीं।

    ताम्बे में यह सुविधा भी थी कि उससे चद्दरें भी बनाई जा सकती थीं और उसके टुकड़़े भी किए जा सकते थे। टूट जाने पर ताम्बे को जोड़ा भी जा सकता था। छोटा नागपुर के पठार से लेकर उत्तरी गंगा-द्रोणी तक फैले हुए विशाल क्षेत्र में ताम्र-वस्तुओं की चालीस से अधिक निधियाँ मिली हैं परन्तु इनमें से लगभग आधी निधियाँ केवल गंगा-यमुना के दोआब से प्राप्त हुई हैं। दूसरे क्षेत्रों से छुटपुट निधियाँ ही मिली हैं।

    इन निधियों में कुल्हाड़े, मत्स्य-भाले, खड्ग और परशु आकृति वाली वस्तुएं हैं। इन वस्तुओं का उपयोग न केवल मछली मारने, आखेट करने और लड़ाई करने अपितु दस्तकारी, कृषि आदि अनेक कामों के लिए भी होता था। इन ताम्र-वस्तुओं के निर्माता कुशल शिल्पकार थे। ये वस्तुएं आखेटकों अथवा घुमन्तू लोगों द्वारा निर्मित नहीं हो सकतीं। ऊपरी गंगा की घाटी में कई स्थलों पर ये वस्तुएं गेरुए रंग के बर्तनों और कच्ची मिट्टी के ढांचों के साथ मिली हैं।

    इससे पता चलता है कि ताम्र-निधियों का उपयोग करने वाले लोग स्थायी बस्तियों में रहते थे। दोआब के काफी बड़े भाग में बसने वाले ये सबसे पुराने आदिम कृषक और कारीगर लोग थे। गेरुए रंग के बर्तनों वाले अधिकांश स्थल गंगा-यमुना दोआब के उत्तरी भाग से मिले हैं परन्तु ताम्र-निधियां प्रायः समस्त दोआब और इसके परे भी मिली हैं। गेरुए रंग के मृदभाण्डों की इस संस्कृति का काल मोटे तौर पर ई.पू.2000 और ई.पू.1800 के बीच का है।

    ताम्र-वस्तुओं तथा गेरुए रंग के बर्तनों का उपयोग करने वाले वाले लोगों की बस्तियां जब गायब हो गईं, तो लगभग ई.पू.1000 तक दोआब निर्जन ही रहा। इस बात का कुछ संकेत मिलता है कि काले और लाल बर्तनों को उपयोग मंे लाने वाले लोगों की छुटफुट बस्तियां थीं परन्तु अब तक उनके सांस्कृतिक अंतर के सम्बन्ध में सुस्पष्ट धारणा नहीं बन सकी है। जो भी हो, दोआब के उत्तरी भाग तथा ऊपरी गंगा की घाटी में धातु युग का वास्तविक आरम्भ ताम्र वस्तुओं और गेरुए रंग के बर्तनों का उपयोग करने वाले लोगों के साथ ही हुआ परन्तु किसी भी स्थल पर इनकी बस्ती लगभग सौ साल से अधिक समय तक टिकी नहीं रही।

    न ही ये बस्तियां बड़ी थीं और न काफी बडेे़ क्षेत्र में फैली हुई थीं। इन बस्तियों का अंत क्यों और कैसे हुआ, यह स्पष्ट नहीं है। हिन्दू-धर्म में तांबे के बर्तनों को पवित्र तथा धार्मिक दृष्टि से शुद्ध माना जाता है तो इसका कारण सम्भवतः यह है कि तांबा मानव द्वारा खोजी गई प्रथम धातु थी।

    ताम्राश्म संस्कृति की विशेषताएँ

    ताम्राश्म संस्कृति के लोगों के बारे में यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि इस संस्कृति के लोग पश-ुपालक थे, कृषि करते थे, साधारण किस्म के ताम्बे का प्रयोग करते थे और ग्रामीण परिवेश में रहते थे।

    काल निर्धारण: कालक्रम के अनुसार ताम्र-पाषाण संस्कृति, सिंधु सभ्यता की कांस्य संस्कृति के बाद आती है। वैज्ञानिक विधि से निर्धारित की गई तिथियों से पता चलता है कि ताम्र-पाषाण संस्कृति का प्रारंभ ई.पू.2150 के पश्चात् हुआ था। कुछ क्षेत्रों में इस संस्कृति का चरण ई.पू.1000 तक चला, तो कुछ अन्य क्षेत्रों में ई.पू.800 तक अथवा उसके बाद ईस्वी 600 (गुप्तकाल) तक भी चलता रहा। जब तक लोहे के औजारों का प्रचलन नहीं हुआ, तब तक पुराने औजारों का उपयोग होता रहा परन्तु अनेक क्षेत्रों में काले-लाल मृदभाण्डों का उपयोग ईसा पूर्व दूसरी सदी तक होता रहा।

    ताम्र एवं पाषाण का एक साथ उपयोग: इस काल के मानवों द्वारा ताम्र एवं पाषाण उपकरणों का उपयोग एक साथ किया जाता रहा इसलिए इस संस्कृति को ताम्र-पाषाण संस्कृति भी कहते हैं। इस अवस्था मंे तांबे का उत्पादन सीमित था। तांबे की भी अपनी सीमाएं थी। केवल तांबे से बनाया गया औजार नरम होता था। तांबे के साथ टिन मिलाकर एक अधिक मजबूत और उपयोगी कांसे की मिश्र धातु बनाने की कला लोगों को ज्ञात नहीं थी। कांसे के औजारों ने कीट, मिò और मेसोपोटामिया में प्राचीनतम सभ्यताओं के उदय में सहायता दी। सिन्धुवासी भी कांसे का प्रयोग करते थे परन्तु दो-आब क्षेत्र की ताम्र-पाषाणिक अवस्था में कांसे के औजारों का प्रायः अभाव ही है।

    प्रस्तर फलकों का प्रयोग: ताम्र-पाषाण संस्कृतियों के लोगों ने पत्थर के जिन छोटे औजारों और हथियारों का उपयोग किया उनमें प्रस्तर-फलकों का स्थान महत्त्वपूर्ण था। यद्यपि कई स्थलों पर प्रस्तर-फलक उद्योग ने खूब उन्नति की तथापि पत्थर की कुल्हाड़ियों का भी उपयोग होता रहा। ऐसे स्थल पहाड़ियों से अधिक दूर नहीं होते थे, परन्तु ऐसे ही अनेक स्थल नदी मार्गों पर भी खोजे गए हैं। कुछ स्थलों से तांबे की कई वस्तुएं मिली हैं। आहड़ और गिलूँड ऐसे ही स्थल हैं जो राजस्थान की बनास घाटी के शुष्क क्षेत्र में स्थित हैं। आहड़ से पत्थर की कोई कुल्हाड़ी या फलक नहीं मिला है। इसके विपरीत, यहाँ से तांबे की कई कुल्हाड़ियां और दूसरी वस्तुएं मिली हैं, क्योंकि तांबा स्थानीय रूप से उपलब्ध था। गिलूँड में प्रस्तर-फलक उद्योग मिलता है। महाराष्ट्र के जोर्वे तथा चंदोली से तांबे की सपाट तथा आयताकार कुल्हाड़ियां मिली हैं, चंदोली से तांबे की तक्षणियाँ (छेनियाँ) भी मिली हैं।

    यातायात के साधनों में वृद्धि: पाषाण-काल के आरंभिक चरण में बोझा ढोने का काम मनुष्य स्वयं करता था परन्तु पशु-पालन आरंभ होने से बोझा ढोने का काम पशुओं द्वारा किया जाने लगा। बोझा ढोने के लिए सबसे पहले बैलों का प्रयोग किया गया परन्तु बाद में गधों, घोड़ों तथा ऊँटों का प्रयोग होने लगा। ताम्रकाल में यह कार्य पशुओं के साथ-साथ पशुओं द्वारा खींची जाने वाली पहियेदार गाड़ियों से भी किया जाने लगा। जल यात्राओं के लिए नावों का निर्माण भी आरम्भ हो गया।

    कृषि में उन्नति: कृषि का काम मध्य-पाषाण-काल में ही आरम्भ हो गया था परन्तु अब कृषि बहुत बड़े परिमाण में की जाने लगी। पशुओं की संख्या में वृद्धि हो जाने के कारण अब उनके चारे तथा रखने की व्यवस्था करनी पड़ी। पशुओं के लिए मोटे अन्न की खेती की जाने लगी। अनुमान है कि इस काल का मानव कृषि कार्य में हल का उपयोग नहीं करता था। ये लोग नुकीले पत्थर के दूसरे सिरे में लकड़ी के डण्डे फंसा कर उससे धरती खोदते थे। इस संस्कृति की बस्तियों से हल नहीं मिला है। ये लोग चावल, गेहूँ, बाजरा, मसूर, उड़द तथा मूँग जैसी कई दालें और मटर पैदा करते थे। महाराष्ट्र में नर्मदा तट पर स्थित नवदाटोली में इन समस्त अनाजों के अवशेष मिले हैं। सम्भवतः भारत के किसी भी अन्य स्थल के उत्खनन में इतने अधिक अनाज प्राप्त नहीं हुए हैं। नवदाटोली के लोग बेर और अलसी पैदा करते थे। दक्खन की काली मिट्टी में कपास की पैदावार होती थी। निचले दक्खन में रागी, बाजरा और इसी कोटि के दूसरे कई अनाजों की खेती होती थी।

    पशु-पालन: विद्धानों का मत है कि ताम्र-पाषाणिक काल का मानव पशुओं को दूघ या घी प्राप्त करने के लिए नहीं पालता था अपितु मांस प्राप्ति, बोझा ढोने, कृषि करने तथा यातायात के लिए करता था। दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी मध्य प्रदेश और पश्चिमी महाराष्ट्र में रहने वाले ताम्र-पाषाण काल के लोगों ने पशुओं को पालतू बनाया था और वे खेती भी करते थे। वे गाय, बकरी, सूअर और भैंस पालते थे और हिरन का आखेट करते थे। इस काल की बस्तियों से ऊंट के अवशेष भी मिले हैं। पशुओं के कुछ ऐसे अवशेष मिले हैं जो घोड़े या पालतू गधे या जंगली गधे के हो सकते हैं। ये लोग निश्चय ही गौ-मांस खाते थे, सूअर के मांस का बहुत उपयोग नहीं होता था।

    मछली एवं चावल का भोजन: बिहार और पश्चिमी बंगाल से, जहाँ चावल की खेती होती थी, मछली पकड़ने के कांटे भी मिले हैं। इससे पता चलता है कि पूर्वी प्रदेशांे में रहने वाले ताम्र-पाषाण के लोग मछली और चावल खाते थे। देश के इस भाग में आज भी मछली और चावल लोकप्रिय भोजन हैं।

    हस्तकलाएं: इस काल का मानव तांबे की वस्तुएं और पत्थर के औजार बनाने में निपुण था। इस काल के छोटे आकार के बहुत सारे पत्थर के औजार मिले हैं, जिन्हें लघुपाषाण कहते हैं। वे कताई और बुनाई की कला भी जानते थे, क्योंकि मालवा से उस काल की तकली की चक्रियां मिली हैं। महाराष्ट्र से कपास, सन और रेशम के तन्तु मिले हैं। इससे पता चलता है कि वे लोग कपड़ा भी तैयार करते थे।

    विभिन्न प्रकार के मृद्भाण्डों का उपयोग: ताम्र-पाषाण काल के लोग विभिन्न प्रकार के मृदभाण्डों का उपयोग करते थे। इनमें से एक प्रकार के बर्तन काले-लाल रंग के थे। अनुमान होता है कि इनका प्रचलन दूर-दूर तक था। इन बर्तनों को चाक पर बनाया जाता था। कभी-कभी इन पर सफेद रैखिक आकृतियां भी चित्रित की जाती थीं। यह तथ्य न केवल राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की बस्तियों के सम्बन्ध में है अपितु बिहार और पश्चिमी बंगाल में खोजी गई बस्तियों के सम्बन्ध में भी है। मध्य प्रदेेश और महाराष्ट्र में रहने वाले इस काल के लोगों ने टोंटी वाले लोटे, धरनी-युक्त तश्तरियां और धरनी-युक्त कटोरे बनाए थे। यह सोचना गलत होगा कि जिन भी लोगों ने काले-लाल बर्तनों का उपयोग किया उनकी संस्कृति भी एक ही थी। उनके बर्तनों और औजारों की बनावट में अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। इस काल के लोगों ने लोटों तथा तश्तरियों का उपयोग तो किया किंतु थालियों का उपयोग नहीं किया।

    कार्य-कुशलता में वृद्धि: धातु के काम में कुशलता की बड़ी आवश्यकता होती है। अतः अपने कार्य मं् निपुणता प्राप्त करने के लिए अब लोग पूरे समय अपने ही कार्य में लगे रहते थे। इस प्रकार विभिन्न प्रकार के कार्यों में विशेषज्ञता प्राप्त करने लगे। अब कार्य-विभाजन का सिद्धान्त बहुत आगे बढ़ गया और लोग अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बहुत से लोगों पर निर्भर रहने लगे। इस प्रकार मनुष्य स्वावलम्बी से परावलम्बी हो गया।

    पक्के भवनों का निर्माण: इस काल से पहले के लोग आम तौर से पकी हुई ईटों से परिचित नहीं थे। धूप में सुखाई तथा आग में पकाई हुई ईटों के भवनों का निर्माण इसी काल में आरम्भ हुआ किंतु इनका उपयोग विरले ही होता था। इस काल में अधिकतर घर टट्टर को लीपकर बनाए जाते थे और इन पर संभवतः छप्पर भी डाले जाते थे। ये मकान बड़े सुविधाजनक होते थे और इनमें सुरक्षा की पूरी व्यवस्था रहती थी। इन आवासों में मनुष्य, पशु तथा भण्डारण के लिए अलग-अलग प्रबन्ध रहता था। पश्चिमी महाराष्ट्र के इनामगांव स्थान पर आरंभिक ताम्र-पाषाण काल के चूल्हों सहित मिट्टी के बड़े भवन और गोलाकार गड्ढों वाले भवन खोजे गए हैं। बाद की अवस्था ( ई.पू.1300-1000) का पांच कमरों का एक कमरा गोलाकार है। इससे पता चलता है कि इस युग के परिवार बड़े होते थे।

    नगरीय सभ्यता के जनक: ताम्र-पाषाणिक अर्थ-व्यवस्था वस्तुतः ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था थी। जैसे कि इनामगांव तथा पश्चिमी मध्य प्रदेश की एरण तथा कयथ बस्तियों की किलेबंदी करके इनके चहुंओर खाइयां खोदी गई थीं जिससे अनुमान होता है कि ताम्राश्म संस्कृति के मानव ने नगरीय सभ्यता को जन्म दिया था।

    धार्मिक भावना का सुढ़ढ़ीकरण: इस युग मंे कृषि कार्य विस्तृत हो जाने के कारण मानव पर प्रकृति की अनुकूलता एवं प्रतिकूलता अधिक प्रभाव डालने लगी। इस कारण इस काल के मानव ने प्राकृतिक शक्तियों को देवी-देवता के रूप में पूजना आरम्भ किया। पूजा के लिए मन्दिरों का निर्माण आरम्भ हो गया। धार्मिक भावना के उदय के साथ-साथ इस युग के मानव में अन्धविश्वास भी उत्पन्न हो गया और वह जादू-टोना में विश्वास करने लगा। स्त्रियों की लघु मृण्मूर्तियों से पता चलता है कि ताम्र-पाषाण काल का मानव मातृदेवियों की उपासना करता था। कच्ची मिट्टी की नग्न लघु मूर्तियों की भी पूजा होती थी। इनामगांव से मातृदेवी की एक मूर्ति मिली है जो पश्चिमी एशिया से मिली मातृदेवी की मूर्ति जैसी है। मालवा और राजस्थान से प्राप्त वृषभ की रूढ़ शैली की मृण्मूर्तियों से पता चलता है कि वृषभ की अनुष्ठानिक पूजा होती थी।

    शवाधान: ताम्र-पाषाणिक सभ्यता के लोगों के शव-संस्कारों और धार्मिक अनुष्ठाानों के बारे में भी जानकारी मिलती है। इस काल में महाराष्ट्र क्षेत्र में मृतक के शव को अपने भवन के फर्श के नीचे उत्तर-दक्षिण स्थिति में गाढ़ा जाता था। हड़प्पा के लोगों की तरह उनके पृथक समाधि क्षेत्र नहीं होते थे। कब्र में मिट्टी की हांडियाँ और तांबे की कुछ वस्तुएं भी रखी जाती थीं, जो परलोक में मृतक के उपयोग के लिए होती थीं। पश्चिमी महाराष्ट्र में चंदोली और नेवासा के शवाधानों में कुछ बच्चों को उनके गलांे में तांबे की मणियों की मालाएं पहनाकर गाढ़ा गया था परन्तु दूसरे बच्चों के शवाधानों में केवल मिट्टी के बर्तन देखने को मिलते हैं। इनाम गांव के एक वयस्क व्यक्ति को मिट्टी और तांबे के बर्तनों के साथ गाढ़ा गया है।

    ताम्राश्म संस्कृति की दुर्बलताएं

    सामाजिक असमानताएं: ताम्र-पाषाण काल में सामाजिक असमानताएं आरंभ होने के प्रमाण मिलते हैं। कायथा के एक भवन से तांबे की 29 चूड़ियां और दो विशिष्ट कुल्हाड़ियां मिली हैं। उसी स्थान से मिट्टी के घड़ों में से सेलखड़ी और कार्नेलियन-जैसे कुछ मूल्यवान पत्थरों की मणियों की मालाएं मिली हैं। अनुमान है कि ये वस्तुएं समृद्ध लोगों की थीं।

    कष्टमय जीवन: पश्चिमी महाराष्ट्र में बड़ी संख्या में गाढ़े गए बच्चों के शवावशेषों से इस ताम्र-पाषाणिक संस्कृति की दुर्बलता स्पष्ट हो जाती है। अन्न-उत्पादक अर्थव्यवस्था के उपरांत भी बच्चों की मृत्यु-दर बहुत ऊंची थी। इसके कारणों का पता लगाना कठिन है। कुपोषण अथवा महामारी के कारण इतनी बड़ी संख्या में बच्चे मरे होंगे। उस काल के ताम्र-पाषाणिक समाज तथा अर्थव्यवस्था में दीर्घायु प्राप्ति को बढ़ावा मिलना सम्भव नहीं था।

    हड़प्पा सभ्यता से तकनीकी आदान-प्रदान का अभाव: ताम्र-निधियों वाले ये लोग हड़प्पा सभ्यता के समकालीन थे, और ये लोग गेरुए रंग के बर्तनों वाले जिस प्रदेश में रहते थे वह भी हड़प्पा संस्कृति के क्षेत्र से अधिक दूर नहीं था। इसलिए दोनों सभ्यताओं में सम्पर्क होना तथा तकनीकी कौशल का आदान प्रदान होना स्वाभाविक था किंतु ताम्र-पाषाणिक सभ्यता के लोगों ने हड़प्पा सभ्यता के लोगों के ज्ञान का लाभ नहीं उठाया। इसलिए वे कांसे के बारे में नहीं जान सके।

    भारत में ताम्र बस्तियों की खोज

    भारत में ताम्र निर्मित सामग्री सबसे पहले गंगा-यमुना के दोआब में उपलब्ध हुई थी। गुनेरियां नामक स्थान से ताम्बे एवं कांसे की वस्तुओं का विशाल भण्डार मिला है। इस सामग्री में कुल्हाड़ियां, तलवारें, कटारें, हार्पून एवं छल्ले प्रमुख हैं। इतिहासकार मि. पिगट ने इस क्षेत्र से प्राप्त कुल्हाड़ियों को पांच भागों में बांटा है। तलवारें प्रायः एक जैसी हैं। इन तलवारों के ब्लेड पत्ती के समान हैं एवं मुठिया तथा धार के साथ समूची तलवार एक ही सांचे में ढाली गई है। कटार का निर्माण भी इसी प्रकार से किया गया है। यह समग्र सामग्री सिंधु घाटी से प्राप्त सामग्री से भिन्न है।

    प्रमुख ताम्र-पाषाणिक बस्तियाँ

    भारत में प्रमुख ताम्र-पाषाणिक बस्तियों का प्रसार लगभग ई.पू.2150 से ईस्वी 600 (वैदिक-काल से लेकर गुप्तकाल) तक रहा। दक्षिण भारत में नवपाषाणिक अवस्था एकाएक ताम्र-पाषाणिक अवस्था में बदल गई। इसलिए इन संस्कृतियों को नवपाषाणिक ताम्र-पाषाणिक नाम दिया गया है। दूसरे भागों, विशेषतः पश्चिमी महाराष्ट्र और राजस्थान के लोग सम्भवतः उपनिवेशिक थे परन्तु तिथिक्रमानुसार, मालवा और मध्य भारत की कुछ बस्तियां, जैसे कि कायथा और एरण की बस्तियां, सबसे पुरानी थीं। पश्चिमी महाराष्ट्र में ताम्र-पाषाणिक बस्तियां कालांतर में स्थापित हुईं। पश्चिमी बंगाल में ताम्र-पाषाणिक बस्तियों की स्थापना सम्भवतः सबके अंत में हुई।

    (1.) कायथा संस्कृति (ई.पू. 2150 से ई.पू.1400): कायथा संस्कृति की बस्तियां मध्यप्रदेश में कालीसिंध नदी के किनारे स्थित हैं। कायथा टीले से 12 मीटर मोटा सांस्कृतिक जमाव मिला है जिसमें ताम्रपाषाणिक संस्कृति से लेकर गुप्त राजवंश के काल तक के पुरावशेष प्राप्त हुए हैं। यहाँ से मृदभाण्ड बनाने की तीन परम्पराएं मिली हैं। प्रथम पात्र परम्परा हल्के गुलाबी रंग की है जिस पर बैंगनी रंग की चित्रकारी मिलती है। दूसरी पात्र परम्परा पाण्डुरंग की है। बर्तनों पर लाल रंग से चित्रण अभिप्राय संजोये गए हैं। तीसरी परम्परा अलंकृत लाल रंग की मृद्भाण्ड परम्परा है जिन पर कंघी की तरह के किसी उपकरण से आरेखण किया गया है।

    (2.) आहड़ संस्कृति (ई.पू.1900 से ई.पू.1200): यह बस्ती राजस्थान के उदयपुर नगर से 4 किलोमीटर दूर आहड़ नामक स्थान पर मिली है। आहड़ का प्राचीन नाम ताम्रवती है। इस स्थान को अब धूलकोट कहते हैं। यहाँ पर कायथा की तुलना में ताम्र उपकरण अधिक मिले हैं। इस संस्कृति के लोग सुखाई गई कच्ची ईंटों की सहायता से भवन बनाते थे। मकानों में दो-तीन मुंह वाले चूल्हे भी मिले हैं। यहाँ से बड़े-बड़े भाण्ड तथा अन्न पीसने के पत्थर मिले हैं। कपड़़ों पर छपाई के ठप्पे भी प्राप्त हुए हैं। इस संस्कृति में शवों को गाड़ते समय शव का मस्तक उत्तर की ओर तथा पैर दक्षिण की ओर रखे गए हैं। आहड़ संस्कृति को बनास संस्कृति भी कहते हैं क्योंकि इस सभ्यता का प्रसार सम्पूर्ण बेड़च, बनास एवं चम्बल के कांठे में पाया गया है।

    (3.) गिलूण्ड संस्कृति (1700 ई.पू. से 1300 ई.पू.): आहड़ के निकट गिलूण्ड से भी ताम्रपाषाणिक बस्ती मिली है। यहाँ से चूने के प्लास्टर एवं कच्ची दीवारों के प्रयोग की जानकारी मिलती है। यहाँ से लाल एवं काले मृदभाण्डों की ही संस्कृति प्राप्त हुई है। यहाँ से 100 गुणा 80 फुट आकार के ईंटों से बने विशाल भवन के अवशेष प्राप्त हुए हैं। ऐसे भवन आहड़ में देखने को नहीं मिलते।

    (4.) नवदाटोली संस्कृति (1500 ई.पू. से 1200 ई.पू.): मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में मिलने के कारण इसे मालवा संस्कृति भी कहा जाता है। यह नर्बदा नदी के बायें किनारे पर स्थित है। यहाँ से मिले मृदभाण्ड गुलाबी रंग के हैं। इन पात्रों पर काले रंग से चित्रण किया गया है। यहाँ से ताम्र उपकरण बहुत कम संख्या में प्राप्त हुए हैं। यहाँ से स्वर्ण, ताम्र, मृदा, शंख एवं सेलखड़ी पत्थर से बने आभूषण प्राप्त हुए हैं। कुछ अग्निकुण्ड भी मिले हैं जिनसे अनुमान होता है कि इस संस्कृति में अग्नि पूजा भी होती थी।

    (5.) जोरवे संस्कृति (1400 ई.पू. से 700 ई.पू.): पश्चिमी महाराष्ट्र में प्रवर नदी तट पर स्थित जोरवे नामक गांव से इस संस्कृति के अवशेष मिले हैं। बाद में नासिक, नेवासा, इनामगांव, दैमाबाद आदि स्थलों से भी इस संस्कृति के अवशेष मिले। इस संस्कृति में बस्तियां बसाने का काम योजनाबद्ध तरीके से होता था। जोर्वे संस्कृति का प्रत्येेक गांव 35 से भी अधिक गोलाकार अथवा आयताकार भवनों की एक सुगठित बस्ती होती थी। घरों के बीच एक से दो मीटर चौड़ी गलियां छोड़़ी गई हैं। यहाँ से कुम्हार, सुनार, हाथीदांत के शिल्पकारों के औजार मिले हैं जो बस्ती की पश्चिमी सीमा पर रहते थे। समृद्ध किसान गांव के बीच में रहते थे। दस्तकारांे के मकानों का आकार, समृद्ध किसानों के घरों के आकार की तुलना में छोटा है। यहाँ से अल्प मात्रा में ताम्बे के उपकरण पाए गए हैं। मृण्मूर्तियाँ भी मिली हैं जिनमें मातृदेवी एवं वृषभ की मूर्तियाँ विशेष हैं। इस संस्कृति में खेती के लिए नहरों एवं बांधों का निर्माण किए जाने के प्रमाण मिले हैं। दैमाबाद से कांसे की वस्तुएं बड़ी संख्या में मिली हैं। दैमाबाद से ताम्बे से निर्मित- रथ चलाते हुए मनुष्य, सांड, गैंडे तथा हाथी की मूर्तियाँ मिली हैं।

    (6.) पूर्वी भारत की बस्तियां (2000 ई.पू.): पूर्वी भारत से चावल पर आधारित एक विस्तृत ताम्र-पाषाणिक ग्राम संस्कृति का पता चला है। यह 2000 ई.पू. के आसपास अस्तित्त्व में रही होगी। उड़ीसा तथा बंगाल प्रांत के वीरभूम, बर्दवान, मिदनापुर, बांकुरा, पांडु राजार ढिबी, महिषदल आदि में इस संस्कृति की बस्तियां मिली हैं। यहाँ गारे और सरकण्डे से निर्मित घरों के साथ-साथ चावल तथा मंूग सहित तरह-तरह की फसलों का समृद्ध संग्रह देखने को मिलता है।

    (7.) ऊपरी गंगा घाटी और गंगा-यमुना दो-आब की बस्तियां (1500 ई.पू. से 1000 ई.पू.): इन क्षेत्रों से गेरुए रंग के मृदभाण्डों वाली बस्तियां मिली हैं। उत्तर प्रदेश के बदायूँ जिले के बसौली तथा बिजनौर जिले के राजपुर परसू से नई किस्म के बर्तन प्राप्त हुए हैं। ये दोनों ही स्थान ताम्र भण्डार क्षेत्र में स्थित हैं। इस संस्कृति में अतरंजीखेड़ा का प्रमुख स्थान है। यहाँ से धूसर भाण्ड वाली बस्तियां मिली हैं। सहारनपुर से लेकर इटावा तक इस संस्कृति के लगभग 110 स्थल मिले हैं जिन्हें गेरुए रंग के मृदभाण्डों की संस्कृति कहते हैं।

    (8.) ऐतिहासिक कालों की बस्तियां: उत्तर भारत में ताम्र पाषाणिक संस्कृति, जनपद युग एवं मगधीय साम्राज्य (600 ई.पू. से 300 ई.पू.) तथा शुंग, कुषाण एवं गुप्त काल (300 ई.पू. से 600 ई.) तक अस्तित्त्व में रहीं जबकि पश्चिमी भारत में 3500 ई.पू. के आसपास ताम्रकांस्य संस्कृति जन्म ले चुकी थी।

    (9.) सिंधु नदी घाटी क्षेत्र में ताम्र-पाषाण-कालीन बस्तियाँ: सिंधु नदी घाटी में भी ताम्बे एवं कांसे की अनेक वस्तुएं प्राप्त हुई हैं किंतु यहाँ पर तलवार एवं हार्पून का अभाव है। इस क्षेत्र से मिले इस काल के हथियार साधारण कोटि के हैं। यहाँ पर धातु के साथ-साथ पाषाण सामग्री का उपयोग भी चलता रहा।

    कांस्य की खोज

    पाषाण की तुलना में ताम्बा अधिक उपयोगी था किंतु मुलायम होने के कारण इससे कठोर कार्य नहीं लिया जा सकता था। इसलिए मनुष्य ताम्बे से अधिक कठोर धातु की खोज में जुटा तथा उसने कांसे को खोज निकाला। यह मिश्रित धातु थी जो ताम्बे में टिन के मिश्रण से तैयार की जाती थी। दो धातुओं के मिश्रण से तीसरी धातु बनाने की क्षमता अर्जित कर लेना, इस युग के मानव की बौद्धिक परिपक्वता का प्रमाण है।

    ताम्र-कांस्य युगीन बस्तियाँ

    आज से कुछ हजार वर्ष पहले, सिंध और बलोचिस्तान के जो प्रदेश आज की तरह रेगिस्तान नहीं थे। इन क्षेत्रों में अच्छी वर्षा होती थी तथा घने जंगलों से परिपूर्ण थे। जल और जंगल के कारण इन क्षेत्रों में मानव सभ्यता ने अच्छा विकास किया। ई.पू.4000 में भी इस क्षेत्र में ग्रामीण बस्तियां थीं। इन बस्तियों में पाषाण युग के बाद ताम्र युग का विकास हुआ। इन बस्तियों के लोगांे का पश्चिम एशिया में स्थित मानव बस्तियों से सम्पर्क होने का भी अनुमान है। क्योंकि सिंध एवं बलोचिस्तान जैसे उपकरण पश्चिम एशियाई बस्तियों में भी प्राप्त हुए हैं। इतिहासकार मि. पिगट ने इन बस्तियों को चार भागों में विभक्त किया है-

    (1) क्वेटा संस्कृति: बोलन के दर्रे में प्राप्त अवशेषों के आधार पर),

    (2) अमरी-नल संस्कृति: सिंध में अमरी नामक स्थान पर तथा बलोचिस्तान में नल नदी की घाटी में उपलब्ध अवशेषों के आधार पर,

    (3) कुल्ली संस्कृति: बलोचिस्तान में कोल्बा नामक स्थान से प्राप्त अवशेषों के आधार पर तथा

    (4) झोब संस्कृति: उत्तरी बलोचिस्तान की झोब घाटी में उपलब्ध अवशेषों के आधार पर।

    राजस्थान की ताम्र-कांस्य युगीन बस्तियाँ

    राजस्थान में भी पाषाण काल के अंतिम वर्षों में ताम्रकाल आरंभ हो गया था। राजस्थान के पुरातत्त्व विभाग ने भारत सरकार के पुरातत्त्व विभाग के सहयोग से कालीबंगा, आहड़, बागौर, रंगमहल, बैराठ, गिलूण्ड, नोह आदि स्थानों पर उत्खनन किया। इन उत्खननों में हमें सिंधु सभ्यता से भी प्राचीन एवं सिंधु सभ्यता के समकक्ष सभ्यताओं के अवशेष प्राप्त हएु हैं।

    ताम्र-पाषाणिक एवं ताम्र-कांस्य संस्कृति में अंतर

    ताम्र-पाषाणिक संस्कृति का मानव पकी हुई ईंटों से घर बनाना नहीं जानता था जबकि ताम्र-कांस्य संस्कृति का मानव पकी हुई ईटों से घर बनाता था। ताम्र-पाषाणिक संस्कृति का मानव ताम्र औजारों के साथ-साथ प्रस्तर निर्मित औजारों का प्रयोग करता था जबकि ताम्र-कांस्य संस्कृति का मानव ताम्र एवं कांस्य से बने औजारों का प्रयोग करता था। ताम्र-पाषाणिक बस्तियां पूर्वी भारत, उत्तरी भारत, मध्य भारत एवं महाराष्ट्र में नासिक तक प्राप्त हुई हैं जबकि ताम्र-कांस्य बस्तियां बिलोचिस्तान एवं सिंध क्षेत्र में अधिक प्राप्त हुई हैं।

    ताम्र-पाषाण-कालीन मानव धातुओं के मिश्रण की कला अर्थात् कांसा बनाने की विधि से अपरिचित था जबकि ताम्र-कांस्य कालीन मानव धातुओं के मिश्रण की कला से अच्छी तरह परिचित हो गया था। यह एक आश्चर्य की ही बात है कि सिंधु सभ्यता जो कि ताम्र-पाषाण काल से भी पुरानी है, में कांसे का प्रयोग होता था। इससे अनुमान होता है कि ताम्र-पाषाणिक अवस्था में जी रहे लोगों का उन क्षेत्रों से सम्पर्क नहीं था जो उनके समकालीन होते हुए भी कांस्य का उपयोग कर रहे थे।

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  • अध्याय - 1 संग्रहालय की अवधारणा का विकास

     02.06.2020
    अध्याय - 1 संग्रहालय की अवधारणा का विकास

    अध्याय - 1


    संग्रहालय की अवधारणा का विकास

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    जब भी मनुष्य में यह समझ विकसित हुई होगी कि अपने द्वारा संचित ज्ञान को उसके प्रमाणों, चिह्नों एवं प्रतीकों के साथ, भविष्य में आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेज कर रखा जाए, उसी समय संग्रहालय की भी नींव पड़ी होगी।

    आदिम संग्रहालय एवं चित्रशालाएं

    आदिम युगीन शैल-चित्रों को संग्रहालयों अथवा चित्रशालाओं का सबसे प्रारंभिक रूप माना जा सकता है। भारत के विभिन्न प्रांतों में स्थित पर्वतीय गुफाओं में ये शैल-चित्र देखने को मिलते हैं जिनमें पशु-पक्षी, मानव, शिकारी, खेत आदि का चित्रण किया गया है। जम्मू-काश्मीर राज्य के श्रीनगर की मदानी मस्जिद में चट्टान के एक टुकड़े पर 5000 साल पुराने भित्ति चित्र मिले हैं जिनमें एक ओर तारे बने हुए हैं तथा दूसरे छोर पर ड्रैगन जैसा सिर है। इस स्थान का मूल भित्तिचित्र धुंधला पड़ चुका है किंतु उसकी एक प्रति कश्मीर विश्वविद्यालय में सहेजकर रखी गई है। इस भित्तिचित्र में भारतीय खगोल की एक दुर्लभ घटना का चित्रांकन किया गया है तथा इसमें दो सूर्य एक साथ दिखाए गए हैं। इस भित्तिचित्र में दिखाई दे रहा दूसरा सूर्य वास्तव में एक सुपरनोवा है जो किसी पुराने तारे के टूटने से उत्पन्न हुई ऊर्जा होती है। भीषण विस्फोट के बाद यह कई दिनों तक चमकदार दिखाई देता है जो दूसरे सूर्य के समान लगता है। इस चित्र में तारों के साथ सूर्य दिखाने का आशय है कि यह सुपरनोवा तब भी चमक रहा था जब रात्रि में तारे चमक रहे थे।

    राजस्थान में शेखवाटी क्षेत्र के अजीतगढ़, डोकन, सोहनपुरा, गुढागौड़जी में शैलचित्र खोजे गए हैं। रावतभाटा से 33 कलिोमीटर दूर दरा अभ्यारण्य में तिपटिया नामक स्थान पर प्रागैतिहासिक काल के शैल-चित्र मिले हैं। धरती से लगभग 500 फुट ऊँचा तीन मंजिल वाला शैलाश्रय है जिसकी दूसरी एवं तीसरी मंजिलें चित्रित हैं। उत्तरपाषाण कालीन मानवों द्वारा चित्रित इन शैल-चित्रों में बैल, गाय, हिरण, सूअर एवं काल्पनिक पशुओं के चित्रों का अंकन किया गया है। इन चित्रों का रंग गहरा कत्थई तथा लाल रंग का है तथा ये रेखाओं के माध्यम से बनाए गए हैं। प्रागैतिहासिक काल के अनेक चित्रों के ऊपर ही ऐतिहासिक काल के चित्र भी बना दिए गए हैं। इस काल के चित्रों में देवी-देवता, योद्धा, घुड़सवार एवं ऊँट सवार प्रमुख हैं। ये पीले रंग तथा गेरू से बने हैं। इस काल के चित्रों में गौपालक द्वारा गायों को चराने, कहारों द्वारा वधू की डोली ले जाने एवं एक नृत्यांगना द्वारा नृत्य करने के दृश्य भी अंकित हैं जिनसे स्पष्ट है कि इस काल में मानव सभ्यता काफी आगे बढ़ चुकी थी। आहू नदी के तट पर झालावाड़ जिले में आमझीरी नाला के निकट कई शैलाश्रय खोजे गए हैं जिनमें प्रस्तर युगीन मानवों द्वारा बनाई गई चित्रशाला देखी जा सकती है। इन चित्रों में बैल, हिरण, बकरी, बारहसिंघा, नीलगाय, चीता, मानव आकृतियां, धनुष-बाण, पशु-शिकार के दृश्य आदि अंकित हैं।

    पूर्वोत्तर भारत की कुछ आदिम जातियों की बस्तियों में उन मनुष्यों की खोपड़ियों के संग्रह पाये गए हैं जिन्हें इन आदिम जातियों द्वारा मारकर खा लिया गया था। ये खोपड़ियां जातीय गौरव एवं शौर्य प्रदर्शन के लिए संगृहीत की गईं। इन्हें भी संग्रहालयों का आदिम रूप माना जा सकता है। इसी प्रकार मनुष्यों द्वारा विविध पशुओं के सिर, सींग, खाल आदि के संग्रहालय भी बनाए जाते रहे हैं।

    परग्रही जीवों द्वारा छोड़े गए संग्रहालय

    विश्व के कुछ देशों में मिले शैल-चित्रों में अंतरिक्ष यानों एवं अंतरक्षि यात्रियों जैसी आकृतियां देखी गई हैं। वर्ष 2017 में फ्रांस में 38 हजार वर्ष पुराना एक ऐसा चित्र पाया गया है जिसमें पिक्सल्स की सहायता से आकृतियां उकेरी गई हैं। आधुनिक कम्प्यूटर भी इसी पिक्सल तकनीक का प्रयोग करते हैं। इसे विश्व का सबसे पुराना शैलचित्र माना गया है। उस समय धरती पर उत्तर-पाषाण काल चल रहा था तथा होमोसेपियन मानवों द्वारा पिक्सल्स का उपयोग करके चित्रों का निर्माण करना संभव नहीं था। इसलिए अनुमान है कि शैल-चित्रों में मिले अंतरिक्ष यानों तथा अंतरिक्ष यात्रियों के चित्रों और इस पिक्सल युक्त चित्र में कोई सम्बन्ध होना चाहिए। ये संभवतः उस काल में धरती पर परग्रही मनुष्यों की हलचल का परिणाम थे जो इनके माध्यम से अपनी कहानी धरती पर भविष्य में आने वाली मानव प्रजातियों के लिए छोड़कर गए थे।

    यद्यपि धरती पर परग्रही जीवों के आवागमन को अभी तक अकादमिक स्तर पर स्वीकार नहीं किया गया है किंतु इस दिशा में अनुसंधान कार्य अनवरत चल रहे हैं। कुछ स्थानों पर पत्थरों की विशालाकाय रचनाएं एवं पत्थरों के माध्यम से धरती पर बनाई गई ज्यामितीय रचनाएं पाई गई हैं, इन्हें भी परग्रही जीवों द्वारा छोड़े गए संग्रहालय माना जा सकता है। कुछ विद्वान मिश्र, चीन, कम्बोडिया सहित अनेक देशों में मिलने वाले पिरामिडों को भी परग्रही जीवों द्वारा एक विशिष्ट क्रम में बनाए गए संग्रहालय एवं अंतरिक्ष से आने वाले मानवों के लिए दिशा सूचक अथवा संकेतक मानते हैं। मिश्र के पिरामिडों में शवों के साथ मिली बहुमूल्य सामग्री भी एक प्रकार के संग्रहालय ही हैं।

    धार्मिक संग्रहालयों का विकास

    सभ्यता के विकास के साथ जब कलात्मक मंदिरों का निर्माण आरम्भ हुआ तो संग्रहालयों को एक नया आयाम प्राप्त हुआ। भारतीय देवालय स्वयं ही देव-विग्रहों के संग्रहालयों के रूप में सामने आए। मंदिरों की प्रत्येक वस्तु पवित्र मानी जाती थी। इसलिए मंदिर में कुछ समय तक उपयोग होने के बाद अनुपायोगी हो गई सामग्री यथा- कलात्मक प्रस्तर, शिखर खण्ड, स्तम्भ, देव-प्रतिमाएँ, धर्म-ग्रंथ, धार्मिक चित्र, लोक साहित्य, बर्तन तथा अन्य वस्तुएं कचरे में नहीं फैंकी जाती थीं, वरन् मंदिर परिसर किसी स्थान पर रख दी जाती थीं, धीरे-धीरे यह सामग्री संग्रहालय का रूप ले लेती थी। भारतीयों की इसी प्रवृत्ति के कारण अजमेर में स्थित ढाई दिन का झौंपड़ा (मूलतः बारहवीं शताब्दी का सरस्वती मंदिर) से अनेक महत्वपूर्ण शिलालेख, पत्थर पर उत्कीर्ण नाटक एवं दुर्लभ देव-प्रतिमाएँ प्राप्त हुईं जिनमें से कुछ आज भी इस परिसर में बने कक्षों में देखी जा सकती हैं। इसमें से कुछ सामग्री अजमेर के राजकीय संग्रहालय में संजोई गई है तथा भारतीय संग्रहालय कलकत्ता को भेजी गई है। बीकानेर के तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं के मंदिर में बहुत सी दुर्लभ प्रतिमाएँ संगृहीत की गई हैं। बीकानेर के दसवें राठौड़ शासक अनूपसिंह (ई.1638-98) ने मुगलों की ओर से दक्षिण में अनेक लड़ाइयां लड़ीं एवं उस दौरान दक्षिण भारत से अनेक प्रतिमाओं को सुरक्षित बचाकर बीकानेर भेज दिया। अन्यथा ये मूर्तियां औरंगजेब द्वारा नष्ट कर दी जातीं।

    राज्याश्रित संग्रहालयों का विकास

    रियासती काल में राजाओं-महाराजाओं द्वारा अपने पुरखों के चित्रों, तलवारों, बंदूकों, भालों, ढालों, पालकियों, रथों, शिरस्त्राणों, कवचों, तूणीरों, वस्त्राभूषणों आदि विविध राजसी सामग्री को नष्ट नहीं करके, उन्हें एक स्थान पर संजो लिया जाता था ताकि उन पुरखों की स्मृति बनी रहे। इन संग्रहालयों तक जन-सामान्य की पहुंच नहीं होती थी। ये केवल राजसी व्यक्तियों द्वारा देखे जाने के लिए होते थे। इस तरह के संग्रहों का उल्लेख प्राचीन भारतीय इतिहास एवं साहित्य में हुआ है।

    चित्रशालाएं एवं चित्रित पोथियाँ

    रामायण एवं महाभारत नामक महाकाव्यों में रंगशाला, चित्रशाला एवं विश्वकर्मा मन्दिर का उल्लेख मिलता है। कृष्ण-धर्मोत्तर पुराण में चित्रशालाओं का उल्लेख हुआ है जहाँ चित्र संगृहीत किए जाते थे। गुरुकुलों, ऋषि-आश्रमों, हिन्दू मंदिरों, जैन स्थानकों एवं बौद्ध उपाश्रयों आदि में भी सचित्र पोथियाँ लिपिबद्ध की जाती थीं। ये चित्र पौराणिक एवं धार्मिक कथाओं के अंकन के साथ-साथ कला के अप्रतिम उदाहरण भी हैं। भारतीय शासकों ने अपने दरबारी चित्रकारों से साहित्यिक एवं धार्मिक विषयों के चित्र बनवाए तथा उनका संग्रह किया, राजाओं-महाराजाओं के संग्रहालय पुस्तक प्रकाश, सरस्वती भण्डार, सूरतखाना आदि नामों से जाने जाते थे। मुगल शासकों के पुस्तकालय कुतुबखाना के नाम से एवं चित्रसंग्रह तस्वीरखाना के नाम से जाने जाते थे। इन्हें पोथीखाना तथा कारखाना भी कहा जाता था और इनमें चित्रित एवं अचित्रित ग्रंथों का प्रतिलिपिकरण एवं संग्रहण होता था। मुगलकाल में भी अरबी, फारसी, संस्कृत, हिन्दी, ब्रज, डिंगल आदि विविध भाषाओं के लेखकों और कवियों की कृतियों को संरक्षण प्रदान किया गया।

    भारत के लगभग सभी प्राचीन एवं मध्यकालीन मंदिरों एवं राजमहलों में भित्तिचित्रों का अंकन किया गया। ये उस काल की चित्रशालाओं एवं चित्रवीथियों का ही रूप हैं। बीकानेर के भांडाशाह जैन मंदिर में रंगमंडप की चित्रकारी बीकानेर के प्रसिद्ध मथेरण, उस्ता एवं चूनगर जाति के चित्रकारों द्वारा की गई है जिनमें जैन कथा साहित्य, नरक यातना, रोहणियाचार, उग्रसेन का महल और गिरनार आदि के अनेक चित्र अंकित हैं। बीकानेर के सुप्रसिद्ध चित्रकार मुराद बख्श ने इस मंदिर की दीवारों पर स्वर्णयुक्त मीनाकारी का कार्य किया। मीनाकारी के माध्यम से ही चित्रकार द्वारा पशु-पक्षियों और फूल-पत्तियों के आकर्षक एवं अद्भुत चित्र बनाए गए हैं। बीकानेर के जूनागढ़, जोधपुर के मेहरानगढ़, नागौर के स्थल दुर्ग, शेखावाटी की हवेलियों में बनाए गए भित्तिचित्रों पर कई शोध ग्रंथ लिखे जा सकते हैं।

    बीकानेर के जूनागढ़ के महलों में सोने और मीने की कारीगरी देखकर लगता है मानो महंगे एवं सुंदर फारसी गलीचों को काटकर ही छतों और दीवारों पर चिपका दिया गया है। दीवारों, छतों एवं खम्भों पर तरह-तरह के बेल-बूटे, फूलपत्ती, पशु-पक्षी और भांति-भांति के चित्र बने हुए हैं। छतों एवं खम्भों के बीच की दीवारों पर लम्बी-लम्बी चित्रकथाएं भी अंकित हैं। अनूप महल के दरवाजों एवं किवाड़ों की चित्रकारी देखते ही बनती है। बादल महल की छतें कड़कड़ाती हुई बिजली से चित्रांकित हैं तथा दीवारों पर पानी की धाराएं गिरती हुई दिखाई देती हैं। बीकानेर की रामपुरिया हवेली में बने आयताकार आंगन के बरामदे में लगभग तीन दर्जन धार्मिक चित्र बने हुए हैं। इस हवेली के अतिथि गृह में बीकानेर शैली के लगभग एक दर्जन चित्र बने हुए हैं। राजपूताना की बहुत से रियासतों में बनी साधु-संतों एवं राजा-रानियों की छतरियों के भीतर भी चित्र बनाए गए हैं जो चित्रवीथियों का काम करते थे। जोधपुर एवं जालोर के नाथ सम्प्रदाय के मंदिरों में नाथ साधुओं एवं नाथ सम्प्रदाय से सम्बन्धित देवी-देवताओं के चित्र बने हुए हैं। मेहरानगढ़ दुर्ग में भी नाथशैली के चित्र देखे जा सकते हैं। इस प्रकार पूरे राज्य में स्थित मध्यकालीन दुर्गों, महलों, मंदिरों, हवेलियों आदि में चित्रवीथियां एवं चित्रशालाएं बनी हुई हैं। शेखावाटी की हवेलियों में भारत की सर्वश्रेष्ठ चित्रशालाएं बनी हुई हैं।

    ब्रिटिश काल में संग्रहालयों की विषय-वस्तु का विस्तार

    अंग्रेजों के आगमन के साथ ही संग्रहालयों की विषय-वस्तु का विस्तार होने लगा। उनकी विषय-वस्तु निजी न होकर सार्वजनिक होने लगी। संग्रहालयों का आयाम राजसी वस्त्राभूषणों तथा अस्त्र-शस्त्रों आदि से ऊपर उठकर सामाजिक परम्पराओं, क्षेत्रीय संस्कृतियों एवं हस्तकला सामग्रियों आदि के लिए भी खुलने लगा। उन्होंने प्राकृतिक इतिहास को संग्रहालयों की विषय वस्तु का आधार बनाया तथा संग्रहालयों के दरवाजे विश्व भर के देशों से संगृहीत की गई सामग्री के लिए खोल दिए। 17वीं शताब्दी से 19वीं शताब्दी तक संग्रहालय शब्द का आशय प्रायः एक ऐसे भवन से लगाया जाता था जिसमें पुरावस्तुओं, प्राकृतिक इतिहास तथा परम्परागत कलाकृतियों जैसी पुरानी वस्तुओं को रखा जा सके। समय के साथ विश्वभर में संग्रहालयों की भूमिका और उद्देश्य में परिवर्तन आया। इसे कला को सीखने की इच्छा को समर्पित भवन के रूप में देखा गया। संग्रहालय शब्द को पहचान मिली और समाज में संग्रहालय की भूमिका महत्वपूर्ण बन गयी। आज का संग्रहालय न केवल विविध वस्तुओं को संकलित करके रखने वाला भवन है, अपितु यह सीखने और सिखाने का प्रमुख संस्थान भी है। इस प्रकार आधुनिक संग्रहालय ज्ञान के संरक्षण के साथ-साथ ज्ञान के विस्तार एवं शोध केन्द्र के रूप में विकसित हो रहे हैं।

    आधुनिक संग्रहालयों की विषय-वस्तु

    आधुनिक संग्रहालय एक ऐसा स्थान है जहाँ, विभिन्न युगों में घटित घटनाओं के चिह्न, अवशेष, चित्र, मॉडल आदि का संग्रहण किया जाता है। अर्थात् संग्रहालय में धरती के किसी भी भाग में अथवा ब्रह्माण्ड के किसी भी पिण्ड पर किसी भी कालखण्ड में विकसित मिट्टी, चट्टान, शैवाल, खनिज, वनस्पति, पुष्प, तितली, कीट, पक्षी, विविधि प्रकार के जीव-जन्तु, उनके जीवाश्म, जीवों के अस्थि-पंजर, मानवों द्वारा प्रयुक्त उपकरण, औजार, शिल्प, स्थापत्य आदि विविध सामग्री का संग्रह किया जाता है। साथ ही खगोलीय घटनाओं से लेकर भौगोलिक, ऐतिहासिक, सामरिक, आर्थिक, वैज्ञानिक, दार्शनिक एवं सांस्कृतिक जगत में घटी घटनाओं तथा उनसे सम्बद्ध महापुरुषों आदि के चित्र, प्रतिमाएँ, चार्ट, ग्राफ, यंत्र, वेशभूषा आदि का संकलन किया जाता है।

    सरल शब्दों में कहा जा सकता है कि विविध कालखण्डों में प्रकृति एवं जीवों द्वारा छोड़े गए अवशेष ही संग्रहालय की मुख्य विषय-वस्तु होते हैं। मानव द्वारा अर्जित ज्ञान का जिस किसी भी प्रकार से निरूपण किया जा सके, वह सब, संग्रहालय की विषय वस्तु बन सकती है। डाक टिकटों से लेकर माचिस की डिब्बियों, सिगरेट केस, कुर्सियों, रेलवे इंजन एवं डिब्बे, बाथरूम यूटेंसिल्स, ताले, घड़ियाँ, बंदूकें, तोपें, कारें, हस्तलिखित पोथियां, चित्रित पोथियां, ताड़पत्र, जन्म कुण्डलियाँ, शिलालेख, मूर्तियां, मिट्टी के बर्तन, ग्रामीण जीवन में काम आने वाली सामग्री, कृषियंत्र, झाड़ू, ग्रामोफोन, रेडियो, गुड़ियाएं, पेपरवेट आदि विभिन्न प्रकार की सामग्री को विश्व भर के संग्रहालयों एवं भारत के संग्रहालयों की विषय-वस्तु बनाया गया है। अमरीका में फर्स्ट लेडी (अर्थात् अमरीकी राष्ट्रपति की पत्नी) के गाउन भी संग्रहालय को दान किए गए तथा उनका प्रदर्शन आज भी किया जा रहा है।

    आधुनिक संग्रहालयों की स्थापना के उद्देश्य

    सामान्यतः संग्रहालय के माध्यम से युग-युगीन मानवीय कार्यकलापों, इतिहास एवं पर्यावरण की विरासतों के संरक्षण के लिए उनका संग्रह, शोध, प्रचार या प्रदर्शन किया जाता है। इस सामग्री का उपयोग इतिहास लेखन, शिक्षण, अध्ययन और मनोरंजन आदि विविध उद्देश्यों के लिए होता है। संग्रहालयों के माध्यम से देशी-विदेशी पर्यटकों के बीच क्षेत्र विशेष की संस्कृति का प्रदर्शन करके लाभार्जन किया जाता है।

    आधुनिक संग्रहालयों का वर्गीकरण

    आज किसी भी विषय-वस्तु को लेकर संग्रहालय स्थापित कर दिया जाता है। विषय वस्तु के आधार पर संग्रहालयों का निम्नलिखित प्रकार से वर्गीकरण किया जा सकता है-

    (1.) कला संग्रहालय: चित्रकला, संगीत कला, लोक वाद्ययंत्र, शास्त्रीय वाद्ययंत्र, हस्तकलाओं के नमूने, नृत्यकला से सम्बन्धित सामग्री आदि।

    (2.) ऐतिहासिक संग्रहालय: स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, देशी रजवाड़ों का इतिहास, संवैधानिक प्रगति का इतिहास, धार्मिक सम्प्रदायों का इतिहास आदि।

    (3.) पुरातत्व संग्रहालय: प्राचीन सभ्यता के स्थलों से प्राप्त बर्तन, मूर्तियां, भवन सामग्री, आभूषण, सिक्के, खेत, कुंए आदि।

    (4.) विज्ञान और प्रौद्योगिकी संग्रहालय: मिट्टियां, पुष्प, तितलियां, खनिज, अंतरिक्ष विज्ञान, विज्ञान के सिद्धांत आदि।

    (5.) नृशास्त्रीय संग्रहालय: विभिन्न काल खण्डों के आदिमानवों के कंकाल, खोपड़ी, ममी आदि।

    (6.) महापुरुषों पर केन्द्रित संग्रहालय: सुभाषचंद्र बोस, बालगंगाधर तिलक, अरविंद घोष, महाराजा अग्रसेन, महाराजा रणजीतसिंह आदि पर केन्द्रित संग्रहालय।

    (7.) पुस्तक मुद्रण कला संग्रहालय: प्रारंभिक मुद्रण कला, ट्रेडल मुद्रण मशीन, ऑफसेट मुद्रण मशीन आदि।

    (8.) डाक टिकट संग्रहालय: भारत में अब तक केवल दिल्ली में ऐसा संग्रहालय स्थापित किया गया है। निजी संग्रहकर्ताओं के पास अपने छोटे-छोटे डाक टिकट संग्रह हैं।

    (9.) बाल संग्रहालय: बालोपयोगी विज्ञान, कला सामग्री, खिलौने, ट्राइसाइकिल, फोटोग्राफ, पेंटिंग आदि।

    (10.) स्वास्थ्य संग्रहालय: स्वच्छता, स्वास्थ्य समस्याएं, घातक बीमारियां, चिकित्सा पद्धतियां, आदि।

    (11.) अस्त्र-शस्त्र संग्रहालय: तोपें, बंदूकें, भाले, तलवार, ढालें, खुकरी, चाकू, छुरे, टैंक, लड़ाकू विमान आदि। जोधपुर दुर्ग में प्राचीन तोपों का संग्रहालय है।

    (12.) दैनिक उपयोग की वस्तुएं: वस्त्र, जूते, टोपियां, पगड़ियां, साफे, कोट, ताले, घड़ियां, कैंचियां, बागवानी के उपकरण, खेती के उपकरण आदि। जोधपुर में पाग-पगड़ियों का संग्रहालय अपने आप में अनूठा है। उदयपुर में बागोर की हवेली में भी पाग-पगड़ियों का संग्रहालय है।

    (13.) चित्रशालाएं: इस प्रकार के संग्रहालयों में विविध कालखण्डों में, विविध क्षेत्रों अथवा प्रांतों में, विविध शैलियों अथवा उपशैलियों में एवं विविध कलाकारों द्वारा निर्मित चित्रों अर्थात् पेंटिंग एवं फोटोग्राफ प्रदर्शित किए जाते हैं।

    (14.) राष्ट्रीय संग्रहालय: इस प्रकार के संग्रहालय में देश-विदेश के दर्शकों को सम्पूर्ण देश का प्रतिनिधित्व करने वाली एवं जीवन के लगभग प्रत्येक पक्ष से सम्बन्ध रखने वाली सामग्री का प्रदर्शन किया जाता है तथा उसे पुरातत्व, कला, पेंटिंग्स, अस्त्र-शस्त्र, वस्त्र एवं वेशभूषा आदि विभागों में विभक्त किया जाता है। इन संग्रहालयों में देश से बाहर से भी सामग्री प्राप्त कर प्रदर्शित की जाती है।

    संग्रहालयों की समस्याएं

    संग्रहालयों की स्थापना, संरक्षण एवं संचालन का कार्य कठिनाइयों से भरा हुआ है। इसके लिए दक्ष व्यक्तियों, विपुल धन एवं विस्तृत भवन आदि की आवश्यकता होती है। संग्रहालयों में संकेतकों की स्थापना करने, दस्तावेजीकरण करने और श्रेणीकरण करने के लिए उत्साही एवं योग्य व्यक्ति बहुत कम संख्या में उपलब्ध हो पाते हैं। संग्रहालयों का परिवेश आकर्षक एवं उत्साहवर्द्धक बनाया जाना आवश्यक है, जहाँ दर्शक बिना किसी तनाव एवं संकोच के पहुंच सके। भारतीय संग्रहालयों के लिए इसी प्रकार के आधारभूत ढांचे की आवश्यकता है, ताकि यह विश्व भर के संग्रहालयों की तुलना में स्वयं को स्तरीय सिद्ध कर सकें। संग्रहालय में प्रदर्शित प्रत्येक सामग्री का विवरण, साधारण दर्शक को सहज रूप से उपलब्ध कराया जाना आवाश्यक है। बहुभाषी प्रदर्शकों (गाइड) की उपलब्धता भी एक बड़ी समस्या है। प्रशिक्षित एवं योग्य गाइड के बिना संग्रहालय को देखने को कोई अर्थ नहीं है। जब तक दर्शकों को संग्रहालय में प्रदर्शित प्रमुख वस्तुओं की विस्तृत और सटीक जानकारी नहीं मिलेगी, तब तक दर्शक का संग्रहालय से समुचित जुड़ाव होना संभव नहीं है।

    राजस्थान का निर्माण होने के बाद राजस्थानी शोध संस्थान चौपासनी (जोधपुर) की स्थापना ई.1955 में, साहित्य संस्थान राजस्थान विद्यापीठ उदयपुर की स्थापना ई.1955 में तथा प्रताप शोध प्रतिष्ठान की स्थापना ई.1967 में हुई थी। राजस्थान में इस प्रकार की संस्थाओं की स्थापना का उद्देश्य इतिहास एवं पुरातत्व के विद्यार्थियों को शोध सामग्री के मूल स्रोत उपलब्ध करवाना था। इन संस्थाओं को राजस्थान सरकार द्वारा 60 से 90 प्रतिशत तक अनुदान उपलब्ध करवाया जाता था किंतु लगभग 50 वर्ष तक राजकीय संरक्षण देने के बाद, सरकार की नीतियों में परिवर्तन आने के कारण वर्ष 2011 में राजकीय अनुदान बंद कर दिया गया। इन संस्थाओं के प्रशिक्षित एवं अनुभवी कर्मचारियों एवं अधिकारियों को अन्य कार्यों में लगा दिया गया। राज्य सरकार के इस कदम के कारण प्रदेश में शोध कार्य को धक्का लगा है।

    संग्रहालयों से अपेक्षाएं

    संग्रहालय संचालकों का पहला और अंतिम उद्देश्य केवल यही होना चाहिए कि वे संग्रहालय में आने वाले प्रत्येक दर्शक की जिज्ञासाओं का समाधान करें। दर्शकों को संग्रहालय में लम्बी अवधि व्यतीत करने का अवसर दिया जाना चाहिए, जिससे वे शिक्षा और ज्ञान की अपनी जिज्ञासाओं का शमन कर सकें। साथ ही, वे कला, विज्ञान एवं विविध विषय पर आधारित सामग्री को भलीभांति समझ सकें। जन साधारण के लिए संग्रहालय किसी अजूबे से कम नहीं होता। उसके इस भाव को स्थायी बने रहने देने के लिए यह आवश्यक है कि संग्रहालय का संयोजन किसी अजूबाघर की ही तरह किया जाए। तभी जनसाधारण का जुड़ाव संग्रहालयों से बना रह सकेगा और वह अपने अतीत की सुनहरी एवं गौरवमयी परम्परा से भिज्ञ रह सकेगा।

    भारत में सार्वजनिक संग्रहालयों की स्थापना

    भारत के अनेक देशी रजवाड़ों में पुराने एवं नए हथियारों को एक स्थान पर एकत्रित करके रखने की परम्परा थी। जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी का आगमन हुआ तो इस परम्परा को और अधिक बढ़ावा मिला। ई.1784 में सर विलियम जोन्स ने कलकत्ता में एशियाटिक सोसायटी बंगाल की स्थापना की। सोसायटी द्वारा अपने पुस्तकालय में हस्तलिखित पोथियों, मानचित्रों, मुद्राओं, आवक्ष आकृतियों, चित्रों तथा अन्य सामग्री का संकलन किया गया। इस छोटे से संग्रहालय की स्थापना, देश में भावी संग्रहालयों की स्थापना के लिए मील का पत्थर सिद्ध हुई तथा इसे व्यापक लोकप्रियता मिली। इस प्रकार अठारहवीं शताब्दी ईस्वी में भारत में पहली बार व्यवस्थित रूप से सार्वजनिक संग्रहालय ने जन्म लिया।

    उन्नीसवीं शताब्दी संग्रहालयों की स्थापना की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुई। एशियाटिक सोसायटी के प्रयासों से ई.1814 में भारतीय संग्रहालय कलकत्ता की स्थापना हुई जिसे भारत का प्रथम संग्रहालय होने का गौरव प्राप्त है। इसके बाद अन्य संग्रहालयों की स्थापना आरम्भ हुई। ई.1851 में केन्द्रीय संग्रहालय मद्रास की स्थापना हुई। इसी वर्ष बम्बई के ग्रांट मेडिकल कालेज में एशिया का प्रथम मेडिकल संग्रहालय स्थापित किया गया। ई.1863 में राजकीय संग्रहालय लखनऊ की स्थापना हुई। यह उत्तर प्रदेश का पहला संग्रहालय था। ई.1865 में राजकीय संग्रहालय मैसूर, ई.1868 में दिल्ली नगर पालिका संग्रहालय और ई.1874 में मथुरा संग्रहालय की स्थापना हुई। ई.1887, 1888, 1890 तथा ई.1894-95 में त्रिचूर, उदयपुर, भोपाल, जयपुर, राजकोट, पूना, बड़ौदा, भावनगर एवं त्रिचनापल्ली इत्यादि शहरों में विभिन्न संग्रहालयों की स्थापना हुई।

    बीसवीं शताब्दी में संग्रहालयों की स्थापना का काम और तेजी से आगे बढ़ा। ई.1914 में प्रिन्स ऑफ वेल्स म्यूजियम मुम्बई, ई.1920 में भारत कला भवन बनारस, हिन्दू विश्वविद्यालय संग्रहालय वाराणसी, ई.1929 में बॉटनीकल म्यूजियम इन्दौर तथा ई.1931 में इलाहाबाद संग्रहालय आदि संग्रहालयों की स्थापना हुई। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् देश में संग्रहालयों की नई भूमिका अनुभव की जाने लगी और अनेक बहुआयामी संग्रहालयों की स्थापना हुई। आजादी के दो वर्ष बाद ई.1949 में नई दिल्ली में राष्ट्रीय संग्रहालय स्थापित किया गया। आज यह बैद्धिक और शैक्षणिक गतिविधियों का बड़ा केन्द्र है। भारत में अब तक सरकारी क्षेत्र में 400 से अधिक संग्रहालयों की स्थापना हो चुकी है। निजी क्षेत्र के संग्रहालयों की संख्या अलग है।

    आधुनिक भारत के निर्माता भारत के ऐतिहासिक अतीत से अवगत थे और वे इसकी समृद्धि, इसके महत्व तथा भावी पीढ़ियों के लिए इसकी उत्सुकता से भी परिचित थे। उन्हें संग्रहालय जैसी महत्वपूर्ण संस्थाओं के निर्माण करने की प्रासंगिकता का भी ज्ञान था। संग्रहालयों की यह यात्रा निश्चित रूप से आने वाले समय में अपने कलेवर और वस्तु-विषय में और भी बड़े परिवर्तन करेगी।

    भारत में संग्रहालयों का वैज्ञानिक पद्धति से विकास

    भारत सरकार द्वारा देश में वैज्ञानिक पद्धति से संग्रहालयों का विकास किया गया है। राष्ट्रीय स्तर के प्राकृतिक इतिहास संग्रहालयों की स्थापना एवं नियंत्रण का कार्य भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा किया जाता है। देश में संस्कृति मंत्रालय के अधीन सात राष्ट्रीय संग्रहालय स्थापित किए गए हैं-

    (1.) इलाहाबाद संग्रहालय,

    (2.) भारतीय संग्रहालय, कलकत्ता,

    (3.) राष्ट्रीय आधुनिक कला वीथी, नई दिल्ली

    (4.) राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय, मुम्बई

    (5.) राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय, बैंगलुरू

    (6.) सालारजंग संग्रहालय हैदराबाद,

    (7.) विक्टोरिया मैमोरियल कलकत्ता।

    देश में विज्ञान के प्रति रुचि जाग्रत करने एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद के अधीन 25 संग्रहालय स्थापित किए गए हैं। साथ ही राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद द्वारा राज्य सरकारों के लिए 18 रीजनल साइंस सेंटर, साइंस सेंटर एवं सबसेंटर भी स्थापित किए गए हैं। भारत सरकार द्वारा 44 संग्रहालय भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधीन स्थापित किए गए हैं। देश में बहुत से संग्रहालय राज्य सरकारों द्वारा स्थापित एवं संचालित किए जा रहे हैं।

    देश में विभिन्न सामाजिक, धार्मिक, शैक्षणिक एवं औद्योगिक संगठनों द्वारा भी अनेक संग्रहालय स्थापित किए गए हैं। कुछ धार्मिक सम्प्रदायों ने अपने प्राचीन गौरव का स्मरण बनाए रखने एवं आगामी पीढ़ियों को इस गौरव से परिचित कराने के उद्देश्य से भी संग्रहालय स्थापित किए हैं जिनमें सेंट्रल सिक्ख म्यूजियम हरमिंदर साहिब अमृतसर, महाराजा रणजीतसिंह मार्टिªयल आर्ट म्यूजियम अमृतसर, शहीद ए आजम सरदार भगतसिंह म्यूजियम कपूरथला, पंजाब स्टेट वार हीरोज मेमोरियल एण्ड म्यूजियम अमृतसर, विरासत ए खालसा आनंदपुर साहिब, द पार्टीशन म्यूजियम अमृतसर तथा इण्टरनेशलन सिक्ख म्यूजियम लुधियाना विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-38

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-38

    पर्यावरण की रक्षक राजस्थान की विशिष्ट जातियाँ (2)


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    आदिवासी जातियाँ


    राजस्थान में लगभग 70 लाख आदिवासी रहते हैं। उदयपुर, जयपुर, सवाईमाधोपुर, सिरोही, भीलवाड़ा, टोंक, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, कोटा, बूंदी तथा झालावाड़ जिलों में ये काफी संख्या में रहते हैं। राजस्थान का दक्षिणी क्षेत्र विशेष रूप से उदयपुर जिले की कोटड़ा, झाड़ौल, सलूम्बर, सराड़ा, खेरवाड़ा तहसीलें और सम्पूर्ण डूंगरपुर जिला आदिवासियों से भरा पड़ा है। ये बिखरी बस्ती में रहना पसंद करते हैं। जंगलों और पहाड़ों में छितराये हुए खेत उपलब्ध होने से ये अलग-अलग झौंपड़ीनुमा छप्पर बनाकर रहते हैं। इनकी कृषि, वर्षा पर निर्भर करती है। जमीन की किस्म के अनुसार ये पैदावार करते हैं। मक्का इनका प्रमुख अन्न है। कोटड़ा तहसील में इनकी वेश-भूषा अन्य स्थानों से थोड़ी भिन्न है। यहाँ स्त्रियां घुटनों तक साड़ी पहनती हैं। वक्षस्थल और शरीर का शेष भाग कपड़ा पहन कर ढक लेती हैं। यहाँ के आदिवासी 'कथोड़ी'कहलाते हैं।

    गोगुंदा तहसील के ओगणा क्षेत्र में इनकी संख्या अधिक है। कोटड़ा एवं झाड़ौल क्षेत्र के आदिवासी, रंग-बिरंगे कपड़े पहनना पसंद करते हैं। पुरुष सिर पर दो गज कपड़ा बांधते हैं। इसे 'फेंटा' कहते हैं। सिर का ऊपरी भाग खुला रहता है। शरीर पर कुर्ता और नीचे धोती पहनते हैं। प्रायः इनकी एक टांग पर धोती घुटने तक ही रहती है। स्त्रियां सिर पर ओढ़नी ओढ़ती हैं जिसे 'लूगड़ा'कहते हैं। वक्षस्थल पर 'चोली' पहनती हैं। कभी-कभी ये चोली के नीचे 'कांचली'भी पहनती हैं। खेरवाड़ा और सराड़ा तहसील में चोली की चौड़ाई मात्र 4-5 इंच ही होती है। फलस्वरूप उदर का अधिक भाग दिखायी देता है। नाभि से थोड़ा नीचे लहंगा पहनती हैं जिसे 'फेटिया'कहते हैं।

    शिक्षा और आधुनिकता के प्रभाव से इनकी वेशभूषा में निरंतर बदलाव आ रहा है। बारां जिले की शाहबाद और किशनगंज तहसीलों में सहरिया जनजाति पाई जाती है। यह राज्य की सर्वाधिक निर्धन जनजाति है। विभिन्न क्षेत्रों में इनकी भाषा की भिन्नता स्पष्ट दिखायी देती है। फलासिया के आदिवासी मारवाड़ी मिश्रित मेवाड़ी बोलते हैं। खेरवाड़ा और आस-पास के क्षेत्र गुजरात से लगे होने से गुजराती मिश्रित खिचड़ी भाषा बोलते हैं। राजस्थान में भील एवं मीणा मुख्य आदिवासी जातियाँ हैं।

    मीणा

    पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मीणा जाति का सम्बन्ध मत्स्यावतार से है। कुछ लोगों का मत है कि मत्स्य क्षेत्र जो अलवर, भरतपुर और जयपुर जिलों में स्थित था, के शासक 'मेना' कहलाते थे। समझा जाता है कि 'मीणा' इन्हीं के वंशज हैं। मीणा जाति में मुख्यतः दो वर्ग हैं- जमींदारी वर्ग और चौकीदार वर्ग। उत्तरी भाग के मीणा 'उच्चवर्ग' और दक्षिणी भाग के मीणा 'निम्नवर्ग' समझे जाते हैं। इन दोनों वर्गों के बीच सामूहिक खान-पान और शादी ब्याह नहीं होते हैं। इनकी पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन व्यवस्था संयुक्त परिवार के अनुसार है।

    स्त्री और पुरुष समान रूप से कार्य करते हैं। स्त्रियां बहुत परिश्रमी और साहसी होती हैं। ये कृषि और गृह कार्यों में पुरुषों के साथ कंधा मिलाकर चलती हैं। इनमें विवाह सम्बन्ध करते समय रिश्तेदारों और रक्त सम्बन्ध का बहुत ध्यान रखा जाता है। बहन के पति का अधिक सम्मान किया जाता है। इनमें गोद लेने की प्रथा भी प्रचलित है। मीणों में सम्बन्ध विच्छेद की प्रथा प्रचलित है। यह सरलता से हो जाता है। पति-पत्नी अलग होना चाहें तो पति के दुपट्टे का कुछ भाग स्त्री के हाथ में देने से विवाह विच्छेद माना जाता है। परिवार पितृवंशीय हैं। ये शक्ति के उपासक हैं। दुर्गा माता एवं काली माता को अधिक मानते हैं। हनुमानजी और शिवजी की पूजा की जाती है। इनमें पितरों का तर्पण करने की भी परंपरा है। बेणेश्वर मेले में ये अपने पूर्वजों की अस्थियां प्रवाहित करना पुण्य समझते हैं और जादू टोनों में विश्वास करते हैं। जमींदार मीणा अधिकतर कृषक हैं। कृषि के साथ पशुधन रखते हैं। कुछ लोग लूट-पाट भी करते हैं।

    भील

    भील राजस्थान का दूसरा प्रमुख आदिवासी समुदाय है। भील शब्द का प्रयोग तमिल भाषा में 'बिल्लुवर' के रूप में हुआ है जिसका अर्थ है- धनुर्धारी। भील अपने को महादेव शिव का वंशज मानते हैं। ये स्वभाव से भोले परंतु वीर, अति साहसी एवं निडर होते हैं। इनमें स्वामि-भक्ति की भावना कूट-कूट कर भरी होती है। ये पहाड़ियों पर बीस-पच्चीस घरों के छोटे-छोटे गाँव बसा कर रहते हैं जिन्हें 'फला' कहते हैं। फला से बड़े गाँवों को 'पाल' कहते हैं। पाल का नेता ग्रामपति या मुखिया कहलाता है जो सामाजिक, आर्थिक एवं व्यक्तिगत झगड़ों को निबटाता है। मुखिया का सर्वाधिक सम्मान होता है।

    भील जाति में सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना बहुत प्रबल होती है। यदि किसी व्यक्ति ने किसी भील पर आक्रमण किया या चोट पहुँचायी तो ये सम्पूर्ण गाँव पर आक्रमण समझते हैं और तदनुसार प्रतिरोध करते हैं। इस कार्य के लिये वे अपनी जान तक गंवाने की भी परवाह नहीं करते हैं। भीलों के गाँव के मुखिया को गमेती भी कहते हैं। राजस्थान के आदिवासियों में गमेती नाम की एक अलग जनजाति भी पाई जाती है। आदिवासी प्रायः पृथक गाँव वालों से अपना रिश्ता जोड़ते हैं और उन्हें अपनाते हैं। कभी-कभी इनमें चचेरे एवं ममेरे भाई-बहिन का विवाह होता है जिसे बुरा नहीं माना जाता है। पत्नी की मृत्यु हो जाने पर प्रायः उसी की छोटी बहिन से (यदि हो तो) विवाह कर लिया जाता है। देवर भोजाई के विवाह का भी प्रचलन है। मक्का, चावल और गेहूं इनका प्रमुख भोजन है। ये लोग मक्का अधिक चाव से खाते हैं। दूध, मछली एवं मांस भी इनका प्रिय भोजन है। शराब पीना अधिक पसंद करते हैं। कमाई का अधिकांश भाग शराब पीने में खर्च करते हैं तथा निर्धनता में जीते हैं। कृषि करना, लकड़ी बेचना तथा मजदूरी करना इनका मुख्य काम है। मौसम के अनुसार जंगलों से गोंद, लकड़ी, कंदमूल आदि एकत्र कर उसे शहरों में लाकर बेचते हैं। परम्परागत त्यौहार, मेले और जलसों में जब ये मिलते हैं तब इनका जीवन दर्शन देखकर रोमांच होता है। रंग-बिरंगे परिधानों में सजे-संवरे, नाचते-गाते अदिवासियों से मिलकर दर्शक आदिम संस्कृति के सागर में गोते लगाने लगते हैं।

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  • अध्याय - 8 दक्षिण भारत में महा-पाषाण संस्कृति

     02.06.2020
    अध्याय - 8 दक्षिण भारत में महा-पाषाण संस्कृति

    दक्षिण भारत में महा-पाषाण संस्कृति


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    महापाषाणीय संस्कृति का उदय ई.पू.1000 के आसपास दक्षिण भारत में हुआ। यह संस्कृति दक्षिण भारत में कई शताब्दियों तक अस्तित्त्व में रही।

    दक्षिणी भारत के विभिन्न स्थानों से महापाषाणीय शवाधान (मेगालिथस्) प्राप्त हुए हैं। इस संस्कृति के लोग अपने मृतकों को समाधियों में गाड़ते थे तथा उनकी सुरक्षा के लिए बड़े-बड़े पाषाणों का प्रयोग करते थे। इस कारण इन्हें वृहत्पाषाण अथवा महापाषाण कहा गया है। इन शवाधानों की खुदाइयों में लोहे के औजार, हथियार तथा उपकरण प्रचुरता से मिलते हैं।

    महापाषाण संस्कृति का काल निर्धारण

    महापाषाणीय संस्कृति का उदय ई.पू.1000 के आसपास दक्षिण भारत में हुआ। यह संस्कृति दक्षिण भारत में कई शताब्दियों तक अस्तित्त्व में रही। माना जाता है कि दक्षिण भारत में लौह युग आरंभ होने के साथ ही महापाषाणीय शवाधानों के निर्माण की परम्परा आरंभ हुई। ब्रह्मगिरि से प्राप्त महापाषाणीय शवाधानों का काल-निर्धारण ई.पू. तीसरी सदी से ई.पू. पहली सदी के बीच किया गया है। इस प्रकार इस संस्कृति का काल निर्धारण अभी भी विवाद का विषय बना हुआ है।

    महापाषाण संस्कृति के प्रमुख क्षेत्र

    दक्षिण भारत: इस तरह के शवाधान महाराष्ट्र में नागपुर के पास, कर्नाटक में मास्की, आंध्र प्रदेश में नागार्जुन कोंडा तथा तमिलनाडु में अदिचलाल्लूर तथा केरल में पाई गई है। महापाषाणीय शवाधानों के निर्माण के तरीकों ने बस्तियों की योजनाओं को भी प्रभावित किया किंतु खेती और पशुचारण के काम परम्परागत रूप से होते रहे।

    मद्रास के तिन्नेवेली जिले के आदिचल्लूर नामक स्थान से कुछ पात्र मिले हैं। इन पात्रों में हथियार, औजार, आभूषण और अन्य सामग्री रख दी जाती थी। इस प्रकार के पात्रों का उल्लेख तमिल साहित्य में भी मिलता है। ब्रह्मगिरि, कोयम्बटूर जिले के सुलर, पाण्डिचेरी के अरिकमेडु से भी महापाषाणीय शवाधान मिले हैं। उत्तर भारत: इस प्रकार के शवाधान उत्तर प्रदेश के बांदा और मिर्जापुर जिलों में भी देखने को मिलते हैं।

    उत्तरी गुजरात के दारापुट में एक महापाषाणिक रचना मिली है जो एक प्राचीन चैत्य भी हो सकती है। उन्नीसवीं सदी के मध्य में कराची जिले के कलक्टर कैप्टेन प्रीडी ने कहा था कि सम्पूर्ण पर्वतीय जिले में बड़ी संख्या में प्रस्तर की कब्रें मौजूद हैं जो हमारी पश्चिमी सीमा तक बढ़ आई हैं। इन कब्रों में द्वार का अभाव है अन्यथा ये शेष बातों में दक्षिण भारत की कब्रों के समान ही हैं। ई.1871 से 1873 की अवधि में कार्लाइल ने पूर्वी राजथान का दो बार भ्रमण किया। उन्होंने फतहपुर सीकरी के पास अनेक संगोरा शवाधानों की उपस्थिति का उल्लेख किया परन्तु वे महापाषाणिक शवाधान नहीं हैं।

    वे प्रस्तरों के आयताकार ढेर हैं जिनमें प्रस्तरों के ही छोटे शवाधान कक्ष बने हुए हैं। इन शवाधानों की छतें भी प्रस्तरों की हैं। इन संगोरों में अधिकतर राख एवं निस्तप्त हड्डियां भरी हुई हैं। कार्लाइल ने देवसा में भी महापाषाण समूहों को देखा था। कश्मीर के बुर्झामा नामक स्थान पर भी महापाषाणिक पांच विशालाकाय पत्थर मिले हैं। इन्हें ई.पू.400 से ई.पू 300 के बीच रखा गया होगा।

    महापाषाण शवाधानों का निर्माण

    महापाषाणीय शवाधानों के निर्माण के कई तरीके देखने में आते हैं। कभी-कभी मृतकों की हड्डियां बड़े कलशों में जमा करके गड्ढे में गाड़ी जाती थीं। इस गड्ढे को ऊपर से पत्थरों अथवा केवल पत्थर से ढंक दिया जाता था। कभी-कभी दोनों ही तरीके अपनाए जाते थे। कलश तथा गड्ढों में कुछ वस्तुएं रखी जाती थीं। कुछ शवों को पकाई हुई मिट्टी की शव पेटिकाओं में भी रखा जाता था। कुछ मामलों में मृतक के शवाधान पत्थरों से बनाए गए हैं। ग्रेनाइट पत्थरों की पट्टिकाओं से बने ताबूतनुमा शवाधानों में भी शवों को दफनाया गया है। भारत में चार प्रकार के महापाषाण-युगीन शवाधानों के अवशेष मिले हैं-

    (1.) संगौरा वृत्त: इस प्रकार के शवाधान अनेक गोलाकार पत्थरों को सम्मिलित कर बनाए गए हैं। इन संगौरा वृत्तों को देखकर लगता है कि उस समय शव को लोहे के औजारों, मृत्तिका पात्र या कलश और पालतू जानवरों की अस्थियों के साथ दफना दिया जाता था। उसके बाद समाधि के चारों ओर गोल पत्थरों को जड़ दिया जाता था। इस प्रकार के संगौरा वृत्त नयाकुण्ड बोरगांव (महाराष्ट्र) तथा चिंगलपेट (तमिलनाडु) में मिलते हैं।

    (2.) ताबूत: यह भी अंत्येष्टि की एक विधि है। इसमें पहले शव को दफनाकर चारों ओर से छोटे-छोटे पत्थरों के खम्भों से घेर दिया जाता था। फिर इन खम्भों के ऊपर एक बड़ी पत्थर की सिल्ली रखकर समाधि पर छाया-छत्र जैसी आकृति बना दी जाती थी। इस प्रकार के शवाधान उत्तर प्रदेश के बांदा और मिर्जापुर जिलों में मिलते हैं।

    (3.) मैनहरि: इस प्रकार के शवाधानों में शव को गाड़कर उसके ऊपर एक बड़ा सा स्तम्भाकार स्मारक पत्थर लगा दिया जाता था जो उस स्थान पर समाधि होने का संकेत देता था। इन स्तम्भाकार पत्थरों की लम्बाई 1.5 मीटर से 5.5 मीटर तक पाई जाती है। इस प्रकार की समाधियां कर्नाटक के मास्की और गुलबर्गा क्षेत्रों से मिली हैं।

    (4.) महापाषाण तुम्ब: इस प्रकार के शवाधानों के निर्माण में सर्वप्रथम पत्थर की पट्टियों से घिरे हुए चबूतरे जैसे स्थान पर शव एक पत्थर की सिल्ली पर रखा जाता था। फिर शव के चारों कोनों पर स्थित खम्भों पर एक और पत्थर की पट्टी रखी जाती थी। उपरोक्त बनावट किसी मेज का आभास देती है। इसी कारण इस प्रकार की समाधियों को तुम्ब कहा जाता है जिसका अर्थ है- पत्थर की मेज। इस प्रकार की समाधियां कर्नाटक के ब्रह्मगिरि एवं तमिलनाडु के चिंगलपेट नामक स्थानों पर प्रायः देखी गई हैं।

    (5.) अन्य समाधियां: उपरोक्त चार प्रकार की समाधियों के अतिरिक्त कुछ अन्य प्रकार के शवाधान भारत के विभिन्न क्षेत्रों में पाए गए हैं। डॉ. विमलचंद्र पाण्डेय ने आठ प्रकार के महापाषाणीय शवाधानों का वर्णन किया है- (1) सिस्ट समाधि, (2) पिट सर्किल, (3) कैर्न सर्किल, (4) डोल्पेन, (5) अम्ब्रेला स्टोन, (6) हुड स्टोन, (7) कन्दराएं और (8) मोहिर।

    शवाधानों से प्राप्त सामग्री

    इन शवाधानों से जो सामग्री मिली है उसका प्रयोग तत्कालीन उत्तर-पश्चिम भारत तथा दक्षिण भारत में किया जाता था। कुछ विशेष प्रकार के बर्तन भी पाए गए हैं। इन शवाधानों से प्राप्त, 'पायों वाले प्याले' ठीक वैसे ही हैं जैसे कि उन दिनों की तथा उनसे भी पुरानी भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र तथा ईरान की कब्रों से मिले हैं। घोड़ों की हड्डियां और घोड़ों से सम्बन्धित सामग्री का मिलना इस बात की ओर संकेत करता है कि घुड़सवारी वाले लोग इस क्षेत्र में पहुँच गए थे। घोड़ों को दफनाने के उदाहरण नागपुर के निकट जूनापानी से प्राप्त होते हैं। ये महापाषाणीय उदाहरण विशेष रूप से मृतकों के अंतिम संस्कार के तरीके तथा देशी एवं विदेशी परम्पराओं का मिश्रण प्रस्तुत करते हैं।

    महापाषाण सभ्यता की लौह सामग्री

    महापाषाणीय युग के स्थलों, विदर्भ में नागपुर के निकट जूनापानी से लेकर दक्षिण में आदिचनल्लूर तक लगभग 1500 किलोमीटर क्षेत्र में लोहे की वस्तुएं समान रूप से पाई गई हैं। लोहे की विभिन्न प्रकार की वस्तुएं, जैसे चपटी लोहे की कुल्हाड़ियां, जिसमें पकड़ने के लिए लोहे का दस्ता होता था, फावड़े, बेल्चे, खुरपी, कुदालें, हंसिये, फरसे, फाल, सब्बल, बरछे, छुरे, छैनी, तिपाइयां, स्टैण्ड, तश्तरियां, लैम्प, कटारें, तलवारें, तीर के फल तथा बरछे के फल, त्रिशूल आदि प्राप्त हुए हैं।

    इन औजारों के अतिरिक्त कुछ विशेष प्रकार की वस्तुएं प्राप्त हुई हैं। जैसे- घोड़े के सामान जिनमें लगाम का लोहे का वह हिस्सा जो घोड़े के मुंह में होता है, फंदे के आकार वाली नाक तथा मुंह पर लगाने वाली छड़ें आदि। धातु की अन्य वस्तुओं में सबसे अधिक संख्या में पशुओं की गर्दन में बांधी जाने वाली ताम्र व कांस्य की घंटियां प्राप्त हुई हैं।

    इस संस्कृति के लोग काले व लाल रंग के बर्तनों का उपयोग करते थे। दक्षिण भारत की महापाषाण सभ्यता से चित्रित धूसर भाण्ड परम्परा के साथ लोहे के जो उपकरण मिले हैं, उन्हें देखकर यह कहा जा सकता है कि इस सभ्यता के मानव द्वारा लौह उपकरणों का उपयोग सीमित कार्य के लिए ही किया गया।

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  • अध्याय - 2 राजस्थान के संग्रहालयों की आधारभूत सामग्री

     02.06.2020
    अध्याय - 2 राजस्थान के संग्रहालयों की आधारभूत सामग्री

    अध्याय - 2 राजस्थान के संग्रहालयों की आधारभूत सामग्री


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    किसी भी देश, प्रदेश अथवा क्षेत्र की सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विरासत से अवगत कराने में संग्रहालयों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। संग्रहालय की सफलता अथवा लोकप्रियता इस बात पर निर्भर करती है कि उसमें किस प्रकार की सामग्री संजोई गई है तथा आमजन की उस सामग्री तक पहुंच कितनी है! आधुनिक काल में पुरातत्व, इतिहास, विज्ञान, प्रकृति आदि विविध विषयों पर आधारित संग्रहालयों की स्थापना की जाती है। संग्रहालयों के लिए विश्वसनीय, स्तरीय एवं प्रामाणिक सामग्री की उपलब्धता अत्यंत संवेदनशील विषय है। इसके लिए विविध स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है तथा सतर्क रहकर सामग्री का चयन करना होता है। राजस्थान के संग्रहालयों में पाषाण कालीन सभ्यताओं के प्रस्तर उपकरणों से लेकर प्राचीन एवं मध्य काल की ऐतिहासिक सामग्री एवं कलाकृतियों से लेकर हस्तलिखित ग्रंथ, ताड़पत्र, पाण्डुलिपियां, चित्रित ग्रंथ, चित्रमालाएं, तांत्रिक यंत्र आदि मसाग्री संजोई गई है। इस विशद सामग्री का परिचय प्राप्त करने से पहले राजस्थान के उन स्थलों के बारे में जानना आवश्यक है जहाँ से यह विविध सामग्री प्राप्त की गई है।

    पाषाण कालीन सभ्यता स्थल

    राजस्थान में मानव सभ्यता पुरा-पाषाण, मध्य-पाषाण तथा उत्तर-पाषाण काल से होकर गुजरी। राजस्थान में आदि मानव द्वारा प्रयुक्त जो प्राचीनतम पाषाण उपलब्ध हुए हैं, वे लगभग डेढ़ लाख वर्ष पुराने हैं। पुरा-पाषाण काल डेढ़ लाख वर्ष पूर्व से पचास हजार वर्ष पूर्व तक का काल समेटे हुए है। इस काल में हैण्ड एक्स, क्लीवर तथा चॉपर आदि का प्रयोग करने वाला मानव बनास, गंभीरी, बेड़च, बाधन तथा चम्बल नदियों की घाटियों में (आज जहाँ बांसवाड़ा, डूंगरपुर, उदयपुर, भीलवाड़ा, बूंदी, कोटा, झालावाड़ तथा जयपुर जिले हैं) रहता था जहाँ प्रस्तर युगीन मानव के चिह्न मिले हैं। इस युग के भद्दे तथा भौंडे हथियार अनेक स्थानों से मिले हैं जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि लगभग पूरे प्रदेश में इस युग का मानव फैल गया था। इन उपकरणों एवं औजारों का उपयोग करने वाला मनुष्य शिकार से प्राप्त वन्य पशु, प्राकृतिक रूप से प्राप्त कन्द, मूल, फल, पक्षी, मछली आदि खाता था।

    नगरी, खोर, ब्यावर, खेड़ा, बड़ी, अनचर, ऊणचा देवड़ी, हीराजी का खेड़ा, बल्लू खेड़ा (चित्तौड़ जिले में गंभीरी नदी के तट पर), भैंसरोड़गढ़, नगघाट (चम्बल और बामनी के तट पर) हमीरगढ़, सरूपगंज, बीगोद, जहाजपुर, खुरियास, देवली, मंगरोप, दुरिया, गोगाखेड़ा, पुर, पटला, संद, कुंवारिया, गिलूंड (भीलवाड़ा जिले में बनास के तट पर), लूणी (जोधपुर जिले में लूनी के तट पर), सिंगारी और पाली (गुड़िया और बांडी नदी की घाटी में), समदड़ी, शिकारपुरा, भावल, पीचक, भांडेल, धनवासनी, सोजत, धनेरी, भेटान्दा, धुंधाड़ा, गोलियो, पीपाड़, खींवसर, उम्मेदनगर (मारवाड़ में), गागरोन (झालवाड़), गोविंदगढ़ (अजमेर जिले में सागरमती के तट पर), काकोनी, (बारां जिले में परवन नदी के तट पर), भुवाणा, हीरो, जगन्नाथपुरा, सियालपुरा, पच्चर, तारावट, गोगासला, भरनी (टोंक जिले में बनास तट पर) आदि स्थानों से उस काल के पत्थर के हथियार प्राप्त हुए हैं।

    राजस्थान में मध्य-पाषाण काल आज से लगभग 50 हजार वर्ष पूर्व आरंभ हुआ। इस काल के उपकरणों में स्क्रैपर तथा पाइंट विशेष उल्लेखनीय हैं। ये औजार लूनी और उसकी सहायक नदियों की घाटियों में, चित्तौड़गढ़ जिले की बेड़च नदी की घाटी में और विराटनगर में भी प्राप्त हुए हैं। इस समय तक भी मानव को पशुपालन तथा कृषि का ज्ञान नहीं हुआ था। उत्तर-पाषाण काल का आरंभ लगभग 10 हजार वर्ष पूर्व से माना जाता है। इस काल में पहले हाथ से और फिर से चाक से बर्तन बनाए गए। इस युग के औजार चित्तौड़गढ़ जिले में बेड़च एवं गंभीरी नदियों के तट पर, चम्बल और वामनी नदी के तट पर भैंसरोड़गढ़ एवं नवाघाट, बनास के तट पर हमीरगढ़, जहाजपुर, देवली एवं गिलूंड, लूनी नदी के तट पर पाली, समदड़ी, बनास नदी के तट पर टौंक जिले में भरनी आदि अनेक स्थानों से प्राप्त हुए हैं। इस युग के उपकरण उदयपुर के बागोर तथा मारवाड़ के तिलवाड़ा नामक स्थानों पर मिले हैं।

    ताम्र युगीन दुर्लभ सामग्री

    राजस्थान में प्राप्त प्राचीनतम ताम्र सामग्री ईसा से लगभग 3000 साल पुरानी है। अर्थात् आज से लगभग 5000 साल पुरानी। सीकर जिले की नीमकाथाना तहसील में कांटली नदी के मुहाने पर स्थित गणेश्वर में हजारों की संख्या में ताम्बे के तीर, ताम्बे के 60 परशु, मछली पकड़ने के कांटे, ताम्बे के कंगन, ताम्बे की अंगूठियां आदि मिली हैं तथा इस क्षेत्र के आसपास ताम्रअयस्क को गलाकर ताम्बा निकालने की भट्टियां भी प्राप्त हुई हैं। किराडोत गांव से ताम्बे के छल्ले प्राप्त हुए हैं। ई.1934 में कुराड़ा (जिला नागौर) से ताम्बे की 103 वस्तुएं प्राप्त हुई थीं जिनमें से केवल 10 वस्तुएं नमूने के लिए रखकर शेष सामग्री जानकारी के अभाव में कबाड़ियों को नीलामी में बेच दी गई। ई.1982 में भरतपुर क्षेत्र में ताम्रयुगीन दुर्लभ अस्त्रों का खजाना मिला। इनमें चार जोड़े कांटे वाले हारपून-9, एक जोड़े कांटे वाले हारपून-3, ताम्रपरशु- सात, ताम्रछेणी-दो, ताम्रभालों के अग्रभाग-4 तथा ताम्बे की तलवारें-3, इस प्रकार कुल 33 वस्तुएं एक साथ प्राप्त हुई थीं। राजस्थान के अन्य स्थलों से भी ताम्रयुगीन सभ्यता की सामग्री प्राप्त हुई है। यह सभ्यता महाभारत काल के लगभग पांच सौ वर्ष बाद की तथा आज से लगभग 5000 साल पुरानी है।

    ताम्र, कांस्य एवं लौह युगीन सभ्यताओं के स्थल

    गणेश्वर (सीकर), आहड़ (उदयपुर), गिलूण्ड (राजसमंद), बागोर (भीलवाड़ा) तथा कालीबंगा (हनुमानगढ़) से ताम्र-पाषाण कालीन, ताम्रयुगीन एवं कांस्य कालीन सभ्यताएं प्रकाश में आयी हैं। ताम्रयुगीन प्राचीन स्थलों में पिण्डपाड़लिया (चित्तौड़), बालाथल एवं झाड़ौल (उदयपुर), कुराड़ा (नागौर), साबणिया एवं पूगल (बीकानेर), नन्दलालपुरा, किराड़ोत एवं चीथवाड़ी (जयपुर), ऐलाना (जालोर), बूढ़ा पुष्कर (अजमेर), कोल- माहोली (सवाईमाधोपुर) तथा मलाह (भरतपुर) विशेष उल्लेखनीय हैं। इन सभी स्थलों पर ताम्र उपकरण मिले हैं। लौह युगीन सभ्यताओं में नोह (भरतपुर), जोधपुरा (जयपुर) एवं सुनारी (झुंझुनूं) प्रमुख हैं।

    सिंधु घाटी सभ्यता के थेड़

    सिंधु नदी हिमालय पर्वत से निकल कर पंजाब तथा सिंध प्रदेश में बहती हुई अरब सागर में मिलती है। इस नदी के दोनों तटों पर तथा इसकी सहायक नदियों के तटों पर जो सभ्यता विकसित हुई उसे सिंधु सभ्यता, हड़प्पा सभ्यता एवं मोहेनजोदड़ो सभ्यता कहा जाता है। यह तृतीय कांस्यकालीन सभ्यता थी तथा इसका काल ईसा से 5000 वर्ष पूर्व से लेकर ईसा से 1750 वर्ष पूर्व तक माना जाता है। राजस्थान में इस सभ्यता के अवशेष कालीबंगा, पीलीबंगा एवं रंगमहल आदि में प्राप्त हुए हैं। गंगानगर जिले में नाईवाला की सूखी धारा, रायसिंहनगर से अनूपगढ़ के दक्षिण का भाग तथा हनुमानगढ़ से हरियाणा की सीमा तक के सर्वेक्षण में पाया गया है कि नाईवाला की सूखी धारा में स्थित 4-5 टीलों पर गाँव बस चुके हैं।

    दृषद्वती के सूखे तल में भी काफी दूर तक टीले स्थित हैं। इस तल में स्थित 7-8 थेड़ों में हड़प्पाकालीन किंतु खुरदरे एवं कलात्मक कारीगरी रहित मिट्टी के बरतन के टुकड़ों की बहुतायत थी। सरस्वती तल में हड़प्पाकालीन छोटे-छोटे एवं उन्हीं के पास स्लेटी मिट्टी के बरतनों वाले उतने ही थेड़ मौजूद थे। हरियाणा की सीमा पर ऐसे थेड़ भी पाये गए जिन पर रोपड़ की तरह दोनों प्रकार के हड़प्पा एवं स्लेटी मिट्टी के ठीकरे मौजूद थे। हनुमानगढ़ किले की दीवार के पास खुदाई करने पर रंगमहल जैसे ठीकरों के साथ कुशाण राजा हुविश्क का तांबे का एक सिक्का भी मिला जो इस बात की पुष्टि करता है कि भाटियों का यह किला एवं अंदर का नगर कुशाण कालीन टीले पर बना है। बीकानेर के उत्तरी भाग की सूखी नदियों के तल में 4-5 तरह के थेड़ पाये गए।

    सिंधु घाटी सभ्यता के हड़प्पाकालीन 30-35 थेड़, जिनमें कालीबंगा का थेड़ सबसे ऊँचा है, की खुदाई साठ के दशक में की गयी। हनुमानगढ़-सूरतगढ़ मार्ग पर स्थित पीलीबंगा से लगभग 5 किलोमीटर दूर स्थित कालीबंगा में पूर्वहड़प्पा कालीन एवं हड़प्पा कालीन सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं। खुदाई के दौरान मिली काली चूड़ियों के टुकड़ों के कारण इस स्थान को कालीबंगा कहा जाता है। इस स्थान का पता पुरातत्व विभाग के निदेशक अमलानंद घोष ने ई.1952 में लगाया था। ई.1961-62 में बी. के. थापर, जे. वी. जोशी तथा वी. वी. लाल के निर्देशन में इस स्थल की खुदाई की गयी। कालीबंगा के टीलों की खुदाई में दो भिन्न कालों की सभ्यता प्राप्त हुई है। पहला भाग 2400 ई.पू. से 2250 ई.पू. का है तथा दूसरा भाग 2200 ई.पू. से 1700 ई.पू. का है। यहाँ से एक दुर्ग, जुते हुए खेत, सड़कें, बस्ती, गोल कुओं, नालियों, घरों एवं धनी लोगों के आवासों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। घरों में चूल्हों के अवशेष भी मिले हैं। कालीबंगा के लोग मिट्टी की कच्ची या पक्की ईंटों का चबूतरा बनाकर घर बनाते थे। 

    कालीबंगा से प्राप्त सामग्री में बरतनों में खाना खाने की मिट्टी की थालियां, कूण्डे, नीचे से पतले एवं ऊपर से प्यालानुमा गिलास, लाल बरतनों पर कलापूर्ण काले रंग की चित्रकारी, देवी की छोटी-छोटी मृदा-प्रतिमाएँ, बैल, बैलगाड़ी, गोलियां, शंख की चूड़ियां, चकमक पत्थर की छुरियां, शतरंज की गोटी तथा एक गोल, नरम पत्थर की मुद्रा आदि सम्मिलित हैं। बरतनों पर मछली, बत्तख, कछुआ तथा हरिण की आकृतियां बनी हैं। यहाँ से मिली मुहरों पर सैंधव लिपि उत्कीर्ण है जिसे पढ़ा नहीं जा सका है। यह लिपि दाहिने से बाएं लिखी हुई है। यहाँ से मिट्टी, तांबे एवं कांच से बनी हुई सामग्री भी प्राप्त हुई है। छेद किये हुए किवाड़ एवं मुद्रा पर व्याघ्र का अंकन केवल इसी स्थल पर मिले हैं।

    रंगमहल-बड़ोपल के थेड़

    सूरतगढ़-हनुमानगढ़ क्षेत्र में रंगमहल, बड़ोपल, मुण्डा, डोबेरी आदि स्थलों के आसपास के क्षेत्र में कई थेड़ मौजूद हैं जिनमें से कुछ की खुदाई की गयी है। इनमें रंगमहल का टीला सबसे ऊँचा है। ई.1952-54 के बीच स्वीडिश दल द्वारा रंगमहल के टीलों की खुदाई की गई। इस खुदाई से ज्ञात हुआ है कि प्रस्तर युग से लेकर छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व तक यह क्षेत्र पूर्णतः समृद्ध था।यहाँ से प्रस्तर युगीन एवं धातु युगीन संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं। रंगमहल के टीलों पर पक्की ईंटें एवं रोड़े, मोटी परत एवं लाल रंग वाले बरतनों पर काले रंग के मांडने युक्त हड़प्पा कालीन सभ्यता के बरतनों के टुकड़े बिखरे हुए दिखाई देते हैं। यहाँ से ताम्बे के दो कुषाण कालीन सिक्के, गुप्त कालीन खिलौने एवं परवर्ती काल के तांबे के 105 सिक्के भी प्राप्त हुए हैं।

    आहड़ सभ्यता

    सरस्वती-दृश्द्वती नदी सभ्यता से निकलकर इस प्रदेश के मानव ने आहड़, गंभीरी, लूनी, डच तथा कांटली आदि नदियों के किनारे अपनी बस्तियां बसाईं तथा सभ्यता का विकास किया। इन सभ्यताओं को पश्चिमी विद्वानों ने 7 हजार से 3 हजार वर्ष पुराना ठहराया है। कुछ भारतीय विद्वानों ने पश्चिमी विद्वानों द्वारा बताए गए ईसा पूर्व के इतिहास को इन तिथियों से भी तीन हजार वर्ष पूर्व का होना सिद्ध किया है। यह सभ्यता उदयपुर जिले में आहड़ नदी के आस-पास, बनास, बेड़च, चित्तौड़गढ़ जिले में गंभीरी, वागन, भीलवाड़ा जिले में खारी तथा कोठारी आदि नदियों के किनारे अजमेर तक फैली थी। इस क्षेत्र में प्रस्तर युगीन मानव निवास करता था। आहड़ टीले का उत्खनन डॉ. एच. डी. सांकलिया के नेतृत्व में हुआ था। प्राचीन शिलालेखों में आहड़ का प्राचीन नाम ताम्रवती अंकित है।

    दसवीं एवं ग्यारहवीं शताब्दी में इसे आघाटपुर अथवा आघट दुर्ग कहा जाता था। बाद के काल में इसे धूलकोट भी कहा जाता था। उदयपुर से तीन किलोमीटर दूर 1600 फुट लम्बे और 550 फुट चौड़े धूलकोट के नीचे आहड़ की पुरानी बस्ती दबी हुई है जहाँ से ताम्रयुगीन सभ्यता प्राप्त हुई है। ये लोग लाल, भूरे एवं काले मिट्टी के बर्तन काम में लेते थे जिन्हें उलटी तपाई शैली में पकाया जाता था। घर पक्की ईंटों के होते थे। पशुपालन इनकी अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार था। आहड़ से मानव सभ्यता के कई स्तर प्राप्त हुए हैं। प्रथम स्तर में मिट्टी की दीवारें और मिट्टी के बर्तन मिले हैं। दूसरा स्तर प्रथम स्तर के ऊपर स्थित है। यहाँ से बस्ती के चारों ओर दीवार भी मिली है। तीसरे स्तर से चित्रित बर्तन मिले हैं। चतुर्थ स्तर से ताम्बे की दो कुल्हाड़ियां प्राप्त हुई हैं। घरों से अनाज पीसने की चक्कियां, ताम्बे के औजार तथा पत्थरों के आभूषण मिले हैं। गोमेद तथा स्फटिक मणियां भी प्राप्त हुई हैं। तांबे की छः मुद्रायें एवं तीन मोहरें मिली हैं। एक मुद्रा पर एक ओर त्रिशूल तथा दूसरी ओर अपोलो देवता अंकित है जो तीर एवं तरकश से युक्त है। इस पर यूनानी भाषा में लेख अंकित है। यह मुद्रा दूसरी शताब्दी ईस्वी की है। यहाँ के लोग मृतकों को कपड़ों तथा आभूषणों के साथ गाढ़ते थे।

    बालाथल सभ्यता

    बालाथल उदयपुर जिले की वल्लभनगर तहसील में स्थित है। यहाँ से ई.1993 में ई.पू. 3000 से लेकर ई.पू. 2500 तक की ताम्रपाषाण युगीन संस्कृति के बारे में पता चला है। यहाँ के लोग भी कृषि, पशुपालन एवं आखेट करते थे। ये लोग मिट्टी के बर्तन बनाने में निपुण थे तथा कपड़ा बुनना जानते थे। यहाँ से तांबे के सिक्के, मुद्रायें एवं आभूषण प्राप्त हुए हैं। आभूषणों में कर्णफूल, हार और लटकन मिले हैं। यहाँ से एक दुर्गनुमा भवन भी मिला है तथा ग्यारह कमरों वाले विशाल भवन भी प्राप्त हुए हैं।

    बागोर सभ्यता

    भीलवाड़ा कस्बे से 25 किलोमीटर दूर कोठारी नदी के किनारे वर्ष ई.1967-68 में डॉ. वीरेंद्रनाथ मिश्र के नेतृत्व में हुई खुदाई में ई.पू. 3000 से लेकर ई.पू. 500 तक के काल की बागोर सभ्यता का पता लगा। यहाँ के निवासी कृषि, पशुपालन तथा आखेट करते थे। यहाँ से तांबे के पाँच उपकरण प्राप्त हुए हैं। घर पत्थरों से बनाए गए हैं। बर्तनों में लोटे, थाली, कटोरे, बोतल आदि मिले हैं।

    गणेश्वर सभ्यता

    सीकर जिले की नीम का थाना तहसील में कांटली नदी के तट पर गणेश्वर टीले की खुदाई ई.1979-87 के मध्य की गयी थी। यहाँ से तीन विभिन्न सांस्कृतिक चरणों की पहचान हुई है। निम्न स्तरों में सूक्ष्म पाषाण उपकरण प्राप्त हुए हैं जिनका उपयोग बाणाग्र, मत्स्य कांटे, भालाग्र, सुए आदि के रूप में होता था। मध्य स्तरों से हस्तनिर्मित एवं चाक निर्मित मृण्पात्र प्राप्त हुए हैं जिन्हें गणेश्वर-जोधपुरा मृदभाण्ड कहा जाता है। इनमें गोल एवं बल्ब के आकार के बड़े मटके, कैरीनेटेड घड़े, उथली परात एवं कटोरे आदि सम्मिलित हैं। अंतिम एवं ऊपरी स्तर से बड़ी संख्या में ताम्र वस्तुएं- बाणाग्र, छल्ले, चूड़ियां दरांती, गेंद, कुल्हाड़ियां आदि प्राप्त हुई हैं।

    ऊपरी चरण से प्राप्त कलश, तलसे, प्याले, हाण्डी आदि मृण्पात्रों में चित्र सज्जा भी उपलब्ध है। यहाँ से प्राप्त बर्तन हड़प्पा सभ्यता एवं गेरूवर्णीय मृणपात्र सभ्यताओं से अलग हैं। यह सभ्यता लगभग 2800 वर्ष पुरानी है। ताम्र युगीन सभ्यताओं में यह अब तक प्राप्त सबसे प्राचीन केन्द्र है। यह सभ्यता सीकर से झुंझुनूं, जयपुर तथा भरतपुर तक फैली थी। यहाँ से मछली पकड़ने के कांटे मिले हैं जिनसे पता चलता है कि उस समय कांटली नदी में पर्याप्त जल था। यहाँ का मानव भोजन संग्रहण की अवस्था में था। यहाँ से ताम्र उपकरण एवं बर्तन बड़ी संख्या में मिले हैं। ऐसा संभवतः इसलिए संभव हो सका क्योंकि खेतड़ी के ताम्र भण्डार यहाँ से अत्यंत निकट थे।

    सरस्वती नदी सभ्यता के स्थल

    राजस्थान में वैदिक काल तथा उससे भी पूर्व सरस्वती एवं दृषद्वती नदियाँ प्रवाहित होती थीं। दसवीं सदी के आसपास दक्षिणी-पश्चिमी राजस्थान की गणना सारस्वत मण्डल में की जाती थी। यह पूरा क्षेत्र लूणी नदी बेसिन का एक भाग है। लूनी नदी सरस्वती की सहायक नदी थी। सरस्वती आज भी राजस्थान में भूमिगत होकर बह रही है। कुछ विद्वान घग्घर (हनुमानगढ़-सूरतगढ़ क्षेत्र में बहने वाली नदी) को सरस्वती का परवर्ती रूप मानते हैं। सरस्वती के किनारे काम्यक वन नामक घना वन था। महाभारत में सरस्वती के मरुप्रदेश में विलीन हो जाने का उल्लेख है। हनुमानगढ़ जिले में घग्घर को नाली कहा जाता है। यहाँ पर एक दूसरी धारा जिसे नाईवाला कहते हैं, घग्घर में मिल जाती है, जो असल में सतलज का प्राचीन बहाव क्षेत्र है। यह सरस्वती नदी का पुराना हिस्सा था। तब तक सिंधु में मिलने के लिए सतलज में व्यास का समावेश नहीं हो पाया था। हनुमानगढ़ के दक्षिण पूर्व की ओर नाली के दोनों किनारे ऊंचे-ऊंचे दिखाई देते हैं। सूरतगढ़ से तीन मील पहले ही एक और सूखी हुई धारा आकर घग्घर में मिलती है। यह सूखी धारा वास्तव में दृशद्वती है। सूरतगढ़ से आगे अनूपगढ़ तक तीन मील की चौड़ाई रखते हुए नदी के दोनों किनारे और भी ऊंचे दिखाई देते हैं। बीकानेर जिले में पहुँच कर घग्घर जल रहित हो जाती है। दृशद्वती हिमालय की निचली पहाड़ियों से कुछ दक्षिण से निकलती है। पंजाब में इसे चितांग बोलते हैं। भादरा में फिरोजशाह की बनवाई हुई पश्चिम यमुना नहर, दृशद्वती के कुछ भाग में दिखाई पड़ती है। भादरा के आगे नोहर तथा दक्षिण में रावतसर के पास इसके रेतीले किनारे दिखते हैं। आगे अनुपजाऊ किंतु हरा-भरा क्षेत्र है। इस पूरे क्षेत्र में जो थेड़ दिखाई देते हैं, उनके नीचे सरस्वती सभ्यता के स्थल दबे हुए हैं जिनसे काले एवं सलेटी रंग के बर्तन मिलते हैं।

    ऋग्वैदिक सभ्यता की सामग्री

    सरस्वती और दृश्द्वती के बीच के हिस्से को मनु ने ब्रह्मावर्त बताया है जो अति पवित्र एवं ज्ञानियों का क्षेत्र माना गया है। आगे उत्तर-पूर्व में कुरुक्षेत्र स्वर्ग के समान माना गया है। सरस्वती-दृश्द्वती के इस क्षेत्र में अनूपगढ़ क्षेत्र से उत्तर पूर्व की ओर चलने पर हड़प्पा कालीन सभ्यता से बाद की सभ्यता के नगर बड़ी संख्या में मिलते हैं जो भूमि के नीचे दबकर टीले के रूप में दिखाई पड़ते हैं। इन टीलों में स्लेटी मिट्टी के बर्तन काम में लाने वाली सभ्यता निवास करती थी। यह सभ्यता हड़प्पा कालीन सभ्यता से काफी बाद की थी। अनूपगढ़ तथा तरखानवाला डेरा से प्राप्त खुदाई से इस सभ्यता पर कुछ प्रकाश पड़ा है। राजस्थान में इस सभ्यता का प्रतिनिधित्व करने वाले अन्य टीलों में नोह (भरतपुर), जोधपुरा (जयपुर) एवं सुनारी (झुंझुनूं) प्रमुख हैं ये सभ्यताएं लौह युगीन सभ्यता का हिस्सा हैं। सुनारी से लौह प्राप्त करने की प्राचीनतम भट्टियाँ प्राप्त हुई हैं।

    महाभारत कालीन सभ्यता की सामग्री

    महाभारत काल के आने से पूर्व मानव बस्तियां सरस्वती तथा दृशद्वती क्षेत्र से हटकर पूर्व तथा दक्षिण की ओर खिसक आयीं थीं। उस काल में कुरु जांगलाः तथा मद्र जांगलाः के नाम से पुकारे जाने वाले क्षेत्र आज बीकानेर तथा जोधपुर के नाम से जाने जाते हैं। इस भाग के आस पास का क्षेत्र सपादलक्ष कहलाता था। कुरु, मत्स्य तथा शूरसेन उस काल में बड़े राज्यों में से थे। अलवर राज्य का उत्तरी विभाग कुरुदेश के, दक्षिणी और पश्चिमी विभाग मत्स्य देश के और पूर्वी विभाग शूरसेन के अंतर्गत था। भरतपुर तथा धौलपुर राज्य तथा करौली राज्य का अधिकांश भाग शूरसेन देश के अंतर्गत थे। शूरसेन देश की राजधानी मथुरा, मत्स्य की विराट तथा कुरु की इन्द्रप्रस्थ थी। महाभारत काल में शाल्व जाति की बस्तियांे का उल्लेख मिलता है जो भीनमाल, सांचोर तथा सिरोही के आसपास थीं।

    जनपद काल सभ्यता की सामग्री

    ई.पू. 1000 से लेकर ई.पू. 300 तक का समय जनपद काल कहलाता है। इस काल से इतिहास की आधारभूत सामग्री, सिक्के, आभूषण अभिलेख आदि मिलने लगते हैं। सिकंदर के आक्रमण के काल में और उसके बाद गुप्तों तक राजस्थान में अनेक छोटे-छोटे जनपदों का उल्लेख मिलता है। इनमें भरतपुर के आस-पास राजन्य जनपद तथा मत्स्य जनपद, नगरी का शिवि जनपद और अलवर के निकट शाल्व जनपद प्रमुख हैं।

    मौर्यकालीन सभ्यता की सामग्री

    मौर्यकाल में लगभग पूरा राजस्थान मौर्यों के अधीन था। चंद्रगुप्त मौर्य के समय से ही मौर्यों की सत्ता इस क्षेत्र में फैल गयी। कोटा जिले के कण्सवा गाँव से मिले शिलालेख से यह पता चलता है कि वहाँ मौर्य वंश के राजा ‘धवल’ का राज्य था। ई.733 के लगभग जब बप्पा रावल ने चित्तौड़ विजय किया तब वहाँ मौर्य राजा ‘मान’ का राज्य था। चित्तौड़गढ़ दुर्ग के पास पूठोली गाँव में मानसरोवर नामक तालाब के किनारे राजा मान का ई.713 का एक शिलालेख मिला है। मौर्यकाल में राजस्थान, सिंध, गुजरात तथा कोंकण का क्षेत्र अपर जनपद अथवा पश्चिम जनपद कहलाता था।

    बैराठ सभ्यता की सामग्री

    बैराठ सभ्यता मौर्य कालीन सभ्यता है। यहाँ से मौर्य कालीन सभ्यता के अवशेष बड़े स्तर पर प्राप्त हुए हैं। जयपुर से 85 किलोमीटर दूर विराटनगर की भब्रू पहाड़ी से मौर्य सम्राट अशोक का एक शिलालेख मिला है। ई.1840 में यह शिलालेख एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल (कलकत्ता) को स्थानांतरित कर दिया गया। ई.1909 में बीजक की पहाड़ी में एक बौद्ध विहार (गोलमंदिर) के अवशेष प्राप्त हुए। इस विहार को सम्राट अशोक के शासन काल के प्रारंभिक दिनों में निर्मित माना जाता है। इसमें पत्थरों के स्थान पर लकड़ी के स्तंभों तथा ईंटों का प्रयोग हुआ है। इस स्थान से अलंकारिक मृद्पात्र, पहिये पर त्रिरत्न तथा स्वस्तिक के चिह्न प्राप्त हुए हैं। जयपुर नरेश सवाई रामसिंह के शासन काल में यहाँ से एक स्वर्णमंजूषा प्राप्त हुई थी जिसमें भगवान बुद्ध के अस्थि अवशेष थे। चीनी चात्री ह्वेनसांग ने इस क्षेत्र में 8 बौद्ध विहार देखे थे जिनमें से 7 का अब तक पता नहीं चल पाया है। अशोक ने जिस योजना के अनुसार शिलालेख लगवाए थे, उसके अनुसार इन 8 बौद्ध विहारों के पास 128 शिलालेख लगवाए होंगे किंतु इनमें से केवल 2 शिलालेख ही प्राप्त हुए हैं।

    विदेशी शासकों के स्थलों से प्राप्त सामग्री

    यूनानी राजा मिनेण्डर ने ई.पू. 150 में मध्यमिका नगरी पर अधिकार किया तथा अपने राज्य की स्थापना की। तब से भारत में विदेशी जातियों का शासन होना आरंभ हो गया। यूनानी राजाओं के सिक्के सांभर झील के पास स्थित मीठे पानी की झील नलियासर से प्राप्त हुए हैं। उनके कुछ सिक्के बैराठ तथा नगरी से भी प्राप्त हुए हैं। ई.पू. प्रथम शताब्दी में पश्चिमी राजस्थान पर सीथियनों के आक्रमण आरंभ हुए। कुषाण, पह्लव तथा शकों को सम्मिलित रूप से सीथियन कहा जाता है। ईसा से लगभग 90 वर्ष पहले राजस्थान से यूनानी शासकों का शासन समाप्त हो गया तथा सीथियनों ने अपने पांव जमा लिये। सौराष्ट्र से प्राप्त उषवदात के लेख के अनुसार शकों का राजा पुष्कर होता हुआ मथुरा तक पहुँचा। ये लोग ई.पू. 57 तक मथुरा पर शासन करते रहे। शक मूलतः एशिया में सिकंदरिया के रहने वाले थे। राजस्थान में नलियासर से शक शासक हुविष्क की मुद्रा प्राप्त हुई है। उसका शासनकाल ई.95-127 के बीच था। पश्चिमी भारत में शकों की दो शाखायें- क्षहरात एवं चष्टन, कुषाणों के अधीन रहकर शासन करती थीं। कनिष्क के शिलालेख के अनुसार ई.83-119 तक कुषाण राजस्थान के पूर्वी भाग पर शासन करते रहे। ई.150 के सुदर्शन झील अभिलेख से ज्ञात हुआ है कि कुषाणों का राज्य मरुप्रदेश से साबरमती के आसपास तक फैला हुआ था।

    देशी जनपदों के पुनरुत्थान काल की सामग्री

    देशी जनपदों के सिर उठाने से, ई.176 के लगभग कुषाणों की कमर टूटने लगी तथापि वे ई.295 तक किसी न किसी रूप में शासन करते रहे। ई.226 में मालवों ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया। कर्कोट नगर से प्राप्त मुद्राओं पर ‘मालवानाम् जयः’ अंकित है। इसके बाद चौथी शताब्दी तक मालव, अर्जुनायन तथा यौधेयों की प्रभुता का काल है। ये सब जातियाँ अथवा जनपद वस्तुतः महाभारत कालीन जातियों के उत्तरकालीन अवशेष हैं। मालव जयपुर के आसपास के क्षेत्र में थे जो बाद में अजमेर, टोंक तथा मेवाड़ के क्षेत्र तक फैल गए। समुद्रगुप्त के काल तक मालव अपनी सत्ता गणतंत्रात्मक बनाए रहे। मालवों ने अर्जुनायनों के साथ मिलकर कुषाणों को परास्त किया। अर्जुनायन भरतपुर-अलवर क्षेत्र में फैले थे। राजस्थान के उत्तरी क्षेत्र के यौधेय (अब जोहिये) भी गणतंत्रात्मक अथवा अर्द्ध राजतंत्रात्मक व्यवस्था बनाकर रहते थे। यौधयों ने राजस्थान से कुषाण सत्ता को उखाड़ फैंका। इस युग में आभीर तथा मौखरी गणराज्य भी अपना अस्तित्व रखते थे। इनके प्रमाण स्वरूप कई मुद्राएं प्राप्त हुई हैं जो विभिन्न संग्रहालयों में संगृहीत की गई है।

    गुप्तकालीन सामग्री

    भारतीय इतिहास में ई.320-495 तक का काल गुप्तकाल कहलाता है। समुद्रगुप्त ने पश्चिमी भारत के गणराज्यों पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। इनमें से अधिकांश गणराज्यों ने बिना लड़े ही समुद्रगुप्त की अधीनता स्वीकार की। समुद्रगुप्त के पुत्र चंद्रगुप्त (द्वितीय) ने इन गणराज्यों को नष्ट कर इस सम्पूर्ण क्षेत्र को अपने राज्य में मिला लिया। उसके आक्रमणों से शक क्षत्रपों का अस्तित्व हमेशा के लिए नष्ट हो गया। पश्चिमी राजस्थान के नाग शासक भी गुप्तों के अधीन सामंत हो गए। गुप्त कालीन भवनों एवं मंदिरों के अवशेष जालोर जिले के भीनमाल तथा मण्डोर आदि स्थानों पर देखे जा सकते हैं। इस काल की मूर्तियां, सिक्के, कलात्मक तोरण, स्तम्भ तथा अभिलेख राजस्थान के विभिन्न संग्राहालयों में रखे गए हैं।

    हूणों द्वारा नष्ट सभ्यता स्थलों से प्राप्त सामग्री

    हूणों के आक्रमण गुप्त काल में आरंभ हुए। कई शताब्दियों तक गुप्त शासकों ने हूणों से देश की रक्षा की किंतु अंत में हूणों के कारण गुप्त साम्राज्य अस्ताचल को चला गया। हूण राजा तोरमाण ने ई. 503 में गुप्तों से राजस्थान छीन लिया। छठी शताब्दी के आसपास हूणों ने सभी गणतंत्रात्मक तथा अर्द्ध राजतंत्रात्मक राज्य छिन्न-भिन्न कर दिए तथा उस काल के सभ्यता के प्रमुख केन्द्र नष्ट कर दिए। इनमें बैराठ, रंगमहल, बड़ोपल और पीर सुल्तान की थड़ी आदि स्थान प्रमुख हैं। इन स्थलों से प्राप्त सामग्री विभिन्न संग्रहालयों में प्रदर्शित की गई है जिनमें बीकानेर दुर्ग का संग्रहालय प्रमुख है।

    हर्षवर्धन काल की सामग्री

    सातवीं शताब्दी में पुष्यभूति वंश का राजा हर्षवर्धन प्रतापी सम्राट हुआ। उसका राज्य उत्तर में हिमालय पर्वत से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी तक तथा पश्चिम में सौराष्ट्र से लेकर पूर्व में आसाम तक फैला हुआ था। हर्ष के बारे में हमें दो गं्रथों- बाणभट्ट द्वारा लिखित हर्षचरित तथा ह्वेनसांग द्वारा रचित सी-यू-की से जानकारी मिलती है। चीनी यात्री ह्वेनसांग हर्ष के शासनकाल में भारत आया था। चीनी लेखक मा-त्वान-लिन ने भी हर्ष की विजयों का वर्णन किया है। नौसारी दानपत्र, खेड़ा से प्राप्त दद्द के दानपत्र में हर्ष के वलभी युद्ध का उल्लेख है। कल्हण की राजतरंगिणी हर्ष के कश्मीर का राजा होने की पुष्टि करती है। हर्ष के दरबार में रहने वाले राजकवि बाणभट्ट ने कादम्बरी तथा हर्ष चरित की रचना की। हर्ष के दरबार में रहने वाले मतंग नामक कवि ने सूर्यशतक की रचना की। स्वयं हर्ष ने संस्कृत में तीन नाटक नागानंद, प्रियदर्शिका तथा रत्नावली लिखे। बाणभट्ट लिखता है कि हर्ष की संस्कृत भाषा की कविताओं में अमृत की वर्षा होती थी। हर्ष के काल में राजपूताना चार भागों में विभक्त था- (1.) गुर्जर, (2.) बघारी, (3.) बैराठ तथा (4.) मथुरा। बयालीस वर्ष तक सफलता पूर्वक शासन करने के बाद ई.648 में हर्षवर्धन की मृत्यु हुई। हर्ष कालीन समाज के चिह्न एवं कलाकृतियां राजस्थान के विभिन्न भागों से प्राप्त हुई हैं जिन्हें विभिन्न संग्रहालयों में रखा गया है।

    राजपूत काल एवं मुगल काल की सामग्री

    राजस्थान के इतिहास पर ई.648 से ई.1206 तक राजपूत काल, ई.1206 से ई. 1526 तक दिल्ली सल्तन काल तथा ई.1526 से ई.1737 तक मुगल काल का प्रभाव रहा। इस कालखण्ड की विभिन्न प्रकार की ऐतिहासिक सामग्री संग्रहालयों में रखी गई है। इस सामग्री में शिलालेख, ताम्रपत्र, मुद्राएं, ताड़पत्र, प्राचीन ग्रंथ, चित्रित ग्रंथ, नक्शे, अस्त्र-शस्त्र, बर्तन, वेशभूषाएं, आभूषण, सिक्के, पाण्डुलिपियां, रियासती दस्तावेज, पत्राचार, बहियां आदि प्रमुख हैं। शासकों के कोठारों, भण्डारों, शासकीय कार्यालयों की बहियों के साथ-साथ रावों एवं भाटों द्वारा लिखी गई बहियां एवं वंशावलियां भी संग्रहालयों के लिए महत्वपूर्ण सिद्ध हुई हैं।

    मृण्प्रतिमाओं का योगदान

    राजस्थान में मृणप्रतिमाओं का इतिहास हजारों साल पुराना है। सिंधु सभ्यता के प्रमुख केन्द्र कालीबंगा से पांच हजार वर्ष पुरानी सैंकड़ों सुंदर मृण्मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। यहाँ से प्राप्त एक भद्र पुरुष के शीश की मृण्मूर्ति अत्यंत सुंदर है। इस मूर्ति से उस काल के उच्च वर्गीय पुरुषों द्वारा किए जाने वाले केश विन्यास का ज्ञान होता है। इस काल में पुरुष दाढ़ी रखते थे। सैंधव सभ्यता के पश्चात् लगभग 2 हजार साल तक राजस्थान में अपेक्षाकृत कम संख्या में मृण्प्रतिमाओं का निर्माण हुआ। उदयपुर जिले के आहाड़-धूलकोट के उत्खनन से ई.पू.1700 से ई.पू.1500 के समय के बैल, हाथी, घोड़ा आदि पशुओं की मृण्मूर्तियां प्राप्त हुई हैं।

    आहड़ से प्राप्त इस श्रेणी का घोड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण पुरावशेष है। भरतपुर जिले के नोह नामक स्थल के उत्खनन से प्राप्त चित्रित सलेटी रंग के पक्षी की मृण्मूर्ति पुरातत्व जगत की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह मृण्मूर्ति लगभग ई.पू.1100 की मानी जाती है। मौर्य युग की सैंकड़ों मृण्मूर्तियां नोह क्षेत्र से प्राप्त हुई हैं। इनके सामने का भाग चपटा एवं चौड़ा है। इनमें उभरती नारी आकृतियों का घघरीदार पहनावा विलक्षण है। छाती का ऊपरी भाग चपटा एवं ऊंचा है। कमर बिल्कुल पतली है जबकि नितम्ब तथा जांघ के ऊपर का भाग भारी है। मूर्ति निर्माण की यह शैली उत्तर भारत में बहुत लम्बे समय तक प्रचलन में रही। नोह एवं बैराठ से मौर्यकालीन अनेक मृण्मूर्तियां मिली हैं।

    शुंग काल की मृण्प्रतिमाओं की पहचान उनके परिधान के अंकन से होती है। इनमें दो गांठों वाली पगड़ी को भी स्थान मिला है। इस युग की प्रतिमाओं में पैरों के बीच धोती का तिकोना छोर धरती को स्पर्श करता है। राजस्थान में शुंग काल की कला के प्रमुख केन्द्र रैढ, सांभर, बैराठ और नगर थे। रैढ से प्राप्त एक स्त्री मूर्ति में उसे भी पगड़ी पहनाई गई है। उसने दो वेणियां बना रखी हैं। इससे केश विन्यास की परम्पराओं को समझने में सहायता मिलती है। कुषाण कालीन मृण्प्रतिमाओं की पहचान भी बड़ी आसानी से हो जाती है। ये अत्यधिक संख्या में मिलती हैं। ये भी चपटी हैं किंतु शुंग कालीन प्रतिमाओं से ही अधिक उभरी हुई हैं। इनका मुखमण्डल अधिक चौड़ा है, आकृति मोटी एवं सुघड़ है। नारी आकृतियां अधिक मांसल एवं कमनीय हैं। इनकी केश सज्जा पूर्व की एवं पश्चात् की प्रतिमाओं से अलग प्रकार की है। सामने झूलते हुए बालों की गोल बनावट होती है और नीचे से दोनों ओर बाल पीछे की ओर खींच लिए जाते हैं। चपटी एवं चौड़ी करघनी इस काल की प्रतिमाओं की मुख्य पहचान है।

    गुप्त काल की मृण्मूर्तियां, मूर्तिकला के चरम उत्कर्ष का दर्शन कराती हैं। इन प्रतिमाओं में सुघराई, अभिप्रायों की रुचि एवं अलंकरण की शोभा अनुपम है। मृण्प्रतिमाओं का उभरा हुआ अण्डाकार चेहरा, पतला शरीर तथा सिर के घुंघराले बाल सजीवता का आभास देते हैं।

    राजस्थान में कुषाण काल, कुषाणोत्तर काल एवं गुप्त कालीन मिट्टी के खिलौने तथा मृण्मूर्तियां रैढ़, सांभर, नगर, नगरी, आहाड़, रंगमहल आदि स्थलों से बड़ी संख्या में उपलब्ध हुए हैं जो राजस्थान के विभिन्न संग्रहालयों में प्रदर्शित किए गए हैं।

    उत्कीर्णित लेखों एवं अभिलेखों का योगदान

    शिलाखण्डों, भित्तियों, गुहाओं, स्तम्भों, ताम्रपत्रों आदि पर खुदे हुए लेखों से मानव सभ्यता का प्रामाणिक इतिहास प्राप्त होता है। ऐसे अनेक लेख विभिन्न भवनों के खण्डहरों, मंदिरों, किलों एवं अन्य स्थलों से प्राप्त हुए हैं जिनसे तत्कालीन भारतीय समाज और संस्कृति का दिग्दर्शन होता है। ये लेख राज-प्रशासन, दान-धर्म, भवन-मंदिर निर्माण एवं वीर-प्रशस्ति आदि से सम्बन्धित हैं। कुछ लेख जन कल्याणकारी कार्य और राज निर्देशन को इंगित करते हैं। इनमें राजाओं, राजपरिवार के सदस्यों एवं सामंतों आदि के नाम, वंश-परिचय, संधि-विग्रह, सामाजिक, धार्मिक तथा आर्थिक कार्य कलाप लिखे गए हैं। इनमें अशोक के अभिलेख, धौली शिलालेख, एर्रगुडी शिलालेख, ब्रह्मगिरि शिलालेख, दिल्ली-मेरठ स्तम्भलेख, रामपुरवा स्तम्भलेख, रूमिन्देई स्तम्भलेख, समुद्रगुप्त का प्रयाग अभिलेख, स्कन्दगुप्त का भीतरी अभिलेख, कलिंगराज खारवेल का हाथीगुम्फा अभिलेख तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक इतिहास को उद्घाटित करते हैं।

    राजस्थान के प्राचीन दुर्गों, मंदिरों, सरोवरों, बावड़ियों एवं महत्वपूर्ण भवनों की दीवारों, देव प्रतिमाओं, लाटों एवं विजय स्तंभों आदि पर राजाओं, राजकुमारियों, राजमहिषियों, सामंतों, दानवीरों, सेठों और विजेता योद्धाओं द्वारा समय-समय पर उत्कीर्ण करवाए गए शिलालेख मिलते हैं जो लाखों की संख्या में हैं। अशोक के शिलालेख खरोष्ठी एवं ब्राह्मी लिपि में हैं। उसके बाद के शिलालेख संस्कृत एवं राजस्थानी भाषा में हैं। मुस्लिम शासकों के शिलालेख फारसी भाषा एवं अरबी लिपि मंे मिलते हैं। ई.608 का गोठ मांगलोद स्थित दधिमती माता मंदिर का अभिलेख, ई.661 का अपराजित का शिलालेख, ई.685 का मण्डोर शिलालेख, 8वीं ईस्वी का मान मोरी का शिलालेख, ई.861 के घटियाला के शिलालेख, ई.956 का ओसियां शिलालेख, ई.1170 का बिजोलिया के पार्श्वनाथ मंदिर के निकट एक चट्टान पर उत्कीर्ण लेख, ई.1273 का चौखा शिलालेख, ई.1274 का रसिया की छतरी का शिलालेख, ई.1460 का चित्तौड़ दुर्ग का कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति शिलालेख, ई.1285 का आबू पर्वत शिलालेख, ई.1434 का देलवाड़ा का शिलालेख, ई.1428 का श्ृंगी ऋषि का शिलालेख, ई.1428 का समिधेश्वर मंदिर का शिलालेख, ई.1439 की रणकपुर प्रशस्ति, ई.1460 की कुंभलगढ़ प्रशस्ति, ई.1613 का जमवा रामगढ़ का प्रस्तर लेख, ई.1594 की रायसिंह की बीकानेर प्रशस्ति, ई.1652 की उदयपुर के जगदीश मंदिर की जगन्नाथ राय की प्रशस्ति तथा ई.1676 का राजसमंद झील के किनारे उत्कीर्ण राजप्रशस्ति महाकाव्य, राजस्थान के प्रमुख एवं अत्यन्त महत्वपूर्ण शिलालेखों में से हैं।

    इनमें से बहुत से शिलालेख प्रदेश के विभिन्न संग्रहालयों में रखे गए हैं। कुछ शिलालेख राष्ट्रीय संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रहे हैं।

    मुद्राओं का योगदान

    प्रदेश के आर्थिक एवं सामाजिक इतिहास के निर्माण में मुद्राओं एवं सिक्कों का अभूतपूर्व योगदान है। इन मुद्राओं से तत्कालीन शासक और उसका समय तो ज्ञात होता ही है, साथ ही उस युग की भाषा, लिपि, धर्म, समाज और आर्थिक दशा का भी ज्ञान होता है। आहत अथवा पंचमार्क सिक्के सबसे पुराने हैं, जिनसे उस युग की राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक स्थिति का पता चलता है। राजस्थान से मिले पंचमार्का सिक्के, गधैया सिक्के, ढब्बू सिक्के, आहड़ उत्खनन से प्राप्त सिक्के, मालवगण के सिक्के और सीलें, राजन्य सिक्के, यौधेय सिक्के, रंगमहल से प्राप्त सिक्के, सांभर से प्राप्त मुद्राएं, सेनापति मुद्राएं, रेड से प्राप्त सिक्के, मित्र मुद्राएं, नगर मुद्राएं, बैराट से प्राप्त मुद्राएं, गुप्तकालीन सिक्के, गुर्जर प्रतिहारों के सिक्के, चौहानों के सिक्के तथा मेवाड़ी सिक्के राजस्थान के प्राचीन इतिहास को जानने के प्रमुख स्रोत हैं।

    मौर्य युग के पश्चात की मुद्राएं अधिक व्यवस्थित और सुन्दर हैं तथा विभिन्न राजाओं और राजवंशों की स्वर्ण, रजत और ताम्र मुद्राएं समय-समय पर मिलती रहती हैं, जिनसे समाज और धर्म की जानकारी प्राप्त होती है। यवन, पह्लव, शक, कुषाण एवं सातवाहन, गुप्त, राजपूत, मुगल इत्यादि विभिन्न राजवंशों के सिक्के मिले हैं, जो अपने-अपने युग पर प्रकाश डालते हैं। गुप्त सम्राटों के सोने के सिक्के अभूतपूर्व हैं जो गुप्तों और लिच्छवियों के सम्बन्धों पर प्रकाश डालते हैं तथा उस युग की समृद्धि एवं राजकीय शक्ति की गाथा कहते हैं। गुहिल राजा कालाभोज का सोने का सिक्का उस युग के इतिहास को जानने का एकमात्र साधन है। अजमेर से मिले एक सिक्के में एक तरफ पृथ्वीराज चौहान का नाम अंकित है तथा दूसरी तरफ मुहम्मद गौरी का नाम अंकित है। इससे अनुमान होता है कि पृथ्वीराज चौहान को परास्त करने के बाद मुहम्मद गौरी ने उसके सिक्कों को जब्त करके उन्हें अपने नाम से दुबारा जारी किया था।

    राजस्थान के संग्रहालयों में मुगल शासकों द्वारा जारी किए गए सिक्के बड़ी संख्या में मिलते हैं। इनमें जहांगीर द्वारा जारी किए गए राशि बोधक सिक्के विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उसने सिक्कों पर अपने नाम के साथ नूरजहाँ का नाम भी उत्कीर्ण करवाया तथा सिक्कों पर अपना आवक्ष चित्र मुद्रित करवाया जिसमें वह पालथी मारे बैठा है तथा उसके दाहिने हाथ में मदिरा का चषक है। उसकी ऐसी मुहरें हिजरी 1023 में अजमेर टकसाल में बनीं जिन पर फारसी में शबीह-हजरत-शाह जहांगीर तथा पृष्ठभाग में सूर्य का चिह्न बना है एवं इसके चारों ओर फारसी में अल्लाहु अकबर-जरब-अजमेर लिखा है। यह सिक्का लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में संगृहीत है। हिजरी 1027 (ई.1618) अर्थात् अपने राज्य के 13वें वर्ष में उसने राशिबोधक सिक्के चलाए। प्रत्येक सिक्के को ढालते समय सूर्य जिस राशि में था, सिक्कों पर वही राशि उत्कीर्ण की गई। उससे पहले अकबर के समय में हिजरी सन् के साथ चंद्र माह का नाम सिक्कों पर लिखा जाता था। जहांगीर के इस आदेश से आगरा टकसाल से मुहरें तथा अहमदाबाद की टकसाल से चांदी के रुपए जारी किए गए। ये सिक्के बहुत कम संख्या में बनाए गए थे तथा जनता को इतने पसंद आए कि जनता द्वारा संगृहीत कर लिए गए और बाजार में चलन में नहीं आए। जहांगीर के बाद के बादशाहों ने इन सिक्कों को इस्लाम के खिलाफ मानकर बंद कर दिया।

    जहांगीर के राशिबोधक सिक्कों का पूरा सेट वर्तमान में ब्रिटिश म्यूजियम लंदन के अतिरिक्त और कहीं उपलब्ध नहीं है। वर्नियर के अनुसार स्वयं जहांगीर के शासन काल में दो या तीन राशि बोधक मुहरों को प्राप्त करना अत्यंत कठिन था। बीकानेर के गंगा गोल्डन जुबली म्यूजियम में मेष राशि बोधक एक मुहर (119 ग्रेन), सरदार संग्रहालय जोधपुर में मेष और कर्क राशि बोधक दो चांदी के रुपए और केन्द्रीय संग्रहालय जयपुर में सिंह राशि बोधक रुपया (154 ग्रेन) संगृहीत है।

    भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान निकाली गई विभिन्न प्रकार की मुद्राएं ईस्ट इण्डिया कम्पनी एवं ब्रिटिश क्राउन का भारत में विस्तार एवं देशी रियासतों से उनके सम्बन्धों की गाथा तो कहते ही हैं, साथ ही भारत के सामाजिक विषयों के प्रति उनके दृष्टिकोण को भी समझाने में सहायक हैं। ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा जारी किए गए चांदी के सिक्कों पर भगवान राम, लक्ष्मण एवं वैदेही का चित्रांकन किया गया है। ये सिक्के भी देश के अनेक संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रहे हैं।

    ताम्रपत्रों का योगदान

    जब शासक किसी महत्वपूर्ण अवसर पर भूमि, गाँव, स्वर्ण एवं रत्न आदि दान देते थे या कोई अनुदान स्वीकृत करते थे, तब वे इस दान या अनुदान को ताम्बे की चद्दर पर उत्कीर्ण करवाकर देते थे ताकि पीढ़ियों तक यह साक्ष्य उस परिवार के पास उपलब्ध रहे। हजारों की संख्या में ताम्रपत्र उपलब्ध होते हैं। इन दानपत्रों से इतिहास की महत्वपूर्ण कड़ियों को जोड़ने में सहायता मिली है। अब तक सबसे प्राचीन ताम्रपत्र ई.679 का धूलेव का दानपत्र मिला है। ई.956 का मघनदेव का ताम्रपत्र, ई.1002 का रोपी ताम्रपत्र, ई.1180 का आबू के परमार राजा धारावर्ष का ताम्रपत्र, ई.1185 का वीरपुर दानपत्र, ई.1194 का कदमाल गाँव का ताम्रपत्र, ई.1206 का आहाड़ ताम्रपत्र, ई.1259 का कदमाल ताम्रपत्र, ई.1287 का वीरसिंह देव का ताम्रपत्र तथा ई.1437 का नादिया गाँव का ताम्रपत्र प्रमुख हैं। इन ताम्रपत्रों को राजस्थान के विभिन्न संग्रहालयों में रखा गया है। कुछ ताम्रपत्र राष्ट्रीय अभिलेखागारों एवं संग्रहालयों में देखे जा सकते हैं।

    अस्त्र-शस्त्रों का योगदान

    राजस्थान के राजा हजारों वर्षों से युद्ध लड़ते आए थे। इस कारण उनके शस्त्रागारों में ना-ना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र उपलब्ध थे। राजस्थान में जयपुर, मारवाड़, मेवाड़, कोटा, बूंदी, अलवर, सिरोही आदि राज्यों में अलग-अलग प्रकार की तलवारें बनती थीं। राजपूताने में बनी तलवारों की पूरे देश में आपूर्ति होती थी। तलवारों को उनकी बनावट एवं उनकी मारक क्षमता के आधार पर अलग-अलग नाम दिए गए थे। इनमें सांकेला, बट, असील, रोटी, कित्ती, काबरा, लहरिया, ईरानी, नलदार, कर्णशाही अथवा शाही कीरच, नागफणी, सोसणकत्ती, फलसी, खांडा, मोती लहर, जामा तलवार कहते थे। इनके अतिरक्त जमधर, छुरी, कटार, गुप्ती आदि भी काम में लाई जाती थीं। सिरोही में नीलकण्ठ महादेव की बावड़ी के पानी और सिरोही की मिट्टी से तलवार को धार देने पर तलवार की धार बहुत तीखी हो जाती थी जिससे एक ही वार में पेड़ भी काटा जा सकता था। इन तलवारों की धार एवं नोक पर जहर भी लगाया जाता था। इनकी मूठें एवं म्यानें भी बहुत कलात्मक होती थीं तथा कई प्रकार की डिजाइनों में बनती थीं।

    भारत के कई राजा-महाराजा एवं बादशाह अपनी सेना के लिए सिरोही में तलवारें बनवाते थे। मध्यकाल में सिरोही में 500 लोहार एवं मियांगर कार्यरत थे। राजाओं की सेनाएं भाले, ढाल, बख्तरबंद, शिरस्त्राण (सिर के टोप), तीर-कमान, तरकष आदि का उपयोग करती थीं। युद्ध में काम आने वाले हाथी, घोड़े, ऊँट, बैल आदि के लिए भी कवच बनाए जाते थे। मुगलों के समय में तोपें, बंदूकें एवं अन्य आग्नेय अस्त्र बनने लगे थे। तोपों के साथ-साथ उनकी पहियेदार गाड़ियां, बारूद के गोले, मोटे रस्से भी कई प्रकार के बनाए जाते थे। संग्रहालयों में देशी रियासातों के शस्त्रागारों से प्राप्त अस्त्र-शस्त्रों को भी प्रमुख स्थान दिया गया है।

    पालकियाँ एवं डोलियां

    रियासती काल में महत्वपूर्ण पुरुषों एवं राजमहिषियों को लाने ले जाने के लिए पालकियों एवं डोलियों का प्रयोग किया जाता था। इन्हें भी बहुत कलात्मक ढंग से बनाया जाता था। राजस्थान के संग्रहालयों में विभिन्न रियासतों से प्राप्त पालकियाँ एवं डोलियां भी प्रदर्शित की गई हैं।

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