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  • अजमेर का इतिहास - 64

     01.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 64


    ई.1875 में जब अजमेर में रेल पहुँची तो अजमेर नगर का चेहरा अचानक ही बहुत तेजी से बदलने लगा। ई.1878 में जब लोको मोटिव वर्कशॉप कार्य करने लगा तो अजमेर की जनसंख्या और तेजी से बढ़ने लगी। बी.बी.एण्डसी.आई. रेलवे कम्पनी ने वीसल झील तथा मदार पहाड़ी के बीच 52 बंगले बनाये। इस क्षेत्र को हजारी बाग कहा जाता था। यह क्षेत्र गवर्नमेंट कॉलेज के दक्षिण में स्थित था। आगरा एवं अन्य नगरों से बहुत से कर्मचारी अजमेर पहुँचने लगे। ई.1884 में अजमेर में रेलवे के सामान्य कार्यालयों की स्थापना की गयी।

    गाड़ीवानों का रोजगार ठप्प

    रेल आने से पहले अजमेर में सैंकड़ों तांगे वाले, ऊँट गाड़े वाले तथा बैल गाड़ियों वाले रोजगार कमाते थे किंतु रेल आने के बाद उनमें से अधिकांश लोग भूखे मरने लगे और धीरे-धीरे अजमेर शहर छोड़कर चले गये।

    मकानों का किराया बढ़ा

    रेल के आने के बाद अजमेर शहर की जनसंख्या तेजी से बढ़ने लगी और लगभग तीन गुनी हो गई। बाहर से बड़ी संख्या में मनुष्यों के आने से जिन लोगों के पास पक्के भवन थे, वे तेजी से मालदार हो गये। घरों तथा रिक्त भूमि का किराया भी आठ गुना तक बढ़ गया। रिक्त भूमि पर अस्थाई शौचालय बनाकर जिसने छप्पर डाल लिया, वह भी दो रुपये महीना कमाने लगा।

    नगर विस्तार योजनाएँ

    जनसंख्या वृद्धि के साथ ही अजमेर नगर के विस्तार की योजनाएं आरंभ की गईं। साण्डर्स ने पहली नगर विस्तार योजना अजमेर नगर के दक्षिण में कैसर गंज के रूप में आरम्भ की। कैसरगंज की स्थापना ब्रिटिश साम्राज्ञी विक्टोरिया के दिल्ली दरबार आयोजन एवं कैसरे हिन्द की उपाधि धारण करने की स्मृति में की गई। अजमेर के लोग इसे केसरगंज कहकर पुकारते हैं।

    ई.1884-85 में केसरगंज बनकर तैयार हुआ। इसके केन्द्र में एक गोलाकार पार्क था। इस गोलाकार पार्क से सात सड़कें विभिन्न दिशाओं को जाती थीं। पूरा नियोजन बहुत सुंदर विधि से किया गया था। शीघ्र ही यह पूरा क्षेत्र दुकानों एवं घरों से भर गया। ई.1880 के दशक में नगरा, जोंसगंज, रामगंज, नारायण गंज आदि मौहल्ले बसने लगे। जोंसगंज की स्थापना ई.1880 में रेलवे ने उस समय की जब अजमेर में रेलवे शॉप्स की स्थापना हुई। इस कॉलोनी को बसाने के लिये रेलवे ने अपने कर्मचारियों को भूमि एवं अन्य सुविधायें उपलब्ध करवाईं।

    ई.1890 में पाल बीसला पर एक कॉलोनी विकसित हुई। इन्हीं दिनों में नसीराबाद रोड तथा श्रीनगर रोड के बीच पुराना जादूघर मौहल्ला विकसित हुआ। जब अजमेर की जनंसख्या काफी बढ़ गई तो आगरा गेट के बाहर गंज में भी बहुत भीड़-भाड़ हो गई जिससे इस क्षेत्र में लूंगिया तथा बापूगढ़ नामक मौहल्ले बस गये। इम्पीरियल रोड से लेकर दौलतबाग तक का क्षेत्र एवं जयपुर सड़क से लेकर कचहरी सड़क तक का क्षेत्र जो प्राचीन समय में सब्जियों एवं फलों के बगीचों से भरा हुआ था, वहाँ पर हाथी भाटा नाम से काफी भीड़भाड़ वाला मौहल्ला बस गया। बीसवीं सदी के आरंभ में ब्रह्ममपुरी नामक मौहल्ला बसा। कुछ ही दिनों में ये सारे क्षेत्र परकोटे के भीतर के मौहल्लों की भांति भीड़-भाड़ वाले हो गये।

    इसके बाद अजमेर के दक्षिण में, रेलवे शॉप्स के पास, जनसंख्या का विस्तार होना आरंभ हुआ। भगवानगंज, आसागंज(ट्रामवे स्टेशन के पास), भैरूगंज (नसीराबाद रोड के निकट), लोको शॉप तथा मेयो कॉलेज के बीच रबद्या बसा। नसीराबाद रोड पर उदयगंज एवं भजनगंज, जोन्सगंज के दक्षिण में गणेशगंज तथा आसागंज के दक्षिण में पहाड़गंज बसा। रेलवे लाइन एवं गवर्नमेंट हाईस्कूल के बीच में तोपदड़ा बसा। दौलतबाग के निकट पूर्व में लगे हुए कालाबाग तथा अन्य बागीचे लुप्त हो गये। वहाँ सिविल लाइन्स बनी जिसमें उच्च वर्ग के लोगों ने अपने निवास बनाये।

    अजमेर में महत्त्वपूर्ण भवनों का निर्माण

    अजमेर नगर में जब नई कॉलोनियां का विकास हो रहा था, तब उन दिनों में अजमेर में कई विशाल एवं महत्त्वपूर्ण भवनों का निर्माण हुआ। इनमें कैसरगंज क्षेत्र में दयानंद आश्रम, रेलवे हॉस्पीटल, रेलवे इंस्टीट्यूट, रोमन कैथोलिक कैथेड्रल, पुराना विक्टोरिया हॉस्पीटल, नया कचहरी भवन, जनरल पोस्ट एण्ड टेलिग्राफ ऑफिस, किंग एडवर्ड मेमोरियल, द गवर्नमेंट हाईस्कूल नया विक्टोरिया हॉस्पीटल रेलेव बिसेट इंस्टीट्यूट प्रमुख हैं।

    आगरा से आये सर्वाधिक लोग

    रेल आ जाने के कारण ई.1894 तक अजमेर शहर की जनसंख्या दो गुनी बढ़ गई। बाहर से आने वालों में आगरा के लोग सबसे अधिक थे।

    वेश्याओं का बोलबाला

    अजमेर शहर में व्यभिचार तो पहले से ही चला आ रहा था किंतु रेल के आने के बाद और भी बढ़ गया। अंतर केवल इतना आया कि पहले अजमेर में राजपूताना और अजमेर की औरतें उपलब्ध थीं, अब कहीं की भी औरतें मिलने लगीं। अजमेर में इतनी बड़ी संख्या में वेश्याओं के आने का कारण यह भी था कि अजमेर के चारों तरफ राजपूत रियासतें थीं जहाँ बदचलन औरतों को घर में ही मार दिया जाता था। राजा के कोप से डरने के कारण व्यभिचार से दूर रहते थे किंतु अजमेर में राजा का राज न था, अंग्रेजी कानून हर व्यक्ति की सहायता के लिये उपलब्ध था। इस कारण अजमेर में व्यभिचारी औरतों का जमावड़ा हो गया। अजमेर में आने वाली औरतें आसपास की रियासतों से आती थीं जो अपने घर, परिवार और समाज के अत्याचारों से दुखी होकर आती थीं। वे लौटकर अपने घरों को नहीं जाती थीं। इन्हें ढूंढने भी कोई नहीं आता था। ई.1870 के आसपास अजमेर में वेश्याओं के 11 ठिकाने थे किंतु ई.1897 में इनकी संख्या 20-21 हो गई। इन अड्डों पर कुटनियां भी रहती थीं जो हर वेश्या से अपना कमीशन पच्चीस पैसे लेती थीं।

    किरायेदारों ने बढ़ाया व्यभिचार

    रेल के आने के बाद बहुत से लोगों ने बाहर से आये लोगों को किरायेदार बनाकर अपने घरों में रखा। इन घरों में जवान बहू बेटियों ने अवैध बच्चों को जन्म दिया जिससे उन परिवारों को बहुत शर्मिंदगी झेलनी पड़ी।

    भिखारियों की भीड़

    रेल के आने से पहले ख्वाजा की दरगाह पर खादिमों के अतिरिक्त कुछ भिखारी भी दिखाई देते थे। इसी प्रकार पुष्कर में भी पण्डों के अतिरिक्त कुछ भिखारी दिखाई देते थे किंतु रेल के आने के बाद पूरे देश के भिखारी अजमेर के धार्मिक महत्त्व के कारण अजमेर और पुष्कर में आकर रहने लगे। ये दोनों शहर भिखारियों से भर गये। इनमें कुछ बदमाश एवं चोर आदि भी सम्मिलित रहते थे।

    कुंजड़ों की चांदी

    रेलवे के आने के बाद अजमेर में निचले तबके के लोगों की दौलत में अधिक तरक्की हुई। कुंजड़े, माली तथा मेवा बेचने वाले मालामाल होने लगे। रेल के आने से पहले एक रुपये में कई मन तरकारी मिलती थी किंतु रेल के आने के बाद तरकारी का भाव एक रुपये की आठ सेर हो गया। शहर में मिलावटी घी बिकने लगा।

    शराब का ठेका

    रेल के चलते ही अजमेर में बहुत से अंग्रेजों, पारसियों एवं हिन्दुस्तानी व्यापारियों ने बड़ी संख्या में अपनी दुकानें लगा लीं। इन लोगों ने अच्छा पैसा कमाया। रेल के आने से पहले ई.1870 में अजमेर का देशी शराब का ठेका दस-ग्यारह हजार रुपये में उठता था किंतु रेल आरंभ होने के बाद ई.1886 में एक लाख सत्तर हजार रुपये का ठेका उठा। अजमेर शहर में शराब का पहला ठेका दादाभाई पेस्तमजी नामक पारसी ने लिया किंतु चार साल में उन्हें बीस से तीस हजार रुपये का घाटा उठाना पड़ा क्योंकि ठेके की पूरी राशि वूसल नहीं हो पाती थी।

    चण्डू का चलन

    रेल के आने से पहले शहर में एक भी दुकान पर चण्डू नहीं बिकता था। चण्डू अफीम से बनने वाला मादक पदार्थ है जिसके सेवन से नशा होता है। इसकी लत वाले व्यक्ति को समय पर चण्डू नहीं मिलने से उसकी हालत खराब हो जाती है।रेल आरंभ होने के बाद अजमेर में चण्डू की कई दुकानें खुल गईं। मुराद अली के अनुसार मुरादाबाद का रहने वाला रहीम बख्श नामक एक बदमाश अजमेर में चण्डू लेकर आया। उसी ने अजमेर के नौजवानों को चण्डू पीना सिखाया। रेल के आने के बाद अजमेर में चण्डू का भी ठेका उठने लगा। मदार गेट के अंदर वेश्याओं के मौहल्ले में उसकी दुकान थी।

    वह किसी भी मालदार नौजवान से दोस्ती गांठता, फिर उसे अपनी दुकान में ले जाकर बिना पैसा लिये चण्डू के छर्रे पिलाता। हर रोज दोस्ती के नाम पर छर्रों की संख्या बढ़ा देता। इस प्रकार उस नौजवान को चण्डू की लत लग जाती। धीरे-धीरे सैंकड़ों बदमाश, उचक्के और जुआरी उसकी दुकान से चण्डू पीने लगे। रहीम बख्श चण्डू बेचकर प्रतिदिन 15-16 रुपये कमाने लगा। उसे देखकर अजमेर में और भी बहुत से लोगों ने चण्डू की दुकानें खोल लीं। यहाँ तक कि अजमेर में चण्डू की 32 दुकानें खुल गईं।

    जब यह संख्या समाचार पत्रों में छपी तो सरकार ने चण्डू की दुकानों के लिये लाइसेंस की व्यवस्था की। इसके बाद से मदक, चण्डू तथा अफीम का ठेका साथ ही छूटने लगा। अजमेर की सरकार ने अजमेर में केवल तीन दुकानों को ही चण्डू के लाइसेंस दिये। कुछ समय बाद अजमेर रेलवे के खलासी माल गोदाम से सामान चुराकर रहीम बख्श की दुकान पर बेचने लगे। ई.1890-91 तथा 1892 में पादरियों ने अफीम की खेती एवं सेवन का विरोध किया।

    पादरियों ने चण्डूबाजों के किस्से और चित्र लंदन के समाचार पत्रों- सेन्टीनल, बेनर और एशिया, मुम्बई के समचार पत्र- गारजियन आदि में छपवाये। इस आलोचना के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारत के शहरों में चण्डू के लाइसेंस देने की प्रथा बंद कर दी। उस समय कर्नल ट्रेवर अजमेर का कमिश्नर था। उसने भी अजमेर में चण्डूखाने के लाइसेंस देने बंद कर दिये।

    अफीम बेचने के लाइसेंस भी बंद कर दिये गये किंतु मदक का ठेका जारी रहा। इसके बाद अजमेर शहर में चण्डू की दुकानें चोरी-छिपे चलने लगीं। इसके बाद कानून लागू हुआ कि कोई भी व्यक्ति ढाई तोला चाण्डू तथा पांच तोला अफीम अपने साथ रख सकता है। इसलिये अफीम और चण्डू के लाइसेंस बंद करने का परिणाम केवल इतना हुआ कि सरकार को राजस्व की हानि हुई। इन दोनों चीजों का उपयोग वैसे ही होता रहा।

    अजमेर के जुआघर

    रेल के आने से पहले अजमेर शहर में तीन जुआघर थे। इन तीनों जुआघरों का मालिक झूंथाराम जौहरी था। रेल आने के बाद मदार गेट के बाहर पाचं नये जुआघर खुल गये। पुलिसकर्मियों ने भी इन जुआघरों के कर्मचारियों से मिली भगत कर ली। धड़ल्ले से जुआ खिलवाया जाने लगा। जब पुलिस इंस्पेक्टर ब्लांचट को इन जुआघरों के बारे में ज्ञात हुआ तो उसने भेस बदल कर जुआरियों एवं जुआघरों के कर्मचारियों को पकड़ा। जिससे सारे जुआघर बंद हो गये।

    पत्तेबाजों के गिरोह

    शहर में 15-20 पत्तेबाजों का एक गिरोह था जिनमें पन्नालाल और कल्लन आदि बदमाश अधिक कुख्यात थे। ये लोग तड़के सवेरे ही शहर से बाहर निकल जाते और खुल्लमखुल्ला मुसाफिरों को जुए से लूटा करते थे। पुष्कर, नसीराबाद और किशनगढ़ की सड़कों पर हर समय ये लोग मुसाफिरों की ताक में लगे रहते थे तथा प्रतिदिन सौ-सौ रुपये तक कमाकर आपस में बांट लेते। एक दिन इन जुआरियों ने एक फकीर को अपने जाल में फंसाकर उसके सारे कपड़े जीत लिये। सर्दियों का समय था। इसलिये फकीर ने कहा कि कम्बल छोड़ दो किंतु जुआरी न माने उन्होंने फकीर से कम्बल भी छीन लिया।

    इस पर दुखी होकर फकीर ने मदार गेट के बाहर स्थित डिक्सन कुण्ड में कूदकर आत्महत्या कर ली। इसके बावजूद लम्बे समय तक अजमेर में पत्तेबाजों का बाजार उसी तरह गर्म रहा। गंज के बाहर स्थित आगरा दरवाजे के जुलाहों और चटाईवालों का गिरोह तथा मदार गेट के बाहर के बदमाशों के गिरोह भी जबर्दस्त थे। ये कोसों दूर तक मुसाफिर का पीछा करते थे। पहले उसको अनजान बनकर दो तीन रुपये जितवा देते थे। फिर एक ही दांव में उसका सारा माल छीन लेते थे।

    उनका तरीका यह रहता था कि जब ये लोग जुआ खेल रहे होते तब जुआरियों के गिरोह का एक आदमी पास की झाड़ियों में छिपा रहता था और वह अचानक सामने आता और यह कहकर इन पर धावा बोल देता कि मैं पुलिस वाला हूँ और कई दिनों से तुम्हें ही खोज रहा हूँ। तुम सब कोतवाली चलो। यह सुनकर गिरोह के सदस्य भाग खड़े होते तथा मुसाफिर पकड़ लिया जाता। इस तरह उसका सब माल लूट लिया जाता। कुछ समय बाद पुलिस कार्यवाही की गई और कई जुआरी पकड़ लिये गये और उन्हें सजा दी गई।

    बादाम फोड़ने वाले बदमाश

    जब पत्तेबाजी का धंधा मंदा पड़ गया तो इनमें से कुछ लोगों ने बादाम फोड़ने का जुआ खेलना आरंभ किया। ये लोग अपनी जेब में ऐसे बादाम रखते थे जिनमें से कुछ में एक गिरी तथा कुछ में दो गिरी होती थी। ये बदमाश शर्त लगाकर बादाम फोड़ते कि इस बादाम में कितनी गिरी हैं। शर्त जीतने वाले को पैसे मिलते। इन बदमाशों को अच्छी तरह पहचान होती थी कि किस बादाम में कितनी गिरी है। ये लोग रास्ता चलते व्यक्ति को अपने खेल में शामिल कर लेते और उसका सारा माल लूट लेते।

    जब रेल आई तो बादाम का खेल भी बंद हो गया और उसका स्थान पटका ने ले लिया। एक बदमाश कुछ खोटा जेवर लेकर मुसाफिर के सामने चलता और उसके कुछ साथी, मुसाफिर के पीछे चलते। आगे चलने वाला बदश्माश अपना खोटा जेवर रास्ते में गिरा देता। जब मुसाफिर उसे उठाता तो मुसाफिर के पीछे चल रहे बदमाश मुसाफिर को पकड़ लेते और कहते कि इसमें हमारा भी हिस्सा है। जब ये लोग झगड़ा कर ही रहे होते कि आगे चलने वाला बदमाश रोता हुआ आता और कहता कि मेरा सौ-सवा सौ रुपये का कड़ा कहीं गिर गया। तुम्हें मिला हो तो बताओ। इस पर दूसरे बदमाश कड़ा मिलने से मना कर देते। जब पहले वाला बदमाश रोता हुआ चला जाता तो बाकी के बदमाश मुसाफिर से उस कड़े के बदले में बीस-पच्चीस रुपये ले लेते और कड़ा मुसाफिर को दे देते। इस कड़े की वास्तविक कीमत दो आने होती थी।

    गौमांस की दुकानें

    अजमेर में अंग्रेजों के आने से पहले गाय का मांस नहीं मिलता था। यहाँ तक कि मुगल बादशाहों ने भी अजमेर में गाय काटने तथा उसके मांस की बिक्री करने पर प्रतिबंध लगा रखा था। रेल के आने के बाद अजमेर में यूरोपियन्स ने गौमांस खाना आरंभ किया। नसीराबाद छावनी से गौमांस लाकर अजमेर में बेचा जाने लगा। मदार गेट के बाहर मोरी दरवाजे पर गौमांस की चार दुकानें खुल गईं।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-1

     01.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-1

    प्रस्तावना



    'राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति' ग्रंथ के लेखन का उद्देश्य राजस्थान प्रदेश में विगत हजारों वर्षों से पल्लवित एवं पुष्पित मानव सभ्यता द्वारा विकसित एवं स्थापित परम्पराओं, सिद्धांतों एवं व्यवहार में लाई जाने वाली बातों में से उन गूढ़ तथ्यों को रेखांकित करना है जिनके द्वारा राजस्थान की संस्कृति ने पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए मानव को आनंददायी जीवन की ओर अग्रसर किया है।

    मानव सभ्यता प्रकृति की कोख से प्रकट होती है तथा उसी के अंक में पल कर विकसित होती है। मानव सभ्यता को जो कुछ भी मिलता है, प्रकृति से ही मिलता है। इस कारण किसी भी प्रदेश की सभ्यता को, प्रकृति के अनुकूल ही आचरण करना होता है। प्रकृति के विपरीत किया गया आचरण, अंततः मानव सभ्यता के विनाश का कारण बनता है। प्रकृति ने अपनी सुरक्षा के लिये जिस आवरण का निर्माण किया है, वह है धरती का पर्यावरण।

    धरती का पर्यावरण ही सम्पूर्ण प्रकृति को जीवन रूपी तत्व से समृद्ध एवं परिपूर्ण रखने में सक्षम बनाता है। धरती का पर्यावरण बहुत सी वेगवान शक्तियों का समूह है जो एक-दूसरे के अनुकूल आचरण करती हैं, एक-दूसरे को गति देती हैं और एक दूसरी को सार्थकता प्रदान करती हैं। ठीक इसी तरह अपने पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिये सम्पूर्ण धरती एक जीवित कोशिका की तरह कार्य करती है। जिस तरह एक कोशिका में स्थित समस्त अवयव एक दूसरे के अनुकूल रहकर, कोशिका को जीवित रखने, स्वस्थ रखने और कार्य करने की क्षमता प्रदान करते हैं, ठीक उसी तरह धरती पर मौजूद प्रत्येक तत्व को एक दूसरे के अनुकूल आचरण करना होता है, अन्यथा धरती का अस्तित्त्व ही खतरे में पड़ सकता है।

    पर्यावरणीय संस्कृति से आशय मानव द्वारा प्राकृतिक शक्तियों के दोहन में संतुलन एवं अनुशासन स्थापित करने से है। इस अनुशासन के भंग होने पर प्रकृति कठोर होकर मानव सभ्यता को दण्डित करती है। उदाहरण के लिये यदि मानव अपनी काष्ठ सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये समस्त वनों को एक साथ काट ले तो मानसून नामक शक्ति हमसे बदला लेती है। वर्षा या तो होती ही नहीं और यदि होती है तो बाढ़ को जन्म देती है। इसके विपरीत, यदि मानव अपनी काष्ठ सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये सीमित मात्रा में पेड़ों को काटे तथा साथ-साथ नये पेड़ लगाना जारी रखे तो प्रकृति का संतुलन बना रहेगा।

    इस प्रकार पर्यावरणीय संस्कृति से आशय एक ऐसी सरल जीवन शैली से है जो मानव जीवन को सुखद एवं आराम दायक बनाती है तथा पर्यावरण को भी नष्ट नहीं होने देती। राजस्थान की संस्कृति के विभिन्न आयाम इसी गहन तत्व को ध्यान में रखकर स्थापित किये गये हैं जिनका विवेचन इस पुस्तक में करने का प्रयास किया गया है। राजस्थान की संस्कृति में ऐसे बहुत से बारीक एवं गहन गम्भीर तत्व उपस्थित हैं जो मानव को यह चेतना प्रदान करते हैं कि प्रकृति का उपयोग कबीर की चद्दर की तरह किया जाये- दास कबीर जतन कर ओढ़ी, ज्यों की त्यों धर दीन्ह चदरिया।

    आशा है यह पुस्तक हमारी नई पीढ़ी का ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित करने का सफल प्रयास करेगी कि मानव प्रकृति का पुत्र है, पर्यावरण प्रकृति की चद्दर है तथा हमें प्रकृति रूपी माँ की इस चद्दर को सुरक्षित रखना है। यह तभी संभव है जब हम अपने पुरखों द्वारा विकसित की गई सांस्कृतिक चेतना को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिये अपने प्रयास निरंतर जारी रखें। 
    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता



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  • अजमेर का इतिहास - 65

     01.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 65

    उन्नीसवीं सदी के अंत में अजमेर (1)



    उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में अजमेर नगर का चेहरा एक बार फिर बदलने लगा। उस समय आनासागर पानी से इस तरह भरा रहता था कि शाहजहानी बाग तथा पुष्करजी के रास्ते तक पानी ही पानी दिखाई देता था। पूरे नगर के कुण्ड मदार के पहाड़ तक आनासागर के पानी से लबालब रहते थे। बीसला तालाब सूखा हुआ होने के उपरांत भी उसके पूर्व की तरफ पक्की सीढ़ियों के पास दूर तक पानी जमा रहता था। मदार दरवाजे के सामने डिक्सन साहब का कुण्ड और सूरज कुण्ड जो दौलतबाग और शहर के बीच में थे, भरे रहते थे। इसी तरह ऊसरी दरवाजे की डिग्गी बारह महीने भरी हुई रहती थी। पूरा शहर इन कुण्डों का ही पानी पीता था। वन विभाग के अधिकारी पेड़ों पर लोहे की प्लेट चिपकवाते थे।

    अजमेर के निकट बजरंगनाग पहाड़ पर एक भी वृक्ष नहीं था। जिला कार्यालय, ऑनरेरी मजिस्ट्रेटों की कचहरियां, तहसीलदार कार्यालय, सैटलमेंट विभाग तथा पुलिस विभाग मैगजीन में स्थित थे। मैगजीन का मुख्य दरवाजा बंद रहता था, दूसरा दरवाजा खुला रहता था। मैगजीन के पूर्व तथा दक्षिण में वीराना था। डिप्टी कंजरवेटर फॉरेस्ट मुंशी अनवर खान, स्थान-स्थान पर सफाचट मैदानों को जंगल बनाने के लिये घेरते फिरते थे।

    उन्नीसवीं शती के नब्बे के दशक में अजमेर में नया चिकित्सालय बना जिसे ई.1892 में सेठ मूलचंद सोनी ने खरीद लिया। इसमें शेख मोहम्मद इलाही बख्श को चिकित्सक नियुक्त किया गया। धानमण्डी में पादरियों का चिकित्सालय था जिसमें पीरुलाल बाबर नियुक्त थे। दरगाह मीरां सैयद हुसैन खुनग (घोड़ासवार) तारागढ़ का प्रबंधन कोर्ट ऑफ वार्ड्स के अधीन था। अजमेर की जनसंख्या 25 से 30 हजार थी। विदेशी कर्मचारियों में सैटलमेंट विभाग के पंजाबी बड़ी संख्या में थे। शेष शहर एक ही ढंग का था। जनजातियां बहुत ही बुरे हाल में थीं। विशेषतः कुंजड़े बहुत गरीब और कंगले थे। शहर में टके धड़ी तरकारी और अमरूद आदि मिलते थे। न पेट भर रोटी मिलती थी और न तन ढंकने को कपड़ा। अंदरकोट के रहने वालों का खूब जोर था। इन्हें अंदरकोटी कहते थे। ये लोग लड़ाकों के रूप में विख्यात थे तथा बगीचों के ठेके लिया करते थे। तमाम फल-फूल के मालिक यही थे। कुंजड़े और कुंजड़ियां उनकी गुलाम हुआ करती थीं। मालियों की हालत भी अच्छी नहीं थी।

    मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर उर्स के समय प्रतिवर्ष एक बड़ा शामियाना लगाया जाता था। बाद में उस स्थान पर पत्थरों से महफिल खाना बना दिया गया। इसमें लोहे की तीलियों पर बारीक लाल रंग का कपड़ा लगी फानूस रोशन की जाती थी। महफिल के दिन अव्वल मुतवल्ली दो चौबदारों एवं अर्दली को साथ में लेकर, महफिल में आकर बैठते थे। इसके बाद सज्जादा नशीन या उसका एक रिश्तेदार आता था। तब फातेहा ख्वानी होकर कव्वालियों के समारोह तथा सरोद की शुरुआत होती थी। अंतिम दिन पगड़ियां बंटती थीं। खादिम लोग एक के बदले बीस-बीस पगड़ियां मार लेते थे। लंगर और देगों का खाना बांटने में छूट रखी जाती थी। ये खाने अजमेर शहर में हर कहीं बिकते हुए दिखाई देते थे। उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में भी यह प्रथा जारी थी।

    आम तौर पर शहर के लोगों का व्यवहार शरीफाना था। कोई शख्स दगाबाजी करना नहीं जानता था। बिना लिखा पढ़ी के हर साहूकार विश्वसनीय आदमी को रुपया देता था। मकानों का कियारा बहुत सस्ता था। मकान भी हजारों सूने पड़े थे और दो-दो रुपये में अच्छी भली हवेली किराए पर मिलती थी। दो ढाई सौ रुपये में खासी जायदाद आदमी खरीद सकता था। शहर में हजारों बीघा जमीन वीरान पड़ी थी। सौ-डेढ़ सौ मकानों के अतिरिक्त समस्त मकान एक मंजिला थे। पक्की इमारतें बहुत कम थीं। (यादगार-ए-मुराद अली, 03.05.1998; मुराद अली द्वारा दिया गया यह विवरण सही नहीं जान पड़ता। एक ओर तो वह लिखता है कि शहर में व्यभिचार का बोलबाला था और रास्तों पर खतरा ही खतरा था। दूसरी ओर लिखता है कि कोई शख्स दगाबाजी करना नहीं जानता था। एक ओर वह लिखता है कि शहर में हजारों हवेलियां सूनी पड़ी थीं और उसी केसाथ लिखता है कि पक्की इमारतें बहुत कम थीं।)

    घी शुद्ध मिलता था। अनाज भी बहुत था। रुपये के पंद्रह सेर गेहूं, एक मन जौ, तीन सेर घी बिकता था। मिट्टी के तेल से कोई भी परिचित नहीं था। न उसकी बिक्री होती थी। सब तिल्ली का तेल ही जलाते थे। आर्यसमाज को कोई जानता न था। हिन्दू सनातन धर्म के पाबंद थे। संदेश वाहकों का बाजार गर्म था। बीकानेर, ब्यावर, उदयपुर आदि समस्त शहरों में पत्र संदेशवाहक ही पहुँचाते थे। बड़े शहरों के सिवाय डाकखाना कहीं नहीं था। जयपुर से अजमेर और अजमेर से पाली और पाली से आबू तक तार जाते थे। ब्यावर के लोग ऊपर की ओर मुंह उठाकार तार को देखा करते थे।

    लोहागल के रास्ते से अजमेर शहर की तरफ जाने पर एक नहर दिखाई देने लगी जो पादरी ग्रे के बंगले की तरफ से आनासागर की तरफ खोदी गई। हाजी मोहम्मद खान का हरा-भरा बगीचा उजड़ गया और वहाँ पर केवल एक कब्र बची। ऊँचे टीलों पर कोठियां दिखाई देने लगीं। आनासागर के पूर्वी कोने वाली बड़ी टेकड़ी पर एजेंट टू दी गवर्नर जनरल फॉर राजपूताना व चीफ कमिश्नर अजमेर-मेरवाड़ा का भव्य भवन दिखाई देने लगा। उस पर लाल सफेद पट्टियों वाला यूनियन जैक दूर से ही उड़ता हुआ दिखाई देता था।

    राय बंसीलाल का बगीचा भी अब शेष नहीं रहा था। महवेबाग वाली कोठी जहाँ एक्स्ट्रा असिस्टेंट कमिश्नर सैटलमेंट बैठते थे, वीरान हो गई। दूधिया कुएं के पास होकर आनासागर की जो चादर चलती थी, वह भी लुप्त हो गई। मछलियों के रहने के स्थान की जगह अब सड़कें बन गईं। सैलानी पीर की पूर्व वाली जमीन में दौलत बाग का विस्तार हो गया। बाग की पुरानी दीवार गायब हो गई।

    नगर की तरफ सूरजकुण्ड तक बाग फैल गया। वहाँ से पश्चिम में पहाड़ के नीचे बरगद के तले की कब्रें गायब हो गईं और उनके स्थान पर कनेर की झाड़ियां नजर आने लगीं। बाग के दरवाजों पर लोहे के फाटक लग गये जिन पर मसूदा के जागीरदार का नाम खुदा हुआ था। यह बाग सन् 1877 के कैसरे हिन्द दरबार की स्मृति में बनाया गया था। इस दरबार को अजमेर के लोग केसरी दरबार भी कहते थे। दिल्ली दरवाजे से एक सड़क सीधी दूधिया कुएं के पूर्व में होकर बाग वाली सड़क से जा मिली। अंधेरिया बाग से लेकर डॉक्टर हस्बैण्ड साहब की कोठी तक जो बाड़ियां और खेत थे, तथा जहाँ घने वृक्ष थे, वहाँ कैसर बाग लग गया।

    जहाँ डाक बंगला और पीली बंगलिया के बीच में वीराना हुआ करता था, वहाँ जिला कचहरी बन गई। पीली बंगलिया में नजारत का कार्यालय और डाक बंगले में कोर्ट ऑफ वार्ड्स का कार्यालय बन गया। आगरा गेट के बाहर गंज में जहाँ दो तीन कसाई और चटाई वाले थे, वहाँ पर हजारों पक्के मकान बन गये तथा तिल धरने को भी जगह नहीं रही।

    राय बहादुर मूल चंद सोनी के मंदिर का काम पूरा हो गया था तथा उसके दरवाजे लग गये थे। उसमें सोने चांदी और मीनाकारी की मूर्तियाँ लग गईं। मंदिर इतना भव्य था कि उसकी छत की लाल बुर्जियां आकाश से बातें करती थीं। आगरा दरवाजे से घूघरा घाटी तक, मदार दरवाजे से मदार के पहाड़ तक और मेयो कॉलेज से मोडिया भैंरू स्थित सड़क नसीराबाद तक 114 बंगले, 115 छोटी कोठियां और 109 सड़कें निकल गईं। मदार दरवाजे और मैगजीन के बीच तार बंगला बन गया। हाथी भाटा की जगह सवाईजी का मंदिर और धर्मशाला तैयार हो गये।

    मदार दरवाजे के बाहर बीसला को जाते हुए जो पुराने बाग का दरवाजा और कब्रिस्तान थे वे नष्ट होकर उन पर रेलवे कर्मचारियों के क्वार्टर बन गये। यहीं से मालपुए में होकर एक सड़क कचहरी जिला को गई जिसके दोनों तरफ सैंकड़ों मकान बन गये। मुंशी घासीराम की धर्मशाला बन गई। जहाँ मैदान था, वहाँ बबूल आदि के सैंकड़ों नए वृक्ष उग गए। सड़क के किनारे-किनारे हजारों मकान और बंगले बन गये। तालाब बीसला सुखा दिया गया। उसमें खेत बोये जाने लगे और घुड़दौड़ होने लगी।

    अजमेर के धोबी पहले आनासागर में कपड़े धोते थे, उन्नीसवीं सदी के अंत में धोबियों ने अपना जमावड़ा बीसला तालाब पर लगाया। मदार गेट के बाहर सैंकड़ों दुकानें बन गईं। जहाँ कुंजड़े बाजार लगाते थे। डिक्सन कुण्ड के दक्षिण में गंदा नाला और कांटों की झाड़ियों के स्थान पर दरगाह की चिश्ती चमन सराय बन गई। इस सराय के सामने मस्जिद के पास भटियारे और व्यापारी बैठते थे, उनकी जगह नगर निगम का मैदान बन गया। उसके पूर्वी कोने में घण्टाघर बन गया।

    पुख्ता सराय और इमलियों के पेड़ों की जगह रेलवे स्टेशन बन गया जिससे लगती हुई रेल की पटरियां बिछ गईं। कैवेण्डिशपुरा में सैंकड़ों पक्के मकान बन गये तथा वेश्याओं का चकला लग गया। मदार गेट से ऊसरी दरवाजे तक जहाँ मदार गेट से ऊसरी गेट तक, जहाँ खाइयां थी और दिन में भी डर लगता था, बहुत सारे घर बन गये।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-2

     01.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-2

    अनुक्रमणिका



    प्रस्तावना

    चित्र सूची


    खण्ड - एक

    (सभ्यता एवं संस्कृति का विकास)


    1. राजस्थान में मानव सभ्यता का उदय एवं पुरा-संस्कृतियों का विकास

    2. ऐतिहासिक काल में राजस्थान की सभ्यता एवं संस्कृति

    3. पर्यावरण एवं संस्कृति का सम्बन्ध


    खण्ड - दो

    (राजस्थान का पर्यावरण)


    4 राजस्थान का भूगोल

    5 राजस्थान का जलवायु

    6 राजस्थान में सूखा एवं अकाल

    7 राजस्थान की मिट्टियाँ

    8 राजस्थान में जल संसाधन

    9 राजस्थान में वन सम्पदा

    10 राजस्थान में वन्य जीवन

    11 राजस्थान में पशुधन

    12 राजस्थान में कृषि

    13 राजस्थान में खनिज सम्पदा


    खण्ड - तीन

    (राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति)


    14. नगरों एवं गांवों का परम्परागत स्थापत्य

    15. ग्रामीण क्षेत्रों के पर्यावरणीय आवास

    16. राजस्थान में प्रकृति पूजन परम्परा

    17. राजस्थान में जल चेतना

    18. पर्यावरण के पहरेदार ओरण और गोचर

    19. राज्य पशु, पक्षी एवं वृक्ष

    20. पक्षी प्रेम की मिसाल है खीचण

    21. राज्य में अधिक अन्न उत्पादन के पर्यावरणीय उपाय

    22. कृषि-उपज एवं पशु-धन पर आधारित उद्योगों की स्थापना

    23. पर्यावरण की रक्षक राजस्थान की विशिष्ट जातियाँ

    24. पर्यावरण के पुजारी : बिश्नोई

    25. पर्यावरण की रक्षक कला-साधक जातियाँ

    26. पर्यावरण को स्वर देते लोक गीत

    27. पर्यावरण में संगीत घोलते लोकवाद्य

    28. प्रकृति और मानव मन के उल्लास की संयुक्त अभिव्यक्ति लोकनृत्य

    29. पर्यावरणीय संस्कृति की अभिव्यक्ति हैं लोक नाट्य

    30. पर्यावरणीय चेतना की द्योतक राजस्थान की विशिष्ट लोककलाएं

    31. पर्यावरण एवं संस्कृति की चितेरी चित्रकला

    32. पर्यावरण को साधती हस्तकलाएं

    33. पर्यावरण के पोषक : तीज-त्यौहार

    34. पर्यावरण के उन्नायक एवं संस्कृति के संवाहक मेले

    35. पर्यावरणीय संस्कृति की पहचान : पशु मेले

    36. पर्यावरण एवं संस्कृति का मिलन बिंदु : आहार एवं व्यंजन

    37. पर्यावरण की व्याख्या है राजस्थान की वेशभूषा

    38. पर्यावरण की परिभाषा सौंदर्य प्रसाधन एवं आभूषण

    39. पर्यावरण की गोद में पले हैं राजस्थान के परम्परागत खेल

    40. पर्यावरणीय चेतना युक्त साहित्य

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  • अजमेर का इतिहास - 66

     01.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 66

    उन्नीसवीं सदी के अंत में अजमेर (2)


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    मैगजीन के चारों ओर खाई भरकर उस पर घर बना दिये गये। दक्षिणी और पूर्वी बुर्ज की तरफ शहर का परकोटा तोड़कर वहाँ आधुनिक चिकित्सालय की नींव रखी गई। यह चिकित्सालय 16 जुलाई 1894 को बनकर पूरा हुआ। कर्नल ट्रेवर ने इसका उद्घाटन किया। इस चिकित्सालय के लिये सेठ मूलचंद सोनी और सौभाग ढढ्ढा ने सात-सात हजार रुपये चंदा दिया। इस चिकित्सालय के निकट से होकर एक सड़क निकाली गई। मैगजीन की जड़ में लड़कों का सरकारी स्कूल बन गया। मैगजीन का अस्थायी दरवाजा बंद होकर स्थायी वाला वास्तविक दरवाजा खुल गया। ऊसरी दरवाजे का नामोनिशान भी शेष न रहा।

    दरवाजे के पश्चिमी हिस्से में हलवाई की दुकान खुल गई। उधर का परकोटा भी तोड़ दिया गया। रिसाले का पूरा मैदान, अब्दुल्लाहपुरा की सराय तक आबाद हो गया। अब्दुल्लाहपुरा और मस्जिद की बाईं तरफ डाक बंगला रेवले से दक्षिण में जो कब्रिस्तन था, उसके मुर्दों की मिट्टी पलीद हुई। आधा रेल की पटरियों के नीचे और आधा स्टेशन की चाहरदीवारी में मालगोदाम के पास आ गया। सराय अब्दुल्लापुरा आधी नष्ट हो गई। अब्दुल्लाह खान की बीवी का मकबरा रेल के अहाते में चला गया और खुद नवाब अब्दुल्लाह की कब्र सराय में ही रह गई। उनके बीच से रेल की पटरी निकल गई।

    कच्ची कोठरियों के स्थान पर पक्की कोठरियां बन गईं। सराय के चारों तरफ जहाँ थोहर और गधे दिखाई देते थे, वहाँ सन् 1877 में कैसरगंज बसाया गया। ऊँचे टीलों पर सिरकी बंध कुंजड़ों की जगह पुतलीघर बन गया। उसके चारों तरफ कोठियां और बंगले खड़े हो गये। उसके पास ही गवर्नमेंट कॉलेज भी बन गया। ब्यावर और नसीराबाद की सड़कों के दोनों तरफ जहाँ तक दृष्टि जाती थी, बंगले ही बंगले बन गये। मेयो कॉलेज अपनी शैक्षणिक भव्यता के साथ दिखता था।

    पुरानी रेजीडेंसी के बंगले का नाम मिट गया। वहाँ रईसों की कोठियां बन गईं। श्रीनगर की सड़क के दोनों तरफ भी बंगले दिखाई देने लगे। नवाब कुम्हारबाय के कब्रिस्तान स्थित बीसला तालाब की पाल के निकट गिर्जाघर और रेल का तार लगा हुआ है। कैवेण्डिशपुरा की झौंपड़ियों में महल बन गये। शहर में सड़कें बन गईं। हर गली कूंचे में लालटेनें लग गईं। शहर में हजारों की संख्या में दो-तीन मंजिला पक्के मकान बन गये। नया बाजार में आटा पीसने वालों की दुकानों में कपड़ा बाजार लग गया।

    दूसरे राज्यों से हजारों लोग अजमेर में आकर बस गये। घर-घर में रेल कर्मचारी और सरकारी बाबू दिखाई देने लगे। दो रुपये मासिक का किराया अब दस रुपये मासिक हो गया। मकानों का किराया पेशगी देना पड़ता था। शहर के हर गली कूंचे में मद्रासी, गुजराती, काठियावाड़ी और पंजाबी दिखाई देने लगे। ख्वाजा साहब की कमेटी कुप्रबंधन के कारण टूट गई। दरगाह पर सरकारी प्रबंधन हो गया। मुंशी अल्लाह नूर खां टॉडगढ़ की नायब तहसीलदारी से तहसीलदार हो गये और दरगाह के प्रबंधक बन गये।

    ई.1870 में अजमेर शहर में पांच बग्घियां थीं। ई.1894 के आते-आते घर-घर गाड़ियां हो गईं। मुराद अली ने लिखा है- कुछ सेठों को छोड़ दें तो अजमेर के शेष रईस नीबू निचोड़ और भूखे हैं। सेठ मूलचंद सोनी को उसने दानवीर मर्द तथा रहमदिल साहूकार बताया है। दरगाह के दलबदल शामियाने की जगह नवाब इकबालउद्दौला वजीर हैदराबाद ने पत्थर का महफिलखाना बना दिया। ई.1896 के आसपास आनासागर में पानी कम हो गया और फॉयसागर में पानी की मात्रा काफी हो गई। अब फॉयसागर का पानी शहर के नलों में आने लगा। इस सागर का निर्माण फाई नामक इंजीनयिर ने नगरपालिका कमेटी के रुपयों से करवाया और अपने नाम पर इसका नामकरण किया।

    अंदरकोटी मुसलमान

    शहर के बाहर पुरानी आबादी में अंदर कोट था। इसमें मुस्लिम जनसंख्या रहती थी जिन्हें अंदरकोटी मुसलमान कहा जाता था। इसमें सब कौमों के मुसलमान रहते थे। सेठ-साहूकार, मालदार और सरदार लोग अपनी सुरक्षा के लिये अंदरकोटियों को नौकर रखते थे। लोग अपने दुश्मनों से बदला लेने के लिये भी किसी अंदरकोटी को दो-चार रुपये देकर उनको जूते पड़वाते थे। ख्वाजा साहब की देग को भी रस्म के रूप में अंदरकोटी मुसलमान लूटा करते थे। जब ताजिये निकलते थे तो अंदरकोटी लोग अखाड़ेबाजी और तलवार घुमाने का प्रदर्शन भी करते थे। उस समय नगर परकोटे का मुख्य द्वार बंद कर दिया जाता था। इस अखाड़ेबाजी और तलवार बाजी के कारण यदि कोई आम आदमी घायल हो जाता था तो भी वह शिकायत नहीं करता था।

    देसवाली मुसलमान

    ई.1894 के आसपास अजमेर में देसवाली लोगों के आठ मुहल्ले थे। देसवाली मूल रूप से राजपूत थे इनके पूर्वजों ने ई.1202 में तारागढ़ पर स्थित मीरान सैयद खनग सवार की दरगाह पर रात में धावा मारा था। इसके बदले में इन्हें पकड़कर मुसलमान बनाया गया। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में अजमेर के चारों ओर देसवाली मुसलमानों की संख्या पचास हजार से ऊपर हो गई। ये अपने गोत्र खीची, चौहान, सांखला आदि लिखते रहे। ये बहुत गरीब थे। मेहनत मजदूरी करके तथा लकड़ियां बेचकर जीवन निर्वाह करते थे।

    इनके घरों में बात-बात पर झगड़ा होता था। उस समय में मुसलमानों की एक बड़ी आबादी ख्वाजा की दरगाह के खादिमों की भी खड़ी हो चुकी थी। अजमेर में मुसलमान जागीरदारों के पुराने घर भी बड़ी संख्या में थे जिनके पुरखों की जागीरें अजमेर के आसपास हुआ करती थीं। वे अब इतनी छोटी-छोटी रह गई थीं कि कई परिवारों के हिस्से में साल भर में तीन से चार सेर अनाज की आय ही रह गई थी।

    जागीरों की आय

    उस काल में बड़ी जागीरों के स्वामी बहुत कम रह गये थे। जिनमें ख्वाजा साहब की जागीर की आय 40 हजार रुपये वार्षिक, दरगाह मीरान सैयद हुसैन (तारागढ़) की आय 4400 रुपये वार्षिक, चिल्ला पीर दस्तगीर (तारागढ़) की आय 1800 रुपये वार्षिक, मंदिरों की जागीर आय 4000 रुपये वार्षिक, दीवान गयासुद्दीन अली खान शखुलमशाही दरगाह सज्जादा नशीन की आय लगभग 5000 रुपये वार्षिक, नवाब शम्सुद्दीन खां महावत खानी की आय 10,000 रुपये वार्षिक, राजा देवीसिंह गौड़ की आय 4500 रुपये वार्षिक, राजा विजयसिंह, जागीरदार गंगवाना की आय लगभग 5000 रुपये वार्षिक, सैयद इनायतुल्लाह शाह आय लगभग 4300 रुपये वार्षिक, खानदान मेहरबान अली की आय 5600 रुपये वार्षिक थी।

    उस समय अजमेर जिले में 32 ताजीमी पट्टेदार ठिकाने थे- 1. भिनाय, 2. मसूदा, 3. जूनिया, सावर, खरवा, पीसांगन, बांधनवाड़ा, देवलिया कलां, महरुलकलां, आदि प्रमुख थे। इनमें से भिनाय ठिकाना सबसे बड़ा था। राजा मंगल सिंह इसके जागीरदार थे। वे दानवीर और प्रजापालक माने जाते थे। ई.1877 में उन्हें दिल्ली के दरबार में सी.आई.ए. की उपाधि मिली थी। पीसांगन का नौजवान राजा और बासोढ़ी का बड़ा ठाकुर नाहरसिंह ई.1897 में नाबालिगी में ही चल बसे थे। उसके बाद उसका छोटा भाई ठाकुर हुआ। देवलिया का ठाकुमर हरिसिंह भी ई.1897 से पहले मर गया।

    अपराधियों का बोलबाला

    उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों का वर्णन करते हुए मुराद अली ने लिखा है- देशी रजवाड़ों की अपेक्षा ब्रिटिश शासित क्षेत्र अजमेर में चोरी, डकैती, हत्या, बलात्कार, जालसाजी, दगाबाजी की वारदातें अधिक हो रही हैं। यद्यपि आरंभ में अंग्रेजी शासन की बड़ी प्रशंसा हुई तथा यह कहा गया कि अंग्रेज के शासन में शेर और बकरी एक ही घाट पर पानी पीते हैं किंतु अब यह बात नहीं रही। मुजरिमों की रक्षा के लिये कानून बनाया गया है जिससे हजारों अपराधी बच जाते हैं। अपराधी को पकड़ लिये जाने पर वह तुरंत वकील करता है, वकील के सवालों से गवाह घबरा जाता है और अपराधी छूट जाता है। इससे अपराधियों के हौंसले बुंलद होते जा रहे हैं।

    वकीलों की मौज

    साण्डर्स के आने से पहले अजमेर में वकील बहुत ही कम थे। जब साण्डर्स अजमेर आया तो अजमेर-मेरवाड़ा विदेश विभाग के अधीन था। इसलिये साण्डर्स ने विदेश विभाग से अजमेर के लिये विशेष कानून बनवाया जिसे अजमेर रेगूलेशन एक्ट कहते थे। इसकी धारा 28 के अंतर्गत यह प्रावधान किया गया कि अजमेर से बाहर का वकील बिना किसी विशेष परिस्थिति के, अजमेर की न्यायालयों में मुकदमे की पैरवी नहीं कर सकता था। इस कारण साण्डर्स के समय में भी वकीलों की संख्या बहुत कम थी। इससे न्यायालयों में बहस बहुत कम होती थी और मुकदमों का निस्तारण बहुत कम समय में हो जाता था।

    बाद में धारा 28 का प्रावधान हट जाने से पूरे देश से वकील अजमेर आने लगे जिससे बहसें लम्बी हो गईं और मुकदमों के फैसले विलम्ब से होने लगे। वकीलों की लम्बी बहसों का परिणाम यह हुआ कि अपराधी छूटने लगे और बेगुनाह सजा पाने लगे। मुराद अली लिखता है- जब कोई मालदार व्यक्ति मुकदमे बाजी में फंस जाता है तो न्यायालयों के कर्मचारियों तथा वकीलों की बांछें खिल जाती हैं।

    वकील और रीडर मन ही मन पुलाव पकाने लगते हैं। चपरासी भी इनाम की इच्छा से पूंछ हिलाने लगता है। न्यायाधिकारी यदि डिक्री दे भी दे तो वसूल कहां से हो। डिक्री को लेकर चाटते फिरो। ऐसी तकलीफों के कारण अजमेर के लोगों ने आपस में लेन देन बंद कर दिया। पहले लोग कच्चे कागज पर लिखवाकर रुपया उधार देते थे किंतु अब प्रोनोट लिखवाने लगे। बहुत से लोग मकान का किराया चुकाये बिना ही गायब हो गये थे इसलिये मकान मालिक भी किराया एडवांस मांगने लगे। झूठ, फरेब और दगाबाजी सीमा से अधिक बढ़ गई।

    बोहरों की मनमानी

    अजमेर नगर के आसपास के गांवों के किसान और निर्धन लोग अजमेर में आकर बोहरों से नमक, तेल, शक्कर, कपड़ा, गुड़, आदि उधार खरीदते थे। बोहरे इन्हें बहुत महंगा सामान देते थे। तोलते भी कम थे। फिर नगद पर सूद अलग वसूल करते थे। इस प्रकार उधार लेने वाले को हर सामान डेढ़ से दो गुनी कीमत पर मिलता था। फसल पकने पर बोहरे स्वयं ही किसान के खेत पर चले जाते। वे बाजार कीमत से कम दर पर अनाज लेते और तोलने में भी एक मन की जगह सवा मन तोल लेते। यदि किसान किसी तरह की आपत्ति करता तो बोहरे न्यायालय में मुकदमा ठोककर सूद पर सूद चढ़ाकर डिक्री करा लेते।

    दरगाह का प्रबंध सरकार के हाथों में

    ख्वाजा की दरगाह के सामने खड़े होकर प्रार्थना करने वालों के पास चिट्ठियां उतरा करती थीं। जिनमें सफेद कागज पर सुनहरी स्याही से बहुत ही खराब हस्तलेख से याचक की इच्छा पूरी होने की बात लिखी होती थी। ये इच्छायें धन एवं औरत मिलने की होती थीं। कुछ ही दिनों में उस याचक की इच्छा पूरी हो जाती थी। जब दरगाह का प्रबंध अंग्रेज सरकार ने अपने हाथ में ले लिया तो ये चिट्ठियां उतरनी बंद हो गईं।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-3

     01.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-3

    राजस्थान में मानव सभ्यता का उदय एवं पुरा-संस्कृतियों का विकास(1)



    पाषाण कालीन सभ्यताएँ

    राजस्थान में आदि मानव द्वारा प्रयुक्त लगभग डेढ़ लाख वर्ष पुराने प्राचीनतम पाषाण उपकरण उपलब्ध हुए हैं। इस भू-प्रदेश में मानव सभ्यता उससे भी पुरानी हो सकती है। राजस्थान में मानव सभ्यता पुरा-पाषाण, मध्य-पाषाण तथा उत्तर-पाषाण युग से होकर गुजरी। अतः राजस्थान में मानव अधिवास उस समय से है जब सभ्यता अपने प्रारम्भिक चरण धरना सीख रही थी। पुरा-पाषाण युग डेढ़ लाख वर्ष पूर्व से पचास हजार वर्ष पूर्व तक का काल समेटे हुए है। इस काल में हैण्ड एक्स, क्लीवर तथा चॉपर आदि का प्रयोग करने वाला मानव बनास, गंभीरी, बेड़च, बाधन तथा चम्बल नदियों की घाटियों (बांसवाड़ा, डूंगरपुर, उदयपुर, भीलवाड़ा, बूंदी, कोटा, झालावाड़ तथा जयपुर जिले) में रहता था। इस युग के भद्दे तथा भौंडे हथियार अनेक स्थानों से मिले हैं जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि इस युग का मानव लगभग पूरे प्रदेश में फैल गया था।

    पुरा पाषाण युग का मनुष्य, सभ्यता के उषा काल पर खड़ा था। उसका आहार शिकार से प्राप्त वन्य पशु, प्राकृतिक रूप से प्राप्त कन्द, मूल, फल, पक्षी, मछली आदि थे। नगरी, खोर, ब्यावर, खेड़ा, बड़ी, अनचर, ऊणचा, देवड़ी, हीराजी का खेड़ा, बल्लू खेड़ा (चित्तौड़ जिले में गंभीरी नदी के तट पर), भैंसरोड़गढ़, नगघाट (चम्बल और बामनी के तट पर) हमीरगढ़, सरूपगंज, बीगोद, जहाजपुर, खुरियास, देवली, मंगरोप, दुरिया, गोगाखेड़ा, पुर, पटला, संद, कुंवारिया, गिलूंड (भीलवाड़ा जिले में बनास के तट पर), लूणी (जोधपुर जिले में लूनी के तट पर), सिंगारी और पाली (गुड़िया और बांडी नदी की घाटी में), समदड़ी, शिकारपुरा, भावल, पीचक, भांडेल, धनवासनी, सोजत, धनेरी, भेटान्दा, धुंधाड़ा, गोलियो, पीपाड़, खींवसर, उम्मेदनगर (मारवाड़ में), गागरोन (झालवाड़), गोविंदगढ़ (अजमेर जिले में सागरमती के तट पर), कोकानी, (कोटा जिले में परवानी नदी के तट पर), भुवाणा, हीरो, जगन्नाथपुरा, सियालपुरा, पच्चर, तारावट, गोगासला, भरनी (टोंक जिले में बनास तट पर) आदि स्थानों से उस काल के पत्थर के हथियार प्राप्त हुए हैं।

    मध्य-पाषाण युग लगभग 50 हजार वर्ष पूर्व आरंभ हुआ। इस काल के उपकरणों में स्क्रैपर तथा पाइंट विशेष उल्लेखनीय हैं। ये औजार लूनी और उसकी सहायक नदियों की घाटियों में, चित्तौड़गढ़ जिले की बेड़च नदी की घाटी में और विराटनगर में भी प्राप्त हुए हैं। इस समय तक भी मानव को पशुपालन तथा कृषि का ज्ञान नहीं था। उत्तर-पाषाण काल का आरंभ लगभग 10 हजार वर्ष पूर्व हुआ। इस काल में पहले हाथ से और फिर से चाक से बर्तन बनाये गये। इस युग के औजार चित्तौड़गढ़ जिले में बेड़च व गंभीरी नदियों के तट पर, चम्बल और वामनी नदी के तट पर भैंसरोड़गढ़ व नवाघाट, बनास के तट पर हमीरगढ़, जहाजपुर, देवली व गिलूंड, लूनी नदी के तट पर पाली, समदड़ी, बनास नदी के तट पर टौंक जिले में भरनी, उदयपुर के बागोर तथा मारवाड़ के तिलवाड़ा आदि अनेक स्थानों से मिले हैं। इस काल में कपास की खेती होने लगी थी। समाज का वर्गीकरण आरंभ हो गया था तथा व्यवसायों के आधार पर जाति व्यवस्था का सूत्रपात हो गया था।

    ताम्र, कांस्य एवं लौह युगीन सभ्यताएँ

    राज्य में गणेश्वर (सीकर), आहड़ (उदयपुर), गिलूण्ड (राजसमंद), बागोर (भीलवाड़ा) तथा कालीबंगा (हनुमानगढ़) से ताम्र-पाषाण कालीन, ताम्रयुगीन एवं कांस्य कालीन सभ्यताएं प्रकाश में आयी हैं। ताम्रयुगीन प्राचीन स्थलों में पिण्डपाड़लिया (चित्तौड़), बालाथल एवं झाड़ौल (उदयपुर), कुराड़ा (नागौर), साबणिया एवं पूगल (बीकानेर), नन्दलालपुरा, किराड़ोत व चीथवाड़ी (जयपुर), ऐलाना (जालोर), बूढ़ा पुष्कर (अजमेर), कोल- माहोली (सवाईमाधोपुर) तथा मलाह (भरतपुर) विशेष उल्लेखनीय हैं। इन सभी स्थलों पर ताम्र उपकरणों के भण्डार मिले हैं। लौह युगीन सभ्यताओं में नोह (भरतपुर), जोधपुरा (जयपुर) एवं सुनारी (झुंझुनूं) प्रमुख हैं।

    सरस्वती नदी सभ्यता

    वैदिक काल में तथा उससे भी पूर्व के काल-खण्ड में इस प्रदेश में सरस्वती नदी प्रवाहित होती थी जिसके किनारे पर आर्यों ने अनेक यज्ञ व युद्ध किये। सरस्वती नदी की उत्त्पत्ति तुषार क्षेत्र से मानी गयी है। यह स्थान मीरपुर पर्वत है जिसे ऋग्वेद में सारस्वान क्षेत्र कहा गया है। ऋग्वेद के 10वें मण्डल में सूत्र 53 के मंत्र 8 में दृषद्वती तथा अश्वन्वती नदियों का उल्लेख है। माना जाता है कि सरस्वती एवं दृषद्वती का प्रवाह क्षेत्र आज के मरू प्रदेश में था। दसवीं सदी के आसपास दक्षिणी-पश्चिमी राजस्थान की गणना सारस्वत मण्डल में की जाती थी। यह पूरा क्षेत्र लूणी नदी बेसिन का एक भाग है। लूनी नदी सरस्वती की सहायक नदी थी। सरस्वती आज भी राजस्थान में भूमिगत होकर बह रही है। कुछ विद्वान घग्घर (हनुमानगढ़-सूरतगढ़ क्षेत्र में बहने वाली नदी) को भी सरस्वती का परवर्ती रूप मानते हैं।

    हनुमानगढ़ जिले में घग्घर को नाली कहा जाता है। यहाँ पर एक दूसरी धारा जिसे नाईवाला कहते हैं, घग्घर में मिलती है, जो सतलज का प्राचीन बहाव क्षेत्र है। यह सरस्वती नदी का पुराना हिस्सा था। तब तक सिंधु में मिलने के लिये सतलज में व्यास का समावेश नहीं हो पाया था। हनुमानगढ़ के दक्षिण पूर्व की ओर नाली के दोनों किनारे ऊंचे-ऊंचे दिखायी देते हैं। सूरतगढ़ से तीन मील पहले एक और सूखी धारा घग्घर में मिलती है। यह सूखी धारा वास्तव में दृशद्वती है। सूरतगढ़ से आगे अनूपगढ़ तक तीन मील की चौड़ाई रखते हुए नदी के दोनों किनारे और भी ऊंचे दिखायी देते हैं जिनके बीच में गंगनहर की सिंचाई से खूब हरा-भरा भाग है। यहीं पर अनेक गाँव बसे हैं। बीकानेर जिले में पहुँच कर घग्घर जल रहित हो जाती है। दृशद्वती, हिमालय की निचली पहाड़ियों से कुछ दक्षिण से निकलती है। पंजाब में इसे चितांग कहते हैं। भादरा में फिरोजशाह की बनवाई हुई पश्चिमी यमुना नहर, दृशद्वती के कुछ भाग में दिखायी पड़ती है। भादरा के आगे नोहर तथा दक्षिण में रावतसर के पास इसके रेतीले किनारे दिखते हैं।

    सिंधु घाटी सभ्यता

    सिंधु नदी हिमालय पर्वत से निकल कर पंजाब तथा सिंध प्रदेशों में बहती हुई अरब सागर में मिलती है। इस नदी के दोनों तटों पर तथा इसकी सहायक नदियों के तटों पर जो सभ्यता विकसित हुई उसे सिंधु सभ्यता, हड़प्पा सभ्यता एवं मोहेनजोदड़ो सभ्यता कहा जाता है। यह तृतीय कांस्यकालीन सभ्यता थी तथा इसका काल ईसा से 5000 वर्ष पूर्व से लेकर ईसा से 1750 वर्ष पूर्व तक माना जाता है। इस सभ्यता की दो प्रमुख राजधानियां हड़प्पा (पंजाब में) तथा मोहेनजोदड़ो (सिंध में) मानी जाती हैं। अब ये दोनों स्थल पाकिस्तान में हैं। मोहेनजोदड़ो शब्द का निर्माण सिन्धी भाषा के 'मुएन जो दड़ो' शब्दों से हुआ है जिनका अर्थ है- मृतकों का टीला।

    राजस्थान में इस सभ्यता के अवशेष कालीबंगा एवं रंगमहल आदि में प्राप्त हुए हैं। गंगानगर जिले में रायसिंहनगर से अनूपगढ़ के दक्षिण का भाग तथा हनुमानगढ़ से हरियाणा की सीमा तक के सर्वेक्षण में पाया गया है कि नाईवाला की सूखी धारा में स्थित 4-5 टीलों के नीचे सिंधु घाटी सभ्यता की बस्तियां दबी हुई हैं। इन टीलों पर अब नये गाँव बस चुके हैं। दृषद्वती के सूखे तल में काफी दूर तक टीले स्थित हैं। इस तल में स्थित 7-8 थेड़ों में हड़प्पाकालीन किंतु खुरदरे व कलात्मक कारीगरी रहित मिट्टी के बरतन के टुकड़ों की बहुतायत थी। सरस्वती तल में हड़प्पाकालीन छोटे-छोटे व उन्हीं के पास स्लेटी मिट्टी के बरतनों वाले उतने ही थेड़ मौजूद थे। हरियाणा की सीमा पर ऐसे थेड़ भी पाये गये जिन पर रोपड़ की तरह दोनों प्रकार के हड़प्पा व स्लेटी मिट्टी के ठीकरे मौजूद थे। हनुमानगढ़ किले की दीवार के पास खुदाई करने पर रंगमहल जैसे ठीकरों के साथ कुषाण राजा हुविश्क का तांबे का सिक्का भी मिला है जो इस बात की पुष्टि करता है कि भाटियों का यह किला व अंदर का नगर कुषाण कालीन टीले पर बना है। बीकानेर के उत्तरी भाग की सूखी नदियों के तल में 4-5 तरह के थेड़ पाये गये।

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  • अजमेर का इतिहास - 67

     01.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 67

    अजमेर का गौरव मेयो कॉलेज (1)



    ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन के दौरान यह माना जाता था कि भारतीय नरेशों के अशिक्षित होने के कारण उन्हें नियंत्रण में रखना सरल है। इसलिये उनकी शिक्षा पर कोई ध्यान नहीं दिया गया तथा इसे राजाओं का आंतरिक मामला कहकर उपेक्षित किया गया। ई.1830 से इस नीति में बदलाव आना आरंभ हुआ तथा नरेशों एवं राजकुमारों के शिक्षण के लिये निजी शिक्षक नियुक्त किये जाने लगे।

    ई.1858 में महारानी विक्टोरिया की घोषणा के बाद राज्यों को ब्रिटिश साम्राज्य का सहयोगी घोषित किया गया। ब्रिटिश साम्राज्य के काम में भारतीय नरेशों का सहयोग लेने के उद्देश्य से नरेशों एवं राजकुमारों की अंग्रेजी शिक्षा की आवश्यकता अनुभव की गई। महलों एवं रजवाड़ों में इनकी शिक्षा के लिये समुचित वातावरण उपलब्ध नहीं था। उन्हें साधारण स्कूलों में भी पढ़ने के लिये नहीं भेजा जा सकता था क्योंकि उन स्कूलों का स्तर बहुत नीचा था।

    ई.1869 में भरतपुर के पोलिटिकल एजेंट कर्नल सी. के. एम. वॉल्टर ने अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की कि भारतीय युवा पीढ़ी, विशेषकर राजपुत्रों में, बदलते विश्व परिवेश के अनुरूप भावनाएँ जाग्रत करने एवं उन्हें एक श्रेष्ठ व्यक्ति बनाने के लिए इस देश में भी 'ईटन' जैसी एक संस्था अपरिहार्य है। राजपूताना के एजीजी कर्नल कीटिंग्स ने वॉल्टर के सुझाव को महत्त्वपूर्ण माना तथा लॉर्ड मेयो ने भी इस सुझाव को महत्त्व प्रदान किया।

    ई.1870 में लॉर्ड मेयो ने अजमेर में आयोजित हुए राजपूताना शासकों के दरबार में लम्बा भाषण दिया जिसमें उन्होंने इच्छा व्यक्त की कि वे राजकुमारों के लिये एक कॉलेज खोलना चाहते हैं। कलकत्ता लौटकर भी लॉर्ड मेयो ने इस योजना पर काम करना जारी रखा तथा राजाओं से कहा कि वे प्रस्तावित कॉलेज के लिये धन दें। (भारत सरकार ने इस अवधि में भारतीय राजकुमारों की शिक्षा के लिए राजकोट में राजकोट कॉलेज, अजमेर में मेयो कॉलेज, इन्दौर में डेली कॉलेज और कुछ समय बाद लाहौर में एचिसन कॉलेज के नाम से विशेष विद्यालय खोले।)

    मेयो ने राजाओं को विश्वास दिलाया कि ब्रिटिश सरकार भी इस कार्य के लिये पर्याप्त धन देगी। देशी राजाओं ने वायसराय के इस प्रस्ताव का उत्साह से समर्थन किया। प्रारंभ में कॉलेज की स्थापना के लिये चार लाख रुपये की आवश्यकता अनुभव की गई किंतु एजीजी कर्नल ब्रुक ने इसे बढ़ाकर छः लाख रुपया कर दिया जिसमें से आधी राशि ई.1871 में, चौथाई राशि ई.1872 में तथा शेष चौथाई राशि ई.1873 में देने की आवश्यकता जताई गई। मेयो कॉलेज की स्थापना के लिये भारत सरकार ने 6 लाख रुपये का अंशदान दिया।

    ब्रिटिश अधिकारियों की मांग पर राजपूताने के 18 में से 15 राजाओं ने भी मेयो कॉलेज के लिये 6,26,000 रुपये उपलब्ध करवाये। इनमें से उदयपुर महाराणा ने एक लाख रुपये, जयपुर महाराजा ने सवा लाख रुपये, जोधपुर महाराजा ने एक लाख रुपये, कोटा महाराव ने 70 हजार रुपये, भरतपुर महाराजा ने 50 हजार रुपये, बीकानेर महाराजा ने 50 हजार रुपये, झालावाड़ महाराजराणा ने 40 हजार रुपये, अलवर महाराव ने 35 हजार रुपये, करौली महाराजा ने 15 हजार रुपये, बूंदी महाराव राजा ने 10 हजार रुपये, प्रतापगढ़ महारावल ने 10 हजार रुपये, किशनगढ़ महाराजा ने 6 हजार रुपये, टोंक नवाब ने 5 हजार रुपये, बांसवाड़ा महारावल ने 4 हजार रुपये तथा सिरोही महाराव ने 3,750 रुपये उपलब्ध करवाये।

    शाहपुरा के राजाधिराज ने कोई राशि उपलब्ध नहीं करवाई। इस सहायता के अतिरिक्त कई राजाओं ने यह आश्वासन भी दिया के वे इस कॉलेज में पढ़ने वाले अपनी रियासत के लड़कों के लिये हॉस्टल भी बनायेंगे। इस कॉलेज की योजना पर महाराणा उदयपुर ने कहा कि यह एक अच्छा कार्य है। जयपुर महाराजा रामसिंह ने कहा कि वॉयसराय के मन में जिन राजकुमारों की भलाई के लिये रुचि है, यह कॉलेज उन राजकुमारों के मनोबल तथा बौद्धिक स्तर को काफी ऊँचा बढ़ायेगा तथा इससे अगणनीय लाभ होगा।

    टोंक नवाब ने कहा कि यह आनंद का स्रोत है, उन्होंने इस कार्य के लिये अधिक राशि देने की इच्छा व्यक्त की किंतु अनेक कारणों से केवल 25 हजार रुपये ही देने का प्रस्ताव भिजवाया। वॉयसराय ने इसमें से केवल 5 हजार रुपये ही स्वीकार किये। वायसराय के इस कार्य को जोधपुर महाराजा ने उदारता का कार्य बताया। कोटा महाराव छित्तरसिंह ने वॉयसराय की इच्छा की प्रशंसा की तथा राजकुमारों के भविष्य के लिये कल्याणकारी बताया।

    भरतपुर महाराजा जसवंतसिंह ने राशि भेजते समय सरकार के सदैव सहयोग की अपेक्षा की। बीकानेर महाराजा सरदारसिंह ने इस कार्य पर वास्तविक प्रसन्नता व्यक्त करते हुए आशा की कि उनकी रियासत में होने वाले दंगों पर सरकार अधिक अर्थदण्ड नहीं लगायेगी। झालावाड़ के महाराजाराणा पृथ्वीसिंह ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं कि कॉलेज का बहुत अच्छा प्रभाव होगा। अलवर महाराव ने इसे गर्व करने योग्य आवश्यक उद्देश्य बताया।

    बूंदी महाराव राजा ने कहा कि सरकार की इच्छा इस कॉलेज को खोलकर हृदय से देशी राजाओं का भला करने की है। किशनगढ़ महाराजा पृथ्वीसिंह ने इस प्रस्ताव को अत्यंत प्रशंसनीय बताया। सिरोही के महाराव ने इसे राजपुत्रों की सम्पूर्ण भलाई वाली योजना बताया। जब विभिन्न रियासतों द्वारा भेजी गई राशि एजीजी को प्राप्त हो गई तो वायसराय ने एजीजी को निर्देश दिये कि जब तक कॉलेज प्रबंधन के न्यासी तय नहीं हो जाते तथा कॉलेज का संविधान पूरा नहीं हो जाता, तब तक के लिये इस राशि को अजमेर-मेरवाड़ा के चीफ कमिश्नर तथा भारत सरकार के सचिव के संयुक्त नाम से राजकीय प्रतिभूति में निवेश कर दिया जाये।

    अजमेर के कमिश्नर को मेयो कॉलेज अजमेर की तरफ से राजकीय प्रतिभूति पर ब्याज लेने के लिये अटॉर्नी नियुक्त किया गया। जयपुर नरेश इस कॉलेज को जयपुर में बनवाना चाहते थे किंतु लॉर्ड मेयो ने इस कॉलेज के लिये अजमेर का चुनाव किया। ऐसा करने के तीन कारण थे- (1.) यह नगर, राजपूताने के केन्द्र में स्थित था। (2.) यह ब्रिटिश शासित क्षेत्र था जहाँ समस्त रियासतों के शासक बिना किसी भय के आपस में मिल सकते थे। (3.) यदि इस कॉलेज को किसी भी रियासत में बनाया जाता तो अन्य रियासतों के राजाओं के हृदय में ईर्ष्या उत्पन्न होती। भारत सरकार ने इस कॉलेज के मुख्य भवन तथा हॉस्टल के निर्माण के लिये भूमि उपलब्ध करवाई तथा छः लाख रुपयों की लागत से एक हॉस्टल भी बनवाया।

    लॉर्ड मेयो का मूल विचार यह था कि इस कॉलेज को एक श्रेष्ठ उद्यान के मध्य में खड़ा किया जाये। मुख्य भवन के चारों ओर विद्यार्थियों के लिये बंगले बनाये जायें। बंगलों के पास ही घुड़शालायें तथा अनुचरों के क्वार्टर्स हों। यह अनुभव किया गया कि अजमेर में पेयजल की उपलब्धता एक कठिन कार्य होगा, इसलिये भवनों की छतों के जल को भूमिगत टांकों में एकत्रित किया जाये। इस कॉलेज के लिये चर्च की बगल में, जयपुर जाने वाली सड़क के बाईं ओर स्थान निर्धारित किया गया।

    चूंकि उन्हीं दिनों में अजमेर में रेलवे लाइन तथा रेलवे स्टेशन के लिये भूमि का निर्धारण किया जाना था इसलिये मेयो कॉलेज के लिये स्थान का निर्धारण कुछ दिनों के लिये टाल दिया गया। अंत में मि. गोर्डन ने कॉलेज के लिये भूमि का चयन किया। यह एक पुरानी एजेंसी जागीर (ओल्ड रेजीडेंसी) थी जिसमें 88 एकड़ भूमि थी। इसके साथ ही 79 एकड़ भूमि कॉलेज पार्क के लिये और खरीदी गई। इस प्रकार कॉलेज के पास 167 एकड़ भूमि हो गई।

    लॉर्ड मेयो इस कॉलेज का नक्शा इस प्रकार का बनाना चाहते थे जिसमें एक विशाल हॉल हो और उसके चारों ओर कक्षायें हों। उनके बाहर की तरफ सजावटी स्तम्भों पर बने हुए बरामदे हों जो काफी हवादार और सजावटी हों। उन्होंने केवल इतना ही सुझाव दिया, कोई निश्चित नक्शा नहीं दिया। राजपूताने के एजीजी कर्नल लेविस पेली को मेयो के विचार से प्रसन्नता नहीं हुई। उसे लगा कि यदि कॉलेज बिल्डिंग भव्य और आकर्षक नहीं हुई तो राजा लोग नाराज हो जायेंगे किंतु वह भी इस भवन को अधिक अलंकृत नहीं बनाना चाहता था।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-4

     01.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-4

    राजस्थान में मानव सभ्यता का उदय एवं पुरा-संस्कृतियों का विकास(2)



    कालीबंगा

    हड़प्पा कालीन सभ्यता वाले 30-35 थेड़, जिनमें कालीबंगा का थेड़ सबसे ऊँचा है, की खुदाई साठ के दशक में की गयी। खुदाई के दौरान मिली काली चूड़ियों के कारण इस स्थान को कालीबंगा कहा जाता है। कालीबंगा के टीलों की खुदाई के दौरान दो भिन्न कालों की सभ्यता प्राप्त हुई है। पहला भाग 2400 ई.पू. से 2250 ई.पू. का है तथा दूसरा भाग 2200 ई.पू. से 1700 ई.पू. का है। यहाँ से एक दुर्ग, जुते हुए खेत, सड़कें, बस्ती, गोल कुओं, नालियों मकानों व धनी लोगों के आवासों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। मकानों में चूल्हों के अवशेष मिले हैं।

    कालीबंगा के लोग मिट्टी की कच्ची या पक्की ईंटों का चबूतरा बनाकर मकान बनाते थे, बरतनों में खाना खाने की मिट्टी की थालियां, कूण्डे, नीचे से पतले व ऊपर से प्यालानुमा गिलास, लाल बरतनों पर कलापूर्ण काले रंग की चित्रकारी, मिट्टी की देवी की छोटी-छोटी प्रतिमायें, बैल, बैलगाड़ी, गोलियां, शंख की चूड़ियां, चकमक पत्थर की छुरियां, शतरंज की गोटी तथा एक गोल, नरम पत्थर की मुद्रा आदि मिले। बरतनों पर मछली, बत्तख, कछुआ तथा हरिण की आकृतियां बनी हैं। मुहरों पर सैंधव लिपि उत्कीर्ण है जिसे पढ़ा नहीं जा सका है। यह लिपि दाहिने से बायें लिखी हुई है। यहाँ से मिट्टी, तांबे एवं कांच से बनी हुई सामग्री मिली है। छेद किये हुए किवाड़ एवं मुद्रा पर व्याघ्र का अंकन केवल यहीं से मिले हैं।

    रंगमहल

    सूरतगढ़-हनुमानगढ़ क्षेत्र में रंगमहल, बड़ोपल, मुण्डा, डोबेरी आदि स्थलों के निकट कई थेड़ मिले हैं जिनमें से कुछ की खुदाई की गयी है। इनमें रंगमहल का टीला सबसे ऊँचा है। इस खुदाई से ज्ञात हुआ कि प्रस्तर युग से लेकर छठी शताब्दी ई.पू. तक यह क्षेत्र पूर्णतः समृद्ध था। यही कारण है कि यहाँ से प्रस्तर युगीन एवं धातु युगीन संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं। रंगमहल के टीलों पर पक्की ईंटें व रोड़े, मोटी परत व लाल रंग वाले बरतनों पर काले रंग के मांडने युक्त हड़प्पा कालीन सभ्यता के बरतनों के टुकड़े बिखरे हुए हैं। यहाँ से ताम्बे के दो कुषाण कालीन सिक्के तथा गुप्त कालीन खिलौने भी मिले हैं। तांबे के 105 अन्य सिक्के भी प्राप्त हुए हैं।

    आहड़ सभ्यता

    सरस्वती-दृश्द्वती नदी सभ्यता से निकलकर इस प्रदेश के मानव ने आहड़, गंभीरी, लूनी, डच तथा कांटली आदि नदियों के किनारे अपनी बस्तियां बसाईं तथा सभ्यता का विकास किया। इन सभ्यताओं का काल 7 हजार से 3 हजार वर्ष पुराना ठहराया गया है। यह सभ्यता उदयपुर जिले में आहड़ नदी के आस-पास, बनास, बेड़च, चित्तौड़गढ़ जिले में गंभीरी, वागन, भीलवाड़ा जिले में खारी तथा कोठारी आदि नदियों के किनारे अजमेर तक फैली थी। इस क्षेत्र में प्रस्तर युगीन मानव निवास करता था। प्राचीन शिलालेखों में आहड़ का पुराना नाम ताम्रवती अंकित है। दसवीं व ग्यारहवीं शताब्दी में इसे आघाटपुर अथवा आघट दुर्ग कहा जाता था। बाद के काल में इसे धूलकोट कहते थे।

    उदयपुर से तीन किलोमीटर दूर 1600 फुट लम्बे और 550 फुट चौड़े धूलकोट के नीचे आहड़ का पुराना कस्बा दबा हुआ है जहाँ से ताम्र युगीन सभ्यता प्राप्त हुई है। ये लोग लाल, भूरे व काले मिट्टी के बर्तन काम में लेते थे जिन्हें उलटी तपाई शैली में पकाया जाता था। मकान पक्की ईंटों के होते थे। पशुपालन इनकी अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार था। आहड़ सभ्यता की खुदाई में मानव सभ्यता के कई स्तर प्राप्त हुए हैं। प्रथम स्तर में मिट्टी की दीवारें और मिट्टी के बर्तन मिले हैं। दूसरा स्तर प्रथम स्तर के ऊपर स्थित है। यहाँ से बस्ती के चारों ओर दीवार भी मिली है। तीसरे स्तर से चित्रित बर्तन मिले हैं। चतुर्थ स्तर से ताम्बे की दो कुल्हाड़ियां मिली हैं। मकानों से अनाज पीसने की चक्कियां, ताम्बे के औजार, पत्थरों के आभूषण, गोमेद तथा स्फटिक की मणियां प्राप्त हुई हैं। तांबे की छः मुद्रायें व तीन मोहरें मिली हैं। एक मुद्रा पर एक ओर त्रिशूल तथा दूसरी ओर अपोलो देवता अंकित है जो तीर एवं तरकश से युक्त है। इस पर यूनानी भाषा में लेख अंकित है। यह मुद्रा दूसरी शताब्दी ईस्वी की है। ये लोग मृतकों को कपड़ों तथा आभूषणों के साथ गाढ़ते थे।

    बागोर सभ्यता

    भीलवाड़ा कस्बे से 25 किलोमीटर दूर कोठारी नदी के किनारे वर्ष 1967-68 में डॉ. वीरेंद्रनाथ मिश्र के नेतृत्व में की गयी खुदाई में 3000 ई.पू. से लेकर 500 ई. पू. तक के काल की बागोर सभ्यता का पता लगा। यहाँ के निवासी कृषि, पशुपालन तथा आखेट करते थे। यहाँ से तांबे के पाँच उपकरण प्राप्त हुए हैं। मकान पत्थरों से बनाये गये हैं। बर्तनों में लोटे, थाली, कटोरे, बोतल आदि मिले हैं।

    बालाथल

    बालाथल उदयपुर जिले की वल्लभनगर तहसील में स्थित है। यहाँ से 1993 में ई.पू. 3000 से लेकर ई.पू. 2500 तक की ताम्रपाषाण युगीन संस्कृति के बारे में पता चला है। यहाँ के लोग भी कृषि, पशुपालन एवं आखेट करते थे। ये लोग मिट्टी के बर्तन बनाने में निपुण थे तथा कपड़ा बुनना जानते थे। यहाँ से तांबे के सिक्के, मुद्रायें एवं आभूषण प्राप्त हुए हैं। आभूषणों में कर्णफूल, हार और लटकन मिले हैं। यहाँ से एक दुर्गनुमा भवन तथा ग्यारह कमरों वाले विशाल भवन भी प्राप्त हुए हैं।

    गणेश्वर सभ्यता

    सीकर जिले की नीम का थाना तहसील में कांटली नदी के तट पर गणेश्वर टीला की खुदाई 1977-78 में की गयी थी। यहाँ से प्राप्त सभ्यता लगभग 2800 वर्ष पुरानी है। ताम्र युगीन सभ्यताओं में यह अब तक प्राप्त सबसे प्राचीन केंद्र है। यह सभ्यता सीकर से झुंझुनूं, जयपुर तथा भरतपुर तक फैली थी। यहाँ से मछली पकड़ने के कांटे मिले हैं जिनसे पता चलता है कि उस समय कांटली नदी में पर्याप्त जल था। यहाँ का मानव भोजन संग्रहण की अवस्था में था। यहाँ से ताम्र उपकरण एवं बर्तन बड़ी संख्या में मिले हैं। ऐसा इसलिये संभव हो सका क्योंकि खेतड़ी के ताम्र भण्डार यहाँ से निकट थे। मिट्टी के बर्तनों में कलश, तलसे, प्याले, हाण्डी आदि मिले हैं जिन पर चित्रांकन उपलब्ध है।

    ऋग्वैदिक सभ्यता

    सरस्वती और दृश्द्वती के बीच के हिस्से को मनु ने ब्रह्मावर्त बताया है जो अति पवित्र एवं ज्ञानियों का क्षेत्र माना गया है। आगे उत्तर-पूर्व में कुरुक्षेत्र स्वर्ग के समान माना गया है। सरस्वती-दृश्द्वती के इस क्षेत्र में पाकिस्तान की सीमा से लगते, अनूपगढ़ क्षेत्र से उत्तर पूर्व की ओर चलने पर हड़प्पा कालीन सभ्यता से बाद की सभ्यता के नगर बड़ी संख्या में मिलते हैं जो भूमि के नीचे दबकर टीले के रूप में दिखायी पड़ते हैं। इन टीलों में स्लेटी मिट्टी के बर्तन काम में लाने वाली सभ्यता निवास करती थी। यह सभ्यता हड़प्पा कालीन सभ्यता से काफी बाद की थी। अनूपगढ़ तथा तरखानवाला डेरा से प्राप्त खुदाई से इस सभ्यता पर कुछ प्रकाश पड़ा है। राजस्थान में इस सभ्यता का प्रतिनिधित्व करने वाले अन्य टीलों में नोह (भरतपुर), जोधपुरा (जयपुर) एवं सुनारी (झुंझुनूं) प्रमुख हैं। ये सभ्यताएं लौह युगीन सभ्यता का हिस्सा हैं। सुनारी से लौह प्राप्त करने की प्राचीनतम भट्टियाँ प्राप्त हुई हैं।

    ऋग्वैदिक काल में भारतीय समाज में दो वर्ण थे। पहला वर्ण गौर वर्ण के लोगों का था जो आर्य कहलाते थे। दूसरा कृष्ण वर्ण के लोगों का था जो अनार्य कहलाते थे। ऋग्वेद में ब्राह्मण और क्षत्रिय शब्दों का प्रयोग तो बार-बार हुआ है किंतु केवल एक ही सूक्त ऐसा है जिसमें चतुर्वर्णों का उल्लेख मिलता है। इस सूक्त में कहा गया है कि परम पुरुष के मुख से ब्राह्मण की, भुजाओं से क्षत्रिय की, जांघों से वैश्य की और पैरों से शूद्रों की उत्त्पत्ति हुई। इस रूपक का आशय जातियों की श्रेष्ठता का क्रम निर्धारित करना नहीं है अपितु प्रत्येक जाति के कार्य की स्थिति को स्पष्ट करना है। यह रूपक बताता है कि ब्राह्मण का कार्य देश के मुख के समान है। अर्थात् यज्ञ-हवन, नीति निर्देशन, उपदेश तथा शिक्षण का कार्य करने वाले ब्राह्मण हैं। क्षत्रिय देश की भुजाएं हैं। अर्थात् वे बाहुबल से प्रजा की रक्षा करते हैं। समाज रूपी शरीर के मुख और बाहुओं से नीचे अर्थात् पेट से लेकर जांघ तक का कार्य वैश्य करते हैं अर्थात् कृषि पशुपालन एवं व्यापार के माध्यम से वे प्रजा का पेट भरते हैं। शूद्रों का कार्य देश को गति देना है। वे निर्माण, सेवा और अन्य कार्यों के माध्यम से समाज को गति प्रदान करते हैं।

    वैदिक काल में जातीय श्रेष्ठता का विचार उत्पन्न नहीं हुआ था। सभी आर्य परस्पर बराबर थे। कोई भी आर्य अपनी क्षमता और रुचि के अनुसार एक कर्म को त्याग कर दूसरा कर्म अपना सकता था। अंगिरा ऋषि लकड़ी का कार्य करते थे। उनके वंशज परवर्ती काल में जातियों का निर्माण होने पर 'सः अंगिरा' अर्थात् 'वह जो अंगिरा है' अर्थात् जांगिड़ कहलाये। वैदिक काल में देश व प्रजा की रक्षा के लिये युद्ध करने वाले क्षत्रिय कहलाते थे। व्यापार, वाणिज्य, कृषि कर्म, पशुपालन आदि आर्थिक गतिविधियों में संलग्न समुदाय वैदिक काल में वैश्य कहलाता था।

    उत्तर ऋग्वैदिक सभ्यता

    उत्तर ऋग्वैदिक युग के सम्पूर्ण संस्कृत वांगमय से लेकर राजपूत काल के शिलालेखों तक में आर्यों के चार वर्णों- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र तथा चार आश्रमों-ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास का उल्लेख मिलता है। जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता गया, इन वर्णों में कई भेद और विभेद भी दृष्टि गोचर होने लगे। स्कंदपुराण में पंचगौड़, पंचद्रविड़, पुष्करणा और श्रीमाली ब्राह्मणों का बोध होता है जो ब्राह्मणों में श्रेष्ठ माने जाते थे। राजस्थान के कई ब्राह्मण अपने आप को पूर्वी भारत के ब्राह्मणों से श्रेष्ठ मानते थे। क्योंकि पूर्वी ब्राह्मणों में से कुछ मांसाहारी होते थे।

    श्रेष्ठ ब्राह्मण, निम्न समझे जाने वाले ब्राह्मणों के साथ बराबरी का व्यवहार नहीं करते थे। इस काल में गोत्र एवं प्रवर भी अलग-अलग होने लग गये थे। कुछ ब्राह्मण पुरोहिताई के काम में, कुछ राजकीय सेवा में, कुछ अध्यापन में तथा कुछ ब्राह्मण व्यापार कर्म में भी लगे हुए थे। ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य समुदाय से इतर जातियों को शूद्र कहा जाता था। इनमें कुम्हार, दर्जी, तेली, तम्बोली, नाई, लुहार, सुनार, ठठेरा आदि जातियाँ गिनी जाती थीं। शूद्र वर्ग को भी समाज में पर्याप्त आदर मिलता था। इनमें से अधिकतर जातियाँ खेती का काम भी करती थीं इस कारण इनकी आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति ठीक थी। उपरोक्त चार वर्णों के अतिरिक्त डोम, चमार, चाण्डाल, नट, गांछे, मातंग, मच्छीमार, व्याध, धोबी, चिड़ीमार, जुलाहे आदि जातियाँ अधम और अधमाधम कही जाती थीं। इन्हें अंत्यज अर्थात् अस्पर्श्य माना जाता था। समाज के इस वर्ग की स्थिति अत्यंत दयनीय थी।

    महाभारत कालीन सभ्यता

    महाभारत काल से पूर्व मानव बस्तियां सरस्वती तथा दृशद्वती क्षेत्र से हटकर पूर्व तथा दक्षिण की ओर खिसक आयीं थीं। उस काल में कुरु जांगलाः तथा मद्र जांगलाः के नाम से पुकारे जाने वाले क्षेत्र आज बीकानेर तथा जोधपुर के नाम से जाने जाते हैं। इस भाग के आस पास का क्षेत्र सपादलक्ष कहलाता था। कुरु, मत्स्य तथा शूरसेन उस काल में बड़े राज्य थे। अलवर राज्य का उत्तरी भाग कुरुदेश के, दक्षिणी और पश्चिमी भाग मत्स्य देश के और पूर्वी भाग शूरसेन के अंतर्गत था। भरतपुर तथा धौलपुर राज्य तथा करौली राज्य का अधिकांश भाग शूरसेन देश के अंतर्गत थे। शूरसेन देश की राजधानी मथुरा, मत्स्य की विराट तथा कुरु की इन्द्रप्रस्थ थी। महाभारत काल में शाल्व जाति की बस्तियों का उल्लेख मिलता है जो भीनमाल, सांचोर तथा सिरोही के आसपास बसी हुई थीं।

    जनपद कालीन सभ्यता

    ईसा से 1,000 वर्ष पूर्व से लेकर ईसा के 300 वर्ष पूर्व तक का समय जनपद काल कहलाता है। यहाँ से इतिहास की आधारभूत सामग्री, सिक्के, आभूषण अभिलेख आदि मिलने लगते हैं। सिकंदर के आक्रमण के समय और उसके बाद गुप्तों तक राजस्थान में अनेक छोटे-छोटे जनपदों का उल्लेख मिलता है। इनमें भरतपुर के आस-पास राजन्य जनपद तथा मत्स्य जनपद, नगरी का शिवि जनपद और अलवर के निकट शाल्व जनपद प्रमुख हैं।

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  • अजमेर का इतिहास - 68

     01.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 68

    अजमेर का गौरव मेयो कॉलेज (2)



    ई.1871 में मेयो कॉलेज के सार्वजनिक निर्माण खण्ड की स्थापना की गई। मि.गोर्डन को इसका प्रथम एक्जीक्यूटिव इंजीनियर बनाया गया। उसने डीग के महलों का भ्रमण किया तथा शिमला में बैठकर दो नक्शे तैयार किये। इनमें से पहला नक्शा ग्रेशियन ढंग का था तथा दूसरा नक्शा इण्डो-सारसेनिक ढंग का था। लॉर्ड मेयो को ग्रेशियन ढंग वाला नक्शा पसंद आया किंतु इस नक्शे को अनुमोदित नहीं किया गया। मि. जोसेलाइन ने मेयो कॉलेज के लिये कोल्हापुर स्कूल का डिजाइन प्रस्तुत किया किंतु यह भी स्वीकृत नहीं हुआ।

    इसके बाद चार साल तक कॉलेज के मानचित्र के निर्माण पर विभिन्न अधिकारियों एवं अभियंताओं में लम्बा पत्र व्यवहार हुआ। लम्बे विचार विमर्श हुए और अंत में रॉयल इंजीनियर्स सेवा के मेजर जनरल कनिंघम एवं मेजर जनरल मॉण्ट द्वारा प्रस्तुत नक्शा स्वीकार कर लिया गया। राजपूताना के एजीजी मि.अल्फ्रेड सी. ल्याल ने 19 अक्टूबर 1875 को भवन की नींव रखी। इसके बनने में 7 साल और 8 माह लगे। इसके भवन निर्माण पर 3,81,696 रुपये की लागत आई।

    इसके निर्माण का आरंभिक कार्य एक्जीक्यूटिव इंजीनियर ब्रासिंगटन की देखरेख में आरंभ हुआ। उसके बाद एक्जीक्यूटिव इंजीनियर भगारसिंह की सेवायें ली गईं जो 30 जून 1885 तक अजमेर में रहा। इसी के साथ मेयो कॉलेज का पीडब्लूडी खण्ड भंग कर दिया गया तथा कॉलेज के पर्यवेक्षण का काम कॉलेज के प्रिंसीपल को दे दिया गया। इसका उद्घाटन 7 नवम्बर 1885 को वायसरॉय लॉर्ड डफरिन द्वारा हुआ। ई.1903-04 में इसमें विस्तार कार्य किया गया।

    ई.1909 में इस कॉलेज के लिये चार भूखण्ड खरीदे गये। ये भूखण्ड, कॉलेज के विद्यार्थियों के स्वास्थ्य की रक्षा के उद्देश्य से खरीदे गये। ई.1908-09 में नवीन पूर्वी खण्ड जोड़ा गया ताकि कक्षाओं की संख्या पूरी की जा सके। राजाओं, राजकुमारों तथा सामंत पुत्रों के लिये स्थापित किये गये इस कॉलेज की स्थापना का उद्देश्य शैक्षिक कम और राजनैतिक अधिक था। साम्राज्यिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये अंग्रेज अधिकारियों को एक ऐसे अंग्रेजी पसंद वर्ग की आवश्यकता थी जिन्हें शासन में उच्च पदों पर महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी जा सकें।

    अक्टूबर 1875 में अंग्रेज अधिकारियों ने कॉलेज तो आरंभ कर दिया किंतु उन्हें चिंता थी कि इसमें पढ़ने के लिये राजा एवं राजकुमार आयेंगे अथवा नहीं। उनकी चिंता को दूर करने के लिये अलवर नेरश मंगलसिंह इसके आरंभ होने से पहले ही अजमेर पहुँच गये। वे इसमें प्रवेश लेने वाले प्रथम विद्यार्थी थे। इस सत्र में जयपुर रियासत के जोबनेर ठिकाणे के करणसिंह, बगरू से पृथ्वीसिंह, दूदू के शिवनाथसिंह भरती हुए।

    इस सत्र में अलवर से पांच, मारवाड़ से 8, मेवाड़ से 4, जयपुर से 6, झालावाड़ से 1, अजमेर से 9 विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया। इन 33 विद्यार्थियों में से एक अलवर रियासत का राजा था। एक को शीघ्र ही झालावाड़ की राजगद्दी पर बैठाया जाने वाला था तथा एक विद्यार्थी महाराजा जोधपुर का भाई था। ये समस्त विद्यार्थी 7 से 17 साल की आयु के थे। ये अपनी मातृभाषा में भी लिखना और पढ़ना नहीं जानते थे। इनमें से केवल अजमेर के तीन विद्यार्थी ही ऐसे थे जिन्हें अंग्रेजी का पूर्व ज्ञान था।

    मेयो कॉलेज में जयपुर के विद्यार्थियों के आवास के लिये जयपुर हाउस का मानचित्र अंग्रेज इंजीनियर डी. के. फैब ने बनाया। इसके निर्माण पर 66 हजार रुपये खर्च आया। ई.1875 में जोधपुर नरेश महाराजा जसवंतसिंह (द्वितीय) ने मारवाड़ के सरदारों और राजवंश के बालकों के रहने के लिये 36 हजार रुपये व्यय कर मेयो कालेज में एक बोर्डिंग (छात्रावास) बनवाया और मेयो कॉलेज के लिये मकराना (संगमरमर) का पत्थर मुफ्त दिया। जब तक अलवर रेजीडेंस तैयार नहीं हुआ, महाराजा अलवर ब्रिटिश रेजीडेंसी के एक बंगले में रहे। मेजर सेंट जॉन को मेयो कॉलेज का प्रथम प्रिंसीपल बनाया गया।

    यहाँ से वह कर्नल के पद पर पदोन्नत होकर कश्मीर व बलूचिस्तान का रेजीडेंट बना। कॉलेज के खुलने के समय मि. केटर को ऑफीशियेटिंग हैड मास्टर, मि. कीने को राइटिंग मास्टर, मौलवी हबीबुर्रहमान को उर्दू एण्ड पर्शियन टीचर, पण्डित जानकी नाथ को जूनियर इंगलिश एण्ड वर्नाक्यूलर मास्टर तथा पण्डित शिवनारायण को हिन्दी एण्ड संस्कृत ट्यूटर रखा गया।

    5 दिसम्बर 1879 को लॉर्ड लिटन मेयो कॉलेज के पुरस्कार वितरण समारोह में भाग लेने अजमेर आये। इस दौरान उन्होंने कहा कि इस कॉलेज का प्रथम उद्देश्य देश को प्रथम श्रेणी के बुद्धिमान युवक उपलब्ध करवाना तथा राजपूताना के उच्च वर्ग के युवकों को शारीरिक प्रशिक्षण उपलब्ध करवाना है। लॉर्ड रिपन ने इस संस्था के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा था कि हमारा उद्देश्य आपको वह समस्त ज्ञान उपलब्ध करवाना है जो पश्चिमी सभ्यता ने आज तक अर्जित किया है। साथ ही वह श्रेष्ठ ज्ञान जो परम्परागत रूप से आपमें निहित है, उसे भी बनाये रखना है।

    कर्नल लॉक ने इस संस्था के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए कहा कि इस कॉलेज का उद्देश्य केवल किताबी ज्ञान उपलब्ध करवाना नहीं है अपितु मस्तिष्क एवं शरीर को ऊर्जा एवं बढ़ावा देना है। लॉक ने कहा कि यह कॉलेज विभिन्न रियासतों के राजकुमारों को निकट लाकर उनमें परस्पर मित्रता स्थापित करने का भी अवसर प्रदान करता है जिससे कि वे इतने परिपक्व हो जायें कि उनके अपने और उनकी प्रजा के उच्चतम लाभ निष्फल न हो सकें। इस संस्था में केवल राजा एवं राजकुमार ही पढ़ते थे।

    संस्था के प्रथम प्राचार्य ऑलिवर सेंट जॉन के समय से ही संस्था को अच्छे शिक्षाविदों की सेवाएं प्राप्त होती रहीं। विद्यालय प्रारंभ से ही 20 खेल मैदानों एवं सभी आधुनिक सुविधाओं से युक्त रहा। बीसवीं सदी का पूर्वार्द्ध संस्था के इतिहास में गौरवशाली परंपराओं का पर्याय रहा और संस्था में विलियम लॉक, स्टो, लेस्ली जॉन, पं.चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी', कानमल माथुर एवं गफ्फार हुसैन जैसे प्रख्यात शिक्षाविदों ने पढ़ाया।

    लॉर्ड मेयो की प्रतिमा

    आरम्भ में लॉर्ड मेयो की प्रतिमा कॉलेज के केन्द्रीय कक्ष में लगाई गई थी। ई.1885 में मेयो कॉलेज भवन बनकर पूरा हुआ। 5 नवम्बर 1885 को वायसराय मारकीस ऑफ डफरिन अजमेर आया। इसी वर्ष लॉर्ड मेयो की प्रतिमा कॉलेज के केन्द्रीय कक्ष से हटाकर पश्चिम में बाहर लॉन में स्थानान्तरित की गयी।

    मेयो हॉस्टल में शराब और औरतों का बोलबाला

    अंग्रेजों ने भारतीय राजाओं तथा सामंतों को सभ्य बनाने के लिये मेयो कॉलेज खोला था किंतु इस कॉलेज में पढ़ने के प्रति राजपूताना के राजाओं में विशेष उत्साह नहीं था। 1970 से 1990 तक इस कॉलेज में जयपुर, जोधपुर, उदयपुर से कोई शासक अथवा राजकुमार पढ़ने के लिये नहीं आया। कोटा नरेश उम्मेदसिंह को बलपूर्वक लाया गया। बीकानेर नरेश बालक होने के कारण सरलता से अजमेर लाया जा सका। कॉलेज में वातावरण बहुत उत्साह जनक नहीं था। शराब पीना और स्त्रियों का रात्रि में हॉस्टलों में आना सामान्य घटनाएं थीं। कॉलेज के मंच से घोषणा की गई कि अब कॉलेज के द्वारा राजाओं, राजकुमारों तथा सामंतों को सभ्य नहीं बनाया जायेगा। ई.1890 में लेंसडाउन ने कॉलेज की असफलता को स्वीकार किया। मेयो कॉलेज को असफल होने से बचाने के लिये लेन्स डाउन तथा कर्जन ने इसके प्रशासन में फेर बदल किया।

    मेयो कॉलेज की दुर्दशा

    1891 के पश्चात् इस कॉलेज में विद्यार्थियों की संख्या में निरंतर गिरावट आने लगी। शेरिंग ने ई.1896 में हिस्ट्री ऑफ मेयो कॉलेज लिखकर कॉलेज के पुराने छात्रों से अपील की कि वे अपनी मातृ संस्था को सफल बनायें। शासकों से अनुरोध किया गया कि वे अपने यहाँ ऐसी संस्थायें खोलें जिनसे छात्रों को, बड़ा होने पर अजमेर के मेयो कॉलेज में भरती किया जा सके। ई.1902 में लॉर्ड कर्जन ने इस समस्या को व्यापक रूप देकर समस्त कुलीन वर्गीय कॉलेजों के प्रबंध से सम्बन्धित भारतीय नरेशों की एक सभा बुलाई। इसके बाद यह सम्मेलन हर साल बुलाया जाने लगा जिसका निमंत्रण वायसरॉय की ओर से दिया जाता था।

    कर्जन ने कॉलेजों के प्रशासन में आवश्यक परिवर्तन किये जिससे नरेशों का विश्वास प्राप्त किया जा सके। मेयो कॉलेज की प्रबंध समिति में 16 में से 13 सदस्य राज्यों के नरेश अथवा प्रमुख सामंतों को बना दिया गया। कॉलेज में खेले जाने वाले पोलो के खेल की आलोचना हुई। प्राचार्य को पढ़ाने का दायित्व सौंपा गया। भारतीय अध्यापकों की नियुक्ति आरंभ हुई तथा इम्पीरियल कैडेट कोर की योजना बनी। वास्तव में यह एक राजनीतिक योजना थी।

    जोधपुर के राजा और राजकुमार मेयो कॉलेज में

    फरवरी 1907 में जोधपुर नरेश सरदारसिंह अजमेर में मेयो कॉलेज की 'कॉन्फ्रेंस' में सम्मिलित हुआ। नवम्बर 1907 में वह पुनः अजमेर आया तथा मेयो कॉलेज के उत्सव में सम्मिलित हुआ। ई.1910 में जोधपुर नरेश उम्मेदसिंह शिक्षा प्राप्त करने के लिये अपने बड़े भ्राता महाराजकुमार सुमेरसिंह के साथ ही अजमेर के मेयो कॉलेज में प्रविष्ट हुए। उन्होंने कर्नल वाडिंग्टन् की निगरानी में रहकर, शिक्षा प्राप्त की। उम्मेदसिंह का छोटा भ्राता महाराज अजीतसिंह भी मेयो कॉलेज में शिक्षा प्राप्त करने लगा।

    भारत के वायसरॉय मेयो कॉलेज में

    भारत की स्वतन्त्रता से पूर्व, भारत के समस्त वायसरायों ने, मेयो कॉलेज का अवलोकन किया। इनमें लॉर्ड लिटन (ई.1879), लॉर्ड रिपन (ई.1881), लॉर्ड डफरिन (ई.1885), लॉर्ड लेन्सडाऊन (ई.1891), लॉर्ड कर्जन (ई.1899 तथा ई.1902), लॉर्ड मिन्टो (ई.1906), लॉर्ड इर्विन (ई.1930), लॉर्ड वेलिंग्टन (ई.1932), आदि प्रमुख थे। इनके अतिरिक्त प्रिस ऑफ वेल्स (बाद में किंग एडवर्ड सप्तम्) भी संस्था में आए। उन्होनें इस संस्था को 'पूर्व का ईटन' की संज्ञा दी। ई.1911 में महारानी मैरी ने भी इस संस्था को देखा।

    मेयो कॉलेज का संग्रहालय

    मेयो कॉलेज का संग्रहालय विश्व भर की शिक्षण संस्थाओं में अद्भुत है। इसमें प्राचीन काल के अस्त्र-शस्त्र, भाले, तलवारें, बन्दूकें, पिस्तोलें तथा आधुनिक युग के हथियार-बम आदि रखे गये हैं। भारतीय और मिश्र सभ्यता के प्राचीन अवशेषों की प्लास्टर ऑफ पेरिस की अनुकृतियां तथा छठी शताब्दी ईस्वी से बारहवीं शताब्दी ईस्वी के बीच के पुरातात्विक अवशेष, पहली-दूसरी शताब्दियों की पत्थर की कलाकृतियों की अनुकृतियां, 17वीं से 19वीं शताब्दी ईस्वी की पुरानी पेंटिंग्स, पोट्रेट्स, ऑइल पेंटिंग्स, तथा फोटोग्राफ, भारत में विभिन्न काल खण्डों में प्रचलित रहे सिक्के, विश्व के प्रमुख देशों में प्रचलित सिक्के तथा मुद्रायें, विभिन्न पशुओं के अण्डे, घोंसले, मधु मक्खियों के छत्ते, विभिन्न पशुओं की खालें, विभिन्न प्रकार के पशु, पक्षी, सरीसृप एवम् मछलियों के नमूने उनके सींग तथा दांत, तितलियां, कीट-पतंगे, सीपियां, घोंघे, कौड़ियां, वनस्पति एवं जन्तुओं के काष्ठ जीवाश्म, चट्टानों के नमूने, खनिज पदार्थ, विभिन्न प्रकार की पोषाकें, टोपियाँ, बुनाई के नमूने तथा विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों के नमूने संग्रहीत हैं।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-5

     01.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-5

    ऐतिहासिक काल में राजस्थान की सभ्यता एवं संस्कृति(1)



    मौर्य कालीन सभ्यता

    मौर्यकाल (325 ई.पू. से 184 ई.पू.) से हमें तिथिक्रम युक्त इतिहास मिलना आरम्भ हो जाता है। इस काल के आते-आते राजस्थान में सभ्यता काफी विकास कर गई थी। मौर्यकाल में लगभग पूरा राजस्थान मौर्यों के अधीन था। चंद्रगुप्त मौर्य के समय से ही मौर्यों की सत्ता इस क्षेत्र में फैल गई। बैराठ (विराटनगर) से मौर्य कालीन सभ्यता के अवेशष प्राप्त हुए हैं। इसे बैराठ सभ्यता भी कहते हैं। जयपुर से 85 किलोमीटर दूर विराटनगर की भब्रू पहाड़ी से मौर्य सम्राट अशोक का एक शिलालेख मिला है।

    ई.1840 में यह शिलालेख एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल (कलकत्ता) को स्थानांतरित कर दिया गया। ई.1909 में बीजक की पहाड़ी में एक बौद्ध विहार (गोलमंदिर) के अवशेष प्राप्त हुए। इस विहार को सम्राट अशोक के शासन काल के प्रारंभिक दिनों में निर्मित माना जाता है। इसमें पत्थरों के स्थान पर लकड़ी के स्तंभों तथा ईंटों का प्रयोग हुआ है। इस स्थान से अलंकारिक मृद्पात्र, पहिये पर त्रिरत्न तथा स्वस्तिक चिह्न प्राप्त हुए हैं। जयपुर नरेश सवाई रामसिंह के काल में यहाँ से एक स्वर्णमंजूषा प्राप्त हुई थी जिसमें भगवान बुद्ध के अस्थि अवशेष थे। चीनी चात्री ह्वेनसांग ने इस क्षेत्र में 8 बौद्ध विहार देखे थे जिनमें से एक का ही पता चल पाया है। अशोक ने जिस योजना के अनुसार शिलालेख लगवाये थे, उसके अनुसार इन 8 बौद्ध विहारों के पास 128 शिलालेख लगवाये होंगे किंतु अब तक 2 शिलालेख ही प्राप्त हुए हैं। मौर्यकाल में राजस्थान, सिंध, गुजरात तथा कोंकण का क्षेत्र अपर जनपद अथवा पश्चिम जनपद कहलाता था।

    विदेशी जातियों का शासन

    मौर्यों का पतन हो जाने के बाद राजस्थान छोटे-छोटे गणों में बंट गया। इस कारण भारत भूमि पर विदेशी जातियों के आक्रमण बढ़ गये। यूनानी राजा मिनेण्डर ने ई.पू. 150 में मध्यमिका नगरी पर अधिकार करके, अपने राज्य की स्थापना की। तब से भारत में विदेशी जातियों का शासन होना आरंभ हो गया। यूनानी राजाओं के सिक्के सांभर झील के पास स्थित मीठे पानी की झील नलियासर से प्राप्त हुए हैं। उनके कुछ सिक्के बैराठ तथा नगरी से भी प्राप्त हुए हैं। ई.पू. प्रथम शताब्दी में पश्चिमी राजस्थान पर सीथियनों के आक्रमण आरंभ हुए। कुषाण, पह्लव तथा शकों को सम्मिलित रूप से सीथियन कहा जाता है। ईसा से लगभग 90 वर्ष पहले राजस्थान से यूनानी शासकों का शासन समाप्त हो गया तथा सीथियनों ने अपने पांव जमा लिये। ये लोग ई.पू. 57 तक मथुरा पर शासन करते रहे। शक मूलतः एशिया में सिकंदरिया के रहने वाले थे। राजस्थान में नलियासर से शक शासक हुविष्क की मुद्रा प्राप्त हुई है। उसका शासनकाल ई.95 से ई.127 के बीच था। पश्चिमी भारत में शकों की दो शाखायें- क्षहरात एवं चष्टन, कुषाणों के अधीन रहकर शासन करती थीं। कनिष्क के शिलालेख के अनुसार ई.83 से ई.119 तक कुषाण राजस्थान के पूर्वी भाग पर शासन करते रहे। ई.150 के सुदर्शन झील अभिलेख से ज्ञात हुआ है कि कुषाणों का राज्य मरुप्रदेश से साबरमती के आस पास था।

    ई.130 से 150 के मध्य, शक शासक रुद्रदामन तथा यौधेयों के मध्य घनघोर संघर्ष हुआ। इस संघर्ष में यौधेय पराजित हो गये। ई.150 के लगभग नागों की भारशिव शाखा ने अपनी शक्ति बढ़ानी आरंभ की तथा विदेशी शासकों को भारत से बाहर निकालने का काम आरंभ किया। इन नागों ने यौधेय, मालव, अर्जुनायन, वाकटाक, कुणिंद, मघ आदि जातियों की सहायता से पंजाब, राजस्थान तथा मध्य प्रदेश को कुषाणों से मुक्त करवा लिया। नागों ने कुषाणों के विरुद्ध अपनी विजयों के उपलक्ष्य में वाराणसी में दस अश्वमेध यज्ञ किये। वह स्थान आज भी दशाश्वमेध घाट कहलाता है।

    देशी जनपदों के सिर उठाने से, ई.176 के लगभग कुषाणों की कमर टूटने लगी तथापि वे ई.295 तक किसी न किसी रूप में शासन करते रहे। ई.226 में मालवों ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया। कर्कोट नगर से प्राप्त मुद्राओं पर 'मालवानाम् जयः' अंकित है। इसके बाद चौथी शताब्दी तक मालव, अर्जुनायन तथा यौधेयों की प्रभुता का काल है। ये सब जातियाँ अथवा जनपद वस्तुतः महाभारत कालीन जातियों के उत्तरकालीन अवशेष थे। मालव जयपुर के आसपास के क्षेत्र में थे जो बाद में अजमेर, टोंक तथा मेवाड़ के क्षेत्र तक फैल गये। समुद्रगुप्त के काल तक मालव अपनी गणतंत्रात्मक सत्ता बनाये रहे। मालवों ने अर्जुनायनों के साथ मिलकर कुषाणों को परास्त किया। अर्जुनायन भरतपुर-अलवर क्षेत्र में फैले थे। राजस्थान के उत्तरी क्षेत्र के यौधेय (अब जोहिये) भी गणतंत्रात्मक अथवा अर्द्ध राजतंत्रात्मक व्यवस्था बनाकर रहते थे। यौधयों ने राजस्थान से कुषाण सत्ता को उखाड़ फैंका। इस युग में आभीर तथा मौखरी गणराज्य भी अपना अस्तित्त्व रखते थे।

    गुप्त कालीन सभ्यता

    भारतीय इतिहास में 320 ईस्वी से 495 ईस्वी तक का काल गुप्तकाल कहलाता है। समुद्रगुप्त ने पश्चिमी भारत के गणराज्यों पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। इनमें से अधिकांश गणराज्यों ने बिना लड़े ही समुद्रगुप्त की अधीनता स्वीकार की। पश्चिमी राजस्थान के नाग शासक भी गुप्तों के अधीन सामंत हो गये। समुद्रगुप्त के पुत्र चंद्रगुप्त द्वितीय ने इन गणराज्यों को नष्ट कर इस सम्पूर्ण क्षेत्र को अपने राज्य में मिला लिया। उसके आक्रमणों से शक क्षत्रपों का अस्तित्त्व हमेशा के लिये नष्ट हो गया। गुप्त कालीन भवनों एवं मंदिरों के अवशेष जोधपुर जिले में मण्डोर, नागौर जिले में दधिमति माता मंदिर तथा जालोर जिले के भीनमाल सहित अनेक स्थानों पर मिलते हैं।

    गुप्त काल में हूणों के आक्रमण आरंभ हुए। कई शताब्दियों तक गुप्त शासकों ने हूणों से देश की रक्षा की किंतु अंत में हूणों के कारण गुप्त साम्राज्य अस्ताचल को चला गया। हूण राजा तोरमाण ने ई. 503 में गुप्तों से राजस्थान छीन लिया। छठी शताब्दी के आसपास हूणों ने समस्त गणतंत्रात्मक तथा अर्द्ध राजतंत्रात्मक राज्यों को छिन्न भिन्न करके, उस काल तक विकसित हुए सभ्यता के समस्त प्रमुख केंद्र नष्ट कर दिये। इनमें वैराट, रंगमहल, बड़ोपल और पीर सुल्तान की थड़ी आदि स्थान प्रमुख हैं। (ये नाम बाद के हैं, तब इन स्थानों के नाम कुछ और रहे होंगे।) मालवा के राजा यशोवर्मन (अथवा यशोधर्मन) ने 532 ई. में हूणों को परास्त कर राजस्थान में शांति स्थापित की किंतु उसके मरते ही राजस्थान में पुनः अशांति हो गयी।

    हर्षवर्धन एवं उसके बाद का काल

    सातवीं शताब्दी में पुष्यभूति वंश का राजा हर्षवर्धन प्रतापी सम्राट हुआ। हर्ष के बारे में हमें दो ग्रंथों- बाणभट्ट द्वारा लिखित हर्षचरित तथा ह्वेनसांग द्वारा रचित सी-यू-की से जानकारी मिलती है। चीनी यात्री ह्वेनसांग हर्ष के शासनकाल में भारत आया था। सी-यू-की का कथन है कि शीलादित्य (हर्षवर्धन) ने पूर्व से लेकर पश्चिम तक के समस्त राजाओं को जीत लिया तथा वह दक्षिण की ओर आगे बढ़ा। राजतरंगिणी का कथन है कि कश्मीर कुछ समय तक हर्ष के अधीन रहा। चालुक्य अभिलेख उसे 'सकलोत्तरापथनाथ' कहते हैं। इनसे अनुमान होता है कि उसका राज्य नेपाल से लेकर दक्षिण में नर्मदा तक फैल गया। थानेश्वर, पूर्वी राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, सिंध तथा उत्तरप्रदेश भी उसके अधीन थे। हर्ष के काल में राजस्थान चार भागों में विभक्त था- 1. गुर्जर, 2. बघारी, 3. बैराठ तथा 4. मथुरा। बयालीस वर्ष तक शासन करने के बाद 648 ई. में हर्षवर्धन की मृत्यु हुई। उसके बाद राजस्थान में पुनः अव्यवस्था फैल गयी।

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