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  • अध्याय - 2 भारतीय संस्कृति के प्रधान तत्त्व एवं विशेषताएँ

     02.06.2020
    अध्याय - 2 भारतीय संस्कृति के प्रधान तत्त्व एवं विशेषताएँ

    भारतीय संस्कृति के प्रधान तत्त्व एवं विशेषताएँ


    हे भारत! मैं तुम्हें विस्मययुक्त श्रद्धा और आश्चर्य के साथ प्रणाम करता हूँ ...... कला और दर्शन के क्षेत्र में अति-उच्च स्थान प्राप्त उस भारत को जिसका मैं विशेषज्ञ हूँ। - पियरे लोती।


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    विश्व में अनेक प्राचीन एवं अर्वाचीन संस्कृतियां हैं। उन सबमें भारतीय संस्कृति का स्थान सबसे अनुपम एवं सर्वोच्च है। सांस्कृतिक दृष्टि से भारत विगत हजारों साल से अत्यन्त समृद्ध रहा है। अपनी अनेक अप्रतिम विशेषताओं के कारण भारतीय संस्कृति अमर है। यह सम्पूर्ण विश्व के मानव समाज की अमूल्य निधि है। 14वीं शताब्दी के इतिहासकार अब्दुल्ला वासफ ने अपने ग्रंथ ताजियत उल अम्सार में लिखा है- 'समस्त लेखकों की एकमत से यह राय है कि पृथ्वी पर रहने के लिए भारत सबसे अधिक रमणीय स्थल है और विश्व का सबसे आनन्ददायक प्रदेश है...... यदि यह कहा जाए कि स्वर्ग भारत में है तो आश्चर्य मत करना क्योंकि स्वर्ग स्वयं ही भारत से तुलना योग्य नहीं है।'

    अंग्रेजी विद्वान मुरे ने लिखा है- 'पाश्चात्य जगत् की कल्पनाओं में यह भारत हमेशा ही अत्युत्तम और अलंकृत, स्वर्ण और रत्नों से जगमगाता तथा मनमोहक गंधों से सुरभित रहा........।'

    एक अन्य विद्वान थार्नटन ने लिखा है- 'भारत की प्राचीन स्थिति निश्चित रूप से अतिविशिष्ट भव्यता की रही होगी।' काण्डट ब्जोन्सर्टजेरना ने लिखा है- 'भारत में हर वस्तु विशिष्ट, भव्य और रूमानी है......।'

    श्रीमती मैनिंग ने लिखा है- 'मनुष्य के मस्तिष्क का जितना भी विस्तार सम्भव है, हिन्दुओं के पास उसका सर्वाधिक विस्तार था।'

    प्रो. मैक्समूलर ने लिखा है- 'मानव मस्तिष्क के अध्ययन के इतिहास में स्वयं के अध्ययन में तथा हमारे वास्तविक अस्तित्त्व के अध्ययन में भारत का स्थान समस्त देशों में प्रथम है। अपने विशेष अध्ययन के लिए आप मानव मस्तिष्क के किसी भी क्षेत्र को चुनें, भले ही वह भाषा हो या धर्म, या पौराणिक कथाएँ, या दर्शन या फिर चाहे विधि या प्रथाएं या प्रारम्भिक कला या प्रारम्भिक विज्ञान, हर स्थिति में चाहने या न चाहने पर भी आपको भारत जाना ही होगा क्योंकि मानव के इतिहास की सबसे अधिक मूल्यवान और शिक्षाप्रद सामग्री का कोष भारत में और केवल भारत में ही है।'

    भारतीय संस्कृति की पावन धारा का प्रवाह, कब आरम्भ हुआ, इसका ठीक-ठीक काल निर्धारण नहीं हो सकता किंतु यह निर्विवाद है कि यह विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है तथा इस समय यह धरती पर विश्व की प्राचीनतम जीवित संस्कृति है क्योंकि भारतीय संस्कृति के साथ जन्म लेने वाली अन्य वैश्विक संस्कृतियां आज काल के गाल में समा गई हैं। मेसोपोटामिया की सुमेरियन, असीरियन, बेबीलोनियन और रवाल्दी प्रभूति, मिस्र, ईरान, यूनान और रोम की प्राचीन संस्कृतियां काल के गाल में समा चुकी हैं।

    उनके ध्वंसावशेष ही अब उनकी गाथा कहते हैं। केवल चीन की ही संस्कृति ऐसी है जो प्राचीनता के मामले में भारतीय संस्कृति के समकक्ष ठहरती है। विश्व की अन्य प्राचीन संस्कृतियों की भांति भारतीय संस्कृति ने भी विगत कई हजार वर्षों में काल के क्रूर थपेड़े सहन किए हैं। विश्व भर की प्राचीन संस्कृतियां इन थपेड़ों के कारण अपना अस्तित्त्व खो बठीं किंतु भारतीय संस्कृति आज भी पूरे उल्लास के साथ जीवित है। हालांकि इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि भारतीय संस्कृति की भौगोलिक सीमाओं में निरंतर संकुचन हुआ है और यह संकुचन आज भी जारी है।

    एक समय था जब भारत देश का नामकरण 'भारत' के रूप में नहीं हुआ था किंतु तब भी भारतीय संस्कृति अत्यंत विकसित अवस्था में विद्यमान थी और इसकी सीमा पश्चिम में हिन्दुकुश पर्वत से आरम्भ होकर पूर्व में बंगाल की खाड़ी एवं उसके आगे के सैंकड़ों द्वीपों तक विस्तृत थी।

    उष्णकटिबन्धीय द्वीपों में भारतीय संस्कृति का विस्तार

    आज जिन देशों को दीपान्तर अथवा पार-महाद्वीपीय देश कहा जाता है, उनमें भी भारतीय संस्कृति ही व्यवहृत होती थी। दक्षिण-पूर्व एशिया और ओशिनिया (उष्णकटिबन्धीय प्रशान्त महासागर के द्वीप) क्षेत्रों में स्थित इण्डोनेशिया, विएतनाम, मलेशिया, कम्बोडिया आदि देशों में भी भारतीय संस्कृति ही प्रसारित थी तथा उसके दर्शन आज भी इन देशों में किए जा सकते हैं। भारतीय पुराणों में उष्णकटिबन्धीय प्रशान्त महासागर के एक विशाल द्वीप समूह को 'द्वीपान्तर भारत' अर्थात् समुद्र-पार-भारत कहा गया है। जब यूरोपवासियों ने भारत को 'इण्डिया' कहा तब उन्होंने पारद्वीपीय द्वीपों के एक बड़े समूह की भारतीय संस्कृति से साम्यता के आधार पर उसे 'इण्डोनेशिया' कहा। जो 'इण्डिया इन एशिया' की ध्वनि देता है।

    डचों द्वारा शासित औपनिवेशिक काल में इस द्वीप समूह को ईस्ट-इण्डीज कहा जाता था। भूगोलविदों, इतिहासकारों, वैज्ञानिकों एवं प्राचीन भारतीय साहित्य के अनुसार ईस्ट-इण्डीज द्वीप, किसी समय एशिया से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक जुड़े हुए थे। बाद में भूगर्भीय हलचलों के कारण टूट-टूट कर अर्द्धचंद्राकार आकृति में बिखर गए। इनमें से जावा, सुमात्रा, बाली तथा बोर्नियो बड़े द्वीप हैं।

    भारतीय पौराणिक साहित्य तथा चीनी साहित्य थाइलैण्ड, कम्बोडिया, विएतनाम, मलेशिया तथा इण्डोनेशियाई द्वीपों से भारत के सांस्कृतिक सम्बन्ध रामकथा के काल से भी पहले ले जाते हैं। उस काल में भारत की भौगोलिक सीमाएं जम्बूद्वीप (भारत) से लेकर सिंहल द्वीप (श्रीलंका), स्याम (थाइलैण्ड), यवद्वीप (जावा), स्वर्णद्वीप (सुमात्रा), मलय द्वीप (मलेशिया), शंखद्वीप (बोर्नियो), बाली तथा आंध्रालय (ऑस्ट्रेलिया) तक थीं।

    मलय द्वीप अथवा मलाया को अब मलेशिया कहते हैं, काम्बोज, कम्बोडिया (कम्पूचिया) के नाम से अलग देश है। उस काल के चम्पा राज्य के द्वीप वर्तमान में विएतनाम और कम्बोडिया (कम्पूचिया) में बंट गए हैं। यहाँ आज भी संस्कृत भाषा व्यवहार में लाई जाती है। उस काल में भारत के राजा दूर-दूर के समुद्री द्वीपों पर अधिकार कर लेते थे। इनमें कुशद्वीप (अफ्रीका) तथा वाराहद्वीप (मेडागास्कर) प्रमुख हैं। रामकथा से पहले से लेकर सातवीं शताब्दी ईस्वी में इस्लाम का उदय होने तक इनमें से अधिकांश द्वीप भारत का हिस्सा थे तथा यहाँ की प्रजा हिन्दू थी।

    मेडागास्कर अब अफ्रीका महाद्वीप के दक्षिण-पूर्व में समुद्र के बीच स्थित एक विशाल द्वीप है तथा अलग राष्ट्र है। दक्षिण एशियाई द्वीपों में स्थित बोर्नियो नामक द्वीप पर ब्रुनेई नामक देश की राजधानी का नाम आज भी 'बंडर सिरी बगवान' है जो 'बंदर श्री भगवान' अर्थात् हनुमानजी की ओर संकेत करता है।

    वाल्मीकि रामायण में सप्तद्वीपों का उल्लेख

    वाल्मीकि रामायण में लिखा है- 'यत्रवन्तो यवद्वीपः सप्तराज्योपशोभितः।।' अर्थात् यवद्वीप में सात राज्य हैं। निश्चित रूप से उस काल में यवद्वीप (जावा), भारत की मुख्य भूमि के पर्याप्त निकट रहा होगा। इसके निकटवर्ती समुद्री क्षेत्र में अन्य द्वीप होंगे जिनमें से छः-सात द्वीप मानव-बस्तियों की उपस्थिति की दृष्टि से प्रमुख रहे होंगे।

    वायुपुराण के छः द्वीपों की आर्य बस्तियां

    वायुपुराण के एक श्लोक में कहा गया है- 'अंगद्वीपं, यवद्वीपं, मलयद्वीपं, शंखद्वीपं, कुशद्वीपं वराहद्वीपमेव च।। एवं षडेषे कथिता अनुद्वीपाः समन्त्तः। भारतं द्वीपदेशो वै दक्षिणे बहुविस्तरः।।' अर्थात्- अंग द्वीप, यव द्वीप, मलय द्वीप, शंख द्वीप, कुश द्वीप तथा वराह द्वीप आदि, भारतवर्ष के अनुद्वीप हैं जो दक्षिण की ओर दूर तक फैले हुए हैं। इस काल में बाली द्वीप भी इन्हीं द्वीपों की श्ृंखला में गिना जाता था जहाँ भारतीय आर्यों की बस्तियां थीं और जहाँ मनुस्मृति के आधार पर सामाजिक एवं न्याय व्यवस्था स्थापित थी।

    लंका के साथ सांस्कृतिक सम्बन्ध

    लंका को आजकल सीलोन कहा जाता है जो कि सिंहल का अपभ्रंश है। पौराणिक काल में लंका को सिंहल द्वीप भी कहा जाता था। पौराणिक काल में लंका का आशय जिस द्वीप से होता था, उसमें मलय एवं सुमात्रा की भूमि भी सम्मिलित थी।

    ब्रह्माण्ड पुराण कहता है- 'तथैव मलयद्वीपमेवमेव सुसंवृतम्। नित्यप्रमुदिता स्फीता लंकानाम महापुरी।' इस श्लोक से ज्ञात होता है कि ब्रह्माण्ड पुराण के रचना काल में मलयद्वीप लंका के ठीक निकट उसी प्रकार स्थित रहा होगा जिस प्रकार आज लंका, भारत के निकट है। सुमात्रा द्वीप पर आज भी सोनी-लंका नामक एक स्थान है जो सुमात्रा के उत्तर-पूर्व वाले पर्वत के निकट समुद्र तट पर स्थित है। इस स्थान पर अत्यधिक मात्रा में सुवर्ण उपलब्ध था। इस स्वर्ण की प्राप्ति पहले यक्षों ने और बाद में राक्षसों द्वारा की गई।

    नारद खण्ड में लिखा है- 'भविष्यन्ति काले कालि दरिद्राः नृपमानवः तेऽत्र स्वर्णस्य लोभेन देवतादर्शनाय च।। नित्यं चैवागमिष्यन्ति त्यक्त्वा रक्षः कृत भयम्।' अर्थात् कलियुग में राजा-प्रजा दरिद्री हो जाएंगे, इसलिए यहाँ लोभ के कारण नित्य ही आया करेंगे।

    लंका के राजा रावण का नाना सुमाली, अपने राक्षसों को भगवान विष्णु के संहार से बचाने के लिए, लंका छोड़़कर पाताल में जाकर रहने लगा। यह पाताल जावा-सुमात्रा-बाली आदि द्वीप समूह का कोई द्वीप होना अनुमानित किया जाता है। इस घटना के सही समय के बारे में यद्यपि अलग-अलग मान्यताएं हैं तथापि भारतीय वांगमय मानता है कि यह घटना आज से लगभग सात हजार साल पहले हुई। इन द्वीपों पर रामकथा के प्रसंगों वाली हजारों साल पुरानी प्रतिमाएं मिलती हैं।

    पश्चिम के वैज्ञानिक भी भगवान राम का अवतरण-काल आज से सात हजार साल पुराना मानते हैं। रामसेतु की कार्बन डेटिंग भी इस कालखण्ड की पुष्टि करती है। सुमात्रा द्वीप को भारतीय पौराणिक साहित्य में सुवर्ण द्वीप तथा अंगद्वीप कहा गया है जहाँ स्वर्ण के विशाल भण्डार उपलब्ध थे। यक्ष जाति के लोगों ने अपना स्वर्ण, स्वर्णद्वीप (इसे अंगद्वीप भी कहते थे) से लाकर सिंहल द्वीप (लंका) में रखा था। यक्षों का राजा कुबेर इस धन की रक्षा करता था। राक्षसों के राजा रावण का बचपन (आन्ध्रालय) ऑस्टेलिया में व्यतीत हुआ था।

    रावण ने आन्ध्रालय से आकर लंका पर चढ़ाई की तथा लंका के राजा कुबेर को परास्त करके सोने की लंका पर अधिकार कर लिया तथा उसका पुष्पक विमान भी छीन लिया। इसके बाद राक्षस पुनः लंका में रहने लगे। कुबेर और रावण, दोनों ही विश्रवा के पुत्र थे। बाली एवं जावा द्वीपों पर आज भी राक्षसों की तरह दिखाई देने वाली मूर्तियाँ यत्र-तत्र दिखाई देती हैं। बाली द्वीप पर राक्षस जैसी दिखने वाली विशालाकाय मूर्तियों का बड़ा संग्रहालय है। इन मूर्तियों की उपस्थिति भारतीय पौराणिक साहित्य में वर्णित राक्षसों के इन द्वीपों से सम्बन्ध की पुष्टि करती हैं।

    उष्णकटिबन्धीय द्वीपों का समुद्र में बिखराव

    जैसे-जैसे समय व्यतीत होता गया, पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण, भारत भूमि के निकट स्थित द्वीप, समुद्र में दूर-दूर तक छितराते चले गए। आज इनमें से दूरस्थ द्वीप ऑस्ट्रेलिया एवं मेडागास्कर के नाम से जाने जाते हैं। इन द्वीपों के दूर चले जाने के कारण भारत देश की परिकल्पना भी संकुचित होती चली गई।

    आर्यावर्त

    प्राचीन काल में भारत के लिए 'आर्यावर्त' नाम प्रचलित हुआ। मनु स्मृति (संभावित रचना काल ई.पू. दूसरी शताब्दी से दूसरी शताब्दी ईस्वी) में लिखा है कि जो सरस्वती तथा दृषद्वती नदियों के मध्य में देव-निर्मित देश है, वह 'ब्रह्मावर्त' कहलाता है। उस देश का परम्परागत आचरण ही भिन्न-भिन्न शाखाओं सहित वर्णों के लिए सदाचार है। कुरुक्षेत्र, मत्स्य, पांचाल, शूरसेन आदि से मिलकर 'ब्रह्मर्षि देश' बना है।

    यह ब्रह्मावर्त के पश्चात् है। इस देश में उत्पन्न हुए ब्राह्मणों से पृथ्वी के समस्त जन को अपना चरित्र सीखना चाहिए। हिमालय तथा विन्ध्याचल के मध्य में विनशन के पूर्व तथा प्रयाग के पश्चिम में स्थित देश 'मध्यदेश' कहलाता है। पूर्वी समुद्र से पश्चिमी समुद्र तक; एवं हिमालय से विन्ध्य पर्वतों के मध्य जो देश है, वह विद्वानों द्वारा 'आर्यावर्त' के रूप में जाना जाता है। अर्थात् ब्रह्मवर्त, ब्रह्मर्षि देश एवं मध्यदेश से मिलकर आर्यावर्त बनता था।

    उत्तरापथ

    आर्य जन, लम्बे समय तक आर्यावर्त, ब्रह्मावर्त, ब्रह्मर्षि देश एवं मध्यदेश में निवास करते रहे। बिहार तथा बंगाल का दक्षिण-पूर्वी भाग आर्यों के प्रभाव से बहुत समय तक मुक्त रहा परन्तु अन्त में आर्यों ने इस भू-भाग पर भी प्रभुत्व स्थापित कर लिया। आर्यों ने सम्पूर्ण उत्तरी भारत को 'उत्तरापथ' कहा।

    दक्षिणा-पथ

    विन्ध्य पर्वत तथा घने वनों के कारण दक्षिण भारत में बहुत दिनों तक आर्यों का प्रवेश न हो सका। इन गहन वनों तथा पर्वतमालाओं को पार करने का साहस सर्वप्रथम ऋषि-मुनियों ने किया। सबसे पहले अगस्त्य ऋषि दक्षिण-भारत में गए। इस प्रकार आर्यों की दक्षिण विजय केवल सांस्कृतिक विजय थी। वह राजनीतिक विजय नहीं थी। धीरे-धीरे आर्य सम्पूर्ण दक्षिण भारत में पहुँच गए और उसके कोने-कोने में आर्य-सभ्यता तथा संस्कृति का प्रचार हो गया। आर्यों ने दक्षिण-भारत को 'दक्षिणा-पथ' नाम दिया।

    भारत देश की भौगोलिक सीमाओं का संकुचन

    विष्णु-पुराण के लिखे जाते समय (अनुमानतः ई.300 से 600 के बीच) भारत की भौगोलिक सीमाएं हिमालय पर्वत से हिन्दमहासागर तक विस्तृत थीं क्योंकि विष्णु-पुराण में भारत भूमि का उल्लेख इस प्रकार हुआ है-


    उत्तरं यत्समुद्रस्य, हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।

    वर्ष तद् भारतं नामा, भारती यत्र संतति।

    भारत वर्ष के नौ विभाग

    राजशेखर (ई.873-920) ने अपने ग्रंथ 'काव्यमीमांसा' में प्राचीन भारत के विभिन्न विभागों का वर्णन किया है- यह भगवान् मेरु प्रथम वर्ष पर्वत है। उसके चारों ओर 'इलावृत्त वर्ष' है। उसके उत्तर में श्वेत, नील तथा श्ृंगवान नामक तीन वर्ष हैं। उनके देश रम्यक, हिरण्यमय, उत्तर-कुरु आदि हैं।

    दक्षिण में भी निषध, हेमकूट तथा हिमवान् नामक तीन पर्वत हैं। इनके भी हरिवर्ष, किम्पुरुष, भारत आदि तीन देश हैं। उनमें यह भारतवर्ष है और इसके नौ भेद (विभाग) हैं यथा- इन्द्रद्वीप, कसेरुमान्, ताम्रपर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, सौम्य, गन्धर्व, वरुण तथा कुमारी। हिमालय तथा विन्ध्याचल एवं पूर्वी तथा पश्चिमी समुद्र के मध्य आर्यावर्त है। वहीं पर चतुराश्रम तथा चार वर्ण पाए जाते हैं। वहीं सदाचार की जड़ भी है।

    भारत वर्ष का बिखराव

    इतिहास के प्रत्येक कालखण्ड में पश्चिम की ओर से होने वाले क्रूर सैन्य आक्रमणों ने भारतवासियों को राजनैतिक रूप से एक नहीं रहने दिया किंतु भारतीय संस्कृति ने एक ऐसी सुदृढ़़ रज्जु का काम किया जिसने आसेतु हिमालय, भारत वासियों को सदैव एक होने का अनुभव कराया किंतु जब सातवीं शताब्दी ईस्वी में इस्लाम का उदय होने के बाद भारतीयों की सांस्कृतिक एकता की रज्जु टूटने लगी तो अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांगलादेश आदि नाम से अलग-अलग देश बन गए। बाद में अंग्रेजों के दीर्घ शासन काल में नेपाल, भूटान तथा बर्मा भी भारत से अलग कर दिए गए।

    इस बिखराव के पश्चात् भी 'भारत' के नाम से जो देश वर्तमान समय में अस्तित्त्व में है, वह भौगोलिक विस्तार की दृष्टि से विश्व में सातवां स्थान रखता है तथा संसार की कुल जनसंख्या का छठा हिस्सा भारत में निवास करता है। इस दृष्टि से यह विश्व का दूसरे नम्बर का सबसे बड़ा देश है।

    भारतीय संस्कृति के अध्ययन की आवश्यकता

    भारतीय संस्कृति का अध्ययन पिछले सौ वर्षों से अधिक समय से हो रहा है। प्रत्येक भारतीय को अपनी राष्ट्रीय संस्कृति की विशेषताओं से परिचित होना चाहिए ताकि देश की वर्तमान समस्याओं का हल ढूँढने के लिए हम राष्ट्र के पूर्वगामी अनुभवों, परम्पराओं और प्रयासों के प्रकाश में अपना मार्ग खोज सकें। इसके अध्ययन से हमें न केवल इसके गुण-दोष ही ज्ञात होंगे अपितु यह भी ज्ञात होगा कि किन कारणों से संस्कृति का उत्कर्ष और अपकर्ष होता है।

    निःसन्देह भारतीय संस्कृति का अतीत अत्यन्त उज्जवल था तथा इस संस्कृति में कुछ ऐसी महान् बातें हैं जो विश्व की अन्य संस्कृतियों में नहीं पाई जातीं। फिर भी भारतीय संस्कृति के अनेक पुरातन तत्त्वों को आज का समाज स्वीकार नहीं कर सकता। अतः भारतीय संस्कृति के अध्ययन से ही उन विशेषताओं एवं त्याज्य पुरातन तत्त्वों को चिह्नित किया जा सकता है।

    भारतीय संस्कृति का उद्भव एवं निर्माण

    भारतीय संस्कृति का उद्भव, धरती भर की सभ्यताओं में घटने वाली सबसे अद्भुत घटना थी। आज भारत में विविध प्रकार की संस्कृतियां रहती हैं जिनमें अलग-अलग तरह के आचार-विचार एवं रीति-रिवाज हैं। बहुत से विद्वानों का मत है कि भारतीय संस्कृति को प्राचीन आर्यों ने जन्म दिया किंतु बहुत से अन्य विद्वान इस मत को स्वीकार नहीं करते। पश्चिमी विद्वान हेरास और भारतीय विद्वान चटर्जी की मान्यता है कि भारतीय संस्कृति के निर्माण का श्रेय द्रविड़़ों को है।

    फेयर सर्विस का विश्वास है कि यह हिन्दी-ईरानी क्षेत्र की अपनी उपज है। प्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता व्हीलर की मान्यता है कि भारतीय संस्कृति का उद्भव और विकास पश्चिमी एशिया की सुमेरियन संस्कृति के प्रभाव से हुआ। हमारी राय में इन समस्त विद्वानों के मत अपूर्ण हैं। वास्तविकता यह है कि भारतीय संस्कृति की आत्मा में आर्य-संस्कृति है जिसे द्रविड़़ों की संस्कृति ने स्पर्श करके और अधिक परिष्कृत, सुकोमल एवं मानवीय बना दिया है।

    रामधारी सिंह 'दिनकर' के अनुसार 'भारतीय संस्कृृति में चार बड़ी क्रांतियां हुई हैं। पहली क्रांति तब हुई, जब आर्य भारतवर्ष में आए अथवा जब भारतवर्ष में उनका आर्येतर जातियों से सम्पर्क हुआ। आर्यों ने आर्येतर जातियों से मिलकर जिस समाज की रचना की, वही आर्यों अथवा हिन्दुओं का बुनियादी समाज हुआ और आर्य तथा आर्येतर संस्कृतियों के मिलन से जो संस्कृति उत्पन्न हुई, वही भारत की बुनियादी संस्कृति बनी। इस बुनियादी भारतीय संस्कृति के लगभग आधे उपकरण आर्यों के दिए हुए हैं और उसका दूसरा आधा आर्येतर जातियों का अंशदान है। दूसरी क्रांति तब हुई तब महावीर और गौतम बुद्ध ने, स्थापित धर्म या संस्कृति के विरुद्ध विद्रोह किया तथा उपनिषदों की चिंतनधारा को खींचकर वे अपनी मनोवांछित दिशा की ओर ले गए। तीसरी क्रांति उस समय हुई जब इस्लाम, विजेताओं के धर्म के रूप में भारत पहुँचा और इस देश में हिन्दुत्व के साथ उसका सम्पर्क हुआ और चौथी क्रांति तब हुई जब भारत में यूरोप का आगमन हुआ तथा उसके सम्पर्क में आकर हिन्दुत्व एवं इस्लाम दोनों ने नवजीवन का अनुभव किया। भारतीय संस्कृति नूतन अवदानों को ग्रहण करने के बाद भी अपना मौलिक रूप हमेशा कायम रखती आई है।'

    यदि दिनकर के मत को स्वीकार कर लिया जाए तो इसका अर्थ यह है कि केवल आर्यों ने इस देश की संस्कृति का निर्माण नहीं किया, वे भारत में बाहर से आए उनके भारत में आने से पूर्व ही कोई संस्कृति यहाँ फल-फूल रही थी। जबकि आधुनिक भारतीय विद्वान इस बात को स्वीकार नहीं करते कि आर्य कहीं और से चलकर भारत आए। उनकी दृष्टि में आर्य जाति इसी देश की मूल निवासी है।

    डॉ. राधा कुमुद मुखर्जी ने लिखा है- 'अब आर्यों के आक्रमण और भारत के मूल निवासियों के साथ उनके संघर्ष की प्राक्कल्पना को धीरे-धीरे त्याग दिया जा रहा है।'

    अविनाश चन्द्र दास के विचार में 'सप्त-सिन्धु ही आर्यों का आदि देश था।' कुछ अन्य विद्वानों के विचार में काश्मीर तथा गंगा का मैदान आर्र्यों का आदि-देश था। भारतीय सिद्धान्त के समर्थकों का कहना है कि आर्य-ग्रन्थों में आर्यों के कहीं बाहर से आने की चर्चा नहीं है और न अनुश्रुतियों में कहीं बाहर से आने के संकेत मिलते हैं। इन विद्वानों का यह भी कहना है कि वैदिक-साहित्य आर्यों का आदि साहित्य है। यदि आर्य सप्त-सिन्धु में कहीं बाहर से आए तो इनका साहित्य अन्यत्र क्यों नहीं मिलता।

    ऋग्वेद की भौगोलिक स्थिति से भी यही प्रकट होता है कि ऋग्वेद के मन्त्रों की रचना करने वालों का मूल स्थान पंजाब तथा उसके समीप का देश ही था। आर्य-साहित्य से हमें ज्ञात होता है गेहूँ तथा जौ प्राचीन आर्यों के प्रमुख खाद्यान्न थे। पंजाब में इन दोनों अन्नों का ही बाहुल्य है। अतः यही आर्यों का आदि-देश रहा होगा।

    सप्तसिंधु क्षेत्र को आर्यों का आदि देश मानने में सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि हड़प्पा तथा मोहेनजोदड़ो की सभ्यता, आर्य-सभ्यता से भिन्न तथा अधिक प्राचीन है। जब सिन्धु-प्रदेश की प्राचीनतम सभ्यता अनार्य थी तब सप्त-सिन्धु कैसे आर्यों का आदि-देश हो सकता है! इस समस्या का निवारण इस तथ्य से हो जाता है कि सिंधु सभ्यता का विस्तार सिंधु नदी घाटी में था तथा आर्य बस्तियों का प्रसार उनके पड़ौस में पंजाब तथा काश्मीर की तरफ था क्योंकि सिंधु नदी घाटी सभ्यता क्षेत्र से उसी काल की आर्य बस्तियां नहीं मिली हैं अपितु वे थोड़ी हटकर स्थित थीं।

    पश्चिमी विद्वानों को यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि भारत में कम से कम 1000 साल की अवधि तक सैन्धव बस्तियां एवं आर्य बस्तियां उत्तर भारत में एक साथ विद्यमान रहीं। आर्यों का प्राचीनतम साहित्य अर्थात् ऋग्वेद 2500 ई.पू. से मिलने लगता है जबकि सैन्धव सभ्यता 3500 ई.पू. से 1500 ई.पू. तक अस्तित्त्व में थी।

    भरत में आर्य संस्कृति का प्रसार

    सप्त-सिन्धु प्रदेश में निवास: भारतीय आर्य चाहे भारत के मूल-निवासी रहे हों और चाहे मध्य एशिया से भारत में आए हों परन्तु यह निश्चित है कि प्रारम्भ में वे सप्त-सिन्धु प्रदेश में रहते थे, यहीं से वे शेष भारत में फैले। सप्त-सिन्धु वही प्रदेश था जिसे वर्तमान में पंजाब कहा जाता है। पंजाब, का संधि विग्रह होता है- पंच$अम्बु, अर्थात् पाँच जलों अथवा नदियों का देश।

    सप्त-सिन्धु का भी अर्थ है, सात नदियों का देश। उन दिनों इस प्रदेश में सात नदियाँ पाई जाती थीं। उनमें से पाँच-शतुद्रि (सतलज), विपासा (व्यास), परुष्णी (रावी), चिनाब (असिक्नी) तथा झेलम (वितस्ता) तो अब भी विद्यमान हैं और दो नदियाँ- सरस्वती तथा दृशद्वती, विलुप्त हो गई हैं। प्राचीन आर्यों ने अपने ग्रन्थों में इसी सप्त-सिन्धु का गुणगान किया है। इसी जगह उन्होंने वेदों की रचना की और यहीं पर उनकी सभ्यता तथा संस्कृति का सृजन हुआ। यहीं से भारतीय आर्य शेष भारत में फैले। ब्रह्मावर्त में प्रवेश: सप्त सिन्धु क्षेत्र से आर्य पूर्व की ओर बढ़े।

    सप्त-सिन्धु से प्रस्थान करने के इनके दो प्रधान कारण हो सकते हैं। प्रथम तो यह कि इनकी जनसंख्या में वृद्धि हो गई, जिससे इन्हें नए स्थान को खोजने की आवश्यकता पड़ी और दूसरा कारण यह हो सकता है कि अपनी सभ्यता तथा संस्कृति का प्रसार करने के लिए ये लोग आगे बढ़े। सप्त-सिन्धु से प्रस्थान करने का जो भी कारण रहा हो, इतना तो निश्चित है कि वे बड़ी मन्द-गति से आगे बढ़े क्योंकि अनार्यों के साथ उन्हें भीषण संघर्ष करना पड़ा।

    अनार्यों से अधिक बलिष्ठ, वीर, साहसी तथा रण-कुशल होने के कारण आर्यों ने उन पर विजय प्राप्त कर ली और उन्होंने कुरुक्षेत्र के निकट के प्रदेश पर अधिकार स्थापित कर लिया। इस प्रदेश को उन्होंने ब्रह्मावर्त के नाम से पुकारा।

    ब्रह्मर्षि-देश में प्रवेश: ब्रह्मावर्त क्षेत्र के शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लेने के बाद आर्यों ने अपनी युद्ध-यात्रा जारी रखी। अब उन्होंने आगे बढ़कर पूर्वी राजस्थान, गंगा तथा यमुना के दो-आब और उसके निकटवर्ती प्रदेश पर अधिकार स्थापित कर लिया। इस सम्पूर्ण प्रदेश को उन्होंने ब्रह्मर्षि-देश कहा।

    मध्य-देश में प्रवेश: ब्रह्मर्षि-देश पर प्रभुत्व स्थापित कर लेने के बाद आर्य और आगे बढ़े तथा हिमालय एवं विन्ध्य-पर्वत के मध्य की भूमि पर प्रभुत्व स्थापित कर लिया। आर्यों ने इस प्रदेश का नाम मध्य-देश रखा।

    सुदूर-पूर्व में प्रवेश: बिहार तथा बंगाल के दक्षिण-पूर्व का भाग आर्यों के प्रभाव से बहुत दिनों तक मुक्त रहा परन्तु अन्त में उन्होंने इस भू-भाग पर अधिकार कर लिया। आर्यों ने सम्पूर्ण उत्तरी भारत को आर्यावर्त एवं उत्तरापथ कहा।

    दक्षिणा-पथ में प्रवेश: विन्ध्य पर्वत तथा घने वनों के कारण दक्षिण भारत में बहुत दिनों तक आर्यों का प्रवेश नहीं हो सका। इन गहन वनों तथा पर्वतमालाओं को पार करने का साहस सर्वप्रथम ऋषि-मुनियों ने किया। सबसे पहले अगस्त्य ऋषि दक्षिण-भारत में गए। इस प्रकार आर्यों की दक्षिण विजय केवल सांस्कृतिक विजय थी। धीरे-धीरे आर्य सम्पूर्ण दक्षिण भारत में पहुँच गए और उसके कोने-कोने में आर्य-सभ्यता तथा संस्कृति का प्रचार हो गया। आर्यों ने दक्षिण-भारत को 'दक्षिणा-पथ' कहा।

    भारतीय संस्कृति के विभिन्न सोपान

    पूर्व वैदिक-काल से लेकर उत्तरवैदिक-काल तक भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्त्वों का निर्माण हो चुका था। इस दीर्घ काल में भारतीय समाज में बौद्धिक चिंतन का महाविस्फोट हुआ तथा समाज के लिए निश्चित परम्पराएं, रीति-रिवाज एवं धार्मिक विश्वास स्थापित हुए। आर्य ऋििषयों एवं राजाओं ने समाज के लिए आदर्श संस्कृति के निर्माण के भागीरथ प्रयत्न किए। उत्तरवैदिक-काल में भारतीय संस्कृति सिंधु संस्कृति के सम्पर्क में आने लगी। सिंधु संस्कृति के प्रभाव से भारतीय आर्यों में लिंगपूजा, नदियों की पूजा, पेड़-पौधों एवं पशु-पक्षियों की पूजा आदि नवीन परम्पराओं एवं नवीन विचारों का प्रसार हुआ।

    भारतीय आर्य छोटे-छोटे 'जन' में रहा करते थे जिनकी तुलना पुरातन कबीलों अथवा गांवों से की जा सकती है किंतु सिंधु संस्कृति के प्रभाव से उनमें भी नगरीय सभ्यता का विकास हुआ जिन्हें वे 'पुर' कहा करते थे। आर्य राजाओं ने इसी दौरान अपने राज्यों का विस्तार करके महाजनपदों की स्थापना की। मौर्यकाल में बौद्धों के प्रभाव से भारतीय संस्कृति में बड़ी क्रांति हुई। इस काल में भारतीय समाज 16 बड़े महाजनपदों में विभक्त था। इस काल में यज्ञों में दी जाने वाली पशु-बलियों पर रोक लगी।

    देश भर में बौद्ध मठ एवं विहार स्थापित हो गए। लोग बड़ी संख्या में बौद्ध-भिक्षु बनकर इन मठों एवं विहारों में प्रवेश करने लगे ताकि उन्हें राजकीय संरक्षण में चल रहे इन मठों में बिना कोई काम किए भोजन, कपड़ा एवं आश्रय मिल सके तथा उन्हें युद्धों में भाग नहीं लेना पड़े। ईसा की पहली एवं दूसरी शताब्दी ईस्वी में पश्चिमी की ओर से आए शकों द्वारा पश्चिमी भारत में शासन स्थापित किए जाने के बाद भारतीय संस्कृति में बड़ा परिवर्तन होता हुआ दिखाई देता है। उनके प्रभाव से सम्पूर्ण उत्तर भारत में यक्षपूजन की परम्परा आरम्भ हुई।

    इस काल में यक्ष-यक्षियों एवं रुद्र तथा उनकी पत्नी शक्ति की मिट्टी की मूर्तियाँ बहुत बड़ी संख्या में बनने लगीं। इस काल के आदर्श, अपने पूर्ववर्ती एवं पश्चवर्ती भारतीय समाज के आदर्शों से बिल्कुल भिन्न हैं। गुप्तकाल में भारतीय संस्कृति ने एक बार पुनः बड़ी करवट ली एवं भारतीय संस्कृति में युगांतकारी परिवर्तन आया। वैष्णव धर्म अपने चरम पर पहुँच गया। विष्णु एवं उनके अवतारों को समर्पित करके मंदिरों, मूर्तियों एवं चित्रों का निर्माण हुआ। समाज में व्यापक स्तर पर मनाए जाने वाले धार्मिक समारोह, दान, तप-व्रत एवं तीर्थों का महत्त्व स्थापित हुआ।

    ब्राह्मणों द्वारा बनाई गई धार्मिक एवं सामाजिक व्यवस्थाएं नए सिरे से समाज द्वारा स्वीकार कर ली गईं। भारतीय समाज में नवीन आदर्शों, मानव मूल्यों एवं सदाचार के साथ-साथ राष्ट्रीय भावना का प्रसार हुआ। यही कारण है कि गुप्त काल को भारतीय इतिहास का स्वर्ण काल कहा जाता है। यह शांति और समृद्धि का युग था। इस काल में घरों में ताले लगने तक बंद हो गए। इसी काल में पुराणों की रचना हुई तथा षड्दर्शन का विकास हुआ।

    गुप्त काल से लेकर आधुनिक काल तक भारतीय संस्कृति के मूलभूत आदर्शों में कोई परिवर्तन नहीं आया है। गुप्त सम्राटों ने इसे पल्लवित एवं पुष्पित करने में महान् योगदान दिया। उनके प्रयासोें से भारतीय संस्कृति को दृढ़ता प्राप्त हुई। उसी सांस्कृतिक दृढ़ता का परिणाम था कि परवर्ती गुप्तकाल में भारत पर हुए विदेशी आक्रमणकारियों की संस्कृतियां, भारतीय संस्कृति के आधार पर चोट नहीं कर सकीं। अपितु हूणों, खिजरों एवं पह्लवों के साथ आईं विदेशी संस्कृतियाँ स्वयं ही भारतीय संस्कृति में विलोपित हो गईं।

    भारतीय संस्कृति की मूलभूत विशेषताएँ

    भारतीय संस्कृति की कुछ ऐसी विशेषताएँ हैं जो विश्व की किसी अन्य संस्कृति में नहीं पाई जातीं। आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा धरती की पंचमहाभूतों के रूप में कल्पना किसी अन्य संस्कृति में साकार नहीं हुई है। अग्नि देवता, वायु देवता, वरुण देवता तथा धरती देवी जैसे देवी-देवताओं की पूजा केवल इसी संस्कृति में होती है। प्राकृतिक शक्तियों की देवी-देवताओं के रूप में पूजा भारतीय संस्कृति के अतिरिक्त केवल प्राचीन यूनान में ही पाई जाती थी।

    देवी-देवताओं के वाहनों के रूप में गरुड़, मोर, मूषक, नाग, श्वान, सिंह, बैल आदि की कल्पना भी भारतीय संस्कृति में ही हुई है। इन विशेषताओं के कारण ही भारतीय संस्कृति में नदियों, पहाड़ों, वृक्षों तथा पशु-पक्षियों की पूजा होती है जो संसार भर की किसी अन्य संस्कृति में नहीं मिलती। भारत के अतिरिक्त दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में ये परम्पराएं भारतीय संस्कृति अर्थात् प्राचीन आर्य संस्कृति के प्रभाव से मिलती हैं।

    गंगा-यमुना आदि नदियों की पूजा; गायों, बछड़ों, नागों, गरुड़ आदि पशु-पक्षियों की पूजा; तुलसी, पीपल, बड़ एवं खेजड़ी आदि वृक्षों की पूजा केवल भारतीय संस्कृति में ही पाई जाती हैं। विभिन्न पर्वों एवं तिथियों पर नदियों में स्नान करना, श्राद्ध करना, षोडश संस्कार करना, शव को विधि विधान एवं मंत्रोच्चार के साथ अग्नि को समर्पित करने जैसी परम्पराएं केवल भारतीय संस्कृति में मिलती हैं।

    भारत की प्राचीन संस्कृति का गुणगान करते हुए यूरोपीय लेखकों ने लिखा है- 'प्राचीन हिन्दू कवित्वपूर्ण लोग थे। वह निश्चित रूप से एक संगीतमय जाति थी और वे लोग वाणिज्य-व्यापार की क्षमता वाले लोग थे। वह दार्शनिकों का देश था। विज्ञान में भी वे सदा ही दक्ष और परिश्रमी थे। कला ने तो मानो भारत में ही स्वयं को निःशेष कर दिया था। संसार में साहित्य, धर्मशास्त्र और अध्यात्म-विद्या के जनक हिन्दू थे। उनकी भाषा विश्व में सर्वोत्तम, सर्वश्रेष्ठ और सबसे सुंदर है। सत्यवादिता, शूरता और वैयक्तिक चरित्र, प्रतिष्ठा में प्राचीन हिन्दुओं का राष्ट्रीय चरित्र अनुपमेय था। उनके उपनिवेशों ने विश्व को ज्ञान से भर दिया। उनके राजा आज भी समुद्र के देवताओं की भांति पूजे जाते हैं। उनकी सभ्यता आज भी सभ्य संसार के हर कोने में ओत-प्रोत है और हमारे जीवन के हर दिन हमारे चारों और फैली है।'

    अष्टांग योग, ध्यान, धारणा, समाधि, प्राणायाम एवं देव-पूजन; देवनागरी लिपि एवं उसकी विशिष्ट प्रकार की ध्वनियां; नृत्य, संगीत एवं गायन की अनुपम शैलियां; चित्रकला सहित विविधि प्रकार की ललित कलाओं की शैलियां; पितृपक्ष में श्राद्ध, तर्पण, तिलांजलि आदि आचार-विचार किसी अन्य संस्कृति में देखने को नहीं मिलते हैं।

    सिन्धु संस्कृति के उत्खनन से प्राप्त विभिन्न प्रकार की सामाग्री से एक विशिष्ट प्रकार की मानव सभ्यता एवं संस्कृति संसार के सामने आई है जो एक विशेष प्रकार के रहन-सहन को प्रकट करती है और जिसकी तुलना संसार की माया सभ्यता जैसी प्राचीनतम संस्कृतियों में भी नहीं मिलती। भारतीय संस्कृति को संसार की किसी अन्य संस्कृति से जोड़ने के कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं हुए हैं। भारतीय संस्कृति की उदार, सहिष्णु एवं समन्वयात्मक प्रवृत्ति निःसन्देह आदर्श मानव-समाज की रचना के लिए ठोस आधार प्रस्तुत करती है।

    सर्वांगीणता, विशालता, उदारता और सहिष्णुता की दृष्टि से विश्व भर की कोई भी संस्कृति, भारतीय संस्कृति की समता नहीं कर सकतीं। यूरोप तथा अमरीका जैसे देशों में राष्ट्रवाद, अपने पड़ौसी देश के लिए भयोत्पादक एवं मानव संहारी तत्त्व के रूप में प्रकट हुआ जबकि भारतीय राष्ट्रवाद का स्वरूप देश की संस्कृति के अलोक में ही उद्भासित होता है जो अत्यंत उदार है और प्राणी मात्र को अभयदान देने वाला है। भारतीय संस्कृति का शान्ति, अहिंसा और विश्व-बन्धुत्व का सन्देश परमाणु युद्ध की विभीषिका से त्रस्त मानवता के लिए विश्व-शांति की आशा संजोए हुए है। भारतीय संस्कृति की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं-

    (1.) प्राचीनता

    भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है। इसका दीर्घकालीन स्थायित्व आज भी देखा जा सकता है। प्राचीन विश्व की अनेक सभ्यताएँ इस समय नष्ट हो चुकी है। मिस्र, असीरिया, बेबीलोनिया, क्रीट, यूनानी आदि संस्कृतियाँ, अपने वैभव के चरम पर पहुँचकर समाप्त हो गईं। आज प्राचीन यूनानी एवं रोमन धर्मों का एक भी अनुयाई धरती पर नहीं बचा है। आज संसार की प्राचीनतम संस्कुतियों में से केवल चीन और भारत की संस्कृतियां ही जीवित बची हैं।

    बहुसंख्य भारतीय आज भी हजारों साल पुराने वैदिक धर्म का पालन करते हैं। इस देश के पुरोहित एवं ब्राह्मण आज भी वेद मन्त्रों द्वारा यज्ञ कुण्ड में आहुति देकर देवी-देवताओं को प्रसन्न करते हैं। उपनिषदों और श्रीमद्भगवद् गीता ने भारत की धरती पर ज्ञान की जो धारा प्रवाहित की थी, वह आज भी इस देश में बह रही है। हजारों साल पहले लिखी गई रामायण और महाभारत आज भी भारतीय स्त्रियां को सीता, अनुसुइया, सती, सावित्री और पार्वती के पथ पर चलने के लिए प्रेरित करती हैं।

    राम और कृष्ण आज भी साधारण से साधारण और विशिष्ट से विशिष्ट व्यक्ति के लिए उच्च-आदर्शों की पराकाष्ठा है। महात्मा बुद्ध और महावीर स्वामी ने साधारण मनुष्य के लिए सादाजीवन और सदाचरण का जो पथ प्रशस्त किया था वह आज भी इस देश की अनुपम धरोहर है।

    प्रसिद्ध अमरीकी विद्वान विल ड्यूरेण्ट ने भारतीय संस्कृति की प्राचीनता का उल्लेख करते हुए लिखा है- 'यहाँ ईसा से 2900 साल पहले या इससे भी पहले मोहनजोदड़ो से लेकर महात्मा गांधी, रमण और टैगोर तक उन्नति और सभ्यता का शानदार सिलसिला जारी है। यहाँ ईसा से आठ शताब्दी पहले उपनिषदों से आरम्भ होकर ईसा के आठ सौ साल बाद शंकर तक ईश्वरवाद के हजारों रूप प्रतिपादित करने वाले दार्शनिक हुए हैं। यहाँ के वैज्ञानिकों ने तीन हजार साल पहले ज्योतिष का आविष्कार किया और इस जमाने में भी कई नोबल पुरुस्कार जीते हैं। कोई भी लेखक मिस्र, बेबीलोनिया और असीरिया के इतिहास की भाँति भारत के इतिहास को समाप्त नहीं कर सकता, क्योंकि भारत मंे अभी तक इतिहास का निर्माण हो रहा है, उसकी सभ्यता अब भी क्रियाशील है।'

    ड्यूरेण्ट भले ही भारतीय संस्कृति को ईसा से 2900 साल पहले या सिंधु घाटी सभ्यता के काल तक ले जाते हैं किंतु वास्तव में यह संस्कृति उससे भी कही अधिक पुरानी है। काउण्ट ब्जोर्न्स्टजेरना के अनुसार 'पृथ्वी पर कोई राष्ट्र अपनी सभ्यता और प्राचीनता के सम्बन्ध में भारत की प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता। ...... बैली की गणना के अनुसार यदि यह सत्य है कि ईसा से 3000 साल पहले हिन्दुओं ने खगोल विज्ञान और रेखागणित के ज्ञान में इतनी उच्च दक्षता प्राप्त कर ली थी, तो भला कितनी सदियों पूर्व उनकी संस्कृति का उदय हुआ होगा। क्योंकि मानव मस्तिष्क विज्ञान के मार्ग पर कदम-कदम ही चलता है।'

    हिन्दुओं के चार युगों का विवेचन करके के प्रश्चात् डॉ. हैलेहेद लिखते हैं- 'हिन्दुओं की इतनी प्राचीनता के सम्मुख मूसा का काल तो कल का सा ही लगता है और मॅथ्यूसेलाह का जीवन अल्पावधि से अधिक कुछ नहीं।'

    अमेरिका के येल कॉलेज के अध्यक्ष डॉ. स्टाईल हिन्दू लेखों की आश्चर्यजनक प्राचीनता से इतने उत्साहित हुए कि उन्होंने सर वी जोन्स को पत्र लिखकर प्रार्थना की कि वे हिन्दुओं के प्राचीन ग्रंथों की खोज करें। कार्बन डेटिंग पद्धति के आधार पर पश्चिमी वैज्ञानिक मानते हैं कि अयोध्या के राजा रामचंद्र आज से लगभग 7000 साल पहले अर्थात् ईसा से लगभग 5000 साल पहले हुए।

    भारतीय संस्कृति तो इससे भी प्राचीन है क्योंकि राजा रामचंद्र के पहले भी ईक्ष्वाकु वंश के राजाओं की एक सुदीर्घ परम्परा मौजूद थी। प्रो. मैक्स डंकर के अनुसार एक प्राचीन भारतीय राजा स्पेटेम्बस अर्थात् डायोनिसियस का शासनकाल ईसा से लगभग 6,717 वर्ष पहले निर्धारित होता है। मिस्र के टिनाईट थेबाईन राजवंश के प्रमुख 'मैनथे' की तालिकाओं में सबसे प्राचीन राजा का शासनकाल ईसा से 5,867 वर्ष पूर्व निर्धारित होता है तथा गीजा के पिरामिड के संस्थापक सौफी का शासनकाल ईसा से 2,000 वर्ष पूर्व निर्धारित होता है। इस प्रकार भारत के प्राचीनतम राजाओं में से एक स्पेटेम्बस अर्थात् डायोनिसियस का शासनकाल मिस्र के प्राीचनतम राजा से लगभग 1000 वर्ष पहले का है।

    (2.) धार्मिकता, आध्यात्मिकता एवं दार्शनिकता

    किसी भी देश की संस्कृति उस देश के नागरिकों के दार्शनिक विचारों, आध्यात्मिक चिंतन, धार्मिक आचरण, कविता, साहित्य और कला के विविध रूपों में अभिव्यक्त होती है। भारतीय संस्कृति ने स्वयं को जिस रूप में सर्वाधिक सुंदर ढंग से अभिव्यक्त किया, वह है- धर्म, अध्यात्म एवं दर्शन। 'मनु' ने अपने ग्रंथ 'मनुस्मृति' में धर्म के दस लक्षण बताए हैं-


    धृति क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।

    धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम।।

    अर्थात्- धृति (धैर्य), क्षमा, दम (मन पर संयम), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (पवित्रता), इन्द्रिय निग्रह, धी (बुद्धि विवेक), विद्या, सत्य और क्रोध न करना। वैष्णव धर्म से लेकर जैन धर्म, बौद्ध धर्म, शैव मत, शाक्त मत आदि समस्त धर्मों और मतों की आत्मा में धर्म के यही दस लक्षण विद्यमान हैं।

    भारत में यह विचार सदा से चला आ रहा है कि, आँखों से दिखाई देने वाले इस स्थूल संसार से परे भी कोई सत्ता है, जिससे जीवन एवं शक्ति प्राप्त करके यह प्रकृति फल-फूल रही है। भारत में हजारों साल से 'कण-कण में भगवान' की चिंतन धारा फल-फूल रही है। साथ ही 'अहम् ब्रह्मास्मि' अर्थात् सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में स्वयं को तथा स्वयं में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को समाए हुए देखने की प्रवृत्ति रही है। भारतीय अध्यात्म विगत हजारों वर्षों से भारतीयों को भौतिक प्रगति के साथ-साथ आध्यात्मिक प्रगति के लिए प्रेरित करता आया है।

    षडदर्शन में वर्णित समस्त दार्शिनिक विचार भी मनुष्य को 'ब्रह्म' अथवा 'मोक्ष' की प्राप्ति का मार्ग दिखाते हैं। जैन-धर्म 'नमो अरिहंताणम्....' के 'पंचमकार मंत्र' के माध्यम से और बौद्ध धर्म 'अप्प दीपो भव' के घोष के माध्यम से मनुष्य मात्र के 'आत्मकल्याण' की ही युक्ति सुझाते हैं। यही कारण है कि प्रत्येक भारतीय को 'ब्रह्म की प्राप्ति' अथवा 'मोक्ष की प्राप्ति' अथवा 'आत्मकल्याण' ही मानव-जीवन की सर्वाेच्च उपलब्धि प्रतीत होती है। 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' , 'सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय' तथा 'सियाराम मय सब जग जानी' का उद्घोष केवल भारतीय संस्कृति ही कर सकी है।

    (3.) सहिष्णुता

    विभिन्न संस्कृतियों, मान्यताओं, चिंतन धाराओं एवं सम्प्रदायों के प्रति सहिष्णुता और सम्मान का भाव भारतीय संस्कृति का प्रधान तत्त्व है। आर्य संस्कृति पर द्रविड़़ संस्कृति का जो व्यापक प्रभाव दिखाई देता है, वही इसी प्रवृत्ति का द्योतक है। सम्राट अशोक ने आज से लगभग 2200 साल पहले पहले, प्रजा को दिए गए संदेशों में लिखा है- 'लोग केवल अपने ही सम्प्रदाय का आदर और बिना कारण दूसरे सम्प्रदाय की निन्दा न करें। जो व्यक्ति ऐसा करता है, वह अपने सम्प्रदाय को भी क्षति पहँुचाता है और दूसरे सम्प्रदाय का भी अपकार करता है। लोग एक-दूसरे के धर्म को ध्यान से सुनें और उनकी सेवा करें क्योंकि समस्त सम्प्रदाय में बहुत से विद्वान हैं तथा वे मानव कल्याण का कार्य करते हैं।'

    अशोक द्वारा प्रतिपादित यह भावना आज भी भारतीयों में विद्यमान है। यदि आज जैन धर्म, बौद्ध धर्म, सिक्ख धर्म, कबीरपंथी, राधास्वामी आदि विभिन्न मत-मतांतर, भारतीय अध्यात्म की मूल धारा अर्थत् हिन्दू-धर्म की विभिन्न शाखाओं के रूप में देखे जाते हैं तो उसका कारण हिन्दू-धर्म में सबको अपनाने और साथ लेकर चलने की भावना ही है।

    सहिष्णुता की भावना के बल पर भारतीय समाज ने यवन, शक, कुषाण, हूण, पह्लव आदि जातियों को अपने भीतर आत्मसात् कर लिया। यदि अपवाद स्वरूप मिलने वाले कुछ उदाहरणों को छोड़़ दिया जाए तो यह कहा जा सकता है कि भारतीय राजाओं ने विभिन्न धर्मों को मानने वाली प्रजा पर धार्मिक अत्याचार नहीं किए और न ही दो राजाओं के बीच साम्प्रदायिक युद्ध ही हुए। जबकि यूरोप में न केवल एक धर्म ने दूसरे धर्म पर, परन्तु अपने ही धर्म में विभिन्न मत रखने वालों पर जो भीषण अत्याचार किए, उनसे यूरोपीय इतिहास के अनेक पृष्ठ रक्तरंजित हैं।

    प्राचीन काल में भारत ही एकमात्र ऐसा देश था, जहाँ हिंसा और धर्मान्धता का प्राधान्य नहीं रहा। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि 'विभिन्न देवताओं की श्रद्धापूर्वक उपासना करने वाले भी मेरा ही भजन करते हैं।' भारतीय विचारकों ने इस्लाम के साथ भी ताल-मेल बैठाने का भरपूर प्रयास किया। इसी समन्वयकारी भावना के कारण 'अल्लोपनिषद्' की रचना हुई तथा भजनों में 'ईश्वर अल्ला तेरो नाम' जैसी पंक्तियां जोड़ी गईं। मुसलमानों को प्रेम का संदेश देने के लिए भारतीय संस्कृति को 'गंगा-जमनी तहजीब' कहा गया।

    हिन्दुओं ने सूफियों को भारत के अध्यात्म, योग-साधना और रहस्यवाद का मुस्लिम संस्करण मानकर उसे प्रेम तथा प्रतिष्ठा प्रदान की। इस प्रकार के और भी कई प्रयास हुए किंतु 'इस्लाम' अपनी संस्कृति एवं सिद्धांतों के साथ किसी तरह का समझौता करने को तैयार नहीं हुआ। इस कारण भारतीय संस्कृति का इस्लाम पर प्रभाव लगभग शून्य रहा। भारत ने विदेशों से धार्मिक अत्याचारों द्वारा पीड़ित होकर आने वाले पारसियों, यहूदियों और सीरियन ईसाइयों को अपने यहाँ उदारतापूर्वक शरण दी।

    भारतीयों का यह अटूट विश्वास है कि भगवान एक अचिन्तय, अव्यक्त, सर्वशक्तिमान सत्ता है, विविध प्रकार की उपासनाएँ उस तक पहुँचने के विभिन्न मार्ग हैं। स्वामी रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे- 'ईश्वर एक है किंतु उसके विभिन्न स्वरूप हैं। जैसे एक घर का मालिक, एक के लिए पिता, दूसरे के लिए भाई और तीसरे के लिए पति है और विभिन्न व्यक्तियों द्वारा विभिन्न नामों से पुकारा जाता है, उसी प्रकार ईश्वर भी विभिन्न कालों एवं देशों में भिन्न-भिन्न नामों एवं भावों से पूजा जाता है। इसीलिए धर्मों की अनेकता देखने को मिलती है।'

    (4.) आनुकूल्यता

    आनुकूल्य का अभिप्राय है- स्वयं को बदलती हुई परिस्थितियों के अनुकूल बनाते रहना। प्रकृति में वही प्राणी दीर्घजीवी होता है जो स्वयं को परिस्थितियों के अनुकूल ढालता रहे। पृथ्वी पर किसी समय हाथियों से भी कई गुना बडे़ 'डायनोसोर' नामक प्राणी रहते थे, उनके द्वारा किए जाने वाले अत्यधिक भोजन, उनकी जनसंख्या में बेतहाशा वृद्धि एवं उनके परस्पर झगड़ों के चलते, उन्होंने स्वयं अपने लिए ऐसी खतरनाक परिस्थितियां उत्पन्न कर लीं कि वे उन्हीं परिस्थितियों में फंस कर नष्ट हो गए।

    संस्कृतियों के सम्बन्ध में भी यह नियम लागू होता है। मिस्र, मैक्सिको और ईरान की प्राचीन संस्कृतियाँ, विदेशी संस्कृतियों के आक्रमणों में स्वयं भी कमजोर हो गईं तथा उन्होंने दूसरी संस्कृतियों को भी गंभीर आघात पहुँचाए। इस कारण वे संस्कृतियां नष्ट हो गईं। ईसा से लगभग 5000 वर्ष पहले भारत में विकसित हुई सिंधु संस्कृति भी स्वयं को प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयार नहीं कर सकी तो वह भी आज से लगभग 1700 वर्ष पहले समाप्त हो गई जबकि आर्य संस्कृति आनुकूल्यता के गुण से सम्पन्न होने के कारण विभिन्न प्रकार की विपरीत परिस्थ्तिियों का सामना करती हुई और विदेशी संस्कृतियों को स्वयं में आत्मसात करती हुई आज तक जीवित है।

    आनुकूल्यता की इस प्रक्रिया में भारतीय संस्कृति ने विदेशी संस्कृतियों की विशेषताओं एवं विकृतियों को भी आत्मसात किया। यही कारण है कि वैदिक संस्कृति में उद्भव से लेकर वर्तमान समय तक आमूल-चूल परिवर्तन हो जाने के बाद भी इस संस्कृति की मूल आत्मा आज भी पूर्ण उत्साह के साथ जीवित है। वैदिक युगीन यज्ञ-प्रधान हिन्दू-धर्म ने वेदान्ती युग, कर्मकाण्डी युग तथा बौद्ध युग में निरंतर परिवर्तित होते हुए, मध्य-काल में इस्लाम के भीषण प्रहार सहे तथा उनके बचने के लिए स्वयं को भक्ति प्रधान बना लिया।

    इस प्रकार उसने हर काल में नवीन रूप एवं नवीन उत्साह धारण किया। इसी प्रकार मुस्लिम एवं ब्रिटिश शासनकाल में शिक्षित भारतीयों द्वारा विदेशी रहन-सहन, विदेशी भाषाओं और विदेशी वेश-भूषाओं को अपनाकर आनुकूल्यता के सिद्धांत का सहारा लिया और अपने परम्परागत धर्म और सामाजिक आदर्शों का परित्याग नहीं किया।

    (5.) ग्रहणशीलता

    संस्कृति की उदार सोच एवं उसका लचीलापन ही उसकी ग्रहणशीलता का निर्माण करती है। ग्रहणशीलता का अर्थ यह कदापि नहीं है कि दूसरी संस्कृतियों की विकृतियों को ग्रहण करने की प्रक्रिया में कोई संस्कृति अपनी मौलिकता को खो बैठे अपिुत ग्रहणशीलता का अर्थ यह होता है कि दूसरी संस्कृति से आई बुराई का परिमार्जन करके उसकी अच्छाइयों को आत्मसात कर ले।

    भारतीय संस्कृति के सम्पर्क में जो भी नवीन तत्त्व आते गए, भारतीय संस्कृति उन्हें विवेकपूर्ण चिंतन के साथ आत्मसात् करती गई। बाह्य दृष्टि से भारतीय संस्कृति निषेधात्मक और पृथकत्व-प्रिय दिखाई देती है परन्तु यदि इसमें ग्रहणशीलता नहीं होती तो वह संभवतः बहुत पहले ही, अन्य संस्कृतियों की तरह विलुप्त हो गई होती। विभिन्न काल खण्डों में चीन, मंगोलिया, ईरान, यूनान, अरब, फ्रांस, हॉलैण्ड, पुर्तगाल तथा इंग्लैण्ड आदि देशों से सैनिक आक्रांता, धर्म प्रचारक तथा व्यापारी अपनी-अपनी संस्कृतियों को लेकर भारत में आए और उन्होंने जन-धन, शस्त्र एवं शास्त्र के बल पर भारतीय समाज एवं संस्कृति को बदलने का भरपूर प्रयास किया किंतु वे भारतीय संस्कृति को नष्ट नहीं कर सके।

    शक, कुषाण तथा हूण आदि तो भारतीय संस्कृति में ही समा गए। तुर्क और मंगोल अपनी विकसित संस्कृति लेकर आए। उन्होंने हमारी भाषा, धर्म तथा नीति-विधान को अत्यधिक प्रभावित किया जिसे भारतीय संस्कृति ने स्वीकार कर लिया किंतु तुर्क एवं मंगोल भी भारतीय संस्कृति को नष्ट नहीं कर सके। भारतीय ज्योतिष विज्ञान, खगोल विज्ञान तथा चिकित्सा विज्ञान, यूनानी, इस्लामी और ईसाई प्रभाव से समृद्ध हुआ है। भारतीय भाषाओं के शब्दकोषों पर भी विदेशी भाषाओं का बहुत प्रभाव है।

    भारत में आज संसार की बहुत सी संस्कृतियों के धार्मिक विश्वास और रहन-सहन के ढंग मिलते हैं तथा विभिन्न प्रकार की पूजा-पद्धतियाँ प्रचलित हैं। प्राचीनकाल के वेद, कपिल मुनि के सांख्य और चार्वाक के निरीश्वरवाद से लेकर आधुनिक युग के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद तक की विभिन्न विचारधाराएँ और दर्शन भारत के विभिन्न समुदायों में प्रचलित हैं। विवाह सात जन्मों के बंधन में बांधने वाला पवित्र संस्कार भी है तो इच्छा मात्र से तोड़ा जाने वाला भौतिक सम्बन्ध भी।

    (6.) व्यक्ति के सर्वांगीण विकास से समष्टि का विकास

    भारतीय संस्कृति का आधारभूत विचार 'व्यक्ति के सर्वांगीण विकास से समष्टि का विकास' करना है। सर्वांगीण विकास का लक्ष्य 'दैहिक, दैविक और भौतिक' उन्नति करना है। भारतीय संस्कृति में प्रत्येक व्यक्ति के लिए चार पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष बताए गए हैं। इनकी प्राप्ति के लिए आश्रम व्यवस्था की स्थापना की गई। ब्रह्मचर्य और गृहस्थ आश्रम पहले तीन पुरुषार्थों को प्राप्त करने के लिए थे जबकि वानप्रस्थ एवं सन्यास आश्रम में मोक्ष प्राप्ति का प्रयत्न किया जाता था।

    इस प्रकार भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिक और भौतिक दोनों तत्त्वों पर समान रूप से बल दिया गया है। मनुष्य को चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का प्रयत्न समान रूप से करना चाहिए। धर्म का अनुसरण करके 'अर्थ' की उपलब्धि करने, धर्मानुसार 'काम' का सेवन करने और 'मोक्ष' को अन्तिम लक्ष्य बनाकर कर्म करने से मनुष्य अपना सर्वांगीण विकास कर सकता है।

    यह तभी संभव है जब प्रत्येक व्यक्ति की शारीरिक, आर्थिक, मानसिक और आध्यात्मिक शक्तियों का विकास हो। 'नहीं दरिद्र सम दुःख जग मांहि.....। लोक लाह परलोक निबाहू........। पराधीन, सपनेहुं सुख नांहि.....। दैहिक दैविक भौतिक तापा, रामराज नहीं काहुहि व्यापा।। रामराज बैठे त्रैलोका, हर्षित भए गए सब सोका।। नहीं दरिद्र कोई दुःखी न दीना.... आदि संदेश देने वाला भारतीय साहित्य मनुष्य मात्र को यह संदेश देता है कि वह अपना सर्वांगीण विकास करे। वह सद्कर्मों के माध्यम से इस लोक में भी उपलब्धियां अर्जित करे तथा मृत्यु के बाद प्राप्त होने वाले परलोक को भी सुधारे। इस प्रकार सम्पूर्ण भारतीय साहित्य इस विचार पर खड़ा है कि मनुष्य मात्र के सर्वांगीण विकास से ही सम्पूर्ण समाज का विकास संभव है। इसी को व्यक्ति से समष्टि का विकास कहा जाता है।

    (7.) जीवन शैली का सहज प्रवाह

    भारतीय संस्कृति किसी विशेष धर्म, विशेष पुस्तक, विशेष वेशभूषा या विशेष धार्मिक नेता द्वारा बताए गए सिद्धांतों की कठोर कारा में कैद नहीं है। यद्यपि हिन्दू-धर्म भारतीय संस्कृति का मुख्य अंग है तथापि हिंदू धर्म का दायरा बहुत विस्तृत होने से भारतीय संस्कृति किसी विशेष प्रकार की पूजा-पद्धति तक ही सीमित नहीं है। हिन्दू-धर्म बहुव्यापी, उदार एवं मानव मन में सहज प्रवाहित होने वाली जीवन शैली के रूप में प्रकट हुआ है तथा इसकी यह उदारता एवं व्यापकता आज भी बनी हुई है।

    प्राचीनतम वैदिक धर्म से लेकर पश्चवर्ती पौराणिक धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म, ब्राह्मण धर्म, भागवत् धर्म, वैष्णव सम्प्रदाय, शैव सम्प्रदाय, शाक्त सम्प्रदाय, कबीर पंथी, दादू पंथी, सतनामी, सिक्ख धर्म आदि ना-ना प्रकार के मत-मतांतर इसी धर्म की विभिन्न शाखाएं हैं। इनमें से जो भी मत या मतांतर स्वयं को हिन्दू-धर्म के भीतर माने या बाहर, उसे ऐसा करने की पूरी स्वतंत्रता है। इसलिए कहा जाता है कि हिन्दू कोई धर्म नहीं है, जीवन पद्धति है।

    हिन्दू-धर्म के लोग मंदिर से लेकर बौद्ध मठ, जैन उपाश्रय, सिक्खों के गुरुद्वारे, कबीर पंथियों के आश्रम, दादू पंथियों के दादूद्वारे तक में बड़ी सहजता से आता-जाता है। हिन्दू मंदिरों में भी किसी भी मत-मतांतर के व्यक्ति को सहज रूप से आने-जाने की छूट है। हिन्दू-धर्म के भीतर वेद, पुराण, रामायण, महाभारत, रामचरित मानस, विविध पुराण, सत्यार्थ प्रकाश, भगवद्गीता आदि किसी भी ग्रंथ को धार्मिक पुस्तक के रूप में पढ़ने की छूट है।

    जनेऊ पहनने या नहीं पहनने; मुण्डन करवाने या नहीं करवाने; गंगाजी नहाने या नहीं नहाने, मूर्ति-पूजा करने या नहीं करने, मंदिर में जाने या नहीं करने, रातिजगा करने या नहीं करने, व्रत करने या नहीं करने, यज्ञ करने या नहीं करने, श्राद्ध करने या नहीं करने तथा विभिन्न कर्मकाण्डों को करने या नहीं करने की पूरी छूट है। आदमी को जो अच्छा लगे उसकी इच्छा पर निर्भर है किसी पर भी धर्म की ओर से कोई पाबंदी नहीं है।

    (7.) विश्वकल्याण की भावना

    विश्वभर की मानव संस्कृतियों में विश्वकल्याण की भावना का प्राकट्य सबसे पहले भारतीय संस्कृति में ही देखा जा सकता है। वेदों में ऐसी अनेक उक्तियां आई हैं जिनमें विश्वमंगल एवं प्राणी मात्र के कल्याण की कामना की गई है।


    सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।

    सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखाभाग्भवेत्।।

    अर्थात् समस्त मनुष्य सुखी होवें, समस्त रोगमुक्त रहें, समस्त मनुष्य मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी भी मनुष्य को दुःख का भागी न बनना पड़े।


    अयं निः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।

    उदारचरितानाम् तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।

    अर्थात् यह मेरा है, यह उसका है, ऐसी गणनावृत्ति संकुचित चित्त वाले व्यक्तियों की होती है। इसके विपरीत उदारचरित वाले लोगों के लिए तो यह सम्पूर्ण धरती ही एक परिवार जैसी होती है।


    आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।

    अर्थात् जब सारा विश्व ही आत्मीय है तब कोई भी अपने लिए अनुचित माना जाने वाला आचरण दूसरों के प्रति क्यों करे?

    भारतीयों में व्याप्त विश्वमंगल की इसी कामना के कारण आज तक भारतवासियों ने किसी अन्य देश पर आक्रमण नहीं किया। अपितु भारतीय ऋषि-मुनि एवं भिक्षु विश्व-शांति एवं प्राणी मात्र को सुखी बनाने का संदेश लेकर विश्व के अन्य देशों एवं दूरस्थ द्वीपों में गए।

    यही कारण है कि यदि भारत भूमि पर उत्पन्न धर्मों अर्थात् हिन्दू-धर्म, बौद्ध धर्म, जैन-धर्म एवं सिक्ख धर्म के अनुयाइयों की संख्या पर विचार किया जाए तो आज विश्व भर में निवास कर रहे मानवों की लगभग आधी संख्या इन्हीं धर्मों के भीतर स्थित है।

    भारतीय संस्कृति में एकता के तत्त्व

    भारत वर्ष के भौगोलिक विस्तार, जनसंख्या प्रसार, सांस्कृतिक वैविध्य, भाषाई बहुलता, क्षेत्रीय पहचान, वेषभूषा के अंतर तथा राजनीतिक विश्ृंखलता आदि तत्त्वों के कारण अधिकांश पाश्चात्य विद्वानों ने यह मान्यता बनाई है कि भारत एक राष्ट्र नहीं है और न कभी अतीत में रहा है। उनकी दृष्टि में विशाल भारत छोटे-छोटे राज्यों का 'समूह' अथवा 'संघ' मात्र है। अनेक विदेशी विद्वानों ने भारत को जातियों, भाषाओं, मत-मतान्तरों, संस्कृतियों और रीति-रिवाजों का अजायबघर कहकर पुकारा है जबकि इस कथन में रंचमात्र भी सच्चाई नहीं है।

    भारत सदियों से एक विशाल देश रहा है और अपनी विशालता के कारण यह कई प्रकार की विशिष्टताओं एवं जटिलताओं से परिपूर्ण है। भारतीय संस्कृति में जिस प्रकार की जातीय आधारित संरचना दिखाई देती है, वह विश्व की किसी अन्य संस्कृति में उपलब्ध नहीं है। देश में निवास करने वाले अनेकानेक समुदायों में अलग-अलग प्रकार के रीति-रिवाज और विधि-विधान प्रचलित हैं किंतु इनमें बाह्य भिन्नता दिखाई देते हुए भी आंतरिक 'ऐक्य' मौजूद है।

    (1.) भौगोलिक एकता

    यद्यपि हिमालय से लेकर हिन्द महासागर तक विस्तृत विशाल भारत देश में अनेक पर्वत, पठार, मैदान एवं भू-प्रदेश स्थित हैं तथा उनमें अलग-अलग जलवायु, जीव-जन्तु एवं वनस्पतियाँ विद्यमान हैं, तथापि प्रकृति ने इसे एक भौगोलिक इकाई बनाया था तथा एक देश के रूप में संगठित किया था। प्राचीन काल में हजारों वर्षों तक उत्तर में स्थित हिन्दुकुश पर्वत से लेकर पूर्व में स्थित बंगाल की खाड़ी तक इसकी प्राकृतिक सीमा थी किंतु राजनीतिक विभाजनों ने इस देश की भौगोलिक एकता को भंग कर दिया।

    फिर भी वर्तमान समय में उत्तर में स्थित हिमालय की दुर्गम चोटियां इसकी उत्तरी सीमा का निर्माण करती हैं तथा शेष तीनों आरे से समुद्र ने इसे अच्छी तरह से घेर रखा है। यद्यपि उत्तर में स्थित चीन, नेपाल और भूटान की सीमाएं भारत की सीमाओं से प्राकृतिक आधार पर विभक्त नहीं की जा सकतीं तथापि हिमालय की ऊंची चोटियां उन देशों को भारत से सुस्पष्ट ढंग से अलग करती हैं। पूर्व में स्थित बांगलादेश भी यद्यपि प्राकृतिक रूप से भारत से अलग नहीं है किंतु भारत और बांगला देश का विभाजन प्राकृतिक नहीं है, राजनीतिक है।

    इसी प्रकार पश्चिम में स्थित पाकिस्तान भी ऐसा देश है जो केवल राजनीतिक रेखा के माध्यम से अलग है। भारत के दक्षिण में स्थित श्रीलंका भारत से समुद्र द्वारा स्पष्ट रूप से अलग हैं। अंग्र्रेज इतिहासकार स्मिथ के अनुसार 'भारत निःसन्देह एक स्वतंत्र भौगोलिक इकाई है, जिसका एक नाम होना सर्वथा ठीक ही है।' भारतीयों को प्राचीनकाल से ही इस भौगोलिक एकता का ज्ञान है।

    जिस समय से आर्य सभ्यता सम्पूर्ण देश में प्रसारित हो गई, तब से इस भौगोलिक एकता के चिह्न हमारे धार्मिक और लौकिक साहित्य में मिलते हैं। कात्यायन से आरम्भ होकर कोई ऐसा प्रसिद्ध कवि, आचार्य, नीतिकार और राजनीतिज्ञ नहीं हुआ जो भारत के किसी भाग को विदेश समझता हो। रामायण एवं महाभारत में सम्पूर्ण देश का नामकरण 'भारतवर्ष' ही किया गया है। विष्णु-पुराण में बताया गया है कि समुद्र के उत्तर और हिमालय के दक्षिण का सारा प्रदेश 'भारत' है और उसके निवासी भारत की सन्तान है।

    (2.) राजनीतिक एकता

    कुछ विद्वानों के अनुसार यह देश केवल अंग्रेजी शासन के अन्तर्गत ही एक-सूत्र में बँध सका, इससे पूर्व नहीं। यह कथन ऐतिहासिक दृष्टि से सही नहीं है। यद्यपि प्राचीनकाल में देश की विशालता के ाकरण और यातायात के साधनों के अभाव के कारण पूर्ण राजनीतिक-एकता स्थापित नहीं हो सकी परन्तु प्राचीन भारतवासी, देश में राजनीतिक एकता, केन्द्रीय सत्ता के आदर्श एवं प्रांतीय शासन संस्थाओं से भली-भाँति परिचित थे। महत्त्वाकांक्षी हिन्दू नरेश दिग्विजय करके चक्रवर्ती सम्राट बनने का प्रयास करते थे।

    प्रतापी नरेश अपने साम्राज्य का विस्तार करके अपनी सार्वभौमिक प्रतिष्ठा के लिए राजसूय, अश्वमेध, वाजपेय आदि यज्ञ करते थे। मगध के नन्द, मौर्य और गुप्त सम्राटों ने उत्तर-दक्षिण तथा पूर्व-पश्चिम के विशाल भू-भागों को अपने अधीन करके देश में एक केन्द्रीय शासन व्यवस्था बनाए रखी। दिल्ली सल्तनत एवं मुगलों के शासन काल भी देश का अधिकांश भू-भाग एक केन्द्रीय राजनीतिक व्यवस्था के अधीन रहा। ब्रिटिश काल में भारत की राजनीतिक एकता और अधिक दृढ़ हो गयी जिसने भारतवासियों में राष्ट्रीय भावना का नए सिरे से उदय किया।

    इसी राष्ट्रीय भावना से प्रेरित होकर भारत देश के विभिन्न प्रान्तों में निवास करने वाले स्त्री-पुरुषों ने राजनीतिक एवं सामजिक संगठन बनाए तथा राष्ट्रीय संस्थाओं के झण्डे के नीचे एकत्रित होकर राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलनों में भाग लिया। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद सम्पूर्ण देश में एक जैसी राजनीतिक, आर्थिक एवं शासन व्यवस्था लागू की गई।

    (3.) आध्यात्मिक एकता

    भारत के विभिन्न प्रांतों में आदि काल से अनेक प्रकार के धार्मिक विचारों, अनेक प्रकार की भाषाओं, अनेक प्रकार की वेषभूषाओं एवं सैंकड़ों जातियों के विद्यमान होने पर भी भारत की सांस्कृतिक एकता प्राचीनकाल से मौजूद रही है। भारतीय संस्कृति विविध सम्प्रदायों तथा जातियों के आचार-विचार, विश्वास और आध्यात्मिक साधनाओं का समन्वय है। यह संस्कृति वैदिक, बौद्ध, जैन, हिन्दू, मुस्लिम और आधुनिक संस्कृतियों के सम्मिश्रण से बनी है।

    भारत भूमि पर उत्पन्न हुए विभिन्न धार्मिक मतों एवं सम्प्रदायों के दार्शनिक और नैतिक सिद्धान्तों में मूलभूत साम्य है। निष्काम भक्ति, अष्टांग योग, एकेश्वरवाद, आत्मा का अमरत्व, कर्मफल सिद्धांत, पुनर्जन्म की अवधारणा, मोक्ष अथवा निर्वाण की अवधारणा आदि तत्त्व प्रायः समस्त धर्मों की निधि हैं। धार्मिक कर्मकाण्डों और संस्कारों में भी बहुत समानता हैं। यम, नियम, शील, तप और सदाचार पर समस्त सम्प्रदाय जोर देेते हैं।

    ऋषि-मुनियों, सन्त-महात्माओं और महापुरुषों का सम्मान, बिना किसी भेदभाव के सर्वत्र होता है। समस्त सम्प्रदायों के तीर्थस्थान, पवित्र नदियाँ और पर्वत सम्पूर्ण भारत में फैले हुए हैं। यही सांस्कृतिक एकता एवं अखण्डता का सबल प्रमाण है। भारत को आध्यात्मिक एकता के सूत्र में बांधने के प्रयास रामायण काल से ही होने लगे थे। जब कोई राजा चक्रवर्ती पद प्राप्त करता था अथवा अश्वमेध जैसे बड़े यज्ञ करता था तो उसके अभिषेक के लिए देश भर के तीर्थों से जल मंगवाया जाता था।

    अयोध्या के राजा श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करने से पहले दक्षिण भारत में शिवलिंग की स्थापना की। आज भी वह स्थान रामेश्वरम् के नाम से प्रसिद्ध है तथा भारत भर से श्रद्धालु रामेश्वरम् जाकर जल चढ़ाते हैं। भारत के विभिन्न भागों में द्वादशज्योतिर्लिंगों की स्थापना की गई ताकि लोग इनके दर्शनार्थ सम्पूर्ण भारत का भ्रमण करें और उन्हें राष्ट्र की सांस्कृतिक एकता का भान हो। प्रत्येक भारतीय अपने जीवन में कम से कम एक बार इन द्वादश ज्योतिर्लिंगों के दर्शन अवश्य करना चाहता है, इससे उनमें राष्ट्र की सांस्कृतिक एकता का भाव स्वतः स्फूर्त होता है क्योंकि इनके दर्शनों के लिए किसी भी व्यक्ति को सम्पूर्ण भारत का भ्रमण करना होता है।

    भारतीय धर्मग्रंथों में बद्रीनाथ, द्वारका, जगन्नाथ पुरी और रामेश्वरम की चर्चा चार धामों के रूप में की गई है। देश भर में रहने वाले हिन्दू अपने जीवन में कम से कम एक बार इन धामों की यात्रा रकना चाहते हैं। आदि शंकराचार्य ने आठवीं शताब्दी ईस्वी में भारत की चारों दिशाओं में एक-एक मठ की स्थापना की ताकि भारत की आध्यात्मिक एकता को अक्षुण्ण रखा जा सके-

    (1.) दक्षिण भारत में स्थित रामेश्वरम् में वेदांतज्ञान मठ।

    (2.) पूर्वी भारत में स्थित जगन्नाथ पुरी में गोवर्धन मठ।

    (3.) पश्चिमी भारत में स्थित द्वारकापुरी में शारदा मठ (कालिका)।

    (4.) उत्तरी भारत में बद्रीनाथ में स्थित ज्योतिर्मठ। भारतीय प्रतिदिन स्नान करते समय विभिन्न नदियों का स्मरण करते हैं- गंगे! च यमुने! चैव गोदावरी! सरस्वति! नर्मदे! सिंधु! कावेरि! जलेैस्मिन् सन्निधिं कुरु।।

    (4.) रीति-रिवाजों की एकता

    रीति-रिवाजों के मामले में हिन्दू, जैन, बौद्ध, सिक्ख आदि विभिन्न भारतीय सम्प्रदाय एक जैसे हैं। उत्तर एवं दक्षिण भारत के निवासियों के रीति-रिवाजों में बाह्य रूप से भले ही अंतर दिखता हो किंतु उनकी मूल आत्मा एक है। यहाँ तक कि भारत तथा उससे अलग हुए देशों के मुसलमान अपने विचारों और रीति-रिवाजों की दृष्टि से तुर्की तथा अरब देशों के मुसलमानों की अपेक्षा भारतीय हिन्दुओं के अधिक निकट हैं।

    आधुनिक पारसी गुजराती बोलते हैं, उनके शादी-ब्याह के रीति-रिवाज और नीति-विधान भारतीय है। भारत के ईसाई तथा मुसलमान जिस प्रांत में रहते हैं, वे उसी प्रांत की भाषा बोलते हैं। हिन्दुओं एवं मुसलमानों के शादी-विवाह का ढंग हिन्दुओं के सात-फेरों और मुसलमानों के निकाह पढ़ने के अतिरिक्त समस्त मामलों में लगभग एक जैसा है। बहुत से हिन्दू जो मध्य-काल में मुसलमान बन गए थे, आज भी अपने घरों में हिन्दू-जीवन-शैली का पालन करते हैं।

    हिन्दुओं की संस्कृति पर भी मुसलमानों के बहुत से रीति-रिवाजों का प्रभाव पड़ा है। दूल्हे के मुंह पर फूलों का सेहरा बांधना, हिन्दू रीति-रिवाजों का अंग बन गया है जबकि यह मुस्लिम संस्कृति का अंग था। यद्यपि आज का भारतीय समाज आर्य, द्रविड़़ सीथियन, हूण, तुर्क, पठान, मंगोल आदि देशी-विदेशी जातियों के सम्मिश्रण से बना है तथापि उनके खान-पान, शिष्टाचार, मनोरंजन, आमोद-प्रमोद, पर्व, उत्सव, मेले आदि में काफी-कुछ समानता है।

    (5.) साहित्य की एकता

    भारतीय साहित्य एवं कला के विषय समस्त प्रान्तों में एक जैसे रहे हैं, यथा- धार्मिक भावना, नैतिक भावना, रहस्यानुभूति तथा प्रतीकात्मकता आदि। साहित्य एवं कला के आधार- कथावस्तु, चरित्र-चित्रण, अलंकार, रस आदि समस्त जगह समान हैं। वेद, उपनिषद, गीता, रामायण, महाभारत, पुराण, स्मृति, बौद्ध एवं जैन साहित्य समस्त भारत में समान रूप से प्रेरणा के स्रोत रहे हैं।

    संस्कृत वांगमय में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को मनुष्य के चार पुरुषार्थ बताया गया है। छठी शताब्दी ईस्वी में तमिल भाषा में तिरुवल्लुवर द्वारा रचित तिरुक्कुरुल में तीन अध्याय हैं जिनके शीर्षक क्रमशः धर्म, अर्थ एवं काम हैं। जिस प्रकार संस्कृत वांगमय की धार्मिक रचनाओं के प्रारम्भ में मंगलाचरण एवं देवस्तुति की परम्परा है, ठीक उसी तरह इस ग्रंथ के प्रारम्भ में भी ईशस्तुति की गई है।

    (6.) कलाओं की एकता

    देश भर में स्थित कला-स्मारकों में प्रान्तीय विशेषताएं होते हुए भी स्थापत्य, मूर्तिकला, चित्रकला, संगीत और रंगमंच आदि में भारतीयता ही दिखाई देती है। अजन्ता, एलोरा, विदिशा उदयगिरी, बोधगया के चैत्य एवं विहार तथा सारनाथ, साँची, भरहुत, अमरावती, मथुरा, गया आदि स्थानों के विहार तथा स्तूप भारत को एक ही धार्मिक भावना से प्रेरित सिद्ध करते हैं।

    अंतर केवल इतना है कि हिन्दुओं के स्थापत्य एवं विविध प्रकार की ललितकलाओं में हिन्दू देवी-देवताओं को प्रमुखता दी गई है, बौद्धों के स्थापत्य एवं ललितकलाओं में भगवान बुद्ध एवं अन्य बौद्ध देवी-देवताओं को प्रमुखता दी गई है। जैनों के स्थापत्य एवं विविध प्रकार की ललितकलाओं में जैन तीर्थंकरों एवं जैन देवी-देवताओं को प्रमुखता दी गई है।

    (7.) भाषाई एकता

    भारतीयों की मान्यता है कि उन्हें भाषा का ज्ञान देवताओं ने करवाया। देवताओं की भाषा 'संस्कृत' थी। इसलिए भारतीय आज भी 'संस्कृत' को 'देवभाषा' कहते हैं। प्राचीन आर्यों द्वारा मौखिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाए गए वेदों की भाषा भी संस्कृत थी। इसलिए भारत में सांस्कृतिक विचारों का आदान-प्रदान संस्कृत भाषा के माध्यम से ही आरम्भ हुआ तथा संस्कृत भाषा में अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना हुई।

    रामायण, महाभारत, उपनिषद, गीता एवं पुराण भी संस्कृत में लिखे गए। यद्यपि प्रारम्भिक जैन एवं बौद्ध मतावलम्बियों ने प्राचीन वैदिक संस्कृति से विद्रोह करके अपने-अपने दर्शनों का प्रसार किया था इसलिए बौद्धों ने प्राकृत और जैनों ने पालि भाषा को अपने उपदेशों का मुख्य माध्यम बनाया किंतु बौद्धिक प्रतिस्पर्द्धा की दृष्टि से उन्हें भी बाद में संस्कृत भाषा को ही अपनाना पड़ा। राजनैतिक अध्ययन एवं शासन तंत्र में भी संस्कृत भाषा का प्रयोग होता था। अतः यह अन्तर-प्रान्तीय उपयोग की भाषा बन गई।

    मध्य-युग तक इसका खूब प्रचार रहा तथा इस काल में भी अनेक प्रसिद्ध ग्रन्थ संस्कृत में लिखे गए। हिन्दी तथा देश की विविध प्रान्तीय भाषाओं यथा- मराठी, गुजराती, बंगला, पंजाबी, तमिल, तेलुगू आदि का मूल स्रोत भी संस्कृत है। इनकी शब्दावली पर संस्कृत का ही अधिक प्रभाव है। इन समस्त भाषाओं के साहित्य में भी समानता है, क्योंकि उनके प्रेरणा के मूल स्रोत रामायण, महाभारत एवं पुराणों की कथाएँ, उनके नायकों के जीवन चरित्र, देवी-देवताओं के वृत्तान्त ही रहे हैं।

    इस प्रकार संस्कृत ने प्रान्त, जाति, सम्प्रदाय और बोली आदि का अतिक्रमण करके भारतीयों को एक सांस्कृतिक सूत्र में पिरोया। तुर्कों एवं मुगलों के काल में जब देश में तुर्की एवं फारसी का प्रचार हुआ तो हिन्दी सहित समस्त प्रांतीय भाषाओं में तुर्की एवं फारसी शब्दों का प्रवेश हो गया। अतः निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि क्षेत्र, भाषा, धर्म एवं जाति के आधार पर भारतीय संस्कृति में भले ही अलग-अलग प्रकार के तत्त्व दिखाई देते हों किंतु उन सबका आत्म-तत्त्व एक ही है और वह केवल भारतीयता है, भारतीयता के अतिरिक्त और कुछ नहीं।

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  • संक्षिप्त जीवन वृत्तांत - श्री भैरोंसिंह शेखावत

     02.06.2020
    संक्षिप्त जीवन वृत्तांत - श्री भैरोंसिंह शेखावत

    संक्षिप्त जीवन वृत्तांत - श्री भैरोंसिंह शेखावत 

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    नाम
    - श्री भैरोंसिंह शेखावत

    जन्म - 23 अक्टूबर 1923

    पिता का नाम - श्री देवीसिंह शेखावत

    माता का नाम - श्रीमती बन्नेकंवर

    गांव - खाचरियावास (सीकर जिला)

    ननिहाल - सहनाली बड़ी गांव (चूरू जिला)

    प्रारंभिक शिक्षा - बीछीदाना गांव में (सीकर जिला)

    हाईस्कूल शिक्षा - एंग्लोवैदिक स्कूल जोबनेर

    विवाह - 3 जुलाई 1941

    पत्नी का नाम - श्रीमती सूरजकंवर

    ससुराल - बुचकला (जोधपुर जिला)

    पिता का निधन - ई.1942

    नौकरी - ई.1942 से 1952

    पद - सीकर ठिकाणे की पुलिस में असिस्टेण्ट सब इंसपैक्टर

    राजनीति में प्रवेश - ई.1952

    पहली बार विधायक - ई.1952 में जनसंघ के टिकट पर दांतारामगढ़ सीट से।

    दूसरी बार विधायक - ई.1957 में जनसंघ के टिकट पर श्रीमाधोपुर सीट से।

    तीसरी बार विधयक - ई.1962 में जनसंघ के टिकट पर किशनपोल सीट से।

    चौथी बार विधायक - ई.1967 में जनसंघ के टिकट पर किशनपोल सीट से।

    राज्यसभा सदस्य - ई.1974 से 1977 तक जनसंघ के टिकट पर मध्यप्रदेश

    पांचवीं बार विधायक - ई.1977 में जनता पार्टी के टिकट पर छबड़ा सीट से।

    पहली बार मुख्यमंत्री - 22 जून 1977 से 15 फरवरी 1980

    छठी बार विधायक - ई.1980 में भाजपा के टिकट पर छबड़ा सीट से।

    पहली बार नेता प्रतिपक्ष - 15 जुलाई 1980 से 10 मार्च 1985

    सातवीं बार विधायक - ई.1985 में भाजपा के टिकट पर निंबाहेड़ा तथा अजमेर

    दूसरी बार नेता प्रतिपक्ष - 28 मार्च 1985 से 30 दिसम्बर 1989

    आठवीं बार विधायक -  ई.1990 में भाजपा के टिकट पर धौलपुर तथा छबड़ा 
    सीट से। बाद में अजमेर सीट छोड़ दी।

    दूसरी बार मुख्यमंत्री - 4 मार्च 1990 से 15 दिसम्बर 1992

    नौवीं बार विधायक - ई.1993 में भाजपा के टिकट पर बाली सीट से।

    तीसरी बार मुख्यमंत्री - 4 दिसम्बर 1993 से 31 दिसम्बर 1998

    दसवीं बार विधायक - ई.1998 में भाजपा के टिकट पर बाली सीट से।

    तीसरी बार नेता प्रतिपक्ष - 8 जनवरी 1999 से 18 अगस्त 2002

    भारत के 11वें उपराष्ट्रपति -19 अगस्त 2002 से 21 जुलाई 2007

    निधन - 15 मई 2010, जयपुर।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-33

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-33

    पक्षी प्रेम की मिसाल है खीचण


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    जोधपुर जिले में फलौदी के निकट खीचण गांव में कुरजां (कुरजां) पक्षियों के झुण्ड प्रति वर्ष प्रवास करने आते हैं। यहाँ नदी, झील अथवा चारागाह जैसी कोई सुविधा नहीं है। प्राकृतिक आवास के नाम पर केवल एक छोटा तालाब, रेत के धोरे और कंकरीला मैदान स्थित हैं। फिर भी ये पक्षी सदियों से इस गांव में आ रहे हैं। कुरजां पक्षी, सारस प्रजाति का सदस्य है जिसे अंग्रेजी में 'डेमोजल क्रेन' कहते हैं। शीतकाल में जब उत्तरी रूस, उक्रेन तथा कजाकिस्तान में बर्फ जमने लगती है तो वहाँ निवास करने वाले हजारों-लाखों कुरजां पक्षी पश्चिमी भारत में स्थित राजस्थान तथा गुजरात राज्यों के लिये उड़ जाते हैं।

    सितम्बर-अक्टूबर में कुरजां पक्षियों के झुण्ड पश्चिमी राजस्थान के छह जिलों के सत्रह स्थानों पर पड़ाव डालते हैं। इनमें से पन्द्रह से बीस हजार कुरजां खीचण गांव में आकर बसेरा करते हैं। इन पक्षियों के झुण्ड गांव के पूर्व की तरफ बने तालाब के पेटे में उतरते रहते हैं। ग्रामीणों द्वारा गांव के पश्चिम में बनाये गये चुग्गाघर का गोदाम अनाज से भर दिया जाता है। कुरजां को हिंसक पशुओं से बचाने के लिये ग्रामीणों ने तारबंदी युक्त बाड़ा बनाया है। इस गांव में कुरजां को नवम्बर से फरवरी के बीच 90 मैट्रिक टन अनाज चुग्गे के रूप में डाला जाता है।

    खींचन गांव में आने वाली कुरजांओं से खींचन के निवासियों ने काव्यमय संवाद स्थापित कर लिये हैं-


    भर मुट्ठी दूं रोज कै, कुरजां थानैं जवार।

    चुगनैं मती विसारजै, ओ खींचन को प्यार।।

    आती संदेसो देसस्यूं, जाती थकै ले जाऊँ।

    बाट जोइजै गोरड़ी, पर बरस पाछी आऊँ।

    उड़ती कठां सूं आई तूं, अर उड़र जावै कठै।

    बारों मास लड़ावस्यां, रेहजा कुरजां अठै।

    आ निरख्योड़ी कांकरी, वा धोरां री रेत।

    पाछी बेगी आवस्यूं, थांसूं पड़ग्यो हेत।

    सूती थी रंग महल में, सूतोड़ी नै आयो रे जंजाल।

    कुरजां ए म्हारो भंवर मिला दीजौ ऐ।

    खींचन में आई कुरजाओं का विवरण

    वर्ष 1983 से 1999 की अवधि में खींचन में आने वाली कुरजाओं का अभिलेख रखा गया। वर्तमान में खींचन में प्रतिवर्ष लगभग 20 हजार कुरजाएं आती हैं।

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  • अध्याय - 3 भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के इतिहास को जानने के साधन

     02.06.2020
    अध्याय - 3 भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के  इतिहास को जानने के साधन

    भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के इतिहास को जानने के साधन


    लोकांचल में बहुत पहले से ही संख्या, लिपि, गणना, धातुतन्त्र, आदि शास्त्र प्रचलित रहे हैं और ऐसे ही अप्रमेय शिल्पयोग लोकानुबन्धी हैं और बहुत कोटि कल्पों से इनकी शिक्षा पाई जाती है। - ललितविस्तर, 10, 297.


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    सभ्यता एवं संस्कृतियां जब विकास करती हैं तो उनके आरम्भिक चरण में मानव को भाषा, लिपि, लेखनकला, चित्रकला एवं मूर्तिकला आदि का ज्ञान नहीं होता। इसलिए उस काल का इतिहास जुटाने में भौतिक अवशेषों का सहारा लेना पड़ता है। उदाहरण के लिए अण्डमान निकोबार के एक आदिवासी समुदाय की बस्ती के बाहर स्थित टीलों की खुदाई करके पता लगाया जा सकता है कि उस टीले में मछलियों की हड्डियां, नारियल के कड़े छिलके, कछुओं के खोल, बड़े पशुओं की हड्डियां एक के ऊपर एक कितने स्तरों में दबे हुए हैं? वे कितने पुराने हैं? विभिन्न स्तरों में जमा मछलियों एवं नारियलों को छीलने के लिए किस सामग्री अथवा विधि का प्रयोग किया गया था?

    इस सामग्री के अध्ययन से न केवल उस टीले में रहने वाले आदिवासियों की प्राचीनता का ज्ञान होता है अपितु विभिन्न कालखण्ड में उस कबीले की अनुमानित संख्या, खान-पान की आदतों एवं रहन-सहन के तौर तरीकों आदि का भी अनुमान हो जाता है। इसी प्रकार उस बस्ती के आसपास स्थित शवाधानों (कब्रों) की खोज करके उनके रीति-रिवाजों, परम्पराओं तथा उनके धार्मिक विचारों आदि का पता लगाया जा सकता है। उन शवों की हड्डियों की कार्बन डेटिंग से उनकी आयु तथा नृवंशविज्ञान के माध्यम से उन मृत मानवों की मूल नृवंशीय जाति का पता लगाया जा सकता है कि वे नीग्रेटो जाति के हैं या भूमध्यसागरीय द्रविड़ हैं या पश्चिमी ब्रेचीसेफल्स जाति के हैं।

    विश्व की अन्य सभ्यताओं की भांति प्राचीन भारतीयों ने भी अपने पीछे अनगिनत भौतिक अवशेष छोड़े हैं जिन्हें जोड़कर इतिहासकारों ने प्राचीन भारतीय इतिहास का निर्माण किया है। जब कोई सभ्यता मूर्तिकला, स्थापत्य कला तथा लेखन कला का विकास कर लेती है तब उस सभ्यता का इतिहास जानने के दो प्रमुख स्रोत उपलब्ध हो जाते हैं- (1.) साहित्यक स्रोत तथा (2.) पुरातात्विक स्रोत। इस अध्याय में हम भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के इतिहास को जानने के लिए इन दोनों स्रोतों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

    साहित्यिक स्रोत

    सभ्यता एवं संस्कृति के इतिहास को जानने के लिए उपलब्ध प्राचीन भारतीय साहित्यिक स्रोतों को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है-

    (1) भारतीय साहित्यिक स्रोत तथा (2) विदेशी विवरण।

    (1.) भारतीय साहित्यिक स्रोत

    भारतीयों को ई.पू. 2500 में लिपि की जानकारी हो चुकी थी परन्तु सबसे प्राचीन उपलब्ध हस्तलिपियाँ ईसा पूर्व चौथी सदी की हैं। ये हस्तलिपियाँ मध्य एशिया से प्राप्त हुई हैं। भारत में ये लिपियाँ भोजपत्रों और ताड़पत्रों पर लिखी गई हैं, परन्तु मध्य एशिया में जहाँ भारत की प्राकृत भाषा का प्रचार हो गया था, ये हस्तलिपियाँ मेष-चर्म तथा काष्ठ-पट्टियों पर भी लिखी गई हैं। इन्हें भले ही अभिलेख कहा जाता हो, परन्तु ये हस्तलिपियाँ ही हैं। चूँकि उस समय मुद्रण-कला का जन्म नहीं हुआ था इसलिए ये हस्तलिपियाँ अत्यधिक मूल्यवान समझी जाती थीं। समस्त भारत से संस्कृत की पुरानी हस्तलिपियाँ मिली हैं, परन्तु इनमें से अधिकतर हस्तलिपियाँ दक्षिण भारत, कश्मीर एवं नेपाल से प्राप्त हुई हैं। इस प्रकार के अधिकांश हस्तलिपि-लेख, संग्रहालयों और हस्तलिपि गं्रथालयों में सुरक्षित हैं। ये हस्तलिपियां प्राचीन इतिहास को जानने के प्रमुख स्रोत हैं।

    प्राचीन भारत के इतिहास को जानने के भारतीय साहित्यिक स्रोतों को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है- (अ.) धार्मिक ग्रन्थ (ब.) अन्य ग्रन्थ।

    (अ.) धार्मिक ग्रन्थ: यद्यपि अधिकांश प्राचीन भारतीय ग्रंथ, धार्मिक विषयों से सम्बन्धित हैं तथापि वेद, उपनिषद, ब्राह्मण, धर्मसूत्र, बौद्ध-साहित्य, जैन साहित्य आदि धार्मिक ग्रंथों में ऐतिहासिक तथ्य भी मिलते हैं। बिम्बसार के पहले के राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक इतिहास को जानने के लिए ये गं्रथ ही प्रमुख साधन हैं। इनमें धार्मिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक तथ्यों की प्रचुरता के साथ-साथ राजनैतिक तथ्य भी मिलते हैं।

    (प) हिन्दू-धर्म ग्रंथ: हिन्दुओं के धार्मिक साहित्य में वेदों, उपनिषदों, महाकाव्यों (रामायण और महाभारत) तथा पुराणों आदि का समावेश होता है। यह साहित्य, प्राचीन भारत की सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों पर काफी प्रकाश डालता है किंतु इनके देश-काल का पता लगाना काफी कठिन है।

    वैदिक साहित्य: ऋग्वेद सबसे प्राचीन वैदिक ग्रंथ है। इतिहासकार इसके रचनाकाल के बारे में एकमत नहीं हो सके हैं। जर्मन विद्वान याकोबी के अनुसार ऋग्वेद का रचनाकाल ई.पू.4500 से ई.पू. 3000 है तथा ब्राह्मणों का रचनाकाल ई.पू. 3000 से ई.पू. 2000 है। सुप्रसिद्ध लेखक पी. वी. काणे ने वेदों का रचना काल ई.पू.4000 से ई.पू.1000 माना है। कुछ विद्वान ऋग्वेद का रचनाकाल ई.पू.1500 से ई.पू.1000 के बीच की अवधि का मानते हैं। अथर्ववेद, यजुर्वेद, ब्राह्मण ग्रंथ और उपनिषदों को ई.पू.1000-500 के लगभग का माना जाता है। प्रायः समस्त वैदिक ग्रंथों में क्षेपक मिलते हैं जिन्हें सामान्यतः प्रारम्भ अथवा अंत में देखा जा सकता है। कहीं-कहीं ग्रंथ के बीच में भी क्षेपक मिलते हैं। ऋग्वेद में मुख्यतः प्रार्थनाएं मिलती हैं और बाद के वैदिक गं्रथों में प्रार्थनाओं के साथ-साथ कर्मकांडों, जादू टोनों और प्राचीन व्याख्यानों का समावेश मिलता है। उपनिषदों में दार्शनिक चिंतन प्रमुखता से मिलता है।

    पुराण: अधिकांश प्रमुख पुराणों की रचना ई.300 से ई.600 के बीच हुई। प्रमुख पुराण 18 हैं। इनमें विष्णु-पुराण, स्कन्द पुराण, हरिवंश पुराण, भागवत पुराण, गरुड़ पुराण आदि प्रमुख हैं। पुराणों से प्राचीन काल के राज-वंशों की वंशावली का पता चलता है। पुराण, चार युगों का उल्लेख करते हैं- कृतयुग (सत्युग), त्रेतायुग, द्वापर और कलियुग। बाद में आने वाले प्रत्येक युग को पहले के युग से अधिक निकृष्ट बताया गया है और यह भी बताया गया है कि एक युग के समाप्त होने पर जब नए युग का आरम्भ होता है तो नैतिक मूल्यों तथा सामाजिक मानदण्डों का अधःपतन होता है।

    महाकाव्य: वाल्मीकि कृत रामायण एवं वेदव्यास कृत महाभारत को महाकाव्य माना जाता है। डा. याकोबी ने रामायण की भाषा के आधार पर इसे ई.पू. 800 से ई.पू. 600 के बीच की रचना माना है। इसी प्रकार रामायण में मूलरूप से 12,000 श्लोक थे जो आगे चलकर 24,000 हो गए। इस महाकाव्य में भी उपदेश मिलते हैं जिन्हें बाद में जोड़ा गया है। अनुमान है कि रामायण का वर्तमान स्वरूप, महाभारत ग्रंथ की रचना के बहुत बाद में लिखा गया।

    महाभारत की रचना ई.पू. चौथी शताब्दी (मौर्यकाल) मानी जाती है। इसका वर्तमान स्वरूप चौथी शताब्दी ईस्वी (गुप्तकाल) में सामने आया। रामायण और महाभारत में ई.पू. दसवीं शताब्दी से ई.पू. चौथी शताब्दी तक की परिस्थितियों को चित्रित किया गया है। महाभारत में मूलरूप से 8,800 श्लोक थे और इसे यव संहिता कहा जाता था अर्थात् विजय सम्बन्धी संचयन। आगे चलकर इसमें 24,000 श्लोक हो गए और इसका नाम प्राचीन वैदिक कुल- 'भरत' के नाम पर भारत हो गया। अंत में श्लोकों की संख्या बढ़ कर एक लाख तक पहुँच गई और इसे महाभारत अथवा शतसह संहिता कहा जाने लगा। इसमें व्याख्यान, विवरण और उपदेश मिलते हैं। मुख्य व्याख्यान कौरव-पांडव संघर्ष का है जो उत्तर-वैदिक-काल का हो सकता है। विवरण वाला अंश उत्तर-वैदिक-काल का और उपदेशात्मक खण्ड उत्तर-मौर्य एवं गुप्तकाल का हो सकता है।

    उत्तर-वैदिक धार्मिक साहित्य: उत्तर-वैदिक-काल के धार्मिक साहित्य में कर्मकाण्ड की भरमार मिलती है। राजाओं और तीनों उच्च वर्णों के लिए किए जाने वाले यज्ञों के नियम, स्रोतसूत्र में मिलते हैं। राज्याभिषेक जैसे उत्सवों के विवरण भी इन्हीं में है। इसी प्रकार जन्म, नामकरण यज्ञोपवीत, विवाह, दाह आदि संस्कारों से सम्बद्ध कर्मकांड गृह्यसूत्र में मिलते हैं। स्रोतसूत्र और गृह्यसूत्र- दोनों ही लगभग ई.पू. 600-300 के हैं। शल्वसूत्र में बलि-वेदियों के निर्माण के लिए विभिन्न आकारों का नियोजन है। यहीं से ज्यामिति और गणित प्रारम्भ होते हैं।

    (पप) बौद्ध ग्रंथ: बौद्धों के धार्मिक गं्रथों में ऐतिहासिक व्यक्तियों तथा घटनाक्रमों की जानकारी मिलती है। प्राचीनतम बौद्ध ग्रंथ पालि भाषा में लिखे गए हैं, यह भाषा मगध यानी दक्षिणी बिहार में बोली जाती थी। इन ग्रंथों को ईसा पूर्व दूसरी सदी में श्रीलंका में संकलित किया गया। यह धार्मिक साहित्य बुद्ध के समय की परिस्थितियों की जानकारी देता है। इन ग्रंथों में हमें न केवल बुद्ध के जीवन के बारे में जानकारी मिलती है अपितु उनके समय के मगध, उत्तरी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ शासकों के बारे में भी जानकारी मिलती है। बौद्धों के गैर धार्मिक साहित्य में सबसे महत्त्वपूर्ण एवं रोचक हैं- 'गौतम बुद्ध के पूर्वजन्मों से सम्बन्धित कथाएँ।' माना जाता है कि गौतम के रूप में जन्म लेने से पहले बुद्ध, 550 से भी अधिक पूर्वजन्मों से गुजरे। इनमें से कई जन्मों में उन्होंने पशु-जीवन धारण किया। पूर्वजन्म की ये कथाएँ, जातक कथाएँ कहलाती हैं। प्रत्येक जातक कथा एक प्रकार की लोककथा है। ये जातक ईसा पूर्व पांचवी से दूसरी सदी तक की सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालते हैं। ये कथाएँ बुद्धकालीन राजनीतिक घटनाओं की भी जानकारी देती हैं।

    (पपप) जैन ग्रंथ: जैन ग्रंथों की रचना प्राकृत भाषा में हुई थी। इन्हें ईसा की छठी सदी में गुजरात के वल्लभी नगर में संकलित किया गया था। इन गं्रथों में ऐसे अनेक गं्रथ है जिनके आधार पर हमें महावीर कालीन बिहार तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास को समझने में सहायता मिलती है। जैन ग्रंथों में व्यापार एवं व्यापारियों के उल्लेख बहुतायत से मिलते हैं।

    (ब.) धर्मशास्त्र: धर्मसूत्र और स्मृतियों को सम्मिलित रूप से धर्मशास्त्र कहा जाता है। धर्मसूत्रों का संकलन ई.पू.600-ई.पू.200 में हुआ। प्रमुख स्मृतियों को ईसा की आरंभिक छः सदियों में विधिबद्ध किया गया। इनमें विभिन्न वर्णों, राजाओं तथा राज्याधिकारियों के अधिकारों का नियोजन है। इनमें संपत्ति के अधिकरण, विकल्प तथा उत्तराधिकार के नियम दिए गए हैं। इनमें चोरी, आक्रमण, हत्या, जारकर्म इत्यादि के लिए दण्ड-विधान की व्यवस्था है।

    (स.) अन्य ग्रन्थ: अर्थशास्त्र, हर्षचरित, राजतरंगिणी, दीपवंश, महावंश तथा बड़ी संख्या में उपलब्ध तमिल-ग्रंथों से भी ऐतिहासिक तथ्य प्राप्त होते हैं। कौटिल्य का अर्थशास्त्र एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विधि-गं्रथ है। इसमें मौर्य-वंश के इतिहास की जानकारी उपलब्ध होती है। यह ग्रंथ पन्द्रह अधिकरणों यानी खण्डों में विभक्त है। इनमें दूसरा और तीसरा अधिकरण अधिक प्राचीन है। अनुमान है कि इन अधिकरणों की रचना विभिन्न लेखकों ने की। इस ग्रंथ को ईस्वी सन् के आरंभकाल में वर्तमान रूप दिया गया।

    इसके सबसे पुराने अंश मौर्यकालीन समाज एवं अर्थतंत्र की दशा के परिचायक हैं। इसमें प्राचीन भारतीय राजतंत्र तथा अर्थव्यवस्था के अध्ययन के लिए महत्त्वपूर्ण सामग्री मिलती है। प्राचीन साहित्य में भास, कालीदास और बाणभट्ट की कृतियाँ उपलब्ध हैं। इनका साहित्यिक मूल्य तो है ही, इनमें कृतिकारों के समय की परिस्थितियाँ भी प्रतिध्वनित हुई हैं। कालीदास ने अनेक काव्यों और नाटकों की रचना की, जिनमें अभिज्ञान शाकुंतलम सबसे प्रसिद्ध है। कालीदास के इस महान् सर्जनात्मक कृतित्त्व में 'गुप्तकालीन मध्य-भारत' के सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन की भी झलक मिलती है।

    बाणभट्ट के हर्ष चरित से हर्ष के शासन-काल का तथा कल्हण की राजतरंगिणी से काशमीर के इतिहास का पता चलता है। दीपवंश तथा महावंश से श्रीलंका के इतिहास का पता चलता है।

    संगम साहित्य: संस्कृत ग्रंथों के साथ-साथ, प्राचीनतम तमिल ग्रंथ भी उपलब्ध हैं जिन्हें 'संगम साहित्य' कहा जाता है। राजाओं द्वारा संरक्षित विद्या-केन्द्रों में रहने वाले कवियों ने तीन-चार सदियों के काल में इस साहित्य का सृजन किया था। चूँकि ऐसी साहित्य सभाओं को संगम कहते थे, इसलिए यह सम्पूर्ण साहित्य, संगम साहित्य के नाम से जाना जाता है। यद्यपि इन कृतियों का संकलन ईसा की प्रारंभिक चार सदियों में हुआ, तथापि इनका अंतिम संकलन छठी सदी में होना अनुमानित है।

    ईसा की प्रारंभिक सदियों में तमिलनाडु के लोगों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन के अध्ययन के लिए संगम साहित्य एकमात्र प्रमुख स्रोत है। व्यापार और वाणिज्य के बारे में इससे जो जानकारी मिलती है, उसकी पुष्टि विदेशी विवरणों तथा पुरातात्त्विक प्रमाणों से भी होती है।

    चरित लेखन: चरित लेखन में भारतीयों ने ऐतिहासिक विवेक का परिचय दिया है। चरित लेखन का आरम्भ सातवीं सदी में बाणभट्ट के हर्षचरित के साथ हुआ। हर्षचरित अलंकृत शैली में लिखी गई एक अर्धचरित्रात्मक कृति है। बाद में इस शैली का अनुकरण करने वालों के लिए यह बोझिल बन गई। इस गं्रथ में हर्षवर्धन के आरंभिक कार्यकलापों का वर्णन है। यद्यपि इसमें अतिशयोक्ति की भरमार है, फिर भी इसमें हर्ष के राजदरबार की और हर्षकालीन सामाजिक एवं धार्मिक जीवन की अच्छी जानकारी मिलती है। इसके बाद कई चरित्र ग्रंथ लिखे गए।

    संध्याकर नंदी के रामचरित में पाल-शासक रामपाल और कैवर्त किसानों के बीच हुए संघर्ष का वर्णन है। इस संघर्ष में रामपाल की विजय हुई। बिल्हण ने विक्रमांकदेवचरित में अपने आश्रयदाता कल्याण के चालुक्य नरेश विक्रमादित्य षष्ठ (1076-1127 ई.) की उपलब्ध्यिों का वर्णन किया है। बारहवीं और तेरहवीं सदियों में गुजरात के कुछ व्यापारियों के चरित लिखे गए। बारहवीं सदी में रचित कल्हण की राजतरंगिणी ऐतिहासिक कृतित्त्व का सर्वोत्तम उदाहरण है। इसमें कश्मीर के राजाओं का क्रमबद्ध चरित प्रस्तुत किया गया हैै यह प्रथम कृति है जिसमें आधुनिक दृष्टि युक्त इतिहास की कई विशेषताएँ निहित हैं।

    (2.) विदेशी विवरण

    प्राचीन भारत के इतिहास निर्माण के लिए विदेशी विवरणों का भी उपयोग किया गया है। जिज्ञासु पर्यटक के रूप में अथवा भारतीय धर्म को स्वीकार करके तीर्थयात्री के रूप में, अनेक यूनानी, रोमन तथा चीनी यात्री भारत आए और उन्होंने भारत के सम्बन्ध में आंखों देखे विवरण लिखे। विदेशी विवरणों से, भारतीय संदर्भाें का कालक्रम एवं तिथि निर्धारण करना संभव हो पाया है। अध्ययन की सुविधा से विदेशी विवरण को दो भागों में बांट सकते हैं-

    (अ.) विदेशी लेखकों के विवरण तथा (ब.) विदेशी यात्रियों के विवरण।

    (अ.) विदेशी लेखकों के विवरण: विदेशी लेखकों में यूनानी लेखक एरियन, प्लूटार्क, स्ट्रैबो, प्लिनी, जस्टिन आदि, चीनी लेखक सुमाचीन, तिब्बती लेखक तारानाथ आदि आते हैं। तारानाथ के द्वारा लिखे गए भारतीय वृत्तांत कंग्युर एवं तंग्युर नामक ग्रंथों में मिलते हैं।

    (ब.) विदेशी यात्रियों के विवरण: विदेशी यात्रियों में यूनानी राजदूत मेगस्थिनीज, चीनी यात्री फाह्यान, तथा ह्वेनत्सांग और मुसलमान विद्वान अल्बेरूनी प्रमुख हैं। यूनानी लेखकों से हमें सिकन्दर के भारतीय आक्रमण का, यूनानी राजदूत मेगास्थनीज की पुस्तक इण्डिका से चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन-काल का, चीनी लेखकों से शक पार्थियन और कुशाण जातियों के इतिहास का, फाह्यान के विवरण से चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के शासन काल का, युवान-च्वांड् के ग्रंथ- 'सि-यू-की' के विवरण से हर्षवर्धन के शासनकाल का और अल्बेरूनी की पुस्तक- 'तहकीक-ए-हिन्द' के विवरण से महमूद गजनवी के आक्रमण के समय के भारत के राजनीतिक वातावरण का ज्ञान होता है।

    विदेशी विवरणों का मूल्यांकन

    भारतीय स्रोतों में ई.पू. 324 में सिकंदर के भारत पर आक्रमण की कोई जानकारी नहीं मिलती। उसके भारत में प्रवास एवं उपलब्धियों के इतिहास की रचना के लिए यूनानी विवरण ही एकमात्र उपलब्ध स्रोत हैं। यूनानी यात्रियों ने, सिकंदर के एक समकालीन भारतीय योद्धा के रूप में सैण्ड्रोकोटस का उल्लेख किया है। यूनानी विवरणों का यह राजकुमार सैण्ड्रोकोटस और भारतीय इतिहास का चन्द्रगुप्त मौर्य, जिसके राज्यारोहण की तिथि 322 ई.पू. निर्धारित की गई है, एक ही व्यक्ति थे।

    यह पहचान प्राचीन भारत के तिथिक्रम के लिए सुदृढ़़ आधारशिला बन गई है। इस तिथि क्रम के बिना भारतीय इतिहास की रचना करना सम्भव नहीं है। चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में यूनानी दूत मेगस्थिनीज की इण्डिका उन उद्धरणों के रूप में संरक्षित है जो अनेक प्रसिद्ध लेखकों ने उद्धृत किए हैं। इन उद्धरणों को मिलाकर पढ़ने पर न केवल मौर्य शासन-व्यवस्था के बारे में उपयोगी जानकारी मिलती है अपितु मौर्यकालीन सामाजिक वर्गाें तथा आर्थिक क्रियाकलापों के बारे में भी जानकारी मिलती है।

    यह कृति आंखें मूँदकर मान ली गई बातों अथवा अतिरंजनाओं से मुक्त नहीं है। अन्य प्राचीन विवरणों पर भी यह बात लागू होती है। ईसा की पहली और दूसरी सदियों के यूनानी तथा रोमन विवरणों में भारतीय बन्दरगााहों के उल्लेख मिलते हैं और भारत तथा रोमन साम्राज्य के बीच हुए व्यापार की वस्तुओं के बारे में भी जानकारी मिलती है। यूनानी भाषा में लिखी गई टोलेमी की 'ज्योग्राफी' और 'पेरीप्लस ऑफ दि एरीथ्रियन सी' पुस्तकें, प्राचीन भारतीय भूगोल और वाणिज्य के अध्ययन के लिए प्रचुर सामग्री प्रदान करती हैं। पहली पुस्तक में मिलने वाली आधार सामग्री ईस्वी 150 की और दूसरी पुस्तक ईस्वी 80 से 115 की मानी जाती है। प्लिनी की 'नेचुरलिस हिस्टोरिका' पहली शताब्दी ईस्वी की है।

    यह लैटिन भाषा में है और भारत एवं इटली के बीच होने वाले व्यापार की जानकारी देती है। चीनी पर्यटकों में फाह्यान और युवान-च्वांड् प्रमुख हैं। दोनों ही बौद्ध थे। वे बौद्ध तीर्थों का दर्शन करने तथा बौद्ध धर्म का अध्ययन करने भारत आए थे। फाह्यान ईसा की पांचवी सदी के प्रारंभ में आया था और युवान-च्वांड् सातवीं सदी के दूसरे चतुर्थांश में। फाह्यान ने गुप्तकालीन भारत की सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक परिस्थितियों की जानकारी दी है, तो युवान-च्वांड् ने हर्षकालीन भारत के बारे में इसी प्रकार की जानकारी दी है।

    पुरातात्विक स्रोत

    भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के प्राचीन इतिहास को जानने के वे साधन जो गुफाओं, नदियों के किनारों, तालाबों के किनारों, टीलों तथा धरती में दबे हुए मिलते हैं उन्हें पुरातात्विक स्रोत कहा जाता है। इन्हें मुख्यतः चार भागों में विभक्त किया जा सकता है- (1) अभिलेख (2) दानपत्र (3) मुद्राएँ और (4) प्राचीन स्मारक तथा भवनों के अवशेष।

    (1.) अभिलेख

    प्राचीन भारत का इतिहास जानने के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तथा सर्वाधिक विश्वसनीय साधन अभिलेख हैं। ये प्रधानतः स्तम्भों, शिलाओं तथा गुफाओं पर मिलते हैं परन्तु कभी-कभी मूर्तियों, पात्रों तथा ताम्रपत्रों पर भी अंकित मिलते हैं। ये लेख देशी तथा विदेशी दोनों हैं। देशी अभिलेखों में अशोक के अभिलेख, प्रयाग का स्तम्भ लेख तथा हाथीगुम्फा के अभिलेख सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। विदेशी अभिलेखों में एशिया माइनर में स्थित बोगजकोई के अभिलेख अधिक प्रसिद्ध हैं।

    अशोक के अभिलेखों से उसके धर्म तथा उसकी शिक्षाओं का परिचय मिलता है। अशोक के अभिलेख ही उसकी शिक्षाओं तथा राजाज्ञाओं को जानने का एकमात्र साधन हैं। इसी प्रकार हाथीगुम्फा के अभिलेख खारवेल-नरेश के शासन काल का इतिहास जानने के एकमात्र साधन हैं। बोगजकोई के अभिलेख से भी भारतीय इतिहास पर यत्किंचित प्रकाश पड़ा है।

    अभिलेखों के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए वी. ए. स्मिथ ने लिखा है- 'प्रारंभिक हिन्दू इतिहास में घटनाओं की तिथि का जो ठीक-ठीक ज्ञान अभी तक प्राप्त हो सका है वह प्रधानतः अभिलेखों के साक्ष्य पर आधारित है।' पश्चिमी इतिहासकार फ्लीट ने अभिलेखों के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए लिखा है- 'प्राचीन भारत के राजनीतिक इतिहास का ज्ञान हमें केवल अभिलेखों के धैर्यपूर्ण अध्ययन से प्राप्त होता है।'

    पुरालेख: प्राचीन अभिलेखों को पुरालेख कहते हैं तथा प्राचीन अभिलेखों के अध्ययन को पुरालेखशास्त्र कहते हैं। पुरालेखों तथा अन्य प्राचीन लेखों की प्राचीन लिपियों के अध्ययन को पुरालिपिशास्त्र कहते हैं। मुद्राओं, मुहरों, प्रस्तरों, स्तंभों, चट्टानों, ताम्रपत्रों, विजय-स्तम्भों तथा मंदिरों की भित्तियों के साथ-साथ ईंटों और मूर्तियों पर भी पुरालेख उत्कीर्ण किए गए हैं। ये पूरे देश में प्राप्त होते हैं।

    ईसा की आरंभिक सदियों में इस कार्य के लिए ताम्रपत्रों का उपयोग होने लगा था किंतु पत्थरों पर भी भारी संख्या में लेख उत्कीर्ण किए जाते रहे। सम्पूर्ण भारत में मंदिरों की दीवारों पर भी स्थायी स्मारकों के रूप में भारी संख्या में अभिलेख खोदे गए हैं।

    विभिन्न स्थानों से लाखों की संख्या में प्राप्त अभिलेख देश के विभिन्न संग्रहालयों में सुरक्षित हैं, पर सर्वाधिक संख्या में अभिलेख, मैसूर के प्रमुख पुरालेख शास्त्री के कार्यालय में संगृहीत हैं। मौर्य, मौर्याेत्तर, सीथियन, गुप्त तथा कलचुरी काल के अधिकांश अभिलेख कार्पस् इंस्क्रिप्शओनम् इंडिकारम नामक ग्रंथमाला के चार खण्डों में संगृहीत एवं प्रकाशित किए गए हैं। गुप्तोत्तर काल के अभिलेख सुव्यवस्थित रूप से संगृहीत नहीं हो पाए हैं। दक्षिण भारत के अभिलेखों की लिपि-शैलियों की सूचियां प्रकाशित हो चुकी हैं। फिर भी 50,000 से भी अधिक अभिलेखों का, जिनमें अधिकांश दक्षिण भारत के लेख हैं, प्रकाशन अभी शेष है।

    पुरालेखों की भाषा: भारत के सर्वाधिक प्राचीन अभिलेख प्राकृत भाषा में हैं और ईसा पूर्व तीसरी सदी के हैं। ईसा की दूसरी सदी में अभिलेखों के लेखन के लिए संस्कृत भाषा को अपनाया गया। चौथी-पांचवीं सदी में संस्कृत भाषा का सर्वत्र प्रचार-प्रचार हुआ किंतु तब भी प्राकृत भाषा का उपयोग होता रहा। प्रादेशिक भाषाओं में अभिलेखों की रचना नौवीं-दसवीं शताब्दियों से होने लगी।

    पुरालेखों की लिपि: हड़प्पा संस्कृति के अभिलेख, जिनको अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है, सम्भवतः एक ऐसी भावचित्रात्मक लिपि में लिखे गए हैं जिसमें विचारों एवं वस्तुओं को चित्रों के रूप में व्यक्त किया जाता था। अशोक के शिलालेख ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण किए गए हैं, यह लिपि दायीं ओर से बायीं ओर लिखी जाती थी। पश्चिमोत्तर भारत से प्राप्त अशोक के कुछ लेख खरोष्ठी लिपि में भी हैं, ये भी दायीं ओर से बायीं ओर लिखी जाती थी। पश्चिमोत्तर भारत के अतिरिक्त शेष प्रदेशों में ब्राह्मी लिपि का ही प्रचार रहा। अफगानिस्तान में अशोक के शिलालेखों के लिए यूनानी और ब्राह्मी लिपियों का भी उपयोग हुआ है। गुप्तकाल के अंत तक देश की प्रमुख लिपि ब्राह्मी-लिपी ही बनी रही। गुप्तकाल के बाद ब्राह्मी-लिपि की प्रादेशिक शैलियों में बड़ा अंतर आया और उन्हें अलग-अलग नाम दिए गए।

    पुरालेखों का कालक्रम: भारत से प्राप्त सर्वाधिक प्राचीन लेख, हड़प्पा संस्कृति की मुहरों पर मिलते हैं। ये लगभग 2500 ई.पू. के हैं। इन पुरालेखों को पढ़ना अब तक सम्भव नहीं हो पाया है। सबसे पुराने जिन अभिलेखों को पढ़ना सम्भव हो पाया है वे ई.पू. तीसरी सदी के अशोक के शिलालेख हैं। फिरोजशाह तुगलक ने मेरठ में अशोक के एक स्तम्भलेख का पता लगाया था। उसने यह अशोक-स्तंभ दिल्ली मंगवाया और अपने राज्य के पंडितों सेे इस पर उत्कीर्ण लेख को पढ़ने का आदेश दिया किन्तु किसी को भी इसमें सफलता नहीं मिली। अठारहवीं सदी के अंतिम चरण में अंग्रेजों ने जब अशोक के अभिलेखों को पढ़ने का प्रयास किया तो उन्हें भी इसी कठिनाई का सामना करना पड़ा। ई.1837 में जेम्स प्रिंसेप को इन अभिलेखों को पढ़ने में पहली बार सफलता मिली जो बंगाल में ईस्ट इंडिया कंपनी का सिविल अधिकारी था।

    पुरालेखों के प्रकार: पुरालेख कई प्रकार के हैं। कुछ अभिलेखों में अधिकारियों और जन-सामान्य के लिए जारी किए गए सामाजिक, धार्मिक तथा प्रशासनिक राज्यादेशों एवं निर्णयों की सूचनाएं हैं। अशोक के अभिलेख इसी कोटि के हैं। दूसरे वर्ग के अन्तर्गत वे आनुष्ठानिक अभिलेख हैं जिन्हें, बौद्ध, जैन, वैष्णव, शैव आदि सम्प्रदायों के अनुयाइयों ने स्तंभों, प्रस्तर-फलकों, मंदिरों अथवा मूर्तियों पर उत्कीर्ण करवाया है। तीसरे वर्ग में प्रशस्तियांे के रूप में लिखे गए अभिलेख हैं जिनमें राजाओं तथा विजेताओं के गुणों और उनकी सफलताओं का विवरण रहता है, पर उनकी पराजयों तथा कमजोरियों का कोई उल्लेख नहीं रहता। चन्द्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति इसी कोटि की है। चौथे वर्ग में दान अभिलेख मिलते हैं। इनमें राजाओं, राजपरिवार के सदस्यों, कारीगरों तथा व्यापारियों के द्वारा, धार्मिक प्रयोजन से धन, स्वर्ण, रत्न, मवेशी, भूमि आदि के रूप में दिए गए विशिष्ट दान का उल्लेख रहता है।

    (2.) दानपत्र

    राजाओं और सामंतों द्वारा दिए गए भूमिदानों से सम्बन्धित अभिलेख विशेष महत्त्व के हैं। इनसे प्राचीन भारत के भूमिबन्दोबस्त के बारे में उपयोगी जानकारी मिलती है। अधिकांश दानपत्र, ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण हैं। इन अभिलेखों में भिक्षुओं, पुरोहितों, मंदिरों, विहारों, जागीरदारों तथा अधिकारियों को दिए गए गांवांे, भूमियों तथा राजस्व के दानों का उल्लेख रहता है।

    (3.) मुद्राएँ

    प्राचीन भारत के इतिहास के निर्माण में मुद्राओं से बड़ी सहायता मिली है। इनके महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए स्मिथ ने लिखा है- 'सिकन्दर के आक्रमण के समय से मुद्राएँ प्रत्येक युग में इतिहास के अन्वेषण के कार्य में अमूल्य सहायता पहुँचाती रही हैं।' वास्तव में ई.पू. 206 से ई.300 तक के भारतीय इतिहास को जानने के प्रधान साधन मुद्राएँ ही हैं। इण्डो-पार्थियन तथा बैक्ट्रियन लोगों के इतिहास का पता हमें मुद्राओं से ही लगता है। मुद्राओं से हमें राजाओं के नाम, उनकी वेष-भूषा, उनके शासन-काल तथा उनके राजनीतिक एवं धार्मिक विचारों को जानने में बड़ी सहायता मिली है।

    राज्य की सीमा निर्धारित करने में भी कभी-कभी मुद्राओं का सहारा लिया जाता है। मुद्राओं से राज्य की आर्थिक दशा का भी ज्ञान प्राप्त हो जाता है। यदि मुद्राएँ शुद्ध सोने-चांदी की होती हैं तो उनसे देश की सम्पन्नता प्रकट होती है परन्तु यदि वे मिश्रित धातुओं की होती हैं तो उनसे राज्य की विपन्नता का पता लगता है। मुद्राओं के चित्रों तथा अभिलेखों से राज्य की कला तथा साहित्य की अवस्था का भी ज्ञान होता है।

    गुप्तकालीन मुद्राएँ बड़ी ही सुन्दर तथा कलात्मक हैं और उन पर शुद्ध तथा गीतमय संस्कृत लेख लिखे हैं जिनसे ज्ञात होता है कि गुप्त-सम्राट् साहित्य तथा कला के प्रेमी थे। प्राचीन भारत में सिक्कों पर धार्मिक चिह्न और संक्षिप्त लेख अंकित होते थे जिनसे उस समय की कला एवं धार्मिक परिस्थितियों पर प्रकाश पड़ता है।

    मुद्राशास्त्र: सिक्कों के अध्ययन को मुद्राशास्त्र कहते हैं। सबसे प्राचीन सिक्के आग मंे पकाई हुई मिट्टी के हैं। उसके बाद तांबा, चांदी, सोना और लेड (सीसा) धातुओं से सिक्के बनाये गए। पूरे देश से पकी हुई मिट्टी से बनाए गए सिक्कों के सांचे बड़ी संख्या में मिले हैं। इनमें से अधिकांश सांचे कुषाण काल के अर्थात् ईसा की आरंभिक तीन सदियों के हैं। गुप्तोत्तर काल में ये सांचे लगभग लुप्त हो गए।

    प्राचीन काल में लोग अपना पैसा मिट्टी तथा कांसे के बर्तनों में जमा रखते थे। ऐसी अनेक निधियों, जिनमें न केवल भारतीय सिक्के हैं अपितु रोमन साम्राज्य जैसी विदेशी टकसालों में ढाले गए सिक्के भी हैं, देश के अनेक भागों में खोजी गई हैं। ये निधियां अधिकतर कलकत्ता, पटना, लखनऊ, दिल्ली, जयपुर, बम्बई और मद्रास के संग्रहालयों में सुरक्षित हैं। बहुत से भारतीय सिक्के इंगलैण्ड, नेपाल, बांगलादेश, पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान के संग्रहालयों में भी रखे गए हैं। ब्रिटेन ने भारत पर लम्बे समय तक शासन किया, इसलिए ब्रिटेन के सार्वजनिक संग्रहालयों के साथ-साथ ब्रिटिश अधिकारियों के निजी संग्रहालयों में भी भारतीय सिक्के संग्रहीत किए गए हैं।

    विभन्न संग्रहालयों द्वारा भारत के प्रमुख राजवंशों के सिक्कों की सूचियां तैयार करके प्रकाशित करवाई गई हैं। कलकत्ता के इंडियन म्यूजियम तथा लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम आदि के सिक्कों की सूचियां उपलब्ध हैं परन्तु अब भी सिक्कों के अनेक संग्रहों की सूचियां नहीं बन पायी हैं और न ही प्रकाशित हुई हैं।

    हमारे देश के सबसे पुराने सिक्कों पर कुछ चिह्न देखने को मिलते हैं, पर बाद के सिक्कों पर राजाओं और देवी-देवताओं के नाम तथा तिथियाँ अंकित की गई हैं। जिन-जिन स्थानों पर ये सिक्के मिलते हैं उनके बारे में स्पष्ट हो जाता है कि उस प्रदेश में इनका प्रचलन रहा है। इस प्रकार खोजे गए सिक्कों के आधार पर कई राजवंशों के इतिहास की पुनर्रचना सम्भव हुई है। विशेषतः उन हिन्द-यवन शासकों के इतिहास की जो उत्तरी अफगानिस्तान से भारत पहुँचे थे और जिन्होंने ईसा पूर्व दूसरी एवं पहली सदियों में भारतीय क्षेत्रों पर शासन किया था।

    सिक्कों से, क्षेत्र विशेष एवं काल विशेष के आर्थिक हतिहास के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है। प्राचीन भारत में राजाओं की अनुमति से, बड़े व्यापारियों एवं स्वर्णकारों की श्रेणियों ने भी अपने सिक्के चलाए। इससे शिल्प और व्यापार की उन्नत व्यवस्था की सूचना मिलती है। सिक्कों के कारण बड़ी मात्रा मे लेन-देन करना सम्भव हुआ और व्यापार को बढ़ावा मिला। सबसे अधिक सिक्के मौर्योत्तर काल के मिले हैं, विशेषतः तांबे, चादी एवं सोने के सिक्के। गुप्त शासकों ने सोने के सबसे अधिक सिक्के जारी किए। इससे पता चलता है कि गुप्तकाल में व्यापार और वाणिज्य खूब बढ़ा। गुप्तोत्तर काल के बहुत कम सिक्के मिले हैं, इससे उस समय में व्यापार और वाणिज्य की अवनति की सूचना मिलती है।

    (4.) प्राचीन स्मारक तथा भवनों के अवशेष

    प्राचीन काल के मन्दिरों, मूर्तियों, स्तूपों, खण्डहरों आदि के अध्ययन से भी प्राचीन भारत के इतिहास के निर्माण में बड़ी सहायता मिली है। यद्यपि इनसे राजनीतिक दशा का विशेष ज्ञान प्राप्त नहीं होता है परन्तु धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक दशा का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त होता है। प्राचीन स्मारकों का अध्ययन कर विभिन्न कालों की कलाओं का ज्ञान प्राप्त किया गया है। काल विशेष में किस सामग्री का प्रयोग किया जाता था और किस शैली में इसका निर्माण होता था आदि बातों की जानकारी प्राप्त हुई है।

    कला-कृतियों की प्राचीनता का अध्ययन कर कालक्रम को भी निर्धारित किया गया है। मूर्तियों तथा मन्दिरों के अध्ययन से लागों के धार्मिक विचारों तथा विश्वासों का पता लगता है। गुप्तकाल की मूर्तियों का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि उस काल में वैष्णव, शैव, बौद्ध आदि धर्मों का प्रचलन था और उनमें धार्मिक सहिष्णुता थी। मूर्तियों और चित्रों का अध्ययन करने से हमें सामाजिक दशा का भी पता लगता है क्योंकि इनसे लोगों की वेश-भूषा, खान-पान, वनस्पतियों तथा पालतू पशुओं आदि का पता लगता है।

    प्राचीन स्मारकों के अध्ययन से हमें स्थानीय शासकों के परस्पर सम्बन्धों तथा विदेशी शासकों के साथ सम्बन्धों का भी ज्ञान होता है। दक्षिण-पूर्व एशिया के स्मारकों से ज्ञात होता है कि भारत का विदेशी शासकों के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध था। पुराने खण्डहरों की खुदाइयों से इतिहास निर्माण में उपयोगी मूल्यवान सामग्री मिलती है। हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो में जो खुदाइयाँ हुई हैं उनसे भारत की एक अत्यन्त प्राचीन सभ्यता का पता लगा है जिसे सिन्धु घाटी सभ्यता कहा गया है।

    टीलों का उत्खनन: पूरे भारत में प्राचीन समारक एवं भवनों के अवशेष देखने को मिलते हैं। इनमें से अधिकांश स्मारकों एवं भवनों के अवशेषों को मिट्टी के टीलों के नीचे से खोद कर निकाला गया है। दक्षिण भारत में पत्थर के मंदिर और पूर्वी भारत में ईटों से बने विहार, टीलों के नीचे मिले हैं। इनमें से जिन थोड़े से टीलों का उत्खनन हुआ है, उन्हीं से हमें प्राचीन काल के जन-जीवन के बारे में कुछ जानकारी मिली है। टीलों का उत्खनन दो प्रकार से हो सकता है- (1.) लम्बरूप खुदाई तथा (2.) क्षैतिज खुदाई।

    लम्बरूप खुदाई सस्ती पड़ती है। इसलिए भारत में अधिकांश स्थलों की खुदाई लम्बरूप में की गई है। इस खुदाई का लाभ यह है कि इससे एक क्षेत्र पर विभिन्न कालों में होने वाले क्रमिक सांस्कृतिक विकास का अध्ययन करने में सहायता मिलती है किंतु इस प्रकार के उत्खनन से प्राचीन भारतीय इतिहास के अनेक चरणों के भौतिक जीवन का पूर्ण और समग्र चित्र नहीं मिल पाता। किसी भी काल की समग्र जानकारी प्राप्त करने के लिए क्षैतिज खुदाई करना आवश्यक है किंतु अत्यधिक खर्चीली होने के कारण क्षैतिज खुदाईयां बहुत कम की गई हैं।

    विभिन्न टीलों के उत्खनन से प्राप्त पुरावशेष, विभिन्न अनुपातों में सुरक्षित रखे गए हैं। सूखी जलवायु के कारण पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पश्चिमोत्तर भारत के पुरावशेष अधिक सुरक्षित बने रहे, परन्तु मध्य गंगा घाटी और डेल्टाई क्षेत्रों की नम और आर्द्र जलवायु में लोहे के औजार भी गल गए। कच्ची मिट्टी से बने भवनों के अवशेषों का दिखाई देना कठिन होता है इस कारण नम और जलोढ़ क्षेत्रों में पक्की ईटों और पत्थर के बने हुए भवनों के काल के अवशेष ही प्राप्त होते हैं।

    पश्चिमोत्तर भारत में किए गए उत्खननों से ऐसे नगरों का पता चला है जिनकी स्थापना लगभग 2500 ई.पू. में हुई थी। इसी प्रकार के उत्खननों से हमें गंगा की घाटी में विकसित हुई भौतिक संस्कृति के बारे मेें जानकारी मिली है। इससे पता चलता है कि उस समय के लोग जिस प्रकार की बस्तियों में रहते थे उनका विन्यास क्या था, वे किस प्रकार के मृद्भांडों का उपयोग करते थे, किस प्रकार के घरों में रहते थे, किन अनाजों का उपयोग करते थे, और किस प्रकार के औजारों अथवा हथियारों का उपयोग करते थे।

    दक्षिण भारत के कुछ लोग मृत व्यक्ति के शव के साथ औजार, हथियार, मिट्टी के बर्तन आदि भी रख देते थे और इसके ऊपर एक घेरे में बड़े-बड़े़ पत्थर खडे़ करते थे। ऐसे स्मारकों को महापाषाण कहते हैं। समस्त महापाषाण इस श्रेणी में नहीं आते। जिस विज्ञान के आधार पर पुराने टीलों का क्रमिक स्तरों में विधिवत् उत्खनन किया जाता है उसे पुरातत्त्व कहते हैं।

    उत्खनन और गवशेषणा के फलस्वरूप प्राप्त भौतिक अवशेषों का विभिन्न प्रकार से वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाता है जिससे यह पता चलता है कि वे स्थान कहाँ हैं, जहाँ से ये धातुएँ प्राप्त की गईं। इनसे धातु विज्ञान के विकास की अवस्थाओं का पता लगाया जाता है। पशुओं की हड्डियों का परीक्षण कर पालतू पशुओं तथा उनसे लिए जाने वाले कामों के बारे में जानकारी एकत्रित की गई है।

    भारतीयों में ऐतिहासिक विवेक

    प्राचीन भारतीयों पर यह आरोप लगाया जाता है कि उनमें ऐतिहासिक बोध का अभाव था। यह स्पष्ट है कि प्राचीन भारतीय लेखकों ने वैसा इतिहास नहीं लिखा जैसा आजकल लिखा जाता है, न ही उन्होंने यूनानियों की तरह इतिहास ग्रंथ लिखे किंतु हमारे धर्मग्रंथों में, विशेषकर पुराणों में तत्कालीन इतिहास मिलता है जो वस्तु-तत्त्व की दृष्टि से विश्वकोशीय है और गुप्त साम्राज्य के प्रारंभ तक के राजवंशीय इतिहास को उपलब्ध कराता है।

    काल-बोध, जो इतिहास का एक महत्त्वूपर्ण घटक है, अभिलेखों में देखने को मिलता है। इनमें महत्त्वपूर्ण घटनाओं से सम्बन्धित किसी शासक विशेष के शासन वर्षों का उल्लेख रहता है। प्राचीन भारत में कई संवत् आरम्भ किए गए जिनके आधार पर घटनाओं को अंकित किया गया। विक्रम संवत्, 58 ई.पू. में आरम्भ हुआ, शक संवत् 78 ई.पू. में और गुप्त संवत 319 ई.पू. में।

    अभिलेखों में स्थानों और तिथियों का उल्लेख रहता है। पुराणों और जीवन चरित्रों में घटनाओं के कारण तथा परिणाम दिए गए हैं। इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए ये सब चीजें अपरिहार्य हैं, परन्तु इनके बारे में सुव्यवस्थित जानकारी नहीं मिलती।

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  • सेवाड़ी के शिलालेखों का महत्व

     02.06.2020
    सेवाड़ी के शिलालेखों का महत्व

    ई.1107 का शिलालेख

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राजस्थान के पाली जिले में सेवाड़ी नामक एक अत्यंत प्राचीन गांव स्थित है। बारहवीं शताब्दी ईस्वी में इस गांव को शमीपाटी कहा जाता था। इस गांव में स्थित महावीर स्वामी के मंदिर से बारहवीं शताब्दी ईस्वी के दो शिलालेख मिले हैं। इनमें से पहला शिलालेख तीन पंक्तियों का है। इस शिलालेख को 3‘ 6‘‘ गुणा 2‘ 3/4‘‘ के पत्थर पर उत्कीर्ण किया गया है। लेख संस्कृृृृत भाषा तथा देवनागरी लिपि में उत्कीर्ण है। लेख का मूल पाठ इस प्रकार है-

    ‘‘सं.1164 चै. सु 6 महाराजाधिराज श्री अश्वराज राज्य श्री कटुकराज युवराज्ये समीपाठीय चैत्ये श्री धर्म्मनाथ देवसां नित्य पूज्यार्थ महसाहणिय पूअविपौत्रेण उत्तिम राजपुत्रैण उप्पल राईन मा गढ आंवल। वि. सलखण जोगादि कुटुंब सम। पद्राडा ग्रामो मेद्रचा ग्रामे तथा छेडड़िया मद्दवडी ग्रामे।। अरहर्ट प्रतिदत्तः जवाहरर्कः ’’

    इस लेख में कहा गया है कि विक्रम संवत् 1164 की चैत्र शुक्ला 6 (ईस्वी 1107) का महाराजाधिराज अश्वराज चौहान जिसका कि युवराज कटुकराज था, ने महावीरजी के चैत्य को पद्राड़ा, मेद्रचा, छेछड़िया तथा महड़ी गांवों से प्रत्येक रहट से एक हारक (एक डलिया की नाप) यव (जौ) प्रदान करने का आदेश दिया गया है। इस दान की वैधानिक व्यवस्था महासाणिय उप्पलराक के द्वारा की जाएगी। यदि कोई व्यक्ति इस व्यवस्था को रोकेगा तो वह गौ, स्त्री, और ब्राह्मण की हिंसा के तुल्य पाप होगा। उस काल में साहणिय, अस्तबल का अधिकारी होता था। इस शिलालेख से ज्ञात होता हे कि महासाणिय अर्थात् मुख्य अस्तबल अधिकारी को दान आदि की व्यस्थाएं सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी दी जाती थी।

    ई.1115 का शिलालेख

    सेवाड़ी के महावीर मंदिर का दूसरा शिलालेख वि.सं. 1172 (ईस्वी 1115) का है। यह आठ पंक्तियों का लेख है जिसे 2‘ 1.25‘‘ गुणा 4.5‘‘ क्षेत्र में उत्कीर्ण किया गया है। शिलालेख की मुख्य पंक्तियां इस प्रकार हैं-

    पंक्ति 4: इतश्चासीत् वि (शु) द्वात्मा यशोदेवो बलाधिपः। राज्ञं महाजनस्यापि सभायामग्रणी स्थितः।

    पंक्ति 7: पिता महे (न) तस्येदं समीपाट्यां जिनालये। कारितं शांतिनाथस्य बिंबं जन मनोहरं।।

    इस शिलालेख में अणहिल, जिंदराज, अश्वराज और कटुकराज आदि चौहान शासकों, यशोदेव नामक सेनाध्यक्ष (बलाधिप), बाहड़ नामक शिल्पी तथा उसके पुत्र थल्लक के नाम का उल्लेख किया गया है। इस शिलालेख में सेवाड़ी गांव का नाम शमीपाटी लिखा गया है। इस शिलालेख में बलाधिप के गुणों का उल्लेख किया गया है जिनके आधार पर किसी व्यक्ति को बलाधिप नियुक्त किया जाता था। इस शिलालेख से अनुमान होता है कि थल्लक का पितामह भी चौहान शासकों का विश्वासप्राप्त शिल्पी था जिसने शांतिनाथ की प्रतिमा का निर्माण किया था।

    इस शिलालेख में कहा गया है कि शमीपत्तन नामक नगर में महाराजा कटुकराज ने मंदिर के निमित्त जो दान दिया है उसकी अवहेना करने वाला पाप का भागी होगा तथा कामना की गई है कि इस दान को स्थायित्व प्राप्त हो।

    सेवाड़ी के शिलालेखों में ऐतिहासिक तत्व

    ये दोनों शिलालेख देखने में भले ही बहुत छोटे लगें किंतु इतिहास निर्माण की दृष्टि से अत्यंत महत्व के हैं। इन शिलालेखों से कई बातों की पुष्टि होती है। ये इस बात की पुष्टि करते हैं कि 12वीं शताब्दी ईस्वी में इस क्षेत्र पर चौहानों का शासक था। ये चौहान शासक जैन धर्म के मंदिरों को भी दान देते थे। उस काल में राजदरबार की भाषा संस्कृत थी और लेखन के लिए देवनागरी लिपि प्रयुक्त होती थी। इन शिलालेखों से इस बात की भी पुष्टि होती थी कि राज्य के सेनाधिकारी यथा सेनापति, अश्वशाला का मुख्य अधिकारी आदि भी दान व्यवस्था को बनाए रखने में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाते थे। राजा की कामना होती थी कि जो दान वह दे रहा है, वह चिरकाल तक चलता रहे। उस युग में पाली क्षेत्र के किसान अरहट से सिंचाई करते थे। गौ, स्त्री, और ब्राह्मण की हिंसा को सर्वाधिक गर्हित पाप समझा जाता था। सेनापतियों की नियुक्ति उनके गुणों के आधार पर होती थी। शिल्पियों के परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी किसी राजवंश से जुड़े हुए रहते थे।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-34

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-34

    राज्य में अधिक अन्न उत्पादन के पर्यावरणीय उपाय (1)


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    कृषि कार्य के दौरान पर्यावरण को सर्वाधिक क्षति पहुंचती है। खेत में बार-बार हल चलाने से मृदा संरचना खराब होती है तथा मिट्टी को बार-बार पलटने से भूमि से जल वाष्पन की गति तेज हो जाती है। खेत में सिंचाई करने से मिट्टी के पोषक तत्व पानी में घुलकर मिट्टी के नीचे की परतों में चले जाते हैं। फसल को कीट-पतंगों से बचाने के लिये कीटनाशकों का तथा खरपतवार को नष्ट करने के लिये खरपतवार नाशकों का छिड़काव किया जाता है जिनका सम्पूर्ण पर्यावरण पर अत्यंत घातक प्रभाव होता है। अतः कृषि क्रियाओं के दौरान ऐसी विधियों को अपनाने की आवश्यकता होती है जिनसे पर्यावरण को हानि न पहुंचे। लगभग सम्पूर्ण राजस्थान में जल की सीमित मात्रा तथा जलवायु की शुष्कता फसल उत्पादन के लिये बड़ी चुनौती है। अतः भूमि की ऊर्वरा शक्ति की रक्षा करते हुए, फसल उत्पादन को बढ़ाने के विविध उपाय किये जा रहे हैं जिनमें परम्परागत ज्ञान से लेकर आधुनिक वैज्ञानिक शोधों का सहारा लिया जा रहा है। वर्तमान युग में यांत्रिक खेती, रासायानिक ऊर्वरकों के उपयोग तथा कीट-नाशकों के छिड़काव पर अधिक जोर है। कम परिश्रम एवं कम समय में अधिकतम उपज प्राप्त करने की अनिवार्यता है किंतु साथ ही साथ किसानों द्वारा पर्यावरण सुरक्षा के विविध उपाय किये जा रहे हैं जो कि राजस्थान की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं।


    पर्यावरण संरक्षण हेतु की जाने वाली कृषि-क्रियाएं

    पड़ती खेती

    यदि किसी भूमि पर बरसों तक लगातार खेती की जायेगी तो उसकी मिट्टी में से पोषक तत्त्वों की कमी हो जायेगी तथा फसल की अच्छी पैदावाार लेना संभव नहीं रहेगा। इसलिये भूमि पर वर्ष प्रति वर्ष लगातार फसल न लेकर उसे कुछ समय के लिये खाली छोड़ दिया जाता है। इसे पड़ती छोड़ना कहते हैं। इससे मृदा को अपनी खोई हुई ऊर्वरा शक्ति फिर से प्राप्त करने का समय मिल जाता है।

    सूड़

    जब खेत खाली पड़ा रहता है तो उसमें कई प्रकार की खरपतवारें एवं झाड़ियां उग आती हैं। खेत को बोने से पहले इन खरपतवारों एवं झाड़ियों को काटकर खेत की सफाई की जाती है, उसे खेत को सूड़ना कहते हैं। इस विधि से खेत की मिट्टी से होने वाला वाष्पीकरण रुकता है।

    खड़ाई

    जब वर्षा होती है तो पानी रिसकर भूमि में जाता है। इस कारण पूरे खेत में महीन केशिकाएं (कैपीलरी) बन जाती हैं। इन केशिकाओं से तेज गर्मी के समय मिट्टी में दबा हुआ पानी वाष्प बनकर उड़ता रहता है। वाष्पन की इस क्रिया को तोड़ने के लिये केशिकीय संरचनाओं को नष्ट करना आवश्यक होता है। इसलिये खेत को बोने से पहले उसमें देशी हल से जुताई कर दी जाती है, इसे खड़ाई करना कहते हैं। खड़ाई करने से खरपतवार के साथ-साथ केशिकाएं भी नष्ट हो जाती हैं तथा भूमि का जल भूमि में ही संरक्षित रहता है।

    निदाण

    पशु-पक्षियों के गोबर, मींगनी, बीट तथा हवाओं के द्वारा खेत में खरपतवारों के बीज आ जाते हैं। खरपतवारों के पौधे, मुख्य फसल के साथ उगकर उनसे पानी, प्रकाश, पोषक तत्व एवं स्थान के लिये संघर्ष करते हैं। इस कारण फसल की उपज कम हो जाती है। इन खरपतवारों को नष्ट करने के लिये यूरोप एवं अमरीका आदि विकसित देशों में रासायनिक खरपतवार नाशकों का प्रयोग किया जाता है। जबकि भारत में खड़ी फसल के बीच से खरपतवार को खोदकर हटा दिया जाता है। इस प्रक्रिया को निदाण कहते हैं। राजस्थान के किसान भी रासायनिक खरपतवार नाशकों के स्थान पर निदाण प्रक्रिया पर ही जोर देते हैं।

    कणाबंदी

    मिट्टी की सबसे ऊपरी परत में पोषक तत्व तथा ह्यूमस होती है। तेज हवाओं के चलने पर इस परत के उड़कर नष्ट हो जाने का खतरा रहता है। इसलिये मिट्टी को उड़ने से बचाने के लिये खेत में 50 से 250 फीट की दूरी पर, सिणिया, कैर, आक, बुआड़ी तथा फोग की कटी हुई झाड़ियों से 1.5-2 फुट ऊँची कतारें बनाई जाती हैं, इसे कणाबंदी कहते हैं। कणा का अर्थ किनारा होता है।

    फसल चक्र

    एक ही प्रकार की फसलों को लगातार बोते रहने से भूमि की संरचना खराब हो जाती है तथा उसमें आवश्यक तत्वों की कमी हो जाती है। इसलिये किसानों द्वारा फसल चक्र अपनाया जाता है। इस विधि में अनाज की फसलों के बाद दलहनी फसलें अथवा हरी खाद की फसलें बोई जाती हैं। अनाज की फसलों के बाद दलहनी फसलों को उगाने से मृदा में नाईट्रोजन की मात्रा बनी रहती है। इसी प्रकार अनाज की फसलों के बाद हरी खाद की फसलें अर्थात् सन, सनई, ढंेचा आदि बोने से मृदा में जीवांश की पर्याप्त मात्रा बनी रहती है तथा मृदा अपरदन कम होता है। हरी खाद की खेती को लक्ष्य करके कन्हैयालाल सेठिया ने लिखा है-


    दाणां नहीं तो तूंतड़ा ही बा,

    उगो'र मत उगो, भौम तो दबा।

    शुष्क खेती

    राज्य में कृषि योग्य भूमि का लगभग तीन चौथाई भाग बारानी एवं असिंचित है। वर्षा का वार्षिक औसत भी मात्र 60 से.मी. अथवा उससे कम ही है। इस कारण राज्य में सूखा रोधी किस्मों को उन्नत कृषि विधियों से उगाया जाता है। इसे शुष्क खेती कहते हैं।

    जल बजट योजना

    राज्य में जल की कमी को देखते हुए जल बजट आधारित कृषि का प्रसार किया जा रहा है जिसमें बूंद-बूंद सिंचाई योजना, फव्वारा सिंचाई योजना, पक्की नालियों एवं पाइपों के माध्यम से जल का वितरण, सामुदायिक नल कूपों की स्थापना आदि उपाय अपनाये जाते हैं।

    राष्ट्रीय सूक्ष्म सिंचाई मिशन

    फसल उत्पादकता बढ़ाने एवं पानी बचाने के लिए लघु सिंचाई पद्धति (ड्रिप एवं फव्वारा सिंचाई पद्धति) के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय सूक्ष्म सिंचाई मिशन क्रियान्वित किया जा रहा है जिसमें लघु एवं सीमान्त कृषकों को 60 प्रतिशत व अन्य कृषकों को 50 प्रतिशत अनुदान का प्रावधान है। राज्य सरकार द्वारा ड्रिप इरिगेशन तंत्र को स्थापित करने हेतु अतिरिक्त सहायता प्रदान की जाती है।

    विशेष खाद्यान्न उत्पादन कार्यक्रम

    सातवीं पंचवर्षीय योजना की मध्यावधि समीक्षा के दौरान देश के 14 राज्यों के 169 जिलों में यह कार्यक्रम चलाया गया। इस योजना के तहत गेहूँ, चना, मक्का एवं बाजरा के उत्पादन में वृद्धि के उपाय किये गये हैं।

    तिलहन विकास कार्यक्रम

    राजस्थान में वर्ष 1979-80 में तिलहनों का उत्पादन केवल 2.51 लाख टन था जो राज्य में तिलहन उत्पादन की संभावनाओं को देखते हुए काफी कम था। इसलिये राज्य सरकार द्वारा तिलहन विकास कार्यक्रम चलाया गया। इसके परिणाम स्वरूप राज्य में 1989-90 में तिलहन उत्पादन सात गुना बढ़कर 18.45 लाख टन पहुंच गया। आठवीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक राज्य में 35.29 लाख टन तिलहन उत्पादन रिकॉर्ड किया गया। वर्ष 2012-13 में राज्य में कुल 63.31 लाख टन तिलहन उत्पादन अनुमानित था जिसमें से 24.45 लाख टन खरीफ में तथा 38.36 लाख टन तिलहन रबी में पैदा होना अुमानित किया गया। तिलहन उत्पादन में वृद्धि के लिये खरीफ के दौरान सोयाबीन, अरण्डी, तिल, सूरजमुखी, मूंगफली तथा रबी के दौरान रायड़ा एवं सरसों की खेती के प्रसार पर अधिक ध्यान दिया गया है। राजस्थान की तिलहनों में सरसों तथा राई का उत्पादन सर्वाधिक होता है।

    दलहन विकास कार्यक्रम

    राज्य में दलहनी फसलों की खेती 35 से 40 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में की जाती है जबकि इन फसलों का उत्पादन 10 से 20 लाख टन रहता है। राज्य के कुल दलहनी क्षेत्र के 40 प्रतिशत हिस्से में मोठ बोयी जाती है। राजस्थान की दलहनों में चने का उत्पादन सर्वाधिक होता है। इसके अतिरिक्त उड़द, मूंग, मोठ, अरहर, मसूर तथा मटर भी उत्पन्न होता है। दलहन उत्पादन को बढ़ावा देने के लिये ई.1998-90 से जैसलमेर, जालोर, पाली व सिरोही जिलों को छोड़कर शेष राज्य में दलहन विकास योजना चलाई जा रही है।

    यांत्रिक कृषि

    जिन क्षेत्रों में जनसंख्या घनत्व कम है, वहाँ कृषि यंत्रों की सहायता से विस्तृत खेती कर भूमि का उचित उपयोग किया जा रहा है। राज्य में इस कृषि का विकास गंगानगर एवं हनुमानगढ़ जिलों में अधिक हुआ है। तत्कालीन सोवियत रूस सरकार के सहयोग से सूरतगढ़ में 15 अगस्त 1956 को 12,410 हैक्टेयर क्षेत्रफल में सूरतगढ़ यांत्रिक कृषि फार्म की स्थापना की गयी। श्रीगंगानगर जिले के जैतसर में भी सोवियत रूस के सहयोग से 30 हजार एकड़ भूमि में यांत्रिक कृषि फार्म की स्थापना की गयी।

    मिश्रित कृषि

    कृषि कार्य के साथ-साथ पशुपालन व्यवसाय को अपनाना मिश्रित कृषि कहलाता है। राजस्थान में कृषि कार्यों में संलग्न 70 प्रतिशत जनसंख्या मिश्रित कृषि करती है।

    झूमिंग कृषि

    इस कृषि में वृक्षों को काटकर सुखाया जाता है तथा वर्षा ऋतु के आगमन से पूर्व उन्हें जलाकर उनकी राख खेतों में बिखेर दी जाती है। वर्षा होने पर उस खेत में बीज डाल दिये जाते हैं। यह कृषि पर्यावरण के लिये अत्यंत हानिकारक है। यह पद्धति आदिवासियों द्वारा अपनायी जाती है। झूमिंग प्रणाली की वालरा कृषि भीलों द्वारा उदयपुर, डूंगरपुर तथा बांसवाड़ा जिलों में की जाती है।

    राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आर.के.वी.वाई.)

    कृषि एवं सम्बद्ध क्षेत्रों में लगातार गिरते हुए निवेश को देखते हुए केन्द्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय कृषि विकास योजना प्रारम्भ की गई है जिसमें कृषि जलवायु स्थितियां, प्राकृतिक संसाधन से सम्बन्धित मुद्दों एवं तकनीक को दृष्टिगत रखते हुए कृषि क्षेत्र के लिए विस्तृत योजना बनाने का कार्य किया जाएगा।

    कृषि उपज विपणन

    राजस्थान में कृषि उपज को नष्ट होने से बचाने के लिये सशक्त विपणन व्यवस्था की गई है। 6 जून 1974 को राजस्थान राज्य कृषि विपणन बोर्ड का गठन किया गया और 1980 में कृषि विपणन निदेशालय की स्थापना की गयी। राजस्थान में 129 कृषि उपज मण्डियां तथा 302 गौण मण्डियां हैं जिन्हें चार श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है।

    कृषि वानिकी एवं चारा उत्पादन

    राज्य में एक ओर तो वर्षा की कमी है तथा दूसरी ओर पशुओं की बहुलता है। इसलिये राज्य को अपने पड़ौसी राज्यों से चारा मंगावाना पड़ता है। पशु चारे की आपूर्ति एवं ग्रामीण ईंधन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये कृषि वानिकी एवं चारा उत्पादन के उपाय किये जा रहे हैं। इन उपायों को भागीरथ योजना में सम्मिलित किया गया है। राजस्थान राज्य बीज निगम द्वारा किसानों को 50 प्रतिशत अनुदानित दर पर चारे वाली फसलों के प्रमाणित बीज दिये जाते हैं। छोटे पत्तों वाले वृक्षों को उगाने के लिये 20 पैसे की दर से पौध उपलब्ध करवायी जाती है। किसानों को 25,000 पौधों की पौधशाला के विकास के लिये 50 पैसे प्रति पौध की दर से आर्थिक सहायता दी जाती है।

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  • अध्याय - 6 सैन्धव सभ्यता, धर्म एवं समाज

     02.06.2020
    अध्याय - 6 सैन्धव सभ्यता, धर्म एवं समाज

    सैन्धव सभ्यता, धर्म एवं समाज


    (ताम्रकांस्य कालीन सभ्यता एवं संस्कृति)


    सिन्धुघाटी के शहरों में बनी हुई वस्तुएं दजला और फरात के बाजारों में बिकती थीं...... अरब सागर के किनारों से लाई गई मछलियां मोहनजोदड़ो के भोजन में सम्मिलित थीं। -सर जॉन मार्शल।


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    सिंधु घाटी सभ्यता, भारत भूमि पर प्रकट होने वाली सर्वप्रथम सुविकसित सभ्यता मानी जाती है। यह तृतीय कांस्य-कालीन सभ्यता थी तथा वैदिक सभ्यता से भी प्राचीन थी। लौह सभ्यताएं अभी भविष्य के गर्भ में थीं, यहाँ तक कि इसके समानांतर रह रही प्राचीन बस्तियां अभी भी नव पाषाणकाल में जी रही थीं तथा उनमें ताम्बे की खोज होनी अभी बाकी थी।

    निश्चित रूप से सिंधु घाटी सभ्यता, नवपाषाण कालीन बस्तियों से ही विकसित हुई थी किंतु सिंधु वासियों ने न केवल ताम्बे की अपितु उसके साथ-साथ टिन की खोज में भी सफलता अर्जित कर ली थी जिसके कारण वे मिश्रधातु 'कांस्य' अथवा 'कांसे' का निर्माण कर पाए थे तथा इस धातु के कारण वे सभ्यता, संस्कृति एवं विज्ञान के मामले में अपनी समकालीन संस्कृतियों से अचानक ही तेजी से आगे निकल गए थे।

    चूँकि इस सभ्यता के अधिकांश भग्नावशेष सिन्धु तथा उसकी सहायक नदियों की घाटियों में उपलब्ध हुए हैं, इसलिए इसे 'सिन्धु-घाटी सभ्यता' अथवा 'सैन्धव सभ्यता' कहा जाता है। हड़प्पा तथा मोहेनजोदड़ो नामक नगरों के आस-पास इस सभ्यता के बड़े केन्द्र प्राप्त होने से इस संस्कृति को 'हड़प्पा संस्कृति' एवं मोहेनजोदड़ो संस्कृति के नाम से भी पुकारा जाता है।

    आसपास की भूमि से ऊपर उभरे हुए विशाल टीलों में दबी पड़ी इस सभ्यता के उत्खनन का कार्य ई.1920 में हड़प्पा में आरम्भ किया गया। हड़प्पा, अखण्ड भारत के पंजाब प्रांत के पश्चिमी हिस्से में स्थित 'माण्टगोमरी' जिले में स्थित था। लाहौर से लगभग 100 मील दक्षिण-पश्चिम में रावी नदी के तट पर हड़प्पा सभ्यता के टीले विद्यमान थे। इन टीलों का उत्खनन कार्य करवाने वालों में दयाराम साहनी तथा माधोस्वरूप वत्स अग्रणी थे।

    ई.1922 में राखालदास बनर्जी के नेतृत्व में सिन्ध प्राप्त के लरकाना जिले में खुदाई का काम हुआ, जिसके फलस्वरूप 'मोहेनजोदड़ो' नामक स्थान पर एक सैन्धव नगर के अवशेष उपलब्ध हुए। यद्यपि इन दोनों स्थानों के बीच लगभग 680 किलोमीटर की दूरी है तथापि दोनों स्थानों की खुदाई में प्राप्त अवशेषों में अद्भुत साम्यता थी। दोनों केन्द्रों से प्राप्त सामग्री के तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर सर जॉन मार्शल ने सिद्ध किया कि ये अवशेष एक ही पूर्वेतिहासिक सभ्यता से सम्बद्ध हैं।

    अर्नेस्ट मैके, एन. जी. मजूमदार, सर ऑरेल स्टीन, एच. हारग्रीव्ज, पिगट, मोरटीमर व्हीलर, रंगनाथराव, एच. डी. सांकलिया, बी. बी. लाल, बी. के. थापर आदि पुरातत्त्वेताओं ने खोज और खनन के कार्य को आगे बढ़ाया जिससे यह पता चला कि यह प्राचीन सभ्यता केवल सिन्धु घाटी तक ही सीमित नहीं थी। सिंधु की सहायक नदियों के किनारों से भी इस काल की सभ्यता के अवशेष बड़ी संख्या में प्राप्त हुए।

    सिंधु सभ्यता का विस्तार क्षेत्र

    इस सभ्यता का विस्तार अफगानिस्तान से लेकर पाकिस्तान के बलोचिस्तान, सिन्ध एवं पंजाब, भारत के गंगा घाटी, पश्चिमी राजस्थान एवं गुजरात तक था। पाकिस्तान में हड़प्पा और मोहनजोदड़ो इस सभ्यता के दो प्रमुख केन्द्र थे। अफगानिस्तान में क्वेटा, कीली, गुलमुहम्मद, मुण्डिगक नदी के किनारे-किनारे तथा डम्बसदात में भी सिन्धु सभ्यता के प्राचीनतम अवशेष मिले हैं। बलोचिस्तान के उत्तर-पूर्व में लोरलाय घाटी तथा जोब नदी की घाटी में भी इस सभ्यता के कई स्थल मिले हैं।

    मान्यता है कि दक्षिणी बलोचिस्तान की 'कुल्ली सभ्यता' सिन्धु सभ्यता का ही प्रारम्भिक रूप रही होगी। उत्तरी राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित कालीबंगा से मिले अवशेषों का निचला स्तर सिन्धु सभ्यता से भी पहले का है जबकि ऊपरी स्तर सिन्धु सभ्यता से सम्बन्धित है। पंजाब में रोपड़ तथा गुजरात में लोथल और रंगपुर नामक स्थानों से प्राप्त अवशेष भी सिन्धु सभ्यता के समकालीन प्रमाणित होते हैं। इस प्रकार अखण्ड भारत में सैन्धव सभ्यता का विस्तार पश्चिम में अरब सागर के तट पर स्थित सुत्कांगाडोर से लेकर पूर्व में आलमगीरपुर एवं विलुप्त सरस्वती नदी के किनारे तथा उत्तर में शिमला की पहाड़ियों की तलहटी से लेकर दक्षिण में नर्बदा और ताप्ती नदियों के मध्य भगवार तक था।

    रंगनाथराव ने इस सभ्यता का विस्तार पूर्व से पश्चिम में लगभग 1600 किलोमीटर और उत्तर से दक्षिण में लगभग 1100 किलोमीटर माना है। यह सम्पूर्ण क्षेत्र एक त्रिभुज के आकार का है और लगभग 12,99,600 वर्ग किलोमीटर में विस्तृत है। यह क्षेत्र आज के पाकिस्तान से तो बड़ा है ही, साथ ही प्राचीन मिस्र और मेसीपोटामिया से भी बड़ा था। ई.पू.3000 एवं ई.पू.2000 में संसार का कोई भी अन्य सांस्कृतिक क्षेत्र हड़प्पा संस्कृति के क्षेत्र से बड़ा नहीं था।

    हड़प्पा सभ्यता के प्रमुख स्थल

    हड़प्पा संस्कृति के अब तक 1400 से अधिक स्थलों का पता लग चुका है। इनमें से अधिकांश स्थल सरस्वती नदी घाटी क्षेत्र में थे। अब तक ज्ञात स्थलों में से केवल छः स्थलों को ही नगर माना जाता है। इन नगरों में दो सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नगर थे- पंजाब में हड़प्पा और सिन्ध में मोहेनजोदड़ो। सिन्धु नदी इन्हें एक दूसरे से जोड़ती थी। तीसरा नगर सिन्ध प्रांत में चहुन्दड़ो था जो मोहेनजोदड़ो से लगभग 130 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। चौथा नगर गुजरात में खम्भात की खाड़ी के ऊपर लोथल नामक स्थान पर है।

    पांचवा नगर उत्तरी राजस्थान में कालीबंगा नामक स्थान पर तथा छठा नगर हरियाणा के हिसार जिले में बनवाली नामक स्थल पर है। बनवाली में भी कालीबंगा की तरह दो सांस्कृतिक अवस्थाओं- हड़प्पा पूर्व सभ्यता और हड़प्पा-कालीन सभ्यता के दर्शन होते हैं। बिना पकी ईटों के चबूतरों, सड़कों और मोरियों के अवशेष हड़प्पा-पूर्व युग के हैं। इन समस्त स्थलों पर उन्नत और समृद्ध हड़प्पा संस्कृति के दर्शन होते हैं।

    सुत्कांगाडोर और सुरकोटड़ा के समुद्रतटीय नगरों में भी इस संस्कृति के उन्नत रूप के दर्शन होते हैं जहाँ नगर दुर्ग स्थित हैं। गुजरात के काठियावाड़ प्रायद्वीप में रंगपुर और रोजड़ी एवं कच्छ क्षेत्र में धौलावीरा नामक स्थलों पर इस संस्कृति की उत्तरावस्था के दर्शन होते हैं। हरियाणा में राखीगढ़ी तथा कुणाल एवं उत्तर प्रदेश में हिण्डन नदी के किनारे आलमगीरपुर में भी इस संस्कृति के दर्शन होते हैं।

    सैन्धव सभ्यता का काल

    सिन्धु-घाटी की सभ्यता कितनी पुरानी है, इसका ठीक-ठीक निश्चय नहीं हो पाया है। बुलीहॉल, गार्डन चाइल्ड, बेक आदि विद्वान विश्व की नदी घाटी सभ्यताओं में सिन्धु सभ्यता को सबसे प्राचीन एवं प्रारम्भिक मानते हैं। कुछ विद्वानों ने इसे ईसा से 5,000 वर्ष पूर्व, कुछ ने 4,000 वर्ष पूर्व, कुछ ने 3,000 वर्ष पूर्व और कुछ ने केवल 2,500 वर्ष पूर्व की बताया है। डॉ. राधकुमुद मुकर्जी ने इसे विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता बताते हुए लिखा है- 'सिन्धु-घाटी की सभ्यता का न तो मेसोपोटामिया की सभ्यता के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है और न वह उसकी ऋणी है।'

    जॉन मार्शल और डॉ. राधाकुमुद मुकर्जी का मत है कि सिन्धु सभ्यता का प्रारम्भ ई.पू.3250 से भी बहुत पहले हुआ होगा। प्रो. के. एन. शास्त्री और डॉ. राजबली पाण्डेय इसे ई.पू. 4000 साल पुरानी सभ्यता मानते हैं। अब यह धारणा दृढ़ होती जा रही है कि सिन्धु-सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यता है। डी. पी. अग्रवाल ने रेडियो कार्बन पद्धति के आधार पर इसका समय 2300 ई.पू. से 1750 ई.पू. तक बताया है।

    डॉ पाण्डेय का मत है कि- 'सिंधु सभ्यता की खुदाई में जल के धरातल तक प्राचीन नगरों के खण्डहरों के एक के उपर एक, सात स्तर मिले हैं। यदि एक नगर के बसने, पनपने और उजड़ने के लिए 500 साल का समय दिया जाए तो सात नगरों के बसने, विकसित होने और उजड़ने में लगभग 3500 साल लगे होंगे। सबसे नीचे का स्तर भी सभ्य नगर का अवशेष है, जिसके पूर्व सभ्यता विकसित हो चुकी थी और यदि भू-गर्भ का पानी बीच में बाधा न डालता तो सातवें स्तर के नीचे भी खण्डहरों के स्तर मिल सकते हैं। इस प्रकार सिन्धु सभ्यता कम से कम ईसा पूर्व चार हजार वर्ष की है।'

    बलोचिस्तान एवं मकरान में मिली पुरातत्विक वस्तुओं के आधार पर भी यह माना जाता है कि सिन्धु सभ्यता का प्रारम्भ ईसा से 4000 साल पूर्व क्वेटा, अमरी, नाल, कुली, झोव आदि स्थानों पर छोटी बस्तियों के रूप में हो गया था। डॉ. राधाकृष्णन की मान्यता है कि सिन्धु सभ्यता ई.पू.3500 से ई.पू.2250 के मध्य अपने चरम पर थी। सर मोरटीमर व्हीलर इस सभ्यता को ई.पू.2500 से ई.पू.1500 के मध्य की मानते हैं। डॉ. फ्रेंकफर्ट ने इसका काल ई.पू.2800 का माना है।

    डॉ. फबरी ने इसका समय ई.पू.2800-2500 माना है। नवीनतम खोजों के आधार पर डॉ. अर्नेस्ट मैके ने भी डॉ. फबरी के मत की पुष्टि की है। 'कार्बन-14 परीक्षण प्रणाली' के अनुसार सिन्धु सभ्यता का काल एक विवादास्पद प्रश्न है परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि ई.पू.3000 में भारत-भूमि पर सिन्धु सभ्यता के रूप में स्वतंत्र एवं समृद्ध सभ्यता विकसित हो चुकी थी और यह सभ्यता मेसोपोटामिया तथा सुमेरियाई सभ्यताओं से किसी भी प्रकार कम उन्नत नहीं थी।

    डॉ. फ्रैंकफर्ट ने लिखा है- 'यह बिना किसी सन्देह के निर्धारित हो चुका है कि भारत ने एक ऐसी संस्कृति के निर्माण में अपनी भूमिका अदा की जिसने यूनानियों के पहले इस विश्व को सभ्य बनाया।'

    हड़प्पा सभ्यता के तीन स्तर

    हड़प्पा सभ्यता के तीन स्तर पाए गए हैं- (1.) प्रारंभिक काल (ई.पू.3500 से ई.पू.2800 ई.पू.), (2.) मध्य-काल या चरमोत्कर्ष काल ( ई.पू.2800 से ई.पू.2200) तथा (3.) अवनति काल ( ई.पू.2200 से ई.पू.1500)

    कांस्य कालीन सभ्यता

    सैन्धव सभ्यता प्रधानतः कांस्य कालीन सभ्यता थी तथा उस काल के तृतीय चरण की सभ्यता है। इसका गम्भीरता पूर्वक अध्ययन करने पर इसमें कांस्य-काल की चरमोन्नति दिखाई देती है। कांस्य कालीन सभ्यता कालक्रम के अनुसार ताम्र कालीन सभ्यता के बाद की तथा लौह कालीन सभ्यता के पूर्व की ठहरती है।

    समकालीन सभ्यताओं से सम्पर्क

    हड़प्पा सभ्यता का तत्कालीन अन्य सभ्यताओं से घनिष्ठ सम्बन्ध रहा होगा। ये लोग पहिए वाली बैलगाड़ियों एवं जल-नौकाओं का उपयोग करते थे। अरब सागर में तट के पास उनकी नौकाएं चलती थीं। बैलगाड़ियों के पहिए ठोस होते थे। हड़प्पा संस्कृति के लोग आधुनिक इक्के जैसे वाहन का भी उपयोग करते थे। इस कारण अन्य स्थानों के लिए इनका आवागमन एवं परिवहन पहले की सभ्यताओं की तुलना में अधिक सुगम था।

    हड़प्पा तथा मोहेनजोदड़ो की खुदाइयों में बहुत सी ऐसी वस्तुएँ मिली हैं जो सिन्धु घाटी में नहीं होती थीं। ये वस्तुएँ बाहर से मंगाई जाती होंगी और उन देशों से हड़प्पावासियों के व्यापारिक सम्बन्ध रहे होंगे। सोना, चांदी, ताम्बा आदि धातुएं सिन्धु-प्रदेश में नहीं मिलती थीं। इन धातुओं को ये लोग अफगानिस्तान तथा ईरान से प्राप्त करते होंगे। हड़प्पावासी ताम्बा राजस्थान से, सीपी और शंख काठियावाड़ से तथा देवदारु की लकड़ी हिमालय पर्वत से प्राप्त करते होंगे। अनुमान है कि हड़प्पा संस्कृति के राजस्थान, अफगानिस्तान और ईरान की अन्य मानव बस्तियों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध थे।

    हड़प्पा संस्कृति के लोगों के, दजला तथा फरात प्रदेश के नगरों के साथ भी व्यापारिक सम्बन्ध थे। सिन्धु सभ्यता की कुछ मुहरें मेसोपोटामिया के नगरों से मिली हैं। अनुमान होता है कि मेसोपोटामिया के नगर-निवासियों द्वारा प्रयुक्त कुछ शृंगार साधनों को हड़प्पावासियों ने अपनाया था। लगभग ई.पू.2350 से आगे के मेसोपोटामियाई अभिलेखों में मैलुह््ह के साथ व्यापारिक सम्बन्ध होने के उल्लेख मिलते हैं। यह सम्भवतः सिन्धु प्रदेश का प्राचीन नाम था।

    सभ्यता के निर्माता

    यह प्रश्न आज भी नहीं सुलझ पाया है कि सिन्धु सभ्यता के निर्माता कौन थे! सिन्धु सभ्यता के विभिन्न केन्द्रों की खुदाई में प्राप्त नर-कंकालों की शारीरिक बनावट के विश्लेषण के आधार पर मानवशास्त्र वेत्ताओं ने सिन्धु सभ्यता का विकास करने वालों लोगों को चार नस्लों- (1.) आदिम आग्नेय, (2.) मंगोलियन, (3.) भूमध्यसागरीय तथा (4.) अल्पाइन से सम्बन्धित बताया है। इनमें से भूमध्यसागरीय जाति के लोगों की खोपड़ियां सर्वाधिक संख्या में मिली हैं जबकि मंगोलियन तथा अल्पाइन नस्ल के लोगों की केवल एक-एक खोपड़ी मिली है। अतः जब तक सिन्धु सभ्यता के स्थलों से प्राप्त मोहरों पर अंकित लिपि को पढ़ नहीं लिया जाता तब तक यह कहना कठिन होगा कि इस सभ्यता के निर्माता किस जाति या नस्ल के थे? सैन्धव सभ्यता के निर्माताओं के सम्बन्ध में विद्वानों में विभिन्न मान्यताएँ प्रचलित हैं-

    (1.) सैन्धव सभ्यता के निवासी मिश्रित नस्ल के थे- सिंधु सभ्यता से मिली चार नस्लों की खोपड़ियों के आधार पर कर्नल स्युअल और डॉ गुह्बा की मान्यता है कि सिन्धु सभ्यता का निर्माण किसी एक नस्ल अथवा जाति के लोगों ने नहीं किया। सिन्धु सभ्यता नागरिक सभ्यता थी। इसके मुख्य नगर व्यापार तथा वाणिज्य के प्रमुख केन्द्र बने हुए थे। अतः आजीविका की तलाश में अनेक प्रजातियों के लोग यहाँ आकर बस गए थे।

    (2.) सैन्धव सभ्यता के निवासी द्रविड़़ थे- सर जॉन मार्शल तथा प्रो. रामलखन बनर्जी आदि कुछ विद्वानों ने माना है कि चूँकि खुदाई में प्राप्त नर-कंकालों में भूमध्यसागरीय नस्ल की प्रधानता है, अतः इस सभ्यता के निर्माण का श्रेय द्रविड़़ों को दिया जाना चाहिए। द्रविड़ लोग भूमध्यसागरीय नस्ल की ही एक शाखा थे। कुछ विद्वान बलोचिस्तान आदि भागों में बोली जाने वाली 'ब्राहुई' भाषा तथा द्रविड़ों की भाषा मंः समानता के कारण भी द्रविड़ों को इस सभ्यता का निर्माता मानते हैं। दक्षिण भारत के द्रविड़ों के मिट्टी तथा पत्थर के बर्तन और आभूषण सिन्धु-घाटी के लोगों के बर्तन तथा आभूषणों से मिलते-जुलते हैं।

    (3.) सैन्धव सभ्यता के निवासी सुमेरियन थे- प्रोफेसर चाइल्ड ने सुमेरियन लोगों को इस सभ्यता का निर्माता माना है। डॉ. हाल ने भी उनके मत की पुष्टि की है। पिगट के अनुसार इस सभ्यता का मूल पूर्णतः भारतीय था परन्तु वे इस पर सुमेरियन प्रभाव को भी स्वीकार करते हैं।

    (4.) सैन्धव सभ्यता के निवासी आर्य थे- लक्ष्मण स्वरूप, रामचंद्र, शंखरानन्द, दीक्षितार तथा डॉ. पुसालकर के अनुसार सैन्धव सभ्यता के निर्माता या तो आर्य थे अथवा आर्यों ने इस सभ्यता के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया था। डॉ. पुसालकर के शब्दों में- 'यह आर्य और अनार्य सभ्यताओं के मिश्रण का प्रतिनिधित्व करती है। अधिक से अधिक हम यह कह सकते हैं कि सम्भवतः ऋग्वैदिक आर्य वहाँ की जनता का एक महत्त्वपूर्ण भाग थे और उन्होंने भी सिन्धु घाटी की सभ्यता के विकास में अपना योग दिया।'

    (4.) सैन्धव निवासी असुर थे- एक विद्वान के विचार में सिन्धु-सभ्यता के निर्माता वही असुर थे जिसका वर्णन वेदों में मिलता है।

    निष्कर्ष

    सैन्धव सभ्यता की खुदाई में विभिन्न जातियों से सम्बद्ध मानवों की हड्डियाँ मिली हैं अतः यह मानना उचित होगा कि सिन्धु-घाटी के निर्माता मिश्रित जाति के थे तथापि सैन्धव समाज में द्रविड़ जाति की प्रधानता थी। सैन्धव सभ्यता के निर्माता जो भी रहे होंगे किंतु उनकी कुछ बातें उन्हें अपनी समकालीन मानव सभ्यताओं से बिल्कुल अलग करती हैं। सैन्धव सभ्यता के लोग अपने भवनों का निर्माण पक्की ईंटों से करते थे जबकि सुमेरियन सभ्यता के लोग कच्ची ईंटों के मकान बनाते थे।

    सिंधु सभ्यता के स्थलों से न तो सुमेरियन शहरों की तरह मन्दिर मिले हैं और न मिस्र के नगरों जैसे महल या मकबरे। सिंधु सभ्यता में लिंगपूजा, योनिपूजा, पीपल पूजा, बड़े कूबड़ एवं विशाल सींगों वाले बैलों का महत्त्व, स्नान-ध्यान का महत्त्व और सफाई का महत्त्व आदि ऐसे प्रमाण मिले हैं जो अन्य समकालीन अथवा पूर्ववर्ती सभ्यताओं से प्राप्त नहीं हुए हैं। सैन्धव सभ्यता के स्थलों से प्राप्त पुरुष प्रतिमाओं के केशविन्यास, मुद्राएं, बाट, खिलौने, मृण्मूर्तियाँ आदि वस्तुएं सैंधव संस्कृति को अन्य पूर्ववर्ती अथवा समकालीन सभ्यताओं से पूरी तरह अलग करती हैं।

    सैन्धव धर्म

    सिंधु सभ्यता के निवासी भलीभांति शिक्षित थे और उन्होंने लिपि, लेखन कला, मूर्तिकला, चित्रकला, नृत्यकला एवं संगीतकला आदि विविध कलाओं के साथ-साथ धार्मिक विश्वासों एवं रीति-रिवाजों का विकास कर लिया था। उनकी कलाप्रियता, धार्मिक विश्वासों एवं रीति-रिवाजों का परिचय सिंधु सभ्यता की मुद्राओं पर बनी आकृतियों, बर्तनों पर की गई चित्रकारियों, शवाधानों में मिली वस्तुओं आदि से मिलता है। सिंधु सभ्यता की लिपि को अभी तक ठीक से नहीं पढ़ा जा सका है।

    इस कारण उनकी भाषा और उसमें व्यक्त विचारों का ज्ञान नहीं हो सका है। फिर भी विविध स्थलों की खुदाई से प्राप्त मुद्राओं, लिंगों, योनियों, आभूषणों, बर्तनों एवं भवनावशेषों से इस विषय पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है कि सैन्धव संस्कृति के विकास के पीछे गहरी धार्मिक मान्यताएँ विद्यमान थीं। वे आधुनिक भारतीयों की तरह जल, अग्नि, सूर्य, वायु, धरती आदि प्राकृतिक शक्तियों के साथ-साथ वृक्षों एवं पशु-पक्षियों की पूजा करते थे।

    विश्वरूप स्रष्टिकर्ता अथवा परमपुरुष की उपासना

    सिन्धुवासियों द्वारा मन्दिरों में पूजा-उपासना करने का कोई साक्ष्य नहीं मिला है किन्तु सिन्धु सभ्यता की खुदाई में मिली कुछ मुद्राएं, लिंग, योनियां एवं मातृदेवियों की मूर्तियाँ सिधु सभ्यता के धार्मिक विश्वासों का परिचय देती हैं जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि सिंधु सभ्यता के निवासी प्रजनन शक्तियों की परिचायक शक्तियों की पूजा देवी-देवता के रूप में करते रहे होंगे।

    खुदाई में मिली एक मुद्रा पर तीन मुख वाला उर्ध्वलिंग व्यक्ति योग मुद्रा में बैठा हुआ है। इस व्यक्ति के सिर पर दो सींग बने हैं और उनके बीच में पंखेदार आकृति का तिकोना मुकुट धारण किया हुआ है। इस योगी के गले में तिकोनी माला है और हाथों में ऊपर तक मणियों की लड़ियाँ हैं। योगी के निकट हाथी, चीता, गैण्डा और भैंसा बने हुए हैं और उसके आसन के नीचे हरिणों का एक जोड़ा है। मुद्रा के उपरी हिस्से पर छः शब्द अंकित हैं जिन्हें पढ़ा नहीं जा सका है।

    बहुत से विद्वानों का मत है कि मुद्रा पर अंकित चित्र भगवान शिव का है क्योंकि शिव को योगीश्वर, त्रिशूलधारी, पशुपति, त्रयम्बक तथा त्रिनेत्रधारी कहा जाता है। इस योगी के साथ शिव के विशिष्ट वाहन नन्दी का कोई अंकन नहीं किया गया है जिससे प्रतीत होता है कि यह प्रतिमा भगवान शिव की नहीं है अपितु 'विश्वरूप त्वष्टा' की है जिसकी चर्चा ऋग्वेद में हुई है। वहाँ इसे विश्वकर्मा प्रजापति का रूप एवं पुत्र बताया गया है। यह सृष्टि में स्रष्टा के अवतार का प्रतीक है। इनके तीन सिर, मन, प्राण और वाक् को प्रकट करते हैं जिनसे विश्व की सृष्टि होती है।

    योगी का ऊर्ध्वलिंग स्रष्टा की प्रजनन शक्ति का परिचायक है। इसके आसन के नीचे बने हुए दो हरिण, प्रजापति और उषा के, हरिण और हरिणी के रूप में सम्भोग करने के सूचक हैं, जिसकी चर्चा मैत्रायणि संहिता और ऐतरेय ब्राह्मण में आई है। इसके दोनों और दिखाए गए पशुओं के चित्र ऋग्वेद में वर्णित त्वष्टा के पशुपति रूप को प्रकट करते हैं। सिन्धु घाटी की खुदाई में मिली एक अन्य मुद्रा पर एक अन्य योगी का चित्र है जिसके दोनांे ओर एक-एक नाग तथा सामने दो नाग बैठे हैं।

    कुछ विद्वानों का मानना है कि नागों से घिरा हुआ योगी का यह चित्र भी भगवान शिव का है, क्योंकि वे अपने गले में नाग धारण करते हैं। एक अन्य मुद्रा पर एक धनुर्धारी शिकारी का चित्र पाया गया है। विद्वानों की मान्यता है कि यह चित्र किरात वेशधारी भगवान शिव का है। इन समस्त साक्ष्यों से ऐसा प्रतीत होता है कि इस देवता की आकृति के पीछे 'विश्वरूप स्रष्टिकर्ता' अथवा 'परम पुरुष' की परिकल्पना है।

    परमनारी की पूजा

    सिन्धु नगरों की खुदाई में मिट्टी की बनी हुई बहुत सी नारी मूर्तियाँ मिली हैं जिनसे अनुमान होता है कि सिन्धु संस्कृति में परमनारी की पूजा अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान रखती होगी। विद्वानों का मत है कि ये मूर्तियाँ मातृदेवी या प्रकृति देवी की हैं। अतः सिंधुुवासी पृथ्वी माता की प्रतीक किसी देवी की पूजा करते थे। इस देवी की पूजा समस्त कृषि प्रधान समाजों में प्रचलित थी। वे लोग देवी के समक्ष पशु-पक्षी अथवा नरबलि देते थे और उसके बदले में वह उन्हें धनधान्य देती थी।

    कालान्तर में मातृदेवी की उपासना से ही शक्ति-पूजा की परम्परा का विकास हुआ होगा। मातृदेवी की मूतियाँ प्रायः नग्न रूप में मिली हैं। मूर्ति की कमर में पटका और मेखला तथा गले में हार प्रदर्शित किया गया है। सिर पर कुल्हाड़ी से मिलती-जुलती आकृति की कोई वस्तु भी दिखाई पड़ती है। कुछ मूर्तियों में देवी को जननी के रूप में दिखाया गया है। इन मूर्तियों में देवी द्वारा शिशु को स्तनपान करते हुए प्रदर्शित किया गया है।

    एक मूर्ति में एक ऐसी स्त्री बनी हुई है जिसके गर्भ से एक वृक्ष निकलता हुआ प्रदर्शित किया गया है। सम्भवतः यह वानस्पतिक जगत की देवी का प्रतीक हो। एक अन्य मूर्ति के शीश पर एक पक्षी पंख फैलाए बैठा है। संभवतः यह पक्षी जगत की देवी की प्रतीक हो। इन सब प्रमाणों से स्पष्ट है कि सिन्धुवासी मातृदेवी को समस्त लोक की जननी एवं पालनकर्ता मानते थे। बहुत सी मूर्तियों के दोनों ओर दो प्याले अथवा दीपक प्रदर्शित हैं और इन मूर्तियों के अग्रभाग पर धूम्र के निशान मिले हैं। इससे अनुमान लगाया जाता है कि सिन्धुवासी इन प्यालों में तेल अथवा धूप जलाकर मातृदेवी अथवा पृथ्वी माता की प्रतीक किसी देवी की पूजा करते थे।

    प्रजनन शक्ति की पूजा

    परमपुरुष और परमनारी के साथ-साथ सिन्धुवासी प्रजनन शक्ति की, लिंग एवं योनि के प्रतीकांे के रूप में भी पूजा करते थे। हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो में बहुत से लिंग मिले हैं। ये सामान्य पत्थर, लाल पत्थर अथवा नीले पत्थर के बने हैं। ये लिंग कुछ इंच से लेकर चार फुट की ऊँचाई तक के हैं।

    विद्वानों का मत है कि सिंधुुवासी छोटे आकार के लिंगांे की पूजा अपने घरों में करते थे और बड़े आकार के लिंग विशेष स्थानों अथवा चबूतरों पर प्रतिष्ठित करके पूजे जाते थे। आधुनिक हिन्दू-धर्म में लिंग पूजा संभवतः सिन्धुवासियों की ही देन है। अर्नेस्ट मैके का मत है कि लिंग की आकृति केे जो पत्थर मिले हैं उन्हें पूजा का प्रतीक नहीं समझना चाहिए। उनसे सम्भवतः कूटने-पीसने का काम लिया जाता रहा होगा जैसाकि आज भी मूसल, लोढ़े अथवा बट्टे से लिया जाता है।

    खुदाई में पत्थर, चीनी मिट्टी तथा सीप के बने बहुत से छल्ले मिले हैं जिनका आकार आधा इंच से लेकर चार इंच तक है। बहुत से विद्वानों ने इन छल्लों को योनियों का प्रतीक मानकार यह मत व्यक्त किया है कि सिन्धुवासी योनि की पूजा भी करते थे। आर्य लोग योनि पूजक नहीं थे। अतः आज भारत में लिंग-योनि पूजा की जो परम्परा देखने को मिलती है, वह निस्सन्देह अनार्यों की देन है। छल्लों के बारे में मैके का मत है कि अधिकांश छल्ले स्तम्भों के आधार थे न कि योनियों के प्रतीक।

    वृक्ष-पूजा

    सिंधु स्थलों की खुदाई में प्राप्त अनेक मुद्राओं पर वृक्षों के चित्र मिले हैं जिनके आधार पर विद्वानों का मत है कि सिन्धुवासी वृक्षों की पूजा करते थे। एक मुद्रा पर दो पशुओं के शीश पर पीपल की नौ पत्तियाँ अंकित हैं। एक अन्य मुद्रा पर एक नग्न स्त्री का चित्र है जिसके दोनों ओर एक-एक टहनी बनी है। उसके सामने पत्तियों का मुकुट पहने एक अन्य आकृति का चित्र है। मार्शल का मत है कि मुद्रा में अंकित टहनियाँ पीपल की हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि वृक्ष-पूजा के दो रूप प्रचलित थे-

    (1.) वृक्ष को उसके प्राकृतिक रूप में पूजना, जैसे कि तुलसी पूजन।

    (2.) वृक्ष को किसी देवता के प्रतीक के रूप में पूजना, जैसे पीपल की पूजा।

    ऐसा प्रतीत होता है कि सिन्धुवासी पीपल को बड़ा पवित्र मानते थे। उनकी बहुत सी मुद्राओं पर पीपल के विविध अंकन मिलते हैं। कहीं उसे वेदिका से उगता हुआ दिखाया गया है तो कहीं इसके भीतर देवता को अंकित किया गया है। कहीं इसकी पांच पत्तों की टहनी और कहीं ग्यारह पत्तों की शाखा चित्रित की गई है। एक जगह इसकी पांच टहनियों पर सात पत्ते उपर की ओर, दो नीचे की ओर और एक बराबर में दिखाया गया है। कपड़ों और बर्तनों पर भी पीपल की टहनी और पत्तों के अनेक डिजाइन मिले हैं।

    वेदों में पीपल का पेड़ विश्व-सृष्टि के प्रतीक के रूप में अंकित है। तैतिरीय ब्राह्मण में ब्रह्म को वृक्ष कहा गया है। भारत में पीपल को ब्रह्म का रूप समझ कर पूजा जाता है। सिन्धु सभ्यता के नगरों तथा ग्रामोें के चौराहों और रास्तों पर बड़े-बड़े पीपल के पेड़ रहे होंगे, जिनकी जड़ों को स्त्री-पुरुष पूजते और जल से सींचते होंगे, जैसा कि आज भी होता है। कुछ विद्वानों की मान्यता है कि सिन्धुवासियों में पीपल के साथ-साथ तुलसी, नीम, खजूर, बबूल आदि वृक्षों की पूजा भी प्रचलित रही होगी। भारत में वृक्ष-पूजा की परम्परा बहुत पुरानी है। बौद्ध मतानुयायी भी पीपल की पूजा करते थे।

    पशु-पूजा

    वृक्ष-पूजा के साथ-साथ सिन्धुवासी पशु-पूजा में भी विश्वास रखते थे। कुछ मुद्राओं पर बैल के चित्र मिले हैं। खिलौनों के रूप में भी बैल मिले हैं। मोहेनजोदड़ो के एक ताम्रपत्र पर कूबड़दार बैल अंकित किया गया है। इसलिए विद्वानों का अनुमान है कि सैन्धव सभ्यता में बैल का बड़ा महत्त्व रहा होगा। शहरों की सड़कों पर बड़े-बड़े बैल विचरते हांेगे और लोग श्रद्धा से उन्हें भोजन आदि देते होंगे। विद्वानों का अनुमान है कि बैल की पूजा शक्ति के प्रतीक के रूप में की जाती होगी।

    वैदिक साहित्य में भी बैल को देवत्व का प्रतीक और बड़ा पवित्र समझा गया है। बैल की भांति भैंस और भैंसा की भी पूजा की जाती थी, क्योंकि अनेक मुद्राओं पर इनके चित्र मिले हैं। गाय की पूजा भी अवश्य होती थी। एक मुद्रा पर गाय की पूजा करते हुए एक मनुष्य का चित्र अंकित है। नाग-पूजा काफी प्रचलित थी। एक चबूतरे पर लेटे हुए नाग को दिखाया गया है। सिंधु सभ्यता से प्राप्त विभिन्न मुद्राओं पर हाथी, बाघ, भेड़, बकरी, गैंडा, हिरण, ऊँट, घड़ियाल, गिलहरी, तोता, मुर्गा, मोर आदि पक्षियों के चित्र भी मिले हैं।

    सम्भव है कि ये पशु-पक्षी हिन्दू-धर्म की भांति सैन्धव धर्म में भी विभिन्न देवी-देवताओं के वाहन रहे हों। सैन्धव प्रदेश की कुछ मुद्राओं पर मनुष्य को चीते से लड़ते हुए दिखाया गया है। इस चित्र में वृक्ष पर चढ़ा हुआ आदमी चीते को भगा रहा है तथा भागता हुआ चीता पीछे की ओर मुँह करके देख रहा है। इन मुद्राओं से अनुमान होता है कि उस काल में चीते बड़ी संख्या में पाए जाते थे और मानवों का उनसे निरंतर संघर्ष चल रहा था। सैन्धववासी, पशुओं की आकृति विचित्र ढंग से बनाते थे।

    कुछ पशु आधे मनुष्य और आधे पशु हैं। आधा भेड़, आधा बकरा, आधा हाथी और आधा बैल या इसी प्रकार के अन्य मिश्रण से पशुओं की आकृति बनाते थे। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वे इनमें दैवीय अंश मानकर इनकी पूजा करते थे।

    अग्नि-पूजा

    सैन्धव लोग अग्नि-पूजा भी करते थे। कालीबंगा के मकानों में कोयले, राख तथा जली हुई लकड़ियों से भरे हुए गड्ढे मिले हैं। एक चबूतरे पर कुआँ खुदा हुआ है तथा अग्नि स्थान पर पक्की ईंटों से निर्मित एक आयताकार गड्ढा मिला है जिसमें पशुओं की हड्डियां पाई गईं। दूसरे चबूतरे पर आयताकार सात अग्नि-वेदिकाएं एक कतार में थीं। यह कोई यज्ञभूमि प्रतीत होती है, जहाँ सामूहिक रूप से बैठकर यज्ञ करते थे। कुएं, हड्डियों भरे हुए गड्ढे तथा यज्ञवेदियों के पास-पास मिलने से अनुमान किया जाता है कि सैन्धव लोग नहाकर पवित्र होने के बाद यज्ञ करते थे तथा इस अवसर पर पशु-बलि दिया करते थे।

    कुछ मूर्तियों एवं मुद्राओं के हिस्से धुएं से काले पड़े हुए हैं। अनुमान है कि सैंधव-वासी पूजा में धूप-दीप का भी प्रयोग करते थे।

    जल-पूजा

    मोहेनजोदड़ो के दुर्ग की खुदाई में एक बहुत बड़ा जलाशय मिला है। ईंटों के स्थापत्य का यह एक सुंदर नमूना है। यह 11.88 मीटर लंबा, 7.01 मीटर चौड़ा और 2.43 मीटर गहरा है। यह पक्की ईटों का बना हुआ है और इसकी दीवारें मजबूत हैं। जलाशय के चारों और एक बारामदा है जिसकी चौड़ाई 5 मीटर है। जल-कुण्ड के दक्षिण-पश्चिम की ओर आठ स्नानागार बने हुए हैं। इन स्नानागारों के ऊपर कमरे बने हुए थे जिनमें सम्भवतः पुजारी रहते थे।

    जलाशय के निकट एक कुआं भी मिला है जिसके पानी से जलाशय को भरा जाता होगा। जलाशय को भरने तथा खाली करने के लिए नल बने होते थे। जलाशय के दोनों सिरों पर स्नानागार की सतह तक सीढ़ियां बनी हुई हैं। अनुमान है कि इस विशाल स्नानागार का उपयोग आनुष्ठानिक स्नान के लिए होता था तथा धार्मिक प्रथाओं में शारीरिक शुद्धि अथवा स्नान-ध्यान पर विशेष ध्यान दिया जाता होगा। आज भी भारत के धार्मिक कृत्यों में ऐसे स्नान का बड़ा महत्त्व है। ऐसा प्रतीत होता है कि सिंधुुवासी जल को भी देवता मानकर उसकी पूजा करते थे।

    धार्मिक चिह्न

    खुदाई में प्राप्त अनेक अवशेषों पर सींग, स्तम्भ और स्वास्तिक के चिह्न मिलते हैं। विद्वानों का मत है कि इन चिह्नों का भी कुछ धार्मिक महत्त्व रहा होगा। सम्भव है कि यह चिह्न किसी देवी-देवता के प्रतीक रहे हों अथवा किसी धार्मिक भावना के प्रतीक के रूप में इनकी पूजा की जाती हो।

    यह भी संभव है कि इन चिह्नों के माध्यम से रोग, बुरी नजर, प्रेतात्माओं आदि को दूर भगाया जाता हो। कुछ मुद्राओं पर बने चित्रों में नर-नारियों को सींग धारण किए हुए दिखाया गया है। संभवतः शीश पर सींग धारण करने का भी कुछ धार्मिक महत्त्व था। इसी प्रकार स्तम्भ, स्वास्तिका और धूप-दीप आदि के प्रदर्शन का भी धार्मिक महत्त्व रहा होगा। हिन्दू-धर्म में आज भी स्वास्तिक, शंख, मछली आदि चिह्नों को पवित्र माना जाता है। माण्डने बनाने की प्रथा भी इन्हीं चिह्नों के अंकन की परम्परा का विकास हो सकता है।

    मूर्ति-पूजा

    मुद्राओं पर अंकित देवी-देवताओं के चित्रों तथा धार्मिक चिह्नों के अंकन से निश्चित हो जाता है कि सैन्धव लोग ईश्वर की सगुण-साकार उपासना करते थे और उनमें मूर्ति-पूजा प्रचलित थी किंतु वे लोग इन मूर्तियों की स्थापना एवं धार्मिक चिह्नों के अंकन के लिए मंदिर नहीं बनाते थे क्योंकि सैंधव स्थलों की खुदाई में अभी तक मंदिर जैसी कोई रचना नहीं मिली है। कुछ विद्वानों का मानना है कि मोहेनजोदड़ो में जिस स्थान पर कुषाणकालीन बौद्ध-स्तूप खड़ा है, उसके नीच सैन्धव वासियों का मन्दिर दबा हुआ हो सकता है।

    धार्मिक अनुष्ठानों में नृत्य एवं संगीत का महत्त्व

    सर जॉन मार्शल ने मुद्राओं पर अंकित विभिन्न नारी आकृतियों का अध्ययन करके यह निष्कर्ष निकाला है कि ये नारी मूर्तियाँ मन्दिरों की उपासिकाएँ रही होंगी। खुदाई में प्राप्त निर्वस्त्र नृत्यांगना को विद्वानों ने देवदासी या उपासिका मानकर देवदासी प्रथा प्रचलित होने की कल्पना भी की है। संगीत एवं नृत्य के द्वारा देवताओं को प्रसन्न करने की परिपाटी भी रही होगी।

    पशु-बलि

    सैन्ध्व लोग, अपने देवताओं को प्रसन्न करने के लिए पशु-बलि भी देते होंगे। कालीबंगा में एक चबूतरे पर सात यज्ञकुण्डों की कतार वाले चबूतरे के निकट स्थित दूसरे चबूतरे पर खुदे कुएं के पास के गड्ढे में पशुओं की हड्डियां मिली हैं जिनसे प्रतीत होता है कि यज्ञों के समय पशु-बलि दी जाती होगी। यह भी संभव है कि बलि देने से पशुओं को भी जल से स्नान कराया जाता हो।

    योग साधना

    सैन्धव स्थलों से प्राप्त बहुत सी मुद्राओं पर योगियों की मूर्तियाँ बनी हुई हैं। उनकी योगसन मुद्राओं के आधार पर कह कहा जा सकता है कि सैन्धव सभ्यता में योग साधना का बड़ा महत्त्व था।

    परलोक में विश्वास

    सैन्धव लोग मानव जीवन की यात्रा केवल इसी लोक तक सीमित नहीं समझते थे इसलिए वे शव को या तो विधि-विधान पूर्वक शवाधानों में गाढ़ते थे। या उसे जलाकर उसकी भस्मी कलश में रख दी जाती थी। शव को गाढ़ते समय या उसकी भस्मी के कलश के साथ पशु-पक्षी, मछली, मनके, कड़े, बर्तन आदि चीजें रखते थे। संभवतः उनका विश्वास था कि मनुष्य को दूसरे लोक में पहुँचकर ये वस्तुएं प्राप्त होंगी। एक मृद्भाण्ड पर बकरा, गाय या बैल एवं कुत्ता अंकित है। इस अंकन का आशय पशु-बलि से हो सकता है। कुछ मुद्राएँ गण्डे एवं ताबीज की तरह बनाई गई हैं जो संभवतः गले में पहनी जाती होंगी या भुजाओं एवं कमर पर बांधी जाती होंगी। इन ताबीजों से अनुमान होता है कि सैन्धव-वासी जादू व टोने-टोकटे में भी विश्वास करते थे।

    आधुनिक हिन्दू-धर्म के साथ तुलना

    सिन्धु वासियों के धर्म तथा आधुनिक हिन्दू-धर्म में अनेक आश्चर्यजनक समानताएं हैं। इस आधार पर स्टुअर्ट, पिगट तथा जॉन मार्शल आदि पश्चिमी इतिहासकारों की मान्यता है कि आधुनिक हिन्दू-धर्म का स्रोत सिन्धु घाटी रहा होगा। जॉन मार्शल ने लिखा है- 'सिन्धु घाटी के धर्म में बहुत सी ऐसी बातें हैं जिनसे मिलती जुलती बातें हमें अन्य देशों में भी मिल सकती हैं और यह बात समस्त प्रागैतिहासिक धर्मों के विषय में ठीक सिद्ध होगी किंतु उनका धर्म इतनी विशेषता के साथ भारतीय है कि आधुनिक युग में प्रचलित हिन्दू-धर्म से बड़ी कठिनाई से ही उसका भेद किया जा सकता है।

    सैन्धव समाज

    सैन्धव सभ्यता की खुदाई में मिली वस्तुओं से सैन्धव समाज की विस्तृत जानकारी मिलती है। आवासों की बनावट एवं नगर योजना के आधार पर कहा जा सकता है कि सैन्धव समाज में लोगों का सामाजिक स्तर एक जैसा नहीं था। समाज कई वर्गों में विभाजित था। पुजारी, पदाधिकारी, ज्यातिषि, वैद्य, आदि लोगों को उच्च वर्ग का समझा जाता होगा। कृषक, बढ़ई, कुम्हार, मछुआरे, मल्लाह, गाड़ीवान, चरवाहे आदि कर्मकार निम्न वर्ग के रहे होंगे। नगर में ऊँचे स्थान पर बने दुर्ग इस बात का प्रमाण हैं कि सैन्धव समाज में कोई न कोई राजनैतिक व्यवस्था विद्यमान थी।

    भवन निर्माण

    सैन्धव स्थलों की खुदाई से प्राप्त भवन अवशेषों से सिंधु सभ्यता की भवन निर्माण कला की जानकारी मिलती है। सड़कों के दोनों किनारों पर मकान होते थे जो पक्की ईटों के बने होते थे। हड़प्पा संस्कृति के नगरों में पकाई हुई ईटों का उपयोग होना एक अदभुत बात है, क्योंकि मिस्र के समकालीन भवनों में मुख्यतः धूप में सुखाई गई ईटों का उपयोग होता था।

    समकालीन मैसोपोटामिया में भी सीमित मात्रा में पकाई हुई ईटों का उपयोग होता था किन्तु हड़प्पा संस्कृति के नगरों में पकाई हुई ईटों का उपयोग बहुत बड़े स्तर पर हुआ है। अधिकांश भवन दो मंजिलों के होते थे परन्तु दीवारों की मोटाई से पता लगता है कि दो से भी अधिक मंजिलों के मकान बनते थे। सिंधु सभ्यता के आवासीय भवनों के द्वार एवं खिड़कियाँ मुख्य मार्ग पर नहीं खुलते थे, अपितु गलियों और सहायक सड़कों की ओर खुलते थे। खुदाई में उच्च वर्ग एवं साधारण वर्ग के निवासियों के आवासीय भवनों के भग्नावशेष मिले हैं।

    साधारण वर्ग के लोगों के भवन छोटे होते थे जिनकी सामान्यतः लम्बाई 30 फुट और चौड़ाई 27 फुट होती थी। इस भवन में चार से पांच कक्ष होते थे। उच्च वर्ग के लोगों के घर बड़े होते थे जिनका आकार छोटे घरों की तुलना में दुगुना या उससे अधिक होता था और उनमें कक्षों की संख्या भी अधिक होती थी। कुछ विशाल भवनों के भग्नावशेष भी मिले हैं। एक भवन 242 फुट लम्बा और 115 फुट चौड़ा था। दीवारों में छेद बनाकर उनमें शहतीरें लगाई जाती थीं और फिर बल्लियाँ डालकर मजबूत चटाई बिछा देते थे। उस पर मिट्टी एवं गोबर से फर्श को पक्का बनाया जाता था। बड़े भवनों के दरवाजे बड़े तथा चौडे़ होते थे।

    कुछ मकानों के दरवाजे तो इतने चौड़े थे कि उनमें रथ तथा बैलगाड़ियाँ भी आ-जा सकती थीं। कमरों में दीवारों के साथ अलमारियाँ भी लगी होती थीं। हड्डियों तथा शंख की बनी कुछ ऐसी वस्तुएँ मिली हैं जिनसे ज्ञात होता है कि कमरों में खूंटियाँ भी लगी होती थीं। भवन में खिड़कियों तथा दरवाजों का पूरा प्रबन्ध रहता था जिससे हवा तथा प्रकाश की कमी न हो। दीवारों के निर्माण मंे पक्की ईंटों का प्रयोग किया जाता था। ईंटों का नाप आधुनिक ईंटों से काफी मिलता-जुलता है। ईंटों को आग में पकाया जाता था।

    दीवारों में ईंटों को जोड़ने के लिए मिट्टी का गारा काम लाया जाता था। धनिक या उच्च वर्ग के लोग मिट्टी के गारे में चूना भी मिलाते थे। मकानों का निर्माण नींव डालकर किया जाता था। दो मंजिले मकानों की नींव अधिक गहरी होती थी और ऐसे मकानों की पहली मंजिल की दीवारें भी अधिक चौड़ी बनाई जाती थीं। डॉ. मैके के अनुसार दीवारों पर प्लास्टर भी किया जाता था। निचली मंजिल से ऊपरी मंजिल पर जाने के लिए लकड़ी और पत्थर से सीढियां बनाई जाती थीं, जो प्रायः बहुत उँची व तंग होती थीं।

    अधिकांश मकानों के दरवाजे तीन या चार फुट चौड़े होते थे। कमरों में दीवारों के साथ अलमारियां भी बनाई जाती थीं। घरों के मध्य में प्रायः आँगन रखा जाता था। आँगन के एक कोने में रसोईघर होता था। घर के मुख्य प्रवेश द्वार के निकट स्नानागार तथा शौचालय बनाए जाते थे। ऐसा संभवतः जल निकासी की सुविधा के लिए किया जाता होगा। स्नानागार तथा शौचालय के फर्श पक्की ईंटों के होते थे। आँगन में पक्की ईंटों से चुना हुआ एक कुआँ होता था। कुछ कुंओं के भीतर सीढ़ियों के चिह्न भी मिले हैं। सैन्धव स्थलों से कुछ विशेष भवनों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।

    हड़प्पा एवं मोहेनजोदड़ो दोनों ही स्थानों से एक-एक दुर्ग अथवा गढ़ी के अवशेष मिले हैं जो नगर से अलग टीले पर बनाया गया था। हड़प्पा दुर्ग की लम्बाई 460 गज, चौड़ाई 215 गज और ऊंचाई लगभग 45-50 फुट है। गढ़ी की बाहरी दीवार में कई बुर्ज और द्वार बने हुए हैं। गढ़ी के समीप अनेक भवन स्थित थे जिनमें भण्डागार विशेष उल्लेखनीय है। छ-छः कमरों की दो पंक्तियों में बने बड़े-बड़े भवन भी मिले हैं। दोनों पंक्तियों के मघ्य काफी चौड़ा मार्ग है। ये भवन अन्न संग्रहण के काम में आते होंगे।

    इन भण्डागारों का मुख्य द्वार नदी की ओर था। सम्भवतः नदी मार्ग से ही इन भण्डागारों में अन्न सामग्री आती-जाती थी। इन भण्डागारों से थोडी दूर पर 18 बड़े-बड़े गोलाकार चबूतरे मिले हैं। चबूतरों के बीच में छेद होता था। अनुमान है कि ये चबूतरे अन्न पीसने के काम में आते होंगे। इन चबूतरों के उत्तर में सात-सात मकानों की दो पंक्तियाँ मिली हैे, जिनके समीप सोलह भट्टियाँ हैं। अनुमान है कि ये श्रमिकों के आवास रहे होंगे। इस गढ़ी के भीतर सबसे महत्त्वपूर्ण रचना है एक विशाल स्नानागार।

    इस स्नानागार के मध्य में प्रधान स्नान-कुण्ड, पूर्व-पश्चिम तथा दक्षिण में बरामदे और उनके पीछे लघु कक्ष स्थित हैं। प्रधान स्नान कुण्ड के उत्तर की ओर मार्ग के लिए जगह छोड़़कर आठ लघु स्नानगृह बने हुए हैं, जिनमें पानी आने की व्यवस्था है तथा ऊपर की ओर जाने की सीढ़ियाँ हैं। स्नानागार का फर्श पक्की ईटों का बनाया गया है और सीलन से बचाने के लिए राल का लेप किया गया है। स्नान कुण्ड की सफाई करने तथा गन्दा पानी बाहर निकालने के लिए इसके दक्षिणी भाग में एक नाली बनी हुई है।

    यह स्नानागार धार्मिक अवसरों पर पुजारियों अथवा शासकीय व्यक्तियों के विशेष स्नान के उपयोग में आता होगा। स्नानागार की उपस्थिति से अनुमान लगाया जाता है कि आधुनिक हिन्दू-धर्म की भाँति सैन्धवासियों के धर्म में भी पवित्र स्नान का विशेष महत्त्व रहा होगा। इस प्रकार भवन निर्माण के आधार पर कहा जा सकता है कि सैन्धव समाज में उच्च वर्ग एवं साधारण वर्ग जैसा विभाजन मौजूद था।

    सैन्धव परिवार

    सैन्धव सभ्यता से प्राप्त भवनों और उनमें स्थित पृथक-पृथक कक्षों की योजना से लगता है कि सिन्धु सभ्यता में परिवार ही समाज की मूल ईकाई थी। कक्षों की संख्या, आंगन में कुओं की उपस्थिति, प्रवेश द्वार के निकट शौचालय एवं स्नानागार की उपस्थिति से अनुमान लगाया जा सकता है कि सैन्धव समाज में संयुक्त परिवार प्रणाली प्रचलित रही होगी और माता-पिता, भाई-बहिन, पुत्र-पुत्री आदि एक साथ रहते होंगे। खुदाई में प्राप्त नारी मूर्तियों की बहुलता और मातृदेवी की लोकप्रियता के आधार पर विद्वानों का मानना है कि सैन्धव समाज मातृ-प्रधान था, अर्थात् परिवार में माता का स्थान सर्वाेपरि होता था। द्रविड़ समाज भी मातृ-प्रधान था।

    सैन्धव समाज में नारी का स्थान

    विद्वानों का अनुमान है कि सैन्धव समाज में नारी का स्थान सम्मानजनक था। वह परिवार की मुखिया एवं पोषिका समझी जाती थी। उसका मुख्य काम बच्चों का लालन-पालन एवं घर पर रहकर सूत कातना था। मुद्राओं पर अंकित विभिन्न नारी-चित्रों के आधार पर अनुमान लगाया जाता है कि सैन्धव स्त्रियों में पर्दा प्रथा का प्रचलन नहीं था और वे धार्मिक तथा सामाजिक उत्सवों में पुरुषों के साथ समान रूप से सम्मिलित होती थीं।

    रहन-सहन

    सैन्धव स्थलों से प्राप्त वस्तुओं में अस्त्र-शस्त्रों की अल्पता इस बात की सूचक है कि सैन्धव लोग शान्ति-प्रिय थे और समृद्ध जीवन बिताने की कामना करते थे। खुदाई से प्राप्त घड़े, कलश, थालियाँ, कटोरे, तश्तरियाँ, गिलास, चम्मच आदि बर्तन उनकी सम्पन्नता के द्योतक हैं। विभिन्न मुद्राओं पर अंकित पलंग, कुर्सियाँ, तिपाइयाँ आदि भी उनकी सम्पन्नता का उद्घोष करते हैं।

    वेश-भूषा

    खुदाई में प्राप्त अधिकांश नारी-मूर्तियाँ नग्न हैं परन्तु सैन्धव लोग वस्त्रों का प्रयोग करते थे। सिन्धु-घाटी के लोग ऊनी तथा सूती दोनों प्रकार के वस्त्र पहनते थे। उनके वस्त्र साधारण हुआ करते थे। खुदाई में एक पुरुष की मूर्ति मिली है जिसमें वह एक शॉल ओढ़े हुए है। शॉल बाएँ कन्धे के ऊपर से दाहिनी कांख के नीचे जाता है। विद्वानों का अनुमान है कि इनके दो मुख्य वस्त्र रहे होंगे। एक शरीर के नीचे के भाग को ढँकने के लिए और दूसरा ऊपर के भाग के लिए। हड़प्पा की खुदाई में मिली सामग्री से अनुमान होता है कि स्त्रियाँ सिर पर एक विशेष प्रकार का वस्त्र पहनती थीं जो सिर के पीछे की ओर पंखे की तरह उठा रहता था। ऐसा प्रतीत होता है कि स्त्रियों तथा पुरुषों के वस्त्रों में विशेष अन्तर नहीं होता था। कुछ स्त्रियां पगड़ी भी पहनती थीं। कुछ स्त्री मूर्तियों को नुकील टोपी पहने हुए दिखाया गया है।

    केश-विन्यास

    खुदाई में प्राप्त शीशा और कंघी तथा कुछ मुद्राओं पर मिले अंकन से ज्ञात होता है कि सैन्धव स्त्री-पुरुष केश-सज्जा किया करते थे। मूर्तियों से पता चलता है कि पुरुष दाढ़ी और मूँछ दोनों रखते थे एवं वे अपने केशों को संवारकर पीछे की ओर बाँध लेते थे। खुदाई में हजामत बनाने का उस्तरा भी मिला है। कुछ मुद्राओं और मूर्तियों से पता चलता है कि कुछ लोग दाढ़ी रखते थे परन्तु मूँछे मुंडवा लेते थे। सैन्धव स्त्रियाँ, आज की हिन्दू स्त्रियों की भाँति बीच से माँग निकालकर चोटी करती थीं। कुछ स्त्रियाँ अपनी चोटी को सिर के पीछे लपेट लेती थीं। कुछ स्त्रियाँ बालों को जूड़ा बनाकर पीछे फीते से बाँध लेती थीं।

    शृंगार एवं आभूषण

    सैंधव स्त्रियाँ आज की हिन्दू स्त्रियों की भांति काजल, सुरमा, सिन्दूर, बालों की पिन, इत्र तथा पाउडर का प्रयोग करती थीं। मैके के अनुसार, वे लिपिस्टिक का प्रयोग भी करती थीं। खुदाई में कण्ठहार, कर्णफूल, हंसली, बाजूबन्द, कडे़ छल्ले, अंगूठियाँ, पायजेब तथा नाक में पहनने के आभूषण मिले हैं जिनसे ज्ञात होता है कि स्त्री-पुरुष दोनों को ही आभूषणों का चाव था। ये आभूषण विभिन्न धातुओं के बने होते थे और उन पर पच्चीकारी का काम किया जाता था। धनी लोग सोने-चाँदी मणि-माणिक्य के आभूषण पहनते थे तथा निर्धन स्त्री-पुरुष तांबा, हड्डी एवं मिट्टी से बने आभूषण पहनते थे।

    खान-पान

    सैन्धव स्थलों की खुदाई में गेहूँ, जौ, चावल, खजूर आदि के बीज, अधजली हड्डियाँ तथा फलों के छिलके मिले हैं जिनसे ज्ञात होता है कि सैन्धवासियों के खान-पान का स्तर उच्च था। मुद्राओं पर अंकित चित्रों से उनके माँसाहारी होने के प्रमाण भी मिलते हैं। वे मछली, गाय, सूअर, भेड़ तथा मुर्गे का मांस खाते थे। गाय, भैंस तथा बकरी के दूध का उपयोग किया जाता था। यह कहना कठिन है कि वे लोग दूध से घी निकालना जानते थे अथवा नहीं।

    मदिरा-पान

    जनार्दनराय नागर विद्यापीठ विश्वविद्यालय उदयपुर के पुरातत्त्व संग्रहालय में एक जार प्रदर्शित किया गया है जिसे 'वाइन टारपीडो' कहते हैं। यह मिट्टी से बना हुआ है जिसे आग में पकाया गया है तथा उस पर विशेष प्रकार की पॉलिश है। यह बेलनाकार आकृति में है, इसका मुंह संकरा, मध्य भाग चौड़ा तथा नीचे का भाग पुनः कम चौड़ा है। इसकी ऊँचाई लगभग 26 इंच है। यह जार पश्चिम एशिया से लेकर सिंधुुघाटी सभ्यता स्थलों से प्राप्त होता है। उदयुपर संग्रहालय का जार गुजरात के एक सैन्धव सभ्यता स्थल से मिला है। इस जार के भारत में मिलने से इस तथ्य की पुष्टि होती है कि उस काल में भारत एवं यूनान के बीच व्यापारिक सम्बन्ध थे। यह भी संभव है कि इन जारों में मदिरा भरकर यूनान अथवा रोम से पश्चिम एशिया तक लाई जाती हो एवं वहाँ के व्यापारी इन्हें सैन्धव सभ्यता के बंदारगाहों तक पहुँचाते हों।

    आमोद-प्रमोद

    सैन्धववासियों में कई प्रकार के आमोद-प्रमोद प्रचलित थे। मछली पकड़ना और शिकार करना मनोरंजन के प्रिय साधन थे। एक मुद्रा पर कुछ लोगों को तीर-कमान से एक बारहसिंगे का शिकार करते हुए दिखाया गया है। एक अन्य मुद्रा पर एक पुरुष को दो शेरों से लड़ते हुए दिखाया गया है। बर्तनों एवं मुद्राओं पर बने चित्रों से ज्ञात होता है कि वे लोग मुर्गे, तीतर और बटेर लड़ाते थे। खेलकूद और व्यायाम में भी उनकी रुचि थी। एक मुद्रा पर एक व्यक्ति को व्यायाम करते हुए दिखाया गया है। वे लोग घरों में भी कई प्रकार के खेल खेला करते थे। अनेक स्थलों से पत्थर, मिट्टी और हाथी दाँत से बने हुए सुन्दर चौकोर पासे मिले हैं।

    इन पर आधुनिक पासों की तरह अलग-अलग संख्या के बिन्दू बने हैं। इनसे प्रतीत होता है कि सैन्धववासी शतरंज अथवा चौपड़ जैसे घरेलू खेल अथवा जुआ खेला करते थे। नृत्य और संगीत सिन्धुवासियों के आमोद-प्रमोद का मुख्य साधन था। धातु की बनी हुई नर्तकी की एक सुन्दर मूर्ति मिली है। कुछ मुद्राओं पर तबले, ढोल तुरही, वीणा आदि वाद्ययंत्र उत्कीर्ण हैं। नृत्य के समय इन वाद्यों का प्रयोग किया जाता होगा।

    सैन्धव स्थलों की ख्ुादाई में बच्चों के खिलौने बड़ी संख्या में मिले है। इनमें झुनझुने, सीटियाँ, बैलगाड़ियाँ, नर-नारियों की आकृतियों एवं पशु-पक्षियों की आकृतियों वाले खिलौने प्रमुख हैं। कुछ पशु आकृति वाले खिलौनों की गर्दन एवं सिर हिलते हैं। कुछ खिलौनों में हाथ-पैरों को अलग से धागे की सहायता से जोड़ा गया है जिसे खींचने पर खिलौने के हाथ-पैर हिलते हैैं।

    यातायात के साधन

    सिन्धु-घाटी के लोग कच्ची सड़कें बनाते थे। बैलगाड़ी मुख्य सवारी होती थी। हड़प्पा में ताम्बे का एक वाहन मिला है जो इक्के के आकार का है। नौकाएं भी यातायात एवं परिवहन का साधन थीं।

    मृतक-संस्कार

    सैन्धव स्थलों से मिले शवाधानों, अस्थि कलशों एवं राख के घड़ों आदि के आधार विश्वास किया जाता है कि सैन्धववासी तीन प्रकार से शवों का अन्तिम संस्कार करते थे-

    (1.) पूर्ण समाधिकरण- अर्थात् पूरे शव को गाड़ दिया जाता था।

    (2.) आंशिक समाधिकरण- अर्थात् शव को पशु-पक्षियों के खाने के बाद बचे भाग को गाड़ा जाता था।

    (3.) अग्नि संस्कार- अर्थात् शव को जलाया जाता था और कभी-कभी उसकी भस्म गाड़ दी जाती थी। हांडियों और कलशों में इस प्रकार की भस्म तथा जली हुई अस्थियाँ प्राप्त हुई हैं।

    हड़प्पा तथा कालीबंगा से कुछ शवाधान (कब्र) मिले हैं, जिनमें रखे शव का सिर उत्तर दिशा की ओर है। ऐसा किसी धार्मिक विश्वास के आधार पर ही किया गया होगा। शवाधानों में रखे शवों के साथ विविध आभूषण, वस्त्र और अन्य वस्तुएँ भी मिली हैं, जिनसे अनुमान किया जाता है कि सैन्धववासी सम्भवतः परलोक के जीवन की कल्पना करते थे। मोहनजोदड़ो की खुदाई में कोई शवाधान प्राप्त नहीं हुआ है। अतः इस नगर के लोग शवों को या तो अग्नि में जलाते होंगे अथवा नदी में बहाते होंगे।

    शिक्षा

    सैन्धववासी लिखना-पढ़ना जानते थे अतः अनुमान है कि उन्होंने शिक्षा देने का एक निश्चित तरीका विकसित कर लिया होगा। खुदाई में लकड़ी की कुछ तख्तियाँ मिली हैं। इन तख्तियों पर लकड़ी की कलमों से लिखा जाता था। खुदाई में बड़ी संख्या में प्राप्त खिलौने के आधार पर अनुमान लगाया जाता है कि बच्चों को प्रत्यक्ष ज्ञान उपलब्ध कराने में खिलौनों का प्रयोग किया जाता होगा। माप-तौल के निश्चित साधनों की उपस्थिति से अनुमान होता है कि बच्चों को अंकगणित की शिक्षा दी जाती थी। खुदाई में प्राप्त बाटों की दशमलव ईकाइयों के आधार पर यह अनुमान भी है कि सैन्धववासी दशमलव पद्धति से परिचित थे।

    भवन और नगर निगम की निश्चित योजना से स्पष्ट है कि विद्यार्थयों को ज्यामिति के उच्च सिद्धान्तों की शिक्षा दी जाती थी। विद्वानों का माना है कि सैन्धववासियों को ज्योतिष के सिद्धान्तों की भी जानकारी रही होगी। घरों से गंदे पानी की निकासी की सुदृढ़ व्यवस्था से पता चलता है कि सैन्धववासी सार्वजिनक सफाई के प्रति सतर्क थे। वे रोगों से बचने का उपाय जानते थे और उन्हें चिकित्सा सम्बन्धी ज्ञान भी था। अतः बच्चों को अंकगणित, ज्यामिति, संगीत, नृत्य, चित्रकला, स्वच्छता एवं चिकित्सा अािद विषय पढ़ाए जाते होंगे।

    लिपि

    सैन्धव स्थलों से प्राप्त बर्तनों, मुद्राओं एवं ताम्रपत्रों पर अनेक प्रकार के लेख उत्कीर्ण हैं। ये लेख एक या दो पंक्तियों में हैं। इसलिए आधुनिक भाषा-विज्ञानी, इन लेखों को पढ़ने में सफल नहीं हो सके हैं। फिर भी सैन्धव लिपि में प्रयुक्त होने वाले कुछ संकेतों का पता लगा लिया गया है। हण्टर का मत है कि ये लेख चित्रलिपि में हैं। अतः सैन्धव-लिपि को चित्रात्मक लिपि मानना चाहिए।

    लिपि का प्रत्येक चित्र किसी विशेष शब्द अथवा वस्तु को प्रकट करता है। विद्वानों ने अब तक 396 चिह्नों की सूची बनाई है। विद्वानों का माना है कि यह लिपि पहली पंक्ति में दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी जाती थी और दूसरी पंक्ति बाईं ओर से दाहिनी ओर लिखी जाती थी। इस प्रकार की लिखावट को 'बॉस्ट्रोफेडोन' कहते हैं। पहचाने गए संकेतकों के आधार पर कहा जा सकता है कि सिंधु लिपि, अपनी समकालीन सुमेरिया और मिस्र की लिपियों की तुलना में अधिक उन्नत और परिष्कृत थी।

    सैन्धव कलाएँ

    सैन्धव स्थलों से प्राप्त दैनिक उपयोग की सामग्री एवं भवनावशेषों के आधार पर कहा जा सकता है कि सैंधव संस्कृति में विभिन्न कलाओं का विकास हो चुका था तथा कलाओं की दृष्टि से यह एक उन्नत संस्कृति थी। सैन्धववासी न केवल सुंदर नगरों की रचना करने में सफल हुए थे अपितु भवन निर्माण पद्धति से भी उन लोगों की कलाप्रियता की जानकारी मिलती है। वे मिट्टी एवं कांसे के बर्तन और मिट्टी, कांसे और पत्थरों से अनेक प्रकार की मूर्तियाँ बनाने में निष्णात थे।

    हड़प्पा से प्राप्त एक नर्तकी त्रिभ्ंागी मुद्रा में नृत्य करने के लिए तत्पर दिखाई पड़ती है। यहाँ से प्राप्त दो पाषाण-प्रतिमाएं विशेष उल्लेखनीय हैं। इनमें से एक लाल पत्थर की खण्डित मानव-मूर्ति है जिसका सिर टूटा हुआ है किंतु धड़ सुरक्षित अवस्था में है। दूसरी प्रतिमा काले पत्थर से निर्मित एक नर्तक की है जिसने नृत्य-मुद्रा में अपना बायां पैर ऊपर उठा रखा है। एक अन्य खण्डित प्रतिमा किसी पुजारी या योगी की है जिसकी आँखें अधखुली हैं। पाषाण मूर्तियों में पशु-पक्षियों की अनेक मूर्तियाँ की मिली हैं।

    एक बैल मूर्ति उल्लेखनीय है जिसका मुख्य शरीर पत्थर से निर्मित है परन्तु सींग और कान किसी अन्य पदार्थ से बने हैं। सैन्धव सभ्यता की मूर्तिकला के सम्बन्ध में जाँन मार्शल ने लिखा था- 'सैन्धव धर्म और कला अद्भुत हैं और उन पर अपनी एक विशिष्ट छाप है। इस काल में हम अन्य देशों में कोई ऐसी वस्तु नहीं जानते जो शैली की दृष्टि से यहाँ बनी मूर्तियों से साम्य रखती हो ........ ये मूर्तियाँ इतनी सुन्दर हैं कि चौथी ईसा पूर्व कोई भी यूनानी कलाकार इनको अपनी कृति बताने में गौरव का अनुभव करेगा।'

    सैन्धववासियों की चित्रकला की जानकारी मिट्टी के बर्तनों पर बने चित्रों से होती है। सैन्धववासी, रेखाओं और बिन्दुओं के माध्यम से बर्तनों पर हिरण, खरगोश, कौआ, बत्तख, गिलहरी, मोर, साँप, मछली आदि पशु-पक्षी और पीपल, नीम, खजूर आदि पेड़-पौधों के चित्र बनाते थे। अनेक बर्तनों पर मानव आकृतियाँ भी बनी हुई हैं। एक बर्तन पर मछुआरे का चित्र है जो बाँस पर जाल लटकाए जा रहा है और उसके पैरों के पास मछली और कछुए पड़े हैं। कुछ बर्तनों पर बने चित्र बड़े आकर्षक हैं और वास्तविक जान पड़ते हैं।

    आर्थिक जीवन

    सिन्धु घाटी में वर्तमान में लगभग 15 संेटीमीटर वार्षिक वर्षा होती है। इसलिए यह प्रदेश अधिक उपजाऊ नहीं है किंतु सिंधु सभ्यता के उत्खनन स्थलों को देखने से अनुमान होता है कि उस काल में यह प्रदेश अधिक उपजाऊ था। ईसा-पूर्व चौथी सदी में सिकंदर का एक समकालीन इतिहासकार जानकारी देता है कि सिन्धु क्षेत्र उपजाऊ प्रदेश था। इससे भी पहले के काल में सिन्धु प्रदेश में प्राकृतिक वनस्पति अधिक थी और इस कारण यहाँ वर्षा भी अधिक होती थी। इस कारण पूरे प्रदेश में घने जंगल थे जिनसे व्यापक स्तर पर जलाऊ लकड़ी प्राप्त की जाती थी। इस लकड़ी का उपयोग ईंटें पकाने, कृषि उपकरण बनाने, युद्ध के औजार बनाने तथा भवन बनाने में होता था।

    हड़प्पा तथा मोहेनजोदड़ो जैसे विशाल तथा वैभवपूर्ण नगर जिस संस्कृति में विद्यमान थे वह निश्चय ही बड़ा सम्पन्न रहा होगा। चूँकि यह सभ्यता कृषि-प्रधान नहीं थी इसलिए यहाँ के निवासियों का आर्थिक जीवन प्रमुखतः व्यापार तथा उद्योग-धन्धों पर आधारित था। व्यापार तथा उद्योग उन्नत दशा में था। सिन्धु-वासियों का आर्थक जीवन औद्योगिक विशिष्टीकरण तथा स्थानीयकरण पर आधारित था। उनमें श्रम-विभाजन तथा संगठन की कल्पना की भी जा सकती है। एक प्रकार का व्यवसाय करने वाले लोग एक ही क्षेत्र में निवास करते थे। यदि इस सभ्यता को औद्योगिक सभ्यता कहा जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। हड़प्पा सभ्यता में निम्नलिखित व्यवसाय तथा उद्योग प्रचलित थे-

    (1.) कृषि: सिन्धु सभ्यता के लोग सिंधु नदी में बाढ़ के उतर जाने पर नवंबर के महीने में बाढ़ के मैदानों में गेंहूू और जौ बो देते थे और आगामी बाढ़ आने से पहले, अप्रेल के महिने में गेंहूू और जौ की फसल काट लेते थे। इस क्षेत्र से कोई फावड़ा या फाल नहीं मिला है, परन्तु कालीबंगा में हड़प्पा-पूर्व अवस्था के जिन कूँडों की खोज हुई है, उनसे पता चलता है कि हड़प्पा-काल में राजस्थान के खेतों में हल जोते जाते थे।

    हड़प्पा संस्कृति के लोग सम्भवतः लकड़ी के हल का उपयोग करते थे। इस हल को आदमी खींचते थे या बैल, इस बात का पता नहीं चलता। फसल काटने के लिए पत्थर के हँसियों का उपयोग होता होगा। गबरबंदों अथवा नालों को बांधों से घेरकर जलाशय बनाने की बिलोचिस्तान और अफगानिस्तान के कुछ हिस्सों में प्रथा रही है, परन्तु अनुमान होता है कि सिन्धु सभ्यता में नहरों से सिंचाई की व्यवस्था नहीं थी।

    हड़प्पा संस्कृति के गांव, जो प्रायः बाढ़ के मैदानों के समीप बसे होते थे, न केवल अपनी आवश्यकता के लिए अपितु नगरों में रहने वाले कारीगरों, व्यापारियों और दूसरे नागरिकों के लिए भी पर्याप्त अनाज पैदा करते थे। सिन्धु सभ्यता के किसान गेहूँ, जौ, राई, मटर, आदि पैदा करते थे। वेे दो किस्मों का गेहूँ और जौ उगाते थे। बनवाली से बढ़िया किस्म का जौ मिला है। वे तिल और सरसों भी पैदा करते थे। हड़प्पा-कालीन लोथल के लोग ई.पू.1800 में भी चावल का उपयोग करते थे। लोथल से चावल के अवशेष मिले हैं।

    मोहेनजोदड़ो, हड़प्पा और सम्भवतः कालीबंगा में भी विशाल धान्य कोठारों में अनाज जमा किया जाता था। किसानों से सम्भवतः करों के रूप में यह अनाज प्राप्त किया जाता था और पारिश्रमिक के रूप में धान्य-कोठारों से श्रमिकों को वितरित होता था। यह बात हम मेसोपोटामिया के नगरों के सादृश्य के आधार पर कह सकते हैं जहाँ पारिश्रमिक का भुगतान जौ के रूप में होता था।

    सिन्धु सभ्यता के लोग कपास पैदा करने वाले सबसे पुराने लोगों में से थे। इसीलिए यूनानियों ने कपास को सिंडोन नाम दिया जिसकी व्युत्पत्ति सिन्ध शब्द से हुई है।

    (2.) शिकार: सिन्धु-घाटी के लोग शाकाहारी तथा मांसाहारी थे। वे मांस, मछली तथा अंडे आदि का प्रयोग करते थे। मांस प्राप्त करने के लिए वे पशुओं का शिकार करते थे। पशुओं के बाल, खाल तथा हड्डी से भिन्न-भिन्न प्रकार की वस्तुएँ बनाई जाती थीं।

    (3.) पशुपालन: सिन्धु सभ्यता के लोग खेती करने के साथ-साथ बड़ी संख्या में पशु पालते थे। खुदाई से प्राप्त मुहरों पर पशुओं के चित्र मिले हैं जिनसे ज्ञात होता है कि गाय, बैल, भैंस, बकरी, भेड़, कुत्ता और सूअर उनके पालतू पशु थे। सिन्धुवासियों को बड़े कूबड़ वाला सांड विशेष रूप से पसंद था। आरम्भ से ही कुत्ते दुलारे पशु थे। बिल्ल्यिों को भी पालतू बना लिया गया था। कुत्ता और बिल्ली, दोनों के पैरांे के निशान मिले हैं। बैलों और गधों का उपयोग भारवहन के लिए होता था। आश्चर्य की बात है कि खुदाई में ऊँट की हड्डियाँ नहीं मिली हैं। घोड़े के अस्तित्त्व के बारे में भी केवल तीन प्रमाण मिले हैं।

    मोहेनजोदड़ो की एक ऊपरी सतह से और लोथल से एक-एक संदिग्ध लघु मूण्मूर्ति मिली है जिसे घोड़े की मूर्ति कहा जा सकता है। घोड़े के अवशेष, जो ई.पू.2000 के आसपास के हैं, गुजरात के सुरकोटड़ा नामक स्थान से मिले हैं। अनुमान होता है कि हड़प्पा-काल में ऊँट तथा घोड़े का उपयोग आम तौर पर नहीं होता था। हड़प्पा संस्कृति के लोग हाथी तथा गेंडे से भली-भांति परिचित थे। मेसोपोटामिया के समकालीन सुमेर सभ्यता के नगरों के लोग भी प्रायः सिन्धु प्रदेश जैसे ही अनाज पैदा करते थे और उनके पालतू पशु भी प्रायः वही थे जो हड़प्पा संस्कृति वालों के थे परन्तु गुजरात में बसे हुए हड़प्पा संस्कृति के लोग चावल पैदा करते थे और पालतू हाथी भी रखते थे। मेसोपोटामिया के नगरवासियों के लिए ये दोनों बातें सम्भव नहीं थी।

    (4.) शिल्प तथा व्यवसाय: हड़प्पा संस्कृति कंास्य-युग की है। हड़प्पा सभ्यता का मानव कुशल शिल्पी तथा व्यवसायी था। वह पत्थर के अनेक प्रकार के औजारों का उपयोग करता था तथा कांस्य-निर्माण से भी भली-भांति परिचित थे। धातुकर्मी तांबे के साथ टिन मिलाकर कांसा तैयार करते थे। चूँकि हड़प्पावासियों के लिए ये दोनों धातुएं सुलभ नहीं थीं। इसलिए हड़प्पा में कांस्य-वस्तुओं का निर्माण बड़े पैमाने पर नहीं हुआ।

    तांबा राजस्थान में खेतड़ी कीे खानों तथा बिलोचिस्तान से मंगाया जाता होगा। टिन बड़ी कठिनाई से सम्भवतः अफगानिस्तान से प्राप्त किया जाता था। टिन की कुछ पुरानी खदानें बिहार के हजारी बाग में मिली हैं। हड़प्पा संस्कृति के स्थलों से मिले कांसे के औजारों और हथियारों में टिन का अनुपात कम है। फिर भी इस सभ्यता से बहुत सारी कांस्य वस्तुएँ मिली हैं, जिनसे स्पष्ट है कि हड़प्पा समाज के कारीगरों में कसेरों का महत्त्वपूर्ण स्थान था। उन्होंने मूर्तियाँ और बर्तन ही नहीं, विविध प्रकार की कुल्हाड़ियां, आरियां, छुरे और भाले आदि हथियार भी बनाए।

    सैन्धव सभ्यता में कई शिल्पों का विकास हुआ। मोहेनजोदड़ो से बुने हुए सूती कपड़़े का एक टुकड़़ा मिला है और कई वस्तुओं पर कपड़़े के छापे देखने को मिले हैं। कताई के लिए तकलियों का उपयोग होता था। बुनकर सूती और ऊनी कपड़़ा बुनते थे। ईटों की विशाल ईमारतों से ज्ञात होता है कि राजगीरी एक महत्त्वपूर्ण कौशल था। इनसे राजगीरों के एक वर्ग के अस्तित्त्व की भी सूचना मिलती है।

    हड़प्पा संस्कृति के लोग नौकाएं बनाना जानते थे। मुहरें और मृण्मूर्तियाँ बनाना महत्त्वपूर्ण शिल्प-व्यवसाय थे। सुनार, चांदी, सोना और कीमती पत्थरों के आभूषण बनाते थे। चांदी और सोना अफगानिस्तान से आता होगा और कीमती पत्थर दक्षिणी भारत से। हड़प्पा संस्कृति के कारीगर मणियों के निर्माण में भी निपुण थे। कुम्हार के चाक का खूब उपयोग होता था। उनके मिट्टी के बर्तनों की अपनी विशेषता थी। बर्तनों को चिकना और चमकीला बनाया जाता था। उन पर चित्रकारी की जाती थी। हाथी-दाँत की भी विभिन्न वस्तुएँ बनाई जाती थीं।

    (5) व्यापार: हड़प्पा तथा मोहेनजोदड़ो की खुदाइयों में बहुत सी ऐसी वस्तुएँ मिली हैं जो सिन्धु घाटी में नहीं होती थीं। अतः यह अनुमान लगाया गया है कि ये वस्तुएँ बाहर से मंगाई जाती थीं और इन लोगों का विदेशों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध था। सोना, चांदी, ताम्बा आदि सिन्धु-प्रदेश में नहीं मिलता था। इन धातुओं को ये लोग अफगानिस्तान तथा ईरान से प्राप्त करते थे। यहाँ के निवासी सम्भवतः ताम्बा राजपूताना से, सीपी, शंख आदि काठियावाड़ से और देवदारु की लकड़ी हिमालय पर्वत से प्राप्त करते थे। हड़प्पा संस्कृति का मानव धातु की मुद्राओं का उपयोग नहीं करता था। सम्भव है कि व्यापार वस्तु-विनिमय से चलता हो।

    निर्मित वस्तुओं और सम्भवतः अनाज के बदले में वह पड़ोसी प्रदेशों से धातुएं प्राप्त करता था और उन्हें नौकाओं तथा बैलगाड़ियों से ढोकर लाता था। अरब सागर में तट के पास उनकी नौकाएं चलती थीं। वह पहिए का उपयोग जानता था। बैलगाड़ियों के पहिए ठोस होते थे। हड़प्पा संस्कृति के लोग आधुनिक इक्के जैसे वाहन का उपयोग करते थे।

    इन लोगों के राजस्थान, अफगानिस्तान और ईरान के साथ व्यापारिक सम्बन्ध थे। हड़प्पा संस्कृति के लोगों के, दजला तथा फरात प्रदेश के नगरों के साथ भी व्यापारिक सम्बन्ध थे। सिन्धु सभ्यता की कुछ मुहरें मेसोपोटामिया के नगरों से मिली हैं। अनुमान होता है कि मेसोपोटामिया के नगर-निवासियों द्वारा प्रयुक्त कुछ शृंगार साधनों को हड़प्पा वासियों ने अपनाया था। लगभग ई.पू.2350 से आगे के मेसोपोटामियाई अभिलेखों में मैलुह््ह के साथ व्यापारिक सम्बन्ध होने के उल्लेख मिलते हैं। यह सम्भवतः सिन्धु प्रदेश का प्राचीन नाम था।

    (6) नाप तथा तौल: खुदाई में बड़ी संख्या में बाट मिले हैं। कुछ बाट इतने बड़े हैं कि वे रस्सी से उठाये जाते होंगे और कुछ इतने छोटे हैं कि उनका प्रयोग जौहरी करते होंगे। अधिकांश बाट घनाकार हैं। लम्बाई नापने के लिए फुट होता था। मोहेनजोदड़ो की खुदाई में सीपी का बना हुआ एक फुट के बराबर माप का टुकड़ा मिला है। कांसे की बनी एक शलाका पर छोटे-छोटे निशान अंकित हैं, यह फुट प्रतीत होता है। तौलने के लिए तराजू का प्रयोग होता था।

    निष्कर्ष

    इस प्रकार हम देखते हैं कि सैन्धव सभ्यता और संस्कृति पर धर्म, कला एवं शिक्षा का विपुल प्रभाव था। जीवन का कोई अंग शायद ही इन पक्षों से अछूता था। सैन्धव सामाज में पुरोहित, शासक, व्यापारी, श्रमिक और कृषक रहते थे जो अलग-अलग कार्य करके सामाजिक विन्यास की रचना करते थे।

    सैन्धव सभ्यता के लोग सुसभ्य और सांस्कृतिक थे। उनके रहन-सहन का ढंग आधुनिक हिन्दू समाज की तरह काफी उन्नत था तथा समकालीन संस्कृतियों से काफी आगे था। भारतीय आर्यों ने सैंधव संस्कृति की अच्छी बातों को अपनाने में कोई संकोच नहीं किया। यही कारण है कि आज के हिन्दू-धर्म पर सैन्धव संस्कृति का व्यापक प्रभाव है। सैंधव वासियों का आर्थिक जीवन भी पर्याप्त विकसित था। ईसा से लगभग 1500 वर्ष पहले इस संस्कृति का विलोपन हो गया।

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  • भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण

     02.06.2020
    भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण का विचार जीवन के हर अंग पर रहा है। इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण चाहिए तो केवल ये दो कहावतें देख लेनी पर्याप्त होंगी-


    संतोषी सदा सुखी।

    सादा जीवन उच्च विचार।


    जब मनुष्य संतोष से जीना सीख जाएगा और जीवन में सादगी को धारण करने का अभ्यास करेगा तो पर्यावरण संरक्षण के लिए उसे अलग से विचार करने की आवश्यकता नहीं रह जाएगी। किंतु आज हमने ‘कर लो दुनिया मुट्ठी में, चक दे इण्डिया और तेरी कमीज मेरी कमीज से ज्यादा सफेद कैसे ? जैसी बातों के बहकावे में आकर संतोष और सादा जीवन पर आधारित जीवन शैली त्याग दी है।

    यदि संस्कृत वांगमय में झांक कर देखे तो ऐसी उक्तियां भरी पड़ी हैं जिन्हें अपने जीवन में ढालें तो पर्यावरण संरक्षण का लक्ष्य स्वतः सिद्ध हो जाएगा- अथर्ववेद का सूक्तकार कहता है-

    ‘माता भूमिः पुत्रो ऽहं पृथिव्याः।’

    जब व्यक्ति पृथ्वी को अपनी माता समझ लेता है, तो उसे वह नुक्सान कैसे पहुंचा सकता है। उपनिषद कहता है-

    ऋते ज्ञानात् न मुक्तिः।

    अर्थात् ज्ञान प्राप्त किए बिना मुक्ति नहीं होती। यह ज्ञान कौनसा है ? यह प्रकृति की व्यवस्था का ज्ञान है। इसके बिना किसी मनुष्य को मुक्ति नहीं मिलती। प्रकृति क्या है? इसे कौन चलाता है? उसके साथ हमारा क्या सम्बन्ध है? उसे अपने अनुकूल कैसे बनाया जा सकता है? आदि बातों को जानना ही तो वास्तविक ज्ञान है। मानव द्वारा आज तक संचित समस्त ज्ञान तथा आने वाले युगों में अर्जित किया जाने वाला ज्ञान प्रकृति और उसके रहस्यों को जानने तक ही तो सीमित है।

    जब कोई मनुष्य प्रकृति की व्यवस्था के ज्ञान को प्राप्त करने का प्रयास करेगा तो पर्यावरण संरक्षण उसके जीवन का ध्येय बन जाएगा। पर्यावरण केवल वनस्पतियों और वायुमण्डल में उपस्थित गैसों को ही नहीं कहते। पर्यावरण में वे पांचों तत्व- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश भी आते हैं जिनसे यह प्रकृति बनी है।

    पर्यावरण में वनस्पति जगत, जीव जगत, वायुमण्डल, धरती तक पहुंचने वाली सूर्य किरणें, अंतरिक्ष से आने वाले विकीरण आदि विभिन्न तत्व भी आते हैं। ये एक दूसरे से सम्बद्ध हैं, ये एक दूसरे को सहारा देते हैं और नियंत्रित करते हैं।

    जब हम किसी जीव-जंतु को मारते हैं तो हमें यह जानना चाहिए कि हम उस समय केवल एक जीव को नहीं मार रहे होते अपितु ऐसा करके हम जीव जगत के साथ-साथ वायुमण्डल, वनस्पति मण्डल और अंतरिक्षीय शक्तियों पर भी प्रहार कर रहे होते हैं, प्रकृति के मूलाधार पांचों तत्वों को भी कुपित कर रहे होते हैं।

    केवल पेड़ को मारने से ही जीव नहीं मरता, जीव को मारने से पेड़ भी मरता है, यह बात सुनने में अटपटी लग सकती है, किंतु यह सच्चाई है जिसे विज्ञान से लेकर हमारा अध्यात्म तक मानता है।

    यहां मैं यह कह रहा हूं कि केवल पेड़ को मारने से हिरण नहीं मरता, हिरण को मारने से पेड़ भी मरता है।

    क्योंकि केवल वृक्ष जीव का सहारा नहीं है, जीव और वृक्ष दोनों एक दूसरे का सहारा हैं। जब हम किसी पहाड़ को काटते हैं तो भी प्रकृति में ठीक वैसी ही प्रतिक्रिया होती है जैसी कि जंगल में आग लगाने पर होती है। यह ठीक वैसा ही है कि जंगल से शेर को समाप्त कर देने से पूरे जंगल के ही सूख जाने का खतरा उत्पन्न हो जाता है।

    मुगल एवं ब्रिटिश काल में पूरे भारत में शेरों का बड़ी संख्या में शिकार हुआ, आज जंगलों की क्या हालत है, हमारे सामने है।

    ऐसा कैसे होता है, इस बात को समझने के लिए हमें कोशिका का उदाहरण लेना होगा। यह सम्पूर्ण सृष्टि एक जीवित कोशिका की तरह कार्य करती है। जिस प्रकार एक कोशिका के किसी भी अवयव को भंग करने पर पूरी कोशिका को क्षति पहुंचती है, ठीक वैसा ही धरती या सृष्टि के बारे में है।

    जब उपनिषदों ने आज से हजार साल पहले ‘अहिंसा परमो धर्मः’ की घोषणा की तो यह केवल धार्मिक या आध्यात्मिक उद्घोष नहीं था, मनुष्य को इस धरती पर कैसे व्यवहार करना चाहिए, कैसा जीवन जीना चाहिए, उसकी गाइड लाइन थी। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति का मूल आधार अहिंसा का विचार ही रहा है। जब जीवों के प्राण नहीं लिए जाएंगे तो प्रकृति में एक संतुलन स्थापित होगा।

    भारतीय संस्कृति में विगत हजारों वर्षों से स्थापित परम्पराएं, सिद्धांत एवं व्यवहार में लाई जाने वाली ऐसी अनगिनत बातें हैं जिन्होंने पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए मानव को आनंददायी जीवन की ओर अग्रसर किया है।

    मानव सभ्यता प्रकृति की कोख से प्रकट होती है। उसे जो कुछ भी मिलता है, प्रकृति से ही मिलता है। इस कारण मानव को, प्रकृति के अनुकूल ही आचरण करना होता है। हमारे ऋषियों ने भारतीय संस्कृति का निर्माण इस प्रकार किया कि प्रकृति के मूल कोश को भंग नहीं किया जाए। पेड़, नदी, पर्वत और जंगल; प्रकृति के मूल कोश हैं। उन्हें नष्ट करना, अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना है।

    मनुष्य धरती पर आया है तो उसे अपना जीवन जीने के लिए प्रकृति के संसाधन काम में लेने ही होंगे। फिर क्या किया जाए ?

    इसका एक मात्र उपाय है कि प्रकृति के किसी भी संसाधन को इस प्रकार काम में लिया जाए कि उसकी रीसाइक्लिंग हो सके। मिट्टी के सकोरे या पत्ते के दोने-पत्तल को प्लास्टिक और पॉलिथीन ने रिप्लेस किया। प्लास्टिक या पॉलिथीन का प्रयोग प्रकृति के मूल कोश को खर्च करने जैसा है जबकि मिट्टी के सकोरे या पत्ते के दोने-पत्तल का प्रयोग रीसाइक्लिंग की प्रक्रिया का हिस्सा है।

    बहुत से लोग कहेंगे कि आज के युग मेें मिट्टी के सकोरे या पत्ते के दोने-पत्तल का प्रयोग अव्यावहारिक है। यह ठीक वैसा ही है जैसे हवाई जहाज की जगह बैलगाड़ी को अपनाया जाए। मिट्टी के सकोरे या पत्ते के दोने-पत्तल का प्रयोग इसलिए अव्यावहारिक है, क्योंकि ऐसा हम सोचते हैं। जिस दिन हम सोचेंगे कि यह किया जा सकता है, उस दिन यह व्यावहारिक हो जाएगा। दक्षिण भारत में आज भी केले के पत्ते का प्रयोग बड़े पैमाने पर होता है।

    मेरी उम्र कोई बहुत अधिक नहीं हुई है किंतु मैने अपनी आंखों से उस परम्परा को देखा है, जिसमें शादी-विवाह में जीमण के लिए गांव के लोग अपने घरों से बर्तन लेकर जाते थे। मैंने अपनी आंखों से मिट्टी के सकोरे या पत्ते के दोने-पत्तल का प्रयोग ठीक उसी रूप में देखा है, जिस रूप में आज प्लास्टिक और पॉलिथीन हो रहा है।

    मैंने अपनी आंखों से उस संस्कृति को देखा है जब निमंत्रण देने के लिए पीले चावल दिए जाते थे। और आज............। आज किसी परिवार में विवाह होता है तो हजार-हजार की संख्या में निमंत्रण पत्र छपते हैं। क्या हजार-हजार की संख्या में छपने वाला निमंत्रण पत्र, कागज अर्थात् पेड़ अर्थात् जंगल अर्थात् शेर अर्थात् हिरण की हत्या करने जैसा नहीं है !

    हमारे सामने दो रास्ते हैं, या तो प्रकृति के संसाधनों को बचाएं या फिर उन्हें आज ही उपभोग करके नष्ट कर दें और अपने बच्चों को कागज अर्थात् पेड़ अर्थात् जंगल अर्थात् शेर अर्थात् हिरण से वंचित करके चले जाएं। उनके लिए एक ऐसी दुनिया छोड़ जाएं जो सूरज की गर्मी से झुलस रही होगी, जिसमें पानी नहीं होगा, जिसमें कचरे और प्लास्टिक के ढेर होंगे। जहां गायें घास नहीं, प्लास्टिक खा रही होंगी। वो दुनिया कितनी वीरान होगी जिसमें लिखने पढ़ने के लिए कागज नहीं होगा! केवल इण्टरनेट और इलेक्ट्रोनिक गेजेट्स होंगे।

    बात यहाँ समाप्त नहीं होती। यहां से शुरु होती है। प्लास्टिक खाकर गाय जीवित नहीं रहेगी, बिना गाय के दूध नहीं मिलेगा, बिना दूध के बच्चे कैसे बनेंगे ! ये दुनिया कैसी होगी! मैं आपको अपना आंखों देखा अनुभव बताता हूँ कि बिना गाय के दुनिया कैसी होगी !

    इण्डोनेशिया का नाम हमने सुना है। आज से पांच सौ साल पहले इण्डोनेशिया में केवल हिन्दू और बौद्ध निवास करते थे। आज यह दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम देश है। इसके उपरांत भी इण्डोनेशिया के बाली द्वीप में आज भी 80 प्रतिशत हिन्दू आबादी निवास करती है। मैंने पिछले वर्ष अपने परिवार के साथ इण्डोनेशिया के कुछ द्वीपों की यात्रा की। हमें यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि वहां सड़कों पर गायें नहीं हैं। हमें यह सोचकर दुःख हुआ कि भारत में गाएं सड़कों पर मारी-मारी फिरती हैं।

    हमने जावा, जकार्ता और बाली में अपने 11 दिन के प्रवास के लिए होटल बुक नहीं कराए थे अपितु सर्विस अपार्टमेंट्स बुक करवाए थे ताकि वहाँ हम अपना भोजन स्वयं बना सकें। इसके लिए कच्ची रसोई अपने साथ ले गए थे। जब हमने चाय बनाने के लिए बाजार से दूध खरीदना चाहा तो वहाँ दूध की थैलियां नहीं मिलीं। मालूम हुआ कि यहाँ गायें नहीं हैं इसलिए बाजार में दूध नहीं बिकता। ऑस्ट्रेलिया और नीदरलैण्ड आदि देशों से लिक्विड वैजीटेबल दूध के डिब्बे आते हैं जो मक्का, सोयाबीन, तेलों और कुछ घासों से बनाए जाते हैं। इस दूध पर लिखा रहता है, बच्चों के लिए हानिकारक। आप अनुमान लगा सकते हैं कि इस दूध का स्वाद और गुण कैसा होगा !

    हमारे जैसे शुद्ध शाकाहारी भारतीय परिवार को दिन में चार-पांच बार चाय चाहिए और सोने से पहले दूध का एक गिलास चाहिए। बाद में पता चला कि सड़कों पर गायें और बाजार में दूध आएंगे कहां से! गायें तो बूचड़ खानों में ले जाई जाकर लोगों के पेट में पहुंच चुकी हैं।

    हमने पूछा इण्डोनेशिया के एक हिन्दू परिवार से पूछा- आपके बच्चे क्या पीते है !

    उन्होंने कहा- मां का दूध। हमने पूछा- और मां का दूध छूटने पर।

    इस सवाल के जवाब में जो कुछ हमें सुनने का मिला वह बेहद चौंकाने वाला था।

    उन्होंने जवाब दिया कि मां का दूध छोड़ने पर बच्चे चिकन, फिश, पोर्क और राइस खाते हैं।

    जब हमने पूछा कि आप लोग चाय नहीं पीते, इस पर उन्होंने कहा कि हम ब्लैक कॉफी पीते हैं, वह भी केवल गेस्ट के आने पर।

    मेरे पिता केन्द्र सरकार में अच्छे पद पर थे किंतु मुझे याद है कि गर्मियों में स्कूलों की छुट्टियां होने पर हमसे अपनी पिछले साल की कॉपियों से कागज की थैलियां बनवाती थीं और कुछ कॉपियों को पानी में गलाकर उन्हें कूटकर और मुल्तानी मिट्टी मिलाकर छोटी-छोटी टोकरियां बनवाती थी जिन्हें मारवाड़ में ठाठिए कहते थे।

    मां दीपावली आने पर हमें घर में ही रंगीन कागज से कंदील बनाना सिखाती थीं। वे हम भाई-बहिनों को घर में सूत से दरियां बनाना सिखाती थीं। गेहूं के सूखे तनों को पानी में भिगोकर उनसे हाथ के पंखे बनाना सिखाती थीं।

    उन्होंने एक और अद्भुत काम हमें सिखाया। मेरा अनुमान है कि यह कार्य बहुत कम बच्चों को उनकी माताओं ने सिखाया होगा। उन दिनों गैस नहीं थी, गांवों में तो चूल्हे होते थे जिनमें लकड़ी जलती थी और शहरों में अंगीठियां होती थीं जिनमें कोयला जलाया जाता था। मेरी मां बाजार से कोयले की चूरी मंगवाती थीं और उसमें काली मिट्टी तथा गोबर मिलाकर हमसे उनके लड्डू बनवाती थीं। जब ये लड्डू कोयले की अंगीठी में डाले जाते थे तो वे घण्टों तक दहकते रहते थे। इससे कोयले की बचत होती थी और अंगीठी में से धुंआ कम निकलता था।

    जब हम पूछते थे कि आप हमसे गर्मियों की छुट्टियों में इतना काम क्यों करवाती हैं तो वे हंसकर जवाब देतीं कि मैं चाहती हूं कि तुम मेलों में जाने के लिए जेबखर्ची मुझसे नहीं मांगो, स्वयं अपने पैसे से मेला देखकर आओ।

    आज सोचता हूं तो लगता है कि मां भले ही अपनी ओर से हमें स्वावलम्बी होने का मंत्र सिखाती थीं किंतु इस कार्य में पर्यावरण संरक्षण का कितना बड़ा संदेश छिपा हुआ था।

    दुर्भाग्य से आधुनिक समय में हम रेडीमेड संस्कृति की ओर अग्रसर हो गए हैं। हाथ से बने हुए सामान की जगह केवल मशीनों द्वारा किए गए उत्पादन ही हमें स्वीकार्य हैं। हमारी यही प्रवृत्ति प्रकृति एवं पर्यावरण के संतुलन को तेजी से समाप्त कर रही है।

    समय की आवश्यकता है जब हम अपनी मूल संस्कृति की ओर लौटें जो प्रकृति को माता और पर्यावरण को अपना सुरक्षा चक्र मानती है। जो उदाहरण मैंने दिए हैं, वे हो सकता है आज की तरीख में आउट डेटेड बातें हों किंतु जो विषय आज के लिए प्रासंगिक हैं, उन्हें तो हम कर ही सकते हैं।

    एक उदाहरण लेते हैं। बाजार में बिकने वाली मिठाइयों एवं पान पर चांदी का बर्क लगाया जाता है। वास्तव में यह चांदी का बर्क नहीं है, एल्यूमिनियम का है। जब यह मिठाई और पान के साथ हमारे शरीर में पहुंचता है। इसे बकरे की खाल में रखकर कूटा जाता है। मनुष्य की आंते इस बर्क को अवशोषित करने का प्रयास करती हैं और लीवर से निकला जूस इसे पचाने का प्रयास करता है। जब आंतें और लीवर इस काम को नहीं कर पाते तो यह बर्क किडनी तक पहुंचता है। किडनी इसे छानने का प्रयास करती है किंतु यह छनता नहीं है इससे किडनी पर जोर पड़ता है किडनी को अधिक काम करना पड़ता है। अंत में हमारे मल-मूत्र के साथ निकला हुआ बर्क सीवरेज चैनल के माध्यम से भूमि में प्रवेश करता है और मिट्टी को खराब करता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि जब मिट्टी खराब होती है तो पूरे पर्यावरण चक्र में विक्षोभ होता है।

    क्या हम बर्क को खाना छोड़ सकते हैं। यदि समस्त मनुष्य बर्क खाना छोड़ दें तो देश की मिट्टी पर इसका कितना सकारात्मक प्रभाव होगा, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। यदि यह बर्क सोने या चांदी का भी होता तो भी यह मनुष्य की आंतों, लीवर और किडनी को इसी तरह नुक्सान पहुंचाता। हमारे केवल इस एक छोटे से कदम से पर्यावरण का संरक्षण होगा।

    भारतीय संस्कृति शारीरिक श्रम पर आधारित है। गांवों में आज भी महिलाएं प्रातःकाल में चक्की चलाकर अनाज पीसती हैं। घरों में ही पापड़, बड़ियां, राबोड़ी, खीचिये, खीच, राबड़ी, आदि विविधि व्यंजन बनाती हैं। बाजरे, ज्वार तथा गेहूं की रोटियां, टुक्कड़ अथवा सोगरे को प्याज, लहसुन, चटनी, मिर्च, अचार, घी तथा छाछ जैसी घरेलू लगावण के साथ खाया जाता है जबकि पश्चिम की संस्कृति से आई ब्रेड के लिये महंगे बटर और जैम की आवश्यकता होती है जो पर्यावरणीय संस्कृति की बजाय पूंजीवादी संस्कृति के उपकरण हैं।

    ऐसी संस्कृति जिसमें शारीरिक श्रम का अभाव हो, यूज एण्ड थ्रो कल्चर तथा डिस्पोजेबल कल्चर, को बढ़ावा देती है। उपभोक्तावादी मानसिकता एवं बाजारीकरण की प्रवृत्तियां पर्यावरण को क्षति पहुंचाने वाली एवं विनाशकारी संस्कृति की प्रवृत्ति है।

    शादी विवाह में पहले मिट्टी के सकोरों और रामझारों का प्रयोग होता था। आज प्लास्टिक तथा थर्मोकोल के गिलास प्रयुक्त होते हैं। ये गिलास मिट्टी में गलकर नष्ट नहीं होते। एक-एक शादी में पांच-दस हजार गिलासों का ढेर लगना मामूली बात है।

    हमें एक शादी में इतने लोग क्यों बुलाने चाहिए। यह हम केवल इतना समझ लें कि विवाह एक पारिवारिक उत्सव है न कि सामाजिक फंक्शन न कि दशहरे का मेला, तो हमराी तरफ से यह, पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बहुत बड़ा योगदान होगा।

    फाउण्टेन इंक पैन का उपयोग पर्यावरणीय संस्कृति का उदाहरण है तो बॉल पॉइण्ट पैन डिस्पोजेबल कल्चर है।

    शेविंग के बाद केवल ब्लेड बदलना, पर्यावरण के लिये कम क्षतिकारक है जबकि पूरा रेजर ही फैंक देना, पर्यावरण के लिये अधिक विनाशकारी है।

    उत्तर भारत में कुछ स्थानों पर यह परम्परा थी कि जब लड़की के पीहर वाले अपनी बहन के ससुराल मायरा भरने जाते थे तो वहाँ तालाब से मिट्टी खोदकर बाहर निकालते थे। अब यह काम सरकार करवाती है। पंजाब में यह परम्परा थी कि लड़की जब विवाह के पश्चात् ससुराल जाती थी तो उससे एक पेड़ लगवाते थे। लड़की जब ससुराल से अपने पीहर आती थी और इस पेड़ को देखती थी, पेड़ हरा-भरा मिलता था तो लड़की समझ जाती थी कि उसके पीहर में आज भी उससे प्रेम किया जाता है, उसके लगाए बिरवे को भाई और भाभियां स्नेह जल से सींच कर पाल रही हैं।

    हमारे पुरखों ने वृक्षों, नदियों, समुद्रों तथा पर्वतों की पूजा करने से लेकर गायों को रोटी देने, कबूतरों एवं चिड़ियों को दाना डालने, कीड़ीनगरा सींचने, गर्मियों में पक्षियों के लिये पानी के परिण्डे बांधने, बच्छ बारस को बछड़ों की पूजा करने, श्राद्ध पक्ष में कौओं को ग्रास देने, नाग पंचमी पर नागों की पूजा करने, प्रतिदिन पीपल तथा तुलसी सींचने, सूर्यदेव को अर्घ्य देने एवं विशिष्ट पर्वों एवं व्रतों पर चंद्रदेव को अर्घ्य देने, द्वितीया को चंद्र दर्शन करने जैसे धार्मिक विधान बनाए जिनसे मानव में प्रकृति के प्रति संवेदना, आदर और कृतज्ञता का भाव उत्पन्न हो।

    प्राकृतिक शक्तियों द्वारा जो कुछ भी निर्मित किया जाता है एवं वनस्पति जगत द्वारा जो कुछ भी उपलब्ध कराया जाता है, उस सबका उपभोक्ता जीव जगत है। जीव जगत में भी मनुष्य ऐसा प्राणी है जो प्रकृति द्वारा उत्पन्न किये जाने वाले एवं उपलब्ध कराये जाने वाले संसाधनों को अंतिम उपभोक्ता की तरह प्रयुक्त करता है।

    यही कारण है कि मनुष्य इस प्रकृति का पुत्र होते हुए भी, प्रकृति में उपलब्ध हर वस्तु का स्वामी है या नेचुरल रिसोर्सेज नामक कम्पनी का सबसे बड़ा शेयर होल्डर है। स्वाभाविक है कि मालिक या सबसे बड़े शेयर होल्डर को अधिक जिम्मेदारी का प्रदर्शन करना होता है। व्यवहार रूप में उसे प्राकृतिक संसाधनों का मालिक बनकर नहीं अपितु सेवक बनकर रहना होगा, तभी हम पर्यावरण का सच्चे अर्थों में संरक्षण कर सकते हैं।

    संत पीपा के इस दोहे पर अपनी मानसिकता को जांचकर देखें जो मनुष्य को मनुष्य बनाने के लिए बहुत जरूरी है-

    स्वामी होना सहज है, दुरलभ होणो दास।

    पीपा हरि के नाम बिन, कटे न जम की फांस।।


    हम प्रकृति के सेवक होकर रहें न कि स्वामी।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-35

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-35

    राज्य में अधिक अन्न उत्पादन के पर्यावरणीय उपाय (2)


    अन्न एवं चारा संरक्षण के ग्रामीण उपाय

    कराई

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    चारा भण्डारण के लिये खुले स्थान में कराई बनाई जाती है। इसके लिये 8 से 15 फीट के व्यास के घेरे में 50-60 तगारी राख बिछाकर थळा बनाते हैं। कराई के चारों ओर अंदर की तरफ एक-एक फुट पाई का बाटा लगाते हैं। बोरड़ी के कांटों की बींट गुंथली को गोल घेरे में रखकर बेवली चौकनी से कूटते हैं। जब यह बींट 3-4 फुट की बन जाती है, इसमें बोरड़ी के पत्ते अलग कर देते हैं। बींटे को आधा काटा जाता है, चंद्राकार बींटे के राख वाले गोल घेरे के चारों ओर भीतर की तरफ एक-एक फुट में लगाते हैं। इसे पाई का बाटा लगाना कहते हैं। बाटे के अंदर खाली जगह में बाजरे का डूर भर दिया जाता है। इसके ऊपर धामण, भूरट, बेकरिया, मूंग और ग्वार का गुणा के बाटे बनाते हैं। एक-एक फुट का बाटा लगाते हैं तथा बीच के रिक्त स्थान में बाजरे के डोकों को काटकर डालते जाते हैं। मूंग-मोठ की पानड़ी(पत्ते), ग्वार की ग्वारटी या फलगटी डालकर खूंदते जाते हैं। दस फुट बाद कांकड़ी बनाई जाती है। इसे पेट निकालना भी कहते हैं। अंत में कराई को छाजते हैं। कराई की ऊँचाई 12 से 25 फीट होती है।

    पचावा

    पचावा में डोकों को बिना कुतर के रखा जाता है। इसमें मिट्टी या ईंटों की थर पंक्तिबद्ध तरीके में दी जाती है। दो पंक्तियों के बीच स्थान छोड़ा जाता है। थर के ऊपर अरणी के डोकों की नाथ देकर इसे मिट्टी से भर दिया जाता है। उसके बाद डोकों की थई दी जाती है। कराई झौंपड़ी के आकार में होती है जबकि पचावा चौकोर आकार में होता है।

    कणारा

    फसल को चूहों, कीट-पतंगों एवं फफूंदियों द्वारा नष्ट कर दिये जाने की आशंका रहती है। इसलिये धान के कणों को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से गांवों में कणारे बनाये जाते हैं। ये मिट्टी और गोबर से बनाये जाने वाली बड़ी कोठियां होती हैं। कोठियां कणारा से छोटी होती हैं। चोकोर आकार की कोठी को कोठलिया कहते हैं। जब किसी वर्ष अनाज अत्यधिक पैदा होता है तो उसे कणारा या कोठी में नहीं रखा जा सकता। ऐसी स्थिति में चारे की कराई में, चारे के साथ सिट्टे भी रख दिये जाते हैं।


    कृषि के संदर्भ में जिलेवार महत्वपूर्ण तथ्य

    अजमेर : राज्य में गुलाब के फूल तथा अमरूद का सर्वाधिक उत्पादन अजमेर जिले में होता है। पुष्कर क्षेत्र में गुलाब की रोज इण्डिया किस्म का सर्वाधिक उत्पादन होता है। अजमेर में फूलों की आधुनिक मण्डी विकसित की गई है।

    अलवर : राज्य में तम्बाखू का सर्वाधिक उत्पादन अलवर जिले में होता है। जिले के तिन कारुड़ी में बीज फार्म स्थापित किया गया है। जिले के नौगावां नामक स्थान पर सरसों अनुसंधान का अग्रणी कृषि विज्ञान केन्द्र स्थापित किया गया है। अलवर में राज्य की प्रमुख प्याज मण्डी है। जिले का शाहजहाँपुर कस्बा फूड प्रोसेसिंग की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

    उदयपुर : राज्य में मशरूम, हल्दी, पपीता तथा ककड़ी का सर्वाधिक उत्पादन उदयपुर जिले में होता है।

    कोटा : राज्य में सर्वाधिक ज्वार, अलसी, सोयाबीन तथा मसालों का उत्पादन कोटा जिले में होता है। यहाँ समन्वित सोयाबीन परियोजना स्थापित की गई है। कोटा में राज्य का पहला एग्रो फूड पार्क स्थापित किया गया। कोटा जिले के बोरखेड़ा में सोयाबीन शोध संस्थान खोला गया है।

    चित्तौड़गढ़ : राज्य में मूंगफली, अफीम, सिंघाड़ा, सीताफल, लहसुन अजवायन एवं बेर का सर्वाधिक उत्पादन चित्तौड़गढ़ जिले में होता है।

    चूरू : जैसलमेर तथा चूरू जिलों में कपास का उत्पादन बिलकुल नहीं होता।

    जयपुर : राज्य में सर्वाधिक जौ, आम तथा नाशपति का उत्पादन जयपुर जिले में होता है। जयपुर में राष्ट्रीय कृषि विपणन संस्थान स्थापित किया गया है। जयपुर में सब्जी सुधार की अखिल भारतीय समन्वित परियोजना का उपकेन्द्र स्थापित किया गया है।

    जालोर : राज्य में जीरा, ईसबगोल, अरण्डी, बेदाना अनार तथा भांग-गांजा का सर्वाधिक उत्पादन जालोर जिले में होता है। यह जिला उच्च कोटि के टमाटरों के उत्पादन के लिये भी प्रसिद्ध है।

    जैसलमेर : जैसलमेर जिले में शुष्क वन अनुसंधान संस्थान द्वारा बांस की खेती की जा रही है। राज्य में कार्यशील जोतों का सबसे बड़ा औसत आकार (16.99 हैक्टेयर) जैसलमेर जिले में है।

    जोधपुर : राज्य में मिर्च, अनार, दालों तथा जोजोबा का सर्वाधिक उत्पादन जोधपुर जिले में होता है। जोधपुर से औषधीय महत्व की सोनामुखी की पत्तियों का निर्यात होता है। मण्डोर में ईसबगोल अनुसंधान केन्द्र खोला गया है।

    झालावाड़ : सर्वाधिक संतरा उत्पादन के कारण झालावाड़ को राजस्थान का नागपुर कहते हैं।

    टोंक : राज्य में मतीरा (तरबूज) का सर्वाधिक उत्पादन टोंक जिले में होता है। टोंक के खरबूजे भी प्रसिद्ध हैं।

    डूंगरपुर : राज्य में कार्यशील जोतों का सबसे छोटा औसत आकार (1.47 हैक्टेयर) डूंगरपुर जिले में है।

    धौलपुर : राज्य में नींबू का सर्वाधिक उत्पादन धौलपुर तथा भरतपुर जिलों में होता है।

    नागौर : राज्य में सर्वाधिक तिल उत्पादन नागौर जिले में होता है। नागौर जिले में खुशबूदार मेथी का उत्पादन होता है जिसे देश विदेश में निर्यात किया जाता है।

    पाली : राज्य में खरबूजा का सर्वाधिक उत्पादन पाली जिले में होता है। टोंक के खरबूजे भी प्रसिद्ध हैं।

    बाड़मेर : राज्य में बाजरा तथा सिनकोना का सर्वाधिक उत्पादन बाड़मेर जिले में होता है। इस जिले में मोठ तथा खरीफ की दालें सर्वाधिक पैदा होती हैं।

    बारां : राज्य में धनिया का सर्वाधिक उत्पादन बारां जिले में होता है।

    बांसवाड़ा : राज्य में केले का सर्वाधिक उत्पादन बांसवाड़ा जिले में होता है। बांसवाड़ा जिले के बोखर गाँव में मक्का शोध संस्थान खोला गया है।

    बीकानेर : राज्य में खजूर तथा अंजीर का सर्वाधिक उत्पादन बीकानेर जिले में होता है। जिले के लूणकरणसर क्षेत्र को मूंगफली उत्पादन के लिये राजस्थान का राजकोट कहा जाता है। बीकानेर में खजूर एवं बेर अनुसंधान केन्द्र खोले गये हैं।

    बूंदी : राज्य में सर्वाधिक चावल उत्पादन बूंदी जिले में होता है। यहाँ सैला बासती चावल उगाया जाता है।

    भरतपुर : राज्य में सर्वाधिक सरसों उत्पादन भरतपुर जिले में होता है। राज्य में नींबू का सर्वाधिक उत्पादन धौलपुर तथा भरतपुर जिलों में होता है। जिले के सेवर नामक स्थान पर सरसों शोध संस्थान खोला गया है।

    राजसमंद : राज्य में अदरक का सर्वाधिक उत्पादन राजसमंद जिले में होता है। जिले के खमनौर नामक स्थान पर दश्मक गुलाब (चैती गुलाब) उगाया जाता है।

    सवाईमाधोपुर : सवाईमाधोपुर में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने कृषि विज्ञान केन्द्र स्थापित किया है।

    सिरोही : राज्य में सौंफ तथा चीकू का सर्वाधिक उत्पादन सिरोही जिले में होता है। जिले के माउण्ट आबू में सेब का उत्पादन सर्वप्रथम आरंभ हुआ। सिरोही एवं बांसवाड़ा जिलों में लीची एवं बादाम की खेती की संभावनाएं मौजूद हैं। जिले में मॉलवी किस्म की कपास की खेती होती है।

    सीकर : राज्य का पहला कृषि विज्ञान केन्द्र फतहपुर शेखावाटी में स्थापित किया गया।

    श्रीगंगानगर : राजस्थान में जिले के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल में से शुद्ध बोया गया सर्वाधिक क्षेत्रफल श्रीगंगानगर जिले में है। एक से अधिक बार बोया गया क्षेत्रफल के मामले में भी यह अन्य जिलों से आगे है। यह जिला गेहूँ, गन्ना, कपास, चुकंदर, किन्नू तथा मालटा उत्पादन में सब जिलों से आगे है। इसे राजस्थान का अन्न भण्डार भी कहते हैं। समस्त जिलों में सर्वाधिक फल उत्पादन के कारण श्रीगंगानगर को बागानों की भूमि कहा जाता है। राज्य में चुकंदर आधारित मिल केवल इस जिले में है। राजस्थान में हरित क्रांति इस जिले से आरंभ हुई। इस जिले में नाइट्रोजन उर्वरक का प्रयोग अन्य जिलों से अधिक होता है। राज्य में सर्वाधिक कृषि मण्डियां तथा स्टेट वेयर हाउस इस जिले में हैं। एशिया का सबसे बड़ा कृषि केन्द्र- सूरतगढ़ यांत्रिक फार्म इस जिले के सूरतगढ़ कस्बे में है। इसकी स्थापना रूस के सहयोग से 15 अगस्त 1956 को हुई थी। चारे के प्रमाणिक बीजों के उत्पादन और प्रचार-प्रसार का कार्य इसी केन्द्र में किया जाता है। यह भारत का राष्ट्रीय बीज केन्द्र है। राजस्थान की प्रमुख कपास मण्डी तथा कपास शोध संस्थान भी श्रीगंगानगर में है। कपास को सफेद सोना भी कहा जाता है। राज्य में किन्नू की मण्डी केवल श्रीगंगानगर में है। इस जिले के जैतसर नामक स्थान पर कनाडा के सहयोग से जैतसर यांत्रिक फार्म स्थापित किया गया है। गंगानगर एवं हनुमानगढ़ जिलों में अमरीकन कपास का नगदी फसल के रूप में बड़ी मात्रा में उत्पादन होता है।

    हनुमानगढ़ : राज्य में चने तथा ग्वार का सर्वाधिक उत्पादन हनुमानगढ़ जिले में होता है।


    राजस्थान में बागवानी

    बागवानी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को कृषि प्रसंस्करण एवं अन्य गौण गतिविधियों में परिवर्तित कर ग्रामीण लोगों को अतिरिक्त रोजगार के अवसर उपलब्ध कराती है। बागवानी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए निम्नलिखित योजनाएं संचालित की जा रही हैं-

    राष्ट्रीय बागवानी मिशन : राज्य के चयनित 24 जिले क्रमशः जयपुर, अजमेर, अलवर, चित्तौड़गढ़, कोटा,बारां, झालावाड,जोधुपर, पाली, जालौर, बाड़मेर, नागौर, बांसवाड़ा, टोंक, करौली, सवाईमाधोपुर, उदयपुर,डूंगरपुर, भीलवाड़ा, बून्दी, झुंझुनूं, सिरोही, जैसलमेर एवं श्रीगंगानगर में विभिन्न उद्यानिकी फसलों यथा- फल, मसाला, फूल एवं औषधीय फसलों के क्षेत्रफल, उत्पादन व उत्पादकता बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय बागवानी मिशन चलाया जा रहा है।

    राष्ट्रीय बम्बू मिशन : योजनान्तर्गत बाँस की खेती को बढ़ावा देने के लिए राज्य के करौली, सवाईमाधोपुर, उदयपुर, चितौड़गढ़, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, सिरोही, बांरा, झालावाड़, भीलवाड़ा, राजसमन्द एवं प्रतापगढ़ जिलों को सम्मिलित किया गया है।

    राष्ट्रीय कृषि विकास योजना : कृषि एवं सम्बद्ध क्षेत्र में लगातार गिरते हुए निवेश को देखते हुए केन्द्र सरकार ने यह योजना आरम्भ की है जिसमें कृषि जलवायु स्थितियों, प्राकृतिक संसाधनों से सम्बद्ध विषयों एवं तकनीक को दृष्टिगत रखते हुए कृषि क्षेत्र के लिये विस्तृत योजना बनाई गई है। इसके अंतर्गत राज्य में उद्यानिकी विकास परियोजना के लिये वर्ष 2012-13 में खजूर की खेती, अनार का उत्पादन, अंगूर पौधारोपण, खजूर टिश्यू कल्चर प्रयोगशाला, गैर राष्ट्रीय बागवानी मिशन वाले जिलों में उद्यानिकी विकास कार्यक्रम, ग्रीन हाउस पौधारोपण सामग्री, शेड व नेट हाउस में में सब्जी उत्पादन, सब्जी मिनी किट्स वितरण, ढिढोल नर्सरी विकास, सोलर पम्पसैट पर सहायता आदि कार्यों हेतु 123.15 करोड़ रुपये स्वीकृत किये गये हैं।


    राजस्थान में औषधि सम्पदा

    हिमालय पर्वत के बाद राजस्थान ही एक मात्र ऐसा क्षेत्र है जिसे सृष्टिकर्ता ने सर्वाधिक औषधियां प्रदान की हैं। यहाँ की साधारण तथा घास-फूस समझी जाने वाली वनस्पतियां भी मनुष्य एवं पशुओं के आरोग्य हेतु बड़ी चमत्कारी औषधियां हैं। मरू प्रदेश में कैर, कुमटी, खेजड़ी, धतूरा, आसलिया, जीरा, ईसबगोल, शंखपुष्पी, रोहिषतृण (देशी बूर), गांगेरुकी, कर्पूरगंधा, महाबला, हरमल, इंद्रायण, लाल व सफेद आकड़ा, भूरांगणी, ऊँटकटो, खारी, बेर, भाऊ, फोग, धव, खींप, नागबेल, कनेर, थूहर, सर्पगंधा, अश्वगंधा, गोंद तथा गूगल आदि अनेक बहुमूल्य औषधियां पायी जाती हैं। अरावली के पर्वतीय वन-क्षेत्र में बाय हाकल, काली हाकल, चित्राल, बरकड़ा, गारह गोटा, बिदार कंद, तोलिया कन्द, सफेद मूसली, बिल्व, गंेगची, अपामार्ग, शालपर्णी, शैफाली, नागरमोथा, घातकी पाठा, कम्पलीक, मिर्चीकन्द, सूरवाल घास, खाट खटूम्बर, बटेड़ा, पलाश, हस्तकर्ण, ट्रायडक्स आदि दुर्लभ औषधियों का भण्डार है।

    राष्ट्रीय औषधीय पादप मिशन (एन.एम.एम.पी.) : राज्य में औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देने एवं फार्मा सेक्टर को आसानी से कच्चा माल उपलब्ध कराने के लिए भारत सरकार द्वारा वर्ष 2009-10 से यह कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया है।

    औषधीय पौध संरक्षित क्षेत्र : राज्य में औषधीय प्रजातियों के संरक्षण हेतु 9 औषधीय पौध संरक्षित क्षेत्र की स्थापना की जा रही है जिनमें से 7 क्षेत्र स्थापित किये जा चुके हैं।

    ईसबगोल की खेती : मरुस्थलीय क्षत्रों में जहाँ थोड़ी बहुत वर्षा होती है तथा सिंचाई के कृत्रिम साधन उपलब्ध हैं, ईसबगोल की खेती सफलता से की जाती है। इसके बीजों में सफेद रंग की भूसी पाई जाती है जिसे औषधि के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।

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  • अध्याय - 7 भारत में लौह युगीन संस्कृति

     02.06.2020
    अध्याय - 7 भारत में लौह युगीन संस्कृति

    भारत में लौह युगीन संस्कृति


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    ऋग्वेद में अयस नामक एक ही धातु का उल्लेख हुआ है। अथर्वेद में लाल-अयस तथा श्याम-अयस नामक दो धातुओं का उल्लेख है। वाजसनेयी संहिता में लौह तथा ताम्र शब्द प्राप्त होते हैं।

    भारत में ताम्र-कंास्य काल के बाद लौह-काल आरम्भ हुआ। शोधकर्ताओं के अनुसार लौह-काल का आरम्भ उत्तर तथा दक्षिण में एक साथ नहीं हुआ। दक्षिण भारत में लोहे का प्रयोग उत्तर भारत की अपेक्षा काफी बाद में हुआ।

    लोहे की खोज

    विश्व में सर्वप्रथम 'हित्ती' नामक जाति ने लोहे का उपयोग करना आरम्भ किया जो एशिया माइनर में ई.पू.1800 से ई.पू.1200 के लगभग निवास करती थी। ई.पू.1200 के लगभग इस शक्तिशाली साम्राज्य का विघटन हुआ और उसके बाद ही भारत में लोहे का प्रयोग आरंभ हुआ।

    भारत में लौह युग के जन्म-दाता

    माना जाता है कि भारत में लौह-काल की शुरुआत करने वाले लोग पामीर पठार की ओर से आए थे और हिमालय से नीचे उतरकर दक्षिण-पश्चिम की ओर चलते-चलते महाराष्ट्र तक फैल गए। कुछ विद्वान इन्हीं को भारत में आने वाले प्रारम्भिक आर्य मानते हैं। उनके आने से पहले भारत में जो जातियाँ निवास कर रही थीं वे सैन्धव, द्रविड़, कोल, ब्रेचीफेलस, मुण्डा आदि आदिवासी जातियाँ थी। लौह संस्कृति को जन्म देने वाले आर्य भारत में जहाँ-जहाँ गए, अपने साथ लौह का ज्ञान ले गए जिससे सम्पूर्ण भारत में लौह संस्कृति की बस्तियां बस गईं। कालान्तर में ये आर्य, मध्य प्रदेश के वनों को पार करके बंगाल की ओर भी फैल गए।

    मानव जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन

    मनुष्य के जीवन को सुखमय बनाने तथा उसकी सभ्यता एवं संस्कृति की उन्नति में अन्य किसी धातु से उतनी सहायता नहीं मिली जितनी लोहे से मिली है। लोहे के उपकरण कांस्य उपकरणों की अपेक्षा अधिक मजबूत सिद्ध हुए। लौह-काल में मनुष्य ने वैज्ञानिक विकास आरम्भ किया जिससे उसके जीवन में बड़े क्रान्तिकारी परिवर्तन होने लगे। प्रारंभिक लौह युगीन बस्तियों के अवशेष अनेक स्थलों से प्राप्त हुए हैं।

    लौह युग का काल निर्धारण

    विद्वानों की धारणा है कि उत्तर भारत में इसका प्रारम्भ ईसा से लगभग 1,000 वर्ष पूर्व हुआ होगा। ई.पू.800 में लोहे का प्रयोग प्रचुर मात्रा में किया जाने लगा। लौह उत्पादन की प्रक्रिया का ज्ञान भारत में बाहर से नहीं आया। कतिपय विद्वानों के अनुसार लौह उद्योग का प्रारम्भ, मालवा एवं बनास संस्कृतियों से हुआ। कर्नाटक के धारवार जिले से ई.पू.1000 के लोहे के अवशेष मिले हैं। लगभग इसी समय गांधार (अब पाकिस्तान में) क्षेत्र में लोहे का उपयोग होने लगा। मृतकों के साथ शवाधानों में गाढ़े गए लौह उपकरण भारी मात्रा में प्राप्त हुए हैं। ऐसे औजार बलोचिस्तान में मिले हैं। लगभग इसी काल में पूर्वी पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश में भी लोहे का प्रयोग हुआ। खुदाई में तीर के नोंक, बरछे के फल आदि लौह-अस्त्र मिले हैं जिनका प्रयोग लगभग ई.पू.800 से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आमतौर पर होने लगा था। लोहे का उपयोग पहले, युद्ध में और बाद में कृषि में हुआ।

    लोहे के साहित्यिक प्रमाण

    भारत में लोहे की प्राचीनता सिद्ध करने के लिए हमें साहित्यिक तथा पुरातात्विक दोनों ही प्रमाण मिलते हैं। ऋग्वेद में अयस नामक धातु का उल्लेख हुआ है। कहा नहीं जा सकता कि अयस का आशय ताम्बे से है या लोहे से? अथर्ववेद में लौह आयस तथा श्याम-अयस नामक दो धातुओं का उल्लेख है। इनमें से लौह-अयस लोहा तथा श्याम-अयस ताम्बा अनुमानित होता है। यूनानी साहित्य में उल्लेख मिलता है कि भारतीयों को सिकंदर के भारत आने से पहले से ही लोहे का ज्ञान था। भारत के कारीगर लोहे के उपकरण बनाने में निष्णात थे। उत्तर-वैदिक-काल के ग्रंथों में हमें इस धातु के स्पष्ट उल्लेख प्राप्त होते हैं। साहित्यिक प्रमाणों के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि ई.पू. आठवीं शताब्दी में भारतीयों को लोहे का ज्ञान प्राप्त हो चुका था।

    लोहे के पुरातात्विक प्रमाण

    लोहे की प्राचीनता के सम्बन्ध में साहित्यिक उल्लेखों की पुष्टि पुरातात्विक प्रमाणों से होती है। अहिच्छत्र, अतरंजीखेड़ा, आलमगीरपुर, मथुरा, रोपड़, श्रावस्ती, काम्पिल्य आदि स्थलों के उत्खननों में लौह युगीन संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इस काल का मानव एक विशेष प्रकार के मृद्भाण्डों का प्रयोग करता था जिन्हें चित्रित धूसर भाण्ड कहा गया है। इन स्थानों से लोहे के औजार तथा उपकरण यथा तीर, भाला, खुरपी, चाकू, कटार, बसुली आदि मिलते हैं। अतरंजीखेड़ा की खुदाई से धातु शोधन करने वाली भट्टियों के अवशेष मिले हैं। इस संस्कृति का काल ई.पू.1000 माना गया है। पूर्वी भारत में सोनपुर, चिरांद आदि स्थानों पर की गई खुदाई में लोहे की बर्छियां, छैनी तथा कीलें आदि मिली हैं जिनका समय ई.पू.800 से ई.पू.700 माना गया है।

    लौह कालीन प्रारंभिक बस्तियां

    (1.) सिन्धु-गंगा विभाजक तथा ऊपरी गंगा घाटी क्षेत्र: चित्रित धूसर भाण्ड संस्कृति इस क्षेत्र की विशेषता है। अहिच्छत्र, आलमगीरपुर, अतरंजीखेड़ा, हस्तिनापुर, मथुरा, रोपड़, श्रावस्ती, नोह, काम्पिल्य, जखेड़ा आदि से इस संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं। चित्रित धूसर भाण्ड एक महीन चूर्ण से बने हुए हैं। ये चाक निर्मित हैं। इनमें अधिकांश प्याले और तश्तरियां हैं। मृद्भाण्डों का पृष्ठ भाग चिकना है तथा रंग धूसर से लेकर राख के रंग के बीच का है। इनके बाहरी तथा भीतरी तल काले और गहरे चॉकलेटी रंग से रंगे गए हैं। खेती के उपकरणों में जखेड़ा में लोहे की बनी कुदाली तथा हंसिया प्राप्त हुई हैं। हस्तिनापुर के अतिरिक्त अन्य समस्त क्षेत्रों में लोहे की वस्तुएं मिली हैं। अतरंजीखेड़ा से लोहे की 135 वस्तुएं प्राप्त की गई हैं। हस्तिनापुर तथा अतरंजीखेड़ा में उगाई जाने वाली फसलों के प्रमाण मिले हैं। हस्तिनापुर में केवल चावल और अजरंजीखेड़ा में गेहूँ और जौ के अवशेष मिले हैं। हस्तिनापुर से प्राप्त पशुओं की हड्डियों में घोड़े की हड्डियां भी हैं।

    (2.) मध्य भारत: मध्य भारत में नागदा तथा एरण इस सभ्यता के प्रमुख स्थल हैं। इस युग में इस क्षेत्र में काले भाण्ड प्रचलित थे। पुराने ताम्रपाषाण युगीन तत्त्व इस काल में भी प्रचलित रहे। इस स्तर से 112 प्रकार के सूक्ष्म पाषाण उपकरण प्राप्त हुए हैं। कुछ नए मृद्भाण्डों का भी इस युग में प्रचलन रहा। घर कच्ची ईंटों से बनते थे। ताम्बे का प्रयोग छोटी वस्तुओं के निर्माण तक सीमित था। नागदा से प्राप्त लोहे की वस्तुओं में दुधारी, छुरी, कुल्हाड़ी का खोल, चम्मच, चौड़े फलक वाली कुल्हाड़ी, अंगूठी, कील, तीर का सिरा, भाले का सिरा, चाकू, दरांती इत्यादि सम्मिलित हैं। एरण में लौहयुक्त स्तर की रेडियो कार्बन तिथियां निर्धारित की गई हैं जो ई.पू.100 से ई.पू.800 के बीच की हैं।

    (3.) मध्य निम्न गंगा क्षेत्र: इस क्षेत्र के प्रमुख स्थल पाण्डु राजार ढिबि, महिषदल, चिरण्ड, सोनपुर आदि हैं। यह अवस्था पिछली ताम्र-पाषाण-कालीन अवस्था के क्रम में आती है, जिसमें काले-लाल मृद्भाण्ड देखने को मिलते हैं। लोहे का प्रयोग नई उपलब्धि है। महिषदल में लौहयुक्त स्तर पर सूक्ष्म पाषाण उपकरण भी पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं। यहाँ से धातु-मल के रूप में लोहे की स्थानीय ढलाई का प्रमाण मिलता है। महिषदल में लोहे की तिथि ई.पू.750 लगभग की है।

    (4.) दक्षिण भारत: दक्षिण भारत में प्रारंभिक कृषक समुदायों की बस्तियां ई.पू.3000 में दिखाई देती हैं। यहाँ मानव के आखेट संग्रहण अर्थव्यवस्था से, खाद्योत्पादक अर्थव्यवस्था की ओर क्रमबद्ध विकास के कोई प्रमाण नहीं मिलते हैं। यहाँ से प्राप्त साक्ष्य संकेत देते हैं कि उस काल में गोदावरी, कृष्णा, तुंगभद्रा, पेनेरू तथा कावेरी नदियों के निकट मानव की बसावट हो चुकी थी। ये क्षेत्र शुष्क खेती तथा पशुचारण के लिए उपयुक्त थे। इस युग में पत्थरों की कुल्हाड़ियों को घिसकर तथा चमकाकर तैयार किया गया था। इस युग का उद्योग, पत्थरों की कुल्हाड़ियों का उद्योग कहा जा सकता है। इन बस्तियों के लोग ज्वार-बाजरा की खेती करते थे। इन बस्तियों में सभ्यता के तीन चरण मिले हैं- प्रथम चरण (ई.पू.2500 से ई.पू.1800) में पत्थर की कुल्हाड़ियां मिलती हैं। द्वितीय चरण (ई.पू.1800 से ई.पू.1500) में ताम्र एवं कांस्य औजारों की प्राप्ति होती है। तृतीय चरण (ई.पू.1500 से ई.पू.1100) में इनका बाहुल्य दिखाई देता है तथा इसके बाद लौह निर्मित औजारों की प्राप्ति होती है।

    दक्षिण भारत में नव-पाषाण-कालीन बस्तियां तथा ताम्र-पाषाण-कालीन बस्तियां, लौह युग के आरंभ होने तक अपना अस्तित्त्व बनाए रहीं। महाराष्ट्र में भी ताम्र-पाषाण-कालीन बस्तियां, लौह युग के आरंभ होने तक अपना अस्तित्त्व बनाए रहीं। ब्रह्मगिरि, पिक्लीहल, संगनाकल्लू, मास्की, हल्लूर, पोयमपल्ली आदि में भी ऐसी ही स्थिति थी।

    दक्षिणी भारत में लौह युग का प्राचीनतम चरण पिक्लीहल तथा हल्लूर की खुदाई एवं ब्रह्मगिरि के शवाधानों के आधार पर निश्चित किया गया है। इन शवाधानों के गड्ढों में पहली बार लोहे की वस्तुएं, काले एवं लाल मृद्भाण्ड तथा फीके रंग के भूरे तथा लाल भाण्ड प्राप्त हुए हैं। ये मृदभाण्ड जोरवे के मृद्भाण्डों जैसे हैं। टेकवाड़ा (महाराष्ट्र) से भी ऐसे ही पाषाण प्राप्त हुए हैं। कुछ बस्तियों में पत्थरों की कुल्हाड़ियों एवं फलकों का प्रयोग, लौहकाल में भी होता रहा।

    लौह युग का दक्षिण में प्रारंभ

    कुछ विद्वानों की धारणा है कि भारत में लोहे का सर्वप्रथम प्रयोग दक्षिण भारत में हुआ किंतु यह धारणा सही प्रतीत नहीं होती। उत्तर भारत में मिली आर्य-बस्तियों के आधार पर कहा जा सकता है कि लोहे का प्रयोग दक्षिण की बजाय उत्तर भारत में पहले हुआ। विद्वानों की धारणा है कि लौह-काल के लोग पामीर पठार की ओर से आए थे और धीरे-धीरे महाराष्ट्र तक फैल गए। कालान्तर में मध्यप्रदेश के वनों को पार कर ये लोेग बंगाल की ओर चले गए।

    दक्षिण में ताम्रकांस्य काल पर भ्रांति

    प्रारंभिक खोजों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि दक्षिण में लौह संस्कृति का प्रारम्भ, पाषाण काल के बाद ही हो गया। दक्षिण में ताम्र-कांस्य काल नहीं आया। हमारी राय में यह कहना उचित नहीं है कि दक्षिण भारत में पाषाण काल के बाद सीधा ही लौह काल आ गया। दक्षिण भारत की कृषक बस्तियों के दूसरे चरण (ई.पू.1800 से ई.पू.1500) में ताम्र एवं कांस्य औजारों की प्राप्ति होती है।

    तृतीय चरण (ई.पू.1500 से ई.पू.1100) में इनका बाहुल्य दिखाई देता है तथा इसके बाद के काल में लौह निर्मित औजारों की प्राप्ति होती है। अतः यह कैसे कहा जा सकता है कि दक्षिण भारत में ताम्र-कांस्य काल नहीं आया?

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